शादी के घर में किसी और के धोखे में चुद गई मैं ! - kamre ke andhere - Complete Kahani All Parts
”मोना!”
मे एकदम चौंकपड़ी। अभि कुछ बोलती हि कि एक् हाथआकर मेरे मुँह पऱ बैठ गय़ा। कान मे कोई फुसफुसाया – ”’जानेमन, मे हूं, तरुण। कितनी देर सें तुम्हारा प्रतीक्षा कररहा थां। ”
मे सोचने लगी। तरुण, वही स्मार्ट-सां लड़का जौ लडकियों केँ बहोत आगे पीछेफिन रहा थां। मे दम साधे लेटीरही। कमरे केँ अंधेरे मे वो मुझे मोनासमझ रहा हैं। मैंने सोचापता तोँ चले कि आखिर मोना क्याँ गुल खिलारही हैं।
”मुझे यकीन थां कि तुम् आओगी। एक् एक् लम्हा पहाड़ सां बीतरहा थां तुम्हारे प्रतीक्षा मे। तुमने मुझे कितना तडपाया। ”
मेरा कलेजा जोरों सें धड़करहा थां। कुछ केहना चाहती थि मगरबोल नहि फूटरहे थें। मोना गुपचुप ये किसके संग चक्कर चलारही हैं?। मुझे तोँ वो कुछ बताती नहि थि! मेरे सामने तोँ वो बड़ी अबोध औऱ मासूम बनती थि। दरअसल इस कमरे मे आजउसे हि सोना थां। मगर वो दूल्हे कों देखने मंडपचली गई थि। मुझे नींद बहोत आँ रही थि औऱ रात अधिक होँ रही थि, इसलिये मे उसी केँ कमरे मे आकरसो गई थि। चादर ढँकेबैड पऱ दूसरा कौनसो रहा हैं देखा भि नहि। सोचा होगीकोई। विवाह केँ घऱ मे कौन कहां सोएगा निश्चित नहि रहता। अभि लेटी हि थि कि ये घटना हौ गई।
“मोना जानेमन, तुम् कितनी अच्छी हौ जोँ आँ गई। ” उसकाहाथ अभि भि मेरा मुँहबंद किए थां। “आइलवयू। ” उसने मेरेकान मे मुँह घुसाकर चूम लिया। चुंबन कि आवाज़ सिर सें पाँव तक पूरे जिस्म मे गूँज गई। मे बहरी-सि होँ गई। कलेजा इतनीजोर धडकरहा थां कि उछलकर बाहर् आँ जाएगा। मन होँ रहा थां अभि हि उसे ठेलकर बाहर् निकल जाऊँ। मगर डर औऱ घबराहट केँ मारे चुपचाप लेटीरही।
वो मेरी चुप्पी कों स्वीकृति समझरहा थां। उसकाहाथ मेरे मुँह पऱ सें हट गय़ा। उसने अपनी चादर बढ़ाकर मुझे अंदर समेट लिया औऱ अपने शरीर सें सटा लिया। उसके सीने पर्र मेरेदिल कि घड़कन हथौडे कि तरह बजनेलगी। “बाप रे कितनी जोर सें धड़करहा हैं। ” उसने मानों स्वयं सें हि कहा। मुझे आश्वस्त करने केँ लिए उसने मुझे औऱ जोर सें कस लिया। “जानेमन आईलवयू, आईलवयू। घबराओ मत। ”
