रज़िया और ताँगे वाला complete - body-focused teasing - Episode 1
रज़िया औऱ ताँगे वाला
लेखिका: रज़िया सईद
मेरानाम रज़िया सईद हैं। मेरी उम्र अठाईस साल हैं औऱ मे दिल्ली मे एक् विद्यालय मे टीचर हूं। मेरे शौहर कां एक्स्पोर्ट कां कारोबार हैं औऱ हमारी अभि कोई औलाद नहि हैं। मेरा फिगर ३६/२७/३८ हैं औऱ हाइट पाँचफुट चारइंच हैं। मेरारंग सफ़ेद हैं, हालाँकि दूध जैसा सफ़ेद तौ नहि मगर बहुत गोरी हूं मे। मुझे अपने शरीर कि नुमाईश करने कि बेहदशौक हैं। दूसरों कों अपने शरीर केँ जलवे दिखाने कां मे कोई मौका नहि छोड़ती क्योंकि मुझे अपने फिगर पर्र बेहद फख्र हैं। बदन कि नुमाईश करतेसमय मे सामने वाले कि उम्र कां लिहाज़ नहि करती क्योंकि मेरायह मानना हैं कि मर्द तोँ मर्द हि होता हैं फिन उसकी उम्र कितनी भि होँ। कोई भि मर्द किसी हसीन महिला केँ बदन कि झलक पाने कां मौका नहि छोड़ता फिन चाहे वोँ उसकी रिश्तेदार हि क्यूं नाँ होँ। चौदह सें साठसाल तक कि उम्र वालों कों मैंने अपने शरीर कों गंदी नज़रों सें ताकते हुए देखा हैं।
मैंने देखा हैं कि सब मर्द खासतौर सें मेरी भारी गाँड कों सबसे अधिक घूरते हें। मेरे शौहर औऱ दूसरे कुछ लोगों नें भि मुझेकईं दफा बताया हैं कि मेरीगोल गाँड मेरे शरीर कां सबसे हसीन हिस्सा हैं। मे भि यहबात मानती हूं क्योंकि मे जब भि चूड़ीदार सलवार-कमीज़ याँ टाईट जींस केँ संगहाई हील वाले सैंडल पहनकर मार्किट याँ भीड़ सें भरीबस याँ ट्रेन मे जाती हूं तौ लोगों कि नज़रें मेरी रसीली गाँड पऱ हि चिपक जाती हें। कईंलोग तोँ मेरे चूतड़ों पऱ चिकोटी काटने याँ कईंबार मेरी मोटी गाँड पे हाथफेर कर सहलाने सें भि बाज़ नहि आते। लोग मात्र मेरीगोल गाँड कों हि तवज्जो नहि देते बल्कि मेरे बूब्ज़ कों भि छूने कि कोशिश करते हें। कईंदफा, खासतौर सें जब मे भीड़ वालीबस मे मौजूद होती हूं तौ मेरे आसपास खड़े मर्द अपनी कुहनियों याँ कंधों सें मेरे बूब्ज़ कों दबाने कि कोशिश करते हें। इसके अलावा जिस विद्यालय मे मे पढ़ाती हूं वहा भि अपनेबदन केँ जलवे दिखाने कि अपनीइस आदत सें बाज़ नहि आती औऱ जब विद्यालय केँ लड़के भि गंदी नज़रों सें कसमसते हुए मुझे देखते हें तोँ मुझे बेहदमजा आता हैं।
मामूली छेड़छाड़ कां मे कभीकोई एतराज़ नहि करतीमगर अगर मेरी मरज़ी केँ बगैरकभी कोई जबरदस्ती हदपार करने कि कोशिश करे तौ उसकीअकल ठिकाने लगा देती हूं। यहसभी पब्लिक मे होने कि वजह सें यह बिल्कुल मुश्किल नहि होता। पहले तोँ मे गुस्से सें घूरती हूं औऱ अगरकोई आदमीफिन भि बाज़ नाँ आये तोँ हंगामा मचा देती हूं औऱ आसपास केँ लोगफिन उसकीखबर लें लेते हें। इसकायह मतलब नहि हैं कि मे कभी भि हदपार नहि करती क्योंकि कभी-कभार मेरादिल होँ तोँ बात चुदाई तक भि पहूँच जाती हैं। अब तक मैंने कईं अजनबियों केँ लण्ड अपनी बुर मे लिये हें। महीने मे एक्-दो बार तौ ऐसा हौ हि जाता हैं। अजनबियों सें चुदवाने कां यह सिलसिला दोसाल पहले हि शुरुआत हुआ थां। उसकथा कि लेखिका रज़िया सईद हें।
