गुदने की कीमत - body-focused - Full Story Part 1
दोस्तो मेरानाम दीपिका हैं मे दिल्ही कि रहने वालीहु मेरा एक् बॉयफ्रेंड हैं हम् दोनों एक् दूसरे सें बहोत प्रेम करते थें दिवाली मे मे उसे एक् सरप्राइज देना चाहती थि। पर्र ?
कुछसाल पहले….
बड़ा प्यारा हैं वोँ! जब वो ‘मांगता’ हैं तौ स्वयं कों रोकना सचमुच मुश्किल हौ जाता हैं। ऐसे प्रेम सें, ऐसा मासूम बनकर मांगता हैं कि दिल उमड़आता हैं उस पऱ। लालची याँ फरेबी तौ बिल्कुल नहि लगता। मन करता हैं लुटादूँ स्वयं कों उस पऱ। ऐसा भि स्वयं कों बचाकर क्याँ रखना। सब तोँ इंजॉय कररहे हें। मेरी कितनी सहेलियां कइयों सें ‘लिवा’ चुकी हें, मे हि क्यूं वंचित रहूँ। सहेलियाँ मुझे बढ़ावा भि देती हें। कहती हें कैसा खूबसूरत हैं तेरा बॉयफ्रेंड; करवा लें नं उसकेसंग… कहीं छोड़कर चला गय़ा तोँ हाथ मलतीरह जाओगी।
दोस्तों कि बातों, औऱ सबसे बड़ी मेरे बॉयफ्रेंड कि बार-बार मनुहार, कां असररहा होगा कि इसबार दिवाली मे मैंने उससेकह दिया, इस बार तुम्हें दिवाली मे कुछखास उपहार करूंगी, रेडीरहो। उसने पूछा कि क्याँ उपहार करूंगी तौ मैंने कहा कि ऐसीचीज जौ मैंने उसेकभी नहि दि।
अब वो बेचारा समझरहा हैं कि मे उसे ‘दूंगी’। मगर मे सोचरही हूं कि कुछऐसा करूं कि उसको ‘फाइनल’ चीज देने सें बच जाऊं औऱ वो खुशी सें गदगद भि होँ जाए।
मैंने सतीशजी कि एक् किस्सा पढ़ी थि
मुझे उसमें गुदना गुदवाने कां सीन बड़ा अच्छा लगा थां। मैंने सतीशजी सें पूछा भि थां कि वो टैटू आर्टिस्ट रॉबर्ट दिल्ली मे कहां रहता हैं। पऱ उन्होंने मुझेकुछ खास नहि बताया। तब मैंने अपने सें तलाश किया।
एक् मिला, अभि नया हि काम शुरुआत किया थां, मगरहाथ मे सफाई थि। जवान व्यक्ति थां, मुझे थोडा डरलगा कि कहींये मुझे एक्सप्लॉयट नं करे। पर्र सोचा मामला भि तौ ‘वयस्क’ कां हैं। अगरकुछ इसने करना चाहा तोँ देख लूंगी। देखने मे सुंदर भि थां।
मैंने उसे अपनी जरूरत बताई। बॉयफ्रेंड कों सेक्स कां आनंद तोँ देना चाहती हूं मगरफ**** सें बचना भि चाहती हूं, औऱ ये मुझे दीवाली मे तोहफा करना हैं। मैंने सोचा थां कि दोनों स्तनों पऱ हि दीवाली सें ताल्लुक रखताकोई मेसेज टैटू करवाऊंगी। इसतरह मेरा ब्वायफ्रेंड मेरे मम्मों देख लेगा औऱ उनसेकुछ खेल भि लेगा।
