Ek Bhai Ki Vasna (Completed) - bhai behan ka pyar - Real Kahani Part 1
Ek bhay kee Vasna
UPDATE - 01
हैलो। मेरानाम ताबिदा हैं। मेरी विवाह कों कोई 8-9 महीने हुए हें। मेरे शौहर कां नाम फैजान हैं। वोँ मेरे दफ़्तर मे मेरेसंग हि काम करते थें। मगर विवाह केँ बाद मैंने नौकरी छोड़ दि औऱ घऱ पऱ हि रहनेलगी हूं।
फैजान कोई बहोत ज़्यादा अमीर व्यक्ति नहि हें। उसकी फैमिली शहर केँ पास हि एक् गाँव मे रहती हैं। उधर थोड़ी सि ज़मीन हैं। जिस पऱ उसकेघऱ वाले अपना गुज़र-बसर करते हें। गाँव मे उसके बाप। मम्मी। बेहन औऱ एक् छोटा भइया रहते हें। उसका छोटा भइया अपनी बाप केँ संग जमीनों पर्र हि होता हैं। गाँव केँ विद्यालय मे हि बेहनपढ़ रही थि। वोँ बहोत हि प्यारी लड़की हैं। जाहिरा। यानि वोँ मेरी ननदी हुई।
मे अपने शौहर फैजान केँ संगशहर मे हि रहती हूं। हमने एक् छोटा सां घर-मकान किराए पऱ लियाहुआ हैं। इसमें एक् बेडरूम मय अटैच बाथरूम। छोटा सां टेलीविज़न लाउंज औऱ एक् किचन हैं।
घऱ केँ अगले हिस्से मे एक् छोटी सि बैठक हैं। जिसका एक् द्वार (दरवाज़ा) घऱ सें बाहर् खुलता हैं। औऱ दूसरा टेलीविज़न लाउंज हैं। घऱ केँ पिछले हिस्से मे एक् छोटा सां बरामदा हैं। बस। तक़रीबन 3 कमरे कां घऱ हैं। ऊपर कि छत बिल्कुल खाली हैं।
मेनगेट केँ अन्दर थोड़ी सि स्थान गैराज केँ तौर पऱ जहाँ पऱ फैजान अपनी बाइकखड़ी करता हैं।
मे औऱ फैजान अपनी विवाह सें बहोत खुश हें औऱ बड़ी हि अच्छी लाइफ गुज़र रही थि। अगरचे। फैजान कां बैक ग्राउंड गाँव कां थां। मगरफिन भि शुरुआत सें शहर मे रहने कि वजह सें वोँ काफ़ी हद तक शहरी हि होँ गय़ा थां। रहन-सहन। ड्रेसिंग वगैरह सभी शहरियों कि तरह हि थि। औऱ वोँ काफ़ी ओपन माइंडेड भि थां।
घऱ पर्र हमेशा वोँ मुझसे फरमाइश करता केँ मे मॉडर्न किस्म केँ कपड़े हि पहनूं। इसलिये घऱ पऱ मे अक्सर टाइट लैंगिंग्स औऱ टॉप्स। स्लीव लैस शर्ट्स औऱ हर किस्म कि वेस्टर्न ड्रेसस पहन लेती थि।
मे अक्सर जब भि बाहर् जाती.तब भि मेरी ड्रेसिंग काफ़ी मॉड हि होती थि।
मे अक्सर जीन्स औऱ टी-शर्ट पहनती थि याँ सलवार कमीज़ पहनती तौ। वोँ भि फैशन केँ मुताबिक़ हि एकदम चुस्त औऱ मॉडर्न हि होती थि।
घऱ सें बाहर् भि वोँ मुझे अक्सर लेगिंग पहनाकर लेँ जाता थां। घऱ आँ जाता तोँ मुझसे सिर्फ़ ब्रेजियर औऱ लेगिंग मे हि रहने कि फरमाइश करता थां.
