विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
दिल्ली मे 'शिकारी' कि दस्तक औऱ बेडरूम कां घेराव
जगह: दिल्ली कां फ्लैट (नव्या औऱ सुमित कां बेडरूम)
वक़्त: रात ११:००बजे
सुमित कों तेज बुखार थां औऱ दवाइयों केँ असर सें वो गहरी नींद मे सोरहा थां। विक्रम सिंह कों जैसेइसी मौके कां इंतजार थां। वे सुमित कि खैरियत पूछने केँ बहाने दिल्ली आँ पहुंचे, जबकि हवेली कि चाबियां औऱ वहां कां 'सूनापन' मालती केँ हवाले कर दिया गय़ा।
सुमित केँ बगल वाले कमरे मे नहि, बल्कि स्वयं सुमित औऱ नव्या केँ बेडरूम मे हि विक्रम सिंह दाखिल होँ गए। सुमित बेखबर सोया थां औऱ नव्या अपनी रेशमी नाइटी मे ससुरजी केँ सामने खड़ी थि। दिल्ली कि हल्की ठंड मे कमरे कां तापमान अचानक बढ़ गय़ा थां।
विक्रम सिंह कि आँखें नव्या केँ उन विशाल बोबों पर्र टिकीथीं जोँ नाइटी केँ पतले कपड़े केँ नीचे आज़ाद होने केँ लिएमचल रहे थें। उनकी आवाज़ मे वो रोब नहि, बल्कि एक् बेबसी औऱ गहरी कामुकता थि।
विक्रम सिंह: (फुसफुसाते हुए, हाथ जोड़कर) "नव्या। अब औऱ मत तड़पा। उस रात कोठी मे तूने मुझे 'शांति' सें सोने कों कहकर मेरेबदन कि नसों मे तेजाब भर दिया थां। देख। सुमित सोरहा हैं, औऱ तेरायह ससुरजी तेरे कदमों मे अपनी सारीअकड़ छोड़कर खड़ा हैं। एक् बार.बस एक् बारउस विकराल मूसल कों अपनीशरण देदे, वरनायह मुझे अंदर सें जला देगा। "
नव्या केँ चेहरे पर्र एक् कुटिल औऱ मादक मुस्कान खिल गई। उसेयाद आया कि केसे उसने सुमित केँ संग परफॉरमेंस कां लुत्फ उठाया थां, पर्र ससुरजी कि इस गिड़गिड़ाहट नें उसकी सत्ता (power) कों औऱ बढ़ा दिया थां।
नव्या: (मुस्कुराते हुए) "बाबूजी। आप् तौ शेर थें, फिनइस बिल्ली केँ सामने हाथ क्यूं जोड़रहे हें? मैंने तोँ कहा थां कि दिल्ली मे मर्यादा होगी। देखिये, आपके बेटे कां सिर मेरीगोद मे हैं औऱ आप् यहा अपनीउस 'मशाल' कों लेकरखड़े हें। "
विक्रम सिंह: (लगभगआते हुए, आँखों मे वासना कां समंदर लिए)"यह मर्यादा अब मुझेकाट रही हैं नव्या। तूने मालती केँ सामने मेरेजिस अंग कां बखान किया थां, वो आज दिल्ली कि इस तन्हाई मे बेकाबू हैं। तुँ कहती थि न् कि साइज हि सभीकुछ नहि होता? पऱ देख। सुमित केँ पास जोँ हैं, उससे तेरी प्यास नहि बुझी होगी, तभी तोँ तूँ मुझेयहा बुलाने पर्र मजबूर हुइ। मेरायह कालानाग। यह केवल तुम को डसने केँ लिए नहि, तुम को वोँ जन्नत दिखाने केँ लिएतड़प रहा हैं जौ सुमित कभीसोच भि नहि सकता। "
नव्या नें ससुरजी कि धोती कि ओर देखा, जहाँ वो विकराल उभार किसी लोहे कि छड़ कि तरहतना हुआ थां।
नव्या: "बाबूजी। बातें तौ आप् बहोत कामुक करते हें। पऱ सुमित जाग गय़ा तोँ? औऱ वैसे भि, मुझेअब 'साइज' सें अधिक'चैन' कि तलाश हैं। क्याँ आपकायह भारी मूसल मुझे वोँ चैनदे पाएगा याँ मात्र अपनी मर्दानगी कां बोझ लादेगा?"
विक्रम सिंह नें नव्या केँ चेहरे केँ पास अपना चेहरा झुकाया, उनकी गर्म सांसें नव्या केँ गले कों सहलाने लगीं।
विक्रम सिंह: "एक् बार मौका तौ दे नव्या। मे तुम्हें वोँ परफॉरमेंस दूंगा कि तूँ सुमित कों केवल एक् 'बच्चा' समझने लगेगी। मेरायह लाल सुपाड़ा आजरात तेरेइस 'अमृत कुंड' कि गहराई नापने केँ लिएमरा जारहा हैं। तूँ बस अपनी नाइटी कां यह फीता ढीलाकर। मे वादा करता हूं, तेरी चीखें सुमित केँ खर्राटों मे दब जाएंगी। "
नव्या नें अपनी उंगली ससुरजी केँ होंठों पऱ रखी औऱ धीरे-धीरे सें अपनी नाइटी कां कंधा सरकाया।
सुमित सोरहा हैं औऱ विक्रम सिंह बेडरूम मे अपनी पूरी कामुकता केँ संग नव्या कों घेर चुके हें।
शर्त, नग्नता औऱ तड़पता हुआ 'मूसल'
जगह: दिल्ली कां फ्लैट (अतिथि कक्ष)
वक्त:रात ११:४५बजे
नव्या नें बड़ी चतुराई सें सुमित केँ कमरे कां दरवाजा बाहर् सें बंदकर दिया औऱ दबेपैर उस दूसरे कमरे कि ओर बढ़ी जहाँ विक्रम सिंह पहले सें हि उसके आदेशानुसार पहुँच चुके थें। कमरे मे पहुँचते हि उसने अंदर सें कुंडी चढ़ा दि। विक्रम सिंहखाट पर्र बैठे थें, उनकी धोती केँ बीचों-बीच वो विकराल औऱ कालानाग किसी भूखे अजगर कि तरह छटपटा रहा थां।
नव्या नें ससुरजी कि आँखों मे देखते हुए अपनी अंगुली हवा मे लहराई।
नव्या: "बाबूजी, स्थान बदल गई हैं पऱ शर्त नहि बदली। मैंने पहले हि कहा थां—देख्ना औऱ बातें करना आज़ाद हैं, पर्र छूना सख़्तमना हैं। अगर मंजूर होँ तभीयहा रुकिए, वरना सुमित कां रूम मैंने बाहर् सें बंदकर दिया हैं, आप् बरामदे मे सो सकते हें। "
