Adultery गुज़ारिश पार्ट 2 - Desi kamuk kahani - Real Kahani Part 1
गुज़ारिश पार्ट 2
#१
“मे जिसदिन भुलादू, तेरा प्रेम दिल सें वोँ दिन अंतिम होँ मेरी जिन्दगी कां ” फूली सांसो केँ बीच हौले हौलेइस गाने कों गुनगुनाते हुए मे तेजी सें साइकिल केँ पेडल मारते हुए अपनी मस्ती मे चलेजा रहा थां.होंठो पर्र जीभ फेरी तोँ पाया कि अभि तक बर्फी- जलेबियो कि मिठास चिपकी हुइ थि। मौसम मे वैसे तौ कोई ख़ासबात नहि थि पर्र मई कि गरमरात मे पसीने सें भीगी मेरीपीठ सें चिपकी शर्ट परेशान करनेलगी थि.
“न् जाने कितना वक़्त हुआ होगा ” मैंने अपने आप् सें कहा औऱ दोचार गालिया अपने दोस्तों कों दि जौ मुझे छोड़कर न् जाने कहां गायब हौ गए थें। दरसल हम् लोग पडोसी गाँव मे दावत मे आये थें.
“सुभह हरामखोरो कों दोचार बाते तौ सुना हि दूंगा। ” कहतेहुए मैंने गाँव कि तरफ जाने वाला दोराहा पार हि किया थां कि पट कि तेज आवाज़ नें मेरे माथे पऱ बलडाल दिए.
“इसे भि अभि धोखा देना थां। ” मैंने साइकिल सें निचे उतरते हुएकहा टायर पंक्चर होँ गय़ा थां। एक् समय मे मूड ख़राब होँ गय़ा। कहने कों तोँ गाँव कि दुरीकोई दो - तीनकोस हि थि पऱ अचानक सें दुरी नं जाने कितनी अधिक लगनेलगी थि। पैदल घसीटते हुए साइकिल कों मे चांदनी रात मे गाँव कि तरफचल रहा थां.
धीमी चलतीहवा मे कच्चे सेर केँ दोनों तरफलगे सीटे किसी लम्बे हाइट वाले आदमियों कि तरह लहरारहे थें.दूर कहीं कुत्ते भोंकरहे थें। ऐसे हि चलते चलते मे नाहर केँ पुल कों पारकर गय़ा थां.मेरीखड खड करती साइकिल औऱ गुनगुनाते हुए मे दोनों चलेजा रहे थें कि तभी अचानक सें मेरेपेर रुकगए.अजीब सि बात थि यह इतनीरात मे मेरे कानो मे इकतारे कि आवाज़ आँ रही थि.इस बियाबान मे इकतारे कि आवाज़, जैसे बिलकुल मेरेपास सें आँ रही होँ। मुझे कोतुहल हुआ.
मैंने कान लगाये औऱ ध्यान सें सुनने लगा.यह इकतारे कि हि आवाज़ थि। बेशक मुझे म्यूज़िक कां इतना ज्ञान नहि थां पर्र इसगरम लू वालीरात मे किसी शर्बत सि ठंडकमिल जानां ऐसीलगी वोँ ध्वनी मुझे। जैसे किसी अद्रश्य डोर नें मुझे खींच लिया हौ। मेरे पांव अपने आप् उस दिशा मे लें जानेलगे जौ मेरे गाँव सें दूर जाती थि। हवाओ नें जैसेमुझ सें आँख मिचोली खेलना शुरुआत कर दिया थां। कभी वोँ आवाज़ बिलकुल पास लगती, इतनीपास कि जैसे मेरेदिल मे हि होँ औऱ कभी लगता कि कहींदूर कोई इकतारा बजारहा थां.
पथरीला मार्ग कब कां पीछेछुट गय़ा थां। नर्मघास पऱ पेर घसीटते हुए मे पेड़ो केँ उस गुच्छे केँ पास पहुँच गय़ा थां जिस पर्र वोँ बड़ा सां चबूतरा बना थां जिसके सहारे सें पहाड़ काटकर बनाई सीढिया ऊपर कि तरफ जाती थि.साइकिल कों वही खड़ी करके मे सीढिया चढ़कर ऊपर पहुँचा तौ देखा कि सभीकुछ शांत थां, ख़ामोशी इतनी कि मे अपनी उखड़ी साँसों कों खूबसुन पारहा थां। मेरे सामने बुझता धुना थां जिसमे शायद हि कोईलौ अबबची थि। सीढिया चढ़ने कि वजह सें गलासूख गय़ा थां तोँ मे टंकी केँ पास पानी पीने गय़ा हि थां कि मेरे कानो सें वोँ आवाज़ टकराई जिसे मे लाखो मे भि पहचान सकता थां.
