मानस और छाया ( एक कामुक कहानी) - devarani ki chudai - Latest Update 1
कुछ रिश्ते जन्म केँ संग हि मिलते हें उन रिश्तो मे एक् अलग आत्मीयता होती हैं औऱ कुछ रिश्ते सामाजिक मजबूरियों कि वजह सें थोपदिए जाते हें पर्र कामुकता सें उत्पन्न हुआ प्यार इन थोपेगए रिश्तो कों नजरअंदाज कर देता हैं। "छाया" इन्हीं थोपेगए रिश्तो केँ बीच पनपते प्यार कां चित्रण हैं.
भारतवर्ष मे 80 औऱ 90 केँ दशकों मे लड़कियों केँ कौमार्य कि बहोत अहमियत थि। शादी पूर्व औऱ विवाहेत्तर सेक्स समाज मे थां तोँ ज़रूर पऱ आम नहि थां। इस प्यार कथा केँ पात्रों नें इन्हीं परिस्थितियों मे अपने आपसी सामंजस्य सें अपनी सारी उचित याँ अनुचित कामुक कल्पनाओं कों हुस्न सें जीया हैं.
कथा केँ पात्र काल्पनिक हें उनका किसी जीवित याँ मृत किसी शख्स सें कोई संबंध नहि हैं। कथा मे वर्णित दृश्यों सें यदि किसी पाठक कि भावनाएं आहत हुयीं होँ तौ कथाकार माफ़ प्रार्थी हैं.
परिचय
हर इंसान केँ जिंदगी मे अनचाहे रिश्तों होंये जरूरी नहि। मेरे जिंदगी मे इनकी प्रमुख भूमिका रही हैं। आज उम्र केँ इस पड़ाव पऱ आकर पीछे देखने पर्र ये महसूस होता हैं कि केसेकुछ अनचाहे रिश्ते प्रेम औऱ काम वासना केँ बीच झूलते रह जाते हें.
मुझेआज भि दुर्गा अष्टमी कां वोँ दिनयाद हैं, जब मे पहलीबार इसकथा कि नायिका सें मिला थां। दुर्गा पूजाघूम करथका हुआ मे अपनेघऱ केँ अहाते मे प्रवेश करते वक़्त घऱ केँ बाहर् औऱ अंदर कि दुनिया केँ बीच फर्क केँ बारे मे सोचरहा थां। एक् तरफ जहां दोस्तों केँ संग जिंदगी कां खुशीआता थां वहीँघऱ पर्र एकदम एकांत थां। जेब सें घऱ कि चाभी निकाल कर दरवाजे कि ओरबढ़ा। दरवाजा खुला देखकर यह यकीन हि नहि हुआ कि बापूआज घऱ जल्द आँ गए थें। दरवाजा अन्दर सें बंद नहि थां औऱ मे सीधाहाल मे दाखिल हौ गय़ा जहां पिताजी केँ अलावा एक् औरत कों देखकर आश्चर्यचकित होँ गय़ा। कुछ कहने सें पहले बापू बोले.
“बेटा यह मायाजी हें औऱ आज सें यह यहीं रहेंगी मैंने इनसे शादीकर लिया हैं”.
मे अनमने मन सें उनको ध्यान सें देखे बिना, नमस्कार कर सीधा अपने कमरे मे चला गय़ा। शायदइस जल्द कि वजह मुझेआई हुई लघुशंका थि। जैसे हि मैंने अपने बाथरूम केँ दरवाजे कों खोलने कि कोशिश कि तभी अंदर किसी केँ होने कि आवाज़ आई। मे आश्चर्यचकित होँ कर पीछेहटा पर्र लघुशंका जोर सें लगे होने केँ कारण दरवाजे कों तेजी सें पीटने लगा.तभी अंदर सें आवाज़ आई “एक् मिनट”। आवाज़ किसी बच्ची जैसी थि। मैंने जैसे हि मुड़कर आपनेखाट कि ओर देखा वहांपड़ा सूटकेस देखकर कुछ अंदाज लगाने कि कोशिश कि तभी बाथरूम केँ दरवाजे केँ खुलने कि आवाज़ हुई औऱ उसमे सें एक् लड़की कों चहरे पर्र तौलिया डाले निकलते हुए देखकर मे कुछ भि बोल नहि पाया.
शायद आप् सब कों येइस वक्त मेरी मनोस्थिति कां आभास होँ रहा होगा। मुझेइस विवाह कि जानकारी पहले सें हि थि औऱ इस रिश्ते कों मे पहले हि अस्वीकार कर चुका थां। पर्र येसभी इतनी जल्द घटेगा औऱ यह इतनी जल्दयहा आँ जाएंगी यह मैंने नहि सोचा थां.
जैसे जैसे मे लघुशंका समाप्ति कि ओरबढ़रहा थां वैसे वैसेघऱ मे आयेइस परिवर्तन केँ बारे मे सोचरहा थां। अभि अभि जोँ लड़की गई, थि वोँ कौन हैं ? कहीयह मायाजी कि बेटी तौ नहि.
मे तौ इतनी जल्द मे घऱ मे आया थां कि उन्हें देख भि नहि पाया थां इसलिये इस निष्कर्ष पर्र पहुचना मुश्किल थां। बाथरूम सें बाहर् आकर मे अपनेखाट पऱ पड़ गय़ा। मेरे दिमाग़ मे बहोत हलचल थि। कुछ हि देर मे बापू नें आवाज़ लगायी तोँ मे धडकते हृदय सें वापसहाल मे प्रवेश किया.
सोफे पऱ एक् ३०-३२साल कि एक् हसीन स्त्री बैठी हुईँ थि औऱ उसकेबगल मे एक् वही मासूम लड़की बैठी थि। शायदये वही लड़की थि जौ अभि- अभि मेरे बाथरूम सें निकलकर आयी थि.
आप् सब कों मे अपना औऱ अपने परिवार कां परिचय देदूं। मेरानाम मानस हैं औऱ मेरी उम्रउस वक़्त १८ बर्ष कि थि। मे उस वक़्त १२वीं पास करने केँ बाद इंजीनीयरींग प्रवेश परीक्षा केँ लिए तैयारी कर रह१५था। मेरे पिता शासकीय कॉलेज मे प्रोफेसर थें औऱ उनकी उम्र करीब५० बर्ष थि। मेरी मम्मी कां देहांत आज सें १० वर्ष पूर्व होँ गय़ा थां। हम् लोग एक् मध्यमवर्गीय परिवार सें थें। मेरा गाँवशहर सें ८ किलोमीटर दूर थां। ये एक् विकसित गाँव केँ जैसा थां। मम्मी केँ जाने केँ बाद घरेलू कार्यों कां साराबोझ दादीमा पऱ आँ गय़ा थां। दुर्भाग्यवश २ वर्ष पूर्व वोँ भि चल बसीं थि.
बापू, मां केँ जाने केँ बाद अकेले तौ थें पऱ दुबारा विवाह कि लिएकभी इच्छुक नहि थें। उन्होंने अपना वक़्त शराब केँ हवाले कर दिया थां। हाँ दादीमा केँ जाने केँ बाद वोँ परेशान रहते थें। घऱआने केँ बाद खानां बनाना औऱ अन्य घरेलू कार्य करनायह सभी बहोत कठिन हौ रहा थां। मे अपनी पढ़ाई कि वजह सें उनकासंग कम हि दे पाता थां। शायद इन्हीं परिस्थितियों कि वजह सें उन्होंने मायाजी कों पत्नि रूप मे घऱ लेँ आये थें। मुझे पूरा विश्वास थां कि इसमें औरतसुख भोगने जैसीकोई बात नहि थि। दरअसल वोँ पिताजी सें उम्र मे करीब-करीब १५-२० वर्ष छोटी थि। उम्र कां ये अंतर औऱ बापू कां सामाजिक हाइटएवं उनका स्वास्थ्य इस महिला सुख कां भोग करने कि इजाजत नहि देता थां। आसपास मे सबलोग ये जानते थें कि मेरे बापू एक् चरित्रवान आदमी थें औऱ उन्होंने मायाजी कों लाकर केवल उनकेसर पर्र एक् छत दि थि औऱ उन्हें एक् सम्मान पूर्वक जीने कां हक़ दिया थां। इसकेएवज मे मेरे पिता कों घरेलू कार्यौं सें मुक्ति मिलनी थि.
शायद आप् सभी किस्सा कि नायिका केँ बारे मे जानने कों उत्सुक होँ रहे हैं? धीरज रखिये। यदि आप् इस किस्सा कों पढ़कर जल्दी निष्कर्ष पऱ पहुचने कों लालायित हें तौ शायद आप् कों दूसरी कहानियों पढ़नी चाहिए। माफ़ कीजिएगा पऱ धीरज कां फल हमेशा मीठा होता हैं.
इसकथा कां नायक मे, उस वक्त अपने भविष्य निर्माण केँ लिए पिछले कई वर्षों सें अपनी पढ़ाई पूरी ईमानदारी सें कररहा थां। लड़कियों मे मेरी विशेष दिलचस्पी नहीं थि। ऐसा नहि थां कि मैंने उस वक्त तक सेक्स कभी अनुभव नं किया होँ पर्र मे इसकाआदि कभी नहि थां.
मेरे पड़ोस मे रहने वाली मंजुला चाची कि जेठानी चंडीगढ़ मे रहतीं थीं। उनकी लड़की सीमा बहोत हि सुंदर थि। वो अक्सर छुट्टियों केँ वक्त अपने पैतृक निवास यानि देहात पऱ आया करती थि। इसी दौरान वो हरसाल मेरे संपर्क मे आती थि। हम् सभी अन्य पडोस केँ बच्चों रोहन, रिया, साहिल, सौरभआदि केँ संग खेलते कूदते थें औऱ अपने बचपन कां मजा लेते थें.
पहला अनुभव
एक् बार हम् सभी मेरीछत केँ सीढ़ीरूम मे लूडो कां गेमखेल रहे थें। खेल कि शुरूआत मे सीमा, मे औऱ दो अन्य बच्चे खेलरहे थें पऱ बाद मे केवल मे औऱ सीमा हि बचे। सीमा कां जिस्म थोडा थुलथुल किस्म कां थां। उभरता यौवनएवं पेट मे जैसेहोड़ लगी हुईँ थि कि कौनआगे निकलता हैं। वोँ गोरी औऱ चेहरे पऱ नूरलिए थि.
आमतौर पऱ घऱ मे सम्पन्नता औऱ सुख कों आप् उसघऱ कि लड़कियों केँ नूर सें अंदाज सकते हैं.
खेलते खेलते बातें होने लगीं औऱ अंत मे लड़कों औऱ लड़कियों मे अंतर पर्र आँ गयीँ,। सीमा मेरे सें ज़्यादा समझदार थि औऱ सेक्स केँ बारे मे ज़्यादा उत्सुक थि। उसने मुझसे पूछा कि
“क्याँ तुम्हें अपनेबदन औऱ मेरेबदन केँ अंतर केँ बारे मे पता हैं?” मैंने हाँ मे सर हिलाया तोँ उसका साहसबढ़ गय़ा औऱ उसने पूछा
“अच्छा बताओ क्याँ क्याँ अंतर हैं?” उसके सवाल केँ उत्तर मे मे क्याँ जवाबदूं येसोच नहि पारहा थां फिन भि मैंने उसके स्तनों औऱ जांघों कि ओर इशारा किया। वो समझ गई औऱ बोलि.
“मानस मैंने आज तक किसी लड़के कां वो भाग नहि देखा हैं। क्याँ तुम् मुझे एक् बार दिखाओगे?”
मे सकुचाया पऱ वो प्लीज प्लीज रटतीरही। अंततः मैंने कहा
“ठीक हैं। पर्र बदले मे मुझे क्याँ मिलेगा” तोँ उसनेकहा कि
“मे भि वहीकाम तुम्हारे लिए करूंगी.”
मैंने खुदआज तक कभी किसी लड़की कां वो भाग नहि देखा थां यहां तक कि किसी फोटो मे भि नहि। वो उतावली हौ रही थि.
“दिखाओ नां। क्यूं शर्मा रहे हौ.”
उसकेबार बार कहने पऱ मैंने धीरे-धीरे सें अपना पैजामा नीचेकर दिया औऱ अपने लिंग कों बाहर् लेँ आया जौ कि इनसभी बातों केँ दौरान बहुतकड़ा हौ गय़ा थां। मेरा लिंग सामान्य युवा थां पऱ एकदमसाफ सुथरा थां। लिंग कां रंग गोरा थां। सीमा अपनी उत्सुकता नां रोक पायी औऱ बोलि
“क्याँ मे इसेछू सकती हूं?”
मेरे उत्तर कां इंतज़ार किये बिना उसने अपनाहाथ सीधा लिंग पर्र रखकरउसे महसूस करना शुरुआत कर दिया। थोड़ी हि देर मे मेरा लिंग इतनाकड़ा हौ गय़ा जैसे कि फट जाएगा। मेरे लिंग केँ ऊपरीभाग मे मुझे हल्का दर्द कां अनुभव हुआ। मुझे लगता हैं इसके पहले शायददो याँ तीनबार मैंने अपने लिंग कों इतना कड़ा महसूस किया थां। उसके हाथों कां स्पर्श पाकरआज जैसी अनुभूति शायद पहलेकभी नहि हुईँ थि। वो बार-बार मेरे लिंग कि तारीफ करती औऱ हल्के हल्के सहलाती जारही थि। मुझसे अब बर्दाश्त नहि होँ रहा थां। मैंने देखा कि सीमा कां दूसरा हाथ उसकी जांघों केँ बीच हैं। मुझेअब विश्वास होँ चुका थां कि सीमायह काम पहले भि किसी केँ संगकर चुकी हैं। मैंने उससेकहा.
“मुझे भि देख्ना हैं”
उसनेकुछ देर सोचा औऱ कहा.
“ठीक हैं रुको”
उसने धीरे-धीरे सें मेरे सें लिंग केँ अग्रभाग पर्र अपनी हथेलियों कां प्रेशर बढ़ा दिया। उसकेइस कार्य सें उत्तेजना कि एक् तीव्र लहर मेरेबदन मे दौड़ गई। मेराबदन बुरीतरह कांपरहा थां। शायदउसे मेरी स्थिति कां अंदाजा थां। उसने अपना कार्य जारीरखा औऱ आहिस्ता मेरे औऱ पास आँ गई। पासआने केँ बाद उसने अपना बायाहाथ अपनी जांघों केँ बीच सें हटा लिया औऱ मेरेकान मे धीरे-धीरे सें कहा.
“अपनी आँखें बंदकर लो.”
उसने मेरे लिंग कों सहलाना जारीरखा। जब वो लिंग कि चमड़ी कों पीछे कि तरफ खींचती थि तोँ शिश्नाग्र मे बहोत सनसनाहट होती औऱ हल्का दर्द भि होता। चमड़ी कों पीछे करके उसनेजब सुपाड़े कों छुआ तोँ मेरीजान हि निकल गई,। अग्रभाग इतना संवेदनशील थां कि उसे सीधा सहलाना मुझे बर्दाश्त नहि हौ रहा थां। मैंने सीमा कां हाथपकड़ लिया। वोँ येजान चुकी थि कि मेरे सुपाड़े कों शायद पहलीबार हस्तमैथुन केँ लिएछुआ गय़ा थां। वोँ अपने हथेली मे मेरे कोमल पर्र अत्यंत सख्त हौ चुके लिंग कों पकड़कर आगे पीछे करनेलगी। मे मजा कि पराकाष्ठा मे थां। मैंने स्खलित होने केँ पहले सीमा कों जोर सें पकड़ लिया औऱ लिंग केँ अन्दर धधकरहे ज्वालामुखी नें लावा उड़ेल दिया.
इससे पहले कि मे यथार्थ मे वापसआता, उसनेहाथ मे लगे वीर्य रस कों मेरे बनियान मे पोछा औऱ “आती हूं” कहकरभाग गई,.
सीमाइस कला मे उस उम्र केँ हिसाब सें शायद पारंगत थि। मुझे नहि पता कि उसेइस क्रिया मे क्याँ मिला पर्र वोँ खुश थि.
सुनहरी यादों मे एक् खूबी होती हैं कि उन्हें व्यक्त याँ याद करते टाइम वक़्त तेजी सें निकल जाता हैं.
शेष अगलेभाग मे
मानस और छाया ( एक कामुक कहानी) - devarani ki chudai – New Episode
नए मेहमान
मेरेलिए मायाजी औऱ उनकी बेटी कां कोई महत्व नहि थां। मे उस वक्त पूरीतरह अपनी पढ़ाई मे मशगूल थां। अतत: मे शांति सें हाल मे आकरबैठ गय़ा। बापू नें एक् बारफिन मायाजी कों मेरे बारे मे बताया औऱ बाद मे उस प्यारी लड़की कि तरफ इशारा करके बोलेयह छाया हैं मायाजी कि बेटी। वोँ जल्दी उठकर मेरेपास आई औऱ मेरे पांवछूए। मुझेकुछ अटपटा सां लगा, मे “ठीक हैं” कहकर थोडा पीछेहटा.
बाद मे मुझेपता चला कि मायाजी पिताजी केँ ससुराल केँ देहात कि थि। पति केँ देहांत केँ बाद मायाजी औऱ उनकी बेटी कां गाँव मे कोई नं थां। पिताजी केँ ससुराल पक्ष वालों कि सहमति सें मंदिर मे विवाह करवे उनकेसंग चली आयींथीं। शायदयही नियति कों मंजूर थां। मे औऱ बापू दोनों हि उनको मायाजी कहकर हि संबोधित करते थें। येइसबात कां भि परिचायक थां कि वोँ हमारे घऱ मे जरूरथीं पर्र हमारे मन मे उनकाकोई विशेष जगह नहि थां.
जैसे मायाजी घरेलू कार्य मे निपुण थि औऱ वैसे हि उनकी बेटी छाया। पिताजी भि खुश रहनेलगे औऱ घऱ एक् मे एक् बारफिन रौनक होँ गई,.
नारी कि उपस्थिति घऱ केँ सजीव औऱ निर्जीव दोनों मे जानडाल देती हैं.
घऱ कि कुर्सियां परदेएवं अन्य साजो सामान चमकने लगे। पिताजी औऱ मे भि खुश थें हमेंघऱ कां कोईकाम नहि करना पड़ता थां। बापू कों अबघऱ कि कोई चिंता नहि थि। टाइम काटने केँ लिए शराब अपनी स्थान थि हि। मे उस टाइम न् तोँ मायाजी सें न् हि छाया सें कोई नाता रखने कों उत्सुक थां। दरअसल मेरेपास पढाई केँ अलावा टाइम हि नहि थां खासकर इसनए रिश्ते केँ लिए.
मायाजी वक़्त सें मेरेरूम मे हि ब्रेकफास्ट व खानां दे जाया करतीं थि। इसके अलावा उनसेबात करने कां कोईतुक भि नहि थां.
जब स्वीकार्यता नहि होती तौ अक्सर व्यक्ति बातचीत सें दूर भागता हैं यहीहाल मेरा थां.
परीक्षा अच्छे सें देने केँ बाद मे बहोत खुश थां औऱ घऱआने पऱ उसदिन मैंने मायाजी सें पहलीबार बात कि। उन्होंने अपने गाँव केँ बारे मे बताया औऱ अपने पहले पति कों यादकर दुखी हि गयीं। मैंने बातबदल कर वापस उन्हें वर्तमान मे लेँ आया। छाया कि बात करतेहुए उन्होंने कहा कि उसे भि अपने जैसा होशियार बनादो। मैंने बात कों सुनकर भि अनसुना कर दिया वैसे भि यहसभी पिताजी कों हि करना थां। छाया भि मुझसे दूर हि रहती थि.
पनपती कामुकता
अगलेकुछ दिनों मे मैंने सीमा कों बहोत याद किया उसका स्पर्श औऱ उसके कोमल हाथों मे मेरे लिंग केँ एहसास केवल सें मेरा लिंग उत्तेजित होँ जाता थां। अबजब पढाई कां तनाव न् थां तौ केवल सीमा केँ संग एक् बार किया गय़ा हस्तमैथुन हि एक् सुनहरी याद थि। मैंने उसेयाद करकर केँ कईबार हस्तमैथुन किया। मैंने उस वक़्त तक कभी किसी लड़की केँ उपरी याँ निचले भाग कों नहीं देखा थां। सीमा नें मुझसे वादा तौ किया पऱ वोँ बिना पूरा किये हि चली गयीँ, थि.
जब आप् औरत अंगों सें परिचित नं हौ तोँ आपकी कल्पना भि अजीब होती हैं। मे चाहकर भि योनि कि बनावट औऱ कोमलता कि कल्पना नहि करपारहा थां.
पऱ युवावस्था मे अपनाहाथ हि किसी काल्पनिक योनि कि तरह चरमावस्था देने मे निपुण होता हैं। अगले एक् महीने मे मैंने कईबार अपने लिंग कों सुखद एहसास दिलाया जैसेउसे आने वाली जिन्दगी केँ लिए सजधजकर कररहा थां। कईबार हस्तमैथुन करने सें मेरे लिंग कि चमड़ी आसानी सें आगे पीछे होनेलगी थि औऱ अब हस्तमैथुन करते टाइम होने वाला हल्का दर्द खुशी मे बदल चुका थां। शिश्नाग्र कि सवेंदना भि कुछकम होँ गई, थि.
कुछ हि दिनों मे मेरा एडमिशन दिल्ली केँ एक् प्रतिष्ठित कालेज मे हौ गय़ा। घऱ सें जाते टाइम छाया भि मुझे छोड़ने आई थि। मैंने पहलीबार उसे ध्यान सें देखा थां। वोँ बहोत मासूम थि औऱ थोडा दुखी भि लगरही थि। सुनहरे ख्वाब लिए मे दिल्ली केँ लिए निकल चुका थां.
होस्टल कि दुनिया निराली थि। मेरेलिए यहासभी कुछनया थां। नए वातावरण मे ढलने मे मुझे१० – १५दिन लगे। जीवन कों जैसे पर्र लगगए थें। दोस्तों केँ संग घूमना फिरना, शहर कि लड़कियों कों देख्ना एक् अलग हि अनुभव थां। कुछ मित्र अपने सेक्स केँ अनुभव भि शेयर करते थें पऱ मैंने कभी भि सीमा केँ संगहुए अपने छोटे अनुभव कों साझा नहि किया थां.
होस्टल केँ टेलीविज़न रूम मे एक् रात बहुत लोगों केँ होने कि आवाज़ आँ रही थि। मे औऱ मेरारूम पार्टनर उत्सुकता वशउधर कि तरफगए तोँ देखा कि टेलीविज़न रूम खचाखच भराहुआ थां। टेलीविज़न पर्र एक् ब्लू फ़िल्म चलरही थि जिसमे सम्भोग क्रिया जारी थि। मेरी तौ आंखें फटीरह गयीं। मैंने आज तक ये दृश्य नहि देखा थां नं हि कभी कल्पना कर पाया थां.