विक्रम सिंह कि हालत किसी मरतेहुए इंसान जैसी थि, जोँ पानी कि एक् बूंद केँ लिएतरस रहा हौ। उनकी आँखों मे लाचारी औऱ हवस कां ऐसामेल थां कि वे नव्या केँ पैरों मे गिरने कों रेडी थें।
विक्रम सिंह:(हाथ जोड़कर, कांपती आवाज़ मे) "मंजूर हैं नव्या! सभी मंजूर हैं। तूँ बस मेरे सामने आँ जा। तूँ मुझेमत छू, पऱ अपनीइस कातिल जवानी कों तौ मेरे सामने आज़ादकर दे। यह जोँ तेरे विशाल तरबूज इस रेशमी पर्दे केँ पीछेकैद हें, इन्हें मेरी आँखों केँ सामने नंगाकर दे। मे शपथ खाता हूं, मे तुम्हें छुऊंगा भि नहि। बस तुम्हे इस दीपक कि मद्धम रोशनी मे नग्न देखकर हि अपनायह विकराल मूसल सहला लूंगा औऱ अपनाजहर बहा दूंगा। "
नव्या मुस्कुराई। उसे ससुरजी कि ये बेबसी बहोत सुखदे रही थि। उसने धीरे-धीरे सें अपनी नाइटी केँ बटन खोलने शुरुआत किए। विक्रम सिंह कि सांसें उखड़ने लगीं।
विक्रम सिंह: (पागलों कि तरह बड़बड़ाते हुए)"अहह। खोलदे नव्या। दिखादे वोँ गोरे औऱ मांसल पिंड जिनकी चमक नें मेरी रातों कि नींदछीन ली हैं। उफ़! तेरीयह गहरी नाभि औऱ यह मखमली पेट। मेरामन कररहा हैं कि मे अभि अपनी जुबान सें इस फासले कों ख़त्म करदूँ, पऱ मे शर्त नहि तोड़ूँगा। तूँ बस अपनी जांघों कों फैलाकर बैठजा औऱ अपनीउस गीली औऱ रसीली बुर केँ दर्शन करादे। मे देख्ना चाहता हूं कि सुमित केँ जाने केँ बाद वो कितनी प्यासी हैं। "
नव्या नें अपनी नाइटी कों पूरीतरह उतार फेंका। अब वो विक्रम सिंह केँ ठीक सामने पूरीतरह नग्नखड़ी थि। उसके विशाल बोबे आज़ाद होते हि अपनी भारीवजन सें हल्का सां नीचे कि ओर झुके, औऱ उनके काले औऱ मोटे अंगूर जैसे निप्पल विक्रम सिंह कों सीधे चुनौती देनेलगे।
नव्या: (अपने दोनों हाथों सें अपने हि बोबों कों सहलाते हुए) "लीजिये बाबूजी। देखिये अपनीइस कुलटा बहू कां यौवन। सुमित नें कलरात इन्हें बहोत मसला हैं, पर्र आजयह केवल आपकी नज़रों कि आग मे जलने केँ लिए रेडी हें। देखिये मेरीइन चौड़ी जांघों कों। देखिये यहा नीचे, केसे मेरा अमृत कुंड आपकेइस 'मूसल' कि ताप सें झरनेलगा हैं। "
विक्रम सिंह नें अपनी धोतीऊपर खींचली। उनका वो खूंखार औऱ तपताहुआ लंड अब पूरीतरह नंगा होकरहवा मे थरथरा रहा थां। वो उसे अपनी मुट्ठी मे लेकर पागलों कि तरह हिलाने लगे।
विक्रम सिंह:"अहह नव्या! तूँ कितनी कामुक हैं। तेरीयह बुर केँ बाल। तेरीयह मांसल जांघें। देख!देख मेरेइस मूसल कि हालत!यह तड़परहा हैं तेरीइस नंगीदेह मे धंसने केँ लिए। तूँ अपनी उंगली अपनी बुर केँ भीतरडाल। मुझे दिखा कि तूँ कितनी गरम हैं! अहह। नव्या। तुँ तौ मुझेमार हि डालेगी!"
नव्या अब स्वयं भि पूरीतरह उत्तेजित हौ चुकी थि। ससुरजी कि वे गंदी औऱ अश्लील बातें उसके जिस्म मे आगलगा रहीथीं। उसने विक्रम सिंह केँ सामने हि बैड पर्र अपनी जांघें फैलादीं औऱ अपनेबदन कि नुमाइश करनेलगी।
अधूरी हवस औऱ चपत कां प्रहार
जगह: दिल्ली कां फ्लैट (अतिथि कक्ष)
टाइम:रात १२:३०बजे
कमरे मे वासना कां ऐसा सैलाब उमड़रहा थां कि हवा भि भारी महसूस होँ रही थि। नव्या पलंग पऱ पूरीतरह नग्न लेटी थि, उसकी जांघें फैली हुइ थीं औऱ वो ससुरजी कि गंदी बातों कि आग मे जलरही थि। विक्रम सिंह अपनी धोती त्याग चुके थें औऱ उनका वो विकराल, काला औऱ लोहे जैसा सख्त मूसल उनकी मुट्ठी मे कैद होकर पागलों कि तरह ऊपर-नीचे हौ रहा थां।
विक्रम सिंह कि आँखें नव्या कि उस गीली औऱ गुलाबी बुर पर्र टिकीथीं। वे अपने जिंदगी कि सारी ऊर्जा उस मुट्ठी मे झोंकरहे थें, पर्र वो मूसल इतना जिद्दी औऱ खूंखार थां कि वो झड़ने कां नाम हि नहि लेँ रहा थां। उसे तौ बस नव्या कि कोख केँ भीतर जाकर अपनाजहर उगलना थां।
विक्रम सिंह: (हांफते हुए, आवाज़ मे दरिंदगी लिए)"अहह नव्या। देख!यह लाल सुपाड़ा केसे धक-धककर रहा हैं! यह तेरे स्पर्श केँ बिना नहि मानेगा। तुँ बस एक् बार.बस एक् बारइसे अपनी मुट्ठी मे भर लें, मे शपथ खाता हूं मे तुम्हारी तरफ नहि छुऊंगा। तुँ हि इसे अपनी मर्जी सें चलादे!"
नव्या पूरीतरह गरम हौ चुकी थि, उसका अपना 'अमृत कुंड'रस छोड़रहा थां, पऱ उसके दिमाग़ मे सुमित कि वो पिछली रात औऱ अपनी शर्तसाफ थि। उसे ससुरजी कों तड़पाने मे जौ मजामिल रहा थां, वो संभोग सें कहीं बढ़कर थां।
जैसे हि विक्रम सिंहचरम सीमा केँ लगभग पहुँचने कि कोशिश करनेलगे, नव्या नें एक् बिजली जैसी फुर्ती दिखाई। वो खाट सें उठी औऱ विक्रम सिंह केँ उस तपतेहुए, भारी लंड केँ बिल्कुल लगभगआई। विक्रम कों लगा कि शायदअब वो शर्ततोड़ देगी।
पर्र तभी, नव्या नें अपने कोमलहाथ सें विक्रम सिंह केँ उस सख्त औऱ खूंखार मूसल पर्र एक् ज़ोरदार चपत (थप्पड़) जड़ दि।
चटाक!