फैजान मेरे खूबसूरती औऱ मेरेबदन कां दीवाना थां। हमेशा मेरी गोरेरंग औऱ हसीन शरीर कि तारीफ करता थां।
ुजब भि मौका मिलता। वोँ मेरी चूचियों कों मसल देता थां। औऱ मेरे खुलेगले मे हाथडाल कर मेरी चूचियों कों सहलाता रहता थां।
अपने शौहर कों खुश करने औऱ उसे लुभाने केँ लिए मे भि हमेशा डीप औऱ लोनेक कि कमीजें सिलवाती थि। जिसमें सें मेरी चूचियों भि नजरआती थीं औऱ बूब्ज़ कां क्लीवेज तौ हर वक्त हि ओपन होता थां।
दिन मे जब भि मौका मिलता। हम् लोग सेक्स करते थें। बल्कि सचबात तौ ये हैं कि मे विवाह सें पहले हि अपना कुँवारापन फैजान पर्र लुटा चुकी थि।
जीहाँ। फैजान हि मेरी पहली औऱ अंतिम इश्क थां औऱ ये फैजान कि इश्क हि थि। जौ केँ मुझे विवाह सें पहले हि उसकेखाट तक उसकी बाँहों मे लेँ आई थि।
विवाह केँ 8-9 महीने बाद भि जब हमारी सेक्स लाइफ औऱ हवस सें भरी हुई ज़िंदगी पूरे सिरे पऱ थि। तौ एकदम इसमें एक् ब्रेक सि लग गई औऱ एक् टकराव सां आँ गय़ा।
इसकीवजह ये थि कि मेरी ननदी जाहिरा… नें विद्यालय कां अंतिम इम्तिहान पासकर लिया थां औऱ उसने कॉलेज मे एडमिशन लेने कां शौक़ ज़ाहिर किया। तौ मेरे ससुरजी जी नें पहले तोँ इन्कार कर दिया.मगर जब उसके चहेते बड़े भइया फैजान नें भि अपने बाप सें बात कि। तौ मेरे ससुरजी जी नें हामीभर ली कि अगर फैजान उसकी जिम्मेदारी उठा सकता हैं। तौ ठीक हैं।
अब दिक्कत ये थि कि गाँव मे कोई कॉलेज नहि थां औऱ उसेशहर मे आनां थां। जब जाहिरा नें कॉलेज मे एडमिशन लिया। तोँ वोँ गाँव सें शहर मे आँ गई। अब ज़ाहिर हैं कि उसे हमारे संग हि रहना थां तौ जाहिरा शहर मे हमारे संगउस छोटे सें घर-मकान मे हि शिफ्ट हौ गई।
जाहिरा कि आने सें औऱ हमारे संग रहने सें मुझे औऱ तौ कोई दिक्कत नहि थि। मगर सिर्फ़ एक् मसला थां कि हमारी सेक्स लाइफ थोड़ी बंदिशों वाली होँ जाने थि।
अब हमें जोँ भि करना हौ। तौ अपने कमरे मे हि करना थां। वैसे जाहिरा बहोत हि अच्छे नेचर कि लड़की थि। अभि क़रीब 19 साल कि हि थि। बहोत हि खूबसूरत औऱ सुंदर लड़की थि। बिल्कुल दूध कि तरह गोरारंग। औऱ मक्खन कि तरह सें नरम-नरम बदन थां उसका.
उसके सीने कि उठान। यानि चूचियों उभर चुकीथीं। मगर अभि बहोत बड़ी नहि थीं। जाहिर सि बात हैं कि मुझसे तोँ छोटी हि थि। बहोत हि सादा औऱ मासूम सि लड़की थि।
मुझसे बहोत हि प्रेम करती थि औऱ बहोत हि इज्जत देती थि।
जब सें घऱ मे आई। तोँ किचन मे भि मेराहाथ बंटाती थि। औऱ मेरेसंग घऱ कां काफ़ी काम करती थि। मे भि जाहिरा कि शक्ल मे एक् अच्छी सि सहेली कों पाकरखुश थि।
उसके सोने कां इंतज़ाम उस छोटी सि बैठक मे हि एक् सिंगल बैड लगवाकर। कर दिया गय़ा थां। वोँ वहीं पऱ हि पढ़ती थि औऱ वहीं पर्र हि सोती थि। बाथरूम उसे हमारा वाला हि इस्तेमाल करना पड़ता थां। जिसका एक् द्वार (दरवाज़ा) छोटे सें टेलीविज़न लाउंज मे खुलता थां औऱ दूसरा हमारे बेडरूम मे खुलता थां।
बसरात कों सोतेसमय हम् लोग अपने बेडरूम वाला बाथरूम कां द्वार (दरवाज़ा) अन्दर सें बंदकर लेते थें। ताकि जाहिरा बाहर् सें हि उसे इस्तेमाल करसके।
जाहिरा वैसे तौ बहोत हि सुंदर लड़की थि। मगर सारी ज़िंदगी गाँव मे रहने कि वजह सें बिल्कुल हि ‘डल’ लगती थि। उसकी ड्रेसिंग भि बहोत ज़्यादा ट्रेडीशनल किस्म कि होती थि। सादा सि सलवार-कमीज़ पहनती थि। कभी भि मॉड किस्म केँ कपड़े नहि पहनती थि।
मुझेघऱ मे लेगिंग पहने देख्ना शुरुआत किया। तौ वोँ बहोत हि हैरान हुई। तौ मैंने हंसकर कहा-अरे दोस्त क्यूं हैरान होती होँ। येसभी आज केँ समय कि ज़रूरत औऱ फैशन हैं। इसके बिना ज़िंदगी कां क्याँ मजा हैं। वैसे भि तोँ घऱ पऱ सिर्फ़ तुम्हारे भैया हि होते हें नां। औऱ जब भि बाहर् जाती हूं। तौ उनकेसंग हि जाती हूं। तौ फिन मुझेकिस चीज़ कि फिकर हैं।
जाहिरा- मगर भाभी बाहर् तौ बहोत सें लोग होते हें। वोँ आपको अजीब नजरों सें नहि देखते क्याँ?
