विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
दिल्ली कि तन्हाई औऱ मूसल कि याद
जगह: दिल्ली कां नया फ्लैट
वक़्त: साम७:३० बजे
दिल्ली कि भीड़भाड़ औऱ कंक्रीट केँ जंगलों केँ बीच सुमित नें एक् छोटा सां आशियाना सजाया थां। सुमित तौ दफ़्तर केँ काम मे मशस्त थां, पर्र नव्या कां मनउस आलीशान फ्लैट कि दीवारों मे नहि, बल्कि गाँव कि उस पुरानी कोठी केँ बरामदे मे अटका थां। वो खिड़की केँ पास खड़ी बाहर् कि लाइटें देखरही थि, पर्र उसकी आँखों केँ सामने रह-रहकर वही एक् छवि आँ रही थि—ससुरजी जी कि उसलाल कपड़ा बिछी कुर्सी पऱ बैठा उनका वो रोबीला जिस्म।
नव्या नें एक् गहरी ठंडी सांसली। उसे अपनी हि कही हुई बात पऱ अब पछतावा सां हौ रहा थां।
नव्या: (मन हि मन बुदबुदाते हुए) "क्याँ कहआई मे। कि शांति सें सोजाओ? उनकी आँखों मे जौ उसरात प्यास थि, उसे बुझाने कि बजाय मे दिल्ली चलीआई। वोँ विकराल औऱ कालानाग। जौ धोती कों फाड़कर बाहर् आने कों बेताब थां, उसे बिनाचखे यहा आनां सबसे बड़ीभूल थि। "
नव्या नें अपनेनए बेडरूम कां द्वार (दरवाज़ा) बंद किया औऱ आईने केँ सामने खड़ी हौ गई। सुमित बाहर् हॉल मे कुछकाम कररहा थां। नव्या नें अपनी कुर्ती केँ बटन ढीलेकिए। उसेयाद आया कि केसे गाँव कि उस 'दीपक वालीसाम' कों ससुरजी कि आँखें उसके बोबों केँ उभार कों चखरही थीं।
नव्या: "छुअन तौ दूर कि बात थि, पऱ वोँ जोँ नज़रों कां संभोग थां। वोँ जोँ बिनाछुए उनके हलवी लोड़े कि ताप महसूस होती थि, वोँ यहा सुमित केँ पास कहां? सुमित तौ बस प्रेम करना जानता हैं, पऱ ससुरजी जी। उनकी आँखों मे तौ हवस कां वोँ विकराल मंजर थां जौ जिस्म कों अंदर तक झुलसा देता थां। "
नव्या कि उंगलियां स्वयं-ब-स्वयं उसके भारी बोबों पर्र रेंगने लगीं। उसने अपनी आँखें बंदकीं औऱ कल्पना कि कि वो दिल्ली मे नहि, बल्कि कोठी केँ उसी अंधेरे गलियारे मे हैं। उसे ससुरजी जी कि वो भारी आवाज़ सुनाई देनेलगी— "शिकार तौ तब होगाजब शिकारी कों आज़ादी मिले."
