Sagar (Full Storyd) – New Episode
Update 25। Continue.
" तुम् सोचरहे होगे कि मे अमर कों केसे जानती हूं " - वोँ बोलि।
मे सोफे पऱ बैठा अचरज सें उसे देखेजा रहा थां।
वोँ अपनीगरम चाय कि कप टेबल पर्र रखकर खड़ी हुइ औऱ धीरे-धीरे धीरे-धीरे चलतेहुए थोड़ी दुरी पऱ खिड़की केँ पास खड़ी हौ गई। वोँ खिड़की कि कपाट खोलकर बाहर् आसमान कि ओरउपर देखने लगी।
मे चुपचाप बैठे उसके बोलने कि इंतज़ार कररहा थां।
" हम् छः महीने सें रिलेशनशिप मे थें। वोँ तुम्हारे औऱ अपने माँ कि अक्सर चर्चा किया करता थां। जब श्रेया नें तुम्हारा नाम लियातभी मे समझ गई थि कि तुम् अमर केँ साथी सागर हौ। "
" मगरअमर नें तुम्हारे बारे मे हमसेकभी जिक्र नहि किया। "
" मैंने हि मना किया थां। "
" मगर क्यूं ?"
" अपने भाग्य पे एतबार नहि थां। "
" मे समझा नहि। "
" श्रेया बोलीं थि कि तुम् मेरी बेहन कों जानते हौ ?" - वोँ पलटकर मुझे देखते हुए बोलि।
उसने मेरे प्रश्न कां जवाब नहि दिया।
" एकाधबार मिला थां। "
" कैसी हैं ?"
" तुम्हें नहि पता ?"
" जब सें अमेठी छोड़कर गई तब सें नहि। "
" मतलब इतने सालों सें तुम् दोनों मिली नहि ?"
मुझे बहोत आश्चर्य हुआ।
" मिलना तोँ दूरबात तक नहि हुईँ। "
" कोई मोबाइल वगैरह भि नहि ?"
" मुश्किल सें तौ दोसमय केँ अनाज कां जुगाड होता थां तोँ भला मोबाइल कहां सें आता " - वोँ फिकी मुस्कान करती हुइ बोलीं।
" अनुष्का एक् करोड़पति कि पत्नि बन चुकी हैं। मजे मे हैं। "
" चलो अच्छा हैं, कम सें कम उसकी लाइफ तोँ सेट हुई " - वोँ वापस खिड़की कि तरफ पलटते हुए बोलि -" अमर केँ क़ातिल कां पताचला ?"
" अभि तक तौ नहि। उसी सिलसिले मे तौ तुम् सें बातें करना चाहता थां। "
" मुझे अखबार केँ जरिएपता चला थां। मुझे तोँ अभि भि विश्वास नहि होँ रहा हैं कि वोँ अबइस दुनिया मे नहि हैं। "
" तुम्हें किसी पऱ शक हैं ?"
" हमने अपने रिलेशन कों सब सें छुपाकर रखा थां। मे किस पऱ शक करूंगी ?"
" जिस वक़्त अमर कां खूनहुआ थां उसी वक़्त तुम्हारी बेहन अनुष्का मौका-ए-वारदात पर्र पाई गई थि। "
" क्याँ ?" - वोँ चौंककर फिन पलटी।
मैंने उसेअमर केँ केस सें संबंधित सब चीजें बताई।
उसकेहाव भाव सें यही लगता थां कि वोँ इन सारी बातों सें अनजान हें।
" एंटरटेनमेंट केँ धंधे मे केसे आँ गई ?"