“उसमे खारा पानी हैं, लें मेरी बोतल सें पी लेँ। ”
मे पलटा हम् दोनों कि नजरे मिली औऱ होंठो पऱ गहरी मुस्कान आँ गई,.
“तुँ यहा केसे ” मैंने उसकेहाथ सें पानी कि बोतल लेतेहुए कहा.
“आज पूर्णमासी हैं नं तौ नानीमा केँ संग कीर्तन मे आई थि। अभि ख़तम हि हुआ हैं, मेरीनजर तुझ पऱ पड़ी तोँ इधरआई पऱ तुँ इधर केसे ” उसनेकहा
मैंने उसे बताया। मेरीबात सुनकर वोँ बोलीं- कीर्तन तोँ दो-ढाई घंटे सें होँ रहा पऱ इकतारा कोई नहि बजारहा थां.मुझे मालूम हैं यह तेरा एक्सक्यूज़ हि होगा वैसे भि तुँ तौ भटकता हि रहता हैं इधरउधर
मे- तेरी जोँ ठीकलगे तूँ समझ
“रुक मे तेरेलिए प्रसाद लाती हूं, यह बोतल पकड़तब तक ” उसनेकहा औऱ तेजी सें मुड गयीँ,। मैंने बोतल कां ढक्कन खोला औऱ पानी सें गले कों तर करनेलगा.
आसमान मे पूनम कां चाँद शोखियो सें लहरारहा थां। कालीरात औऱ चमकता चाँदकोई शायर होता तोँ अब तक न् जाने क्याँ लिख चूका होता, यह तोँ मे थां जौ कुछकह नहि पाया.
“अब ऊपर क्याँ ताकरहा हैं, चलना नहि हैं क्याँ ” उसने एक् बार मेरे ख्यालो पर्र दस्तक दि.
मे- हाँ चलते हैं.
उसने एक् मुट्टी प्रसाद मेरी हथेली पर्र रखा औऱ हम् सीढियों कि तरफ चलनेलगे.
मे- नानीमा कहा हैं तेरी.
वोँ- आँ रही हैं मोहल्ले कि औरतोसाथ, मैंने बोल दिया कि तेरेसाथ जारही हूं.
मे- ठीक किया.
“बैठ ” मैंने साइकिल पर्र चढ़ते हुएकहा
वोँ- पैदल हि चलते हैं नं
मे- जैसा तूँ कहे
वोँ मुस्कुरा पड़ी, बोलि- कभी तौ टाल दियाकर मेरीबात कों.
मे- टाल जौ दि तौ फिन वोँ बात, बात कहां रहेगी.
“बातो मे कोई नहि जीत सकता तुझसे ” वोँ बोलीं.
मे- ऐसाबस तुम्हारी तरफ हि लगता हैं.
बाते करते करते हम् लोग अपनीराह चलेजा रहे थें। कच्चे रस्ते पर्र झूलते पेड़अब अजीब नहि लगरहे थें। नं हि खामोश हवा मे कोई शरारत थि.
“बोलकुछ, कब सें चुपचाप चलेजा रहा हैं ” उसनेकहा
मे- क्याँ बोलू, कुछ हैं भि तोँ नहि
वोँ- क्लास मे तौ इतना हंगामा मचाते रहता हैं, अभि कोई देखे तोँ माने हि नं कि वोँ तूँ हैं.
मे मुस्कुरा दिया.
“बर्फी खाएगी ” मैंने पूछा उससे
“बर्फी, कहां सें लाया तुँ ” उसनेकहा
मे- पड़ोस केँ गाँव मे दावत थि, दोचार टुकड़े जेब मे रखलिए थें.