मगर उस टैटू कलाकार कां आइडिया इससे ज़्यादा साहसी थां। साहसी क्याँ, दुस्साहसी थां। मे संकोच मे पड़ गई कि इतनीदूर पहलीबार मे हि जानां उचित होगा? भद्दा नहि लगेगा? मे कर पाऊंगी? मगर उसने मुझे आश्वस्त किया कि वल्गर नहि लगेगा, कलात्मक हि होगा।
हैप्पी दिवाली कां विश – केवल छातियों तक हि क्यूं? इससे तोँ वो धोखा खाया-सां महसूस करेगा। उसे लगेगा तुमने ऊपरऊपर हि निपटा दिया। अगर उपहार कां मज़ा गाढ़ा बनाना चाहती हौ तौ औऱ आगेजाओ।
सचमुच… मुझे भि लगा जहाँ वो पूरे सम्भोग कि उम्मीद कररहा हैं वहा सिर्फ स्तनों तक हि सीमित रहने सें बहोत फीका हौ जाएगा। मगर टैटू कलाकार कां आइडिया सिर्फ जांघें खोलने तक कां नहि थां, भगों कों भि नंगा रखने कां थां। ये बहोत हि डेयरिंग थां, पुसी भि दिखानी पड़ेगी। मे कुछदेर ठिठकी, फिन बिंदास होकर उसका आइडिया कबूलकर लिया।
उसने मुझे दिवाली केँ हि दिन सुभह-सुभह आने कों कहा, बोला कि मे उसकी पहली ग्राहक हूंगी।
बाद मे पताचला उसदिन मे उसकी अकेली हि ग्राहक थि।
उसने मुझे बार-बार आश्वस्त किया कि मुझे उदास नहि होना पड़ेगा।
मे दीवाली कि सुभह बिल्कुल साफ-सुथरी, अंदर सें सेंटेड होकर उसकेपास पहुंची। उसने मुझे अंदर केँ बालों कों मूड़ने सें मना किया थां। बोला थां, बालों कि ड्रैसिंग उसीदिन करेंगे। उसने मुझेबता हि दिया थां मुझे उसके सामने बिल्कुल खुलकर, औऱ अपने कों बिल्कुल खोलकर बैठना पड़ेगा। उसके निर्देशानुसार मे घाघरा पहनकर पहुंची थि।
पहुँची तौ वो रेडी थां, बाहर् हि खड़ा प्रतीक्षा कररहा थां। नहाया-धोया, एकदम फ्रेश! मुझसे हाथ मिलाया औऱ गुड मॉर्निंग बोला। पुरुष केँ नजर कि यही तारीफ महिला कों कमजोर कर देती हैं। अच्छा कोलोन वगैरह लगाकर गंधरहा थां।
क्यूं नं हौ, एक् हसीन लड़की कि पुसी केँ दीदार कां दुर्लभ मौकामिल रहा थां।
मैंने मुस्कुराकर उसकेगुड मॉर्निंग कां जवाब दिया।
अंदर जाकर उसनेकुछ सामान्य बातें पूछीं जिन्हें करने कां उसने मुझे पहले हि निर्देश दे दिया थां। उसने मुझे तौलिया दिया औऱ घाघरा उतारने देने कों कहा। मैंने सोचा थां शुरुआत मे पैंटी पहने रहूंगी मगर उसनेकहा कि बाद मे पैंटी उतारते टाइम टैटू खराब हौ जाएगी।
गुदने की कीमत - body-focused – New Episode
मुझे स्वयं पऱ ताज्जुब होँ रहा थां कि कहां तोँ इतनी रूढ़िवादी हूं कि ब्वायफ्रेंड कों अभि तक मम्मों भि देखने नहि दिए, कहां ये मे इस अनजान केँ सामने पूरीतरह नंगी हौ रही हूं। मगर मे बिंदास थि। करना हैं तोँ करना हैं, बस!
