झूठा झूला बहेंन कों झुलाया – New Episode
मेरानाम जितेश हैं। यह मेरी लाइफ़ कि रियलकथा हैं जोँ अभि घाटरही हैं, मे पूरा डिटेल मे बताने कि कोशिश करुगा क्योकि मेरा रुपया लेखक कां भि हैं तोँ मेरी अपनी लाईफ़ कि रहस्य मई बातेयहा बतारहा हूं जोँ वैसे किसीको तौ नहि बता पाया हूं उतनी हिम्मत नईआई ट्राय किया थां एक् मित्र केँ संग शेयर करने कों सभीबात नहि हौ पायाअब सुरु सें सभी बताता हूं
मे गुजरात कां हूं औऱ पेशे सें इलेक्ट्रिशियन एंड लेखक हूं। हरदीन भरवही खंभों औऱ मोटरों कां काम रहता हैं। घऱ मे बस मे, मेरी मां औऱ मेरी छोटी बेहन रसीला हें। रसीला एकदम सीधी-साधी लड़की हैं, दिनभर घऱ केँ काम औऱ मां कि सेवा मे लगी रहती हैं। हमारे बीचबस उतनी हि बात होती थि जितनी काम कि होँ, जैसे "खानां खा लिया" याँ "पानीला दे। "कभी कुछ फालतू सोचा हि नहि थां उसके बारे मे।
उसदिन बारिश बहोत तेज़ हौ रही थि। साइट पऱ कामबंद हुआ तौ मे दोपहर मे हि घऱ आँ गय़ा। मम्मी अपने कमरे मे सोरही थीं। मे हाथ-मुँह धोकर अपने कमरे मे लेटा हि थां कि रसीला गरमचाय लेकर आँ गई।
उसनेगरम चाय मेज़ पर्र रखी औऱ पूछा, "भइया, आज जल्द आँ गए?"
मैंने कहा, "हाँ, बारिश कि वजह सें छुट्टी हौ गई। "
तभी मेरी नज़र कोने मे रखीउस पुरानी लोहे कि अलमारी पर्र गई। उसकी कुंडी ढीली थि औऱ कूलर कि हवा सें 'कड़क-कड़क' आवाज़ कररही थि। मेरा दिमाग़ खराब होँ रहा थां उस आवाज़ सें।
मैंने रसीला सें कहा, "रसीला, ज़रायहा आँ तौ। इस अलमारी कां द्वार (दरवाज़ा) पकड़, मे इसकी कुंडी ज़राठीक करदूँ, वरनारात भर सोने नहि देगी। "
रसीला पासआई औऱ द्वार (दरवाज़ा) पकड़कर खड़ी होँ गई। मे नीचे बैठकर पेंचकस सें पेंच कसनेलगा। रूम छोटा थां औऱ कूलर कि आवाज़ बहुत तेज़ थि। हम् दोनों एकदम पास-पास थें। काम करते-करते अचानक मेराहाथ उसकी उंगलियों सें टच होँ गय़ा।
सच कहूँ तौ उस वक़्त मुझेकुछ अजीब सां लगा। मैंने ऊपर देखा तोँ रसीला भि मुझे हि देखरही थि। हम् दोनों बस एक्-दूसरे कों देखते रहगए। नं उसने अपनाहाथ हटाया, नं मैंने। कूलर कि हवा उसके चेहरे पर्र आँ रही थि औऱ वो एकदमचुप थि।
उसनेबस धीरे-धीरे सें पूछा, "होँ गय़ा भइया?"
मैंने कहा, "हाँ, होँ गय़ा। "
वोँ बिनाकुछ बोलेगरम चाय कां खाली गिलास उठाकर बाहर् चली गई। पऱ उसदिन केँ बाद सें मेरा दिमाग़ थोडा भटकने लगा थां। वोँ जौ हाथटच हुआ थां, उसकीयाद बार-बार आँ रही थि।
उसरात अलमारी ठीक करकेजब मे अपने कमरे मे लेटा, तोँ नींद मेरी आँखों सें कोसों दूर थि। कूलर कि वोँ आवाज़ जौ रोज़ अच्छी लगती थि, आज मेरे कानों मे हंगामा मचारही थि। मेरेमन मे बार-बार वहीसीन चलरहा थां—जब रसीला मेरे एकदम लगभगखड़ी थि औऱ मेरी उंगलियाँ उसकी उंगलियों सें टच हुईँ थीं। वोँ एहसास मेरेहाथ सें जा हि नहि रहा थां।
मैंने करवट बदली, पर्र सुकून नहि पड़ा। आँखें बंद करता तोँ रसीला कां वोँ चेहरा, उसकी वोँ झुकी हुइ नज़रें औऱ वोँ सादी सि कुर्ती जिसमें सें उसकेबदन कि गंध आँ रही थि, सभीसाफ दिखने लगता। अचानक मेरेहाथ अपने आप् नीचे कि तरफचले गए।
आज तक मैंने रसीला कों हमेशा अपनी छोटी बेहन कि तरह देखा थां, पर्र पता नहि उस एक् समय नें क्याँ चमत्कार किया कि आज पहलीबार मेरा नज़रिया बदल गय़ा थां। मैंने चादर केँ अंदरहाथ डाला औऱ आहिस्ता अपनाकाम शुरुआत किया। जैसे-जैसे हाथ कि रफ़्तार बढ़ी, मेरे दिमाग़ मे रसीला कि तस्वीर औऱ साफ होनेलगी।
मैंने सोचा कि काशउस समय अलमारी केँ पासजब हम् अकेले थें, तौ मे उसकाहाथ न् छोड़ता। मे सोचने लगा कि अगर मे उसे घसीटकर अपने लगभगकर लेता, तोँ वोँ क्याँ करती? इन्ही खयालों मे रसीला कां नाम लेते-लेते मेरी साँसें चढ़ने लगीं। सन्नाटे मे बस मेरी भारी होती साँसों कि आवाज़ आँ रही थि।
उसरात पहलीबार मुझे अहसास हुआ कि रसीला मात्र मेरी बेहन नहि, एक् बहोत हि जवान औऱ हसीन लड़की भि हैं। जब मेराकाम पूराहुआ, तोँ शरीर एकदम ढीलापड़ गय़ा, पऱ मन मे एक् अजीब सि हलचल शुरुआत होँ गई थि। मुझेपता थां कि अब अगलेदिन जब मे उसे देखूँगा, तोँ वोँ पहले वाला जितेश नहि रहूँगा।
उसरात केँ बाद मेरेमन मे जोँ हलचलमची थि, वोँ शांत होने कां नाम नहि लें रही थि। पर्र क़िस्मत नें मौका स्वयं हि दे दिया। मम्मी कि एक् दूर कि बेहन कि तबीयत ज़्यादा खराब हौ गई थि, औऱ उन्हें दूसरे शहर देखने जानां थां। मां नें रसीला सें कहा कि वो भि संगचले, पऱ रसीला नें बहाने बना दिया कि उसेघऱ कि सफाई करनी हैं औऱ मेरे खाने-पीने कां भि ध्यान रखना हैं। मम्मी कों अकेला जानां पड़ा, औऱ वोँ दोदिन केँ लिए मौसी केँ घऱ रुकने वालीथीं।
अबघऱ मे केवल मे औऱ रसीला थें।
