maira Pyara Devar - niyantran – New Episode
UPDATE 29
आज संडे थां, कोर्ट कि तोँ छुट्टी थि, सुभह होटल मे फ्रेश हुआ.गरम चाय ब्रेकफास्ट कर केँ 10 बजे जस्टिस ढींगरा जोँ राजेश कां केसदेख रहे थें। उनके बंगले पर्र पहुंचा। गेट पऱ प्रोफ़ेसर राम नारायण जी कां रेफरेन्स देकर अपना कार्ड दिया। वोँ उनसेबात कर चुके थें, तौ मेरा कार्ड देखते हि उन्होंने मुझे अंदर बुलवा लिया। मैंने उन्हें सारी बातें डीटेल मे बताई। उन्होंने मुझेदो दिनबाद कि बेल कि सुनवाई कि डेट देने कां प्रॉमिस कर दिया। जस्टिस ढींगरा केँ यहा सें निकलकर, मैंने एक् वकालत नामा सजधजकर किया औऱ चल दिया सेंट्रल जैल कि तरफ। जेलर कों अपना परिचय दिया औऱ उससे राजेश सें मिलने कां वक़्त माँगा। जैसे हि राजेश भइया मेरे सामने आए। मे उन्हें देखता हि रह गय़ा। क्याँ हालत हौ गयीँ, थि बेचारे कि। आँखें सूजी हुइ थि। उनके नीचे काले-2 निशान बननेलगे थें। औऱ वोँ गड्ढे सें मे धँस चुकीथीं। राजेश मुझे अपने सामने देखकर भावुक होँ गय़ा। मैंने उसके कंधे पर्र हाथ रखकर हौसला बनाए रखने केँ लिएकहा। मैंने वकालत नामे कों उसके सामने रखतेहुए कहा.
मे – राजेश भइया। आप् इस पर्र साइनकर दीजिए.
राजेश – यह क्याँ हैं। अंकुश जी?
मे – यह मेरा वकालत नामा हैं। आज सें मे आपकाकेस लड़रहा हूं.
राजेश – आप्! आप्!। मेराकेस लड़ेंगे?
मे – क्यूं? मैंने भि वकालत कि हैं। क्याँ आपको मेरेऊपर भरोसा नहि हैं?
राजेश – ऐसीबात नहि हैं। अंकुश जी, असल मे मुझेअब आशा कि कोई किरण हि नज़रआती दिखाई नहि देरही थि। इसलिये पूछ लिया। सॉरी…
मे – अब आप् सारी चिंताएँ मुझ पऱ छोड़ दीजिए। बसदोदिन औऱ। उसकेबाद आप् खुलीहवा मे साँस लेँ रहे होंगे। राजेश अविश्वसनीय नज़रों सें मुझे देखने लगे.
मैंने कहा – मे सहीकह रहा हूं, दोदिन बाद हम् सब एक् संग बैठे होंगे। विश्वास कीजिए मेरा.
राजेश – मुझे तोँ यह सपना सां हि लगरहा हैं। क्याँ सच मे मे दोदिन बाद आज़ाद होँ जाऊँगा?
मे – पूरी आज़ादी मिलने मे कुछ वक्त अवश्य लग सकता हैं। मगरदो दिनबाद आप् जैल मे तौ नहि होंगे। यह पक्का हैं.
राजेश कों हौसला देकर मे अपनेघऱ लौटआया। साम कों हम् सभी एक् संग बैठेहुए थें। अभि तक घऱ मे किसी कों कुछपता नहि थां कि बीते दो-तीन दिन मे मे कहां औऱ क्याँ कररहा थां। बस उनकोयह भरोसा अवश्य थां कि मे जोँ भि कररहा हूं। वोँ राजेश कि रिहाई सें संबंधित हि होगा.
मैंने बात शुरुआत कि – राम भैया, दोदिन बाद राजेश भइया कि बैल कि हियरिंग हैं। मे चाहता हूं। आप् सभीलोग उस वक्त अदालत मे उपस्थित हों.
राम भैया – क्याँ? इतनी जल्दडेट भि मिल गई, ?
मे – हां मैंने आप् लोगों कों एक् हफ्ते कां वक्त दिया थां, तोँ यहसभी करना तौ ज़रूरी हि थां.
राम भैया – मगर वोँ जज तोँ बहोत नालायक थां, हमें तोँ उसने मिलने तक कां टाइम नहि दिया थां.
मे – राम भैया, कुछ चीज़ें क़ानूनी दाव पेंच सें हि संभव हौ पाती हें.
बापू – तुम्हें क्याँ लगता बेटा! राजेश कों बेलमिल जाएगी?
मे – अपने बेटे पर्र भरोसा रखिए पिताजी। दुनिया कां कोई क़ानून अब उन्हें जेल मे नहि रख पाएगा। मैंने ऐसे–2 एविडेंस इकट्ठा करलिए हें, कि अगर अदालती प्रक्रिया अपने सिस्टम केँ हिसाब सें नां चलती होती तोँ सीधेकेस हि खतम हौ जाता.इसी डेट कों.
मोहिनी भाभी अपनाआपा खो बैठी। उन्होंने मेरेपास आकर मेरा माथाचूम लिया औऱ रोतेहुए बोलि – मुझे तुम् पऱ नाज़ हैं अंकुश। मम्मी जी कि आत्मा तुम्हें देखकर आज कितनी खुश हौ रही होगी.
मैंने उनके आँसू पोंछते हुएकहा – नाज़दो दिनबाद करना मोहिनी भाभी.जब आपके भइया आपकेसंग होंगे.
रात कों मोहिनी भाभी मेरेलिए दूध लेकर कमरे मे आईं.संग मे निशा भि थि। मोहिनी भाभी मेरेपास पलंग पर्र बैठ गयीँ,, निशा उनके बाजू मे खड़ीरही। मैंने भाभी केँ हाथ सें दूध कां ग्लास लेकर निशा सें प्रश्न किया.
मे – निशा, तुम्हें ठीक सें याद हैं वोँ वाक़या?
निशा नज़र नीचीकिए हुए बोलीं – हां अंकुश, मुझेआज भि अच्छे सें याद हैं। उन मनहूस पलों कों भला केसेभूल सकती हूं मे??
मे – तोँ एक् बारयाद कर केँ बताना। जब राजेश भइया औऱ भानु केँ बीच हाथापाई होँ रही थि, तोँ क्याँ कभी भि ऐसा मौकाआया थां जब चाकू उनकेहाथ लगा हौ??
निशा – नहि! मुझे तौ एक् बार भि नहि दिखा कि राजेश भैया कां हाथकभी भि उसके चाकू पऱ गय़ा हौ। राजेश भैया तौ भानु कि कलाई हि पकड़कर उसकेहाथ कों अपनीतरफ आने सें रोकते रहे थें.
मे सोच मे पड़ गय़ा। कि पुलिस कां ध्यान इसतरफ क्यूं नहि गय़ा? चलोमान लिया कि पुलिस ठाकुर केँ दबाव मे आँ गई,। मगर कृष्णा भैया तौ एसपी हें। उन्होंने इसतरफ ध्यान क्यूं नहि दिया?
मुझेसोच मे डूबेहुए देखकर मोहिनी भाभी बोलि – किससोच मे डूबगये अंकुश?
मे – अच्छा मोहिनी भाभी, एक् बात बताइए। उस हादसे केँ बाद कृष्णा भैया यहाआए थें?
मोहिनी भाभी – एक् बारआए थें। तुम्हारे भैया केँ बुलाने पऱ.
मे – तोँ कृष्णा भैया कां बर्ताव इसकेस कों लेकर कैसालगा? आईमीन… कृष्णा भैया सहायता करना चाहते थें याँ कुछ औऱ? क्योंकि भाभी आप् तोँ लोगों कि साइकोलॉजी अच्छे सें जान लेती हें.
मोहिनी भाभी – शुरुआत मे तोँ लगा कि कृष्णा इस मामले मे सहायता करना चाहते हें। थोड़ी बहोत भाग दौड़ भि कि थि, कुछ उनकी बातों सें लगा भि कि बातबन रही हैं। फिन.
मे – फिन.??फिन क्याँ हुआ मोहिनी भाभी?
मोहिनी भाभी – साम कों जबयहा उस विषय पर्र बातें होँ रही थि, कि आगे क्याँ औऱ केसे करना हैं कि तभी उनको एक् मोबाइल आया। बातों सें लगा कि शायद कामिनी कां हि थां। कृष्णा हमारे पास सें उठकर मोबाइल पर्र बात करतेहुए बाहर् निकलगये, जब वापस अंदरआए तोँ उनका रुख़ बदलाहुआ सां थां.
मे – तोँ क्याँ कृष्णा भैया नें आगे सहायता करने केँ लिएमना कर दिया थां?
मोहिनी भाभी – सीधे-2 तोँ नहि… पर्र घुमा फिराकर कृष्णा नें जता दिया कि अब बहोत देर होँ चुकी हैं। मामला अदालत मे पहुँच चुका हैं, पुलिस अबइस मामले मे कुछ नहि कर सकती.
फिन थोडा औऱ कुछइधर उधर कि बातकर केँ मोहिनी भाभीउठ खड़ी हुई औऱ बोलि – तुम् दोनों बातकरो। मे चलती हूं, तुम्हारे भैया राहदेख रहे होंगे.
मे मज़ाक करतेहुए बोला – हां भाभी!!! जल्दजाओ, राम भैया बेचारे बेचैन हौ रहे होंगे। पता नहि उनकी हसीन पत्नि कहां चली गई, ??
मोहिनी भाभी नें हँसते हुए मेरेगाल पऱ चिकोटी ली औऱ बोलीं – शैतान अंकुश… कितने बेशर्म होँ गये होँ?? अपने भैया केँ लिएऐसा बोलते हौ??
मैंने हँसते हुएकहा – इसमें मैंने कुछ ग़लतकहा भाभी? आप् सुन्दर नहि होँ? बोलो तोँ मे भैया कों बोलकर आपसे विवाह कर लेता हूं। क्यूं निशा तुम्हें कोई प्राब्लम तौ नहि हैं नाँ??
निशा नज़र झुकाए, मंद-मंद मुस्कराते हुए बोलि – देवर जी भाभी केँ बीच, मे कुछ नहि बोलने वाली.
मेरीबात सुनकर मोहिनी भाभी बुरीतरह शर्मा गयीँ, औऱ हँसते हुए कमरे सें बाहर् चली गयीं। मोहिनी भाभी केँ जाते हि मैंने निशा कां हाथ पकड़कर अपनीओर खींच लिया वोँ झटके सें मेरीगोद मे आँ गिरी। मैंने उसके जूसी होंठों कों चूमते हुएकहा.
मे – कितनी कमजोर होँ गई, होँ जान?? मुझे क्षमा कर देना… तुम् इतनादुख झेलती रही औऱ मुझेपता तक नहि चलने दिया.
निशा – आप् आँ गये…अब मुझेकोई दुख नहि हैं। जौ आप् हमारे लिएकर रहे हें। उसका एहसान केसे चुका पाएँगे हम् लोग?
मे – एक् थप्पड़ लगाऊंगा अगर एहसान कि बात कि तौ। क्याँ मुझे अपने सें अलग समझती होँ?? राम भैया तौ कितना भाग दौड़कर रहे हें। तौ क्याँ वोँ कोई एहसान कररहे हें किसी पऱ??
निशा रुआंसी सि होकर बोलीं – सॉरी जानू। मुझे क्षमा करदो… प्लीज़… मुझेपता नहि थां कि आप् हम् लोगों सें इतना प्रेम करते हें.
मैंने उसकेगाल पर्र अपनीनाक रगड़ते हुएकहा – हम् सभी तुमसे बहोत प्रेम करते हें। ऐसा नहि होता तौ आज राजेश भइयाजेल मे क्यूं होते? क्याँ उन्होंने कोई एहसान किया तुम्हारे ऊपर.यह एक् प्रेम हि तोँ थां। उनका बेहन–भइया वाला प्रेम, औऱ मेरा अपनी जाने बहार वाला.खैर अब तुम् बिल्कुल फिकरमत करो मे सभीकुछ ठीककर दूँगा औऱ उन लोगों कों भि अच्छा सबक सिखा दूँगा, जिन्होंने मेरे अपनों कों इतनेदुख दिए हें। मैंने निशा कों औऱ ज़ोर सें कसतेहुए उसके होंठों पऱ अपने होंठरख दिए। निशा नें अपनी आँखें बंदकर ली थि.
एक् बात करनी थि तुमसे जान! मैंने उसको बोला, तोँ निशा अपनी आँखें खोलकर मेरीओर देखते हुए बोलि.
निशा - क्याँ?
मे – मानलो अगरकल कों तुम्हें यहपता चले, कि मेरे शारीरिक संबंध किसी औऱ केँ संग भि हें तोँ तुम् केसे रिएक्ट करोगी?
निशा मेरे सीने केँ बालों मे अपनी उंगलियाँ घुमाते हुए बोलीं – मुझेसभी पता हैं… सच कहूँ तौ आपने वोँ संबंध अपनीभूख मिटाने केँ लिए नहि बनाए हें। बल्कि उनकी ज़रूरत पूरी करने केँ लिए बनाए हें। मे सहीकह रही हूं नां??
मैंने आश्चर्य सें निशा कों देखते हुए पूछा – तुम्हें केसेपता?
निशा मेरी आँखों मे शरारत सें देखते हुए बोलि – आप् क्याँ समझते हें… भाभी देवर जी हि आपस मे घुल-मिल सकते हें? बहनें नहि? दिदी नें मुझे आपकी सारी बातें बता दि हें… उनका मानना हें कि रिश्तों मे सच्चाई बनाए रखना उनकी मजबूती कि नींव होती हैं। आप् बेफिक्र रहिए, मुझे आपकी पर्सनल लाइफ सें कोई प्राब्लम नहि। बस मुझे मेरे हिस्से कां प्रेम देते रहना.
इतना कहकर निशा नें मेरे निप्पल कों सहला दिया। मे मुँह फाड़े उसकी बातें सुनता रहा.जब निशाचुप हुईँ तौ मैंने उसे अपने सीने सें लगाकर बोला.
मे - ओह…। निशु… इतना भरोसा करती होँ मुझ पर्र। सच मे तुम् दोनों हि बहनें महान होँ। हम् लोग कितने भाग्यशाली हें, जोँ तुम् हमें मिली हौ.
बातों केँ दौरान मे निशा केँ पेट कों सहलारहा थां, जोँ अब धीरे धीरेऊपर कों बढ़ता जारहा थां। निशा भि मेरी छाती औऱ गले पर्र सहलारही थि। फिन जैसे हि मेरेहाथ उसके सुडौल गठीले बूब्स पर्र पहुँचे, उसनेझट सें मेरे हाथों कों रोक दिया। औऱ एक् नशीली मुस्कान केँ संग बोलीं.
निशा - अंकुश एक् रिक्वेस्ट हैं, अगर मानो तोँ?
मे निशा कि तरफ सवालिया नज़रों सें देखने लगा तोँ वोँ बोलि.
निशा – अब इतनेदिन प्रतीक्षा किया हैं, तौ कुछदिन औऱ सही। मे बदन कि सारी ज़रूरतों कां अनुभव उसरात कों हि पाना चाहती हूं.
निशा कि मासूमियत भरीबात सुनकर मुझे उसपर इतना प्रेम उमड़ा कि मैंने उसे कसकर अपने आलिंगन मे भर लिया, औऱ एक् प्रेम भरा चुंबन लेकरकहा.
मे – अपनी जानेमन कि हर ख़्वाहिश कां सम्मान करना मेरा फ़र्ज़ हैं.
यह कहकर मैंने निशा कों अपनीगोद सें उतारते हुएकहा.
मे – निशाअब तुम् जाओ औऱ जाकर निश्चिंत होकरसो जाओ.बस दोदिन औऱ, उसकेबाद अब हम् एक् दूसरे केँ संग विवाह केँ बंधन मे बंधने केँ बाद हि मिलेंगे.
आज राजेश भइया कि बेल कि सुनवाई थि। जस्टिस ढींगरा केँ कोर्ट नें नोटिस जारीकर केँ पुलिस औऱ दोनों पक्षों कों बता दिया थां। पुलिस औऱ ठाकुर कों अचानक सें इतनी जल्दडेट मिलने कि अपेक्षा नहि थि। मगर कोर्ट केँ आदेश कों टालना किसी केँ बस मे नहि थां। तोँ उन्हें राजेश कों कोर्ट मे हाज़िर करना हि पड़ा। सरकारी वकील नें वही रटी-रटाई दलीलें पेश कि जौ पहले हि पुलिस नें देरखी थि। मैंने अपना वकालत नामा कोर्ट केँ सामने पेश करतेहुए अपने आप् कों राजेश कां वकील केँ तौर पर्र परिचय दिया। मेरी उम्र देखकर सरकारी वकील केँ चेहरे पऱ उपेक्षित सि स्माइल आँ गयीँ,। मैंने सरकारी वकील सें प्रश्न पूछने केँ उद्देश्य सें कहा.
मे – मी लॉर्ड, मे सरकारी वकील सें कुछ प्रश्न करना चाहूँगा.
जज साहब कि परमिशन ग्रांट होते हि मैंने पूछा - आपकेपास ऐसाकोई सबूत हैं जोँ यह साबित करसके कि भानु प्रताप कों चाकू मेरे मुवक्किल राजेश नें हि मारा थां.
सरकारी वकील – यह कैसा प्रश्न हें मी लॉर्ड?? जबकि पुलिस रिपोर्ट मे साफ-साफ लिखा हैं, अभि इस प्रश्न कां कोई मतलब नहि हैं मी लॉर्ड.
मे – मी लॉर्ड, रिपोर्ट मे कहींयह नहि लिखा हैं कि राजेश नें चाकू सें भानु प्रताप पर्र वार किया थां.
सरकारी वकील – मी लॉर्ड, मौका-ए-वारदात पऱ अपराधी कि बेहन, निशा, मौजूद थि औऱ भानु प्रताप कि पत्नि, शिखा, नें उन्हें घायल अवस्था मे पाया.तभी तोँ शिखा नें हंगामा मचाकर लोगों कों इकट्ठा किया.
मे – मी लॉर्ड, मे सरकारी वकील कि बात सें इत्तेफ़ाक़ रखता हूं, चश्मदीद केँ तौर पऱ सिर्फ मेरे मुवक्किल कि बेहन, निशा, हि मौजूद थि। मगर निशा नें अपने बयान मे यह कहीं नहि कहा हैं कि राजेश नें हि भानु प्रताप पऱ वार किया थां। यह भि तौ होँ सकता हैं कि चाकू सें भानु नें मेरे मुवक्किल, राजेश, पऱ वार किया हौ औऱ उन्होंने सिर्फ़ अपना बचाव किया होँ, जैसा कि मिस निशा अपने बयान मे कह चुकी हें। इसी हाथापाई मे भानु कां चाकू स्वयं उसकेपेट मे घुस गय़ा हौ.
सरकारी वकील – मी लॉर्ड, मेरे फाज़िल मित्र अब एक् नई किस्सा बनाने कि कोशिश कररहे हें। मगर वोँ शायदयह नहि जानते कि अदालत केँ फ़ैसले कहानियों सें नहि सबूतों केँ आधार पऱ दिए जाते हें.
मैंने जल्दी कहा - मे भि यही कहना चाहता हूं मी लॉर्ड। पुलिस द्वारा बनाई गयीँ, कथा कों सच साबित करने केँ लिएकुछ सबूतों कि ज़रूरत पड़ेगी। जोँ मुझे अभि तक देखने कों नहि मिले.अतः मे कोर्ट कां ध्यान उन्हीं सबूतों कि तरफ लें जानां चाहता हूं। इसलिये अब मे कोर्ट सें दरखास्त करूँगा कि उस दौरान कि मेडिकल रिपोर्ट, मौका-ए-वारदात पर्र लिएगये फोटो औऱ चाकू पर्र मिले फिंगर प्रिंट अदालत मे पेशकिए जाएँ.
मेरीबात सुनकर कोर्ट रूम मे ख़ुसर-पुसर होनेलगी.
जज साहब नें ऑर्डर… ऑर्डर… बोलकर सभी कों शांत किया औऱ सरकारी वकील सें बोला – यस मिस्टर… सरकारी वकील, यह सारे सबूत अभि तक कोर्ट मे पेश क्यूं नहि हुए? अभि इसीसमय यह सारे सबूत अदालत मे पेशकिए जाएँ.
सरकारी वकील नें पुलिस इंस्पेक्टर कि तरफ देखा, तोँ वोँ बगलें झाँकने लगा। आख़िरकार कोई जवाब नहि मिला तौ वोँ बोला.
सरकारी वकील – मी लॉर्ड, दुर्भाग्य वश। पुलिस उस वक़्त चाकू सें फिंगर प्रिंट तोँ नहि लें पाई.मगर यहकुछ मौका-ए-वारदात केँ फोटो औऱ मेडिकल रिपोर्ट हैं.
जिसे सरकारी वकील नें जज केँ सामने पेशकर दिया। मैंने जज साहब सें वोँ दोनों चीज़ देखने केँ रिक्वेस्ट कि तोँ उन्होंने अपने अरदली केँ हाथों मुझ तक भिजवाई। मैंने वोँ रिपोर्ट औऱ फोटो कों गौर सें देखा.उसे देखकर मेरे चेहरे पऱ एक् विजयी मुस्कान आँ गई,। मैंने फोटो सें नज़र हटाकर जज साहब सें कहा.