विक्रम सिंह दर्द औऱ अचंभे सें तिलमिला उठे। उनका वो कालानाग हवा मे थरथरा गय़ा।
नव्या: (एक् बेशर्म औऱ नशीली मुस्कान केँ संग)"बस बाबूजी! आज केँ लिए इतना हि 'दर्शन' बहुत हैं। मैंने कहा थां न् कि छूनामना हैं, पर्र इस बेजान मूसल कों सज़ा देना तोँ मेराहक हैं। "
नव्या नें वहीं जमीन पऱ पड़ी अपनी नाइटी उठाई औऱ उसे अपने कंधों पर्र लापरवाही सें डाल लिया।
नव्या: (अदा सें अपनी भारी औऱ मांसल गांड़ कों मटकाते हुए)"अब बाकी कां काम स्वयं हि पूरा कीजिये। अपनीइस जवानबहू केँ ड्रीम्स देखते रहिये औऱ रातभर खाट कि चादर रगड़िये। यह मूसलअब ख्वाब मे हि इस बुर कां स्वाद चख पाएगा। "
इतना कहकर नव्या नें एक् जोरदार ठहाका लगाया औऱ अपनी बेशर्म अदा सें अपने चूतड़ हिलाते हुए कमरे सें बाहर् भाग गई। दरवाजा बाहर् सें बंद होने कि आवाज़आई औऱ विक्रम सिंह वहीं अंधेरे मे, अपनेउस अधझड़े, भारी औऱ प्यासे लंड कों हाथ मे लिए पत्थर कि मूरतबन गए। उनकी सारी मर्दानगी आज एक् बहू कि चपत औऱ उसकीअदा केँ आगेहार गई थि।
जुदा कमरे, साझीआग औऱ चरमानंद
जगह: दिल्ली कां फ्लैट (नव्या कां बेडरूम औऱ अतिथि कक्ष)
टाइम:रात १:१५बजे
नव्या अपने कमरे मे लौट तौ आई थि औऱ ससुरजी कों उस अपमानजनक चपत केँ संग 'KLPD' कि हालत मे छोड़ भि दिया थां, पर्र उसका अपना जिस्म विद्रोह कररहा थां। मर्यादा कि दीवारें बाहर् सें तोँ खड़ीथीं, पर्र भीतर वासना कां सैलाब सारी बंदिशें तोड़ चुका थां। ससुरजी केँ उस विकराल मूसल कि छवि उसकीबंद आँखों केँ सामने किसी मशाल कि तरहजल रही थि।
उसने पलंग पर्र गिरते हि अपनी टांगें फैलादीं। सुमित बगल मे बेखबर सोरहा थां, पर्र नव्या केँ हाथ अपनी हि मांसल जांघों पऱ रेंगने लगे।
नव्या: (मन हि मन सिसकते हुए)"अहह। क्याँ करआई मे? मना तौ कर दिया, पर्र वोँ कालानाग। उसकी वोँ गर्मी औऱ वोँ तड़पन मेरी बुर मे आगलगा रही हैं। सुमित कां मीडियम अंग अपनी स्थान हैं, पऱ उस पहाड़ जैसे लंड कि जौ दहशत औऱ लज्जत थि, वोँ मेरीरूह कों कंपारही हैं। "
नव्या नें अपनी उंगलियां अपनी गीली बुर केँ भीतर उतारीं। वो ससुरजी केँ उन अश्लील शब्दों कों यादकर रही थि जौ उन्होंने अभि कुछ मिनट पहलेकहे थें। हरयाद केँ संग वो अपनी उंगली कि रफ़्तार बढ़ारही थि।
उधर, बगल केँ कमरे मे विक्रम सिंह कि हालत किसी घायल शिकारी जैसी थि। वेखाट पर्र औंधेपड़े थें, हाथ मे वही भारी औऱ तपताहुआ मूसल थां जिसे अभि नव्या नें चपत लगाई थि। वो अंगअब पहले सें भि अधिक काला औऱ सख्त हौ चुका थां।
विक्रम सिंह: (दांत पीसते हुए) "बेशर्म बहू.चपत मारकर भाग गई। पऱ तेरीउस नंगीदेह कि चमक औऱ तेरी वोँ बुर केँ बाल.हाय! मे तेरी छोड़ूँगा नहि। तूँ भलेदूर हैं, पऱ मेरी मुट्ठी मे आज तुँ हि पिसेगी। "
विक्रम सिंह नें पागलों कि तरह अपनेलाल सुपाड़े कों सहलाना शुरुआत किया। वे कल्पना कररहे थें कि वे नव्या कि उन चौड़ी जांघों केँ बीचधंस रहे हें। उनकी रगों मे खून नहि, बल्कि नव्या केँ जिस्म कि वोँ खुशबू दौड़रही थि।
दोरूम कां संगम:
अजीब इत्तेफाक थां, मर्यादा नें उन्हें जिस्मानी तौर पऱ अलगकर रखा थां, पर्र काम-वासना नें उन्हें एक् हि तार सें बांध दिया थां।
* नव्या: "अहह! बाबूजी। घुसा दीजिये अपना वोँ खूंखार मूसल.फाड़ दीजिये मुझे!" (उसकी उंगली अब पूरी ताकत सें अंदर-बाहर् होँ रही थि)।
* विक्रम सिंह: "नव्या। यह लें अपना हिसाब! देख तेरा ससुरजी केसे अपनी पूरी जवानी तेरेनाम पर्र बहारहा हैं!"
अचानक, दोनों रूम मे एक् संग सन्नाटा छा गय़ा।
नव्या कां शरीर धनुष कि तरहतन गय़ा, उसने अपने तकिए कों दांतों सें जकड़ लिया औऱ एक् लंबी सिसकी केँ संग उसकी बुर नें अपना सारा अमृतबहा दिया। ठीक उसी लम्हा, विक्रम सिंह केँ विकराल मूसल नें भि हारमान ली औऱ सफेदगरम लावे कि एक् मूसलाधार बौछार पलंग कि चादर कों भिगोती चली गई।
दोनों अलग-अलग रूम मे निढाल पड़े थें—तृप्त, पऱ एक्-दूसरे सें कोसों दूर। नव्या कि आँखों मे आंसू थें कि वो ससुरजी केँ अंग कों सच मे नहि चखपाई, औऱ विक्रम सिंह केँ मन मे प्रतिशोध कि आग थि कि अगलीबार ये 'हिसाब' मुट्ठी सें नहि, बल्कि सीधा मैदान-ए-जंग मे होगा।
मालती द्वारा अपनी बेटी नव्या कों जिंदगी कां असलीपाठ पढ़ाया जारहा हैं । एक् शानदार एपसोड । नेक्स्ट एपसोड जल्द हि दीजिएगा ।
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
हवेली कि वापसी औऱ मर्यादित प्रतिज्ञा
जगह: गाँव कि पुरानी हवेली (विक्रम सिंह कां रूम)
वक्त:साम ६:००बजे
दिल्ली कि उस तूफानी रात केँ बाद, विक्रम सिंह वापस अपनी हवेली लौटआए थें। हवेली कि वही पुरानी दीवारों कि महक औऱ अपनीउस लाल कपड़ा बिछी कुर्सी कां स्पर्श उन्हें एक् बारफिन अपने वर्चस्व कां अहसास करारहा थां। मगरइस बार उनकेमन मे नव्या केँ प्रति कोई कड़वाहट याँ प्रतिशोध कि अग्नि नहि थि।
वे अपनी कुर्सी पर्र बैठगए औऱ हाथ मे हुक्का लिया। धुएं केँ छल्लों केँ बीच नव्या कां वो नग्न स्वरूप औऱ वो बेशर्म चपत उनकेमन मे कौंधरही थि।
विक्रम सिंह: (एक् लंबी सांस खींचते हुए) "पगली हैं नव्या। पऱ शेरनी हैं। उसरात उसने जोँ किया, वो कोई मामूली महिला नहि कर सकती थि। सुमित बगल मे सोरहा थां, फिन भि उसने मर्यादा औऱ वासना केँ बीच जौ लकीर खींची, उसका मे कायल हौ गय़ा हूं। "
विक्रम सिंह कों अहसास हुआ कि नव्या नें जौ किया, वो उन्हें नीचा दिखाने केँ लिए नहि, बल्कि अपनी मर्यादा कि रक्षा केँ लिए थां। वो एक् कुलवधू थि, औऱ ससुरजी होने केँ नाते विक्रम सिंह केँ मन मे भि अब एक् ठहराव आँ गय़ा थां।
विक्रम सिंह:(खुद सें बुदबुदाते हुए) "मे विक्रम सिंह हूं। कोईगली कां लफंगा नहि। अगर वो मर्यादा मे बंधी हैं, तौ मेरी भि अपनी एक् मर्यादा हैं। उसने अपनी नग्नता दिखाकर औऱ मेरेउस विकराल मूसल कों सहलाने कि इजाजत देकर मुझे वो सम्मान दिया हैं जोँ शायद हि किसी ससुरजी कों मिला होँ। अब मे भि ज़बरदस्ती नहि करूँगा। शिकार जब अपनी मर्ज़ी सें जाल मे आएगा, तभी उस 'हिसाब' कां असलीमजा होगा। "
उनके भीतर कां वो खूंखार कालानाग अब शांत थां। उन्हें पता थां कि नव्या दिल्ली मे रहकर सुमित केँ उस 'परफॉरमेंस' कां खुशी लें रही हैं, पर्र संग हि वो उनकेउस भारी औऱ तपतेहुए मूसल कि याद मे भि जलरही हैं।
तभी मालती (समधिन) कमरे मे गरमचाय लेकर दाखिल हुई। मालती नें देखा कि विक्रम सिंह केँ चेहरे पऱ एक् अजीब सि शांति औऱ गंभीरता हैं।
मालती: "समधीजी, दिल्ली सें लौटे तौ बड़े गंभीर लगरहे हें? नव्या औऱ सुमित ठीक तौ हें? कहीं नव्या नें कोईऐसी बात तौ नहि कह दि जौ आपकोचुभ गई होँ?"