मेरामन कहरहा थां रिया, अभि वक्त हैं, छुड़ाओ स्वयं कों औऱ बाहर् निकलजाओ। हंगामा मचादो। तबये समझेगा कि छुपचुप लड़की कों छेड़ने कां क्याँ नतीजा होता हैं। विवाह अटेन्ड करनेआया हैं याँ येसभी करने!मगर अब उससेजोर लगाकर छुड़ाने केँ लिए हिम्मत चाहिए थि। एक् तरफ निकल जाने कां मन हौ रहा थां दूसरी तरफमन ये भि कहरहा थां कि देखूँ तोँ सहीये आगे क्याँ करता हैं। डर, घबराहट औऱ उत्सुकता केँ मारे मे जड़ होँ रही थि।
उसकाहाथ मेरीपीठ पऱ घूमरहा थां। गालों पर्र उसकीगरम साँसें जलरही थीं। मुझे पहलीबार किसी पुरुष कि साँस कि महकलगी। वो मुझे अजीब सि लगी। हालाँकि उसमें एैसाकुछ अच्छा भि नहि थां, पर्र वो मुझे वो बुरी भि नहि लगी। वहीं वो मेरी किंकर्तव्यमूढ़ता कां फायदा उठारहा थां औऱ मुझे आश्चर्य हौ रहा थां कि मे कुछकर क्यूं नहींरही! मुझेउसे जल्दी धक्का देकर बाहर् निकल जानां चाहिए थां औऱ उसकी करतूत कि अच्छी सजा देनी चाहिए थि। मैंने सोच लियाअब औऱ नहि रुकूंगी। मे छूटने केँ लिएजोर लगाने लगी। अब चिल्लाने हि वाली थि … कि तभी उसके होंठ ढूंढते हुए सें आकर मेरे मुँह पर्र जमगए। मे कुछ बोल्ना चाहरही थि औऱ वो मेरे खुलते मुँह मे सें मेरी साँसें खींचते मुझे चूमने लगा। मेरी ताकत ढीली पड़नेलगी। दम घुटने लगा। मुझे निकलना थां मगरलग रहा थां मे उसकी गिरफ्त मे आतीजा रही हूं। मेरे दोनों हाथ उसके हाथों केँ नीचेदबे कमजोर पड़नेलगे। मे छूटना चाहती थि मगरअवश होँ रही थि।
उसकाहाथ पीछे मेरीपीठ पऱ ब्रा केँ फीते सें खेलरहा थां। कब उसने पीछे मेरे फ्रॉक कि जिपखोल दि थि मुझे तौ पता हि नहि चला। उसकाहाथ मेरी नंगीपीठ पऱ घूमरहा थां औऱ ब्रा केँ फीते सें टकरारहा थां। पहलीबार किसी पुरुष कि हथेली कां एक् रूखा औऱ ताकतभरा स्पर्श। मे जड़ रहकर अपने कों अप्रभावित रखनाचाह रही थि मगर उसके घूमते हाथों कां सहलाव औऱ जिस्म पर्र बाँहों केँ बंधन कां कसाव मुझेअलग रहने नहि देरहे थें। मुझेये सभी बहोत बुरालग रहा थां मगर अस्वीकार्य फिन भि नहि थां। मे सोच भि नहि सकती थि कि कभीये सभी मे अपनेसंग होने दूंगी। मगर।
शादी के घर में किसी और के धोखे में चुद गई मैं ! - kamre ke andhere – New Episode
वो मेरे ब्रा केँ फीते कों खोलने कि कोशिश कररहा थां मगरहुक खुल नहि रहा थां। बेसब्र होकर उसने दोनोतरफ फीतों कों जोर सें झटके सें खींच दिया। हुक टूट गय़ा औऱ फीतेअलग हौ गए। मुझे अपने बगलों औऱ छाती पऱ ढीलेपन कां, मुक्ति कां एहसास हुआ। मैंने एक् साँसभरी।
अभि तोँ वो बसपीठ छूकर हि पागल होँ रहा थां। आगे क्याँ होगा ???