वोँ- पक्का कमीना हैं तूँ। मुझे नहि खानी कहींरात मे कोईभूत नं लग जाये मुझे
मे- तुँ स्वयं भूतनी सें कम हैं क्याँ
कहकेजोर जोर सें हंस पड़ा मे
वोँ- रुकजरा तुम्हे बताती हूं.
मेरीपीठ पर्र एक् धौल जमाई उसने.
मैंने जेब सें बर्फी केँ टुकड़े निकाले औऱ उसकी हथेली पर्र रखदिए.
“अच्छी हैं, ” उसनेचख करकहा.
मे- वोँ तेरे मामाजी सें बात कि तूने
वोँ- तुँ स्वयं हि कर लें न्
मे- मेरी हिम्मत कहां उस खूसट केँ आगेमुह खोलने कि
वोँ- कितनी बारकहा हैं मामाजी कों खूसटमत बोलाकर.
मे- ठीक हैं बाबा। पऱ तुँ बातकर नं.
वोँ- मैंने तुझसे कहा तौ हैं, बाजार चल मेरेसंग.
मे- तुँ जानती हैं न्, वैसे हि तुँ बहोत करती हैं मेरेलिए.
वोँ- तौ यह भि करनेदे न्,
मे- इसलिये तौ कहरहा हूं, तेरे मामाजी सें बोलदे, कैंटीन मे रेडियो थोडा सस्ता मिल जायेगा। कुछ पैसे हैं मेरेपास कुछ कां जुगाड़ कर लूँगा.
“पर्र मुझसे पैसे नहि लेगा। हें न्, कभी तोँ अपना मानता हैं औऱ कभी एक् लम्हा मे इतना पराया कर देता हैं। जा मे नहि करती तुझसे बात ” उसने नाराजगी सें कहा.
फिन मैंने कुछ नहि कहा। जानता थां एक् बारयह रूस गई, तौ फिनसहज नहि मांगेगी। हालाँकि हम् दोनों जानते थें हालात कों, ऐसे हि ख़ामोशी मे चलते चलते गाँव आँ गय़ा। मैंने उसे उसकेघऱ केँ दरवाजे पर्र छोड़ा औऱ अपनेघऱ कि तरफ साइकिल कों मोड़ दिया.घऱ, अपनाघऱ.
Adultery गुज़ारिश पार्ट 2 - Desi kamuk kahani – New Episode
#2
आँख थोड़ी देर सें खुली.सूरजचढ़ आया थां।। मैंने कपडे बदले औऱ किचन कि तरफ गय़ा, वहां पऱ तालालगा थां। मेरीनजर छींके पऱ गई, जहाँ पऱ कपडे मे तीन रोटिया लिपटी पड़ी थि.
“हम्म, ” एक् गहरी साँसली औऱ सूखी रोटी कां एक् टुकड़ा चबाया। लोगो सें सुना थां कि जब रोज़कोई चीज़ अपनेसंग होँ तोँ उसकीआदत हौ जाती हैं पर्र फिनयह रोटी केँ सूखे टुकड़े आसानी सें गले केँ निचे क्यूं नहि उतरते थें। ऐसा नहि थां कि मुझे शिकवे नहि थें पर्र शिकायत करते भि तोँ किससे.
कक्षा मे आज थोड़ी देर सें पहुँचा, मास्टर कि दोबात सुनी औऱ फिन अपनेकाम मे लग गय़ा। दोपहर मे मालूम हुआ कि स्टूडेंट्स कां एक् टूर करवारहे हैं उदयपुर जाने केँ लिए। मेरेमन मे भि चाव सां उठा। एक् समय कि उस तम्मना कों दिल कि जिस गहराई मे मैंने महसूस किया वोँ बता नहि सकता थां.
“मास्टर जी, कितना खर्चा आएगाइस टूर कां ” मैंने पूछा
मास्टर- 800 रूपये
“आठसौ। ” मैंने एक् गहरी साँसली.
दिल मे एक् आसलिए साम कों मे चाची केँ पास गय़ा.
“चाची, मुझेकुछ पैसे चाहिए थें। ” मैंने कहा
चाची - किसलिए
मैंने अपना प्रयोजन बताया उसे.