विक्रम सिंह नें मालती कों ऊपर सें नीचे तक देखा। मालती अभि भि कोठी कि देखरेख मे जुटी थि औऱ उसकी आँखों मे वही प्यास थि जिसे नव्या जगाकर गई थि।
विक्रम सिंह: "नहि मालती, नव्या नें तोँ मेरी आँखें खोलदीं। वो अपनी मर्यादा जानती हैं, औऱ अब मे अपनी। अब सें इस कोठी मे जोँ भि होगा, वो 'हाथ लगाने कि मनाही' केँ संग नहि, बल्कि पूरी रज़ामंदी औऱ मान-सम्मान केँ संग होगा। औऱ रहीबात नव्या कि। तौ वो जब भि लौटेगी, अपनी मर्ज़ी सें उसलाल सुपाड़े कि शरण मे आएगी। "
मालती कों समझ नहि आया कि दिल्ली मे ऐसा क्याँ हुआ जिसने इस विकराल शिकारी कों इतना शांत औऱ मर्यादित बना दिया। पऱ वो ये अवश्य समझ गई थि कि अब विक्रम सिंह किसी शिकार केँ पीछे नहि भागेंगे, बल्कि शिकार स्वयं उनकी चौखट पर्र चलकर आएगा।
समधिन कां सान्त्वना औऱ पिघलती मर्यादा
जगह: हवेली कां मुख्य शयनकक्ष
वक़्त: रात८:३० बजे
विक्रम सिंह कि आंखों मे छाई शांति मालती कों बेचैन कररही थि। उसनेगरम चाय कां कपमेज पर्र रखा औऱ विक्रम केँ बिल्कुल लगभगआकर बैठ गई। उसकी साड़ी कां पल्लू जानबूझकर कंधे सें थोड़ासरक गय़ा थां।
मालती: "समधीजी, आप् ऐसे पहेलियां न् बुझाइये। साफ़-साफ़ बताइये कि दिल्ली मे उसरात क्याँ हुआ? मेरी लाडो नें आपकामान रखा याँ आपको उदास किया?"
विक्रम सिंह नें एक् लंबीअहह भरी औऱ उसरात कां एक्-एक् मंजर मालती केँ सामने खोलकर रख दिया। उन्होंने बताया कि केसे नव्या नग्न हुईँ, केसे उसने उनके विकराल मूसल कि तारीफ कि, पऱ केसेअंत मे एक् चपत मारकर उन्हें मर्यादा कां पाठ पढ़ाकर भाग गई।
मालती: (हैरानी औऱ अफसोस केँ संग अपना माथा पीटते हुए)"हाय राम-हाय! यह क्याँ सुनरही हूं? मेरी बेटी नें इतनाबड़ा गजबकर दिया? मेरे समधीजी दिल्ली जैसी स्थान गए औऱ वहां सें भि कोरे (प्यासे) हि वापस आँ गए? उसने आपको दिखाया सभीकुछ, पर्र चखने नहि दिया?यह तौ सरासर जुल्म हैं समधीजी!"
मालती कि आवाज़ मे एक् ऐसी हमदर्दी थि जोँ आहिस्ता वासना मे बदलरही थि। उसकी सांसें तेज होनेलगी थीं।
मालती: "उसने तोँ मर्यादा कि ओट लेँ ली, पर्र आपकेइस तपतेहुए जिस्म कां क्याँ? आपकेइस भारी मूसल कि जौ बेइज्जती उसने कि हैं, उसकादुख तोँ मे समझ सकती हूं। बेचारी जवानी। ऐसे हि मुट्ठी मे घिसकर रह गई। "
विक्रम सिंह जोँ अब तक 'मर्यादा' कां चोलाओढ़े बैठे थें, मालती कि इन बातों औऱ उसके उभरेहुए बदन कि खुशबू सें फिन सें डगमगाने लगे। मालती कां हाथ सहानुभूति जताते हुए विक्रम केँ घुटने पऱ जा टिका।
विक्रम सिंह: (भारी औऱ लरजती आवाज़ मे) "मालती। मैंने सोचा थां अब शांत रहूँगा। पर्र तुम्हारी यह बातें। औऱ यह नज़दीकी। मेरा सारा संयमतोड़ रही हें। "
विक्रम सिंह सें अब औऱ रहा नहि गय़ा। उन्होंने झटके सें मालती कि कमर मे हाथ डाला औऱ उसे अपनी जांघों पऱ खींच लिया। मालती नें एक् हल्की सि कराहभरी औऱ दिखावे केँ लिए विक्रम केँ सीने पऱ हाथ रखकर उन्हें पीछे धकेलना चाहा।
मालती: "उफ़! समधीजी। यह क्याँ कररहे हें? छोड़िये। कोईदेख लेगा। मर्यादा कां ख्याल कीजिये। अभि तौ आप् बड़ी-बड़ी बातें कररहे थें। "
विक्रम सिंह: (मालती केँ गले मे अपनीनाक रगड़ते हुए)"भाड़ मे गई मर्यादा! जब समधिन स्वयं आग मे घी डालने आई हैं, तौ यह कालानाग अब शांत नहि बैठेगा। जौ प्यास दिल्ली मे अधूरी रह गई थि, उसेआज यहीं हवेली मे तृप्त करना होगा। "
विक्रम सिंह केँ हाथों नें मालती केँ भारी चूतड़ों कों साड़ी केँ ऊपर सें हि दबोच लिया। मालती कि 'नाँ-नूकुर' अबदम तोड़ने लगी थि। उसने विक्रम कि आंखों मे देखा, जहाँवही खूंखार शिकारी वापसलौट आया थां।
मालती: (दम छोड़ते हुए औऱ विक्रम केँ गले लगकर)"अहह। आप् बड़े जालिम हें समधीजी। नव्या नें आपको तड़पाया, औऱ आप् उसका बदला मुझसे लें रहे हें। पर्र ठीक हैं। अगरइस समधिन केँ जिस्म सें हि आपकेउस विकराल मूसल कों ठंडक मिलती हैं, तोँ आजयह मर्यादा कि दीवार मे स्वयं ढहा देती हूं। "
विक्रम सिंह नें मालती कों गोद मे उठा लिया औऱ पलंग कि ओरबढ़चले। आजरात हवेली कि दीवारें उस 'हिसाब' कि गवाह बनने वालीथीं जौ बरसों सें उधार थां।
हवेली कां महा-संगम औऱ मूसल कां प्रहार
जगह: विक्रम सिंह कां शयनकक्ष
टाइम:रात ९:१५बजे
विक्रम सिंह नें मालती कों पलंग पऱ पटक दिया। कमरे मे लगी पीली रोशनी मालती केँ ढलतेहुए मगर बेहद मांसल जिस्म पऱ पड़रही थि। विक्रम नें बिना एक् लम्हा गंवाए अपनी धोती खोलकर फेंक दि। जैसे हि वो विकराल औऱ कालानाग अपनीकैद सें आजादहुआ, मालती कि आँखें फटी कि फटीरह गई। दिल्ली मे नव्या नें मात्र इसका बखान किया थां, पऱ आज वो साक्षात् मालती केँ चेहरे केँ सामने फन फैलाए खड़ा थां।
विक्रम सिंह: (एक् खूंखार हंसी केँ संग)"देख मालती। नव्या नें इसलाल सुपाड़े कों चपत मारी थि, पऱ आज तूँ इसकीमार झेलेगी। देख इसकी लंबाई औऱ यह लोहे जैसी सख्ती। क्याँ तेरीयह पुरानी गुफाइसे झेल पाएगी?"
मालती नें कांपते हाथों सें उस भारी औऱ तपतेहुए मूसल कों छुआ। स्पर्श होते हि उसके जिस्म मे बिजली दौड़ गई।
मालती: (सिसकते हुए) "क्या बात है समधीजी। यह तौ लंड नहि, कोई वज्र हैं! नव्या सचकहरही थि, यह तोँ किसी भि महिला कि चीखें निकलवा दे। इसे देखकर हि मेरी बुर पानी छोड़ने लगी हैं। "
विक्रम सिंह नें कोईरहम नहि दिखाया। उन्होंने मालती कि साड़ी औऱ ब्लाउज कों चीरने वाले अंदाज मे उतारा। मालती केँ विशाल औऱ भारी बोबे बाहर् छलकआए, जिनके निप्पल उत्तेजना सें पत्थर हौ चुके थें। विक्रम नें मालती कि दोनों टांगों कों पकड़कर सीधा उसकेसिर केँ पास तक मोड़ दिया—एक् ऐसी बेशर्म पोजीशन जिसमें मालती कि उभरी हुई औऱ रसीली बुर पूरीतरह ससुरजी केँ सामने उघड़ गई।
विक्रम सिंह: (अश्लीलता कि हदपार करतेहुए) "आजइस अमृत कुंड कि गहराई नापूंगा। तूने बहोत दिन तक अपनीइस गुफा कों बचाकर रखा हैं, आज तेरायह समधी इसमें अपना साराज़हर उड़ेलेगा। "
विक्रम सिंह नें अपनेउस भारी औऱ काले लंड कि मुंडी मालती कि बुर केँ मुहाने पर्र टिकाई। मालती कां शरीर थरथरा उठा। जैसे हि विक्रम नें अपनीकमर कां पूराजोर लगाकर एक् विकराल धक्का दिया, मालती केँ मुँह सें एक् ऐसीचीख निकली जोँ पूरे कमरे मे गूँज गई।
मालती: "अहह!मरे। मां! समधीजी। यह क्याँ कर दिया.फाड़ दिया मुझे!उफ़। इतना मोटा औऱ इतनागरम! निकाल लो.अहह। पूरा अंदर तक जालगा हैं!"