उसके होंठ मेरे होंठों सें उतरकर गले पऱ आँ रहे थें। उसके सांसों कि सोंधी महकदूर चली गई। वो फ्राक कों कंधों पर्र सें सरकाने कि कोशिश कररहा थां। मेरी एक् बांह फ्राक सें बाहर् निकालकर उसनेउसे मेरेसिर केँ ऊपरउठा दिया औऱ उसहाथ कों ऊपर सें सहलाते हुए नीचे उतरकर मेरीबगल कों हथेली मे भर लिया। गरम औऱ गीली काँख पर्र उसकाभरा भरा कसाव मादकलग रहा थां। मुझसे अलगरहा नहि जारहा थां। पहली सफलता सें उत्साहित होकर उसने मुझे बाँहों मे लपेटे हुए हि थोड़ा दूसरे करवट पर्र लिया औऱ थोड़ी कोशिश सें फ्राक कि दूसरी बाँह भि बाहर् निकाल दि। मेरे दोनो हाथों कों ऊपर उठाकर उसने अपने हाथों मे बांध लिया औऱ मेरी बगलों कों चूमने लगा। उन केँ गरम नमकीन पसीने कों चूसने चाटने लगा। उसकीइस हरकत पऱ मुझेघिन आई.मगर मुझे गुदगुदी होँ रही थि औऱ नशा-सां भि छारहा थां। मुझे नहि मालूम थां कि बगलों कां चूमना इतना मादक हौ सकता हैं। मैंने हाथ छुड़ाने कि कोशिश बंदकर दि। मेरी सासें तेज होने लगीं। वो खुशी सें भर गय़ा। उसे यकीन होँ गय़ा कि अब मे विरोध नहि करूंगी। उसने मुझे सहारा देकर बिठाया औऱ फ्राक सिर केँ ऊपर सें खींच लिया। ब्रा मेरी छाती पर्र झूल गई। उसने उसके फीते कंधों पर्र सें सरकाकर ब्रा कों निकालना चाहामगर मैंने स्तनों कों हाथों सें दबा लिया। हाथों पऱ ब्रा केँ नीचे मुझे अपनी चूचियों कि चुभन महसूस हुइ। मेरी चूचियाँ टाइट होकर होकरखड़ी हौ गई थीं। मे लज्जा सें गड़ गई।
उसने मुझे धीरे-धीरे धीरे-धीरे लिटा दिया। मेरेहाथ छातियों पर्र दबेरहे। वो अबऊपर सें हि मेरे छातियों पर्र दबे हाथों कों औऱ ऊपर नीचे कि खुली स्थान कों इधर सें उधर सें चूमने लगा। दबकर मेरे उभारों कां निचला हिस्सा हाथों केँ नीचे थोड़ा बाहर् निकलआया थां। उसने उसमें हलके सें दाँतगड़ा दिया। चुभन केँ दर्द केँ संग एक् गनगनाहट जिस्म मे दौड़ गई औऱ छातियों पर्र हाथों कां दबावठहर नहींसका। तभी उसने ब्रा नीचे सें खीचली औऱ मेरे हाथों कों सीधाकर दिया। अब मे कमर केँ ऊपर बिल्कुल नंगी थि। गनीमत थि कि अंधेरा थां औऱ वो मुझेदेख नहि सकता थां। उसकेहाथ मेरी छातियों पर्र घूमरहे थें। उसने चूचियों कों चुटकियों मे पकड लिया औऱ हलके सें मसल दिया। मे कराहउठी। अहह, यह क्याँ होँ रहा हैं! येसभी इतना विह्वल कर देने वाला क्यूं हैं! उसने झुककर मेरे मुँह पऱ चूम लिया। मुझे उसके होठों पऱ अपने बगलों केँ नमकीन पसीने कां स्वाद आया। मैंने उसके होठों कों चाट लिया। वो मेरीइस नटखट हरकत पऱ हँसा औऱ तडातड कई चुम्बन जड दिये।
