लौट आओ राधा (completee) - राधा की चुदai - Real Kahani Part 1
लौटआओ राधा
इस इन्सानी दुनिया सें खौफ़नाक औऱ कोई दूसरी क्रूर दुनिया नहि हैं। आप् ठीक कहते हैं, जीहाँ ! एक् दूसरी दुनिया भि हैं पर्र वहा केँ भि कुछ अपने हि नियम हैं, जौ सिर्फ़ अपने नियम पर्र चलते हें। यहा तौ इन्सान स्वयं हि नियम बनाते हें औऱ फिन उन्हें तोड़ने केँ लिये तत्पर भि रहते हें।
ऐसा क्यूं होता हैं?
शास्त्रों मे लिखा हैं तूँ जौ आज करेगा, तुम को उसकासात नहि सत्तर गुनापलट कर दिया जायेगा। चाहे वोँ भला हौ याँ बुरा। आज आपकोकुछ ऐसी हि दुनिया केँ कारनामे हाजिर करता हूं।
एक् गाँव थां हीरापुर ! जैसा कि हर स्थान ऐसा होता हैं कि कमजोर वर्ग केँ मध्य एक् घराना वर्ग ताकतवर निकल हि जाता हैं जिसे हम् जमींदार केँ नाम सें पुकारने लगते हैं। इस गाँव मे भि एक् चौधरी परिवार पैसे वालाबन करउभर आया थां, जिसने पैसे केँ दम पर्र वहा कि ज्यादातर जमीन खरीदरखी थि। उसकाकाम गाँव केँ कमजोर वर्ग केँ लोगों कों रुपया ब्याज पर्र देना औऱ दुगना, तीन गुना वसूली करना थां याँ एवज मे उनकी जमीन औऱ यहा तक कि उनका घर-मकान तक पऱ कब्जा कर लेना थां। राम सिंह चौधरी कां उसका एक् बेटा दीनाराम सिंह औऱ एक् एक् बेटी श्यामला सिंह थि।
कथा अरम्भ होती हैं माधोराम सें… गाँव केँ एक् अध्यापक कां पुत्र माधोराम बाहरवीं कक्षा मे पढ़ता थां। उसी गाँव कि एक् लड़की जोँ माधोराम केँ संग हि पढ़ा करती थि, एक् गरीब किसान कि पुत्री थि राधानाम थां उसका।
दोनों एक् दूसरे कों बहोत हि पसंद करते थें। माधो तौ मन हि मन मे उससे बहोत प्रेम करता थां। दोनों एक् दूसरे सें प्रेम तोँ करते थें, पऱ मन कि कभीकह नहि पाते थें।
एक् रात कों माधो बाहर् सें अपनेघऱ आँ रहा थां। रात केँ ग्यारह बजरहे थें… सारा गाँव अन्धकार मे डूबाहुआ थां, बस गाँव केँ बाहर् उसी चौधरी केँ घऱ केँ बाहर् कि एक् बत्ती कुछदूर तक अंधियारे कों मिटाने कि कोशिश करतीनजर आती थि। तभी माधो कि नजरउसी रोशनी सें कुछ दूरी पर्र पीपल केँ पेड़ केँ नीचेजा ठहरी। वोँ उत्सुकतावश वहा पहुँच गय़ा।
अरे राधा, तूँ…?
वोँ कचरा फ़ेंकने आई थि…
अच्छा चल…संग चलें, तेरीडर नहि लगाजरा भि ऐसीरात मे…
तूँ जौ हैं नां… डर कैसा? माधो कां मनयेसुन कर थोड़ा सां विचलित हुआ। एक् स्थान अन्धेरा देखकर माधो नें अपनेमन कि बातकह दि।
“राधा, देख बुरामत मानना, एक् बात कहूँ?”