पऱ आज नारी जिस्म केँ नग्न अवस्था मे साक्षात दर्शन करसमझ हि नहि आँ रहा थां कि क्याँ देखूं क्याँ छोडू। ह्रदय कि धड़कनतेज हौ गयीँ, थि। पर्र लिंग मे कोई हलचल नहि थि। दिमाग़ मे तरहतरह केँ ख्याल आँ रहे थें। सामाजिक वर्जनाएं एक् झटके मे खंडित हौ रही थि। बायोलॉजी कि क्लास सें मम्मों औऱ योनि केँ बारे मे ज्ञान तोँ थां पऱ इसतरह विदेशी नायिका केँ नग्न अंगो कां दर्शन अप्रत्याशित थां। चार पांच मिनटबाद मन कि ग्लानि कों मिटाकर नायिका केँ अंगों कों मैंने भावविभोर होकर नहाना शुरुआत किया तोँ साक्षात कामदेव लिंग मे प्रवेश करगए। बिना हाँथ लगाये हि लिंग कि धड़कन बढती गयीँ, औऱ वीर्य प्रवाह होँ गय़ा। इसकेबाद मे वहां सें चलाआया पर्र इन१० - १५ मिनट मे मेरे जेहन मे नग्नता कि इतनी तश्वीरें कैद हौ गई थि जोँ २-४ महीने तक मेरे हस्तमैथुन कों जीवंत बनाए रखती.
फ़िल्म कि वयस्क नायिका कों नग्न देखने केँ उपरांत मेरी कल्पना सातवे आसमान पऱ पहुच गई। नायक केँ संग सम्भोग करतेहुए नायिका कों देखकर अविस्मरणीय अनुभूति हुइ थि। अब मेरा एकांत मेरेलिए सुखद होता थां तथा मे अपनी सेक्स कि कल्पनाओ कों नयीनयी ऊंचाइयां देनेलगा। दोस्तों सें प्राप्त नग्न किताबें एवं कामुक साहित्य नें छ;सात महीनों मे मुझे मेरीनजर मे आज कां वात्स्यायन ( कामसूत्र केँ रचयिता) बना दिया। मैंने नायिका केँ जिस्म औऱ उससे कि जाने वाली छेड़छाड़ केँ बारे मे इतना सोचने लगा कि प्रतिदिन एक् याँ दोबार हस्तमैथुन अवस्य करता थां। इस दौरान मेरी सेहत भि गिरने लगी थि.
धीरे-धीरे धीरे-धीरे मेरी कल्पनाओं मे आसपास केँ लोगो नें अपनी स्थान बनाई.
ब्लू फ़िल्मो कां एक् ख़राबअसर ये भि हैं कि सुन्दर औऱ सुडौल नायिका कि उस मदमस्त जवानी केँ सामने आसपास कि लड़कियां याँ युवतियां फीकी दिखाई पड़ती हैं। आप् चाहकर भि उन्हें अपने विचारों मे नग्न नहि कर सकते आपकामन खट्टा हौ जाएगा.
मे तौ औऱ भि भावुक थां। सेक्स अब मेरेलिए जिंदगी मे एक् अहम्भाग हौ गय़ा थां। मेरी कल्पना आसमान छूरही थि। एक् साल बीतने कों आँ रहा थां। इससाल भर मे मैंने केवल अपनी एक् प्यारी सहपाठी राधिका औऱ एक् टीचर कों अपने ख्वाबों मे नग्न किया थां औऱ उनकेसंग शरमाते हुए जमकर संभोग किया थां। वोँ दोनों मुझसे बातचीत करती थि पर्र शायद उन्हें इसबात कां इल्म भि न् होँ कि एक् सीधा साधा लड़का न् जाने अपनी कल्पना मे कितनी बार उनका योनि मर्दन कर चुका हैं.
सीमा औऱ गुरुदक्षिणा
पहली छुट्टियाँ
परीक्षाओ केँ बाद मे वापस अपनेघऱ आया। एक् सीधा साधा लड़का अबबदल चूका थां। सफर मे मिलने वाली सुन्दर युवतियों कों अपनी कल्पना मे नग्नकर उनके यौवनएवं योनि प्रदेश कि कोमलता कां मन मे अनुभव करतेहुए सफर कां टाइम तेजी सें बीत गय़ा। अब नारी अंगों कों छूने कां मन तौ बहोत करता थां पऱ हिम्मत नहि होती थि। जितना मे अपने खयालों मे नंगा थां शायद वोँ मासूम सि युवतियां एवं लड़कियां नहि होंगी ये मुझे पूरा विश्वाश थां.
मे अब१९ वर्ष कां होँ चुका थां। चेहरे पऱ मासूमियत कायम थि पर्र हाइट काठीठीक हौ चली थि। लम्बाई ५फुट११ इंच, रंग भि साफ थां। अधिक हस्तमैथुन सें लिंगअब टाइम सें पहले वयस्क होँ गय़ा तथाउस पऱ नसेंअब साफ दिखाई पड़ती थि। इनसाल भर मे सबसे ज़्यादा किसी नें मेहनत कि थि तोँ वो यही बहादुर थां। जितना वीर्यदान इसनेसाल भर मे किया थां उसमें तोँ मेरी प्यारी सहपाठी राधिका आराम केँ एक् बार स्नान कर लेती.
घऱ पहुँचने पर्र सबखुश थें। मायाजी नें मेरे पसंदीदा पकवान बनाए थें। मैंने उन्हें धन्यवाद कहातथा दिल्ली सें लायी मिठाई उन्हें दि जोँ उन्होने छाया कों दे दि। छाया भि खुश थि। छाया सें अभि तक मेरीकोई बातचीत नहि थि। वोँ फिन मेरेपेर छूनेआई औऱ मे “ठीक हैं, ठीक हैं” कहकर पीछेहटा। बापू सें मिलकर मैंने कॉलेज केँ बारे मे कई बातें कि। मे उनका अभिमान थां वोँ मुझे बहोत मानते थें.
‘’मानस भैया गरमचाय लेँ आऊं’’ किचन सें आवाज़ आई तौ मे आश्चर्यचकित थां कि किसने मुझे आवाज़ दि वोँ भि मानस भैया कहकर? “भैया” शब्द अपने सें छोटे लड़कों केँ नाम केँ संग लगाना सम्मान देने केँ लिए एक् आमबात थि। पऱ मायाजी सें यह शब्द मुझे अच्छे नहि लगे। मुझे अचानक उनकेचार कि कामवाली जैसे होने कां अहसास हुआ। वोँ गरमचाय लेकर आयीं तोँ मैंने उनसेकहा “आप् मुझे मानस हि बुला सकती हैं.”
दोतीन दिनों मे मे नए परिवेश मे अपने आप् कों व्यवस्थित कर लिया। बापू नें छत पर्र एक् नयारूम भि बनवा दिया थां जिसमे मेरे मनपसंद कि सारी चीजें थि। खिड़की घऱ केँ आगन मे खुलती थि। वहां सें नीचे किसी सें भि आसानी सें बात होँ सकती थि। मेरारूम वास्तव मे बहोत सुन्दर हौ गय़ा थां। मेरे पुराने कमरे मे माया औऱ छायासंग मे रहतीं थि। छाया नें उसे अपने अनुसार व्यवस्थित कर लिया थां। उसकारूम प्राचीन होने केँ बावजूद सुन्दर लगरहा थां.
वैसे भि काबिल लड़कियों कां रूम हमेशा साफसुथरा औऱ सजाहुआ होता हैं.
मुझे राजकुमार जैसा महसूस हौ रहा थां। छत कां खुला खुला वातावरण मुझे बहोत पसन्द थां। बापूअब भि अपने कमरे मे एकांत मे रहते थें तथा अपनी किताबों औऱ शराब मे मस्त रहते थें। छाया कां एडमिशन भि बापू नें अपने हि कॉलेज मे करा दिया थां। वोँ टाइम निकल कां उसेपढ़ा भि दिया करते थें। कुल मिलाकर अबघऱघऱ जैसा लगनेलगा थां.
रात्रि मे खानां खाकर सोने गय़ा तोँ इसघऱ मे बिताए सारेसमय एक् एक् करयाद आतेगए। मां कों यादकर मन रुआंसा भि हुआ पर्र धीरे-धीरे धीरे-धीरे वर्तमान मे वापस आँ गय़ा। आज मे नए कमरे मे बहोत खुश थां। यहा गर्मियों मे हि मौषम खुशनुमां होता थां औऱ जाड़े मे कडाके कि ठण्ड पड़ती थि.
मानसिक सुख औऱ एकांत मन मे सेक्स कों जीवंत कर देते हैं.
धीरे-धीरे धीरे-धीरे मेराहाथ अपने लिंग कां हालचाल लेनेलगा। उसकासंग देने केँ लिए चंचलमन एक् वयस्क नायिका कि तलाश मे भटकने लगा जिसे मे अपनी कल्पना मे निर्वस्त्र कर अपनीकाम पिपासा कों शांतकर सकूं.
घटना याँ दुर्घटना
मुझे सीमा कि यादआई। काश वोँ भि यहा छुट्टियाँ मनाने आई होती। मैंने उसेआज अपनी नायिका बनाने कि कोशिश कि पर्र वोँ मेरी यादों मे बहोत छोटी थि। मैंने उसेभूल करआजरात कि नायिका केँ लिएकई औऱ चेहरों कों दिमाग़ मे लाया पऱ अंततः वीर्यस्खलन कां श्रेय मेरी सहपाठी राधिका कों हि मिला.
अगलेदिन मे बहाने सें पड़ोस मे मंजुला चाची सें मिलने गय़ा। उन्होंने कहाआओ मानस बेटा हम् लोग अभि तुम्हारी हि बातकर रहे थें। सीमा कि मां कां फ़ोनआया थां वोँ लोग भि परसों आँ रहे हें। सीमाआगे कि पढाई केँ बारे मे तुम्हारा मार्गदर्शन चाहरही थि। तुमने तोँ हम् सभी कां नाम रोशनकर दिया हैं। थोडा ज्ञान सीमा कों भि दे देना.
यही होता हैं तकदीर जब मेहरबान होती हैं तोँ खुशियाँ आपको खोजती हुईँ आँ जाती हें.
सीमा मुझसे मिलने आँ रही थि वोँ भि अपने परिवार वालों कि सहमति सें। यहा मिलने कां उद्देश्य अलगअलग होँ सकता हैं मेरा उद्देश्य आप् समझते हि होंगे। परिवार वालों कि मंशा स्पष्ट थि पर्र सीमा केँ उद्देश्य पऱ अभि प्रश्नचिन्ह थां.
दो दिनों केँ बाद सीमा आँ गई। साम कों अपनी माँ केँ संग हमारे घऱआईइस बार सीमा कों देखकर एक् नया अनुभव होँ रहा थां। अब मेरी आंखें लड़कियों कों देखने कां नजरिया बदल चुकीं थीं। यौवन कां उतार चढाव वरीयता प्राप्त कर चुका थां। सीमा जौ पहले एक् थुलथुली लड़की थि अब वो बहुत खूबसूरत हौ गई थि। उसमें बहुत शारीरिक बदलाव आँ चुका थां। उसकापेट औऱ वक्षस्थल अबअलग दिखाई देरहे थें। वक्षस्थल उभराहुआ औऱ पेट सपाट थां। उसका हाइट करीब 5 फीट 2 इंच थां। अभि भि वो सामान्य लड़कियों सें थोड़ी मोटी थि, पऱ अब जिस्म उसका व्यवस्थित लगरहा थां.
मे उसेदेख कर मुस्कुराया औऱ वोँ भि मुझे देखकर वैसे हि मुस्कुराई। उसकी मम्मी नें कहा…
“बेटा मानस, सीमा भि तुम्हारी तरह इंजीनियर बनाना चाहती हैं जब तक वोँ यहा हैं तुम् उसकी सहायता कर देना वोँ तुम्हें बहोत मानती हैं.”
हम् उसकी पढाई केँ बारे मे बात करनेलगे। कुछदेर बाद सीमा कि मां मायाजी केँ संग रसोई मे चली गई। सीमाबात करते करते बहुतखुल चुकी थि। हम् सभी हंसी मजाक कि बात भि कररहे थें। मैंने बात हि बात मे उसकेसंग छत पऱ बिताए उन पलों कां भि जिक्र कर दिया। वो बहोत शर्मा गई औऱ अपनी नजरें नीचीकर ली। मैंने उसके अधूरे वादे कां भि जिक्र किया जिसे सुनकर वो उठ गई औऱ सीधा रसोई मे चली गई.
मे मन हि मनसोच रहा थां कि ये मैंने क्याँ कर दिया। इतना उतावलापन शायदठीक नहि थां.
पऱ जब सेक्स मन मे भरा हौ तोँ उतावलापन स्वाभाविक रूप सें आँ जाता हैं.
वैसे भि मे अभि इस क्षेत्र कां नया खिलाड़ी थां। तीर कमान सें निकल चुका थां अब उसकी प्रतिक्रिया हि आगे कां रास्ता प्रशस्त करती। वो अपनी मां औऱ मायाजी केँ संगगरम चाय औऱ स्नैक्स लेकरआई। हम् सभी नें गरमचाय पीइस दौरान दोतीन बार मेरी नजरें सीमा सें मिली पर्र वो नजरहटा लेती थि। आखिर मे जाते वक्त सीमा कि माँ नें कहा बेटा दिन मे जब भि खालीरहो तौ सीमा कों बुला लियाकरो तुमसे मिलकर कुछसीख लेगी। मे उसकीतरफ देखकर मुस्कुराया तौ इसबार वो भि मुस्कुरा दि.
मेरेदिल सें एक् बहोत बड़ाबोझ उतर गय़ा औऱ आशा कि एक् नई किरणजाग उठी.रात बड़ी बेचैनी सें कटी। रात मे मैंने पिछले साल सीमा केँ संग बिताए गएउन अंतरंग पलों कों याद किया तोँ मेरा लिंग अपनी मालकिन सीमा कों सलामी देने कों उठ खड़ाहुआ। उसकी नसेंतन गई उसके कष्ट कों कम करने केँ लिएहाथ खुद हि उसे सहलाने लगे। परंतु जितना हि हाथउसे सहलाते वो औऱ तन जाता। मैंने अपनेमन मे सीमा कों निर्वस्त्र करना शुरुआत कर दिया थां। सीमा ब्रा कां प्रयोग करती थि याँ ये प्रश्नचिन्ह थां, परंतु मेरे दिमाग़ मे एक् नई तस्वीर बनरही थि। मे उसके छोटे छोटे स्तनों कि हुस्न कि पूरी कल्पना तौ नहि करपारहा थां जल्दी उसका एहसास बड़ा सुखद थां। इसका कारण शायदइस बात कि आशा थि कि शायदउन केँ साक्षात दर्शन होँ सके। वक्षस्थल सें नाभि प्रदेश होतेहुए कमर तक पहुंचने केँ पूर्व हि लिंग लावा उगलने केँ लिए केँ लिए रेडी हौ गय़ा थां। मैंने उसे शांत करने केँ लिए अपना ध्यान सीमा कि कमर सें हटाकर उसके चेहरे कि तरफ लें गय़ा। मुझेलगा उसकी मासूमियत मेरे लिंग कों थोडा नरमकर देगी पऱ सीमा कि हंसी औऱ उसकेबाद करने केँ अंदाज नें मेरे सब्र कां बांधतोड़ दिया। मेरा लिंग केँ अंदर कां लावा एकदम मुहाने पर्र आँ गय़ा। मेरे हाथों नें लिंग कों कसकर दबाया ताकि वो शांत होँ सके पर्र हुआ उसका उल्टा हि। निकलने वाले वीर्य कि गति दोगुनी हौ गई औऱ उसकीधार करीब-करीब चारफुट उपर जाने केँ बाद वापस मेरे हि चेहरे पऱ आँ गिरी.
चेहरे पऱ वीर्य गिरने कि ये घटना मुझे ताउम्र याद रहेगी। वीर्य स्खलन केँ दौरान हि दरवाजे पऱ नॉकहुआ। सामान्यतः इतनीरात कों कोई मेरे कमरे मे कोई नहि आता थां। मे फटाफट अपनेखाट सें उठा औऱ अपने लिंग (जोँ अभि भि उछलरहा थां) कों व्यवस्थित करने केँ बाद जल्द जल्द अपने चेहरे कों पोछाएवं दरवाजे कों खोला। मायाजी कटोरी मे दो रसगुल्ले लेकर खड़ी थि। मैंने पूछा ….
“इतनीरात कों?”
उन्होंने कहा आपके पिताजी आपकेलिए लाए थें। उन्होंने हि जिद कि कि अभि हि मानस कों देदो वो सोया नहि होगा। मायाजी नें मेरी झल्लाहट कों पहचान लिया थां। रसगुल्ले कि कटोरी देने केँ बाद अचानक उन्हें मेरे माथे पर्र मेरे वीर्य कि एक् मोटी लकीर दिखाई दि। उन्होंने कहा…
“माथे पर्र ये क्याँ लगा हैं?” मेरे कहने सें पहले हि उन्होंने हाथ बढ़ाकर उसे पोंछ लिया.हे ईश्वर ये क्याँ होँ गय़ा ? उन्हें एहसास भि नहि थां ली उन्होंने क्याँ छू लिया थां। मायाजी नें अपनाहाथ अपनी साड़ी केँ पल्लू मे पोछ लिया। वापस जाते टाइम मैंने देखा कि वोँ अपनी उंगलियों कों नाक केँ पास लेँ गयीं जैसे पहचानने कि कोशिश कररही हौ कि वोँ क्याँ चीज थि। मुझेये बातदो तीन वर्षों बाद मालुम चली कि मायाजी नें उसे सूंघने केँ बाद पहचान लिया थां कि वोँ मेरा वीर्य हि थां.
हस्तमैथुन केँ दौरान कुछ घटनाएं याँ दुर्घटनाएं इसतरह घट जाती हैं कि हमेशा याद रहतीं हैं। ये उन्हीं मे सें एक् थि.
छुपन- छुपाई
हमारे यहा ज़्यादा स्थान होने केँ कारण मोहल्ले केँ छोटे बच्चे खेलने केँ लिएआया करते थें। उनमे सीमा कां भइया सौरभ, साहिल, पड़ोस मे रहने वाला रोहन, रिया मुख्य थें औऱ बाद मे छाया भि जुड़ गई थि। बचपन मे मे औऱ सीमा भि इसी टोली कां हिस्सा थें। हालाँकि, अब हम् लोग थोडा बड़े होँ चुके थें पर्र बच्चे अभि भि हम् लोगों कों अपनेसंग खेलने केँ लिए आग्रह करते रहते थें.
गांवों सें संबंध रखने वालेसब लोगये जानते होंगे कि दोपहर मे खानां खाने केँ पश्चात सब बड़ेलोग आराम करते हें औऱ यही वक़्त हम् बच्चों केँ लिए खेलने केँ लिए उपयुक्त होता हैं। हम् सभीइसी वक्त इकट्ठा होकरकई प्रकार केँ खेल खेलते। कभी लूडो, कभी चाइनीस चेकर तौ कभीकभी छुपन छुपाई खेलने कां भि खुशी लेते। सीमा केँ भइया सौरभ औऱ साहिल बहोत हि मासूम थें। उन्हें छुपन छुपाई मे अधिक आनंदआता थां। बच्चों मे रोहन सबसे छोटा थां। बच्चे अपनी दुनिया मे थें बड़े अपनी दुनिया मे
अगलेदिन मे ब्रेकफास्ट करके अपनेबेड पर्र लेटाहुआ थां औऱ सीमा केँ बारे मे हि सोचरहा थां तभी नीचे सें नमस्कार आंटी कि मधुर आवाज़ आई.
“ मानस कहां हैं ?”
बेटा वो ऊपर अपने कमरे मे हि होगा.
“ठीक हैं आंटी, मे वहींचली जाती हूं.” मुझे बिल्कुल भि उम्मीद नहि थि कि सीमा इतनी जल्दचली जाएगी। मैंने जल्दी अपनेहाथ मे पड़ी किताब कों तकिए केँ नीचेरखा औऱ उसका प्रतीक्षा करनेलगा.
सीमा नें दरवाजे पऱ दस्तक दि। मैंने कहा.
“आँ जाओ”
उसने कमरे मे घुसते हि कहा
“रूम तोँ बहोत हि सुंदर हैं”
मैंने भि उसे छेड़ा
“तुमसे अधिक नहि” वो हंसने लगी.
वो अपनेहाथ मे एक् डायरी औऱ एक् पुस्तक लेकरआई थि। मैंने उसे अपनी कुर्सी खींचकर बैठने केँ लिए दि। औऱ मे भि उसकेपास एक् स्टूल खींचकर बैठ गय़ा। वो बोलि
“आप् कुर्सी पर्र बैठ जाइए”
“नहि नहि तुम् धीरे-धीरे बैठो। मे ठीक हूं.” मैंने लड़कियों कों सम्मान देनासीख लिया थां.
“ मुझे बताइए नाँ इंजीनीयरिंग कि तैयारी मे मुझेकिन चैप्टर्स पऱ ज़्यादा ध्यान देना चाहिए.”
मे समझ गय़ा कि वो अभि पढ़ाई कि बातों कों लेकर संजीदा हैं। मैंने उसेकई सारी टिप्स दींतथा जितना मेरा ज्ञान थां उसके हिसाब सें उसे भरपूर सहायता कि। उसने मेरी टिप्स कों अपनी डायरी मे लिखा। आहिस्ता वो अपने बारे मे बताने लगी। वो अब बातूनी हौ चुकी थि। उसने मुझे अपने विद्यालय, अपनी सहेलियां औऱ जाने क्याँ क्याँ बताया। बातचीत केँ दौरान ज्यादातर उसका चेहरा खिड़की कि तरफ रहता कभी-कभी वो मेरीतरफ देखती पऱ जल्दी हि अपना चेहरा वापस खिड़की कि तरफ घुमा लेती। शायद वोँ नजरें मिलाकर बात करने मे सहज नहि होँ पारही थि। जब वो खिड़की कि तरफदेख रही होतीतब मेरी निगाहें उसकेबदन कां नाप लें रहीं होती.
सीमा केँ बाल कंधे तक आँ रहे थें उसने एक् पिंकटॉप तथा कालेरंग कि पजामी पहनी थि। उसके वक्ष स्थल पर्र निगाह पड़ते हि मैंने अपनी निगाहों सें ये जानने कि कोशिश कि कि क्याँ वो ब्रा कां उपयोग करती हैं?
संग बैठकर आपस मे बातकर रहेदो इंसानो कि मानसिक अवस्था अलगअलग होँ सकती हैं.
जहां सीमा अभि पढ़ाई पर्र केंद्रित थि पऱ मे कामुक हौ रहा थां। सीमा कि जांघें थोड़ी मोटीलग रही थि। शायद कुर्सी पर्र बैठने कि वजह सें जांघों कि चौड़ाई बढ़ गई थि। अचानक सीमा नें मेरीतरफ नजर घुमाई औऱ मेरी निगाहों कों नीचे देखते हुए पकड़ लिया। उसने सीधा सवाल किया
“आप् वहां क्याँ देखरहे हें?”
मेरे मुंह सें अचानक निकला
“जिसे तुमने दिखाने कां वादा किया थां.”
ये उत्तर अप्रत्याशित थां। मैंने भि येसोच समझकर नहि बोला थां। वो बुरीतरह झेंप गई। नं वो कुछबोल पारही थि नं मे.