साम कों जब मे काम सें वापसआया, तोँ घऱ मे एक् अजीब सि खामोशी थि। रोज़ तोँ मम्मी कि आवाज़ याँ टेलीविज़न कां हंगामा रहता थां, पर्र आज सन्नाटा थां। रसीला किचन मे खानां बनारही थि। मे हाथ-मुँह धोकर बाहर् आया औऱ डाइनिंग टेबल पर्र बैठ गय़ा।
रसीला जब खानां लेकरआई, तोँ मैंने गौर किया कि उसनेआज बाल खुलेरखे थें औऱ नीलेरंग कां सूट पहना थां। वोँ जानबूझकर मेरी नज़रों सें बचरही थि। हम् दोनों नें संग मे खानां खाया, पर्र पूरीमेज़ पऱ मात्र बर्तनों केँ टकराने कि आवाज़ आँ रही थि। कोईकुछ बोल नहि रहा थां, पऱ हवा मे वोँ पुरानी वाली 'नॉर्मल' बात नहि थि।
खानां खाने केँ बाद रसीला बर्तन साफ करनेलगी। मे वहीं सोफे पऱ बैठकर फोनचला रहा थां, पर्र मेरा ध्यान पूरीतरह सें उसकीतरफ थां। तभी अचानक बाहर् तेज़ आंधी-तूफान शुरुआत होँ गय़ा औऱ बिजली चली गई।
पूरेघऱ मे एकदम अंधेरा छा गय़ा। केवल खिड़की सें बिजली कि कड़कहट कि रोशनी आँ रही थि।
"भइया। कहां होँ?" रसीला कि आवाज़ किचन सें आई। उसकी आवाज़ मे थोड़ी घबराहट थि।
"यहीं हूं, तूँ डरेमत, " मैंने फोन कि टॉर्च जलाते हुएकहा।
मे किचन कि तरफ गय़ा। रसीला अंधेरे मे कोने मे खड़ी थि। जैसे हि टॉर्च कि रोशनी उसके चेहरे पऱ पड़ी, मैंने देखा कि वो पसीने सें भीग चुकी थि। उमस बहोत थि औऱ लाइट जाने सें गर्मी बढ़ गई थि।
"बहोत गर्मी लगरही हैं, " वो धीरे-धीरे सें बोलीं औऱ अपनेगले केँ पास सें सूट कों थोड़ा झटकने लगी ताकिहवा लगे।
मे उसके बिल्कुल लगभग जाकरखड़ा हौ गय़ा। फोन कि रोशनी कों मैंने दीवार कि तरफमोड़ दिया ताकि हल्की मद्धम रोशनी रहे। हम् दोनों केँ बीच कि दूरी बहोत कम थि। झिझक तौ बहोत थि, पऱ उस अंधेरे नें मुझे हिम्मत दे दि।
"चल, छत पर्र चलते हें, शायदवहा थोड़ीहवा मिले, " मैंने बहोत धीमी आवाज़ मे कहा।
वो चुपचाप मेरे पीछे-पीछे सीढ़ियों कि तरफचल दि। छत पऱ सन्नाटा थां औऱ ठंडीहवा चलरही थि। हम् मुंडेर केँ पास जाकरखड़े हौ गए। अचानक बिजली कड़की औऱ रसीला डरकर मेरे लगभग आँ गई। उसने घबराहट मे मेराहाथ पकड़ लिया।
इस बार उसनेहाथ छोड़ा नहि। उसकी हथेलियों कि गर्माहट मुझे महसूस होँ रही थि। मैंने मुड़कर उसकीतरफ देखा। अंधेरे मे उसकी आँखें चमकरही थीं। लज्जा तोँ हम् दोनों कों आँ रही थि, पर्र उसरात कि खामोशी औऱ हमारा अकेले होना.सभी कुछ एक् अलग हि दिशा मे लेँ जारहा थां।
छत पर्र जब उसने मेराहाथ पकड़ा, तौ मुझेलगा कि यहीसही मौका हैं। ठंडीहवा चलरही थि औऱ आसमान मे बिजली कड़करही थि। मैंने धीरे-धीरे सें अपना दूसरा हाथ उसकीकमर पर्र रखा औऱ उसे अपनीतरफ खींचने कि कोशिश कि। रसीला एक् समय केँ लिए रुकी, उसने मेरी आँखों मे देखा, औऱ फिन अचानक जैसेउसे होशआया।
झटके सें अपनाहाथ छुड़ाया औऱ सीढ़ियों कि तरफभाग गई। अँधेरे मे भि मुझे महसूस होँ रहा थां कि वो कितनी शर्मिंदा थि।
मे वहींखड़ा रह गय़ा। मुझेलगा शायदआज सभी ख़त्म होँ गय़ा, वोँ कभी मुझसे बात नहि करेगी। मे भि थोड़ीदेर बाद नीचेआया औऱ अपने कमरे मे जाकर चुपचाप लेट गय़ा। पूराघऱ सन्नाटे मे डूबा थां, बस बाहर् बारिश कि बूंदों कि आवाज़ आँ रही थि।
उसरात गर्मी इतनी थि कि रूम मे रुकना मुश्किल थां। लाइट तोँ पहले हि जा चुकी थि औऱ इन्वर्टर भि जवाबदे गय़ा थां। घऱ कां दूसरा रूम एकदमतप रहा थां, इसलिये मजबूरी मे हम् दोनों कों उसी एक् कमरे मे सोना पड़ा जहाँ थोड़ी बहोत खिड़की सें हवा आँ रही थि। मम्मी घऱ पर्र थि नहि, तौ रसीला नें फर्श पर्र हि खाटलगा लिया औऱ मे बेड पर्र थां।
पर्र गर्मी नें सबको बेहाल कररखा थां। रसीला बार-बार करवटबदल रही थि। अंत मे उसने धीरे-धीरे सें कहा, "भइया, नीचे बहोत घुटन हौ रही हैं। "
मैंने बिना सोचेकह दिया, "तोँ ऊपर आँ जा, बेड बहुत बड़ा हैं। "
वो झिझकते हुएउठी औऱ बेड केँ एक् कोने मे एकदम सटकरलेट गई। हम् दोनों केँ बीचबस कुछइंच कां फासला थां।
घऱ मे सन्नाटा ऐसा थां कि घड़ी कि टिक-टिक भि कान मे चुभरही थि। मां मौसी केँ घऱ गई हुई थि, तोँ घऱ मे केवल मे औऱ रसीला थें। गर्मी नें तोँ वैसे हि मन खराबकर रखा थां, ऊपर सें लाइट भि चली गई। मजबूरी ऐसीबनी कि हम् दोनों कों एक् हि कमरे मे सोना पड़ा जहाँ थोड़ी हवा आँ रही थि। रसीला बेड केँ एक् कोने मे एकदम सटकरसोई थि, उसकीपीठ मेरीतरफ थि।
मे कम सें कम एक् घंटे सें जागरहा थां। पसीने सें पूरी बनियान भीग चुकी थि, पऱ वोँ गर्मी सें ज्यादा घबराहट थि। मेराहाथ बार-बार उसकीतरफ बढ़ता औऱ फिनडर केँ मारे वापस खिंच जाता। "भइया हैं तूँ उसका, क्याँ कररहा हैं?"—एक् मनयह बोलता, पर्र दूसरा मनउसरात कि उमस औऱ रसीला कि उस नज़दीकी मे पागलहुआ जारहा थां। मेरा लैंड पैंट केँ अंदर इतना टाइट हौ चुका थां कि अब दर्द करनेलगा थां।