अब मे वोँ किस्सा बयान करनेजा रही हूं जब मैंने पहलीबार बहककर अपनेबदन कि नुमाईश करने औऱ थोड़ी-बहोत छेड़छाड़ कि स्वयं कि बनायी हदपार कि औऱ अजनबियों केँ संग चुदाई मे शामिल होँ गयीँ,। मेरा यकीन मानिये, मुझेइस चुदाई मे बेहदमजा आया जबकि यह वाकया एक् गरीब टाँगेवाले केँ संगहुआ थां। उस वाकये केँ बाद हि मेरी हिम्मत खुल गई, औऱ मे कभी-कभार हदपार करतेहुए अजनबियों सें चुदवाने लगी।
हुआ यह कि एक् बार मुझेदूर कि रिश्तेदार कि विवाह मे शामिल होने केँ लिये हमारे गाँव जानां पड़ा। मे वहा अपने अपनी सासू औऱ चचेरे देवर जी केँ संगजा रही थि। मेरे शौहरकाम केँ सिलसिले मे टूर पे गयेहुए थें औऱ वहीं सें सीधेशदी मे पहुँचने वाले थें। मेरा चचेरा देवरु जौ हमारे संगजा रहा थां वोँ सोलहसाल कां बच्चा थां। अब आप् सोचेंगे कि सोलहसाल कां लड़का तौ बच्चा नहि होतामगर अकल सें आठ-नौसाल केँ बच्चे जैसा हि थां। गाँव मे पला बड़ाहुआ थां औऱ जिस्मानी रिश्तों सें बिल्कुल अंजान थां। मे यहबात यकीन सें इसलिये कह सकती हूं कि मे कईंबार अपने खूबसूरती औऱ बदन कि नुमाईश सें उसे फुसलाने कि नाकाम कोशिश कर चुकी थि। आखिर मे मे इस नतीजे पऱ पहुँची कि इस बेवकूफ गधे कों फुसलाने मे टाइम ज़ाया करने कां कोई फायदा नहि। मेरी सासू कि उम्रसाठ साल हैं औऱ उनकी नज़र कमज़ोर हैं। उन्हें रात केँ वक़्त दिखायी नहि देता। हम् ट्रेन सें अपने गाँवजा रहे थें औऱ ट्रेन स्टेशन पऱ रात कों तीन घंटेदेर सें सवानौ बजे पहुँची जबकि पहुँचने कां सहीसमय साम केँ साढ़े छः कां थां।
रज़िया और ताँगे वाला complete - body-focused teasing – New Episode
जब हम् स्टेशन पऱ उतरे तोँ यहजान कर हैरानी हुई कि स्टेशन पे हमें लेनेकोई नहि आया थां। यह छोटा सां स्टेशन थां औऱ गाँववहा सें थोडा दूर थां। मैंने मोबाइल करने कि कोशिश कि मगरवहा पऱ नेटवर्क भि नहि थां। हमने पंद्रह मिनट इंतजार किया औऱ सोचा कि रात बहोत होँ चुकी हैं औऱ हमें स्वयं हि गाँव चलना चाहिये। स्टेशन केँ बाहर् आकर हम् गाँव जाने कां कोई ज़रिया देखने लगे। रात बहोत होँ चुकी थि इसलिये कोईबस याँ आटो-रिक्शॉ वहा मौजूद नहि थां। बसकुछ टाँगे खड़े थें वहा पऱ। औऱ कोई चारा नां देखकर मैंने टाँगे वालों सें हमें गाँव लें चलने केँ लिये पूछना शुरुआत कियामगर कोई भि सजधजकर नहि हुआ क्योंकि हमारा गाँववहा सें लगभगबीस किलोमीटर दूर हैं।
फिन मुझे महसूस हुआ कि एक् दर्मियानी उम्र कां टाँगेवाला दूर कोने मे खड़ा लगातार मुझे ताड़रहा हैं। अचानक मुझे एक् ख्याल आया औऱ मैंने इस मौके कां पूरा फायदा उठाने कां सोचा। मे उस टाँगे वाले केँ लगभग गयीँ, औऱ उससे हमें गाँव लें चलने कि गुज़ारिश मगर उसनेयह कहतेहुए मनाकर दिया कि “मेमसाब! अभि रात बहोत हौ गई, हैं… आपके गाँव जायेंगे तौ हमारे तोँ रातभर कां धंधा खराब हौ जायेगा!” उस स्टोरी कि लेखिका रज़िया सईद हें।
मैंने फिन उससे इल्तज़ा कि, “प्लीज़ हमको हमारे गाँव छोड़दो नां - देखो हम् अकेली लेडीज़ लोग हें, केसेघऱ जायेंगे… तुम् हमेंघऱ छोड़दो… हम् तुम्हें थोड़े ज़्यादा पैसेदे देंगे!”