मे- अरे दोस्त देखते हें। तोँ देखते रहें। मेरा क्याँ जाता हैं। वैसेइन लोगों कि कमीनी नज़रों कां भि अपना हि मजा होता हैं।
मैंने एक् आँखमार कर जाहिरा सें कहा। तोँ वोँ झेंप गई।
मे उसे हमेशा हि मॉड औऱ न्यू फैशन केँ कपड़े पहनने कों कहती.मगर वोँ इन्कार कर देती।
‘मुझेशरम आती हैं। ऐसी कपड़े पहनते हुए। औऱ फिन मुझेइन कपड़ों मे देखकर भैया बुरामान जाएंगे.’
शहर मे आने केँ बाद फैजान नें उसेखूब शहर कि सैर करवाई। हम् लोग फैजान कि बाइक पर्र बैठकर घूमने जाते। मे फैजान केँ पीछेबैठ जाती औऱ मेरे पीछे जाहिरा बैठती थि।
हम् लोगखूब शहर कि सैर करते। औऱ जाहिरा भि खूब एंजाय करती थि।
बाइक पऱ बैठे-बैठे मे अपनी चूचियों कों फैजान कि बैक पऱ दबा देती औऱ उसकेकान मे ख़ुसर-फुसर करती जाती- क्यूं फिनफील होँ रही हें नां मेरी चूचियां तुमको?
मेरीकमर पर्र फैजान भि जानबूझ कर अपनीकमर सें थोड़ा-थोड़ा हरकत देता औऱ मेरी चूचियों कों रगड़ देता। कभी मे उसकी जाँघों पऱ हाथरख कर मौका मिलते हि उसकी पैन्ट केँ ऊपर सें हि उसके लण्ड कों सहला देती थि। जिससे फैजान कों बहोत मजाआता थां।
हमारी इन शरारतों सें बाइक पऱ पीछे बैठे हुइ जाहिरा बिल्कुल बेख़बर रहती थि।
फैजान अपनी बेहन सें बहोत हि प्रेम करता थां। आख़िर वोँ उसकी सबसे छोटी बेहन थि नां। कम सें कम भि उससे 18 साल छोटी थि। औऱ वोँ मुझसे 10 साल छोटी थि।
रोज़ाना फैजान स्वयं दफ़्तर जातेहुए जाहिरा कों कॉलेज छोड़कर जाता औऱ वापसी पऱ संग हि लेताआता थां। मुझे भि कभी भि इस सबसेकोई दिक्कत नहि हुईँ थि। जैसा कि ननदी-भाभी मे घरों मे झगड़ा होता हैं। मेरे औऱ जाहिरा कि बीच मे ऐसाकभी भि नहि हुआ थां। बल्कि मुझे तौ वोँ अपनी हि छोटी बेहन लगती थि।
Ek Bhai Ki Vasna (Completed) - bhai behan ka pyar – New Episode
Ek bhay kee Vasna
UPDATE - 02
आपने अभि तक पढ़ा.