हम् हम् दोनों करीब एक् मिनट तक मौनरहे। अचानक सीढ़ियों पर्र बच्चों केँ आने कि आवाज़ आई। साहिल दरवाजे केँ पास पहुंचते हि बोला.
“अरे सीमा दिदी भि यहीं पऱ हैं। चलिएसभी लोग नीचे, हम् लोग छुपन छुपाई खेलेंगे.”
उस बच्चे कां आर्डर सुनकर सीमाखुश हौ गई औऱ उठकर नीचे जानेलगी औऱ मौन तोड़ते हुए बोलीं आप् भि चलिए.
हम् दोनों मे बहुतकुछ बदल चुका थां। सीमा कां मन औऱ तन जवान होँ चुका थां। वोँ समझदार हौ चुकी थि। मे खुद सेक्स औऱ उससे संबंधित क्रियाकलापों मे बहुत ज्ञान प्राप्त कर चुका थां। सीमा द्वारा किया गय़ा हस्तमैथुन एक् सुनहरी याद थि पऱ आज कि परिस्थितियों मे दोबारा ये अवसर मिलेगा याँ नहि ये सवाल चिन्ह थां। हम् सभी नीचे आँ गए थें.
आप् मे सें शायदकुछ लोगों नें देहात मे अपना टाइम बिताया हौ। वेलोग देहात केँ घरों औऱ उनके आसपास कि स्थान जैसे दालान गौशाला आदि सें परिचित होंगे। मेरेघऱ केँ सामने एक् बड़ी सि दालान थि इसमें कुलतीन कमरे थें दो कमरेआपस मे जुड़े हुए थें तथा एक् रूमअलग थां। जुड़े हुएरूम मे सें एक् कमरे मे भूसा औऱ पुवाल रखा रहता थां तथाउस कमरे मे बहुत अंधेरा रहता थां। उसकेसंग वाले कमरे मे पुरानी अलमारियां पड़ी हुई थि। दालान केँ सामने आम औऱ नीम केँ पेड़ थें। सीमा कां घऱ हमारी दालान केँ ठीक पीछे थां.
छुपन छुपाई मे छुपने केँ लिए दालान केँ दोनों कमरे, पेड़ कि ओट, छत, आँगनएवं सीमा केँ घऱ कां बाहरी रूम थां। इसमें भि बड़ी-बड़ी अलमारियां पड़ी थि जिनके पीछे व्यक्ति आसानी सें छुप सकता थां एक् पुरानी बिस्तर भि थि जिसे खड़ा कियाहुआ थां उसके पीछे भि छुपाजा सकता थां। सीमा दालान कि परिस्थितियों सें परिचित थि। येखेल हम् बचपन मे भि खेला करते थें। येखेल मे औऱ सीमा बचपन सें खेलते आँ रहे थें। भूसा वाले अंधेरे कमरे केँ बगल वालारूम छुपने केँ लिए मेरी औऱ सीमा कि पसंदीदा स्थान थि.
राजकुमार औऱ घायल राजकुमारी
खेल शुरुआत हुआ, सबसे पहले मैंने स्वयं हि चोर बनना स्वीकार किया.सभी बच्चे अलग-अलग जगहों पर्र छुपगए। मैंने खेल कां आनन्द लेतेहुए सबसे पहले छोटे रोहन कों फिन बाकी सबको ढूंढ लिया.
सबसे छोटा रोहनइस बारचोर बना थां औऱ हम् सभी कि छिपने कि बारी थि। सारे बच्चे अपनी अपनी जगहों पऱ छिपने चलेगए। मैंने सीमा कों दालान केँ दूसरे वाले कमरे कि तरफ जातेहुए देख लिया थां। येऐसी स्थान थि कि कोई भि छोटा बच्चा उधर जाने कि हिम्मत नहि करता थां। मे भि सीमा केँ पीछे होँ लिया। सीमा नें मुझेआते हुएदेख लिया थां पर्र फिन भि वोँ चुपचाप रही। मुझे बड़ी अलमारी केँ पीछे थोड़ी हलचल सि लगी। मे पीछे सें गय़ा औऱ सीमा कों पकड़ लिया। मैंने अपना एक् हाथ उसके मुंह पर्र रखा ताकि वो आवाज़ नं निकाल दे। सीमा नें कहा.
“आप् यहां केसे आँ गए?” मैंने कहा.
“कुछ मतकहो रोहनआता हि होगा”
इस वक़्त मेरा एक् हाथ सीमा केँ मुंह पऱ थां तथा दूसरा हाथ उसकेपेट पऱ थां। कुछ हि सेकंड मे हमें अपनी स्थिति कां एहसास हुआ। मैंने महसूस किया कि सीमा भि असहज थि। सीमा केँ नितंब मेरे लिंग सें सटेहुए थें। सीमा मुझसे सटी हुयी थि। इसका एहसास होतेहुए हि मेरे लिंग मे तनाव उत्पन्न होँ गय़ा। इस तनाव कि अनुभूति सीमा कों बखूबी हौ रही थि पर्र वो कुछ नहि बोलरही थि। धीमे-धीमे ये तनाव असहनीय हौ गय़ा। मैंने अपनीकमर कों थोडा पीछेकर अपने लिंग कों आरामदायक स्थिति मे लाने कि कोशिश कि। पऱ लिंग औऱ तन चुका थां। सीमा सें चिपकने पर्र लिंग सीधा सीमा कि कमर मे छेद करने कों आतुर दिखा। सीमा नें हँसते हुएकहा…
“राजाजी जागगए हें क्याँ?”
“राजाजी” मे सोच नहि पारहा थां कि सीमा नें किसे राजाजी कहा। मैंने धीरे-धीरे सें कान मे पूछा…
“कौन राजाजी” इस पऱ वो अपनाहाथ पीछे लेँ गई औऱ मेरे लिंग कों अपनी उंगलियों सें दबा दिया। मे भि हँसपड़ा। मैंने उसकेकान मे धीरे-धीरे सें कह.
“राजाजी अपनी रानीखोज रहे हें.”
बात करते वक़्त मैंने अपनी पजामी कों थोडा नीचेकर दियाअब लिंगखुल खुल बाहर् आँ चुका थां। मैंने अपनीकमर कों औऱ नीचे किया ताकि वोँ सीमा केँ कि जांघों केँ बीच आँ जाए। बाहर् बच्चों कि आवाज़ आँ रही थि अब सीमा सें ये स्थिति बर्दाश्त नहि होँ रही थि। उसने भि अपनीकमर कों हिलाया तथा मेरे लिंग कों अपनी जांघों केँ बीच स्थान दे दि। उसकी जांघों औऱ मेरे लिंग केँ बीच मे उसकी पजामी थि। मेरा लिंग सीमा कि जांघों केँ बीच सें होतेहुए बाहर् कि तरफ आँ गय़ा थां। सीमा कि जांघों कां तनाव मेरे लिंग पऱ पड़रहा थां। वोँ मेरे इरादे जान चुकी थि तभी रोहन केँ दरवाजे पऱ आने कि आवाज़ हुईँ.
सीमा मे मुझे चिकोटी काटकर अपनी पकड़ सें छुड़ाया औऱ धीरे-धीरे सें रोहन कि नजर मे आँ गई, औऱ बाहर् आकर स्वयं बोलीं
“चलोअब मानस भैया कों ढूंढते हें”.
सारे बच्चे उस कमरे सें बाहर् चलेआए। मैंने भि अपनी पजामी ठीक कि औऱ मौकादेख कर कमरे सें बाहर् आँ गय़ा औऱ एक् पेड़ केँ पीछेछुप गय़ा.
अगलीबार मे मे सीमा कों देख नहि पाया कि वो किधर छुपी हैं। वोँ अलमारी केँ पीछे नहि थि। अतः मुझे भि किसी दूसरी स्थान पर्र छुपना पड़ा। दूसरी बार कां खेल खत्म होँ गय़ा। तीसरे दौर मे मैंने सीमा कों फिनउसी कमरे कि तरफ जाते देखा औऱ मे भि उसके पीछे हौ लिया। मैंने बिना वक़्त गवाएं फिन सें सीमा कों पीछे सें पकड़ लिया। सीमा केँ सहयोग सें पहले वाली स्थिति पुनःबन चुकी थि। लिंग पूर्ण तनाव मे थां केवलउसे सीमा केँ सहलाने कां प्रतीक्षा थां। सीमा नें मेरा प्रतीक्षा समाप्त करतेहुए अपनी हथेली मेरे लिंग पर्र पऱ रख दि औऱ प्रेम सें सहलाने लगी। मे सातवें आसमान पर्र पहुंच चुका थां। मैंने अपनाहाथ उसकेपेट पर्र सें हटाकर उसके स्तनों पर्र रखने कि कोशिश कि तौ उसने मेराहाथ रोक लिया। शायद वो निर्णय नहि करपारही थि पर्र उसने मेरे लिंग कों सहलाना जारीरखा। मैंने सीमा कों छेड़ते हुएकहा
“ “राजाजी” अपनी “रानी” कों खोजरहे हैं.” मेरेइस संबोधन सें वोँ हँसपड़ी.
सीमा नें मुस्कुराते हुएकहा…
“यदि रानी कि तलाश हैं तोँ आपको शादीशुदा महिलाओं केँ पास जानां पड़ेगा। यहां पर्र तौ केवल राजकुमारी हैं”
मे उसकीबात समझ गय़ा। मैंने उससेकहा.
“तुम् चाहोगी तौ राजकुमारी कों रानीबना देते हें”
“अभि राजकुमारी कों रानी बनने मे वक्त हैं”
“इस हिसाब सें तोँ मेरा राजा भि अभि राजकुमार हि हैं” वो खिलखिला करहंस पड़ी औऱ अपनी हथेली सें शिश्नाग्र पऱ दबावबढ़ा दिया। मैंने फिन आग्रह किया किया कि राजकुमार राजकुमारी सें मिल तौ सकता हैं राजा रानी कि तरह नां सहीयार कि तरह हि सही। वो मेराआशय समझरही थि। उसनेकहा.
“ठीक हैं। पर्र अभि राजकुमारी घायल हैं। तीन-चार दिनबाद मुलाकात कराएंगे.”
मे स्खलित होने हि वाला थां तभी रोहन केँ आने कि आहट हुई। सीमा मुझे छोड़कर पहले कि भांति अलग हौ गई,। रोहन नें फिन सें उसे पहचान लिया। वो रोहन कों लेकर कमरे सें बाहर् आँ गई,, ताकि हम् दोनों एक् संग थें ये बच्चे न् जान सकें औऱ मुझे टाइममिल सके अपने आप् कों व्यवस्थित करने कां। सीमा कि ये समझदारी मुझे बहोत प्रभावित कर गई थि.
हम् सभी बाहर् आँ गए थें। खेल ख़त्म होँ गय़ा थां, सभीलोग जानेलगे मैंने सीमा कों रोकना चाहा पर्र वो हंसते-हंसते जानेलगी। मे उसके पीछे भागा औऱ बिलकुल पास पहुचने पर्र वोँ रुकी। मैंने उससेपूछ लिया
“राजकुमारी घायल केसे होँ गयीँ, ?”
उसने मुझेपलट कर देखा औऱ हंसकर बोलीं.
“आप् बुद्धू हें….धीरे-धीरे सोचियेगा” कहकर वोँ अपनेघऱ भाग गई.
गुरुदक्षिणा कि तैयारी
मे मन मसोसकर रह गय़ा पऱ आज सीमा केँ संग गुजारे पलों नें मुझे गर्मियों कि छुट्टियों केँ यादगार बनने कि उम्मीदें बढ़ा दि.
मे वापस अपने कमरे मे आकर सीमा द्वारा दिएगए इननए संबोधनों केँ बारे मे सोचने लगा। मे मन हि मनखुश भि होँ रहा थां कि सीमा मुझसे खुलकर बातकर रही थि। राजकुमारी केँ घायल होने कि बात मे अभि भि नहि समझपा रहा थां। अचानक मुझे महिलाओं केँ रजस्वला होने कि बातयाद आई। मुझेअब पूरीबात समझ मे आँ गई। सीमा कां ये अंदाज निराला थां। मेरेलिए आज कां दिन बहोत अच्छा थां। धीरे धीरेदिन गुजर गय़ा अगले 2 दिन 3 दिनों तक सीमारोज मेरेपास आती। मे उसकी पढ़ाई मे दिल सें सहायता करता औऱ कभीकभी हम् इधरउधर कि बातें करते औऱ बच्चों केँ संग खेलते। कभी-कभी बातों हि बातों मे राजकुमार औऱ राजकुमारी कां जिक्र होँ जाता। मैंने भि अपने आपको नियंत्रित कर लिया थां कि जब तक राजकुमारी पूरीतरह स्वस्थ नहि हौ जातीतब तक प्रतीक्षा करूंगा। मेरे राजकुमार कां क्याँ थां उसकी तौ रोजरात मे मालिश होँ जाया करती थि औऱ वो वीर्य दानकर सो जाया करता थां। मैंने सीमा कों अपने नोट्स एवं अपनी किताबें भि दि ताकि वो पढ़कर इसकालाभ लेँ सके। वो मेरे सें बहोत प्रभावित थि। उसने मुझसे कहा…
“आपने मेरी पढ़ाई मे इतनी सहायता कि हैं। आप् मेरे गुरु हैं.”
मैंने मुस्कुराकर पूछा
“गुरुदक्षिणा कब मिलेगी?” उसनेसर झुका लिया औऱ अपनी उंगलियों पर्र कुछगिन कर बोलीं.
“परसों” इतनाकह कर वोँ मुस्कुराते हुए सीढियों कि तरफबढ़ गई। परसों कां दिन मेरेलिए क़यामत कां दिन होने वाला थां.
आपकोये जानकर हर्ष होगा कि इस उपन्यास कों लिखते वक्त सीमा मेरेसंग थि। उसनेउस वक़्त अपनेमन मे चलरही भावनाओं कों मुझे बताया। आगे कि कथा कों मे उसकी उसकी यादों केँ अनुसार प्रस्तुत करता हूं.
[मे सीमा]
सोमवार कां दिन थां। मेरी राजकुमारी अब पूरीतरह ठीक हौ चुकी थि। पिछली दोपहर सें हि मे सामान्य होँ चुकी थि। आज सुभह नहाने केँ पश्चात मैंने बहोत ध्यान सें अपनी राजकुमारी कां निरीक्षण किया। कहीं पर्र भि लालिमा नहि थि। मे खुश थि औऱ आज होने वालेनए अनुभव केँ लिए अपने आप् कों मानसिक रूप सें रेडीकर रही थि.
अभि दोपहर होने मे दो-तीन घंटे कां समय थां। मेरी राजकुमारी केँ चारों तरफ हल्के हल्के बाल आँ गए थें जैसे उसकी दाढ़ी मूछ आँ गई होँ। बाल बहोत कोमल थें। मैंने आज तक इन बालों कों नहि हटाया थां। पर्र आज राजकुमारी, राजकुमार सें मुलाकात करने वाली थि। एक् बार केँ लिए मैंने सोचा कि इन्हें हटादूँ पऱ संसाधनों कि कमी कि वजह सें ये विचार त्याग दिया। मैंने मानस भैया केँ राजकुमार केँ लिए एक् अलग हि गुरुदाक्षिणा सोचरखी थि.
राजकुमारों कों काबू मे रखने कि कला मुझे बखूबी आती थि। दरअसल चंडीगढ़ मे मेरा एक् यार सोमिल थां। (आज केँ वक्त मे आप् उसे ब्याय फ्रेंड कह सकते हें) वोँ मेरे विद्यालय मे हि पढ़ता थां एवं मेरे पड़ोस मे रहता थां। मैंने उसके राजकुमार कि पिछले २ सालों मे बहोत सेवा कि थि। मगर मैंने उसे अपनी राजकुमारी सें नहि मिलवाया थां। उसने मुझेहर स्थान छुआ थां पर्र हमेशा कपड़ो केँ संग। मैंने उससेयही करार कियाहुआ थां। दरअसल वोँ इन मामलों मे संयमखो बैठता थां। मुझे हमेशा डर लगता थां कि कही वोँ मेरी राजकुमारी कों देखकर उग्र नं होँ जाए औऱ मेरा कौमार्य भंगकर दे। मेरी राजकुमारी पिछले दो वर्षों सें अक्सर वक़्त-वक्त पर्र लार टपकाती रहती थि औऱ मुझेउस वक़्त बहोत अच्छा भि लगता थां। इस दौरान मे तकिया याँ रजाई कों अपने पैरों केँ बीच फंसा लेती औऱ थोडा बहोत उछलकूद करने सें मेरी राजकुमारी ख़ुशी केँ आसूं बहती औऱ मे आनंदित होँ जाती.
मानस मानस भैया अपेक्षाकृत शांत स्वभाव केँ थें। वोँ सामाजिक ताने बाने कों समझते थें। पहले भि जब मैंने मानस भैया केँ राजकुमार कों हाथ लगाया थां तभी मे जान गयीँ, थि कि वोँ उस वक्त तक हस्तमैथुन भि नहि करते थें। उसदिन भि उनका सुपाडा ठीक सें नहि खुल पाया थां। आज भि मेरेमन कां कौतूहल वैसा हि थां। अब मानस भैया कां राजकुमार कैसा होगा इसकी मे कल्पना नहि करपारही थि.
मे अच्छे सें सजधजकर हुईँ। मैनेरेड कलर कि टॉप औऱ ब्लैक कलर कि एंकल लेंथ स्कर्ट पहनी। अलमारी सें जाकरलाल रंग कि पेंटी निकाली औऱ मन हि मन मुस्कुराने लगी। मां केँ कमरे मे जाकर अपनेबाल बनाएं परफ्यूम लगाया औऱ सजधजकर रेडी हौ गइ। अभि दोपहर मे वक़्त थां। मे अभि भि मानस भैया सें मिलने केँ लिए उचित स्थान कि तलाशकर रही थि। मानव भैया कां रूम एक् आदर्श स्थान थि परंतु वो मेरी राजकुमारी केँ साक्षात दर्शन करते मे इसकेलिए सजधजकर नहि थि। मैंने अभि तक सेक्स करने कां मन नहि बनाया थां। मे अपने कौमार्य कों मे हरहाल मे सुरक्षित रखना चाहती थि। उनके राजकुमार कों अपने हाथों मे लेने केँ बाद मुझेये महसूस हौ गय़ा थां कि सारे राजकुमार एक् जैसे नहि होते औऱ इस राजकुमार केँ लिए मुझेकुछ खास करना पडेगा.
चार पांचदिन पहले आलमारी केँ पीछे मानस भैया केँ राजकुमार सें मुलाकात कों याद करते टाइम मुझेनया विचार आया। औऱ मे उठकर मुस्कुराते हुए मानस भैया केँ घऱ कि तरफबढ़ चली। मैंने सबकीनजर सें बचकर दालान मे पड़ी अलमारी केँ पीछे वाली स्थान कों थोडा साफ किया। वहां पर्र एक् पुरानां ड्रम ( स्टूल कि उचाई कां) पड़ाहुआ थां जिसेसाफ कर मैंने अलमारी केँ पीछेरख दिया। मे खुश होकर मुस्कुराते हुए मानस भैया केँ कमरे मे गई मानस भैया मुझे बहोत अच्छे लगते थें मे मन हि मन उन्हें बहोत प्रेम करती थि पर्र इस टाइम मेरेऊपर केवलहवस हावी थि.
गुरुदक्षिणा
मे मानस भैया केँ कमरे मे पहुंची वोँ मुझे देखते हि बोले।.
“सीमा मे तुम्हारा हि प्रतीक्षा कररहा थां.”
मैंने मजाक किया
“सच मे मेरा याँ राजकुमारी कां?” वोँ हँसपड़े.
“सच मे आज तुम् बहोत हसीनलग रही होँ.”
मे मुस्कुरा दि। मैंने येबात नोटिस कि थि इसबार मेरे देहात आने केँ बाद सें मानस भैया मेरेऊपर बहोत ध्यान देते थें। हम् सभी इधर-उधर कि बातें करनेलगे। तभी मेरा छोटा भइया साहिल जल्द-जल्द सीढ़ियां चढ़ता हुआआया औऱ बोला आप् लोग नीचे चलिएसभी लोग आपका प्रतीक्षा कररहे हें.
छुपन छुपाई कां खेल शुरुआत हौ रहा थां। पहलेदौर मे छायाचोर बनीसब बच्चे इधरउधर छुपने चलेगए। मे भि मानस सें नजर बचाकर दालान कि स्थान सीढ़ीरूम मे जाकरछुप गई। मैंने मानस कों दालान कि तरफ जाते देखा मुझे हंसीछूट गई,। वोँ अधीर हौ रहे थें। आरामसे छाया नें सभी कों ढूंढ लिया। मानस मुझे अलमारी केँ पीछे नं पाकरबगल वाले कमरे मे छुपगए। छाया नें अंत मे उन्हें भि ढूंढ लिया। अगलेदौर केँ लिए सबका प्यारा रोहनचोर बना। रोहन बहोत छोटा थां औऱ सभी कों ढूंढने मे अधिक वक्त लगाता थां यही मानस भैया औऱ मेरेलिए उपयुक्त वक़्त थां। बच्चों केँ इधर-उधर छुपने केँ बाद मे अलमारी कि तरफ गई मानस नें मुझे जातेहुए देख लिया थां औऱ वोँ धीरे-धीरे सें मेरे पीछे पीछे आँ गए। मे अलमारी केँ पीछे धड़कते ह्रदय केँ संग खड़ी थि। उन्होंने पीछे सें आकर बिनाकुछ कहे मुझे पकड़ लिया.आज उनके दोनों हाथ मेरेपेट पऱ हि थें मेरा मुंह ढकने कि कोई आवश्यकता नहि थि। वो भि जानरहे थें कि मे स्वेक्छा सें यहांआई हूं। यहा पर्याप्त अँधेरा थां.
वासना अँधेरे मे जवान होती हैं.
वो मेरीपीठ औऱ गले कों चूमने लगे मे भि भाव विभोर हौ गई थि। आहिस्ता उनके हाँथ एक् दूसरे सें दूर होनेलगे। एक् हाथऊपर कि तरफ तौ दूसरा नीचे कि तरफ बढ़ने लगा। उनका बायाहाथ मेरे दाहिने बूब्ज़ पऱ आँ चुका थां औऱ दूसरा मेरी राजकुमारी कि तलाशकर रहा थां। उनके उतावलेपन कों देखकर ऐसालग रहा थां जैसेये उनकेलिए भि पहलीबार थां। उनका राजकुमार अब पूरीतरह तन चुका थां औऱ मेरीकमर मे गडरहा थां। उन्होंने पिछली बार कि तरह अपनीकमर पीछे कि। मे समझरही थि कि वो अपने राजकुमार कों आजादकर रहे हें। ठीक वैसा हि हुआ औऱ उनका राजकुमार मेरे नितम्बों मे अपनेलिए उपयुक्त स्थान ढूंढने लगा। मानस भैया नें अपने घुटने मोड़े। पर्र इसबार राजकुमार कां मेरी जांघों केँ बीच आँ पाना इतना आसान नहि थां। इसबार मैंने स्कर्ट पहनी हुईँ थि। वो परेशान थें मेरी स्कर्ट कों ऊपरकर पाने कि हिम्मत नहि थि। मैंने उनकी सहायता करने केँ लिए अपने हि हाथों सें अपने स्कर्ट कों ऊपर किया.