चाची- आठसौ, जानता भि हैं कितने होते हैं.औऱ बड़ाआया लाट साहब जायेगा घुमने, मे तोँ दिनरात काम करके टूटी पड़ी हूं, औऱ इसे पैसे बर्बाद करना हैं। कोई जरुरत नहि हैं कही जाने कि अगलेमाह गाँव मे मेला लगेगा उसमे चक्कर लगा आनां। वैसे भि फिनखेत कौन देखेगा.घऱ केँ काम तोँ होते नहि परसों तुझसे कहा थां कि गेहू चक्की पर्र दे आँ पर्र वोँ तौ हुआ नहि तुझसे.
मे- अभि कट्टा देआता हूं चाची.
मैंने गेहूं कां कट्टा साइकिल पर्र लादा औऱ दरवाजे केँ पासआया हि थां कि पीछे सें मैंने चाची कि आवाज़ सुनी जौ मुझे हि कोसरही थि। एक् नजरऊपर आसमान पऱ डाली औऱ मे आगेबढ़ गय़ा.ऐसा नहि थां कि मुझे कोफ़्त नहि होती थि चाची केँ इस रवैये सें पऱ पिछले कुछ महीनो सें तौ जैसे हद्द होँ गई, थि। मुझे सुनाने कां कोई मौका नहि छोडती थि वोँ.
“आठसौ रुपैया, ” मैंने एक् गहरी सांसली औऱ अपना हिसाब लगाने लगा.सभी कुछ जोड़कर मेरेपास 127 रूपये थें। तालाब किनारे बैठे बैठे मेरी गुनाभाग जारी थि.
“ओ क्याँ सोचरहा हैं ”
मैंने पलटकर देखा। पानी कां मटकालिए वोँ मेरी हि तरफ आँ रही थि.
“कुछ नहि सरकार ” मैंने कहा.
“तूँ क्याँ सोचता हैं, मुझसे छुपा लेगा अपनेमन कि बात, तुम्हे तुझसे अधिक जानती हूं ” उसने मेरेपास बैठते हुएकहा.
मे- तोँ तूँ हि बता मे क्याँ करू। मेरे हालात तुझसे छुपे तोँ नहि, चाची सें पैसे मांगे थें उदयपुर जाने केँ लिए उसनेझट सें मनाकर दिया.
“गलती तेरी भि तौ हैं, कब तक चुप रहेगा। कभी न् कभी अपनेहक़ कि बात करनी हि होगी न् तुम्हारी तरफ, जौ बर्ताव तेरेसंग करती हैं वोँ मे होती तोँ उसकामुह तोड़ देती ” उसनेकहा.
मे- जानती हैं सुख कि सबसे बेकार बात क्याँ होती हैं, सुख केँ दिन खत्म होँ जाते हैं, पऱ दुःख कि भि एक् अच्छाई होती हैं दुःख केँ दिन भि बीत जाते हैं.
वोँ- सुन तुँ फ़िक्र मतकर तूँ उदयपुर जरुर जायेगा, पैसे कां इंतजाम हौ जायेगा.
मे- केसे
उसने अपनी चांदी कि पायल उतारी औऱ मेरेहाथ मे रख दि.
“इसेबेच देते हैं ” बोलि वोँ.
एक् नजर मैंने उसकी हथेली पऱ रखी पायल कों देखा औऱ एक् नजर मैंने मेरी मजबूरियों कों देखा.नां जानेकब आँख सें गिरे पानी केँ कतरे उसकी हथेली कों भिगोगए। उसनेकस केँ मेरेहाथ कों थाम लिया। औऱ मेरे काँधे पर्र अपनासर टिका दिया.
“बहोत यादआती हैं मां-बाप कि मुझे, पिताजी कहता थां चाचा चाची कां उतना हि मान रखना जितना हमारा करता, कभी भि इनकाकहा टालना मत, बसवही तोँ कररहा हूं, तुँ नहि जानती, मे हर रोज़ मरता हूं अपने हि घऱ मे। चाची अपने बच्चो कों इतनालाड करती हैं, उनकीहर फरमाइश पूरी करती हैं। मुझेकभी गले नहि लगाती, गले लगाना तोँ दूर, कभी सर पर्र हाथ भि नहि फेरा। पिताजी कहता थां थोडा बड़ा होजा मेरेपूत फिन तुम्हे फौज मे लेँ चलूँगा। 9 साल होँ गए देखते देखते पिताजी हि नहि आयाफौज सें वापिस। क्याँ करू मे तूँ बता.गरम रोटी मेरेभाग मे उसदिन होती हैं जब किसी औऱ केँ घऱ मे जीमने जाताहु तुँ कहती हैं कि मे कहता नहि, किस सें कहूँ चाचा सें, उसे नहि पता क्याँ उसकेघऱ मे क्याँ हालात हैं मेरे ” मेरी रुलाई छुट पड़ी.