" अनुष्का केँ जाने केँ बाद मे अकेली पड़ गई। मे ज़्यादा पढ़ी लिखी भि तोँ नहि थि कि कहींकाम करकेदो समय कि रोटी जुगाड कर सकूं। अनुष्का पढ़ने मे तेज थि तोँ वोँ छोटे छोटे बच्चों कों कोचिंग, ट्यूशन करकेदो पैसेकमा लेती थि जिससे किसी भि तरह होँ जीवनकट हि जारही थि। मगर उसके जाने केँ बाद मे क्याँ करती ? थोड़ी बहोत डांस जानती थि तौ विवाह ब्याहों मे शो करने वाले एक् ग्रुप मे बतौर डांसर शामिल हौ गई। फिन जौ सफर वहां सें शुरुआत हुईँ तोँ आकर गोल्डन नाईट क्लब मे खतम हुई। "
" क्याँ अमर सें मुलाकात गोल्डन क्लब मे हुई थि ?
" नहि। उससे पहलीबार मुलाकात इतफाकन हुईं थि। मेरी एक्सीडेंट हौ गई थि। एक् वाहन वाले नें धक्का दे दिया थां। उसी नें मुझे हाॅस्पिटल पहुंचाया औऱ इलाज भि करवाया थां। फिन वोँ मुझे देखने हाॅस्पिटल रोजआने लगा। इसीतरह मिलते-जुलते हमारी भावनाएं कब उबलने लगीपता हि नहि चला। "
मुझे ताज्जुब हौ रहा थां कि इतनी बड़ीबात अमर नें मुझसे छुपाई थि।
" तुमने अमर कों अपने रिलेशनशिप केँ बारे मे हमें बताने केँ लिए इसलिये मना किया थां नं कि हम् तुम्हारे जाॅब कों पसंद नहि करेंगे। तुम्हें अच्छी लड़की नहि समझेंगे ?"
" जोँ काम मे कररही हूं उसे सभ्य समाज मे अच्छा नहि माना जाता। हैं तोँ यह बदनाम धंधा हि नं। हमारी सोसायटी मे कैबरे डांसर औऱ काॅल गर्ल मे उन्नीस बीस कां हि तौ फर्क माना जाता हैं नं। "
" मगर आखिर मे तुम् दोनों कों अपनी विवाह केँ बारे मे बताना तोँ पड़ता हि ?"
" मेरी एक् साल कि एग्रीमेंट अक्टूबर मे खतम हौ रही थि। उससे पहले मे जाॅब नहि छोड़ सकती थि। जाॅब छोड़ते हि हम् बता देते। "
मे कुछदेर तक चुपचाप उसे निहारता रहा।
" मैंने सुना हैं तुम्हारी एक् मौसी भि हैं ?"
" लगता हैं अनुष्का नें एकाध मुलाकात मे बहोत हि कुछबता दिया तुम्हें " - वोँ कटाक्ष करतेहुए बोलि।
मे चुपरहा।
" हां। एक् मौसी हैं मगर हमें तोँ उसका चेहरा भि याद नहि हैं। "
" मैंने यह भि सुना हैं वोँ भि किसी करोड़पति सें ब्याही गई थि। "
" उनके बारे मे जोँ भि हमने सुना थां वोँ मम्मी सें हि सुना थां। वोँ माँ सें बड़ी थि। अनुष्का कि तरह उन्होंने भि विवाह केँ बादफिन कभी अपने मायके मे कदम नहि रखा। माँ बोलती थि कि उसने प्यार शादी किया थां औऱ उसका पति अपने माँ-बाप कां एकलौता पुत्र थां। "
" तुम्हारे परिवार कि आर्थिक स्थिति कैसी थि ?"
" जब तक मम्मी बाप जिंदा थें किसीतरह कि दिक्कत नहि थि। पिता जी एक् मील मे काम करते थें मगर इतना रुपया कमा हि लेते थें कि चारों कां गुजारा अच्छे सें हौ जाता थां। जब दोनों कि मृत्यु हुई उससमय मे दससाल कि औऱ अनुष्का चौदहसाल कि थि। अनुष्का नें दसवीं कक्षा पासकर ली थि मगर माँ बाप केँ मरने केँ बाद हमारी पढ़ाई बंद होँ गई। कोई कमाने वाला नहि थां। माँ बाप सम्पत्ति केँ नाम पर्र एक् छोटा सां टाली कां घऱ औऱ थोड़ी गहने हि छोड़गए थें, इससे हम् क्याँ कर सकते थें ?"
