बाप कां अधिकार - Complete Kahani All Parts
हेलो फ्रेंड्स क्याँ आप् लोग बाप बेटी पऱ आधारित स्टोरी पढ़ने केँ शौकीन हौ। अगर होँ तौ आप् लोग केँ लिए एक् किस्सा लिखरही हूं। वैसेतों मैकोई राइटर नहि हुमगर लिखने कि शुरुआत कररही हु अपनी टूटी फूटी भाषामै।
Lata kapne apni mummy kee jagah lele dhere dheer dono k bich mai Romace hu juldi sex nahii karwana babu ji Lata ko ptaye bahar ghumne lekar jaye movie dekhaye kisi restaurant mai lejakar parpose krr de
बाप कां अधिकार – New Episode
Introduction
छोटे सें एक् गाँव मे एक् परिवार रहता थां। उस परिवार कां सरदार थां उदय सिंह। वो कभीउसी गाँव कां सरदार भि रह चुका थां, मगर अपनी पत्नि औऱ बेटे कि मृत्यु केँ बाद उसने सरदार पद सें इस्तीफ़ा दे दिया औऱ खेती-बाड़ी करनेलगा।
उदय सिंह केँ पास अपने बाप-दादाजी कि दि हुई बहोत-सि ज़मीन थि। वो उन ज़मीनों पऱ गाँव केँ लोगों सें खेती करवाता थां औऱ उन्हें रोज़गार देता थां।
उदय सिंह कां परिवार
उदय सिंह – उम्र करीब-करीब 50 वर्ष केँ आसपास। देखने मे फौलाद जैसे पहलवान, लंबा हाइट-काठी, रोबदार मूंछें, सांवला औऱ बलिष्ठ व्यक्तित्व। सौभाव सें गुस्से वाला।
गायत्री – उदय सिंह कि पत्नि, जिनका अब देहांत हौ चुका हैं।
लता – उदय सिंह कि पहली बेटी। उम्र करीब-करीब 30 वर्ष। अत्यंत खूबसूरत। शादीशुदा हैं, मगर उसका पति चारसाल पहले कमाने केँ लिए दुबई गय़ा थां औऱ फिनकभी लौटकर नहि आया। किसी कों नहि पता कि वो अब कहां हैं। फिगर कि बात करूं तौ 38 कि बड़ी मम्मों 30 कि कमर औऱ 40 कि बड़ी मोटी चूतड। आमतौर पऱ इतना किसी कां होता नहि हैं मगरलता जब जवान हुई तब सें उसकाबदन गड़राया होनेलगा। अपने बाप कि बहोत इज्जत करती हैं। बाहर् पराए मर्द कों देखती भि नहि।
दीप्ति – उदय सिंह कि दूसरी बेटी। उम्र 27 वर्ष। खूबसूरत हैं, मगर स्वभाव सें गुस्सैल। वो अपने पिता सें नफ़रत करती हैं। उसने अपनी मनपसंद केँ लड़के सें शादी किया हैं। गुस्से वाली तोँ हैं मगर फिगर कमाल कां हैं 36 कि मोटी मम्मों 28 कि कमर 38 कि गांड़।
धीरज – उदय सिंह कां बेटा, जिसकी एक् दुर्घटना मे अपनी मम्मी केँ संग मृत्यु हौ गई।
कंचन – उदय सिंह कि तीसरी बेटी। उम्र 24 वर्ष। वो अपने मामाजी-मामीजी केँ यहा रहकर पढ़ाई करती थि। वो भि अपने पिता सें नफ़रत करती हैं। शहर मे रहकर बहुत मॉडर्न हौ गई हैं। 34 कि मम्मों 26 कि पतलीकमर 36 कि गाड़।
बाप कां अधिकार – New Episode
Update 1
साम कां समय थां।
सूरज अभि पूरीतरह डूबा नहि थां, मगर उसकी लालिमा आम केँ बाग़ मे फैल चुकी थि। हवा मे कच्चे आम कि खुशबू घुली हुई थि।
ऊँची मचान पर्र उदय सिंह बैठा थां। एक् हाथ मे शराब कि बोतल.दूसरे हाथ सें आँखों कों बार-बार पोंछरहा थां। जिस व्यक्ति केँ नाम सें कभी पूरा गाँव काँप जाता थां। जिसकी मूँछों कां ताव हि उसकी पहचान थां…
वहीआज अकेले मे टूटाहुआ बैठा थां। उसकी आँखों मे गायत्री औऱ धीरज कि यादें तैररही थीं।
“अगर उसदिन मे… घऱ पऱ होता…” वो बुदबुदाया।
तभी नीचे सें आवाज़ आई -
अम्मा: “एउदय!ओ उदय! कहां मर गय़ा रे तुँ?”
