स्वाँग - body-focused teasing - Real Kahani Part 1
स्वाँग
मुख्य पात्रों केँ बारे मे
परी : एक् कुरूप लड़की जौ कई लोगों केँ हत्या केँ जुर्म मे कारगार मे कैद थि औऱ जिसे अदालत मे पेश किया गय़ा। न्यायधीश केँ आदेश पऱ जौ अपनी स्टोरी अदालत मे सुनाती हैं।
नीलिमा : ग्रामीण क्षेत्र मे रहने वाली एक् औरत औऱ परी कि मम्मी जिसे एक् पुत्री कों जन्म देने केँ अपराध मे निरंतर हि प्रताड़ित किया जाता थां।
राघव : परी केँ पिता जौ पेशे सें एक् मजदूर औऱ बहोत हि गरीब किसान हैं। बिहार राज्य केँ ग्रामीण क्षेत्र मे रहने वालेइस मजदूर कि आर्थिक स्थिति बहोत हि दयनीय थि।
सुलेखा : परी कि बड़ी बेहन जौ उसकी सबसे अच्छी साथी भि थि औऱ जीवन कि कठिनाईयों कों दोनों नें संग मे लड़ी।
कविता : परी औऱ सुलेखा कि पड़ोसी यार जिसके परिवार वालों नें हि उसकी हत्या कर दि थि क्योंकि वो किसी दूसरे जाति वाले लड़के सें प्यार करनेलगी थि।
परी कि दादीमा : एक् बहोत हि पुराने ख्यालात वाली वृद्ध महिला जिन्हें वंस बढ़ाने केँ लिए एक् पोते हि लालसा थि। मगर उनकीये लालसा पूरी नहि होने कि वजह सें उन्होंने अपनीबहू कों बहोत प्रताड़ित किया।
स्वाँग - body-focused teasing – New Episode
अध्याय एक्
नीलिमा गर्भवती हैं औऱ आज उसका प्रसव हैं। गाँव केँ कुछलोग राघव कों सहानुभूति देने केँ लिए दरवाजे केँ बाहर् हि चबूतरे पऱ बैठे हैं, औऱ राघव कि बड़ी बेटी सुलेखा जौ अभि सिर्फ दो हि वर्ष कि हैं, बिना किसी टेंसन केँ अपने खिलौनों केँ संग खेलने मे मग्न हैं। उसे ज्ञात हैं कि उसकेघऱ मे एक् नन्हा सां मेहमान आने वाला हैं। एक् राजकुमार ऐसाउसे बताया गय़ा हैं। अपने भइया केँ संग खेलने कि उत्सुकता, औऱ प्रसवपीड़ा सें चीखती नीलिमा।
पिछली बार कि तरह, इस बार भि प्रसव केँ लिए नीलिमा कों उसके मायके वाले अपनेसंग लें जाने कां प्रस्ताव राघव केँ माता औऱ पिता केँ सामने रखे थें, मगर उन्होंने ये कहकर इनकार कर दिया कि आपकेघऱ कि अशुभ छाया मे कहीं लड़की न् जन्म लेँ लेँ।
पिछली बार गई थि नीलिमा, औऱ प्रसव भि वहींहुआ थां। परंतु जब सुलेखा कां जन्महुआ तौ राघव केँ परिवार वालों कि तरफ सें रिश्तों कि डोर मे गांठ आँ गई। उसकेबाद सें अब तक राघव एक् बार भि ससुराल नहि गय़ा औऱ नं हि नीलिमा कों मायके जाने कों मिला।
बड़े संतान मे एक् पुत्र कि ख्वाइश उससमय तौ अधूरी रह गई थि मगरइस बार तोँ लड़का होने कि संभावना पूर्ण थि। बुजुर्गों द्वारा बताएगए बर्ताव औऱ झाड़-फूंक करने वाले साधुओं औऱ भिक्षुओं केँ द्वारा बताएगए हर एक् टोटके कों उसने अच्छी तरह सें किया थां। औऱ इसबार लड़की होने कि कोई गुंजाइश नहि थि।