मानस मे अपनीकमर कों थोडा औऱ नीचे कियाअब उनका राजकुमार मेरी नंगी जांघों केँ स्पर्श सें उछलने लगा। उसकी धड़कन मुझे अपने जांघो पऱ महसूस हौ रही थि। मानस भैया नें मुझे अपनीतरफ औऱ तेजी सें चिपका लिया थां। आरामसे उनका राजकुमार मेरी जांघों केँ बीच सें होतेहुए सामने कि तरफ आँ चुका थां। मेरी राजकुमारी औऱ उसकेबीच करीब-करीब थोड़ी स्थान हि बची होगी.
उनका बायां हाथ मेरे दाहिने मम्मों कों धीरे धीरे सहलारहा थां तथा दाहिना हाथ राजकुमारी कों तलाश करतेहुए उनके उनके राजकुमार सें टकरा गय़ा जहां पर्र मेरी उंगलियां उसे पहले सें हि सहलारही थि। मैंने उनकी उँगलियों कों अपनी राजकुमारी केँ सिर पर्र रखा औऱ उनकी उंगलियों सें उसे धीरे-धीरे धीरे-धीरे सहलाया ताकि वो समझसके कि उन्हें क्याँ करना हैं। वोँ अंदाज़ पऱ हि अपनी उंगलियों कों मेरी राजकुमारी केँ उपर फिराने लगे। पैंटी पहने होने केँ कारण उन्हें राजकुमारी कां एहसास नहि हौ पारहा थां। परन्तु मे नंगे राजकुमार केँ सुपाडे कों अपनी उँगलियों सें सहलाकर आनंदित हौ रही थि। राजकुमार औऱ राजकुमारी दोनों हि लगातार खुशी केँ आंसूबहा रहे थें। मेरी पेंटी अब गीली हौ चुकी थि तथा जांघों केँ बीच कां हिस्सा भि चिपचिपा औऱ गीला होँ गय़ा थां। राजकुमार कों सहलाने सें मेरी उत्तेजना बढ़ती जारही थि। मानस नें अपनाहाथ बारी-बारी सें दोनों स्तनों पऱ घूमना शुरुआत कर दिया थां। मेरामन हुआ कि उनकाहाथ पकड़कर अपनीटॉप केँ नीचे सें अपने स्तनों पऱ रखदूं पर्र मेरी हिम्मत नहि हुइ। धीरे धीरे उनके लिंग कां तनावचरम पऱ पहुंच रहा थां औऱ उनकी धड़कन बढ़ती जारही थि। जैसे जैसे उनके लिंग मे उत्तेजना बढ़रही थि उसीतरह उनके हृदय कि गति भि बढ़रही थि। मेरेपीठ पर्र उनकी धड़कन कां एहसास लगातार होँ रहा थां.
थोड़ी हि देर मे मैंने उनकी उंगलियों कों अपनी पेंटी केँ इलास्टिक कों पकड़कर नीचे खींचते हुए पाया। मे घबरारही थि पऱ मैंने उन्हें इसबात कां एहसास नहि होने दिया। जैसे हि पैंटी मेरे नितंबों सें नीचेआई मैंने उनकाहाथ पकड़ लिया। उन्होंने बिना किसी जोर-जबर्दस्ती केँ पैंटी कों वापसऊपर कर दिया औऱ वापस मेरी राजकुमारी कों सहलाने लगे। मे उनकेइस बर्ताव सें बहोत खुश थि। गिफ्ट स्वरूप मैंने उनका बायाहाथ स्तनों पर्र सें हटाकर अपनेटॉप केँ अंदरकर दिया। इससे पहले कि वो मेरे नग्न बूब्ज़ छू पाते बाहर् रोहन केँ आने कि आहट हुइ। मे बहोत अस्त व्यस्त थि मैंने मानस कों बोला आप् जाइए मे रुकती हूं। उन्होंने अपने राजकुमार कों अंडरवियर मे व्यवस्थित किया औऱ अपने कपड़े ठीक करतेहुए रोहन कि निगाह मे आँ गए। रोहन पकड़ लिया - पकड़ लिया करतेहुए खुश हौ गय़ा। वो सभी बच्चों कों लेकर बाहर् चलेगए मैंने अपने आप् कों ठीक किया.आधी चढ़ी पैंटी केँ बारे मे सोचने लगी। मेरेमन मे मानस कि शराफत नया उत्साह भररही थि। मैंने हिम्मत करके अपनी पेंटी उतार दि औऱ उसे वहीं स्टूल जैसे पुराने ड्रम पर्र रख दिया। अपनेटॉप कों नीचे औऱ उसके सिलवटों कों दूर करने केँ बाद मे भि बाहर् आँ गई। पहलीबार बिना पैंटी केँ मात्र स्कर्ट मे मे दालान केँ बाहर् खड़ी थि मेरी राजकुमारी औऱ जांघों केँ बीच कां हिस्सा गीला हौ चुका थां। बाहर् चलने वाली हल्की हल्की हवा वहां ठंडक कां अहसास करारही थि.
इसबार मेरा छोटा भइया साहिल चोरबना थां। सारे बच्चे फिन अपनी अपनी स्थान पऱ छिपने चलेगए। औऱ मे भि वापस अलमारी केँ पीछे आँ गई। मानस भि बिनादेर किए वापस मेरेपास आँ गए.आने केँ पश्चात उन्होंने अपने दोनों हाथ मेरीटॉप केँ नीचे सें मेरे स्तनों पर्र लेँ गएतथा दोनों स्तनों कों पकड़ लिया.
उनके हाथों कां नग्न स्पर्श पाकर बूब्ज़ औऱ कड़े होँ गए। स्तनों केँ निप्पल पत्थर कि तरह होँ गए थें। जब उनकी उंगलियों निप्पलों सें टकराती मेरी राजकुमारी कांप उठतीतथा जिस्म मे एक् अजीब सि लहरदौड़ जाती। नग्न स्तनों कि संवेदना सें उनका लिंग वापस पूरे उफान पर्र आँ चुका थां औऱ मेरी जांघों केँ बीचआने कि कोशिश कररहा थां। उनके दोनों स्तनों पऱ व्यस्त थें। मे नहि चाहती थि कि वो अपनाहाथ हटाए इसलिये मैंने स्वयं हि अपनी स्कर्ट ऊपरकर दि। अब उनका लिंग मेरी जांघों केँ बीच सें सामने कि तरफआने लगा। पैंटी हट जाने कि वजह सें लिंग कां मार्ग बिल्कुल आसान हौ गय़ा थां वो मेरी योनि सें सटतेहुए आगे कि तरफ आँ गय़ा थां। उनके लिंग सें निकलरहे द्रव्य नें मेरी जांघों केँ बीच केँ उस हिस्से कों पूरीतरह गीलाकर दिया थां। राजकुमार राजकुमारी केँ बिल्कुल समीप पहुंच चुका थां। अभि तक मानस कों मेरी पैंटी हटाने कां एहसास नहि थां पऱ लिंग केँ चारोओर मिलरही चिकनाहट सें वोँ उत्तेजित थें.
मानस अपना एक् हाथ स्तनों सें हटाकर राजकुमारी केँ समीपला रहे थें। नाभि केँ नीचेआते आते मेरी धड़कनें तेज होँ गई। जैसे हि उनकी उँगलियाँ नें आगे कां सफर किया उन्हें कोई रूकावट नहि मिली। पैंटी पहले हि हट चुकी थि। पैंटी केँ हटने कां एह्साह होते हि मानस नें मेरेगाल पर्र चुम्बनों कि बारिश कर दि तथाकान मे धीरे-धीरे सें कहा “ थैंकयू”। मैंने भि अपनी उंगलियों सें राजकुमार कों सहलाकर उन्हें खुस किया। उनकी उंगलियां मेरी राजकुमारी केँ बिल्कुल समीप पहुंच चुकीं थि। आहिस्ता ये प्रतीक्षा ख़त्म हौ गय़ा उनकी उंगलियां मेरे दरार केँ बीच मे पहुंच गयीं। उत्तेजना अपनेचरम पर्र थि इस अद्भुत औऱ नईचीज कों उनकी उंगलियां महसूस करनाचाह रहींथीं। जैसे हि वो दरार मे थोडा नीचेगए उनकी तर्जनी मेरी राजकुमारी केँ मुह मे चली गयीँ,। मैंने उन्हें धीरे-धीरे सें कहा…
“अन्दर मत लें जाइएगा.” वोँ समझगए। मे भि उनके लिंग कों प्रेम सें सहलाने लगी। मुझेयाद आया कि मानस अभि तक अपने घुटने मोड़ेहुए थें। मैंने “एक् मिनट” कहकर अपने आप् कों उनसेअलग किया.तथा उनकीतरफ घूमी। उनका राजकुमार अब बहुतबड़ा हौ गय़ा थां। वो अँधेरे मे भि आकर्षक लगरहा थां। मैंने उन्हें स्टूल पर्र बैठने कों कहा.
मानस स्टूल पर्र बैठ चुके थें। उन्होंने अपने राजकुमार कों व्यवस्थित कर लिया थां। मानस भैया नें अपनीपीठ दीवाल सें लगाली थि औऱ वो आरामदायक स्थिति मे आँ गए थें उनकीकमर अब स्टूल पऱ थि। उनका नाभि प्रदेश बिल्कुल सपाट थां। उनका राजकुमार उर्ध्व स्थिति मे छत कि तरफदेख रहा थां। मैंने वापस अपनीपीठ मानस भैया कि तरफ कि तथा अपना एक् पांव उठाकर उन्हें अपने दोनों पैरों केँ बीच लेँ लिया। अपने आप् कों संतुलित करतेहुए मैंने अपनीकमर कों नीचे करना शुरुआत किया। जैसे जैसे मे नीचे आँ रही थि मेरी धड़कन तेज हौ रही थि। औऱ नीचेआने पर्र राजकुमार नें मेरी राजकुमारी कों छू लिया। राजकुमारी पूरीतरह प्यार रस मे डूबी हुइ थि। राजकुमार भि अपने चेहरे पऱ प्यार रस लपेटे हुए थां। मैंने राजकुमार कां मुखड़ा अपनी राजकुमारी केँ मुंह मे जाने दिया। दोनों नें एक् दूसरे कां स्पर्श किया। मैंने महसूस किया कि मानस भैया कां हाथ मेरे नितंबों कों सहलारहा हैं। इस उत्तेजना कि घड़ी मे भि मे पूरीतरह सतर्क थि। मे किसी भि स्थिति मे अपना कौमार्य नहि खोना चाहती थि.
कुछ हि देर मे राजकुमारी केँ प्यार रस मे राजकुमार पूरीतरह डूब चुका थां। मेरी जांघों पर्र भि चिपचिपपा सां महसूस हौ रहा थां। मेरे पांवअब दर्द करनेलगे थें। मैंने राजकुमार कों थोडा आगे किया औऱ मानस कि नाभि औऱ लिंग केँ बीच केँ भाग मे बैठ गई। मैंने पीछे मुड़कर मानस कि तरफ देखा वो खुशी मे डूबेहुए थें। उन्होंने अपने दोनों पांवआपस मे सटालिए थें ताकि मुझे अपनेपेर अधिक नं फैलाने पड़े। उनकेहाथ वापस मेरे स्तनों तक आँ चुके थें। मेरी उंगलियां उनके राजकुमार कों छूरही थि। मैंने अपनी हथेली औऱ योनि केँ बीच मे एक् मार्ग जैसाबना दिया थां। उनका राजकुमार इसी पतलीगली मे उछलकूद कररहा थां। मे इसगली कि चौड़ाई कम ज़्यादा करती औऱ वो स्वयं उछलने लगता। बीच-बीच मे मे उसे राजकुमारी केँ पास भि लेँ जातीतथा दोनों कि मुलाकात कराती। मिलन केँ वक्त राजकुमार कां उछलना तेजी सें बढ़ जाता। (जिन्दा मछली पकड़ते टाइम मुझेकभी कभीइस टाइम कि यादआती हैं.)
मुझसे औऱ बर्दाश्त नहि होँ रहा थां मैंने राजकुमार कों अपनी राजकुमारी केँ मुख पर्र रगड़ना शुरुकर दिया। अपनी हथेली सें राजकुमार कों सहारा देकर अपनी राजकुमारी कों आगे पीछे करनेलगी। मेरीकमर मे हरकतदेख कर मानस सतर्क हौ गए थें। राजकुमार मेरे हाथों सें भि ज़्यादा रसीले थां उसके स्पर्श सें राजकुमारी बहोत प्रफुल्लित थि औऱ थोड़ी देर मे उसका कंपन भि अतिरेक तक पहुंच गय़ा। मेरे पांव तननेलगे थें। मैंने मानस भैया केँ पैरों मे भि तनाव देखा। उनकी पकड़ मेरे स्तनों पर्र औऱ ज़्यादा होँ गई थि। कुछ हि पलों मे राजकुमार मे लावा उड़ेल दिया। राजकुमारी सें भि खुशी केँ आंसूझर झरबहरहे थें। मेरे छोटेहाथ इतने सारेकाम रस कों समेट पाने मे असमर्थ थें। मानस कां भि हाथ भि कुरुक्षेत्र मे आँ गय़ा थां उनकाहाथ भि प्यार रस सें सराबोर होँ चुका थां। उन्होंने राजकुमारी केँ चेहरे पऱ उंगलियां फेरी पऱ मैंने उनकाहाथ पकड़ लिया। राजकुमारी बहोत संवेदनशील होँ गई थि। आज उसकेसंग कुछ अद्भुत हुआ थां। वो अभि तक फड़करही थि.
मे धीरे-धीरे सें उठी। मानस भि उठगए। मैंने स्टूल पर्र पड़ी अपनी पेंटी कों उठाया। मैंने उससे मानस केँ राजकुमार कों पोछा इसकेबाद मैंने अपनी राजकुमारी तथा जांघों कों साफ किया। पेंटी करीबआधी गीली हौ चुकी थि। मेरेहाथ पोछे केँ बाद मानस नें भि पैंटी मांगी। हाथ पोछने केँ बाद वो पेंटी कों अपनीजेब मे रखनेलगे। मैंने उनकाहाथ पकड़ने कि कोशिश कि तोँ वो बोले…
“ मे इसेरख लेता हूं” मैंने पूछा.
“क्यूं “ तोँ उन्होंने कहा
“गुरु दक्षिणा”
ये सुनकर मे निरुत्तर होँ गयीँ, तथा बाहर् आँ गई। साहिल मुझेदेख करखुस होँ गय़ा मैंने खेल समाप्ति कि घोषणा कि तथा अपनेघऱ आँ गई.
ग्रामीण परिवेश मे भि काम वासना उसीतरह फलती फूलती हैं जिसतरह शहरों औऱ विदेशों मे। अंतर केवल इतना होता हैं कि गांवों मे सेक्स मे इतना नंगापन नहि होता.
राजकुमारी दर्शन
अपनेरूम मे पहुंचने केँ बाद मे खाट पऱ लेट गय़ा। आज जौ हुआ थां उसकी कल्पना भि मुझे नहि थि। लड़कियों कां वो अंग इतना कोमल होता हैं मे नहि जानता थां। उसकी राजकुमारी अत्यंत कोमलतथा रसभरी थि तथा दोनों मम्मों भि अत्यंत कोमल थें। मैंने अपनीहाथ कि उंगलियों कों चुम्मा जोँ अभि-अभि राजकुमारी सें मिलकर आयींथीं। उंगलियों पर्र राजकुमारी केँ खुशी केँ आंसूतथा मेरा लावा दोनों मिलेहुए थें। ब्लू फिल्मों मे मैंने देखा थां कि नायिका वीर्य कों अपने मुंह मे लें लेती हैं तथा नायक नायिका कि योनि अपनी जिह्वा सें छूता हैं। मेरेलिए ये एक् घृणास्पद क्रिया थि परंतु आज सीमा कि योनि छूने केँ बाद उससे एक् अजीब किस्म केँ आत्मीयता हौ रही थि नां चाहते हुए भि मैंने उसका स्वाद कों जानने कि कोशिश कि। मेरी उंगलियां गीली होकर वापस चिपचिपी होँ गयीं पऱ स्वाद केँ बारे मे मे कोईराय नहि बना पाया.
अगली सुभह सीमा नहि आई। मे समझ गय़ा थां कि वो कल कि घटना केँ बाद मुझसे मिलने मे कुछ वक्त अंतराल चाहरही थि। सीमा नें कल जौ किया थां वो उस उम्र कि लड़की केँ लिए बहोत बड़ीबात थि। मुझेइस बात कां पूरा एहसास थां कि मेरे राजकुमार केँ अलावा उसने औऱ भि राजकुमारों कि सेवा कि थि परंतु उसका कौमार्य सुरक्षित थां ऐसा मुझे प्रतीत होता थां। उसका पढ़ाई मे संजीदा होना भि इसबात कां परिचायक थां। 2 दिनों बाद सीमाफिन आई अपनी पढ़ाई केँ संबंध मे औऱ कुछ बातें कि। मैंने पूरी तन्मयता सें उस विषय कों समझाया वो खुश हौ गयीँ,। उसके संतुष्ट होने केँ बाद मैंने उसे छेड़ा “राजकुमारी कुशल मंगल सें तोँ हैं नां?” वो हंसने लगी औऱ बोलीं…
“आपके राजकुमार नें उसे इतनी चुम्मियाँ ली हैं कि वो बार-बार खुशी केँ आंसू बहाती रहती हैं” मे उसकी भाषा समझने लगा थां। आज वो फिन सें स्कर्ट औऱ टॉपपहन करआई थि छोटा रोहन सीढ़ियों सें आकर सीमा सें बोला….
“दिदी आप् 2 दिनों सें खेलने नहि आयीं.आज चलिए नां। मानस भैया आप् भि आइए”
“ चलिएआइए बच्चों कां मनरख लेते हें” हम् सभी नीचे आँ गए। सीमा कों फिन अलमारी कि तरफ छुपते देखमन प्रफुल्लित होँ उठा थां आज भि मे उसी उत्साह केँ संग सीमा केँ पीछे होँ लिया.अब हम् दोनों इसखेल केँ खिलाड़ी हौ चुके थें। हमने 2 - 3 बारखेल केँ दौरान अपनीकाम पिपासा बुझाई औऱ वापस आँ गए। सीमा नें इसबार हमारे प्यार रस कों अपनी स्कर्ट मे हि पोछ लियाआज वो पैंटी नहि पहने हुयी थि.
अगलेकुछ दिनों तक सीमा लगातार मेरेपास आतीरही औऱ अपनी पढ़ाई केँ बारे मे मुझसे कई चीजें समझती रही.कई बार वो पजामी पहनकर आती थि तौ कईबार स्कर्ट पहनकर। मैंने नोटिस किया कि जब वो पजामी पहनकर आती थि तौ छुपन छुपाई खेल सें बचती थि औऱ जब स्कर्ट पहनकर आती थि तोँ खुशी-खुशी छुपन छुपाई खेलने कों सजधजकर हौ जाती। मेरेलिए याँ इशारा बन चुका थां कि यदि मैंने उसे स्कर्ट मे आतेहुए देखा तोँ मेरे राजकुमार कों आजसुख मिलना पक्का लगता थां। कुछ हि दिनों मे हमारा येसुख ख़त्म होने वाला थां.
सीमा केँ दिल्ली जाने कां वक़्त लगभग आँ रहा थां। सीमा नें बताया कि 3 दिनों केँ बाद वो वापसजा रही हैं। मे दुखी होँ गय़ा मैंने कहा ….
“सीमा तीन-चार दिन औऱ रुकजाओ मे भि तुम्हारे संग वापस चलूंगा”.
“उसनेकहा मानस भैया बापू टिकटकरा चुके हें” उसने मुझेखुश करने केँ लिए मेरेसंग बिताए पलों कों याद किया औऱ कहा.
“आपके राजकुमार नें तौ राजकुमारी सें मुलाकात करली”
मैंने उसेयाद दिलाया कि उसने मुझे राजकुमारी कों दिखाने कां वचन 2 वर्ष पूर्व दिया थां। वो पशोपेश मे पड़ गई,। हमारे पास बहोत कम टाइमबचा थां सीमा नें कहा अच्छा मे कोशिश करूंगी। 2 दिनबाद अचानक सुभह-सुभह मायाजी कि तबीयत खराब हौ गई उनकेपेट मे दर्द होँ रहा थां। पिताजी उनकोशहर मे डॉक्टर सें दिखाने लेँ गए छाया भि संग मे जाने कि जिद करनेलगी औऱ वो भि वाहन मे बैठकर चली गयीँ,। पिताजी नें कहा…
“ बेटा कुछबना करखा लेना हम् लोग दोपहर तक लौट आएंगे” जाते वक्त मंजुला चाची भि वहांथीं। वोँ बापू कि बात सुनकर येसमझ गयींथीं कि मैंने ब्रेकफास्ट नहि किया हैं.
[मे सीमा]
चाची नें कहा…
“ मानस नें ब्रेकफास्ट नहि किया हैं। तुम् जाकर मानस कों ब्रेकफास्ट देआवो वो घऱ पऱ अकेला हैं” मे ये सुनकर बहोत खुश होँ गई औऱ बोलि। “चाची मे नहाकर जाती हूं उन्होंने कहा बेटा वो भूखा होगा मैंने कहाबस 5 मिनट लगेगा”
“ ठीक हैं” मे फटाफट बाथरूम मे चली गई,। बाथरूम जाने केँ बाद मैंने ये निर्णय कर लिया कि आज अपनी राजकुमारी केँ दर्शन मानस भैया कों करा हि दूंगी पता नहि फिनकभी मौका मिले नां मिले। अपनी राजकुमारी कि दाढ़ी मूछें मे 2 दिन पहले हि साफकर चुकी थि। मेरी राजकुमारी अब अत्यंत खूबसूरत औऱ चमकदार लगरही थि। शीशे मे मे स्वयं कों देखकर शरमा गई,। मैंने अपनी राजकुमारी कों साबुन सें धोया औऱ नहाकर वापस बाहर् आँ गयीँ,। मे सीधा माँ केँ कमरे मे गई अपनी पहलेदिन वाली स्कर्ट औऱ टॉप पहनी। माँ कां वही परफ्यूम लगाया औऱ चाची केँ पासआकर बोलि.
“लाइए चाची दीजिए” चाची नें मानस भैया केँ लिए ब्रेकफास्ट निकाल कररखा थां जिसे लेकर मे धड़कते ह्रदय केँ संग मानस भैया केँ पास पहुंच गई,। मानस भैया थोड़े दुखी थें क्योंकि मायाजी औऱ उनके बापूसब लोगशहर गएहुए थें। मे उनकी स्थिति समझ सकती थि। मैंने कहा…
“छोटी मोटी तकलीफ होगी। वो जल्दठीक हौ जाएंगीं आप् प्यार सें ब्रेकफास्ट कर लीजिए.” मैंने उन्हें अपने हाथों सें एक् रोटी खिलाई। मे अभि अभि नहाकर आई थि वो मुझे एकटकदेख रहे थें। ब्रेकफास्ट करने केँ बाद मैंने उनसेकहा कि कल मे चली जाऊंगी। वोँ मेरे जाने कि बात सें अधिक दुखी हौ गए। मैंने उनके हांथों कों अपने हाँथ मे लेँ लिया औऱ उनसेकहा…
“मेरी राजकुमारी आपको दर्शन देना चाहती हैं” उनकागम एक् समय मे गायब होँ गय़ा। तभीफ़ोन कि घंटीबजी। मानस नीचेगए औऱ वापसआकर बताया.
