स्वाँग - body-focused teasing – New Episode
सबसे कठिन कार्य होता हैं इंसान केँ विचार कों सझना। किस वक्त वो क्याँ सोचरहा हैं औऱ किसी केँ प्रति उसका क्याँ विचार हैं, येजान पाना। मास्टर जी कां भि हालकुछ ऐसा हि थां। सुलेखा अभि जिस उम्र सें गुजररही थि औऱ अब वो बच्ची नहींरही थि।
उसकाबाल अवस्था करीब-करीब ख़त्म हौ गय़ा थां औऱ अब वो जबान होँ रही थि। इसका एहसास मास्टर जी कों तबहुआ थां जब राघव नें उनसे सुलेखा कि विवाह कि बातकही थि। तब सें उनके आँखों पऱ धीरे धीरे वासना कां परत चढ़ने लगा थां। सुलेखा जोँ बैड पर्र बैठकर पुस्तक केँ पन्नों कों उलट-पलट करदेख रही थि, मास्टर जी लगातार उसे हि देखेजा रहे थें। जैसे कि आज सें पहले उन्होने उसे देखा हि नहीं थां।
उसकी मासूम चेहरे पऱ भय औऱ उसकेहाथ भि काँपरहे थें। मास्टर जी नें बहोत प्रयास किया थां कि सुलेखा उनसे डरने केँ बजाय उनसे अपनीयार कि तरहबात करे। उन्हे अपनेहवस कि अग्नि कों ठंडा जोँ करना थां। हरदिन उनकेजहन मे यही विचार चलता रहता कि अपनीइस वासना कि भूख कों मिटाने केँ लिए क्याँ करे। उनकीसोच दिनों-दिन गंदी होतीचली जारही थि औऱ आज उन्होने अपनेलिए एक् अवसरबना हि लिया।
“क्याँ हुआ सुलेखा? मात्र पन्ने हि पलटोगी याँ कुछ पढ़ोगी भि?” उनके होंठों पर्र वासना सें लथपथ मुस्कान लिपटी थि, जोँ सुलेखा केँ भय पऱ विजय पाने मे असमर्थ साबित हौ रही थि।
अगलेकुछ मिनटों तक वातावरण बिलकुल शांतरहा।
सुलेखा किताब मे लिखे प्रश्नों कों हल करने केँ प्रयास मे थि मगरआज उसका हृदयकुछ अधिक हि विचलित हौ रहा थां। वो अपनेभय पऱ नियंत्रण पाकर पढ़ाई पर्र ध्यान केन्द्रित नहि करपारही थि। शायदउसे मास्टर जी केँ हृदय मे उमड़रहे अश्लील विचारों कां आभास होँ गय़ा थां। मास्टर जी नें अपने कार्य कों अंजाम देने कि सोची।
उन्होने उसे अपनेपास बुलाया औऱ उसकी कॉपी उसकेहाथ सें लें ली। एक् नजरउन प्रश्नों पर्र डाली औऱ हँसते हुए बोले कि यहसभी तौ बिलकुल हि आसान हैं। औऱ उसके कंधे पर्र हाथरख दिया।
सुलेखा कां हृदयभय केँ मारे अत्यंत तीव्र वेग सें धड़कने लगा। उसकेलगा कि अब मास्टर जीउसे पिटेंगे। इसलिये उसने आँखें बंदकर ली। मगर मास्टर जी पीटने केँ बजाय उसके कंधे कों सहलाने लगे। औऱ जैसे हि उसे इसका आभासहुआ वो दोकदम पीछेहट गयीँ,। अब मास्टर जी कां वास्तविक चेहरा उसके सामने स्पष्ट थां औऱ वोँ समझ गई, थि कि मास्टर जी क्याँ चाहते हें। मगर वो अकेली थि। छोटी थि। कमजोर थि। चाहकर भि कुछ नहींकर सकती थि।
“देखो, डरो मत। क्यूं डररही हौ मुझसे। हाँ? देखो न् तुम् कितनी बड़ी हौ गायी होँ। बहादुर बनो सुलेखा। बहादुर। “ बोलते हुए मास्टर जी नें एक् नजरउसे सर सें पाँव तक देखा।
उसकी जवानी उसके सौन्दर्य कों निखार रही थि। सफ़ेद रंग औऱ लंबेकेश। औऱ भय केँ बादल केँ पीछे छुपाहुआ बहोत हि मासूम चेहरा।
“इतनी सि थि तुम् औऱ मैंने तुम्हें अपनीगोद मे खेलाया थां। औऱ देखते-देखते तुम् कब बड़ी हौ गयीँ,, पता हि नहींचला। सुलेखा, सच मे तुम् अब बड़ी हौ गयीँ, होँ। “
मास्टर जी केँ बातों कां उसकेपास कोई जबाब नहीं थां। मगर उसका हृदय बगावत करने कों कहरहा थां। अपनी दुर्बलता कां त्याग कर नायक कि तरह बहदुरी सें इस परिस्थिति कां सामना करने कों कहरहा थां। फिल्मों मे उसनेऐसी कई परिस्थियों कां दृश्य देखा थां, एक् केँ बाद एक् उसके सामने आनेलगा थां। एक् नायक केसे अकेले हि विजय होने तक लड़ता हैं। एक् नायिका जौ कभीहार नहीं मानती। वो अपनीइस स्टोरी कि नायक औऱ नायिका दोनों हि थि औऱ उनके सामने खलनायक केँ रूप मे मास्टर जी बैठे थें।
वो उन्ही फिल्मों मे दिखाई जाने वालीउन स्त्रियों कि तरहइस परिस्थिति कां सामना करना चाहती थि मगर उसकाभय उसे औऱ भि दुर्बल बनाते जारहा थां।
“सुंदर बहोत होँ तुम् सुलेखा। मगर तुम्हारे चेहरे पर्र यहडर बिलकुल भि अच्छा नहीं लगता। एक् बात जानती होँ सुलेखा? जब तुम् अपने सहेलियों केँ संग होती औऱ जोँ खूब हँसती हौ, तोँ तुम् औऱ भि अधिक सुंदर लगती होँ। देखो सुलेखा, अब तुम् मुझसे डरोगी तोँ केसेकाम चलेगा? मे कोई राक्षस थोड़ी न् हूं औऱ नं हि मेरेसिर पऱ दो बड़े सींग हैं। “
अपनी हि बात पर्र उनकी हंसीछुट पड़ीमगर सुलेखा पऱ इसकाकोई प्रभाव नहीं पड़ा।
“मे तोँ तुम्हारा यार बनना चाहता हूं सुलेखा औऱ तुम् मुझसे डरती हौ। यह अच्छी बात नहि हैं। बताओ सुलेखा। मेरीयार बनोगी?”
सुलेखा नें हाँ मे सिर हिलाया क्योंकि इसके अलावा उसकेपास कोई औऱ विकल्प भि तौ नहीं थां।
“चलोयह हुई न् बात। “ जैसे कि उन्हे कोई बड़ा खजाना मिल गय़ा होँ, वोँ इतनेखुश हुए। “चलो अबइसनए दोस्ती कि खुशी मे थोडा सां मुस्कुरा भि दो। “
सुलेखा नें मुस्कुराने कां नाटक किया। कोशिश करने केँ बाद भि मुस्कुराहट उसके चेहरे पऱ नहींआयी।
“हाथ नहीं मिलाओगी मुझसे, साथी? मैंने सुना हैं कि जबनई दोस्ती होती हैं तोँ एक् दूसरे केँ संग मिलाया जाता हैं?” उन्होने सुलेखा कि ओरहाथ बढ़ते हुएकहा।
सुलेखा नें डरतेहुए उनसेसंग भि मिलाली। उसकेपास औऱ कोई विकल्प भि तोँ नहीं थां।
“अच्छा। अबजब हम् दोनों साथी हें तौ एक् सीक्रेट बताऊँ तुम्हें? मगर वादाकरो कि तुम् मेरायह सीक्रेट किसी कों नहि बताओगी। “
सुलेखा नें मात्र सिर हिलाया।
मास्टर जी कों लगा कि सुलेखा उसके झांसे मे आँ रही हैं औऱ जल्द वोँ अपने मकसद मे कामयाब हौ जाएंगे। उनसे सुलेखा कां हाथ पकड़ समीप खींच लिया औऱ जल्दी हि उसकेकमर कों कसकर पकड़ लिया। वो अपने आपको उनके चंगुल सें छुड़ाने कां प्रयास कररही थि मगर उसकी उँगलियों मे उतनाबल नहीं थां।
“क्याँ हुआ सुलेखा? कुछ नहीं करूंगा मे तुम्हें। सीक्रेट हैं नाँ? इसलिये कान मे बतारहा हूं ताकिकोई औऱ न् सुन लेँ। “ मास्टर जी अपने होंठ कों उसकेकान केँ समीप लेँ गए। उसके बालों कि खुशबू कों लंबी सांस लेकर सूंघा। उनकामन तौ उसके कोमल गालों कों चूम लेने कों कररहा थां मगर उन्होने ऐसा नहीं किया।
“यह बात मे केवल तुम्हें हि बतारहा हूं कि मुझे नां लड़कियों केँ बूब्ज़ बहोत मनपसंद हैं। उभरेहुए मम्मों। बड़े सें। औऱ तुमहे?”
