विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
नव्या दीया जलाकर अभि भि वहीं झुकी हुई थि। दीपक कि वो हल्की सि कांपती लौ उसकेहरे रंग कि झीनी चोली केँ भीतरकैद उसके मांसल औऱ विशाल बोबों कि गहरी दरार (cleavage) कों सोने जैसा चमकारही थि। साड़ी कां पल्लू कंधे सें सरककर कोहनी तक आँ गिरा थां, जिससे उसकीकमर कि चिकनाई औऱ नाभि कां गहरा गड्ढा विक्रम सिंह कि आँखों केँ सामने पूरीतरह नुमाया थां।
विक्रम सिंह अपनी कुर्सी पऱ जकड़ेहुए थें, पऱ उनकी धोती केँ भीतर वो विकराल मूसलअब किसी लोहे केँ खंभे कि तरह सीधाखड़ा होकर कपड़े कों फाड़ने कि जिद्द कररहा थां। उस उभार कि मोटाई औऱ लंबाई कों देखकर नव्या केँ जिस्म मे बिजली सि कौंध गई।
नव्या: (दीपक कि लौ कों देखते हुए, दबी आवाज़ मे) "बाबूजी। आपकीइस 'मशाल' कि गर्मी यहा तक आँ रही हैं। देखिए तोँ, आपकी धोती केँ नीचेकोई बेगुनाह कैद होने केँ लिए कितनी छटपटाहट दिखारहा हैं। इतना भयंकर औऱ कालानाग। इसे देखकर तौ लगता हैं कि यह किसी भि 'बिल' कों फाड़कर उसे अपनी स्थान बना लेगा। "
विक्रम सिंह नें एक् लंबी सांस खींची, उनकी छातीफूल गई औऱ उनकाहाथ अनचाहे हि अपनी जांघ कि ओरबढ़ा।
विक्रम सिंह:"यह बेगुनाह नहि हैं नव्या, यह तोँ गुनहगार हैं। औऱ इसकीसज़ा मात्र तुम्हारी उसकसी हुई बुर कि कैद हैं। देखोइसे। यह तुम्हारी इस 'नग्नकला' कों देखकर फटने कि कगार पऱ हैं। मेरामन कररहा हैं कि अभि इस धोती कों उतार फेंकूं औऱ तुम्हारी तरफ दिखाऊं कि जिस 'मूसल' कि तुँ तारीफ कररही हैं, वो असल मे कितना खूंखार औऱ गर्म हैं। "
नव्या नें धीरे-धीरे सें गर्दन घुमाई औऱ ससुरजी कि आँखों मे देखते हुए अपने दोनों हाथों सें अपनी भारी जांघों कों सहलाया।
नव्या: "अहह। बाबूजी, इतना सीधा औऱ सख्त!इसे देखकर तोँ मेरा 'अमृत कुंड' स्वयं-ब-स्वयं झरनेलगा हैं। काश मर्यादा कि यह जंजीरें नं होतीं, तोँ मे अभि इसी चौरे पऱ घुटनों केँ बल बैठकर आपकेइस लाल सुपाड़े कां साराजहर अपने मुँह मे भर लेती। कितना कामुक लगरहा हैं यह। बिल्कुल किसी मस्तक उठाएहुए नाग कि तरह!"
विक्रम सिंह: (हांफते हुए) "तौ फिनदेर किसबात कि हैं नव्या? तूँ बस अपनीइस साड़ी कों जरा औऱ ढीलाकर। मे चाहता हूं कि तुँ इस दीपक कि रोशनी मे अपनेइन तरबूजों कों पूरीतरह आज़ादकर दे। मे बस देख्ना चाहता हूं कि जब मेरायह मूसलहवा मे लहराएगा, तौ तेरे जिस्म केँ यहअंग केसे थरथराएंगे। "
नव्या कि सांसें तेज हौ गई थीं। उसने अपनी उंगली साड़ी केँ किनारे पऱ रखी औऱ उसे हल्का सां नीचे सरकाया, जिससे उसके बोबों कां ऊपरी हिस्सा औऱ भि नंगा होकर ससुरजी केँ 'दर्शन' केँ लिएपेश हौ गय़ा।
नव्या: "आज तोँ केवल नज़रों कां संभोग होगा बाबूजी। पर्र वादा करती हूं, जब मां आएगी, तौ यह कोठीइस विकराल लंड कि मार औऱ मेरी चीखों सें गूँज उठेगी। अभि तौ आप् बसइसे अपनी मुट्ठी मे भींचकर मेरानाम लीजिये, औऱ मे अंदर जाकर अपनी 'गीलीतड़प' कों शांत करूँगी। "
वो एक् झटके सें उठी, अपनी साड़ी कों संभाला, औऱ एक् ऐसी अश्लील नज़रउस खड़ेहुए अंग पऱ डाली कि विक्रम सिंह कां रोम-रोम कांपउठा।
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
नव्या लड़खड़ाते कदमों सें अपने कमरे केँ भीतर पहुंची औऱ दरवाजा बंद करते हि उसकीपीठ दीवार सें चिपक गई। उसकी सांसें किसी भागती हुईँ हिरणी कि तरहचल रहीथीं। बाहर् ससुरजी कि धोती केँ भीतर जोँ पहाड़ जैसा उभार उसने देखा थां, उसकीछवि उसकीबंद आँखों केँ पीछे किसी दहकते हुए अंगारे कि तरहनाच रही थि।
उसने अपनी जांघों कों एक्-दूसरे सें जोर सें रगड़ा। उसकी बुर सें निकलने वाला काम-रस अब उसके पैरों कि ओर बहनेलगा थां। वो पागलों कि तरह अपने हि जिस्म कों नोचने लगी, उसकी उंगलियां अपनी साड़ी केँ पल्लू कों हटाकर उन विशाल बोबों कों बुरीतरह मसलने लगीं।
नव्या (अंधेरे मे सिसकते हुए):"अहह। बाबूजी! क्याँ चीज़पाल रखी हैं आपने! वो विकराल मूसल। वो इतना सख्त औऱ इतना बड़ा केसे हौ सकता हैं? मेरी तौ रूह कांपरही हैं उसे सोचकर। पऱ यह बुर। यह बुर तोँ बसउसी केँ नीचे दबकर फटने केँ लिए तड़परही हैं। अहह! बाबूजी। रगड़िये उसे.दबा दीजिये अपनी मुट्ठी मे उस कालेनाग कों!"