“पिताजी कां मोबाइल थां। मायाजी ठीक हें। ड्रिप लगरहा हैं एक् दो घंटे मे वापसघऱ आँ जाएंगें.” वोँ खुश हौ गए थें। उन्होंने मुझे अपने आलिंगन मे खींच लिया। मैंने उनसेकहा.
“आप् आखेंबंद कर लीजिए जब मे कहूंतब खोलिएगा.”
उन्होंने अपनी आखेंबंद करलीं। मैंने अपनी स्कर्ट उतार दि पता नहि मेरेमन मे क्याँ आया कि मैंने अपनाटॉप भि उतार दियाअब मे उनके सामने पूर्ण नग्न खड़ी थि। मेरेमन मे एक् औऱ शरारत सूची मैंने मानस भैया सें कहा अपनीआंख बंदकिए रहिए औऱ अपने राजकुमार कों भि आजादकर दीजिए। उन्होंने मुस्कुराते हुए अपनी पजामी कों अलगकर दिया। मैंने उनसेकहा आप् अपना कुर्ता भि हटा दीजिए.मेरे कहने पर्र अब वो पूरीतरह मेरे सामने नग्न खड़े थें। मे उन्हें देखकर मन हि मन उत्तेजित हौ रही थि। वोँ नग्न अवस्था मे औऱ भि सुन्दर लगरहे थें। मे भि नग्न थि पऱ वो मुझेदेख नहि पारहे थें। उन्होंने ईमानदारी सें अपनी आंखें बंद कि थि। मे पलंग पऱ बैठी हुई थि। मे खड़ी हुइ औऱ उनसेकहा आप् अपनी आंखें खोल सकते हें.
आंखें खोलने केँ पश्चात उन्होंने अपने जिंदगी मे पहलीबार किसी लड़की कों नग्न देखा थां। उनका राजकुमार तौ इस परिस्थिति कि कल्पना मे पहले हि तनकर खड़ा हौ चुका थां। राजकुमार पहले सें बड़ा हौ चुका थां ये मैंने पहले हि नोटिस कर लिया थां। वो मुझे एकटक देखते रहे मे लज्जा सें अपनी आंखें नीचे कि हुइ थि पऱ मेरी आंखें उनके राजकुमार पर्र हि टिकी थि। करीब-करीब एक् मिनट तक देखने केँ बाद वो धीरे-धीरे धीरे-धीरे मेरेपास आए औऱ बोले “सीमा तुम् बहोत हि सुंदर होँ मे तुम्हें जीभरकर देख्ना चाहता हूं.” मैंने फिनवही सवाल किया.
“मे याँ राजकुमारी?”
“ दोनों” उन्होंने मुझे सहारा देकर पलंग पऱ लिटा दिया। उन्होंने मेरे पैरों कों छुआ। आहिस्ता उनकेहाथ मेरी जांघों तक आँ गए। उन्होंने अपनेगाल मेरी जांघों पऱ सटादिए। उन्होंने मुझसे पूछा.
“ क्याँ लड़कियां इतनी कोमल होती हैं?” ये कहतेहुए वो धीरे-धीरे धीरे-धीरे मेरे राजकुमारी केँ पास आँ गये.
राजकुमारी कों देखकर वो अपनी नजरें नहि हटापा रहे थें। वोँ बहोत देर तक उसे देखते रहेफिन मेरी अनुमति सें उन्होंने उसेछुआ। मैंने जानबूझकर अपनी जांघें अलगकर दि। वो आश्चर्य सें मेरी राजकुमारी कों देखते रहे राजकुमारी अपनीलार टपकारही थि। वो धीरे-धीरे धीरे-धीरे अपना ध्यान नाभि प्रदेश सें होतेहुए स्तनों कि ओरतरफ लें आये। मेरे दोनों बूब्ज़ तनेहुए थें। मेरे स्तनों कों वो पहले भि छू चुके थें इसलिये उन्होंने मेरी इजाजत केँ बिना हि उन दोनों कों छू लिया.कुछ देर उन्हें सहलाने केँ बाद उन्होंने मेरे दोनों निप्पलों कों भि अपनी उंगलियों मे लेकर महसूस किया। वोँ अपनेहाथ मेरी गर्दन सें होतेहुए मेरे चेहरे पऱ लें गए औऱ दोनों हाथों मे मेरा चेहरा लेकर मुझे माथे पर्र चूम लिया औऱ बोले.
“ सीमा तुम् मेरे जिंदगी कि पहली लड़की हौ जिसे मैंने नग्न देखा हैं मे तुम्हारा ऋणी हूं। काश तुम् मेरी जीवनसंगिनी बन पाती.” उन्होंने मुझे होठों पर्र चुम्बन नहि दिया। वो वापस मेरी राजकुमारी कि तरफगए तथा अपनी हथेलियों केँ दबाव सें मेरी जाँघों कों अलगकर रहे थें। मे समझ गई थि वो क्याँ चाहते हैं मैंने उनका सहयोग करने केँ लिए अपने दोनों हाथों सें अपने पैरों कों पकड़ लिया औऱ जितना संभव हौ सकता थां उसे फैला दिया।। राजकुमारी कि दरारअब बढ़ गई थि वोँ पूरीतरह रस मे डूबी हुइ थि ठीकउसी तरहजिस तरह
किसी ताजेफल मे चीरा लगाने केँ बादउस कां रसछलक कर बाहर् आँ जाता हैं.
मानस नें मेरीतरफ देखा औऱ अपनी उंगलियों कों मेरी राजकुमारी केँ पास लें आये औऱ मेरी इजाजत केँ लिए धीमी आवाज़ मे पूछा…
“क्याँ मे इसेछू सकता हूं?” मैंने सिर हिलाकर इसकी सहमति दे दि। वो अपनी उंगलियों सें राजकुमारी कां मुआयना करनेलगे। पहले उन्होंने अपनी तर्जनी सें मेरी दरार कों ऊपर सें नीचे तक छुआ.ऐसा लगरहा थां जैसे वोँ उसकेरस कों बराबर सें बांट देना चाहते हें। उनकी तर्जनी पूरीतरह गीली हौ गई थि। अगलीबार उन्होंने तर्जनी कां दबाव बढ़ाया तौ दरार अपने आप् फैल गई उन्हें अंदर औऱ भि गीलापन महसूस हुआ। हमारी उंगलियों केँ 3 भाग होते हें उन्होंने उन्होंने अपनी तर्जनी कां पहलाभाग मेरी दरार केँ अंदरडाल दिया थां। अब उनकी तर्जनी नीचे सें ऊपर कि तरफ आँ रही थि। जैसे हि उनकी उंगली मेरी भग्नासा सें टकराई मे बेचैनी उठी। मेरे पैरों कि हरकत सें उन्हें मेरेइस भाग कि अहमियत कां अंदाजा हुआ। उन्होंने अपनी उंगली पीछेकर ली। भग्नासा सें नीचेआने केँ बाद तर्जनी राजकुमारी केँ मुख मे प्रविष्ट होनेलगी। वो आगे बढ़ना चाहरहे थें उन्होंने अपनी तर्जनी कां दबाव बढ़ाया। यदि मे उन्हें नं रुकती तौ वो अपनी अज्ञानता मे अपनी तर्जनी सें हि मेरा कौमार्य भेदनकर देते। वो अपनीइन क्रियाओं केँ दौरान बीच-बीच मे मेरीतरफ देखते थें शायद मेरी रजामंदी केँ लिए.
मैंने उन्हें सिर हिलाकर मनाकर दिया थां उन्होंने मेरी दरार केँ दोनों होंठों कों अब अपने दोनों हाथों केँ अंगूठे औऱ तर्जनी तर्जनी सें औऱ फैलाने कि कोशिश कि ताकि वो अनजानी गुफा केँ रहस्य सें परिचित हौ सकें। दरार कों फैलाते हि अंदर गुलाबी गुफा दिखाई दे गई.
गुफा केँ शीर्ष पऱ स्थित भग्नासा कों भि उन्होंने बहोत ध्यान सें देखा। उनका अंगूठा गुफा मे प्रवेश करने कों आतुर हौ रहा थां। मैंने इशारे सें उन्हें रोक दिया। उन्होंने अपने हाथों केँ सहारे मुझे करवट लेटने कों कहा.फिन आहिस्ता मुझेपेट केँ बल लिटा दिया.कभी कभी मुझेऐसा एहसास हौ रहा थां जैसेकोई डॉक्टर मेरा मुआयना कररहा हौ। लड़कियों केँ बदन मे कोमलता हर स्थान होती हैं। मेरे नितंब देखकर बिनाकहे उन्होंने अपनेगाल उससेसटा दिए। उन्होंने अपने दोनों हाथों सें नितंबों कों नापातथा उन कों अलगकर अलग करके देखने कि कोशिश। मेरे दूसरे दरवाज़ा कों देखते हि उन्होंने अपेक्षाकृत तेज आवाज़ मे बोला…
“दासी भि राजकुमारी जितनी हि सुंदर हैं” उन्होंने उसेछुआ नहि औऱ मेरीपीठ सें सहलाते औऱ गर्दन पऱ चुंबन करतेहुए बालों केँ पास आँ गए औऱ मेरेकान मे धीरे-धीरे सें कहा….
“सीमा मे राजकुमारी कों एक् अभूतपूर्व गिफ्ट देना चाहता हूं” मैंने कुछ नहि बोलाबस सहमति मे सर हिला दिया। मानस भैया पऱ मुझे पूरा विश्वास थां.
इस टाइम मे भि वासना मे पूरीतरह घिरी हुई थि। स्वीकृति पाकर वो मेरीपीठ सहलाते हुए नितंबों तक आँ गए औऱ मेरीकमर कों पकड़कर मुझे एक् बारफिन पीठ केँ बल लिटा दिया। उन्होंने मुझे आंखेबाद करने केँ लियेकहा औऱ अगलेदो मिनट तक आंखें खोलने केँ लिएमना किया.मै उनके चमत्कारी तोहफा कि इंतज़ार करनेलगी.
अचानक मेरी राजकुमारी कि दरार मे मे किसी मोटी पर्र चिपचिपी चीज केँ रेंगनें कां एहसास हुआ। वो दरारों केँ बीच सें होतेहुए मेरी भग्नासा तक गयीँ, औऱ वापसलौट आयी.ये बड़ा हि उत्तेजक एहसास थां। एक् दोबार इसयही क्रिया कों दोहराने कि बादउस रहस्यमई चीजें नें गुफा केँ दरवाज़ा पऱ दस्तक दि औऱ प्रवेश करने कि कोशिश कि। ये इतनी रसीले थि कि मेरा कि मेरा कौमार्य भेदन इसकेबस कां नहि थां। मे निश्चिंत थि। उसने मेरी गुफा मे मे प्रवेश पाने कि भरसक कोशिश कि तथाकुछ देर प्रयास करने केँ पश्चात मेरी भग्नासा पऱ थिरकने लगी। मेरी राजकुमारी केँ लिएये बिल्कुल नईचीज थि। इस स्पर्श सें राजकुमारी केँ अंदर धड़कन बढ़ गई थि। मुझसे अब बर्दाश्त नहि होँ रहा थां। मुझेऐसा महसूस हुआ जैसे उसकासंग देने केँ लिए उसके मित्र भि आँ गए हें। मेरी राजकुमारी पऱ तीनतरफ सें वार हौ रहा थां। वो रहस्यमई चीजकभी मेरी दरारों कों फैलाती कभी भग्नाशा पऱ थिरकती। मे उत्तेजना केँ चरम पऱ थि मेरी राजकुमारी स्खलित होनेलगी। मे अपने पैरों कों अपने सीने कि तरफ तेजी सें खींचे हुए थि। उत्तेजना केँ आखिरी पड़ाव पर्र मे अपने पैरों कों छोड़कर अपनेहाथ अपनी राजकुमारी तक लेँ जारही थि ताकि उसकी सहायता कर सकूं।। मेरेहाथ वहां तक मेरेहाथ वहां तक पहुंचते, इससे पहले वो मानस भैया केँ बालों सें टकरागए। मे सारीबात समझ चुकी थि.
मैंने उनकासिर अपनी जांघों केँ बीच सें हटाने कि। उन्होंने अंत मे मेरी राजकुमारी कों दोनों होठों सें चुंबन लियाएवं एवं अपनीजीभ कों दरारों केँ बीच सें लें जातेहुए मेरी भग्नासा कों छू लिया। मे एक् फिनउछल पड़ी। उत्तेजना केँ बाद भग्नासा बहोत संवेदनशील होँ जाती हैं। मैंने अपनी जाँघों कों वापससटा लिया औऱ धीरे-धीरे सें उठकरबैठ गयीँ,.
मानस कि आखों मे वासना थि। उनके होठों पऱ मेरा प्यार रस दिखाई पड़रहा थां। वो कमरे सें सटे बाथरूम मे चलेगए मे बैड पर्र अभि भि नग्न बैठी थि। अब मेरी राजकुमारी कि धड़कन शांत होँ चुकी थि.
मैंने आज तक सोमिल ( मेरा चंडीगढ़ वाला मित्र) केँ संग इतने खुलेमन सें सेक्स नहि किया थां। हमनेआज तक एक् दूसरे कों नग्न नहि देखा थां मैंने उसका हस्तमैथुन कई तरीकों सें किया थां तथा इसमें महारत हासिल कर चुकी थि। वो बार-बार अपना वीर्य मेरे जिस्म पऱ गिराने कों उत्सुक रहता पर्र मे हमेशा उसे अपनी रुमाल याँ उसकी रुमाल मे गिरा देती थि। कभी कभार लापरवाही बरतने पर्र उसने अपना वीर्य मेरे कपड़ों पर्र गिरा दिया थां। दरअसल सोमिल मे धीरज नहि थां। वो सेक्स कों बहोत जल्दजी लेना चाहता थां। उसने मुझे नग्न करने केँ लिएकई प्रकार केँ प्रलोभन दिए थें पर्र मे हमेशा टाल जाती थि। वो मुझसे बहोत प्रेम करता थां औऱ मुझेसर आंखों पर्र बिठाये रखता थां। उसनेआज तक मेरीकोई बात नहि टाली। मे अपनीसोच मे डूबी हुयी थि तभी बाथरूम कां दरवाजा खुला औऱ मानस भैया बाहर् आँ गये.
उनके लिंग कां तनावकुछ कम होँ गय़ा थां वो चेहरा धोकर वापसआए थें। वापसआकर वो वापस कुर्सी पऱ बैठगए मुझे अभि तक नग्न देखकर उनकी उम्मीदें जागउठी थि। मैंने अपने कपड़े क्यूं नहि पहने थें शायद वोँ यहीसोच रहे थें। मे धीरे-धीरे सें उठकर उनकेपास गई। पास पहुंच कर मैंने बिना उनसे पूछे उनके राजकुमार कों अपने हाथों मे लें लिया। राजकुमार जल्दी अपनीतनी हुईँ अवस्था मे आँ गय़ा। मैंने देखा कि राजकुमार 2 सालों मे पर्याप्त बड़ा हौ गय़ा थां। सुनील केँ जितना तौ नहि पर्र उससे थोडा हि कम थां। ये राजकुमार बहोत हि कोमल थां। मैंने उसे प्रेम सें आगे पीछे करना शुरुआत किया। मे स्टूल लेकर उनके दोनों पैरों केँ बीचबैठ गई औऱ अपने हाथों सें राजकुमार कों खिलाने लगी मैंने अपनी सारी कार्यकुशलता औऱ अनुभव जौ सोमिल नें मुझे सिखाया थां उसका प्रयोग करनेलगी। हरबार नए अंदाज सें मानस भैया खुश हौ जातेतथा स्खलित होने केँ लिए रेडी हौ जाते। फिन मे उनका तनावकम करती.
इस प्रक्रिया मे राजकुमार केँ दोनों अन्डकोशों केँ वीर्य उत्पादन कि गति बढ़ती जारही थि। कुछ वीर्य तौ राजकुमार केँ मुंह सें लार कि तरहटपक रहा थां यही राजकुमार कों सहलाने मे मेरी सहायता कररहा थां। जरूरत पड़ने पर्र मे अपनी राजकुमारी केँ प्यार रस कां उपयोग भि कर लेँ रही थि। मानस भैया अपनेहाथ कभी मेरेपीठ पर्र रखतेकभी स्तनों पर्र। राजकुमार कां उछलना बढ़ चुका थां मानव भैया कां चेहरा लाल हौ चुका थां औऱ वो अपनी गर्दन कों इधर-उधर कररहे थें तथाकमर कों ऊंचाकर राजकुमार कों मेरीतरफ लाने कां प्रयास कररहे थें। मे समझ गयीँ, मैंने भि उन्हें अधिक परेशान नां करतेहुए राजकुमार केँ शिश्नाग्र केँ नीचे वालेभाग पऱ अपनीरगड़ बढ़ा थि.
ज्वालामुखी कां विस्फोट होँ गय़ा वीर्य कि पहलीधार मेरे गालों पऱ पड़ी.इस अप्रत्याशित विस्फोट सें लिंग पर्र मेरी पकड़ ढीली हुई। उसकेमुख पऱ जब तक मे अपनाहाथ लगाती तब तक वो वीर्य वर्षा प्रारंभ कर चुका थां मैंने जल्दी हि अपनी हथेली राजकुमार केँ मुख पऱ रख दि अब वीर्य मेरी हथेलियों सें टकराकर वापस राजकुमार पऱ हि गिररहा थां ऐसालग रहा थां जैसे उसका दुग्ध स्नान हौ रहा हौ। मानस भैया मेरे एक् मम्मों कों तेजी सें दबाएहुए थें तथा मेरे कंधे पऱ उनकाहाथ कसाहुआ थां। लिंग सें होँ रहे वीर्य प्रवाह केँ रुकने केँ पश्चात मैंने अपनाहाथ लिंग पर्र सें हटा लिया.
मानस भैया केँ चेहरे पर्र संतुष्टि थि। उनकी आंखें बंद थि मेरेहाथ हटाने केँ बाद उन्होंने आंखें खोलीं औऱ मुस्कुराते हुए मुझे देखा उनका वीर्य मेरेगाल गर्दन तथा स्तनों पर्र गिराहुआ थां। मे उसे पोछने केँ लिए किसी उचित वस्त्र कि तलाश मे इधरउधर देखरही थि तभी मानस भैया नें हाथ पकड़कर मुझे अपनी जांघ पऱ बैठा लिया। उन्होंने अपने हाथों सें मेरेबदन पऱ गिरेहुए वीर्य कों पोछा औऱ स्तनों पऱ मलनेलगे। मुझे थोड़ी असमंजस हौ रही थि। मेरेगाल पर्र गिराहुआ वीर्य मेरे होठों तक आँ चुका थां मानस भैया कि नजर पड़ते हि जल्दी उन्होंने अपने हाथों सें पोछा पऱ तब तक वीर्य मेरे होठों केँ रास्ते अंदर प्रवेश कर चुका थां। वीर्य कां अजीब सां स्वाद मेरे चेहरे घृणा कां भाव उत्पन्न करता इससे पहले हि उनके होंठ मेरे होंठों पऱ आकर चिपकगए। जैसे अपने वीर्य कि इस गुस्ताखी पऱ वो उसेसजा देनाचाह रहे हें औऱ उसे मेरेमुख मे प्रवेश करने सें पहले हि रोक लेना चाहते हें। मे इस अप्रत्याशित कदम सें हतप्रभ थि। इतने दिनों मे कभी भि होठों पऱ चुंबन कि स्थिति नहि आई थि। मानस भैया मेरे होंठचूस रहे थें मे स्वयं कों रोक नहि पाई औऱ इसमें सहयोग करनेलगी.
राजकुमारी मे एक् अजीब सि हलचल हुइ राजकुमार कां तनाव भि मुझे महसूस होनेलगा थां। कुछ हि पलों मे मैंने अपने आपको उनसेदूर किया। मेरी नजरें अभि भि झुकी हुइ थि। मैंने अपने वस्त्रों कि तरफ देखा जौ उपेक्षित सें पड़ेहुए थें। शायदइस रासलीला मे उनकी अहमियत नहि रह गई थि.
मे अपने वस्त्र लेकर बाथरूम मे चली गई। वापसआकर मैंने देखा मानस भैया नें भि अपने कपड़े पहनलिए थें। अभि मे बातकर पाने कि स्थिति मे नहि थि। अतः मैंने नाश्ते कि थाली उठाई बिनाकुछ बोले अपनेघऱ कि तरफ आँ गई। मानस भैया नें भि कुछ नहि बोला पर्र मुझे छोड़ने सीढ़ियों तक आए। अंततः आज उन्होंने राजकुमारी केँ दर्शन उसके प्यार रसएवं स्पर्श कां पूर्ण खुशी लिया थां.
युवाओं कां शांत औऱ सौम्य बर्ताव चंचल युवतियों कि उत्तेजना जगाने मे मददगार होता हैं। वोँ जब अपने दोस्त पर्र पूर्ण विश्वास कर लेतीं हें तोँ नग्नता कां उतना हि खुशी लेतीं हैं जितना कि उनके मित्र युवा.
मंजुला चाची नें मुझे देखते हि पूछा
“बेटा कितनी देरलगा दि” मुझेलगा मेरी चोरी पकड़ी गई। मैंने जल्दी अपने कपड़े ठीक करतेहुए कहा.
“चाची वो भैया सें कुछ पढ़ाई कि बातें होनेलगी” मेरीये दलील उन्हें पसन्द नां आयी पर्र मानस भैया पे शक करने कां कोई कारण नहि थां। मे अपने कमरे मे जाकर पलंग पऱ लेट गई। आज कि घटना सें मेरे हृदय मे मानस भैया केँ लिए प्यार उत्पन्न हौ गय़ा थां। मेरेमन मे सोमिल औऱ मानस कों लेकर पशोपेश कि स्थिति हौ गई थि। मुझेये भि नहि पता थां कि इसकेबाद मानस भैया सें अगलेसाल हि मुलाकात होगी कि नहीं.
मानस सें 1 महीने मे हुइ अंतरंग मुलाकातों मे उनका कामुक परंतु सहज बर्ताव मेरेदिल कों प्रभावित कर गय़ा थां.
प्यार मे बिताए गएकुछ लम्हा आपकेदिल पर्र एक् गहरीछाप छोड़ जाते हें। कामुकता सें जन्मलिए इस प्रेम कां अपना महत्व थां.