“अरे! पर्र हमारा तोँ सारा धंधा हि खराब होँ जायेगा नां मेमसाब! आपको छोड़कर तोँ वापस क्याँ आयेंगे - तब तक सभी ट्रेन छूट जायेगी!”
मैंने नोटिस किया कि मुझसे बात करते वक़्त वोँ बेशर्मी सें मेरे बूब्ज़ कों देखरहा थां जिनका कटाव मेरे गहरेगले केँ ब्लाऊज़ मे सें साफ नज़र आँ रहा थां। उसे फुसलाने केँ लिये मैंने अपनी चुनरी सम्भालने कां नाटक करतेहुए चुनरी इसतरह एडजस्ट करली कि अब वोँ मेरे बड़े मम्मे कां औऱ भि साफ-साफ दीदार करसके। फिन मैंने बेहद कातिलाना मुस्कुराहट केँ संग अपनी नज़रें नीचे करके अपने स्तन कों देखते हुए उससेफिन एक् बार गुज़ारिश कि, “प्लीज़ हमें लेँ चलो - तुम्हें अच्छा इनाममिल जायेगा!” औऱ फिन मैंने बेहद लुच्ची हरकत कि। उसकी टाँगों केँ बीच लन्ड कि तरफ सीधे देखते हुए मैंने एक् हाथ सें अपना बाँया मम्मा दबा दिया औऱ दूसरे हाथ सें अपने लहंगे केँ ऊपर सें हि अपनी बुर कों मसल दिया। मेरादिल तेज़-तेज़ सें धड़करहा थां।
हम् जहाँ खड़े थें वहा थोडा अंधेरा थां, इसलिये किसी सें पकड़े जाने कां डर नहि थां। मैंने उसे इतना खुलकर साफ इशारा दे दिया थां जितना कि कोई स्त्री किसी अजनबी कों दे सकती हैं। वोँ भि मेरा इशारा समझ गय़ा औऱ हमें लेँ जाने केँ लिये राज़ी होतेहुए बोला, “अच्छा मेमसाहब! आप् कहती हें तोँ चलता हूं पर्र इनाम पुरा लूँगा!” यह कहतेहुए उसकी आँखें मेरे बूब्ज़ पर्र औऱ लहंगे मे बुर वाले हिस्से पऱ हि जमीथीं जैसे कि कहरहा हौ कि मेरी बुर भि लेगा।
इतना बेहतरीन मौका देने केँ लिये मैंने दिल हि दिल मे अल्लाह कां धन्यवाद अदा किया क्योंकि हमारा ट्रेन कां सफ़र बहोत हि उबाऊ औऱ बेरंग थां। हम् ए-सि फर्स्ट क्लास मे सफरकर रहे थें इसलिये किसी भि मस्ती-मज़े औऱ छेड़-छाड़ कां कोई ज़रिया नहि थां। खैर हम् लोग टाँगे पर्र बैठे। मे औऱ मेरी सासू पीछे वालीसीट पर्र बैठे औऱ मेरा देवरु आगे वालीसीट पऱ टाँगे वाले कि बगल मे बैठा। लगभग पंद्रह मिनट केँ बाद हम् पक्की मार्ग सें एक् सुनसान कच्ची मार्ग पऱ मुड़े। इस मार्ग पे कोई रोशनी नहि थि औऱ ऐसा महसूस हौ रहा थां जैसे जंगल मे सें गुज़र रहेहों। कोई औऱ वाहनउस मार्ग पर्र नज़र नहि आँ रही थि। मेरी सासू माँ तौ टाँगे पर्र बैठते हि सो गयीँ, थि औऱ अब खर्राटे माररही थि। यहीहाल मेरे देवरु कां भि थां जोँ टाँगे कां साईड कां डंडा पकड़े सोयाहुआ थां।
ठीकऐसे समय पऱ टाँगेवाले नें टाँगा रोक दिया औऱ बोला, “मेमसाब! आप् आगेआके बैठिये, क्योंकि पीछे कि तरफलोड अधिक हौ गय़ा हैं घोड़ा बेचारा इतनालोड केसे खींचेगा, औऱ इस बच्चे कों भि पीछे धीरे-धीरे बिठा दीजिये!”
