विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
शहर कि पहली रात—पारदर्शी समर्पण
जगह:शहर कां एक् निजी होटलरूम
वक़्त: रात १०:३०बजे
शहर कां पहलादिन किसी ड्रीम्स जैसा बीता थां। भीड़-भाड़ वाले बाज़ारों औऱ शहर कि चकाचौंध केँ बीच अदिति कां मन एक् अनजानी आज़ादी सें झूमरहा थां। रात कां खानां खाने केँ बाद, दोनों अपने कमरे मे लौटे। अदिति केँ मन मे अबकोई नाटक नहि थां, उसने फैसला कर लिया थां कि आज कि रात वो अपनी 'शुभी' कि पवित्रता औऱ स्त्रीत्व कां सारारस हर्ष केँ नामकर देगी।
अदिति नें बहोत हि मासूमियत सें हर्ष सें कहा, "हर्ष, बहोत दिनों सें मन थां शहर कि कुल्फी याँ आइसक्रीम खाने कां। क्याँ तुम् नीचे सें मेरेलिए ला दोगे?"
हर्ष, जौ अदिति कि हर छोटी खुशी कों पूरा करने केँ लिए बेताब रहता थां, मुस्कुराकर जल्दी नीचेचला गय़ा। उसके जाते हि अदिति नें कमरे कां दरवाजा अंदर सें बंद किया औऱ अपनी तैयारी शुरुआत कि। उसनेबैग सें वो पारदर्शी सफ़ेद गाउन निकाला जिसे उसने औऱ नव्या नें इसीदिन केँ लिए ख़रीदा थां।
जब उसने अपनी साड़ी उतारी औऱ उस झीने सें गाउन कों अपने जिस्म पऱ डाला, तौ वो स्वयं केँ हि रूप पर्र दंगरह गई। वो गाउन इतना पारदर्शी थां कि उसके भीतर अदिति कि दूधिया देह, सुडौल बोबे औऱ सुराहीदार कमरसाफ़ झलकरही थि। वो पूरीतरह नग्न थि, उस गाउन केँ नीचे नं कोई परदा थां औऱ नं हि कोई संकोच।
कुछदेर बाद कमरे केँ दरवाजे पर्र दस्तक हुइ। हर्ष आइसक्रीम कां प्याला लिए अंदरआया। जैसे हि उसकीनज़र सामने खड़ी अदिति पर्र पड़ी, उसकेकदम वहींथम गए। उसकेहाथ सें आइसक्रीम कां प्याला छूटते-छूटते बचा।
सामने उसकी 'शुभी'खड़ी थि, पर्र आज वो कोई मर्यादित बहू नहि, बल्कि साक्षात् रति कि प्रतिमा लगरही थि। उस पारदर्शी कपड़े केँ पीछे सें उसकी गुलाबी निप्पल औऱ जांघों केँ बीच कां वो कालातिल हर्ष केँ संयम कि परीक्षा लें रहे थें।
हर्ष: (हकलाते हुए)"शु। शुभी!यह। तुम्."