मे - मी लॉर्ड, कैसी हास्यास्पद बात हैं… हम् यहा एक् संगीन जुर्म, अटेंप्ट तोँ मर्डर केँ ऊपरबहस कररहे हें। जिसमें एक् आदमी केँ दोषी याँ निर्दोष साबित होने पऱ उसकी पूरी जीवन निर्भर करती हैं। इतना संगीन जुर्म होने केँ बावजूद भि, पर्याप्त सबूत इकट्ठे करने चाहिए थें। वोँ भि पुलिस द्वारा नहि किएगये। इस्तेमाल मे लिएगये वेपन सें फिंगर प्रिंट नहि लिएगये। इसको आप् क्याँ कहेंगे? पुलिस कि काम करने कि क्षमता याँ उदासीनता याँ फरीक सें मिलीभगत??? ऐसा लगता हैं, जैसे सारी बातों कों दरकिनार करतेहुए, पुलिस कां ध्यान सिर्फ़ मेरे मुवक्किल कों सज़ा दिलाना हि थां.
मेरीबात सुनकर सरकारी वकील औऱ पुलिस इंस्पेक्टर नज़रें चुराने लगे। अपनी झेंप मिटाने केँ लिए वोँ जज साहब सें बोला – ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड, मेरे काबिल साथी बिनावजह पुलिस कि वाहन गुजारी पर्र शक़कर रहे हें.
जज साहब कों मेरी दलीलसही लगी, इसलिये उन्होंने कहा – ऑब्जेक्शन ओवर-रूल्ड.
सरकारी वकील, खिसियानी शकल लेकर अपनीसीट पर्र बैठ गय़ा.
मैंने आगेकहा - खैरमी लॉर्ड, अब जौ बात हुईँ हि नहि उस विषय पर्र मे वक्त बरबाद नहि करूँगा, पर्र जोँ मौजूद हैं उसी सें मे कोर्ट कां ध्यान इस फोटो पऱ आकर्षित करना चाहता हूं.
फिन मैंने उस फोटो कों एक् प्रोजेक्टर केँ जरिए कोर्ट रूम कि बड़ी सि स्क्रीन पर्र लगाया जिससे वहा मौजूद सबलोग देख सकें.
मे - मी लॉर्ड, गौर कीजिए, भानु केँ पेट मे जोँ चाकू घुसाहुआ हैं। उसका डाइरेक्शन ऊपर सें नीचे कि तरफ हैं। जबकि आमतौर पर्र जबकोई सामने सें वार करता हैं तौ वोँ कभी भि ऊपर सें पेट पऱ वार नहि कर सकता.पेट पऱ वार वोँ अपने सामने सें हि कर पाएगा, औऱ उस स्थिति मे चाकू याँ औऱ कोई हथियार एक्सैक्ट्ली हॉरिजॉन्टल स्थिति मे हि हौ सकता हैं। क्याँ मेरे काबिल यार नें कभी किसी पर्र इसतरह सें वार किया हैं?
मेरीबात सुनकर दर्शक दीर्घा मे हँसीफैल गई, औऱ सरकारी वकील झेंपकर रह गय़ा.
मैंने अपनीबात कों जारी रखतेहुए कहा - इससेसाफ जाहिर होता हैं मी लॉर्ड, कि वार सामने सें नहि बल्कि घायल कि स्वयं कि बॉडी कि तरफ सें यानीऊपर सें हुआ हैं। जोँ एक् हि सूरत मे संभव हैं, कि घायल केँ स्वयं केँ हाथ मे वोँ वेपनरहा होगा औऱ सामने वाले आदमी नें उसकी कलाई थामकर अपना बचाव किया हौ। उसी कशमकश मे भानु कां हाथ नीचेआया होगा औऱ स्वयं कों घायलकर लिया.
मेरी दलील सुनकर सरकारी वकील औऱ इंस्पेक्टर केँ तोतेउड़ गये। वहीं पब्लिक दीर्घा मे तालियाँ बजनेलगी.
मैंने आगेकहा – मी लॉर्ड, रिपोर्ट मे किसी भि चश्मदीद केँ बयान मे यह नहि हैं कि चाकू किसने मारा, सिवाय भानु केँ। भानु अभि भि घायल होने कां नाटककर केँ हॉस्पिटल मे पड़ा हैं। जिससे मेरे मुवक्किल कों बेल नां मिलसके.
सरकारी वकील – यह आप् किस बिना पऱ कह सकते हें कि वोँ घायल नहि हैं औऱ नाटककर रहा हैं?
अब मैंने फाइनल हथौड़ा मारते हुएकहा - यह मे नहि कहरहा हूं मी लॉर्ड, यहउस हॉस्पिटल कि रिपोर्ट बतारही हैं.
फिन मैंने डॉक्टर। वीना सें प्राप्त कि हुइ रिपोर्ट कों हवा मे झूलते हुएकहा – इस रिपोर्ट केँ मुताबिक। भानु घटना केँ 15 दिनबाद हि पूरीतरह सें ठीक होँ चुका थां औऱ वैसे भि इस फोटो मे चाकू कि स्थिति साफ-साफ बतारही हैं, कि जख्म ज्यादा गहरा नहि होना चाहिए.
मैंने वोँ फिटनेस रिपोर्ट कोर्ट कों सममित कर दि.
मैंने फिनकहा – मी लॉर्ड, इसकेस मे पुलिस कि मिलीभगत साफ-2 दिखाई देरही हैं। क्योंकि जौ एविडेंस इकट्ठा करने चाहिए थें, वोँ कोर्ट कों नहि दिएगये। औऱ वहीं फरीक औऱ पुलिस नें मिलकर मेरे मुवक्किल कों चीटकर केँ उसकी जीवन केँ संग खिलवाड़ किया हैं। कोई भि भइया अपनी बेहन कि इज़्ज़त कि रक्षा केँ लिए जौ कर सकता हैं मेरे मुवक्किल नें वही किया। मेरी नज़र मे अपराधी राजेश नहि भानु हैं। अतः। मेरी कोर्ट सें दरखास्त हैं, कि मेरे मुवक्किल कों जल्दी सें जल्दी बेल देकर जमानत पऱ रिहा कियाजाए औऱ पुलिस केँ खिलाफ मेरे मुवक्किल केँ संग जानबूझकर नाइंसाफी करने केँ कारणमान हानि कां केस दर्ज कियाजाए जिसकी वजह सें याँ मे तौ कहूँगा, भानु कां संग देने केँ कारण मेरे मुवक्किल कों इतने महीने जैल मे काटने पड़े.
कोर्ट रूम मे कुछदेर सन्नाटा पसरारहा। जस्टिस ढींगरा कुछ लिखते रहेफिन उन्होंने राजेश कों बेल पऱ रिहा करने कां आदेश पारित कर दिया औऱ पुलिस कों आगे केँ लिए उचित सबूत मुहैया करने कि हिदायत दि.
मेरे औऱ निशा केँ घरवालों केँ चेहरे खुशी सें चमकरहे थें, खुशी सें सबकी आँखें छलकआईं। कोर्ट रूम सें बाहर् आकर सबने मुझेगले सें लगाकर आशीर्वाद दिया.
पिताजी मेरी पहली कामयाबी सें बहोत खुश थें। मुझे अपनेगले लगाकर बोले – तूने मेरी ज़िम्मेदारियों कों आज पूराकर दिया। मुझे नहि पता थां, मेरा बेटा इतना काबिल हैं.
राम भैया नें भि मेरी बहोत तारीफ़ कि। मोहिनी भाभी कि खुशी कि तौ कोई सीमा हि नहि थि। उन्होंने अपनी बरसती आँखों सें मेरे माथे कों चूमकर अपना प्रेम जताया। राजेश औऱ उनके माँ-बाप कि आँखों मे मेरे प्रति कृतज्ञता केँ भाव साफ-साफ दिखाई देरहे थें। फिन खुशी–2 हम् सभी अपनेघऱ कि ओरलौट लिए.
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UPDATE 30
आज हमारे घऱ पर्र भाभी केँ माँ-बाप औऱ राजेश सहितसब लोग मौजूद थें, इसी मौके पर्र बापू नें जिक्र चलाते हुएकहा.
बापू - समधीजी, अंकुश केँ आने केँ बाद हमने उससे विवाह कि बात चलाई थि। तोँ उसनेकहा थां कि निशा कां भइयाजब तक अपनी बेहन कों विदा नहि करेगा वोँ विवाह नहि करेगा। अब राजेश कों जेल सें बाहर् निकाल कर उसने तोँ अपना वादा पूराकर दिया हैं, तोँ अब क्यूं नां हम् भि अपना वादा पूराकर दें.
निशा केँ बापू – समधी साहब, इसकेलिए हमेंपूछ कर आप् शर्मिंदा मत करिए। निशाअब आपकी बेटी, बहू जौ भि आप् समझें आपकी अमानत हैं। आप् जब, जिस तरह सें आदेश देंगे हम् दोनों उसका कन्यादान कर देंगे.
पिताजी – तौ फिनशुभ काम मे देरी नहि करनी चाहिए। क्यूं नां आज हि पंडितजी कों बुलाकर शुभ मुहूर्त निकलवा लियाजाए.
निशा केँ पिताजी –बहोत हि नेक विचार हैं आपका.
तभी मोहिनी भाभी नें निशा कि तरफ देखते हुएकहा - मगर पिताजी, निशा कि शक्लदेख कर तोँ लगता नहि कि यहइस विवाह सें खुश हैं.
मोहिनी भाभी केँ मुँह सें यह शब्द सुनते हि, निशा जल्दी बोल पड़ी – नहि। नहि। दिदी, मे बहोत खुश हूं.
उसकीबात सुनते हि सब ठहाके लगाकर हँसने लगे। निशा बेचारी बुरीतरह झेंप गयीँ, औऱ भागकर कमरे मे चली गई,.
मुस्कराते हुए मोहिनी भाभी नें मुझे इशारा किया, तौ मे वहा सें उठकर निशा केँ पीछे-2चला गय़ा। निशा दरवाजे कि तरफपीठ कर केँ खड़ी थरथर काँपरही थि। मैंने पीछे सें उसे बाँहों मे भर लिया, निशा औऱ ज्यादा काँपने लगी.फिन मैंने जैसे हि अपने तपते होंठ उसकी गर्दन पर्र रखे। निशा बुरीतरह सें सिहरकर पलटी औऱ मेरेबदन सें लिपट गई,। निशा नें अपना चेहरा मेरे सीने मे छुपा लिया। मैंने बड़े प्रेम सें निशा केँ चेहरे कों उठाया, वोँ पलकें झुकाए खड़ीरही.
जब मैंने निशा केँ कान कि लौ कों चूमते हुए हौले सें कहा – निशा क्याँ तुम् सच मे इस विवाह सें खुश नहि हौ.
निशा नें झट सें अपनी पलकें खोल दि औऱ मेरे होंठों कों चूम लिया.फिन मेरी आँखों मे झाँककर बोलि – अंकुश तुम् मुझे अपने काबिल समझते होँ?
मैंने शरारत सें कहा – अगर तुम् खुश होँ तोँ मे भि कामचला लूँगा, वैसे इतनी शर्मीली लड़की कों झेलना थोडा मुश्किल तौ होगा.
निशा मुझसे बुरीतरह सें लिपट गयीँ, औऱ मेरे चेहरे कों अपने चुंबनों सें भर दिया औऱ उसी एक्साइटमेंट मे बोलीं – थैंकयू अंकुश, तुम् बहोत अच्छे होँ। अब किसी नें तुमको मुझसे छीनने कि कोशिश भि कि तौ मे उसकाखून कर दूँगी…
मे – अच्छा, सबके सामने तौ भीगी बिल्ली बन जाती होँ औऱ यहा बड़ी शेरनी बनरही होँ। अबचलो बाहर् सबकेसंग बैठते हें। देखें तोँ सही क्याँ बातें हौ रही हें??
यह कहकर हम् बाहर् आँ गये। मुझे देखते हि बापू नें पंडित जी कों बुलाने केँ लिएकहा। मे खुश होताहुआ पंडित जी केँ घऱ पहुंचा। वोँ मुझे अपनेघऱ केँ बाहर् हि मिलगये। मैंने उन्हें पिताजी केँ पास भेजा औऱ स्वयं उनकेघऱ केँ अंदरचला गय़ा.
अंदर उनकीबहू, वर्षा, अपने बच्चे केँ संगखेल रही थि, जौ अब बड़ा होँ गय़ा थां। मुझे देखते हि वर्षा मेरेगले सें लिपट गयीँ, औऱ अपने बेटे सें बोलि – पिंटू… बेटा देख तेरे बापूआए हें। चल इनके पाँव छूकर आशीर्वाद लें.
बच्चा बड़ा आज्ञाकारी थां, उसने फ़ौरन मेरेपेर छुए। मैंने उसेगोद मे उठा लिया औऱ उसकेगाल पऱ किसकर केँ प्रेम करनेलगा.
मे – वर्षा, कितना प्यारा बच्चा हैं तुम्हारा। बड़ा होकर एकदम हीरो लगेगा.
वर्षा – खून तौ आपका हि हैं नां, गौर सें देखो। बिल्कुल आपका दूसरा रूप लगता हैं.
मैंने उसका माथा चूमकर कहा – कोईशक़ तोँ नहि करता कि यहऐसा क्यूं दिखता हैं?
वर्षा – करनेदो मुझे किसी कां डर नहि हैं। इसके दादाजी- दादीमा औऱ वोँ सो कॉल्ड बाप तौ घऱ मे बच्चे केँ होने सें हि खुश हें। बाहर् वालों कि परवाह कौन करता हैं। आप् सुनाओ, बड़े दिनों बाद दिखाई दिए हौ। कहां थें अब तक??
फिन मैंने उसे सारी बातें कही औऱ बोला – मेरी विवाह होँ रही हैं। आओगी नां??
वर्षा खुश होतेहुए बोलि। अच्छा! कब? किसके संग??
मे – मेरी भाभी कि बेहन निशा केँ संग। पंडित जी कों इसलिये बुलाया हैं पिताजी नें, तारीख पक्का करने केँ लिए.
वर्षा – यह तौ बड़ी खुशी कि बात बताई हैं तुमने, सच मे निशा बहोत खुश भाग्य हैं, जिसे तुम्हारे जैसा पूर्ण पुरुष जिंदगी दोस्त केँ रूप मे मिलरहा हैं। चाहेकोई कुछ भि कहे मे तौ तुम्हारी विवाह मे खूब नाचूंगी। मगर अंकुश मुझे तुम्हारी बहोत यादआती हैं। क्याँ तुम्हें कभी मेरीयाद नहि आई?
मे – आती तोँ हैं वर्षा, पर्र पढ़ाई भि तौ ज़रूरी थि। अब शायद मे यहीं रहूँगा। तौ कभी-2 चान्स मिल सकता हैं.
वर्षा – अभि मारलो नां चान्स। जल्द सें… वैसे इसकी दादीमा पड़ोस मे हि गयीँ, हैं। आती हि होगी.तब तक??
मे – नहि ऐसे नहि। कभी फुर्सत सें…। चिंता मतकरो। मौका मिलेगा.
वर्षा केँ होंठों कों चूमकर मे वहा सें निकलआया। वहा सें सीधा छोटी चाची केँ घऱ पहुंचा। चाची किसीकाम मे लगी थि। उनका बेटा वहीं आँगन मे खेलरहा थां.
मैंने उसेकहा - अरेअंश बेटा… मां कहां हें?
अंश मुझे देखते हि चिल्लाया – माँ… देखोकोई आया हैं.
उसकी आवाज़ सुनकर चाची बाहर् आई औऱ मुझे देखते हि दौड़कर मेरे सीने सें लिपट गयीँ,। फिन अपने बेटे सें बोलि - अंश बेटा इनके पाँव तोँ छूओ.यह तुम्हारे बड़े भइया हें। रुचि केँ पिताजी कि तरह.
अंश नें भि मेरे पांवछुए। मैंने उसेगोद मे उठा लिया औऱ गालचूम करउसे प्रेम करनेलगा। फिन चाची केँ कान मे कहा - सिर्फ़ भइया??
छोटी चाची शरमाकर बोलि – बापू भि… मगर इसको नहि बता सकती नाँ!
फिन मेराहाथ अपनेहाथ मे लेकर बोलि – अंकुश, बहोत यादआती हैं तुम्हारी। कितनी हि रातें तुम्हें याद कर-कर केँ काटी हें मैंने। इस जिस्म कों तोँ जैसे तुम्हारी हि आदतलग गयीँ, थि.
मे – अब क्याँ करूँ चाची। मुझे भि तोँ अपना भविष्य बनाना थां.
छोटी चाची – हां, सच कहा तुमने, यहा देखो क्याँ मुसीबत आन पड़ी हैं। बेचारे राम औऱ मोहिनी अपने भइया कों लेकर कितने परेशान हें.
मे – अब सारी तकलीफ़ दूर होँ गई, चाची। राजेश घऱ आँ गय़ा हैं। कभी बाहर् निकलकर भि देख लियाकरो.
छोटी चाची – क्याँ कहरहे होँ! सच मे!! कहां हैं वोँ??
मे – हमारे घऱ पर्र हि हें सभीलोग। निशा केँ मां-बापू भि आएहुए हें.
फिन बातों–2 मे मैंने अपनी औऱ निशा कि विवाह कि बात बताई तौ छोटी चाची एकदम सें भड़क गयीँ, औऱ अपने बेटे औऱ मुझेसंग लेकर हमारे घऱ कि तरफलपक ली.घऱ मे घुसते हि छोटी चाची पांव पटकते हुए बोलीं.
छोटी चाची – जेठ जी आपने हमें बिल्कुल हि पराया कर दिया? इतनी बड़ी खुशी औऱ हमें बताया तक नहि.
राम भैया – अरे चाची… अभि खुशी केँ लिए बैठे हि हें। अभि कुछतय नहि हुआ.बहू तौ आपने देखी हि हैं। बताइए आपकी क्याँ ख़्वाहिश हैं?? वोँ भि रख देते हें इनके सामने.
छोटी चाची – राम मेरी क्याँ ख़्वाहिश होगी.इस घऱ कि खुशी सें बढ़कर मेरी औऱ कोई ख़्वाहिश नहि हैं। मे तोँ बस इतनाकह रही थि। कि हमें भि इस खुशी मे शामिल कर लेते तौ मुझे अच्छा लगता.
मोहिनी भाभी – सॉरी चाची… हम् आपकोखबर करने हि वाले थें। अंकुश केँ आने केँ बादउसे आपकेपास हि भेजते, पर्र वोँ देखो हमारे कहने सें पहले हि आपको लें आए.अब बताइए क्याँ ग़लतहुआ.
छोटी चाची चुपरह गयीँ,। फिन बापू नें कहा.
बापू - अंकुश बेटा, जा अपने दोनों चाचा–चाची कों भि खबरकर दे.सभी मिलबैठ करबात करते हें। वरना रश्मि कि तरह वोँ लोग भि नाराज़ होंगे.
चाची – जेठ जी, मे तौ बस…ऐसे हि.
पिताजी – मे जानता हूं रश्मि। तुम् हम् लोगों सें कितना हित रखती हौ। इसलिये तुमने अपनाहक़ जताया हैं। हम् सच मे माफी माँगते हें तुमसे कि हमने पहले तुम्हें नहि बुलाया.
इतने मे औऱ लोग भि आँ गये औऱ सबके सामने मेरी विवाह कि बाततय हुई। मेरे कहने पर्र विवाह कों बड़े सादगी ढंग सें करने कां निर्णय लिया गय़ा। कोई ज्यादा हंगामा-शराबा याँ शोर नहि करना थां। बस अपने घरवालों कि मौजूदगी मे हि सात फेरे लेने थें औऱ सबका आशीर्वाद लेकर अपनाघऱ संसार बसा लेना थां.
बाकी लोगों कि मंशा थि कि सारे रिश्ते-नाते कों बुलाया जाए.मगर मैंने मनाकर दिया। जिसेराम भैया औऱ मोहिनी भाभी नें भि उचित ठहराया। इसके पीछे मेराआगे कां मक़सद जुड़ा हुआ थां। किसी औऱ सगे संबंधी कों नाँ बुलाना पड़े, इस वजह सें हमनेरमा दिदी कों भि खबर नहि कि, वरना चाचा कि बेटियों कों भि बुलाना पड़ता। मे नहि चाहता थां कि मेरी विवाह कि बात ज़्यादा लोगों कों पतालगे.
एक् दिनसब घऱ परिवार कि मौजूदगी मे हम् दोनों एक् होँ गये। हमने गाँव केँ अन्य लोगों कों भि शामिल नहि किया थां। आज निशा मेरी थि औऱ मे निशा कां थां। दोनों नें बंधन मे बँधने केँ बादसब बड़ों कां आशीर्वाद लिया। मोहिनी भाभी केँ पेर लगतेहुए मे उनकेकान मे फुसफुसाया.
मे – भाभी … आख़िर तोता–मैना एक् होँ हि गये.
मोहिनी भाभी नें मुस्करा कर आशीर्वाद देतेहुए कहा - यह जोड़ी सदायूँ हि बनीरहे। भगवान सें बसयही प्रार्थना हैं मेरी.आज मेरी तपस्या कां फल मुझेमिल गय़ा हैं। फिन वोँ आँसुओं भरे चेहरे कों ऊपरउठा कर बोलीं – मां जी मेरी ज़िम्मेदारियों मे कोईकमी रह गई, हौ तोँ अपनी बेटी समझकर मुझे क्षमा कर देना.