आखिर वोँ अश्लीलता पऱ उतर हि आए। इससे पहले कि वो कुछ औऱ कहते याँ करते सुलेखा नें अपना पूरा ज़ोर लगाया औऱ स्वयं कों वासना केँ उस बेड़ियों कि कैद सें बाहर् निकलने कां पहला प्रयास किया जोँ मास्टर नें उसके शरीर सें लपेट दिया थां। वो कुछकदम पीछेआई। मगरभय नें इसबार फिन सें उसे प्रहाश्त कर दिया। काश इससमय परी उसकेसंग होती तोँ वो जरा सां भि नहीं डरती। औऱ नाँ हारती। नाँ जानेयह हवसी मास्टर उसकेसंग क्याँ करेगा अब?परी होती तोँ वो उसेइस समस्या सें जरूर निकाल लेती।
“शर्माओ मत सुलेखा। मे भि किसी कों कुछ नहीं बताऊंगा। मुझे तुमने अपना मित्र बनाया हैं नां? अपने साथी केँ गले नहि लगोगी? कविता औऱ पुजा कि तरह?अगर वोँ ये पुछती तोँ तुम् उसे बताती नाँ?”
“वोँ दोनों नहीं पुछती यहसभी। “
“तौ क्याँ हुआ? हम् तोँ तुम्हारे खास मित्र हें नां? आओगले लगो अपनेइस नए साथी केँ। “
सुलेखा पूरीतरह सें काँपने लगी थि। ऐसालग रहा थां कि भय नें उसकेबदन कों बिलकुलही दुर्बल कर दिया हैं। अब वो बस एक् निष्प्राण मूर्ति कि भांति थि जिसमें बस थोडा सां हि प्राण शेष थां।
“उसदिन एक् हवसी मास्टर केँ वासना कि भूख सें मेरी बेहनबच गई,। शायद उसकी भाग्य अच्छी थि। मास्टर नें उसकेसंग जबर्दस्ती नहीं किया क्योंकि उसे यकीन थां कि अब वो अपने मसूबों मे कामयाब होँ हि जाएगा। उसरात वो बिलकुल खामोश थि औऱ भय उसकी आँखों मे मुझे बिलकुल साफ दिखाई पड़रहा थां। भले हि मे उससे छोटी थि मगर अपने बेहन केँ हृदय कों पढ़ सकती थि। उसकेजहन मे मास्टर कां वो दृश्य पत्थर कि लकीर कि तरह अंकित होँ गय़ा थां, अगरइसे जल्द नहीं मिटाया जाता तोँ वो पागल हौ जाती। “परी जज साहब कि ओर देखते हुए बोलीं।
अचानक सें आए स्टोरी मे ट्विस्ट नें सबको विवशकर दियाआगे कि कथा बिलकुल ध्यान सें सुनने कों।
“तौ फिन तुमने क्याँ किया?”जज साहब नें उससे पूछा।
“उस रात मुझे मेरी बेहन सुलेखा नहींमिल रही थि। मेरी बेहन जोँ अपना पूरा दिनचर्या मेरेसंग शेयर करती, मुझे हँसाने केँ लिए बनाबटी कहानियाँ सुनाती, उसदिन बिलकुल हि खामोश थि। बनाबटी किस्सों कि नायिका, मेरी बहादुर बेहनउस रात कमरे केँ एक् कोने मे दुबकी हुइ थि। मानों काल्पनिक कहानियों वाला राक्षस वास्तविक दुनियाँ मे आँ गय़ा हौ औऱ उसके पीछे पड़ा हौ। “ कटघरे मे खड़ी वोँ कुरूप लड़की अपने वस्त्रों कों व्यवस्थित करतेहुए बोलीं।
“फिन क्याँ हुआ?”
“कुछ खास नहि। “ उसकथा केँ अंजाम कों स्मरण करतेहुए वो मुस्कुरायी औऱ फिन बोलि। “मास्टर कि कथा कां अंत”
“मुझे बिलकुल ठीक नहींलग रहा थां क्योंकि मेरी बड़ी बेहन नं जाने क्यूं ऐसी खामोश औऱ डरी हुईँ थि। किसी नें तंग तौ नहि किया तुम्हें? – मे उससे पुछना चाहती थि औऱ उसकानाम भि। क्योंकि मैंने उसेसजा देने कि ठानली थि। दिदी नें डरतेहुए बताया उस हवसी मास्टर कि सारी हरकतें जोँ उसने उसकेसंग किया थां। बोलीं उस टाइमउसे क्रोध आँ रहा थां औऱ अपनी स्टोरी कि नायक बनकरउसे सजा भि देना चाहती थि। उसकामन कररहा थां कि ईंट मारकर उसकासर फोड़दे जोँ उससेऐसी अश्लील बाते औऱ हरकतें कररहा हैं। वोँ अबवहा पर्र पढ़ने कभी नहीं जाएगी मगरफिन बाबा कों यहबात केसे बताएगी? मास्टर उसे विद्यालय मे भि तंग करेगा इसलिये वो विद्यालय नहीं जानां चाहती। “
“तौ क्याँ हुआ दिदी? उसकासिर हि फोड़ना हैं न्? चलोअब फोड़ देते हें। “ मे बोलि। मे अपनी बेहन कों उसकी किस्सा कि नायिका केँ रूप मे देख्ना चाहती थि जोँ अपनेलिए स्वयं संघर्ष करे, गुनहगारों कों सजादे। मगर इसकेलिए मुझे उसका ताकत बनना थां।
“मगर केसे?” दिदी पुछी।
“चलो। “ मे मुस्कुरायी।
लगभगरात केँ एक् बजे होंगे। पूरा गाँव गहरी नींद मे सो गय़ा थां तब हम् दोनों बहनेउस मास्टर कों सजा देने निकले। गर्मी केँ मौसम होने कि वजह सें लोग ज़्यादातर याँ तौ घऱ केँ छत पर्र सोयेहुए थें याँ तोँ बाहर् गलियारों मे। अगर किसी कि भि नजर हम् पर्र पड़ जाती तोँ सारा प्लान चौपट होँ जाता। इसलिये हम् दोनों बिलकुल हि चौकन्ने थें। इतनी गर्मी मे चादरओढ़ कर निकलना थोडा अजीब थां मगरउस वक़्त मुझेवही सहीलगा। हम् दोनों मास्टर केँ घऱ केँ बाहर् पहुँचे। बिजली चली गई थि औऱ मास्टर अपने कमरे मे गर्मी सें बेहाल होकरसो रहा थां। हमने ज़ोर सें दरवाजा खटखटाया औऱ छिपगए। मैंने एक् मोटा डांडा लें लिया थां जिसके एक् हि प्रहार सें मास्टर कि हड्डियाँ टूटने वाली थि।
“आधीरात कों कौन होँ सकता हैं? कौन हैं?” आधी नींद मे मास्टर चिल्लाया। पलंग पऱ सें उठा औऱ बड़बड़ाते हुए दरवाजा खोला। मगर दरवाजे पर्र उसेकोई नहीं दिखा।
जैसे हि मास्टर दुबारा बैड पर्र सोने केँ लिए लेटा मैंने फिन सें दरवाजा खटखटाया। मास्टर फिन सें चिल्लाते हुएआया औऱ दरवाजा खोला। जब उसेफिन सें दरवाजे पऱ कोई नहीं दिखातब वो फिन सें बड़बड़ाते हुए अंदर गय़ा। अंदर जाकर वो लेटने हि वाला थां कि फिन सें मैंने दरवाजा खटखटाया। बार-बार उसेइसी तरह सें हमने उसकी नींद खराबकर दि। तंग आकार वो दरवाजे केँ बीच मे बैठ गय़ा औऱ वैसे हि सो गय़ा। मैंने दिदी कों कहा कि ईंटउठा लें औऱ मौका अच्छा हैं मास्टर कों मज़ाचखा दे।
दिदी नें ईंट उठाया औऱ उसकेऊपर फेंक दिया। ईंट मास्टर केँ सर सें लगा औऱ वो ज़ोर सें चिल्लाया। इससे पहले कि वो कुछसमझ पाता मैंने चादर सें उसेढक दिया औऱ डंडे बरसने शुरुआत कर दिया। अफसोस अभि तक उसकासर नहीं फूटा थां। उसकीपीठ औऱ बाजुओं कि हड्डियाँ तौ टूट गई, थि यहबात अलग हैं, मगर अश्लील विचार कों जन्म देने वाले उसकेसिर कों मुझे फूटते हुए देख्ना थां, वोँ भि दिदी केँ हाथों।
