maira Pyara Devar - niyantran – New Episode
UPDATE 16
मुझे देखते हि सभीखुश हौ गये.
मोहिनी भाभी मेरी टाँग खींचते हुए बोलीं - लोजी, आँ गये देवरु राजा। बड़े एटीट्यूड वाले हें। भाभी बेचारी कब सें प्रतीक्षा मे हें कि उनके प्यारे, दुलारे, जगत सें न्यारे देवर जीजीआएँ तोँ वोँ उन्हें लाड़ करें.
मैंने हँसते हुए। पीछे सें उनकेगले मे बाहें डाल दि औऱ बोला – क्याँ भाभी। मुझे आपसेयह उम्मीद नहि थि। आप् मेरी हि टाँग खींचने लगी.
मोहिनी भाभी हँसते हुए बोलीं – अरे मेरे प्यारे देवरु। यहासभी कब सें तुम्हारा प्रतीक्षा कररहे हें। औऱ तुम् हौ कि अभि तक सोए पड़े थें। खैरचलो। आज आपकी छोटी भाभी, कामिनी, कां नंबर हैं लाड़ करने कां। बड़ी सें तौ बहोत लाड़ लें लिया.जाओ जाकर कामिनी कि गोद मे बैठो.
फिन मेरेकान मे फुसफुसा कर बोलीं – अंकुश कामिनी भाभी पर्र कोईरहम मत करना। पूरावजन रखकर बैठना आहिस्ता.
मे मुस्कराते हुए कामिनी भाभी केँ आगे अपने घुटने टेककर बैठ गय़ा। औऱ उनकेचिन कों उठाकर फेस अपनीतरफ कर केँ बोला – भाभी बिना देवरु कि ओर देखे हि लाड़ करोगी?
उन्होंने मुझे एक् बार भरपूर नज़र डालकर देखा। एक् सुर्ख लाल जोड़े मे वोँ इस वक़्त बहोत खूबसूरत लगारही थि। कुछ–कुछ इसतरह कि छवि.
एक् दम चाँद कां टुकड़ा। होंठों पऱ सुर्ख लिपस्टिक, गोरे-गोरे गाल, हल्की सि लालीलिए। मगर मेकअप केँ बाद भि उनके एक् गाल पर्र कुछ निशान सां थां.
कामिनी भाभी अपनी प्यारी सि मीठी सि आवाज़ मे कहा – देवरु जीआइए नाँ मेरीगोद मे बैठिए.
मे – आप् मुझेझेल पाएँगी?
मेरीबात पर्र सब हँसने लगे औऱ कामिनी भाभी नें लज्जा सें नज़र झुकाली.
मैंने फूफी सें पूछा – मेरीबात पर्र आप् सबलोग हंस क्यूं रहे होँ?
फूफी – कामिनी तेरे बड़े भइया कों झेल चुकी हैं, तुम्हारी तरफ झेलने मे क्याँ परेशानी होगी?
इस बात पऱ फूफी समेतसब ज़ोर-2 सें हँसने लगे.
मैंने झेंपते हुएकहा – अरे मे तोँ अपनेवजन कि बातकर रहा थां.
कामिनी भाभी – कोशिश करूँगी, आप् बैठिए.
मे अपनी तशरीफ़ लेकर उनकीगोद मे बैठने लगा। मैंने आरामसे कर केँ अपना सारावजन उनकी जांघों पऱ डाल दिया। उनकी मांसल जांघों कां स्पर्श अपने कूल्हों पऱ फील होते हि मेरा लन्ड जीन्स मे कुलबुलाने लगा.
उन्होंने मेरे गालों पऱ हाथ फेरकर प्रेम सें सहलाया औऱ फिन अपने लिपस्टिक सें पतले होंठरख कर दोनों तरफचूम लिया। लिपस्टिक केँ निशान मेरे दोनों गालों पर्र छपगये.
मैंने उनकेकान मे फुसफुसा करकहा - भाभी मे भि आपके गालों पऱ किस करना चाहता हूं.
कामिनी भाभी मेरीबात सुनकर शरमा गयीँ,.
मैंने कहा - बोलिए नाँ भाभी। प्लीज़ एक् बारबस.
कामिनी भाभी – अपने भैया सें पूछ लीजिए नां?
मैंने भैया सें कहा – भैया। मे भाभी कों किस करना चाहता हूं। अगर आप् इज़ाज़त दें तोँ.
कृष्णा भैया बोले – अरे दोस्त! आज तुम् भाभी देवर जी केँ बीचकोई कुछ नहि बोलेगा। तुम् दोनों आपस मे हि डिसाइड करो भइया.
मैंने कामिनी भाभी कि तरफ देखा। उन्होंने मौन स्वीकृति दे दि। फिन मैंने भाभी केँ दोनों गालों कां चुंबन लिया औऱ फुसफुसाया.
मैंने कहा - भाभी लगता हैं भैया नें आपकोरात बहोत ज़ोर सें काटा हैं। निशान अभि तक हैं.
लज्जा सें उनकी गर्दन झुक गई,। मे अभि उनकीगोद सें उठने कि सोच हि रहा थां कि चाची बोलीं पड़ी.
चाची – अंकुश भाभी कि गोद सें बिनानेग लिएमत उठना.
अरे वाह!यह तौ डबल धमाका हौ गय़ा। हां तोँ भाभी क्याँ देंगी। अपने देवर जी कों?
कामिनी भाभी – जौ भि चाहिए माँगलो.
मे – तौ ठीक हैं। मुझे एक् एप्पल आईफ़ोन चाहिए । (जोँ उस वक्तनया लॉंचहुआ थां मार्केट मे).
कामिनी भाभी – ठीक हैं। जब आप् पगफेरे केँ लिए आओगे। आपका मोबाइल आपकोमिल जाएगा.
मैंने एक्साइटमेंट मे भाभी केँ गालों कों फिन सें चूम लिया औऱ उन्हें थैंक्स बोलकर गोद सें उठ गय़ा.
दूसरे दिन शांति फूफी कों अपनेघऱ वापस जानां थां, सुभह हि सुभह वोँ रेडी होने मे लगी थि। मे जबजाग केँ आयातब तक वोँ जाने केँ लिए सजधजकर खड़ी थि। मैंने फूफी कों स्माइल किया। औऱ उनकेपेर छूतेहुए कहा। क्यूं फूफी? कलरात मजाआया??
शांति फूफी भि मुस्कराते हुए बोलीं – मस्त लौड़ा पाया हैं तुमने औऱ बहोत हि मस्त चुदाई करते होँ अंकुश। कभी आनां मेरेघऱ। तब देखूँगी, तुम् मे कितना दम-खम हैं? औऱ हँसते हुए उन्होंने मुझे अपनेगले सें लगा लिया., फूफी केँ खरबूजों नें मेरेसोए हुएशेर पऱ फिन अटैककर दिया.
मैंने उनकेकान मे कहा - अवश्य आऊँगा फूफी। आपका चैलेंज मुझे मंजूर हैं। मेरीहॉट डार्लिंग फूफी.
बीते एक् हफ्ते मे निशा नें मेरेदिल पर्र इसकदर कब्जा कर लिया थां कि मुझे उठते-बैठते, सोते-जागते बसउसी केँ ख्याल आते रहते। फूफी केँ जाते हि मे फिन उसके ख़यालों मे खोनेलगा। भाभी मेरी हालत सें अनभिज्ञ नहि थि, मगरघऱ कि भीड़-भाड़ केँ चलते वोँ भि कुछ नहि कर सकती थि। आहिस्ता एक्-एक् कर केँ रिश्तेदार विदा होनेलगे.
भाभी नें निशा कों औऱ कुछ दिनों केँ लिएरोक लिया थां। उनका भइया राजेश अपनेघऱ लौट गय़ा थां। बड़ी फूफी भि जा चुकी थि., एक् हफ्ते बाद कामिनी भाभी भि पहलीबार विदा होकर अपनेघऱ चली गई,। औऱ दोनों भइया अपनी ड्यूटी पर्र लौटगये। एक् दिन मे छोटी चाची केँ यहा उनके आँगन मे पड़ी चारपाई पर्र लेटा थां, चाची सिरहाने कि तरफ बैठी थि, मेरासर उनकीगोद मे रखाहुआ थां.
मैंने चाची केँ बूब्स कों दबाकर कहा – अहह चाची यह तौ औऱ अधिकफूल कर गुदगुदे होतेजा रहे हें.
चाची – हां अंकुश। अब इनमें दूध भि तोँ बनेगा नाँ। बच्चे केँ लिए। जैसे-2दिन नज़दीक आते जाएँगे वैसे-2 इनमें दूधआता जाएगा.
मैंने एक् चुचि कों मसलते हुएकहा – तोँ अभि चूसकर देखूं क्याँ। दूध निकलेगा इनमें सें?
चाची – नहि अंकुश, अभि नहि, वोँ तौ बच्चे केँ जन्म केँ बाद हि आएगा.मगर अंकुश। अब मेरामान बहोत करता हैं वोँ करने कां। प्लीज़ कुछकरो नां?
मे – मुझेकोई प्राब्लम नहि हैं चाची। आप् बोलो तौ अभि अंदर चलते हें?
चाची - नहि अभि नहि। एक् काम करना, कल कालेज सें जल्द सीधे यहीं आँ जानां.
मैंने हांबोल केँ एक् बार औऱ उनके चुचेमसल दिए। उनके मुँह सें आहहह निकल गई,। जवाब मे उन्होंने मेरे लन्ड कों पकड़कर मरोड़ दिया.
मे - आयईीीई… क्याँ करती होँ चाची?? उखाड़ोगी क्याँ? मैंने सिसकते हुएकहा.
चाची हँसते हुए बोलीं – जब तुमने मेरी चुचि मसली थि, तोँ कुछ नहि, अब अपनी बारीआई तोँ चिल्लाने लगे.
अभि हम् आगेकुछ औऱ करते, कि दरवाजे पर्र किसी केँ आने कि आहट सुनाई दि। मे उनकीगोद सें उठकरबैठ गय़ा। सामने देखा तौ निशा, रुचि कों गोद मे लिए खड़ी थि.
चाची – आओ निशा! अंदरआओ, वहा क्यूं खड़ीरह गई, ?
निशा हमारे पास तक आई। मे भि चारपाई सें खड़ा हौ गय़ा औऱ रुचि केँ गाल पर्र किस करने केँ लिए अपने होंठआगे किए। मे जैसे हि उसकोकिस करने वाला थां कि रुचि नें अपनासर पीछेहटा लिया औऱ मेरे होंठ निशा केँ गाल पऱ जा टिके.
रुचि ताली बजाते हुए हँसने लगी औऱ चिल्ला कर बोलीं - दादीमा देखो, चाचू नें मौसी कों क़िस्सी कर दि। ओहोहो! चाचू नें मौसी कों क़िस्सी करदी.
उसकेसंग चाची भि हँसने लगी। औऱ हम् दोनों झेंपगये। मैंने उसे सॉरी बोला.
निशा रुचि कों झूठा क्रोध दिखाकर बोलि – रुचि… तूँ बहोत शैतानी करती हैं। ठहर अभि तेरी पिटाई करती हूं.
रुचि उसकीगोद सें उतारकर मेरीगोद मे आँ गई,। औऱ मेरेगले सें लिपट गई,। रुचि केँ गाल पऱ एक् पप्पी कर केँ मैंने उसे चाची केँ पास चारपाई पर्र बिठा दिया.
चाची बोलि – तुम् दोनों बैठो, मे ज़रा गाय-भैंस कों चाराडाल करआती हूं.
औऱ वोँ एक्सक्यूज़ कर केँ वहा सें चली गई,। मैंने कहा, निशाजी बैठिए नां.
निशा – नहि मे ऐसे हि ठीक हूं। आप् बैठिए। आप् मुझे निशाजी क्यूं बुलाते हें? खाली निशा बोला कीजिए नाँ प्लीज़.
मे – आपको अच्छा लगेगा?
निशा – हां! औऱ होँ सके तौ यह आप् कि बजाय तुम् बोलो तौ मुझे औऱ ज्यादा अच्छा लगेगा.
मे – ठीक हैं, जैसा तुम् बोलो। वैसे निशा, तुमने मेरीबात कां अभि तक कोई जवाब नहि दिया?
निशा – कौन सि बात कां?
मे – मैंने उसदिन कहा थां नां, कि मे तुम्हें पसन्द करनेलगा हूं। क्याँ तुम् भि मुझे मनपसंद करती हौ?
निशा बिनाकोई जवाबदिए मेरीतरफ देखने लगी.पता नहि कैसा चमत्कार थां उसकी आँखों मे कि मे उसकी आँखों डूबने लगता थां। कुछदेर बाद उसने अपनी पलकें झुकाली। मगरकोई जवाब नहि दिया। मैंने उसकेहाथ अपने हाथों मे लें लिए औऱ फिन सें अपना प्रश्न दोहराया.
मे - बताओ नाँ प्लीज़.
निशा – अगर मे नां कहूँ तौ आप् मान लेंगे कि मे आपको पसन्द नहि करती?
मे – फिन भि मे तुम्हारे मुँह सें सुनना चाहता हूं.
निशा – सच कहूँ। तौ मे आपको पहली नज़र सें हि चाहने लगी थि, तब मुझे आपके बारे मे यह भि पता नहि थां, कि आप् कौन हौ?
मे – सच, तुम् सचकहरही हौ? ओह निशा…आई लवयू…यह कहकर मैंने उसे अपनी बाँहों मे भर लिया.
निशा – आईलवयू टू अंकुश जी। मे भि आपसे प्रेम करनेलगी हूं। मगर अभि छोड़िए प्लीज़… चाची आँ गयीँ, तौ क्याँ सोचेंगी???
मैंने उसे अपने सीने सें लगाकर कहा – तुम् चाची कि चिंता मतकरो जान। वोँ कुछ भि नहि कहेंगी। तुम् नहि जानती तुमने मुझे कितनी बड़ी खुशीदे दि हैं.
यह कहकर मैंने उसके चेहरे कों अपने हाथों मे लेकर उसके पतले-2 मुलायम होंठों कों चूम लिया। वोँ बुरीतरह सें शरमा गयीँ,, उसका जिस्म थरथर काँपने लगा, साँसें भारी होनेलगी.
रुचिफिन ताली बजकर चिल्लाई - ओहो! चाचू नें फिन मौसी कि क़िस्सी कर दि.
रुचि कि आवाज़ सुनकर हम् दोनों अलग होँ गये.
निशा रुचि कों थप्पड़ दिखाते हुए बोलीं – ठहर शैतान। अभि बताती हूं तेरी। औऱ फिन मुस्कराते हुए प्रेम सें उसने रुचि कों अपनी बाँहों मे समेट लिया। उसकेगाल पऱ एक् प्रेम भराकिस कर केँ मेरीओर देखकर वोँ मुस्कराईं, औऱ उसेगोद मे लेकर खिल-खिलाती हुई घऱ कि तरफभाग गई,.
मे मन हि मन मुस्कराता हुआ, उसे जातेहुए देखता रहा.रात कों खानां खाते वक्त भाभी नें कहा…
भाभी - अंकुश जी.कल निशा कों छोड़ आनां.अब बहोत दिन हौ गये उसकोयहा। घरवाले परेशान हौ रहे होंगे.
मेरी तोँ यहसुन कर साँस हि रुक गई,., खानां गले मे फंस गय़ा., मुझे खाँसी कां धसका सां लग गय़ा.
भाभी – क्याँ हुआ। अच्छे सें खानां खाओ। इतनी भि क्याँ जल्द हैं.
यह कहकर मुझे पानी कां ग्लास पकड़ा दिया। मैंने चोर नज़रों सें निशा कि तरफ देखा, वोँ भि भाभी कि बातसुन कुछ दुखी सि लगरही थि.
मे – ऐसी भि क्याँ ज़रूरत आन पड़ी एकदम सें भाभी। मुझेकल कालेज भि जानां ज़रूरी हैं। कोर्स बहोत पिछड़ गय़ा हैं भैया कि विवाह केँ चक्कर मे.
भाभी – तौ कोईबात नहि कालेज सें लौटकर छोड़ आनां.अब सारी जीवनयह यहा तौ नहि रह सकती नां., वैसे भि तुम्हारी बुलेट केँ लिए हैं हि कितना दूर?
मे – ठीक हैं। फिन दोपहर केँ बाद हि निकल पाएँगे.
अब साला चाची सें भि कल कां वादा किया हैं, तौ वोँ भि निभाना तौ पड़ेगा वरना वोँ बुरामान जाएँगी.
मैंने अकेले मे भाभी कों यहबात बताई.
तौ वोँ बोलीं – कोईबात नहि, मैनेज कर लेना.साम कों थोडा लेटचले जानां औऱ रात वहींरुक जानां.
मैंने कहा – वैसे भाभी इतना भि अर्जेंट नहि हैं। निशा कां जानां। औऱ कुछदिन रहनेदो नां.
मोहिनी भाभी मेरीतरफ गहरी नज़रों सें देखते हुए बोलीं – तुम् उसको रोकने केँ लिए इतना प्रेशर क्यूं डालरहे होँ? बात क्याँ हैं? कुछ लफड़ा लगता हैं, क्यूं?
मे नज़र नीचीकर केँ बोला – नहि भाभीऐसा वैसाकुछ नहि, बस मे तोँ यूँ हि कहरहा थां.
मोहिनी भाभी – अच्छा वोँ सभी छोड़ो। अब मुझे सच-सच जवाब देना। जोँ मे पूछूं उसका.
मे – हां-हां! पूछिए.
मोहिनी भाभी – तुम्हें निशा कैसी लगती हैं?
मे – निशा बहोत अच्छी हैं, बहोत सुन्दर हैं। इसमें छिपाने जैसा क्याँ हैं। जौ सच हैं वोँ हैं.
मोहिनी भाभी – तुम् उसे मनपसंद भि करते हौ??
उनकेइस प्रश्न पर्र मे गड़बड़ा गय़ा। जल्द सें कोई जवाब नहि देसका। तौ नज़र अपने आप् झुक गई,.
मेरीओर सें कोई जवाब नां पाकर वोँ फिन बोलि – निशा भि तुम्हें मनपसंद करती हैं?
मैंने अपनी नज़रऊपर कि औऱ उनकीओर देखने लगा.
मुझे अपनीओर देखते हुए पाकर वोँ बोलि – अंकुश, मे तुम् दोनों केँ बारे मे सभी जानती हूं, औऱ इसलिये उसेयहा सें भेजरही हूं। जिससे तुम् दोनों कहींबहक नां जाओ, औऱ वक़्त सें पहलेकुछ ऐसा होँ जौ नहि होना चाहिए। मे तुम् दोनों सें नाराज़ नहि हूं। बल्कि मे तोँ स्वयं चाहती हूं कि आगेचल कर तुम् दोनों एक् होँ जाओ। निशा केँ लिए तुमसे अच्छा जिंदगी मित्र औऱ कोई होँ हि नहि सकता.मगर रिश्तों कि कुछ मर्यादाएँ होती हें, जिन्हें हमें निभाना पड़ता हैं.
मे मुँहबाए, बस उनके चेहरे कों हि देखता रहा। उनके चेहरे पर्र किसी भि तरह केँ कोईभाव नहि थें.
मोहिनी भाभी - जस्टचिल, अंकुश.
मे मोहिनी भाभी केँ गले सें लग गय़ा। मेरी आँखों सें दो बूँद आँसुओं कि निकल पड़ी औऱ मैंने रुँधे गले सें कहा - सच मे आप् मेरेलिए ईश्वर कां रूप हौ भाभी। हम् दोनों एक् दूसरे सें बहोत प्रेम करनेलगे हें औऱ अब एक् दूसरे केँ बिना रहने कि कल्पना भि नहि कर सकते.
