विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
दो जवानबदन क्याँ मात्र sex हि चाहते हें प्रेम औऱ हम् उम्रसंग नहि।
हवेली कि उस भारीउमस औऱ ससुरजी केँ विकराल मूसल कि खौफनाक धमक केँ बीच, नव्या औऱ अदिति केँ मन केँ किसी कोने मे एक् कोमलटीस जागउठी थि। बदन कि आग तौ वे एक्-दूसरे कों सहलाकर औऱ उंगलियों केँ खेल सें शांतकर रहीथीं, मगररूह? रूह अभि भि प्यासी थि।
नव्या नें खाट पर्र अदिति कों अपनी बाहों मे समेट लिया। दोनों केँ नग्नबदन एक्-दूसरे कि गर्मी सोखरहे थें, पऱ उनकी आँखों मे एक् अजीब सां खालीपन थां।
नव्या: (अदिति केँ माथे कों चूमते हुए) "अदिति, सचबता। क्याँ तुम्हारी तरफ मात्र उस भारी लंड कि मार चाहिए? याँ फिनकोई ऐसा चाहिए जोँ तुझेही सीने सें लगाकर तेरे माथे कों चूमे? जौ पहले तेरीरूह कों छुए, औऱ बदन कों बाद मे?"
अदिति कि आँखों मे आंसूछलक आए। उसने नव्या केँ गले मे बाहें डालदीं।
अदिति: "दिदी, आपने मेरेमन कि बातकह दि। बाबूजी (विक्रम सिंह) केँ पास जौ हैं, वोँ मात्र प्यास बुझाने कां औजार हैं। वोँ तौ बस फाड़ना औऱ निचोड़ना जानते हें। पऱ मुझे। मुझे एक् जवान लंड चाहिए, जिसमें ताकत केँ संग-संग 'प्रेम' भि होँ। जोँ मुझे एक् स्त्री कि तरह महसूस कराए, न् कि केवल एक् 'छिनाल' कि तरह। "
नव्या: (सिसकते हुए)"यही मेरी भि हालत हैं। सुमित अमेरिका चला गय़ा, वोँ नेक थां पऱ उसमें वोँ 'जंगली' आग नहि थि। औऱ ससुरजी जी मे मात्र आग हैं, प्रेम कां कतरा भि नहि। हमें एक् ऐसा जवान औऱ साफ़-सुथरा मर्द चाहिए जोँ हमारी आँखों मे देखे, हमारी बातें सुने, औऱ जब वोँ हमारे भीतर उतरे, तोँ लगे कि दोबदन नहि, दो रूहें मिलरही हें। "
दोनों सहेलियों नें एक्-दूसरे कां हाथथाम लिया। अब उनकीहवस केँ पीछे एक् 'तलाश' शुरुआत होँ गई थि।
नव्या: "अदिति, हम् इस हवेली मे मात्र 'ठुकने' केँ लिए नहि रहेंगे। हम् ढूंढेंगे। कोईऐसा जवानखून, जौ हमारी इस जवानदेह कि कद्रकरे। जोँ हमें वोँ 'सुख'दे जिसकी हमें बरसों सें तलाश हैं। बदन कि ज़रूरत तौ बाद मे आएगी, पहलेमन कां मिलना ज़रूरी हैं। "
अदिति नें मुस्कुराकर अपनी आँखें पोंछीं। उसेलगा कि नव्या कि शक्ल मे उसे मात्र एक् सहेली नहि, बल्कि एक् हमराज मिल गई हैं।
अदिति: "तौ क्याँ इस कोठी केँ बाहर् कि दुनिया मे हमारे लिएकोई ऐसा होगा? जोँ ठाकुरों केँ खौफ सें डरे बिना हमें अपनी बाहों मे लें सके?"