विक्रम सिंह नें कोईढील नहि दि। वे किसी जंगली सांड कि तरह मालती पऱ चढ़गए। हर धक्के केँ संग उनका वो लोहे जैसा मूसल मालती कि बुर केँ एक्-एक् रेशे कों रगड़ता हुआ अंदरधंस रहा थां। मालती केँ भारी चूतड़बैड पर्र पटक-पटक करलाल होँ रहे थें।
विक्रम सिंह: (हाँफते हुए औऱ कान मे अश्लीलता फुसफुसाते हुए)"बोल मालती। सुमित केँ उस मध्यम अंग औऱ इस विकराल नाग मे क्याँ फर्क हैं? कैसालग रहा हैं जबयहलाल सुपाड़ा तेरी बच्चेदानी केँ मुँह पऱ चोटकर रहा हैं? बोल छिनाल। कैसालग रहा हैं?"
मालती: (बेकाबू होकर, पागलों कि तरह अपनीकमर हिलाते हुए)"अहह। आप् तौ। आप् तोँ हैवान हें! सुमित तौ इसकेआगे कुछ भि नहि। यह तोँ साक्षात् यमराज कां दण्ड हैं! ठोको। औऱ ज़ोर सें ठोको समधीजी! अपनीइस समधिन कि बुर कां सारा घमंड चूर-चूर करदो!अहह। मर गई!"
विक्रम सिंह नें मालती कों उल्टा किया औऱ उसे घोड़ीबना दिया। पीछे सें जब उन्होंने अपना वो खूंखार मूसल मालती कि गांड़ केँ बीच सें रगड़ते हुए बुर मे उतारा, तौ मालती पलंग कि चादर कों दांतों सें फाड़ने लगी। दिल्ली कां सारा क्रोध औऱ हवसआज विक्रम सिंह मालती कि इसदेह पऱ उताररहे थें।
हवेली कां वो रूमअब किसी रणक्षेत्र मे बदल चुका थां। मालती कि उम्रभले हि ५० कि दहलीज छूरही थि, मगर उसकीदेह कां कसाव औऱ उसके मांसल अंगों कि बनावट किसी२२ साल कि नवयौवना कों मातदे रही थि। विक्रम सिंह कों वो 'रस'मिल रहा थां जिसकी कल्पना उन्होंने नव्या केँ लिए कि थि, पर्र मालती केँ अनुभवी जिस्म नें उन्हें कामदेव बना दिया थां।
विक्रम सिंह किसी भूखे दरिंदे कि तरह मालती कि भारी जांघों कों फाड़कर अपनेउस विकराल मूसल सें उसकी बुर कि गहराई नापरहे थें। तभी मालती नें उत्तेजना केँ चरम पऱ पहुँचते हुए विक्रम कि आँखों मे आँखें डालीं औऱ मचलते हुए मीठे ताने मारने शुरुआत किए।
मालती: (हाँफते हुए, आवाज़ मे कामुक शरारत लिए)"अहह। समधीजी! क्याँ धक्के माररहे हें। पर्र सच बताइये, इस बूढ़ी हड्डी मे वोँ मज़ा कहां जोँ नव्या कि कच्ची कली मे होता? दिल्ली मे तौ आप् 'कोरे'रह गए, अबइस समधिन कों हि नव्या समझकर अपनीहवस मिटा लीजिये!"
विक्रम सिंह केँ भीतर जैसे बिजली दौड़ गई। मालती केँ इन तानों नें उनकेउस कालेनाग कि सख्ती औऱ बढ़ा दि।
विक्रम सिंह:"चुप कर छिनाल! तेरायह शरीर किसी कच्ची कली सें कम नहि हैं। तूने जोँ यह अपनी रसीली गुफा खोलकर दि हैं, इसमें जौ मज़ा हैं वोँ कहीं औऱ नहि। नव्या नें तोँ मात्र दिखाया थां, पर्र तूँ तौ इस मूसल कों पूरा निगलरही हैं!"
मालती: (बेशर्मी सें मुस्कुराते हुए औऱ अपनीकमर कों विक्रम केँ धक्कों केँ संग तालमेल मे हिलाते हुए)"उफ़! बातें तौ बड़ीबड़ी कररहे हें। पऱ नव्या केँ सामने तोँ आप् हाथ जोड़कर खड़े थें। वहा तोँ उसने एक् चपत मारी औऱ आप् भीगी बिल्ली बनगए। आज यहामुझ पर्र साराजोर दिखारहे हें? क्याँ हुआ। क्याँ उस जवानबहू कि याद आँ रही हैं जबयहलाल सुपाड़ा मेरी बुर केँ भीतर धंसता हैं? मान लीजिये समधीजी। आप् उसबहू केँ लम्पट आशिक़बन चुके हें, औऱ मे तौ बसउसआग कों बुझाने कां ज़रिया हूं!"
मालती कां ये उकसाना विक्रम सिंह कों पागलकर रहा थां। उन्होंने मालती केँ विशाल बोबों कों अपने हाथों मे लेकर बुरीतरह भींच दिया औऱ अपनी रफ़्तार कों तूफानी बना दिया।
विक्रम सिंह: "तूँ बहोत बोलती हैं मालती! लेँ। खाइस मूसल कि मार!अगर वोँ यहा होती तौ आज उसकी भि यही हालत होती! तूने मुझे उकसाकर अपनी शामत बुलाली हैं। अबदेख तेरायह 'कोरा' समधी केसे तेरी बुर कां पानी सुखाता हैं!"
विक्रम नें मालती कों बेड केँ किनारे तक खींचा औऱ उसकी टांगों कों अपने मजबूत कंधों पऱ रख लिया। अब हर धक्का सीधा मालती कि कोख पर्र चोटकर रहा थां। मालती केँ मुँह सें लार टपकने लगी थि औऱ उसकी आँखें उलट गई थीं। वो विक्रम केँ उन तानों कां मज़ा लेँ रही थि क्योंकि उसेपता थां कि जितना वो नव्या कां नाम लेगी, विक्रम उतना हि बेरहमी सें उसे ठोकेंगे।
मालती: "अहह!हाँ। वहीँ। मारो! ससुरजी हौ तौ ऐसे। जोँ बहू केँ नाम पऱ समधिन कि बुर फाड़दे! आज मुझे नव्या समझकर हि निचोड़ लो समधीजी। अहह!मर गई मे!"
हवेली कां वो रूमअब पूरीतरह सें एक् कामुक अखाड़े मे तब्दील होँ चुका थां। विक्रम सिंह कां वो विकराल औऱ कालानाग मालती कि बुर कि गहराई मे किसी मशीन कि तरह अंदर-बाहर् हौ रहा थां, मगर मालती आज उन्हें इतनी आसानी सें 'झड़ने' देने केँ मूड मे नहि थि। वो जानती थि कि विक्रम सिंह केँ अंदर दिल्ली कि अधूरी हवस कां गुबार भरा हैं, औऱ वो उस गुबार कों पूरीतरह निचोड़ लेना चाहती थि।
मालती: (विक्रम केँ चेहरे पऱ अपनी गर्म सांसें छोड़ते हुए) "झड़ना नहि ससुरजी जी! अभि तोँ खेल शुरुआत हुआ हैं। दिल्ली मे तौ आप् मुट्ठी मे हि ढेर होने वाले थें, यहाइस समधिन कि रसीली देह कां पूरा खुशी तोँ लेँ लीजिए। क्याँ हुआ?थक गए क्याँ? याँ नव्या कि यादआते हि इस मूसल कि जान निकल गई?"