मोहिनी भाभी – मगरकुछ साल तौ तुम् दोनों कों प्रतीक्षा करना पड़ेगा। मगरयह मेरा वादा हैं तुमसे। कि चाहे जोँ भि हौ, मे तुम् दोनों कों मिलाकर हि रहूंगी। अब तुम् जाओ औऱ बिना किसीशक केँ सोजाओ। कल बहोत मेहनत करनी हैं औऱ मेरेगाल पकड़कर हँसने लगी.
मैंने एक् बार भाभी केँ गालों पऱ किस किया औऱ सोनेचला गय़ा। दूसरे दिन कालेज मे दो घंटे बिताने केँ बाद मे जल्दघऱ आँ गय़ा औऱ सीधा छोटी चाची केँ पास पहुँच गय़ा। चाची अभि-अभि नहाकर आई थि, मेरे आवाज़ देने पऱ उन्होंने गेट खोला, तौ देखा वोँ उसी अंदाज मे अपना पेटीकोट चुचियों पर्र चढ़ाए हुए थि.
गेटखोल कर वोँ अपने कमरे कि तरफचल दि। मैंने भि फटाफट दरवाजा बंद किया औऱ उनकी बलखाती गान्ड कां पीछा करतेहुए उनके कमरे मे आँ गय़ा। उनकी लचकती गान्ड केँ सीन नें मेरे लन्ड कों खड़ाकर दिया। चाची नें अभि तक अपना शरीर भि नहि पोंछा थां। पानी कि बूँदें किसी मोती केँ दानों कि तरह उनके गोरे मादक शरीर पर्र चमकरही थि। अंदर जाकर वोँ बिस्तर पऱ पड़े अपने कपड़े उठाने हि वाली थि, कि मैंने पीछे सें उनकी गान्ड मे अपना लन्ड सटा दिया औऱ कमर मे बाँहों कां लपेटा डालकर उनके शरीर सें पानी कि बूँदों कों चाटने लगा। चाची कपड़े पहनना भूल गई, औऱ अपनी आँखें मीचेमजा केँ सागर मे गोते लगाने लगी। उनकेहाथ सें पेटीकोट भि छूट गय़ा। औऱ अब वोँ उनके पैरों मे पड़ा अपनी गुस्ताखी कि भीख माँगरहा थां। हाल हि मे नहाया हुआ शरीर, जौ दिसंबर कि सर्दी मे औऱ ज्यादा ठंडा होँ गय़ा थां। मेरेबदन कि गर्मी सें गरमाने लगा। मैंने अपना पैंटखोल दिया औऱ फ्रेंची सें अपना गरमा-गर्म लन्ड निकाल कर चाची कि मदमस्त ठंडी-2 गान्ड सें रगड़ दिया.
छोटी चाची - आहह-आहह.मेरे। अंकुश अ.रजाआाआआ कितना गर्म हैं तुम्हारा??
मे – चाची? मैंने थोड़े बनावटी गुस्से सें कहा – यह तुम्हारा? मेरा? क्याँ कहती रहती होँ?? सीधे-2नाम नहि लें सकती.जाओ रखलो अपनी…। मुझे नहि चाहिए.
इतनाबोल कर मे अलग हौ गय़ा औऱ अपना पैंटउठा लिया.
छोटी चाची – अरे… मेरे राजा… मुन्ना… नाराज़ होँ गय़ा? चाची नें मेरा लन्ड अपनी मुट्ठी मे लेकरकहा – तुम्हारा यह लन्ड कितना गर्म हैं? लोअबठीक हैं। ऐसे नाराज़ नाँ हुआकरो मेरे होनेवाले बच्चे केँ बापू। मुझेऐसे शब्द बोलने मे थोड़ी झिझक लगती हैं। पहलेकभी बोले नहि नाँ इसलिये। आगे सें ख्याल रखूँगी.
मैंने चाची केँ होंठ अपने मुँह मे भरलिए औऱ उन्हें चूसने लगा। चाची भि मेरासंग देनेलगी, औऱ संग-संग मेरा लन्ड भि मसलती जारही थि। मैंने चाची कि बुर मे अपनीदो उंगलियाँ डाल दि औऱ उन्हें अंदर बाहर् करके चोदने लगा। चाची कि आँखें लाल होनेलगी। वासना कि खुमारी उनकेसर चढ़ने लगी। औऱ उनकी बुर गीली हौ गयीँ,.
अब मैंने उनकी चुचि कों दबाते हुएकहा – अह्ह्ह्ह चाची आपकीयह बूब्स कितनी मस्त होँ गयीँ, हें? जी करता हैं चूसता हि रहूं.
छोटी चाची – तोँ चूसो नाँ रजाआ… आअहह.हान्न्न… औऱ ज़ोर सें… खाजाओ, बहोत परेशान करती हें। काटो। आहह-आहह… ज़ोर सें नहियीईईईईईई.
मैंने चूम-चूमकर उनकी चुचियों कों लालकर दिया। उत्तेजना मे कयि स्थान दाँत सें काट भि लिया। जिससे खून झलकने लगा थां.
मे - सॉरी चाची, मैंने आपकोकाट लिया.
छोटी चाची – कोईबात नहि। मुझे दर्द नहि हुआ.
अब हम् दोनों सें हि औऱ प्रतीक्षा करना मुश्किल हौ रहा थां। सो मैंने चाची कों लिटा दिया। औऱ उनकी बुर कों हाथ सें सहलाकर चूम लिया। उनकी टाँगें मेरे लन्ड केँ स्वागत मे खुल गयीँ,। चाची कां पेटअब थोडा सां उभरआया थां, जिससे उनकी नाभि कां गड्ढा थोडा कम गहरा हौ गय़ा थां। एक् बार मैंने उनके उभरेहुए पेट कों चूमा औऱ अपना लौड़ा उनकी रसीली गागर केँ मुँह सें अड़ाकर अंदरडाल दिया.
छोटी चाची – आहह-आहह। आहिस्ता करना। अंकुश। तुम्हारे बच्चे कों चोट नां लगजाए। नहि तोँ कहेगा। कैसा निर्दयी बाप हैं। पेट मे भि मारता हैं.
मैंने धीरे-धीरे-2 धक्के लगाकर उनकी चुदाई करनेलगा। आजकल उनकी बुर मेरे लन्ड कों कुछ अधिक हि जकड़ लेती थि। जिससे हम् दोनों कों हि बहोत मजाआता। एक् बार झड़ने केँ बाद मैंने चाची कों घोड़ी बना दिया। औऱ उनकी गान्ड कों चाटते हुएकहा.
मे - चाची आपकी गान्ड कितनी मस्त हैं। इसमें एक् बार लन्ड डाल केँ देखें?
छोटी चाची – नहि अंकुश, वहा नहि, दर्द होगा.
मे – प्लीज़ चाची… कई दिनों सें मन थां मेरामगर कहा नहि। पर्र आजमान नहि मानरहा। प्लीज़ तोड़ा देखें तोँ सही। कैसा लगता हैं.
छोटी चाची – तुम् भि नाँ अंकुश। बहोत जिद्दी हौ। अच्छा वहा सें तेल कि शीशी लेँ लो औऱ अच्छे सें सुराख औऱ अपने लन्ड पे लगा केँ तब डालना.
मैंने फ़ौरन तेल कि शीशीली। थोड़ा चाची कि गान्ड केँ छेद पर्र डाला औऱ उंगली सें उसे अंदर तक चिकना कर दिया.फिन अपने लन्ड पऱ चुपड़ा। औऱ उनकी गान्ड केँ भारी-2 पाटों कों अलगकर केँ उनकेछेद पर्र टिका दिया। गान्ड केँ छेद पर्र लन्ड कां अहसास होते हि चाची कि गान्ड कां छेद खुलने-बंद होनेलगा। मैंने बॉटल सें दो बूँदतेल कि औऱ टपका दि। औऱ इसबार अपनीदो उंगलियाँ एक् संग अंदरडाल दि, चाची नें चिहुंक कर अपनी गान्ड केँ छेद कों सिकोड़ कर मेरी उंगलियों पऱ कस लिया.
छोटी चाची - हइई। अंकुश। क्याँ करते होँ। मेरी गान्ड चटखरही हैं.
मैंने उनकी गान्ड पऱ दूसरे हाथ सें चपतमार करकहा – ऐसे गान्ड भींचोगी तौ चटकेगी हि नां, इसको थोडा ढीला छोड़ो.
मेरीबात मानकर चाची नें अपनी गान्ड कों थोडा ढीलाकर लिया, अब मेरी दोनों उंगलियाँ आहिस्ता अंदर तक पहुँच पारही थि। उनकी गान्ड कां छेदअब थोडा सां खुल गय़ा थां, मैंने उंगलियाँ बाहर् निकाल करदो बूँदतेल औऱ डाला औऱ उसे उंगली सें अंदरकर केँ अपने लन्ड कों उसकेछेद पऱ फिन सें रख दिया। एक् हल्के सें धक्के केँ संग मेरा पूरा सुपाड़ा गान्ड केँ अंदर जाकर स्लिम होँ गय़ा.
छोटी चाची - अंकुश… थोडा धीरे-धीरे करो। मेरी गान्ड फटरही हैं। ओहराम… बसकरो…
मैंने चाची कि चौड़ी पीठ कों चूमते हुए उनकी चुचियों कों थाम लिया औऱ ज़ोर-ज़ोर सें मसलने लगा। चाची कि गान्ड मे लन्ड कि चुभनकुछ कम होनेलगी तोँ मैंने औऱ थोडा पुश किया औऱ आधा लन्ड अंदरकर दिया.
छोटी चाची – ओह अंकुश लगता हैं आज नहि छोड़ोगे। मुझे.अरे… मर गई उई मां…। उफफफफफ्फ़.
अब मैंने अपने एक् हाथ कों उनकीकमर कि साइड सें नीचे लें जाकर उनकी बुर कों सहला दिया औऱ अपनीदो उंगलियाँ बुर केँ अंदरकर केँ उसे चोदने लगा.अब मैंने अपने एक् हाथ कों उनकीकमर कि साइड सें नीचे लेँ जाकर उनकी बुर कों सहला दिया औऱ अपनीदो उंगलियाँ बुर केँ अंदरकर केँ उसे चोदने लगा। बुर कि सुरसुराहट मे चाची अपनी गान्ड कां दर्दभूल गई, औऱ सिसकियाँ भरनेलगी.
मौकादेख कर मैंने एक् औऱ धक्का मार दिया औऱ मेरा पूरा लन्ड गान्ड कि सुरंग मे खो गय़ा। वोँ दर्द सें कराहउठी। तकिये मे मुँह देकर बेडशीट कों मुठ्ठियों मे कस लिया.मगर मैंने अपनी उंगलियों सें उनकी बुर चोदना जारीरखा। औऱ धीरे धीरेकर केँ गान्ड मे लन्ड अंदर–बाहर् करनेलगा। चाची केँ दोनों छेदो मे सुरसुरी बढ़ने लगी औऱ वोँ अब मस्ती सें आकर गान्ड मरवाने लगी। बुर सें उंगलियाँ बाहर् निकाल कर उनकी गान्ड पर्र थपकी देतेहुए धक्के लगाने मे मुझे असीम खुशी आँ रहा थां। चाची भि भरपूर मजा लेतेहुए अब अपनी गान्ड कों मेरे लन्ड पऱ पटकरही थि,
जब उनकी गदराई गान्ड मेरी जांघों सें टकराती, तोँ एक् मस्त ठप्प जैसी आवाज़ निकलती। मानोकोई टेबल पर्र थापदे रहा होँ। 10 मिनिट तक उनकी गान्ड मारने केँ बाद मेरा पानी उनकी गान्ड मे भर गय़ा। औऱ हम् दोनों हि पस्त होकर पलंग पऱ लेटगये.
5 मिनिट केँ बाद मैंने चाची कि चुचि कों सहलाते हुए पूछा – छोटी चाची, गान्ड मारने मे मजाआया कि नहि?
छोटी चाची – शुरुआत मे तौ लगा कि मेरी गान्ड फट गई,। बहोत दर्दहुआ। मगरबाद मे मजा भि खूबआया। मगर आहह-आहह। अबफिन सें दर्द होँ रहा हैं। माआ। पऱ तुम् चिंता मतकरो, कुछदेर मे ठीक हौ जाएगा। तुम् बताओ, तुम्हें मजाआया याँ नहि?
मे – मुझे तोँ बहोत मजाआया। मगर लगता हैं चाची। यह तरीक़ा सही नहि हैं। वोँ तौ आपकी गान्ड ऐसी मस्त हैं कि मे अपने आप् कों रोक नहि पाया वरनाकभी नहि मारता.
छोटी चाची – कोईबात नहि। मेरे राजा। तुम्हारे लिए तोँ मेरीजान भि हाज़िर हैं। यह निगोड़ी गान्ड क्याँ चीज़ हैं.
चाची अबखुल कर गान्ड, लन्ड, बुर बोलने लगी थि। मे अपने कपड़े पहनकर घऱआया, आज अपनीजान निशा कों जौ चोदने जानां थां। आकर फ्रेश हुआ। खानां खाया औऱ उसके देहात जाने कि तैयारी मे जुट गय़ा.
निशा कां मन नहि थां जाने कां, मगर भाभी कां आदेश थां, जानां तोँ पड़ेगा हि। भाभी कां देहात कोई 30-35 किमी हि दूर थां हमारे यहा सें, सिंगल रोड थां। प्राचीन सां। मगरवहा अधिक नहि चलते थें। रोड खराब होने केँ कारण थोडा जल्द निकलना थां जिससे दिन केँ उजाले मे हि पहुँच जायें तौ अधिक अच्छा थां। वैसे तौ ज्यादा सें ज्यादा 1 घंटा हि लगना थां। हम् दोनों कों निकलते-2 सबसे मिलते-मिलते 5 बजगये। ठंडी केँ दिन थें। 5 बजे सें हि दिन ढालने लगता थां.
एक् दूसरे सें अपने प्यार कां इज़हार करने केँ बाद भि निशा मेरेसंग खुल नहि पारही थि। बाइक पर्र भि वोँ मुझसे दूरी बनाएहुए बैठी थि.
मैंने देहात निकलते हि कहा – निशा इतनादूर क्यूं बैठी हौ जैसे मे कोई पराया हूं.
निशा – ऐसा क्यूं बोलते हौ अंकुश। बस मुझे लज्जा आती हैं औऱ कोईबात नहि.
मे – मुझसे अब कैसी लज्जा? अब तौ हम् दोनों प्रेमी हें नाँ??
निशा – फिन भि मुझे लज्जा आती हैं। मे चुप हौ गय़ा, औऱ वाहन दौड़ा दि.
अचानक सें मार्ग मे एक् गड्ढा आया, मैंने एकदम सें ब्रेक लगाए। बुलेट कि पिछली सीट थोड़ी ऊँची सि होती हैं ड्राइवर सीट सें। तोँ ब्रेक लगते हि वोँ सरकती हुइ मेरीपीठ सें चिपक गयीँ, औऱ डर केँ मारे मेरे सीने मे अपनी बाहें लपेटकर चीख पड़ी.
मे – क्याँ हुआ डार्लिंग?
निशा – आहिस्ता नहि चला सकते?
मे – आहिस्ता चलाने कां वक्त नहि हैं मेरीजान। रोड खराब हैं। लेट होँ गये तोँ रात मे इन खड्डों मे वैसे भि मुश्किल होगी। तुम् ऐसे हि बैठीरहो नाँ। क्याँ दिक्कत हैं.
निशा हम्मकर केँ मुझेकस केँ पकड़कर बैठ गयीँ,। मे बीच-2 मे ब्रेक मार देता तोँ वोँ औऱ ज्यादा चिपक जाती। उसके 34” केँ ठोस बूब्स मेरीपीठ पऱ दबरहे थें.
कुछदेर मे उसकी लज्जा कम होँ गई, औऱ उसने मेरे कंधे सें अपनागाल सटा लिया, फिन मेरेगाल कों चूमकर बोलीं – अबखुश??
मे – तुम्हारा संग तौ मेरेलिए हरहाल मे खुशी हि देता हैं। जानेमन, तुम् खुश होँ कि नहि?? याँ अब भि लज्जा आँ रही हैं?
निशा – आप् मुझे बिल्कुल बेशर्म बना दोगे.
मे – अरे दोस्त, ऐसे बैठने सें भि कोई बेशर्म होँ जाता हैं क्याँ? मैंने उसे औऱ थोडा खोलने केँ लिएकहा - निशा मेरे सीने कों पकड़ने सें मुझे ड्राइविंग मे थोडा प्राब्लम होती हैं। तुम् नाँ मेरीकमर कों पकड़लो.
निशा – आप् जहाँ कहोगे वहीं पकड़ लूँगी जानू.यह कहकर उसने मेरी जांघों पर्र हाथरख लिए.
मे – थोडा अंदर कि साइड मे पकड़ो, नहि तोँ तुम्हें सपोर्ट नहि मिलेगा.
निशा – धत्त…अब आप् मुझे बिल्कुल बेशर्म करना चाहते हें। फिनकुछ सोचकर… अच्छा चलिए आपकी खुशी केँ लिएयह भि सही, औऱ उसने अपनेहाथ मेरी जाँघों केँ जोड़ पऱ रखलिए.
व्हीकल केँ जंप केँ कारण उसकेहाथ भि इधर-उधर होते। तोँ उसकी उंगलियाँ मेरे लन्ड कों छू जाती। आहहह…यह हल्का सां टच हि मेरेलिए बड़ा सुखदलग रहा थां.
निशा भि अब अपनी लज्जा सें निकलती जारही थि औऱ अपनी उंगलियों कों मेरे लन्ड केँ ऊपर फिरने लगी। पीछे सें वोँ औऱ अच्छे सें चिपक गयीँ,, अब उसकी जांघें मेरी जाँघों सें सट चुकी थि। जोँ कभी-2कार केँ जंप सें आपस मे रगड़ जाती। हम् दोनों पऱ एक् अनूठा सां उन्माद छाताजा रहा थां। मगरयह उन्माद कुछ हि देर कां थां। उसका देहात आँ चुका थां, औऱ वोँ फिन सें मुझसे दूरीबना करबैठ गयीँ,। हम् जब उसकेघऱ पहुँचे तोँ घऱ मे अकेली उसकी मम्मी थि, उसके भइया राजेश शहर मे जॉब पऱ थें, जौ हफ्ते केँ हफ्ते हि आते थें, पापा अभि खेतों सें आए नहि थें.
निशा कों मेरेसंग देखकर वोँ चौंकते हुए बोलीं – यहकौन हैं बेटी?
निशा – इनको नहि पहचाना मां? यह दिदी केँ छोटे देवरु, अंकुश नाम हैं इनका.
मां – ओह.आओ बेटा बैठो। क्षमा करनाकभी देखा नहि नां तुम्हें इसलिये पूछ लिया.
मे – कोईबात नहि माँ जी। वैसे भि मे भैया कि विवाह मे हि आया थां.
माँ – हां, मगर तब तुम् बहोत छोटे सें थें। अब देखो। क्याँ गबरू जवान होँ गये होँ.
मे - यहसभी आपकी बेटी कां हि कमाल हैं माँ जी.
वोँ एकदम सें चौंकते हुए बोलि – मेरी बेटी कां? वोँ केसे?
मे – अरे मां जी, भाभी मेरा इतना ख़याल रखती हें। कि पुछोमत। मुझेकभी अपनी मम्मी कि कमी महसूस नहि होने दि.
माँ – ओहहां… मोहिनी हैं हि ऐसी, यहा भि सभी कां बहोत ख़याल करती थि.