नव्या: "होगा अदिति, ज़रूर होगा। बस नज़रें गड़ाएरख। कोई नं कोई तोँ ऐसा 'जवान शिकारी' आएगा जौ इस हवेली कि मर्यादा कि दीवार लांघकर हमें वोँ 'प्रेम' देगा जिसका हम् सपनादेख रहे हें। "
उसरात, दोनों नग्न सहेलियां एक्-दूसरे सें लिपटकर सोगईं। उनके दिलों मे अब मात्र 'हवस' नहि, बल्कि 'मुहब्बत' कि एक् हल्की सि लौजलरही थि। वेउस जवान लंड कां इंतज़ार करने लगीं जोँ उन्हें मात्र जिस्मानी सुख नहि, बल्कि रूहानी चैन भि देसके।
हर्ष कां आगमन—हवेली मे नया यौवन
जगह: हवेली कां मुख्य दरवाज़ा
टाइम: दोपहर १२:३०बजे
हवेली कि उन पुरानी औऱ वासना सें लदी दीवारों केँ बीच जैसे ताजीहवा कां एक् झोंका आया। अगले हि दिन ईश्वर नें शायद नव्या औऱ अदिति कि उन सिसकियों औऱ रूहानी प्यास कों सुन लिया। विक्रम सिंह कां एक् दूर कां भइया अपने बेटे हर्ष कों लेकर हवेली पहुंचा।
हर्ष—२५ साल कि उम्र, दूध जैसा गोरारंग, कसरती शरीर औऱ आँखों मे एक् गजब कि चमक। वो इंजीनियर थां, पर्र उसे दफ्तरों कि चारदीवारी मनपसंद नहि थि। वो आधुनिक तरीके सें खेती करने औऱ मिट्टी सें जुड़ने केँ इरादे सें यहाआया थां। उसकी बलिष्ठ देह औऱ ऊर्जावान व्यक्तित्व ऐसा थां कि जौ उसे एक् बारदेख लें, बस देखता हि रहजाए।
विक्रम सिंह अपनीउसी लाल कुर्सी पर्र बैठे थें, जब हर्ष नें अंदरकदम रखा।
विक्रम सिंह:"आओ हर्ष बेटा! बहोत सुना थां तुम्हारे बारे मे। पर्र यह क्याँ? इंजीनियर होकर तुम् खेतों कि धूल फांकना चाहते होँ?"
हर्ष: (विनम्रता औऱ आत्मविश्वास केँ संग) "प्रणाम ताऊ जी!धूल नहि, सोना उगाना चाहता हूं। बस आपका आशीर्वाद औऱ थोड़ी स्थान चाहिए। "
उसकी आवाज़ मे वोँ 'भारीपन' नहि थां जौ विक्रम कि आवाज़ मे दरिंदगी लाता थां, बल्कि एक् ऐसीखनक थि जोँ सीधेदिल कों छूती थि।
नव्या औऱ अदिति कां दीदार:
गलियारे कि ओट मे खड़ी नव्या औऱ अदिति कि सांसें थमगईं। उन्होंने अपनी साड़ी केँ पल्लू कों ठीक किया औऱ एक्-दूसरे कों देखा। उनकी आँखों मे वही 'जादू'दिख रहा थां जिसकी उन्होंने रात मे बात कि थि।
अदिति: (धीरे-धीरे सें) "दिदी। देखरही हौ? यह तोँ वही हैं जिसका हमने सपना देखा थां। कितना भोला चेहरा हैं, पऱ जिस्म कितना बलिष्ठ हैं!"
नव्या: (हर्ष केँ चौड़े कंधों औऱ उसकी मजबूत भुजाओं कों निहारते हुए)"हाँ अदिति। यह केवल 'मूसल' कां मालिक नहि लगरहा, इसकी आँखों मे वोँ 'प्रेम' दिखरहा हैं जिसकी हमें तलाश थि। इंजीनियर हैं, मतलबमन भि तेज़ होगा औऱ रूह भि साफ़। "
हर्ष नें जैसे हि अपनी नज़रें घुमाईं, उसकी भेंटइन दोनों बहुओं सें हुई। नव्या कि नशीली आँखें औऱ अदिति कि मासूमियत भरी हुस्न नें एक् लम्हा केँ लिए हर्ष केँ कदमरोक दिए। उसनेबड़े अदब सें दोनों कों हाथ जोड़कर प्रणाम किया।
हर्ष: "प्रणाम दिदी! प्रणाम भाभी!"