"अरेअब बैठ भि जा। क्यूं इधर-उधर चक्कर काटरहा हैं टेंसन मे? आँ बैठ। बिना पजामे वाले बाबा कां आशीर्वाद कभी व्यर्थ नहि जाता। उन्होंने कहा हैं नां तुम्हे कि बेटा होगा! तौ बेटा हि होगा! आँ बैठ!" चबूतरे पऱ बैठेउन सात-आठ लोगों मे सें एक् नें राघव कां हाथ पकड़कर तसल्ली दिलाते हुएउसे अपनेपास चबूतरे पर्र बैठाया। औऱ उसके कंधे पऱ हाथरखा।
"वोँ तौ ठीक हैं। मगर अभि मुझे नीलिमा कि चिंता होँ रही हैं। इसबार शायदउसे अधिक प्रसव पीड़ा सहनापड़ रहा हैं। " बोलते हुए वो फिन सें उठ खड़ाहुआ औऱ परिसर मे चक्कर लगाने लगा।
धूम्रपान कररहे एक् वयस्क नें राघव सें कहा कि तुँ इतनी चिंता क्यूं कररहा हैं? अन्दर हैं नां उसकीदेख रेख करने वाले। बिल्कुल औरतों केँ जैसे बात-बात पर्र तूँ ऐसा टेंसन लेने लगता हैं। —औऱ वो हंसने लगा।
इस बार वास्तव मे नीलिमा कों सामान्य सें अधिक हि प्रसव पीड़ा कां सामना करनापड़ रहा थां। उसकी ख्वाइश थि किसी अच्छे अस्पताल मे जाने कि। क्योंकि गाँव केँ कुछ औरतें जिनका प्रसव अस्पताल मे हुआ थां, नीलिमा कों बताया करती थि कि अस्पताल मे प्रसव होने सें मां औऱ बच्चा दोनों हि सुरक्षित होते हैं, औऱ प्रसव पीड़ा भि कम होता हैं। क्योंकि वो अपने बच्चे केँ संगकोई जोखिम नहि लेना चाहती थि, अस्पताल जाने कां प्रस्ताव उसने राघव केँ समक्ष रक्खी तोँ थि मगर उसकी सासू कां कहना थां कि पुत्र प्राप्ति केँ लिए स्वामी जी नें कहा हैं कि प्रसव, घऱ पर्र हि हौ, तोँ बेहतर होगा। औऱ पुत्र कि आयु भि लम्बी होगी। औऱ अस्पताल मे खर्चे भि तोँ बहोत होते हैं? इतना रुपया कहां सें लाएगी? दहेज केँ नाम पऱ तौ उसके मायके वालों नें बस पाँच हजार रूपए औऱ एक् साइकिल हि दिया हैं।
"तूँ तौ बस मिठाई कां डिब्बा लें आँ। खुशखबरी आती हि होगी। " दूसरे नें कहा।
राघव केँ पिता जी एक् ओर निश्चिंत बैठे थें क्योंकि स्वामी कि बातों नें उन्हें पूर्ण विश्वास दिलाया थां कि इसबार पुत्र हि होगा। उन्होंने भि राघव कों शांत होकरबैठ जाने कों कहामगर लगातार बढ़ती हुइ नीलिमा कि चीखें उसे व्याकुल कररही थि। अपनी मम्मी कि चींखें सुनकर दो वर्ष कि बच्ची सारे खिलौनों कों फेंककर अन्दर जाने केँ लिए दरवाजे कि ओर भागी। वैसे तौ दरवाजा अंदर सें बंद थां मगरफिन भि राघव नें भागकर उसे पकड़ा औऱ गोद मे लेँ लिया। वो अबोध भि रोनेलगी।
