विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
हवेली वापसी औऱ झूठ कां बुनाहुआ जाल
जगह: हवेली कां मुख्य शयनकक्ष
वक्त:रात ९:००बजे
मालती जब हवेली कि सीढ़ियां चढ़रही थि, तौ उसकेपेर कांपरहे थें। दिल्ली मे नव्या नें जोँ 'वफादारी' कां आईना दिखाया थां, उसने मालती केँ अरमानों पर्र पानीफेर दिया थां। पऱ सामने खड़ा थां विक्रम सिंह—वो शिकारी, जौ अपनी कुर्सी पऱ बैठा किसी भूखे भेड़िए कि तरह मालती कि आँखों मे नव्या कां अक्स ढूंढरहा थां।
विक्रम सिंह नें हुक्के कां एक् लंबाकश खींचा औऱ धुएँ केँ बीच सें गुर्राते हुए पूछा।
विक्रम सिंह: "आँ गई मालती? पऱ अकेली? कहां हैं मेरी वोँ 'शिकारी' बहू? तूने तौ कहा थां कि तुँ उसे अपनी बाहों मे समेटकर मेरेइस विकराल मूसल केँ नीचे लें आएगी। क्याँ हुआ तेरे वादे कां?"
विक्रम कि आँखों मे वहीलाल सुपाड़े वालीचमक औऱ हवस कि तड़प साफ़दिख रही थि। मालती नें एक् गहरी सांसली औऱ अपने चेहरे पर्र चालाकी कां नकाबओढ़ लिया। उसे पता थां कि अगर उसनेसच कह दिया कि नव्या अबकभी नहि आएगी, तोँ विक्रम कां क्रोध उसे भस्मकर देगा।
मालती: (पासआकर, विक्रम केँ घुटनों कों सहलाते हुए) "धीरज रखिये समधीजी। शिकारी जब बड़े शिकार पर्र निकलता हैं, तोँ जाल बिछाने मे वक़्त लगता हैं। नव्या कोई कच्ची कली नहि हैं जिसे एक् झटके मे तोड़ लियाजाए। वो सख्तजान हैं। "
विक्रम सिंह: (हुक्का पटकते हुए) "सख्तजान? उसदिन तौ दिल्ली मे वोँ मेरे सामने नग्न होकर अपनी बुर केँ दर्शन करारही थि! अबउसे क्याँ हुआ?"
मालती: "वही तोँ बात हैं समधीजी! वो आपको तड़पाने कां मजाजान गई हैं। मैंने जालडाल दिया हैं। वो सुमित कि 'वफादारी' कां ढोंगकर रही हैं, पऱ अंदर सें वो आपकेइसी भारी औऱ तपतेहुए मूसल कि आग मे जलरही हैं। उसनेकहा हैं कि वो आएगी, पऱ अपनी शर्तों पर्र। वो चाहती हैं कि आप् उसे औऱ याद करें, उसे औऱ तड़पाएं। वोँ 'सख्त'बन रही हैं ताकिजब वो टूटे, तोँ आपके नीचे पूरीतरह बिखरजाए। "
मालती नें विक्रम केँ हाथ कों अपनी जांघों पर्र रखा औऱ अश्लीलता सें फुसफुसायी।
मालती: "इंतजार कां फल मीठा होता हैं दोस्त! अभि तौ मे हूं नाँ। आपकीइस प्यास कों बुझाने केँ लिए। नव्या जब आएगी, तोँ वोँ तूफान लेकर आएगी। तब तक आप् इस समधिन कि देह पर्र अपना अभ्यास जारी रखिये। आखिरउस जवान बुर कों फाड़ने केँ लिए आपको अपनीकमर कि ताकत बनाए रखनी होगी। "
विक्रम सिंह कां क्रोध थोड़ी देर केँ लिए शांतहुआ, पऱ उनकी आँखों मे नव्या कों पाने कि चाहत औऱ भि गहरी हौ गई। उन्हें लगा कि नव्या वास्तव मे एक् खेलखेल रही हैं।
विक्रम सिंह:"ठीक हैं मालती। इंतजार करूँगा। पऱ याद रखना, अगर तेरायह जाल खाली निकला, तौ मे दिल्ली पहुँच कर वोँ तांडव करूँगा कि मर्यादा कि ईंट सें ईंटबज जाएगी। फिलहाल। तूँ आँ इधर, औऱ मुझे दिखा कि तूने दिल्ली मे अपनीउस बेटी सें क्याँ नया'गुर' सीखा हैं। "