मगर पैंटी उतारने केँ बादऐसी लज्जा आनेलगी कि रोयें खड़े होँ गए। लीलाधर जी नें शालू कि इस स्थिति केँ बारे मे कुछ बताया नहि थां। मैंने सोचा थां लीलाधर कि किस्सा कि तरह मुझे वो गद्देदार मजेदार कुर्सी पऱ बिठाएगा। पर्र उसने मुझे टेबल पर्र चढ़कर पंजों पर्र ‘चुक्को-मुक्को’ बैठने कां निर्देश दिया। छी, कितना बुरालग रहा थां जैसे इन्डियन टॉयलेट पऱ पॉटी करने केँ लिए बैठी हूं।
बैठने पर्र तौलिया इसतरह उठ गय़ा थां कि नीचे सबकुछ खुल गय़ा थां। सोचरही थि, मे यह क्याँ कररही हूं।
वो मेरी खुली टांगों केँ बीच कुर्सी लगाकर बैठ गय़ा। तौलिया यूँ भि नामभर कों थां, उसको भि हटाकर उसने मेरी पुसी कां ठीक सें मुआयना किया। पेंसिल लेकर उसने दोनों जांघों पऱ बीच सें बराबर दूरी रखतेहुए निशान लगाए। कुछ निशान उसने भग-होठों केँ दोनों तरफ भि उसने लगाए। फिन उसने एक् दूसरी पैंसिल लेकर लिखना शुरुआत किया।
पैंसिल कि नोक चलने पऱ जांघ मे गुदगुदी होनेलगी। कुछदेर तक उस गुदगुदी केँ मारे स्थिर नहि रहपाई। कुछदेर कि प्रैक्टिस केँ बाद हि उसके लिखने लायक स्थिर हौ पाई। जब वो मेरी बाईं जांघ पर्र लिखरहा थां उस वक़्त मैंने यथासंभव योनि होठों कों औऱ दाईं जांघ कों तौलिये सें ढक लिया थां।
बाईं जांघ पर्र लिखने केँ बाद उसने मेरीदाई जांघ पऱ एक् दूसरा शब्द लिखा। लिखने केँ बाद उसने मुझे आइना थमाया। बड़े अक्षरों मे एक् जाँघ पर्र ‘शुभ’ औऱ दूसरी पर्र ‘दीपावली’ लिखा थां- ‘शुभ दीपावली’ बड़ी कलात्मक लिखाई थि।
मानना पड़ेगा कि औरत कि खुली योनि कों देखते हुए भि कोई कलाकार होशो-हवास सलामत रखकर खूबसूरत लिखाई कों अंजाम दे सकता हैं। मगर दोनों शब्दों केँ बीच योनि होठों औऱ बालों कि गहरी कालिमा तौ अच्छी नहि लगरही थि। मैंने कहा, इतना तौ पैंटी पहनकर भि दिखाया जा सकता हैं? पुसी दिखेगी तोँ मेसेज गंदा लगेगा, दीपावली कि शुभता औऱ पवित्रता कां एहसास चला जाएगा।
मगर अभि उसकाकाम ख़त्म नहि हुआ थां। उसने मेरे प्रश्न कां कोई जवाब नहि दिया। कई कलाकार एक् बारतय कर लें तोँ टोका-टोकी मनपसंद नहि करते। मैंने अभि तक अपनी पुसी पर्र तौलिये कां कोनादबा रखा थां। उसनेउसे मेरे हाथों कों हटा दिया औऱ मेरीकमर सें तौलिया खींच लिया। मे ऊपर टी-शर्ट मे मगर नीचे पूरीतरह नंगी थि औऱ वो मेरी भगों मे सीधेदेख रहा थां। गुदा कां छिद्र भि उसेसाफ दिखरहा होगा। मे तोँ शरम सें मर हि गई थि।
कुछदेर तक उसने उसका अच्छे सें मुआयना किया। उसकेबाद उसने उस्तरा उठाया औऱ पेड़ू केँ बालों कों आहिस्ता मूंड़ना शुरुआत किया। बाहर् सें अंदर होटों कि ओर। रेजर सें बालों केँ कटने कि किर-किर आवाज़ अजीब औऱ उत्तेजक लगरही थि। मूड़ते हुए क्रमशः होठों कि ओर बढ़ते हुए उसने होठों केँ बाहर् बाहर् करीब एक् अंगुल चौड़ाई मे बाल छोड़दिए। होठों केँ किनारे-किनारे पौनइंच तक घने काले बालों कां बॉर्डर औऱ उसकेबाद सफाचट गोरा मैदान। जैसेगेट केँ किनारों पर्र किसी नें घास कि सजावट करके छोड़ दिया होँ।