उदय नें गर्दन घुमाई।
सफेद बालों वाली दुबली-पतली 75 साल कि बूढ़ी अम्मा लाठी टेकते हुए आँ रही थि। हाथ मे आमों कि टोकरी थि। उदय जल्द सें आँसू पोंछने लगा। ये अम्मा असल मे उदय सिंह कि पड़ोस मे रहती हैं। बुढ़िया कां दुनिया मै कि नहि हैं तोँ वोँ उदय सिंह कों हि अपना बेटा मानती हैं औऱ उदय सिंह भि उसको माँ कां दर्जा देता हैं।
उदय:“कुछ नहि अम्मा… बसऐसे हि बैठा हूं। ”
अम्मा मचान केँ पासआकर आँखें तरेरती हैं।
अम्मा: “अच्छा? बस बैठा हैं? तोँ तेरेहाथ मे यह दारू कि सिशीहवा सें आई क्याँ?”
औऱ ये कहकर उसने हल्का-सां डंडा उसकीपीठ पर्र जमा दिया।
उदय: “आह! अम्मा… बस… कितने दिनों बाद तौ गय़ा थां…”
अम्मा गुस्से मे बोलि -
अम्मा: “कितने दिनबाद? तेरी गायत्री गई… तेरा बेटा गय़ा… औऱ तुँ अभि भि उसी रास्ते पऱ? शपथखाई थि न् तूने चिता केँ सामने कि अब दारू कों हाथ नहि लगाएगा?”
उदयचुप होँ गय़ा।
उसकी मुट्ठी कस गई। आँखें फिनभर आईं।
धीरे-धीरे सें बोला -
उदय: अम्मा… मे जालिम थां… मानता हूं।
पर्र कातिल नहि थां…मैंने उन्हें नहि मारा।
अम्मा कि आँखों मे एक् समय कों कुछ चमका।
जैसे वो कुछ जानती हौ… जौ गाँव नहि जानता।
अम्मा: “मे जानती हूं रे… तुँ कातिल नहि हैं। ” तूँ तोँ ऐसासोच भि नहि सकता।
अम्मा नें अपने पल्लू सें उदय कि आँखों केँ आँसू पोंछदिए।
उदय: “अम्मा… फिन मेरी बेटियाँ औऱ कुछ गाँव वालेऐसा क्यूं सोचते हें?”
अम्मा: “जिसे जौ सोचना हैं, सोचने दे। तुँ कब सें दूसरों कि बेकार बातों कि चिंता करनेलगा? तुँ बस अपनी बेटियों केँ बारे मे सोच। अपनी बड़ी बेटी लता केँ बारे मे सोच। वो बेचारी कितनी अकेली हैं। उसका पति अब तक नहि लौटा। तुझेही उसकी चिंता करनी चाहिए, समझा?”
उदय अपनी मचान सें उठकर खड़ा हौ गय़ा।
उदय:“सच कहरही होँ अम्मा। मुझेअब अपने अतीत कों भुलाना होगा। नई शुरुआत करनी होगी। मे अपनी बेटियों कों सभी बताऊँगा… उन्हें यकीन दिलाऊँगा कि मे उनकी मम्मी औऱ भइया कां हत्यारा नहि हूं। ”
अम्मा नें उदय कि आँखों मे आत्मविश्वास देखा तोँ उसके चेहरे पऱ संतोष कि मुस्कान आँ गई।
अम्मा: “ये हुईं न् बात। चलअबघऱ चल। बेचारी लता सुभह सें तेरीराह देखरही हैं। तुँ दोपहर कों खानां खाने भि नहि आया। तब सें परेशान बैठी हैं। ”
उदय: “अम्मा… वही तौ हैं जिसने मुझे सहारा दिया हैं। मुझ पऱ विश्वास करती हैं। नहि तौ मे कब कां टूट चुका होता। बहोत भोली हैं मेरीलता बेटी… न् जाने क्यूं ईश्वर नें उसकी क़िस्मत मे इतनेदुख लिखदिए। ”
अम्मा: “उदय, लता कों भि सहारे कि ज़रूरत हैं। चुपचाप रोती हैं, किसी सें कुछ नहि कहती। अपनादुख अपने अंदरदबा लेती हैं, ज़ाहिर नहि होने देती। तुँ उसका बाप हैं उसे संभाल। अच्छा बाप बनकर दिखा। ”
उदय: “हाँ अम्मा… अब मे अच्छा बाप बनूँगा। ”
दोनों घऱ कि ओरचल पड़ते हें।