अदिति नें बिनाकुछ बोले हर्ष केँ लगभगकदम बढ़ाए। उसकी आँखों मे वो प्रेम थां जिसने 'हवस' कों भि 'इबादत' बना दिया थां। उसने हर्ष केँ हाथ सें आइसक्रीम ली औऱ मेज पर्र रख दि, फिन उसके मजबूत हाथों कों थामकर अपनेउस नग्न जिस्म पर्र रख लिया।
अदिति: (गहरी औऱ कांपती आवाज़ मे) "हर्ष, हवेली मे मे सिर्फ़ एक् 'बहू' थि, पऱ यहा, इस कमरे मे मे सिर्फ़ तुम्हारी 'शुभी' हूं। आजइस पारदर्शी परदे केँ पीछेकुछ भि छुपाहुआ नहि हैं। नं मेरामन, औऱ न् मेरायह जिस्म। तुमने मुझे प्रेम दिया, सम्मान दिया.आज मे तुम्हें वोँ सभी देना चाहती हूं जौ मेरा अपना हैं। "
हर्ष नें जब अदिति केँ उस मखमली औऱ गरम जिस्म कों छुआ, तौ उसकी रगों मे दौड़ता खून जैसे उबलने लगा। उसने अदिति कि कमर केँ उस पतले हिस्से कों अपनी बाहों मे भर लिया।
हर्ष: "शुभी, तुम् इतनी हसीन होँ कि मुझेडर लगरहा हैं कहींयह कोई ख़्वाब नं होँ। मैंने सिर्फ़ तुम्हारे मन सें प्रेम किया थां, पऱ आज तुम्हारा यहरूप। मुझे पागलकर रहा हैं। "
अदिति नें हर्ष केँ गले मे अपनी बाहें डालदीं औऱ उसके होंठों केँ लगभग फुसफुसाई— "तोँ पागल होँ जाओ हर्ष.आज कि रात औऱ यहचार दिन सिर्फ़ हमारे हें। कोई मर्यादा नहि, कोईखौफ नहि। "
उस पहलीरात, शहर केँ उस कमरे मे, 'शुभी' कां वो पारदर्शी गाउन ज़मीन पऱ गिर गय़ा औऱ दो रूहें पहलीबार एक्-दूसरे केँ जिस्मानी सच सें रूबरू हुईं।
हर्ष कि आँखों मे एक् शरारत भरीचमक आँ गई। उसनेमेज पऱ रखे आइसक्रीम केँ प्याले कों उठाया औऱ अदिति कि नग्नदेह कों सिर सें पेर तक निहारा। अदिति केँ बदन पर्र उस पारदर्शी गाउन केँ नीचे छिपी उत्तेजना साफ़झलक रही थि।
हर्ष: (भारी आवाज़ मे) "शुभी, तुमने आइसक्रीम माँगी थि। पर्र अबइसे तुम् नहि, मे खाऊंगा। औऱ मेरा अंदाज़ थोड़ाअलग होगा। "
हर्ष नें चम्मच सें ठंडी वनीला आइसक्रीम निकाली औऱ उसे सबसे पहले अदिति केँ गले कि सुराहीदार ढलान पर्र रख दिया। ठंडी बर्फ जैसे हि उसकीगरम त्वचा सें टकराई, अदिति केँ मुंह सें एक् तीखी सिसकी निकली। हर्ष नें अपनी जुबान सें उस पिघलती हुइ धार कों चाटना शुरुआत किया।
अदिति: "उफ़्फ़। हर्ष। बहोत ठंडा हैं। आअह्ह!"
हर्ष रुका नहि। उसने अगली चम्मच अदिति केँ दाएं बोबे केँ गुलाबी निप्पल पर्र रख दि। आइसक्रीम आरामसे पिघलकर नीचे कि ओर ढुलकने लगी। हर्ष नें अपने होठों सें उस पूरे उभार कों घेर लिया औऱ ठंडी आइसक्रीम केँ संग-संग अदिति कि गर्माहट कों अपनी जुबान पर्र समेटने लगा। अदिति नें हर्ष केँ बालों कों अपनी उंगलियों मे कसकरजकड़ लिया।
एक् केँ बाद एक्, हर्ष नें आइसक्रीम केँ गोलों कों अदिति केँ पेट कि नाभि पर्र रखा औऱ फिनउसे अपनी जुबान केँ घेरों सें साफ करनेलगा। वो जितनी देर तक चाटता, अदिति कि सिसकियाँ उतनी हि गहरी होती जातीं।
हर्ष: "अभि तौ असली स्वाद बाकी हैं शुभी."
अंत मे, हर्ष नें बची हुइ सारी आइसक्रीम अदिति कि दोनों जांघों केँ संगम पर्र, उस गुलाबी कली केँ मुहाने पर्र लगा दि। अदिति कां पूरा शरीर थरथरा उठा। ठंडी आइसक्रीम औऱ हर्ष कि गरम जुबान कां वो संगम अदिति केँ लिए असहनीय सुखबन गय़ा। हर्ष करीब-करीब आधे घंटे तक अदिति केँ शरीर केँ एक्-एक् हिस्से सें उस मिठास कों चाटता रहा।
अदिति अब पूरीतरह सें पिघल चुकी थि। उसका शरीर पसीने औऱ आइसक्रीम कि गंध सें सराबोर थां। वो पलंग पर्र ढह गई औऱ हर्ष कों अपनेऊपर खींच लिया।
अदिति: "हर्ष.अब औऱ इंतज़ार नहि होता। मुझे पूरीतरह अपनाबना लो."