उसने अपनी जांघों कों आपस मे भींचा। ससुरजी केँ उस भारी औऱ सख्त मूसल कि याद नें उसकी बुर मे एक् ऐसी हलचल पैदाकर दि कि वो दिल्ली कि एसी वाली ठंडक मे भि पसीने सें तरबतर होनेलगी।
नव्या: "अहह। मां भि कितनी खुशनसीब हैं। इससमय वोँ कोठी मे उनकेसंग अकेली होगी। मैंने उसे तौ कह दिया कि हाथमत लगाने देना, पर्र क्याँ वोँ रुक पाएगी? उस भयंकर मूसल कों देखने केँ बादकौन सि महिला अपनी मर्यादा बचा पाएगी? काश.काश मे उसरात 'शांति' कि बात नं करती औऱ उनकेउस लाल सुपाड़े कां ज़हर पीकरयहा आती। "
नव्या नें उत्तेजना मे अपने होंठचबा लिए। दिल्ली कां ये सलीकेदार फ्लैट उसेअब एक् जेल कि तरहलग रहा थां, जहाँसभी कुछ 'मर्यादित' थां, पऱ कोठी कि उस 'अश्लीलता' औऱ विकराल लंड कि कमीउसे अंदर हि अंदर पागलकर रही थि।
नव्या कि सोच मे ये एक् बहोत बड़ा मनोवैज्ञानिक बदलाव थां। अब तक वो केवलउस विकराल आकार औऱ पहाड़ जैसे उभार केँ सम्मोहन मे थि, जिसे उसने ससुरजी कि धोती केँ नीचे देखा थां। उसे लगता थां कि शायदवही 'विशालता' चरमसुख कि कुंजी हैं। मगर दिल्ली कि इस पहलीरात नें उसकीइस धारणा कों पूरीतरह ध्वस्त कर दिया।
आकार कां भ्रम औऱ परफॉरमेंस कां चमत्कार
जगह: दिल्ली कां नया फ्लैट (बेडरूम)
टाइम:रात ११:३०बजे
सुमित नें कमरे कि लाइट मद्धम कर दि थि। नव्या बेड पर्र लेटी थि, उसकेमन मे अभि भि गाँव कि कोठी औऱ ससुरजी कां वो भारी मूसलघूम रहा थां। उसेलग रहा थां कि सुमित कां मध्यम आकार कां अंग शायदउसे वो तृप्ति नं देपाए जिसकी वो ससुरजी केँ दर्शन केवल सें उम्मीद कररही थि।
पर्र सुमित आजअलग हि लय मे थां। उसेपता थां कि नव्या कुछ दिनों सें उखड़ी-उखड़ी हैं, औऱ उसनेठान लिया थां कि आज वो उसे दिल्ली कि इस पहलीरात कां असली तोहफा देगा।
सुमित नें नव्या केँ पासआकर उसके कानों केँ पीछे धीरे-धीरे सें होंठरखे। उसकी छुअन मे कोई जल्दबाजी नहि थि, बल्कि एक् ऐसी तरलता थि जौ आहिस्ता नव्या केँ रोम-रोम कों जगाने लगी।
सुमित: (फुसफुसाते हुए) "नव्या। आज तुम् बहोत दूरलग रही होँ। क्याँ इसशहर कि चमक तुम्हें अच्छी नहि लगरही?"
नव्या नें जवाब देना चाहा, पऱ सुमित केँ हाथअब उसकी भारी जांघों कों बहोत हि कलात्मक तरीके सें सहलारहे थें। सुमित कां अंग मध्यम थां, पऱ उसका नियंत्रण औऱ अपनी पत्नि केँ शरीर कि समझ बेमिसाल थि। जब उसने नव्या केँ कपड़े उतारे, तोँ नव्या कि नज़र सुमित केँ खड़ेहुए अंग पर्र पड़ी। ससुरजी केँ उस खूंखार नाग केँ मुकाबले ये दिखने मे सामान्य थां, पर्र इसकी सख़्ती किसी फौलाद जैसी थि।
सुमित कां खेल शुरुआत हुआ:
उसने नव्या कों ऐसे 'फोरप्ले' (foreplay) मे उलझाया कि नव्या केँ विशाल बोबेअब ससुरजी कि नज़रों केँ लिए नहि, बल्कि पति केँ दांतों औऱ जीभ केँ नीचे तड़पने लगे। सुमित नें नव्या केँ हर संवेदनशील हिस्से कों अपनी जुबान सें ऐसेछुआ कि नव्या कि आँखें पलटगईं।
नव्या: (हाँफते हुए)"अहह। सुमित। यह.यह क्याँ कररहे होँ?"