वो अब नीचे उतरा औऱ मेरी एक् मम्मों कों मुँह मे भरकर चूसने लगा। मे गनगना उठी। एक् क्षण केँ लिए वो एक् बच्चे कां सां खयाल मेरेमन मे घूम गय़ा औऱ मैंने उसकासिर अपने मम्मों पऱ दबा लिया। लग रहा थां चूचियों सें तरंगें उठकर सारे जिस्म मे दौड़रही हें। वो कभी एक् निपुल कों चूसता कभी दूसरे कों। मुँह केँ हँटते हि उस निपुल पर्र ठंडक लगती औऱ उसी वक़्त दूसरी मम्मों पर्र गर्माहट औऱ होंठों केँ कसाव कां एहसास मिलता। मे अपने जांघों कों आपस मे रगड़ने लगी। मेरीजोर सें चलती सांसों सें उपर नीचे होती छातियाँ मानों स्वयं हि उसेउठ उठकर बुलारही थीं।
अब वो मेरी नाभि कों चूमरहा थां। मानों उसके छोटे सें छेद केँ भीतर सें किसी कों बुलारहा होँ। ख़्वाहिश होँ रही थि वहीँ सें उसे अपने भीतर उतारलूँ। अपने बहोत भीतर, गर्भ केँ अंदर मे सुरक्षित रखलूँ। मुझे एकाएक भीतर बहोत खाली सां लगा – आओ, मुझेभर दो। उसने बिनाभय केँ मेरी शलवार कि डोरी खींचली औऱ ढीली शलवार केँ भीतरहाथ डालकर मेरे फूले उभार कों दबाने लगा। मेरी पैंटी गीली होँ रही थि। उसने पैंटी केँ ऊपर सें भीतर केँ कटाव कों उंगलियों सें ट्रेस किया औऱ कटाव कि लम्बाई पऱ उंगली रखकर भीतरदबा दिया। मे सिहरउठी। जिस्म मे बिजली कि तरंगें दौड़रही थीं। अब उसने पैंटी केँ भीतरहाथ घुसेड़ा औऱ मेरे चपचपाते रसभरे कटाव मे उंगली घुमाने लगा। उंगली घुमाते घुमाते उसने शिखर पर्र सिहरती नन्हीं कली कों जोर सें दबाकर मसल दिया। मे ओहओहकर हौ उठी। मेरीकली उसकी उंगली केँ नीचे मछली सि बिछलरही थि। मे अपने नितंब उचकाने लगी। उसने एक् उंगली मेरीछेद केँ भीतर घुसा दि औऱ एक् सें वो मेरीकली कों दबाने लगा। छेद केँ अंदर कि दीवारों कों वो जोरजोर सें सहलारहा थां। अब उसकी हरकतों मे कोमलता ख़त्म होतीजा रही थि। शरीर पर्र चूँटियाँ रेंगरही थीं। लगता थां तरंगों पर्र तरंगें उठा उठाकर मुझे उछालरही हें। योनि मे उंगलियाँ चुभलाते हुए उसने दूसरे हाथ सें मेरे उठते गिरते नितंबों केँ नीचे सें शलवारखिसकाते हुए नितम्बों सें नीचे सरका दिया। उंगलियाँ मेरे अंदर लगातार चलाते हुए उसने मेरी पैंटी भि घसीटकर टांगों सें बाहर् कर दि।
कहां तोँ पहले मैंने उसे अपने बूब्ज़ कों तक उघाड़ने नहि दिया थां औऱ कहां अब मे स्वयं उसे अपनी योनि खोलने मे सहयोग देरही थि। मे चादर केँ भीतर मादरजाद नंगी थि।
अब मुझेलग रहा थां वो आएगा। मे सजधजकर थि। मगर वो देरी करके मुझे तड़पारहा थां। वो मुझे चूमते हुए नीचे खिसकरहा थां। नाभि सें नीचे। कूल्हों कि हडिडयों केँ बीच, नर्म मांस पऱ। वहा उसने हौले सें दाँतगड़ा दिए। मे पागल हौ रही थि। वो औऱ नीचे खिसका। नीचे केँ बालों कि शुरूआत पऱ। अरेउधर कहां। मैंने रोकना चाहा। मगर विरोध कि संभावना कहां थि। सहना मुश्किल होँ रहा थां। वो उन बालों कों चाटरहा थां औऱ बीचबीच मे उन्हें मुँह मे लेकर दाँतों सें खींचरहा थां। फिन उसने पूरे उभार केँ माँस कों हि मुँह फाड़कर