शहर मे आने केँ बाद फैजान नें उसेखूब शहर कि सैर करवाई। हम् लोग फैजान कि बाइक पऱ बैठकर घूमने जाते। मे फैजान केँ पीछेबैठ जाती औऱ मेरे पीछे जाहिरा बैठती थि।
हम् लोगखूब शहर कि सैर करते। औऱ जाहिरा भि खूब एंजाय करती थि।
बाइक पर्र बैठे-बैठे मे अपनी चूचियों कों फैजान कि बैक पऱ दबा देती औऱ उसकेकान मे ख़ुसर-फुसर करती जाती- क्यूं फिनफील होँ रही हें नाँ मेरी चूचियां तुमको?
मेरीकमर पऱ फैजान भि जानबूझ कर अपनीकमर सें थोड़ा-थोड़ा हरकत देता औऱ मेरी चूचियों कों रगड़ देता। कभी मे उसकी जाँघों पर्र हाथरख कर मौका मिलते हि उसकी पैन्ट केँ ऊपर सें हि उसके लण्ड कों सहला देती थि। जिससे फैजान कों बहोत मजाआता थां।
हमारी इन शरारतों सें बाइक पर्र पीछे बैठे हुई जाहिरा बिल्कुल बेख़बर रहती थि।
फैजान अपनी बेहन सें बहोत हि प्रेम करता थां। आख़िर वोँ उसकी सबसे छोटी बेहन थि नां। कम सें कम भि उससे 18 साल छोटी थि। औऱ वोँ मुझसे 10 साल छोटी थि।
रोज़ाना फैजान स्वयं दफ़्तर जातेहुए जाहिरा कों कॉलेज छोड़कर जाता औऱ वापसी पर्र संग हि लेताआता थां। मुझे भि कभी भि इस सबसेकोई दिक्कत नहि हुई थि। जैसा कि ननदी-भाभी मे घरों मे झगड़ा होता हैं। मेरे औऱ जाहिरा कि बीच मे ऐसाकभी भि नहि हुआ थां। बल्कि मुझे तोँ वोँ अपनी हि छोटी बेहन लगती थि।
अबआगे लुत्फ़ लें.
फिन एक् दिन वोँ वाकिया हुआ जोँ इस स्टोरी केँ आगे बढ़ने कि वजहबना, उससे पहले नां कुछ ऐसा-वैसा हुआ हमारे घऱ मे, औऱ नां हि किसी केँ मन मे थां। मगरउस वाकिये केँ बाद मेरामन एक् अजीब हि रास्ते पऱ चलपड़ा औऱ मैंने वोँ सभी करवा दिया जोँ कि कभी नहि होना चाहिए थां।
वोँ इतवार कां दिन थां औऱ हम् सभीलोग घऱ पऱ हि थें। दोपहर केँ वक्त हम् सभीलोग टेलीविज़न लाउंज मे हि बैठेहुए टेलीविज़न देखरहे थें कि फैजान नें गरमचाय कि फरमाइश कि। इससे पहले कि मे उठती। हस्बए आदत। जाहिरा फ़ौरन हि उठी औऱ बोलि- भाभी आप् बैठो। मे बनाकर लाती हूं।
मैंने उसे ‘थैंक्स’ बोला औऱ दोबारा टेलीविज़न देखने लगी, फैजान भि मेरापास हि बैठाहुआ थां।
अचानक हि किचन सें जाहिरा कि एक् चीख कि आवाज़ सुनाई दि औऱ संग हि उसके गिरने कि आवाज़ आई। मे औऱ फैजान दोनों हि फ़ौरन हि उठकर किचन कि तरफ चिल्लाते हुए भागे।
‘क्याँ हुआ हैं जाहिरा?’
जैसे हि हम् लोग अन्दर गए तौ देखा कि जाहिरा नीचे किचन कि फर्श पर्र गिरी हुई हैं औऱ अपने पांव कों पकड़कर दबारही हैं औऱ वोँ दर्द केँ मारे कराहरही थि।
हम् फ़ौरन हि उसकेपास बैठगए औऱ मे बोलीं- क्याँ हुआ जाहिरा। केसेगिर गई?