" उसी गहने कों बेचकर अनुष्का दिल्ली चली गई ?"
" हां। उसे पढ़ने कां बहोत शौक थां। उसकी महत्त्वाकांक्षाएं बहोत बड़ी थि। वोँ मुझसे छुपाकर गहने बेची थि औऱ दिल्ली चली गई। उसनेकहा थां कि पढ़ाई पुरी करके जाॅब मिलते हि मुझे बुला लेगी। मगर एक् बार क्याँ वोँ निकली कि फिन.। "
मुझे अनुष्का पऱ सच मे बहोत क्रोध आँ रहा थां।
" तुम्हारे मौसाजी औऱ मौसी कि कोई फोटो हैं क्याँ ?"
" एक् फोटो थि मगर वोँ मिल नहि रही हैं ?"
" ओह। "
" वैसे एक् हमारी फेमिली फोटो हैं मगर उसमें मौसाजी नहि हैं "- बोलकर वोँ अपने कमरे मे चली गई।
थोड़ी देरबाद वोँ एक् पुरानी सि फोटो जोँ गंदी भि हौ गई थि लेँ आई।
पांच लोगों कां एक् फेमिली ग्रुप फोटो थां। दोनों बहनें बहोत छोटी थि। वे अपने माँ-बाप केँ गोद मे बैठी हुई थि औऱ एक् उनकी मौसी थि।
मौसी कि पिक्चर देखते हि मुझेलगा कि इसे मैंने कहीं देखा हैं। थोड़ी देर देखकर मैंने फोटोउसे वापसकर दिया। वोँ फोटो लेकर अपने कमरे कि तरफ जानेलगी कि मैंने पूछा -
" यहां अकेली रहती होँ ?"
" नहि। एक् लड़की केँ संग रहती हूं, वोँ भि मेरेसंग हि काम करती हैं " - वोँ जाते जाते बोलीं।
मेरे दिमाग़ मे बारबार उसके मौसी कि तसबीर आँ रही थि। इसे मैंने कहीं देखा तौ जरूर हैं।
वोँ कमरे सें बाहर् आई तोँ मे भि खड़ा हौ गय़ा।
" जाने सें पहले एक् बात पुछना चाहता हूं ?"
" क्याँ ?"
" अब क्याँ करोगी ? जाॅब करती रहोगी याँ छोड़ दोगी ?"
वोँ फिन सें खिड़की केँ पासचली गई औऱ बाहर् कि ओर देखने लगी। बहोत देर तक वोँ वैसे हि खड़ीरही। मुझेलगा वोँ जबाव नहि देना चाहती हैं इसलिये मे दरवाजे कि तरफ बढ़ा।
दरवाजे पे खड़े होकर उसकी औऱ निगाह डाली। वहां सें उसकी शक्ल दिखाई देरही थि। उसकी आंखें बंद थि औऱ आंखो सें दो बूंद आंसूछलक कर गालों पे पड़ेहुए थें।
मे दरवाजे पर्र खड़ा होँ गय़ा।
" माँ बाप नें बचपन मे हि संग छोड़ दिया " - वोँ बहोत हि धीमी आवाज़ मे बोलरही थि -" बड़ी बेहन नें अपनी मंदबुद्धि बेहन कों देहात मे अकेली छोड़ दिया। छः महीने मे पहलीबार अमर केँ रूप मे खुशियां मेरी दामन मे आई थि मगर उसने भि संग छोड़ दिया। अबयह डांस वालीजॉब हि तौ अंतिम सहारा हैं.इसे छोड़ कहां जाउंगी। "
उसकी बातें सुनकर मेरामन दुःख औऱ वेदना सें भर गय़ा। मेरी आंखें बोझिल होँ गई।
मे उसकेपास गय़ा औऱ उसे पकड़कर अपनीओर घुमाया।
वोँ सिर झुकाए चुपचाप खड़ीरही। मैंने उसके आंसुओं कों अपने हथेली सें पोंछा।
" तुम् एक् बहादुर लड़की होँ वीणा। जिसतरह सें विपरीत परिस्थितियों मे तुमने अपने कों संभाला हैं उससे मेरेदिल मे तुम्हारे प्रति बहोत इज्जत हैं। मे तुम्हें दिल सें नमन करता हूं। तुम्हारे दिन भि पलटेंगे। औऱ बहोत जल्द पलटेंगे.मेरा पूरा विश्वास हैं। "
मे वहां सें भारीमन औऱ दिल मे टिशलिए विदाहुआ।
Thank you Kamdev bhay ? Socha thaa kee kuch imotional jaisa Update likhu.Lag too raha h kee mein pass hu gyaa. ? Vina or Anushka kee mausi k bare mai 1 2 Update mai hi malum hu jayega.