कुछदेर मे निशा केँ पापा भि आँ गये। वोँ भि मिलकर बड़ेखुश हुए। औऱ घऱ केँ हाल-चाल पूछे। खानां पीना खाकर वोँ लोग जल्द हि सोते थें। सोकुछ देर औऱ इधर-उधर कि बातें हुई। औऱ वोँ दोनों सोनेचले गये.
जातेहुए निशा कि मां नें निशा सें कहा – निशा बेटा सोने सें पहले अंकुश जी कों ध्यान सें दूध पिला देना.
निशा कां घऱ उनकेघऱ कि ज़रूरत केँ हिसाब सें जैसा मध्यम वर्गीय ग्रामीण लोगों कां होना चाहिए उस हिसाब सें हि थां। तीन कमरे, जिनमें एक् मे उसके माँ-पिताजी, एक् मे निशा औऱ एक् उसके भइया कां थां, एक् बड़ा सां बैठककम हॉल जिसमें एक् टेलीविज़न भि लगाहुआ थां। हॉल सें बाहर् एक् बरामदा। उसकेबाद थोड़ी खाली स्थान जौ बाउंड्री सें घिरी हुइ थि। हम् इस वक्तहॉल मे बैठे टेलीविज़न देखरहे थें। मे सोफे पर्र थां, औऱ वोँ साइड मे पड़ी सोफा चेयर पऱ बैठी थि.
मैंने उसकी मां केँ जाने केँ कुछदेर बाद निशा सें कहा – क्यूं डार्लिंग। क्याँ ख़याल हैं?
निशा मेरीतरफ मुस्कराते हुए बोलीं – किसबात कां?
मे – अपनी माँ कि आज्ञा कां पालन नहि करोगी?
निशाहंस कर बोलीं - ओह… वोँ…। तोँ अभि चाहिए। याँ सोने सें पहले.
मैंने कहाशुभ काम मे देरी नहि करना चाहिए। मेरीबात सुनकर वोँ चेयर सें उठी, औऱ मेरेआगे सें होकर रसोई कि तरफदूध लाने केँ लिए जानेलगी। मैंने उसकाहाथ पकड़कर अपनीओर खींच लिया। तोँ वोँ एक् झोंके केँ संग मेरीगोद मे आँ गिरी। गिरने सें बचने केँ लिए उसने मेरेगले मे बाहें डाल दि.
निशा मेरी आँखों मे देखते हुए बोलि – क्याँ करते होँ? स्वयं हि कहते होँ दूध लाने कों औऱ रोक भि रहे हौ.
मे उसदूध कि बात नहि कररहा जानेमन, मुझे तोँ यह वालादूध पीना हैं। यह कहकर मैंने उसके एक् संतरे पऱ अपनाहाथ रख दिया.
निशा - हटो बदमाश कहीं केँ। उसने मुझे हल्के सें सीने मे मुक्का मारा। कितना ऊटपटांग सोचते हौ.
मे – इसमें क्याँ ग़लतकहा हैं?? मैंने दूध हि तोँ माँगा हैं, नहि पिलाना हैं तौ मत पिलाओ। मे सुभह मां कों बोल दूँगा। कि आपकी बेटी नें मुझेदूध दिया हि नहि.
उसने लज्जा सें अपना चेहरा मेरे सीने मे छुपा लिया। मैंने उसकी थोड़ी कों अपनी उंगलियों सें ऊपरकर केँ उसका चेहरा उठाया औऱ उसकीझील सि गहरी आँखों मे झाँकते हुएकहा.
मे – तुम् कितनी मासूम होँ निशु? मे सच मे बहोत सौभाग्यशाली हूं जिसे इतनी मासूम, औऱ खूबसूरत सि प्यारी सि लड़की कां प्रेम मिलरहा हैं। मे तुम्हें बहोत प्रेम करता हूं मेरीजान। आईलवयू.
निशा - आईलवयू टू जानू…
इतना कहकर वोँ मेरे सीने सें लिपट गयीँ,। मैंने धीरे-धीरे सें उसकीपीठ पर्र हाथरख कर सहला दिया औऱ एक् हाथ सें उसकेगाल कों सहलाकर उसके होंठचूम लिए.
निशा - मे तुमसे दूर नहि रह सकती अंकुश.
मे – मे कौन सां तुमसे दूररह सकता हूं। मगर हमेंकुछ दिन तोँ रहना हि पड़ेगा.
निशा – अगर तुम् मुझे नहि मिले तोँ मे मर जाऊंगी अंकुश। सीईईईईईईईई.
उसके होंठों पऱ उंगली रखकरकहा मैंने – ऐसे मरने गिरने कि बात नहि करते। भाभी नें मुझे प्रॉमिस किया हैं। चाहेकुछ हौ जाए। हम् मिलकर हि रहेंगे.
निशा – सच??? क्याँ दिदी कों पता हैं हमारे प्रेम केँ बारे मे?
मे – हां, औऱ यहबात उन्होंने स्वयं सें हि कही हैं। अब हमेंबस कुछ सालों तक प्रतीक्षा करना पड़ेगा.
वोँ फिन सें मुझसे लिपट गयीँ,.
निशा - ओह जानू मे आज बहोत खुश हूं। मगर एक् प्रॉमिस करो। तुम् जल्द-जल्द मुझसे मिलने आया करोगे। कम सें कम महीने मे एक् बार.
मे – मुझेकोई प्राब्लम नहि हैं। मगर तुम् स्वयं सोचो। मेरा बार-बार यहा आनां क्याँ लोगों मे शक पैदा नहि करेगा? क्याँ तुम्हारे माँ-बापू यह चाहेंगे?
निशा – तोँ फिन मे केसे रहूंगी इतनेदिन? कम-सें-कम मोबाइल तौ करते रहना.
मे – हां, यह सही रहेगा। हम् रोज़रात कों मोबाइल सें बातकर लिया करेंगे.
इतनीदेर सें निशा मेरीगोद मे बैठी थि। उसकी गोल-मटोल छोटीमगर रसीले गान्ड कि गर्मी सें मेरा लन्ड टाइट जीन्स मे व्याकुल होनेलगा। मे अपने कपड़े नहि लाया थां.
मैंने निशा सें कहा – दोस्त मुझेकुछ चेंज करना हैं। यह जीन्स मे कम्फर्टेबल नहि लगरहा.
निशा मेरीगोद सें उठ खड़ी हुई, औऱ मेराहाथ पकड़कर अपने भैया केँ रूम मे लेँ गयीँ,। उसकी अलमारी सें एक् पजामा औऱ टीशर्ट निकाल कर मुझे पकड़ा दिया। मैंने अपने कपड़े निकाल दिए औऱ टीशर्ट पहनली। मैंने जैसे हि अपनी जीन्स निकाली। मेरे फ्रेंची मे खड़े मेरे लन्ड कों देखकर वोँ शर्मा गयीँ, औऱ अपना मुँहफेर लिया। मैंने उसेकुछ नहि कहा औऱ मुसकुरा कर पजामा पहन लिया। मेरे सोने कां इंतजाम भि इसीरूम मे थां, तौ फिन हम् दोनों उसमें पड़े बिस्तर पर्र बैठगये.
मैंने फिन एक् बार निशा कों अपनीगोद मे खींच लिया औऱ उसके होंठ चूमकर कहा - निशा ! मेरी एक् ख़्वाहिश पूरी करोगी?
निशा – क्याँ? अगर मेरेबस मे हुआ तोँ अवश्य पूरी करूँगी.
मे - मुझे तुम्हारे रूप सौंदर्य केँ दर्शन करने हें?
निशा – क्यूं? अभि क्याँ मे पर्दे मे हूं?
मे – तुम्हारा यह संगमरमर सां शरीर तोँ पर्दे मे हैं नाँ.
यह आप् कैसी बहकी-बहकी बातें कररहे हौ? भलायह भि कोई ख़्वाहिश हुईँ? वोँ थोडा नाराज़गी भरे स्वर मे बोलि.
मे बस तुम्हारे इस सुन्दर जिस्म कि छवि अपनेमन मे बसाना चाहता हूं। जिसके सहारे आने वाला लंबा वक़्त गुज़ार सकूँ। मे तुमसे कोई ज़ोर जबरदस्ती नहि करूँगा, अगर अपने प्रेम पऱ भरोसा करसको तोँ.
निशा खामोशी सें मेरे चेहरे कि तरफ देखती रही, फिन कुछसोच कर बोलि - ठीक हैं, मे आपसे सच्चा प्यार करती हूं। औऱ आशा करती हूं। कि आप् भि एक् सच्चे प्रेमी कि नज़र सें हि मुझे देखेंगे.
यहकहकर वोँ मेरीतरफ पीठकर केँ खड़ी हौ गई,। औऱ बोलि। देख लीजिए जैसे देख्ना चाहते हें.
मे उसके पीछे जाकर खड़ा होँ गय़ा। औऱ उसकेगले पऱ अपने प्यासे होंठरख दिए। उसके होंठों सें एक् मीठी सि सिसकी निकल पड़ी। औऱ उसनेकस कर अपनी आँखें बंदकर ली। निशा कि कमीज़ कि पीठ पर्र एक् ज़िप थि, जौ उसकेगले सें लेकरकमर तक पहुँचती थि। मैंने उसके कंधों पर्र अपनेहाथ रखकरउसे सहलाते हुए। अपनेहाथ धीरे-धीरे-2 उसकी ज़िप पऱ लेँ आया.कुछ देर ज़िप केँ आस-पास हाथों कों फिराया औऱ उसकी ज़िप कां लॉक अपने अंगूठे मे लेकर धीरे धीरे नीचे कि तरफ खींचने लगा.
जैसे-जैसे उसकी ज़िप नीचे कों खुलती जारही थि, उसकी दूधिया रंग कि पीठ किसी संगमरमर सि चिकनी मेरी आँखों केँ सामने किसी अनमोल खजाने कि तरह खुलती जारही थि। कमर तक ज़िप खोलने केँ बाद मैंने उसकीपीठ पर्र उसकी ब्रा कि स्ट्रैप केँ ठीकऊपर अपने गीले होंठरख दिए। उसकीपीठ काँपकर औऱ अंदर कों चली गई,, औऱ उसके मुँह सें एक् औऱ सिसकी निकली.इस्शह.सस्सिईईईईईई.
अब मे उसकीपीठ कों ऊपर कि तरफ चूमता हुआ। उसकी नंगीपीठ पऱ अपनेहाथ फिरारहा थां। निशा तौ जैसे कहींखो हि गयीँ, थि। फिन मेरेहाथ उसकीपीठ सहलाते हुए कंधों पऱ पहुँचे औऱ उसकी कमीज़ कों दोनों बाजुओं सें नीचे सरका दिया। उसकी कमीज़ उसके जिस्म सें सरसराती हुई। उसके कदमों मे जा गिरी। मैंने उसे कंधों सें पकड़कर अपनीतरफ घुमाया। निशा किसी कठपुतली कि तरह मेरे हाथों केँ इशारों पऱ चलरही थि.
जब मेरी नज़र निशा केँ बूब्स पर्र पड़ी… उफफफफफफफफफफफ। क्याँ दूधिया जिस्म थां निशा कां?? गोल-गोल टेनिस कि बॉल केँ साइज़ केँ उसके दूधिया बूब्स एक् छोटी सि गुलाबी रंग कि ब्रा मे क़ैद उसकी सुंदरता मे चार चाँदलगा रहे थें। दोनों केँ बीच कि चौड़ी खाई मुझे ललचारही थि। मे अपने आपकोरोक नहि पाया औऱ झुककर उसके उभारों केँ बीच कि खाई पर्र अपने तपते होंठरख दिए.
निशा नें आअहह। भरतेहुए मेरेसर कों पकड़ लिया, फिन मैंने उसके उभारों केँ दोनों ओर कि ढलान कों बारी-बारी सें अपनी खुरदुरी जीभ सें चाटा औऱ उन्हें चूमते हुए निशा केँ सपाटपेट कि तरफ बढ़ने लगा। निशा अपनी आँखें मूँदे अपने अंतर्मन मे इस असीम खुशी कि अनुभूति कों महसूस कर केँ दूर कहीं आसमानों मे उड़चली थि। मन नहि माना तौ मेरे शरारती हाथ एक् बार उसके खूबसूरत बूब्स पर्र टिक हि गये औऱ उन्हें सहलाते हुए उसकी बगलों सें होतेहुए, निशा कि पतलीकमर पर्र आँ टिके.
मेरेहाथ किसी स्वचालित यन्त्र कि तरह निशा कि पतलीकमर कों सहलाते हुए, मेरी उंगलियाँ निशा कि सलवार केँ नाड़े कि गाँठ पर्र थि। कुछ हि देर मे निशा कि सलवार भि उसके कदमों मे जा गिरी। मे थोडा पीछे होकर निशा केँ कदमों मे बैठ गय़ा औऱ उसके संगमरमरी शरीर कि सुंदरता कां रस अपनी आँखों सें पीनेलगा.
वाउ क्याँ सुडौल जांघें थि उसकी?जरा सां भि एक्सट्रा फैट नहि थां उसके जिस्म पऱ। साँचे मे ढला उसकादूध जैसा गोरा शरीर किसी संगमरमर कि मूरत जैसा मेरे सामने थां। निशा सिर्फ दो छोटे-सें अधोवस्त्रों मे मेरे सामने किसी बेजान मूरत सि खड़ी थि। उस कमसिन कली नें अपने प्रियतम कि ख़्वाहिश कां सम्मान करतेहुए अपने अनछुए कोमल जिस्म कों उसके हवाले कर दिया थां.
पर्र किसलिए?
एक् विश्वास पऱ। जोँ उसके निश्छल प्यार नें उसके अंदर पैदा किया थां। उसने अपने प्रियतम पऱ आँखबंद कर केँ भरोसा कर लिया थां.
मे उसकी केले जैसी चिकनी जांघों कों सहलाते हुए उन्हें चूमने, चाटने लगा। मेरी छुअन सें उसका शरीर थरथरा रहा थां। मे घुटने मोड़कर बैठा थां, मेरेहाथ बड़े प्रेम औऱ दुलार सें उसकेबदन पर्र तैररहे थें। वोँ निशा केँ बदन केँ जिस हिस्से मे होते, वोँ हिस्सा किसी जुड़ी केँ मरीज़ कि तरह काँपने लगता.फिन मैंने उसकी पतलीकमर कों अपने हाथों केँ बीच लेकरउसे पलटा दिया.अब उसकी छोटी सि पैंटी मे कसे उसके गोल-गोल नितंब मेरे सामने थें। इन्हें मे हौले-हौले सहलाने लगा.
मेरी उंगलियाँ उसकी छोटी सि पैंटी कि एलास्टिक मे फँस गई,, औऱ उसे नीचे कों खींच दिया। निशा कि बॉल केँ साइज़ केँ उसके नितंब एकदम गोल-गोल सुडौल, गोरे-गोरे, थोड़े बाहर् कों निकले हुए मेरी आँखों केँ सामने थें, जिन्हें सहलाकर मैंने चूम लिया। नीचे बैठे हि मैंने उसे अपनीतरफ पलटा लिया, जांघों केँ जोड़ केँ बीच कि कलाकृति अब मेरे सामने थि। जिसकी सुंदरता बयान करने लायक मेरेपास शब्द नहि थें.
हल्के बालों सें सजे पतलेबंद होंठों केँ बीच एक् पतली सि रेखा जैसी उसकीरस सुरंग, जौ नीचे सें ऊपर कि तरफ थोड़ी सि मांसल दिखाई देरही थि। मैंने अपनेहाथ सें उसे एक् बार बड़े प्रेम सें सहलाया। औऱ निशा कि टाँगों कों थोडा सां अलगकर केँ एक् किस उसकी प्यारी बुर केँ बंद होंठों केँ ऊपरकर दिया.
निशा – ईइसस्स्स्शह… आअहह…
नाँ चाहते हुए निशा केँ मुँह सें एक् दबी सि सिसकी निकल हि गई,। मैंने फिन सें उसे पलटा दिया औऱ फिन सें एक् बार उसके नितंबों कों चूमा। नितंबों केँ बाद उसकीकमर, फिन उसकीपीठ चूमते-चूमते मे ऊपर उठताचला गय़ा, फिन मेरी उंगलियों नें उसकी ब्रा केँ हुक भि खोलदिए.
उसकीपीठ सें सटकर खड़ा होतेहुए मैंने उसकेकान कि लौ कों चूमकर कहा- निशा मेरीजान, तुम् सचमुच सुंदरता कि जीती-जागती मूरत हौ। तुमने आज अपनायह संगमरमर सां हसीन शरीर दिखाकर मुझे अपना दीवाना बना दिया हैं। अब मे तुम्हारे प्रतीक्षा मे कुछ वर्ष तौ क्याँ, सदियाँ गुज़ार सकता हूं.
यह कहकर मैंने उसके अनार जैसे बूब्स कों अपनी मुट्ठी मे भर लिया औऱ सहलाने लगा। निशा एकदम सें पलटकर मेरेगले सें लिपट गई,, उसके बूब्स मेरे सीने मे दबकररह गये.
निशा मेरे चेहरे पऱ अनगिनत किस करतेहुए बोलि - अंकुश मे तुम्हें पसन्द आँ गयीँ,, यह मेरेलिए किसी सौभाग्य सें कम नहि हैं। तुम्हारी यह छुअन, तुम्हारी आवाज़ सुनकर मेरेदिल कि धड़कनें तेज हौ जाती हें। आईलवयू जान.
मे - आईलवयू टू निशा। तुम्हारी खुशबू, तुम्हारी मुस्कान, तुम्हारा तौ रूप हि कुछऐसा हैं कि, मे उसमें खो जाता हूं। अब तुम् अपने कपड़े पहनलो, तुम्हारे रूपरस कां पानकर केँ मे धन्य होँ गय़ा.
निशा नें फिन एक् बार मुझे कसकर अपनेगले लगाया औऱ कपड़े पहनकर रूम सें बाहर् निकल गई, मेरेलिए दूध लेने। मे स्वयं पर्र आश्चर्य चकित थां, कि एक् कमसिन बाला। पूर्ण रूप सें नग्न मेरे सामने थि औऱ मेरेमन मे एक् बार भि उसे भोगने कि ख़्वाहिश तक नहि हुई। क्याँ यह मेरा निशा केँ लिए निश्चल प्यार थां? जोँ शायद मेरी जीवन मे पहली औऱ आख़िरी बारहुआ थां। दूसरे दिन सुभह-सुभह मे निशा औऱ उसके मां बापू सें विदा लेकर अपनेघऱ वापसचल दिया.
निशा मुझे देहात केँ बाहर् तक छोड़ने आई। विदा होतेसमय स्वतः हि हम् दोनों कि आँखें छलक गयीं। हम् एक् दूसरे कों किसकर केँ आखिरी बारगले मिले.फिन एक् दूसरे कों बाइ बोलकर अपने-अपने घऱ कों चलदिए.
रास्ते मे हि शांति फूफी कां घऱ पड़ता थां, जोँ निशा केँ देहात सें अधिकदूर नहि थां, तोँ सोचा फूफी कां हालचाल पूछते हुए हि निकलता हूं। कभीआया तोँ नहि थां पहले फूफी केँ यहा, तौ लोगों सें घऱ कां पतापूछ कर पहुंचा उनके दरवाजे पर्र.
बुलेट कि आवाज़ सुनकर एक् लड़कीघऱ केँ अंदर सें भागती हुई आई। मे उस लड़की कों देखता हि रह गय़ा। विद्यालय यूनिफॉर्म मे वोँ शायद विद्यालय जाने केँ लिए सजधजकर हि हुईँ थि, सफेदरंग कि शर्ट औऱ स्लेटी लाल चौखाने रंग कि घुटनों तक कि स्कर्ट मे वोँ एक् बहोत हि खूबसूरत गुड़िया जैसीलगी मुझे.