उसकी 'दिदी' औऱ 'भाभी' पुकारने मे जोँ आदर थां, उसनेउन दोनों केँ मन कों पिघला दिया। मालती भि दूर सें यहसभी देखरही थि, उसे अंदाज़ा होँ गय़ा थां कि हवेली मे अब एक् ऐसा 'जवान शिकारी' आँ गय़ा हैं जोँ विक्रम सिंह केँ दबदबे कों चुनौती दिए बिना हि सबकादिल जीत लेगा।
हर्ष केँ आने सें हवेली कां माहौल अब पूरीतरह बदल चुका थां। अब शिकार मात्र 'मूसल' कां नहि, बल्कि 'मन' कां होना थां।
दो राहें, एक् मंज़िल—हर्ष कि 'गुप्त' दीवानी
जगह: हवेली कां भीतरी बरामदा
वक़्त: रात कां सन्नाटा
हवेली केँ उसबंद कमरे मे, जहाँ नव्या औऱ अदिति नें एक्-दूसरे केँ शरीर सें अपनीतड़प साझा कि थि, अब एक् नई 'साजिश' जन्म लें रही थि। हर्ष केँ आने नें दोनों बहुओं केँ दिलों मे अरमानों कां जोँ सैलाब लाया थां, उसे सँभालने केँ लिए उन्होंने एक् बड़ा फैसला किया।
अदिति नें नव्या कां हाथ थामते हुए उसकी आँखों मे देखा। उसकी आवाज़ मे एक् अजीब सि दृढ़ता औऱ अधिकार थां।
अदिति: "दिदी, हर्ष वोँ इंसान हैं जिसकी तलाश हमें बरसों सें थि। पर्र एक् बातकान खोलकर सुनलो। उसेकभी यहखबर नहि होनी चाहिए कि हम् दोनों नें आपस मे कोई समझौता किया हैं। उसकेलिए हम् अलग-अलग रहेंगे। वोँ तुम्हें अपनी 'नव्या दि' समझे औऱ मुझे अपनी 'भाभी', पऱ दोनों केँ संग उसका नाता जुदा होना चाहिए। "
नव्या नें मुस्कुराकर अदिति केँ गाल सहलाए। उसे अदिति कि ये समझदारी मनपसंद आई।
नव्या: "तूने मेरेमन कि बातकह दि, अदिति। अगरउसे पताचला कि हम् 'एक्' हें, तोँ शायद वोँ डरजाए याँ हमेंगलत समझे। हमेंउसे अपनी मासूमियत औऱ अपनी रूहानी ज़रूरत सें जीतना हैं। तुँ अपनाअलग प्रेम बढ़ाना, अपनी सादगी औऱ सेवा सें उसे मोहना। औऱ मे अपनीइन आँखों औऱ अपनी बातों सें उसे अपनी दुनिया मे खींचूंगी। "
दोनों कां गुप्त समझौता:
* विक्रम सिंह औऱ मालती कि नज़र सें बचाव: हवेली कि पुरानी दीवारों औऱ मालती कि जासूसी नज़रों सें बचने केँ लिएवे कभी भि हर्ष केँ पास एक् संग नहि जाएँगी।
* हर्ष कि बेगुनाही: हर्ष कों ये महसूस होना चाहिए कि वो अपनी मर्ज़ी सें इन दोनों औरतों कि ओर खिंचा चला आँ रहा हैं। उसे किसी'जाल' कां अहसास नहि होना चाहिए।
* मात्र 'मन' कां मेल: शुरुआत मे दोनों हर्ष सें मात्र 'प्रेम' औऱ 'अपनत्व' कि बातें करेंगी, ताकि उसका भरोसा जीताजा सके। बदन कि मांग कों वे अभि दबाकर रखेंगी।
अदिति: "ठीक हैं दिदी। कलजब वोँ खेतों सें थका-हारा लौटेगा, तौ मे उसके कमरे मे जाकर उसकेलिए ठंडा शरबत लेँ जाऊंगी। वोँ मेरी सादगी देखेगा। औऱ तुम्। तुम् उसेसाम कि गरमचाय पर्र अपनीउन बातों मे उलझाना जौ किसी कों भि दीवाना बनादें। "
