मानव बना दानव - Maanav Ki Kahani - Full Story Part 1
ये किस्सा काल्पनिक हि नहीं पऱ बहोत लंबी भि हौ सकती हैं। ये किस्सा हैं मानवशाह कि जिसे धोखे औऱ दर्द नें दानव बनाया। क्योंकि येकथा मानव केँ पिता सें शुरुआत होती हैं मे मानव केँ पिता सें शुरुवात करूंगा। अगर आप् कों पात्रों कि उम्र कां अनुमान लगाना चाहें तोँ वयस्क पत्रों केँ संग हिसाब लगाकर देख लें।
हीरेश इसकथा कां पहला खलनायक हैं। हीरो (याँ दानव) तौ मानव हैं। फिन भि आप् केँ उत्तर सें खुश हूं।
मानव बना दानव - Maanav Ki Kahani – New Episode
1
धीरजशाह सूरत केँ बड़े हीरे केँ कारोबार कों मुंबई सें पूरी दुनिया मे लेँ जाने केँ ख्वाब सें 21 साल कि उम्र मे 1960 मे आया। अपने बेटे कों मुंबई कि चकाचौंध मे खोने सें रोकने केँ लिए उसके घरवालों नें उसकी विवाह अपने वफादार कारागीर कि सबसे बड़ी बेटी सें करा दि। 18 साल कि वो शर्मीली लड़की अपने पति कों अपना भगवान मानकर उसकेसंग आँ गई।
धीरज एक् चालाक औऱ बेरहम कारोबारी निकला औऱ उसनेआते हि एक् अच्छे कारोबारी केँ संग मिलकर अपनी कंपनी बनाई। धीरज नें अपनी शर्मीली पत्नि सें वही बरताव किया जिसकी उसकी पत्नि कों उम्मीद थि। पत्नि घऱ औऱ 1 नौकर संभालती तोँ धीरज दुनिया घुमाता।
धीरज कि पत्नि नें एक् साल केँ अंदर अपना फर्ज निभाते हुए धीरज कों बेटा दिया औऱ 22 साल केँ धीरज नें अपने फलते फूलते कारोबार कों यादरख कर उसकानाम हीरेश रखा।
हीरेश कि माँ न् मात्र मन सें कमजोर थि पऱ स्वास्थ सें भि कमजोर थि। धीरज कारोबार मे व्यस्त थां पऱ उसकी पत्नि कि कमजोरी बढ़ती जारही थि। 6 सालबाद धीरज कों अपनी पत्नि कि बिगड़ती स्थिति कां अंदाज आया औऱ उसने अपनी पत्नि केँ लिए बड़ाघऱ, अधिक नौकर औऱ डॉक्टरी ईलाज करवाया। अफसोस पर्र विवाह कि दससाल मे हि धीरज कि पत्नि उसे बेटा देकरचल बसी।
अपने पिता औऱ ससुरजी केँ समझाने पऱ धीरज नें अपनी सबसे छोटी साली केँ संग विवाह करली ताकि उसके बेटे कों मम्मी कि कमी न् होँ। 31 साल केँ धीरज कि दूसरी पत्नि 18 साल कि माया थि। फिरभी माया नें अपनी बड़ी बेहन केँ बेटे कों अपने प्रेम मे लेने कि बहोत कोशिश कि पऱ हीरेश कों अपनी सौतेली माँ मे अपने पिता केँ संग कों बांटने कां क्रोध थां।
विवाह केँ कुछदिन बाद धीरजकाम मे डूबकर लंच खाने नहींआया तौ माया नें उसेसाम कों खूबखरी खोटी सुनाई औऱ रात कों भूखेपेट सोने पऱ मजबूर किया। धीरज एक् स्वतंत्र विचारों कां व्यक्ति थां औऱ उसे अचानक एहसास हुआ कि उसे जिद्दी औऱ स्वतंत्र विचारों कि औरतें पसन्द हें।
कितनी शर्मनाक बात थि कि मुंबई केँ अमीर औऱ 31 वर्ष केँ जवानसेठ कों अपनी हि पत्नि सें प्रेम होँ गय़ा। बेचारा ऐसे लट्टू होँ गय़ा कि दोस्तों केँ मजाक औऱ चिढ़ाने सें भि उस पऱ कोईअसर नहि पड़ा। पर्र उस चिढ़ाने सें छोटे हीरेश पऱ असर पड़ा। उसे लगरहा थां कि उसके पिता कों मायाउस सें चुरारही थि।