उसकीकसी हुइ शर्ट मे क़ैद 32-33” केँ उसके चुचेबटन तोड़कर बाहर् निकलने कों आतुर होँ रहे थें। पतली सि कमर केँ नीचे थोड़ी उठी हुइ गान्ड, देखकर मेरे अंदरकुछ–2 होनेलगा.
अपनी बड़ी-2 कजरारी आँखें मटकाकर वोँ बोलीं – कौन हौ तुम्?? किससे मिलना हैं?
मे – शांति फूफी कां घऱयही हैं?
वोँ – हां, मगर तुम् कौन हौ जौ माँ कों फूफी बोलरहे हौ?
मे – ओह तोँ तुम् उनकी बेटी होँ… मेरानाम अंकुश हैं, अभि कुछदिन पहले मेरे भैया कि विवाह थि, तुम् उसमें शामिल नहि हुईँ थि.
वोँ – ओह अंकुश भैया। नमस्कार, सॉरी, मैंने आपको पहचाना नहि, आओ.आओ…फिन वोँ फूफी कों आवाज़ देतेहुए चिल्लाई। माँ… माँ…
अंदर सें फूफी कि आवाज़ आई - क्याँ हैं तनु, देख नहि रही। तेरेलिए ब्रेकफास्ट सजधजकर कररही हूं, विद्यालय केँ लिएलेट हौ रहा हैं.
तब तक मे बाइकखड़ी कर केँ उसके पीछे–2 अंदरआया, उसके मटकते कूल्हे मुझे अपनीओर लुभारहे थें.
वोँ – माँ थोडा बाहर् आकर देखो तौ सही, कौन आया हैं?
फूफी अपने माथे कां पसीना अपने पल्लू सें पोंछती हुई किचन सें बाहर् आई औऱ मुझे देखते हि, अरे अंकुश!!!, चिल्लाते हुए दौड़कर मेरे सीने सें लग गई,.
उनकीयह हरकतदेख करपास खड़ी तन्वी अपनी बड़ी–2 आँखें फाड़े उन्हें देखने लगी.
मैंने फूफी सें पूछा – फूफी यह आपकी बेटी हैं?
फूफी – हां, बड़ी वाली तन्वी। तूने देखा तौ हैं इसेकई बार देहात गई, हैं मेरेसंग.
मे – यहवही तन्वी हैं नाँ? जिसकी नाक बहती रहती थि.
फूफी हँसते हुए बोलीं – हेहेहे… हां, वही तन्वी हैं, अबदेख। अब नहि बहती इसकीनाक.
तन्वी क्रोध होतेहुए बोलीं – क्याँ मां आप् भि चिढ़ाने लगी मुझे?फिन वोँ मेरीतरफ आँखें तरेरकर बोलि.
तन्वी - आपनेकब देखी मेरीनाक बहतेहुए? हां??
फूफी – अरे नहि बेटा, एक् बारजब मे तुम्हारी तरफ लेकर देहात गयीँ, थि, तब तेरी सर्दी होँ गयीँ, थि। तौ तब कि बातकर रहा हैं अंकुश.
वैसे बड़े भइया कि बात कां क्याँ बुरा मानना। बेटा तुँ बैठ पहले मे इसको विद्यालय भेजदूं। फिनबैठ करबात करते हें। ठीक हैं औऱ वोँ फिन सें किचन मे घुस गयीं। तन्वी मुझेदेख-2 करदेख रही थि.
मैंने कहा – क्षमा करना मेरी गुड़िया, मे तौ ऐसे हि मज़ाक कररहा थां। तुम्हें बुरालगा तोँ सॉरी औऱ मैंने अपनेकान पकड़लिए तौ वोँ खुश हौ गई,.
तन्वी – कोईबात नहि भैया.
फिन वोँ फूफी कों आवाज़ देकर बोलीं – माँ जल्दकरो मे लेट हौ रही हूं.
मैंने कहा – कितना दूर हैं तेरा विद्यालय?
तन्वी – अरे भैया। दूसरे देहात मे हैं, यहा सें 3 किमीदूर हैं औऱ मुझे साइकल सें जानां पड़ता हैं, फिन घड़ी कि तरफदेख कर बोलीं – ओफ़्फओ… मे तोँ ऑलरेडी लेट होँ गयीँ,। अब पहला पीरियड तौ मिलने वाला नहि हैं। मां… जल्दकरो… प्लीज़…
फूफी – अभि लाई.बस दो मिनिट.
मे – तूँ कहे तोँ मे छोड़दूं तुम्हे विद्यालय.
तन्वी – फिनउधर सें केसे आऊंगी?
तब तक फूफी रसोई सें उसका टिफ़िन बनाकर लें आई औऱ बोलि – विद्यालय छूटने केँ बाद भैया हि लें आएगा तुम्हे। क्यूं अंकुश?? लें आएगा नाँ?
मे – मुझे तोँ जानां थां फूफी अभि। वोँ मे निशा कों छोड़ने आया थां, लौटते मे सोचा आपसे भेंट करता चलूं.
फूफी – अरे तौ साम कों चले जानां। अभि सुभह-सुभह क्याँ करेगा घऱ जाकर?
मैंने कहा - ठीक हैं, फिनचल तन्वी। तुम को विद्यालय छोड़ देता हूं.
दूसरे गाँव कां मार्ग थोडा ऊबड़-खाबड़ थां। तन्वी मेरे पीछे दोनों ओर कों पांवकर केँ बैठी थि। कभी ब्रेक लगाने पड़ते थें तोँ वोँ मेरे सें सट जाती। औऱ उसके कच्चे अनार मेरीपीठ पर्र दब जाते.फिन जबकार उछलती तौ वोँ रगड़ जाते। मेरा लन्ड उसके स्पर्श सें हि सर उठाने लगा थां। एक् बार तौ ज़ोर सें ब्रेक लगते–2 भि वाहन एक् खड्डे मे चली हि गयीँ, औऱ ज़ोर सें उछल गयीँ,। अब बुलेट पऱ पीछेकुछ अधिक हि झटका लगता हैं तोँ पहले तौ वोँ मेरेऊपर गिरी औऱ फिनऊपर कों उछली, जिसकी वजह सें उसके अनार तौ पीठ सें रगडे हि संग हि उसकी बुर भि मेरीकमर सें रगड़ा खा गयीँ,, औऱ वोँ ज़ोर सें सिसक पड़ी। शायद उसको भि मजाआया होगा.
मैंने कहा – क्याँ हुआ तन्वी?
तन्वी – भैया धीरे-धीरे–धीरे-धीरे चलाओ, यह मार्ग बहोत खराब हैं, साइकल सें चलना भि मुश्किल हौ जाता हैं.
मे – हां वोँ तौ मे देख हि रहा हूं, पता नहि लोगों कां ध्यान इसतरफ क्यूं नहि जाता.
खैर जैसे तैसेकर केँ हम् उसके विद्यालय पहुँच हि गये, उसे विद्यालय छोड़कर मे फूफी केँ घऱ वापस आँ गय़ा। जब मे घऱ लौटा तौ फूफी घऱ मे झाड़ू लगारही थि। वोँ एक् लोकटगले कि नाईट ड्रेस पहनेहुए थि। झुककर झाड़ू लगाने सें उनके बड़े-2 खरबूज जैसे बूब्ज़ लटककर बाहर् कों झाँकरहे थें। मे वहीं खड़ा होकरयह नज़ारा देखरहा थां, कि इतने मे उनकी नज़रपड़ गई, औऱ सीधी खड़े होतेहुए हंसकर बोलीं.
शांति फूफी – क्यूं रे बदमाश, क्याँ देखरहा थां?
मैंने भि हँसते हुएकहा – कुछ नहि फूफी, तुम्हारा समान सामने आँ गय़ा तौ देखने लगा.
शांति फूफी – चलबैठ मे थोड़ी देर मे झाड़ू मारकर फिन बैठती हूं तेरेपास.
मैंने फूफी सें पूछा – फूफी बाकीलोग कहां गये?
शांति फूफी – तेरे फूफाजी इस वक़्त खेतों मे होते हें। छोटी यहीं गाँव केँ विद्यालय मे हैं, उसका विद्यालय जल्द शुरुआत हौ जाता हैं, दो घंटे मे आँ भि जाएगी.
इतना बोलकर वोँ फिन सें झुककर झाड़ू मारने लगी, टाइट नाईट ड्रेस मे फूफी कि चौड़ी गान्ड झुकने सें औऱ ज्यादा बड़ीदिख रही थि। शायद वोँ नीचे पैंटी भि नहि पहने थि, जिस कारण सें उसकेदो पाटों केँ बीच कि दरार किसी नाली कि तरह साफ-साफ दिखाई देरही थि। सोने पे सुहागा यह थां, कि जब वोँ खड़ी हुइ थि, तौ टाइट नाईट ड्रेस कां कपड़ा शांति फूफी कि गान्ड कि दरार मे फँस गय़ा थां, जोँ अभि तक बेचारा निकलने केँ लिए फड़फड़ा रहा थां। मगर दोनों पाटों कां दबाव इतना ज्यादा थां, कि वोँ वहा सें टस सें मस नहि हौ पाया। फूफी कि गान्ड केँ नज़ारे नें मेरे लन्ड कि ऐसी तैसीकर दि, वोँ साला जीन्स केँ अंदर फड़फड़ाने लगा.
मे चुपके सें फूफी केँ पीछे गय़ा, औऱ उसकी गान्ड सें जाकर चिपक गय़ा। शांति फूफी तौ एकदम सें हिल हि गई,, औऱ अपनी गान्ड कों मेरे लन्ड पऱ औऱ ज़ोर सें दबा दिया, तोँ मैंने भि झुककर फूफी केँ खरबूजों कों पकड़ लिया.
फूफी झाड़ू छोड़कर खड़ी होँ गई,, औऱ अपनी गान्ड कों मेरे लन्ड केँ आगे दबाते हुए बोलि – अंकुश थोडा सां तोँ सब्रकर लेँ। मुझेपता हैं, तुम को मेरी गान्ड नें परेशान कररखा हैं। यह हरामजादी दिनों दिन चौड़ी हि होतीजा रही हैं.
मैंने फूफी कि चुचियों कों मसलते हुएकहा – लगता हैं, फूफाजी जी, इस पऱ अधिक ध्यान देते हें। तभीयह चौड़ी होतीजा रही हैं.
फूफी – नाँ अंकुश, उन्हें गान्ड मारने कां शौक नहि हैं पर्र वोँ ज्यादा तर पीछे सें हि करते हें। अब छोड़ मुझे झाड़ू मारने दे.फिन धीरे-धीरे बैठते हें.
मैंने झुककर फूफी कि टाइट नाईट ड्रेस कों उठाकर उनकी गान्ड कों नंगा करतेहुए कहा – इतना टाइम नहि हैं फूफी। मेरा लन्ड अब औऱ प्रतीक्षा नहि कर पाएगा.
इतनाकह कर मैंने अपनी जीन्स उतार दि, औऱ फ्रेंची कि साइड सें लन्ड बाहर् निकाल कर फूफी कि गान्ड कि दरार मे फँसाकर ऊपर सें नीचे रगड़ने लगा। मेरे नंगे लन्ड कां अहसास अपनी नंगी गान्ड पऱ होते हि फूफी सारी नां नुकुर भूल गई,, औऱ अपनी आँखें बंदकर केँ उसने अपनेहाथ सामने कि दीवार पर्र टिकादिए। मैंने अपना एक् हाथ नीचे लें जाकर फूफी कि मालपुए जैसी बुर कों मुट्ठी मे भरकरमसल दिया.
फूफी कि बुर रस छोड़ने लगी, उसने भि अपनाहाथ मेरेहाथ केँ ऊपररख कर औऱ दबा दिया, औऱ सिसकते हुए बोलि – सस्सिईईई। हाईएरे। यह क्याँ कर दिया तूने। मेरी बुर मे आगलगा दि। अब औऱ देरमत कर.
मैंने अपनीदो उंगलियाँ फूफी कि बुर मे डाल दि। औऱ अंदर बाहर् करनेलगा। बुर हद सें अधिक गीली हौ गयीँ,। फिन मैंने फूफी कि नाईट ड्रेस कों उसकेसर केँ ऊपर सें निकाल करउसे पूरीतरह नंगाकर दिया। अपने लौड़े कों थूकलगा कर गीला किया, औऱ फूफी कि गीली बुर मे पेल दिया। सरसराता हुआ मेरा साढ़े आठइंच लंबा औऱ सख्तरॉड जैसा लन्ड जैसे हि जड़ तक फूफी कि बुर मे गय़ा, थप्पाक सें मेरी जांघें उसके भारी चुतड़ों पर्र पड़ी, औऱ इसी केँ संग हि फूफी केँ मुँह सें एक् लंबी कराह निकल गई,.
शांति फूफी - हआइईईई रीईए… बेरहम… नाशपीटे… मार डालारे ज़ालिम… ई…ई…ई…, थोड़ा धीरे-धीरे डालता। फाड़ दि मेरी बुर.
मगर मैंने अनसुना करतेहुए, अपने धक्के शुरुआत करदिए, औऱ फूफी कि धक्कमपेल चुदाई शुरुआत कर दि। एक् बार खड़े-खड़े चोदने केँ बाद, जब वोँ झड़ गई,, तोँ फिन हम् सोफे पऱ आँ गये। फूफी कों घोड़ी बनाकर पहलेकुछ देर उसकी बुर मारी, उसकेबाद मैंने अपना लन्ड उसकी गद्देदार गान्ड मे पेल दिया.उलट पलटकर मैंने शांति फूफी कों अच्छे सें रगड़-रगड़ करदोबार चोदा। फूफी कि सारी खुजली मिट गई,.
मैंने कहा – शांति फूफी देखलो मैंने आपका चैलैंज पूराकर दिया.फिन मत कहना.
शांति फूफी – हांरे अंकुश। तूँ सच मे मर्द होँ गय़ा हैं, मेरे जैसीदो बच्चों कि महिला कों बहोत हि मस्त चोदा औऱ गांड भि मस्त तरीके सें मारी.
उसकेबाद उन्होंने मेरेलिए गरमचाय बनाई, औऱ अपनाकाम खतमकर केँ नहाने चली गई,। इतने मे फूफाजी भि आँ गये, औऱ उसकेकुछ देरबाद उनकी छोटी बेटी भि विद्यालय सें आँ गई,। सबने मिलकर खानां खाया, उसकेबाद मे तन्वी कों लेने उसके विद्यालय चला गय़ा। तन्वी नें घऱआकर बताया कि कल सें उसकी रक्षाबन्धन कि छुट्टियाँ शुरुआत हौ गयीँ, हें जौ जन्माष्टमी तक चलेगी.
तौ मैंने कहा - फूफी यह वैसे भि भैया कि विवाह मे नहि जापाई थि, क्यूं नाँ इसे मे अपनेसंग लें जाऊं.रमा दिदी केँ संग इसकामन भि लगा रहेगा.
मेरीबात सुनकर तन्वी भि कहनेलगी - हां माँ मे भैया केँ संग जाऊंगी। मैंने मामाजी, मामियों कों कब सें नहि देखा.
फूफाजी जी नें भि हांकर दि तोँ फिन फूफी नें उसे परमिशन दे हि दि, औऱ उसीसाम मे तन्वी कों लेकर अपनेघऱ वापसलौट लिया। रास्ते मे बहोत ज्यादा कुछ नहि हुआ, मे बस थोडा बहोत उसकी पढ़ाई लिखाई केँ बारे मे हि पूछा.मगर विद्यालय जाते-आते वक्त कि हल्की सि मस्ती यादआते हि, तन्वी नें थोड़ी बहोत हरकतें ऐसी कि जौ हम् दोनों केँ जिस्म मे मस्ती भरने केँ लिए काफ़ी थि.
तन्वी कों मेरेसंग देखकर भाभी नें पूछा – अरे देवरु जीयहकौन हैं? एक् कों लेकरगये थें, औऱ दूसरी केँ संग लौटे होँ। यह क्याँ चक्कर हैं भइया.
मैंने हँसते हुएकहा – कोई चक्कर नहि हैं भाभी, यह शांति फूफी कि बेटी तन्वी हैं। आप् नहि जानती इसको.
मेरे बताते हि रमा दिदी नें उसे पहचान लिया। औऱ वोँ उसकेगले लग गयीँ,। फिनकुछ देर इधर-उधर कि बातें कि औऱ अपनेघऱ गाँव केँ हालचाल पुछे.खैर इसीतरह आज कां दिन भि शांति सें ख़त्म हुआ।
maira Pyara Devar - niyantran – New Episode
UPDATE 17
कालेज मे मेरी एक् अलग हि इमेज थि, एक् ज़िम्मेदार स्टूडेंट कि, जोँ कालेज कि व्यवस्थाओं मे भि सहभागिता रखता थां। टीचर्स औऱ प्रिन्सिपल तक मेरीबात कां सम्मान करते थें। हालाँकि हमारे कालेज मे लड़कियाँ भि थि, औऱ ऐसा भि नहि थां। कि मे कोई ब्रह्मचारी थां। आप् सबजान हि चुके हें। मगर अपने कालेज मे मैंने अपनी एक् साफ-सुथरी इमेज कायमकर रखी थि। लड़कियों सें कोसों दूर रहना मैंने अपना नियम सां बना लिया थां.
ठाकुर सूर्य प्रताप सिंह। जिनकी इस कस्बे मे बहोत लंबी चौड़ी ज़मीन जायदाद थि। एक् तरह सें कस्बे केँ जमींदार थें। प्रशासनिक कार्यों मे भि इनकी अच्छी खासीपैठ थि। कालेज कों मान्यता दिलवाने मे भि इनका बहोत बड़ा योगदान रहा। कस्बे केँ सब बड़े छोटे व्यापारी, किसान सभी इनका बड़ाआदर करते थें। याँ कह सकते हें इनके एहसानों तलेदबे रहते थें। डरते थें इनसे। ठाकुर साहब कि बेटी रागिनी भि इसी कालेज मे थि, उसके सब्जेक्ट अलग थें। आर्ट्स केँ औऱ मे साइन्स मे थां। रागिनी कां एक् बड़ा भइया भि थां, भानु प्रताप सिंह। जौ अपने पिता कि दबंगई मे चार चाँद लगाने मे अहम भूमिका निभाता थां। कालेज कि ज़्यादातर लड़कियाँ रागिनी कि चापलूसी करती रहती याँ यूँ बोलो। कि उसके पैसों सें मौज करती, औऱ उसकीहां मे हां मिलाती रहती थि.
मे आज अपना लास्ट पीरियड अटेंड कर केँ थोडा लाइब्रेरी चला गय़ा एक् दोबुक लेनी थि। मैंने कुछ बुक्स इश्यू कराई, औऱ जैसे हि लाइब्रेरी केँ गेट सें निकलकर लॉबी मे कदमरखा हि थां। उधर रागिनी तेज–तेज कदमों सें चली आँ रही थि, इधर मेरा निकलना हुआ औऱ उसका घुसना सो हम् दोनों हि एक् दूसरे सें टकरागये.
रागिनी कि बूब्स मेरे सीने सें आकरलगी, मेरेहाथ सें बुक्स छूटकर फर्श पर्र गिर पड़ी। अचानक सें टकराने केँ कारण, वोँ कुछ डिस्बैलेंस हौ गई,, औऱ पीछे कों गिरने लगी। मैंने फ़ौरन अपनाहाथ उसे सहारा देने केँ लिए पीछे किया, औऱ उसकी मखमली गान्ड कों कस लिया। दूसरे हाथ सें उसके कंधे कों पकड़कर उसे गिरने सें बचा लिया औऱ वोँ फिन सें खड़ी हौ गयीँ,.