“क्याँ दिदी केसे मारती होँ? इसकासर तोँ फूटा हि नहीं। एक् औऱ बार कोशिश करो। औऱ डरोमत कुछ नहीं होगा। यह हमारा औऱ मास्टर जी कां सीक्रेट हैं। मास्टर जी भि इसे सीक्रेट हि रखेगे। “ बोलते हुए मैंने उसकेऊपर सें चादरहटा दिया औऱ उसके सामने आकार खड़ी होँ गयीँ,। इतनी पिटाई केँ बाद वो मात्र दर्द सें चीख सकता थां, उठकर हमें पीटने याँ हमारे पीछे भागने कि हिम्मत नहींबची थि उसमें।
“क्योचीख रहे होँ मास्टर जी?आधी रात हैं। लोगजग जाएंगे। फिन उन्हे आपका सीक्रेट पाताचल जाएगा। हमें तौ बस आपकासर फोड़ना हैं। प्रेम सें आपकासिर फोड़ेंगे फिनचले जाएंगे। गाँव वालेपता नहीं आपकेसंग क्याँ-क्याँ करेंगे। बुलाऊँ उन्हे?” मे मास्टर कों आँखे दिखाते हुए बोलीं।
“ये तुमने ठीक नहीं किया। “ वो अपनी आबाज धीमी करतेहुए चिल्लाया।
“दिदी, जल्दकरो नां। मुझे नींद आँ रही हैं। सुभह जल्द जागना हैं। विद्यालय दौड़ना हैं। देर होगी तौ मास्टर जी पिटेंगे। तुम्हें भि पिटेंगे। जल्द सें फोड़ो सर कां सिर औऱ चलो। “ मास्टर कि बातों कों इगनोर करतेहुए, अपनी बेहन कि हिम्मत बढाते हुए मैंने कहा। मे देख सकती थि कि अब उसके हृदय मे भय बिलकुल भि नहीं थां। औऱ आज वो अपने अपराधी कों दंडित करने केँ लिए निर्भय होकर खड़ी थि। बिलकुल नायिका कि तरह।
मेरी आँखों मे जीत औऱ होंठों पर्र विजयभरी हंसी देखकर दिदी कां भय बिलकुलही समाप्त हौ गय़ा। जिस मास्टर केँ सामने जाने कि सोच सें हि वो थर-थर काँपने लगती थि, जिसने उसकेसंग अश्लीलता कां बर्ताव किया थां, आज उसके सामने अपराधी बनकर खड़ा थां। दिदी नें फिन सें ईंट उठायी औऱ मास्टर कि ओर बढ़ी।
“इस बार इनकासिर फूटना चाहिए। नहीं तौ मे तुमसे बात नहीं करूंगी। “
दिदी मास्टर कि ओर उसकासर फोड़ने बढ़ी। मास्टर कों सामने सें यमराज कां आगमन दिखाई पडरहा थां। वो सुलेखा कों समझाने कां प्रयास कररहा थां। वो मुझे भि बहलाने कां प्रयास कररहा थां। कहरहा थां कि हम् ऐसा नहींकरे। उसकासिर नहीं फोड़ें। वोँ हमें मिठाइयाँ देगा। चॉकलेट देगा। औऱ भि बहोत कुछ। मगर दिदी कों तोँ बस उसकासिर हि फोड़ना थां। मास्टर कां सारा प्रयास व्यर्थ गय़ा। न् हम् बदलें न् वो अपनेसिर कों फूटने सें बचा पाया। दिदी उसके नजदीक गई, औऱ पूरी ताकत लगाकर दे मारी उसकेसर पर्र। वो दर्दसह नहींसका औऱ ज़ोर सें चिल्लाया। उसके चिल्लाने कि आवाज़ सुनकर दिदी मुस्कुरायी औऱ उसे मुसकुराता देखकर मै भि।
गाँववाले चीखने कि आबाज सुनकर जागगए थें औऱ इधर हि आँ रहे थें।
“चलो दिदी। “ दिदी नें ईंट वहीं फेंका। मैंने चादर लिया औऱ हम् दोनों वहा सें भागे। अपने कमरे मे जाकरसो गए।
“क्याँ मैंने गलत किया थां? क्याँ उस मास्टर कां सिर फोड़ना गलत थां याँ उस मास्टर कां वोँ अश्लील हरकतसही थां?” परी नें जज साहब कों सवालभरी निगाहों सें देखा।
वो निशब्द थें। क्योंकि अभि इतनी जल्द वो इसका फैसला नहीं करना चाहते थें। परी कि किस्सा अजीब थि क्योंकि जज साहब नें उससे उसकीकथा कहने कों कहा थां मगर उसकीइस स्टोरी कां संबंध तौ इस मामले सें बिल्कुल हि नहीं थां।
स्वाँग - body-focused teasing – New Episode
अध्याय पाँच
एक् लंबी खामोशी केँ बादजब जज साहब नें कुछ नहींकहा परीआगे कि कथा सुनाने लगी।
उस घटना केँ बाद मेरी बेहन सुलेखा कों विद्यालय सें आजादी मिल गई। पापा नें उसकेलिए लड़का ढूंढना आरंभकर दिया औऱ कुछ हि महीनों केँ बाद उसकी विवाह तयकर दि गई। वो बहोत खुश थि। क्योंकि कुछ हि महीनों केँ बादउसे उसका जीवनसाथी जोँ मिलने वाला थां। हालाँकि विवाह मे अभि वक्त थां मगर इसकी तैयारी कई महीने पहले सें हि शुरुआत कर दिया गय़ा थां।
सुलेखा कि विवाह तय होँ जाने केँ बाद राघव पहले सें अधिक हि व्यस्त होँ गय़ा थां। पहले सें अधिक वक्त तक मजदूरी करता ताकिकुछ पैसा ज़्यादा कमाए। नं ठीक सें सो पाता न् हि उसे सुकून हि मिलती। हर घड़ीबस एक् हि बात कि फिक्र उसे सताते रहती कि सुलेखा केँ शादी मे कोईकमी नं रहजाए।
क्योंकि सुलेखा कों पता थां कि विवाह केँ बादउसे मां बाप सें दूर जानां होगा। सबसे बड़ीबात अपनी प्यारी बेहनपरी सें दूर जानां होगा इसलिये इनबचे वक़्त मे वो जितना ज़्यादा होँ सकेसब केँ संग गुजारना चाहती थि। दादीमा कि कड़वी बोलीं मे भि स्नेह ढूंढ लेती औऱ उनके गुस्से मे प्रेम।
टाइमरेत कि तरह जैसे किसी पात्र सें देखते हि देखते फिसल गय़ा। टाइम आँ गय़ा जब विवाह सें पहले कि विधियों कां आरम्भ हुआ। उधर उसकी सहेली कविता कों भि एक् लड़के सें प्रेम होँ गय़ा थां। पास हि केँ गाँव कां एक् लड़का जोँ उसकेसंग हि मे विद्यालय मे पढ़ता थां। प्यारी बातें करकेउसे हंसाता, अमिताभ बच्चन कि नकल करता औऱ उनके फिल्मों केँ गानों कों बेसुरे अंदाज मे गाता। सुलेखा तोँ विद्यालय नहि जाती थि मगर कविता जबउस लड़के सें मिलने जाया करती तोँ वो उसकेसंग जाती।
विवाह कां दिन आँ गय़ा थां। राघव कि बेचैनी असमान पऱ थि। अपनीओर सें वो कोई भि कसर नहि छोड़ना चाहता थां। कोईऐसी बात जोँ बारातियों कों अच्छी न् लगे याँ किसी कों किसीतरह कि असुविधा नं हौ।
आज सुभह भागते हुए कविता सुलेखा केँ पासआई थि। क्योंकि आज वो फिन सें उस लड़के सें मिलने जारही थि औऱ उसकेपास कोईखास कपड़े भि नहि थें। सुलेखा कों बहोत सारेनए कपड़े मिले थें इसलिये कविता नें उसका एक् ड्रेस बसदो घंटों केँ लिए उधार माँगी।
सुलेखा उसेरोक लेना चाहती तोँ थि मगर उसकी बेचैनी बहोत अच्छे सें समझती थि। औऱ बसदो हि घंटों कि हि तौ बात थि, फिन उसकी सहेली विदाई तक उसकेसंग हि मे रहने वाली थि। मगर विवाह केँ इसदिन कों, जबकुछ घंटों केँ बाद जिंदगी कां एक् नया अध्याय शुरुआत होने कों थां, वो अपनी सहेली केँ संग बातें करना चाहती थि। मगर उसपर तौ प्यार कां बुखार जौ चढ़ा थां। समझाने सें थोड़ी समझती औऱ नं रोकने सें रुकती। उसे मिलेरंग बिरंगे कपड़ों मे सें एक् सुंदर ड्रेस कां चयन सुलेखा नें कविता केँ लिए किया। हालाँकि दुल्हन सुलेखा बनने वाली थि मगर सजाई कविता जारही थि।