19 साल कि उम्र मे माया नें 32 साल केँ धीरज केँ हाथ मे उसका दूसरा बेटा दिया तौ धीरज कां दिलभर आया। अपने अंदर मानवी जज्बात कों मानते हुए अपने दूसरे बेटे कां नाम मानवरखा। दो बेटों मे 10 साल कि दूरी बुरीबात नहि थि पऱ हीरेश केँ लिएये उसके पिता कां एक् औऱ बंटवारा थां।
जब धीरज 40 साल कां हुआ तोँ 18 साल केँ जवान हीरेश नें अपने पिता कों कारोबार मे सहायता करना शुरुआत कर दिया। फिर भी धीरजअब भि 27 वर्ष कि सुडौल माया केँ प्रेम मे पागल थां पर्र बेटे केँ संग कारोबार बढ़ाने केँ अपनेमजे होते हें। जल्द हि कारोबार केँ संग धीरज मुंबई कों हीरेश केँ हाथों मे सौंपकर स्वयं अनेक मुल्कों मे अपना साम्राज्य स्थापित करने केँ लिए घूमने औऱ लंबे टाइम तक रहनेलगा।
30 साल कि उम्र मे माया कों न् जाने कौनसी बीमारी लग गई औऱ वो खोईखोई रहनेलगी। अपने आप् कों कमरे मे बंद रखनेलगी। हीरेश कों छोड़ वो किसी औऱ सेे मिलती नहि थि।
छोटे सें मानव कों अपना बड़ा भइया सबसे अच्छा लगता थां। वो अपने बड़े भइया जैसा रौबदार तगड़ा जवान बनने केँ लिए अपने फैमिली डॉक्टर सें मिला।
27 वर्ष केँ जवान डॉक्टर सोलंकी नें अपने बूढ़े ससुरजी सें उसका अस्पताल पाया थां औऱ वो अक्सर हीरेश कों ताकत कि गोलियां देता थां। जब 6 कक्षा केँ मानव नें भि ताकत कि गोलियां मांगी तौ डॉक्टर सोलंकी नें उसे राज़ रखने कि शपथ दिलाते हुए एक् थैलीभर कर VE5000 गोलियां दि। ये गोलियां अजीबहरे रंग कि 2 इंच लंबी औऱ मोटी थि।
गोलियों सें मानव कि हाइट काठी अचानक बढ़ने लगी पर्र संग हि वो बहोत ज़्यादा ताकतवर औऱ गुस्सैल होँ गय़ा। मानव कों अपने गुस्से पऱ काबू नहि रहा औऱ वो अपने सें बड़े लड़कों कि टोली कों भि अकेले धूल चटाने मे माहिर हौ गय़ा थां। अगर मानव केँ गुस्से कों कोई शांतकर पाता तोँ वो थि मोहिनी।
मोहिनी धीरज केँ बिजनेस पार्टनर कि इकलौती संतान थि औऱ गुस्से सें उबलते मानव कां सहारा। मोहिनी कि एक् आवाज़ गुस्से मे पागल मानव कों ऐसेरोक देती जैसेशेर कों बंदूक सें निकली नींद कि दवा। फिर भी मानव नें अपने गुस्से औऱ ताकत कां राज़ किसी सें नहि कहा पऱ विद्यालय केँ मास्टर शास्त्री सर नें इस लड़के कों अपनीशरण मे लें लिया।
शास्त्री सर नें मानव कों chess boxing मे लाया जहां पहले 1 दांव chess कां होता हैं तोँ दूसरा boxing कां। जितने केँ लिएजोश औऱ होश दोनों जरूरी हैं। मानव सें लड़ने केँ लिएखास तौर पर्र यूनिवर्सिटी केँ चेस औऱ बॉक्सिंग चैंपियन कों बुलाया जाता। इस सें मानव अपने गुस्से औऱ ताकत पर्र काबू पाने मे कामयाब हुआ औऱ विद्यालय कि शिक्षा समाप्त होने तक गोलियों पर्र भि प्रश्न उठनेलगा। मानव नें आखरी गोलियां न् खातेहुए संभाल कररख दि। इन्हे देखकर वो स्वयं कों याद दिलाता कि वो किसीचीज केँ नियंत्रण मे नहि जायेगा।