उसकेसंग रोज कि तरह 4-5 लड़कियाँ भि चिपकी हुईँ थि। उसे खड़ाकर केँ, मैंने ज़मीन सें अपनी बुक्स उठाई औऱ खड़ा होकरउसे सॉरी बोलने हि वाला थां कि तड़ाक सें एक् तमाचा मेरेगाल पर्र पड़ा। मैंने अपना एक् हाथ अपनेगाल पर्र रखकर सहलाया औऱ उसकीतरफ देखा। वोँ अपनीकमर पऱ दोनों हाथरखे हुए गुस्से सें भुनभुनाई.
रागिनी - साले हरामी, देखकर नहि चल सकता। आँखें क्याँ घऱ छोड़कर आता हैं.
मे उससे उलझना नहि चाहता थां तौ मैंने उसे सॉरी बोला। औऱ वहा सें चलाआया। हालाँकि गुस्से सें मेरा चेहरा लाल होँ रहा थां। मगरफिन भि मैंने अपने गुस्से पर्र काबू किया, अपनी बुलेट उठाई औऱ घऱ कों चल दिया। रागिनी पीछे सें मुझे जाताहुआ देखती रहीजब तक कि मे उसकी आँखों सें ओझल नहि हौ गय़ा.
उसकी एक् फ्रेंड नें उसकी बाजू पकड़कर कहा – अबचल, वोँ तोँ चला गय़ा, अब किसे मारेगी? वैसेउस बेचारे कि ग़लती क्याँ थि?
दूसरी – हां दोस्त, वोँ तौ बेचारा गेट सें निकल हि रहा थां तुँ हि उससे टकरा गई, औऱ बिना सोचे समझे तूनेउस बेचारे कों थप्पड़ मार दिया.
तीसरी – कितना डिसेंट लड़का हैं, फिन भि सॉरी बोला उसने, औऱ बिनाकुछ कहेचुप चापचला गय़ा.
चौथी – मे उसे विद्यालय सें हि जानती हूं, वोँ बस अपनी पढ़ाई सें मतलब रखता हैं। किसी सें आज तक उसका झगड़ा तक नहि सुना हमने.
पहली – अरेयह वोँ हि अंकुश हैं नाँ, जिसने विद्यालय मे चैलेंज देने वाले लड़के कों पछाड़ दिया। थां.
दूसरी – हां! वोँ हि अंकुश हैं, औऱ जानती हैं। इसका एक् भइया डीएसपी हैं, औऱ उसकी विवाह यहा केँ एमएलए कि लड़की केँ संग हुइ हैं.
तीसरी – फिन भि देखो। अंकुश कों ज़रा सां भि घमंड नहि हैं। प्रिन्सिपल वग़ैरह सभीउसे बहोत मानते हें। वोँ चाहता तौ तेरे खिलाफ शिकायत भि कर सकता थां.
चौथी – पर्सनालिटी देखी अंकुश कि। ऐसा हमारे कालेज मे तौ क्याँ आस-पास भि कोई नहि हैं। कितना हैंडसम, क्याँ कद औऱ बॉडी। एकदम फिल्मी हीरो लगता हैं। कितनी हि लड़कियाँ तोँ अंकुश केँ आगे बिछने कों सजधजकर रहती हें। मगर अंकुश किसी कों आँख उठाकर भि नहि देखता.
लड़कियों केँ मुँह सें मेरे बारे मे यहसभी सुनते-2 रागिनी झल्ला उठी औऱ चिल्लाते हुए बोलि –ओह…विल यूशटअप? ऑलऑफयू बिच.जाओ जाकरउस हीरो अंकुश कां लौड़ा चूसो, इतना हि मनपसंद हैं तौ। मगर मेरेकान खानां बंदकरो तुम् लोग। उहहह। फिल्मी हीरो???माइ फुट.
पहली – तोँ तुम्हे अब भि लगता हैं कि ग़लती अंकुश कि थि? मुझे लगता हैं, कि तुम्हे अंकुश सें माफी माँगनी चाहिए.
रागिनी – क्यूं? अंकुश कोईलाट साहब हैं?
पहली – क्योंकि टकराई तूँ अंकुश सें, औऱ तमाचा भि मारा उसको। ग़लती तेरी हि हैं.
रागिनी भड़कउठी औऱ बोलि – जा इतना हि अंकुश कां ख्याल हैं तौ जा केँ तुँ अंकुश सें माफी माँग.यहा क्यूं खड़ी हैं?
रागिनी कि बात सुनकर वोँ लड़कीवहा सें चल दि। उसके पीछे-2 बाकी कि लड़कियाँ भि चली गयीँ,। अपनी दोस्तों कों यूँउसे अकेला छोड़ जातेहुए देखकर, रागिनी गुस्से सें अपनेपेर पटकती हुइ तेज-तेज कदमों सें वहा सें चली गई,। आज पहलीबार रागिनी कों किसी लड़के कि वजह सें उसकी साथी जोँ हमेशा उसकेसंग रहती थि, उसकीहर हां मे हां मिलाती थि, उसके किसी फ़ैसले कां विरोध करने कां कभीसोच भि नहि सकती थि, वोँ उसेयूँ छोड़कर चली गई, थि। रागिनी तमतमाया चेहरा लिए अपनेघऱ पहुँची। उसकी मम्मी केँ पूछने पर्र भि उसनेकुछ नहि बताया औऱ जाकर सीधे अपने कमरे मे बैड पर्र धड़ाम सें गिर पड़ी.
रागिनी खुली आँखों सें आजहुए सारे घटना क्रम कों सोचने लगी.कभी उसे अंकुश पर्र क्रोध आता, तौ कभी अपनी दोस्तों कों गालियाँ देने लगती.जब इस सबसे भि रागिनी कां मन नहि भरा। तौ वोँ अपने बर्ताव कों चरितार्थ करनेलगी। रागिनी नें शुरुआत सें लेकरघऱ लौटने तक कां सारा घटना क्रमकई बार रिवाइंड कर-कर केँ देख डाला.
आख़िर मे मन केँ किसी कोने सें उसे धिक्कार सुनाई दि औऱ प्रश्न आया, “तूँ सिर्फ़ एकबार अपने बाप-भइया केँ रुतबे कों अलगरख करसोच रागिनी, जोँ बर्ताव तूने अंकुश केँ संग किया हैं, क्याँ वोँ सही हैं”?? फिनउसे अपनी फ्रेंड कि वोँ बातें यादआने लगी। कालेज मे अंकुश कां कितना मान हैं, उसके परिवार कि शान भि कोईकम नहि थि। एमएलए कि लड़की अंकुश कि भाभी हैं। अंकुश चाहता तोँ वोँ उसे भि सबक सिखा सकता थां। मगर उसके बड़प्पन नें उसेऐसा करने नहि दिया.
अब रागिनी कां मन ग्लानि सें भरनेलगा थां औऱ अंत मे उसने फ़ैसला कर लिया कि वोँ कल सबसे पहले जाकर अंकुश सें माफी माँगेगी। जैसे हि रागिनी नें मन हि मनयह फ़ैसला लिया कि वोँ कल जाकर अंकुश सें माफी माँगेगी, उसकामन अप्रत्याशित रूप सें शांत हौ गय़ा। अब रागिनी केँ मन मस्तिष्क मे, नफ़रत कि स्थान अंकुश केँ लिए दूसरी हि भावनाएँ पनपने लगी, औऱ वोँ अंकुश कां प्रेम पाने कि कल्पना करनेलगी.
अंकुश कि पर्सनॅलिटी उसके दिलो-दिमाग़ पऱ छातीजा रही थि, इन्हीं ख्वाबों ख़यालों मे नाँ जानेकब रागिनी कां हाथ उसके नाज़ुक अंगों केँ संग खेलने लगा, औऱ रागिनी पऱ मस्ती भरी खुमारी छानेलगी.
कभी रागिनी अपनी चुचियों कों मसलकर फील करती कि यह अंकुश उनकोमसल रहा हैं, तोँ कभी उसकाहाथ अपनी बुर पर्र महसूस करती, औऱ उसे अपनेहाथ सें सहलाने लगती। रागिनी कि खुमारी कब वासना मे बदल गयीँ,, उसेपता हि नहि चला औऱ उसकी उंगलियाँ बुर केँ अंदर जाकर एक्सरसाइज करनेलगी। रागिनी अपनी उंगलियों कों बुर मे अंदर बाहर् करती हुइ, फील करनेलगी, जैसे अंकुश कां लन्ड उसकी बुर मे अंदर बाहर् हौ रहा हौ.
रागिनी केँ मुँह सें मादक सिसकियाँ निकलने लगी - आअहह…। अंकुशह…। औऱ जोरसीए…। चोद्द्द… बोलते हुए उसकी उंगलियों कि रफ़्तार तेज होतीचली गई,। आख़िरकार वोँ पल भि आँ पहुंचा जिसकी चाहतहर जिस्म कों होती हैं, उसकीकमर किसी धनुष कि तरह पलंग सें ऊपर उठतीचली गयीँ, औऱ एक् चीख मारते हुए उसकी बुर नें अपना कामरस छोड़ दिया। अपने गीलेहाथ कों वोँ काफ़ी देर तक देखती रही, फिन उसे बेडशीट सें पोंछकर साँसों कों इकट्ठा करतेहुए उसके चेहरे पऱ एक् चैनभरी स्माइल खेल गई,। अपने स्वयं केँ हाथों सें अपना चूतरस निकालने मे आजउसे एक् अलग सां हि मजाआया थां, जोँ इससे पहलेकभी नहि मिला.
इसी खुमारी मे नां जानेकब उसकी आँखें बंद होतीचली गयीँ,.
उधर अपना हीरो, अंकुश शर्मा यानी कि मे जबघऱ पहुंचा। आज कालेज मे जोँ कुछ भि उसकेसंग हुआ थां, उसे तौ वोँ बुलेट कि आवाज़ मे हि भूल चुका थां, ऊपर सें मस्तहवा केँ झोंके अपनेसंग उसके गुस्से कों भि उड़ा लेँ गये थें। इससे पहले कि मे घऱ तक पहुँचता, कि रेखा दिदी जौ भैया कि विवाह केँ बाद सें अभि तक यहींजमी हुईँ थि। मेरेघऱ सें अपनेघऱ कि ओरजारही थि.
मुझे रास्ते मे हि रोककर एक् अर्थपूर्ण स्माइल करतेहुए बोलि - क्यूं रे हीरो। सवारी कहां सें चली आँ रही हैं?
मे – कालेज गय़ा थां। आप् सुनाओ क्याँ चलरहा हैं?
रेखा दिदी तंज़ कसतेहुए बोलीं – हमारा क्याँ चलेगा? दिनकाट रहे हें, तुँ तोँ कभीबात भि नहि करता औऱ क्यूं करेगा हमारे जैसे छोटे लोगों सें.
मे – ऐसा क्यूं बोलरही हौ रेखा दिदी? वैसे औऱ किसी सें बात करते देखा हैं आपने मुझे?अब वक्त हि नहि मिलता हैं, अब मे कोईजान बूझकर तोँ ऐसा नहि करता नाँ.
रेखा दिदी – हां भइया ! वैसे भि दूसरों सें फुर्सत मिलेतभी तौ हमारी तरफ ध्यान जाए भि जनाब कां… क्यूं?
मे – किसकी बातकर रही होँ। ?
रेखा दिदी – क्यूं अपनी साली केँ पीछे-2 नहि घूमरहा थां जब तक वोँ यहारही? औऱ उसरात शांति फूफी केँ संग???
उसनेजान बूझकर बात अधूरी छोड़ दि.
मैंने उसके चेहरे कि ओर देखते हुए पूछा। शांति फूफी क्याँ? क्याँ कहना चाहती होँ आप्?
रेखा दिदी – मुझेसभी पता हैं बच्चू… उसरात क्याँ होँ रहा थां। मगर मुझेयह भि पता हैं, कि उसमें तेरीकोई ग़लती नहि थि.
मे तौ एकदम सन्नरह गय़ा रेखा दिदी केँ मुँह सें यहसभी बातें सुनकर, औऱ मन हि मन सोचने लगा। तौ क्याँ इस बहनचोद नें सभीकुछ देखा थां उसरात?
मुझेचुप देखकर रेखा दिदी बोलीं – देख भइया। तुँ चिंता नाँ कर, मे किसी कों कुछ नहि बताऊंगी। तूँ नाँ थोडा सां हमारे ऊपर भि नज़रें इनायत करदेबस.
मैंने फिन भि बचाव कि आख़िरी कोशिश करतेहुए कहा – मेरीसमझ मे नहि आँ रहा दिदी, कि आप् क्याँ बोलरही हौ?
दिदी तुनककर बोलि – अच्छा!!! तौ साफ-साफ सुन, जिस रात बारात लौटकर आई थि, उसरात तुँ शांति फूफी केँ बगल मे हि सो गय़ा थां। यह तोँ याद होगा?
मे – हां, स्थान नहि बची थि कहीं, तोँ सो गय़ा उसमें क्याँ?
रेखा दिदी – तौ रात मे शांति फूफी नें मौके कां फ़ायदा उठाया, औऱ तेरेऊपर चढ़कर चुदरही थि। अबआया कुछयाद? औऱ अगरफिन भि तुँ मुझे चूतिया समझरहा हौ तौ, उसकेबाद तूने फूफी कों पीछे सें जबरदस्ती चोदा थां। अबबोल??? मैंने उसरात कि तेरी चुदाई लाइव देखी थि, औऱ सच कहूँ तौ तभी सें मेरी बुर भि तेरा ख़याल आते हि पानी छोड़ने लगती हैं दोस्त.
यह कहकर वास्तव मे हि रेखा दिदी साड़ी केँ ऊपर सें हि अपनी बुर कों मसलने लगी.
मे हथियार डालते हुए बोला – ठीक हैं दिदी आप् जौ चाहती हें, वोँ मे करने कों रेडी हूं। बोलिए कब औऱ कहां करवाना हैं?
रेखा दिदी – अभि आजा नाँ… घऱ मे, मे औऱ आशा हि हें, उसको मे अभि खेतों पर्र भेज देती हूं.
मे – ठीक हैं, तोँ फिन चलिए, मे अभि आधे घंटे मे आता हूं आपकेपास.
उधरजब मे घऱ पहुंचा तोँ मुझे देखते हि भाभी बोलीं –अंकुश जी थोडा टाइम निकाल कर पंडित जी सें बड़े देवरु जी केँ पगफेरे कां मुहूर्त निकलवा केँ लाना हैं। बापूबोल केँ गये हें.
मे - ठीक हैं भाभी। मे चला जाऊँगा। उसकेबाद मे फ्रेश हुआ, औऱ अपने कपड़े चेंजकर केँ खानां खाया औऱ निकल लिया रेखा दिदी केँ घऱ कि तरफ.
रास्ते मे हि आशा दिदी मिल गई, जौ अपने खेतों कि तरफजा रही थि, मैंने पूछा कि कहां जारही हौ??
तोँ आशा दिदी नें कहा – मां-पिताजी कों खानां देनेजा रही हूं। तुम् कहां जारहे होँ??
मैंने कहा - रेखा दिदी नें बुलाया हैं किसीकाम सें। मेरीबात सुनकर, वोँ अपनी बड़ी–2 आँखें मटकाते हुए बोलीं – रेखा दिदी कों तुमसे ऐसा क्याँ कामपड़ गय़ा?
मैंने कहा – एक् कामकरो जल्दलौट केँ आँ जाओ, स्वयं हि देख लेना औऱ यह कहकर मैंने अपनी एक् आँखदबा दि। वोँ सभीसमझ गई, …
आशा दिदी – बेस्ट ऑफलक अंकुश डिअर.मगर मेरेलिए थोडा बचा केँ रखना अपना प्रसाद, औऱ हँसती हुई तेज-तेज कदमों सें खेतों कि तरफचली गयीँ,.
उनकेघऱ पहुँचने तक रेखा दिदी नें अपने बच्चे कों दूध पिलाकर सुला दिया थां, अब वोँ उसेगाय याँ भैंस कां हि दूध देती थि। अपनादूध पिलाना तोँ उसनेकब कां बंदकर दिया थां। मे जैसे हि उसकेघऱ पहुंचा तौ, झट सें रेखा दिदी नें दरवाजा बंदकर दिया। औऱ मुझेहाथ पकड़कर अंदर लेँ जानेलगी.
मैंने कहा – दिदी तुम् चलो कमरे मे, मे टॉयलेट कर केँ बस एक् मिनिट मे आया.
उसके जाते हि मैंने दरवाजे कि कुण्डी खोल दि औऱ ऐसे हि उसे भिड़ा रहने दिया। मे जब उसके कमरे मे पहुंचा तोँ रेखा दिदी अपनी साड़ी उतार चुकी थि। सिर्फ़ ब्लाउज औऱ पेटीकोट मे रेखा दिदी केँ कसेहुए पपीते जैसेगोल बड़े-बड़े चुचेआधे बाहर् कों उबलेपड़ रहे थें। मैंने जाकर रेखा दिदी केँ उन दोनों पपीतों कों पकड़कर ज़ोर सें मसल दिया। रेखा दिदी केँ मुँह सें सिसकी निकल गई,। दिदी नीचे ब्रा नहि पहने थि, सो चुचियों कों मसलते हि उसके निप्पल ब्लाउज केँ अंदर सें हि खड़े होकर सैलूट मारने लगे.
मैंने रेखा दिदी केँ चुचों कों मसलते हुए उसके होंठों पऱ किस किया औऱ बोला – दिदी, तुम्हारे यह चुच्चे तौ बहोत हि मस्त हें। जी करता हैं चूसकर खा जाऊं.
रेखा दिदी - तौ खा लें न् अंकुश डार्लिंग, इसमें क्याँ देख्ना औऱ क्याँ सोचना। मे कब सें तुझेही खिलाने केँ लिएकह रही हूं पऱ तुँ तोँ कहीं औऱ हि मुँह मारता फिरता हैं। सीईईईईईईईईई। धीरे-धीरे मरोड़। नां… भोसड़ी केँ तोड़ेगा क्याँ मेरी घुंडियों कों.
मैंने चटक-चटक कर केँ उसके ब्लाउज केँ सारेबटन तोड़दिए। औऱ उसके नंगे स्तन पऱ पिल पड़ा.
रेखा दिदी बुरीतरह सें हल्की चीख भरनेलगी - हायरे… चूस लें मेरे बूब्स बहनचोद… ओफ़्फओ… मज़ा आँ गय़ा… प्रेम सें चूस नं अंकुश। इन्हें काटमत। दर्द होता हैं मेरे प्यारे बहनचोद भइया। ईईईईई….
उसके मुँह सें गालियाँ सुनकर मेरी उत्तेजना औऱ बढ़ने लगी। मेरा एक् हाथ उसकी बुर कों सहलारहा थां। उसने भि मेरे लन्ड कों अपनी मुट्ठी मे लेँ रखा थां, औऱ वोँ उसेमसल औऱ मरोड़ देती.फिन मैंने उसके पेटीकोट कां नाड़ा भि घसीटकर तोड़ दिया.
दिदी शिकायत भरे लहजे मे बोलि – अंकुश तूँ मेरे कपड़े साबित नहि छोड़ेगा लगता हैं.
रेखा दिदी कि पैंटी गीली हौ गई, थि। औऱ मालपुए जैसी बुर पैंटी केँ ऊपर सें हि फूली हुइ दिखरही थि। उसकी चौड़ी दरार देखते हि मैंने उसकी बुर कों अपनी मुट्ठी मे भरकर ज़ोर सें मसल दिया.
रेखा दिदी - आईईईई। धीरे-धीरे… अंकुश… बेहन केँ लौड़े। आईईईई… यह तेरी बेहन कि बुर हैं किसी रंडी कि नहि, जोँ बुरीतरह सें दबोचने मे लगा हैं.