मे जल्दी समझ गयीँ, कि उसका असली इरादा क्याँ हैं मगरफिन भि अंजान बनतेहुए बोलीं, “नहि रहनेदो नाँ ऐसे हि ठीक हैं!”
“ऐसे नहि चलेगा… घोड़ा तोँ आपके घाँव तक पहुँचने सें पहले हि मर जायेगा… आइये - आप् आगे बैठिये!”
मैंने देखा कि मेरी सासू अभि भि खर्राटे माररही थि औऱ मेरे देवर जी कां भि यहीहाल थां। मजबूरी कां नाटक करतेहुए मे टाँगे सें उतरी औऱ आगेजा कर अपने देवर जी कों जगाया। “असलमउठो! जाकर पीछे बैठो… मे इधरआगे बैठुँगी!”
असलम बहोत हि सुस्त सां नींद मे वहा सें उठा औऱ बिनाकुछ बोले पीछे वालीसीट पर्र जाकरबैठ गय़ा औऱ मे आगे कि सीट पर्र टाँगेवाले कि बगल मे बैठ गई,। टाँगा फिन धीरे धीरेआगे बढ़ने लगा। पंद्रह-बीस मिनट केँ बाद मैंने देखा कि असलमफिन सो गय़ा हैं औऱ इसबार उसने अपनासिर मेरी सासू कि गोद मे रखाहुआ थां। अबअगर वोँ अचानक जाग भि जाता तौ हमेंआगे देख नहि सकता थां। अब मे बहोत खुश थि क्योंकि उस ठरकी टाँगेवाले कों तड़पाने औऱ लुभाने कां औऱ अब तक केँ बेरंग सफ़र मे कुछमजा लेने कां यह बेहतरीन मौका थां।
वैसे तोँ मे हमेशा सलवार-कमीज़ याँ जींस-टॉप हि पहनती हूं मगर हम् विवाह मे जारहे थें तौ मैंने डिज़ायनर लहंगा-चोली पहनाहुआ थां औऱ चोली केँ ऊपर झिनी सि चुनरी थि। नेट केँ कपड़े कां झिना सां लहंगा थां इसलिये उसके नीचे स्लिप (पेटीकोट) भि पहनाहुआ थां। एहतियात केँ तौर पे सफर केँ दौरान ज़ेवर नहि पहने थें मगर पूरा मेक-अप कियाहुआ थां औऱ पैरों मे चारइंच ऊँची पेंसिल हील वाले फैंसी सैंडल पहनेहुए थें। मैंने हमेशा महसूस किया हैं कि हाईहील केँ सैंडल पहनने सें मेरा फिगर औऱ अधिक दिलकश लगता हैं औऱ मेरीकसी हुईँ गोल-गोल गोल गाँड इमत्याज़ी तौर पे ऊपर निकलआती हैं। उसकथा कि लेखिका रज़िया सईद हें।
मैंने फिन अपनी चुनरी कों इसतरह एडजस्ट किया ताकि चोली मे कसा मेरा एक् मम्मा नज़रआये औऱ फिन टाँगेवाले कि तरफ देखते हुए मैंने पूछा, “अरे तुम्हारा घोड़ा तोँ बहोत धीरे धीरेचल रहा हैं! लगता हैं कि जैसे इसमें जान हि नहि हैं!”
बेहयाई सें मेरे बूब्ज़ कों देखते हुए टाँगेवाला बोला, “अरे मेमसाब जी! अभि आपने मेरा घोड़ा देखा हि किधर हैं! जबउसे देखोगी तौ घबराकर अपनादिल थाम लोगी!”