विक्रम नें मालती कों झटके सें अपनीओर खींचा। मालती नें एक् राहत कि सांस ली—उसने एक् बड़ाझूठ बोलकर फिलहाल अपनीजान बचाली थि, पर्र वो जानती थि कि येजाल बहोत दिनों तक विक्रम कों रोक नहि पाएगा।
अदिति कां आगमन औऱ हवेली मे नया सवेरा
हवेली कि दुःखी औऱ वासना सें भारी दीवारों केँ बीच अचानक एक् ऐसी हलचल हुई जिसने सभीकुछ बदलकर रख दिया। विक्रम सिंह केँ छोटे भइया कि बहू, अदिति, कुछ वक़्त केँ लिए कोठी पर्र रहनेआई थि। अदिति कि उम्र, उसका यौवन औऱ उसकारूप बिल्कुल नव्या जैसा हि थां—वही सफ़ेद रंग, वही तीखे नैन-नक्श औऱ वही मांसल जिस्म जिसे देखकर किसी कां भि ईमानडोल जाए।
विक्रम सिंह अपनीउसी लाल कपड़े वाली कुर्सी पऱ बैठे थें, जब अदिति नें हवेली कि चौखट पर्र कदमरखा। उसे देखते हि विक्रम केँ हाथ सें हुक्के कि नली छूटते-छूटते बची।
विक्रम सिंह:(मन हि मन)"यह क्याँ जादू हैं? क्याँ नव्या हि रूप बदलकर वापस आँ गई हैं? वही उभार, वही चाल। बिल्कुल वैसी हि बिजली सि चमक हैं इसके शरीर मे। "
अदिति स्वभाव सें चुलबुली औऱ सेवाभावी थि। वो विक्रम केँ पेर छूने केँ लिए नीचे झुकी, औऱ जैसे हि वो झुकी, उसके गहरेगले केँ ब्लाउज सें झाँकते हुए उसके दूधिया औऱ सख्त बोबे विक्रम सिंह कि आँखों केँ ठीक सामने आँ गए। विक्रम कि सांसें रुकगईं; उन्हें लगा जैसे दिल्ली वाली वोँ 'अधूरी हवस'अब इसनएरूप मे उनके सामने खड़ी हैं।
अदिति: "प्रणाम बड़े बाबूजी! घऱ पर्र सभीकह रहे थें कि आप् अकेले पड़गए हें, तोँ सोचाकुछ दिन आपकी सेवा मे यहींरह लूँ। सुना हैं यहाकाम बहोत रहता हैं। "
विक्रम सिंह नें अपनी आवाज़ कों सँभाला, पऱ उनकी नज़रें अदिति कि पतलीकमर औऱ चौड़े चूतड़ों पर्र टिक चुकीथीं।
विक्रम सिंह: "आँ। आओ अदिति! बहोत सही वक्त पऱ आई हौ। हवेली कों वाकई एक् 'जवान' रौनक कि ज़रूरत थि। मालती तौ अपनीतरफ सें सेवाकर हि रही हैं, पऱ तुँ घऱ कि बहू हैं। तेरीबात हि कुछ औऱ हैं। "
मालती नें जब कोने सें ये मंजर देखा, तोँ उसके कलेजे पर्र सांपलोट गय़ा। उसेसमझ आँ गय़ा कि जोँ जाल उसने नव्या केँ लिए बुना थां, अदिति नें उसमें बिनाकुछ किए हि अपनी स्थान बनाली हैं। अदिति कां रूप-रंग औऱ उसकी ताज़गी देखकर मालती कों अपनी 'ढलती उम्र' कां अहसास होनेलगा।
हवेली कां बदलता माहौल:
अदिति नें आते हि हवेली कां नक्शा बदल दिया। वो कभी विक्रम केँ कमरे कि सफाई करती, तौ कभी उनके पैरों कि मालिश करनेबैठ जाती। वो नव्या कि तरह 'शर्तों' वाली स्त्री नहि थि; वो तोँ सम्मान औऱ सेवा केँ नाम पऱ विक्रम केँ इतने लगभग आँ जाती कि विक्रम केँ उस विकराल मूसल मे फिन सें हलचल शुरुआत होँ जाती।
एक् साम, जब अदिति विक्रम केँ पांवदबा रही थि, तौ उसकी साड़ी कां पल्लू सरककर नीचेगिर गय़ा। विक्रम नें देखा कि अदिति नें कोई विरोध नहि किया, बल्कि वो औऱ भि तन्मयता सें उनकी जांघों कों सहलाने लगी।
अदिति: "बड़े बाबूजी, आपकी जांघें तौ पत्थर कि तरह सख्त हें। बहोत थकान रहती होगी नाँ? सुमित भैया कि मम्मी (मालती) क्याँ आपकीठीक सें मालिश नहि करतीं?"