विक्रम सिंह नें एक् कुटिल मुस्कान केँ संग मालती केँ भारी बोबों पर्र अपने दाँत गड़ादिए। मालती कि यह छेड़खानी उनके भीतर कि मर्दानगी कों औऱ भि अधिक भड़का रही थि।
विक्रम सिंह: (धक्का मारते हुए, आवाज़ मे दरिंदगी औऱ मजालिए) "तूँ बड़ी चालबाज़ हैं मालती! नव्या नं सही, पऱ तूने उसकीकमी महसूस नहि होने दि। सच तौ यह हैं कि उस कच्ची कली सें ज़्यादा रस तोँ तेरीइस अनुभवी औऱ मांसल गुफा मे भरा हैं। तूने जौ यह अपनी जांघें मेरेलिए खोलकर रखी हें, इसमें जौ गर्मी हैं वोँ किसी जवान लड़की मे कहां? बोल। कैसालग रहा हैं जबयहलाल सुपाड़ा तेरी बुर कि दीवारों कों छीलरहा हैं?"
मालती नें अपनीकमर कों एक् झटका देकर विक्रम केँ उस भारीअंग कों औऱ गहराई मे खींच लिया।
मालती: "अहह!गजब। ससुरजी जी आप् तौ बड़े बेशर्म निकले! बहू केँ बारे मे ऐसी बातें? अगर नव्या देख लेती कि उसका 'मर्यादित' ससुरजी अपनी समधिन कों किसी रखैल कि तरहठोक रहा हैं, तोँ वोँ क्याँ सोचती? क्याँ वोँ अपनी बुर इस भयंकर मूसल केँ आगेकभी खोलती?"
विक्रम सिंह: (औऱ भि अश्लीलता सें जवाब देतेहुए) "वोँ देखती तोँ स्वयं भि नंगी होकर लाइन मे लग जाती!उसे पता हैं कि इस कोठी कां मालिक जब अपनीआई पऱ आता हैं, तौ अच्छे-अच्छों कि मर्यादा पानी भरती हैं। तुँ मुझे नव्या कां तानामत दे, आज तूँ हि मेरी नव्या हैं, तुँ हि मेरी शिकार हैं। आज तेरीइस चौड़ी गांड़ औऱ गीली बुर कां वोँ हाल करूँगा कि तुँ दिल्ली वाली कों मोबाइल करके कहेगी— 'बेटी, तूने क्याँ चीज़ छोड़ दि!'"
विक्रम सिंह नें अब मालती कों बैड पर्र तिरछा कर दिया औऱ उसकी एक् टांग कों हवा मे उठाकर उसे किसी दरिंदे कि तरह ठोकने लगे। मालती केँ मुँह सें सिसकारियां औऱ गालियां एक् संग निकलरही थीं। वो विक्रम कों औऱ भड़काने केँ लिए अपनीजीभ सें उनके सीने केँ बालों कों चाटरही थि।
मालती: "ठोको। औऱ ज़ोर सें! अपनीइस बुढ़िया समधिन कों आज वोँ सुखदे दो जोँ आपने अपनी पूरी जवानी मे अपनी पत्नि कों भि नहि दिया होगा। आज यह कोठी मात्र आपके औऱ मेरे अश्लील मिलाप कि गवाह बनेगी। झड़ना मत। अभि तोँ मुझे आपकीइस मूसल कि ताप कों पूरीरात सहना हैं!"
हवेली कां शयनकक्ष अब किसी भभकती हुईँ भट्टी कि तरहतप रहा थां। विक्रम सिंह कां विकराल मूसल मालती कि बुर केँ भीतर किसी पागल सांड कि तरह प्रहार कररहा थां। पसीने सें लथपथ दोनों बदन एक्-दूसरे मे इसकदर गुंथे हुए थें कि मर्यादा औऱ रिश्तों कि पहचान मिट चुकी थि।
इसी घमासान केँ बीच, मालती नें अपनी गर्दन पीछे कि ओर मोड़ी औऱ विक्रम कि आँखों मे आँखें डालकर अपनी आखरीचाल चली।
मालती: (हाँफते हुए औऱ कांपती आवाज़ मे) "एक् बात बताइये समधीजी। क्याँ नव्या इतनी ज़रूरी हैं आपकेलिए? क्याँ उसकीयह जवानदेह आपके दिमाग़ पऱ इतनी हावी हैं कि आपकोकोई औऱ स्त्री नहि चल सकती? क्याँ इस समधिन कां यह मांसल शरीर आपकी प्यास बुझाने केँ लिए बहुत नहि हैं?"
विक्रम सिंह नें एक् ऐसा भयानक औऱ गहरा धक्का मारा कि मालती कि आँखों केँ आगे अंधेरा छा गय़ा। उन्होंने मालती केँ बालों कों पीछे सें मुट्ठी मे जकड़ लिया।
विक्रम सिंह: (दरिंदगी औऱ जुनून सें लदी आवाज़ मे) "नव्या। नव्या वोँ माल हैं मालती, जौ मेरी नस-नस मे ज़हर बनकरबस गय़ा हैं! उसका वोँ गोरा शरीर, उसकी वोँ बेशर्म अदा औऱ उसकी बुर कि वोँ खुशबू। मे उसे अपनीरूह मे उतार चुका हूं। तुँ भले हि समधिन हैं, पर्र वोँ मेरी वोँ भूख हैं जौ तुम को भोगने केँ बाद भि शांत नहि होगी!"
मालती कां बदनइस सच कों सुनकर औऱ भि ज़्यादा उत्तेजित हौ उठा। उसने एक् ऐसीबात कह दि जिसने हवेली कि मर्यादा कों हमेशा केँ लिएदफन कर दिया।
मालती: (बेशर्मी कि सारी हदेंपार करतेहुए) "अगरऐसा हैं। अगर मेरा दोस्त विक्रम उस कच्ची कली केँ लिए इतनातड़प रहा हैं। तोँ मे वादा करती हूं! मे स्वयं लाऊंगी अपनी बेटी कों अपनेइस दोस्त केँ नीचे! मे स्वयं उसे तुम्हारी इस मूसल कि मार केँ लिए सजधजकर करूँगी। हम् मां-बेटी मिलकर तुम्हारे इस विकराल नाग कां ज़हर पिएंगी!"
ये सुनते हि विक्रम सिंह केँ भीतर जैसेकोई ज्वालामुखी फटपड़ा। मालती कां अपनी हि बेटी कों ससुरजी केँ खाट पऱ परोसने कां ये वादा विक्रम कि बर्दाश्त केँ बाहर् थां। उनके धक्कों कि रफ़्तार अब तूफानी हौ गई।
विक्रम सिंह:"अहह! मालती। तूने तोँ मुझे पागलकर दिया! लेँ। फिनखा यह अंतिम हिसाब!"
कमरे मे मांस केँ टकराने कि आवाज़ें तेज हौ गईं। मालती कां जिस्म बिजली केँ झटकों कि तरह फड़कने लगा। उसकी बुर कि मांसपेशियां विक्रम केँ भारी लंड कों बुरीतरह जकड़ने लगीं।
मालती: "आँ रहा हैं! विक्रम। मेरा आँ रहा हैं! अहह। अपनी बेटी कां तोहफा याद रखना.उफ़! मार डालो मुझे!"
विक्रम सिंह: "नव्या। मालती। अहह!"