आखिरकार वो वक्त आँ हि गय़ा जब नीलिमा नें एक् बच्ची कों जन्म दिया। हां, इसबार भि लड़की कों हि जन्म दिया नीलिमा नें। प्रसव कराने वाली एक् स्त्री दरवाजा खोलकर बच्ची कों गोद मे लिए राघव केँ पासआई। उसकी मायूस चेहरे नें सबकोबता दिया कि संतान केँ रूप मे एक् पुत्र कि उनकी ख्वाइश इसबार भि पूरी नहि हुइ। इसबार भि लड़की हि हुईँ।
"लड़की हैं। " इतना बोलकर वो इस उम्मीद सें खड़ीरही कि राघवउसे गोद मे लेगा औऱ अपनी पुत्री कि हसीन शक्ल कां दीदार सबसे पहले करेगा। औऱ सुलेखा कों गोद सें उतारकर वो बच्ची कों गोद लेने केँ लिए अभि बढ़ने हि वाला थां कि उसकी मम्मी नें उसेरोक लिया।
"वापसरख आँ इसे इसके मां केँ पास। कोई नहि देखेगा इस मनहूस कि शक्ल कों। " लड़की होने कि वजह सें सबका चेहरा वैसे तौ पहले सें हि उतराहुए थां, औऱ वहा उपस्थित किसी भि आदमी कों एक् लब्ज बोलने कि हिम्मत नहि हौ रही थि क्योंकि हर किसी नें अपने-अपने ज्ञान केँ अनुसार राघव कों पुत्र प्राप्ति केँ लिए उपाय बताए थें। जिसकी निष्फलता निसंदेह सबके सामने थां। ऐसेकटु वचन कों अनदेखा करके राघव अपनी पुत्री कों गोद मे लेगाइस उम्मीद सें वोँ कुछदेर तक खड़ीरही।
"मैंने क्याँ कहा सुना नहि तुमने?" राघव कि मम्मी जोर सें उस महिला पऱ चिल्लाई। उसकी तीक्ष्ण शब्दों नें उसके हृदय मे भय उत्पन्न कर दिया औऱ भागते हुए बच्ची कों नीलिमा केँ पास रखने केँ लिए वोँ अन्दर चली गई।
"याद रखनाकोई भि उस मनहूस कि शक्ल नहि देखेगा। " चेतावनी देतेहुए वो भि अन्दर चली गई। औरत नें अभि बच्ची कों नीलिमा केँ समीप सुलाई हि थि कि वो भि वहा पहुँची औऱ नीलिमा केँ पास गई। क्योंकि नीलिमा उसके उम्मीदों पऱ इसबार भि खरी नहि उतरी थि, उनके हृदय मे गुस्स औऱ चिढ़ कि भावना अत्यंत तीव्र थि। मगर इसमें नीलिमा कि तौ कोई गलती थि हि नहि।
राघव कि मम्मी नीलिमा सें बोलि, 'देखो इस महारानी कों। बेटी पैदा करती हैं बेटी। औऱ ये भि नहि जानती कि वंश बेटी नहि बल्कि बेटा बढ़ाता हैं। यह तौ केवलबोझ होती हैं। एक् ऐसी पूंजी जिसका कोईलाभ नहि। '
उसकीये शब्द स्पष्ट करते थें कि पुत्री केँ जन्म सें उसकी विवाह तक केँ किए जाने वाली सारी इन्वेस्टमेंट व्यर्थ हैं। क्योंकि वो ससुराल चली जाती हैं। पुत्र औऱ पुत्री केँ बीच तुलना करने केँ लिए उसकी सांस नें जिस पगडंडी कां उपयोग किया थां क्याँ वो सही हैं? —कुछ सेकेंड तक नीलिमा भि विचार करतीरही। क्याँ वास्तव मे लड़की कों पालना लाभकारी नहि हैं? मगरलाभ औऱ हानि केँ बारे मे विचार करना तोँ व्यापार हैं? औऱ मे कोई व्यापारी