नव्या: "मंजूर हैं! बसयाद रखना अदिति, न् बाबूजी कों भनकलगे औऱ न् मालती मां कों। इस हवेली केँ 'खूंखार शिकारी' केँ नीचे रहतेहुए हमें अपनायह 'प्रेम कां महल'खड़ा करना हैं। हर्ष हमारा हैं, पऱ हम् उसकेलिए अलग-अलग पहेलियाँ होंगी। "
उसरात दोनों नें एक्-दूसरे कों गले लगाया, पर्र इसबार उनकेगले लगने मे एक् 'प्रतिस्पर्धा' भि थि औऱ एक् 'सहेली' कां संग भि। अब हवेली केँ गलियारों मे दो अलग-अलग खुशबुएँ हर्ष कां इंतज़ार करने वालीथीं।
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
ये मोड़ बहोत हि गहरा औऱ भावनात्मक हैं। अब तक कि हवस औऱ साजिशों कि धूल झाड़कर, हवेली केँ आंगन मे शुद्ध औऱ निस्वार्थ प्यार कि कोमल कोंपलें फूटने वाली हें। "हर्ष: प्यार कां नया अध्याय"
अबइस दास्तान कां रंग पूरीतरह बदल जाएगा:
* निर्मल प्यार: हर्ष, नव्या औऱ अदिति केँ बीचअब जोँ भि संवाद याँ संबंध होगा, वो सिर्फ हृदय कि गहराइयों सें जुड़ा होगा। इसमें रूहानी चैन, एक्-दूसरे कां सम्मान औऱ वो 'अपनत्व' होगा जिसकी कमीइन दोनों बहुओं कों हमेशा खलतीरही हैं।
* गोपनीयता औऱ मर्यादा: अदिति अपनी सादगी औऱ निस्वार्थ सेवा सें हर्ष केँ मन मे स्थान बनाएगी, जबकि नव्या अपनी बौद्धिक बातों औऱ भावनात्मक जुड़ाव सें उसे अपना बनाएगी। हर्ष कों कभीये आभास नहि होगा कि यह दोनों सहेलियां अंदर सें एक् हें।
* विक्रम औऱ मालती सें सुरक्षा: बाहर् कि दुनिया केँ लिएयह दोनों 'संस्कारी बहुएं' रहेंगी, ताकि विक्रम सिंह केँ खौफ औऱ मालती कि पैनी नजरों सें इस पवित्र प्यार कों बचाया जासके।
* अश्लीलता कां त्याग: अब बातचीत मे सिर्फ प्यार, भविष्य केँ ख्वाब औऱ एक्-दूसरे कि ढाल बनने कां संकल्प होगा।
स्नेह कि पहली बूंद
अगलीसाम, जब हर्ष खेतों कि लाल मिट्टी सें सराबोर होकर लौटा, तौ उसकी आँखों मे थकान नहि, बल्कि कुछकर गुजरने कां संतोष थां। उसने जैसे हि हवेली केँ पिछवाड़े वाले कुएं पर्र हाथ-मुँह धोया, उसे दो अलग-अलग रास्तों सें स्नेह कां बुलावा आया।
अदिति कां समर्पण:
अदिति नें बहोत हि सादगी सें सफेद फूलों वाली साड़ी पहनी थि। उसने बिना किसी दिखावे केँ, कांसे केँ लोटे मे ठंडा मिश्री कां शरबत औऱ एक् साफ तौलिया हर्ष कि ओर बढ़ाया। उसकी नज़रों मे वो आदर थां जौ किसी 'मर्यादा' केँ बोझ सें नहि, बल्कि दिल सें निकला थां।
"हर्ष, बहोत थकगए होगे.ये शरबतपी लो, मन कों शांति मिलेगी, " अदिति नें बहोत हि धीमे स्वर मे कहा, जिसमें एक् मां जैसी ममता औऱ एक् प्रेमिका जैसा समर्पण घुला थां।