आखिरकार, मैंने अपनी पूरी हिम्मत जुटाई। मेराहाथ थर-थर काँपरहा थां जब मैंने उसे उसकीकमर पर्र रखा। जैसे हि मेरी उँगलियों नें उसेछुआ, रसीला एकदम सें झटक गई। मेरी तोँ सिट्टी-पिट्टी गुम होँ गई, लगा कि बसअब डाँट पड़ेगी। मे वैसे हि पत्थर बनकर पड़ारहा, साँस तक रोकली थि। पर्र जब उसने मेराहाथ हटाया नहि, तौ मुझेलगा कि शायदउसे भि इंतजार थां।
मैंने धीरे-धीरे सें अपना जिस्म उसके औऱ लगभग किया। पसीने सें हम् दोनों केँ बदन चिपचिपे होँ रहे थें। मैंने काँपते हाथों सें उसके पायजामे केँ नाड़े कों टटोला। झिझक इतनी थि कि उँगलियाँ काम नहि कररही थीं। मैंने बहोत धीरे-धीरे सें नाड़ा ढीला किया औऱ पायजामे कों बस थोडा सां नीचे सरकाया, बस उतना हि जहाँ सें काम हौ सके।
अंधेरा इतना थां कि कुछदिख नहि रहा थां, पऱ स्पर्श सभीबता रहा थां। मैंने अपनाहाथ पीछे सें घुमाकर उसकी जाँघों केँ बीच डाला। वोँ स्थान पूरीतरह गीली होँ चुकी थि। रसीला नें तकिए मे अपना मुँहदबा लिया औऱ एक् दबी हुइ सिसकी भरी।
मैंने बिना कपड़े उतारे, बस पायजामे केँ उसी थोड़े सें खुले रास्ते सें अपना पत्थर जैसा सख्त लैंड उसकी बुर केँ मुहाने पऱ टिकाया। वोँ इतनीतंग (Tight) थि कि मार्ग हि नहि देरही थि। मैंने थोडा ज़ोर लगाया, तौ रसीला कां पूरा जिस्म धनुष कि तरह अकड़ गय़ा। जैसे हि मे आधा अंदर गय़ा, उसकी टाइटनेस नें मेरे दिमाग़ कि नसें हिलादीं।
बिना एक् शब्द बोले, उस अंधेरे कमरे मे केवल हमारी भारी साँसें औऱ जिस्मों कि रगड़ सुनाई देरही थि। रसीला नें लज्जा केँ मारे एक् बार भि पीछे मुड़कर नहि देखा, पऱ उसके हाथों नें चादर कों इतनी ज़ोर सें जकड़रखा थां कि उसकी बेताबी साफ़समझ आँ रही थि।
अंधेरे कमरे मे मात्र हमारी भारी साँसों कां हंगामा थां। रसीला कि बुर इतनीतंग थि कि हर धक्के केँ संग मुझे अपनीजान निकलती हुई लगरही थि। लज्जा केँ मारे उसने अपना चेहरा तकिए मे पूरीतरह दबारखा थां, ताकि उसकी आवाज़ बाहर् नं जाए, पर्र उसकी दबी-दबी सिसकियाँ मेरे कानों मे बिजली कि तरहदौड़ रहीथीं।
मैंने उसे पीछे सें औऱ कसकरजकड़ लिया। पसीने सें हम् दोनों केँ जिस्म चिपचिपे होँ रहे थें, जौ रगड़ कों औऱ भि ज़्यादा असलीबना रहे थें। मैंने बिनाकुछ बोले अपनी रफ़्तार बढ़ाई। रसीला कां शरीरहर झटके केँ संगउछल रहा थां, पर्र मजाल हैं कि उसने एक् शब्द भि मुँह सें निकाला हौ। उसकी वोँ खामोशी मुझे औऱ भि ज़्यादा पागलकर रही थि।
बाँहों मे अपनीसगी बेहन कां वोँ भराहुआ बदन महसूस करना औऱ उसतंग रास्ते कों चीरते हुए अंदर जानां—यह वोँ एहसास थां जोँ हर किसी कि भाग्य मे नहि होता। मैंने उसके पायजामे कों थोड़ा औऱ नीचे किया ताकि घर्षण औऱ बढ़जाए। जैसे-जैसे मे गहराई मे उतररहा थां, रसीला कि पकड़ मेरे हाथों पऱ मज़बूत होतीजा रही थि। उसने मुड़कर नहि देखा, पऱ उसके पैरों कि उंगलियाँ पलंग कि चादर कों खुरचरही थीं।
पूरीरात हमनेउस सन्नाटे कों जिया। नं कोईबात हुईँ, नं कोई इकरार, बसदो जिस्मों कि वोँ भूख थि जोँ समाप्त होने कां नाम नहि लेँ रही थि। जब मे पूरीतरह खालीहुआ, तोँ रसीला कां जिस्म एकदम ढीलापड़ गय़ा। वो वैसे हि पीठकिए लेटीरही, जैसे पत्थर कि मूरत हौ। मे भि चुपचाप उसके पीछे सटकरलेट गय़ा औऱ कब नींद आँ गई, पता हि नहि चला।
अगली सुभहजब सूरज कि पहली किरण खिड़की सें आई, तौ सभीकुछ बदल चुका थां। रसीला मुझसे पहलेउठ चुकी थि। जब मे आँखें मलतेहुए बाहर् आया, तौ वो किचन मे गरमचाय बनारही थि।
मैने उसकीतरफ देखा, पऱ उसने अपनी नज़रें झुकालीं। उसके चेहरे पऱ वही पुरानी सादगी थि, जैसेरात कों कुछहुआ हि न् होँ। "गरमचाय पी लीजिए भइया, " उसने एकदम नॉर्मल आवाज़ मे कहा, जैसे रोज़ कहती हैं।
मैंने भि गरमचाय कां कप पकड़ा औऱ वैसे हि पेशआया जैसे हम् रोज़ रहते हें। घऱ कि दीवारों केँ बीच वोँ राज़दफन होँ गय़ा थां। मम्मी केँ आने कां वक़्त हौ रहा थां औऱ हम् दोनों फिन सें वही भइया-बेहन बनगए थें, पऱ हमारी आँखों केँ कोने मे वोँ एक् राज़ हमेशा केँ लिएबस गय़ा थां जिसे हम् दोनों केँ अलावा कोई नहि जानता थां।
घऱ मे अब मां हमेशा संग रहती थि, तौ रात कों वोँ पहले जैसा मौका नहि मिलपा रहा थां। रसीला नें भि स्वयं कों मम्मी केँ लगभगकर लिया थां ताकि मे पहुँच न् सकूँ। मेरीतड़प बढ़तीजा रही थि, तोँ मैंने एक् प्लान बनाया। शहर मे एक् कुलदेवी कां मंदिर थां जहाँसाल मे एक् बारबड़ा मेला लगता थां। मैंने मम्मी सें कहा, "मम्मी, इसबार मेले मे चलते हें, रसीला कां भि मनबहल जाएगा। "
मम्मी खुश होँ गई, पऱ फिन मैंने अपना असली पत्ता फेंका। मैंने कहा, "मगर मम्मी, आपकी तबीयत ठीक नहि रहती, भीड़-भाड़ मे परेशान हौ जाओगी। आप् घऱ पर्र आरामकरो, मे रसीला कों घुमा लाता हूं, साम तक वापस आँ जाएंगे। "