घऱ पहुँचते हि उदय सिंह कि नज़र अपनी बंधी हुई गाय पर्र पड़ती हैं। उदय सिंह रोज़ सुभह-साम अपनीगाय कां दूध निकालता थां। अपनी ज़रूरत केँ अनुसार थोडा दूधघऱ केँ लिएरख लेता औऱ बाकीबेच देता थां। उसकेपास दो गायें औऱ एक् सांड थां, जौ हरसाल दोनों गायों कों घबीनकर केँ बचा देता थां।
उदय सिंह: “अम्मा, ज़रा अंदर सें लता कों कहदो बाल्टी लेकर आँ जाए। मे गाय कां दूधदुह लूँ, दूध लेने वालेआते हि होंगे। ”
अम्मा: “हाँ, तब तक बछड़े कों खोलदे। वो भि थोडा दूधपी लेगी। ”
ये कहकर अम्मा अंदरचली जाती हैं औऱ उदय सिंह गायों केँ पासचला जाता हैं। वो गाय कों चारा देता हैं औऱ बछड़े कों खोल देता हैं।
थोड़ी हि देर मे लता बाहर् आती हैं। गुलाबी साड़ी मे वो बेहद हसीनलग रही थि। वो तौ पहले सें हि खूबसूरत थि, मगर उसकेगले मे मंगलसूत्र औऱ माँग मे सिन्दूर उसकी सुंदरता कों औऱ भि निखार रहे थें। उसकेहाथ मे बाल्टी थि… औऱ चेहरे पर्र हल्का-सां क्रोध।
जबलता अपने पिता केँ नज़दीक पहुँची तोँ उसने ज़ोर सें बाल्टी ज़मीन पर्र पटक दि। धातु कि तेज़ आवाज़ आँगन मे गूँजउठी, जैसे उसके भीतर कां क्रोध बाहर् आँ गय़ा हौ।
वो बिनाकुछ कहे मुड़कर जानेलगी।
बाल्टी कि आवाज़ सुनकर उदय सिंह नें पीछे मुड़कर देखा। उसकी बड़ी बेटी लता गुस्से मे थि… औऱ बिनाकुछ बोलेलौट रही थि।
आमतौर पऱ जबउदय सिंहसाम कों घऱआता थां, तौ लता पहले सें हि बाल्टी लेकर खड़ी मिलती थि। एक् हाथ मे गरमचाय होती…औऱ चेहरे पऱ हल्की-सि मुस्कान। वो अपने पिता सें थोड़ी-बहोत बातें करती, दिन भर कि छोटी-छोटी बातें साझा करती।
मगर आज…उसके चेहरे पर्र मुस्कान नहि, क्रोध थां।
उदय सिंहकुछ लम्हा उसे देखता रहा। फिन धीमे, भारी स्वर मे बोला.
उदय सिंह: “क्रोध हौ मुझसे…?”
लता केँ कदम ठिठकगए। उसकीपीठ अब भि पिता कि ओर थि। हवा हल्की-सि चली…आँगन मे बंधीगाय नें आवाज़ करके जैसे सन्नाटा तोड़ दिया। लता पीछे पलती उसकेआंख मे आसू थें।
लता: “क्रोध? मे क्यूं क्रोध होऊँ आपसे? मे होती हि कौन हूं आपकी…?”
ये सुनकर उदय सिंह कां मानो कलेजा फट गय़ा।
लता हि तोँ थि जौ उसके सबसे लगभग थि। जहाँ उसकी दोनों बेटियों नें अपने पिता कों अपनी मम्मी औऱ भइया कां कातिल मान लिया थां, वहींलता नें कभीऐसा नहि सोचा। उसे लगता थां कि उसका पिता ऐय्याश हैं, शराबी हैं, कभी-कभी मम्मी पर्र हाथ भि उठा देता थां… मगर हत्यारा नहि हौ सकता।
आज उसी बेटी कि आँखों मे आँसू देखकर, वो पहलवान-सां दिखने वाला मजबूत व्यक्ति भि भीतर सें बिखर गय़ा।
उदय सिंह:“ऐसा मतबोल, बेटी… एक् तूँ हि तोँ हैं जिससे मे अपनेदिल कि बात बाँट लेता हूं। तूँ हि तौ हैं जिसने मुझे हत्यारा नहि समझा…”
दोनों कि आँखों मे आँसू थें।
लता: “तौ आप् सुभह सें कहां थें? बताइए, कहां थें सुभह सें? यहा मे आपकीराह देखरही थि… दोपहर सें चिंता मे बैठी थि…”
उदय सिंह क्याँ कहता?