जब सुमित नें अपनी 'एंट्री' कि, तोँ नव्या कों एक् बहोत बड़े सत्य कां अहसास हुआ। ससुरजी कां वो मोटा-ताजा मूसल शायदउसे फाड़ देता याँ केवल दर्द देता, पर्र सुमित कां ये मध्यम आकार कां हथियार उसकी बुर कि गहराई मे एक्-एक् इंच पर्र अपना कब्ज़ा कररहा थां। सुमित कि रफ़्तार औऱ उसके धक्कों कां कोण (angle) इतना सटीक थां कि वो सीधा नव्या केँ 'G-Spot' पर्र प्रहार कररहा थां।
परफॉरमेंस कि जीत:
सुमित नें अपनीचाल नहि बदली। वो लंबे वक्त तक उसीलय मे उसे ठोकता रहा। नव्या, जौ अभि तक केवल ससुरजी केँ 'विशाल लंड' केँ गुणगान कररही थि, अब सुमित केँ नीचे बेकाबू होकर अपनीकमर ऊपरउठा रही थि। उसेसमझ आँ गय़ा कि मोटा औऱ बड़ा होना हि सभीकुछ नहि हैं, बल्कि उसअंग कों चलाने कां तरीका औऱ महिला केँ शरीर कों संतुष्ट करने कां जज्बा असलीसुख हैं।
नव्या: (पसीने मे नहाते हुए)"अहह! सुमित। हाँ! वहीँ.ओ गॉड! तुम् तोँ। तुम् तोँ मुझेमार हि डालोगे। बाकीसभी। सभी फीका हैं इसकेआगे! तुम्। तुम् तोँ कमालकर रहे हौ!"
सुमित कि उस जबरदस्त परफॉरमेंस नें नव्या कों एक् नहि, बल्कि तीनबार लगातार झड़ने पर्र मजबूर कर दिया। वो ससुरजी केँ उस भारी लंड कि छवि कों भूल गई। उसे अहसास हुआ कि बड़ा लंड केवलडरा सकता हैं याँ नज़रों कों चैनदे सकता हैं, पर्र सुमित जैसा मर्द हि हैं जौ स्त्री कों उसकीरूह तक तृप्त कर सकता हैं।
नहि आप् हि लिखो आपकी लेखनी बहरीन हैं इतने जल्द ससुरजी केँ नीचे आँ गई तोँ किस्सा मे मज़ाकम आएगा अच्छा चलरहा हैं लिखते रहिए अगलेभाग कि इंतजार मे
कथा जितनी लंबी होगी उतनी मजेदार भि होगी स्टोरी बहोत बढ़िया लगरही हैं आप् लिखते रहो
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
समर्पण औऱ चरमसुख कि पराकाष्ठा
सुमित आज रुकने वाला नहि थां। उसने नव्या कि आँखों मे वो बदली हुईँ चमकदेख ली थि—वोचमक जोँ अब किसी'छवि' केँ पीछे नहि, बल्कि उसके वजूद केँ लिए तड़परही थि। नव्या, जौ कुछ घंटों पहले तक ससुरजी केँ उस विकराल मूसल कि कल्पनाओं मे डूबी थि, अब सुमित केँ मध्यम मगर फौलादी अंग केँ नीचेमोम कि तरह पिघलरही थि।
सुमित नें नव्या कि दोनों टांगों कों उठाकर अपने कंधों पर्र रख लिया। इस स्थिति (position) मे नव्या कि तरबतर बुर पूरीतरह खुल गई थि। सुमित नें जब अपनीकमर कां पूराजोर लगाकर एक् गहरा धक्का दिया, तौ नव्या केँ मुँह सें एक् ऐसीचीख निकली जौ दर्द कि नहि, बल्कि उस रूहानी सुख कि थि जिसे वो पहलीबार महसूस कररही थि।
नव्या: (सुमित केँ गले मे बाहें डालते हुए)"अहह। सुमित! मर गई। तुम्। तुम् कहां छिपाकर रखे थें यहआग? वोँ सहेलियां कहती हें मोटा लंड। मगर वोँ सभीबस एक् धोखा हैं असलीजान तोँ तुम्हारे इन धक्कों मे हैं। अहह! गहरे। औऱ गहरे मारो सुमित!"