जैसे हि मैंने यहकहा, रसीला जौ किचन मे खड़ी थि, एकदम सें ठिठक गई। उसने पहलीबार अपनी गर्दन घुमाई औऱ सीधा मेरी आँखों मे देखा। उसकी आँखों मे एक् अजीब सां क्रोध औऱ डर थां। वोँ समझ गई थि कि मेरा इरादा मेला घुमाना नहि, उसे अकेला पाना हैं। वोँ मुझे घूरती रही, जैसेपूछ रही हौ "तुम् रुकोगे नहि?" पर्र मां केँ सामने वोँ कुछबोल नहि पाई। बस खामोश खड़ीरही, औऱ उसकी वोँ खामोशी हि उसकीहार थि।
अगलेदिन हम् बस सें शहर कि तरफ निकले। रास्ते भर वोँ खिड़की केँ बाहर् देखती रही, एक् लफ्ज़ भि नहि बोलि। मैंने शहर केँ किनारे एक् छोटा सां गेस्ट हाउस देखा औऱ उससेकहा कि मुझेयहा एक् यार सें सामान लेना हैं। वो चुपचाप मेरे पीछे अंदर आँ गई। कमरे कां द्वार (दरवाज़ा) बंद होते हि सन्नाटा छा गय़ा।
गेस्ट हाउस केँ उस छोटे सें कमरे मे पहुँच तौ गए, पऱ मेरीरूह काँपरही थि। रसीला एक् कोने मे खड़ी थि, उसकासिर झुका थां औऱ वो अपने दुपट्टे कों उंगलियों मे बुरीतरह मरोड़रही थि। कमरे केँ पुराने पंखे कि 'चर-चर' आवाज़उस सन्नाटे मे औऱ भि भयानक लगरही थि।
मेरेहाथ पसीने सें गीले होँ गए थें। एक् मनकहरहा थां, "जितेश, अभि भि टाइम हैं, बाहर् निकलजा, वोँ तेरी अपनी बेहन हैं। " पऱ दूसरा मन उसकीउस तंग कुर्ती औऱ घऱ कि रातों कि उन अधूरी मुलाकातों कों याद करके पागलहुआ जारहा थां। मैंने थूक गटका, मेरागला सूखकर काँटा हौ गय़ा थां।
मे दोकदम बढ़ा, फिन रुक गय़ा। रसीला नें एक् बारनज़र उठाई, उसकी आँखों मे पानी थां औऱ वोँ नफरत औऱ मजबूरी कां एक् अजीब सां मेल थां। उस एक् समय केँ लिए मेरा साराजोश ठंडापड़ गय़ा। मुझेलगा कि मे हार जाऊँगा। पर्र तभी रसीला नें अपना मुँहफेर लिया औऱ दीवार कि तरफ देखने लगी। उसकीइस बेबसी नें मुझे जैसे उकसा दिया।
मैंने काँपते हुए हाथों सें पीछे सें जाकरउसे पकड़ा। जैसे हि मेरा सीना उसकीपीठ सें सटा, वो पत्थर कि तरहअकड़ गई। मेरादिल इतनी ज़ोर सें धड़करहा थां कि लगा जैसेफट जाएगा। मैंने बहोत धीरे-धीरे सें उसकेकान केँ पास अपना चेहरा लें जाकर सूंघा। उसके बालों सें वही चमेली केँ तेल कि गंध आँ रही थि।
"रसीला." मेरी आवाज़गले मे हि फंसकर रह गई।
उसनेकोई जवाब नहि दिया, बस सिसकने लगी। मेरी हिम्मत अब जवाबदे रही थि, पऱ अब पीछे हटने कां मार्ग नहि थां। मैंने अपनी पूरी मर्दानगी बटोरी औऱ उसकेसूट कि डोरी खींची। जैसे हि उसकासूट ढीला होकर उसके कंधों सें नीचे गिरा, मेरा लैंड पैंट केँ अंदर फटने कों रेडी होँ गय़ा।
मैंने उसे घुमाकर बेड पऱ पटका। वो रोरही थि, पऱ चिल्ला नहि रही थि। यही उसकी सबसेबड़ी मंज़ूरी थि। मैंने अपनी पैंट नीचे कि औऱ मेरा काला, सख्त औऱ नसों वाला लैंड बाहर् निकलआया। रसीला नें उसे देखते हि अपनी आँखें कसकरबंद करलीं।
मैंने उसके पायजामे कों पैरों सें बाहर् निकाला। उसकी बुर गुलाबी औऱ एकदमसाफ थि, जौ डर केँ मारे रह-रहकर सिकुड़ रही थि। मैंने कोईबात नहि कि, बस उसकेऊपर चढ़ गय़ा। जैसे हि मेरा सुपारी वाला हिस्सा उसकी बुर केँ छेद सें टकराया, रसीला नें अपनाहाथ अपने मुँह मे ठूँस लिया।
वोँ स्थान इतनी टाइट (Tight) थि कि लगरहा थां पत्थर मे सुराख कररहा हूं। मैंने अपनी पूरी ताकत लगाई औऱ एक् ज़ोरदार धक्का मारा। रसीला कां पूराबदन बेड पऱ उछल गय़ा। मेरा मोटा लैंड उसकी बुर कों चीरता हुआआधा अंदरधँस गय़ा।
"उफ़्फ़.अहह." उसके मुँह सें दबी हुई आवाज़ निकली।
मैंने उसे संभलने कां मौका नहि दिया। मे पागल होँ चुका थां। मैंने तेज़ धक्के लगाने शुरुआत किए। मेरा लैंड उसकी बुर कि दीवारों सें इसकदर रगड़खा रहा थां कि मुझे अपनी नसों मे बिजली दौड़ती महसूस होँ रही थि। हर धक्के केँ संग 'चप-चप' कि आवाज़ गूँजरही थि। रसीला नें अपनी टाँगें मेरे कूल्हों पऱ कसलीं। उसे दर्द होँ रहा थां, पर्र वोँ मज़ा भि अब उसके चेहरे पऱ दिखने लगा थां।
पूरी दोपहर मैंने अपनीउस सगी बेहन केँ शरीर कों जी भरकर रौंदा। उसकीउस टाइटनेस नें मुझे तीन-चार बार झड़ने पऱ मजबूर किया, पर्र मे रुकने कों रेडी नहि थां। वो मेराखून थि, पर्र उस टाइम वोँ मात्र एक् भूख थि जिसे मे सालों सें दबाए बैठा थां।
गेस्ट हाउस केँ उस छोटे सें कमरे मे जब मे रसीला केँ ऊपर सें हटा, तोँ रूम एकदम शांत थां। बस पुराने पंखे कि किट-किट आवाज़ आँ रही थि। रसीला वैसे हि बेड पर्र लेटीरही, उसने अपनी बाँहों सें अपना चेहरा ढँक लिया थां। उसके सफ़ेदसूट पर्र पसीने औऱ हमारे मिलन केँ निशान साफ़दिख रहे थें।
मेरी साँसें अब भि भारीथीं। मैंने अपनी पैंट पहनी औऱ खिड़की केँ पास जाकरखड़ा होँ गय़ा। बाहर् धूपतेज़ थि। मुझे अचानक डर लगने लगा—अब घऱ केसे जाएंगे? मम्मी केँ सामने क्याँ बोलेंगे?