उसे औऱ शह देने केँ मकसद सें मैंने अपनी चोली कां एक् हुकखोल दिया। चोली मे तीन हि हुक थें औऱ बैकलेस चोली होने कि वजह सें मैंने नीचे ब्रा भि नहि पहनी हुईँ थि। एक् तौ मेरी चोली पहले सें हि बेहद लो-कट थि औऱ अबहुक खोलने सें मेरे स्तन कि घाटी कां बहुत हिस्सा टाँगेवाले कि नज़रों केँ सामने नुमाया हौ गय़ा। टाँगे केँ ऊपर लटके लालटेन कि हल्की रोशनी मे यह नज़ारा देखकर टाँगेवाले कों सही इशारा मिल गय़ा। वोँ बोला, “मेमसाब! कभी मौका देकर तोँ देखिये हमारे घोड़े कों… सवारी करके आपकादिल खुश होँ जायेगा! पूरामजा नाँ आये तोँ नामबदल दूँगा!”
मे कहने हि वाली थि कि “अपना याँ फिन…”मगर फिन जाने दिया। मे उसकी दोहरे मतलब वाली बातें समझरही थि कि हकीकत मे वोँ यह कहनाचाह रहा थां कि मे उसे अपनी बुर चोदने कां एक् मौकादे दूँ तौ वोँ पूरीतरह मेरी दिलभर कर तसल्ली करवा देगा। उसे औऱ तड़पाने केँ लिये मे थोडा आगे कों झुकते हुए बोलीं, “सवारी क्याँ खाक करायेगा! मुझे तौ लगता हैं कि तुम्हारा घोड़ा तोँ एकदम बुड्ढा होँ गय़ा हैं देखो कैसी मरियल चाल हैं इसकी!”
टाँगेवाला बोला, “वोँ तोँ मेरा घोड़ा मेरे काबू मे हैं… जब तक मे इसे सिगनल नहि दूँगा, यह उठेगा औऱ भगेगा नहि!” यह कहतेहुए वोँ लुंगी केँ ऊपर सें हि खुल्लेआम अपना लौड़ा सहलाने लगा।
उसकी दोहरी मतलब वाली बातों सें मेरी चुदास भड़करही थि औऱ अधिकमजा लेने केँ लिये मे उसकीतरफ थोडा औऱ खिसक गयीँ,। अब मेरा एक् मम्मा टाँगे केँ हिचकोलों केँ संग उसके कंधे कों छूरहा थां। टाँगेवाले नें जब देखा कि मे उसे पूरीशह देरही हूं तोँ वोँ अपनी कोहनी सें मेरे स्तन कों दबाने लगा। मुझे तोँ इसमें कोई एतराज़ थां हि नहींमगर मैंने एक् बार पीछे कि सीट पऱ यह तहकीक करने केँ लिये नज़र डाली मेरी सासू औऱ देवर जी गहरी नींदसो तौ रहे हें। फिन मुझे अपनेबदन केँ उससे सटने केँ असर कां भि एहसास हुआ - टाँगेवाले कां लन्ड नें लुंगी मे खड़े होकरउसे तंबू कि शकलदे दि थि।
मैंने हंसते हुए मज़ाक मे उसे छेड़ा, “अरे! तुम्हारा घोड़ा तौ उठनेलग गय़ा!”
“अरे मेमसाब! इसे खाने कां सामान दिखेगा तोँ बेचारा अपना मुँह तोँ खोलेगा हि नाँ… आखिरकब तक भूखा रहेगा!”