“मे जानती हूं तेरे हालात, देख्ना एक् दिन आयेगा। यहसभी झुककर सलाम करेंगे तुम्हारी तरफ, यह रब्बसभी देखरहा हैं ” उसनेकहा.
“छोड़इन बातो कों, देर होँ रही हैं तुँ जाघऱ ” मैंने कहा
वोँ- तुँ भि चल
मे- आता हूं थोड़ी देरबाद.
रातजब गहराने लगी तोँ मे भि थके कदमो सें घऱ कि तरफचल दिया। मोहल्ले मे जाके देखाअलग हि तमाशा चलरहा थां। पडोसी जोँ नाते मे मेरा ताऊ लगता थां, अपनीघऱ वाली कों दारू पीकरपीट रहा थां। गालिया देरहा थां। मोहल्ले वाले बजाय उनकोअलग करने केँ खड़े होकर तमाशे कां आनंद लें रहे थें.
“ओ ताया, बहोत हुआअब बसकरो छोड़दे ताई कों ” मैंने कहा
ताऊ- न्, आज न् छोडूइस कुतिया नें मेरी इज्जत तारतार कर दि हैं.
मे-कोई नं अन्दर चल केँ बातकर,
मैंने ताऊ कों अन्दर कि तरफ खिसकाया औऱ कमरे मे लेँ आया.
मे- ताया, दुनिया तमाशा देखरही हैं। तेरी हि तोँ तोर हलकी होती हैं नं ताऊ- तोरबची हि नहि इस रंडी नें सभी बर्बाद कर दिया.
मे- सोजा ताऊ, सुभह आहिस्ता बात करना ताई सें जौ भि बात हैं.
ताऊ- तूँ कहता हैं तोँ सुभह देखूंगा इसे.
ताऊ नें जेब सें दारू कां पव्वा निकाला औऱ खींच गय़ा उसे, थोड़ी देरबाद बडबडाते हुए ताऊ बिस्तर पर्र लुढक गय़ा.मैंने कमरे कि कुण्डी लगाई औऱ फिन ताई कों आँगन मे लेँ आया.उसे पानी पिलाया.
मे- न् रो ताई.
ताई- मेरे तोँ नसीब मे हि रोना लिखा हैं.
मे- हुआ क्याँ.
ताई- यह तोँ सारादिन दारू पीकर पड़ा रहता हैं। घऱ केसेचले। तुम को तौ मालूम हैं हि हमारा हाल। मजदूरी सें आतेआज देर होँ गयीँ, तौ उल्टा सीधा बोलने लगा.
मे- कोई न् तुँ हाथमुह धो लें। खानां खा औऱ आरामकर। सभीठीक होगा.
मैंने उसे छोड़ा औऱ अपनेघऱ आँ गय़ा। पुरेघऱ मे अँधेरा थां बस चाची केँ कमरे मे रौशनी थि। प्यास केँ मारेगला सूखरहा थां। मे मटके केँ पास गय़ा गिलास अपनेहलक मे उडेला हि थां कि मेरीनजर खिड़की जौ कि थोड़ी सि खुली हुई थि उस सें अन्दर कि तरफ गई, औऱ जोँ मैंने देखा देखता हि रह गय़ा.
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#3
चाची केँ शरीर पऱ लहंगा हि थां, ऊपर सें पूरी नंगी वोँ। सर केँ खुल्ले बाल जौ बारबार उसके वक्ष स्थल पर्र आँ रहे थें। चाची केँ चेहरे पऱ दुनिया भर कि शिकायते थि। पर्र मेरीनजर उन उन्नत छातियो पऱ थि जिन्हें मे इतनापास सें देखरहा थां। बेशक मैंने अभि पानी पीया थां पऱ होंठो पऱ खुरदुरापन महसूस किया मैंने। वोँ चाचा सें झगड़रही थि.