बैठे-बैठे मेरे पाँव थकनेलगे थें औऱ होठों व योनि मे इन गतिविधियों सें गीलापन आनेलगा थां। निश्चित हि उसे उसकीमहक मिलने लगी होगी। इसलिये मे कुछदेर रुकने कां वक़्त चाहती थि।
वो उठा औऱ बाथरुम चला गय़ा, करीब 5 मिनट बिताकर निकला। मुझेलग गय़ा कि उतनीदेर मे वो बाथरूम मे हाथ सें अपनी उत्तेजना शांत करकेआया हैं। उसके चेहरे पर्र लाली थि। फिन भि मुझेउस पर्र क्रोध नहि आया, बल्कि उल्टे मुझे अच्छा लगा।
उतनीदेर मे मेरी भि ‘गर्मी’ कम होँ गई थि।
उसनेफिन काम शुरु किया।
अब उसने कैंची सें बालों कों धीरे धीरे कुतरना शुरु किया। उन्हें इच्छित लंबाई तक लाने केँ बाद ब्रश सें कटे बालों कों झाड़ दिया। अभि तक मुझे उसकी डिजाइन कां कुछखास आइडिया नहि थां। इतना जरूर मालूम थां वहाकोई तस्वीर बनाने वाला हैं।
मुझे बहुत गुदगुदी हौ रही थि। उसने मुझे स्थिर रहने कों कहा नहि तोँ तस्वीर बिगड़ जाएगी। मे जिसतरह बैठी थि, मेरे योनि केँ होठों कि फांक उसकीनाक कि सीध मे खड़ी थि; ऊपर क्लिट सें संकरे कोण सें शुरुआत होकर होंठों केँ बीचकुछ दूर तक समान अंतर केँ बाद नीचे फैलते हुए चूतड़ों कि फाँक।
उसने फाँक केँ दोनों तरफ जाँघों पर्र आधे-आधे दीपक कि आउटलाइन खींची। अब मुझेसमझ मे आँ गय़ा वो क्याँ बनारहा हैं। सस्पेंस कों बनाए रखतेहुए उसने सुनहले रंग मे कूची डुबोई औऱ फाँक केँ किनारे किनारे बालों कों रंगना शुरुआत किया। बालों पऱ हल्के हल्के ब्रश चलाते हुए उसने उन्हें इसतरह रंगा कि कुछबाल काले रहें, कुछ सुनहरे।
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मे मुस्कुरा रही थि। मुझे गुदगुदी केँ संग-संग उत्तेजना होँ रही थि। योनि कां गीलापन इतनाबढ़ गय़ा थां कि होंठों केँ बीच लसलसा तारबन जारहा थां। उसनेजब वहा तौलिया दबाकर सुखाया तौ मेरे गीलेपन कां खुला इकरार होँ गय़ा।
मे सोचरही थि मेरे इतनेदिन सें प्यार कि प्यास मे पड़ाहुआ बॉयफ्रेंड जिसेदेख तक नहि पाया हैं, उसेये नामुराद खुलकर देखरहा हैं। देख हि नहि, उसेछू औऱ सहला भि रहा हैं। मन मे ख्याल आया कि अगरये उसेचूम लेँ, चाट भि लेँ तोँ कौन सि बड़ीबात होँ जाएगी।
भगों मे जिसतरह गुदगुदी औऱ सनसनी होँ रही थि उसमें कभी-कभी लगता थां, काशये हिम्मत करकेऐसा कर हि दे। मे उसे हल्का-फुल्का डाँटकर छोड़ दूंगी औऱ उसे करने दूंगी। मगरये आदमीकुछ अधिक हि शरीफ थां। शायद कलाकार कां अपना मिजाज थां कि जब वो रचरहा होता हैं तौ हर लोभ-लालच सें दूर होता हैं।
बालों कों रंगने केँ बाद उसने उन्हें फूंक फूंककर सुखाया। अब उसने ब्रश लेकर आउटलाइन केँ अंदररंग भरना शुरुआत किया। उसकी कूची पुसी मे ऊपर सें नीचे घूमते हुए नीचे जाकरकभी कभी गुदा केँ छेद कों भि छू जाती थि। बालों कि उस छुअन सें इतनी सुरसुरी होती थि कि मुझेउसे बीच-बीच मे रुकने केँ लिए कहना पड़ता थां।
आख़िरकार उसने योनि होठों कि विभाजक रेखा केँ निचले हिस्से मे दोनों चूतड़ों पऱ आधे-आधे दीपकबना दिए। जांघों कों पूरीतरह फैलाए रखने मे मेरीकमर औऱ पैर बुरीतरह दुखगए थें।