नव्या नें अपनी साड़ी औऱ पेटीकोट कों ऊपर घुटनों तक उठा लिया। कमरे कि तन्हाई मे उसके सिसकने कि आवाज़ें औऱ भि अश्लील हौ गई थीं। वो अपनी उंगलियों कों अपनी तरबतर बुर कि गहराई मे उतारते हुए ससुरजी केँ उस खूंखार अंग कां गुणगान करनेलगी।
नव्या: "मां! तूनेसच कहा थां। यहा कां पानी हि कुछ औऱ हैं। बाबूजी कां वो मूसल। वो जब मेरीइस तंग गुफा मे घुसेगा, तोँ मेरा क्याँ होगा? वो तौ मुझे फाड़ डालेगा! अहह। कितना मोटा। कितना लंबा! मेरामन कररहा हैं कि अभि खिड़की तोड़कर बाहर् जाऊं औऱ उसलाल सुपाड़े कों अपनी जांघों केँ बीचदबा लूँ। बाबूजी। मार डालिये मुझे अपनेउस हथियार सें!"
नव्या केँ जिस्म मे अब झटके लगने शुरुआत हौ गए थें। ससुरजी केँ उस खड़ेहुए लंड कि कल्पना हि उसकेलिए किसी वास्तविक चुदाई सें ज़्यादा ताकतवर साबित हौ रही थि। उसका चेहरा उत्तेजना सें लालपड़ चुका थां औऱ उसकी आँखें पलटरही थीं।
नव्या: "अहह। आँ रहा हैं। मम्मी। बाबूजी! आपका वो नाग मुझेडस रहा हैं। लेँ लीजिये। लेँ लीजिये अपनीइस कुलटा बहू कि बलि!अहह! मे। मे झड़रही हूं!"
नव्या कां जिस्म एक् ज़ोरदार ऐंठन केँ संग कमान कि तरहतन गय़ा। उसके मुँह सें एक् दबी हुइ, लंबी औऱ अश्लील चीख निकली औऱ उसकी बुर नें गर्मधार छोड़ दि। वो कांपती हुईँ फर्श पर्र ढह गई, उसका पूरा जिस्म पसीने औऱ काम-रस मे नहाया हुआ थां।
उधर बाहर् बरामदे मे, विक्रम सिंह भि अपनी कुर्सी पर्र निढाल पड़े थें। दोनों केँ बीच कि दूरी अभि भि बनी हुइ थि, पऱ उस विकराल लंड कि ताप नें कमरे केँ भीतर नव्या कि मर्यादा कि आखिरी दीवार भि पिघला दि थि।
बरामदे मे सन्नाटा तोँ थां, पऱ विक्रम सिंह केँ भीतरहवस कां एक् समंदर उबलरहा थां। नव्या तोँ अंदरजा चुकी थि, मगर वो अपने पीछे वासना कां ऐसा मंजरछोड़ गई थि जिसने विक्रम सिंह कि रातों कि नींद औऱ जिस्म कां चैनलूट लिया थां।
विक्रम सिंह नें कुर्सी केँ हत्थों कों इतनीजोर सें भींचा कि उनकी हथेली कि नसेंउभर आईं। उनकी आँखों केँ सामने अभि भि दीपक कि वो हल्की लौनाच रही थि, जिसने नव्या केँ हरेरंग कि चोली मे फंसेउन विशाल औऱ मुलायम बोबों कों किसी सोने केँ कलश कि तरह चमका दिया थां।
विक्रम सिंह (दांत पीसते हुए बुदबुदाए): "उफ़। वोँ उठान!जब वो झुकी थि, तोँ उन बोबों कि वोँ गहरी दरार.ऐसा लगरहा थां जैसेकोई प्यासा उसमें डूबकर मरजाए। औऱ वोँ चमक। चोली कां वोँ तंग कपड़ाउन पहाड़ जैसे मांसल पिण्डों कों संभाल नहि पारहा थां। क्याँ देहपाई हैं मालती कि बेटी नें। बिल्कुल कच्ची कली कि तरह मांस सें लबालब!"