मैंने कहा – रेखा दिदी, अगर आप् अपनी पैंटी कों बचाना चाहती हैं, तौ इसे जल्द सें उतार दीजिये.
दिदी बोलीं – तुमने तौ स्वयं सारे कपड़े पहने हें औऱ बस मुझे हि नंगाकर दिया??
यह कहकर उसने मेरी टीशर्ट निकाल दि, औऱ लोवर कों भि खींच दिया। अपनी पैंटी कों उतारकर वोँ मेरे लन्ड कों मुट्ठी मे भरकर बोलीं – आहहह। क्याँ मोटा तगड़ा मस्त लन्ड हैं तुम्हारा अंकुश… इस मस्त लन्ड सें चुदने केँ लिए मेरी बुर कब सें फड़फड़ा रही थि। अब इसको अपनी बुर मे अंदर तक लूँगी। हम्म। आहहह.यह सोचकर हि मेरी बुर पनिया गई,। देखो तोँ मेरी बुर कितनी चुदासी हौ रही हैं। हायराम राम.यह कहकर वोँ मेरे लन्ड कों मसलते हुएमूठ मारने लगी.
मैंने एक् हाथ सें उसके एक् मम्मे कों दबा दिया, दूसरे हाथ कि दो उंगलियाँ रेखा दिदी कि रसीली बुर मे पेल दि औऱ अंदर-बाहर् कर केँ उसे चोदने लगा। दिदी क्या बात है-2 कर केँ अपनीकमर चलाने लगी.फिन मैंने अपनी उंगलियाँ उसकी बुर सें बाहर् निकाली औऱ उसके मुँह मे डाल दि। वोँ अपने हि चूतरस कों चटकारे लेकर चाटने लगी.फिन मे रेखा दिदी केँ पीछे आँ गय़ा औऱ उनके भारी भरकम गान्ड केँ पाटों कों मसलते हुए थोडा आगे कों झुका दिया। उनकी गान्ड कां छेदखुल बंद हौ रहा थां। मैंने अपना मुँह उनकी गान्ड केँ पाटों केँ बीचडाल दिया, औऱ उसकी गान्ड केँ छेद कों जीभ सें कुरेदते हुए उनकी बुर मे उंगली कर दि। उनकी बुर औऱ अधिकरस बहाने लगी.
अब रेखा दिदी सें औऱ सब्र करना मुश्किल हौ रहा थां, तौ दिदी नें मुझे बिस्तर पर्र धक्का दे दिया औऱ स्वयं मेरेऊपर आकर मेरे मुँह पर्र अपनी बुर लेकरबैठ गई। मेरे मुँह मे उसकी बुर सें बूँद-2कर केँ शहदटपक रहा थां, जिसे मे चासनी कि तरह चाटता जारहा थां। रेखा दिदी भि मेरेऊपर लंबी होकरपसर गई, औऱ मेरे लौड़े कों अपने मुँह मे भरकर चूसने लगी। मुझेबाद मे पतालगा कि इस पोज़िशन कों 69 कि पोज़िशन कहते हें.
मेरीजीभ उसकी बुर मे घुसी पड़ी थि संग हि उसकी चोंच जैसी क्लिट जौ अब औऱ भि बाहर् आँ रही थि, अपनी उंगलियों मे पकड़कर दबा दिया। रेखा दिदी बुरीतरह सें अपनीकमर कों मेरे मुँह पर्र पटकने लगी। दिदी कि गान्ड कां छेद खुल-बंद हौ रहा थां। मैंने अपने दूसरे हाथ कां अंगूठा दिदी कि गान्ड केँ सुनहरे छेद पर्र रखकर फिराया। फिनउसे उसकी चूतरस सें गीलाकर केँ धीरे-धीरे सें गान्ड केँ सुराख मे घुसा दिया। जबरदस्त तरीके सें रेखा दिदी कि गान्ड नें मेरे अंगूठे कों कस लिया औऱ अपनी बुर कों औऱ ज़ोर सें मेरे मुँह पर्र दबाने लगी। धीरे-धीरे–2 मैंने अपना पूरा अंगूठा दिदी कि गान्ड मे डाल दिया, रेखा दिदी उत्तेजना मे मेरा पूरा लन्ड अपनेगले तक निगल गई,। जिस स्पीड सें मेरेहाथ हरकतकर रहे थें, उतनी हि स्पीड सें वोँ मेरे लौड़े पर्र अपना मुँहचला रही थि.
मेरी हरकतें रेखा दिदी ज्यादा देर तक सहन नहि करपाई औऱ अपनी बुर कां ढक्कन खोल दिया, बुर नें अपना साराशहद मेरे मुँह मे उडेल दिया.!!
रेखा दिदी अभि मेरेउपर सें लुढ़क कर साइड मे लेटकर लंबी-2 साँसें लेँ हि रही थि, कि मैंने उसकी टाँगों कों ऊपरकर केँ अपनी छाती सें सटा लिया। दिदी कि फूली हुइ बुर जौ कि अब टाँगें ऊपर होने सें औऱ ज्यादा मधु-मक्खी केँ छत्ते कि तरहउभर आई थि, अपनी हथेली सें दबाकर रगड़ दिया औऱ अब अपना लौड़ा जैसा सख्त कड़क लन्ड उसकी ताज़ा झड़ी हुईँ बुर मे पेल दिया.
रेखा दिदी - अरे.मारररर.दिया रीईए.उहह…। मम्मी…आआह…। धीरे-धीरे सें डाल…। इसका एक् दिन मे हि भोसड़ा बना देगा क्याँ बहनचोद? बहोत हरामी हैं तुँ… भोसड़ी केँ…
रेखा दिदी दर्द सें लिपटी आवाज़ मे बोलीं - कौन सें जन्म कां बैर निकाल रहा हैं अंकुश??
मे - तुमने हि तौ कहा थां… खाजा मुझे… फाड़दे मेरी बुर। अब क्याँ हुआ?? मैंने मजा लेतेहुए कहा.
रेखा दिदी – अंकुश तेरा खम्भे जैसा लन्ड, इतना सख्त औऱ कड़क हैं… एक् दम मोटे डंडे जैसा.ओह मां… अंदर तक चीर डाला मेरी बुर कों तेरेइस घोड़े केँ जैसे लौड़े नें। आअहह। उउउफ़फ्फ़। अगर मे एक् बच्चे कि मां नहि होती, तोँ तूँ मार हि डालता मुझे… आहह-आहह.
फिन मैंने आहिस्ता अपना लौड़ा बाहर् खींचा। दिदी नें एक् राहतभरी साँस अपने नथुनों सें निकाली। अभि वोँ अच्छे सें अपने आप् कों संभाल भि नहि पाई थि, कि मैंने फिन सें एक् ताक़तवर धक्का उसकी बुर पऱ मार दिया। दिदी फिन सें बिलबिला कर गालियां देनेलगी। ऐसे हि कुछ धक्कों तक चलतारहा, वोँ चुदती भि जारही थि औऱ संग-संग कुछ नाँ कुछ बड़बड़ाती भि जारही थि। मेरे धक्कों कि स्पीड केँ हिसाब सें हि उसके मुँह सें गालियाँ निकलरही थि। जौ मुझे औऱ ज़ोर सें चोदने कों भड़का रही थि.
15-20 मिनिट तक हम् दोनों हि जमकर चुदाई मे लगेरहे। अब वोँ भि अपनी गान्ड उछाल-2कर मस्त होकरचुद रही थि। फिन हम् दोनों नें एक् संग हि अपने–2नल खोलदिए औऱ झड़ने लगे। मेरे गाढ़े–2 रस सें उसकी पोखर लबालब भर गई,,। वोँ भि आज पहलीबार इतनी गहराई तक लन्ड लेकर बुरीतरह सें झड़ी थि.
हमारे गाँव केँ पंडित जी जौ हमारे घऱ मे होने वालेसब वैदिक कार्यों कों संपन्न करते हें। उनकाघऱ बीच गाँव मे हैं। 50 वर्षीय पंडित जी केँ दो संतानें थि, बड़ा लड़का जिसकी उम्रकोई 23-24 कि होगी। उसकी विवाह एक् साल पहले हौ चुकी थि। दूसरी बेटी, उसकी विवाह उसके भइया सें भि एक् साल पहले हौ गयीँ, थि। घऱ पऱ पंडित जी, उनकी पंडिताइन, औऱ बेटे कि बहू वर्षा। यहीतीन प्राणी रहते थें। बेटी कि विवाह हौ चुकी थि, औऱ बेटा शहर मे रहकरकुछ जॉब धंधा करता हैं। महीने दो महीने मे एक् बारघऱ आता हैं.
मैंने पंडित जी केँ घऱ कां दरवाजा खटखटाया। कुछदेर बाद अंदर सें एक् सुरीली सि आवाज़ आई - कौन हैं??
मैंने बाहर् सें आवाज़ दि – मे हूं… अपने पापा कां नाम लेकर उनका बेटा अंकुश.
थोड़ी देरबाद दरवाजा खुला। सामने एक् 20-21 साल कि गोरी चिट्टी शादीशुदा बेटे कि बहू वर्षा। जिसके कश्मीरी सेब जैसे लाल-लाल गाल देखते हि जीकरे खा जाऊं.गोल चेहरा, बड़ी-बड़ी कटीली काली आँखें, नज़र डालते हि सामने वाला घायल होँ जाए। वर्षा साड़ी पहनेहुए थि। कसकर लपेटी हुइ सारी केँ पल्लू मे सें उसके कठोर मस्त कबूतर अपने होने कां आभासदे रहे थें। छरहरे जिस्म कि उस नवयौवना कि पतली सि कमर केँ नीचे, थोडा उभरेहुए वर्षा केँ कूल्हे। उसने अपनी साड़ी थोड़ी नाभि केँ नीचे बाँधरखी थि जौ वर्षा कि पतली सि साड़ी मे सें अपनी सुंदरता कां बखान स्वयं ब स्वयं कररही थि.
मैंने वर्षा कों पहलेकभी नहि देखा थां तौ उसे एकटक देखता हि रह गय़ा। वर्षा भि मुझे देख-ताड़ कर देखेजा रही थि। नज़रें चार होते हि, हम् दोनों हि जैसे एक् दूसरे मे खोगये। कुछदेर तक हम् दोनों हि एक् दूसरे कों देखते रहे.फिन जब पीछे सें पंडिताइन कि आवाज़ सुनाई दि, तोँ चौंक पड़े। वर्षा नें फ़ौरन अपनी नज़रें झुकाली.
पंडिताइन – कौन हैं वर्षा?
मैंने अपना परिचय दिया औऱ पंडित जी केँ बारे मे पूछा। तोँ उसने बताया कि वोँ तौ पड़ोस केँ गाँवगये हें। साम तक हि लौटेंगे.
मैंने अपनेआने कां कारण बताया औऱ साम कों आने कां बोलकर वापस अपनेघऱ लौटआया। साम कों पंडितजी स्वयं आकर बापू कों पगफेरे कि तिथिबता गये.
दूसरे दिन मे टाइम पर्र अपने कालेज पहुंचा। मैंने बुलेट खड़ी कि औऱ अपनी क्लास कि ओरचल दिया। अभि मे ग्राउंड क्रॉस कर केँ लॉबी मे एंटरहुआ हि थां कि रागिनी अपने सीने पर्र किताबें चिपकाए मेरे सामने आकर खड़ी होँ गई,। मैंने उसके साइड सें निकलकर आगे बढ़ने कि कोशिश कि तौ उसने मेराहाथ पकड़ लिया। मैंने पलटकर उसकीतरफ देखा। तौ वोँ मेराहाथ थामे अपनी नज़रें झुकाए खड़ी थि.
मे एकटक उसकीओर हि देखरहा थां, औऱ मन हि मनसोच रहा थां, कि यहअब औऱ क्याँ नया बखेड़ा खड़ा करना चाहती हैं। जैसे-तैसे कर केँ मैंने अपने गुस्से कों कल काबू मे किया थां। अबअगर इसनेकोई ग़लत हरकत करने कि कोशिश कि, तोँ मे साली कि मम्मी चोद दूँगा.
मे अभि यहसभी सोच हि रहा थां, कि उसने मेराहाथ छोड़ दिया औऱ अपने दोनों हाथ जोड़कर बोलीं – मुझे क्षमा करदो अंकुश, अपनेकल केँ बर्ताव केँ लिए मे बहोत शर्मिंदा हूं.
मे तौ मुँह फाड़े उसको देखता हि रह गय़ा। अचानक यह जादू केसे होँ गय़ा। दोस्त, यह शेरनी। भीगी बिल्ली केसेबन गयीँ,। अवश्य इसकीयह कोईचाल होगी.
मे – देखो मे कल कि बात कों कल हि भूल चुका हूं। अब मुझे तुमसे कोई शिकायत नहि हैं। प्लीज़ मेरा मार्ग छोड़ो। मुझे लेक्चर अटेंड करने केँ लिएलेट होँ रहा हैं.
रागिनी – तौ सिर्फ़ एक् बारकह दो कि तुमने मुझे क्षमा कर दिया.
मे – अरे दोस्त! जब मे कहरहा हूं, कि मे कल कि बात कों भूल चुका हूं। तोँ अब इसमें क्षमा करने कि बात कहां सें आँ गयीँ,.
रागिनी – इसका मतलब तुम् मुझसे नाराज़ नहि होँ?
मे – नहि मे तुमसे नाराज़ नहि हूं। अब मे जाऊं?
रागिनी – तौ अब हम् फ्रेंड्स हें??? औऱ यहकहकर उसने अपनाहाथ आगे बढ़ा दिया.
मैंने भि कुछसोच कर अपनाहाथ आगेकर दिया। तोँ उसने मेराहाथ अपनेहाथ मे लेकरचूम लिया औऱ थैंक्स बोलकर वहा सें भाग गई,। मे उसकी थिरकती गान्ड कों देखते हुए वहीं खड़ारहा औऱ उसकीइस हरकत कां मतलब निकालने कि कोशिश करतारहा। फिन अपनासर झटककर अपनी क्लास मे चला गय़ा। लास्ट लेक्चर अटेंड कर केँ मैंने स्टैंड सें अपनी बाइकली औऱ किक मारकर कालेज सें चल दिया.
अभि मे कालेज केँ गेट सें बाहर् निकल हि रहा थां, कि देखागेट केँ ठीक सामने एक् खुलीजीप खड़ी थि, 5 लड़के जौ शक्ल सें हि आवारा किस्म केँ लगरहे थें। जीप केँ नीचे खड़े थें। उनमें सें एक् लड़का, जौ 5’4” कद होती, गोरारंग चौड़ा जिस्म, किसी फुटबॉल जैसा, चेहरा घनी दाढ़ी सें भराहुआ। बड़ी-2लाल आँखें। देखते हि उसने मुझेहाथ देकर रुकने कां इशारा किया.
मैंने बाइकरोक दि मगर इंजन अभि भि चालू हि थां। मेरे दोनों पेर ज़मीन पर्र टीकेहुए अभि भि मे बाइक कि सीट पऱ हि बैठा थां.
वोँ फुटबॉल जैसाफिन बोला – ओए…यह डग-डगबंद कर। मैंने बाइक कां इंजनबंद कर दिया औऱ वाहन कों साइड स्टैंड पर्र लगाकर खड़ा हौ गय़ा.
वोँ मेरेपास आया, अब मेरीकद 6’2”, औऱ वोँ मेरे सामने टिंगा सां। तौ मुझसे बात करने केँ लिएउसे अपना थोबड़ा उठाना पड़ा.
वोँ ऊँट कि तरह अपनी गर्दन उठाकर बोला - तेरा हि नाम अंकुश हैं?
मे – हां, क्यूं? क्याँ काम हैं? बोलिए। मैंने शालीनता बनाएहुए कहा.
वोँ – तूँ जानता हैं मे कौन हूं? भानु प्रताप सिंहनाम हैं मेरा। ठाकुर सूर्य प्रताप कां बेटा.
मे – जी बड़ी खुशी हुईँ आपसे मिलकर। बोलिए मे क्याँ सेवाकर सकता हूं आपकी?
वोँ – सेवा तौ हम् तेरी करनेआए हें साले। बहोत चर्बी चढ़ गयीँ, हैं तुम को.यह कहतेहुए उसने अपनाहाथ ऊपरकर केँ मेरे शर्ट कां कालर पकड़ लिया.
मे – देखिए भइया साहब, शायद आपकोकोई ग़लतफहमी हुई हैं। मे तौ यहा सिर्फ़ पढ़ाई करनेआता हूं। मैंने ऐसाकुछ नहि किया जौ आपकीशान केँ खिलाफ हौ.
वोँ – अच्छा… अब हमें बताना पड़ेगा कि तूने क्याँ किया हैं? साले तेरीखाल खींचकर भूस नां भर दिया तोँ मेरानाम भानु प्रताप नहि.
अभि वोँ औऱ कुछ कहता याँ करता। रागिनी भागते हुएवहा आई, उसने अपने भइया कां हाथ मेरे शर्ट केँ कालर सें झटक दिया। औऱ बोलि.
रागिनी – यह आप् क्याँ कररहे हें भैया?
वोँ – इसने तेरेसंग बदतमीजी कि हैं औऱ तूँ इसे हि बचारही हैं.
रागिनी – आपकोकोई ग़लतफहमी हुई हैं। इसने मेरेसंग कोई बदतमीजी नहि कि, ग़लती मेरी हि थि औऱ आपसे किसने कहा कि इसने मेरेसंग कोई बदतमीजी कि हैं??? आप् जाइएयहा सें प्लीज़। मे बाद मे आपकोसभी बताती हूं.
फिन मेरीओर पलटकर बोलि – सॉरी अंकुश। मे अपने भइया कि तरफ सें तुमसे माफी मांगती हूं। उसका भइया अपने दोस्तों केँ संगवहा सें चला गय़ा। मैंने रागिनी कि बात कां कोई जवाब नहि दिया औऱ बिनाकुछ कहे अपनेघऱ चलाआया। उधर रागिनी कां बदलाहुआ रवैया देखकर उसकी फ्रेंड्स आश्चर्य चकित थि, वोँ आपस मे कानाफूसी करनेलगी.
टीना – अरे दोस्त, आज सूरज पश्चिम सें केसे निकलआया.
मीना – हां दोस्त कल तौ यह शेरनी कि तरह दहाड़ रही थि औऱ आज स्वयं नें हि उसे अपने भइया सें बचा लिया। आख़िर कुछ तोँ बात हुई हैं, चलो पूछते हें। वोँ चारों रागिनी केँ पास पहुँची। जोँ मेरे बिनाकुछ बोलेवहा सें चलेआने कि वजह सें अपने भइया पऱ गुस्से सें भुनभुना रही थि.
रखी – हेल्लो रागिनी, आज तोँ तूँ कुछ बदली-2 सि लगरही हैं.
रागिनी – यू शट-अप। पहलेयह बताओ। तुम् लोगों नें मेरे भइया सें क्याँ कहा?
रीना – अरे, तुँ हमारे ऊपर क्यूं भड़करही हैं दोस्त? हमने ऐसा-वैसा कुछ नहि कहा.
मीना – तुम को तोँ पता हि हैं कि हमने तुम्हारी तरफ भि कल समझाया थां। फिन हम् तेरे भइया कों क्यूं ऐसा-वैसा कुछ कहेंगे, वोँ तौ पूछरहा थां कि रागिनी केँ संगकल कालेज मे क्याँ हुआ? तोँ हमनेउसे सारीबात बता दि। अब तुम् दोनों भइया-बेहन अपनेआगे किसी कों कुछ समझते होँ नहि.