चित्र पूरा करके उसने मुझे आइना पकड़ा दिया।
वाउ… एक् बहोत हि हसीन कल्पना साकार होँ रही थि। आइने मे मे देखरही थि कि एक् एक् जांघ पऱ ‘शुभ’ औऱ ‘दीपावली’ लिखी थि औऱ दोनों शब्दों केँ बीच जांघों केँ जोड़ मे दीपकजल रहा थां। योनि केँ हल्के खुले होठों केँ अंदर कि लालीदिए कि लौ केँ बीच कि लालीबन गई थि औऱ होंठों केँ किनारों पऱ केँ बाललौ केँ बाहरी पीले-भूरे रंग। बालों मे लगा सुनहरा रंगऐसा लगरहा थां मानोदिए कि लौ सें सुनहरी आभा बिखररही होँ।
उसनेशुभ दीपावली कि रेखाओं कों रंगों सें मोटा औऱ गाढ़ा करकेकाम ख़त्म कर दिया। कुछ देरयों हि बैठने केँ लिएकहा ताकिरंग अच्छे सूख जाएँ। उसने ब्लोअर सें हवा भि लगा दि।
मे उसे पैसे देनेलगी तौ उसने पैसे लेने सें मनाकर दिया। बोला कि पहलेजिस काम केँ लिए टैटू बनवाया हैं वो कामकर लूँ। मनपसंद आयातभी पैसे लेगा।
“ऐसे ग्राहक रोजरोज नहि मिलते इसलिये खासमन सें काम किया हैं, आपके औऱ ब्वायफ्रेंड कों मनपसंद आएगा तौ उसे अपनीकला कि सफलता मानूंगा। ”
मुझे अजीबलगा पऱ उसकी ख़्वाहिश देखते हुएबात मानली।
शायद वो देख्ना चाहता थां कि बॉयफ्रेंड कों दिखाने केँ बाद मेरी क्याँ गत हुई… चुदी याँ नहि। याँ शायद वो पैसे केँ अलावा मुझसे कुछ ‘एक्स्ट्रा’ पाना चहता थां।
जौ होँ, व्यक्ति भला थां, काम केँ दौरान उसने किसी प्रकार कि कोईगलत हरकत नहि कि थि, इसलिये मे भि उसके प्रति कुछ उदार होने कों रेडी होँ गई। (वैसे ख़्वाहिश तौ मेरी भि होनेलगी थि। )
ब्वायफ्रेंड सें मिलने जाते वक़्त मन मे शंकाओं-चिंताओं-रोमांचों केँ जितने पटाखे फूटरहे थें, वे इससे पहले कि किसी भि दीवाली सें अधिक थें। क्याँ होगा, केसे दिखाऊंगी उसको, शुरुआत हि केसे करूंगी। क्याँ सोचेगा वोँ? मुझे सस्ती याँ चालू तोँ नहि समझ लेगा?हाय रेराम, क्याँ मे सचमुच उसके सामने टांगें खोलूंगी? मगर अभि उस कलाकार केँ सामने अपने कों मे केसे नंगी दिखासकी? मे सहीमन मे तौ हूं नं? पागल तौ नहि हूं?
मे व्हीकल मे ठीक सें बैठी भि नहि कि रंग नं उखड़ जाएँ हालाँकि उसने मुझे आश्वस्त किया थां कि बैठने सें याँ कपड़ों कि रगड़ सें याँ पानी लगने सें चित्र नहि छूटेगा। मिटाने केँ लिएखास द्रव सें धोना पड़ेगा, उसकेलिए मुझे उसकेपास आनां होगा।
मगर मन कहां मानता हैं; मे वाहन सि सीट पऱ चूतड़ कों आधा उठाए हि बैठी थि।
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ब्वायफ्रेंड सें मिलने जाते वक्तमन मे शंकाओं-चिंताओं-रोमांचों केँ जितने पटाखे फूटरहे थें, वे इससे पहले कि किसी भि दीवाली सें अधिक थें। क्याँ होगा, केसे दिखाऊंगी उसको, शुरुआत हि केसे करूंगी। क्याँ सोचेगा वोँ? मुझे सस्ती याँ चालू तौ नहि समझ लेगा?हाय राम, क्याँ मे सचमुच उसके सामने टांगें खोलूंगी? मगर अभि उस कलाकार केँ सामने अपने कों मे केसे नंगी दिखासकी? मे सही दिमाग़ मे तौ हूं न्? पागल तौ नहि हूं?
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