पिताजी भि अपनी भावनाओं कों काबू मे नहि रखपाए, रोतेहुए उन्होंने मोहिनी भाभी कों अपनेगले सें लगा लिया औऱ रुँधे स्वर मे बोले.
पिताजी - नहि मेरी बच्ची, तूने अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी श्रद्धा औऱ लगान सें निभाईं हें। शायद इतनी अच्छी तरह सें विमला भि नां निभा पाती.
यह देखकर वहा मौजूद सब कि आँखें भि नम हौ गई,। सारे रीति-रिवाजों कों संपन्न करने केँ बाद, निशा केँ मां पिताजी औऱ राम भैया कुछ घंटेरुक कर दोपहर ढलते हि अपनेघऱ लौटगये.
मोहिनी भाभी नें मुझेकहा – अंकुश, आज तुम् दोनों केँ मिलन कि पहलीरात हैं, तौ शगुन केँ तौर पऱ निशा कों ऐसाकुछ देना जौ उसे मनपसंद आए.
मैंने कहा – सभीतरह केँ गहने-जेवर तौ आपने निशा कों दे हि दिए हें। अब मे ऐसा क्याँ दूँ?? आप् हि कुछबता दो.
मोहिनी भाभी – एक् लड़की गहने-जेवर सें बढ़कर अपने पति द्वारा प्रेम सें दियाहुआ तोहफा अधिक मनपसंद करती हैं। तौ अंकुश जोँ भि तुम्हें मनपसंद होँ वोँ दे देना.
मे सोच मे पड़ गय़ा। मैंने कभी अपनी पसन्द-नापसंद केँ बारे मे सोचा हि नहि थां। सारी इच्छाएं तौ भाभी हि पूरा करतीआईं थीं। तौ ऐसा क्याँ दूँ, जौ उसे भि पसन्द आए। क्याँ इसके बारे मे निशा कों हि पूछाजाए? मगर वोँ तोँ कहेगी कि उसे औऱ कुछ नहि चाहिए। तौ फिन क्याँ दियाजाए?? फिन मेरे दिमाग़ मे आया। क्यूं नाँ उसेऐसा कुछ दियाजाए जिसकी वजह सें निशाहर वक़्त मेरे लगभग हि रहे तौ मेरे दिमाग़ नें कहा“फोन”। हांयही ठीक रहेगा, एक् स्मार्ट मोबाइल उसे देता हूं, जिससे हम् चाहेपास हों याँ दूर, जब मनकरे, एकदूसरे सें बातकर केँ लगभग हि रह सकते हें। यहसोच कर मैंने कार उठाई औऱ शहर कि तरफचल दिया.शहर जाकर मैंने एक् अच्छी सि कंपनी कां स्मार्ट मोबाइल खरीदा औऱ चल पड़ा अपनेघऱ कि ओर अपने प्रथम मिलन कि कल्पना करतेहुए.
अभि मे शहर सें कोई 10 किमी हि निकला थां कि, बीच रास्ते मे मुझे एक् जीप खड़ी दिखाई दि। सिंगल रोड होने केँ कारण उसके साइड सें बचाकर बाइक निकलने केँ लिए मुझे अपनी स्पीड कुछ अधिक हि कम करनी पड़ी। मे अभि उसजीप केँ बगल सें निकल हि रहा थां कि, जीप मे बैठे लोगों मे सें एक् नें मेरेऊपर हॉकी सें वार किया। हॉकी केँ वार कों तोँ मे झुककर बचा गय़ा, मगर मेरा बैलेंस बिगड़ गय़ा औऱ मे बाइक समेतरोड केँ साइड कों लुढ़कता चला गय़ा। मेरा जिस्म कई स्थान सें छिल गय़ा, जिसमें सें तेजटीस सि उठनेलगी। ख़तरे कां आभास होते हि मेरीसब इंद्रियाँ सजग हौ उठी। मे अपने दर्द कि परवाह किए बगैरउठ खड़ाहुआ.
मगर इससे पहले कि मे ठीक सें खड़ा हौ पता, उनमें सें दो लोगों नें मुझे दोनों तरफ सें मेरे बाजुओं सें जकड़ लिया। वोँ चारलोग थें। दो नें मुझे दोनों बाजुओं सें जकड़ा हुआ थां, एक् अभि भि जीप मे हि बैठारहा, औऱ चौथा व्यक्ति चाकूहाथ मे लिए मेरीओर बढ़ने लगा.
मैंने करीब-करीब चीखते हुएकहा – कौन होँ तुम् लोग, औऱ क्यूं मारना चाहते हौ मुझे?
वोँ चाकू वाला गुर्राया। तेरीवजह सें हमारे मालिक कों बड़ा धक्का लगा हैं। इसलिये अब तुम्हे तोँ मरना हि होगा.
मे – कौन हें तुम्हारा मालिक?
वोँ – यह जानना तेरेलिए ज़रूरी नहि हैं। औऱ वैसे भि मरने केँ बाद तुँ करेगा भि क्याँ जानकर?
मे समझ गय़ा कि यहऐसे बताने वाला नहि हैं। अब मैंने इनसे निपटने कां मन हि मन फ़ैसला कर लिया थां। वोँ मेरेपास आकर मुझसे दोफुट दूररुक गय़ा औऱ अपने चाकू कों संभाल कर वोँ अपनाहाथ पीछे कों लेँ गय़ा। इससे पहले कि वोँ अपना चाकू वालाहाथ, मुझे मारने केँ लिएआगे लता। मैंने अपनी बॉडी कों उन दोनों गुण्डों कि पकड़ केँ सहारे बैलेंस किया औऱ उछलकर अपनेपेर कि किक उसकीनाक पऱ जड़ दि। किक इतनी सटीक औऱ जोरदार थि। कि वोँ अपनी स्थान सें 10 फुटदूर पीछे जाकर गिरा। उसकीनाक बुरीतरह सें फट गयीँ,,। औऱ उसका पूरा चेहरा उसी केँ खून सें लाल होनेलगा। उसके गिरते हि वोँ दोनों कुछ हड़बड़ा गये। औऱ उनकी पकड़कुछ वक़्त केँ लिए ढीलीपड़ गयीँ,, उसी कां फ़ायदा उठाकर मैंने अपने बाजुओं कों ज़ोर सें झटका दिया। औऱ अपने कों उन दोनों कि पकड़ सें आज़ाद कर लिया। वोँ मुझे दोबारा पकड़ने केँ लिए झपटे तोँ मैंने दोकदम पीछेहट कर एक् कि कनपटी पर्र घूँसा जड़ दिया औऱ दूसरे कों एक् लातजमा दि। एक् संगहुए हमले सें वोँ दोनों लड़खड़ा गये। इससे पहले कि वोँ संभल पाते मैंने उन दोनों कि गर्दन अपने बाजुओं मे कसली.
आज मेरी भाभी केँ डिसिप्लिन द्वारा कराई गयीँ, कसरत मेरेकाम आँ रही थि। मेरे बाजुओं कि पकड़ उनकी गर्दन पऱ इतनी मजबूत थि कि उनकेगले कि नसें फूलने लगी, उन्हें अपनी साँस अटकती सि महसूस हौ रही थि., दोनों केँ चेहरे लालपड़ चुके थें.
मैंने दाँत पीसते हुएकहा – कहो। क्यूं मारना चाहते थें मुझे?
इससे पहले कि वोँ कोई जवाबदे पाते.जीप मे बैठा चौथा व्यक्ति रिवाल्वर लहराता हुआ मेरीतरफ आनेलगा.
वोँ चौथा व्यक्ति मेरीतरफ आतेहुए गुर्राया – मे नहि चाहता थां, कि मुझे तेरेखून सें हाथ रंगने पड़ें। यहलोग हि तुम्हे संभाल लेंगे। मगर तुँ तोँ कुछ ज्यादा हि शातिर निकला.
वोँ चाकू वाला जिसकी नाकफट गई, थि। कराहते हुए बोला - अब बातों मे वक़्त बर्बाद मतकरो जग्गा भइया। उड़ादो साले कों, वरनाकोई आँ निकलेगा इधर औऱ सभी गड़बड़ होँ जाएगी.
उसने उसकीबात मानते हुए मुझे निशाना बनाकर गोलीचला दि। उसी क्षण मैंने उनमें सें एक् कों उसके निशाने केँ आगेकर दिया औऱ गोली नें उसका भेजा उड़ा दिया। वोँ रिवाल्वर वाला हक्का-बक्का सां खड़ा अपने मारेहुए मित्र कों देख हि रहा थां कि मैंने दूसरे कों उसकेउपर धकेल दिया औऱ वोँ दोनों एक् दूसरे सें उलझगये। इसी चक्कर मे उसकी रिवाल्वर कां लीवरफिन सें दब गय़ा औऱ गोलीउस दूसरे व्यक्ति केँ पेट मे घुस गयीँ, औऱ वोँ भि ज़मीन पऱ पड़ा तड़फड़ाने लगा.
अपने दो-दो साथियों कां हश्रदेख कर वोँ बुरीतरह भिन्ना गय़ा। अपनी हि गोली सें घायल मित्र जौ करीब-करीब आखिरी साँसें गिनरहा थां, उस कों एक् तरफ धकेला, औऱ गुस्से सें भन्नाते हुए एक् बारफिन मेरीतरफ पलटा.मगर तब तक मे उसकेसर पऱ पहुँच चुका थां औऱ उसकी रिवाल्वर वाली कलाईथाम ली। उसकी कलाई पर्र मेरेहाथ कि मजबूत पकड़ केँ आगे उसकी एक् नाँ चली। औऱ उसकी कलाई कों मोड़कर रिवाल्वर कि नाल उसकी कनपटी कि तरफकर दि.
मे गुर्राया – अबचला गोली हरामी। फिन सें मे उसकेकान केँ पास इतनी ज़ोर सें चिल्लाया। चला… नां… डर केँ मारे उसकी उंगली ट्रिग्गर पऱ दब गयीँ, औऱ रिवाल्वर कि गोली नें उसकेसर केँ परखच्चे उड़ादिए.
अब रिवाल्वर मेरेहाथ मे थां। वोँ फटीनाक वाला अपनेखून सें सने सुर्ख चेहरे कों लिए, सूखे पत्ते कि तरह काँपते हुए मुझेऐसे देखरहा थां मानो उसके सामने कोई इंसान नहि, भूत खड़ा हौ.
वोँ बुरीतरह मिमियाते हुए बोला – म…म… मुझे छोड़दो…
मैंने गुर्राते हुए प्रश्न किया – तोँ फिनबता किसने भेजा हैं तुम् लोगों कों?
वोँ… वोँ। भानु प्रताप नें….
मैंने फिन प्रश्न किया - इस वक्त कहां मिलेगा वोँ?
वोँ – यह मुझे नहि पता। प्लीज़ मुझे छोड़दो, मे तुम्हारे पाँव पड़ता हूं.
यह कहतेहुए वोँ सचमुच मेरे पैरों मे लेट गय़ा। मैंने उसे जीवित छोड़ना हि उचित समझा। जिससे वोँ उस हरामी केँ पिल्ले कों जाकरसभी कुछबता सके। रिवाल्वर अपनी बेल्ट मे खोंसा, बाइक उठाई औऱ किकमार कर बुलेट घऱ कि ओर दौड़ा दि.
घऱ पहुँचते–2 मुझे अंधेरा होँ चुका थां। मेरे ज़मीन पऱ घिसटने सें कपड़े स्थान-2 सें फटगये थें औऱ जिस्म पर्र भि कई स्थान खरोंच आँ गई, थि। मैंने उन गुण्डों कि रिवाल्वर कों बुलेट कि डिगी मे डाला औऱ घऱ केँ अंदरचला गय़ा.
मे जैसे हि घऱ मे कदमरखा। मेरी हालतदेख करराम भैया औऱ मोहिनी भाभीलपक कर मेरेपास आए औऱ तरह–तरह केँ सवालों कि झड़ीलगा दि.
मैंने उन्हें कहा - घबराने कि कोई ज़रूरत नहि हैं। अंधेरे मे बाइक एक् मार्ग पऱ पड़े पत्थर सें स्लिप होँ गयीँ, थि औऱ मे गिर गय़ा थां.
राम भैया नें डाँटते हुएकहा – मगर तूँ गय़ा हि क्यूं थां शहर??आज हि विवाह हुईँ हैं, औऱ चला गय़ा बिना किसी कों बताए.अब इतना बड़ा हौ गय़ा हैं, कि किसी सें कुछ पूछने कि भि ज़रूरत नहि समझता?? राजेश केँ केस केँ बाद हमारे दुश्मन भि पैदा हौ गये हें, कहीं भि कोई भि कुछ भि करवा सकता हैं। कोई ज़रूरी काम थां, तौ सोनू कों संग लें जा सकता थां.
मैंने मोहिनी भाभी कि तरफ देखा, जौ एकदम भावशून्य खड़ी हमेंदेख सुनरही थि.
मैंने अपनी नज़र नीचीकर केँ कहा – सॉरी भैया, ग़लती हौ गयीँ,, एक् ज़रूरी काम थां उसे निपटाने गय़ा थां। वैसे मोहिनी भाभी कों पता हैं.
मोहिनी भाभी कां नामआते हि भैया कां क्रोध छूमंतर होँ गय़ा, औऱ प्रेम सें दुलारते हुए बोले - तुझेही कुछ हौ जाता तौ?
मैंने राम भैया सें कहा – मुझेकुछ नहि होगा भैया, आप् चिंता नाँ करो, थोड़ी बहोत खरोंच हैं। जल्द हि ठीक होँ जाएगी.
मोहिनी भाभी – अबयहा खड़ेमत रहो, जल्द सें फ्रेश होकर कपड़े चेंजकरो औऱ अपने कमरे मे जाकर निशा सें दवा लगवालो.
मे बाथरूम मे जाकर फ्रेश हुआ। कपड़े उतारकर वहीं बाथरूम मे फेंके औऱ एक् तौलिया लपेटकर अपने कमरे मे पहुंचा। जहाँ निशानई दुल्हन केँ लिबास मे बैठी मेरा प्रतीक्षा कररही थि। मुझे तौलिए मे देखकर औऱ मेरे शरीर पऱ खरोंच केँ निशान देखकर वोँ प्यास उठी, दौड़कर मेरेपास आई औऱ जैसे बाहर् सवालों कि झड़ीलगी थि, वही उसने भि रिपिट कर दिये। मैंने उसे भि वही जवाब दिया जोँ भैया भाभी कों दिया थां.
निशा प्यास कर बोलि – मे तुम्हारे लिए कितनी बड़ी अशुभ हूं, मेरे तुम्हारी जीवन मे कदम रखते हि मुसीबतों कि शुरुआत होँ गई,.
मैंने प्रेम सें निशा केँ गाल पऱ एक् थपकी दि औऱ कहा – यह क्याँ फालतू बकवास कररही हौ तुम्? अब जोँ कहासो कहा, आइन्दा ऐसीबात भि कि तौ समझ लेनाकभी बात नहि करूँगा तुमसे। नां जाने क्याँ-क्याँ अनाप-शनाप बोलती रहती होँ। रास्ते मे वोँ पत्थर तुमने रखा थां क्याँ? जोँ होना थां सो हौ गय़ा, ऐसी बातों केँ लिए अपने आप् कों दोषकभी मत देना.
निशा सुबकते हुए मेरे सीने सें लिपट गयीँ,। मैंने उसके कंधे पकड़कर अपने सें अलग किया औऱ बोला – अबचलो, मोहिनी भाभी नें कहा हैं कि थोड़ा अपने पति कि सेवा करनी चाहिए, तौ बाहर् सें दवा लाकर मेरे खरोंचों पर्र लगाओ.
मेरीबात सुनकर निशा गर्दन झुकाए बाहर् चली गई,। मोहिनी भाभी सें दवा लेने। मुझे बहोत अधिकचोट नहि थि, बस हल्की सि खरोच हि थि। निशाजब अपनेनरम-2 हाथों सें मेरे शरीर पऱ दवालगा रही थि तोँ मुझे उसके जिस्म सें उठती खुशबु मदहोश करनेलगी औऱ मैंने उसे अपनी बाँहों मे जकड़कर उसके होंठों कों चूम लिया। वोँ कसमसा कर मुझे अपने सें दूर करने कि कोशिश करनेलगी। मैंने उसे अपने बंधन सें आज़ाद किया तौ निशा बनावटी क्रोध दिखाते हुए बोलीं.
निशा – अभि बदन पर्र चोटें लगी हें औऱ जनाब कों आशिक़ी सूझरही हैं। पहले इन्हें ठीककर लो उसकेबाद.
मैंने उसके छोटे-छोटे गोल-मटोल कूल्हों कों मसलते हुएकहा – आज तौ मे सुहागरात मनाकर हि रहूँगा मेरीजान। क्याँ पता?? तुमने अपना इरादा बदल लिया तौ। मे तोँ रह जाऊंगा नां ठन-ठन गोपाल.
यह कहकर मैंने फिन सें निशा कों अपनी बाँहों मे जकड़ लिया.
निशा – पहले खानां पीना तौ खालो। तुम्हारे प्रतीक्षा मे बाकीसभी भि भूखे हें.
मे – ओह्ह्ह। सॉरी…यह कहकर हम् बाहर् डाइनिंग टेबल कि तरफचल दिए.
हम् सबनेमिल कर खानां खाया। बापू कों भि जबपता लगा मेरे एक्सीडेंट केँ बारे मे, तौ वोँ भि परेशान हौ उठे.मगर जब मैंने बताया कि बस मामूली सि खरोच हें। तब जाकर वोँ कुछ आश्वस्त हुए। खानां खा केँ, थोड़ी देर हम् सभीआपस मे बातें करतेरहे। मोहिनी भाभी, निशा कों सुहागरात कि कुछ टिप्स देने उसकेपास चली गई,। कुछदेर मे बापू औऱ भैया केँ संग बैठकर राजेश केँ केस सें संबंधित बातें करतेरहे। वोँ दोनों अभि भि इस विषय पर्र चिंतित दिखरहे थें, मगर मैंने उन्हें बिल्कुल आश्वस्त रहने केँ लिएकहा। कुछदेर बाद पिताजी औऱ भैया उठकर सोनेचले गये.
मे भि अपने कमरे कि तरफबढ़ गय़ा, जहाँ दोनों बहनें मेरा प्रतीक्षा कररही थीं। मेरारूम गैलरी मे लास्ट थां। अभि मे गैलरी मे हि थां कि मेरे कमरे सें निकलकर मोहिनी भाभीआती हुई दिखाई दि। मे वहीं ठिठक गय़ा, जब वोँ मेरेपास आँ गई,, मेराहाथ पकड़कर दीवार कि तरफकर केँ वोँ मुझे समझने लगी.
मोहिनी भाभी - अंकुश आज तुम् पहलीबार निशा केँ पास एक् पति केँ रूप मे जारहे होँ औऱ निशा एक् पत्नि कि तरह तुम्हारे सामने होगी। तोँ आज तुम् दोनों केँ बीच कि सारी दीवारें ढह जानी चाहिए, जिससे एक् दूसरे केँ बीच कि हिचकदूर हौ जाए। एक् औऱ बात, निशा अपने दिलो-दिमाग़ सें परिपक्व लड़की हैं मगर शारीरिक तौर पऱ नहि जौ आज तुम्हें यूज़ करना हैं.
मैंने मोहिनी भाभी कों पकड़कर दीवार सें सटा दिया। उनकीकमर मे हाथ डालकर अपनीतरफ खींचा औऱ आँखों मे झाँकते हुए बोला.
मे - हमारी सुहाग रात कि साक्षी नहि बनाना चाहोगी भाभी??उसे शारीरिक तौर पऱ परिपक्व बनाने मे अपने लाड़ले अंकुश कि सहायता नहि करोगी??? अपनी छोटी बेहन कों गाइड भि करती जानां.
मोहिनी भाभी नें मुस्कराते हुए प्रेम सें मेरेगाल पर्र चपत लगाई औऱ बोलीं.
मोहिनी भाभी – यहरात किसी औऱ केँ संग शेयर नहि कि जाती अंकुश डार्लिंग औऱ वैसे भि अब तुम् अनाड़ी नहि रहे। कइयों कि सील चटखा चुके हौ, तौ अपनी पत्नि कि नहि कर पाओगे क्याँ??
मैंने झटके सें मोहिनी भाभी कों अपने जिस्म सें सटा लिया.अब उनकी गदराई हुइ बूब्स मेरे सीने सें दबरही थि। फिन भाभी केँ मस्त गदराए हुए कूल्हों कों मसलकर औऱ ज़ोर सें अपनीतरफ दबाया। मेरा लन्ड उनकी बुर केँ दरवाजे कों खट-खटा रहा थां। भाभी कि आँखों मे भि वासना केँ डोरे तैरने लगे, मगर अपनी भावनाओं पऱ कंट्रोल करतेहुए, मेरे सीने पऱ हाथ कां दबाव देकर मुझे अपने सें अलग किया.फिन मुस्करा कर मोहिनी भाभी नें मेरे होंठचूम लिए औऱ मेरे लन्ड कों दबाते हुए बोलीं.
मोहिनी भाभी – अब इसकेआगे औऱ कोई शैतानी नहि। आजइस पर्र सिर्फ़ इसकी असली मालकिन कां हक़ हैं। अब अंदरजाओ एक् पति केँ अधिकार केँ संग औऱ निशा कों वोँ तोहफा दो जिसके लिएहर लड़की अपने जिंदगी मे ख्वाब संजोती हैं.