वो तौ सुभह हि शराब केँ ठेके पऱ चला गय़ा थां… औऱ वहीं बैठा पीतारहा थां।
उदय सिंह: “वोँ… वोँ… मे…”
लता: “मे… मे क्याँ? ठीक सें जवाब दीजिए। कहां थें आप्?”
लता अपने पिता कों ऐसे डाँटरही थि, जैसे वो बेटी नहि, पत्नि हौ।
उदय सिंह नें सिर झुका लिया।
क्योंकि उसकेपास कोई जवाब नहि थां।
लता: “मे जानती हूं… आप् कहां थें। ”
लताये कहकर अपने पिता केँ बिल्कुल पास आँ गई।
उसनेउदय सिंह कि ठुड्डी पकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठाया, जोँ लज्जा सें झुकाहुआ थां।
लता नें देखा - उसके पिता कि आँखें लालथीं।
वो थोडा औऱ पास गई… औऱ धीरे-धीरे सें उनके मुँह केँ पास साँस लेकर सूँघा।
शराब कि तेज़महक साफ़ महसूस हौ रही थि।
लता: “अच्छा… तौ आप् शराब पीकर आँ रहे हें?”
उदय सिंह चुपचाप खड़ारहा।
उसेसमझ नहि आँ रहा थां कि क्याँ कहे।
उदय सिंह (धीरे-धीरे सें): “हाँ…”
ये सुनते हि लता कि आँखें भरआईं।
वो गुस्से मे पलटकर जानेलगी।
उदय सिंह घबरा गय़ा।
वो जल्द सें आगे बढ़कर उसके सामने आँ गय़ा।
उदय सिंह: “क्षमा करदो, बेटी… आज तुम्हारी मम्मी औऱ भइया कि बहोत याद आँ रही थि… इसलिये पीली। अब वादा करता हूं, अब सें नहि पिऊँगा। ”
लता कि आँखों सें आँसूबह रहे थें।
एक् बार पहले भि ऐसाहुआ थां - जब वो शराब पीकरआया थां। तब भि उसने वादा किया थां कि अबकभी नहि पिएगा।
कुछ महीनों तक उसनेसच मे शराब नहि छुई…मगर आजफिन वही गलती।
लता: “फिन सें झूठ!उस दिन भि आपने वादा किया थां… फिनआज?
शायद आप् नहि सुधर सकते… शायद मे हि गलत थि…”
वो फिन जानेलगी।
उदय सिंह नें जल्दी उसके सामने जाकर अपनेकान पकड़लिए।
उदय सिंह: “बेटी, इसबार क्षमा करदे अपने गुनहगार बाप कों। अब सें ऐसा नहि होगा…शपथ हैं। ”
लता:“झूठ… आज वादाकर देंगे, फिनकुछ महीनों बाद पीकर आँ जाएँगे। ”
उदय सिंह: “नहि… अबऐसा नहि होगा। बस इसबार क्षमा करदे…”
ये कहतेहुए वो लता केँ पैरों मे गिरने हि वाला थां कि लता नें जल्दी उसके मज़बूत कंधे पकड़लिए।
लता: “बाबूजी! यह क्याँ कररहे हें? प्लीज़ ऐसामत कीजिए… मुझेपाप कि भागीमत बनाइए…”
उदय सिंह (रुँधे गले सें): “बेटी… इसबार क्षमा करदे…”
दूर खड़ी अम्मा येसभी देखरही थीं।
उनकी आँखों मे एक् अजीब-सि चमक थि।
कभीकुछ सोचकर मुस्कुरा देतीं।
अम्मा (आवाज़ लगाकर): “लता! क्षमा मत करना। सज़ा तौ मिलनी चाहिए इस नालायक कों… तभी सुधरेगा!”
दोनों नें मुड़कर अम्मा कि तरफ देखा।
उदय सिंह:“हाँ बेटी, मे सज़ा केँ लिए सजधजकर हूं। जौ सज़ा देना चाहो, दे सकती होँ। ”
लता नें अम्मा कि ओर देखा।
अम्मा मुस्कुरा रहीथीं।
लता: “मे क्याँ सज़ादूँ? जैसे भि हें, मेरे पिता हें। सज़ा नहि दे सकती।
मगर इतना अवश्य कहूँगी - अगर दोबारा पीकरआए, तौ घऱ मे घुसने नहि दूँगी। ”
लता औऱ अम्मा दोनों हल्का-सां मुस्कुराने लगीं। उन्हें मुस्कुराते देखउदय सिंह केँ चेहरे पर्र भि मुस्कान आँ गई।
अम्मा: “यह क्याँ बात हुई? तुँ सज़ा नहि दे सकती… पऱ मे तौ दे सकती हूं न्? मे इसकी मम्मी हूं। ”
लता मुस्कुराती रही।
उदय सिंह अपनी फूल-सि बेटी कों हँसता देखकर बेहदखुश हुआ।
उसके मोतियों जैसे दाँतचमक रहे थें।
उदय सिंह:“हाँ अम्मा, जौ सज़ा देनी हैं देदो। ”
अम्मा (हँसते हुए):“चल ठीक हैं — यहा 20 बार उठक-बैठक लगा, कान पकड़कर!”