जाहिरा- बस भाभी.पता हि नहि चला कि केसे मेरापेर मेरी पायेंचे मे फँस गय़ा औऱ मे नीचेगिर पड़ी।
फैजान- अरेये तौ शुक्र हैं कि अभि इसनेगरम चाय नहि उठाई हुई थि। नहि तौ गरम-गरम गरमचाय ऊपरगिर कर औऱ भि नुक़सान कर सकती थि।
मैंने आहिस्ता-आहिस्ता जाहिरा कों पकड़कर उठाना चाहा। उसका दूसरा बाज़ू फैजान नें पकड़ा औऱ हमने जाहिरा कों खड़ा किया। तोँ वोँ अपना बायाँ पेर नीचे ज़मीन पऱ नहि रखपारही थि। बड़ी हि मुश्किल सें वोँ अपना एक् पेरऊपर उठाकर मेरी औऱ अपने भैया कि सहारे पर्र लंगड़ाती हुइ टेलीविज़न लाउंज मे पहुँची।
इतने सें रास्ते मे भि वोँ कराहती रही- भाभी नहि चलाजा रहा हैं। बहोत दर्द होँ रहा हैं।
टेलीविज़न लाउंज मे लाकर हम् दोनों नें उसे सोफे पर्र हि लिटा दिया औऱ मे उसकेपास बैठ गई।
फैजान- लगता हैं कि इसके पांव मे मोच आँ गई हैं।
मैंने जाहिरा कों सीधा करके सोफे पर्र लिटाया औऱ उसकेपेर कि तरफआकर उसकेपेर कों सहलाती हुए बोलि- हाँ। लगता तोँ ऐसा हि हैं.
मैंने फैजान सें कहा- आप् जाहिरा केँ बेडरूम मे जाकरमूव तौ उठा लायें। ताकि मे इसके पांव कि थोड़ी सि मालिश कर सकूँ।
मेरीबात सुनकर फैजान फ़ौरन हि कमरे मे चला गय़ा औऱ मे आहिस्ता-आहिस्ता उसके पांव कों सहलाती रही। अभि भि जाहिरा दर्द केँ मारे कराहरही थि।
चंद लम्हों केँ बाद हि फैजान वापिस आया औऱ उसनेमूव मुझे दि। मैंने थोड़ी सि ट्यूब सें मलहम निकाली औऱ उसे जाहिरा केँ पेर केँ ऊपर मलनेलगी।
फिन मैंने फैजान सें कहा-जरा किचन मे जाकररबर कि बोतल मे पानी गर्म करके लेँ आओ। ताकि थोड़ी सि सिकाई भि कि जासके।
फैजान भि अपनी बेहन केँ पांव मे मोचआने कि वजह सें बहोत हि परेशान थां। इसलिये फ़ौरन हि किचन मे चला गय़ा।
जाहिरा केँ पेर केँ ऊपरमूव लगाने केँ बाद मैंने उसकी सलवार कों थोड़ाऊपर घुटनों कि तरफ सें उठाया। ताकि उसकी टांग केँ निचले हिस्से पर्र भि मूवलगा दूँ।
जाहिरा नें उस वक्त एक् बहोत हि लूज औऱ खुली पाएचों वाली सलवार पहनी हुई थि औऱ शायदयही वजह थि कि वोँ किचन मे इसके पाएंचे सें उलझकर गिर गई थि।
जैसे हि मैंने जाहिरा कि सलवार कों उसकी घुटनों तक ऊपर उठाया तौ जाहिरा कि गोरी-गोरी टाँगें मेरी आंखों केँ सामने नंगी हौ गईं।
उफफ्फ़। जाहिरा कि टाँगें कितनी गोरी औऱ रसीले थीं। जैसे हि मैंने उसकी नंगी टाँग कों छुआ। तोँ मुझेऐसा लगा कि जैसे मैंने मक्खन मे हाथडाल दिया होँ। मे उसकी टांग कि मालिश कां भूलकर आहिस्ता-आहिस्ता उसकी टाँग कों सहलाने लगी।
आरामसे अपनाहाथ उसकी नंगी टाँग पर्र फेरने लगी। कभी पहलेऐसा नहि हुआ थां। मगरआज मुझे एक् अलग हि मजा आँ रहा थां। मुझे उसकी मखमली टाँग कों सहलाने कां मौका जौ मिल गय़ा थां।
फिन मैंने अपने ख्यालों कों झटका औऱ उसकी टाँग पऱ मूव लगाने लगी।
थोड़ी हि देर मे फैजान गर्म पानी कि रबर कि बोतल लेँ आया औऱ मेज पऱ रख दि।