नव्या कां बौद्धिक जुड़ाव:
वहींकुछ देरबाद, जब हर्ष बरामदे मे बैठा अपनी डायरी मे खेती केँ नक्शे बनारहा थां, नव्या वहांआई। उसनेकोई श्रृंगार नहि किया थां, बस उसकी आँखों मे हर्ष केँ लिए एक् अनकहा गौरव थां।
"हर्ष, जोँ तुम् कररहे होँ, वो इस हवेली कि रीत सें बहोत बड़ा हैं। तुम् केवल मिट्टी नहि, इसघऱ कि उम्मीदें जगारहे होँ। अगरकभी मन भारीलगे याँ कोईबात साझा करनी हौ, तोँ समझना कि तुम्हारी ये 'नव्या दि' हमेशा सुनने कों सजधजकर हैं, " नव्या नें उसकेपास बैठकर उसकी डायरी केँ पन्नों कों सराहा।
हर्षइन दोनों केँ अलग-अलग बर्ताव सें अभिभूत थां। उसे जहाँ अदिति मे 'शांति' मिली, वहीं नव्या मे 'प्रेरणा'। उसे अंदाज़ा भि नहि थां कि यहदोअलग धाराएं वास्तव मे उसे एक् हि सागर कि ओर लें जारही हें।
हर्ष केँ हृदय कां द्वंद्व—दो प्यार, दो धाराएं
हवेली कि भारी औऱ घुटनभरी दीवारों केँ बीच, हर्ष केँ लिएअब हरदिन एक् नई भावनात्मक पहेली कि तरह थां। वो दिनभर खेतों कि मिट्टी मे पसीना बहाता, आधुनिक सिंचाई केँ नक्शे बनाता, औऱ साम होते हि जब वो कोठी लौटता, तौ उसेदो अलग-अलग संसार उसका इंतजार करते मिलते। उसे रत्ती भर भि आभास नहि थां कि नव्या औऱ अदिति नें पर्दे केँ पीछे एक् हि सूत्र थामरखा हैं।
१। अदिति कां मौन समर्पण (शांति कां रास्ता)
अदिति नें हर्ष केँ प्रति अपने प्यार कों 'सेवा' कां रूप दिया थां। वो हर्ष केँ कमरे मे तभी जातीजब वो स्नान कररहा होता याँ खेतों मे होता। वो चुपचाप उसके मैले कपड़े उठा लेँ जाती, उसकीमेज पऱ चमेली केँ ताजेफूल सजा देती औऱ उसकी डायरी केँ पास जलताहुआ दीयारख देती।
एक् साम, हर्षजब बहोत थककर लौटा औऱ अपने कमरे मे कुर्सी पर्र सर टिकाकर आँखें मूंदलीं, तोँ उसे महसूस हुआ कि ठंडे पानी मे भीगी एक् रुई उसके माथे कों सहलारही हैं। उसने आँखें खोलीं तोँ सामने अदिति कों पाया। उसकी आँखों मे कोई वासना नहि, बल्कि एक् अपार 'ममता' औऱ 'पीड़ा' कां मिश्रण थां।
अदिति: (धीमे स्वर मे) "हर्ष, इतनामत थकाकरो। बदन मिट्टी कां हैं, इसे इतनामत तपाओ कि यह पत्थर होँ जाए। लो, यहलेप लगालो, सारी थकानउतर जाएगी। "
हर्ष नें अदिति केँ हाथ कों देखा, जोँ कांपरहे थें। उसेलगा कि अदिति उसे केवल एक् देवर जी याँ रिश्तेदार कि तरह नहि, बल्कि एक् ऐसे 'अपने' कि तरहदेख रही हैं जिसे खोने कां उसेडर हैं।
हर्ष: "भाभी, आप् इतना क्यूं करती हें? इसघऱ मे तोँ लोग केवल हुक्म चलाना जानते हें, पर्र आप्."