उसरात शहर केँ उस कमरे मे, आइसक्रीम कि मिठास औऱ दो जिस्मों कि तड़प नें एक् ऐसी इबादत शुरुआत कि, जिसकी गूँज अगलेचार दिनों तक सुनाई देने वाली थि।
अदिति कि आँखों मे अब एक् शरारती चमक आँ गई थि। उसने देखा कि हर्ष उसके शरीर कों अपनी जुबान सें पूज चुका थां, औऱ अब बारी उसकी थि। उसने प्याले मे बची हुई थोड़ी सि आइसक्रीम कों अपनी उंगलियों पऱ लिया औऱ बड़े प्रेम सें हर्ष कि आँखों मे झाँका।
उसने हर्ष कों बैड पर्र चित लेटने कां इशारा किया। हर्ष, जोँ अब तक मात्र देने वाला थां, आज पूरीतरह अपनी 'शुभी' केँ समर्पण मे बंध गय़ा। अदिति नें धीरे-धीरे सें हर्ष केँ कठोर औऱ उत्तेजित मूसल कों अपने हाथों मे लिया। वो अंगइस वक़्त किसी तपतेहुए लोहे कि तरह गर्म औऱ फौलादी थां।
अदिति नें उस कठोर मूसल केँ अग्रभाग (सुपाड़े) पर्र ठंडी आइसक्रीम कि एक् मोटीपरत लगा दि। हर्ष केँ मुँह सें एक् गहरी कराह निकली।
हर्ष: "शुभी.अहह! यह क्याँ कररही हौ?"
अदिति नें कोई जवाब नहि दिया। उसने अपनी गुलाबी जुबान निकाली औऱ उस कठोरअंग पऱ जमी हुईँ सफ़ेद आइसक्रीम कों आरामसे चाटना शुरुआत किया। ठंडी बर्फ औऱ हर्ष केँ उसअंग कि भीषण गर्मी नें एक् ऐसा अहसास पैदा किया कि हर्ष केँ हाथ चादरों कों भींचने लगे।
अदिति कां प्रेम:
अदिति नें मात्र चाटा हि नहि, उसनेउस पूरी लंबाई पऱ आइसक्रीम कां लेप लगाया औऱ उसे अपनी जुबान केँ नीचे सें ऊपर तक केँ झटकों सें साफ़ करनेलगी। उसने हर्ष केँ अंडकोषों पर्र भि आइसक्रीम कि कुछ बूंदें गिराईं औऱ उन्हें अपनी हथेलियों सें सहलाते हुएसाफ़ किया।
हर्ष: (सिसकते हुए) "शुभी। तुम् तौ जान निकाल दोगी मेरी। इतनासुख मैंने कभी सोचा भि नहि थां। "
अदिति नें उस कठोरअंग कों अपने मुँह केँ भीतर लेँ लिया। अब आइसक्रीम पूरीतरह पिघल चुकी थि औऱ उसकी स्थान अदिति कि थूक औऱ हर्ष कि उत्तेजना कि खुशबू नें लें ली थि। अदिति नें करीब१५ मिनट तक उसअंग केँ संगऐसा खेल खेला कि हर्ष कां पूरा शरीर पसीने सें भीग गय़ा औऱ वो चरम सीमा केँ लगभग पहुँचने लगा।
अदिति ऊपरउठी, उसके चेहरे पऱ आइसक्रीम औऱ पसीने कि मिली-जुली चमक थि। उसने हर्ष केँ सीने पऱ अपनासिर टिका दिया।
अदिति: "हर्ष, हवेली मे यहसभी मात्र हवस केँ लिए होता हैं, पऱ यहा.यहा मे तुम्हारे वजूद कों महसूस करना चाहती हूं। यह आइसक्रीम तौ बस बहाने थि, मुझे तौ तुम्हें अपनी आत्मा मे उतारना हैं। "
उसरात, शहर केँ उस कमरे मे 'शुभी' नें हर्ष कों दिखा दिया कि एक् खामोश रहने वाली महिला जब प्यार मे डूबती हैं, तौ वो कितनी निडर औऱ समर्पित हौ सकती हैं।
हर्ष नें अदिति कि कमर कों अपनी फौलादी बाहों मे जकड़ लिया औऱ उसे अपनेऊपर खींच लिया। दोनों केँ जिस्म पसीने, आइसक्रीम कि गंध औऱ बेपनाह इश्क सें सराबोर थें। कमरे कि मद्धम रोशनी मे अदिति कां वो पारदर्शी गाउनअब कहीं कोने मे पड़ा थां, औऱ उसकी नग्नता हर्ष कि आँखों मे एक् इबादत कि तरहछलक रही थि।