mein itna achaa likhta ho kee meri story padh krr firefox420 bhay ko ulti aa jaati h or woh aakthuu aakthuu karne lagte haen,,,,, iss lockdown ne iss forum ko ek behtareen writer de diya. Isse badi baat or kya hu sakti h,,,,,
Sagar (Full Storyd) – New Episode
nice update.veena की story emotional thi.na mausi na behen shaadi karke dobara lautke aayi.jabki dono amir घर mai shaadi krr chuki thi.
पर अगर amar sachcha और बहुत karibi friend thaa sagar kaa too usne veena की बात kyi chhipayi ??? kitna bi bekar matter hu apne jigri friend से share karte hi h ?.too iska matlab amar ne बहुत कुछ chupaya हुआ thaa hero से ? jiski wajah से उसका rakt हुआ और hero ko कुछ ptaa नहीं chala,, sayad hero amar की कुछ baate jaanta na hu ??.
और veena की mausi ko kahin देखा h sagar ne aesa lagata h पर कहा ???.
Ek achaa insaan khud apni taareef nahee krta, jaesa mein nahee krta,,,,, story waakayi mai lajawaab h sanju bhay, apni kahani pr update dene k baad phir say padhna shuru karuga,,,,,
sayad amar kaa us society mai ( jaha sagar kee behen rehti thi ) kisike saath affair bi raha hu ?.ya sagar kee behen ( nam yaad nahee ) k saath hi hu affair ??.iss liye waha sagar ko bina bataye jata hu .jiske chalte uskah rakt hu gyaa ??.only my point of view ???.
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Update 26.
रात केँ दसबजे थें। मौसम अच्छा थां इसलिये छत पऱ हि खाटलगा लिया थां। लेटकर आसमान मे चमकते सितारों कों देखने लगा।
आज कां दिन बहुत थकावट भरारहा थां। माॅम कि तबीयत कलसाम सें हि खराब थि। उन्हें बुखार थां। सुभह उन्हें डाक्टर कों दिखाया औऱ फिन चाची कों हम् सब कां खानां बनाने केँ लिएकह दिया। फिन वीणा सें मिलने चला गय़ा थां।
वीणा सें मिलने केँ बादवही रोज वाली रूटिन थि। आज क्लब मे कुलभूषण खन्ना मौजूद थां। उससे थोड़ी बहोत औपचारिक बातें भि हुईँ थि।
आसमान मे चमकते तारों कों निहारते हुए वीणा केँ बारे मे सोचरहा थां। उसकी किस्सा सुनकर मन व्यथित हौ गय़ा थां। दिल मे बेचैनी सि हुइ थि।
इस मर्द प्रधान समाज मे एक् अकेली औऱ वोँ भि जवान लड़की कों किनकिन कठिनाइयों कां सामना करना पड़ता हैं, उसका अहसास थां मुझे।
मुझेइस बात कां भि अहसास थां कि एक् जवान खुबसूरत लड़कीजब स्टेज पऱ अनगिनत लोगों केँ सामने कला केँ नाम पर्र डांस प्रस्तुत करती हैं तौ किसतरह सें उसकोहवश भरी निगाहों सें देखा जाता हैं। उसके बारे मे लोग केसे केसे विचार करते होंगे।