अब वोँ दूसरी सोफे पऱ बैठकर दोबारा सें टेलीविज़न देखने लगा। जाहिरा कि टाँग पऱ मूव लगाते हुए अचानक हि मेरी नज़र फैजान कि तरफ गई। तोँ हैरानी सें जैसे मेरी आँखें फट सि गईं। मैंने देखा कि फैजान कि नजरें टेलीविज़न कि बजाय अपनी सग़ी बेहन कि नंगी टाँगों कों देखरही हें।
मुझेइस बात पर्र बहोत हि हैरत हुइ कि फैजान केसे अपनी छोटी बेहन कि नंगी टाँग कों ऐसेदेख सकता हैं।
उसकी आँखों मे जौ हवस थि। वोँ मे अच्छी तरह सें पहचान सकती थि। आख़िर मे उसकी पत्नि थि।
येदेख कर एक् लम्हे केँ लिए तौ मेरेहाथ जाहिरा कि टाँग पर्र रुक सें गए.मगर मुझमें हिम्मत नां हुई कि मे अपने शौहर सें नजरें मिलाऊँ याँ उसको रोकूँ याँ टोकूँ। मैंने अपनी नजरें वापिस जाहिरा कि टाँग पर्र जमादीं औऱ आहिस्ता-आहिस्ता मूव मलनेलगी।
जाहिरा कों किसीबात कां होश नहि थां। वोँ तोँ बस अपनी आँखें बंदकिए हुएपड़ी हुइ थि। जाहिरा कि नंगी गोरी टाँग कों सहलाते सहलाते मेरे दिमाग़ मे एक् शैतानी ख्याल आया। कि क्यूं नाँ मे इसकी टाँग कों थोड़ा औऱ एक्सपोज़ करूँ औऱ देखूँ कि तब भि फैजान अपनी बेहन कि गोरी टाँगों कों नंगा देखता रहता हैं याँ नहि.
यहीसोच कर मैंने आहिस्ता सें जाहिरा कि सलवार उसके घुटनों केँ ऊपर सरका दि। औऱ अब उसकी खुली पायेंचे वाली सलवार उसके घुटनों सें ऊपर आँ गई थि। जिसकी वजह सें जाहिरा कां घुटना औऱ उसकी जाँघ कां थोड़ा सां निचला हिस्सा भि नंगा हौ गय़ा थां।
मैंने उसके घुटनों पर्र भि आहिस्ता-आहिस्ता मूव लगानी शुरुआत कर दि औऱ मसाज करती हुई। मैंने तिरछी नज़र सें अपने शौहर कि तरफ देखा। तौ पताचला कि अब भि वोँ चोर नज़रों सें अपनी बेहन कि नंगी टाँग कि ओरदेख रहे थें।
मे दिल हि दिल मे मुस्करा दि।
कितनी अजीबबात थि कि एक् भइया भि अपनी सग़ी छोटी बेहन कि नंगी टाँग कों ऐसी प्यासी नज़रों सें देखरहा थां। जैसे कि वोँ उसकी बेहन नाँ हौ। बल्कि कोईगैर लड़की होँ!
मुझेइस गंदेखेल मे अजीब सां मजा आँ रहा थां औऱ मे इसलिये इस मसाज कों एक्सटेंड करतीजा रही थि। ताकि फैजान ज़्यादा सें ज़्यादा अपनी बेहन केँ शरीर सें अपनी आँखों कों सेंकसके।
अब मेरेमन मे एक् औऱ शैतानी ख्याल आया।
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Ek bhay kee Vasna
UPDATE - 03
आपने अभि तक पढ़ा.
मैंने उसके घुटनों पऱ भि आहिस्ता-आहिस्ता मूव लगानी शुरुआत कर दि औऱ मसाज करती हुइ। मैंने तिरछी नज़र सें अपने शौहर कि तरफ देखा। तोँ पताचला कि अब भि वोँ चोर नज़रों सें अपनी बेहन कि नंगी टाँग कि ओरदेख रहे थें।
मे दिल हि दिल मे मुस्करा दि।
कितनी अजीबबात थि कि एक् भइया भि अपनी सग़ी छोटी बेहन कि नंगी टाँग कों ऐसी प्यासी नज़रों सें देखरहा थां। जैसे कि वोँ उसकी बेहन नाँ होँ। बल्कि कोईगैर लड़की होँ!
मुझेइस गंदेखेल मे अजीब सां मजा आँ रहा थां औऱ मे इसलिये इस मसाज कों एक्सटेंड करतीजा रही थि। ताकि फैजान ज़्यादा सें ज़्यादा अपनी बेहन केँ बदन सें अपनी आँखों कों सेंकसके।
अबआगे लुत्फ़ लें.