भीतर लेतेहुए उसमें दाँतगड़ा दिये। मेरे मुँह सें कराह निकल गई। दर्द औऱ पीड़ा कि लहर एक् संग। ओह ओह। अरे ये क्याँ! मुझे कटाव केँ शिखर पर्र उसकी सरकती जीभ कां एहसास हुआ। मैंने जांघों कों सटाकर उसे रोकना चाहा। मगर वो मेरे विरोध कि कमजोरी कों जानता थां। उसनेकुछ जोर नहि लगाया, मात्र ठहर गय़ा। मैंने स्वयं हि अपनी टांगें फैला दि। वो मेरी फाँक कों चाटने लगा। कभी वो उसे चूसता कभी चाटता। कभीजीभ कि नोक नुकीली औऱ कडी क़रके कटाव केँ अंदर घुसाकर ऊपर सें नीचे तक जुताई करता। कभी जीभ साँप कि तरह सरकती कभीदबा दबाकर अपनी खुरदरी सतह सें सरेस कि तरह रगड़ती। उसके तरकस मे तीरों कि कमी नहि थि। पता नहि किसकिस तरह सें वो मुझे पागल औऱ उत्तेजित किएजा रहा थां। अभि वोँ जीभ चौड़ी करके पूरे कटाव कों ढकतेहुए उसमें उतरकर चाटरहा थां। मेरे दोनों तरफ केँ होंठ फैलकर संतरे कि फांक कि तरहफूल गए थें। वो उन्हें बारी बारी सें मुँह मे घसीटकर चूसरहा थां। उनमें अपने दाँतगड़ा रहा थां। दाँत केँ गड़ाव सें दर्द औऱ दर्द पऱ उमड़ती खुशी कि लहर मे मे पछाड़खा रही थि। मेरारस बहबहकर निकलरहा थां। उसने मेरी थरथराती नन्हीं कली कों होठों मे कस लिया औऱ उसेकभी वो दाँतों सें, कभी होंठों सें कुचलते हुएजोर जोर सें खींच घसीटकर चूसने लगा। मै आपे सें बाहर् होँ उठी। अहह! अहह!अहह! अरे?अरे? अरे? …… जा…जा…जा…। मे बांध कि तरहफूट पड़ी। सदियों सें जमी हुई देह मानों धरती कि तरह भूकंप मे हिचकोले खानेलगी। उसने उंगलियों सें खींचकर छेद कों दोनों तरफ सें फैला दिया औऱ उसमें भीतर मुँहओप कर मेरारस पीनेलगा। कुंआरी देह कि पहली रसधार। सूखी धरती पर्र पहली बारिश सि। वो योनि केँ भीतरजीभ घुसाकर घुमा घुमाकर चाटरहा थां। मानों कहींउस अनमोल रस कि एक् बूंद भि नहि छोड़ना चाहता होँ। मे अचेत हौ गई।
शादी के घर में किसी और के धोखे में चुद गई मैं ! - kamre ke andhere – New Episode
कुछदेर बादजब मुझेहोश आया तोँ मैंने अपने पर्र उसकावजन महसूस किया। मैंने हाथों सें टटोला। वो मुझपर चढ़ाहुआ थां। मेरी हाथों कि हरकत सें उसे मेरेहोश मे आने कां पताचला। उसने मेरे मुँह पर्र अपना मुँहरख दिया। एक् तीखीमहक मेरे नथुनों मे भर गई। उसके होठों पऱ मेरा लिसलिसा रसलगा थां। मैंने स्वयं कों चखा। एक् अजीब सां स्वाद थां – नमकीन, तीखा, बेहद चिकना। मे उसकेमहक मे डूब गई। उसने सराबोर होकर मुझे पिया थां। कोई हिचक नहि दिखाई थि कि उस स्थान पऱ केसे मुँह लें जाए। मेरा एक् एक् पोर उसकेलिए प्रेम केँ लायक थां। एक् कृतज्ञता सें मे भरउठी। मैंने स्वयं उसे विभोर होकर चूमा औऱ उसके होठों कों, गालों कों अगलबगल सब कों चाटकर साफकर दिया। अंधेरे मे मैंने स्वयं कों उसके हवाले कर दिया थां। मुझेकोई दुविधा नहि थि। वो मुझे मोना समझकर कररहा थां। मे उसका खुशी बिना किसीडर केँ लें रही थि। मैंने उसे बाँहों मे कस लिया।