"रसीला। उठ, देर हौ रही हैं, " मैंने दबे स्वर मे कहा।
उसनेकोई जवाब नहि दिया। उसनेबस धीरे-धीरे सें अपने कपड़ेठीक किए, अपना पायजामा ऊपर चढ़ाया औऱ उठकरबैठ गई। उसकेबाल बिखरे हुए थें औऱ चेहरा लज्जा सें लाल थां। उसने एक् बार भि मेरीतरफ नहि देखा। वोँ चुपचाप उठी, शीशे केँ सामने खड़ी हुई औऱ अपनेबाल ठीक करनेलगी। उसकी उंगलियाँ काँपरही थीं।
हम् कमरे सें बाहर् निकले। मैनेजर कों चाबी देते टाइम मेरादिल धक-धककर रहा थां कि कहीं वोँ हमें पहचान न् लें। बाहर् आकर मैंने एक् ऑटो पकड़ा। ऑटो मे हम् दोनों पिछली सीट पर्र बैठे थें, पर्र हमारे बीच इतना फासला थां कि एक् औऱ व्यक्ति बैठजाए। हवाचल रही थि, पऱ हमारे बीच कां सस्पेंस उसहवा सें भि भारी थां।
रास्ते भर वोँ खिड़की केँ बाहर् देखती रही। मैंने एक्-दो बार उसकाहाथ पकड़ने कि कोशिश कि, पर्र उसने झटके सें अपनाहाथ खींच लिया। उसकी आँखों मे आंसू तोँ नहि थें, पऱ एक् अजीब सि बेबसी थि। मुझेलगा कि शायदअब वोँ मुझसे कभीबात नहि करेगी।
घऱ केँ पास वालेबस स्टैंड पऱ उतरकर हमने थोड़ेफल औऱ मिठाई खरीदी, ताकि मम्मी कों लगे कि हम् वाकई मेले मे थें। जैसे-जैसे घऱ लगभग आँ रहा थां, मेरी धड़कनें बढ़रही थीं।
दरवाज़े पर्र पहुँचते हि मैंने एक् लंबी साँसली औऱ आवाज़ दि, "मम्मी। हम् आँ गए!"
मां नें जैसे हि दरवाज़ा खोला, उनके चेहरे पर्र एक् बड़ी सि मुस्कान थि। "आँ गए मेरे बच्चे! बड़ीदेर कर दि, मे तौ राहदेख रही थि। "
मम्मी नें रसीला कां चेहरा गौर सें देखा। "अरे रसीला, तेरा चेहरा इतना उतराहुआ क्यूं हैं? धूपलग गई क्याँ?"
रसीला नें बस अपनी नज़रें झुकालीं औऱ धीरे-धीरे सें बोलीं, "हाँ मां, गर्मी बहोत थि। " वोँ सीधा अंदर किचन कि तरफभाग गई, शायद अपनी लज्जा छुपाने केँ लिए।
फिन मां नें मेरीतरफ मुड़कर वही प्रश्न पूछा, "जितेश, मेला कैसारहा? औऱ इसे झूले पर्र बिठाया कि नहि?"
मैंने मिठाई कां डिब्बा मेज़ पऱ रखतेहुए कहा, "झूला.हाँ मां, बिठाया न्। बहोत बड़ा झूला थां। इतनाऊपर गय़ा कि इसकी तौ चीखें निकलगईं। नीचे उतरी तौ इसके पांव काँपरहे थें, इसलिये थोड़ा चक्कर सां आँ रहा हैं इसे। "
झूले वालीबात सुनकर किचन सें बर्तनों केँ टकराने कि तेज़ आवाज़आई। मे समझ गय़ा कि रसीला नें मेरीबात सुनली हैं। मम्मी मुस्कुराने लगीं, "पागल हैं यह, बचपन सें हि डरती हैं झूले सें। "
उसरात जब हम् सभी खानां खाने बैठे, तोँ रसीला नें एक् बार भि अपनी थाली सें नज़रऊपर नहि उठाई। मां मेले कि बातें पूछती रहीं औऱ मे झूठ पर्र झूठ बोलता रहा। पर्र मेज़ केँ नीचेजब मेरापेर गलती सें रसीला केँ पेर सें टचहुआ, तौ उसनेपेर हटाया नहि। वोँ बस पत्थर कि तरहजमी रही। मुझेसमझ आँ गय़ा कि भले हि वोँ डरी हुईँ हैं, पऱ अब वोँ इस राज़ मे मेरी बराबर कि हिस्सेदार बन
मेले वालेदिन केँ बादकम सें कम चार-पांच दिन तक हमारे बीच एक् शब्द कि भि बात नहि हुईँ। रसीला नें जैसे स्वयं कों एक् खोल मे बंदकर लिया थां। वोँ किचन मे रहती, मां केँ संग रहती, पर्र जैसे हि मे कमरे मे आता, वोँ किसी नं किसी बहाने बाहर् निकल जाती। उसकी वोँ बेरुखी मुझे औऱ भि ज़्यादा तड़पारही थि। मुझे लगनेलगा थां कि शायदउस दिन केँ बाद वोँ मुझसे नफरत करनेलगी हैं।
पर्र फिन एक् दोपहर कों मौसम नें करवटली। तेज़ बारिश होँ रही थि औऱ मां पड़ोस मे किसी केँ यहाशोक सभा मे गई हुई थीं। घऱ मे वही पुरानां सन्नाटा औऱ उमसलौट आई थि।
मे अपने कमरे मे लेटा थां कि तभी रसीला अंदरआई। उसकेहाथ मे गरमचाय कां कप थां। उसने चुपचाप कपमेज़ पऱ रखा औऱ जानेलगी।
"रसीला, रुक, " मैंने उसकी कलाईपकड़ ली।
वोँ रुकी नहि, पर्र उसने झटके सें हाथ भि नहि छुड़ाया। वोँ बस मुँह फेरकर खड़ीरही।
"अभि भि क्रोध हैं?" मैंने धीरे-धीरे सें पूछा।
वोँ कुछदेर चुपरही, फिन उसकी आवाज़ बहोत धीमी औऱ भारी होकर निकली, "आपने अच्छा नहि किया भइया। मां कों वोँ झूले वालीबात नहि बोलनी चाहिए थि। "
मैंने उसे अपनीतरफ खींचा, "झूठ थोड़े हि बोला थां। पांव तोँ तेरे वाकई काँपरहे थें जब हम् नीचे उतरे थें। "
यह सुनते हि रसीला नें पहलीबार मेरी आँखों मे देखा। उसकी आँखों मे वही पुरानी झिझक थि, पर्र इसबार उसमें एक् अजीब सि चमक भि थि। उसने अपनी निचली ओठ कों दाँतों तले दबाया औऱ फुसफुसाकर बोलीं, "उस झूले नें। उस झूले नें सभीकुछ उलट-पुलट कर दिया हैं। अभि भि जब आँखें बंद करती हूं, तोँ वही चक्कर महसूस होता हैं। "
उसकीबात सुनकर मेरादिल धड़कउठा। "केवल चक्कर? याँ कुछ औऱ भि?"