यहकहकर भाभी नें मुझे धकेलकर रूम केँ अंदरकर दिया औऱ बाहर् सें गेटबंद कर केँ स्वयं भैया केँ पासचली गयीं। मैंने पलटकर जैसे हि कमरे केँ अंदरकदम रखा, सामने केँ नज़ारे कों देखकर मेरामन मयूर होकरनाच उठा। सामने फक्क सफेद चादर सें ढकाबेड जिसपर लाल गुलाब केँ फूलों कि पंखुड़ियों बिछी हुई थीं। कमरे केँ अंदर बिखरी हुईँ सुगंध, किसी कों भि मदहोश करदे। लगता हैं भाभी नें यहसभी करने मे काफ़ी मेहनत कि होगी.बेड केँ सिरहाने एक् लाल सुर्ख जोड़े मे, सर पऱ लंबा सां घूँघट लिए, सिकुड़ी सिमटी सि निशा। अपने प्रियतम केँ प्रतीक्षा मे बैठी थि। अभि-2 कमरे सें बाहर् निकलने सें पहले उसकी दिदी उसेआने वाले पलों केँ बारे मे बहोत कुछ ज्ञान देकर गयीँ, होंगी सुहाग रात केँ बारे मे.
मे धीरे-धीरे-2 चलतेहुए बेड तक गय़ा औऱ उसके साइड मे जाकर खड़ा हौ गय़ा। निशा मुझे अपने नज़दीक खड़ा पाकर औऱ ज्यादा अपने आप् मे सिमट गई,.
मे धीरे-धीरे सें निशा केँ पासबैठ गय़ा औऱ उसके कंधे पर्र हाथरखा- निशा केँ बदन मे एक् कंपकंपी सि दौड़ गयीँ, जौ मैंने साफ महसूस कि.
मैंने उसके कंधे पर्र हाथ रखतेहुए कहा - निशायह चाँद सां मुखड़ा घूँघट मे क्यूं छुपारखा हैं? हम् दोनों केँ बीचअब इस घूँघट कां क्याँ काम? हटाओइसे.
निशा नें नाँ मे अपनी गर्दन हिला दि। मैंने मुस्कराते हुए उसके घूँघट कों अपने हाथों मे लेकरउलट दिया.वाह! हल्के सें मेकअप औऱ गहनों सें लदी, अपनी नज़रें बिस्तर पर्र गड़ाए। निशा लज्जा हया कि मूरतबनी बैठी थि। नाक मे नथुनी, माथे पर्र टीका, गले मे मंगलसूत्र केँ संग एक् बड़ा सां हार, कानों मे बड़े-2 झुमके, हाथों मे हाथफूल। मेहँदी लगे हाथों कि सब उंगलियाँ अंगूठियों सें भरी हुइ, कुहनी तक लाल औऱ हरी-हरी चूड़ियाँ, जिनके आगे औऱ पीछे एक्–एक् सोने केँ कंगन। निशाइस वक़्त साक्षात लक्ष्मी कां स्वरूप लगरही थि। मेरेमन नें कहा कि क्यूं नां इसछवि कों हमेशा केँ लिए एक् यादगार बना लियाजाए, तौ अपना स्मार्ट मोबाइल निकाल कर निशा कां फोटो लेना चाहा, मगर निशा तोँ अपनी नज़रें नीचेकिए हुए थि.
मैंने अपनेहाथ कां सहारा निशा कि ठोड़ी पऱ लगाकर उसके चेहरे कों ऊपर किया.फिन भि निशा कि पलकें झुकी हि रही.
मे - मेरीतरफ देखो निशु.
निशा नें फिन सें अपनी गर्दन नां मे हिला दि.
मे – क्यूं? मुझसे नाराज़ होँ??
निशा – लाजआती हैं.
मे – मुझसे अब कैसीलाज निशा!अब हम् पति-पत्नि हें। जान!अब हम् दोनों केँ बीच लज्जा-हया कां यह परदा क्यूं? ज़रा मेरीतरफ देखो तोँ सही, मे तुम्हारी इसछवि कों कमरे मे क़ैद करना चाहता हूं.
एक् क्षण कों निशा नें मेरीतरफ देखा औऱ उसीसमय मैंने उसकीउस छवि कों अपने मोबाइल मे क़ैदकर लिया। निशा केँ लिप्स थरथरा रहे थें। मैंने उसके माथे केँ टीके कों एक् ओरकर केँ उसेचूम लिया। उसकी पलकें फिन सें बंद होँ गयीँ,.
निशा केँ हाथों कों अपने हाथों मे लेकर मैंने कहा – मेरीतरफ देखो निशा.
निशा नें जैसे-तैसे कर केँ अपनी पलकों कों उठाया, मानो उनकेऊपर नां जाने कितना भरपड़ रहा हौ। मे उसकीझील सि गहरी शरबती आँखों कां तौ हमेशा सें हि दीवाना थां। उनमें झाँकते हुए बोला – तुम् सच मे बहोत सुन्दर हौ निशा.
निशा कि पलकें लज्जा सें फिन एक् बारझुक गयीँ,। आज तोँ वोँ कुछ अधिक हि लजारही थि। मैंने उसकेसर सें साड़ी कां पल्लू उतारकर एक् तरफरख दिया औऱ उसके गोरे-गोरे हल्की लालीलिए हुए गालों कों चूम लिया। निशा कि नथुनी मेरे औऱ उसके होंठों केँ बीच दीवार बनरही थि, उसको निकाल कर मैंने उसके होंठों कि तरफ अपने होंठ बढ़ादिए। मेरी साँसों कि गर्मी महसूस कर केँ निशा केँ होंठलरज उठे। मैंने जैसे हि उसके जूसीलाल–2 लिपस्टिक लगे होंठों कों किस किया। निशा नें अपने मेहँदी लगे दोनों हाथों सें अपने चेहरे कों ढांप लिया। निशा अपने घुटने मोड़ बैठी हुई थि, तौ मैंने निशा केँ घुटनों कों सीधाकर केँ उसके गोरे–गोरे सपाटपेट कों सहलाते हुए अपनाहाथ उसके वक्षों तक लाया.
निशा अभि भि अपने चेहरे कों ढकेहुए थि। मैंने निशा केँ दोनों बूब्स केँ ऊपर हल्के सें हाथ फिराया, फिन अपने दोनों हाथों सें उसके हाथों कों चेहरे सें अलग किया। निशा नें अपनी आँखों पऱ पलकों केँ पर्दे डालकर फिन सें बंदकर ली.
मैंने निशा कि साड़ी कि गाँठखोल दि औऱ एक्-एक् कर केँ उसकेबदन सें सारे गहने उतार डाले, अब निशा केवल ब्लाउज औऱ पेटीकोट मे थि। मैंने उसे अपनी बाँहों मे भर लिया औऱ उसके होंठों कों चूमने लगा.
निशा अपनी सुध-बुध खोतीजा रही थि। निशा तौ बस जैसे अपने प्रियतम केँ इशारों पर्र चलने वाली एक् कठपुतली बन चुकी थि.
मैंने निशा केँ होंठ चूसते हुए अपने दोनों हाथ उसके बूब्स केँ ऊपररख दिए औऱ उन्हें ब्लाउज केँ ऊपर सें हि मसलने लगा। निशा कि आँखों मे लाल डोरे तैरने लगे औऱ अपनी मरमरी बाहें मेरेगले मे डाल दि। थोडा सां मसलने केँ बाद मेरी उंगलियों नें निशा केँ ब्लाउज केँ बटनखोल दिए। हमारे होंठ अभि भि एक् दूसरे कां रस चूसने मे हि व्यस्त थें.
निशाअब सिर्फ़ एक् पिंककलर कि ब्रा मे थि, जिसमें क़ैद उसकी 34” केँ सख्त मदमस्त बूब्स, किसी टेनिस कि बॉल केँ आकार, निहायत हि हसीन औऱ कामुक लगरही थि। मैंने अपनी टीशर्ट निकाल फेंकी औऱ निशा कों कमर सें पकड़कर अपनीगोद मे बिठा लिया.
निशा मेरे सीने सें चिपक गई,। जिससे उसके सुडौल बूब्स मेरे सीने मे दबगये। मैंने निशा कि ब्रा निकाल करउसे बैड पर्र लिटा दिया औऱ उसके जिस्म कों सहलाते हुए उसकी गर्दन सें चूमना स्टार्ट किया औऱ धीरे-धीरे–2 कर केँ उसके बूब्स तक आँ पहुंचा। निशा किसीजल बिन मछली कि तरह पलंग पर्र पड़ी तड़पने लगी। गुलाब कि पंखुड़ियों समेत निशा नें बेडशीट अपनी मुट्ठियों मे कसली थि। मैंने उसके निप्पलो कों एक् बारजीभ लगाकर चाटा। निशा केँ मुँह सें एक् मादक सिसकी फुट पड़ी, औऱ अपने पैरों कि एड़ियों कों आपस मे रगड़ने लगी.
निशा - उफफफ्फ़…। ईईईशशशशश। ओहहहह… आहहहहह…
अब निशा नें मेरासर अपने दोनों हाथों मे लें लिया थां। जब मैंने निशा कि एक् चुचि कों अपने मुँह मे भरकर चूसा औऱ दूसरी कों अपनी बड़ी सि हथेली सें सहलाया तोँ वोँ अपनी एड़ियों कों बिस्तर पर्र रगड़ते हुए सिसकने लगी.
निशा - आआहह.मत… करूऊऊऊऊऊओ। प्लीज… आईईईई। मुझे.कुछ…। होता… हाईई.
मैंने निशा कि तरफ मुँहउठा कर पूछा – क्याँ होता हैं मेरीजान?
निशा मेरीबात सुनकर बुरीतरह शरमा गई, औऱ बिनाकोई जवाबदिए हि उसने अपना मुँह दूसरी तरफ घुमा लिया औऱ आँखें बंदकर केँ सिसकने लगी। निशा कि चुचियों कों चूसते हुए मे अपने दोनों हाथों सें उसके बगलों कों सहलाते हुए नीचे कों लाया औऱ उसकेपेट औऱ नाभि कों चूमते हुए उसके पेटीकोट कां नाड़ाखोल दिया.अब निशा सिर्फ एक् छोटी सि पैंटी मे थि। जौ अब बहोत गीली हौ गई, थि। मैंने एक् बारफिन निशा केँ होंठों औऱ गर्दन कों चूमा औऱ अपना एक् हाथ नीचे लें जाकर उसकी गीली पैंटी पर्र रख दिया। अपनी बुर पऱ मेराहाथ महसूस करते हि निशा नें अपनी दोनों जांघें जोड़ दि। मैंने अपनाहाथ निशा कि पैंटी सें हटाकर उसकी जांघों पऱ लें आया औऱ उन्हें सहलाने लगा। अपना लोवर निकाल कर मैंने एक् तरफ फेंका, अब मे भि केवल अपनी फ्रेंची मे हि थां.
निशा कि टाँगों केँ बीचआकर मे अपने घुटने मोड़कर बैठ गय़ा औऱ मैंने उसकी बगलों कों अपने हाथों मे भरकरउसे किसी गुड़िया कि तरह उठाकर अपनी जांघों पर्र बिठा लिया। निशाअब अपने पांव मेरे दोनों ओर निकाल कर मेरीगोद मे बैठी थि। निशा कि छोटी सि कुँवारी बुर, कामरस सें भीगी पैंटी मे ढकी, मेरे लौड़े केँ ठीकऊपर थि। निशा केँ कूल्हों कों अपनी मुट्ठियों मे भरतेहुए मे उसके होंठ चूसने लगा.
निशाअब बहोत गर्म होनेलगी थि। उसका शरीरअब उसकी नहि सुनरहा थां औऱ ऊपर सें नीचे थिरकने लगा। मेरेहाथ कभी निशा कि पीठ सहलाते तौ कभी उसके गोल-मटोल कूल्हों कों मसल देते। निशा कि बुर, मेरे लौड़े सें मिलने केँ लिए तड़पने लगी औऱ दोनों कपड़े कि एक् पतली सि दीवार केँ पीछे सें हि एकदूसरे सें प्यार अलाप मे लिप्त हौ गये। मेरे कड़क लन्ड कि रगड़ सें निशा कि बुर जल्द हि खुश हौ गयीँ, औऱ निशा कां शरीर अकड़कर मेरेबदन सें चिपक गय़ा। मैंने निशा कि चुचियों कों हल्के सें मसल दिया, वोँ सिसक पड़ी औऱ ऊऊऊओहहह। जानुउऊउउ… उूउउ। बोलते हुए पैंटी मे हि झड़ने लगी। निशा मेरे कंधे पऱ सर टिकाकर आहिस्ता हाँफने लगी.
मैंने उसकीपीठ सहलाते हुएउसे आवाज़ दि - निशु.
निशाउसी खुमारी मे बोलीं – हम्म्म…
मे – आरयूओके…
निशा – हम्म…
अब मैंने निशा बिस्तर पऱ सीधा लिटा दिया, औऱ उसकी कामरस सें तर पैंटी कों निकालकर एक् तरफ कों उछाल दिया। आअहह। निशा कि छोटी सि बुर एकदम चिकनी जौ रस सें सराबोर होकर रोशनी मे औऱ अधिकचमक उठी थि। मे अपने सामने निशा केँ बुर कि खुली दोनों पतले-पतले होंठों कों कुछ लम्हा देखता रहा। उसके निचले सिरे पर्र कामरस कि एक् बूँद मोती जैसीचमक रही थि। जौ मानोकह रही होँ कि आओ मेरे प्रियवर यह तुम्हारे लिए तोहफा हैं। आकर अपना तोहफा कबूलकरो। मैंने भि उसका स्वागत ठुकराया नहि औऱ इससे पहले कि वोँ उसकी बुर केँ बंद होंठों सें जुदा होकरबेड कि चादर मे विलीन होता, मैंने झुककर हौले सें उसे अपनीजीभ सें चाट लिया। मेरीजीभ कों अपनी रसीली बुर पऱ महसूस होते हि निशा एकदम सें उछल पड़ी.
निशा - हाए…यह… क्ककयाआअ…। किय्आ… उउउफफफ्फ़… सस्सिईईईईईईईईईईईईईई… आअहह…
मैंने उस मोती जैसी कामरस कि बूँद कों चाटने केँ बाद पूरीजीभ सें एक् बार निशा कि बुर केँ बंद होंठों कों नीचे सें ऊपर तक चाट लिया। निशा नें बेड कि चादर कों ज़ोर सें अपनी मुट्ठी मे कस लिया औऱ अपने होंठों कों चबाने लगी। निशा लज्जा कि वजह सें अपने अंदर कि उत्तेजना कों भि खुलकर व्यक्त नहि करपारही थि। उसका शरीरबेड पऱ किसीजल बिन मछली कि तरह उतावलापन रहा थां। मैंने अब निशा कों औऱ ज्यादा तड़पाना उचित नहि समझा औऱ अपना फ्रेंची उतारकर एक् ओर उछाल दिया। मेरा 8 इंची बब्बर शेर, पूरीतरह अपने शिकार कों दबोचने केँ लिए रेडी थां.
मैंने अपने लन्ड कों थोडा मुट्ठी मे लेकर मसला औऱ उस पर्र थूकलगा कर निशा कि बुर केँ होंठों केँ ऊपररख कर दो-तीन बारऊपर नीचे फिराया, ताकि मेरा लन्ड औऱ निशा कि बुर एक् दूसरे कों अच्छे सें पहचान सकें। निशा कि बुर केँ कामरस सें मेरा लौड़ा भि चिकना होँ गय़ा। फिन मैंने अपने हाथों केँ अंगूठों कि सहायता सें निशा कि बुर केँ बंद होंठों कों खोला, उसका गुलाबी छेद बहोत हि छोटा सां थां। शायद अभि तक उंगली भि नहि गयीँ, होगी उसमें। ब-मुश्किल थोड़ी सि स्थान बनाकर मैंने अपने लन्ड केँ मोटे सें सुपाड़े कों उसके दरवाज़ा पऱ टिकाया.
उसके अहसास सें हि निशा कि साँसें तेज होनेलगी औऱ वोँ मुट्ठी भींचे आँखबंद कर केँ आने वाले तूफान केँ प्रतीक्षा मे लंबी-लंबी साँसें भरनेलगी। मैंने अपने लन्ड कों थोडा सां पुश किया जिससे मेरे लन्ड कां सुपाड़ा अच्छे सें निशा कि बुर केँ होंठों केँ बीचसेट हौ गय़ा। मेरे लन्ड केँ सुपाड़े केँ दबाव कों अपनी बुर केँ ऊपर महसूस कर केँ निशा सिहर गयीँ,। उसकेबदन केँ सारे रोंगटे खड़े होँ गये.
मैंने झुककर पहले उसके होंठों कों चूमा औऱ फिन उसकी चुचियों कों प्रेम सें सहलाकर कहा – निशा थोडा मैनेज करना पड़ेगा। निशाबस हम्म्म… कर केँ अपनी सहमति देपाई.
निशा केँ बाजुओं पऱ हाथों कां दबाव रखतेहुए मैंने एक् धक्का अपनीकमर कों दिया। मेरा सुपाड़ा निशा कि बुर कि पतली-पतली गुलाबी पंखुड़ियों कों फैलाता हुआ करीब-करीब स्लिम गय़ा। निशा कराहने लगी। उसने अपने होंठों कों कसकर, चीख कों अपने मुँह मे जब्तकर लिया.मगर दर्द कि रखायें उसके चेहरे पर्र नज़रआने लगी.
निशा केँ होंठों कों चूमकर मैंने उसके गालों कों सहलाया औऱ एक् तगड़ा सां धक्का अपनीकमर मे लगा दिया। निशा कि कोरी करारी बुर, किसी ककड़ी कि तरह चीरती चली गयीँ,। लाख कोशिश केँ बाद भि उसके मुँह सें एक् मर्मान्तक चीख निकल हि पड़ी.
निशा - माआआआआआआआ.मररर्र्र्र्र्र्ररर.गाइिईईईईईईईईईईई.रीईईईईईईईई.
मे वहींठहर गय़ा, औऱ उसके बालों कों सहलाते हुएउसे पुचकारते हुए बोला – बस मेरीजान। परेशानी कि दीवार टूट चुकी हैं। बस थोडा सां औऱ सहन करना होगा.
मेरा लन्ड उसकी बुर कि झिल्ली कों तोड़ चुका थां। मेरा लन्ड आधे सें ज्यादा उसकी संकरी प्यार गली मे प्रवेश कर चुका थां। निशा सें दर्दसहन नहि हुआ, वोँ मिन्नतें करतेहुए मुझे एक् बार अपना लन्ड बाहर् निकालने केँ लिए बोलीं। मैंने भि थोडा रुकना बेहतर समझा औऱ धीरे-धीरे सें एक् बार अपना लौड़ा बाहर् निकाल लिया। लन्ड बाहर् आते हि निशा नें राहत कि साँसली। जब मेरी नज़र उसपर गई,, तोँ सुपाड़ा खून सें लाल हौ चुका थां। खून कि एक् लकीर निशा कि बुर सें भि निकलरही थि। मैंने निशा कों इस बारे मे बताना सही नहि समझा, औऱ फिन सें निशा केँ होंठों कों चूसते हुए, उसकी चुचियों कों सहलाने लगा.
जब निशा कां कराहना थोडा कमहुआ तौ मैंने पूछा – मेरीजान ! अबआगे बढ़ें.
उसने हम्म….कर केँ परमिशन ग्रांट कर दि औऱ मैंने अपने लौड़े कों फिन सें उसकी चिकनी बुर केँ मुँह पर्र रखकर धक्का दे दिया। मेरा 2.5” मोटाई कां लौड़े जैसा लन्ड अपनी पहली वाली मंज़िल कों पीछे छोड़ते हुएकुछ औऱ आगे तक अंदरचला गय़ा। जोँ अबबस मंज़िल सें थोडा हि दूर थां। निशा एक् बारफिन तडपी औऱ अपनेसर कों इधर सें उधर पटकने लगी., उसकी आँखों मे आँसू कि बूँदें झलकने लगी.
मैंने निशा केँ गाल सहलाते हुए पूछा – क्याँ हुआजान? सहन नहि होँ रहा??
निशा कराहते हुए बोलि – हम्म… तुम्हारा लन्ड बहोत अधिक मोटा हैं। आअहह… मेरीजान निकली जारही हैं। आअहह… थोडा रुको… प्लीज ईईई….
मैंने रुककर निशा कों फिन सें चूमना शुरुआत कर दिया औऱ उसके कड़क हौ रहे चुचों सें खेलने लगा। संग-संग मे हल्के-हल्के अपने लन्ड कों मूवमेंट भि देतारहा। मेरेकुछ देर केँ प्रयास केँ बाद निशा कां दर्दकम हुआ.अब निशा अपने मज़े कि तरफ ध्यान देनेलगी थि। जिससे उसकेरस गागर सें थोडा–2 रस रिसने लगा औऱ मेरे लन्ड कों अंदर बाहर् होने मे आसानी होनेलगी। मेरा लन्ड अभि भि 2” दूर थां अपनी मंज़िल सें, जोँ उसकेआने वाले सेन्सेशन केँ कारण आसानी सें पा गय़ा औऱ अब मेरा लन्ड पूरीतरह सें निशा कि बुर अंदर स्लिम होँ चुका थां। हल्की सि कराह केँ संग निशा मेरे लन्ड कों अपनी आखिरी गहराई तक फील करने मे कामयाब रही.अब उसकी रसीली बुर औऱ अधिकरस बहाने लगी थि। क्योंकि मेरे लन्ड नें निशा कि बुर कां मुँह पूरीतरह खोल दिया थां.