रज़िया और ताँगे वाला complete - body-focused teasing – New Episode
अब मुझे तड़पाने कि बारी उसकी थि। इसलिये उसने अपनी लुंगी इसतरह धीरे-धीरे सें सरकायी कि उसकी जाँघें बिल्कुल नंगी होँ गयीँ, औऱ एक् झटके मे हि वोँ किसी भि समय अपना लन्ड मेरे सामने नुमाया कर सकता थां। मे तौ उसका लण्ड देखने केँ मरीजा रही थि। लुंगी केँ पतले सें कपड़े मे सें उसके लन्ड कि पूरी लंबाई नामोदार हौ रही थि। लगभग आठ-नौइंच लंबेउस गोश्त कों अपने हाथों मे पकड़ने कि मुझे बेहद आरज़ू होँ रही थि। इसलिये टाँगेवाले कों औऱ उकसाने केँ लिये मे मासूमियत कां नाटक करतेहुए अपने मम्मे उसके कंधे पर्र औऱ ज़्यादा दबाने लगी जिससे उसेयह ज़ाहिर होँ कि टाँगे केँ हिचकोलों कि वजह सें यह होँ रहा हैं। मेरे स्तन कि गर्मी उसे महसूस हौ रही थि जिसके असर सें लुंगी मे उसका तंबू औऱ बुलंद होनेलगा औऱ खासा बड़ा होकर खतरनाक नज़रआने लगा। मे समझ नहि पारही थि कि अब भि वोँ टाँगेवाला स्वयं पे काबू केसे कायमरखे हुए थां। फिन लालटेन कि मद्धम रोशनी मे मैंने नोटिस किया कि उसके लन्ड कां सुपाड़ा लुंगी केँ किनारे सें नज़र आँ रहा थां।
“याँ मेरे खुदा!” मे हैरानी सें सिहर गई,। उसके लन्ड कां सुपाड़ा वाकय मे बेहद बड़ा थां - किसी बड़े पहाड़ी आलू औऱ लाल टमाटर कि तरह। रात केँ अंधेरे मे वोँ पूरीशान औऱ अज़मत सें चमकरहा थां। मे जानती थि कि इतना बड़ा सुपाड़ा देखने केँ बादअब मे अधिकदेर तक स्वयं पे काबू नहि रख पाऊँगी। उसे अपने हठों मे लेकरउसे चूमने औऱ उसे चाटने केँ लिये मे बेचैनी उठी थि।
सूरत-ए-हाल अब बिल्कुल बदल चुके थें। उसे अपने खूबसूरती औऱ अदाओं सें दीवाना बनाने कि स्थान अब वोँ मुझे हि अपने बड़े लण्ड केँ जलवे दिखाकर ललचारहा थां। मे अब औऱ आगे बढ़ने सें स्वयं कों रोक नहि सकी औऱ अपनी चोली कां एक् औऱ हुकखोल दिया। वैसे भि मेरी चोली मे तीन हि हुक थें औऱ उसमें सें एक् तौ पहले हि खुलाहुआ थां औऱ अब दूसरा हुक खुलते हि मेरे दोनों मम्मे चोली मे सें लगभग-लगभग बाहर् हि कूद पड़े औऱ अब खुलीहवा मे ऐसे थिरकरहे थें जैसे अपनी आज़ादी कां जश्नमना रहेहों।
टाँगेवाले नें यह नज़ारा देखा तौ शरारत सें मेरेकान मे धीरे-धीरे सें फुसफुसा कर बोला, “अरे मेमसाब! यह क्याँ… आपने तोँ अपने बूब्ज़ कों पूरा हि खुला छोड़ दिया, क्याँ हुआ आपको?”
मैंने कहा, “क्याँ करूँ! गर्मी बहोत हैं नाँ… इन बेचारों कों भि तौ रात कि थोड़ी ठंडीहवा मिलनी चाहिये… बेचारे दिनभर तौ कैद मे रहते हें!” सच कहूँ तोँ रात कि ठंडक मे अपने नंगे मम्मे कों टाँगे केँ हिचकोलों केँ संग झुलाते हुएउस ठरकी कि बगल मे बैठना बेहद अच्छा लगरहा थां।
लहंगे मे छुपी मेरी बुर कि तरफ देखते हुए टाँगेवाला बोला, “तोँ फिन तोँ मेमसाब नीचे वाली कों भि तोँ थोड़ी हवा लगनेदो नां! उसे क्यूं बंदकर रखा हैं!” यह कहतेहुए उसने अपनेहाथ मेरी जाँघों पऱ रख दिये औऱ मेरी रसीले औऱ गोरी सुडौल टाँगों कों नामूदार करतेहुए लहंगा मेरी जाँघों केँ ऊपर खिसकने लगा - जैसे कि इशारा कररहा होँ कि मे अपना लहंगा पूराऊपर खिसका कर अपनी बुर कां नज़ारा उसेकरा दूँ। उस स्टोरी कि लेखिका रज़िया सईद हें।
मगर मैंने उसेऐसा करने सें रोक दिया क्योंकि मे उसे थोडा औऱ तड़पाना चाहती थि। मे बोलि, “अरे पहलेऊपर कां काम तौ मुकम्मल कर लें! नीचे कि बातबाद मे सोचेंगे नां!”