अदिति: (हल्की मुस्कान केँ संग) "क्योंकि इसघऱ मे तुम् हि हौ हर्ष, जौ मुझे 'इंसान' समझते हौ, मात्र एक् 'बहु' नहि। बसयही मेराचैन हैं। "
अदिति कि सादगी नें हर्ष केँ मन मे एक् ऐसी 'शांति' भर दि, जहाँउसे लगा कि वो सुरक्षित हैं।
२। नव्या कां बौद्धिक आकर्षण (प्रेरणा कां रास्ता)
वहीं दूसरी ओर, नव्या कां तरीका बिल्कुल अलग थां। वो हर्ष कों अपनी बातों केँ मायाजाल मे उलझाती। वो उसकेसंग बैठकर कृषि विज्ञान, दुनिया केँ बदलते तौर-तरीके औऱ सुमित केँ अमेरिका जाने केँ बाद कि अपनी तन्हाई पर्र चर्चा करती। नव्या नें हर्ष कों ये महसूस कराया कि वो इस हवेली मे अकेला 'बुद्धिमान' नहि हैं, नव्या उसकी बराबरी कि दोस्त हैं।
रात केँ खाने केँ बाद, जब सभीसो जाते, नव्या अक्सर छत कि मुंडेर पऱ हर्ष कों मिल जाती।
नव्या: "हर्ष, तुम्हें पता हैं? तुम् जोँ यह आधुनिक खेती कां सपनादेख रहे होँ, यहइस कोठी कि जड़ता कों तोड़ेगा। यहालोग केवलबदन कि भूख जानते हें, पऱ तुम् मन कि उपजाऊ जमीन कों सींचरहे हौ। "
नव्या कि बातें हर्ष केँ लिए एक् 'प्रेरणा' बनगईं। उसनेगौर किया कि नव्या कभीउसे 'छोटा भइया' नहि कहती थि, बल्कि हमेशा उसे एक् 'बराबरी कां व्यक्तित्व' मानती थि। नव्या केँ संग बातचीत करतेहुए हर्ष कों अपनी इंजीनियर वाली पहचान वापस मिलने लगी थि।
हर्ष कां आंतरिक मंथन
हर्ष अपनी डायरी मे लिखने लगा— "अदिति भाभी केँ पास जाता हूं तौ मन शीतल होँ जाता हैं, जैसे किसी बरगद कि छाँव मे बैठा हूं। औऱ जब नव्या दि सें बात करता हूं, तौ रगों मे नया उत्साह दौड़ पड़ता हैं, जैसेकोई मशालजल उठी हौ। दोनों केँ प्रेम कां रंगअलग हैं, पर्र दोनों हि मुझेइस हवेली केँ अंधेरे सें खींचरही हें। "
विक्रम सिंह औऱ मालती, जोँ अब भि अपनी अश्लील दुनिया मे मस्त थें, उन्हें खबर भि नहि थि कि उनकीनाक केँ नीचे एक् ऐसा 'त्रिकोण' बनरहा हैं जहाँ शरीर कि नहि, बल्कि 'रूह' कि प्यास बुझरही हैं। हर्ष कों अब हवेली बोझ नहि लगती थि, क्योंकि उसेपता थां कि दिन ढलते हि दो रूहें उसका इंतजार करेंगी—एक् उसे शांति देगी, औऱ दूसरी उसे उड़ान।
हवेली केँ शांत गलियारों औऱ खेतों कि मेड़ पर्र अब एक् अनकहा म्यूज़िक बजनेलगा थां। हर्ष, जोँ शुरुआत मे मात्र एक् अतिथि औऱ इंजीनियर केँ रूप मे आया थां, अब नव्या औऱ अदिति केँ जिंदगी कां केंद्र बन चुका थां। इन तीनों केँ बीच कां नाताअब सिर्फ शब्दों तक सीमित नहि रहा; वो स्पर्श औऱ मौन कि भाषा मे ढलनेलगा थां।