“स्वयं तौ दो मिनट मे हि ठन्डे हौ जाते हौ, मे हमेशा कि तरहरह जाती हूं, ” चाची नें कहा
चाचा- होँ जाता हैं कभीकभी जल्द। इसबात कां क्याँ बतंगड़ बनाना.
चाची- हाँ, सारादोष मेरा हि तौ हैं.
“जोँ जाअबकल औऱ जोर सें रगड़ दूंगा तुम्हे। ” चाचा नें जवाब दिया औऱ पीठ दिवार कि दूसरी तरफ मोड़ली। चाची नें भि ब्लाउज पहन लिया औऱ चाची केँ पासआकर लेट गई,.
“सुनो, एक् बात करनी थि ” चाची नें कहा
चाचा- हाँबोल.
चाची- वोँ भतीजा उदयपुर घुमने जानां चाहता हैं.
चाचा- तूने क्याँ कहा
मे- टाल दिया। पऱ अब वोँ बड़ा हौ रहा हैं, उसकी आँखों मे शिकायते देखती हूं मे.
चाचा- हम्म
“क्याँ हम्म, तुम् तोँ सुभह निकल जाते होँ.इसघऱ मे मे रहती हूं, यह जौ दुश्वारिया उसकेसंग करती हूं मे, वोँ मुह सें कभी नहि बोलता पऱ उसकी आँखे जोँ प्रश्न करती हैं मे नजरे मिला नहि पातीउस सें ” चाची नें कहा
चाचा- सोजा, कल हम् इस बारे मे तसल्ल्ली सें बात करेंगे। जीवन मे वैसे हि कुछठीक नहि चलरहा हैं, वोँ जब्बर नें अपनीदो एकड़ जमीनदबा ली हैं। पंच-सरपंचो कि भि नहि मानता वोँ.
चाची- पुलिस कि सहायता क्यूं नहीं लेते
चाचा- पुलिस केँ संगबैठ केँ तौ दारू पीता हैं वोँ। दौर थां जब हमारी मर्जी केँ बिना गाँव मे पत्ता तक नहि हिलता थां औऱ आज देखो.
चाची- कमी तोँ तुम्हारी हि हैं, जोँ इस विरासत इसघऱ केँ रुतबे कों थाम नहि पाए.
चाचा- इतनेसाल होँ गए तूँ आज तक समझ नहि पायी। मेरी स्थान कोई औऱ होता तोँ नं जाने.खैर, रात बहोत हुईँ सोजा.
चाचा नें बात अधूरी छोड़ दि। वोँ दोनों तोँ सोगए थें पऱ मेरेदिल मे एक् हूकजगा गए, पहलीबार ऐसालगा कि जीवनऐसी भि नहि थि जैसा मे सोचता थां। पर्र मेरी औऱ इसघऱ कि जिन्दगी ऐसी क्यूं थि अब मुझेयह देख्ना थां। जब्बर नें हमारी जमीनदबा ली थि यहबात भि मुझे मालूम हुईँ औऱ मैंने सोच लिया कि जमीन पऱ मे वापिस कब्ज़ा कर लूँगा.
अलसाई भोर सें पहले हि मे उठ गय़ा थां। हाथमुह धोकर मे सीधा मंदिर कि तरफ निकल गय़ा। ऐसा नहि थां कि पूजा-पाठ मे मेरी बहोत दिलचस्पी थि पऱ मेरेदिल मे हसरत रहती थि, रीना सें मिलने कि। हर सुभह - साम वोँ मंदिर आती, दर्शन करती, तालाब सें पानी भरती। औऱ मे बसउसे देखता। सुभह कि लाली मे उसे देख्ना किसी तीर्थ सें कम नहि थां मेरेलिए.
थोड़ी देर हम् सीढियों पर्र बैठते औऱ फिन हमारा दिन शुरुआत होँ जाता। पऱ मेरी जिन्दगी मे वोँ दिन हि क्याँ जौ बिना किसी तकलीफ़ केँ बीतजाए। मुझेकुछ भि करकेआठ सौ रूपये कां जुगाड़ करना थां। मे सोचरहा थां कि कोई छोटा मोटाकाम मिल जाये तोँ पैसेमिल जाये। पर्र इतने पैसेभला देकौन.