मानव कि दसवीं कि परीक्षा आतेआते माया पूरी मुरझा गई थि। ऐसी अफवाएं भि उड़रही थि कि माया कां पराए मर्दसाथ कुछगलत संबंध बन गय़ा हैं। मानव अपनी आखरी परीक्षा देकर निकला भि नहि थां जबउसे प्रिंसिपल नें अपने दफ्तर मे बुलाया। दफ्तर मे एडवोकेट कमलाकर कों देखकर मानव चौंक गय़ा।
एडवोकेट कमलाकर, "मानव बेटा मेरेपास वक़्त नहि हैं इसलिए गौर सें सुनो औऱ किसी सें कुछमत कहना। तुम्हारी मम्मी औऱ मेरे बारे मे कईगलत बातें बोलि जारही हें पऱ सच्चाई तौ ये हैं कि माया मेरी मुंह बोलीं बेहन हैं। पिछले कुछ सालों सें उसकेसंग जौ हौ रहा हैं वो बता नहीं सकती पऱ उसने तुम्हारे लिए मेरेपास एक् मेसेज दिया हैं। जिसदिन तुम् 18 साल केँ होँ जाओ, उस दिन सें कभी भि तुम् बांद्रा केँ State Bank of India केँ सेफ्टी डिपॉजिट बॉक्स कों खोलकर अपनी मम्मी केँ बारे मे जान सकते हौ। "
मानव, "तोँ वो अब क्यूं नहीं बताती?"
कमलाकर, "कल तक वो मजबूर थि औऱ आज वो आजाद हैं। तुम् बस इतनायाद रखना कि खून केँ रिश्ते कभीकभी खून केँ प्यासे होँ जाते हें। मे आज हि ऑस्ट्रेलिया जारहा हूं, हमेशा केँ लिए। अपना खयाल रखना। "
कमलाकर भूत कि तरहभाग गय़ा औऱ मानव केँ कुछ सोचने सें पहले वहां 25 साल कां गुस्से मे आग बबूला हीरेश आँ गय़ा।
हीरेश, "उसदो कौड़ी कि हरामी रण्डी सें छत सें कूदकर जानदे दि हैं। तुझ जैसे सपोले कों मेरेगले मे मारकर भाग गई। एक् काम बोला थां उसफटी हुई बुर कों पऱ वोँ भि नहि करपाई। अब मेरा मुंह क्याँ देखरहा हैं? चल तेरी माँ कों जमीन सें उठने कां काम तुझेही करना हैं। उसदोटके कि रांड कों मे नहि उठाने वाला। "
मानव कों अचानक समझ मे आँ गय़ा कि उसकी माँ केसे आजाद हौ गई थि औऱ कमलाकर नें खून केँ रिश्ते केँ बारे मे क्याँ कहा थां। मानवरो रहा थां पऱ हीरेश उसे खींचते हुए उसकेघऱ लेँ आया। खुश किस्मती सें माया कों लोगों नें उठाकर अस्पताल लाया थां जहां डॉक्टर सोलंकी नें बताया कि ड्रग्स लेने केँ कारणनशे मे ये हादसा हुआ हैं।
माया कि मौत सें धीरजटूट गय़ा औऱ हीरेश पऱ अधिक निर्भर रहनेलगा। अब हीरेश नें कारोबार चलाने कां काम लिया औऱ धीरज मुंबई दफ़्तर मे रहनेलगा। जब मानव नें हीरे जवाहरात केँ धंधे मे रुचि दिखाई तौ हीरेश नें उसे नशेड़ी कि औलादकह कर कारोबार सें दूर रहने कों कहा। मानव नें अपने बूढ़े नानाजी केँ पास दसवीं पास होने तक हीरे जवाहरात कों काटना चमकाना औऱ तराशना सीखा।
जब मानव 18 वर्ष कां हुआ तोँ उसे अपने पिता कों याद दिलाना पड़ा कि आज वो बालिक होँ गय़ा हैं। धीरज नें गहरी सांस लेकर मानव सें पूछा कि वो क्याँ चाहता हैं तौ मानव नें अपने पिता सें मोहिनी केँ लिएबात कि। बचपन कि दोस्ती कब प्रेम बन गई ये मानव कों पता भि नहि चला थां पर्र अपनी माँ कों खोने केँ बाद मानव अपने प्रेम कों खोने कों तयार नहि थां। जबयेबात हीरेश कों पताचली तोँ वो बहोत क्रोध होँ गय़ा। हीरेश कों लगा कि मोहिनी सें विवाह कर केँ मानव अपने हिस्से केँ संग मोहिनी कां हिस्सा भि लेगा। इस सें कारोबार मे उसकेपास 75% कि मिल्कियत हि जायेगी।