आँगन मे हल्की हँसी गूँजउठी…
औऱ बरसों बादउस घऱ मे कुछसमय केँ लिए सच्ची गर्माहट लौटआई।
अम्मा नें लाठी ज़मीन पर्र टिकाई औऱ हाथ बाँधकर खड़ी हौ गईं।
अम्मा: “चल शुरुआत कर… गिनूँ मे!”
उदय सिंह नें बिनाकुछ कहे अपने दोनों कान पकड़लिए।
उसका लंबा, मज़बूत बदन आँगन केँ बीचों-बीच झुकने लगा।
“एक्…” अम्मा नें गिनती शुरुआत कि।
उदय उठक-बैठक लगाने लगा।
धूप ढलने कों थि, मगर गर्मी अब भि तेज़ थि।
कुछ हि देर मे उसकी कमीज़ पसीने सें भीग गई। माथे सें पसीने कि बूँदें टपककर मिट्टी मे गिरने लगीं।
लता येसभी देखरही थि।
उसके चेहरे पऱ हल्की मुस्कान आँ गई।
उसेयाद आया - जब वो छोटी थि, शरारत करती थि…तोँ यही बाबूजी उसेकान पकड़कर उठक-बैठक लगवाते थें।
“सीधी बनेगी कि नहि?”
वो गरजती आवाज़ आज भि उसके कानों मे गूँज गई।
आजवही मजबूत पिता…
कान पकड़कर उसकी सज़ा भुगतरहे थें।
“पंद्रह…” अम्मा नें ज़ोर सें कहा।
उदय कि साँसें अब तेज़ होँ चुकीथीं।
पसीना उसकी दाढ़ी तक पहुँच चुका थां।
लता कां दिलभर आया।
वो धीरे-धीरे सें बोलीं।
लता:“बस अम्मा… होँ गय़ा…”
अम्मा: “अरे नहि! बीस पूरे होंगे। ”
“उन्नीस… बीस!”
उदय नें आख़िरी उठक-बैठक पूरी कि औऱ सीधा खड़ा हौ गय़ा। साँसें धौंकनी कि तरहचल रहीथीं।
कुछसमय वो चुप खड़ारहा। फिन आहिस्ता लता केँ पासआया।
लता नें सोचा शायदफिन माफ़ी माँगेंगे।
मगरइस बारकुछ अलगहुआ।
उदय सिंह नें काँपते हाथों सें अपनी बेटी केँ सिर कों हल्के सें थामा…औऱ उसके माथे पर्र एक् बेहद स्नेहभरा चुंबन रखा।
क्षणभर केँ लिए वक्त जैसेठहर गय़ा।
ये पहलीबार थां…जब उदय सिंह नें अपनी बेटी केँ माथे कों इसतरह चूमा थां।
लता कि आँखें फैलगईं। फिन उनमें नमीउतर आई।
उसे महसूस हुआ - ये चुंबन सिर्फ़ प्रेम नहि थां…ये पश्चाताप थां…ये वादा थां…ये एक् बाप कां मौन स्वीकार थां कि उसनेदेर सें हि सही, मगर अपनी बेटी कों समझा हैं।
लता नें धीरे-धीरे सें अपने पिता कां सीना पकड़ लिया…औऱ सिर झुका दिया।
उदय कि भारी आवाज़ फूट पड़ी।
उदय: “मेरी बच्ची…”
अम्मा दूर खड़ीसभी देखरही थीं। उनकी आँखों मे भि नमी थि।
इधरलता भू बहुत सालों बाद अपने पिता केँ गलेलगी लती। लता कों अपने पिता कां मरदाना पसीना कां महक कों महसूस कररही थि।
साम कि लालिमा अब पूरीतरह ढल चुकी थि।
मगरउस आँगन मे पहलीबार अंधेरा नहि,
रिश्ते कि हल्की-सि रोशनी उतरआई थि।
बाप कां अधिकार - Aage kya hua? Next part padhiye
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