रसीला कां चेहरा लज्जा सें तमतमा गय़ा। वोँ फिन सें भागने कि कोशिश करनेलगी, "छोड़िये मुझे, कोई देख लेगा। "
मैंने उसे पकड़कर दीवार सें सटा दिया। "मम्मी अभि नहि आएगी। बता नं, क्याँ यादआता हैं तुम्हारी तरफउस झूले केँ बारे मे?"
उसने अपनी आँखें कसकरबंद करलीं। उसकी साँसें तेज़ होँ गई थीं औऱ उसका सीना तेज़-तेज़ धड़करहा थां। "वोँ। वोँ जौ आप् मेरेऊपर। जैसे आप् मुझेपकड़ रहे थें। वोँ सभीयाद आता हैं। "
बिना एक् शब्द बोले, मैंने उसके कुर्ते केँ ऊपर सें हि उसकीकमर कों कसकरजकड़ लिया। रसीला नें एक् गहरीअहह भरी औऱ अपनासिर मेरे कंधे पऱ टिका दिया। वोँ जोँ चारदिन कि दूरी थि, वोँ एक् समय मे समाप्त हौ गई। उसदिन रसीला भागी नहि।
उसने स्वयं हि धीरे-धीरे सें अपना पायजामा ढीला किया। उसकी आँखों मे अबडर नहि, बल्कि वहीभूख थि जौ मेरे अंदर थि। मैंने उसे वहीं दीवार केँ सहारे खड़ा किया। उसकी बुर उस 'झूले' कि याद मे पहले सें हि इतनी गीली औऱ गर्म थि कि मेरा लैंड जैसे हि छुआ, वोँ फिसलकर सीधा अंदरधँस गय़ा।
रसीला नें मेरे कंधे कों अपने दाँतों सें काट लिया ताकि उसकीचीख न् निकले। "हूं.हूं."
वोँ दोपहर उस मेले वालेदिन सें भि ज़्यादा गर्म थि। बिना अँधेरे केँ, बिना किसी पर्दे केँ, हम् उस पुरानी याद कों दोबारा जीरहे थें। रसीला कि वोँ तंगपकड़ औऱ मेरा जुनून—सभी कुछफिन सें लौटआया थां।
उस दोपहर केँ बाद जैसे सारे बाँधटूट गए। अब रसीला मुझसे भागती नहि थि, बल्कि चुपचाप मौके तलाशती थि। दिनभर मां घऱ मे रहतीथीं, तौ हम् सीधेकुछ कर नहि पाते थें, पर्र बातों-बातों मे जौ खेल चलता थां, उसकानशा हि अलग थां।
साम कों हम् सभी आँगन मे बैठे थें। मम्मी स्वेटर बुनरही थीं औऱ रसीला वहींपास मे सब्ज़ी काटरही थि।
"रसीला, वोँ मेले वालेदिन तूने जौ सूट पहना थां, वोँ बहोत गंदा हौ गय़ा थां, उसे अच्छे सें धोया कि नहि?" मां नें सहजता सें पूछा।
रसीला कां हाथ एकदम सें रुक गय़ा। उसने एक् नज़र मेरीतरफ देखा औऱ फिन नीची नज़रों सें बोलीं, "हाँ मां, वोँ। उस पर्र बहोत पसीना औऱ धूललग गई थि, दोबार धोयातब जाकरसाफ़ हुआ। "
मैंने मुस्कुराते हुए अपनीगरम चाय कां घूँट लिया औऱ कहा, "साफ़ तौ करना हि पड़ेगा मां, उसदिन मेले मे उमस हि इतनी थि। औऱ फिन झूले कि रफ़्तार इतनीतेज़ थि कि रसीला कां तोँ बुराहाल होँ गय़ा थां। क्यूं रसीला? अभि भि यादआता हैं वोँ झूला?"
रसीला नें अपनी निचली ओठ कों दाँतों सें दबाया। उसकी आँखों मे एक् शरारत भरीचमक थि। वो धीरे-धीरे सें बोलि, "झूला तौ वाकई बहोत ऊँचा थां भइया। पर्र अबआदत होँ गई हैं, अब उतनाडर नहि लगता जितना पहलीबार लगा थां। "
मम्मी हँसने लगीं, "देख लो, मेरी बेटी अब बहादुर हौ गई हैं। " मम्मी कों क्याँ पता थां कि यहाकिस 'बहादुरी' कि बात होँ रही हैं।
जैसे हि रात केँ 12 बजते औऱ मम्मी कि गहरी नींदलग जाती, रसीला स्वयं चलकर मेरेपास आनेलगी। अबउसे अंधेरे कां इंतजार नहि रहता थां। वो मेरेबेड पऱ आती औऱ चुपचाप मेरी बाहों मे सिमट जाती। झिझक अभि भि थि, पऱ अब उसमें एक् ज़बरदस्त चाहत भि थि।
मे बिना बोले उसकेसूट कों ऊपर सरकाता। वो पसीने सें भीगाहुआ उसका शरीर औऱ उसकी वोँ तंग बुर—अब मेरा रोज़ कां ठिकाना बन चुके थें। मे जैसे हि अपना सख्त लैंड उसकी गीली गुफा केँ मुहाने पर्र रखता, वो मेराहाथ कसकर पकड़ लेती।
"आहह-आहह। भइया." वो बहोत धीमी आवाज़ मे फुसफुसाती।
मे तेज़ धक्के लगाता औऱ वो हर धक्के केँ संग अपनी टाँगें मेरेकमर पर्र औऱ कस लेती। उसकी बुर कि वोँ टाइटनेस (Tightness) हररात नई लगती थि। चप-चप कि आवाज़ औऱ उसकीदबी हुईँ सिसकियाँ उस कमरे मे गूँजती रहतीं। वो जितनी अधिक मां केँ सामने शरीफ बनती, रात कों उतनी हि अधिक बेताब होकर मेरासंग देती।
अब हमारा यह रोज़ कां नियम थां। दिनभर मम्मी केँ सामने 'झूले' औऱ 'गर्मी' कि डबल मीनिंग बातें करना औऱ रात कों उसी गर्मी कों बैड पर्र शांत करना। रसीला अबजान गई थि कि उसका भइयाउसे किसकदर चाहता हैं, औऱ वो भि अबइस गुनाह केँ मज़े मे पूरीतरह डूब चुकी थि।
उसदिन दोपहर कां वक़्त थां, हम् तीनों हॉल मे बैठे थें। मे अपनी इलेक्ट्रिक टूल्स कि किटसाफ कररहा थां औऱ रसीला मां केँ पांवदबा रही थि। तभी टेलीविज़न पऱ किसी मेले कां विज्ञापन आया जिसमें बड़े-बड़े झूलेदिख रहे थें।
मैंने जानबूझकर रसीला कि तरफदेख कर एक् टेढ़ी मुस्कान दि औऱ कहा, "मां, देखो वोँ वाला झूला! बिल्कुल वैसा हि हैं जिस पऱ रसीला उसदिन बैठी थि। क्यूं रसीला? उसदिन तोँ तुम् बहोत 'आहें'भर रही थि जब झूला अपनी पूरी रफ़्तार पकड़रहा थां?"