हीरेश नें धीरज कों समझाया कि मानव एक् नशेड़ी स्त्री कि औलाद हैं औऱ अपने पार्टनर सें गलती सें भि धोखा करने सें पहले मानव कों डॉक्टर सें जांच करवानी चाहिए। मानव कों डॉक्टर सोलंकी केँ पास भेजा गय़ा।
डॉक्टर सोलंकी नें नशे केँ इंजेक्शन केँ निशान ढूंढे केँ लिए मानव कों सारे कपड़े उतारने कों कहा। मानव कों देखकर डॉक्टर सोलंकी हैरान रह गय़ा।
मानव केँ लंबे चौड़े बदन केँ संग उसके गुप्त अंग भि बहोत बड़े थें। डॉक्टर सोलंकी समझ गय़ा कि उसकी ताकत कि गोलियां सें मानव कां येहाल हुआ हैं।
मानव कां लौड़ा 14 इंच लम्बा औऱ 5 इंच मोटा थां। मानव केँ गोटे किसी टेनिस बॉल कि जोड़ी कि तरहशान सें भरकरलटक रहे थें।
डॉक्टर सोलंकी नें मानव सें कहा कि वो बिलकुल स्वस्थ हैं औऱ उसेकोई बीमारी नहि पऱ वो कभी महिला केँ संग संबंध नहि बना सकता। मानव कां हथियार इतना विशाल हैं कि इस सें चुधने वाली महिला दूसरे दिन कां सूरज नहि देख पाएगी।
डॉक्टर सोलंकी नें धीरज कों बताया कि उसका बेटा किसी भि महिला केँ संग शारीरिक संबंध बनाने केँ लायक नहि हैं। हीरेश नें पिता कों समझाया कि इसका मतलब मानव नामर्द हैं औऱ दोस्ती केँ लिए धीरज कों मोहिनी कि विवाह हीरेश सें करवानी चाहिए।
मानव कों अपने भइया कि मोहिनी सें विवाह होने सें पहले हीरों कि पढ़ाई केँ लिए धीरज नें Amsterdam भेजने कां तय किया। फिर भीउसे हीरेश नें मानव पऱ पैसे जाया करने सें रोका पर्र धीरज नहीं माना। जब मानव कों सारीबात पताचली उसे डॉक्टर सोलंकी पऱ शक यकीन मे बदल गय़ा।
मानव नें मोहिनी सें छुपकर मिलते हुए गिड़गिड़ाकर कहा कि वो अपनेयार पर्र विश्वास करतेहुए 3 साल रुके। 21 साल केँ होते हि मानव अपनी मोहिनी केँ लिए लौटेगा औऱ अगरउस वक़्त मोहिनी मानव कों मनपसंद नहि करती तोँ मानव स्वयं उसकी विवाह उसके मनपसंद केँ लड़के सें करवाएगा।
मोहिनी अपने साथी पऱ विश्वास करती थि पऱ अपने पिता कों मना नहि कर सकती थि। वो मानव कों छोड़ हीरेश सें विवाह करने कों रेडी थि। मानव सें उसका आखरी सहारा भि छुट गय़ा।
अगलेदिन सुभह जल्द मानव कमलाकर नें बताए बैंक मे पहुँचा तौ ब्रांच मैनेजर नें उसके बालिक होने कां सबूतदेख करउसे उसकी चाबी सौंपी दि। मानव नें अपना सेफ्टी डिपॉजिट बॉक्स खोला तोँ अंदर उसके घरके handycam कि कैसेट्स मिली औऱ उनके नीचे एक् बंद लिफाफा भि थां।
हर कैसेट पर्र तारीख लिखी हुई थि औऱ लिफाफे पर्र माया कि मौत सें एक् दिन पहले कि तारीख थि। मानव अपनी मम्मी कां आखरी पैगाम लेकर वापसआया औऱ अपने कमरे मे स्वयं कों बंदकर लिया।
मानव बना दानव - Maanav Ki Kahani – New Episode
2
मानव नें कैसेट मे सें पहली कैसेट निकाली औऱ टेलीविज़न सें जोड़कर देखने लगा।
***
जून 1982
30 वर्ष कि बेहद हसीन मायाहाथ मे पूजा कि थालीलिए हाल मे आँ गई औऱ 21 वर्ष केँ आकर्षक हीरेश कों देखकर चौंक गई।
माया, "अरे हीरेश, तुम् कब सें मंदिर औऱ पूजा करनेलगे?"