नहि हूं। अच्छा मान लिया कि बेटी कों पालना लाभकारी नहि होतामगर इसबात कि क्याँ गारंटी हैं कि पुत्र आगेचल कर बुढ़ापे कि लाठी बनेगा? गाँव औऱ समाज मे आएदिन ये सुनने कों मिलता हैं कि वृद्घ होने पर्र फलाने केँ बेटे-बहुओं नें उन्हें बेघरकर दिया। ऐसे मे क्याँ सही हैं औऱ क्याँ ग़लत इसका फैसला राघव कि मम्मी लाभ औऱ हानि कि इस पगडंडी केँ माध्यम सें नहि कर सकती।
"क्षमा करना मां जी। पऱ आप् भि तौ एक् बेटी हि हौ। " सीमित शब्द संख्या मे बनेइस शब्द नें राघव कि मां केँ तथ्यों कां नं मात्र मुंह तोड़ जवाब दिया थां बल्कि ये भि साबित कर दिया थां कि संतान केँ रूप मे बेटी होना किसी व्यापार कि तरहलाभ याँ हानि कां तथ्य नहि हैं। औऱ उसेइस बात कि बहोत खुशी हैं कि इसबार भि उसने एक् बेटी कों जन्म दिया।
एक् लड़की कां जिंदगी हि संघर्ष सें आरंभ होता हैं। औऱ इस लड़की कि क़िस्मत मे तौ शायद केवल संघर्ष हि संघर्ष लिखा हैं। नीलिमा कि यह शब्द राघव केँ मां केँ हृदय कों भेद गई। उसे निशब्द कर गई क्योंकि वो भि तौ एक् बेटी हि थि। मगरइस तथ्य नें उन्हें केवल निरुत्तर किया थां संतान केँ रूप मे बेटी कों पाकर संतुष्ट नहि। मुंह फुलाकर वहा सें चली गई।
अपनी मम्मी केँ वक्ष केँ समीपसोई उस लड़की कि बदकिस्मती तौ देखिए कि उसकी जन्म लेने कि खुशी किसी कों भि नहि हुई। मगरइस बात सें शायदउसे कोई फर्क नहि पड़ता थां, क्योंकि इनसभी रीतियों औऱ तर्कों सें अज्ञात थि। नीलिमा उसकीओर देखी। कुछ हि घंटे तौ हुए थें उसेइस दुनियां मे आएहुए औऱ इतनी जल्द हि वोँ हंसना भि सीख गई थि याँ शायद उसकी शक्ल हि कुछऐसी थि। बहोत हि प्यारी शक्ल पर्र सुंदर हंसी, दुनियां औऱ दुनियां केँ विचारों सें अज्ञात — शायद इसीलिए मुस्कुरा रही थि कि उसने सबसे बुद्धिमान प्राणी इंसान केँ रूप मे जन्म लिया हैं। उसकी हसीन आँखें बहोत हि चमकीली औऱ सम्मोहक थि, कि क्रोधित भि देखकर सम्मोहित होँ जाय; पर्र ये नीलिमा केँ सासू औऱ अपनी दादीमा कों मोहित करने मे नाकाम रही। नीलिमा उसकेसर पर्र हाथ फेरते हुए बोलीं कि कोईबात नहि बेटी, जोँ क्याँ हुआ कि तुम्हारे इस दुनियां मे आने कि खुशी किसी कों नहि हुईँ? तुम् तोँ मेरीपरी हौ।