अब मेरेमन मे एक् औऱ शैतानी ख्याल आया जिससे मे फैजान कों औऱ भि क़रीब सें उसकी बेहन कि नंगी रसीले टाँगें दिखा सकती थि। मैंने अपनेपास हि सोफे पऱ रखी हुई मूव नीचे फर्श पर्र गिरा दि। थोड़ीदेर केँ बाद मैंने फैजान कों आवाज़ दि- सुनो.जरा मुझेमूव नीचे सें उठाकर दें.
मैंने येबात बिना फैजान कि तरफ देखते हुएकही। औऱ वोँ ऐसे चौंका जैसे किसी सपने सें जगा हौ.
फिन वोँ हमारी तरफबढ़ा। इतनीदेर मे मैंने जाहिरा कि दूसरी टाँग भि नंगीकर दि थि औऱ उसको भि मे मजे सें सहलारही थि। जाहिरा कों जैसेअब दर्द सें कुछचैन मिलरहा थां। जिसकी वजह सें वोँ आँखें मूंदे लेटी हुइ थि।
फैजान मेरे क़रीब आया औऱ नीचे फर्श पऱ सें मूवउठा कर मेरीतरफ बढ़ाईमगर मैंने अपनी स्कीम कि मुताबिक़ बिना उसकीतरफ देखते हुएकहा- थोड़ी सि यहा पऱ लगादो.
मैंने जाहिरा कि दूसरी टांग कि तरफ इशारा करतेहुए उससेकहा। दिल हि दिल मे मे मुस्करा रही थि औऱ देख्ना चाहती थि कि अपनी बेहन कि नंगी टाँग केँ इतने क़रीब होते वक़्त फैजान कां क्याँ रिएक्शन होता हैं।
दूसरी तरफ मासूम जाहिरा आँखें बंद करके चुपचाप लेटी हुइ थि… उसे नहि अंदाज़ा थां कि उसकी भाभी क्याँ गेमखेल रही हैं औऱ उसका अपनासगा बड़ा भइयाकिस नज़र सें उसके नंगेबदन कों देखरहा हैं.
आहिस्ता सें फैजान नें हाथ बढ़ाया औऱ जाहिरा कि एक् नंगी टाँग केँ ऊपर सें हाथ गुज़ार कर दूसरी तरफ वाली टाँग पर्र मूव लगाने लगा। मेरी नज़र उसकेहाथ पर्र हि थि। जिसमें मुझे हल्की-हल्की कंपकंपाहट महसूस होँ रही थि।
दूसरी टाँग कि तरफहाथ लें जातेहुए उसकाहाथ जाहिरा कि पहली टाँग कों टच करनेलगा। मैंने आहिस्ता सें उसकी चेहरे कि तरफ देखा। तोँ उसका चेहरा लाल होँ रहा थां औऱ नजरें तौ जैसे अपनी बेहन कि मखमली गोरी-गोरी नंगी टाँगों सें चिपकी हि पड़ीथीं।
मूवलगा कर फैजान नें हाथ पीछे हटाया औऱ मूव कों टेबल पर्र रखकर वापिस दूसरे सोफे पर्र जाकरबैठ गय़ा औऱ टेलीविज़न देखने कि एक्टिंग करनेलगा। जबकी उसकी नज़रअब भि चोरी-छिपे जाहिरा कि नंगी टाँगों कों हि देखरही थीं।
थोड़ीदेर चुप रहने कि बाद फैजान बोला- आख़िर तुमको हुआ क्याँ थां। जौ नीचेऐसी गिर पड़ीं?
जाहिरा बोलि- भैया वोँ मेरा पांव पायेंचे मे फँस गय़ा। तौ गिर गई.
मुझे तोँ जैसे मौका हि मिल गय़ा। मैंने फ़ौरन हि कहा- गिरना हि पड़ेगा नां तुमको। जोँ इतने पुरानी फैशन कि खुले-खुले पायंचों वाली सलवारें पहनती होँ। मैंने कितनी बारकहा हैं कि माहौल औऱ फैशन केँ मुताबिक़ ड्रेसिंग कियाकरो।
मैंने उसे प्रेम सें डाँटते हुएकहा।
फैजान भि बोला-हाँ। ठीक हि तौ कहरही हैं तुम्हारी भाभी। वैसेये तुम्हारा हि काम हैं नाँ। कि तुम् इसे समझाओ कि शहर मे केसे रहना होता हैं.