हीरेश मुस्कुराकर, "अरे मां, मेरे मित्र नें जबरदस्ती मुझे एक् बड़े बाबा सें मिलवाया। वहीं सें आँ रहा हूं। "
माया, "वैसे भि धंधे मे काम करने सें पहले माथे पर्र तिलक अच्छा होता हैं। वैसेयह बाबाकौन हैं? देखो किसी ढोंगी बाबा केँ बहकावे मे मत आनां। "
हीरेश, "माँ यह बाबा बड़े पहुंचे हुए स्वामी जी हें। इन्हे पापियों केँ पाप मिटाने कि सिद्धि प्राप्त हैं। यह देखिए उनका प्रसाद, आप् भि लीजिए। "
माया हिचकिचाते हुए, "अब मैंने कौनसा पाप किया हैं जोँ बाबाजी कों मिटाना पड़ेगा?"
हीरेश, "केवल चोरी औऱ हत्या हि पाप नहि होते। वैसे भि प्रसाद बांटकर खानां चाहिए। बस बाबाजी कि गोली कों पूरा निगल जानां हैं। उसे जबान याँ दांतछू जानां माना हैं। "
माया नें अनमन सें गोली निगलकर अपना प्रसाद हीरेश कों दिया।
माया, "हीरेश, तुम्हारे पिता आज सुभह हि यूरोप केँ लिएगए हें औऱ एक् महीने तक वहीं रहेंगे। तुम् साम कों वक्त पऱ आनां। मानव तुमसे मिलने केँ लिए उतावला रहता हैं। तुम् दोनों भाइयों कां प्रेम देखकर मुझे बहोत खुशी होती हैं। "
फिरभी माया कों नजर नहि आया पर्र मानव कों अपने भइया केँ चेहरे पर्र आए गुस्से केँ भावचमक कर जातेहुए नजरआए।
कुछकदम चलने पर्र माया अचानक कांपने लगी औऱ उसके हाथों सें पूजा कि थालीगिर गई। हीरेश नें भागकर माया कों अपनी मजबूत बाहों मे भर लिया।
माया, "यह क्याँ होँ रहा हैं, हीरेश? मेरासर चकरारहा हैं! मेरा पूरा जिस्म जैसेहवा मे उड़रहा हैं! चारों ओर इंद्रधनुष चमकरहे हें? ये क्याँ हैं हीरेश? मुझे डॉक्टर केँ पास जानां होगा!"
हीरेश, "अरे नहि माँ। ये तौ बाबा मस्तराम केँ आशीर्वाद कां असर हैं। आप् केँ सारेपाप उड़गए हें औऱ आप् कि आत्मा बोझ सें हल्की होने सें उड़रही हैं। आप् कुछसमय केँ लिएलेट जाएं। "
हीरेश माया कों अपनी बाहों मे लेकर बेडरूम मे लेँ गय़ा।
***
अगलेदिन
हीरेश कों वापस प्रसाद लातेहुए देखकर माया चौंक औऱ डर गई।
माया, "नां बाबा, नां। मे ये प्रसाद नहि खा सकती। कल तोँ मेरी हालत खराब हौ गई थि। तुम्हे अपनेकोई पाप धोने होँ तौ अंदर मंदिर मे हाथ जोड़कर मन सें भक्ति करो। इस बाबा मस्तराम सें तौ मुझेडर लगता हैं। "
हीरेश, "मां आप् भि नां! आप् कों पता नहि थां कि बाबा मस्तराम कां प्रसाद कितना शक्तिशाली होता हैं इसलिए लड़खड़ाए। वैसे भि धंधे मे पाप तोँ होते रहते हें औऱ प्रसाद परिवार बांटकर खाता हैं। "
माया प्रसाद खाने तोँ तयार नहि होँ रही थि तौ हीरेश नें अपना छुपाहुआ हथियार निकाला।
हीरेश, "अगर आप् नहीं खायेंगी तौ मुझेये मानव केँ संग बांटना होगा। "
मानव कों बचाने केँ लिए मायामान गई औऱ प्रसाद कि गोली निगल गई। मायाबगल मे सोफे पर्र बैठ गई। कुछ हि पलों मे माया कां जिस्म ढीलापड़ गय़ा औऱ उसके शरीर पऱ पसीने कि चमक आँ गई। माया अपनी आंखेबंद करके पड़ी गहरी सांसे लें रहीथीं मगर हीरेश किसी भूखे भेड़िए कि तरह नफरतभरी आंखों सें उसेदेख रहा थां।
***
कुछ दिनों बाद
माया गुस्से मे हाल मे घूमरही थि। उसनेसब नौकरों कों भगा दिया थां। हीरेश नें जैसे हि हॉल मे कदमरखा माया नें उसके शर्ट कों पकड़ लिया।
माया, "आज इतनीदेर क्यूं लगा दि!! बाबा मस्तराम केँ प्रसाद केँ बिना मे अपनेदिन कि शुरुवात नहि कर सकती। लाओ! लाओ वोँ प्रसाद! मुझे प्रसाद चाहिए!!"