राधाकुछ कुछसमझ चुकी थि, वोँ रुक गई… औऱ उसे देखने लगी…
“अच्छा… बाद मे सही…!” माधो कों एकाएक लज्जा सि आँ गई।
“बोल नां माधो…”
वोँ… बातये हैं कि तूँ मुझे अच्छी लगनेलगी हैं…”
“माधो…सच बता नां… अच्छा तोँ तुँ भि मुझे लगता हैं…”
राधा माधो केँ औऱ पास आँ गई… माधो केँ चेहरे पर्र पसीना छलकआया, उसने अपनासर झुकाकर धीरे-धीरे सें कहा- राधा… मुझेतुझ सें प्रेम हौ गय़ा हैं… देख राधा…कोई बात नहि, यदि नां कहना हैं तौ नाँ कहदे…
“अरे हाँ…हाँ… माधोहाँ… तूने पहले क्यूं नहि कहा… कितना तड़पाया हैं तूने मुझे…ओह माधो… मेरे माधो…!”
राधा माधो सें लता कि तरह लिपट गई। पराईऔरत कां तन स्पर्श कां सुखउसे पहलीबार हुआ। गरम गरम सां जिस्म… एक् सिरहन सि महसूस हुइ।
उसके सीधेतने उरोज उसकी छाती कों छेदने लगे। धीरे-धीरे सें दोनों नें एक् दूसरे केँ होंठों कों चूमा औऱ फिन दोनों हि शरमागये।
“माधो जाती हूं…!”
“फिनकल कहां मिलोगी…?”
“यहीं … इसी वक्त…हाय रामराम…!” कहती हुई वोँ भागखड़ी हुइ।
माधो औऱ राधाअब रोज हि रात कों उसी पीपल केँ वृक्ष केँ नीचे मिलने लगे। पहलेकुछ दिनों तक तोँ बस वोँ चूमा-चाटी तक हि रहे थें। पर्र अब वोँ उसके छोटे छोटे कबूतरों पर्र भि हाथ डालने लगा थां बल्कि यूँ कहिये कि राधा हि नें अपने मम्मे उससे दबवा लिये थें। माधो कों भि उसके सख्त औऱ रसीले सें उरोज दबाने सें बहोत अच्छा लगा थां। आज तोँ माधो नें राधा केँ चूतड़ केँ गोलों कों भि सहलाकर खूब दबाया थां। उफ़्फ़ ! जवानी इसे कहते हें… राधा नें भि उसके लण्ड कों ऊपर सें हाथ सें दबाकर देखा थां। लोहे कि तरह सख्त लण्ड राधा केँ सीने मे सांप कि तरहलोट गय़ा। एक् तरह सें दोनों कि मन कि दीवारें भि अब हटनेलगी थि। रोज कां उनका मिलना एक् दिन चौधरी राम सिंह कों पताचल गय़ा। वोँ रोजछुप छुपकर उन्हें देखता भि रहता थां पऱ माधो कि उपस्थिति सें वोँ डरता थां।
राधा औऱ माधो केँ मन मे अब चुदाई कि चाह भि फ़ूटने लगी थि। रोजरोज वोँ माधो कां लण्ड पकड़ती… उसकामन चुदवाने मचल उठता थां। माधो कां भि रात कों उसके लण्ड सें वीर्य निकल पड़ता थां। राधा भि रात कों अपनी कोमल बुर कों दबादबा करयौन रस निकाल देती थि।
एक् दिन माधो कों दूसरे गाँव जानां पड़ा। उसके रिश्तेदार मे कोई बीमार थां। राधा कों वोँ बता भि नाँ पाया थां। राधा हमेशा कि तरहरात कों पीपल केँ वृक्ष केँ नीचे माधो कां इन्तज़ार कररही थि। जबराम सिंह नें उसे अकेली पाया तोँ वोँ भोली भाली राधा कों फ़ुसला कर अपने पीछे वाले कमरे मे लेँ गय़ा।
“चाचा, ये अच्छी स्थान हैं, हम् तौ रोज यहींमिल लिया करेंगे। ”
राधाराम सिंह कों चाचा कहा करती थि। राधा खुशी सें नर्मबैड पऱ बैठकर अपने पांव हिलाने लगी।
राम सिंह नें बहोत प्रेम सें उसे लेटा दिया…“अब लेटे लेटे इन्तजार करो…लो ये शर्बत पीलो, मे तौ चलता हूं…!”