कविता खूबसजी औऱ सुलेखा कों ये बोलकर चली गय़ा कि बस एक् घंटे मे चली आएगी। घऱ मे व्यस्तता बढ़ने लगी। गाँव कि औरतें आंगन मे बैठगीत गारही थि। सुलेखा कों सजाया जारहा थां। परी तोँ संग हि मे थि मगरकुछ मिनट केँ अंतराल मे किसी नं किसीवजह सें उसेकोई नं कोई बुला लेता।
एक् घंटा तोँ कब कां खत्म होँ गय़ा थां मगर कविता लौटकर नहि आई थि अब तक। कोईहंस रहा थां, कोई हँसारहा थां। घऱ मे विवाह कां माहौल जौ थां। गीत औऱ म्यूज़िक नं मात्र घऱ मे गूंजरही थि बल्कि सुलेखा कि विवाह कि रौनक पूरे गाँव मे थि। ऐसे मे बेचैन सुलेखा कि नजरें उस कमरे केँ दरवाजे पऱ हि टिकी थि जिससे कविता आने वाली थि। ये दुल्हन कां जोड़ा औऱ यह गहनें जिसे वो हमेशा सें पहनना चाहती थि, आज उसकीइस बेचैनी कों दूर करने मे नाकाम साबित हौ रही थि।
"कब आएगीयह लड़की? एक् घंटाबोल कर गई थि, दोपहर ख़त्म होने कों हैं अभि तक नहि आई। पहले तौ खूबकहा करती थि कि विवाह कां दिनआने दो। मे यह करूंगी। मे वोँ करूंगी। मगरआज? आनेदो उसे। " सुलेखा मन हि मन कविता कों डांटरही थि। तभी किसी केँ आगमन कां आभासहुआ उसे। झट सें वो दरवाजे कि ओर मुड़ी तौ देखी कि नीलिमा खड़ी हैं। आँखों मे आंसुओं कि गंगा हैं, वो रो भि रही हैं औऱ मुस्कुरा भि रही हैं।
अपने मम्मी कों ऐसेदेख कर उसकादिल भारी होँ गय़ा। उसेलगा कि रो पड़ूं मगरअगर ऐसा वोँ करती तौ उसकी मां कां क्याँ हाल होता जिसके आँखों मे पहले सें हि आंसू थें! मगर वोँ पत्थर तोँ नहि थि जिसमे भावनाएं नहि होती। तोँ वो केसे नं रोती?
नीलिमा जब अंदरआई तब वो उठकर उसके सीने सें लिपट गई थि।
इतने मे परी भि आँ गई थि। भावुक होकर वो भि दोनो सें लिपट गई।
बच्चे गली मे हंगामा मचारहे थें। ठोल केँ धुन केँ संगकोई कमर हिलारहे थें तोँ कोई फिल्मी अदाकारों कि तरह अभिनय करने केँ प्रयास मे उछलकूद रहा थां। पकवान कि खुशबू हवाओं मे घुलरही थि औऱ संग मे साम भि ढलरही थि। मगर कविता कां अभि तक कोईपता नहि थां। न् वोँ लौटकर घऱआई थि। सुलेखा तब सें तीनबार कविता कों ढूंढने उसकेघऱ गई थि मगर वोँ कहां गई किसी कों नहि मालूम थां। उसकी मां आंगन मे उन औरतों केँ संगबैठ गीतगाए जारही थि। भइया औऱ पिता राघव केँ संग अन्य कामों मे व्यस्त थें।
सुलेखा कां दिल घबरारहा थां। करीबआठ घंटों सें कविता गायब थि। उसेजब लगा कि इस बारे मे परी सें बात करना चाहिए तब तक बारात आँ गई थि।
ठोल औऱ झाल केँ धुन मे भि बाराती झूमकर नाचेजा रहे थें। पठाकों कि हंगामा नें उनके आगमन कां संदेशा दिया थां। फिन राघव नें उनका स्वागत किया। विवाह कि सारी विधियां अच्छे सें हौ गई। मंडप पर्र बैठी सुलेखा अवसर पाकर चारों ओर नजरें दौड़ाती मगरजब कविता कों नहि देखती तोँ उदास हौ जाती।
विवाह कि सारी विधियां खत्म होँ गय़ा। अब सुलेखा पराई होँ गई थि। विदाई केँ वक़्त रोना तौ अनिवार्य थां। विदाई केँ बादजब वो चली गई घऱ सन्नाटे सें भर गय़ा।
सबकुछ अच्छे सें हौ जाने कि संतुष्टि थि। राघव कों खुशी थि कि सुलेखा ससुराल चली गई मगरदिल खाली भि हौ गय़ा थां क्योंकि इसमें रहने वाली उसकी प्यारी सि गुड़िया कों कोई अपनेदेश लेँ गय़ा थां।
परी एक् कोने मे खामोश बैठी थि। उसेयह सन्नाटा बिल्कुल भि मनपसंद नहि आँ रहा थां। सुलेखा केँ संग बिताए हुए वोँ लम्हा कानों मे गूंजरहा थां। मगर वो विवश थि। यही नियम, धर्म औऱ प्रथा थां। जिसतरह सें आज सुलेखा पराई हुईँ एक् दिनउसे भि इस आंगन सें दूर जानां थां। फिनयह मोह केँ मजबूत धागेटूट जानां थां। नए लोगो केँ संगनए रिश्ते बनेंगे। हालाँकि वो उनकेलिए भि पराई हि रहेगी मगर उसकेआगे कि पूरीबची जीवन उन्ही अजनबियों केँ संग हि तौ बिताना होगा।
कैसी बंदिश हैं यह औऱ इस बंदिश मे सुलेखा कैसी महसूस कररही होगी?आज वो एक् अनजान स्थान गई हैं। जहाँ नं उसेकोई जानता हैं औऱ नं यह किसी कों। लोगों केँ होंठों पऱ मुस्कान तौ होगीमगर खुशी झूठी होगी याँ सच्ची यहकौन जानता होगा। हां, उसघऱ कां माहौल इसघऱ सें बिल्कुल हि अलग होगा। मगर कल्पनाओं मे उस वास्तविक कों वो किसहद तक चित्रित कर सकती थि।
ऐसा लगता कि अगले सेकेंड सुलेखा भागते हुए आएगी औऱ अपने सबसे प्यारी सहेली औऱ बेहनपरी सें लिपट जायेगी।
साम होते होते बेचैनी कि सीमाचरम पऱ थि। परी बेचैन मन कों शांत करने केँ लिए खेतों कि ओर निकल पड़ी। मन विचलित हुआजा रहा थां। सुलेखा औऱ कविता एक् केँ बाद एक् नजरों केँ सामने प्रकट होतीफिन गायब होती। मृगतृष्णा सां, दोनों कां आभासी तस्वीर अचानक सें सामने आँ जाती। औऱ जब वो भावुक होकर सुलेखा कों गले लगाने भागती तौ वो सजीव चित्र रेत बनकर हवाओं मे घुल जाती। आज उसे आभास हौ रहा थां कि वो सुलेखा सें कितना प्यार करती थि। सैकड़ों लोगों कि भीड़ लेकरआया वोँ नौजवान न् मात्र सुलेखा कों लेँ गय़ा थां बल्कि उसकेसंग परी कां हृदय भि थां।
अजीबतरह केँ धुन बादलों सें बहरही थि। उदासी मानों आजहवा बन गई होँ। जोँ सब सजीव औऱ निर्जीव केँ हृदय मे प्राण कि तरहबस गय़ा होँ। फिन अचानक सें कविता उसे दिखाई पड़ी। खेत केँ किनारे वाले पेड़ केँ नीचेबैठ बसरोए जारही थि। उसे देखकर परी कां मनकुछ शांतहुआ मगर उसकेइस बर्ताव केँ लिए उसपर क्रोध भि बहोत आयाउसे। उसकीखबर लेने केँ लिए उसकेपास भागी। इससे पहले कि कविता सें कुछ पूछती कविता भि गायब हौ गई। ये भि बस उसके मस्तिष्क कां छलावा थां, वास्तविकता नहि। उसका मस्तिष्क उसकेसंग खेलरहा थां।
परीरो पड़ी। जिस बेचैनी कों शांत करने वो अकेली इधरआई थि, इन आभासी तस्वीरों नें इसेकई गुना बढ़ा दिया थां। नजर घुमाकर जब चारोओर देखी तौ अंधेरे केँ दलदल मे डूबते बादलों केँ अलावा बस बहोत सारे पंक्षियों कां हि हंगामा थां।