सुमित कां परफॉरमेंस किसीमझे हुए खिलाड़ी जैसा थां। उसने नव्या केँ विशाल बोबों कों अपने हाथों मे भरकर उन्हें बुरीतरह मसला, औऱ नीचे सें अपनी रफ़्तार औऱ तेजकर दि। नव्या कों लगरहा थां जैसे सुमित कां वो अंग उसकी बुर कि दीवारों कों खुरचता हुआ सीधा उसकी आत्मा तक पहुँच रहा हैं।
नव्या कां न्योछावर होना:
नव्या अब पूरीतरह सुमित केँ वश मे थि। उसेसमझ आँ गय़ा थां कि मोटा-ताजा होना केवल दिखावा हौ सकता हैं, पऱ सुमित कां ये सटीक प्रहार हि स्त्री कि असली संतुष्टि हैं। उसने सुमित कां चेहरा अपने हाथों मे लिया औऱ उसे पागलों कि तरह चूमने लगी।
नव्या: "सुमित। मे तुम्हारी हूं। मात्र तुम्हारी। मतुम। तुम् तौ मुझे स्वर्ग दिखारहे होँ। मुझेऐसे हि ठोको। सारीरात। मुझे निचोड़ लो सुमित!"
सुमित नें नव्या कों घुमाया औऱ उसे 'डॉगी स्टाइल' मे कर दिया। पीछे सें जब सुमित नें अपनीकमर कि ताकत कां इस्तेमाल किया, तौ नव्या कि भारी गांड़ कि लचक देखने लायक थि। हर धक्के केँ संग नव्या कां जिस्म आगे कि ओर झुकता औऱ वो खाट कि चादर कों अपने दांतों सें दबा लेती।
चरम सीमा:
सुमित अब अपनी आखरी सीमा पऱ थां। उसने नव्या कों वापस सीधा किया औऱ उसकेऊपर लेटकर अपनी रफ़्तार कों तूफानी बना दिया। नव्या कां पूरा जिस्म झटकेखा रहा थां। उसकी बुर कि मांसपेशियां सुमित केँ अंग कों बुरीतरह जकड़रही थीं।
नव्या: "आँ रहा हैं। सुमित। मेराफिन सें आँ रहा हैं! अहह! तुम्। तुम् बेमिसाल होँ! मे तुम् पर्र न्योछावर हूं। मार डालो मुझे!"
एक् जोरदार आह केँ संग नव्या फिन सें झड़ गई, औऱ ठीकउसी समय सुमित नें अपना सारा गर्म लावा नव्या कि गहराई मे उड़ेल दिया। दोनों पसीने मे लथपथ, एक्-दूसरे कि बाहों मे गिरे थें।
नव्या नें सुमित केँ सीने पर्र सिररखा औऱ ठंडी सांसली। ससुरजी कां वो विकराल औऱ कालानाग अब उसकेमन सें पूरीतरह उतर चुका थां। उसेसमझ आँ गय़ा थां कि घऱ केँ असली 'खिलाड़ी' उसके पति सुमित हि हें।
नव्या इस टाइम सुमित कि चौड़ी छाती पर्र सिर टिकाए बेसुध पड़ी थि। उसकीबंद आँखों केँ पोरों सें चैन केँ आंसूछलक रहे थें। ये वो तृप्ति नहि थि जौ मात्र जिस्म केँ एक् अंग कों मिलती हैं, ये वो रूहानी शांति थि जौ तब मिलती हैं जबकोई पुरुष अपनी काम-कला औऱ परफॉरमेंस सें स्त्री केँ वजूद केँ एक्-एक् रेशे कों झंकृत करदे।
ससुरजी कां वो विकराल मूसल, वो कालानाग। जिसकी चर्चा नव्या नें मालती केँ सामने आसमान तक कर दि थि, आजउसे एक् बेजान औऱ डरावने खिलौने जैसालग रहा थां। उसे अहसास हुआ कि उसने मात्र उस 'विशालता' केँ डर औऱ सम्मोहन कों हि सुखमान लिया थां, पऱ असली जन्नत तौ सुमित केँ इन सटीक औऱ लयबद्ध धक्कों मे छिपी थि।