विक्रम सिंह नें अदिति कि कलाईपकड़ ली। उनकी आँखों मे वही कालानाग फन फैलाने लगा थां।
विक्रम सिंह: "मालती पुरानी होँ गई हैं अदिति। अबइस जिस्म कों किसी'नई औऱ सख्त'जान कि ज़रूरत हैं। तूने तौ आते हि मेरेइस सोयेहुए मूसल मे जान फूँक दि हैं। "
अदिति नें अपनी पलकें झुकाईं औऱ
विक्रम सिंह कों लगा थां कि कोठी कि दीवारों केँ भीतरहर महिला मालती कि तरह उसकीहवस केँ आगे घुटने टेक देगी याँ नव्या कि तरह अश्लील खेलों मे उलझी रहेगी। उसने समझा थां कि अदिति कि सेवा औऱ उसकी खिलखिलाहट उसके विकराल मूसल केँ लिए एक् खुला आमंत्रण हैं।
जैसे हि विक्रम नें अदिति कि कलाई कों ज़ोर सें पकड़ा औऱ अपनी जांघों केँ सख्त होने कि बातकही, कमरे कि हवा एक् समय मे बदल गई। अदिति, जोँ अब तक सलीके सें पेरदबा रही थि, झटके सें पीछेहटी। उसने अपनी कलाई विक्रम कि पकड़ सें छुड़ाई औऱ सीधी खड़ी होँ गई।
अदिति कि आँखों मे अब वो सेवाभाव नहि थां, बल्कि एक् ऐसी तीक्ष्ण ज्वाला थि जिसने विक्रम सिंह केँ अहंकार कों हिलाकर रख दिया। उसने अपनी साड़ी कां पल्लू सलीके सें कंधे पर्र टिकाया औऱ विक्रम कि आँखों मे सीधे झाँकते हुएउसे देखकर देखा।
अदिति: (बर्फ जैसी ठंडी औऱ तीखी आवाज़ मे) "यह आप् क्याँ कहरहे हें बड़े बाबूजी? अपनी मर्यादा भूलगए याँ मेरा लिहाज़? मैंने आपकी उम्र औऱ इस खानदान केँ नाम कां सम्मान किया, पर्र आप् तौ मुझे अपनीहवस कि नज़र सें नापरहे हें!"
विक्रम सिंह सकपका गए। उन्हें अपनीलाल कपड़ा बिछी कुर्सी औऱ अपने रुतबे कां गुमान थां, पऱ अदिति कि इसखरी बात नें उन्हें आइना दिखा दिया।
अदिति: "क्याँ ठाकुरों कि मर्यादा मर गई हैं? याँ इस हवेली कि दीवारों नें आपकी बुद्धि भ्रष्ट कर दि हैं? मे इसघऱ कि बहू हूं, कोई बाज़ारू महिला नहि जोँ आपकेइस विकराल रूप कों देखकर पिघल जाऊं। मेरेलिए आप् पिता समान थें, पऱ आपकीयह हरकतें बतारही हें कि आप् अपनी पदमर्यादा कों धोती केँ नीचेदबा कर बैठे हें। "
विक्रम सिंह कां चेहरा लज्जा औऱ गुस्से केँ मिले-जुले भाव सें तमतमा उठा। उनके जांघों केँ बीच जोँ कालानाग फनउठा रहा थां, वो अदिति केँ इन तीखे शब्दों केँ प्रहार सें मानोबिल मे दुबक गय़ा। उन्होंने कभी नहि सोचा थां कि कोई स्त्री उन्हें इसतरह ललकार सकती हैं।
अदिति: "मालती चाची क्याँ करती हें औऱ आप् उनकेसंग किस कीचड़ मे सने हें, यह आपका औऱ उनका मामला हैं। पर्र याद रखियेगा बड़े बाबूजी, अगर दोबारा आपने अपनीहवस कि आंचमुझ तक पहुँचाने कि कोशिश कि, तौ मे इस हवेली कि मर्यादा कों सरेबाज़ार नीलाम करने मे एक् लम्हा कि भि देर नहि करूँगी। मेरेलिए चरित्र सें बढ़कर कुछ नहि हैं। "
अदिति मुड़ी औऱ बिना पीछे देखे कमरे सें बाहर् निकल गई। विक्रम सिंह वहीं अपनी कुर्सी पऱ सुन्न बैठेरह गए। उन्हें अहसास हुआ कि हर चमकती चीज़ सोना नहि होती, औऱ हर महिला मालती नहि होती।
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
नियति कां खेल औऱ हवेली मे तूफ़ान
जगह: हवेली कां मुख्य आंगन
टाइम: सुभह १०:३०बजे
हवेली मे अभि कल कि अदिति वाली कड़वाहट हवा मे घुली हि थि कि बाहर् एक् गाड़ीआकर रुकी। विक्रम सिंह अपनीउसी कुर्सी पर्र बैठे थें, उनके चेहरे पऱ कल कि बेइज्जती कि लकीरें अभि साफ़थीं। पऱ जैसे हि उन्होंने गाड़ी सें सुमित औऱ नव्या कों उतरते देखा, उनके मुर्दा हौ चुके अरमानों मे अचानक जान आँ गई।
सुमित हाथ मे सूटकेस लिए अंदरआया औऱ विक्रम सिंह केँ पांवछुए। नव्या पीछेखड़ी थि, उसकी आँखों मे वही पुरानी चमक औऱ होंठों पर्र वही रहस्यमयी मुस्कान थि जिसे विक्रम सिंह दिल्ली मे अधूरा छोड़आए थें।
सुमित: "बाबूजी, एक् बहोत ज़रूरी काम सें आनांपड़ा। कंपनी मुझेदो साल केँ लिए अकेले अमेरिका भेजरही हैं। वहां परिवार कों संग लेँ जाने कि अनुमति अभि नहि हैं। मे नव्या कों दिल्ली मे अकेला नहि छोड़ना चाहता थां, इसलिये सोचा कि आपसे सुरक्षित स्थान इसकेलिए औऱ क्याँ होगी?"