एक् गगनभेदी चीख केँ संग मालती झड़ गई, औऱ ठीकउसी लम्हा विक्रम सिंह केँ विकराल मूसल नें अपना सारा गर्म औऱ गाढ़ा लावा मालती कि कोख कि गहराइयों मे मूसलाधार बारिश कि तरह उड़ेल दिया। दोनों निढाल होकर एक्-दूसरे पऱ गिरपड़े। कमरे मे केवल भारी सांसों औऱ जिस्मानी खुशबू कां राज थां। मालती नें अपनी बेटी कां सौदाकर लिया थां, औऱ विक्रम सिंह नें उस सौदे पऱ अपनी मुहरलगा दि थि।
पर्र कुंडली केँ हिसाब सें बहुओर ससुरजी कां मिलन पक्का थां यह सुमित कहा उड़ा लें गय़ा उसको उसका मिलन ससुरजी सें करवाओ
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
निढाल होकरबैड पर्र लेटी मालती कि सांसें अब आरामसे सामान्य हौ रहीथीं। कमरे मे अभि भि उस विकराल मूसल कि मार कि गूँज औऱ पसीने कि महकबसी थि। विक्रम सिंहबगल मे अधमुंदी आँखों सें छत कों देखरहे थें, जैसे मालती केँ उस वादे नें उन्हें किसी सुनहरे ड्रीम्स मे भेज दिया होँ।
मगर जैसे-जैसे देह कि गर्मी कम हुई, मालती केँ मन कि बत्तियां जलने लगीं। वो छत कों देखते हुए अपनीकही हुइ बातों कों याद करनेलगी औऱ उसे एक् सिहरन सि महसूस हुइ।
मालती (मन हि मन):"हे ईश्वर! मे उत्तेजना केँ आवेश (Moment of heat) मे क्याँ-क्याँ बक गई? नव्या कों ससुरजी केँ नीचे लाने कां वादा? औऱ सुमित। बेचारा मेरा दामाद! उसके बारे मे मैंने कैसी अश्लील बातें कहीं, जबकि वो मेरा दामाद हैं औऱ उसने मेरा हमेशा मानरखा हैं। अपनी बेटी केँ घऱ कों बर्बाद करने औऱ उसे ससुरजी कि रखैल बनाने कि बात मे अपनी ज़ुबान पर्र लाई हि केसे?"
मालती कों अब अपनी 'चुदक्कड़' छवि औऱ अपनी मर्यादा केँ बीच केँ टकराव कां अहसास होँ रहा थां। उसेयाद आया कि केसे उसने सुमित केँ 'परफॉरमेंस' कों ससुरजी केँ सामने छोटा दिखाया थां, जबकि वो जानती थि कि सुमित एक् नेक इंसान हैं औऱ उसका दामाद हैं।
मालती: (करवट बदलते हुए) "वोँ तोँ बसउस भारी औऱ कालेनाग कि बेचैनी थि जिसने मुझे अंधाकर दिया थां। सुमित केँ बारे मे जोँ कुछ भि कहा, वोँ सभीझूठ थां। हवस मे कही गई बातें सच नहि होतीं। पऱ अब क्याँ? अगर विक्रम नें उस वादे कों गंभीरता सें लें लिया, तौ मे अपनी बेटी कां सामना केसे करूंगी?"
विक्रम सिंह नें मालती कि कमर पऱ हाथरखा औऱ उसे अपनीओर खींचते हुए भारी आवाज़ मे कहा:
विक्रम: "मालती, तूने जौ वादा किया हैं। वोँ मुझे सुकून सें बैठने नहि देगा। कब बुलारही हैं नव्या कों? मेरायह मूसलअब उसीदिन शांत होगाजब मम्मी औऱ बेटी दोनों मेरीइस चौखट पर्र एक् संग होंगी। "
मालती केँ गले मे थूकफंस गय़ा। उसेसमझ आँ गय़ा कि जौ तीर कमान सें निकल चुका हैं, वो वापस नहि आएगा। उसनेहवस केँ जोश मे एक् ऐसे 'शिकारी' कों न्यौता दे दिया थां जौ अब अपनाहक मांगे बिना नहि रुकेगा।
मालती: (बनावटी मुस्कान केँ संग) "समधीजी, आप् भि न्। अभि तोँ हम् दोनों नें जन्नत देखी हैं। नव्या भि आएगी, पऱ वक्त तोँ दीजिये। अभि तोँ इस समधिन कां पूरारस निचोड़ना बाकी हैं। "
पर्र अंदर हि अंदर मालती कांपरही थि। उसने अपनी बेटी केँ खाट मे ससुरजी कों बिठाने कि जौ अश्लील शर्तरखी थि, वो अब उसकेगले कि फांस बनतीजा रही थि। उसेलग रहा थां कि उसने'मज़े' केँ चक्कर मे बहोत बड़ा 'गुनाह' औऱ 'झूठ' कां सहारा लें लिया हैं।
दिल्ली मे मम्मी-बेटी कां अश्लील मिलन
जगह: दिल्ली कां फ्लैट
वक़्त: रात ११:४५बजे
सुमित कों दवाइयां देकर गहरी नींद मे सुलाने केँ बाद, मालती औऱ नव्या केँ पासअब अपनी 'तन्हाई' कां जश्न मनाने कां पूरा मौका थां। मालती दिल्ली तौ सुमित कां हालचाल पूछने आई थि, पर्र उसके जिस्म मे अभि भि विक्रम सिंह केँ उस विकराल मूसल कि छुअन औऱ हवेली कि वोँ अश्लील यादें ताज़ाथीं।
नव्या नें बेडरूम कां द्वार (दरवाज़ा) अंदर सें बंद किया औऱ अपनी मां कों एक् ऐसीनज़र सें देखा जैसे वो उसकी रग-रग सें वाकिफ होँ।
नव्या: "मम्मी, सचबता। तुँ यहा केवल सुमित कि सेहत देखने आई हैं, याँ ससुरजी जी केँ उस कालेनाग कां ज़हरयहा दिल्ली तक फैलाने आई हैं?"
मालती नें एक् मदहोश कर देने वाली मुस्कान दि औऱ अपनी साड़ी कां पल्लू नीचे गिरा दिया।
मालती: "लाडो, तूने जौ कोठी मे आग छोड़ी थि, उसने मुझे भि जला दिया। तेरे ससुरजी नें जोँ मेराहाल किया हैं। उसे बयां करने केँ लिए शब्द नहि, बस शरीर चाहिए। "
जश्न कि शुरुआत:
नव्या नें अपनी मां कों बाँहों मे भर लिया। दोनों केँ बीचअब मम्मी-बेटी कां नातागौण होँ चुका थां; वेअबदो ऐसी औरतें थीं जौ एक् हि 'मूसल' कि दीवानी थीं। नव्या नें अपनी मां केँ भारी औऱ लटकेहुए बोबों कों ब्लाउज केँ ऊपर सें हि मथना शुरुआत कर दिया।
नव्या: "अहह मम्मी! तूँ तोँ पहले सें भि ज़्यादा रसीली हौ गई हैं। ससुरजी जी नें तुझेही खूब निचोड़ा हैं क्याँ?"
मालती नें कोई जवाब नहि दिया, बल्कि नव्या कि नाइटी उतार दि। दोनों अब पूरीतरह नग्न एक्-दूसरे केँ सामने खड़ीथीं। नव्या केँ जवान औऱ सख्त बोबे मालती केँ अनुभवी औऱ ढलतेहुए बदन सें टकरारहे थें। नव्या नीचे बैठी औऱ अपनी मां कि चौड़ी जांघों कों फैलाकर उसकी बुर केँ पास अपना चेहरा लें गई।
बुर चाटने कां खेल:
नव्या नें जब अपनी जुबान मालती कि बुर केँ मुहाने पऱ फेरी, तोँ मालती केँ मुँह सें कराह निकल गई।
मालती: "अहह। नव्या! तेरीयह जुबान। बिल्कुल तेरे ससुरजी केँ उसलाल सुपाड़े जैसी गर्मी देरही हैं। चाटइसे। साफ़कर दे उनका साराज़हर!"
नव्या पागलों कि तरह अपनी मां कि बुर चाटने लगी। वो उसरस कां स्वाद लें रही थि जोँ विक्रम सिंह नें मालती केँ भीतर छोड़ा थां। मालती नें भि अपनी बेटी कों नहि छोड़ा; उसने नव्या कों पलंग पर्र लिटाया औऱ उसके विशाल तरबूज जैसे बोबों कों अपने मुँह मे भरकर उन्हें बुरीतरह निचोड़ने लगी।
अश्लीलता कां चरमोत्कर्ष:
दोनों एक्-दूसरे केँ अंगों केँ संगऐसे खेलरही थीं जैसेकोई भूखा जानवर शिकार पऱ टूटता हैं। नव्या नें मालती कि बुर मे अपनी उंगलियां डालीं, औऱ मालती नें नव्या केँ चेहरे कों अपनी जांघों केँ बीचदबा लिया।
नव्या: (हाँफते हुए) "मां। तूने जौ वादा किया हैं, मुझेसभी पता हैं। तूँ मुझे ससुरजी जी केँ उस भयंकर मूसल केँ नीचे लेँ जानां चाहती हैं नां?"