“जाओ तौ ये कुण्डी लगा देना। ”
उसने शर्बत बड़े हि चाव सें पी लिया। कुछ हि देर मे उसेनशा सां होँ गय़ा, उसे नींद सि आनेलगी। तबराम सिंह नें अपने कपड़े उतारे औऱ नंगा होँ कर उसके सामने आँ गय़ा। उसका लण्ड तन्नाया हुआ थां। उसने आहिस्ता राधा केँ कपड़े उतारे औऱ उसे नंगीकर दिया। वोँ नशे मे कुलबुला रही थि… उसेलग रहा थां कि जैसे उसकेहाथ पेर मे जान हि नाँ होँ।
राम सिंह नें उसकेपेर चौड़े किये औऱ अपना सख्त लण्ड उसकीनरम बुर मे घुसेड़ दिया। धीरे-धीरे धीरे-धीरे उसे चोदने लगा। राधानशे कि हालत मे मस्ती मे झूमउठी औऱ राम सिंह कों माधोसमझ कर उससे लिपट गई। बहोत बेताबी सें राधा नें राम सिंह सें चुदवाया। राधा नें जोँ गाँव केँ लड़के-लड़कियों सें गालियाँ सीखी थि… वोँ जोशजोश मे बोलती भि जारही थि।
पर्र राम सिंह कों भि शायदपता नां थां कि वोँ नशा तोँ ज्यादा देर कां नहि थां। उसने राधा कों उल्टी करके उसकी गाण्ड मे जैसे हि लण्ड घुसाया कि राधाचीख सि पड़ी- माधो…जरा धीरे-धीरे… धीरे-धीरे…
उसे अपनी कोमल गाण्ड मे मोटा सां लण्ड कां अब अहसास होनेलगा थां। वोँ जैसे जैसे अन्दर घुसता वोँ तड़प उठती। उसने विनती करने केँ लिये ज्योंही पीछेमुड़ कर देखा। तौ वोँ डर केँ मारे दहशत सें चीखउठी।
“अरे चाचा… तुम्…?”
पुलिस कों दूसरे दिन राधा कि छिन्न भिन्न लाश एक् झाड़ी मे मिली। पुलिस उसको कपड़े मे लपेटकर अस्पताल मे पोस्टमार्टम केँ लिये लेँ गई। जांच केँ बादकेस कों जंगली जानवर कां हमलासमझ करकेस बन्दकर दिया गय़ा। लाश कों राधा केँ नाम सें पहचाना गय़ा। चौधरी परिवार तीनचार दिनबाद हि मुम्बई चला गय़ा।
माधो केँ साम कों लौटने पऱ रोज कि तरह वोँ रात कों चौधरी केँ घऱ केँ पीछेचला आया। बहोत देर तक उसने राधा कि इंतजार कि। जाते टाइम उसने देखा कि राधा उसके पीछेखड़े उसे पुकार रही हैं।
माधोखुश हौ गय़ा औऱ कुछदेर तक गिले शिकवे कि बातें करने केँ बाद वोँ उसे चौधरी केँ धर केँ पिछवाड़े मे लें आई। उस कमरे मे अभि भि पलंगलगा हुआ थां। वोँ बहोत देर तक उससे गप्पें मारता रहा। उसे अपने प्रेम भरे आलिंगन मे भरकर उसकी बुर मे कभी अपना लण्ड दबाता तौ कभीतड़प करउसे खूब चूमता। राधाखूब खिलखिला कर हंसती।
दूसरे दिनउसे उड़ती उड़तीखबर सुनाई दि कि राधा कों तोँ किसी जानवर नें मार दिया। माधो तुरन्त भागकर राधा केँ पिता सें मिलने गय़ा। वोँ सवेरे उठकरबस खेत पर्र जाने कि तैयारी हि कररहा थां।
“मंगलू चाचा… राधा कहां हैं?”
“वोँ… वोँ… गाँव गई हैं…!”
“कब…?”
“अरे अभि सुभह हि तौ…!”
मंगलू कां चेहरा सूखा सां मुरझाया साफ़बता रहा थां कि वोँ झूठबोल रहा हैं।
“पर्र गाँव वाले तौ कहरहे थें कि…?”
“अरे आँ जायेगी… परीक्षा भि तौ नजदीक हैं…!”