विक्रम सिंह नें अपनी आँखें बंदकीं, तौ उन्हें नव्या कि वो विदा होती हुइ पीठयाद आई। जब वो अंदरजा रही थि, तोँ उसकी भारी औऱ चौड़ी गांड़ कि वोँ कातिलाना लचक। साड़ी केँ महीन कपड़े केँ नीचे उसके कूल्हों केँ दोनों मांसल हिस्सों कां वो आपस मे टकराना औऱ थिरकना विक्रम केँ दिमाग़ मे हथौड़े कि तरहबज रहा थां।
उनका विकराल मूसलअब धोती कि कैद कों बर्दाश्त करने केँ सजधजकर नहि थां। वो किसी पागल जानवर कि तरह कपड़े केँ नीचेसर पटकरहा थां। विक्रम नें अपनी कांपती उंगलियों सें धोती केँ उस भारी उभार कों ऊपर सें हि सहलाया।
विक्रम सिंह: "इतनीलचक। इतनी गर्मी! अगरयह गांड़ केँ फांक एक् बार मेरी जांघों पर्र सवार हौ जाएं, तोँ मे कोठी कि सारी मर्यादा कों इस कालेनाग केँ नीचे कुचलदूँ। नव्या। तूनेआज जौ दिखाया हैं, वो अधूरा हैं। तेरीउस लचक कां जवाब तौ मेरायह लोहे जैसा सख्तअंग हि दे सकता हैं। अहह! केसेमटक रही थि, जैसेकह रही हौ कि 'बाबूजी, दम हैं तोँ इस किले कों फतह करके दिखाओ'। "
विक्रम सिंह कि सांसें उखड़ने लगीथीं। वो कुर्सी पर्र पड़े-पड़े हि अपनीकमर कों हल्का-हल्का हिलाने लगे, जैसे खयालों मे हि नव्या कि उस भारी गांड़ कों पीछे सें ठोकरहे हों। उन्हें महसूस हौ रहा थां कि कोठी कि दीवारों केँ पीछे नव्या भि इसीसमय अपने जिस्म कों नोचरही होगी।
हवा मे अभि भि नव्या केँ जिस्म कि वो सोंधी गंध औऱ दीपक केँ तेल कि खुशबू घुली हुइ थि। विक्रम सिंह नें एक् हाथ अपनी धोती केँ भीतरडाल लिया औऱ उस खूंखार औऱ तपतेहुए मूसल कों मजबूती सें थाम लिया।
विक्रम सिंह:"रुक जा नव्या। अभि तौ केवल दीयाजला हैं, अभि इस कोठी मे तेरे औऱ तेरी मम्मी केँ जिस्मों कि चिता जलनी बाकी हैं। मेरायह विकराल लंड आजरात केवल खयालों सें नहि मानेगा."
वो अंधेरे मे बैठे-बैठे हि अपनी मुट्ठी कि रफ़्तार बढ़ाने लगे, औऱ हर झटके केँ संग नव्या केँ उन चमकते बोबों औऱ लचकती गांड़ कां अश्लील चित्र उनकीबंद आँखों केँ सामने औऱ भि साफ़ होता गय़ा।
बरामदे कि उस सुनसान रात मे, विक्रम सिंह केँ सब्र कां बांध पूरीतरह टूट चुका थां। नव्या कि उन दहकते हुए बोबों कि चमक औऱ उसकी गांड़ कि वो मखमली लचक नें उनकेमन कि हरनस कों कामुकता सें भर दिया थां। वो कुर्सी पऱ किसी घायलशेर कि तरह प्यास रहे थें।
उनका दायां हाथ धोती केँ भीतरउस विकराल मूसल कों पूरी मजबूती सें जकड़े हुए थां। वो अंगअब किसी तपतेहुए लोहे कि छड़ कि तरहदहक रहा थां। विक्रम सिंह नें अपनी गर्दन पीछे कि ओर झुका दि, उनकी आँखें बंदथीं औऱ उनके चेहरे पऱ हवस कि वो चरम पीड़ा साफ़दिख रही थि।
विक्रम सिंह: (सिसकते हुए औऱ बुरीतरह हांफते हुए)"अहह। नव्या। तेरी वोँ जवानी। मुझे जलाकर राखकर देगी। उफ़! वोँ बोबों कां उठान। जैसेकोई मुझे अपनी बाहों मे भींचरहा हौ। औऱ वोँ गांड़ कां मटकना। अहह! मेरी आँखों केँ सामने अभि भि तेरी वोँ साड़ी केँ नीचे थिरकती हुईँ देहनाच रही हैं। लेँ। नव्या। देख तेरेइस ससुरजी कां हाल!"