[मे मानस]
सीमा कों छोड़कर आने केँ बाद मेरा ध्यान मात्र होंठों केँ चुम्बन पऱ केंद्रित हौ गय़ा थां। होठों केँ चुम्बनों केँ दौरान सीमा नें मेरा बराबरी सें संग दिया थां। मेरेमन मे उसके प्रति प्रेम पनपरहा थां। 1 महीने मे उसने मेरीकाम पिपासा कों एक् अलग ऊंचाइयों तक आया दिया थां। पिछले 1 महीने मे वो कईबार मेरा वीर्य प्रवाह कर चुकी थि। क्याँ उसकी भि कामुकता मेरे हि जितनी थि प्रबल थि? परंतु सीमा कों येसभी केसेपता थां? ये मेरेलिए सवाल चिन्ह थां.
मुझेऐसा प्रतीत होता थां कि वो किसी औऱ केँ संग भि येसभी करती हैं। परंतु राजकुमारी कों छूने केँ दौरान उसकी प्रतिक्रिया अलग हि थि। इससे भ्रम होता थां जैसेये सभी उसकेलिए पहलीबार हुआ थां।। उसका कौमार्य सुरक्षित थां येबात अलग थि परंतु उसे अपनी प्रेमिका कां जगहदे पाना पाना कठिन थां। मगर सीमा नें मेरे हृदय मे अपनाजगह बना लिया थां.
मायाजी दोपहर केँ पश्चात डॉक्टर सें मिलने केँ बादघऱ वापस आँ चुकी थि। उनकी तबीयत अबठीक लगरही थि साम तक सभीकुछ सामान्य हौ गय़ा.
सीमा कों वापस जानां थां मे बहोत दुखी थां। अगलेदिन मे बाजार गय़ा औऱ उसकेलिए कुछ तोहफा खरीदे। सीमा जाने सें पहले मुझसे मिलने आईआज भि उसने स्कर्ट पहनी थि पर्र मुझेपता थां आज हम् दोनों कों वो सुख नहि मिलने वाला थां। मैंने उसे अगलेसाल होने वाले एग्जाम केँ लिए शुभकामनाएं दीं औऱ मुस्कुराते हुए राजकुमारी दर्शन केँ लिए उसका शुक्रिया क्याँ। उसनें मुस्कुराते हुएकहा.
“ आपने तोँ दासी केँ भि दर्शन करलिए थें” मे भि मुस्कुरा पड़ा। मैंने उसे उपहार वालाबैग पकड़ाया। इससे पहले कि वो वापस मुड़ती मैंने उसे अपने आलिंगन मे लें लियातथा उसके गालों कों चुमते हुए होठों पर्र आँ गय़ा। होठों पऱ चुंबन लेने केँ पश्चात वो मुझसे अलग हुई आज कामुकता कां कोईजगह नहि थां। हमारी आंखें नामथीं। मे सीमा केँ संग नीचे आँ गय़ा। सभी सीमा कां हि प्रतीक्षा कररहे थें। वो अपनीजीप मे पीछे बैठी औऱ जीपधूल उड़आती हुईँ नजरों सें ओझल हौ गई। मेरी सीमा भि इसीधूल मे खो गई। मै रुवांसा होँ कर अपने कमरे मे वापस आँ गय़ा
मानस और छाया ( एक कामुक कहानी) - devarani ki chudai – New Episode
छायाभाग 2
सीमा कि यादें
एक्-दो दिन दुःखी रहने केँ बाद मे आरामसे सामान्य होँ गय़ा मेरे वापस दिल्ली जाने कां समय भि आँ गय़ा थां। मायाजी नें मेरेलिए कई सारे नाश्ते केँ सामान बनाए थें। छाया मेरेलिए अभि भि एक् अपरिचित हि थि। इसबार मे उसकी नजरें मुझसे केवलदो बार मिली थि वो भि खेल केँ दौरान, वापसआते टाइम भि वो मुझे छोडने नहि आयीआई। मैंने बापू केँ पेरछुए तथा मायाजी कों हाथ हिलाकर अभिवादन किया औऱ दिल्ली केँ सफर पऱ रवाना हौ गय़ा। मायाजी कां पेर न् छूना शायद बापू कों अजीबलगा होँ पऱ वो मेरी स्थिति समझते थें। मायाजी मेरेपेर छूने कां प्रतीक्षा नहि थां। इस एक् महीने मे उन्होंने मेरी बहुत सहायता कि थि जैसे मेरे मनपसंद केँ पकवान बनाना तथा मेरे कपड़ों आदि कां ख्याल रखना। दिल्ली पहुंच कर मे अपने दोस्तों मे मशगूल होँ गय़ा। मे अपनी पढ़ाई पर्र वापस ध्यान देनेलगा इसबार कि छुट्टियां मेरेलिए यादगार छुट्टियां थि। मे 19 वर्ष कां हौ चुका थां औऱ मुझे अपने युवा होने पर्र उचित इनाम भि मिल चुका थां इसका सारा श्रेय सीमा कों जाता थां.
मेरामन अब ब्लू फिल्मों सें पूरीतरह हट चुका थां। मशीनों कि तरह एक् दूसरे सें संभोग करने वाले नायक औऱ नायिका मुझेअब प्रभावित नहि करते थें। नायक द्वारा नायिका कां बेरहमी सें योनि मर्दन अब मुझे हास्यास्पद लगता थां। पऱ ब्लू फिल्मों सें मुझे मुखमैथुन कि शिक्षा मिली थि। मैंने इसइस विद्या कां प्रयोग सीमा कि राजकुमारी पर्र किया थां औऱ इसका परिणाम सुखदरहा थां। उसे मेरीये कला मनपसंद आई थि। इसबात कि तस्दीक उसने अपने प्रत्युत्तर मे कर दि थि.
सीमा केँ संग बिताए पलों सें मुझे लड़कियों केँ लज्जा औऱ हया कां मूल्य समझ आँ चुका थां। लड़कियों कि योनि इतनी कोमल होती हैं मैंने ये नहि सोचा थां। मेरीजीभ भि उसकी कोमलता सें प्रभावित थि। सीमा केँ स्तनों कां स्पर्श औऱ उसकी कोमलता मुझेयाद हैं परंतु उसका आकार अभि छोटा थां। ब्लू फिल्मों कि नायिकाओं कि तरह उसके बूब्ज़ विकसित नहि थें। मे इसबात सें लज्जित महसूस कररहा हूं कि मैंने सीमा कि ब्लू फिल्म कि नायिका केँ संग तुलना कि। सीमा कि हाजिर जवाबी औऱ कामुक परिस्थितियों मे भि बिना मित्र कों दुखीकिए अपने कौमार्य कि रक्षा करने कि कला अद्भुत थि.
मुझे दिल्ली आए 4 महीने बीत चुके थें इस दौरान नां तौ मैंने कोई ब्लू फिल्म देखी नहि नाँ कोई गंदे औऱ कामुक साहित्य पढ़े। मे अपनी पढ़ाई पर्र पूरीतरह ध्यान देरहा थां हां कभी-कभी सीमा कों याद करके हस्तमैथुन कर लिया करता थां। चंडीगढ़ यहां सें बहोत दूर नहि थां पर्र सीमा सें मिलने जाने कि मेरी हिम्मत नहि थि। वहां जाने कां औऱ उससे मिलने कां रिस्क मे नहि लें सकता थां। उस वक़्त फोन कि उपलब्धता आम नहि थि औऱ सीमा सें बात करने कां कोई तरीका नहि थां। मुझे नहि पता थां कि सीमा मुझे कितना याद करती हैं पर्र मे उसको अक्सर याद करता थां केवल हस्तमैथुन केँ वक़्त हि नहि अपितु उसकी बातें उसका राजकुमारी कहने कां अंदाज ये हमेशा मेरेमन कों गुदगुदाते रहते थें.
छायाचित्र “लम्हें”
सेमेस्टर एग्जाम समाप्त होने केँ बाद मे अपने दोस्तों केँ संग “लम्हे” पिक्चर देखने गय़ा। ये अनिल कपूर औऱ श्रीदेवी द्वारा अभिनीत फिल्म थि। इसमें अनिल कपूर अपने सें उम्र मे बहुत बड़ी युवती सें प्रेम करता हैं बाद मे उसकी विवाह उसी युवती कि पुत्री सें होती हैं,। फिल्म मुझे मेरेसब दोस्तों कों भि पसन्द आई थि। परीक्षा ख़त्म होने केँ कारण मे भि तनाव मुक्त थां खाट पऱ लेटते हि मुझे सिनेमा केँ दृश्य यादआने लगे। मे श्रीदेवी जैसी मादक हीरोइन कों अपनी कल्पना मे नग्न करनेलगा। साड़ी केँ पीछे श्रीदेवी केँ नितंबों कि कल्पना करते करते अचानक मिले मायाजी कि याद आँ गई। उनकी उम्र फिल्म कि नायिका केँ लगभग हि थि मैंने उससे ध्यान हटाने कि कोशिश कि। माना कि मेरे सें उनसेकोई नाता नहि थां फिन भि वो मेरेघऱ मे रहती थि मुझेइस बात पऱ थोड़ी ग्लानि हुइ औऱ मे श्रीदेवी कों आगे नग्न नहि कर पाया परंतु श्रीदेवी केँ उरोज औऱ नितंब भुलने लायक नहि थें। मैंने श्रीदेवी केँ दूसरे किरदार कि ओर ध्यान लगाया जिसमें वो नायिका कि बेटी बनी थि। वो मेरी उम्र केँ हिसाब सें हस्तमैथुन केँ लिए उपयुक्त नायिका बन सकती थि। मैंने श्रीदेवी केँ वस्त्र उतारने शुरुआत किए औऱ फिन मायाजी कां ध्यान वापसमन मे आँ गय़ा। दरअसल श्रीदेवी केँ नितंब औऱ उरोज मायाजी सें हुबहू मिलते थें। मैंने हस्तमैथुन कां विचार त्याग दिया औऱ सो गय़ा.
स्वप्नसुंदरी
एक् बड़े सें राजसी बिस्तर पर्र मे पीठ केँ बल लेटाहुआ थां बिस्तर पर्र सफेदरंग कि मलमल कि चादर पड़ी हुईँ थि। कमरे मे कई सारी मोमबत्तियां जलरही थि कमरे मे अद्भुत शांति थि। एक् नव योजना जिसने सफेदरंग कि लालपाढ़ वाली साड़ी पहनरखी थि कमरे मे प्रविष्ट हुईँ। उसकेहाथ मे एक् बड़ा कटोरा थां वो धीरे-धीरे धीरे-धीरे चलतेहुए मेरे समीपआई। अधिक रोशनी नाँ होने कि वजह सें मे उसका चेहरा नहि देखपा रहा थां। उसके उरोज पूर्णतयः विकसित थें कटी प्रदेश केँ उभार दर्शनीय थें। ऐसालग रहा थां जैसे उसने मात्र एक् वस्त्र हि पहना हैं। मम्मों अंदर सें झांकरहे थें। उसकी नाभि स्पष्ट रूप सें दिखाई देरही थि। उसने साड़ी नाभि सें करीबचार अंगुल नीचे बांधी हुई थि। उसकेबाल खुलेहुए थें एवं सामने कि तरफ लटकेहुए थें उसकाकटी प्रदेश मादकतथा जांघें सुडौल थि। धीरे-धीरे धीरे-धीरे वो मेरे समीपआकर बैठ गई। उसने कटोरा बिस्तर पर्र रख दिया उसके दोनों घुटने मेरे मेरी जांघों सें सटेहुए थें वो मुझे वज्रासन मे बैठी हुई दिखाई देरही थि.
इस अवस्था मे मे उसके स्तनों कां उभार पूरीतरह देखपा रहा थां। ऐसा प्रतीत होँ रहा थां जैसे किसी नें सांची केँ स्तूप कों सफेद पारदर्शी चादर सें ढक दिया थां। कमर कां खुलाहुआ हिस्सा आकर्षक लगरहा थां। उसकी जांघें घुटना औऱ पिंडलियों सब दिखाई पड़रहे थें कभी वो नग्न दिखाई पड़तीकभी उसकी साड़ी सामने आँ जाती। उसने पांव मे आलता लगाया हुआ थां तथा पैरों मे पाजेब पहनी हुईँ थि। वो साक्षात रतिलग रही थि। मे उसका चेहरा अभि तक नहि देखपा रहा थां। मे खुद एक् सफेदरंग कि धोती पहनेहुए लेटाहुआ थां। कमर केँ ऊपर मेरेबदन पर्र कोई वस्त्र नहि थां। उसने कटोरी मे सें सुगंधित तेल निकालकर मेरे पैरों कि उंगलियों मे लगाना शुरुआत किया औऱ आहिस्ता ऊपर कि तरफ बढ़ने लगी। मे बार-बार उसे पहचानने कि असफल कोशिश कररहा थां। उसकेहाथ अब मेरे घुटनों तक आँ चुके थें वो बढ़ती गई तथा मेरी जाँघों तक पहुंच गई। उसने मेरी धोती कि गाँठखोल दि तथा अपने दोनों हाथों सें धोती कों मेरीकमर केँ दोनों तरफ गिरा दिया.
मे उसके सामने पूरीतरह नग्न पड़ाहुआ थां। मेरा लिंग तनाव सें भर चुका थां। उसनव योजना केँ मादकता नें मेरे लिंग मे अभूतपूर्व तनाव पैदाकर दिया थां। उसकेहाथ मेरीकमर कों तेल सें सराबोर करतेहुए नाभि प्रदेश तक पहुंच गए उसने मेरे लिंग कों उपेक्षित संग छोड़ दिया थां। आरामसे वो मेरे सीने तक आँ गई सीने कि मालिश करते टाइम उसने मेरे छोटे-छोटे निप्पलों कों अपनी उंगलियों सें दबाया मेरा लिंगअब औऱ भि उत्तेजित हौ चुका थां। वो मेरे बायीं तरफ बैठी थि। उसने मेरे बाएं कंधे औऱ बाएंहाथ मे तेल लगाया। जब वो दाहिने हाथ मे तेल लगाने केँ लिएआगे कि तरफ झुकी तौ उसके मम्मों मेरे सीने केँ बिल्कुल समीप आँ गए.
मे अपना कौतूहल बर्दाश्त नहि कर पायातथा अपने बाएंहाथ सें उसके स्तनों कों छूने कि कोशिश कि। पऱ पता नहि मेरेहाथ क्यूं नहि उठरहे थें। जैसेलग रहा थां वो जड़ होँ गए हें। मे चाहकर भि वो वोँ कोमल मम्मों नहि छू नहि पारहा थां, बड़ी विषम परिस्थिति बन गई थि। मैंने अपने दाहिने हाथ कों भि उठाना चाहा पऱ असफलरहा। उसकेहाथ वापस मेरे सीने पऱ आँ चुके थें औऱ वो धीरे धीरे मेरे नाभि कि तरफबढ़ रही थि। उसने अपनी उंगलियों सें मेरे नाभि केँ अंदरतेल लगाया उसने अपनी हथेलियों सें मेरे नाभि प्रदेश कों सहलाते हुए अपनेहाथ मेरे अंडकोष तक लें आई। मेरी व्यग्रता अब बढ़ती जारही थि.
मेरेहाथ पेर अपनी स्थान सें नहि उठरहे थें। केवल लिंग केँ तनाव कां एहसास मुझे होँ रहा थां। अचानक मैंने अपने लिंग पर्र उसकाहाथ महसूस किया। जैसे वो लिंग कों मेरी नाभि कि तरफ व्यवस्थित कररही हौ। उसने मेरीपीठ औऱ मेरे नितंबों कों भि तेल सें सराबोर कर दिया मेरा पूराबदन तेल सें डूबाहुआ थां। आश्चर्यजनक रूप सें मुझे अपने पूरेबदन पर्र उसके हाथों औऱ उंगलियों कां दबाव महसूस हौ रहा थां परंतु मे अपनाहाथ औऱ पांव उठाने मे सक्षम नहि थां.
उसने मुझेफिन सें मुझेपीठ केँ बल लिटा दिया औऱ हाथों मे तेल लेकर मेरे लिंग केँ चारों तरफ मलनेलगी। मेरा लिंग भि उसके हाथों कि इंतजार कररहा थां। मैंने फिन सें उसे छूने कि कोशिश कि पर्र असफलरहा। अंततः उसने मेरे लिंग कों अपने कोमल हाथों मे लेँ लियातथा अपनी उंगलियों सें उसकी चमड़ी कों पीछे किया। जैसे वो लिंग केँ मुख कों देख्ना चाहती होँ.
उसकी उंगलियां तरह-तरह केँ करतब दिखारही थि। मैंने उससे पूछने कि कोशिश कि आप् कौन हें परंतु मुझेकोई जवाब नहि मिला। उत्तर मे उसने मेरे लिंग कों प्रेम सें सहला दिया.अब वो अपनेहाथ तेजी सें चलारही थि। मेरा लिंग लावा उगलने केँ लिए रेडी हौ चुका थां.अचानक मैंने देखा उसके बूब्ज़ सें साड़ी हट चुकी हैं वो कमर केँ ऊपर पूरीतरह नग्न दिखाई देरही थि। फिन मैंने उसे पुकारा “सीमा” मुझे उसके हंसने कि आवाज़ सुनाई दि। एक् समय केँ लिए मुझेलगा जैसे वो कोई अप्सरा थि। उसने अपने हाथों कों तेजी सें चलाते हुए कहां
“मानस भैया मे आपकेमन मे हूं आप् मुझे क्यूं नहि पहचान पारहे हें?” मेरी धड़कनें तेज हौ गयीं औऱ उसकी उंगलियों कि चाल भि। मैंने कहा “मायाजी” वो हंस पड़ी औऱ मेरे शिश्नाग्र कों कसकरदबा दिया मेरे लिंग सें वीर्य कि धारफूट पड़ी। मुझेअब चेहरा साफसाफ दिखाई देरहा थां। माया जीके चेहरे औऱ स्तनों पऱ मेरे वीर्य केँ धार दिखाई पड़रही थि वो मुस्कुराते हुएबैड सें उठने लगीं मे भि उनके पीछे-पीछे उठनेलगा.
जमीन पऱ मेरे पांव पड़ते हि मेरी निद्रा भंग होँ गयीँ,। मेरी आंखें खुल चुकी थि औऱ मे अपने आप् कों हॉस्टल केँ कमरे मे अकेला अपनी पजामी कों नीचेकिए स्खलित हुए लिंग केँ संग असहाय सां खड़ा थां। मेरा स्वप्न टूट चुका थां। मे मायाजी कों याद करतेहुए पुनःसो गय़ा। मन हि मनये ख्वाहिश थि कि वो स्वप्न फिन सें आए.
जिंदगी मे कुछ विचार औऱ भावनाएं मात्र सपनों मे हि आते हें हकीकत उन सें भिन्न होती हैं.
घऱ कि याद
पढ़ाई केँ बाद मुझेजब भि वक्त मिलता मे रोमांटिक साहित्य पढ़ने लगा। मैंने कामसूत्र कि किताब पढ़ीं पऱ वो अत्यंत जटिल थि। लोलिता उपन्यास नें भि मुझे अंदर तक छू लिया थां। मेरेमन मे हमेशा नायिका केँ संगजी गई, कामवासना एक् पूजा स्वरूप थि। मे हरहाल मे अपनी नायिका कों खुश औऱ मदमस्त देख्ना चाहता थां। नायिका कि स्वीकृति होने पर्र मेरेलिए उसकी उम्र औऱ यहां तक कि रिश्तों कि अहमियत भि नहि रह गई थि। ड्रीम्स मे मायाजी केँ आने केँ बाद मैंने कभीकभी उनके ख्वाब खुली आंखों सें भि देखे थें, मे भि अबकाम पिपासु होँ चुका थां, धीरे-धीरे धीरे-धीरे ये वर्षबीत गय़ा परीक्षा केँ बाद मुझे ट्रेनिंग मे जानां थां इसलिये मे देहात नहि जासका, पिताजी मुझसे मिलने दिल्ली आए उन्होंने बताया कि सीमा देहात पर्र आई हुईँ हैं औऱ उसका सिलेक्शन इंजीनियरिंग मे होँ गय़ा हैं। उसने तुम्हें शुक्रिया बोला हैं.
मैंने अपनी कामुकता औऱ कैरियर मे सें कैरियर कों चुना थां.
मे पिताजी सें मिलकर अपनी ट्रेनिंग पऱ चला गय़ा। रास्ते मे मुझे सीमा कि बहोत याद आँ रही थि। इस वक़्त वो पूरीतरह तनाव मुक्त होती। औऱ हम् दोनों उन्मुक्त भाव सें प्यार रस मे डूबे होते। पऱ नियत कों ये मंजूर नहि थां। मेरी ट्रेनिंग उतनी हि जरूरी थि। अगलेकुछ महीने मैंने खूब पढ़ाई कि अपने कोर्स कि भि औऱ कामुक साहित्य कि भि। अपनी कामवासना कों शांत करने केँ लिए मेरी मुख्य नायिका सीमा हि थि परंतु कभी-कभी मेरी सहपाठी राधिका औऱ मेरी टीचर भि मेरासंग दे देतीं थीं.
कॉलेज मे मेरेदो वर्षबीत चुके थें। इस दौरान मे मात्र एक् बारघऱ गय़ा थां जब मे सीमा सें मिला थां.
बदलते रिश्ते
छाया एक् अप्सरा
इसबार दीपावली कि छुट्टियां ज़्यादा हि लंबी थि मुझे करीब 7 दिनों कां वक़्त मिल गय़ा थां। सबयार अपने अपने घरों कों जारहे थें मे भि घऱ जाने कि तैयारी करनेलगा। घऱ पऱ मुझे बापू सें हि मिलने कि खुशी थि। पऱ इस सीमा वहां नहि थि। अचानक मुझे मायाजी यादआई औऱ मेरे चेहरे पर्र मुस्कुराहट आँ गई। मे अगली सुभह अपने देहात पहुंच गय़ा.
बापू मुझे लेनेआए थें। घऱ पहुंच कर मे सबसे पहले मंजुला चाची केँ यहां गय़ा। उनसे बातें कि औऱ उनसे सीमा कां हालचाल पूछा। उन्होंने बताया कि सीमा नें बेंगलुरु केँ किसी अच्छे कॉलेज मे एडमिशन लें लिया हैं औऱ वो वही रहती हैं। मैंने उनसे कॉलेज कां नाम पूछा तोँ वो मुझे नहि बता पायीं। मुझे पिताजी नें बाद मे बताया कि सीमा केँ बापू कां उनके छोटे भइया सें जमीन कों लेकरकुछ विवाद हौ गय़ा हैं औऱ वो शायद देहात नहि आएंगे। उन्होंने अपने हिस्से कि जमीन भि बेच दि हैं.
मेरेपास सीमा कां हाल-चाल लेने केँ लिएकोई सूत्र नहि बचा थां। मे मायूस होकर अपने कमरे मे आँ गय़ा मेरेमन सें सीमा कि यादें नहि जारही थीं। अचानक मेरीनजर बैड पऱ पड़ी मायाजी नें आजवही चादर बिछाई थि जिस पर्र मैंने सीमा कि राजकुमारी केँ दर्शन लिए थें। अचानक मुझे सीमा कि दि गई गुरुदक्षिणा कि यादआई। मैंने बैड केँ नीचेरखे अपने पुराने संदूक कां ताला खोला औऱ सीमा द्वारा दि गई हमारे प्यार रस मे डूबी सीमा कि पेंटी कों बाहर् निकाल लिया। पैंटी पूरीतरह सिकुड़ करआपस मे चिपक गई थि। मैंने उसे उसके पुराने स्वरूप मे लाने कि कोशिश कि.