इसकेआगे जाने कि अब ख़्वाहिश न् थि। वो मुड़ी औऱ वापस लौटने लगीमगर ऐसालगा जैसे कि किसीने नें उसके कंधे पर्र हाथरखा हौ। अपने मस्तिष्क केँ छलावे कों वो अच्छी तरह सें जान गई थि। औऱ ये भि बस एक् छलावा हैं, वो जानती थि। बिना पीछे देखे वो दोकदम आगे बढ़ी। मगर ऐसालग रहा थां जैसे कि पेर सें भारी पत्थर बाँध दिया गय़ा हैं। कोई विवशकर रहा होँ वापस न् लौटने कों। एक् अजीब सि अनुभूति जैसेकोई संग मे खड़ा किसी विशेष जगह पर्र अपनेसंग लेँ जाने कि जिद्द कररहा होँ। कुछ क्षणों तक पत्थर कि मूर्ति कि तरह वैसे हि खड़ीरही। इन मानसिक यातनाओं कों चक्रव्यूह कि तरह भेदना असंभव सां थां। मन सें हार गई औऱ पीछे मुड़ी। इसकेआगे अक्सर वो कभी नहि जाती थि। मगरआज कोई विवशकर रहा थां इस सीमा कों पार करने कों। वो आगे बढ़ी। तेज हवाएं उस दिशा मे उसकेसंग चलनेलगी।
आगेकुछ दूर पर्र कविता कां एक् खेत थां। जब वो इसखेत केँ पास पहुँची तौ उसकेकदम सें कदम मिलाकर चलती हवाएं शांत होँ गई। वो इस पहेली कों समझ नहि पारही थि कि उसकीनजर कुत्तों केँ एक् झुंड पऱ पड़ी जौ उसे देखकर भौंकने लगे थें।
दस सें अधिक कुत्ते खेत केँ एक् विशेष हिस्से कों घेरेऐसे बैठे थें जैसे वो उसजगह कि रखवाली कररहे हों। ये आश्चर्यजनक थां। सब कुत्ते वृताकार घेरा बनाएउस विशेष जगह कों घेरे थें औऱ दो कुत्ते लगातार जमीन कों खोदेजा रहे थें।
परी कुत्तों केँ इस हरकत कों अनदेखा कर मुड़ने हि वाली थि कि उसकीनजर मिट्टी सें दबे कपड़े पऱ पड़ा। ये उसी कपड़े कां अंश थां जिसे सुलेखा नें कविता कों विवाह केँ दिन दिया थां। ये पहेली जैसी थि। पहेली सुलझ भि गई थि मगरपरी उलझने लगी। उसकी व्याकुलता शांत केसे रहती?ये कविता तोँ नहि? यह कुत्ते यहा क्यूं घात लगाए बैठे हें? ये तोँ बिलकुल उसी ड्रेस कि तरहदिख रहा हैं। मगरऐसा केसे होँ सकता हैं? नहि। मे। मेरामन खराब हौ गय़ा हैं.! यह फिजूल केँ ख्याल। हृदय मे उमड़ा भय काल्पनिक दृश्यों कां रूप लेँ मुझे सताने नजरों केँ सामने आँ रहा हैं। ऐसे सैकड़ों विचार उसकेजहन मे दौड़ने लगें।
परी मूर्ति कि भांति खड़ी वास्तविकता नकारती रही। कुत्तों नें शायद उसके चेहरे कां भावपढ़ लिया थां। उन्हें लगा होगा कि जमीन केँ नीचेदफन उस वस्तु कों परी सें कोई नुकसान नहि हैं। कुत्तों नें जमीन खोदना बंदकर दिया।
माहौल कुछ क्षण केँ लिएथम गय़ा। केवल तेज़ चलती हवाओं केँ हंगामा केँ अलावा कुछ औऱ नहि थां। परी केँ पेर पर्वत होँ गए थें। मगरआगे जानां हि थां।
मिट्टी मे दफन वो अज्ञात शक्ति उसे अपनीओर आकर्षित कररहा थां। सब कुत्ते परी कों टकटकी लगाए देखे हि जारहे थें। हवाओं कां वेग बढ़ता हि जारहा थां। आसमान पऱ काले बादल कब्जा करनेलगे थें। अभि दिन ढलने मे समय थां मगर अंधेरा दामन फ़ैलाने लगा थां।
परीउस कपड़े केँ पास पहुँची। उसकेऊपर पड़ा बड़ा सां मिट्टी कां चट्टान हटाई। चट्टान हटाते हि जोँ दृश्य नजरों केँ सामने थां उसे देखने कि हिम्मत न् थि उसकेपास। वो निर्बल हौ पीछे कि ओरगिर पड़ी। मिट्टी केँ नीचे मात्र कपड़ा नहि बल्कि एक् इंसान कां मृतशव दफ़न थां। इन कुत्तों कों इसका आभास थां।
अगलेकुछ मिनटों तक परी अचेत पड़ीरही। उसने जौ देखा अकल्पनीय थां। काले बादलों नें बारिश कां रूप लेना शुरुआत किया औऱ तेज हवाओं नें आंधी कि। जल कि दोचार बूंदों नें परी कों जगाया।
जब वोँ जागीतब बारिश तेज होँ गई थि। खुद कों हिम्मत दिला मिट्टी खोदने लगी। उसे पता थां कि कब्र केँ नीचेकौन दफन हैं मगर नजरों केँ सामने पड़ीइस वास्तविकता कों वो मिथ्या साबित करना चाहती थि। ये कविता नहि होँ सकती, खुद कों समझा दोनो हाथों सें मिट्टी खोदते जारही थि। बारिश मिट्टी कि जटिलता कों तोड़सरल बनारहा थां क्योंकि कब्र खोदने केँ लिएपरी केँ पास अभि कोई औजार नहि थां। परी कों मिट्टी खोदता देख कुत्तों नें भि मिट्टी खोदना आरंभकर दिया।
परी पूरी क्षमता सें मिट्टी हटाएजा रही थि। उसकी आँखेबंद थि फिन भि कब्र कां चित्र स्पष्ट थां। चाहते हुए भि वो इससे नजरें फेर नहि सकती थि। आँखे इसलिये बंद थि कि अगलेकुछ मिनटों केँ दौरान घटित होने वाली घटनाओं कों देखने कि हिम्मत उसमें नहि थि। अचानक सें उसकाहाथ रुक गय़ा। ये कब्र मे सोए इंसान कां चेहरा थां जोँ परी केँ हाथ कों स्पर्श किए थां। इस चेहरे सें वो भलीभांति परिचित थि। परी टटोलती रही। आँखें खोल सत्य कों मिथ्या साबित करने कां प्रयास करतीरही। येवही चेहरा थां।
अचानक सें बिजली कड़की। आवाज़ गूंजउठा। परी नें स्वयं कों हौसला बंधाया औऱ आँखें खोली। बारिश तेज हौ गई थि। परी कविता केँ शव केँ ऊपर बैठी उसके गालों कों टटोलरही थि। कड़कती बिजली कि रौशनी कविता कि धुंधली छवि कों स्पष्ट चित्रित किया।
परी तौ जैसे निष्प्राण होँ गई थि। ऐसी परिस्थिति मे उसे केसे रिएक्ट करना चाहिए थां, नहि जानती थि। वो उठी। घऱ कि दिशा मे मुड़ी औऱ अपनी पूरी रफ्तार सें भागी। भागती रही। बारिश केँ संगसंग उसके आँखों सें आंसू भि बरसता रहा। घऱ पहुँचने तक उसके पांव कहीं नहि रुके।
घऱ पर्र नीलिमा सुलेखा कि यादों मे खोई थि। दादाजी औऱ दादीमा दालान मे थें। राघव किसीकाम सें बाजार गय़ा थां। अभि तक नहि लौटा थां। परी नीलिमा केँ सामने जा खड़ी होँ गई। हांफती रही। नीलिमा उससेवजह पूछती रही। ऐसा लगरहा थां कि अब एक् शब्दबोल पाना भि कठिन हैं। कविता कां मृत चेहरा अभि सामने हैं। मां अचानक सें इतने सवालपूछ रही हैं तोँ उसे केसे बताए कि कविता कब्र मे गहरी नींदसोई हैं। बताना तौ थां हि।