हर्ष नें अपनी गरिमा बनाएरखी थि, मगरजब वो अदिति सें शरबत कां लोटा लेता याँ नव्या कों अपनी डायरी केँ पन्ने दिखाता, तोँ उनके हाथों कां स्पर्श यदा-कदा होँ हि जाता। वो स्पर्श बिजली केँ झटके जैसा नहि, बल्कि मखमल जैसा कोमल होता, जिसमें एक्-दूसरे कों समझने कां चैन थां। उनकी नजरें जबआपस मे गूथतीं, तौ घंटों कि बातें लम्हा भर मे होँ जातीं।
हर्ष कां नया संबोधन (केवल एकांत केँ लिए):
हर्ष कों महसूस होनेलगा थां कि 'भाभी' औऱ 'दिदी' जैसे शब्दउस गहरे अनुराग केँ सामने छोटेपड़ रहे हें जोँ उसकेमन मे पनपरहा थां। इसलिये, उसने एकांत केँ पलों केँ लिए दोनों कों दो विशेष संबोधन दिए, जिनका सुराग न् तौ विक्रम कों थां औऱ न् हि मालती कों।
१। अदिति केँ लिए — 'शुभी'
जब हर्ष औऱ अदिति किचन केँ पिछले हिस्से मे याँ बगीचे मे अकेले होते, जहाँ केवल परिंदों कि चहचहाहट होती, तब हर्षउसे 'भाभी' नहि, बल्कि 'शुभी'(शुभ करने वाली) कहकर पुकारता।
* हर्ष: "शुभी, जब तुम् मेरेपास होती हौ, तौ ऐसा लगता हैं जैसे सारी थकान किसी मंदिर कि शांति मे बदल गई हैं। तुम्हारी सादगी हि मेरा सबसेबड़ा चैन हैं। "
अदिति इसनाम कों सुनकर अपनी आँखें झुका लेती, औऱ उसके चेहरे पर्र एक् ऐसी लालीछा जाती जोँ किसी भि श्रृंगार सें बढ़कर थि। उसे लगता कि हर्ष नें उसेउस 'बहू' केँ पिंजरे सें आज़ादकर उसे एक् नई पहचान दे दि हैं।
२। नव्या केँ लिए — 'प्रिया'
रात कि खामोशी मे जबछत कि मुंडेर पऱ ठंडीहवा चलती औऱ दूर तक फैली खेतों कि हरियाली चाँदी जैसी चमकती, तब हर्ष नव्या कों 'प्रिया' (प्रिय लगने वाली) कहता।
* हर्ष: "प्रिया, तुम्हारी बातें मुझे हारने नहि देतीं। तुम् मेरी प्रेरणा हौ। इस अंधेरी हवेली मे तुम् वोँ दीया हौ जौ मुझे मार्ग दिखाता हैं। "
नव्या, जौ दुनिया केँ लिए एक् चतुर औऱ वफादार बहू थि, हर्ष केँ मुँह सें 'प्रिया' सुनकर अंदर तक पिघल जाती। उसे महसूस होता कि उसकी बुद्धि औऱ उसके व्यक्तित्व कां असली पारखी मिल गय़ा हैं।
हवेली कां नयारंग:
हर्ष दोनों केँ संग अलग-अलग वक़्त बिताता। अदिति केँ संग उसका प्यार मौन औऱ सेवा कां थां, जबकि नव्या केँ संग संवाद औऱ स्वप्न कां। हर्ष कों रत्ती भर भि संदेह नहि थां कि यह दोनों सहेलियाँ अंदर सें एक् हें औऱ उन्होंने हि उसेये आज़ादी दि हैं।
विक्रम सिंह अपनी कुर्सी पर्र बैठे हुक्का गुड़गुड़ाते रहते, उन्हें लगता कि हर्ष उनके खेतों कों सुधार रहा हैं औऱ बहुएं घऱ कि मर्यादा बढ़ारही हें। मालती भि अपनीधुन मे मस्त थि। किसी कों कानों-कान खबर नहि थि कि इस 'मर्यादा' केँ परदे केँ पीछे एक् बहोत हि पवित्र औऱ गहरा प्यार अपनी जड़ेंजमा चुका हैं।
हर्षअब उन दोनों केँ जिंदगी कां आधारबन गय़ा थां। वो जब खेतों सें लौटता, तौ उसकी एक् नज़र 'शुभी' कों ढूंढती औऱ एक् मुस्कान 'प्रिया' केँ लिए सुरक्षित होती।