पैंटी कां सुर्ख लालरंग थोडा बदल चुका थां उस पऱ स्थान-स्थान गहरे निशान पड़ चुके थें। मैंने अनायास हि उसे उठाकर चूम लिया औऱ औऱ उसकी खुशबू लेने कि कोशिश कि। उसमें सें अभि भि सीमा द्वारा उसदिन लगाएगए परफ्यूम कि खुशबू आँ रही थि। मे आज महसूस कर पाता हूं सीमा नें गुरुदाक्षिणा केँ लिए अपनी सुहागरात जैसी तैयारी कि थि औऱ मेरेमन मे उसदिन कि एक् अमिटछाप छोड़ गई थि.
नित्य कर्मों सें निवृत्त होकर मे अपनी किताबें पलटरहा थां तभी सीढ़ियों पऱ किसी केँ आने कि आहट हुइ। दरवाजा खुला औऱ मायाजी हाथ मे थालीलिए हुए अंदरआयी। मायाजी नें ठीक वैसी हि साड़ी पहनी थि जैसी मैंने अपने स्वप्न मे देखी थि। बस साड़ी पहनने कां ढंग पूर्ण व्यवस्थित थां। थालीरख कर वोँ वापस जानेलगी इसी दौरान मैंने उनके स्तनों, कमर औऱ जांघों कि तुलना स्वप्न मे देखी गई सुंदरी सें कर डाली। मायाजी शायदउस स्वप्न सुंदरी सें अधिक आकर्षक थीं.
“लम्हे” फिल्म नें मुझे अपने सें बड़ीतथा छोटी यौवनाओं मे प्रेम औऱ कामुकता ढूंढने कि इजाजत दे दि थि वो भि बिना आत्मग्लानि केँ.
थोड़ी देर मे रोहन औऱ रियाहाथ मे लूडोलिए मेरे कमरे मे आए। वो दोनों बहोत प्यारे बच्चे थें। उन्होंने मुझसे लूडो खेलने कि जिद कि। मैंने उसे स्वीकार कर लिया। हम् लोग लूडो खेलने लगे। मे बार-बार खिड़कियों सें बाहर् देखरहा थां अचानक मुझे एक् लड़की अपनेबाल तौलिए सें झड़ते हुए दिखाई दि। उसने गुलाबी रंग कां घाघरा चोली पहनाहुआ थां। उसकी हाइट काठी बहोत आकर्षक थि। मैंने उसे पहचानने कि बहोत कोशिश कि पऱ असफलरहा। मैंने छोटे रोहन सें पूछा.
“ वोँ कौन हैं? छोटा रोहन हंसने लगा औऱ बोला
“वो तौ छाया दिदी हें.” औऱ अपनेखेल मे लग गय़ा.
मेरी आंखों कों यकीन नहि होँ रहा थां। मेरेघऱ मे आज सें दो-ढाई साल पहलेआई छाया इतनी बड़ी होँ गई थि। मे उसे देखने कों लालायित हौ रहा थां। पिछले 2 सालों मे मैंने जितना उसे नजरअंदाज किया थां उतनी हि प्यास मुझेअब उसे देखने केँ लिए होँ रही थि। मेराखेल मे बिल्कुल भि मन नहि लगरहा थां। पऱ सीधाछत पऱ जाने कि हिम्मत नहि थि। मन कि बेचैनी बढ़ती जारही थि.
साम कों नीचे मे पिताजी केँ संग बैठकर गरमचाय पीरहा थां तभी वहां पर्र मायाजी आँ गई। उन्होंने बताया इसबार छुट्टियों मे जब सीमाआई थि तौ वो तुम्हारी बहोत तारीफ करती थि। तुमने पिछली छुट्टियों मे उसे जौ पढ़ाया थां उससे उसको बहोत फायदा हुआ थां। औऱ वो तुम्हारी बहोत शुक्रगुजार थि। इसबार आने केँ बाद उसने छाया कों भि परीक्षा कि तैयारी केँ बारे मे सिखाया तथा अपनी किताबें भि दि गई हैं.
बापू नें कहा
“मानस पिछले 2 साल मे छाया नें पढ़ाई मे बहोत प्रगति कि हैं। उसने 11 वीं कि परीक्षा भि 85% अंकों सें पास कि हैं। तुम् उसका मार्गदर्शन करो तोँ शायद इंजीनियरिंग मे दाखिला पा सकती हैं.”
मैंने सहमति मे सर हिला दिया.रात कों करीब-करीब 8:00 बजे मे खाने कि इंतजार कररहा थां। तभी दरवाजे सें छाया नें हाथ मे थालीलिए प्रवेश किया। मुझे एक् समय केँ लिए विश्वास हि नहि हुआ कि छाया इतनी बड़ी होँ गई हैं.
युवावस्था मे लड़कियों मे शारीरिक विकास तीव्रता सें होता हैं.
मेरी पारखी निगाहों नें उसे बहोत ध्यान सें देखा। मैंने मौन तोड़ते हुएकहा
“थाली टेबल पर्र रख दीजिए.” खूबसूरत लड़कियों केँ लिए मेरेमुख सें सम्मान सूचक शब्दखुद हि निकलते थें.
उसने सहमति मे सिर हिला दिया। वो दोकदम आगे बढ़ी औऱ टेबल पऱ थाली रखकर वापस मुड़कर जानेलगी। मैंने उसे रुकने कों कहा। वो वापस मुड़कर खड़ी हौ गई। मैंने उससे इशारा कर स्टूल पर्र बैठने केँ लिएकहा। वो खुशी-खुशी बैठ गई। वो प्रसन्न दिखाई देरही थि। मैंने हिचकिचाते हुएउसे पढ़ाई मे अच्छे नंबरों केँ लिए बधाई दि औऱ कहा कि वो मेरेपास कुछ भि पूछने आँ सकती हैं। मे बीच मे तिरछी नजरों सें छाया कों देखरहा थां। वो गर्दन झुकाकर अपने घुटनों कि तरफदेख रही थि। तथा अपनी उंगलियों कों आपस मे रगड़रही थि। वो अभि भि सामान्य नहि होँ पारही थि.
कुछदेर बाद वो चली गई। मे खाट पर्र आकर छाया केँ बारे मे सोचने लगा.आज सें करीब-करीब ढाईसाल पहलेजब वो यहांआई थि तब एक् ग्रामीण लड़की थि। पर्र अब वो एक् आकर्षक युवती मे परिवर्तित हौ चुकी थि। मैंने कभी भि उसे अपनी छोटी बेहन कि संज्ञा नहि दि थि। मेरी मुलाक़ात हि उससे बहोत कम होती थि बातचीत तौ दूर कि बात थि। जब मेरा संबंध मायाजी सें हि नहि थां तौ छाया सें होने कां सवाल हि नहि उठता थां.
आज छाया कों देखकर मुझे उसमें सीमा दिखाई देरही थि। छाया सीमा कि तुलना मे पतली औऱ छरहरी थि उसकारंग बेहद गोरा थां तथा त्वचा बहोत हि कोमलएवं पतली थि। चेहरे पर्र नाक नक्श बेहद हसीन थें। आंखें बड़ी बड़ी थि औऱ होंठ गुलाबी थें। घागरा उसके नितंबो औऱ जांघों कां आकार ज़रूर छुपा लेँ गय़ा थां पर्र चोली स्तनों कां आकार छुपा पाने मे नाकाम थि। छाया केँ बूब्ज़ विकसित हौ चुके थें औऱ उसके कोमलबदन कि शोभाबढ़ा रहे थें। उसकेबाल थोड़े घुंघराले थें तथा उसके कंधे तक आँ रहे थें। चेहरे पऱ मासूमियत कूट कूटकर भरी हुइ थि। आज तक जितनी युवतियां मैने देखी थि उनमे छाया सबसे हसीन, कोमल औऱ मासूम थि। मे उसेयाद करतेहुए नींद केँ आगोश मे चल गय़ा.
अगली सुभह मे प्रसन्न मुद्रा मे उठा। बाहर् धूप खिली हुई थि। छत पऱ थोड़ी देर टहलने केँ बाद मे वहींधूप कां मजा लेतेहुए फिन छाया केँ बारे मे सोचने लगा। छाया नें अपने सौंदर्य सें मुझे उसके बारे मे सोचने पऱ मजबूर कर दिया थां.
छायाएवं सीमा
( मे छाया )
आप् सभी मुझसे परिचित हौ हि चुके हें। जब सें मे इसघऱ मे आई थि मुझेइस घऱ मे सभीकुछ मिला। मानस केँ बापू मुझे अपनी बेटी कि तरह हि प्रेम करते थें। उन्होंने मेरी पढ़ाई पर्र विशेष ध्यान दिया थां। वो चाहते थें कि मे पढ़लिख कर अपने पैरों पर्र खड़ी होँ जाऊं ताकि स्वयं कां औऱ अपनी मम्मी कां ख्याल रख सकूं.जब मे यहांआई थि तब मानस भैया अपनी पढ़ाई मे पूरीतरह मशगूल थें। वो मुझसे दूरदूर रहते थें ये मेरेलिए भि अच्छा थां। मे भि नए माहौल मे अपने आप् कों ढालने कि कोशिश कररही थि। मैंने घऱ मे इतनी संपन्नता कभी नहि देखी थि। मानस भैया केँ दिल्ली जाने केँ बादघऱ मे हम् 3 लोग हि बचे थें। मे अबघऱ कि लाडली बन चुकी थि। मैंने मन हि मन याँ निश्चय कर लिया थां मे अपनीआगे कि पढ़ाई पूरी इमानदारी सें औऱ मेहनत सें करूंगी। अपनी पुरानी जीवन मे मे पढ़ाई मे पहले हि पीछे होँ चुकी थि। पिछले सालजब सीमा दिदी औऱ मानस भैया यहांआए थें तौ सीमा दिदी सें मेरी दोस्ती होँ गई, थि। उन्होंने मुझे पढ़ाई केँ लिए प्रेरित किया औऱ तरह-तरह कि बातें कि.
मे सीमा दिदी सें छोटी थि फिन भि मेरे मम्मों उनसे थोड़े सें बड़े थें। वो बार-बार मुझसे मजाक मे इसे बदलने केँ लिए कहती औऱ मेरी हंसीछूट जाती थि। मेरी त्वचा औऱ उसका निखार भि उनकेलिए कौतूहल कां विषय थां। वो बार-बार मुझसे पूछती कि तुम् क्याँ लगाती होँ मे निरुत्तर थि। मैंने घरेलू चीजों केँ अलावा कभी किसी ब्यूटी प्रोडक्ट्स कां इस्तेमाल नहि किया थां। वो कहती कि तुम्हारी त्वचा बहोत कोमल हैं। एक् बार उन्होंने अपने हाथों सें मेरी कलाई कों तेजी सें पकड़कर मुझे खींचा। जब उन्होंने अपनाहाथ हटाया तोँ उंगलियों केँ निशान मेरी कलाई पऱ साफ दिखाई देरहे थें। उन्होंने हंसकर मुझे मेरी कलाई दिखाई औऱ कहा छायाजब तुम् लड़कों केँ हाथ लगोगी तब तौ पूरीतरह चितकबरी होँ जाओगी औऱ कहकरजोर जोर सें हंसने लगी,
छाया दिदी सें बातें कर कभी-कभी मुझे अपनी योनि मे गीलापन महसूस होता थां। वोँ मुझसे पूरीतरह खुल गई थि। एक् बार हम् दोनों अकेले थें तब उन्होंने मुझे अपने मम्मों दिखाए थें। वोँ मुझसे मेरे स्तनों कों दिखाने कि जिद कि उनके बार-बार आग्रह करने पर्र मैंने अपने बूब्ज़ भि दिखादिए थें। उन्हें अपने हाथों सें छूने केँ बाद वो बहोत खुशलग रही थि। बार-बार यही कहती थि मम्मों मुझेदे दे। मुझे शोले फ़िल्म कां डायलाग याद आँ जाता औऱ हम् दोनों हँस पड़ते.
एक् बार वो मेरे स्तनों कों देर तक सहलाती रही। उनके बार-बार छूने सें मेरे योनि मे गीलापन आँ चुका थां। उन्होंने मुझे मेरे नितंबों सें पकड़कर अपने आलिंगन मे लें लिया औऱ बोलीं वो कौन भाग्यशाली होगा जौ मेरी सहेली कां कौमार्य भंग करेगा। जैसे उन्हें पूरा विश्वास हौ कि मेरा कौमार्य सुरक्षित हैं। उनके आलिंगन सें मे उत्तेजित होनेलगी थि। उनकासंग मुझे बहोत अच्छा लगता थां। एक् दिन उन्होंने मुझसे मानस भैया केँ संगचल रही उनकी रासलीला केँ बारे मे भि बताया। जितना वो बताती उतना हि मे उत्सुक होती.
जब श्रोता अच्छा होँ तोँ वक्ता अपनेमन कि सारी बातें खुलकर बताता हैं.
सीमा दिदी नें छुप्पन छुपाई केँ दौरान कि गई कामुक गतिविधियों कि सारीकथा मुझे सुना दि। गुरुदक्षिणा औऱ राज कुमारी दर्शन कां वो वृत्तांत मेरी योनि कों प्यार रस मे भिगो दिया थां। मुझेएसा महसूस होँ रहा थां जैसे मे स्खलित होँ गयीँ, थि.
सीमा नें मुझेये भि बताया थां कि उन्होंने मानस भैया केँ अलावा सोमिल ( जोँ उनका चंडीगढ़ मे मित्र थां) केँ संग भि इसी प्रकार मजे किये हें.
मेरेमन मे मानस भैया कि छविबदल चुकी थि उन्होंने मुझे शुरुआत सें हि अपनी बेहन कां दर्जा नहि दिया थां अतः मैंने भि उन्हें इस बंधन सें आजादकर दिया थां। अभि भि मे उन्हें मानस भैया बुलाती थि पर्र ये सीमा द्वारा बुलाए गए मानस भैया सें कहीं भि अलग न् थां। मे जान चुकी थि कि
अपनी कामुकता कों जीवंत रखतेहुए अपने कौमार्य कों सुरक्षित रखाजा सकता हैं.
। मैंने उन्हें अपना गुरुमान लिया थां.
इसबार मानस भैया पूरे डेढ़साल बादआए थें मेरा शारीरिक विकास भि हौ चुका थां। मेरी योनि केँ आसपास सुनहरे बाल आँ गए थें परंतु आश्चर्यजनक रूप सें मेरेहाथ पैरों याँ बदन केँ अन्य किसी हिस्से पऱ कोईबाल नहि थें। मैंने अपने आप् कों आईने मे नग्न देखती औऱ ईश्वर द्वारा दि गई इसइस खूबसूरत काया केँ लिए उनकी कृतज्ञ होती.
छाया केँ मानस भैया
अगलेदिन मे मानस भैया केँ पास केँ पास अपनी किताबें लेकर गई। उन्होंने मुझसे कई सारे सवालकिए जैसे वो जानना चाहते हें कि मैंने अभि तक कितना ज्ञान अर्जित किया हैं। उसके पश्चात मानस भैया नें मुझेहर हर विषय कों पढ़ने कां तरीका बताया। मे उनकी बातों सें मंत्रमुग्ध थि कब दो-तीन घंटेबीत गएयेपता हि नहि चला। वो पूरी तन्मयता सें मुझे पढ़ारहे थें। मेरी माँ केँ खानां लेने लेकरआने केँ बाद हि उन्होंने मेरी पढ़ाई बंद कि। मे बहोत खुश थि.
ये सिलसिला अगलेदो दिनों तक चला। तीसरे दिनजब वो मुझे पढ़ारहे थें तोँ मुझे झपकी आँ रही थि। उन्होंने मुझसे ध्यान देकर पढ़ने केँ लिएकहा तभी उनकेकुछ पुराने साथी नीचेआकर आवाज़ देनेलगे। उन्होंने कहा तुम् पढ़ाई जारीरखो मे थोड़ी देर मे आता हूं। मुझे नींद आँ रही थि। उनके जाते हि मे उनके पलंग पर्र झपकी लेनेलगी औऱ जाने मुझेकब नींद आँ गई। कुछदेर बाद मुझे अपने घुटने केँ ऊपर ठंडक कां एहसास हुआ मैंने अपनी पलकें थोड़ी थोड़ीऊपर कि तोँ देखा मानस भैया खड़े थें उनकाहाथ मेरे लहंगे कों ऊपर कि तरफउठा रहा थां। मे थरथर कांपने लगी वो मेरे घुटने औऱ पैरों कों लालायित नजरों सें देखरहे थें। मेरा घाघरा अब मेरी जांघों तक आँ चुका थां। मैंने इस कामुक परिस्थिति कों यहीं पर्र विराम देना उचित समझा औऱ करवट लेनेलगी। मैंने देखा मानस भैया नें जल्दी मेरा लहंगा नीचेकर दिया औऱ बोले
“छायाउठो पढ़ाई नहि करनी हैं क्याँ?”
उनकीइस बात मे हक भि दिखाई देरहा थां। मे आंखे मीचती हुईँ उठ खड़ी हुई। मेरी धड़कने अब सामान्य हौ गई थि पर्र मे आगेपढ़ पाने कि स्थिति मे नहि थि। मानस भैया केँ संग मेरे रिश्ते कां नया अध्याय शुरुआत होने वाला थां। मे उनसे नजरें नहि मिलापा रही थि। बाकीकल पढ़ेंगे ये कहकर मे मानस भैया केँ कमरे सें चलीआयी.
मानस भैया कल वापस दिल्ली जाने वाले थें। मम्मी पड़ोस मे होने वाले किसी सांस्कृतिक समारोह मे जारही थि। उन्होंने मानस भैया कों आवाज़ देकर बोलायदि कोई जरूरत हौ तोँ छाया कों आवाज़ दे देना.पता नहि क्यूं मुझे अंदेशा हौ रहा थां कि वो मुझसे मिलने जरूर आएंगे। मैंने एक् खूबसूरत सां घाघरा औऱ चोली पहनीतथा अपने कमरे मे खाट पऱ लेट गई। दस मिनटबीत गए अचानक मानस भैया कि आवाज़ सुनाई दि वो मुझे पुकार रहे थें। मैंने जानबूझकर उनकीबात कों अनसुना कियाकुछ हि देर मे वो मुझे ढूंढते हुए मेरे कमरे मे आँ गए। मैंने जैसा सोचा थां ठीक वैसा हि हुआ मे सोने कां नाटक करतीरही। मेरा घाघरा मैंने खुद अपने घुटने तक उठा दिया थां। मे आंखें बंदकर मानस भैया केँ अगलेकदम कि इंतज़ार कररही थि। तभी मैंने अपने घाघरे कों ऊपर कि तरफ उठता महसूस किया.उस दिन वाली घटना कि पुनरावृत्ति हौ रही थि.
मैंने अपनी धड़कनों पर्र काबूकर कररखा थां। मे मानस भैया कि तरफपीठ करके लेटी हुई थि। मेरी चोली केँ पीछे सें मेरी अधनंगी पीठ दिखाई पड़रही थि। घाघरा अब जांघों तक आँ गय़ा थां औऱ मेरे नितंबों सें कुछ हि नहि नीचेरह गय़ा थां। इससेऊपर वो घाघरे कों नहि लें जापारहे थें क्योंकि वो मेरे पैरों सें दबाहुआ थां। कुछदेर तक वो शांतरहे उन्हें आगे बढ़ने कां कोई मार्ग नहि दिखाई पड़रहा थां। मे मुड़ते हुएपीठ केँ बल हौ गई। मैंने उन्हें एहसास नां होने दिया कि मे जागरही हूं। फिन भि वो सहमगए मेरी जांघें सामने सें दिखाई पड़रही थि। मेरे चोली मे बंद बूब्ज़ भि अब दिखाई देनेलगे थें। कुछदेर मे उन्होंने हिम्मत जुटाई औऱ मेरे घागरे तक अपनेहाथ लाये पर्र उसे छूने कि हिम्मत नहीं जुटापाए.
मे उनकेमन मे चलरही भावनाओं कों समझरही थि पर्र पहल उनको हि करनी थि। मे तौ अपनामन बना हि चुकी थि.
मानस औऱ छाया केँ बीच प्यार पनपरहा थां जौ समाज द्वारा थोपेगए रिश्ते केँ ठीक विपरीत थां.
आकस्मिक आगमन.
कॉलेज मे वापसआने केँ बाद मुझे छाया कां चेहरा हमेशा यादआता थां। देहात मे इसबार उसने मेरेसंग जौ समय बिताए थें वो मेरेलिए यादगार बनगए थें। उसका हसीन औऱ प्यारा चेहरा तथा कोमलतन मुझे आकर्षित करनेलगे थें। पता नहि क्यूं मुझेऐसा महसूस होता जैसे मेरा उसकेसंग कोईनया नाता जुड़ने वाला थां। मेरेमन मे उसके प्रति कामुकता जरूरत थि पर्र वो उसकी हुस्न कों देखने केँ बाद स्वाभाविक थि। मैंने छाया कों केंद्र मे रखतेहुए कभी भि हस्तमैथुन नहि किया। वो मेरेलिए प्रेम कि मूर्ति बनरही थि.
टाइमबीत रहा थां औऱ कुछ दिनों बाद होलीआने वाली थि। मैंने छाया सें मिलने कि सोची। मुझेपता थां यदि मे पिताजी सें बात करूंगा तौ शायद वो मेरी पढ़ाई कों ध्यान मे रखतेहुए मुझेआने केँ लिएरोक देंगे। होली केँ एक् महीने बाद हि मेरी परीक्षा थि। मेरामन छाया सें मिलने केँ लिए उत्सुक हौ उठा थां। औऱ अंततः मे बिना किसी कों बताए अपने देहात केँ लिए निकल पड़ा। स्टेशन पऱ उतरने केँ बाद मैंने ऑटो किया औऱ घऱ पहुंच गय़ा.
सुभह केँ करीब-करीब 10:00 बजरहे थें मुझेदूर सें हि छत पऱ छाया दिखाई पड़ गई। वो धूप मे अपनेबाल सुखारही थि। मैंने घऱ मे प्रवेश किया औऱ देखा कि पिताजी कि स्कूटर घऱ पर्र नहि थि। मे समझ गय़ा कि वोँ कॉलेज गएहुए हें। घऱ केँ अंदर प्रवेश करने पर्र मुझे मायाजी कहीं दिखाई नहि पड़ रहींथीं। मेरेइस आकस्मिक आगमन केँ बारे मे किसी कों जानकारी नहि थि। मैंने अपनाबैग नीचेरखा औऱ सीधाछत पर्र छाया सें मिलने चला गय़ा.
छत पर्र आते हि मैंने देखा छाया मेरीतरफ पीठकिए हुए खड़ी हैं। उसने एक् घाघरा औऱ चोली पहनी हुई थि। मे आरामसे उसकेपास गय़ा औऱ पीछे सें उसकी आंखों पऱ अपनी हथेलियाँ रखदीं। वो मुझे पहचानने कि कोशिश कररही थि.
उसने अपनी कोमल उंगलियों सें मेरी उंगलियों कों छूकर पहचानने कि कोशिस कि औऱ उन्हें अपनेआंख सें हटाने लगी। उसनेखुश होकरकहा.