क़िस्मत क्याँ लिखी थि उस बेकसूर कि भगवान नें कि जन्म केँ बाद उसके पिता नें उसका चेहरा देखने सें भि इंकार कर दिया। बात ये नहि थां कि वो उसकी शक्ल देख्ना नहि चाहता थां बल्कि उसकी मां औऱ बाप नें वचन केँ बेड़ियों मे कैदकर दिया थां। राघव पेशे सें एक् किसान थां। अपनी खेती तौ नहि थि उसकेपास मगर वो फिन भि खेती हि करता थां। कुछ जानवरों कों भि पाल रक्खा थां जिसके दूध कों कभीबेच देता तौ कभी स्वयं भि उपयोग करता। भारत कां एक् राज्य बिहार औऱ इस राज्य केँ एक् छोटे सें गाँव मे निवास करने वाला राघव अक्सर हि आर्थिक समस्याओं सें तंग रहता थां। इसदौर मे अब तक बिजली तोँ गाँव मे आँ गय़ा थां मगर कनेक्सन लेने कां विचार उसने नहि किया थां। कुछ हि रूपए तोँ कमाता थां औऱ उसमें भि हर महीने बिलजमा करना;ये तौ चादर सें अधिकपैर पसारने वालीबात थि।
गाँव केँ सन्नाटे मे नं मात्र आज कां दिनदफन होँ गय़ा थां बल्कि परी केँ जन्म लेने कि खुशी भि। ग्रामीण रिवाजों कि तरह एक् दीयाघऱ केँ मुख्य दरवाजे पऱ जला दिया गय़ा थां औऱ एक् आंगन मे लगे तुलसी केँ पौधे केँ पास। इस सन्नाटे सें प्रतीत हौ रहा थां कि घऱ कां हर एक् सदस्य भोजन करकेसो गय़ा हैं। नीलिमा अब भि उसी कमरे मे उसीबैड पऱ सोई हुइ हैं औऱ परी उसके वक्ष केँ पास मे। कुछ कदमों कि आहट सें प्रतीत हौ रहा थां कि इसघऱ कां एक् सदस्य अभि भि जागरहा हैं औऱ छुपते-छुपाते घऱ केँ हि किसीजगह पर्र जारहा हैं।
स्वाँग - body-focused teasing – New Episode
राघव कि मम्मी औऱ पिता जी तौ गहरे नींद मे सोएहुए थें औऱ नीलिमा भि अपने कमरे मे। राघव कों अपनी पुत्री कों देखने कि उत्सुकता हि थां जौ शायदउसे सोने नहि देरहा थां। वो पलंग पर्र सें उठा। उसकी बड़ी पुत्री जोँ उसकेसंग हि मे सोरही थि कि मासूम शक्ल कों कुछदेर तक देखता हि रहा औऱ सोचता रहा कि मैंने इसेकिस बात कि सजादे दिया हैं? कितनी बेचैन थि वोँ अपनी मम्मी औऱ छोटी बेहन कों देखने केँ लिए। मगर किसी नें भि उसे नीलिमा केँ पास जाने नहि दिया थां। बड़ी हि सावधानी सें वो पलंग पर्र सें उठा ताकि सुलेखा कि आँख नं खुलजाय। बहोत जतन करने पऱ तौ वो कुछदेर पहले हि सोई हैं औऱ अगरजाग गई तौ फिन नीलिमा केँ पास जाने कि जिद्द करने लगेगी। ये पुष्टि करने केँ लिए कि उसके माता औऱ पिता सोरहे हैं याँ नहि राघव उनके कमरे केँ पास गय़ा औऱ खिड़की सें झांककर देखा। उसके पिता जी कि खर्राटें स्पष्ट कररही थि कि वे गहरी नींद मे सोरहे हें।