विक्रम सिंह केँ कानों मे सुमित कि बातें किसी म्यूज़िक कि तरह गूँजीं। दोसाल! यानीदो साल तक नव्या इसी हवेली कि चारदीवारी मे, उनके साये केँ नीचे रहेगी।
विक्रम सिंह: (गंभीर बनने कि कोशिश करतेहुए) "यह तोँ बहोत गर्व कि बात हैं सुमित। तुँ फिक्र मतकर, बहू यहा सुरक्षित रहेगी। वैसे भि अदिति यहा हैं हि, दोनों कां मनलगा रहेगा। "
सुमित तोँ निश्चिंत होकर अंदरचला गय़ा, पऱ असलीखेल तौ आंगन मे शुरुआत हुआ। मालती भागती हुईँ आई, नव्या कों गले लगाया, पऱ उसकी निगाहें अपनी बेटी सें अधिक विक्रम सिंह कि आँखों मे तैरती उस दरिंदगी कों पढ़रही थीं जौ कल अदिति नें ठंडीकर दि थि।
नव्या नें अपनी साड़ी कां पल्लू ठीक किया औऱ तिरछी नज़र सें ससुरजी कों देखा। उसे पता थां कि यहा अदिति मौजूद हैं औऱ ससुरजी जीकल हि 'पस्त'हुए हें।
नव्या: (धीमी आवाज़ मे, केवल विक्रम कों सुनाई दे) "बाबूजी। लगता हैं अब 'मर्यादा' कि यह दीवारें बहोत लंबी परीक्षा लेने वाली हें। दोसाल। बहोत लंबासमय होता हैं किसी भारी मूसल केँ इंतज़ार केँ लिए, हैं नां?"
विक्रम सिंह केँ गले मे जैसेथूक रुक गय़ा। कल अदिति नें उन्हें ठाकुरों कि मर्यादा याद दिलाई थि, औऱ आज नव्या नें आते हि उसी मर्यादा कों अपनी नशीली आँखों सें चुनौती दे दि।
हवेली कां समीकरण अब बेहद पेचीदा होँ गय़ा थां:
* एक् तरफ अदिति थि—मर्यादा कि साक्षात् प्रतिमूर्ति, जिसने विक्रम कों उनकी औकात दिखाई थि।
* दूसरी तरफ नव्या थि—जोँ सुमित केँ प्रति 'वफादार' होने कां दावा करती थि, पऱ ससुरजी कों तड़पाने कां कोई मौका नहि छोड़ती थि।
* औऱ बीच मे थीं मालती, जोँ इन सबकेबीच अपनी स्थान औऱ अपना 'दोस्त' बचाने कि जद्दोजहद मे थि।
विक्रम सिंह नें अपनी मूछों पऱ ताव दिया। उन्हें लगा कि शायद कुदरत नें अदिति कों भेजकर उन्हें जौ झटका दिया थां, नव्या कों भेजकर उसकी भरपाई कर दि हैं।
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
दो बहुएं, एक् रहस्य औऱ दोस्ती कां आगाज़
जगह: हवेली कि किचन औऱ पिछला बरामदा
वक्त: सुमित कि विदाई केँ दोदिन बाद
सुमित केँ अमेरिका जाते हि हवेली मे एक् अजीब सि खामोशी छा गई थि, मगरये खामोशी किसीबड़े तूफ़ान केँ आने कां संकेत थि। विक्रम सिंह अपनी कुर्सी पऱ बैठे नव्या औऱ अदिति कि हर हरकत पर्र बाज़ जैसीनज़र रखेहुए थें। उन्हें लगा थां कि नव्या कि 'बेबाकी' औऱ अदिति कि 'मर्यादा' केँ बीचठन जाएगी, पऱ यहा तोँ मंजर हि कुछ औऱ होने वाला थां।