विक्रम केँ हाथ कि रफ़्तार अब किसी बेकाबू मशीन जैसी होँ गई थि। उनकी मुट्ठी उस खूंखार औऱ मोटेनाग कों ऊपर सें नीचे तक बुरीतरह मसलरही थि। उन्हें महसूस हौ रहा थां जैसे नव्या ठीक उनके सामने खड़ी अपनी साड़ी उताररही हैं औऱ अपनेउन विशाल तरबूजों कों उनके मुँह केँ पासला रही हैं।
विक्रम सिंह:"अहह! नव्या। तूने मेरी रातों कि नींद हरामकर दि हैं। तेरी मां मालती नें भि मुझे इतना नहि तड़पाया होगा जितना तुँ अपनीइस नंगी नज़ाकत सें माररही हैं। यह.यहदेख मेराजहर। यह मात्र तेरेउस 'अमृत कुंड' केँ लिए थां। पऱ तूने मुझेइस मोड़ पऱ लाकरखड़ा कर दिया हैं! आँ। आँ। नव्या!"
विक्रम सिंह कां पूरा शरीर कमान कि तरहतन गय़ा। उनकी जांघें थरथराने लगीं औऱ धोती केँ भीतर उनका वो विकराल अंग झटके लेनेलगा। ठीकउसी लम्हा, एक् दर्दनाक आह केँ संग, उनके भीतर सें सफ़ेद गर्म लावा फव्वारे कि तरह छूटा औऱ उनकी मुट्ठी कों भिगोता हुआ धोती औऱ कुर्सी पर्र बिखर गय़ा।
वो वहीं निढाल पड़गए। उनकी सांसें उखड़ी हुईँ थीं औऱ माथे पऱ पसीने कि बूंदें चमकरही थीं। कोठी कि उसरात नें आज विक्रम सिंह जैसे कठोर मर्द कों अपनीबहू कि जवानी केँ आगे घुटने टेकने पर्र मजबूर कर दिया थां। अंदर नव्या अपनी 'गीलीतड़प' मे डूबी थि, औऱ बाहर् ससुरजी अपनी हि 'जलन' मे बह चुके थें।
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
मालती कां आगमन औऱ लंड कां बखान
जगह: कोठी कां मुख्य दरवाज़ा औऱ नव्या कां रूम
वक़्त: अगली सुभह १०:३०बजे
रात कि उस तूफानी उत्तेजना केँ बाद, सुभह कि कोठी एक् अजीब सि शांति ओढ़ेहुए थि, जैसे किसी बड़े धमाके सें पहले कि खामोशी होँ। तभी दरवाजे पर्र दस्तक हुइ। नव्या नें भागकर दरवाजा खोला—सामने मालती खड़ी थि। वही चेहरा, वही ढलती उम्र मे भि बरकरार कशिश, औऱ आँखों मे वो पुरानां राज जिसे वो छिपाती आई थि।
विक्रम सिंह अपनीउसी कुर्सी पऱ जमे थें। जैसे हि उनकीनज़र मालती पऱ पड़ी, उनकी आँखों मे एक् शिकारी वालीचमक कौंध गई।
विक्रम सिंह: (एक् भारी औऱ अर्थपूर्ण मुस्कान केँ संग) "राम-राम मालती! बहोत बरसों बादइस चौखट पऱ कदमरखा। सुना हैं तुम्हें यहा केँ 'हिसाब-पुस्तक' कि बहोत याद आँ रही थि?"
मालती नें अपनी साड़ी कां पल्लू थोड़ा औऱ खींच लिया, उसकी सांसें थोड़ीतेज थीं। "राम-राम समधीजी। बस, बेटी कां मन नहि लगरहा थां तोँ खींची चलीआई। "
विक्रम सिंह: "अच्छी बात हैं। अबआई होँ तौ मेहमान-नवाजी कां पूरा स्वाद लेकर जानां। यहा बहोत कुछऐसा हैं जोँ तुमने पहलेकभी नहि देखा होगा। "
नव्या नें ससुरजी कि आँखों कि वो अश्लील चमक भांपली। वो मालती कां हाथ पकड़कर उसे सीधे अंदर अपने कमरे मे लें गई। जैसे हि कमरे कां दरवाजा बंदहुआ, नव्या नें अपनी मां कों खाट पऱ बिठाया औऱ स्वयं उसके सामने फर्श पऱ बैठ गई।
मालती: (घबराते हुए) "नव्या, यह तूने क्याँ बखेड़ा खड़ाकर रखा हैं? समधीजी कि नज़रें तौ जैसे मुझे कच्चा चबा जानां चाहती हें। "
नव्या: (अपनी आँखों मे एक् दीवानगी लेकर) "केवल नज़रें नहि मां। अगर तूने उनका वो मूसलदेख लिया नं, तोँ तूँ अपनी सुध-बुध खो देगी। मम्मी, सचकहरही हूं, जौ आग तूने मेरी विवाह कि रात बुझाई थि, उसे असली ठंडक केवल बाबूजी हि दे सकते हें। "
मालती नें अपनी बेटी कां मुंह दबाना चाहा, पर्र नव्या रुकी नहि।
नव्या: (फुसफुसाते हुए औऱ उत्तेजित होकर) "मां, तूनेकभी ऐसा विकराल औऱ कालानाग नहि देखा होगा। जब वो अपनी धोती केँ भीतर अंगड़ाई लेता हैं, तौ ऐसा लगता हैं जैसेकोई लोहे कां खंभाखड़ा होँ गय़ा होँ। कलरात जब मे दीयाजला रही थि, मैंने अपनी आँखों सें देखा। उनका वो लाल सुपाड़ा औऱ उसकी मोटाई! मम्मी, शपथ सें कहरही हूं, उसे देखकर मेरी बुर सें काम-रस कां फव्वारा छूट गय़ा थां। वो कोई साधारण मर्द नहि हें मम्मी, वो तोँ साक्षात् कामदेव कां अवतार हें जिनका लंड केवल चीखें निकालना जानता हैं। "