हर्ष: (अदिति कि आँखों मे गहराई सें देखते हुए) "शुभी.अब इस दूरी कों मिटा देनेदो। मे तुम्हारे भीतर मात्र एक् जिस्म बनकर नहि, बल्कि तुम्हारी रूह बनकर उतरना चाहता हूं। "
अदिति: (सिसकते हुए) "उतारलो हर्ष.आज मुझे पूरीतरह सें अपनी जागीर बनालो। हवेली कि उन काली रातों कां हरदाग आज तुम्हारे इस प्रेम सें धो देना चाहती हूं। "
हर्ष नें बहोत हि आहिस्ता सें अदिति कि जाँघों कों फैलाया औऱ अपनेउस तपतेहुए कठोरअंग कों उसकी कोमलदेह केँ मुहाने पऱ टिका दिया। जैसे हि उन दोनों केँ अंगों कां स्पर्श हुआ, एक् सिहरन दोनों केँ वजूद कों हिला गई। हर्ष नें एक् इंच भि अंदर जाने कि जल्द नहि कि; वो उस घर्षण केँ मजा कों लंबा खींचना चाहता थां।
हर्ष: "बताओ शुभी। क्याँ तुम् सजधजकर हौ? इस मिलन केँ बाद हम् कभी पहले जैसे नहि रहेंगे। "
अदिति: (हर्ष केँ होंठों कों चूमते हुए) "मे तोँ उसीदिन तुम्हारी हौ गई थि जब तुमने मुझे 'शुभी'कहा थां। अब रोकोमत। मुझे अपनालो। "
हर्ष नें एक् गहरा औऱ धीमा धक्का लगाया। अदिति केँ मुँह सें एक् ऐसी कराह निकली जिसमें दर्दकम औऱ परमसुख अधिक थां। वो अंग उसकीतंग गहराइयों कों चीरता हुआ धीरे धीरे अंदर समाने लगा। हर्ष नें हर एक् मिलीमीटर कां अहसास किया।
संवादों कां घमासान:
अदिति: "उफ्फ। हर्ष! तुम्। तुम् बहोत बड़े हौ। मुझेलग रहा हैं जैसे मेरा पूरा वजूद तुमसे भर गय़ा हैं। कितना चैन हैं इस दबाव मे। "
हर्ष: (अदिति केँ कानों मे फुसफुसाते हुए)"यह दबाव नहि हैं शुभी, यह मेरा समर्पण हैं। देखो, केसे मेरी धड़कनें तुम्हारे भीतरधड़क रही हें। "
हर्ष नें अब अपनीलय बढ़ानी शुरुआत कि, मगरजोश केँ बावजूद उसने धीमापन नहि छोड़ा। वो हर धक्के केँ संग अदिति केँ चेहरे केँ बदलते भावों कों पढ़रहा थां। अदिति कि आँखें बंदथीं औऱ उसकेहाथ हर्ष कि पीठ पऱ अपने नाखूनों केँ निशान छोड़रहे थें।
अदिति: "हर्ष। औऱ गहराई सें। मुझे महसूस कराओ कि मे ज़िंदा हूं। उस हवेली केँ मुर्दा सन्नाटे सें दूर। मुझे अपनी बाहों मे कुचलदो। "
हर्ष: "तुम्हें कभीकोई आंच नहि आने दूंगा शुभी। तुम् मेरी शांति होँ, मेरी प्रेरणा होँ। "
जैसे-जैसे रात परवान चढ़ी, रूम उनकी सिसकियों औऱ जिस्मों केँ टकराने कि आवाज़ सें गूँजउठा। वो चुदाई कोईहवस कां खेल नहि, बल्कि दो प्यासी रूहों कां महा-मिलन थां। हर्ष कां हरवार अदिति केँ दिल कि गहराइयों तक पहुँच रहा थां, औऱ अदिति कां हर संकुचन हर्ष कों अपनी दुनिया भुला देने पऱ मजबूर कररहा थां।
हवा मे उमस औऱ बढ़ गई थि, औऱ कमरे कां कोना-कोना उन दोनों कि भारी साँसों सें गूँजरहा थां। आहिस्ता-आहिस्ता शुरुआत हुआये सफ़रअब एक् ऐसे तूफ़ान मे तब्दील होँ चुका थां जहाँ 'मर्यादा' कां नामोनिशान मिट चुका थां। हर्ष, जोँ अब तक संयम बरतेहुए थां, अदिति कि उन मदहोश सिसकियों औऱ उसके शरीर कि पकड़ कों महसूस कर पूरीतरह बेकाबू हौ गय़ा।
हर्ष: (हाँफते हुए, दांत पीसकर) "शुभी.अब। अब मे स्वयं कों रोक नहि पारहा। तुम्। तुम् मुझे पागलकर रही होँ!"