दोपहर कां वक़्त थां, मालती कोठी केँ किसीकाम सें बाहर् गई थि। किचन मे अदिति खानां बनारही थि औऱ नव्या उसकी सहायता करने केँ बहाने वहां पहुँच गई।
नव्या: (अदिति केँ गले मे हाथ डालते हुए) "अदिति, तुँ कितनी मेहनत करती हैं। इस हवेली कि दीवारों मे तोँ वैसे हि बहोत उमस हैं, औऱ तुँ ऊपर सें इस चूल्हे कि आग मे जलरही हैं। "
अदिति नें मुस्कुराकर नव्या कि ओर देखा। कल वाली वो सख्त 'अदिति' आज थोड़ीनरम लगरही थि।
अदिति: "दिदी, क्याँ करें?इस घऱ कि रीत हि ऐसी हैं। पऱ आप् दिल्ली सें यहा केसे रहने आँ गईं? सुमित भैया तौ आपकोसंग लें जा सकते थें। "
नव्या नें एक् गहरी सांसली औऱ अदिति केँ कान केँ पास झुककर फुसफुसायी।
नव्या: "अमेरिका कां बहाने हैं पगली। असलीबात तोँ यह हैं कि बाबूजी कि 'नज़र' सें बचना नामुमकिन थां। सुना हैं तूने भि कल उन्हें बहुत खरी-खोटी सुनाई हैं?"
अदिति केँ हाथ कां चिमटा रुक गय़ा। उसने हैरानी सें नव्या कों देखा। उसे लगा थां कि नव्या ससुरजी कि चहेती हैं, पर्र नव्या कि बातों मे एक् अलग हि दर्द औऱ शरारत थि।
अदिति: (नीमी आवाज़ मे) "वोँ। वोँ बस ठाकुरों कि मर्यादा कि बात थि दिदी। पर्र बाबूजी कि आँखें। मुझे डराती हें। "
नव्या नें अदिति कां हाथ अपनेहाथ मे लिया औऱ उसे किचन केँ पीछे वाले बरामदे कि ओर लें गई, जहाँ सें कोई उन्हें देख न् सके।
नव्या: "डरमत अदिति। हम् दोनों एक् हि कश्ती कि सवार हें। तूँ मर्यादा कि ओट लेँ रही हैं, औऱ मे अपनी वफादारी कि। पऱ सच तोँ यह हैं कि उस विकराल मूसल कि तापइस कोठी केँ कोने-कोने मे महसूस होती हैं। मालती मां तौ उसकी दीवानी हैं हि, पऱ हम् जैसों केँ लिएयह हवेली एक् पिंजरा हैं। याँ फिन एक् अखाड़ा। "
अदिति नें नव्या कि नशीली आँखों मे देखा। उसे पहलीबार लगा कि कोईउसे समझने वाला मिला हैं।
अदिति: "तोँ क्याँ आप् भि। मेरीतरह हि सोचती हें?"
नव्या नें एक् मखमली मुस्कान दि औऱ अदिति केँ गालों कों सहलाया।
नव्या: "मे सोचती नहि, मे खेलती हूं। देख अदिति, हम् यहादो सालसंग रहने वाले हें। अगर हम् दुश्मन बने, तोँ बाबूजी एक्-एक् करके हमें शिकार बना लेंगे। पर्र अगर हम् सहेलियां बन जाएं। तोँ हम् इस हवेली केँ 'राजा' कों अपनी उंगलियों पऱ नचा सकती हें। क्याँ पता, जोँ प्यास तूँ दबाकर बैठी हैं औऱ जोँ मे छुपाकर। उसका इलाज हम् एक्-दूसरे मे हि ढूँढ लें?"