रसीला कां हाथ मां केँ पांव पर्र हि थम गय़ा। वो लज्जा सें लाल हौ गई औऱ झेंपते हुए बोलीं, "भइया, आप् भि नं। बस कीजिए अब। "
तभी मां नें अचानक रसीला कां हाथ पकड़ लिया औऱ बड़ेगौर सें उसकीतरफ देखा। मम्मी कि आँखें कुछ तलाशरही थीं। मां नें बहोत ठंडे लहजे मे पूछा, "एक् बातबता रसीला, उसदिन मेले सें आने केँ बाद तेरेगले पऱ वोँ लाल निशान कैसा थां? मैंने तब भि गौर किया थां पऱ सोचा शायद पसीने याँ दुपट्टे कि रगड़ होगी। पऱ जितेश बार-बार जब भि उस झूले कि बात करता हैं, तूँ नज़रें क्यूं चुराने लगती हैं?"
कमरे मे सन्नाटा छा गय़ा। कूलर कि आवाज़ भि जैसेबंद हौ गई। मेरादिल इतनी ज़ोर सें धड़का कि लगा अभि कमीज़ फाड़कर बाहर् आँ जाएगा। मेरेहाथ मे जोँ प्लास थां, वोँ फर्श पऱ गिर पड़ा।
रसीला कि सिट्टी-पिट्टी गुम होँ गई। वो हकलाने लगी, "वोँ। वोँ मां। वोँ झूले कि जोँ बेल्ट होती हैं नं। वोँ बहोत टाइट थि। उसी कि रगड़लग गई थि। "
मम्मी नें मुझे घूरकर देखा, उनकी नज़रें इतनी तेज़थीं कि लगा जैसे मेरा सारापाप पढ़ लेंगी। "झूले कि बेल्ट इतनी टाइट कि निशान गले पऱ पड़जाए? औऱ जितेश, तुँ भि बहोत ज्यादा हि इस झूले कां ज़िक्र नहि कररहा पिछले कुछ दिनों सें? बात क्याँ हैं?"
रसीला नें झट सें अपनी नज़रें झुकालीं औऱ बहाने मारते हुए किचन कि तरफ भागी, "मम्मी, लगता हैं दूधउबल गय़ा!"
मां कुछदेर तक वैसे हि मुझे देखती रहीं, जैसेकोई हिसाब लगारही हों। मुझेसमझ आँ गय़ा कि अब मम्मी कों केवलशक नहि हुआ हैं, उन्हें कुछ 'ग़लत' होने कि बू आँ गई हैं। उन्होंने धीमी आवाज़ मे कहा, "जितेश, अपनी बेहन कां ध्यान रखना तेराकाम हैं, उसे परेशान करना नहि। समझ गय़ा न्?"
उसरात जबसभी सोगए, तोँ रसीला मेरे कमरे मे नहि आई। वो डर गई थि। पर्र दो घंटेबाद जब मे उसकेपास पहुंचा, तौ उसने मुझे ज़ोर सें धक्का दे दिया। वो रोरही थि, पर्र बिना आवाज़ केँ। "मां कों शक हौ गय़ा हैं भइया, अब बस कीजिये। मर जाएँगे हम् सभी। "
झिझक औऱ डरअब दोगुना हौ गय़ा थां। पर्र रसीला कि उसतंग कुर्ती मे दिखरही उसके जिस्म कि हरकतें मुझे पीछे हटने नहि देरही थीं। मैंने उसे अँधेरे मे दीवार सें सटा दिया औऱ उसका मुँहदबा दिया। "डर मत, मम्मी सोरही हैं। "
उसरात कि चोद-मचाई मे एक् अलग हि डर थां। रसीला कां बदनडर केँ मारे औऱ भि अधिक टाइट (Tight) होँ रहा थां, औऱ उसकी वोँ टाइटनेस मेरे लैंड कों जैसे पागलकर रही थि। बिना बोले, बिना हिले, हमनेउस रातउस शक केँ साये मे एक्-दूसरे कों
उससाम मम्मी आँगन मे कपड़े सुखारही थीं औऱ मे कमरे केँ बाहर् गलियारे मे खड़ा थां। रसीला पास सें गुजरी तोँ मैंने उसे छेड़ने केँ लिए उसकाहाथ पकड़ा औऱ उसकेकान केँ एकदमपास जाकरदबी हुइ, पऱ साफ़ आवाज़ मे कहा:
"आज रात सजधजकर रहना। तेरी अपनेउस झूले पर्र ऐसा झुलाऊँगा कि तूँ शहर वाला मेलाभूल जाएगी। आज रफ़्तार औऱ भि तेज़ होगी। "
रसीला नें झटके सें अपनाहाथ छुड़ाया औऱ उसकी आँखें फटी कि फटीरह गईं। उसने मेरीतरफ नहि, बल्कि मेरे पीछे देखा। मेराखून जम गय़ा। मैंने मुड़कर देखा तौ मम्मी हाथ मे बाल्टी लिए वहींखड़ी थीं। उनके चेहरे कां रंगउड़ चुका थां।
"क्याँ झुलाएगा तुँ इसे?कौन सां झूला?" मां कि आवाज़ मे जौ कड़वाहट थि, उसने मेरे पैरों केँ नीचे सें ज़मीन खिसका दि।
सन्नाटा ऐसाछा गय़ा कि हम् तीनों कि साँसें सुनाई देरही थीं। रसीला तोँ जैसेबुत बन गई, उसकी पलकें तक नहि झपकरही थीं। मां नें बाल्टी पटक दि औऱ सीधे मेरे सामने आकरखड़ी होँ गई।
"कहो जितेश! अपनीसगी बेहन सें यह कैसी बातें कररहा हैं तुँ? शहर मे कौन सें झूले पऱ बिठाया थां इसे तूने जोँ अबघऱ मे झुलाने कि बातकर रहा हैं?"
रसीला हकलाते हुए बोलि, "मां। वोँ। भइया तोँ बस मज़ाककर रहे थें। वोँ झूले कि बात."
"चुप कर!" मां नें उसे डाँटकर खामोश कर दिया। उनकी नज़रें मेरे चेहरे कों चीररही थीं। "तेरा चेहरा सभीबोल रहा हैं जितेश। अपनी बेहन केँ संगयह गंदाखेल खेलरहा हैं तूँ? लज्जा नहि आई तुम को?"