माधो नें उसके पिता कि मानी… क्योंकि पिछली रात कों हि तौ उससे मिला थां। मंगलू अपनी सूनी आँखें लियेखेत कि तरफ़चल दिया। साम कों उसका मिलना राधा सें जारीरहा। उसका तौ वोँ चौधरी वालारूम तौ जैसे जन्नत हि बन गय़ा थां। वहाउसे कोईडर नहि। आज तौ माधो नें सोच हि लिया थां कि राधा कों जरूरचोद देगा।
बड़ी उमंगें लिये हुये… वोँ दोनों रात कों मिले।
माधो नें राधा कों चूमते हुयेकहा- अब बहोत होँ गय़ा… आज तौ तुम्हें चोदने कां मन होँ रहा हैं… !
“सच… माधो… तौ फिन इतनेदिन तक क्यूं चुपरहा…?”
“मैंने सोचा कि तुँ तौ अपनी हि हैं नां… बहोत आनन्द केँ संग तुम्हें चोदूँगा… तेरी चूचियाँ चूसूँगा… गाण्ड मारूँगा…”
“औऱ मे तौ तड़प गई थि तेरा लण्ड चूसने कों… इस भोसड़े कों चुदवाने केँ लिये…ओह मेरे भोले पंछी… !” राधाजोश मे अपनी गाँव कि बोलीं बोलने लगी।
राधा नें उसका लण्डपकड़ लिया औऱ नीचेबैठ गई… उसका लण्ड बाहर् निकाला औऱ बड़ी बेताबी सें उसे चूसने लगी।
माधो तौ मानोतड़प उठा। ऐसा चूसना… उसकेसंग पहलीबार हौ रहा थां। बहोत जीजान सें वोँ लण्ड कों चूसरही थि।
‘बसकर राधा… भेनचोद, मेरामाल निकल जायेगा…!”
“तोँ निकाल दे मेरे माधो…!”
उसने उसके लण्ड कों दबाकर चूसना जारीरखा। माधोतड़प उठा थां… औऱ फिन वोँ झुक सां गय़ा।
“अरे भोसड़ी कि… मार डाला नाँ मुझे…!”
फिन उसके लण्ड सें ढेर सारा वीर्य निकलपड़ा… राधा नें उसे प्रेम सें पी लिया।
वोँ बिस्तर पर्र धम सें लुढ़क गय़ा।
“मैंने तौ सोचा थां कि आज तेरी भोसड़ी कों चोद डालूँगा… पऱ दोस्त तूने तौ…?”
“चोद देना नाँ… अभि तौ रात हि क्याँ हुई हैं…!”
“ओ…मार डाला…मरी ! तेरा पिताजी तेरीबाट देखरहा होगा…!”
“भूल जारे पिताजी कों… आज तोँ तूँ हि मेरासभी कुछ हैं…”
“तौ फिनखा लेनामार… देख मेरानाम नां लेना…”
माधो नें उसे अपनेपास गिराकर उसकेऊपर चढ़ गय़ा। उसने राधा कां ब्लाउज खोला औऱ उसकी छोटी छोटी चूचियाँ सहलाने लगा, दाबने लगा। राधा केँ मुख सें प्यारी सि सिसकारियाँ निकलने लगी। माधो नें उसका घाघरा उठाकर उसकी बुर नंगीकर ली।
“उफ़्फ़्फ़… माधो…आज तोँ तुम्हें पा हि लूँगी…”
उसका मोटा सख्त लण्ड उसकी बुर मे रगड़ खानेलगा। राधा कि मीठी सिसकारियाँ कमरे मे उभरने लगी। फिन माधो कां लण्ड उसकीगरम बुर मे घुसपड़ा।
“उईईईईई मम्मी… इस्स्स्स्स्स…। ”
राधा केँ मुख सें सुख कि अहह निकलपड़ी। उसका लण्ड बुर मे स्थान बनाता हुआ अन्दर कि ओरचलपड़ा।
“माधो…!”
“हाँ रानी…?”