लेखक कां दृष्टिकोण: आकार बनामकला
यहा एक् लेखक केँ तौर पऱ येबात रेखांकित करना ज़रूरी हैं कि अक्सर औरतें औऱ मर्द, दोनों हि एक् गलतफहमी कां शिकार रहते हें। समाज औऱ कहानियों नें ये भ्रम पैदाकर दिया हैं कि एक् विशाल औऱ मोटा लंड हि स्त्री कि संतुष्टि कां एकमात्र पैमाना हैं। पर्र कड़वासच ये हैं कि महज़ 'साइज' कां होना किसीकाम कां नहि, यदिउसे चलाने वालाहाथ (याँ कमर) अनाड़ी होँ।
एक् मोटा लौड़ा अक्सर स्त्री केँ लिए मात्र शारीरिक पीड़ा याँ 'टियरिंग' (अंग कां फटना) कां सबब बनता हैं, जिससे महिला डरी रहती हैं औऱ उसका ध्यान चरमसुख (orgasm) सें हटकर केवलउस 'भारीबोझ' कों सहने पऱ टिका रहता हैं।
वहीँ, सुमित जैसा मध्यम आकार कां अंग:
* महिला केँ संवेदनशील अंगों (G-Spot) तक सटीक पहुँच बनाता हैं।
* इसमें मर्दाना फुर्ती औऱ गति (Performance) बेमिसाल होती हैं।
* ये महिला कों डराता नहि, बल्कि उसे अपनीलय मे बहने केँ लिए उकसाता हैं।
नव्या आजइसी सच्चाई सें रूबरू हुइ थि। उसेसमझ आँ गय़ा थां कि ससुरजी कां वो 'मूसल' केवल एक् छलावा औऱ दिखावा थां। असलीजान तोँ सुमित केँ उन धक्कों मे थि, जिसने आज उसकी बुर कि गहराई मे सोई हुइ उसअगन कों शांत किया थां जिसे वो सालों सें ढूंढरही थि।
नव्या कां पश्चाताप औऱ मालती कों मेसेज
नव्या नें सुमित केँ गले मे अपनी बाहें औऱ कसीं औऱ उसके माथे कों चूमा। उसे अपने आप् पर्र हंसी आँ रही थि कि वो एक् 'साइज' केँ पीछेभाग रही थि, जबकि असली हीरा तौ उसके अपने बेडरूम मे थां।
नव्या: (मन हि मन) "मे कितनी पागल थि। बाबूजी केँ उस विकराल अंग कों देखकर लगरहा थां जैसेवही सभीकुछ हैं। पऱ आज सुमित नें मुझे बताया कि असली चुदाई कां मतलब क्याँ होता हैं। ससुरजी जी कि वो 'मशाल' तोँ मात्र आँखों कों चकाचौंध करने केँ लिए थि, घऱ कां असली चिराग तौ सुमित हैं। "
उसे अचानक गाँव मे रह गई अपनी मम्मी मालती कि चिंता हुई। उसने सोचा, "कहीं मेरी बातों मे आकर मां उस 'भारी मूसल' केँ चक्कर मे कोईगलत कदम न् उठा लें। मुझेउसे बताना होगा कि 'दिखावा' हि सभीकुछ नहि होता। "
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
मां-बेटी कां अश्लील संवाद औऱ आकार कि बहस
जगह: दिल्ली औऱ कोठी (मोबाइल पर्र)
टाइम: सुभह९:३० बजे
दिल्ली कि खिड़की सें आतीधूप नव्या केँ चेहरे पऱ पड़रही थि, पऱ उसकामन अपनी मम्मी मालती कि फिक्र मे अटका थां। सुमित केँ कलरात केँ उस बेमिसाल परफॉरमेंस नें नव्या कि आँखें खोल दि थीं। उसने मोबाइल मिलाया औऱ मालती नें दूसरी घंटी पर्र हि उठा लिया।
नव्या: "प्रणाम मम्मी! कैसी होँ? रात कैसी बीती कोठी मे?"