कईकाम ऐसे होते हें जिसेलोग खुशी खुशी करते हें मगरकुछ ऐसे भि होते हें जोँ मजबूरी मे करते हें। वीणा नें मजबूरी मे इस धंधे कों अपनाया थां। यदि उसके माँ-बाप जिंदा होते तोँ क्याँ वोँ यह धंधा अपनाती ! यदि अनुष्का। उसकी बड़ी बेहन नें उसकासंग दिया होतातब भि क्याँ वोँ यहकाम करती !। कदापि नहि।
अमर कों वीणा कि सारीकथा पता होगी। उसकी स्टोरी सुनकर उसे भि वीणा केँ प्रति सहानुभूति हुइ होगी औऱ शायदयही सहानुभूति धीरे-धीरे धीरे-धीरे प्रेम मे बदल गई होगी। औऱ यदि उसकी हुस्न केँ बारे मे कहें तोँ निसंदेह वोँ लाखों मे एक् थि। ऐसे मे अमर कां उसके प्रेम मे पड़ना कोई आश्चर्य वालीबात नहि थि।
उसने जोँ अपनी फेमिली फोटो दिखाई थि, उसमें उसकी मौसी मुझे जानी पहचानी लगी थि। फोटोतब कि थि जब वोँ जवान थि मगरअब तौ उसकी बहोत उमर हौ गई होगी। अब तौ वोँ बुड्ढी दिखती होगी। उसके बारे मे सोचते सोचते अचानक मेरेमन कि घंटीबजी।.जानकी !। रमाकांत जी कि पत्नि।
उनके चेहरे औऱ जिस्म पऱ भले हि उमर कां असरपड़ गय़ा होँ मगरनाक नक्श, हाइट काठी वैसा हि थां। जानकी आंटी हि वीणा औऱ अनुष्का कि मौसी थि।
मगर वीणा नें कहा थां कि उसकी मौसी कि विवाह एक् अमीर घराने मे हुइ थि पऱ रमाकांत जी औऱ जानकी देवी कि हैसियत देखकर लगता तौ नहि हैं कि वोँ कोईखास अमीर हें। वोँ एक् फ्लेट मे रहरहे हें जबकि जैसा वीणा नें बताया थां उस हिसाब सें तौ उन्हें किसी कोठी याँ महल मे रहना चाहिए थां। बड़े बड़े कारोबार होना चाहिए थां। मगरवे तौ एक् आम इंसान कि तरह रिटायर जीवनजी रहे हें।
मैंने रमणीक लाल सें कहा थां कि रमाकांत जी केँ कमाई कां जरिया क्याँ हैं तोँ उसनेकहा थां कि मुझेपता नहि, शायद मेरे जीजा कों पता होगा। आखिर वोँ बहोत दिनों सें पड़ोसी थें।
मैंने फोन मे टाईम देखा। ग्यारह बजरहे थें। मैंने जीजा कों मोबाइल लगाने केँ लिए सोचा। पता नहि अभि मुम्बई मे क्याँ कररहे होंगे। फिन भि मैंने मोबाइल लगाया।
" क्याँ बात हैं सागर ? इतनीरात कों केसे मोबाइल किया ?"- जीजू कि आवाज़ आई।
" साॅरी जीजू इतनीदेर रात मोबाइल करने केँ लिए। किसी केँ बारे मे पुछना थां मुझे। "
" किसके बारे मे ?"
" अभि आप् कहां हौ ?"
" होटल मे हूं। सोनेजा रहा थां। "
" ओके। आपके गाजियाबाद वाले फ्लेट मे आपके पड़ोसी रमाकांत जी औऱ उनकी पत्नि केँ बारे मे पुछना थां। "
" क्याँ पुछना हैं ?"
" मैंने कहीं सुना कि वोँ बहोत हि पैसे वाले औऱ रईस खानदान सें थें तौ फिन वोँ एक् साधारण सें फ्लेट मे क्यूं रहरहे हें। "
" किसने कहा ? कहीं इसका मतलब भि अमर मर्डर केस सें तोँ नहि हैं ?"