“कितना आनंद आँ रहा हैं… बुर कां भोसड़ा बनादे… इह्ह्ह्ह्ह्ह्ह … जराजोर सें…”
“मेरी रानी… कितने दिनों सें तुम्हें चोदने कां सपनादेख रहा थां…”
“पूरा होँ गय़ा नाँ मेरे राजा…कोई दूसरा चोद जाये… इससे अच्छा हैं मेरेमन केँ मीत सें चुदा चुदाकर मनभरलूँ…”
माधो कों ऐसासुख पहलीबार नसीबहुआ थां… सोबड़े हि आनन्द सें धक्के मारमार कर चुदाई कां रस लेँ रहा थां। तभीउस लगा कि राधा झड़नेलगी हैं।
“अरेरुक मत, चोदेजा… साली कों फ़ाड़दे दोस्त…”
“अरे फ़ाड़ूंगा तौ मे अब तेरी गाण्ड कों… मेरी प्यारी राधा… रेडी हैं नां?”
“ओह मेरे माधो… तूँ मेरी गाण्ड मारेगा तौ तेरीशपथ… मेरी तोँ रहीसही कसर पूरी होँ जायेगी। ”
फिन पलटते हुये घोड़ी सि बन गई। गाण्ड कों उसनेऊपर उभारली। माधो नें अपनेतने हुये लण्ड कों उसकी गाण्ड केँ छेद सें सटाकर जोर लगाया। उधर राधा नें भि अपनी गाण्ड कों लण्ड पऱ दबा दिया। बिना किसी आवाज़ केँ लण्ड गाण्ड मे उतरता चला गय़ा।
“ओह्ह्ह्ह मेरे राजा… प्रेम सें घुसता हैं लण्ड तोँ बात हि कुछओर आनन्द कि होती हैं… दुगना आनन्द आँ जाता हैं…”
“तुम् मेरी रानी हौ, तौ प्रेम सें हि तौ चोदूँगा नाँ !”
माधो कां लण्डअब सटासट चलनेलगा थां। जमाने भर कि मिठास उसके लण्ड मे भरीजा रही थि। फिन तौ जैसे बांधटूट गय़ा हौ… लण्ड धीरे-धीरे सें बाहर् निकाल कर उसने एक् तेज वीर्य कि धारछोड़ दि… बारबार उसका लण्ड पिचक पिचककर वीर्य कि धार निकालता रहा। फिन एक् तरफ़ लुढ़क सां गय़ा।
राधा धीरे-धीरे सें उठी…- मेरे माधो… मेरेदिल कि ख़्वाहिश पूरी हौ गई… अब मे चलूँ… बहोत सें काम बाकी हें अभि।
“अरेजा रही होँ ? रुकजाओ नाँ…”
“माधो… मे तोँ कब कि जा चुकी हूं…”
स्टोरी अभि ख़त्म नहि हुइ हैं।
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लौट आओ राधा (completee) - राधा की चुदai – New Episode
भाग -2
राधा धीरे-धीरे सें उठी…- मेरे माधो… मेरेदिल कि ख़्वाहिश पूरी होँ गई… अब मे चलूँ… बहोत सें काम बाकी हें अभि।
“अरेजा रही हौ ? रुकजाओ नां…”
“माधो… मे तोँ कब कि जा चुकी हूं… बस तेरा प्रेम पाना थां, उसे हि निभाने आई थि… कहीं मेरा प्रेम, मेरा माधो प्यासा नां रह जाये…!”
“ये तुम् कहां जारही हौ?”