मालती: (एक् रहस्यमयी हंसी केँ संग)"रात तोँ शांत थि लाडो, पऱ तेरे ससुरजी कि आँखों मे जौ तूँ 'चिनगारी' छोड़कर गई हैं, वो पूरेघऱ कों तपारही हैं। वो अपनीउसी कुर्सी पऱ जमे थें, औऱ उनकी धोती केँ नीचे कां वो मूसल.ओह! दूर सें भि उसकीधमक महसूस होँ रही थि। "
नव्या: (गंभीर होतेहुए) "मम्मी, उसी बारे मे बात करने केँ लिए मोबाइल किया हैं। देख, कल रात सुमित नें मुझे जौ सुख दिया हैं, उसकेबाद मेरा भ्रमटूट गय़ा हैं। मे सचकहरही हूं मेरी चुदक्कड़ मम्मी। वो जौ विकराल औऱ मोटा लंड तूनेवहा देखा हैं, वो सभीकुछ नहि हैं। साइज केवल दिखावा हैं। सुमित कां अंग मध्यम हैं, पऱ उसनेकल रात मेरा वोँ हाल किया हैं कि मेरी बुर कां कोना-कोना तृप्त हैं। पतला औऱ छोटाअंग भि गजबढा सकता हैं अगर मर्दउसे चलाना जानता हौ। "
मालती मोबाइल केँ उसपार खिलखिलाकर हंसपड़ी। उसकी हंसी मे एक् अनुभवी महिला कां तंज थां।
मालती: "तुँ अभि इस मामले मे बच्ची हैं बेटी! तूने अभि दुनिया केँ लंड हि कहां खाए हें? तूने अपनी पूरी जवानी केवल सुमित केँ उस 'मीडियम' साइज पऱ गुजार दि, इसलिये तुम्हारी तरफ वो 'पहाड़' जैसालग रहा हैं। ये ससुरजी वाला मूसल तेरा पहला होतायदि तूँ पति केँ अलावा किसी औऱ कां स्वाद चख लेती। पर्र तूँ तौ बीच रास्ते सें हि भागखड़ी हुइ। "
नव्या: "मां, समझने कि कोशिश कर! सुमित नें जोँ कलरात किया, वो कोई मोटा-ताजा अंग नहि कर सकता। वो भारी चीज़ केवल दर्द देगी याँ तुम कोफाड़ डालेगी। तुँ ससुरजी केँ उस भारी लंड केँ मोह मे मतफंस। "
मालती: (आवाज़ मे सख्ती औऱ हवस मिलाते हुए)"सुन नव्या! मुझे ज्ञान मतदे लाडो। मैंने अपनी उम्र गुज़ारी हैं इन चीज़ों मे। वो जौ विकराल औऱ कालानाग तेरे ससुरजी कि जांघों केँ बीचफन फैलाए बैठा हैं, उसकी एक् मार किसी भि स्त्री कि सात पुश्तों कि प्यास बुझा सकती हैं। तूनेउसे मात्र देखा हैं, मैंने उसे महसूस किया हैं जब वो मेज केँ नीचे मुझेछू रहा थां। वो लोहा हैं नव्या, औऱ लोहे कि मार कां मज़ा हि कुछ औऱ हैं। "
नव्या चुपरह गई। उसेसमझ आँ गय़ा कि मालती पर्र अब ससुरजी केँ उस भारी व्यक्तित्व औऱ विकराल अंग कां चमत्कार पूरीतरह चल चुका हैं।
मालती: "तुँ अपनी दिल्ली कि 'मीडियम' गृहस्थी संभाल, औऱ मुझेयहा इस 'विकराल' हिसाब कों निपटाने दे। तूने तौ हाथ लगाने सें मना किया थां, पऱ अब मुझे नहि लगता कि मे उस मूसल कों बिनाचखे यहा सें जा पाउंगी। "
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