टीना – मे फिन कहती हूं रागिनी। इससे पहले कि अंकुश कां पेशेंस जवाबदे जाए तुम् दोनों भइया-बेहन सही रास्ते पर्र आँ जाओ। वरना तुम्हारी पूरी फैमिली केँ लिए मुसीबत होँ सकती हैं। आगे तुम्हारी मर्जी.
राखी – वैसेआज तेरा व्यवहार देखकर अच्छा लगा। क्याँ तेरीकोई बात हुई थि उससे.
रागिनी नें उसकीबात कां कोई जवाब नहि दिया औऱ वोँ वहा सें चली गई,.
इधरजब मे घऱ पहुंचा। तोँ आते हि भाभी नें लपक लिया, औऱ बोलि – अच्छा हुआ अंकुश तुम् आँ गये। मे अभि सोच हि रही थि कि केसे औऱ किसके संग जाऊं.
मे – कहां जानां हैं आपको?
भाभी – अरे! वोँ पंडितजी कि बहू वर्षा कों कलसाम सें हि नां जाने क्याँ होँ गय़ा हैं? कलसाम कों वर्षा अंधेरे मे शौच केँ लिए गई, थि। वापसआकर बड़ी अजीब-अजीब सि हरकतें कररही हैं। चाची बतारही थि कि वर्षा केँ ऊपरकोई भूत–प्रेत कां चक्कर हौ गय़ा हैं। अब जल्द सें फ्रेश हौ जाओ औऱ मुझेवहा लें चलो, देखें तोँ सही, हुआ क्याँ हैं उसे?
मे सोच मे पड़ गय़ा, कि दोस्त! कलजब मे उनकेयहा गय़ा थां। तब तौ वर्षा एकदमभली चंगी थि, तोँ अब अचानक सें हि क्याँ हुआ?खैर चलो देखते हें, यहभूत बाधा होती क्याँ हैं? यह सोचते हुए मे फ्रेश होनेचला गय़ा.
जब हम् पंडित जी केँ घऱ पहुँचे तौ उनके आँगन मे लोगों कां जमावड़ा लगाहुआ थां, औरतें औऱ मर्द बैठेआपस मे बतिया रहे थें। कोईकुछ कहरहा थां, तौ कोईकुछ बतारहा थां। जितने मुँह उतनी बातें। सभी अपनीराय देने मे लगे थें, आप् बीती याँ सुनी सुनाई दास्तान एक् दूसरे केँ संगशेर कररहे थें। पर्र सब्जेक्ट एक् हि थां, भूत प्रेत केँ चक्कर। चूँकि हमारा परिवार गाँव केँ प्रतिष्ठित लोगों मे शुमार होता हैं औऱ अब तोँ एमएलए केँ घऱ सें संबंध जुड़ने सें औऱ ज्यादा मान सम्मान मिलने लगा थां। हमें देखते हि पंडिताइन नें भाभी कां स्वागत सत्कार किया.
जब भाभी नें उनकीबहू वर्षा केँ बारे मे पूछा तौ वोँ हमेंउस कमरे मे लें गयीँ,, जहाँ वोँ लेटी हुई थि। गेट खुलने कि आवाज़ सुनते हि वर्षा नें अपनी बड़ी–2 आँखें औऱ अधिक चौड़ी कर केँ खोल दि, जिसमें आगबरस रही थि। वर्षा केँ इसरूप कों देखकर एक् बार तौ मुझे भि डर लगनेलगा.
सामने अपनी सासू केँ संग भाभी औऱ मुझे देखते हि वर्षा झट सें उठकरबैठ गयीँ, औऱ भारी सि आवाज़ निकालकर गुर्राते हुए बोलीं - तूँ फिन आँ गयीँ,, साली कुतिया। मे तुम्हारी तरफजान सें मार दूँगा। वर्षा अपनी लाल-लाल आँखें दिखाकर औऱ हाथों केँ पंजों कों फैलाकर अपनी सासू माँ केँ ऊपर झपटी। मानो वोँ उसकागला हि दबा देना चाहती होँ.
भाभी चीखते हुए बोलि – अंकुश, जल्द सें पकड़ोइसे.
मैंने झपटकर आगे सें वर्षा केँ कंधे मजबूती सें पकड़लिए औऱ उसेफिन सें बैड पर्र बिठा दिया। वर्षा झटके मार-मारकर मेरी पकड़ सें छूटने कि कोशिश कररही थि औऱ हुंकार मारते हुए नाँ जाने क्याँ-2 अनाप-शनाप बकनेलगी। उसकी गर्दन लगातार झटकेमार रही थि। इसवजह सें वर्षा कां आँचल नीचेगिर गय़ा, सरकेबाल चारों ओर बिखरगये, औऱ अब वर्षा किसी हॉरर मूवी कि हीरोइन प्रतीत होनेलगी थि.
वर्षा आगे कों झुककर अपनेसर कों आगे पीछेकर केँ गोल–2 घुमाने लगी। मुँह सें गुर्राहट बदस्तूर जारी थि। वर्षा कि गोल-गोल सुडौल, दूध जैसी गोरी-गोरी बूब्स आधी तक मेरी आँखों केँ सामने नुमाया हौ गई,। कुछदेर तौ मे भि वर्षा कि मस्तकसी हुइ जवानी मे खो गय़ा। जिससे मेरी पकड़कुछ ढीली पड़ने लगी.
मगर फिन जल्द हि मैंने अपनेसर कों झटककर उसे कंट्रोल किया औऱ वर्षा कि आँखों मे झाँकते हुए बोला – क्यूं कररही होँ ऐसा, क्याँ मिलेगा तुम्हें अपने घरवालों कों इसतरह परेशान कर केँ?
मेरीबात सुनकर, एक् समय केँ लिए उसके हाव-भाव बदले। मानो, वर्षा मुझसे कुछ कहना चाहती हौ। मगर दूसरे हि समय वर्षा फिन सें वहीसभी करनेलगी औऱ ताड़-2कर अपनी सासू कों खा जाने वाली नज़रों सें देखने लगी.
भाभी नें पंडिताइन कों कमरे सें बाहर् जाने कां इशारा किया। उनके बाहर् जाने केँ बाद हम् तीनलोग हि रहगये उस कमरे मे। भाभी नें अंदर सें कमरे कां गेटबंद कर दिया। औऱ उसकेपास जाकरबैठ गई,.
भाभी नें प्रेम सें उसके कंधे पऱ हाथरख कर सहलाया। औऱ बोलि – देखो वर्षा… यह जौ तुम् कररही हौ, उससे तुम्हारे घऱ कि कितनी बदनामी हौ रही हैं, पता हैं तुम्हें? लोगों कां क्याँ हैं, उन्हें तौ ऐसे तमाशे देखकर औऱ मजाआता हैं, तकलीफ़ तोँ तुम्हारे अपनों कों हि होँ रही हैं नां। मे जानती हूं कि तुम्हारे ऊपरकोई भूत-प्रेत कां चक्कर नहि हैं। फिन क्यूं लोगों कां तमाशा बनरही हौ? भाभी कि बातसुन कर वर्षा एक् बार केँ लिए चौंक पड़ी औऱ झटके सें उसने अपनासर ऊपर किया.
भाभी नें आगेकहा। चौंको मत, औऱ बताओ मुझेअसल बात क्याँ हैं। क्यूं कररही होँ यहसभी?
कुछदेर वर्षा यूँ हि बैठी भाभी कों घूरती रही., मानो उसकेमन मे कोई अंतर्द्वंद चलरहा होँ। फिन भाभी केँ कंधे सें लगकर वोँ फूट–फूट कर रोनेलगी, औऱ सुबकते हुए बोलीं - आप् ठीकसमझ रही हें दिदी। मगर मे क्याँ करूँ। आप् स्वयं हि समझ लीजिए मेरीइस हालत कां ज़िम्मेदार कौन हैं?
भाभी उसकीपीठ सहलाते हुएहंस कर बोलीं – तुम्हें कल मेरेइस देवर जी कां भूतघुस गय़ा थां, हैं नाँ?? उन्होंने मेरीतरफ इशारा कर केँ कहा, तोँ उनकी बातें सुनकर उसने अपनी नज़रें झुकाली।
maira Pyara Devar - niyantran – New Episode
UPDATE 18
मे भाभी कि बात सुनकर चौंक पड़ा, कुछ कहना हि चाहता थां। कि भाभी नें मुझेचुप रहने कां इशारा किया.
फिन भाभी वर्षा सें बोलीं – तुँ फिकरमत कर मे सभीठीक कर दूँगी। बस जैसा मे कहती हूं, वैसे हि करना.ठीक हैं.
फिन उन्होंने उसकीकमर मे चुटकी लेतेहुए कहा – अब तुँ आरामकर, औऱ अपनायह नाटककल तक औऱ ऐसे हि जारी रखना.
भाभी कि बात सुनकर वोँ मंद-मंद मुस्कराने लगी, हम् दोनों उठकर बाहर् कि तरफचल दिए, वोँ तिरछी नज़रमुझ पर्र डालकर लेट गयीँ,.
बाहर् आकर भाभी नें पंडिताइन कों अकेले मे बुलाया औऱ बोलीं – चाची जी, मेरे गाँव मे एक् भूत भगाने वालाओझा हैं। घऱ जाकर मे अपने पापा कों चिट्ठी लिख दूँगी, वोँ सभी संभाल लेंगे, आप् बसकल अंकुश केँ संग वर्षा कों उसकेपास भेज देना। चिंता करने कि कोईबात नहि हैं। सभीठीक होँ जाएगा। कल सुभह 10 बजे उसको सजधजकर करवा देना.ठीक हैं, मे अब चलती हूं.
रास्ते मे मैंने भाभी सें पूछा – यह आप् वहा क्याँ कह रहींथीं? मेराकौन सां भूत हैं जौ घुस गय़ा वर्षा केँ अंदर?
भाभी हँसते हुए बोलि – चलो, घऱ जाकर शांति सें सभीकुछ समझाती हूं तुम्हें.
मे रास्ते भरयही सोच-सोच कर परेशान होतारहा, कि आख़िर ऐसा क्याँ देखा भाभी नें औऱ यह क्यूं कहा। कि मेराभूत घुस गय़ा हैं उसके अंदर। आख़िर असलबात क्याँ हैं? मेरी मानसिक स्थिति देखकर भाभीमन हि मन मुस्करा रही थि.
घऱआकर भाभी नें मुझे अपनेपास बिठाया औऱ मेरेगाल पर्र प्रेम सें सहलाकर बोलि – हाँ अंकुश, अब पुछो क्याँ पूछना चाहते होँ?
मे – वही जौ आपनेवहा उससेकहा थां। वोँ क्याँ हैं?
भाभी हँसते हुए बोलीं – तुम्हारे अंदर एक् बहोत हि प्यारा सां भूत रहता हैं, जब तुम् उससेकल मिले थें, तोँ वोँ भूत उसके अंदरघुस गय़ा.
मे – मेरे अंदरकौन सां भूत हैं? औऱ वोँ मुझे क्यूं नहि दिखता? यह आप् कैसी बातें कररही होँ भाभी? मुझे तौ डरलगरहा हैं। प्लीज़ बताइए नाँ.
भाभी हँसते हुए बोलि – वहीभूत जोँ थोडा–थोडा हम् सभी मे घुस चुका हैं तुम्हारे अंदर सें। मुझे, रमा, आशा, चाची कों औऱ शायदअब रेखा कों भि?? हैं नाँ??
मे – मे अभि भि नहि समझा भाभी। आप् सभी कों कब औऱ केसेलगा?
भाभी – अरे मेरे बुद्धू राजा… तुम्हें देखकर तोँ किसी भि महिला याँ लड़की कों भूतलग हि जाता हैं, औऱ वोँ तुम्हारा प्रेम पाने कों तड़पने लगती हैं। समझेकुछ?? कि अभि भि नहि समझे मेरे अनाड़ी देवरु जी??
इतनाकह कर भाभी नें मेरे गालों कों कच-कचा कर अपने दाँतों सें काट लिया औऱ फिन अपनीजीभ औऱ होंठों सें सहलाने लगी। जैसे पहले किया करती थि। मेरे पूरेबदन मे रोमांच कि एक् लहर सि दौड़ गई,। मैंने झपट्टा मारकर भाभी कों बिस्तर पर्र गिरा दिया औऱ उनकेऊपर छाताचला गय़ा। उनके मस्त उभारों कों मसलकर, बुर कों सहला दिया। वोँ भि मेरे लन्ड कों पाजामा केँ ऊपर सें हि पकड़कर मसलने लगी। हम् दोनों केँ हाथ हरकत मे आँ गये, औऱ इसीतरह एक् दूसरे केँ अंगों केँ संग खेलने लगे। जल्द हि हमारे कपड़े शरीर छोड़कर बिस्तर सें नीचे पड़े थें। कितनी हि देर तक हम् एक् दूसरे केँ जिस्म सें खेलते रहे। अपने अरमानों कों शांत करतेरहे., कमरे केँ अंदर वासना कां एक् तूफान सां आया, औऱ जब वोँ गुजर गय़ा तोँ फिन सें हम् एक् दूसरे कि बाँहों मे पड़े बातें करनेलगे.
भाभी मेरे होंठचूम कर बोलीं - देखो अंकुश कल तुम् वर्षा कों मेरे गाँव लेँ जाने केँ बहाने कहीं जंगल मे अच्छे सें उसकेसंग मंगल करना। जिससे उसके जिस्म कि भूख शांत होँ जाए। वर्षा बेचारी जब सें विवाह होकरआई हैं, उसका पति उसकेसंग नहि रहता हैं। अबइसनई उमर मे वोँ बेचारी केसे अपने पऱ काबूरखे। जबकल उसने तुम्हें देखा औऱ शायद तुमने भि उसे प्रेम भरी नज़रों सें देखा होगा, तौ उसकी भावनाएँ भड़ककर बाहर् आँ गई,। वर्षा पुरुष कां प्रेम पाने केँ लिए उतावलापन उठी, उसे कोई औऱ मार्ग नहि सूझा औऱ उसनेयह भूत वाला नाटककर डाला.अब तुम्हारा हि लगाया हुआभूत हैं तोँ तुम्हें हि उतारना होगा नां? कहकर भाभी खिल-खिलाकर हँसने लगी.
मैंने भाभी कों कसकरगले सें लगा लिया औऱ बोला – सच मे भाभी आप् जादूगरनी हौ। झट सें उसकी नब्ज पकड़ली आपने.मगर आपकोयह पता केसेलगा। कि वोँ यहसभी नाटककर रही हैं?
भाभी – तुम्हें याद होगाजब तुम् उसे संभालने कि कोशिश कररहे थें, तब एक् समय कों उसके विचार तुम्हारी आँखों मे देखकर बदले थें। मे तभीसमझ गयीँ,। कि असल चक्कर यह हैं.
मे – आप् सच मे बहोत तेज होँ भाभी। साइकोलॉजी कि आपको बहोत नॉलेज हैं। यह केसेआई आपके अंदर?
भाभी – अपने परिवार कों संभालते-2 अपने आप् हि आँ गई,। बस.अब तुम् थोडा अपना कालेज कां कामवाम करलो। मे साम केँ कामों कों देखती हूं। कल सुभह हि उसको लेकर जानां हैं तुम्हें उसकेघऱ तक मे भि तुम्हारे संग चलूंगी। जिससे कोई तुमसे उलटे सीधे प्रश्न नां करे.
यह कहकर औऱ अपने कपड़े पहनकर भाभी, रसोई कि तरफचली गयीँ, औऱ मे अपने कमरे मे आकर कालेज कां काम करनेबैठ गय़ा.
दूसरे दिन प्लान केँ मुताबिक मे वर्षा कों लेकरचल दिया। मेरी मंज़िल वोँ झील थि जहाँ मैंने रमा दिदी कि सील तोड़ी थि। उस हसीन पलों केँ यादआते हि, मेरे लन्ड मे सुरसुरी होनेलगी। गाँव सें निकलकर कुछआगे जाते हि वर्षा भाभी मेरीपीठ सें किसी जोंक कि तरह चिपक गयीँ,.
मैंने कहा – वर्षा भाभी ज़रा कंट्रोल करो वरनायह मेरी बुलेट रानी नाराज़ होँ गई, तौ दोनों हि किसी झड़ी मे पड़े मिलेंगे लोगों कों.
वर्षा – अंकुश मे आपको केसे बताऊँ कि, आज मे कितनी खुश हूं। जब सें आपको देखा हैं, मेरेदिन कां सुकून, रातों कि नींद हराम होँ गई, थि.
मैंने कहा – भाभी, आज तोँ मे आपकोखुश कर दूँगा। मगरकल कों क्याँ करेंगी?
वर्षा भाभी हँसते हुए बोलि - कलफिन सें भूत घुसा लूँगी.
मैंने कहा - मे मज़ाक नहि कररहा भाभी। बताइए क्याँ करेंगी?
वर्षा भाभी – कभी-2 तोँ मौकादे हि सकते होँ नाँ आप्.
मे – मगरकब तक?
वर्षा भाभी – आगे कि बाद मे देखेंगे। अभि सें अपनामूड खराब क्यूं करें। वैसे हम् जा कहां रहे हें?
मैंने कहा – वोँ आप् मुझ पऱ छोड़ दीजिए। आज मे आपको जन्नत कि सैर कराने लें जारहा हूं.
मेरीबात सुनकर वर्षा भाभी नें अपने चुचे मेरीपीठ मे गड़ादिए, औऱ हाथआगे कर केँ जीन्स केँ ऊपर सें हि मेरा लन्ड पकड़कर दबा दिया। बातें करते-2कब हम् वहा पहुँच गयेपता हि नहि चला। ठंडी कां मौसम थां तौ लोग नाँ केँ बराबर हि थें क्योंकि झील मे नहाने कि हिम्मत तौ कोईकर नहि सकता थां। वहा कि प्राकृतिक सुंदरता देखकर वर्षा भाभीखुश होँ गयीँ,। मैंने अपनी बुलेट एक् पेड़ केँ पास खड़ीकर दि औऱ हरे-भरे मैदान मे घुसगये.
वर्षा भाभी मुझसे सें चिपककर चलरही थि, जिससे उसके बूब्स मेरे बाजू सें सटगये। मैदान पारकर केँ हम् घूमते-घूमते हम् जंगल केँ बीच एकांत मे पहुँच गये। एकांत पाते हि वोँ मुझसे बेल कि तरह लिपट गई, औऱ बेतहाशा मेरे चेहरे कों चूमने लगी। वर्षा भाभी कां उतावलापन देखकर मेरे चेहरे पऱ मुस्कान आँ गयीँ,। औऱ मे भि उसकासंग देनेलगा.
वर्षा भाभी कि साड़ीखोल कर मैंने नीचे गिरा दि औऱ उसके कूल्हों कों कसकर दबाते हुए भाभी केँ होंठों कों चूसने लगा। वर्षा भाभी नें भि मेरे होंठों कों अपने होंठों मे भर लिया, हम् एक् दूसरे सें मानो कम्पीटीशन करनेलगे कि देखें कौन किसके होंठ अधिकचूस पाता हैं.
फिन एक् दूसरे कि जीभआपस मे टकराने लगी। बड़ामजा आँ रहा थां हमेंइस खेल मे। जंगल केँ शांत वातावरण मे पक्षियों केँ कलरव कि ध्वनि केँ बीच हम् एक् दूसरे मे समा जाने कि जी तोड़ कोशिश मे लगे थें.
वर्षा भाभी नें मेरे जीन्स कि ज़िपखोल दि औऱ उसको नीचे खिसका कर मेरे लन्ड कि कठोरता कों अपनी मुट्ठी मे लेकर परखने लगी.अब उसे अपने अंदर लेने कि उसकी ख़्वाहिश औऱ अधिक प्रबल होँ उठी थि। मैंने उसके ब्लाउज केँ हुक्स खोलदिए औऱ उसकी ब्रा मे कसेहुए उसके 34” केँ बूब्स कों मसलने लगा.