हीरेश (एक् गंदी मुस्कान देतेहुए), "माफ करना माँ पर्र बाबा मस्तराम नें आप् कों प्रसाद देने सें मना किया हैं। उन्होंने कहा कि ये प्रसाद मात्र पापियों केँ लिए हैं। आप् नें बिनापाप किएये प्रसाद खाया तोँ जल्द हि आप् केँ सारेपाप मिटकर आप् स्वर्ग सिधार जाएगी। तोँ आप् कि जान बचाने केँ लिए मे आप् कों प्रसाद नहि दे सकता। "
माया गुस्से सें लाल होँ गई।
माया, "मे पापी हूं। मैनेकल हि तुम्हारे बटवे सें 10 रुपए चुराए थें। मुझे प्रसाद दो! मुझे प्रसाद दो! मुझे प्रसाद चाहिए!!"
हीरेश, "माँ, आप् इसघऱ कि रानी हैं। इसघऱ कि हरचीज आपकी हैं। तोँ फिन आप् कां कुछ चुराना मतलब अपनी एक् जेब मे सें दूसरी जेब मे रखना। इसे कोई भि चोरी याँ पाप नहीं बोलेगा! आप् कों अगरपाप करना हैं तौ कुछऐसा करना होगा जौ साफतौर पर्र मना किया गय़ा हैं। "
माया प्रसाद केँ लिए गिड़गिड़ाने लगी तौ हीरेश नें उसेपाप करने कां सुझाव दिया।
हीरेश, "वैसेपाप करने कां एक् तरीका हैं। अगर आप् किसी पराए मर्द सें संबंध बना लेँ तौ येपाप होगा। "
माया हैरान रह गई। उसे विश्वास नहि हौ रहा थां कि उसका बेटा उसेऐसा कुछ करने कों कहरहा हैं। मगर हीरेश इतने पऱ रुका नहि।
हीरेश, "पिताजी अक्सर महीनों तक विदेश मे रहते हें तौ ये मुमकिन हैं कि वो जर्मनी औऱ Amsterdam कि वैश्या महिलाओं कां भि मज़ा लेते होंगे। तोँ किसी भि पराए मर्दसाथ संबंध बनाना पाप नहीं पऱ इंसाफ होगा। आप् कों पक्का पाप करने केँ लिए किसीऐसे मर्दसाथ संबंध बनाना होगा जोँ हरतरह सें गलत होँ। आप् कों मेरेसंग सेक्स करना होगा। "
माया, "तुम् पागल होँ गए होँ। बाबा मस्तराम नें तेरी पागलकर दिया हैं। तुम् अपनी माँ सें ऐसीबात केसेकर सकते होँ?"
हीरेश, "ठीक हैं। मे चला जाता हूं। मगरपाप नहि तौ प्रसाद नहि। "
माया बाबा मस्तराम केँ प्रसाद केँ लिए बेचैनी रही थि। माया नें आखिर मे मरने पर्र उतारू हौ कर हीरेश कि बातमान ली।
माया, "मे… मे… मे तुम्हें हिलाकर दूंगी। हिलाकर तुम्हारा पानी अपनेहाथ मे लूंगी। एक् मम्मी केँ लिएइस सें बुरा क्याँ होगा?"
हीरेश (शैतानी मुस्कान देतेहुए), "ठीक हैं। मे कल बाबा मस्तराम कि अनुमति सें तुम्हे प्रसाद दूंगा। "
माया नें हीरेश कों पकड़कर सोफे पर्र बिठाया औऱ उसके कपड़े उतारने लगी।
माया, "कल नहीं!आज! अभि!! मुझे प्रसाद चाहिए!"