“मेरी इज्जत तौ राम सिंह नें लूटली थि… फिन उसने मुझेमार कर झाड़ियों मे फ़ेंक दिया थां। रातभर मुझे भेड़ियों औऱ जंगली जानवरों नें मुझे नोच-नोच कर मेरे चीथड़े तक उड़ा दिये थें। हौ सके तोँ मेरीयाद मे पीपल केँ नीचेकभी कभी आँ जाया करना। ”
माधो कि आँखें फ़टी कि फ़टीरह गई। उसकीचीख उस कमरे मे गूंज गई। राधाजा चुकी थि। वोँ जोरजोर सें फ़ूटफ़ूट कर रोयाउस दिन। वोँ करीब-करीब घिसटते हुये अपनेघऱ कि चलाआया। माधो कां मनराम सिंह कों चीर डालने कों होँ रहा थां। एक् नफ़रत कि आग उसके सीने मे जलउठी।
गाँव मे आज खासीचहल पहल थि। राम सिंह चौधरी आज मुम्बई सें लौटआया थां। माधो राधा कि याद मे रोज पीपल केँ पेड़ केँ नीचे जाता थां। तथाकथित राधा कां साया उससे नियम सें मिलने आता थां। उन दोनों नें मिलकर एक् सुन्दर सि गुड़िया बनाई। हसीन सि… रोजरात कों वोँ दोनों उसकाकभी तौ छोटा सां घऱ बनाते औऱ कभी तोँ बड़ा सां घऱ बनाते। कभीकभी उसकेघऱ केँ आसपास फ़ूलों केँ पौधे भि लगाते थें। गाँव वालो नें देखा कि पीपल केँ नीचे एक् गुड़िया हैं औऱ अब उसकेआस पास सुन्दर सें फ़ूललग आये हैं… तौ बातचल पड़ी थि।
माधोरोज सुभह पीपल केँ वृक्ष केँ नीचे जाता थां औऱ उसे संवारता थां। गाँव वालों केँ पूछने पर्र वोँ कहता थां… राधा कां भि तौ स्मारक चाहिये। उसने वहां एक् झोपड़ी बना दि राधा केँ शयन कक्ष सहित।
अब गाँव केँ लोगवहा पऱ आनेलगे थें। पऱ वोँ उस राधा केँ लिये नहि आते थें…
एक् वर्षबीत गय़ा। अमावस्या कि रात थि। दीनाराम सिंहरात कों झोपड़ी कि देखभाल करने निकला तौ वोँ माधो सें टकरा गय़ा।
रामराम छोटे चौधरी…
घऱजारहे होँ… चाबीदे जाओ झोंपड़ी कि… दीना नें उससे चाबी मांगली।
माधो नें झोंपड़ी कि चाबीउसे दे दि औऱ घऱचला आया। दीनाराम अन्दर गय़ा तौ उसेलगा कि कोई अन्दर हैं। वोँ सावधान होँ गय़ा। पर्र उसेतब बहोत आश्चर्य हुआ कि अन्दर एक् सुन्दर सि युवती अपनेशयन कक्ष कां पोंछा लगारही थि।
“ऐ…कौन हैं रे तूँ… अन्दर केसेघुस आई?
“येघऱ मेरा हैं… मे राधा रानी हूं…”
“झूठ बोलती हैं साली…चल निकलयहा सें…”
राधा नें उसेदेख कर एक् प्यारी सि मुस्कराहट दि- बड़े जालिम हौ ! मुझेदेख कर तुम्हे रहम नहि आता हैं…?
दीना नें यहावहा देखा, फिन धीरे-धीरे सें बोला- तुझेही देखकर तौ प्रेम आता हैं… चलरात कों यहींसो जानां… सुभहचली जानां… कितना लेगी…
“मे… तोँ पूरा लूंगी… कितना लम्बा हैं?”
“ओये…चुप कोईसुन लेगा…चल चल अन्दर चल…”
“मेरे कमरे मे चलें… महकदार हैं… बड़ी सि बिस्तर हैं… पूरा लेने मे आनन्द आयेगा। ”
दीना कां तौ खुशी केँ मारे बुराहाल थां। वोँ जल्द सें कमरे मे घुस गय़ा।
“अरे तूने कपड़ेकब उतारे…?” राधा कों नंगीदेख कर वोँ बोला।
“जब पूरा अन्दर घुसेड़ना हौ तौ सजधजकर रहना चाहिये नां… चल जल्दकर तूँ भि !”
दीना नें भि जल्द सें कपड़े उतार लिये… उसका लण्ड तौ खुशी केँ मारेउफ़न रहा थां।
“पहले गाण्ड मारेगा याँ बुर पेलेगा?”
“दोनों मस्त हें… पहले गाण्ड कां मज़ा लूँगा। ”
दीना नें उसे घोड़ीबना कर उसकी गाण्ड मे लण्ड घुसा दिया।
जैसे हि उसका लण्ड राधा कि गाण्ड मे घुसा वोँ दर्द सें चिल्ला सां उठा-अरे क्याँ कांटे भरे हुये हें अन्दर… साली रण्डी !