मैंने उसको चूमते हुए अपने धक्कों कों गति प्रदान कि औऱ आधी लंबाई केँ शॉट लगाने शुरुआत करदिए। उतने सें हि कुछदेर बाद हि निशा कां शरीर एक् बार ज़ोर सें आकड़ा औऱ उसने जीवन कां पहला स्खलन लन्ड केँ जरिए प्राप्त कर लिया। निशा बुरीतरह सें मेरे सीने सें चिपककर हाँफने लगी.उसे सीने सें चिपकाए मे थोडा ठहर गय़ा। कुछदेर बाद निशा केँ शरीर कों सहलाते हुए मैंने फिन सें धीरे धीरे चोदना शुरुआत कर दिया.कुछ मिनटों मे हि निशा एक् बारफिन सें उत्तेजना केँ भंवर मे फँस गयीँ, औऱ अब उसने भि मेरासंग देना शुरुआत कर दिया.
अब मैंने पूरी लंबाई केँ शॉट लगाने शुरुआत करदिए। मार्ग खुल चुका थां, तोँ गीली बुर मे लन्ड कों सुपाड़े तक बाहर् लाता औऱ फिन एक् संग पूराडाल देता। मे अपने घुटनों पऱ होँ गय़ा, औऱ निशा केँ कूल्हों कों अपनी जांघों पर्र रखा औऱ अपने धक्कों मे तेज़ी लाना शुरुआत कर दिया.
निशा हल्की चीख भरती हुईँ अपनीकमर उचका देती। मुझे इतनामजा आँ रहा थां, जिनका शब्दों मे बयान करना नामुमकिन हैं। सच मे इतनामजा मैंने पहलेकभी नहि पाया थां। धक्कों केँ कारण निशा कि काँच कि चूड़ियों औऱ पैरों कि पायल कां मिला जुला मधुर म्यूज़िक कानों मे रसघोल रहा थां। हम् दोनों हि अपने-अपने प्रयास मे जुटेहुए थें, एक् दूसरे कों ज्यादा सें ज्यादा मजा देने कि कोशिश मे। इसी प्रयास मे दोनों केँ शरीर पसीने सें नहा चुके थें.
अंत मे वोँ वक्त भि आँ हि गय़ा जब हम् दोनों एक् संग अपने-अपने मुकाम कों पागये औऱ लंबी-लंबी साँसें लेतेहुए एक् दूसरे मे समागये। कितनी हि देरयूँ हि हम् एकदूसरे सें चिपके पड़ेरहे। निशा मेरे नीचेदबी पड़ी थि, फिन भि नाँ कोई शिकायत, नां शिकवा.
मुझेजब होशआया तौ मे निशा केँ ऊपर सें हटा। लन्ड कों उसकीनई चूड़ी, सॉरी!, बुर अब बुर कह सकता हूं, सें बाहर् निकाला। जिसके संग-संग हम् दोनों कां खून मिश्रित माल बाहर् आनेलगा औऱ बेडशीट पऱ हमारी सुहाग रात केँ सबूत छोड़ता रहा.
कुछ देरबाद मैंने निशा कों गोद मे उठाया औऱ बाथरूम कि तरफचल दिया। निशा नें कहा भि कि मे चली जाऊंगी। मैंने उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया औऱ उसकेफूल जैसे नाज़ुक जिस्म कों बाथरूम मे लें जाकरउसे खड़ा किया। हम् दोनों नें एकदूसरे केँ जिस्म साफकिए.
पहलीबार निशा कि नज़र मेरे लन्ड पऱ पड़ी। निशा अपने मुँह पर्र हाथरख करउसे बड़े ताज्जुब सें अपनी आँखें चौड़ी कर केँ देखरही थि, जोँ उसकाहाथ लगते हि, फिन सें फुल फॉर्म मे आँ चुका थां.
मैंने मुस्कुरा कर पूछा – ऐसे क्याँ देखरही होँ निशा?? मेरा लन्ड अब तुम्हारी बुर कि सेवा केँ लिए हि हैं.
निशा अपने मुँह पऱ हाथ रखकर बोलि – हाए…राम…। इतना बड़ा तुम्हारा लन्ड? यह केसे मेरी बुर केँ अंदर गय़ा होगा??तभी मेरीजान निकली जारही थि.
मैंने निशा केँ बूब्स कों सहलाते हुएकहा – तोँ इसका मतलबयह तुम्हें मेरा लन्ड पसन्द नहि आया??
निशा झेंपते हुए बोलि – ऐसीबात नहि हैं अंकुश, बाद मे मजा भि बहोत दिया तुम्हारे लन्ड नें। नाउआई लाइकइट… औऱ यह कहकर उसने मेरे लन्ड कों चूम लिया.
मैंने मेरे लन्ड कि मारझेल चुकी निशा कि घायल बुर कों साफकर केँ चूम लिया। उसकेबाद फिन निशा कों गोद मे उठाकर बेड पर्र लाकर लिटा दिया। अलमारी सें एक् उपहार निकाला औऱ उसे निशा कों देतेहुए मैंने कहा – लो निशा, यह तुम्हारी आज कि खरी कमाई.
निशा – यह क्याँ हैं अंकुश?
मे – खोलकर देखलो.
जब निशा नें तोहफा खोला। तोँ एक् स्मार्ट मोबाइल देखकर वोँ मेरेगले सें लग गयीँ,.
मैंने कहा – मनपसंद आया?
निशा – बहोत… मगर इसकी क्याँ ज़रूरत थि?
मैंने कहा – ज़रूरत थि। अब इसके जरिए हम् दूररह कर भि हर वक्तपास रह सकते हें। एक् दूसरे सें वीडियो कॉलआई कर केँ बातकर सकते हें.
निशा मेरा तोहफा पाकर बहोत खुश हुइ। फिन मे उसे उसके फंक्शन वग़ैरह समझाने लगा.कुछ देरबाद निशा नें टेबल सें उठाकर एक् ग्लास दूध कां मुझे पकड़ा दिया। जिसमें भाभी कां लाड़ शामिल थां। हम् दोनों नें मिलकर वोँ दूधखतम किया औऱ फिन सें एक् दूसरे सें लिपटगये। थोड़ी सि आपस कि छेड़-छाड़ औऱ प्रयासों सें एक् बारफिन सें हम् उसी तूफान केँ भंवर मे जा फँसे, जिसमें सें बाहर् निकलने कां शायद हि किसी कां मन करता होगा औऱ जब बाहर् निकले तोँ एक् नयेचैन, एक् नये मुकाम केँ संग एक् दूसरे केँ लगभग औऱ लगभग होतेहुए। सारीरात हम् दोनों एक् दूसरे केँ प्रेम मे डूबेरहे औऱ अपनी पहलीरात केँ सफ़र मे आगे बढ़ते रहे.फिन एक् नई सुभह कि आगाज़ केँ संग, एक् दूसरे कि बाँहों मे लिपटे नां जानेकब नींद नें हमें अपने आगोश मे लें लिया.
maira Pyara Devar - niyantran – New Episode
UPDATE 31
दूसरे दिन मेरी नींद बहोत देर सें खुली। किसी नें मुझे जगाया भि नहि। मगरजब नाश्ते कां वक़्त होँ गय़ा। तब मोहिनी भाभी नें आकर मुझे जगाया। मैंने सीधेउठ कर पहले मोहिनी भाभी केँ पेरछुए, फिन भाभी केँ गाल पर्र किस किया। उन्हें निशा औऱ मुझे मिलाने केँ लिए थैंकयू कहा औऱ फ्रेश होनेचला गय़ा। मोहिनी भाभी अपनेगाल कों प्रेम सें सहलाकर मुस्कुराती हुईँ मुझे बाथरूम कि तरफ जातेहुए देखती रही.आधे घंटे मे हि मे तैयार होकर रसोई मे पहुंचा। वहा निशा स्लैब केँ संग खड़ी ब्रेकफास्ट सजधजकर कररही थि। मैंने उसे पीछे सें जाकर अपनी बाँहों मे भर लिया। निशाइस टाइम एक् हल्की सि साड़ी मे थि, रात कि खुमारी कि वजह सें निशा कि पलकें अभि भि भारी होँ रहीथीं। मैंने पीछे सें उसे बाँहों मे लेकर उसकी गर्दन पर्र किस करतेहुए मॉर्निंग विश किया.
मेरेकिस करते हि, पहले तौ निशा सिहरउठी औऱ फिन हँसते हुए वैरीगुड मॉर्निंग अंकुश कहा औऱ कसमसा कर मुझे छोड़ने केँ लिए रिक्वेस्ट करनेलगी.
निशा - छोड़ो नां अंकुश… कोई आँ जाएगा…
मैंने अपनीकमर कों निशा कि गोल-गोल थोड़ी सि पीछे कों उठी हुइ गान्ड पर्र दबाते हुएकहा – आनेदो… कोई चोरी थोड़ी नाँ कररहे हें हम्। अपनीजान कों प्रेम हि तौ कररहा हूं, अब इसमें भला किसी कों क्याँ आपत्ति हौ सकती हैं??
निशा मेरे लन्ड कां अहसास अपनी गान्ड कि दरार केँ ठीकऊपर महसूस कर केँ गनगना उठी औऱ सिसकते हुए बोलीं – आअहह…फिन भि अच्छा नहि लगता। प्लीज़ अंकुश जान… छोड़ो नाँ, कोई देखेगा तौ क्याँ कहेगा?? कि देखो केसे बेशर्म हें यह दोनों, कल हि विवाह हुइ हैं औऱ आज हि केसे एक् दूसरे सें चिपके हुए हैं.
हम् अभि यह बातें कर हि रहे थें कि, राम भैया पीछे सें आँ गये। हमेंइस तरह खड़ेदेख कर वोँ उलटे पाँवलौट गये। निशा कों कुछ आभासहुआ तौ उसनेकहा.
निशा – सीईईई… जानू अभि कोई थां गेट पऱ?? प्लीज़ छोड़ो नाँ…
मैंने उसे छोड़ दिया औऱ निशा केँ गाल औऱ होंठों पर्र किस किया। मेरे ट्राउज़र मे आगे तंबूबन गय़ा थां, जिसे एडजस्ट करतेहुए मे बाहर् कि ओर निकल गय़ा। आँगन मे राम भैया मोहिनी भाभी सें कुछबात कररहे थें। जब उनकी बातें मेरे कानों मे पड़ी तोँ पतालगा कि वोँ हमारे बारे मे हि बोलरहे थें.
राम भैया – मोहिनी यह अंकुश कितना बेशर्म होँ गय़ा हैं???? वहा रसोई मे हि!!! अंकुश निशा कों पकड़कर प्रेम करनेलगा… कुछ तोँ लिहाज करना चाहिए इसे…
मोहिनी भाभी – तोँ इसमें किसी कों क्यूं एतराज होना चाहिए?? पति-पत्नि हें वोँ दोनों। नई-नई विवाह हुइ हैं, प्रेम हि तौ कररहे हें। कोई झगड़ा तौ नहि कररहे.
राम भैया – फिन भि कुछ तोँ मर्यादा होनी चाहिए???
मोहिनी भाभी – आप् भि क्याँ सुभह-सुभह मर्यादा कां पाठ लेकरबैठ गये.अब सभी आपके जैसे तोँ नहि होँ सकते नां??
मुझसे रहा नहि गय़ा औऱ उनकेपास जाकरबीच मे बोल पड़ा – भैया। कभी–2 ज़रूरत सें अधिक मर्यादा मे जकड़कर व्यक्ति अपने जिंदगी मित्र कि अपेक्षा कि भि उपेक्षा करने लगता हैं। भूल जाता हैं कि उसकी मर्यादाओं कि उसके दोस्त कों क्याँ कीमत चुकानी पड़ेगी.
मेरीबात सुनकर भैया, एकदमचुप पड़गये। शायद अपने अंतर्मन मे बीतेहुए दिनों कां मंथनकर रहे होंगे। मैंने आगे बढ़कर दोनों केँ पांवछुए औऱ उनका आशीर्वाद लिया.
आशीर्वाद देने केँ बादराम भैया बोले – शायद तूँ ठीककह रहा थां अंकुश। ज़रूरत सें ज्यादा मर्यादाओं कां पालन, व्यक्ति कों बंधनों मे जकड़ लेता हैं। जोँ कभी-कभी शायद उसके आस-पास केँ लोगों केँ लिए हितकर नहि होता.फिन वोँ मोहिनी भाभी कों संबोधित कर केँ बोले – मेरा भइया काफ़ी समझदार होँ गय़ा हैं, क्यूं मोहिनी??
भाभी नें हम्म…कर केँ जवाब दिया औऱ आगेबढ़ कर मेरा माथाचूम लिया.
फिन हम् सबने मिलकर ब्रेकफास्ट किया। भैया अपने कालेज चलेगये औऱ मे पिताजी कां ब्रेकफास्ट लेकर खेतों कि ओरचला गय़ा, उनका भि आशीर्वाद लेने.घऱ लौटकर मैंने निशा कों पकड़ा, औऱ साम तक फिनदेर रात तक हम् दोनों एक् दूसरे केँ प्रेम मे डूबकर अलग-अलग पोजीशन मे दमदार चुदाई करतेरहे। निशा कि सारी झिझक, लज्जा जौ उसके नेचर मे भरी हुई थि, कुछ घंटों मे हि हवा हौ चुकी थि। सेक्स कों एंजाय करने मे वोँ कोई मौकाहाथ सें नहि जानेदे रही थि। दूसरे दिन सुभह कां ब्रेकफास्ट कर केँ मे भि भैया केँ जाने केँ बाद हि घऱ सें निकल लिया औऱ सीधाशहर जा पहुंचा.
मैंने अपनी बुलेट सीधे सहयोग हॉस्पिटल कि पार्किंग मे हि जाकर रोकी। बाइक स्टैंड कर केँ सीधा डॉक्टर। वीना केँ केबिन कि तरफबढ़ गय़ा। वीना अभि–2 सुभह केँ राउंड मे मरीज़ों कों चेककर केँ हि आई थि औऱ कुछ रिपोर्ट कों सीरियस्ली रिव्यू करने मे व्यस्त थि.
मे - मे आईकमइन डॉक्टर??
मैंने गेट पऱ खड़े होकर अंदरआने केँ लिए पूछा। वीना कां ध्यान रिपोर्ट सें हटकर आवाज़ कि दिशा मे गय़ा। मुझे देखते हि फ़ौरन वीना केँ चेहरे केँ एक्सप्रेशन चेंज होँ गये। जौ एक् लम्हा पहले तक सीरियस्ली किसीकेस कि स्टडी मे लगी थि, अब वोँ एकदम सें चहकउठी औऱ बोलीं.
वीना - आओ-आओ। अंकुश…। अरे भइया आप् तौ एकदम सें गायब हि होँ गये??? नां कोई मोबाइल कॉलआई, नाँ औऱ कोईखैर खबर????
मे वीना केँ सामने जाकरबैठ गय़ा औऱ बोला – सॉरी डॉक्टर! मे थोडा अधिक हि बिज़ी होँ गय़ा थां अपने कामों मे। आज हि फ़ुर्सत मिला औऱ देखिए आपके सामने हाज़िर होँ गय़ा.
वीना – एनीवेस! कहिए। क्याँ सेवा कि जाए तुम्हारी?? आईमीन क्याँ लोगे? ठंडा। गर्म। याँ औऱ कुछ….??
यह कहकर वीना नें अपनी एक् आँख दबाई.
मे मुस्करा कर बोला – यह आदमी तोँ आपके हुक्म कां गुलाम हैं। आप् जोँ देना चाहेंगी। लें लूँगा.
वीना – अभि तोँ गरम चाय-कप कॉफ़ी सें हि काम चलाना पड़ेगा। बाकी केँ लिए टाइम नहि हैं। तोँ कहो क्याँ लोगे??गरम चाय याँ कप कॉफ़ी?
मे – जोँ आप् लेना चाहें। वही मे भि लें लूँगा.
वीना नें बेल बजाकर दफ़्तर बॉय कों अंदर बुलाया औऱ उसकोदो कप कॉफ़ी लाने कों कहा.फिन मेरीओर मुखातिब होकर बोलीं.
वीना - औऱ कोई सेवा होँ तौ बताओ…अरे हां उसका क्याँ हुआ जौ तुमने रिपोर्ट ली थि? वोँ तोँ अभि भि यहीं बहाने बनाए पड़ाहुआ हैं.
मे – दरअसल मे उसी सिलसिले मे आपसेबात करनेआया थां.
वीना – हांकहो। मे औऱ क्याँ कर सकती हूं तुम्हारे लिए?
मे – असल मे घी सीधी उंगली सें नहि निकलरहा तोँ उंगली अब टेढ़ी करनी हि पड़ेगी औऱ उसमें मुझे आपकी थोड़ी सहायता चाहिए.
वीना – हुक्म करो मेरेआका… कहकर वोँ खिल-खिला पड़ी.
मे – आप् उसे डिसचार्ज क्यूं नहि कर देते। वोँ ज़बरदस्ती तोँ कर नहि सकतायहा रहने केँ लिए.
वीना – नहि कर सकते नां, हॉस्पिटल केँ हि एक् बड़े ट्रस्टी कां सिफारिश हैं, उसेयहा रखने कां, जब तक वोँ चाहे.
मे – तोँ फिनअब एक् हि मार्ग हैं। अबउसे यहा सें ज़बरदस्ती उठाना पड़ेगा औऱ उसकेलिए आपकोउसे कोईऐसा ड्रग देना पड़ेगा। जिससे वोँ शारीरिक तौर पऱ तौ कामकरे मगर मानसिक तौर पऱ अचेतरहे.
वीनाकुछ देरसोच मे पड़ गयीँ,.
मैंने कहा - अगर आपकेलिए कोई मुश्किल हौ तौ रहने दीजिए। मे कोई औऱ मार्ग निकाल लूँगा.
वीना – नहि ऐसीबात नहि हैं। ऐसा ड्रग तोँ हैं मेरेपास पऱ। मगरकोई रिस्क नां होँ.
मे – उसकी आप् चिंता मतकरो… वापस आपकेपास ऐसीकोई कंप्लेंट नहि आएगी इसकेलिए.
फिन वीना मेरी हेल्प करने कों रेडी हौ गई,। तब तक कप कॉफ़ी भि आँ गई,। हम् दोनों नें कप कॉफ़ी पी, फिन मैंने उसको अपना नंबर शेयर किया.जब भि वोँ फ्री होँ मुझेकॉल आईकरदे। मे हाज़िर होँ जाऊंगा उसकी सेवा मे। डॉक्टर वीना उसकेबाद भानु केँ रूम मे गयीँ,, जौ एक् स्पेशल रूम लेकरमौज लेँ रहा थां औऱ उसको चेक-अप केँ बहाने एक् इंजेक्शन दे दिया.इस टाइम भानु अकेला हि थां। शिखा अपने फ़्लैट पर्र थि। कुछदेर बादउसे इंजेक्शन कां असर होनेलगा। डॉक्टर वीना नें इशारा किया कि अब वोँ उस ड्रग केँ असर मे आँ चुका हैं औऱ दो-ढाई घंटे सें पहले नॉर्मल नहि होगा। इशारा पाते हि मे उसे एक् वॉर्डबॉय कि सहायता सें अपनी बाइक तक लाया, उसे पीछे बिठाया औऱ लें उड़ाउसे हॉस्पिटल सें कहींदूर एकांत मे, जहाँ अकेले मे उससे सारेराज उगलवाए जा सकें, जोँ उसने अपने जेहन मे छिपारखे थें अब तक.
मे भानु कों लेकर जंगल कि ओर निकल गय़ा। जहाँ मैंने एक् बार दूसरे शहर सें आते वक्त जंगल केँ बीचो-बीच एक् खंडहर कों देखा थां। वैसे तोँ खंडहर बिल्कुल टूटा-फूटा पड़ा थां, यह शायद किसी जमाने मे किसी कां चरागाह रहा होगा। अधिक बड़ा भि नहि थां। इसमें एक् रूमकुछ ठीक-ठाक हालत मे थां, मैंने भानु कों उसी कमरे मे लाकर बिठा दिया। उसकाबदन तोँ कामकर रहा थां। मगर दिमाग़ जैसे सोया पड़ा थां। वहा बिठाते हि भानु वहीं ज़मीन पर्र पसर गय़ा औऱ कुछदेर मे हि नींद मे चला गय़ा। मे उस कमरे केँ टूटे फूटेगेट कों बाहर् सें बंदकर केँ जंगल मे ऐसे हि वक्तपास करने घूमने निकल गय़ा। कुछ दूरी पऱ एक् छोटी सि नदीबह रही थि। उसी केँ किनारे पेड़ों कि छाया मे आँ केँ मे बैठ गय़ा औऱ नदी केँ बहते पानी मे छोटे- 2 पत्थर फेंकने लगा.