नीलिमा भि कविता कि मृत्यु कि खबरसुन स्वयं कों संभाल नहि पाई। कुछ देरबाद उसने फैसला किया कविता कि मृत्यु कि खबर बताने उसकेघऱ जाने कों। कविता कि मम्मी न् जानेकिस हाल मे होगी? पिता औऱ भइयाहर ओरउसे ढूंढ उदास लौटे होंगे। जब अपनी लाडली बेटी कि मृत्यु कि खबर सुनेंगे तौ क्याँ होगा? केसेझेल सकेंगे इसबात कों कि किसी नें उनकी लड़की कि हत्या कर उनके हि खेत मे दफनकर दिया हैं।
"फिन मे औऱ मां कविता केँ घऱगए। उसकी हत्या केँ बारे मे उसके पिता औऱ भइया कों बताने। " परीजज साहब कि ओर देखते हुए बोलीं।
"तौ फिन क्याँ हुआ? अचानक सें कविता कि हत्या? उसे उसके हि खेत मे दफ़न होने कि खबरसुन तोँ उसके घरवाले टूटगए होंगे?" जज साहब नें पूछा।
"कुछ नहि। उसदिन इंसान कि शक्ल मे दानवों कों मैंने देखा। कविता कां हत्यारा कोई औऱ नहि बल्कि उसके अपने दोनों भइया औऱ पिता हि थें। "
जबपरी औऱ नीलिमा कविता केँ घऱ गई। उसके पिता केँ सामने कविता कां नामली तबवेबोल पड़े।
"वो तौ मौत कि नींदसो रही हैं। हमने हि तोँ उसे सुलाया हैं। " औऱ हंसने लगें।
"भइया अपने हि बेहन कां हत्यारा बना औऱ पिता पुत्री कां कातिल। वजह थां कमबख्त मोहब्बत। प्यार। बस मोहब्बत। " परी केँ झुलसे चेहरे पऱ उभरा मुस्कान महसूस कियाजा सकता थां।
स्वाँग - body-focused teasing – New Episode
अध्याय छह
इतना निर्दय तौ दानव भि नहि होते। इनकी तुलना नं इंसानों सें करनाठीक होता औऱ न् दानवों सें। क्योंकि इन्होंने अपनी बेहन औऱ पुत्री कि हत्या कि औऱ घऱ पर्र शांतऐसे बैठे थें जैसे कि कुछहुआ हि नं हौ। कविता जबउस लड़के सें मिलने गई थि। ये उसका दुर्भाग्य थां कि उसके पिता नें उसेदेख लिया थां।
प्यार कि क्याँ परिभाषा हौ सकती हैं? उन्होंने कविता औऱ उस लड़के केँ प्यार कां परिणाम कां आंकलन करने केँ लिएजिन तर्कों कां सहारा लिया क्याँ वो प्यार कि परिभाषा हौ सकती थि।
किसी अन्य जाति केँ लड़के केँ संग प्यार करना, इस तरह सें मिलना जुलना, अगर इनके संबंधों केँ बारे मे किसी एक् कों भि खबरलगा तौ आग कि तरहये पूरे क्षेत्र मे फैल जायेगा।
बदनामी इतनी होगी कि किसी सें नजरें मिलाने केँ काबिल न् होंगे। समाज उनका उपहास करेगा। बिना अपराध किए हि लोगहीन भावना सें देखेंगे। अभि जोँ लोगआदर औऱ सम्मान देते हैं, मुंह पऱ थूकने कों रेडी रहेंगे। भविष्य कि हल्की झांकी नें कविता केँ पिता केँ हृदय मे खौफ केँ वृक्ष बोदिए। ऐसी परिस्थिति मे क्याँ करना उचित होगा? उन्होंने खुद सें सवाल किया।
ज़्यादा विचार किए बिना हि उन्होंने निर्णय कर लिया थां। कविता केँ ऊपर प्रेम कां भूत सवार हैं। समझाने कां प्रयास व्यर्थ होगा। इसका परिमाण ये भि होँ सकता हैं कि वो उस लड़के केँ संगभाग जाय। इस परिस्थिति मे भि बदनामी निश्चित थां।
"औऱ वहा तुम्हे मात्र एक् शव हि मिला.?" कविता केँ पिता नें हंसते हुएपरी सें पूछा।
उस कब्र मे अकेली कविता नहि थि बल्कि वोँ लड़का भि थां। उन्होंने उन दोनों कों मारकर दफना दिया थां।
"ये दुनियां प्यार कों समझने केँ काबिल नहि हैं। उन्हें प्यार केँ सफर पऱ चलतादेख उनकेहर कदम पर्र काटें बिछाते मिलते यहलोग। इसलिये मैंने उन दोनों कों हमेशा केँ लिए एक् कर दिया। अब उनकी प्यार स्टोरी अमर हैं। " उनके स्वर मे पश्चाताप केँ बजाय अभिमान औऱ गर्व थां।
कविता कि मम्मी एक् कोने मे मौन बैठी थि। चाहकर भि वो कुछ नहि करसकी थि।
नीलिमा औऱ परीखेत कि ओर भागे। गाँव केँ बाहर् दो लाशें दफ़न थि। मूसलाधार बारिश हौ रही थि औऱ उनके हत्यारे चैन कि सांस लें रहे थें। नीलिमा औऱ परीखेत पहुँचे। कुत्ते अब भि इस क्षेत्र कि रखवाली कररहे थें। कविता कां मृतशव तौ सामने थां मगर वोँ लड़का? उन्होंने फिन सें कब्र खोदना आरंभकर दिया। हालाकि इन दृश्यों कों देखने कि हिम्मत उनमें नहि थि मगर सत्य उनके सहारे हि सामने आनां चाहता थां।
नीलिमा केँ जाते हि कविता केँ पिता कों गलती कां बोधहुआ। नीलिमा नें तौ केवल कविता कां नाम लिया थां औऱ उन्होंने अपने जुर्म केँ सारे पन्ने खोलदिए। इतनी बड़ी गलती। वो कितने मूर्ख हैं। अब नीलिमा खेत जाकरउन दोनों केँ शव कों ढूंढ लेगी। लोगों कों सभीकुछ पताचल जायेगा। जिस बदनामी केँ भय सें उन्होंने अपनेहाथ गंदेकिए वो तोँ होगा हि, कत्ल केँ अपराध मे उन्हें कड़ीसजा भि भुगतना पड़ेगा। इतनी बड़ी मूर्खता.! उन्हें इस गलती कों भि सुधारना थां।
तेज बारिश थमने कां नाम नहि लें रहा थां। कविता केँ घऱ सें सीधे दोनों खेत कि ओरआई हैं, वे जानते थें।
थोडा औऱ कब्र खोदने केँ पश्चात उन्हे उस लड़के कां भि शव मिला। दोनों एक् दूसरे केँ हाथ थामें मौत कि गहरी नींदसो रहे थें। अभि नीलिमा खड़ी हि हुई थि कि एक् गोली उसके सीने कों पारकर गई। वो मुंह केँ बलगिर पड़ी।
दनादन गोलियां बरसाते कविता केँ पिता औऱ भइयाइसी ओर आँ रहे थें। उनके द्वारा बरसाए एक् गोली नें अपना कार्य कर दिया थां। अपनी मम्मी कों मृत गिरता देखपरी सदमें मे चली गई। उसकी आँखें फटी कि फटीरह गई थि। भावनाएं चेहरे पऱ उमड़ नहि पारहे थें। अचानक सें उसकी मम्मी मौत कों गलेलगा बैठी थि। वो खड़ी थि। मगर निष्प्राण।
बंदूकों कि आवाज़ सुनसब कुत्ते भागगए थें। भागते हुएआए औऱ कविता केँ भाइयों नें परी कों दोनोतरफ सें घेर लिया। दोनों बंदूक ताने बेरहम हौ खड़े थें। इतनी लाशें बिछाने केँ बाबजूद भि उनमें अपराधी होने कां भाव दिखाई नहि पड़रहा थां। तेज हवाएं, कड़कती बिजली, सभीबस तमाशा देखने आए दर्शक कि तरह थें।
"अरे.!अरे.! हैवानों। रुको.! देखोइसे। इतनी प्यारी शक्लदेख तुम्हें इसपरदया नहि आता? केसेचला पाओगे बंदूक इसपर?हाथ नहि कांपगें तुम्हारे?" कविता केँ पिता परी केँ नजदीक आए।
वोँ दोनोअब भि बंदूक ताने वैसे हि खड़े थें।
"बंदूक नीचेकरो। सुना नहि। इस पर्र गोलियां चलते तौ मुझसे देखा नं जायेगा। " अपनी हि पुत्री केँ खून सें हाथ रंगने केँ बाद वोँ अभिनय अच्छा कररहे थें दयावान होने कां।