मे- मेरे पर्र क्यूं क्रोध होते हौ। पूछलो इससे। कितनी बारकहा हैं इसे। कि मेरीतरह कि ड्रेसिंग कियाकरो। मगरये नहि मानती हैं। ये तुमसे डरती हैं। कि पता नहि भैया बुरा न् मान जाएं।
फैजान- लो। इसमें मेरे बुरा मानने वालीकौन सि बात हैं। आख़िर वक्त कि मुताबिक़। एक् हद मे रहकर। तोँ चलना हि होता हैं नाँ.
मे- यही तोँ मे इसको समझाती हूं कि देखो मे भि तोँ लेटेस्ट कपड़े पहनती हूं नां। तौ क्याँ कभी तुम्हारी भइया नें मुझे रोका हैं। याँ कभी बाहर् कुछ ऐसा-वैसा हुआ हैं। जौ तुम् डरती होँ?
जाहिरा शरमाते हुए बोलीं- अच्छा भाभीअब बस भि करो नं। क्यूं भैया केँ सामने मेरीवाट लगाने मे लगी हुई हें।
जाहिरा कि इसबात पर्र मे औऱ फैजान दोनों हँसने लगे। मे महसूस कर चुकी थि कि फैजान कों अपनी सग़ी बेहन कि नंगी टाँगों कों देखकर बहोत अच्छा लगा थां।
मे सोचरही थि कि अगर जाहिरा भि मेरे जैसे हि कपड़े पहने। तौ फैजान कि तौ फट हि जाएगी औऱ फिन मे देखूँगी कि अपनी बेहन पर्र नज़र डालने सें केसे वोँ स्वयं कों रोकता हैं। मेरेदिल मे सिर्फ़ औऱ सिर्फ़ शरारत थि कि मे एक् भइया कों उसकी बेहन कि जरिए सें टीज़ करूँ औऱ देखूँ कि आख़िर एक् भइया कितना ज़ब्त कर सकता हैं। याँ अपनी बेहन कि शरीर कों किसहद तक देख सकता हैं।
कुछदिन कि लिए जाहिरा कों अपनी कॉलेज सें छुट्टी करनीपड़ी औऱ इन दिनों वोँ घऱ पऱ हि रहती थि।
मे उसकी रोज़ाना मूवलगा कर मालिश करती थि। मगर हमेशा हि मेरीयही कोशिश होती थि कि मे उसकी टाँगों कि मालिश उसके भइया केँ सामने हि करूँ। ताकिउसे अपनी बेहन केँ बदन सें आँखें सेंकने कां मौकामिल सके। उधर फैजान कां भि यहीहाल थां कि जब भि मे जाहिरा कों क्रीम लगाती। तौ वोँ आस-पास हि भटकता रहता थां।
इसी दौरान मैंने जाहिरा कों एक् जीन्स लाकर दि औऱ उसने बहोत हि शरमाते हुए एक् लोंग शर्ट केँ संग पहनी।
मैंने भि उसको टी-शर्ट पहनने पर्र जोर नहि दिया कि चलो शुरुआत तौ कराया। तौ एक् दिन इसको सेक्सी कपड़े भि पहना दूँगी।
जब फैजान नौकरी सें वापिस आया तोँ जाहिरा उस जीन्स मे बाहर् हि नहि आँ रही थि। बड़ी मुश्किल सें वोँ बाहर् आई तोँ उसका चेहरा लज्जा सें सुर्ख हौ रहा थां औऱ वोँ नजरें ऊपर नहि करपारही थि।
फिरभी उसकी शर्ट नें उसकी पूरी जीन्स कों छुपाया हुआ थां औऱ उसकी जीन्स सिर्फ़ घुटनों सें नीचे सें हि नज़र आँ रही थि।
वोँ बाहर् आई तौ वोँ अपनी कमीज़ कों अपनेबदन केँ संग चिपका रही थि औऱ नीचे कों खींचरही थि। जैसे कि अपनी जीन्स कों छुपाना चाहती होँ।
फैजान नें उसे देखा तौ पहली तोँ हैरान हुआ औऱ फिन तेज़-तेज़ सें हँसने लगा। जिसेदेख कर मे भि हँसने लगी।
उधर जाहिरा कां औऱ भि बुराहाल होँ गय़ा। लज्जा सें उसका चेहरा रोने वाला हौ रहा थां।
मे- देखलो फैजान। आजबड़ी मुश्किल सें तुम्हारी इस चहेती बैकवर्ड माइंडेड बेहन कों जीन्स पहनाई हैं।
Ek Bhai Ki Vasna (Completed) - bhai behan ka pyar - Next part miss mat karna
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