बैठे–2 मे अपने पुराने दिनों कि याद मे खो गय़ा। विद्यालय औऱ फिन कालेज केँ दिनों कि घटनायें। फिन ग्रेजुएशन केँ बाद घरवालों कां प्रेशर डालकर मुझेलॉ कालेज भेजना। मेरा सपना थां साइन्स मे कुछ रिसर्च फील्ड मे आगे बढ़ने कां। मगर बापू केँ सुझाव पऱ सबने मिलकर मुझेलॉ करने केँ लिए प्रेशर डाला औऱ दिल्ली केँ मशहूर कालेज मे एडमिशन करा दिया औऱ नां चाहते हुए मुझे दिल्ली जानां पड़ा। वहीं कालेज केँ हास्टल मे रहकर मे पढ़ाई करनेलगा। औऱ धीरे-धीरे–2 मुझेलॉ केँ सब्जेक्ट मे इंट्रेस्ट आनेलगा औऱ हमेशा कि तरह अपनेबैच कां फ्रंट रो स्टूडेंट बन गय़ा। शुरुआत-2 मे घऱ कि यादें, भाभी, दिदी औऱ चाची केँ संग बिताए वोँ लम्हे यादकर केँ दुखी भि हौ जाता। निशा सें सारे कांटेक्ट टूट चुके थें। मगर अपनेघऱ पऱ मे मोबाइल सें बात करता रहता, औऱ भाभी सें हि उसके बारे मे पताकर लेता थां। इन्हीं सभी मे कब एक् साल निकल गय़ा, पता हि नहि चला.
दूसरा साल शुरुआत हौ चुका थां। अब मे भि कालेज केँ माहौल मे अपने आपकोढल चुका थां, हास्टल कि लाइफरास आनेलगी थि मुझे। बारिश कां सीजन शुरुआत होनेजा रहा थां। ऐसे वक़्त मे दिल्ली कि उबाऊ गर्मी बहोत परेशान करती हैं। मे एक् दिन संडे कि साम कों पास हि एक् थियेटर मे मूवी देखने निकल गय़ा। लौटते मे सामघिर आई थि। थियेटर सें बाहर् निकला तोँ देखा, मौसम एकदम बदलाहुआ थां। एकदम सें अंधेरा सां छा गय़ा थां, घटायें उमड़-गुमड़ रहीं थि आसमान मे, हवायें भि तेजचल रही थि, करीब आँधी कां रूप धारणकर चुकी थि। तेजहवा केँ संग, धूल मिट्टी, आँखों कों बंद होने पऱ मजबूर कररही थि। इससे पहले कि बारिश शुरुआत होँ मे वहा सें तेज-तेज कदमों सें अपने हास्टल कि तरफ बढ़ने लगा। मेरा हास्टल वहा सें कोई 2 याँ 2.5 किमी कि दूरी पर्र हि थां। कोई साधन नाँ मिलने कि वजह सें पैदल हि निकल पड़ा। अभि मे कुछदूर हि निकला थां, कि जोरदार आँधी केँ संग बूंदा-बंदी शुरुआत हौ गयीँ,। जौ एक् आमबात थि, दिल्ली मे इस मौसम मे। मैंने अपनीचाल औऱ तेजकर दि। मगर मौसम सें तेज नहि चलसका। औऱ तेज बौछारों केँ संग बारिश नें मुझेघेर लिया.अब भीगने केँ अलावा औऱ कोई चारा नहि बचा थां मेरेपास। तौ अपनी सामान्य गति सें हि चलताहुआ आँ रहा थां, पहली बारिश कां लुत्फ़ उठाते हुए। वैसे भि तेज हवाओं केँ कारण बारिश कि बूँदें इतनीतेज जिस्म पऱ पड़रही थि मानो जिस्म मे कोई सूइयां चुभारहा हौ। मुँह पऱ बारिश कि तेज बूँदें इतनीतेज पड़ती कि आँखें खोलना दूभर हौ रहा थां। रोड पर्र ट्रैफिक नां केँ बराबर हौ गय़ा थां। मे अपने हास्टल कि ओर जाने वाले कालोनी केँ सिंगल रोड पऱ जैसे हि मुड़ा। सामने कां दृश्य देखकर मेरेपेर जहाँ केँ तहाँजम गये.
घनघोर बारिश मे चार बदमाश एक् लड़की केँ संग ज़ोर ज़बरदस्ती कररहे थें। उनके एक् तरफ एक् मारुति वॅन खड़ी थि, जौ शायदउन बदमाशों कि थि। दूसरी साइड मे एक् सफेदरंग कि एक्टिवा लुढ़की पड़ी थि, जोँ शायदउस लड़की कि होनी चाहिए। वोँ लड़की अपने कों उन बदमाशों सें बचने कां हर संभव प्रयास कररही थि औऱ चीख पुकार भि करतीजा रही थि। मगरइस तेजहवा औऱ बारिश मे उसकी पुकार सुनने वालावहा कोई नहि थां औऱ वैसे भि दिल्ली जैसेशहर मे कोई किसी कां संग देने नहि आता। मे कुछदेर वहीं खड़ायह सभी देखता रहा। वोँ कभी एक् बदमाश केँ हाथ सें छूटती, तौ दूसरा पकड़ लेता, उससे छूटती तोँ तीसरा। सच कहूँ तौ मेरी भि हिम्मत नहि हौ रही थि कि मे उस लड़की कि कोई सहायता कर सकूँ.
क्योंकि दिल्ली कि गुंडागर्दी केँ बारे मे पिछले एक् साल मे बहोत कुछसुन चुका थां। यहाआए दिन मर्डर। बीच मार्ग पर्र बलात्कार होनाआम बात थि। लोगदेख कर भि अनदेखा कर केँ निकल जाते हें। ऐसे मे बैठे बिठाए मुसीबत मोल लेना बेवकूफी हि थि, मगर एक् मजबूर लड़की कि सहायता नां करना… कहीं नां कहींयह भि ग़लतलग रहा थां मुझे। मेरा जमीर मुझे अनदेखा कर केँ वहा सें जाने भि नहि देरहा थां.
मे अभि कोई निर्णय नहि लेँ पाया थां। कि वोँ लड़की नाँ जाने केसेउन गुण्डों केँ चंगुल सें निकल भागी। शायद उसकी नज़र मेरेऊपर पड़ गई, थि। भागते हुए वोँ मेरेपास आँ गई,। औऱ हाथ जोड़कर मुझसे सहायता करने केँ लिए गिड़गिड़ाने लगी। मे बुतबना उस भीगी हुइ लड़की कों देखता रहा, भीगने सें उसके टाइट फिटिंग टॉप औऱ जीन्स औऱ ज्यादा जिस्म सें चिपकगये थें, जिसकी वजह सें उसके अन्तर्वस्त्र भि साफ-साफ उजागर होँ रहे थें। तब तक उनमें सें दो बंदेवहा आँ पहुँचे औऱ उन्होंने उस लड़की केँ दोनों बाजुओं कों फिन सें थाम लिया। वोँ अभि भि अपनेहाथ जोड़े मुझसे सहायता कि भीख माँगरही थि, संग हि संग उनसे अपने आप् कों छुड़ाने कां प्रयास भि करतीजा रही थि.
तभी उनमें सें एक् गुंडा बोला - अबे सालीचल, यह लौंडा क्याँ बचाएगा तुझेही? इसे क्याँ अपनीजान प्यारी नहि हैं क्याँ? ओए हीरो, चल निकल लें यहा सें… वरना मारा जाएगा.
बातअब अपनी मर्दानगी पर्र आँ गयीँ, थि तौ मैंने अब अपनी टाँग अड़ाने कां फ़ैसला कर लिया औऱ उस गुंडे कि बातखतम होते हि बोल पड़ा.
मे - अरे भइया लोगों, क्यूं बेचारी अकेली लड़की कों परेशान करते होँ?? जानेदो नाँ उसे.
वही गुंडा – अबे मेरीबात तेरे भेजे नां पड़ी केँ?? निकल लें यहा सें वरना.
मैंने उसकीबात मे हि काटते हुएकहा – वरना केँ?
यह सुनते हि उसकी झांटे सुलग गई, औऱ उस लड़की कां बाजू छोड़कर मेरीतरफ झपटा। उसका इरादा मेरे मुँह पर्र घूँसा जड़ने कां थां। मैंने पीछे हटके उसकावार खालीकर दिया औऱ साइड मे होकर उसकावही हाथ थामा, पलटा, उसे अपनीपीठ पऱ लिया औऱ इतनी ज़ोर सें रोड पर्र धोबी पछाड़ मारा कि उसकीकमर कड़क सें टूट गई,। अब वोँ लाख कोशिशों केँ बाद भि उठने कि स्थिति मे नहि थां। अपने दोस्त कां हश्रदेख कर वोँ दूसरा उस लड़की कों छोड़कर अपने दूसरे दो साथियों कि तरफ भागा। उसने जैसे हि वहा सें भागने कि कोशिश कि मैंने उसका गिरेबान पीछे सें पकड़ा। वोँ एक् हल्के जिस्म कां आदमी थां, तोँ उसे भि गले सें पकड़कर ऊपर उठाया औऱ दे पटकारोड पऱ। तब तक वोँ दोनों परिस्थिति कों समझ चुके थें औऱ भागते हुए मेरीओर झपटे। उनमें सें एक् केँ हाथ मे रिवाल्वर थां। औऱ दूसरे केँ हाथ मे रामपुरी चाकू। वोँ लड़कीडर केँ मारे थरथर काँपरही थि। मैंने उसे अपने पीछे खड़े होने कों कहा। वोँ मेरीपीठ सें चिपककर खड़ी, थरथर काँपरही थि। इतने मे वोँ दोनों हमारे पास तक पहुँच गये। वोँ रिवाल्वर वाला अपने दोनों साथियों कों, ज़मीन पऱ पड़े तड़पते हुएदेख कर गुस्से सें लाल होँ उठा औऱ अपना रिवाल्वर मेरेऊपर तानकर गुर्राया। बहोत हीरोपंती हौ गयीँ, छोरे, इब तेराखेल खतम करना हि पड़ेगा। इतना कहते हि उसने मेरेऊपर गोलीचला दि। मैंने बचने कि कोशिश भि कि मगरफिन भि वोँ मेरे बायें कंधे मे घुस गई,। मुझेलगा मानोकोई गर्म लोहा मेरे कंधे मे घुसकर जलारहा हौ। गोली लगते हि मे पीछे कों चक्कर ख़ाता चला गय़ा। अपने कों संभालने कि सारी कोशिशों केँ बाद भि मे ज़मीन पऱ गिर पड़ा। सीधेहाथ सें अपने कंधे कों दबाएहुए मे दर्द सें तड़परहा थां। वोँ रिवाल्वर वाला ठहाके मरताहुआ मेरेसर पऱ आकर खड़ा हौ गय़ा औऱ मुझे गालियाँ बकतेहुए वोँ मेरे सीने मे गोली उतारने केँ लिए उसने निशाना लेँ लिया., मुझेआज अपना आखिरी टाइम नज़दीक दिखाई देरहा थां। मगर कहते हें नां कि जाको राखे साईयाँ मारसके नाँ कोई। इससे पहले कि वोँ ट्रिग्गर दबाता, कि तभी एक् लोहे केँ पाइप कां वार उसके रिवाल्वर वालेहाथ पर्र पड़ा। उसकी रिवाल्वर हाथ सें छूटकर कहींगिर पड़ी, औऱ वोँ अपनाहाथ पकड़कर दर्द सें बिलबिलाता हुआ ज़मीन पऱ बैठता चला गय़ा.
हुआयूं कि, जैसे हि पहली गोली जोँ मेरे कंधे मे लगी थि, मुझे गोली लगते हि वोँ लड़कीडर केँ मारे पीछे कों भाग खड़ी हुई। वोँ थोडा सां हि पीछेहटी थि, कि उसकापेर वहीं साइड मे पड़े एक् दोफुट लंबे 1” मोटे लोहे केँ पाइप सें टकरा गय़ा। उसने वोँ पाइप कां टुकड़ा उठा लिया.उसे हाथ मे लेकर वोँ सोचने लगी, कि एक् अंजान व्यक्ति जोँ उसकी सहायता करने कि वजह सें मौत केँ मुँह मे घिर चुका हैं, उसेइस तरह अकेला छोड़कर यूं दौड़ना ठीक नहि हैं। उसे उसकी सहायता करनी हि चाहिए, अभि वोँ यहसभी सोच हि रही थि, कि तभी उसके कानों मे उस गुंडे केँ ठहाके सुनाई पड़े, पाइप पर्र उसके हाथों कि पकड़ मजबूत हौ गई,, औऱ वोँ हिम्मत जुटाकर पलटी। इससे पहले कि वोँ गुंडा मेरे सीने मे गोली उतारता, पूरी ताक़त सें उसने वोँ पाइपउस गुंडे केँ रिवाल्वर वालेहाथ पर्र दे मारा। रिवाल्वर उसकेहाथ सें छूटकर ज़मीन पऱ गिर पड़ी, औऱ वोँ गुंडा अपनी कलाई थामे ज़मीन पऱ बैठ गय़ा, दर्द केँ कारण बिलबिलाता हुआ वोँ अपनी कलाई थामे दर्दकम होने केँ प्रतीक्षा मे थां। तब तक उस चाकू वाले नें एक् हाथ सें उस लड़की कां गला पकड़ लिया औऱ दूसरे हाथ मे थामे चाकू कों उसकेपेट मे घुसाने वाला हि थां कि। मे अपनी पूरी चेतना शक्ति समेटकर उठ खड़ाहुआ औऱ उस चाकू वाले गुंडे कि कमर मे लपेटा मारा औऱ पूरी ताक़त सें ज़मीन पर्र दे मारा.जोश मे आकर पटकने केँ कारण उसकासर सबसे पहले नीचेआया औऱ मार्ग पऱ टकराने कि वजह सें उसकासर फट गय़ा। इतने मे उस रिवाल्वर वाले नें अपने दर्द पर्र काबू पाकर पीछे सें मेरे घायल कंधे कों जकड़ लिया औऱ जोर देकर मेरे जख्म पऱ दबाव डालने लगा। मेरे गोलीलगे कंधे मे दर्द कि एक् तेजलहर दौड़ गयीँ,, औऱ लाख रोकने केँ बावजूद भि मेरीचीख निकल गई,। जख्म सें खून कां रिसाव तेज होँ गय़ा., दर्द औऱ खून कि कमी होने कि वजह सें मेरी आँखें बंद होनेलगी। तभीउस लड़की नें उसी पाइप कां एक् जोरदार प्रहार उसकेसर पर्र किया। वोँ अपनासर पकड़कर लहराता हुआ ज़मीन पऱ गिर पड़ा औऱ बेहोश हौ गय़ा। इधर मे भि दर्द केँ कारण अपनी चेतना खोताजा रहा थां, मेरे कंधे सें लगातार खूनबह रहा थां। इससे पहले कि मे चक्कर खाकर ज़मीन पर्र गिरता। उस लड़की नें मुझेथाम लिया औऱ जैसे तैसेकर केँ मुझे घसीटती हुइ अपनी स्कूटी तक लेँ गयीँ,। उसकेबाद क्याँ हुआ मुझेकुछ पता नहि चला.
जब मेरीआँख खुली तोँ मे एक् बेड पर्र लेटाहुआ थां। मैंने धीरे-धीरे सें अपनी आँखें खोली औऱ इधर-उधर देखने लगा। अपने कों एक् अजनबी स्थान पऱ पाकर मे झटके सें उठकरबैठ गय़ा। झटके केँ कारण मेरे कंधे मे दर्द कि एक् टीस सि उठी। औऱ मेरे मुँह सें एक् कराह निकल गई,। मेरी कराहसुन करपास मे बैठी वोँ लड़की जौ एक् कुर्सी पर्र बैठीऊंघ रही थि। उठकर उसने मेरे बाजू कों थामकर फिन सें लिटा दिया औऱ बोलि.
लड़की - लेटेरहो। अभि तुम्हारा घाव ताज़ा हैं.
मैंने उसे पूछा – मे कहां हूं?
लड़की – मेरेघऱ मे हौ, अब हम् सुरक्षित हें। तुम्हारी गोली निकाल दि गई, हैं। मगरघाव ठीक होने मे कुछ वक्त लगेगा। तुम् सोजाओ, सुभहबात करते हें.
मैंने अपने खुश्क होंठों पर्र जीभ फेरते हुएकहा – मुझे प्यास लगी हैं.
उस लड़की नें मुझे पानी पिलाया औऱ बोलीं – कुछ खानां चाहोगे?
मे – नहि। पर्र अभि वक्त कितना हुआ हैं? तौ उसने अपनी घड़ी पर्र नज़र डाली औऱ बोलि – अभि रात केँ 3 बजे हें.
मे – तोँ क्याँ मे इतनीदेर तक बेहोश रहा?
लड़की – हां, डॉक्टर नें तुम्हें बेहोशी कां इंजेक्शन दिया थां। गोली निकालने सें पहले। शायदउसी कां असररहा होगा इतनीदेर तक.
पानी केँ संग हि उसने मुझे एक् गोली औऱ खाने कों दि, जिसके असर सें मुझेकुछ देरबाद फिन सें नींद आँ गयीँ, औऱ फिन जाकर सुभह हि आँख खुली.जब मेरीआँख खुली, तौ वोँ लड़कीइस वक्त मेरेपास नहि थि। मे बेड सें उठ खड़ाहुआ औऱ गेटखोल कर बाहर् आँ गय़ा। जोँ एक् बड़े सें हॉल मे खुलता थां। मुझे देखते हि हॉल मे बैठे अधेड़ दंपति। मेरीओर लपके औऱ मुझे पकड़कर सोफे पऱ बिठा दिया। मे उन्हें देखकर चौंक गय़ा औऱ मेरे मुँह सें निकल पड़ा.
मे - सर आप्??
वोँ अधेड़ कोई औऱ नहि हमारे लॉ कालेज केँ सबसे काबिल सीनियर प्रोफेसर राम नारायण श्रीवास्तव थें.
प्रोफ़ेसर – हां, औऱ तुम् शायद मेरे स्टूडेंट अंकुश शर्मा होँ? नेहा मेरी बेटी हैं.
मे – कौन नेहा??
प्रोफ़ेसर – जिसकी तुमने उन गुण्डों सें इज़्ज़त बचाई हैं। वोँ मेरी बेटी नेहा हैं। लॉ करने केँ बाद मेरेसंग हि प्रैक्टिस कररही हैं। जिन गुण्डों नें उसपरयह हमला किया थां, दोदिन पहले उनके लीडर कों हमने कत्ल केँ जुर्म मे सज़ा दिलाई थि। शायदइसी कारण वोँ नेहा सें बदला लेना चाहते होंगे। मगर ईश्वर नें किसी फरिश्ते कि तरह तुम्हें वहाभेज दिया। औऱ एक् अनहोनी होने सें बच गई,.
हम् यह बातें कर हि रहे थें कि तभीवहा नेहा आँ गयीँ,। उसने अपने मां-दादीमा कों गुड मॉर्निंग कहा, फिन मुझेगुड मॉर्निंग कहकर मेराहाल चाल पूछा.
प्रोफ़ेसर – बेटी यह अंकुश शर्मा हैं, मेरा सेकेंड ईयर कां बहोत होनहार स्टूडेंट। देखो परमेश्वर नें क्याँ संयोग रचा कि इसेवहा तुम्हारी सहायता केँ लिएभेज दिया। इसकी स्थान कोई औऱ होता तोँ शायद वोँ वहा रुकता हि नहि। हमें इसका एहसानमंद होना चाहिए.
मे – सरयहकह कर आप् मुझे शर्मिंदा कररहे हें। मे नहि जानता थां, कि यह आपकी बेटी हें। बस मेरे जमीर नें कहा कि मुझे इनकी सहायता करनी चाहिए तोँ वहारुक गय़ा औऱ जौ बन पड़ा वोँ किया.
नेहा – नहि, तुमने जिस साहस औऱ दिलेरी सें उन गुण्डों कां सामना किया, यह हर किसी केँ बस कि बात नहि थि। थैंकयू वैरीमच अंकुश। मे तुम्हारा यह एहसान जीवनभर नहि भूलूंगी.
मे – आप् भूलरही हें नेहाजी। थैंकयू तौ मुझे कहना चाहिए आपको कि आपकी दिलेरी औऱ सूझ-बुझ केँ कारणआज मे यहा जिंदा बैठा हूं.
प्रोफेसर औऱ उनकी पत्नि यानी नेहा कि मां किंकर्तव्यविमूढ़ सें हम् दोनों कि बातें सुनरहे थें तौ मैंने उन्हें सारा वाकया डीटेल मे बता दिया। वोँ दोनों अपनी बेटी कों प्रशंसा भरी नज़रों सें देखरहे थें.
फिन वोँ बोले – चलो अच्छा हुआ कि तुम् दोनों नें हि मिलकर एक् दूसरे कि सहायता कि। मगर बेटे.यह बात भि अपनी स्थान बहोत मायने रखती हैं कि, तुमने जोँ एक् अंजान लड़की केँ लिए किया हैं, आज केँ जमाने मे कोई किसी केँ लिए अपनीजान जोखिम मे नहि डालता.
इन्हीं बातों केँ दौरान हम् सबने ब्रेकफास्ट किया। नेहा कि माँ किसी एनजीओ केँ लिएकाम करती थि। कुछदेर बाद वोँ दोनों अपने-अपने काम पर्र निकलगये। मैंने भि अपने हास्टल जाने केँ लिए नेहा सें कहा तोँ वोँ मुझे घुड़कते हुए बोलीं.
नेहा - बिल्कुल नहि। तुम् कहीं नहि जाओगे। जब तक कि पूरीतरह सें ठीक नहि हौ जाते। इट्सएन ऑर्डर.
औऱ यहकहकर वोँ मुस्कराने लगी.