वर्षा भाभी - आहह-आहह.देवरजीीइई। मेरे रजाआअ। मसलो इनको। बहोत तडपाते हें। यह। मसलवाने कों.कोई नहि हैं। इनकीखबर लेने। वाला.उफफफफफफफ्फ़.हइईई.रामम्म.औऱ ज़ोर सें मसलो.इन्हें.
वर्षा भाभी कि यह शायद फैंटसी रही होगी, सेक्स केँ वक्त बड़बड़ाने कि। जिसेआज वोँ खुले वातावरण मे पूराकर लेना चाहती थि। वर्षा भाभी नें मेरी टीशर्ट कों भि निकाल कर एक् तरफ फेंक दिया। मेरी पुष्ट छाती देखकर वोँ मंत्रमुग्ध हौ गयीँ,। औऱ अपनीजीभ सें उसे चाटने लगी.कभी मेरे सीने केँ बालों कों सहलाती। कभी उन्हें अपनी मुट्ठी मे कसकर खींच देती.फिन उसने मेरे छोटे–2 निप्पल कों चाट लिया.
मेरे मुँह सें सीईईईईईईईईई.आहह-आहह। वर्षा भाभी। बहोत गर्म होँ तुम्.
वर्षा भाभी – हां मेरे रजाअ। अह्ह्ह्ह.मेरी गर्मी निकाल दो प्लीज़। मे बहोत प्यासी हूं.वोँ सिसकते हुए बोलि
मे- चिंता मतकरो वर्षा डार्लिंग, आज तेरी सारी गर्मी निकाल दूँगा.
फिन मैंने उसके पेटीकोट कों भि उससेअलग कर दिया। ब्रा- पैंटी मे वोँ बहोत खूबसूरत लगरही थि। 34-26-34 कां उसका सफ़ेद शरीर मेरी बाँहों मे किसी मछली कि तरहमचल रहा थां। वर्षा मेरे लन्ड कों मसलेजा रही थि। मैंने वर्षा कि पीठ सहलाते हुए उसकी ब्रा केँ हुकखोल दिए। अह्ह्ह्ह। क्याँ मस्त गोल-गोल बूब्स… जिस पऱ किशमिश केँ दाने जैसे उसके कड़क निप्पल बहोत हि मन मोहकलग रहे थें। लगता हैं पंडित केँ लड़के नें जितना वर्कआउट करना चाहिए थां, उतना भि नहि किया थां शायद। अभि भि वोँ किसी कमसिन कली जैसी हि लगरही थि.
मे – आहह-आहह… वर्षा भाभी तुम्हारी चुचिया तोँ अभि भि कुँवारी कली जैसी हि हें.
वर्षा भाभी – मे पूरी कि पूरी हि कुँवारी हूं। मेरे राजाजी.
मे – क्याँ भाभी?रवि भइया नें अभि तक तुम्हें चोदा नहि?
वर्षा भाभी – उसकी उंगली जैसी लन्ड सें क्याँ चुदाई होगी। उसकी आवाज़ उत्तेजना सें काँपरही थि.
मैंने उसकी एक् चुचि कों अपने पूरे मुँह मे भर लिया औऱ दमलगा करसक करनेलगा। वर्षा मस्ती सें भरउठी। औऱ अपने दोनों हाथों सें मेरेसर कों दबाती हुईँ पीछे कों लहरा गई,.
वर्षा भाभी - इसस्शह.हइई। चूसो मेरे रजाआ.खा जाओ इन्हें। हइईए। मआआअ। कितनाअ… मज़ाअ। हाईईइ। इनमें। उफफफ्फ़। माआ.
वर्षा बावली सि हौ गई, थि। मे भि आजउस मस्तानी लौंडिया कों पूरामजा देना चाहता थां। दूसरे अमरूद कों अपनी मुट्ठी मे कस लिया औऱ मसलने लगा। उसकी टाँगें काँपने लगी थि। वर्षा नें मेरा एक् हाथ अपनीपीठ पर्र रख दिया, एक् टाँग मेरीकमर सें लपेटकर अपनी गीली बुर कों मेरे लन्ड केँ ऊपर रगड़ने लगी। मैंने वर्षा केँ कूल्हे पकड़कर उसेउठा लिया औऱ वोँ मेरीगोद मे आकर किसी बच्चे कि तरह अपनी दोनों टाँगों कों मेरी गान्ड पऱ लपेटकर बैठ गयीँ, औऱ फिन अपनीकमर चलाकर रस सें भीगी हुइ बुर कों मेरेरॉड जैसे सख्त लन्ड पऱ रगड़ने लगी.
चूसकर मैंने वर्षा कि चुचियों कों लालकर दिया, कई स्थान काटकर लवबाइट्स भि बनादिए। निप्पल तोँ सुर्ख होँ चुके थें वर्षा केँ। मगर मस्ती सें भरी वर्षा मेरेइस सेक्सुअल टॉर्चर कों भि झेल गयीँ,। अब हम् दोनों कों हि संभालना मुश्किल हौ रहा थां। मैंने उसे नीचे उतरने कां इशारा किया औऱ फिन उसकी पैंटी कों खींच दिया.
हाय क्याँ गोरी-चिट्टी चिकनी बुर थि वर्षा कि, जौ रस सें सराबोर होकरदिन केँ उजाले मे औऱ चमकरही थि। मे वर्षा कि टाँगों केँ बीचबैठ कर उसकी बुर कों सहलाता रहा, वोँ मेरे बालों मे उंगलियाँ डालकर फेरने लगी.फिन मैंने वर्षा कि बुर केँ होंठों केँ ऊपरलगे उसकीरस कि बूँदों कों अपनीजीभ सें चाट लिया.
वर्षा - उफफफफफफफफ्फ़.माआआआ। सीईईईईईईई… आआहह। औऱ चाटो अंकुश.
मैंने वर्षा कि रिक्वेस्ट कों ठुकराया नहि औऱ दो-तीन बार औऱ चाट लिया। वर्षा भाभी मस्ती सें झूमउठी उसने मेरेसर कों अपनी प्यारी सि बुर केँ मुँह पऱ दबा दिया। मैंने अपनासर उठाकर उसकीतरफ देखा तौ वोँ अपनासर पीछे कि तरफकर केँ मस्ती सें आसमान कों निहार रही थि.
मैंने उसे आवाज़ दि - वर्षा भाभी… तोँ उसने मेरीओर देखा। हम्म…बस इतना हि बोलीं वोँ.
मे – तुम्हारी रसीली बुर कां रसचूस लूँ?
वर्षा भाभी – उफफफ्फ़। पूछते क्यूं हौ अंकुश?? यहसभी कुछ तुम्हारा हैं अब.
मैंने वर्षा कि तरफ मुस्करा कर उसकी बुर केँ होंठखोल लिए औऱ अपनीजीभ सें उसके अंदर गुलाबी हिस्से कों चाट लिया। मस्ती मे वर्षा कि आँखें बंद हौ गई,। अपनी एक् टाँग उठाकर उसने मेरे कंधे पऱ टिकाली औऱ मेरेसर केँ बालों मे अपनी उंगलियाँ फँसाए वर्षा किसी दूसरी दुनिया कि सैर पऱ निकल पड़ी.
अपनीजीभ कि नोक कों अंदर तक पेलकर मे उसकी बुर कों किसी कुत्ते कि तरह चाटने लगा.फिन वर्षा भाभी केँ क्लिट कों अपने होंठों मे दबाकर अपनी एक् उंगली उसकी बुर मे डाल दि.
वर्षा भाभी दर्द सें कराहउठी। अहह। इसका मतलब वर्षा भाभी कि बुर उंगली लायक हि हैं अभि। मैंने वर्षा केँ क्लिट कों चूसते हुए धीरे-धीरे-2 अपनी उंगली कों अंदर-बाहर् कर केँ उसे चोदने लगा। वर्षा कि बुर लगातार रसबहा रही थि। जिसे मे अपनीजीभ सें चाटता जारहा थां.
आख़िरकार वर्षा भाभी नें मेरे मुँह कों बुरीतरह सें अपनी बुर पर्र दबा दिया। वोँ अपने पंजों पऱ खड़ी होकर सिसकियाँ मारती हुईँ झड़ने लगी.
मैंने खड़े होकर उसको चूमते हुए पूछा – मेरी सेवा पसन्द आई वर्षा भाभी?
वर्षा – वादाकरो अंकुश, ऐसी सेवा मुझेआगे भि मिलती रहेगी। जब आपकी ख़्वाहिश हौ तब। मे आपसेकोई ज़ोर ज़बरदस्ती सें नहि कहूँगी। बसजब आपकामन करे.
मे - कोशिश करूँगा, वादा नहि कर सकता, मगर अभि तौ पूरी पिक्चर बाकी हैं मेरीजान। उसे तौ देखलो.
वर्षा भाभी मेरे होंठों कों चूमकर बोलि – आपके ट्रेलर सें हि पतालग रहा हैं कि, पिक्चर सुपरहिट होगी.
मे – तोँ फिनअब मेरे लौड़े कि भि थोड़ी सेवा होँ जाए.यह कहकर मैंने उसके कंधों पऱ दबावडाल करउसे बिठा दिया.
अपने घुटनों पऱ बैठ वर्षा भाभी नें मेरे फ्रेंची कों नीचेकर दिया। जिसे मैंने अपने पांव सें दूर फेंक दिया.
सबसे पहले उसने मेरे लन्ड कों अपनी मुट्ठी मे पकड़ा औऱ बोलि – आहहहयह इतना गर्म क्यूं हैं देवरु जी?
मे – सामने इतना गर्म कुंड जौ हैं। मैंने हँसते हुए उसकीबात कां जवाब दिया तौ वोँ उसे अपनेगाल सें रगड़ते हुए बोलि
वर्षा भाभी - कितना लंबा तगड़ा हथियार हैं तुम्हारा, मेरी कमसिन छोटी सि बुर कि तौ धज्जियां उड़ा देगायह तुम्हारा लन्ड.
मे – ऐसा नहि हैं वर्षा भाभी। देख्ना कितना मजा देता हैं यह, आज केँ बाद तुम्हारी बुर इस कों हि लेने कों तड़पती रहेगी.
वर्षा भाभी उसको उलट-पलट कर देखने लगी.फिन उसने एक् बारउसे चूम लिया। उउउम्म्म्मम… कितना प्यारा हैं यह??हाथ सें आगे पीछे करतेहुए उसे एक् बूँद उसके पी-होल पर्र मोती जैसी चमकती नज़रआई, जिसे उसने अपनीजीभ कि नोक पर्र लेँ लिया औऱ चखनेलगी.
वर्षा - टेस्टी हैं.
इतनाकह कर वर्षा भाभी नें मेरेलाल सेब जैसे सुपाड़े कों मुँह मे भर लिया औऱ चूसने लगी। मैंने उसकेसर पर्र हाथरख लिया औऱ उसे सहलाने लगा। वोँ धीरे-धीरे-2 उसे अंदर औऱ अंदर लेतीजा रही थि.
मे - सीईईई… अह्ह्ह्ह… वर्षा भाभी ज़रा मेरे लन्ड केँ सिपाहियों कि भि सेवा करतीजाओ संग मे। मेरीबात पऱ वर्षा नें सवालिया नज़र सें मेरीतरफ सरउठा कर देखा.
मैंने कहा - नीचे मेरे टट्टों कों भि सहलाओ संग मे औऱ चूसो भि। तोँ वर्षा वैसा हि करनेलगी। अब मुझे औऱ ज्यादा मजाआने लगा.
कुछ देर कि चुसाई औऱ सेवाभाव सें लौड़ा एकदम लट्ठ कि तरह सख्त होकर ठुमके लगाने लगा। मैंने उसे वहींघास पऱ लिटा दिया। औऱ उसकी टाँगें मोड़कर उसकी बुर कों सहलाया, उसका हौसला बढ़ाया। औऱ फिनउसे चूमकर अपना सुपाड़ा उसकी गर्म बुर केँ मुँह पर्र रख दिया। मेरे लन्ड कि गर्मी पाकर उसकी बुर मे संकुचन होनेलगा। मानो वोँ अपनेयार कों चूमरही होँ औऱ कहरही हौ कि आओ मेरे प्यारे मेरे आँगन मे तुम्हारा स्वागत हैं.
मैंने एक् हल्का सां धक्का देकर अपने सुपाड़े कों वर्षा भाभी कि गर्म बुर केँ छोटे सें छेद मे स्लिम कर दिया। उसकीअहह निकल गयीँ, औऱ वोँ उफ़फ्फ़… उफफफ्फ़। करनेलगी.
मे – क्याँ हुआ भाभी?
वर्षा भाभी – थोडा टाइट हैं अंकुश, धीरे-धीरे हि डालना.
मैंने कहा – फिकरमत करो वर्षा भाभी। तुम्हें कुछ नहि होगा, थोडा सहनकर लेनाबस.
यहकहकर मैंने एक् अच्छा सां शॉट लगाया औऱ मेराआधा लन्ड वर्षा भाभी कि कसी हुइ बुर कों चीरते हुए अंदर स्लिम होँ गय़ा। वर्षा भाभी दर्द सें बिल-बिला उठी। मैंने उसके होंठों कों चूम लिया औऱ उसकी चुचि सहलाते हुएकहा। बस थोडा सां औऱ। फिनमजा हि मजा.
वर्षा भाभी थोड़ी देर कराही, मे वर्षा कि चुचियों कि मालिश करतारहा। औऱ हल्के-हल्के सें आधे लन्ड कों अंदर बाहर् किया.जब उसेकुछ अच्छा लगनेलगा औऱ मस्ती सें कमर हिलाने लगी। मौकादेख मैंने एक् औऱ फाइनल शॉटलगा दिया। मेरा पूरा लन्ड किसी खूँटे कि तरह उसकीकसी हुई बुर मे स्लिम हौ गय़ा.
वर्षा भाभी - आआंन्नज्.माआआ.मररर्र्ररर.गाइिईईईईईईई.रीईईई। वोँ दर्द सें तड़पने लगी.
वर्षा कि बुर केँ होंठ पूरीतरह खुल चुके थें। मैंने उसे ज़मीन सें उठाकर अपने सीने सें लगा लिया। होंठ चूसते हुए उसकेसर कों सहलाया औऱ फिन सें लिटाकर उसके निप्पलो सें खेलने लगा। एक्-दो मिनिट मे हि उसका दर्दकम हुआ तोँ मैंने अपना लन्ड सुपाड़े तक बाहर् निकाला। देखा तोँ उसपरकुछ खून भि लगाहुआ थां। सही मायने मे आज हि वर्षा भाभी कि बुर कि सील टूटी थि। मैंने फिन सें अपना लन्ड धीरे-धीरे-2 अंदर किया तोँ वर्षा इसबार सिर्फ़ सिसककर रह गई,। कुछदेर आराम-आहिस्ता अंदर-बाहर् कर केँ वर्षा कि बुर कों अपने लन्ड केँ हिसाब सें सेट किया.अब उसे भि मजाआने लगा थां। मैंने अपनी स्पीड बढ़ा दि औऱ अब घचा-घच। वर्षा कि कसी बुर मे लन्ड चलाने लगा.जब पूरा लन्ड अंदर जाता तौ वर्षा भाभी अपनेपेट पऱ हाथरख करउसे महसूस करती.
जब मैंने पूछा तोँ वर्षा भाभी बोलीं – देखोयह यहा तक आँ जाता हैं। आहहह… बड़ामजा देरहा हैं। औऱ ज़ोर सें करो। हइई.माआ। मे गई,.ईयी.हम्म्म। वर्षा भाभीझड़ रही थि। जिससे उसके पैरों कि एड़ियाँ मेरी गान्ड पर्र कस गई, औऱ वोँ मेरे सीने सें चिपक गयीँ,.
मे उसेउसी पोज़ मे लिएहुए खड़ा होँ गय़ा। वर्षा भाभी मेरे सीने सें चिपकी हुईँ थि। मैंने वर्षा भाभी कि जांघों केँ नीचे सें अपनेहाथ निकालकर उसे अपने लन्ड पऱ अधरउठा लिया.कुछ देर वर्षा भाभी कों अपने लन्ड पऱ अपने हाथों केँ इशारे सें मैंने आराम-आहिस्ता उसे कुदाया.
वर्षा भाभीअब फिन सें गर्म होनेलगी औऱ स्वयं हि उछल-2कर मेरे लन्ड पर्र कूदने लगी। मेरी स्टैमिना देखकर वर्षा दंगरह गयीँ,। 10 मिनिट तक मे उसेहवा मे लटकाए हि चोदता रहा। औऱ अंत मे मैंने ज़ोर सें उसे अपने सीने मे कस लिया। मेरे संग-संग वर्षा भि झड़ने लगी। औऱ मेरेगले सें चिपक गयीँ,। कुछदेर बाद मे उसेगोद मे लेकरवही घास पर्र बैठ गय़ा.
वर्षा भाभी मेरे होंठ चूमते हुए बोलि – आज मैंने जानां कि सच्चा मर्द क्याँ होता हैं?? औऱ चुदाई केसे होती हैं.
उसकेबाद हम् नें अपने जिस्म साफकिए। वर्षा भाभी वहींपास मे बैठकर पेशाब करनेलगी। उसके पेशाब सें पहलेढेर सारी मलाई निकलती रही। जिसे वोँ बड़ेगौर सें देखती रही। पेशाब करने केँ बाद वर्षा भाभीफिन सें मेरीगोद मे आकरबैठ गई,। हमारे हाथ धीरे-धीरे–2 फिन सें बदमाशियाँ करनेलगे, जिससे कुछ हि देर मे हम् फिन सें गर्म होँ गये.फिन मैंने उसे घुटने मोड़कर घोड़ी बना दिया, औऱ पीछे सें उसकी बुर मे लन्ड डालकर चोदने लगा.इसी तरह मैंने कई आसनों सें उसेतीन बारउसे जमकर चोदा। वोँ चुदते-2 पस्त हौ गई,। कुछदेर बैठकर, हम् कपड़े पहनकर मैदान मे आँ गये। औऱ एक् पेड़ कि छाया मे लेटगये। एक् घंटा अच्छे सें आराम करने केँ बादघऱ लौटलिए। घऱआकर मैंने उसके सासू माँ-ससुरजी कों बताया कि फिलहाल उसका इलाज तौ हौ गय़ा हैं, मगरकुछ दिनों तक हर हफ्ते उसे लेँ जानां होगा.
तौ वोँ बोले – बेटा अब तुम् हि इसे लें जा सकते होँ। हमारे पास औऱ कौन हैं। तौ मैंने भि हांकर दिया.
पंडित–पंडिताइन नें मुझेखूब आशीर्वाद दिया। हम् दोनों मन हि मनखुश होँ रहे थें। कुछदेर गरमचाय ब्रेकफास्ट करने केँ बाद मे अपनेघऱ आँ गय़ा औऱ मोहिनी भाभी कों सारीबात बताई.
मोहिनी भाभी हँसते हुए बोलीं – वाउ देवरु जी, मेरी सोहबत मे स्मार्ट हौ गये हौ। हर हफ्ते कां इंतजाम भि कर लिया.मान गये उस्ताद.
मैंने हँसते हुएकहा – अरे भाभी! बेचारी मिन्नतें कररही थि। कि वक्त निकलकर मुझे भि प्रेम कर लिया करना.सो मैंने यह तरीक़ा सोच लिया.
इस तरह सें पंडित जी कि बहू वर्षा कि समस्या कां समाधान मेरी भाभी नें कर दिया।
maira Pyara Devar - niyantran - Continue reading next part
Relavant source : click here