मालती कि आँखें फटी कि फटीरह गईं। वो अपनी बेटी केँ मुँह सें ससुरजी केँ अंग कां ऐसा नग्न बखान सुनकर कांपउठी, पऱ कहीं न् कहीं उसके भीतर कि सोई हुईँ हवस भि करवट लेनेलगी थि।
नव्या: "मां, तूँ बस एक् बार उन्हें उस'लाल कपड़े' वाली कुर्सी पर्र बैठेहुए गौर सें देख्ना। तुम्हें पताचल जाएगा कि तेरी बेटी क्यूं इसकदर दीवानी हैं। वो हिसाब। जौ वोँ कहरहे थें। मुझे लगता हैं वोँ मात्र तेरे शरीर कि इसतड़प कां हिसाब हैं। "
भोजन कि मेज औऱ हवस कां परोस
जगह: कोठी कां भोजन कक्ष
टाइम: दोपहर १:३०बजे
दोपहर कि चिलचिलाती धूप कोठी कि खिड़कियों सें छनकर अंदर आँ रही थि। भोजन कि मेज पर्र पीतल कि थालियां सजीथीं, पर्र भूख अनाज कि नहि, बल्कि उस 'जिस्मानी हिसाब' कि थि जोँ हवा मे तैररहा थां। विक्रम सिंहमेज केँ मुख्य हिस्से पऱ बैठे थें। उनके सामने मालती बैठी थि औऱ बगल मे नव्या परोसरही थि।
नव्या नें आज जानबूझकर गहरागला वाला ब्लाउज पहना थां। जब वो झुककर विक्रम सिंह कि थाली मे दाल परोसरही थि, तोँ उसके विशाल बोबे करीब-करीब थाली कों छूने कों थें। विक्रम कि नज़रें मालती केँ चेहरे पऱ टिकीथीं, जोँ लज्जा औऱ उत्तेजना केँ बीचझूल रही थि।
विक्रम सिंह: (एक् निवाला तोड़ते हुए) "क्यूं मालती, भोजन कैसालगा? यहा कां स्वाद तोँ बरसों पहलेचखा थां तुमने। भूल तौ नहि गई न्? याँ फिनयाद दिलाना पड़ेगा कि यहा कि 'गर्मी' कैसी होती हैं?"
मालती नें नज़रें झुकाकर सूखी रोटी कां टुकड़ा तोड़ा। "भोजन तौ बहोत स्वाद हैं समधीजी। पऱ आपकी बातें आजकुछ ज़्यादा हि तीखीलग रही हें। "
नव्या: (बीच मे टोकते हुए, शरारत भरी मुस्कान केँ संग) "मां, बाबूजी कि बातें हि नहि, इनकाहर अंदाज़ हि तीखा हैं। कलरात जब मे इनकेपास बैठी थि, तोँ मुझे अहसास हुआ कि इनकेपास जौ 'खजाना' हैं, वो किसी भि स्त्री कि भूख मिटाने केँ लिए बहुत हैं। क्यूं बाबूजी। मालती मां कों बताइये नं कि आपकीइस उम्र कि मर्दानगी केँ आगे जवान लंड भि पानी भरते हें। "
नव्या कि इस बोल्ड बात नें मालती केँ गले मे निवाला अटका दिया। वो खांसने लगी, तोँ विक्रम सिंह नें धीरे-धीरे सें मेज केँ नीचे अपना पांव बढ़ाया औऱ मालती केँ पेर सें सटा दिया। मालती कां पूरा शरीर बिजली केँ झटके कि तरह कांपउठा।
विक्रम सिंह: (आवाज़ मे भारीपन लातेहुए) "नव्या सचकहरही हैं मालती। यह जोँ मेरा विकराल मूसल हैं, यहआज भि उतना हि जवान हैं जितना उसरात थां जब तुमने पहलीबार इस कोठी मे कदमरखा थां। तुम् दोनों मां-बेटी आजसंग बैठी हौ, तोँ मेरामन कररहा हैं कि आज 'दावत'कुछ खास होँ। मालती, क्याँ तुम्हारी इस ढलती उम्र मे अभि भि उस कालेनाग कों झेलने कि हिम्मत बची हैं जिसे तुम्हारी बेटी रातभर याद करती हैं?"
मालती नें घबराकर मेज केँ नीचे सें अपना पांव हटाना चाहा, पर्र विक्रम सिंह नें अपने मजबूत पंजे सें उसकी पिण्डली कों जकड़ लिया।
मालती: (कांपती आवाज़ मे) "समधीजी। यह आप् क्याँ कहरहे हें। नव्या सामने खड़ी हैं। "
नव्या: "अरे मां, मुझसे क्याँ शरमाना? मैंने तोँ स्वयं अपनी आँखों सें बाबूजी केँ उसलाल सुपाड़े कि चमक देखी हैं। मे तौ चाहती हूं कि आज तुम् भि देखो कि तुम्हारा यह समधीकिस मिट्टी कां बना हैं। बाबूजी, आज दोपहर कि इस तन्हाई मे क्यूं नं मम्मी कों उस 'हिसाब' कां एक् छोटा सां नमूना दिखा दियाजाए?"