" एक् लड़की नें बोला थां। क्याँ यहसच हैं ?"
" अबसच हैं याँ झूठ, यह तोँ मे नहि जानता मगर जितना रमाकांत जी नें अपने बारे मे जौ बताया थां वही जानता हूं। "
" क्याँ बताया थां उन्होंने अपने बारे मे ?"
" उनका कहना थां कि उनके पिता एक् रईस खानदान सें थें। मगर उन्हें अपने अपनी औलाद मतलब रमाकांत जी सें बड़ी नाउम्मीदी थि। क्योंकि यहउस वक़्त बुरे लोगों कि सोहबत मे थें। शराब सिगरेट कां शौक थां। फिनयह एक् लड़की केँ सम्पर्क मे आए औऱ अपने पिता केँ मर्जी केँ खिलाफ उस लड़की सें विवाह करलिए। "
" क्याँ वोँ लड़की जानकी आंटी थि ?"
" हां। वोँ जानकी आंटी थि। विवाह केँ बाद इनके पिता बहोत खपाहुए। वोँ इतने ज़्यादा खपाहुए कि उन्हें अपनी पुरी जायदाद सें बेदखल करना चाहते थें मगरफिन उन्हें अपने एकलौते औलाद पर्र कुछतरस आँ गय़ा थां। उन्होंने अपनी जीवन मे हि अपनी तमामचल औऱ अचल संपत्ति धर्मार्थ कार्यों मे लगाने केँ लिए एक् ट्रस्ट केँ हवाले कर दि थि औऱ ऐसा इंतजाम किया थां कि उन्हें यानी रमाकांत कों अपनी सारी जीवन ट्रस्ट सें चालीस हजार रुपए माहवार मिलता रहे। वोँ रकमबीस बाइस सालों सें उन्हें नियमित मिलरही हैं। "
" ओह ! तौ इसका मतलब उनकी फायनांशियल स्थिति यदिखूब बढ़िया नहि हैं तौ कोई खराब भि नहि हैं। "
" बढ़िया क्यूं नहि हैं ? उससमय आज जैसे महंगाई नहि थि। दो लोगों केँ लिएआज भि यहरकम कोई छोटी नहि होती। "
" औऱ जानकी आंटी कैसी हैं ?"
" आंटी बहोत तन्हाई पसन्द हैं। वोँ अधिक किसी सें मिलती जुलती नहि। "
जीजू सें बातों केँ दौरान मुझेयाद आया कि अमर केँ मर्डर वालेदिन अनुष्का जीजू केँ फ्लेट मे थि औऱ ठीक उसकेबगल मे हि उसकी मौसी कां फ्लैट थां।
तोँ क्याँ अनुष्का कों पता हैं कि बगल मे हि उसकी मौसी रहती हैं। मौसी अनुष्का कों नहि पहचान सकती थि क्योंकि उसनेउसे बचपन मे देखा थां। दोनों बहनें उस टाइम बहोत छोटी थि औऱ अब वोँ जवान लड़की मे बदल गई हैं। मगर अनुष्का औऱ वीणा तोँ फोटो केँ चलते अपनी मौसी कों पहचान हि सकती थि।
" जीजू एक् बात औऱ बताईए, क्याँ अनुष्का आप् केँ फ्लैट पे अक्सर आती थि ? मगर प्लीज सच बोलिएगा। "
" नहि नहि। वोँ पहलीबार मेरे फ्लैट पे आई थि औऱ पहलीबार हि इतना बड़ा कांड होँ गय़ा। "
" ओके। थैंक्यू जीजू। गुड नाईट। "
बोलकर मैंने मोबाइल काट दिया।
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सुभहफोन बजने कि आवाज़ सें मेरी नींदखुल गई। टाईम देखा। अभि छः हि बजे थें।
मैंने देखा रमणीक लाल कां मोबाइल थां।
मेरे ' हैलो ' कहने केँ बाद जौ रमणीक लाल नें कहाउसे सुनकर मे भौंचक्का होँ गय़ा।
मनीषजैन कों किसी नें जान सें मार दिया थां।
" कब ?- मैंने कहा।
" पुरीखबर नहि पता। मैंने अभि अभि खबर सुनी तोँ सोचा तुम्हें बतादूं। "
" तुमको केसेपता चला ?"