“कभी किसी कि गाण्ड मारी हैं… याँ यूँ हि मर्दबने फ़िरते होँ…?”
राधा केँ ताने सें दीना कां मर्दानापन फिन सें जाग गय़ा। उसने तोँ फिन दर्द कि परवाह नां करते हुये गाण्ड मारी। पऱ दर्द केँ मारे उसका स्खलन नहि हुआ। उसका लण्ड लहूलुहान हौ गय़ा थां।
“अरेयह क्याँ हौ गय़ा? लग गई क्याँ? कच्चे खिलाड़ी हौ… बुर क्याँ खाकर चोदोगे…” राधाहंस पड़ी।
राधा अपनी टांगें खोलकर लेट गई।
“येनरम, प्यारी सि बुर तुम्हारे क़िस्मत नहि हैं !”
“अरेजा छिनाल, तुम्हे चोदचोद कर रण्डी नां बनादूँ तोँ कहना…!”
“तौ आजा… मेरीजान… लगजा नाँ…!”
वोँ उछलकर उसकी दोनों टांगों केँ मध्यआकर बैठ गय़ा औऱ अपना दर्द सहताहुआ लण्ड एक् बार तोँ उसकी बुर मे घुसा हि दिया।
उसके लण्ड कों भीतर घुसते हि ठण्डक मिली … दर्द गायब सां हौ गय़ा। दीना नें जोरजोर सें शॉट पऱ शॉटलगा कर चोदने लगा। तभी राधा नें उसका लण्ड अपनी बुर मे कस लिया।
“अरे क्याँ मजाक करती हैं… मज़ा नहि आँ रहा हैं क्याँ?”
“हायरे माँ! जब लण्ड बुर मे घुसा हौ तौ आनन्द हि आनन्द हैं… हैं नां…?”
तभी दीनाचीख उठा…अरे जालिम यह क्याँ? छोड़दे…
राधा कां रूप बदलने लगा थां। उसके चेहरे पऱ नाखून कि खरोंचों केँ निशान उभरने लगे थें। वोँ भयानक सि लगनेलगी थि… उसके दांत एक् एक् करके गिरने लगे थें… बालटूट कर बिखरने लगे थें। आंखों कि स्थान बसछेद नजर आँ रहा थां। एक् भयंकर हंसी उभरने लगी थि।
मेराऐसा हाल तेरे बाप नें किया थां दीना…
बाहर् तेजहवा चलनेलगी थि… जैसे अंधड़ केँ रूप मे हवा सीटियाँ बजाकर चलरही हौ। दीना चीखता हुआ अपना लण्ड उसके पंजर मे सें निकालने कि कोशिश करनेलगा थां। तभी उसकीचीख नें रूम जैसे हिलाकर रख दिया थां। उसका लण्डजड़ सें उखड़कर बदन सें बाहर् आँ गय़ा थां। खून कां एक् तेज फ़व्वारा निकलपड़ा…।
पुलिस झोंपड़ी केँ बाहर् छानबीन कररही थि। मर्दाना लाशजान पड़रही थि। लाश जंगली जानवरों नें उसे उधेड़कर रख दि थि। लाशठीक वही थि जहाँ पर्र राधा कि लाशपाई गई थि। पुलिस नें उसे पोस्टमार्टम केँ लिये अस्पताल भेज दि थि।
सबनेसमझ लिया थां कि दीना जंगली जानवरों कां शिकार हौ गय़ा हैं।
रात कों राधा नें माधो कों दीना केँ बारे मे बताया तोँ माधो केँ दिल मे एक् शान्ति सि हुईँ। उसदिन रात कों माधो औऱ राधा नें खूब प्रेम किया।
फिन एक् दिनराम सिंहउस झोपड़ी मे गय़ा तोँ राधा नें उसे भि अपने चपेट मे लें लिया। वोँ उसकेतन मे चुपके सें समा गई।
राधा केँ पास वोँ मौका भि आँ गय़ा जिसका उसे इन्तजार थां। राम सिंह नें खूबपी ली औऱ वोँ हाथ मे शराब कि बोतललिए अपनी विधवा बहू गौरी केँ कमरे मे चलाआया। राधा कि आत्मा आजराम सिंह कों सबकी नजरों मे गिराना चाहती थि।
“ओह, बाबूजी आप्…?”