विक्रम सिंह नें एक् कुटिल हंसी हंसी औऱ अपनी धोती केँ उस भारी औऱ सख्त उभार कों मेज केँ नीचे हि मालती केँ पांव पर्र रगड़ना शुरुआत कर दिया। मालती कि आँखों मे खौफ औऱ प्यास कां एक् अजीब मिश्रण उभरआया।
मर्यादा कां अचानक प्रहार
जगह: कोठी कां भोजन कक्ष
वक्त: दोपहर २:१५बजे
मेज केँ नीचे विक्रम सिंह कां विकराल मूसल अपनी समधिन मालती कि पिंडलियों पऱ अपनाताप छोड़रहा थां। मालती कां चेहरा पसीने सें तर थां—आधा डर सें, औऱ आधाउस लोहे जैसे सख्तअंग केँ स्पर्श सें जौ उसे रह-रहकर कांपने पर्र मजबूर कररहा थां। नव्या अपनी मां कि आँखों मे उतरती उस बेबसी औऱ हवस कां तमाशा देखरही थि।
विक्रम सिंह अपनी कुटिल जीत कि मुस्कान केँ संग मालती कों पूरीतरह अपनेवश मे करने हि वाले थें कि अचानक कोठी केँ भारी मुख्य दरवाज़ा केँ खुलने कि कर्कश आवाज़ गूँजी।
"मां! आप् यहा? औऱ बाबूजी। आप् सभी नें खानां शुरुआत भि कर दिया?"
वो आवाज़ सुमित कि थि।
पलक झपकते हि मेज केँ नीचे औऱ ऊपर कां सारा अश्लील दृश्य बदल गय़ा। जैसे किसी नें जलती भट्टी पऱ बर्फीला पानीडाल दिया हौ। विक्रम सिंह नें झटके सें अपनापेर पीछे खींच लिया औऱ धोती केँ उस खूंखार उभार कों मेज कि ओट मे छिपाते हुए गिलास कि तरफहाथ बढ़ा दिया। मालती नें एक् झटके मे अपनी साड़ी केँ पल्लू कों गले तक लपेट लिया, उसका चेहरा जोँ अभि वासना सें सुर्ख थां, अबडर सें सफ़ेदपड़ गय़ा।
नव्या, जौ अभि ससुरजी केँ लंड कां बखान अपनी मां केँ सामने कररही थि, बिजली कि फुर्ती सें पीछेहटी औऱ हाथ मे जग लेकरऐसे पानी भरनेलगी जैसे वो दुनिया कि सबसे मर्यादित बहू हौ।
सुमित कमरे मे दाखिल हुआ। उसने अपनी सासू माँ मालती कों देखा तौ उसके चेहरे पऱ ख़ुशी आँ गई।
सुमित: "प्रणाम मम्मी! आप् कबआईं? नव्या नें तौ बताया हि नहि कि आज आप् आने वाली हें। "
मालती: (कांपती आवाज़ कों संभालते हुए)"जी। खुशरहो बेटा। बस अभि थोड़ीदेर पहले हि पहुँची। नव्या कां मोबाइल आया थां कि मन नहि लगरहा, तौ चलीआई। "
विक्रम सिंह नें अपनी आवाज़ कों वापसउसी भारी औऱ अनुशासित लहजे मे ढाला, जिसे वो दुनिया केँ सामने ओढ़े रहते थें।
विक्रम सिंह: "अच्छा किया जौ आँ गए सुमित। काम जल्द निपट गय़ा क्याँ? हम् बस समधिन जी केँ संग भोजन हि कररहे थें। नव्या, सुमित केँ लिए भि थाली लगाओ। "
सुमित अपनी पत्नि नव्या कि तरफबढ़ा। नव्या नें जल्दी सुमित केँ पांवछुए, जबकि अभि कुछ पलों पहले उसकी आँखें ससुरजी कि जांघों केँ बीच अटकेउस विकराल मूसल कि तारीफों केँ पुल बांधरही थीं। सुमित कों अंदाज़ा भि नहि थां कि जिसमेज पर्र वो खानां खानेजा रहा हैं, वहां अभि कुछ पलों पहले उसकी सासू कि पिंडलियों पऱ उसके पिता केँ नंगे लंड कां प्रहार हौ रहा थां।
कोठी पऱ मर्यादा कि एक् मोटी चादरफिन सें बिछ गई थि, पऱ उस चादर केँ नीचेतीन बदन अभि भि उस कालेनाग कि गर्मी सें भीतर हि भीतर झुलसरहे थें।
शतरंज कि बिसात औऱ अंतिम रात कां अल्टीमेटम
जगह: कोठी कां बरामदा
वक़्त: दोपहर ३:००बजे
भोजन केँ बाद सुमित नें हाथ धोतेहुए जौ बम फोड़ा, उसने कोठी कि उस अदृश्य कामुक लय कों छिन्न-भिन्न कर दिया। विक्रम सिंह केँ हाथ मे पकड़ाहुआ पानी कां गिलास हवा मे हि ठिठक गय़ा, औऱ नव्या केँ चेहरे कां रंगउड़ गय़ा। मालती, जौ अभि तक ससुरजी केँ स्पर्श सें सुलगरही थि, अचानक एक् ठंडे सन्नाटे मे डूब गई।
सुमित: "बाबूजी, असल मे दिल्ली मे कंपनी नें मुझे एक् बढ़िया फ्लैट दे दिया हैं। वहा अकेले रहना, स्वयं खानां बनाना बहोत भारीपड़ रहा हैं। मैंने सोचाअब नव्या कों संग हि लेँ जाऊं। आज कि रात हैं हमारे पास, कल सुभह कि पहलीबस सें हम् निकल जाएंगे। "
विक्रम सिंह केँ भीतर एक् ज्वालामुखी फटा, पऱ बाहर् उनका चेहरा पत्थर जैसा शांतरहा। जिस विकराल मूसल कों वो नव्या औऱ मालती केँ 'अमृत कुंड' मे उतारने कां सपनेदेख रहे थें, वो सुमित कि इसबात सें औऱ भि अधिक प्रतिशोध मे तपनेलगा।
विक्रम सिंह: (भारी आवाज़ मे) "इतनी जल्द सुमित? नव्या केँ बिना कोठी सूनी होँ जाएगी। औऱ फिन तुम्हारी सासू भि अभि-अभि आई हें."