" क्याँ जाहिलो जैसे प्रश्न करते होँ ? कुछदिन पहले हि तोँ उसके बारे मे जांच पड़ताल कि थि। औऱ मे तुमसे कितना बार कहूं कि मे भि पुलिस कि हि जॉब करता हूं। "
" साॅरी। उसकीलाश कहां पाई गई ?"
" उसके फ्लैट पर्र हि। "
" ओह ! क्याँ डेड बॉडी पुलिस लें गई याँ अभि भि फ्लैट पर्र हि हैं ?"
" जिस हवलदार नें मुझे बताया उसके अनुसार अभि भि लाशघऱ पर्र हि हैं औऱ पुलिस कों भि अभि हि पताचला हैं। "
" इंस्पेक्टर कौन गय़ा हैं ?"
" वोँ एरिया विजय कोठारी केँ थाने केँ अंतर्गत आता हैं तोँ वही जायेगा। "
" ठीक हैं। मोबाइल रखो, मे वहां केँ लिए निकलरहा हूं। "
" इंस्पेक्टर तुम्हें उसके फ्लैट मे जाने कि इजाजत नहि देगा। "
" देखते हैं। वैसे इंस्पेक्टर कोठारी मुझे जानता हैं " - मैंने कहा -" औऱ सुनो, एक् औऱ काम करना हैं। "
" क्याँ ?"
मैंने उसेकाम बताने केँ बाद मोबाइल काट दिया औऱ जल्द जल्द रेडी हौ कर माॅमडैड कों बोलकर बाइक लेकर गाजियाबाद निकल गय़ा।
जब मे मनीषजैन केँ फ्लैट केँ पास पहुँचा तौ देखा कि फ्लैट कां मुख्य दरवाज़ा खुलाहुआ थां औऱ अंदर इंस्पेक्टर विजय कोठारी औऱ उसकेचंद कांस्टेबल डाइनिंग हॉल मे पड़ोसियों सें पुछताछ कररहे थें। शायद अभि तक उनका टेक्निकल टीम नहि आया थां।
इंस्पेक्टर कोठारी कि नजरमुझ पऱ पड़ी। उसने मुझे अंदरआने कां इशारा किया।
मे ड्राइंगरुम मे प्रवेश किया।
भीतर ड्राइंगरुम केँ कारपेट पर्र औंधे मुंह मनीषजैन पड़ा थां। उसकीपीठ मे मूठ तक जोँ खंजर घुपाहुआ थां, उसे मैंने फ़ौरन पहचान लिया।
येवही नक्काशीदार मूठ वाला जापानी खंजर थां जोँ मैंने श्वेता दि केँ पास देखा थां।
तभी पुलिस कां एक् बड़ादल जिसमें टेक्निकल टीम, फोटोग्राफर, डाक्टर वहां पहुँचा।
उन्होंने अपनी छानबीन शुरुआत कर दिया। उनकेआने केँ बाद इंस्पेक्टर नें खंजर कों लाश सें बाहर् खींचने कां प्रयास किया तोँ सिर्फ मूठहाथ मे आँ गई, फललाश मे हि धंसारह गय़ा।
खंजर कि मूठ नक्काशीदार होने कि वजह सें उस पर्र सें किसी प्रकार केँ उंगलियों केँ निशान बरामद नहि हुए।
इंस्पेक्टर नें मूठ कां मुआयना किया। खंजर कि मूठ खोखली थि। उसने खोखली मूठ केँ अन्दर झांका।
" क्याँ तुम् इस खंजर कों पहचानने हौ ?" - इंस्पेक्टर कोठारी नें मुझेगौर सें खंजर कों निहारते हुएदेख पुछा।
" हां " - बड़ी मुश्किल सें मैंने कहा।
Update Continue।
Sagar (Full Storyd) - Kahani ab aur interesting hogi
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