माया नें हीरेश कि पैंट खोली औऱ उसके कच्छे कों नीचे किया। हिरेश कां 5 इंच लम्बा औऱ डेढ़इंच मोटा लौड़ा छत कि ओर इशारा करता खड़ा थां। माया कि आंखों मे बेबसी केँ आंसू थें। माया नें अपनी आंखें बंद करके अपने पति कि मांफी मांगी औऱ हीरेश केँ जवान गर्म लौड़े कों अपनी उंगलियों सें छू लिया।
हीरेश नें अपने ख्वाब कों साकार होतेदेख कर मज़ा लेने कि ठानली। माया कि उंगलियों नें हीरेश कि 5 इंची लंबाई कों छूकर सहलाया औऱ धीरे-धीरे सें उसे अपनी मुट्ठी मे भर लिया।
हीरेश, "माँ, बाबा मस्तराम नें कहा हैं कि अगरकोई इंसान मजबूरी मे गुनाह करे तौ वो पाप नहि होता। अगर इस मे आप् कों आनंद नहींआया तोँ येपाप नहि हैं। पाप केँ बिना प्रसाद पऱ आपकाकोई हक नहि हैं। "
माया नें डरकर, "तोँ मुझे औऱ क्याँ करना होगा?"
हीरेश, "जैसे आप् मुझे सहलारही हें वैसे मे भि आप् कों सहलाऊंगा। "
माया नें रोकने कि कोशिश कि तोँ हीरेश उठकर जानेलगा। माया कों हीरेश कि बात माननी पड़ी।
माया भि सोफे पऱ हीरेश केँ बगल मे बैठ गई। हीरेश कि नजर सीधे कैमरा मे गई औऱ वो मुस्कुराया। ये कैमरा हीरेश नें लगवाए थें।
माया नें अपनी उंगलियों मे हीरेश केँ लौड़े कों लेने कि कोशिश कि पऱ हीरेश नें जिद्द कर पहले माया कि साड़ी उठाई औऱ अपने दाहिने हाथ कों माया कि पैंटी मे डाल दिया।
माया बाबा मस्तराम केँ प्रसाद केँ लिए तड़पती हीरेश कों रोकने मे नाकाम रही। हीरेश कि उंगलियों नें माया कि सुहागन बुर कों सहलाते हुए उसकी जवानी कों मजबूर किया। माया कि जवानी नें पराए मर्द केँ बुलावे पर्र अंगड़ाई ली।
माया नें हीरेश सें लड़ने केँ बजाय हीरेश केँ ताल मे उसका लौड़ा हिलाना शुरुआत किया। हितेश कि उंगलियां तेजी सें घूमती हुईँ माया कि जवानी कों भड़का कर झड़ने कों मजबूर कररही थि। हीरेश नें यकीनन सुभह एक् बारमूठ मारी थि जिसवजह सें वो माया कि कोशिशों केँ बाद भि टीकारहा।
अचानक माया कां जिस्म कांपते हुए अकड़ने लगा औऱ माया नें झड़ते हुए अपनी मुट्ठी मे हीरेश केँ लौड़े कों कसकर पकड़ लिया। माया झड़ने लगी औऱ हिरेश कां भि वीर्य लौड़े कि जड़ पर्र फंसकर जोरों सें धड़कने लगा। मायाझड़ कर ढीलीपड़ गई औऱ हितेश कां पानीफूट पड़ा।
माया नें अपनी हथेली मे हीरेश कां पानी पकड़ लिया औऱ उसे दिखाया।
माया, "अब तोँ मैनेपाप किया हैं। अब तोँ मुझे बाबा मस्तराम कां प्रसाद देदो। "
हीरेश नें अपनी सौतेली माँ कि आंखों मे देखकर जेब मे सें एक् गोली निकली औऱ अपने वीर्य सें भरी हथेली मे डाल दि।
माया बाबा मस्तराम केँ प्रसाद केँ लिए इतनी उतावली हौ गई थि कि उसने वो गोली हीरेश केँ वीर्य केँ संग हि पीली। कुछ हि पलों मे गोली कां असर होनेलगा औऱ माया वहीं सोफे पर्र सर रखतेहुए जमीन पऱ बैठ गई।
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