सुमित: "बाबूजी, मां तौ अबआई हें, वोँ यहाकुछ दिनरुक लेंगी। पर्र मुझे नव्या कि ज़रूरत वहा ज़्यादा हैं। नव्या, जाओ सामान बांधलो, कल सुभह निकलना हैं। "
नव्या चुपचाप अंदर कमरे मे चली गई, पर्र उसकीचाल मे वो मटक नहि थि। उसके भीतर एक् अजीब सि छटपटाहट थि—एक् तरफ पति कां संग थां, तौ दूसरी तरफ ससुरजी कां वो खूंखार कालानाग, जिसे बिनाचखे जानां उसे अपनी जवानी कां अपमान लगरहा थां।
जैसे हि सुमित हाथ धोने बाहर् गय़ा, विक्रम सिंह नें किचन कि दहलीज पऱ खड़ी मालती औऱ नव्या कि ओर एक् जलती हुइ निगाह डाली। उनकी आँखों मे स्पष्ट मेसेज थां— 'हिसाब' आजरात हि चुकता होगा।
विक्रम सिंह अपनी कुर्सी पर्र झुके औऱ दबी आवाज़ मे बोले, जिसे केवल वोँ दोनों सुन सकें— "तोँ कल सुभह पंछीउड़ जाएगा? पऱ याद रखना नव्या, आज कि रात अंतिम हैं। औऱ मालती। तुम्हारा वोँ 'पुरानां हिसाब' भि इसीरात कि कोख मे दफन होना हैं। सुमित थकाहुआ हैं, जल्दसो जाएगा। पऱ इस कोठी कां 'मालिक' आजरात जागता रहेगा। "
नव्या नें ससुरजी केँ उस भारी उभार कि ओर एक् अंतिम हसरतभरी निगाह डाली। उसे पता थां कि आजरात कोठी मे मर्यादा कां खून होगा औऱ ससुरजी कां वो विकराल मूसल अपनी प्यास बुझाकर हि दम लेगा।
ठंडीरात औऱ बदलाहुआ इरादा
जगह: नव्या कां शयनकक्ष
वक़्त: रात ११:४५बजे
रात कां सन्नाटा कोठी पऱ हावी थां, मगरइस बार वो सन्नाटा वासना सें ज़्यादा एक् नई रणनीति कि गूँजलिए हुए थां। विक्रम सिंह अपने कमरे मे उस विकराल मूसल कि गर्मी लिए इंतजार कररहे थें कि आजरात मर्यादा कि दीवारें ढहेंगी, मगर नव्या औऱ मालती नें मिलकर अपनी सीमाएं खींचली थीं।
नव्या नें अपनी मां मालती कों कमरे केँ कोने मे लेँ जाकर बहोत हि संजीदगी सें बात कि।
नव्या: "मम्मी, सुमित मानेंगे नहि। मुझेकल सुभह उनकेसंग जानां हि होगा। दिल्ली मे कुछदिन रहकर मे उन्हें समझा दूंगी कि कोठी कां काम औऱ बाबूजी कि देखरेख ज़रूरी हैं, फिन मे वापसलौट आऊंगी। पऱ पीछे सें तुम् यहींरहो। "
मालती कि आँखों मे घबराहट थि, "पर्र नव्या। वो 'व्यक्ति' (विक्रम सिंह)। उसकी नज़रें औऱ उसकी बातें। मे अकेले केसे संभालूँगी?"