रात केँ अंधियारे मे कहीं वोँ किसी वस्तु सें नं टकराजाय; बड़ी हि सावधानी सें वो उस कमरे केँ पास गय़ा जहाँ नीलिमा सोरही थि। कमरे केँ दरवाजे पर्र खड़ा हौ कर अन्दर जाने कि हिम्मत जुटाने लगामगर उसकी मां केँ द्वारा दिएगए वोँ वचन उसके हिम्मत कों तोड़रहा थां। भावुक होँ कर आंसू उसके आँखों सें झलक पड़ा औऱ बिना किसी बंधन केँ ये किसीनदी केँ धार कि तरह मुहाने कि दिशा मे बहनेलगा। एक् संघर्ष चलरहा थां उसके भीतर औऱ अंततः उसने अपनीदिल कि बात सुनी। एक् बेटी केँ जन्म केँ प्रति सामाजिक सोच औऱ अपनी मम्मी केँ दिएगए वचन कों अनदेखा करके उसनेवही करने कां फैसला किया जिसने उसेयहा तक खींच लाया थां। उसने नीलिमा कों देखा। प्रतीत हुआ कि वोँ गहरी नींद मे सोरही हैं। राघवआगे बढ़ा औऱ नीलिमा केँ पास गय़ा। अपनी छोटी पुत्री कों देखा जौ उसकेआने कि आहट सुनकर जाग गई थि औऱ खिलखिला रही थि। कुछ सेकेंड तक लगातार मौन खड़ा रहने केँ उपरांत उसने बड़ी हि सावधानी सें परी कों गोद मे उठाया औऱ चांदनी सि चमकती उसकी नूरानी चेहरे कों देखा। उसकी होंठों पर्र सजी बेहद हि सुंदर मुस्कान नें उसके हृदय मे उमड़रहे सारे संशय कों ख़त्म कर दिया। औऱ उसके होंठों पर्र भि मुस्कान कि एक् लहर दौड़ पड़ी। राघव कि आँखों सें आंसू बहते हि जारहे थें मगर इसकाउसे जरा सां भि आभास नहि थां।
"क्षमा करना मेरी बेटी। मेरी नन्ही परी। यह मत समझना कि तेरेआने सें तेरायह बाप नाराज हैं; मगर देखो न् तेरायह बाप कितना बदनसीब हैं कि तेरी स्वागत मे मुस्कुरा भि नहि सका। मगर अब मे जीभरकर मुस्कुराऊंगा। मेरी आँखों मे आंसूदेख करयेमत समझ लेना कि तेरेआने सें मै उदास हूं। ये आंसू तौ मेरे आँखों मे इसलिये हैं कि मै कितना बदनसीब हूं। मगर क्याँ करतामै? मजबूर हूं। जकड़ा हुआ हूं सामाजिक रीतियों सें। जहाँवंश बेटियां नहि बेटे बढ़ाते हें। मेरी हसीनपरी हौ तुम् औऱ मैंने तौ सोच लिया हैं कि मे तोँ तुम्हें परीकह कर हि बुलाऊंगा। परी। "
राघव नें अपनी छोटी पुत्री कां नामाकारण कर दिया। उसके आँखों सें बहते आंसू सें तौ ये स्पष्ट हि नहि हौ रहा थां कि ये खुशी केँ हैं याँ स्वयं पर्र अफ़सोस करने केँ लिए। परी। बहोत हि सुंदर नाम रक्खा थां उसने अपनी छोटी पुत्री कि औऱ थि भि वो बिल्कुल परी केँ जैसी। कुछ देर तक वो गीली आँखों सें उसकी चमकीली आँखों कों देखता रहा औऱ फिनउसे वापस सें नीलिमा केँ पास सुला दिया। औऱ चला गय़ा। उसके जाने केँ बाद नीलिमा नें आँखे खोली। वो सोई हुईँ तौ थि मगर नींद सें नहि औऱ राघव केँ आगमन कि आहट सुनकर हि वोँ भि जाग गई थि मगर आँखेबंद किए बिना गतिविधि किए लेटीरही। औऱ जब वो कमरे सें बाहर् चला गय़ा तौ उसने अपनी आँखें खोली। औऱ स्नेह सें परी केँ सिर पऱ हाथ फेरते हुए बोलि, ' परी, बहोत हि अच्छा नाम रक्खा हैं तेरी, तेरी पिताजी नें। "
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