नव्या औऱ अदिति नें ये गाँठ बाँधली थि कि वे हर्ष केँ सामने अपनीइस 'मिलीभगत' कां सचकभी ज़ाहिर नहि करेंगी। हर्ष केँ लिएवे दो अलग-अलग पहेलियाँ हि बनी रहेंगी—एक् उसकीरूह कि शांति 'शुभी' औऱ दूसरी उसकी प्रेरणा 'प्रिया'। उनका प्यार अबउस मुकाम पऱ थां जहाँ शब्दों कि ज़रूरत कम औऱ एहसासों कि ज़्यादा थि।
एक् दोपहर, अचानक अदिति केँ पेट मे तेज़ दर्द होनेलगा। चेहरा पीलापड़ गय़ा औऱ वो बेहाल होँ गई। हवेली मे अफ़रा-तफरी मच गई। मालती नें कुछ घरेलू नुस्खे आज़माए, पर्र दर्दकम नहि हुआ।
नव्या नें मौका देखा औऱ विक्रम सिंह केँ पास पहुँच गई, जोँ अपने हुक्के केँ संग दालान मे बैठे थें।
नव्या: "बाबूजी, अदिति कि हालतठीक नहि लगरही। गाँव केँ हकीम सें काम नहि चलेगा, उसेशहर केँ बड़े अस्पताल दिखाना होगा। कहीं अपेंडिक्स याँ कोई गंभीर बात न् होँ। "
विक्रम सिंह नें माथे पर्र बल डालते हुएकहा, "शहर? पर्र लें जाएगा कौन? मुझेआज पंचायत मे जानां हैं। "
नव्या: (बड़ी चतुराई सें) "हर्ष हैं नाँ बाबूजी! वो शहर केँ रास्तों सें वाकिफ़ हैं, इंजीनियर हैं, सभी सँभाल लेगा। उसकीजीप भि रेडीखड़ी हैं। "
विक्रम सिंह कों ये मशवरा सहीलगा। उन्होंने हर्ष कों आवाज़ दि औऱ उसे अदिति कों शहर लेँ जाने कां हुक्म दिया। हर्ष भि अदिति कि हालत देखकर चिंतित थां, उसने जल्दी जीप निकाली औऱ पिछली सीट पर्र अदिति केँ लिएबैड जैसा इंतज़ाम किया।
जब हर्ष गाड़ी स्टार्ट कररहा थां, तब नव्या पानी पिलाने केँ बहाने अदिति केँ पास झुकी।
नव्या: (अदिति केँ कान मे एकदम धीमी आवाज़ मे फुसफुसाते हुए) "बेस्ट ऑफलक अदिति। इस 'एकांत' कां पूरा फ़ायदा उठाना। अपनी 'शुभी' कों हर्ष केँ दिल मे हमेशा केँ लिए उतार देना। "
अदिति, जिसका दर्द शायद हर्ष केँ संग जाने कि खबर सुनकर हि आधाकम होँ गय़ा थां, नव्या कि बात सुनकर लज्जा सें लाल हौ गई। उसने अपनी नज़रें झुकालीं औऱ एक् शरारती मुस्कान केँ संगजीप मे बैठ गई।
गाड़ी हवेली केँ फाटक सें बाहर् निकली। विक्रम औऱ मालती कों लगा कि बहू इलाज केँ लिए गई हैं, पऱ नव्या जानती थि कि आजशहर केँ उससफ़र मे 'शुभी' औऱ हर्ष केँ बीच प्यार कि एक् नई दास्तान लिखी जाएगी।
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
स्टोरी मे मज़ा आँ रहा हैं जी विक्रम जब नव्या कि cchudai करेगा तबडीप मे जानां एक् एक् सेकेंड कों डिस्क्राइब करनाओर chudayi sessaon लंबा रखना उनका, मैन किरदार वोँ दोनों हि हैं इस स्टोरी मे
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story - Kahani ab aur interesting hogi
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