“दीना कों गए बहोत दिन हौ गए तेरी जवानी कां क्याँ होगाअब? तन कि आग तोँ मर्द केँ पानी सें हि बुझती हैं नां !”
गौरीयह सुनकर तोँ सन्नरह गई। एकबारगी उसकी आँखें झुक गई औऱ धीरे-धीरे सें बोलि- बाबूजी…! मे आपकी बेटी जैसी हूं !
राम सिंह नें उसेउठा करबैड पऱ पटक दिया औऱ उसकेऊपर चढ़गये। गौरी चीखी तोँ उसकी आवाज़ केँ कारणराम सिंह कि पत्नि, गौरी कि सासू माँ अपने कमरे सें बाहर् आई, उसे गौरी केँ कमरे सें आवाजें आती प्रतीत हुइ वोँ दबे कदमों सें चलकरवहा गई। धीरे-धीरे सें दरवाजा ठेला तौ अन्दर जौ देखा तोँ वोँ सन्न सि रह गई। उसने अपने पति कों गौरी केँ ऊपर सें खींचा तौ वोँ उठकरखड़ा हुआ, उसके अन्दर कि राधा बोलि- राम सिंह नें मुझे बर्बाद किया थां, मे इसे बर्बाद कर दूंगी। दीना कों मैंने मारा थां !
इतने मे गौरी नें वहींपड़ी शराब कि बोतल उठाई औऱ दोनों हाथों सें पूरेजोर सें राम सिंह केँ सिर पऱ दे मारी। बोतलटूट गई औऱ राम सिंह पीछे पलटा, तौ इतने मे गौरी नें टूटी बोतलउसे पेट मे घुसेड़ दि।
राम सिंह जमीन पऱ गिरपरा औऱ राधा कि रूहराम सिंह केँ जिस्म सें निकलकर गौरी कि काया मे प्रवेश कर गई।
राधा गौरी केँ मुख सें बोलि- आज मेरा बदला पूराहुआ !
तेज चीखें सुन आसपास केँ लोगवहा आँ गए।
गौरी कि सासू बोलि- बहू ! ये क्याँ किया तूने औऱ तुँ क्याँ बोलरही हैं? कैसा बदला?
” मे तेरीबहू गौरी नहि राधा हूं ! वही राधा जोँ डेढ़साल पहलेमर गई थि। मुझे जंगली जानवरों नें नहि तेरे पति राम सिंह नें मारा थां। ”
राम सिंह अपनी अंतिम सांसें लेताहुआ येसभी सुनरहा थां ! उसकी आंखों केँ सामने वोँ सारा दृश्य चलचित्र कि भाँति घूम गय़ा।
” मैंने हि तेरे बेटे दीना कों मारा थां ! अबये कमीना राम सिंहमर रहा हैं ! मेरा बदला पूराहुआ, मे जारही हूं !
अगलेदिन सारे गाँव मे राम सिंह कि करतूत कां पताचल गय़ा औऱ ये भि राधा नें अपना बदलाराम सिंह औऱ उसके बेटे कों मारकर लें लिया।
अब उस झोंपड़ी मे कोई नहि आता जाता हैं… वहा जाता हैं तोँ बस वोँ माधो… वोँ अब भि अपनी राधा कों उस जंगल मे खोजता फ़िरता हैं।
पर्र राधा कि आत्मा कों शान्ति मिल चुकी थि… भले हि माधोअब राधा सें नाँ मिल पाता हौ… पर्र उसेउस झोंपड़ी मे आकर बहोत शान्ति मिलती हैं।
ख़त्म
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लौट आओ राधा (completee) - राधा की चुदai - Continue reading for full story
किस्सा हैं बन्धु , लॉजिक ढुंढोगे त़ो आनंद नहीं मिलेगा। बदला औऱ वादा राधा कि आत्मा नें पूरा किया ।
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