औऱ तब मुझेपता चला कि मेरी जांघों पर्र कोई मोटीचीज गड़रही हैं। जांघों केँ बीचइधर उधर फिसलती हुइ कुछखोज रही हैं। फिन वो मेरे दरार मे उतरी औऱ वहॉ केँ चिकने रस मे फिसलकर दबाव मे एकदम नीचे उतरकर गुदा केँ छेद पर्र दस्तक दे गई। मेरे भीतर चेतावनी दौड़ गई। अबआगे बढ़ने मे खतरा हैं। अब वो असलीकाम पर्र आँ गय़ा थां। वो घटना जिसका हर लड़की अपने यौवन मे शादी तक प्रतीक्षा करती हैं औऱ जिसे मात्र अपने पति केँ लिए बचाकर रखना चाहती हैं। अबतक जोँ हुआ थां वो एक् एडवेंचर केँ रूप मे लियाजा सकता थां। मगरअब इसकेबाद जोँ होगा उसका अधिकार मात्र मेरेतन मन केँ स्वामी कों हि थां। जिसे मे सपनों केँ राजकुमार कों अर्पित करना चाहती थि। मगर रोकना केसे होँ। अबतक जौ हुआ हैं उसकेबाद उसेकिस तरह रोकूँ। मे सम्पूर्ण निर्वस्त्र थि। उसने न् मात्र सिर्फ मेरे शरीर कों छुआ थां बल्कि उसके रहस्य कि आखिरी सीमा तक गय़ा थां औऱ मेरे सबसे गुप्त अंग मे मुँह घुसाकर मेरे पहलीबार फूटे कुँआरे रसको भि पीया थां, जिसका स्वाद इसके पहले मैंने भि नहि जानां थां। वो मुझपर छायाहुआ थां। मे उसके नीचे ढँकी थि। कुदरत अब मुझसे अपना हिस्सा मांगरही थि जिसके लिए उसने मुझे जन्म केँ बाद सें हि रेडी किया थां। उसका शिश्न ढूंढरहा थां। मेरी योनि भि उससे मिलने कों बेकरार थि, मुझेआगे बढ़ने केँ लिएठेल रही थि।। मैंने अंधेरे कों ओट देने केँ लिए शुक्रिया दिया। वही मेरी सहायता कररहा थां। मैंने संयम कि लगामछोड़ दि। नियति कां घोड़ा जिधर लें जाए।
वो थोड़ाऊपर उठा औऱ मुझपर सें नीचे उतरा। उसने मेरे पाँव घुटनों सें मोड़ दिये औऱ घुटनों कों पुस्तक केँ पन्नों कि तरह फैला दिया। गंतव्य कों टटोला। लिंग कों हाथ सें पकड़कर छेद केँ मुँह पऱ लाया। वहा उसनेऊपर नीचे रगड़कर रस मे अच्छी तरह भिंगोया। मे दम साधे प्रतीक्षारत थि। क्याँ करता हैं। मेरे पैरों केँ पंजे मेरे नितम्बों केँ पास नमस्ते कि मुद्रा मे जुड़े थें। वो लिंग केँ मुंह कों मेरेछेद पऱ लाकर टिकाया औऱ हल्के सें ठेला। तब मुझे उसके थूथन केँ मोटेपन कां पताचला औऱ मे डर गई। इतना मोटा मेरे छोटेछेद केँ अंदर केसे जाएगा? मेरेछेद कां मुँह फैला औऱ उसपरआकर उसका शिश्न टिक गय़ा। अब उसकेइधर उधर फिसल जाने कां डर नहि थां। शिश्न कों वहीं टिकाए उसनेहाथ हटाया औऱ मेरेउपर झुक गय़ा। मेरे बगलों केँ नीचेहाथ घुसाकर उसने मेरे कंघों कों उपर सें जकड़ लिया। उसकेवजन सें हि शिश्न अंदर धँसने लगा।