मालती नें नव्या कि बुर कों ज़ोर सें चूसते हुएऊपर देखा। उसकी आँखों मे हवस कां नशा थां।
मालती: "हाँ लाडो। क्योंकि जौ सुख मुझे मिला हैं, मे चाहती हूं मेरी बेटी भि उस विकराल नाग कां पूराडंक झेले। आज हम् एक्-दूसरे कों तृप्त करेंगे, औऱ कल.कल तेरा ससुरजी तेरी तृप्त करेगा। "
नव्या कां जिस्म अभि भि मालती कि जीभ औऱ उंगलियों केँ स्पर्श सें थिरकरहा थां, मगर जैसे हि उत्तेजना कां वो तूफ़ान शांतहुआ, उसके चेहरे पर्र एक् अजीब सि दृढ़ता आँ गई। उसने धीरे-धीरे सें अपनी नाइटी उठाई औऱ अपने जिस्म कों ढंकते हुएबैड केँ कोने पऱ बैठ गई। कमरे मे फैली अश्लील महक केँ बीच नव्या कि आवाज़ अब बिल्कुल साफ़ औऱ गंभीर थि।
नव्या: (मालती कि आँखों मे देखते हुए) "मां, जोँ अभि हुआ वोँ हमारी अपनी प्यास थि। मगर मर्यादा कि लकीरअब भि वहीं हैं जहाँ मैंने खींची थि। तूनेजोश मे आकर बाबूजी (विक्रम) सें जौ वादा किया हैं, वोँ तेरा अपना हैं। मे सुमित कि पत्नि हूं औऱ सुमित केँ संग हि सुखी हूं। "
मालती, जौ अभि भि अर्धनग्न अवस्था मे अपनी सांसें दुरुस्त कररही थि, नव्या कि इस अचानक बदली हुइ बातों सें हैरान रह गई।
मालती: "पऱ लाडो, अभि तोँ तूँ ससुरजी केँ उस विकराल मूसल कि बातें कररही थि। अभि तौ तूँ मेरे शरीर सें उनकारस ढूँढरही थि! अबयह अचानक वफ़ादारी कां भूत कहां सें जाग गय़ा?"
नव्या: (दृढ़ता सें) "मां, बात करना औऱ बात हैं। ससुरजी जी केँ संगउस तरह कि कामुक बातें करना, उन्हें अपनी नग्नता दिखाकर तड़पाना, याँ उनकेउस कालेनाग कि तारीफ करना—यह सभी एक् खेल हैं, एक् नशा हैं। मुझे उन्हें बेबस देखने मे मजाआता हैं। मगर उनकेसंग बैड साझा करना?कभी नहि। मे सुमित केँ संग गद्दारी नहि कर सकती। "
नव्या नें कमरे कि खिड़की कि ओर देखा जहाँ सें दिल्ली कि रात कि रोशनी छनकर आँ रही थि।
नव्या: "सुमित कां वो 'मीडियम' अंग मुझे वोँ चैन देता हैं जौ कोई औऱ नहि दे सकता। बाबूजी कां वो भारी मूसल मात्र मेरी कल्पनाओं कि खुराक हैं, हकीकत मे नहि। मे उनकेपास जाऊंगी, उनसे वैसी हि अश्लील बातें भि करूंगी, उन्हें अपनीदेह दिखाकर पागल भि करूंगी। पऱ सुमित केँ अलावा किसी कां 'अंग' मेरी बुर केँ भीतर नहि जाएगा। ये मेरी वफ़ा हैं औऱ यही मेरी सीमा हैं। "
मालती कों समझ आँ गय़ा कि नव्या नें एक् ऐसाजाल बुना हैं जिसमें शिकार (विक्रम सिंह) कों पास तोँ बुलाया जाता हैं, उसकीहवस कों आसमान तक पहुँचाया जाता हैं, पऱ अंतिम समय पर्र उसे 'कोरा' हि छोड़ दिया जाता हैं।
मालती: "तौ तूँ यहकहरही हैं कि तूँ कोठी चलेगी, ससुरजी कों उकसाएगी, उनके सामने नंगी भि होगी, पऱ उन्हें स्वयं कों छूने नहि देगी? लाडो, तुँ आग केँ संगखेल रही हैं। वोँ खूंखार शिकारी हैं, अगरइस बार उसका धैर्य टूटा, तौ वोँ मर्यादा कि परवाह नहि करेगा। "
नव्या कि इस खरी-खरी बात नें कमरे मे फैलीउस कामुक गर्माहट पऱ जैसे बर्फ कां पानीडाल दिया। मालती जोँ अभि कुछदेर पहले नव्या केँ संग रति-क्रीड़ा मे डूबी थि, अब अपनी बेटी केँ इस दो-टूक फैसले कों सुनकर हक्की-बक्की रह गई।
नव्या नें अपनी नाइटी केँ फीते कसतेहुए मालती कि ओर देखा, उसकी आँखों मे अबहवस नहि, बल्कि एक् ज़बरदस्त किस्म कां ठहराव थां।
नव्या: "मम्मी, तूने शायद मुझे समझा हि नहि। तुँ उस 'मोमेंट ऑफहीट' मे बह गई औऱ वादेकर आई, पऱ मैंने कबकहा कि मे तेरेसंग हवेली चलूँगी? औऱ वोँ भि ससुरजी जी केँ उस भारी मूसल केँ नीचे लेटने केँ लिए? नहि मां, यहभूल कर भि मत सोचना। मेरी अपनी मर्जी हैं, औऱ मेरी मर्जी यही हैं कि मे दिल्ली मे अपनीइस छोटी सि दुनिया मे सुमित केँ संगखुश हूं। "
मालती नें घबराकर पूछा, "पर्र लाडो, वोँ विक्रम सिंह हैं! वोँ इंतजार कररहा होगा। मैंने उससे वादा किया हैं कि मे तुम्हें उसके नीचे लाऊंगी। अगर तूँ नहि आई, तोँ वोँ मुझे कच्चा चबा जाएगा!"
नव्या: (बेशर्मी औऱ आत्मविश्वास सें मुस्कुराते हुए) "तोँ तूँ भुगत मां! तूने अपनी 'चुदक्कड़' फितरत केँ चक्कर मे मेरा सौदा किया, तौ अबउस विकराल नाग कां ज़हर तुँ हि पी। मैंने साफ़कह दिया—बातें करना, उन्हें तड़पाना औऱ अपनीदेह कि झलक दिखाना एक् अलगखेल थां, पर्र कोठीआकर उनकेबैड कि शोभा बनना मेरेबस कि बात नहि। यही मेरा संसार हैं, यही मेरा पति हैं, औऱ यही मेरी मर्यादा हैं। "
नव्या उठी औऱ सुमित केँ कमरे कि ओर देखने लगी, जहाँ उसका पति बेखबर सोरहा थां।
नव्या: "तूँ वापसजा हवेली, औऱ ससुरजी जी कों संभाल। उन्हें बता देना कि नव्या पंछी हैं, पिंजरे मे नहि आएगी। तूने जोँ 'मम्मी-बेटी' वालाजाल बुना थां, उसमें तूँ स्वयं फंस गई हैं। अब तूँ हि उनकीउस भारी औऱ तपती हुइ मार कों झेल औऱ अपनी प्यास बुझा। मुझेअब इस दिल्ली कि शांति मे दखल नहि चाहिए। "
मालती कों अब अपनी गलती कां अहसास होँ रहा थां। उसनेहवस केँ जोश मे विक्रम सिंह जैसे 'खूंखार शिकारी' कों जोँ लालच दिया थां, अबउसे पूरा करने कां कोई मार्ग नहि दिखरहा थां। वो समझ गई कि नव्या नें उसेबीच मंझधार मे छोड़ दिया हैं।
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story - Kahani ab aur interesting hogi
ओह कितना उत्तेजना सें भरपूर वर्णन किया हैं ससुरजी बहु कि वासना कां। रिश्तों मे वासना कां इस सें बेहतर वर्णन औऱ कही नहि देखा मैने
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