अदिति कां चेहरा लज्जा सें लाल हौ गय़ा, पर्र उसने नव्या कां हाथ नहि हटाया। नव्या नें बातों-बातों मे अदिति केँ ब्लाउज केँ हुक केँ पास अपनी उंगली फेरी। दोनों कि आँखों मे एक् नया करारदिख रहा थां—एक् ऐसी दोस्ती जोँ शायद 'मर्यादा' औऱ 'हवस' केँ बीच कां एक् नया मार्ग खोलने वाली थि।
मालती कि जलन औऱ दो फूलों कि गंध
जगह: विक्रम सिंह कां शयनकक्ष
वक़्त: रात ११:४५बजे
हवेली कि रातअब औऱ भि गहरी औऱ कामुक हौ गई थि। बाहर् सन्नाटा थां, पर्र विक्रम सिंह केँ कमरे केँ भीतर वासना कां तूफ़ान फिन सें अंगड़ाइयां लेँ रहा थां। मालती, जोँ अब तक विक्रम कि एकछत्र 'रानी'बनी हुइ थि, आज एक् अजीब सि बेचैनी मे थि। उसने अपनी साड़ी उतार फेंकी थि औऱ विक्रम केँ विकराल मूसल कों अपनी हथेलियों मे लेकरउसे सहलारही थि।
विक्रम सिंह पलंग पऱ लेटेहुए थें, पऱ उनका ध्यान मालती केँ शरीर सें अधिकउन दोरूम कि ओर थां जहाँ नव्या औऱ अदिति सोरही थीं।
मालती: (विक्रम केँ ऊपर झुकते हुए, उनके सीने पर्र अपने भारी बोबे रगड़ते हुए) "क्याँ बात हैं समधीजी? आजइस कालेनाग मे वोँ फुर्ती नहि दिखरही। आँखें तौ आपकी बाहर् गलियारे कि ओरताक रही हें। क्याँ उनदोनए फूलों कि खुशबू यहा तक पहुँच रही हैं?"
विक्रम सिंह नें मालती कि कमर कों कसकर दबोचा, पर्र उनकी आँखों मे एक् अलग हि चमक थि।
विक्रम सिंह: "मालती, तुँ तौ पुरानी शराब हैं, जिसका नशा मुझेचढ़ा हुआ हैं। पर्र देख। कुदरत कां करिश्मा देख। कल तक मे एक् फूल (नव्या) केँ लिएतरस रहा थां, औऱ आज मेरी हवेली केँ आंगन मे दो-दो जवान कलियाँ खिली हुइ हें। "
मालती नें एक् तल्ख मुस्कान केँ संग विक्रम केँ उस भारीअंग पर्र अपनीपकड़ औऱ मजबूत कर दि, जैसे वो उस पऱ अपना मालिकाना हकजता रही होँ।
मालती: "यही तोँ मे कहरही हूं। अब तौ आपकेपास दो-दो जवानफूल हें, औऱ भंवरा केवल एक्! एक् तरफ वोँ सख्तजान अदिति हैं जोँ मर्यादा कि तलवार लिएखड़ी हैं, औऱ दूसरी तरफ मेरी लाडो नव्या। जोँ दिखाती सभीकुछ हैं पर्र चखने किसी कों नहि देती। "
मालती नें विक्रम केँ कान केँ पास झुककर अश्लीलता सें फुसफुसाया।
मालती: "पऱ यह भंवरा भि तौ कम नहि हैं। यह मूसलजिस फूल मे एक् बारधंस जाए, उसे अपनीगंध भुला देता हैं। पऱ याद रखियेगा समधीजी। नव्या औऱ अदिति अब सहेलियां बन गई हें। कहींऐसा न् हौ कि दोफूल मिलकर भंवरे केँ हि पंखकतर दें। "
विक्रम सिंह नें मालती कों झटके सें नीचेदबा लिया औऱ उसकी टांगों कों फैलाते हुए अपना वो तपताहुआ लाल सुपाड़ा उसकी बुर केँ मुहाने पर्र टिका दिया।
विक्रम सिंह: "भंवरा जब तक पुरानां फूल नहि निचोड़ लेता, नए पर्र नहि जाता। तुँ आजउन दोनों केँ नाम पर्र मुझे औऱ उकसारही हैं मालती। औऱ इसका हर्जाना तौ तेरीइस रसीली गुफा कों हि भुगतना होगा। "
एक् गहरे औऱ जोरदार धक्के केँ संग विक्रम सिंह मालती केँ भीतरउतर गए। मालती कि चीख निकली, पर्र उसचीख मे जलन औऱ मज़ा दोनों शामिल थें। वो जानती थि कि विक्रम भले हि उसेठोक रहे हें, पर्र उनकेहर धक्के कि लय मे उनदो बहुओं कां ख्याल शामिल हैं।
दो सहेलियां औऱ ससुरजी कि धमक
जगह: अदिति कां रूम(अब नव्या औऱ अदिति कां साझा कक्ष)
वक्त:रात १२:३०बजे
हवेली कि पुरानी दीवारों मे एक् अजीब सि खूबी थि—वेराज तौ छुपा लेतीथीं, पऱ आवाजों कों रोकने मे अक्सर नाकाम रहतीथीं। नव्या औऱ अदिति अब एक् हि बड़े बिस्तर पऱ लेटीथीं। सुमित केँ जाने केँ बाद नव्या नें चतुराई सें अदिति कों मना लिया थां कि डर केँ मारेवे दोनों संग हि सोएंगी।
कमरे मे मद्धम रोशनी थि औऱ बाहर् गलियारे सें विक्रम सिंह केँ कमरे कि 'चप-चप' औऱ मालती कि दबी-कुचली सिसकारियों कि आवाजें रह-रहकर गूँजरही थीं। ऐसा लगरहा थां जैसेकोई भारी मशीन लगातार चलरही होँ।
अदिति नें करवट बदली औऱ नव्या कि ओर देखा, जौ छत कों घूरते हुए गहरी सांसें लें रही थि। अदिति केँ चेहरे पर्र एक् शरारती मुस्कान दौड़ गई। उसनेकल वाली 'मर्यादा' कां चोला उतारकर अपनी सहेली कों छेड़ना शुरुआत किया।
अदिति: (नव्या केँ कान मे फुसफुसाते हुए) "दिदी। सुनरही होँ? मालती चाची तौ आज जैसे जन्नत कि सैरकर रही हें। बड़े बाबूजी कां क्रोध आज उनकी बुर पर्र हि निकलरहा हैं क्याँ?"