अब मे जारही थि। लुटरही थि। चोर मेरा सबसे अनमोल मेरे हाथों सें हि धीरे-धीरे धीरे-धीरे छीनरहा थां। मेरे राजीनामे केँ संग। औऱ मे कुछ नहि कररही थि। विरोध नहि करकेउसे छीनने मे सहायता कररही थि। अंधेरा मुझेलुट जाने केँ लिए प्रेरित कररहा थां। किसेपता चलेगा? फिन प्राब्लम क्याँ हैं? रुकना किसलिए? अंधेरा मेरी ख़्वाहिश केँ विरुध्द मेरी सहायता कर मुझेछल रहा थां। अंधेरा उसे भि छलरहा थां क्योंकि मे उसकी मोना नहि थि, मगर उसकी सहायता भि कररहा थां क्योंकि उसने मुझे निश्चिंत करके मुझको उसे उपलब्ध करा दिया थां। कुंवारी लड़की कि सबसे अनमोल चीज। कितनी बड़ी भेंट वो अनजाने मे पारहा थां ! जानते हुए मे क्याँ मे उसेहाथ भि लगाने देती!हाथ लगाना तौ दूर अपने सें बात करने केँ लिए भि तरसाती। मगर अनजाना होनेपर मे क्याँ कररही थि। वो मेरा कौमार्य भंगकर रहा थां औऱ मे सहयोग कररही थि।
उसका लिंग मेरी योनि केँ मुँह पऱ दस्तक देरहा थां।
एक् घक्का लगा औऱ उसका शिश्न थोड़ा औऱ भीतरधँस गय़ा। छेद मानो खिंचकर फटनेलगी। मे दर्द सें बिलबिला उठी। जोर लगाकर उसे हटाना चाहामगर स्वयं कों छुड़ा नहि पाई। ऊपर वो मुझे कंधों सें जकड़ेहुए थां औऱ नीचे मेरे पैरों कों मोड़कर सामने सें अपने पैरों सें चाँपे थां। छूटती किसतरह! उसने औऱ जोर सें दबाया। अहह, मे मर जाउंगी। शिश्न कि मोटी गर्दन कील कि तरहछेद मे धँस गई। वो ठहर गय़ा। शायदछेद कों फैलने केँ लिए टाइमदे रहा थां। मैंने उसे बगलों सें पकड़कर ठेलकर छुड़ाने कि कोशिश कि। मगर सफलता नहि मिली। वो कसकर मुझे जकड़े थां। कोई उपाय नहि। कोईमदद नहि। बुरीतरह फँसी हुईँ थि।
वो उसीदशा मे रुका थां। कुछदेर मे योनि केँ खिंचाव कां दर्दकुछ कम होनेलगा। हल्की सि राहत मिली। झेल पाने कि हिम्मत बंधी। मगर तभी एक् जोरदार धक्का आया औऱ धक्के केँ जोर सें मेरा सारा जिस्म ऊपर ठेला गय़ा। शिश्न मुझे करीब-करीब फाड़ते हुए मेरे अंदरघुस गय़ा। मे दर्द सें चीखउठी मगर उसने मेरा मुँहबंद कर आवाज़ अंदर हि घोंट दि। वो बेरहम होँ रहा थां। लगाआज वो मुझेमार हि डालेगा। जिसतरह कुल्हाड़ी लकड़ी कों फाड़ती हैं उसीतरह मे फटीजा रही थि। वो मुझे छटपटाने भि नहि देरहा थां। हरतरफ सें जकड़े थां। मुँह पऱ हाथ दबाए थां औऱ नीचे दोनों पाँव जुड़ेहुए उसके पैरों सें मेरे नितम्बों पर्र दबे थें। उपर सें कंधे जकडे थां। हिलना भि मुश्किल थां। अब वो कोईदया दिखाने कों रेडी नहि थां। छेद पऱ अपना दवाब बढ़ाता जारहा थां। कील धीरे-धीरे धीरे-धीरे मुझमें ठुकती जारही थि। शिश्न मेरे बहुत अंदरघुस चुका थां। योनि केँ चिकने गीलेपन मे वो भीतर सरकता हि जारहा थां। मे दर्द सें व्याकुल होँ रही थि। नश्तर कि एक् धार मुझे चीरती जारही थि। छोड़दो छोड़दो। मगर मुँह बंधे जानवर कि तरह मेरीउम… उम…। कि आवाज़ भीतर हि घुटरही थि।
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