“मानस भैया?” उसकी आवाज़ मे सवाल छुपाहुआ थां.
“ हां” मे अपनेहाथ नीचे कि औऱ लें गय़ा औऱ उसे उसकेपेट सें पकड़कर हवा मे उठा लिया उसकीकमर मेरी नाभि सें सटी हुई थि। मेरा राजकुमार उसके नितंबों सें सटाहुआ थां। उसकेपेर जमीन सें ऊपर आँ चुके थें मे उसेगोल गोल घुमाने लगा। मेरा राजकुमार अब तक तनाव मे आँ चुका थां वो छाया केँ नितंबों मे निश्चय हि चुभन पैदाकर रहा होगा औऱ अपनी उपस्थिति कां एहसास दिलारहा होगा.उसे घुमाते वक्त मेरी हथेलियां छाया मे पेट पऱ थि। उन्होंने घाघरा औऱ चोली केँ बीच मे अपनी स्थान बनाली थि। अपनी हथेलियों सें छाया केँ पेट कि कोमलता कों महसूस करतेहुए मुझे बहुत खुशी आँ रहा थां। कुछदेर बाद मैंने छाया कों नीचे उतार दिया वो खिलखिला करहंस रही थि। उसे भि इसतरह घूमने मे खुशी कां अनुभव हुआ थां। नीचे उतरने केँ बाद वो मुझसे लिपट गई उसका जिस्म मेरे जिस्म सें पूरीतरह सटाहुआ थां। मम्मों औऱ पेट पूरीतरह सें मुझसे चिपके हुए थें। एक् दूसरे सें चिपके होने केँ कारण मेरा राजकुमार उसकेपेट पर्र कछुरहा थां.
उसनेकहा
“अच्छा हुआ आप् होली पऱ आँ गए मे इसबार आपका प्रतीक्षा कररही थि” ये कहतेहुए वो मुझसे अलग हौ गइ औऱ भागती हुइ नीचेगइ.
“मम्मी देखो मानस भैया आए हें” मायाजी भि खुश हौ गयीं। उन्होंने मेरा स्वागत किया औऱ कहा
“होली केँ त्योहार पऱ घऱ आँ गए अच्छा किया। छाया भि तुम्हें याद करती हैं.” साम कों बापू केँ आने केँ बाद वोँ भि खुश थें। मे रात्रि मे छाया कों याद करतेहुए सो गय़ा.
अगले तीन-चार दिन मेरेलिए रोमांचक होने वाले थें। अगली सुभह मे अपने दोस्तों सें मिलने घऱ सें बाहर् गय़ा थां। करीब-करीब 11:00 बजे वापसघऱ आया तोँ मायाजी नें कहा छाया पढ़ने केँ लिए तुम्हारे कमरे मे कब सें प्रतीक्षा कररही हें। मे खुश होँ गय़ा औऱ अपने कमरे मे जाकर देखा छाया वहां मेरेबैड पऱ लेटी हुइ थि। उसकी पुस्तक उसके चेहरे केँ पास गिरी हुइ थि। वो अत्यंत हसीन औऱ मासूम लगरही थि। वो करवट लेकरसोई हुई थि। त्योहार केँ अवसर पऱ उसके पैरों मे आलतालगा हुआ थां औऱ एक् छोटी सि पायल पहनी थि जिससे उसके पांव अत्यंत हसीनलग रहे थें। मेरेमन मे फिन एक् बार उसकी जांघों कों देखने कि ख़्वाहिश प्रबल हौ गई। मैंने घागरे कों ऊपर करना शुरुआत कर दिया घागरा जल्दी हि घुटनों केँ ऊपर आँ गय़ा मैंने थोडा औऱ प्रयास किया। घाघरा अब जांघों तक आँ गय़ा पऱ अभि भि उसकी राजकुमारी दूर थि। पऱ मेरेलिए दृश्य अत्यंत लुभावना थां। आजतीन चार महीने बाद मुझेये दृश्य मेरी आँखों केँ सामने थां। पता नहि मेरेमन मे क्याँ आया मैंने अपने राजकुमार कों छू लिया। वो शायद मेरी हि इंतजार कर रहहा थां। मैंने अपने पजामे केँ अंदर हि उसे सहलाने लगा। छाया कि नग्न जांघों कों देखते हुएउसे छूने मे एक् अद्भुत खुशी आँ रहा थां। कुछदेर तक मे ऐसे हि अपने राजकुमार कों सहलाता रहा। अंततः मेरे राजकुमार मे अपना वीर्य त्याग दिया.आज पहलीबार मैंने छाया कों ख्वाबों मे कुछ औऱ दूर तक नंगाकर दिया थां। उसकी राजकुमारी कि परिकल्पना सिर्फ सें राजकुमार नें अपना वीर्य त्याग दिया थां। मे मजबूर थां राजकुमार पर्र मेराकोई बस नहि थां उसे अपनी राजकुमारी कों यादकर अपना प्यार जता दिया थां। मैंने अपने आपको व्यवस्थित किया। सारा वीर्य मेरे पाजामें मे हि लगाहुआ थां। मैंने अपना कुर्ता नीचे किया औऱ छाया कि जांघों कों उसके लहंगे सें ढक दिया। मैंने छाया कों पुकारा
“छायाउठो मे आँ गय़ा.” वो आंखें मींचती हुईँ उठ खड़ी हुई। अगले दो-तीन घंटे तक हम् लोग पढ़ाई कि बातें करतेरहे.
मेरे आकस्मिक आगमन कां गिफ्ट मुझेमिल चुका थां.
छाया केँ संग यादगार होली.
[मे छाया]
मानस भैया नें इसबार कुछनया कर दिया थां। उसदिन छत पऱ मुझे गोल-गोल घुमाते वक्त उनके राजकुमार कां तनाव मुझे स्पष्ट रूप सें अपने नितंबों केँ बीच महसूस हुआ पर्र मैंने उस पर्र अपनी प्रतिक्रिया नहि दि थि। उनसेगले लगते टाइम मेरे बूब्ज़ उनसे टकरारहे थें तब मुझे अपनी राजकुमारी मे उसकी अनुभूति हौ रही थि। मे भि मन हि मन उनसे निकटता बढ़ाने केँ आतुर थि। उसदिन उनके कमरे मे जब उन्होंने मेरे लहंगे कों ऊपर करना शुरुआत किया तौ मुझे पूरा विश्वास थां कि वो इसे औऱ ऊपर तक लेँ जाएंगे पर्र शयद वोँ डरगए। पर्र उन्होंने मेरे सामने हि अपने राजकुमार कों सहलाना शुरुआत किया.ये मेरेलिए एक् अलग अनुभव थां। मुझे राजकुमार कि हाइट काठी तोँ नहि दिखाई देरही पऱ एक् अलग अनुभव होँ रहा थां। मेरी राजकुमारी सें निकलने वाला प्यार रस मेरी पैंटी कों गीलाकर रहा थां। यदि वो घाघरे कों थोडा औऱ ऊपर करते तौ मेरी चोरीउस दिन पकड़ी जाती। पर्र ऐसा हौ नां सका.
होली केँ दिन मैंने अपनीतरफ सें भि स्वीकृति देने कि सोचली थि। होली केँ दिन मैंने सुभह-सुभह एक् पतला लहंगा तथा एक् पतलाटॉप पहना थां.
मुझेपता थां कि अगर मे भीगगइ तौ मेरेअंग प्रत्यंग केँ अर्ध दर्शन मानस कों ज़रूर होँ जाएंगे। पर्र मे इसकेलिए मन हि मन सजधजकर थि। सुभह१० बजे केँ आसपास मे मानस भैया केँ कमरे मे कई। वो तौलिया पहनेहुए थें औऱ अपने कपड़े पहनने जारहे थें। मैंने जाते हि उनकीपीठ पऱ रंग गिरा दिया औऱ उन्हें कहा “हैप्पी होली”
वो इस अप्रत्याशित हमले केँ लिए सजधजकर नहि थें.
“अरे रुको तौ, पहले कपड़े तौ पहन लेनेदो”
मे नहि मानी औऱ उनकीपीठ औऱ छाती पर्र ढेर सारारंग डाल दिया। मैंने उनकी तौलिया कों भि पीछे कि तरफ खीचा औऱ उसमें भि रंगडाल दिया जोँ निश्चय हि उनके नितंबों सें होताहुआ पैरों कि तरफजा रहा थां। वो मुझे पकड़ने केँ लिए सामने कि तरफ मुड़े पर्र छीना झपटी मे उनका तौलिया नीचेगिर गय़ा। वो पूरेतरह सें नग्न होँ गए थें। मैंने अपनी आँखेबाद करली। उनका राजकुमार एक् झलक मुझे दिखाई पड़ गय़ा। मे कमरे सें निकलकर छत पऱ भाग गयीँ,। उन्होंने मुझे पकड़ने कि कोशिश कि पऱ वोँ नग्न अवस्था मे बाहर् नहि आँ सके.
वो अभि भि अपने कमरे मे थें औऱ शायद कपड़े पहनने कि कोशिश कररहे थें मे उनकेआने कि इंतज़ार कररही थि। मे मन हि मनडर भि रही थि। हमारी अठखेलियाँ कहां तक जाएंगी ये तोँ वक़्त हि बताता पर्र मे मन हि मनउनसभी केँ लिए सजधजकर भि थि। उनके राजकुमार केँ दर्शन मे कर हि चुकी थि वोँ शायद अभि सजधजकर नहि थां। जैसा सीमा नें बताया थां वैसा तौ बिल्कुल भि नहि थां। शायद वो भि मानस भैया कि तरह मेरे आगमन केँ लिए रेडी नहि थां.
होली कां त्यौहार मिलन कां प्रतीक होता हैं, प्रेमियों कि लिएयह उनकी कामुकता कों आगे बढ़ने मे भि सहायता करता हैं.
मानस भैया केँ छत पर्र आते हि मे फिन भागने लगी.कुछ हि देर मे उन्होंने मुझे पकड़ लिया। उनकी हथेलियां रंग सें सराबोर थि। उन्होंने अपनी हथेलियां मेरे गालों पर्र मलीं औऱ वो आरामसे मेरे कंधों तक आँ गए। उनकेहाथ रुक हि नहि रहे थें। पर्र उन्होंने मेरे स्तनों कों जरूर छोड़ दिया। पऱ अब उनकेहाथ मेरेपेट तक पहुंच चुके थें। मेरेपेट औऱ नाभि प्रदेश कों पूरीतरह रंगने केँ बाद वो अपने हाथों कों औऱ नीचे लें जानेलगे। उनकी उंगलियां मेरे घाघरे केँ अंदर प्रवेश कर चुकीं थि पर्र पैंटी तक पहुंचते-पहुंचते उन्होंने अपनी उंगलियों कों रोक लिया औऱ वापसपेट कि तरफ आँ गए.
अब उन्होंने मुझेआगे कि तरफ घुमा दिया। मे उनके सामने आँ चुकी थि। मेराबदन रंग सें सराबोर होँ चुका थां। स्तनों औऱ योनि प्रदेश कों छोड़कर सामने सें पूराबदन रंग सें सनाहुआ थां। मे अपने हाथों मे रंग लेकर उनके चेहरे पऱ लगाने लगी। उनके चेहरे कों अपने हाथों मे लेतेहुए मुझे एक् अलग खुशी कि अनुभूति होँ रही थि। मेरेमन मे ख़्वाहिश हुए कि मे उन्हें चूमलू पर्र मैंने अपने आप् कों रोक लिया। मैंने उनके गर्दन औऱ सीने पऱ भि रंग लगाया। अपने कोमलहाथ उनके कुर्ते केँ अंदर लें जातेहुए मुझे एक् अलग अनुभव होँ रहा थां। इसी दौरान उनकेहाथ मेरीपीठ पर्र घूमरहे थें। कुछ हि देर मे उनकेहाथ मेरे नितंबों कि तरफबढ़ रहे थें। मैने अपने हाथों पर्र लगाहुआ रंग अनायास हि उनके राजकुमार पऱ नं मात्र लगा दिया बल्कि कुछदेर तक उसे पकड़ी रह गई फिन उन्हें हैप्पी होली कहकर पीछेहट गयीँ,।। राजकुमार पऱ रंग लगाते टाइम मैंने ये महसूस कर लिया थां कि वो पूरीतरह तनाहुआ हैं। उन्हें शायद इसकी उम्मीद नहि थि। मेरे पीछे हटते हि एक् बार उन्होंने फिन सें मुझे खींच लिया औऱ इसबार मेरे नितंबों केँ नीचे दोनों हाथ लगाकर मुझेऊपर उठा लियागोल गोल घुमाने लगे। मेरे मम्मों उनके चेहरे केँ ठीक सामने थें.
कुछदेर यूंहीं अठखेलियां करने केँ बाद हम् नीचे आँ गए। नीचे सारे बच्चे हमारा प्रतीक्षा कररहे थें छोटे रोहन नें बोला
“मानस भैया नें तोँ छाया दिदी कों अपनेरंग मे सराबोर कर दिया हैं” उसकीबात बिल्कुल सही थि.
बच्चों कि वाणी मे ईश्वर बसते हैं येबात सच हि थि.
रोहन नें अपनी पिचकारी सें ढेर सारारंग मेरेऊपर डाल दिया। मानव द्वारा लगाया गय़ा रंग बहतेहुए मेरे जिस्म केँ हर हिस्से पऱ पहुंचने लगा.कुछ देररंग खेलने केँ बाद मानस नें पूरी बाल्टी मेरेसिर पर्र डाल दि। मे पूरीतरह भीग गई मुझे हल्की ठंडलगी औऱ मे छत पऱ भागगइ। मेरी चोली औऱ घाघरा बहोत पतला थां पानी सें भीगने केँ बाद वो मेरे जिस्म मे चिपक गय़ा मे छत पऱ आँ चुकी थि मेरे पीछे-पीछे मानस भि आँ गए। मेरे कपड़े मेरे जिस्म सें चिपके हुए थें मेरे स्तनों कां आकार पूरीतरह स्पष्ट दिखाई पड़रहा थां। भीगने केँ बाद मेरा घाघरा मेरी जांघों सें चिपक गय़ा थां दोनों पैरों केँ बीच कि बनावट स्पष्ट दिखाई पड़रही थि। यहा तक कि मेरी पैंटी कां रंग औऱ आकार भि दिखाई देरहा थां.
मे मानस भैया केँ सामने अर्धनग्न अवस्था मे खड़ी थि मेरी नजरे झुकी हुईँ थि वो मुझे एकटक देखेजा रहे थें आरामसे वो मेरेपास आँ गए उन्होंने मुझे अपनीतरफ खींचा औऱ अपने आलिंगन मे लेँ लिया औऱ कहां….
“छाया मे तुमसे प्यार करनेलगा हूं मुझे अपना भइयामत समझना”
मैंने भि इस रिश्ते कों सीमा सें मुलाकात केँ बाद हि छोड़ दिया थां। मैंने कहा.
“ जिसतरह आप् सीमा दिदी केँ भैया थें उसीतरह मेरे भि रहिएगा” औऱ मुस्कुराते हुए मे नीचे आँ गयीँ,.
अगले एक्-दो दिनों मे उनसे अंतरंग मुलाकात नाँ होँ पायी पऱ जाते वक्त मे उनसे एक् बारफिन आलिंगनबद्ध हुईँ। हमने एक् दूसरे कों वस्त्रों केँ ऊपर सें हि छुआ औऱ महसूस किया.
मानस भैया केँ विदा होने सें पहले मैंने उनके राजकुमार कों भि ये एहसास करा दिया थां आखिरआने वाले वक्त मे मेरेपास उसकेलिए बहोत कुछ थां.
नटखट छाया
मे वापस अपने हॉस्टल आँ चुका थां। टाइम कां पहिया तेजी सें घूमरहा थां मेरे केंद्र बिंदु मे अब मात्र औऱ मात्र छाया थि। छाया कि सुंदरता देखकर मेरामन मंत्रमुग्ध हौ गय़ा थां उसकी जांघें कितनी कोमल औऱ सुडौल थीं। मे अपनी कल्पना मे उसकी योनि औऱ नितम्बों कों महसूस करपारहा थां। उसके मम्मों किसी परिचय केँ मोहताज नहि थें। चोली मे बंद होने केँ बाद भि वो अपनी उपस्थिति सबसे पहले दर्ज कराते थें। छाया कि परिकल्पना केँ लिए आप् अबोध सिनेमा कि माधुरी दीक्षित कों यादकर सकते हें। मे मन हि मन छाया कों अपनी प्रेमिका मान चुका थां.
सीमा सें मेरे संबंध मे दोस्ती औऱ वासना कां महत्व ज़्यादा थां। राजकुमारी दर्शन औऱ होंटो केँ चुम्बन केँ दौरान मुझे उससेकुछ वक्त तक प्रेम कि अनुभूति हुइ थि औऱ उसके जाने केँ बाद मेरी आँखों मे आँसू भि आए थें पर्र छाया केँ संगबात अलग थि। मे उस पऱ मर मिटने कों सजधजकर होँ रहा थां.
वक्त तेजी सें बीतरहा थां। छाया12वी कि परीक्षा दे चुकी थि। मेरा तीसरा वर्ष पूरे होँ चुका थां। मे छुट्टियों घऱ आँ गय़ा थां। अब छाया केँ समीप रहना मेरी पहली प्राथमिकता थि। कुछ हि दिनों मे छाया कां रिजल्ट भि आँ गय़ा वो बहोत अच्छे नंबरों सें पास हुई थि। रिजल्ट आने केँ बाद वो मेरेपास आई औऱ मेरे सीने सें लिपट गई। मैंने उससे इंजीनियरिंग कि तैयारी केँ लिए एक् वर्ष तक तैयारी करने केँ लिएकहा वो मान गयीँ,। मैंने उसे उसकी तैयारी मे सहायता करने कि सहमति दि। इन पूरी छुट्टियों मे मैंने छाया कों मात्र औऱ केवल पढ़ाया उसे कामुक परिस्थितियों सें बिल्कुल दूररखा औऱ खुद पर्र भि अपना नियंत्रण कायमरखा। जब भि मेरी छुट्टियां होतीं मे छाया केँ पास आँ जाताइस दौरान कामुकता मात्र मेरेमन जन्म लेती पऱ मे उसे वहींदफन कर देता,
इसी बीच एक् दुर्घटना घट गई मेरे बापू हमें छोड़कर चलेगए। दीपावली केँ पहले हुइ इस घटना नें मुझे औऱ छाया कों झकझोर दिया थां। मे दीपावली कि छुट्टियों पऱ घऱआया मैंने मायाजी औऱ छाया कों सांत्वना दि तथा उन्हें संयम बरतने कों कहा.घऱ मे पैसों कि कोईकमी नं थि परंतु मायाजी औऱ छाया कों अगलेकुछ महीनों तक अकेले हि रहना थां। मैंने छाया कों अपनी तैयारी जारी रखने केँ लिए प्रेरित किया औऱ वापस कॉलेज लौटआया.
मेरी इंजीनियरिंग ख़त्म होने केँ पहले हि बेंगलुरु कि एक् बड़ी कंपनी मे मेरीजॉब लग चुकी थि। मुझे 2 महीने बाद वहां जानां थां मेरी कंपनी केँ द्वारा मुझे एक् पूर्णतयः सुसज्जित दो कमरे कां आवास दिया गय़ा थां। मैंने उस आवास कों देखा तौ नहि थां पऱ अपने वरिष्ठ साथियों सें उसके बारे मे सुना जरूर थां। उसघऱ मे रहने केँ लिए मात्र अपने कपड़ों कि आवश्यकता थि बाकीउस घऱ मे सब साजो सामान उपलब्ध थें। इन 2 महीनों कि छुट्टियों मे मे अपनेघऱ वापस आँ चुका थां। अपनीजॉब लगने केँ उपलक्ष मे मैंने मायाजी केँ लिए एक् खूबसूरत साड़ी तथा छाया केँ लिए एक् बहोत हि हसीन गुलाबी रंग कां लहंगा औऱ चोली खरीदा थां। ये लहंगा वास्तव मे बहोत हसीन थां। मैंने छाया केँ लिए अपने अंदाज सें अधोवस्त्र भि खरीदे थें.
जब गिफ्ट लेकर मे वापस देहात आँ गय़ा तोँ छाया वो लहंगा देखकर बहोत खुश हुई औऱ मेरे सीने सें लिपट गई। छाया कि इंजीनियरिंग कि परीक्षा 15 दिनों बाद थि। मे छाया केँ संग दिनभर रहकर उसकी पढ़ाई मे सहायता करता वो करीब मेरे कमरे मे हि रहती। मायाजी मेरेआने सें बहोत खुश थि। औऱ छाया कि इस तन्मयता सें सहायता करते देखकर बहोत खुश होती। शायद मैंने अपने वक़्त पऱ भि इतनी मेहनत नहि कि थि जितनी इस टाइमकर रहा थां.
छाया अपनी इंजीनियरिंग कि परीक्षा देआई थि। वो बहोत खुश थि उसे अच्छे नंबरों सें पास होने कि पूरी उम्मीद थि। परीक्षा ख़त्म होने केँ बाद वो पूर्णता तनाव मुक्त होँ गई थि। अगलेदिन उसनेखुद आकर मेरारूम जोँ करीब पुस्तकालय बनाहुआ थां उसे बहोत करीने सें साफ किया। उसने सारी किताबें उठाकर एक् बक्से मे डाल दि। वो अब भि मेरेसंग वक़्त गुजारती थि औऱ अब मुझसे खुलकर बात करती थि। उसने मुझसे अपने कॉलेज केँ अनुभवों केँ बारे मे पूछाफिन अचानक सीमा कि बात छेड़कर उसने मुझसे कहा
“सीमा दिदी छुपन छुपाई खेल कों बहोत याद करती थि.” मे उसकीबात सुनकर शरमा गय़ा
“ उन्होंने शायद आपकोकुछ गुरु दक्षिणा भि दि थि बताइए नां उन्होंने क्याँ दिया थां”
मे निरुत्तर थां.
कभी मुझे लगता कि वो मुझे छेड़रही हैं। शायद सीमा नें उसेसभी कुछखुल करबता दिया थां। पऱ मे इस पर्र बात करने कि स्थिति मे नहि थां। कुछ दिनों बाद छाया कां इंजीनियरिंग कां रिजल्ट आँ गय़ा वो अच्छे नंबरों सें पास हुइ थि। मायाजी औऱ मे बहोत खुश थें वो मेरेपास आई औऱ मेरे सीने सें लिपट गई मैंने पूछा.
“अब तौ खुश हौ नां?”
वो दोबारा मेरेगले सें लिपटी औऱ मेरे गालों पऱ चुंबन देकरकहा
“सभी आपके कारण हि हें” मे मन हि मन प्रसन्न होँ गय़ा थां। अचानक मेरे मुंह सें निकला
“छाया मुझे क्याँ मिलेगा” उसने अपनी गर्दन झुकाली औऱ मुस्कुराते हुए बोलीं “राजकुमारी दर्शन” औऱ पीछे मुड़कर हंसते हुएभाग गई.
मानस और छाया ( एक कामुक कहानी) - devarani ki chudai - Next part miss mat karna
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