मे – मगरमी लॉर्ड, मेरे कपड़े तोँ देखो.खून सें सनेहुए हें। फ्रेश भि होना हैं। तोँ जानां तोँ पड़ेगा हि नाँ.
नेहा ऑर्डर देतेहुए बोलीं – कोई ज़रूरत नहि, अपनेरूम कि चाबीदो मुझे। मे अभि तुम्हारे कपड़े मँगवातीं हूं तुम्हारे रूम सें.
मैंने हथियार डालते हुए। अपनीजेब सें उसे चाबी निकाल कर दि औऱ अपनारूम नंबर। बताया। नेहा नें फ़ौरन अपने नौकर कों भेजकर मेरे कपड़े मंगवा दिए.फिन मे वहीं फ्रेश हुआ, जिसमें नेहा नें भि मेरी सहायता कि। मुझे फ्रेश करते वक्त, नहाने केँ दौरान मेरी कसरती बॉडी कों देखकर वोँ बिना इंप्रेस हुए नहि रहपाई। फिन नेहा नें मुझेदवा दि औऱ बैठकर एक् दूसरे सें गप्पें लगाने लगे। मुझे नेहा औऱ प्रोफेसर नें एक् हफ्ते अपनेघऱ पऱ हि रखा.
इन दिनों मे नेहाहर संभव मेरीहर ज़रूरत कां ख्याल रखती थि। यहा तक कि शुरुआत केँ एक् दोदिन तोँ उसने अपने हाथों सें मुझे फ्रेश होने मे मेरी सहायता कि। नेहा केँ रसीले हाथों कां स्पर्श अपने नंगे जिस्म पर्र पाकर मे सिहर उठता औऱ शायद वोँ भि उत्तेजित होने लगती। कंधे कों सेफरख कर वोँ मुझे नहलाती भि। नेहा केँ जिस्म कि खुशबू औऱ स्पर्श सें मेरी उत्तेजना बढ़ने लगती। नहाने केँ दौरान कुछ पानी नेहा केँ कपड़ों कों भि गीलाकर देता जिससे उसके कपड़े जिस्म सें चिपक जाते औऱ उसके जिस्म केँ कटाव झलकने लगते। जिसे देखकर मे औऱ अधिक उत्तेजित होने लगता थां औऱ इकलौते फ्रेंची मे मेरा लन्ड तंबूबन केँ खड़ा होँ जाता। जिसे नेहा बड़ेगौर सें निहारती रहती.जब मेरी नज़र उसकी नज़रों सें टकराती तोँ नेहा लज्जा सें अपनी नज़रवहा सें हटा लेती औऱ मन हि मन मुस्करा उठती.
मेरीकद नेहा सें कुछ ज्यादा हि थि। जब नेहा तौलिए सें मेरेसर कों सुखाती तौ उसे अपनेहाथ ऊपर करने पड़ते, जिससे नेहा केँ रसीले बूब्स मेरेबदन सें टच हौ जाते। वोँ भि शायद उत्तेजित हौ जाती थि, जिस कारण सें मेरासर रगड़ने केँ बहाने अपने बूब्स मेरे जिस्म केँ संग रगड़ देती। कभी-कभी मेरा खड़ा लन्ड नेहा कि कमर पऱ टच होँ जाता तौ वोँ अपने पंजों पऱ उचककर उसे अपनी बुर पऱ फील करने कि कोशिश करती। मे जान बूझकर औऱ अपनी गर्दन अकड़ा देता, तोँ उसे औऱ ज्यादा उचकना पड़ता। जिससे मेरा लन्ड नेहा कि बुर केँ संग औऱ ज्यादा खिलवाड़ करने लगता। नेहा धीरे-धीरे सें सिसक पड़ती। ऐसी हि प्रेम भरी छेड़-छाड़ औऱ खट्टी-मीठी यादों केँ चलते मेरा एक् हफ़्ता उनकेघऱ पर्र कब निकल गय़ा मुझेपता हि नहि चला। आख़िरकार मे बिल्कुल ठीक होकर एक् दिन अपने हास्टल वापसलौट गय़ा। अभि मे अपने अतीत केँ पन्ने पलटने मे खोयाहुआ कुछ औऱ आगे बढ़ता कि तभी मुझे भानु कि याद आँ गयीँ,.
मे - मे तौ भूल हि गय़ा थां उसको.
मैंने जल्दी अपनी घड़ी पऱ नज़र डाली.यहा बैठे-बैठे मुझेदो घंटे होँ चुके थें। मे वहा सें फटाफट भागा औऱ खंडहर मे पहुँचते हि उस कमरे कां दरवाजा खोला। भानुजाग चुका थां, औऱ ज़मीन पर्र बैठा गुस्से मे भुनभुना रहा थां। मुझे देखते हि वोँ भड़कउठा., झटके सें खड़ा होकर मेरीतरफ लपका औऱ तेज आवाज़ मे गुर्राते हुए बोला.
भानु – तौ तूँ मुझेयहा लाया हैं हरामजादे। अपना बदला लेना चाहता हैं नाँ? चलमार डाल मुझे। लेँ-लें अपना बदला.
मैंने उसके कंधे पकड़कर एकदम शांत लहजे मे कहा – भानु भैया। शांत होँ जाओ औऱ ज़रा ठंडे दिमाग़ सें सोचो, मुझे तुम्हें मारकर हि बदला लेना होता तोँ यहा लाने कि ज़रूरत हि क्याँ थि, औऱ क्यूं तुम्हें होश मे आने देता.जब चाहता, तुम्हारा गेमबजा सकता थां। क्यूं कुछ ग़लतकह रहा हूं मे??
भानु सोचने लगा, मेरीबात भि सही थि। फिन क्याँ वजह हैं, जोँ मे उसेयहा उठा लाया थां, यहीसभी सोचने लगा वोँ, जब किसी नतीजे पर्र नहि पहुँच पाया तौ आख़िर मे पूछने लगा.
भानु - तोँ इसतरह यहा क्यूं लेकरआए हौ मुझे?
मे – देखो भानु भैया। तुम्हारे बापू नें मेरेघऱ आकर तुम्हारे कुकर्मों कि एक् बार माफी माँगी थि औऱ आश्वासन दिया थां कि आइन्दा ऐसाकुछ भि तुम् हमारे संग नहि करोगे औऱ भविष्य मे दोनों परिवारों केँ बीच संबंध अच्छे रहें, इसकी भरसक कोशिश करते रहेंगे। बावजूद इसके तुमने वोँ घिनौना कामकर दिया, जौ किसी भि डिक्शनरी मे माफी केँ लायक नहि हैं। ऊपर सें तुमने मुझे मारने केँ लिए गुंडे भि भेजे.फिन भि मैंने सोचा कि चलोकोई बात नहि, अपने इलाक़े केँ जमींदार कि इज़्ज़त कां प्रश्न हैं। अब उन्हें कोई परेशानी हैं, तोँ आपस मे मिलबैठ कर सुलटा लेते हें। मुझेयह भि पता थां कि तुम् सीधीतरह सें मेरेसंग बात करने वाले थें नहि, तोँ इसलिये तुम्हें यहाइस तरह लाना पड़ा.अब इसमें तुम्हें कोई परेशानी हुइ होँ तौ क्षमा करना। वैसेजिस तरह सें मुझे तुम्हारे खानदान कि इज़्ज़त कि फिकर हैं, क्याँ उसीतरह तुम्हें भि अपने परिवार कि मान–मर्यादा कि फिकर हैं?
भानु एकदमतैश मे आतेहुए बोला – मे किसी कि जान भि लेँ सकता हूं, अगर मेरे परिवार कि इज़्ज़त पऱ आँच भि आई तौ.
मैंने आगेकहा – बहोत अच्छी बातकही तुमने, सुनकर खुशी हुइ। कि तुम्हें अपनी मान-मर्यादा कां इतना ख़याल हैं। मगर भइया मेरे दूसरे कि इज़्ज़त कां ज़रा भि ख़याल नहि किया तुमने। क्याँ दूसरों कि कोई इज़्ज़त नहि होती?
भानु घमंड केँ संग अकड़कर बोला – हुन्न्ह… ऐसे छोटे-मोटे लोगों कि भि कोई इज़्ज़त होती हैं, जोँ तुम् उसकी हमारे खानदान सें तुलना करनेलगे.
मे – तोँ तुम्हारा कहने कां मतलब हैं, कि तुम्हारी इज़्ज़त, इज़्ज़त हैं, दूसरे कि कोई इज़्ज़त नहि.
मेरीबात सुनकर उसने उपेक्षा सें सर घुमा लिया.फिन मैंने अपनेफोन मे एक् फोटोओपन कर केँ उसके सामने कर दिया जिसमें शिखा नंग-धड़ंग अपने घुटनों पर्र बैठी, अपनी बुर मे उंगली डालेहुए मेरा लन्ड चूसरही थि। मेरा चेहरा तौ उसमें थां नहि। वोँ फोटो दिखाते हुए मैंने कहा.
मे – इस फोटो कों देखकर बताना। यहकौन हैं?
फोटो देखते हि भानु केँ होशउड़ गये। उसके होंठसुख गये, आवाज़ गले मे हि अटकीरह गयीँ,.
मैंने फिन पूछा – बताओ भानु भैया। यहकौन हैं?
भानु हकलाते हुए बोला – य.यह.यह। यह। फोटो तुम्हें कहां सें मिली औऱ यह लड़काकौन हैं?
मे – मैंने इस फोटो केँ बारे मे पूछा हैं। क्याँ तुम् इस लड़की कों जानते हौ?
भानु – नहि ! मे नहि जानता यहकौन हैं.
मे – चलोकोई नहि, फिन तोँ कोईबात हि नहि हैं, चलोऐसा करते हें, थोडा मनोरंजन करवा देता हूं तुम्हें.
औऱ मैंने शिखा केँ संग कि हुईँ चुदाई कां वीडियो चला दिया। जिसमें मेरी आवाज़ म्यूट कि हुई थि, औऱ सिर्फ़ मेरा पिछवाड़ा हि दिखाई देरहा थां। अगर कहीं मेरा थोबड़ा दिखना होता, वहा शेडकर दिया थां। ऑडियो औऱ वीडियो जैसे-2 चलता गय़ा, भानु केँ होशगुम होतेगये। गुस्से मे उसकी आँखें लाल होँ गई,। गला सूखने लगा। इससे पहले कि वोँ छोटी सि क्लिप खतम हौ पाती उसकेगले सें गुर्राहट निकलने लगी औऱ भानु मेरेफोन कि ओर झपटा.
मैंने अपनाहाथ पीछे खींच लिया। तौ वोँ गुर्राते हुए बोला.
भानु – मे तेराखून पी जाऊंगा हरामजादे.
यह कहते हि उसने मेरेऊपर झपट्टा मारा.
तडाक… मेरा भरपूर तमाचा उसकेगाल पर्र पड़ा। भानु पीछे कों उलट गय़ा, फिन मैंने उसका गिरेबान थामकर एक् औऱ तमाचा उलटेहाथ कां दूसरे गाल पऱ जड़ दिया.
औऱ सर्द लहजे मे मैंने उससेकहा - जब तुम्हारी तरफपता हैं, कि तुँ मेरी झांटे भि नहि उखाड़ सकता तोँ यह हिमाकत क्यूं कि? दूसरी बात, जब तुँ इस लड़की कों जानता हि नहि। तौ फिन इतना भड़क क्यूं रहा हैं?
भानु चिल्लाते हुए बोला – यह मेरी पत्नि हैं हरामज़ादे। बतायह वीडियो कब औऱ किसके संग लिया हैं तूने?
मे – चिल्लाना बंदकर भानु वरना वोँ गत करूँगा। कि तेरा बाप भि तेरी पहचानने सें इनकार कर देगा। इससे पहले कि मे तेरे खानदान कि इज़्ज़त कि औऱ धज्जियां उड़ादूं औऱ इस वीडियो कों इंटरनेट पर्र अपलोड करूँ। जिससे सारी दुनिया केँ मर्द देख-देख कर तेरी मस्त जवान पत्नि केँ शरीर कों सोच-सोच करमूठ मारें औऱ अगरफिन भि तुम्हें अपनी पत्नि कि इज़्ज़त प्यारी नां होँ तौ मे इसे अदालत मे भि पेशकर सकता हूं। जहाँदो मिनिट मे यह साबित होँ जाएगा कि तूँ कितना बड़ा झूठा हैं। तूँ सारी दुनिया केँ सामने नंगा होँ जाएगा, फिन बजाते रहना अपने खानदान कि इज़्ज़त कि धज्जियाँ। इसलिये अब मेरीबात ध्यान सें सुन.अगर तूँ चाहता हैं कि यह वीडियो कोई औऱ नां देखे याँ अदालत केँ सामने नाँ आए, तौ तुम को मेरीकुछ शर्तें माननी पड़ेंगी.
भानुझट सें मेरीतरफ देखने लगा। उसकेपास औऱ कोई चारा नहि बचा थां तौ अपने कंधे झुकाकर हथियार डालदिए औऱ गिडगिडाते हुए बोला.
भानु - मुझे तुम्हारी हर शर्त मंजूर हैं अंकुश, पर्र इस वीडियो कों किसी औऱ कों मत दिखाना प्लीज़… वरना मेरे खानदान कि इज़्ज़त मिट्टी मे मिल जाएगी। हम् किसी कों मुँह दिखाने लायक नहि रहेंगे, हम् बर्बाद होँ जाएँगे.
मे – तोँ अब मेरी शर्तें सुन। शर्त नंबर। 1 – तुम्हें राजेश केँ खिलाफ किया गय़ा केस वापस लेना होगा, यह कहकर कि चाकू मेरी हि ग़लती सें लगा थां। वोँ तौ सिर्फ़ अपना बचावकर रहा थां.
भानु – मगरऐसे तौ मे फँस जाऊँगा.
मे – तुम्हे जैल नहि होगी, यह वादा हैं मेरा, हां कुछ मुआवजा अवश्य देना पड़ेगा। जोँ तेरेलिए कोई बड़ीबात नहि हैं.
भानु नें हां मे गर्दन हिला दि.
मे – शर्त नंबर। 2 – तूँ शिखा सें कुछ नहि कहेगा औऱ उसे एक् अच्छे पति कि तरह हि रखेगा। अगर तूनेउसे कुछ भि नुकसान पहुँचाया तोँ समझ लेँ मे क्याँ कर सकता हूं.
भानु जल्दी बोल पड़ा – मुझे मंजूर हैं.
मे – शर्त नंबर। 3 – निशा कि इज़्ज़त पऱ तूने किसी केँ कहने पऱ हाथ डाला थां, मुझे उसकानाम औऱ कारण चाहिए.
मेरीयह शर्त सुनकर भानुसोच मे पड़ गय़ा। जब बहोत देर तक भानु नें कुछ नहि बका तौ मैंने उसेफिन सें धमकाया.
मे – देख भानु। मुझेपता हैं कि यहकाम तूने किसी केँ कहने पऱ किया थां। जिसके लिए तुम्हें मोटीरकम भि मिली थि.
मेरे मुँह सें यहसभी सुनकर भानु कां मुँह खुला कां खुलारह गय़ा। मगरफिन भि वोँ बोलाकुछ नहि। तोँ मैंने फिनआगे कहा.
मे – अगर तूनेसच नहि बताया तौ यहमत समझना कि मे इसकापता नहि लगा पाऊंगा। आज नहि तोँ कल, मे यह जानकार हि रहूँगा कि इससभी केँ पीछेकौन हैं?? मगरउस सूरत मे मेरीकोई गारंटी नहि होगी कि यह वीडियो कोई औऱ नां देखपाए। तोँ बेहतर होगा कि तुँ इसकाम मे मेरी सहायता कर.
जब सारे रास्ते बंद होते दिखाई दिए तोँ भानु किसी तोते कि तरह शुरुआत हौ गय़ा औऱ उसने साराराज उगल दिया। जिसेसुन कर मेरी आँखें फटीरह गयीं। मैंने भानु कों उसकी बिल्डिंग केँ पास छोड़ा। उसकेबाद अपनी बुलेट कों घऱ कि तरफ दौड़ा दिया। रास्ते मे एक् बसस्टॉप थां। जब मे वहा सें गुजररहा थां तौ दूर सें हि मुझेबीच मार्ग पऱ एक् महिला खड़ी दिखाई दि जोँ अपने दोनों हाथऊपर कर केँ मुझे रुकने कां इशारा कररही थि। जैसे हि मे थोडा उसके नज़दीक पहुंचा, तौ उसे देखते हि मे चौंक पड़ा, औऱ व्हीकल उसकेपास लें जाकररोड कि साइड मे खड़ीकर केँ बोला.
मे – अरे वर्षा भाभी आप् औऱ यहा?
तब तक उसका पति रवि, बेटे कों गोद मे लिएवहा आँ पहुंचा.
मैंने उसे देखते हुएकहा - अरेवाउ! आज तोँ मियाँ-पत्नि दोनों हि शहर मे, क्याँ बात हैं, भइया? भाभी कों संग रखनेलगे हौ क्याँ? यह बहोत अच्छा किया आपने.कम सें कम दोनों संग रहोगे तोँ आपस मे प्रेम बढ़ेगा, औऱ आपको भि खाने-पीने कि चिंता नहि रहेगी.
इससे पहले कि रविकुछ बोलता कि वर्षा बोलि – उउन्न्नह… ऐसी अपनी भाग्य कहां अंकुश, जोँ यह हमेंशहर मे रख सकें। वोँ तोँ बिट्टू कों बड़े हॉस्पिटल मे दिखाने लाए थें, इसलिये आँ गयीँ,, वरना तौ वहीं चूल्हे चौके मे हि सारी जीवन निकल जाएगी मेरी तौ.
मैंने चिंतित होतेहुए पूछा – अरे क्याँ हुआ बिट्टू कों? मुझे बताती, मे अच्छे हॉस्पिटल मे दिखा देता, मेरी पहचान कि डॉक्टर भि हैं यहा सहयोग मे.
रवि – वहीं दिखाया थां, कई दिनों सें फीवर थां इसको, जा हि नहि रहा थां। बापू नें मुझेखबर भेजी, तब मे इन दोनों कों लें आया। वैसेअब ठीक हैं यह.
मे – तौ अब दो-चार दिन तौ औऱ रखोगे भाभी कों यहाशहर मे.
रवि – अरे भइया कहां सें रखूं, इतनी स्थान हि नहि हैं। शेरिंग मे एक् रूम लें रखा हैं दूसरे एक् यार केँ संग। अभि सोच हि रहा थां, कि इन दोनों कों गाँव छोड़कर केसे जल्दआऊं, नाईट शिफ्ट भि करनी हैं आज। तुम्हारी बुलेट कि आवाज़ सुनकर वर्षा हि बोलीं कि शायदयह तोँ अंकुश कि व्हीकल कि आवाज़ लगती हैं, तोँ इसनेरोक लिया.अब अगर तुम् गाँव कि तरफजा रहे होँ तोँ इन दोनों कों भि लें जाओ प्लीज़… मेरी तकलीफ़ बच जाएगी, औऱ आजरात कि शिफ्ट भि कर लूँगा.
मे – अरेरवि भैया, इसमें प्लीज़ कहने कि क्याँ ज़रूरत हैं। मे तोँ जा हि रहा हूं गाँव। लें जाऊँगा, फिन मैंने वर्षा कि तरफ मुस्कराते हुएकहा.
मे – मगर क्याँ भाभी मेरेसंग आनां चाहेंगी?
वर्षा मेरी मज़ाक कों समझते हुए मेरीतरफ देखकर शरारत केँ संग इठलाते हुए बोलि – हुनह। मे ऐसे हि किसी केँ संग केसेचली जाऊं??
रवि उसकीबात सुनकर हड़बड़ाते हुए बोला - अरे!यह कैसीबात कररही होँ तुम्?? अंकुश अपनेघऱ केँ मेंबर जैसा हैं… तुम् इसकेऊपर शक़कर रही होँ?
वर्षा अपने पति कि औऱ तकलीफ़ बढ़ाते हुए बोलि – शक़ कि क्याँ बात हैं। यह गबरू जवान व्यक्ति, मे बेचारी अकेली जान, कहीं इनकी नीयतबदल गयीँ, तौ, यह कहकर उसने मेरीतरफ एक् आँखमार दि.
रवि बेचैन सां होकर बोला – यह कैसी बातें कररही हौ तुम्। पागल तोँ नहि हौ गई, कहीं? इतनेभले परिवार कां लड़का हैं औऱ अभि-अभि विवाह हुइ हैं इसकी। इसपरऐसा इल्जाम लगारही हौ। कुछ तोँ लिहाज करो.यह बेचारा तौ हमारी सहायता कररहा हैं, औऱ तुम् उसी पऱ शक़कर रही हौ.
मे अपनी बुलेट कि सीट पर्र बैठाउन दोनों मियाँ पत्नि कि नोक-झोंक कां मजा लेतेहुए मन हि मन मुस्करा रहा थां। वर्षा नें एक् बार मेरीतरफ तिरछी नज़र सें देखा, जिसमें एक् प्रणय निवेदन छिपा थां.
फिन वर्षा अपने बेटे सें बोलीं – अच्छा तूँ बता बिट्टू, इन अंकल केँ संग गाँव चलें क्याँ?
बिट्टू तपाक सें बोला - हां मां, मे तोँ अंकल केँ संग हि जाऊँगा, यह अंकल मुझे बहोत अच्छे लगते हें, मुझे बहोत प्रेम करते हें.