दोनों नें बंदूक कि पकड़ ढीलीकर दि। मगर निशाना अब भि परी कां सीना औऱ सर थां।
कविता केँ पिता नें इधरउधर देखा। उन्हें वोँ लकड़ी कां मोटा टुकड़ा दिखा जिससे उन्होंने कविता कां सर फोड़ा थां। उसेजब दफनाया जारहा थां, वोँ जीवित थि। परी कां भि यहवही हाल करना चाहते थें।
उन्होंने लकड़ी उठाया औऱ अगले हि क्षणदे मारापरी केँ सिर पर्र। मां कों मरतादेख पहले सें हि निष्प्राण हौ चुकीपरी धम्म सें गिर पड़ी। खेत बारिश कि पानी सें भर चुका थां। इसमें तीन लाशें तैररही थि। कविता कि, उसके प्रेमी कि औऱ नीलिमा कि। तीनों बेकसूर थें। तीनों कां कातिल एक् हि थें। चौथा कत्ल होने कों थां।
वेआगे बढ़े। परी मुंह केँ बल गिरी थि। पानी अधिक होने कि वजह सें उसकासिर पूरीतरह सें डूब गय़ा थां। कविता केँ पिता नें उसकेसिर पऱ लातरख मिट्टी कि ओर दबाया। परी सांस नहि लें पारही थि। दर्दमौत कि राह पऱ लेँ जारहा थां। बसकुछ हि क्षण औऱ। मौतउसे गले लगाने हि वाला थां।
अचानक सें मौसम बिगड़ जाने कि वजह सें राघव बाजार मे फंस गय़ा थां। बारिश थम जाने कां प्रतीक्षा करतारहा मगरये रुकने कां नाम नहि लेँ रही थि। आखिरउसे घऱ तोँ वापस आनां हि थां। भले हि क्यूं अब भींगना पड़े। जब वो घऱआया तोँ पूरीतरह सें भींग चुका थां। परी कों पुकारते घऱ केँ भीतर गय़ा। मगर दोनों मे कोईवहा पर्र थि हि नहि।
अंधेरे होँ गय़ा थां। इस वक़्त दोनों हि घऱ सें बाहर् हैं। वो बेचैन होनेलगा। जब अपने पिता सें दोनो केँ बारे मे पूछा तौ उत्तर मिला कि मर जाएं दोनो तोँ दिल कों चैन मिले।
राघव नें उनके बातों कों अनदेखा कर दिया। मगर वोँ ये नहि जानता थां कि आज नीलिमा कि सासू माँ औऱ ससुरजी दोनों कि ख्वाइश पूरीकर दि गई हैं। राघव नें दोनो कों पड़ोस केँ घरों मे ढूंढा। विद्यालय कि ओर भि देखा। जब दोनों मे सें कोई कहीं नहि मिलेतब वो खेतों कि ओर भागा।
खेतों मे बहुत पानीजम गय़ा थां। झींगुर बससोर मचाएजा रहे थें। मेढकों कि आवाजें बेचैनी बढ़ाने केँ लिए पर्याप्त थां। राघवइधर उधर भागता हि जारहा थां। परी कों पुकारते कभी मुंह केँ बल भि गिर पड़ता। गुजरते वक़्त केँ संग राघव कां भय आकार लेता जाता। भगवान सें हर सेकेंड प्रार्थना करता उनकी सलामती कि औऱ झाड़ियों, तालाबों, औऱ अन्य स्थानों पऱ ढूंढता।
राघव कि आवाज़ सुनकर कविता केँ पिता सतर्क हौ गए। उन्होंने नें देखा कि परी नें छटपटाना बंदकर दिया हैं। शायदये अबमर गई हैं। इससे पहले कि राघवयहा आए उन्हे यहा सें जानां चाहिए। अगले हि क्षण उनके दिमाग़ मे एक् औऱ कुराफात नें जन्म लें लिया।
"जल्दभाग यहा सें। " वे चिल्लाए औऱ भागे। कविता केँ दोनों भइया उनके पीछे हि थें। इसबार सतर्क थें। इसलिये कि कहींये खूनीखेल लंबा न् हौ जाय।
राघव भागते हुएइसी ओर आँ रहा थां। उसकी नजरें बेसब्री सें नीलिमा औऱ परी कि छवि कों तलाशरहा थां। जैसे हि वो खेत मे पहुंचा एक् बारफिन मुंह केँ बलगिर पड़ा। उसकीतेज सांसे जबतक धीमी नहि हुई वो उठने कि हिम्मत न् जुटासका। खेत मे बारिश कां पानी औऱ पानी मे तैरते तीनशव। कीचड़ साथ लिपट उनके शरीर सें बहताखून साम्राज्य बढ़ाता हि जारहा थां। ये साम्राज्य राघव कि नजरों कों आकर्षित नं करताऐसा हौ सकता हैं क्याँ? फिनवही भय कां आतंक। वही मनोनस्थिति। हृदय औऱ मस्तिष्क केँ मध्यजंग। नजरों केँ सामने पड़े दृश्य कों झुठलाने कां प्रयास। ये समझना कि कुछ नहि बसये एक् बुरा सपना हैं।
राघव अभि घुटनों केँ बल हि थां, सामने उसकी पत्नि, बेटी, कविता औऱ पड़ोस गाँव कां युवकमौत कि नींद सोया थां। एक् संगचार लाशें। किसकी मृत्यु कां शोक सबसे पहले मनाता.! उसकी अवस्था मूर्छा सें भि गंभीर थि। आंसू बारिश केँ बूंदों मे घुलती जाती। हवाएं कानों मे पराजय गीत गाती। टाइम केँ कहर पर्र बादल कि हंसी, इन चार लोगों कि मृत्यु पऱ कड़कती बिजली कि खुशी। ये बिजली राघव कों भि जलादे तोँ स्टोरी ख़त्म। पर्र ऐसा नहि होता। कभी नहि होता। प्रकृति इंसान कों हंसाती औऱ रुलाती भि हैं।
क्याँ हुआ अचानक सें यह सबकुछ? कुछसमझ आता कि उसकीनजर आहटआती दिशा पर्र पड़ी। इन लाशों केँ शहर मे कुछ आखिरी सांसे गिनती परी करबटबदल जल्द जल्द सांसे लेनेलगी। जैसेकोई उसकेबदन सें आहिस्ता आहिस्ता प्राण निकाल रहा होँ। गहरे जख्मों सें रक्तस्राव होता हि जारहा थां। ये कीचड़ केँ रंग मे रंग भि रहा थां। क्याँ मौत इतनी दर्दनाक होती हैं!
राघव उसकीओर लपका। उसे गोद मे उठाया। अपने वस्त्रों कों फाड़ रक्तस्राव होने वाले अंगों पर्र लगाया। ये पहलीबार थां जब उसने बिना सामाजिक उलाहनों कि परवाह किए अपने बेटी कों सीने लगाया थां। फूटफूट कर रोया भि थां। परीमौत औऱ जीवन केँ मध्य खड़ी थि। अपनेलिए पिता केँ आँखों मे उमड़े तूफान केसे देखती, उसकी आँखें जोँ बंद थि।
वो अपनी पत्नि कि मृत्यु औऱ पुत्री केँ इस अवस्था कां विलाप कर हि रहा थां कि अचानक सें उसे गाँव केँ लोगों कि चीख सुनाई पड़ी। शब्द स्पष्ट तोँ नहि थां मगरऐसा लगा जैसे कि गाँव मे किसी केँ घऱ मे आगलग गय़ा हैं। राघव नें गाँव कि ओर देखा। घऱ उसका हि जलाया गय़ा थां। आग कि लपटें आसमान छूने कों बेताब थि। हालाँकि वो गाँव सें दूर थां मगरआग उसकेघऱ कों जलारही थि यहा सें स्पष्ट दिखाई पड़रहा थां।
कविता केँ पिता औऱ भाइयों नें अपने अपराध कों छिपाने केँ लिएखेत सें वापस लौटते हि राघव केँ घऱ मे आगलगा डाले। परी केँ दादाजी औऱ दादीमा उसीआग कां आहारबन गए। ग्रामीणों नें पूरी कोशिश करीआग बुझाने कि मगर असफलता केँ अलावा औऱ क्याँ हाथ लगता।
"पहले उन्होंने मेराघऱ बिखेरा, फिनआग लगाई, मगर अभि भि उन्हें संतुष्टि नहि थि। न् जानेकिस अपराध कां बदला वोँ हमसे लेना चाहते थें.!"