अदिति नें अपनी जाँघें हर्ष कि कमर पर्र औऱ भि कसलीं, जैसे वो उसकीहर हरकत कों अपने भीतर औऱ गहराई सें महसूस करना चाहती हौ।
अदिति: "पागल हौ जाओ हर्ष! मुझेतोड़ दो। मुझेइस कदर अपने भीतर समेटलो कि मे मर-मर जाऊं.आज छोड़ना मत!"
हर्ष कां जोशअब सातवें आसमान पऱ थां। उसने अदिति केँ दोनों हाथों कों उसकेसिर केँ ऊपरखाट पऱ दबा दिया औऱ अपनी पूरी ताकतउस एक् केंद्र पऱ झोंक दि। अब वो 'धीमापन' गायब थां; उसकी स्थान ली थि एक् अंधाधुंध औऱ शक्तिशाली प्रहार नें। कमरे मे जिस्मों केँ टकराने कि आवाज़ें अब किसी युद्ध कि तरह गूँजरही थीं।
अदिति कां पूरा जिस्म धनुष कि तरहतन गय़ा थां। उसके मुँह सें निकलने वाली आवाज़ें अब सिसकियाँ नहि, बल्कि बेबसी औऱ परमसुख कि चीखें थीं।
अदिति: "आह्ह्ह! हर्ष.हाँ! वही। वहीं!मर गई। उफ़्फ़। मेरा वजूदफटा जारहा हैं!"
तभी वो क्षणआया जब हर्ष कां धैर्य पूरीतरह जवाबदे गय़ा। उसका जिस्म काँपने लगा, नसेंतन गईं औऱ उसकी आँखों केँ सामने जैसे बिजलियाँ कौंधगईं। एक् भयानक विस्फोट कि तरह, हर्ष केँ भीतर सें वो तपताहुआ लावा निकला औऱ अदिति कि गहराइयों मे समाता चला गय़ा।
वो स्खलन इतना जोरदार थां कि हर्ष कां पूराबदन अदिति केँ ऊपरढह गय़ा। अदिति कों महसूस हुआ जैसे उसके भीतरकोई ज्वालामुखी फटपड़ा हौ, जिसकी तपन उसकी आत्मा तक कों झुलसा रही थि।
हर्ष: (बेहोशी कि हालत मे फुसफुसाते हुए) "शुभी। तुम्। तुमने मुझे खालीकर दिया."
अदिति नें हर्ष कों अपने सीने सें लगा लिया। वो हाँफरही थि, उसकी आँखों सें ख़ुशी केँ आंसूबह रहे थें। उसेलगा कि उस 'लावे' नें उसके भीतर कि बरसों कि कड़वाहट औऱ ससुरजी कि दरिंदगी केँ खौफ कों हमेशा केँ लिए जलाकर राखकर दिया हैं।
वो रातशहर केँ उस कमरे मे एक् गवाह थि—कि प्यार जब अपनेचरम पर्र होता हैं, तौ वो किसी विस्फोट सें कम नहि होता।
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
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