नव्या नें एक् लंबीअहह भरी औऱ अदिति केँ लगभग खिसकआई। दोनों केँ बदनअब एक्-दूसरे सें सटेहुए थें।
नव्या: "पगली, वोँ क्रोध नहि हैं। वोँ तौ 'भूख' हैं। कल तूने जोँ उन्हें मर्यादा कां पाठ पढ़ाया थां, उसका सारा उबालआज मालती मम्मी कों झेलना पड़रहा हैं। सुनरही हैं उस मूसल कि धमक?जब वोँ अंदर धंसता होगा, तोँ चाची कों अपनी नानीमा याद आँ रही होगी। "
अदिति नें खिलखिलाकर अपना मुँहदबा लिया। वो नव्या कि बेबाकी सें आहिस्ता खुलने लगी थि।
अदिति: (नव्या कि छाती पऱ उंगली फिराते हुए)"उफ़! दिदी, आप् तौ बड़ी अश्लील बातें करती हें। पऱ सच बताइये। जबयह आवाजें आती हें, तोँ क्याँ आपकेमन मे कुछ-कुछ नहि होता? मालती चाची तौ समधिन होकर भि अपनीकोख ठंडी करवारही हें, औऱ हम् यहा 'वफादारी' औऱ 'मर्यादा' कि चादरओढ़े पड़े हें। "
नव्या नें अदिति कां हाथपकड़ लिया औऱ उसे अपनी तपती हुईँ जांघों केँ बीचरख लिया।
नव्या: "होता क्यूं नहि अदिति? खून मेरा भि गरम हैं। पर्र मुझेउस विकराल नाग कां ज़हरऐसे नहि पीना जैसे मालती मम्मी पीरही हैं। मुझे तौ उस शिकारी कों अपने इशारों पर्र नचाना हैं। पऱ तूँ बता। तुँ जोँ कल इतनी शेरनी बनरही थि, आजइन आवाजों कों सुनकर तेरी 'गुफा' मे हलचल नहि होँ रही?"
अदिति कां चेहरा लज्जा औऱ उत्तेजना सें लाल हौ गय़ा। उसने अपनासिर नव्या केँ कंधे पऱ टिका दिया औऱ दबी आवाज़ मे बोलि—
अदिति: "दिदी। सच तोँ यह हैं कि जबबड़े बाबूजी नें कल मेराहाथ पकड़ा थां, तौ मेराजी चाहा कि मे वहींढह जाऊं। उनकी आवाज़ मे वोँ दरिंदगी औऱ बदन मे वोँ गर्मी। डराती भि हैं औऱ नं जाने क्यूं, अंदर कहींआग भि लगाती हैं। अबयह आवाजें सुनकर मेरा जिस्म भि टूटरहा हैं। "
नव्या नें अदिति कों अपनी बाहों मे भींच लिया। बाहर् मालती कि एक् ऊंचीचीख सुनाई दि, जैसे विक्रम सिंह नें अपना 'आखिरी प्रहार' किया होँ।
नव्या: "डरमत मेरीजान। जब तक हम् संग हें, हम् इस हवेली कि रानियां हें, दासी नहि। आज मालती मम्मी कों मज़ा लेनेदे, कल हम् अपनी शर्तों पर्र इसखेल कां रुख मोड़ेंगे। फिलहाल। अगर तेरी बहोत बेचैनी हौ रही हैं, तौ अपनीइस दिदी कों हि 'बाबूजी' समझकर अपनी प्यास थोड़ीकम कर लें। "
नव्या नें अदिति केँ ब्लाउज केँ ऊपर सें हि उसके सख्त बोबों कों सहलाना शुरुआत कर दिया। अदिति नें विरोध नहि किया, बल्कि उसने अपनी आँखें बंदकर लीं औऱ उन 'ठुकाई' कि आवाजों कि लय मे स्वयं कों नव्या केँ हवाले कर दिया।
हवेली केँ उसबंद कमरे मे, जहाँ बाहर् सें आती ठुकाई कि आवाज़ें एक् नशीला म्यूज़िक बन गई थीं, नव्या औऱ अदिति नें लज्जा कि अंतिम परत भि उतार फेंकी। नव्या नें बड़े सलीके सें अदिति केँ ब्लाउज केँ हुक खोले, औऱ जैसे हि वो रेशमी कपड़ा सरका, अदिति केँ दूधिया औऱ सुडौल बोबे आज़ाद होकर बाहर् निकलआए।
अदिति नें भि कांपते हाथों सें नव्या कि साड़ी औऱ पेटीकोट कों नीचे गिरा दिया। अब दोनों जवान बहुएं एक्-दूसरे केँ सामने पूर्ण नग्नखड़ी थीं। कमरे कि मद्धम रोशनी उनके अंगों पऱ पड़कर एक् कामुक चमक पैदाकर रही थि।
अदिति: (नव्या केँ उभारों कों सहलाते हुए) "दिदी। आप् तोँ वाक़ई किसी अप्सरा जैसी हें। क्याँ ससुरजी जीसच मे आपकेइस जिस्म केँ लिए इतने पागल हें?"