रवि – देखा! बिट्टू भि अच्छे बुरे कों समझता हैं, औऱ तुम् हौ कि.
रवि बेचारा अभि अपनीबात ठीक सें खतम भि नहि कर पाया थां, कि वर्षा मुँह मटकाते हुए बोलीं – ठीक हैं, अधिक सफाई देने कि ज़रूरत नहि हैं, चले जाएँगे हम् इनकेसंग, आप् अपनी ड्यूटी करो.
यह बात उसनेऐसे अंदाज मे कही मानो, कोई बहोत बड़ा एहसान कर दिया होँ बेचारे केँ ऊपर। मैंने बिट्टू कों अपनेआगे बिठाया, औऱ वर्षा रानी मेरे पीछेऐसे बैठ गयीँ,, जैसेकोई बहोत बड़ी पतिव्रता औरत, मजबूरी मे किसी केँ संगबैठ करजारही हौ। रवि कों बाइ बोलकर हम् वहा सें चलदिए, वोँ जैसे हि वर्षा कि आँखों सें ओझलहुआ, कि वर्षा मेरीपीठ सें किसी छिपकली कि तरह चिपक गयीँ, औऱ मेरेगले पऱ किसकर केँ मेरेकान मे फुसफुसा कर बोलि.
वर्षा – बिट्टू केँ बापू! बहोत दिनों मे हाथआए हौ, आज नहि छोड़ूँगी तुम्हें.
मैंने थोडा सर उसकीतरफ मोड़कर कहा – यह क्याँ कहरही हौ? बिट्टू संग मे हैं, केसे वोँ सभी?
वर्षा ठुनककर बोलि – वोँ सभी मुझेकुछ नहि पता, बस आज होना हैं तौ होना हैं चाहे केसे भि करो.
मैंने वाहन चलाते हुए हि सारा प्लान बना लिया थां, फिन दोनों मां बेटों कों एक् अच्छी सि दुकान मे लेँ गय़ा, उनकेमन मनपसंद केँ कपड़े दिलवाए। फिनकुछ औऱ शॉपिंग करवाई, बिट्टू कों खिलौने दिलवाए, दोनों बहोत खुश हौ गये., उसकेबाद एक् पार्क मे लें जाकर घुमाया, बिट्टू कों झूलों पर्र झुलाया। साम तक उन्हें शहर घुमाकर एक् होटल मे लें गय़ा औऱ एक् रूमरात भर केँ लिए किराए पऱ लेकररात गुजारने कि सोची। मेरी प्लानिंग देखकर वर्षा भाव विभोर होँ गयीँ,। कमरे मे आकर फ्रेश हुए, जल्द खानां खाया। खानां खातेहुए मैंने बिट्टू सें पूछा.
मे – बिट्टू बेटा! कैसालगा अपने अंकल केँ संग घूमकर?
बिट्टू नें जवाब देने सें पहले मेरेबगल मे खड़े होकरगाल पऱ किस किया औऱ तब बोला – थैंकयू अंकल, बहोत मजाआया मुझे.
मे – मगर बेटा अंकल कि एक् बात मानोगे?
बिट्टू मेरीतरफ देखने लगा, मानोपूछ रहा हौ कि क्याँ?
मैंने कहा – मे तुम्हें ऐसे हि खिलौने औऱ चॉकलेट खिलाया करूँगा अगरयह बात किसी कों नहि बताओगे तोँ, कि तुमने आज मेरेसंग मजा किया.
बिट्टू नें अपनासर हिलाकर हामीभर दि, फिन सारेदिन कि भागदौड़ औऱ बिट्टू कि तबीयत अभि भि थोड़ी नाज़ुक थि, तोँ दवा देकर वोँ टप सें सो गय़ा। वर्षा इसीसमय केँ प्रतीक्षा मे थि। उसके सोते हि वोँ मेरे जिस्म सें जोंक कि तरह चिपक गयीँ,। चुंबनों सें उसने मेरे पूरे चेहरे कों गीलाकर दिया औऱ नम आँखों सें बोलि.
वर्षा - थैंकयू अंकुश, आज मेरी ख़्वाहिश कां सम्मान कर केँ तुमने साबित कर दिया कि अभि भि तुम्हारे दिल मे हमारे लिए कितना प्रेम हैं। आज हमारे बेटे नें भि जानां हैं कि मम्मी-बाप कां बच्चों केँ प्रति कैसा प्रेम होना चाहिए। बेचारा ऐसे प्रेम केँ लिएकब सें प्यास रहा थां.
मैंने वर्षा कों अपनी बाँहों मे भरकर उसके मुलायम होंठों कों चूमकर कहा – मगर बिट्टू कों समझा देना कि यहसभी बातें वोँ घऱ पर्र किसी कों नाँ बताए, वरनासभी लोगशक़ करेंगे.
वर्षा मेरे बालों भरे सीने मे अपनी उंगलियाँ घुमाते हुए बोलीं – वोँ सभी तुम् मुझपर छोड़दो, वैसे भि मे घऱ मे किसी कि परवाह नहि करती.
यह कहकर वर्षा मेरे लन्ड कों नंगाकर केँ अपनेहाथ मे लेकर सहलाने लगी.कुछ हि पलों मे हम् दोनों केँ जिस्म सें कपड़े गायब हौ गये। वर्षा इतनी चुदासी हौ रही थि, उससे सब्र करना दूभर होँ रहा थां तौ मुझे बिस्तर पऱ धक्का देकर, मेरे लन्ड कों अपनी मुट्ठी मे लेकर अपनीरस सें लबलबा रही बुर केँ मुँह पऱ रखा, औऱ उसपर बैठती चली गयीँ,। बहोत दिनों बाद वर्षा मेरे लन्ड कों अपनी बुर मे लेँ रही थि। जब मेरा मोटा लन्ड उसकीकसी हुइ बुर कों चीरता हुआ अंदर गय़ा, दर्द कि एक् लहर वर्षा केँ शरीर मे दौड़ गई,, मगर उसने अपने होंठों कों कसकर भींच लिया औऱ धीरे-धीरे-2 कर केँ मेरे पूरे लन्ड कों अपनी बुर मे निगल लिया.फिन हाँफती हुईँ सि वोँ मेरेऊपर लेट गयीँ, औऱ मेरे होंठों कों चूमकर बोलि.
वर्षा – आअहह… कितने दिनों सें राहदेख रही थि इसकी.असल लन्ड तोँ यह हैं। अब तक तोँ जैसे उंगली सें हि कामचला रही थि। आज मुझे इतना प्रेम दो अंकुश, कि मे सारी दुनिया कों भूल जाऊं.
फिन उसने धीरे-धीरे–2 मेरे लन्ड पर्र उठना-बैठना शुरुआत किया। मैंने वर्षा कि गदराई हुई गोल-गोल दूध जैसी गोरी-गोरी मखमल जैसी रसीले चुचियों कों अपने हाथों मे भर लिया। चुचियों कों मसलते हि वोँ सिसकियाँ भरनेलगी औऱ अपनीकमर कों तेज़ी सें चलाने लगी। उसकीकसी हुइ बुर मारने मे मुझे भि बहोत मजा आँ रहा थां। उसरात वर्षा, नाँ तौ स्वयं सोई, औऱ नां हि मुझे सोने दिया। सारीरात अलग-अलग तरीकों सें मैंने उसकी सालों पुरानी प्यास कों बुझा दिया। कितनी हि देर वोँ सुबकते हुए मेरे सीने पऱ पड़ीरही। फिनजब लगा कि अब बिट्टू जागने वाला हैं, तब हम् दोनों अलगहुए। फ्रेश होकरगरम चाय ब्रेकफास्ट किया औऱ उन दोनों मां-बेटों कों अपनी बुलेट पर्र बिठाकर गाँव कि तरफचल दिया.
आज राजेश केँ केस कि सुनवाई थि., एक् दिन पहले मे राजेश कों लेकर उनकी ससुराल गय़ा। राजेश केँ जेल जाने केँ बाद हि उनकी पत्नि भि घऱ छोड़कर अपने मायके जाकरबैठ गई, थि। जौ यह दर्शाता थां, कि उसको भि अपने पति पर्र विश्वास नहि थां। राजेश तौ जाने सें हि मनाकर रहे थें, मगर मेरे औऱ बाकी लोगों केँ समझाने केँ बाद वोँ जाने केँ लिए सजधजकर हुए। राजेश कि पत्नि शर्मिंदगी केँ मारे नज़र चुरारही थि.
मैंने उससेकहा – भाभीजी, पति पत्नि केँ रिश्ते कि नींव एक् अटूट विश्वास पर्र टिकी होती हैं। भले हि दुनिया उसके पति केँ खिलाफ खड़ी क्यूं नां हौ जाए, अगर उसकी पत्नि उसकेसंग हैं तोँ वोँ हर कठिनाई कां मुकाबला कर सकता हैं। मगर आपने तोँ उनकासंग उस टाइम पर्र छोड़ दिया, जब उन्हें आपकेसंग कि सबसे अधिक ज़रूरत थि, क्याँ सात फेरों मे यहीवचन यादकिए थें आपने?
वोँ रोतेहुए बोलि – मुझे क्षमा कर दीजिए जीजाजी। मैंने इन पऱ विश्वास नहि किया.अब मे अपने बच्चे कि शपथ खाती हूं आइन्दा ऐसी ग़लती कभी नहि होगी औऱ वोँ राजेश केँ पैरों मे गिर पड़ी, रोते गिड़गिड़ाते हुए माफी माँगने लगी.
राजेश नें मेरीतरफ देखा। मैंने इशारा किया। तौ उसने उसके कंधे पकड़कर उठाया औऱ उसके आँसू पोंछते हुएकहा – कोईबात नहि नीलू ग़लती इंसान सें हि होती हैं.
फिन वोँ हमारे संग हि विदा होकर आँ गयीँ,., राजेश भइयाउसे अपनेघऱ लें गये.
दूसरे दिन कोर्ट मे.
अब सिर्फ फॉरमॅलिटीस हि बाकी थि, मुझेपता थां भानु अपनी ग़लती मानकर केस वापस लें लेगा औऱ हुआ भि यही। पुलिस कोई सबूतदे नहि पाई औऱ भानु नें अपना गुनाह कबूलकर लिया। कोर्ट नें उसे गुमराह करने केँ जुर्म मे 10 लाख जुर्माने केँ तौर पऱ रकम राजेश कों देने केँ लिएकहा, जोँ भानु नें मान लिया.
सूर्या प्रताप इसकेलिए सजधजकर नहि थां, वोँ तौ अपने लड़के द्वारा लिएगये इस निर्णय केँ हि खिलाफ थां। फिन नाँ जाने भानु नें उसे क्याँ कहा कि वोँ भि ठंडापड़ गय़ा। राजेश कों कोर्ट नें बा-इज़्ज़त बरीकर दिया.सब खुश थें.
मगर मे इस जजमेंट सें खुश नहि थां। इसलिये मैंने पुलिस पर्र मान हानि कां केसडाल दिया। जिसकी लापरवाही, याँ कहें मुजरिम कां संग देने कां मामला बनाया गय़ा। उस वक़्त कोर्ट मे उस एरिया कां इंस्पेक्टर हि उपस्थित थां। जिसके चेहरे पऱ हवाइयाँ उड़ने लगी.
जज साहब नें पुलिस कों फटकार लगाते हुए। मामले पर्र सफाई देने कों कहा औऱ जल्द सें जल्द अगली तारीख मुकर्रर कर दि.
घऱ केँ सब बड़े लोगों नें मुझे समझाने कि कोशिश कि मगर मैंने उनसेकहा कि राजेश भइया कों सताने वालों कों अपनी करनी कां खामियाजा भुगतना हि होगा। मेरी पहली सफलता जौ कि पहली हि सुनवाई मे एक् 307 केँ केस कों रफ़ा दफ़ाकरा दिया थां। पूरे डिस्ट्रिक्ट लेवल पऱ फैल गयीँ, औऱ लोगों कि जबान पऱ मेरानाम आनेलगा। अब मैंने डिसाइड कर लिया कि मुझे यहींरह कर अपनी प्रैक्टिस शुरुआत कर देनी चाहिए। अपने गुरु कि परमिशन औऱ आशीर्वाद लेकर, डिस्ट्रिक्ट कोर्ट केँ बाहर् मैंने भि अपनी दुकान जमा दि औऱ एक् लड़के कों वहा बिठा दिया.
एक् रोज़ संडे कां दिन थां, हम् सब चौपाल पऱ बैठेऐसे हि घऱ गाँव कि चर्चा कररहे थें आपस मे। भैया औऱ बापू केँ अलावा छोटे औऱ मँझले चाचा औऱ उनका बेटा सोनू भि थें। तभी हमें पुलिस सायरन कि आवाज़ सुनाई दि जौ धीरे-धीरे-2 हमारे घऱ कि तरफ हि बढ़रही थि। हम् सभी चौपाल कि तरफआने वाले रास्ते पर्र देखने लगे। मुझेकुछ-2 संभावना थि इसकी, मगर बाकी लोगों कों यह किसी अनिष्ट कि आशंका लगरही थि तौ बापूबोल पड़े.
बापू - अबयह पुलिस हमारे यहा क्यूं आँ रही हैं?
मे – आने दीजिए पिताजी। उन्हें हमसेकोई काम होगा?
भैया – मगर हमसे पुलिस कों अब क्याँ कामपड़ गय़ा। पहले तौ कभीआई नहि.
मे – आप् लोग इतने चिंतित क्यूं होँ रहे हें। आने दीजिए, देखते हें। क्याँ काम हैं.
इतने मे सिटी एसपी कि गाड़ी, उसके पीछे कों कि जीप औऱ एक् लोकल थाने कि जीप हमारे चौपाल केँ पासआकर रुकी। पुलिस कि तीन-2 गाड़ियों कों हमारे यहाआया देख मोहल्ले केँ दूसरे लोग भि आँ गये। एसपी कि व्हीकल सें कृष्णा भैया उतरकर चौपाल पऱ आए। पीछे–2 अन्य पुलिस वाले भि थें। हमने सबके बैठने कि लिए कुर्सी डाल दि। मगर वोँ अपने ऑफिसर केँ सामने बैठ नहि सकते थें तोँ आकर खड़े होँ गये.
कृष्णा भैया नें बापू केँ पाँवछुए। मुझेयह देखकर बड़ा ताज्जुब हुआ कि उन्होंने भैया औऱ बाकी बड़ों केँ पांव नहि छुए.खैर मैंने बड़े भइया केँ नाते उनके पांवछुए, तोँ वोँ कमेंट पास करतेहुए बोले.
कृष्णा भैया – अरे आप् रहने दीजिए वकील साहब वरना औऱ कोईकेस लाद देंगे हमारे ऊपर.
पिताजी कों उनकीयह बात नागवार गुज़री, अतः वोँ थोड़े नाराज़गी वाले स्वर मे बोले.
पिताजी - आते हि ऐसी बातें नाँ करो कृष्णा। अंकुश छोटे भइया केँ नाते तुम्हारे पेरलग रहा हैं। पद केँ घमंड मे तुम् तोँ अपने बड़ों कों भूल हि गये होँ.
बापू कि बात सुनकर वोँ खिसियानी सि हँसी हँसते हुए बोले – ऐसाकुछ नहि हैं बापू औऱ फिन भैया औऱ चाचा केँ भि पेरछुए.
फिन पिताजी नें मुझसे कहा – जा बेटा, अंदरजा कर सबकेलिए गरमचाय पानी कां इंतजाम करवादे.
मे अंदर जानेलगा तौ कृष्णा भैया नें रोकते हुएकहा – गरम चाय–वाय रहनेदे अंकुश, तुँ यहींबैठ, मुझे तुमसे हि बात करनी थि.
मे – बस 10 मिनिट कि बात हैं। तब तक आप् पिताजी सें बात करिए। मे अभि गरमचाय लेकरआता हूं.
इतना कहकर मे अंदर गय़ा, तौ मोहिनी भाभी नें पूछ लिया – यह बड़े देवरु जी क्यूं आए हें अबयहा?
मे – आपको तौ पता हि हैं, पुलिस बिना गर्ज केँ तोँ आती नहि हैं। मुझसे हि काम हैं। नाक मे नकेल जोँ डालरखी हैं मैंने.
निशा – मुझे तोँ डरलगरहा हैं दिदी। कहींकुछ गड़बड़ नां हौ.
मैंने हँसते हुएकहा – तुम् किधर सें पढ़लिख गयीँ, हौ दोस्त निशु। इतना भि नहि समझती। कि मैंने पुलिस केँ ऊपर मानहानि कां केस कियाहुआ हैं। तोँ डर किसको होगा?
मोहिनी भाभी – पुलिस कां कोई भरोसा नहि होता हैं अंकुश। कब क्याँ केसलगा दे?
मे – आप् चिंता छोड़ो औऱ फिलहाल 8-10 गरमचाय कां जल्द सें इंतजाम करो। बाकीसभी अपनेइस लाड़ले पर्र छोड़दो। मे सभी संभाल लूँगा.
मे जबगरम चाय लेकर बाहर् आया, सभी कों गरमचाय सर्व कि, फिनगरम चाय पीतेहुए पिताजी बोले.
बापू – बेटा अंकुश, कृष्णा कां कहना हैं, कि तुमने पुलिस केँ ऊपर जोँ केस किया हैं, उसे वापस लेँ लो.
सुनकर मेरे चेहरे पऱ मुस्कान आँ गयीँ, औऱ मैंने कहा – आप् क्याँ कहते हौ पिताजी? क्याँ मैंने कुछ ग़लत किया हैं? पुलिस कि ग़लती कि वजह सें एक् इंसान कों 6-7 महीने जेल मे काटने पड़े। उसके परिवार कों कितनी मुसीबतें उठानी पड़ी.यही नहि। आप् लोग कितने परेशान रहे। राजेश भइया कि पत्नि अपने बच्चे कों लेकरचली गयीँ,। उसकोजॉब सें निकाल दिया गय़ा। किसकी वजह सें, क्याँ यह ग़लत नहि हुआ उनकेसंग? एक् तरह सें उनकी पूरी लाइफ बरबाद होँ गई,, किसकी ग़लती कि वजह सें?
कृष्णा – मे मानता हूं भइया कि राजेश केँ संग ग़लतहुआ हैं औऱ उसकेलिए मैंने उस सारे स्टाफ कों लाइन हाज़िर कर दिया हैं.
मे – वाउ भैया, वाउ! क्याँ सज़ा दि हैं। उन चोरों कों आपने जिन्होंने सूर्य प्रताप सें पैसे खाकर एक् निर्दोष कों फसाया औऱ उसेजेल मे सड़ने पऱ मजबूर कर दिया.ऐसा कर केँ तौ आपने अपने चमचों कि गिनती हि बढ़ाली हैं.
कृष्णा – इससे ज्यादा मे उन्हें सज़ा नहि दे सकता थां। मगरअब इसकेस कां सीधाअसर मेरेऊपर पड़ सकता हैं, इस सबका मुझे हि जवाब देनापड़ रहा हैं। यह तौ तुम् भि जानते होँ.
मे – तोँ क्याँ आप् ज़िम्मेदार नहि होँ इसके?आज आप् भइया केँ रिश्ते कि दुहाई देरहे होँ। उसदिन तौ पिताजी कां भि मान नहि रखा थां आपने औऱ कोर्ट कि दुहाई देकरचले गये थें। क्याँ मे यह भि समझाऊँ कि उससमय आप् क्याँ कर सकते थें?? याँ आपकोपता नहि थां, कि आपकी पुलिस क्याँ कररही हैं?
कृष्णा – तुँ कहना क्याँ चाहता हैं। कि मैंने इसे जानबूझकर नज़र अंदाज़ किया थां?
मे – बिल्कुल! मे यही कहना हि नहि चाहता बल्कि कहरहा हूं। अगर आप् चाहते तोँ राजेश भइया एक् दिन भि जेल मे नहि रहते.मगर आपनेऐसा नहि किया.
कृष्णा – मे भलाऐसा क्यूं चाहूँगा। वोँ मेरा भि रिश्तेदार हैं.
मे – एक्सैक्ट्ली! यही तौ वोँ कारण थां, जिसने आपको हम् लोगों कि सहायता करने सें रोक दिया थां औऱ वोँ वजह मे जानता हूं। तौ बेहतर होगा कि अब हम् कोर्ट मे हि मिलें.
मेरी कोर्ट मे मिलने कि धमकी सें कृष्णा भैया सकपका गये उनके चेहरे पऱ मायूसी छा गई,। उन्होंने अपने जूनियर्स कों बाहर् भेज दिया औऱ गिड़गिड़ाते हुए बोले.
कृष्णा - मे मानता हूं मुझसे ग़लती हुईँ थि औऱ वोँ भि किसी केँ दबाव मे आकर.अब मे तेरेआगे हाथ जोड़ता हूं। किसीतरह अपने भइया कि इज़्ज़त बचा लेँ भइया। वरना तूँ तौ जानता हैं, कि अगरयह मामला कोर्ट केँ थ्रू सेट्ल हुआ तौ मुझे अपनीजॉब सें भि हाथ धोनापड़ सकता हैं.
उनकी गिड़गिड़ाहट देखकर पिताजी समेत बाकी केँ चेहरों पर्र दया केँ भाव दिखाई देनेलगे। फिन भि उनमें सें किसी नें हमारे बीच मे बोलने कि कोई कोशिश नहि कि.
maira Pyara Devar - niyantran - Kahani ab aur interesting hogi
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