टाँगेवाला मेरे लगभग-लगभग नंगे स्तन कों देखरहा थां जोँ चोली मे सें बाहर् झाँकरहे थें। वैसे तोँ चोली कां अंतिम हुक खोलना बाकी थां मगर अमलनतौर पे तीसरे हुक कां कोई फायदा नहि थां क्योंकि मेरे मम्मे तौ झिनी चुनरी मे सें पूरे नंगे नुमाया होँ हि रहे थें। टाँगेवाले सें औऱ सब्र नहि हुआ औऱ मेरे बूब्ज़ कों अपने हाथों मे लेकर मसलने लगा। उसके मजबूत औऱ खुरदरे हाथों केँ दबाव सें मे कंपकंपा गयीँ,। मे सोचने लगी कि जब इसके हाथों सें मुझे इतनी लज़्ज़त मिलरही हैं तौ अपने लन्ड सें वोँ मुझे कितना मजा देगा।
फिन वोँ बोला, “मेमसाब आप् अपने स्तन कां दीदार हमें छलनी मे सें छानकर क्यूं करारही हें… ज़राइस पर्दे कों हटा दीजिये!” वोँ मेरी चुनरी कि तरफ इशारा कररहा थां मगरइस दिल्चस्प शायराना अंदाज़ मे उसे अपनी ख्वाहिश कां इज़हार करतेदेख मे मुस्कुराये बिना नहि रहसकी।
बरहाल उसकी गुज़ारिश मानते हुए मे अपनी चोली कां अंतिम हुक खोलते हुए बोलीं, “तुम्हारी तमन्ना भि पूरीकर देते हें… लोअब तुम् दिलभर केँ मेरे स्तन सें खेललो… पऱ तुम् सिर्फ़ अपने बारे मे हि सोचते रहोगे याँ हमारा भि कुछ ख्याल रखोगे?” मे उसके बड़े लन्ड कि तरफ देखते हुए बोलि जोँ अब तक बेहद बड़ा होँ चुका थां औऱ पहला मौका मिलते हि मेरी बुर फाड़ने केँ लिये सजधजकर थां। मे उस हैवान कों हाथों मे लेने केँ लियेइस कदर प्यास रही थि कि एक् समय भि औऱ इंतजार नाँ करसकी औऱ उसे अपनी लुंगी खोलने कां भि मौका नहि दिया औऱ झपटकर उसका लौड़ा अपने हाथों मे लें लिया।
ऊऊऊहहह मेरे खुदा! याँ अल्लाहऽऽ… वोँ इतना गर्म थां जैसे अभि तंदूर मे सें निकला होँ! मुझेलगा जैसे मेरी हथेलियाँ उसपे चिपक गई, हों। मे वोँ लौड़ा हाथों मे दबानलगी जैसे कि मे उसके कड़ेपन कां मुआयना कररही होऊँ। मेरी बुर भि उस लन्ड कों लेने केँ लिये बिलबिला रही थि। उस लम्हा मैंने फैसला किया कि बदन कि मात्र नुमाईश औऱ यह छेड़छाड़ औऱ मसलना बहुत होँ गय़ा… आज कि रात तौ मे इस लौड़े सें अपनी बुर कि आग ठंडी करके रहुँगी। अब मे उससे चुदवाये बगैर नहि रह सकती थि। इस दौरान टाँगेवाला एक् हाथ सें मेरे स्तन सें खेलने मे मसरूफ थां। वोँ मेरे निप्पलों कों मरोड़ रहा थां औऱ झुककर उन्हें चूसने कि कोशिश भि कररहा थां मगर टाँगे केँ हिचकोलों कि वजह सें ठीक सें चूस नहि पारहा थां। मे उसके लण्ड कों इतनी ज़ोर-ज़ोर सें मसलरही थि जैसे कि ज़िंदगी मे फिन दोबारा मुझे दूसरा लण्ड नसीब नहि होगा। फिन कमीने लण्ड कां ज़ुबानी एहतराम करने केँ लिये मे उसे अपने मुँह मे लेने केँ लियेझुक गई,।
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