नव्या: (अदिति कि कमर केँ नीचे अपनी उंगलियां लेँ जातेहुए) "पागल नहि अदिति, वोँ तोँ भूखे दरिंदे हें। उन्होंने दिल्ली मे मेरी बुर कि बस एक् झलक देखी थि औऱ उनका विकराल मूसल धोती फाड़ने कों सजधजकर होँ गय़ा थां। पर्र हमें जल्द नहि करनी। हमें चुदना तौ हैं, उसी भारी औऱ तपतेहुए नाग सें। पर्र बहोत आहिस्ता, उसे तड़पा-तड़पा कर। "
अश्लील गोष्ठी:
दोनों पलंग पऱ एक्-दूसरे मे सिमटगईं। नव्या नें अदिति कि जांघों केँ बीच अपनी जुबान फेरी, जिससे अदिति कां पूरा जिस्म धनुष कि तरहतन गय़ा।
अदिति: "उफ़! नव्या दि। क्याँ हम् सच मे यहकररही हें? अगर मालती चाची याँ बाबूजी कों भनकलग गई तोँ?"
नव्या: (कामुकता सें मुस्कुराते हुए)"भनक केसे लगेगी? दुनिया कों लगेगा कि हम् दो सहेलियां दुःख-सुख बांटरही हें। दिन मे हम् मर्यादा कां नाटक करेंगी, औऱ रात मे। रात मे हम् एक्-दूसरे केँ शरीर सें उस मूसल कि मार कि कल्पना करेंगी। हम् बाबूजी कों ऐसा उकसाएंगे कि वोँ हमारे तलवे चाटने पर्र मजबूर होँ जाएं, पर्र उन्हें अपना'माल' चखने केँ लिए लंबा इंतज़ार करवाएंगे। "
नव्या नें अदिति केँ पांव ऊंचेकिए औऱ उसकी गुलाबी बुर कों चूमते हुए बोलीं—
नव्या: "अदिति, तुम्हें पता हैं, ससुरजी जी कां वोँ लाल सुपाड़ा जब तेरीइस तंग गुफा मे जाएगा, तौ तूँ चीख पड़ेगी। वोँ मालती मां कि तरहरहम नहि करते। वोँ तौ बस फाड़ना जानते हें। क्याँ तुँ रेडी हैं उस दर्द औऱ मज़े केँ लिए?"
अदिति: (उत्तेजना मे सिसकते हुए) "दिदी। आपकी बातें सुनकर हि मेरी बुर पानीछोड़ रही हैं। मुझेउस मूसल कां डर भि हैं औऱ चाहत भि। पऱ आपनेसही कहा। हम् उन्हें अपनी उंगलियों पऱ नचाएंगे। किसी कों कानों-कान खबर नहि होगी कि यहदो 'संस्कारी' बहुएं अंदर सें कितनी बेशर्म औऱ चुदक्कड़ हौ चुकी हें। "
उसरात, हवेली केँ उस गुप्त कोने मे, दो औरतों नें एक्-दूसरे केँ जिस्म कों चाटकर औऱ सहलाकर उस प्यास कों शांत किया जौ आने वाले तूफ़ान कि तैयारी थि। उन्होंने शपथखाई कि वे विक्रम सिंह कों तब तक नहि छूने देंगी जब तक वोँ उनके सामने पूरीतरह बेबस नं हौ जाएं।
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story - Continue reading next part
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