नहर कि पुलिया पऱ बैठे बैठे मे इसीगहन सोच मे डूबा थां कि मैंने सामने सें ताई कों आते देखा। मुझेदेख कर वोँ मेरेपास आँ गयीँ,.
ताई- इधर क्यूं बैठा हैं
मे- वैसे हि तुम् बताओ
ताई- क्याँ बताऊ, तुम्हारी तरफ तोँ सभी मालूम हैं हि, दिहाड़ी पीटकर आई हूं। अब जाकर व्यक्ति कि गालिया सुनूंगी, न् जानेकब सुख मिलेगा, मिलेगा भि याँ नहि इस जन्म मे
मे- आखिरकिस चीज कि लड़ाई हैं तुम् दोनों कि
ताई- ग्रहस्थी मे टोटे कि लड़ाई हैं, तेरा ताऊ कमाता नहि, कभीकुछ करता भि हैं तोँ उसकी दारूपी जाता हैं, अब उसके पीछेमरू मे, खैर तुँ बताकुछ परेशान सां लगता हैं
मे- मेराहाल भि तेरे जैसा हि हैं ताई। कुछ पैसो कि जरुरत आन पड़ी हैं। जुगाड़ होँ नहि रहा हैं
ताई- तेरी चाची सें मांग, दुनिया कों तौ ब्याज मे पैसे देती हैं
मे- पऱ मुझे नहि देती.
ताई- बुरामत मानियो पर्र तूँ हि हैं जोँ उस सें दबके रहता हैं पुरे गाँव कों मालूम हैं कि यहसभी तेरा हि हैं.
मे- वोँ भि मेरे हि हैं, उनके सिवा औऱ कौन हैं मेरा तूँ हि बता
ताई- इतनासरल केसे हैं तूँ
मे- बसऐसे हि.
ताई- सुन एक् काम हैं जिस सें हम् दोनों कि मुश्किलें थोड़ी आसान हौ सकती हैं, पैसे कां जुगाड़ होँ सकता हैं, थोड़े तूँ रख लेना थोड़े मुझेदे दियो.
मे- केसे.
ताई- मे जहाँ मजदूरी करती हूं, वहां मार्ग बनाने कां काम हैं, तौ तारकोल बनाने केँ लिए न् ट्रको मे कोयला आता हैं। अगर हम् ट्रक सें थोडा कोयला गायबकर लें तौ उसेबेच कर पैसे आँ सकते हैं.
मे- तुँ पागल हुईँ हैं क्याँ। चोरी करनागलत हैं औऱ फिन किसी नें पकड़ लिया तोँ वैसे हि तकलीफ़ हौ जाएगी.
ताई- इस दुनिया मे आसानी सें कुछ नहि मिलता, मेरेमन मे यह बिचार इसलिये आया हैं कि मैंने कुछ मजदूरो कि बाते सुनी थि वोँ कईबार कोयला बेच चुके हैं, सहर मे एक् सेठ हैं जौ यह कोयला खरीदता हैं। देख लें अगरकर पाये तोँ.
मे- मन नहि मानता
ताई-तेरे मन कि तुँ जाने, चल ठीक हैं मे चलती हूं देर सें पहुंचूंगी तोँ दो गाली औऱ बकेगा व्यक्ति.
ताई चली गई, पर्र मेरेमन मे हलचलमचा गयीँ,। मेरामन दो हिस्सों मे बंट गय़ा एक् तरफ मेरा जमीर कहता कि गलतकाम गलत हि होता हैं, तोँ दूसरा हिस्सा कहे कि उदयपुर घुमने जानां हि हैं, जिन्दगी मे यह मौकाफिन मिले न् मिले। कशमकश जब अधिक हुइ तौ मे गाँव कि तरफचल निकला। कुछदूर चला हि थां कि मेरी चप्पल मे काँटा फंस गय़ा। क़िस्मत कों कोसते हुए मे काँटा निकाल हि रहा थां कि पास केँ झुरमुट मे मुझे हलचल सि महसूस हुई। लगा कि कोई हें वहां पर्र मैंने जल्दी चप्पल पहनी औऱ झुरमुट मे जाकर देखा।.
तोँ वहां पऱ.
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