अदालत कां माहौल बिल्कुल शांत हौ गय़ा थां। सबकी नजरें परी केँ मुखमंडल पऱ हि टिकी थि। किस्सा शायद रोचक होताजा रहा थां तभी तोँ एक् सेकेंड कि चुप्पी भि अदालत मे असहजता कां माहौल गढ़ देता।
"आग उन्होनें हि लगाई थि.!" वकील साहब भि आश्चर्य मे थें। स्टोरी सीधी नहि थि। साधारण रफ्तार सें बढ़ती किस्सा मे आया अचानक सें ट्विस्ट सबकोकथा सुनते रहने मे रुचि बढ़ाती रही। प्रकाश केँ लिए पर्याप्त ईंधन कि तरह, जब तक जलेगी, रौशनी भि मिलेगी।
"हां.आग मात्र उन्होंने मेरेघऱ मे हि नहि लगाई थि बल्कि गाँव केँ लोगों केँ दिलों मे लगाई थि। मेरा चरित्र भि उनकी सातिर बुद्धि केँ द्वारा गढ़ा गय़ा थां। उन्होंने लोगों कों स्टोरी तोँ सच्ची सुनाई मगर किरदार बदलदिए। मुझे चरित्र हीन बताया। मुझे मेरी साथी कविता कां कातिल बताया। मेरे पिता कों उस अपराध कां भागीदार बताया। उन्होंने कोशिश कि थि मेरे औऱ बाबा केँ बढ़ते अपराधी कदम मे बेड़ियां डालने कि मगर नाकाम रहे। क्याँ करते मेरे पिता केँ हाथों मे बंदूक थां। जिसकी गोली नें मेरी मां कां प्राण लिया थां। जिस दृश्य केँ वे साक्षी थें। उनकी झूठी स्टोरी लंबी थि। उनकी स्टोरी मे अपराधी हम् थें औऱ हम् हि नें अपनेघऱ कों जलाया थां। मेरी दादाजी दादीमा कां मेरे प्रति रूखा स्वभाव उनका अभेद हथियार बना। औऱ ग्रामीणों कों उनकी बातों कां यकीन करना हि पड़ा। "परी बोलती रही।
कविता केँ पिता केँ द्वारा फेंका गय़ा राघव केँ खिलाफ़ पासा उनकेहित मे थां। उनकी झूठीकथा सुनते हि ग्रामीण गुस्स मे लाल होँ गए। फैसला किया उन्हें तत्काल दंडित करने कां। अपने गाँव मे चरित्रहीन लड़की कां होना औऱ अपने हि पुत्री केँ कातिल कां होना उचित नहि थां। इस भीषण अपराध कां दंड भि भीषण होना चाहिए।
"राघवघऱ कों आगलगा उधर खेतों कि ओर भागा हैं। मैंने देखा थां। " कविता कां बड़ा भइया आक्रमक ग्रामीणों केँ सामने खड़ा होँ खेतों कि दिशा मे इंगित करतेहुए चीखा। उसके चीखते हि ग्रामीण खेतों कि ओरऐसे भागें जैसे कि वेलोग महीनों सें भूखें हों औऱ किसी नें उन्हें भोजन कां पता बताया होँ।
"मार डालेंगे उस पापी कों। उसने हमारे गाँव कां नाम खराब किया। वो अपराधी हैं औऱ उसे दंडित करना गुनाह नहि होगा.मार डालेंगे उस पापी कों." सब भागते हुएचीख रहे थें।
उनके गुस्सा कि कोई सीमा नहि थि। अगरइस वक्त राघव सामने होता तौ उसका क्याँ हाल किया जाता कल्पना कियाजा सकता हैं।
राघव कों अपनीओर आती आक्रमक भीड़ कि चीखें सुनाई पड़ी। वो उनके मकसद कों समझ गय़ा थां। अभि कुछ सोचने कां टाइम नहि थां। किसी भि तरहबस परी कों औऱ स्वयं कों बचाना थां। मगर वो कुछ औऱ देर अपनी पत्नि नीलिमा सें लिपटकर खूब रोना चाहता थां। अंतिम बारगले लगा। खून उसके वस्त्रों सें लिपट गय़ा। बारिश तौ बहोत पहले हि रुक गय़ा थां। गीलाघऱ भि सुखीफूस कि तरहधधक रहा थां। उसनेपरी कों गोद मे उठाया औऱ बिना रास्ते औऱ मंजिल कि परवाह किए पूरी रफ्तार सें भागा।
परी केँ जिस्म सें रक्त केँ धब्बे बह जमीन पऱ गिरती औऱ इतने टाइम अंतराल मे वो कई मीटर कि दूरीतय कर लेता। उसे रास्तों कि परवाह नहि थि। खुरदुरे मिट्टी कि नोंकसुई कि तरह पैरों मे चुभते, पत्थर ठोकरमार बीच रास्ते मे हि गिराउसे नाकाम करनेआते, कंटीली झाड़ियां राघव केँ शरीर केँ कई हिस्से कों चीर गई। बाप औऱ बेटी दोनों हि एक् दूसरे केँ खून सें रंगे थें। एक् आखिरी सांसे गिनरहा थां तौ दूसरा उसे बचाने जीजान लगाकर भागरहा थां।
ग्रामीण जबवहा पहुँचे तौ उन्हें खेत मे तैरते तीन लाशें मिली।
जब जीवन औऱ मौत केँ मध्य प्रतिस्पर्धा होती हैं, तोँ जीवन चाहने वाला भि जीत जाता हैं, कई मामलों मे हारता भि हैं। मौत चीज़ हि ऐसी हैं। राघव ग्रामीणों कि नजरों मे आने सें पहले हि ओझल हौ गय़ा थां। अब जितनी जल्द होँ सकेपरी कों अच्छे अस्पताल मे दाखिल करना अनिवार्य थां, अन्यथा अनहोनी निश्चित थि।
वो हाईवे पर्र आया हि थां कि उसकीनजर मार्ग किनारे खड़ेउस ट्रक पर्र पड़ी। बिना विचार किए वो उसपरचढ़ गय़ा। उसकीतेज सांसे, आंसुओं कि बारिश, अब तौ एक् शब्दबोल पाना भि कठिन थां।
लंबी दूरी तक लगातार भागते रहने औऱ घायल होँ जाने कि वजह सें राघव बुरीतरह सें थक गय़ा थां। परी कों गोद मे लिए, उसे अपने सीने सें लिपटाए कबसो गय़ा पता नहि। ट्रक ड्राइवर घड़ी पऱ चढ़ा औऱ म्यूजिक प्ले किया। गाने केँ धुन मे लिरिक्स गुनगुनाते हुए ट्रक स्टार्ट किया औऱ इसतरह परी, सुलेखा औऱ राघव कि जीवन कां एक् नयासफर शुरुआत हुआ।
अदालत मे लगे पेंडुलम घड़ी अचानक सें बज पड़ी। किसी कों भि वक्तहोश नं थां। धीरे-धीरे धीरे-धीरे सब किस्सा मे खोने लगें थें, येसच थां याँ झूठ इसका निर्णय करनाजज साहब कां काम थां। परी अपराधी थि याँ नहि इसका फैसला भि उन्हें हि करना थां।
"अदालत कां वक़्त खत्म होँ गय़ा। कोट स्थगित किया जाता हैं औऱ अगलेदिन कि तारीख तय कि जाती हैं। " जज साहब कों वक़्त खत्म होने कां अफसोस होँ रहा थां। काश थोडा औऱ समय होता। अब आगे कि किस्सा जानने केँ लिए अगले तारीख तक कां प्रतीक्षा करना थां।
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