नव्या नें अपनी मम्मी केँ हाथों कों थाम लिया औऱ एक् रहस्यमयी मुस्कान केँ संगकहा:
नव्या: "मां, ससुरजी जी कों अब उनकी स्थान दिखानी होगी। रही बात उनकीउस 'खतरनाक चीज़' कि, तौ अब फैसला तुम्हारे हाथ मे हैं। यदि तुम्हें वो विकराल औऱ कालानाग पसन्द आँ जाए, तौ हि तुम् नीचे उतरना। वरना, उन्हें साफकह देना कि हाथ लगाना सख़्त मना हैं। "
मालती नें गहरी सांसली, उसकीदेह मे अभि भि दोपहर केँ स्पर्श कि थरथराहट थि।
नव्या: (फुसफुसाते हुए)"बस उनकी बातों कां मजालो औऱ अपने दर्शन कां मजा उन्हें दो। उन्हें तड़पाना मां। उनकी आँखों केँ सामने अपनी जवानी औऱ अंगों कि नुमाइश करना, पर्र उन्हें 'छूने' कि इजाजत तभी देनाजब तुम्हारा मन हौ। उन्हें समझ आनां चाहिए कि समधिन कों वश मे करना उतना आसान नहि हैं जितना वो समझरहे हें। "
मालती नें धीरे-धीरे सें सिर हिलाया। उसेसमझ आँ गय़ा थां कि अबखेल कां पासापलट चुका हैं। ससुरजी जी जोँ 'शिकारी' बनरहे थें, अब वो स्वयं इन दोनों मम्मी-बेटी केँ इशारों पर्र नाचने वाले 'कैदी' बननेजा रहे थें।
उधर अपने कमरे मे, विक्रम सिंह पलंग पऱ लेटेहुए छत कों देखरहे थें। उन्हें अंदाज़ा भि नहि थां कि जिस 'हिसाब' कों वो आजरात बराबर करने वाले थें, उसकीनई किस्तें नव्या औऱ मालती नें पहले हि लिख दि हें।
विक्रम सिंह अपने कमरे मे बेचैनी सें टहलरहे थें। उनका विकराल मूसल धोती केँ भीतर किसी भूखे भेड़िए कि तरह तड़परहा थां। उन्हें यकीन थां कि सुमित केँ सोने केँ बाद याँ तोँ नव्या आएगी याँ मालती। जैसे हि गलियारे मे आहट हुईँ, विक्रम सिंह केँ चेहरे पर्र एक् कुटिल चमक आँ गई।
दरवाजे पऱ हल्की सि दस्तक हुईँ। विक्रम सिंह नें लपककर दरवाजा खोला, सामने नव्या खड़ी थि। पर्र उसके चेहरे पर्र वो कामुकता नहि थि, बल्कि एक् अजीब सि दो-टूक खामोशी थि।
विक्रम सिंह:(दबी औऱ उत्तेजित आवाज़ मे) "आँ गई नव्या? मुझेपता थां कि तुँ उस 'मूसल' कि याद मे बेचैनी रही होगी। आँ अंदर आँ, आजरात यह कोठी तेरी चीखों कि गवाह बनेगी। "
नव्या नें एक् कदम पीछे हटाया औऱ ससुरजी कि आँखों मे आँखें डालकर बड़े हि ठंडे लहजे मे बात कि।
नव्या: "बाबूजी, अपनीइस उत्तेजना कों आजरात केँ लिएदबा लीजिए। सुमित बगल मे सोरहे हें औऱ मां भि थककरसो चुकी हें। आजरात कुछ नहि होगा, आप् शांति सें सो जाइए। "
विक्रम सिंह कों लगा जैसे किसी नें उनके तपतेहुए बदन पऱ बर्फडाल दि होँ। उनकी आँखें फटी कि फटीरह गईं।
विक्रम सिंह:"यह क्याँ कहरही हैं नव्या? कल तोँ तुँ स्वयं बखानकर रही थि, औऱ आज."
नव्या: (बिनाडरे) "कल कि बातकल थि। आज हालात बदलगए हें। कल सुभह मुझे दिल्ली निकलना हैं, इसलिये मुझे आराम कि ज़रूरत हैं। औऱ आप् भि इस उम्र मे इतनी भाग-दौड़ नं कीजिये। चुपचाप खाट पर्र लेटिए औऱ अपनी मुट्ठी सें हि कामचला लीजिए। आजरात इस दरवाज़े केँ बाहर् देखने कि भि ज़रूरत नहि हैं। "
नव्या नें ससुरजी केँ चेहरे पर्र छाईउस मायूसी औऱ धोती केँ भीतर छिपेउस सख्त उभार कों एक् तिरछी नज़र सें देखा, जैसे वो उन्हें चिढ़ारही हौ।
नव्या: "शुभ रात्रि बाबूजी। शांति सें सोइए। "
इतना कहकर नव्या पलट गई औऱ अपनी भारी गांड़ कों एक् अंतिम बार ससुरजी कि आँखों केँ सामने मटकाते हुए अंधेरे गलियारे मे ओझल हौ गई। विक्रम सिंह वहीं चौखट पऱ खड़ेरह गए, हाथ मे अपनी अधूरी हवस औऱ धोती मे वो तड़पता हुआनाग लिए। आज उनकी सारी 'मर्दानगी' नव्या केँ एक् सधेहुए जवाब केँ आगेढेर हौ गई थि।
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story - Kahani ab aur interesting hogi
Relavant source : click here