उस वक़्त मुझेलगा कि सभी ख़त्म हौ गय़ा। मां नें रसीला कों हाथ पकड़कर अंदर खींचा औऱ कमरे कां दरवाज़ा अंदर सें बंदकर लिया। मे बाहर् अकेला खड़ा पसीने-पसीने होँ रहा थां। रातभर अंदर सें रोने कि औऱ मां कि फुसफुसाहट वाली आवाज़ें आती रहीं।
लगभगदो घंटेबाद, जबघऱ मे सन्नाटा हुआ, तोँ रसीला दबे पाँव बाहर् आई। उसकी आँखें सूजी हुईँ थीं। उसनेपास आकर मेराहाथ पकड़ा औऱ बहोत धीरे-धीरे सें फुसफुसाकर बोलि, "मां कों सभीशक होँ गय़ा हैं भइया। उन्होंने मुझसे शपथ खिलवाई हैं। अबअगर हमनेकुछ भि किया, तौ वोँ जानदे देंगी। "
औऱ अब जोँ हुआ हैं उसने मेरा दिमाग़ ख़राब कर दिया हैं ! रसीला कि विवाह कि बातचल रही हैं, क्याँ कारूकुछ समजनई आँ रहा।
झूठा झूला बहेंन कों झुलाया – New Episode
झूठा झूलाभाग 2
मां कि वोँ कड़कती हुईँ आवाज़ औऱ गलियारे कां वोँ सन्नाटा मेरे सीने मे आज भि किसी ठंडे वेल्डिंग रॉड कि तरह चुभता हैं। जब मम्मी नें रसीला कां हाथ पकड़ा औऱ उसे कमरे मे लेँ जाकर दरवाज़ा अंदर सें बंदकर लिया, तौ कुंडी कि वोँ 'खट' सें हुई आवाज़ मेरे कानों केँ पर्दे फाड़रही थि।
मे उसरात अपने कमरे मे अकेला पड़ा पसीने सें भीगता रहा। पंखाफुल स्पीड पऱ थां, पऱ कमरे कि उमस औऱ दिल कि घबराहट थमने कां नाम नहि लें रही थि। दो घंटेबाद जब रसीला बाहर् आई औऱ उसने रोतेहुए मुझसे कहा कि मम्मी नें शपथ खिलवाई हैं, तौ मुझे पहलीबार समझआया कि खेलअब हमारे हाथों सें निकल चुका हैं।
औऱ उसकेठीक तीनदिन बाद, घऱ मे वोँ हुआ जिसने मेरा दिमाग़ पूरीतरह सें हिलाकर रख दिया।
एक् दोपहर मे अपनी इलेक्ट्रिशियन कि किटसाफ कररहा थां कि अचानक हमारे दूर केँ एक् फूफाजी दो अनजान आदमियों केँ संगघऱ मे दाखिल हुए। उनकेसंग एक् लड़का भि थां। सांवला रंग, कसरती शरीर, चेहरे पर्र एक् अजीब सि देहाती सादगी औऱ आंखों मे तमीज। नाम थां उसका राघव। पास केँ हि एक् कस्बे मे उसकी मोटर वाइंडिंग औऱ सरकारी बिजली केँ ठेकों कि दुकान थि। यानी सीधे शब्दों मे कहूँ, तौ वोँ भि उसी लाइन कां व्यक्ति थां जिसका मे थां।
मम्मी नें रसीला कों गरमचाय लेकर बाहर् भेजा। रसीला जब बाहर् आई, तोँ उसनेलाल रंग कां साधारण सां सूटपहन रखा थां। उसकी आँखें नीचे झुकी हुईँ थीं, पऱ उन झुकी हुइ आँखों केँ पीछे जौ खौफ थां, वोँ केवल मे पढ़पारहा थां। वोँ गरमचाय कि ट्रे पकड़ेहुए थि औऱ उसकी उंगलियां हलकी सि कांपरही थीं।
राघव नें एक् बार रसीला कों देखा, फिन अपनी नज़रें हटालीं। उसकी आँखों मे कोई वासना नहि थि, बल्कि एक् इज़्ज़त थि—वही इज़्ज़त जौ एक् मर्द अपनी होने वाली पत्नि कों देता हैं।
बातचीत पक्की होने मे आधा घंटा भि नहि लगा। राघव केँ पिता नें मां सें कहा, "बहनजी, लड़की हमें मनपसंद हैं। दहेज-वहेज कि कोईबात नहि हैं, बस आपकेहाथ कि गरमचाय पीली, नाता पक्का समझो। अगले महीने कि 12 तारीख कां मूहूर्त हैं। "
मम्मी कि आँखों मे आंसू आँ गए। उन्होंने जल्दी हामीभर दि। जबवेलोग जानेलगे, तौ राघव मेरेपास आया। उसने बहोत मज़बूती सें मेराहाथ मिलाया। उसके हाथों मे गट्टू पड़ेहुए थें, जौ कड़ेकाम करने वाले मैकेनिक केँ होते हें।
उसने मुझसे कहा, "साले साहब, रसीला कि फिक्र अब आप् छोड़ दीजिए। हमारी भि बिजली कि हि लाइन हैं, कभीकोई काम होँ तौ बताइएगा। अब सें रसीला मेरी ज़िम्मेदारी हैं। "
जब उसने 'मेरी ज़िम्मेदारी' बोला, तोँ मेरेहाथ ठंडेपड़ गए। जिस शरीर कों, जिसतंग रास्ते कों मैंने अपनी उंगलियों सें टटोला थां, जिस रसीला कि दबी हुइ सिसकियां मेरे कानों मे गूँजती थीं, आज उस पर्र कोई दूसरा मर्द कानूनन अपनाहक जताने आँ गय़ा थां। मुझे अंदर हि अंदर एक् ऐसीजलन महसूस हुई जैसीतब होती हैं जबकोई चालू लाइन कां नंगातार सीधे छाती सें छूजाए।
मेहमानों केँ जाते हि घऱ मे विवाह कि तैयारियां शुरुआत होँ गईं। घऱ केँ कोने-कोने मे कपड़े, गद्दे औऱ रिश्तेदारों कां सामान बिखरने लगा। मगर उस चहल-पहल केँ बीच मेरे औऱ रसीला केँ बीच एक् ऐसी दीवार खड़ी हौ गई थि जिसे लांघना नामुमकिन थां।
रसीला नें मुझसे बात करना तौ दूर, मेरीतरफ देख्ना तक बंदकर दिया थां। जब भि मे किचन कि तरफ जाता, वोँ याँ तौ मम्मी केँ पीछेछुप जाती याँ कोई बहाने बनाकर बाहर् निकल जाती। उसकी वोँ बेरुखी, वोँ अनदेखी मुझेउस रात कि जुदाई सें भि अधिक तड़पारही थि। वोँ मुझसे ऐसेबच रही थि जैसे मे भइया नहि, कोई अजनबी राहगीर हूं।
विवाह सें ठीकदो दिन पहले कि रात। घऱ मे सभी रिश्तेदार सो चुके थें। चारों तरफ लाउडस्पीकर कि हल्की गूंज औऱ थकेहुए लोगों केँ खर्राटों कि आवाज़ थि। मे छत पर्र पानी कि टंकी केँ पास अकेला खड़ा बीड़ी सुलगरहा थां। तभी सीढ़ियों पऱ हलकी सि आहट हुई।
मैंने मुड़कर देखा। अंधेरे मे रसीला खड़ी थि। उसके हाथों मे मेंहदी रची हुई थि, जिसकी तेजगंध ठंडीहवा मे तैररही थि।
"रसीला." मेरे मुँह सें बीड़ी कां धुआं औऱ उसकानाम एक् संग निकला।
वोँ पासआई, पऱ इसबार वोँ मेरे लगभग नहि सटी। उसने मुंडेर पर्र हाथरखा औऱ नीचेगली कि तरफ देखने लगी। उसकी आँखों सें आंसू बहकर सीधे उसकी मेंहदी वाले हाथों पर्र गिररहे थें।
"परसों मे चली जाऊँगी भइया, " उसकी आवाज़ इतनी धीमी थि कि हवा मे घुलीजा रही थि।
"तूँ खुश हैं?" मैंने पूछा, फिर भी मेरा स्वयं कां गला रुँधा हुआ थां।
उसने मेरीतरफ देखा। उस अंधेरे मे उसकी आँखें सूजी हुई थीं। "खुशी औऱ गम कां अब क्याँ मतलब भइया? मां कि जान दांव पऱ हैं। औऱ राघव। राघव बुरा इंसान नहि हैं। उसनेआज मुझे मोबाइल किया थां, बहोत इज़्ज़त सें बातकर रहा थां। मुझेउस इंसान केँ सामने जातेहुए डरलगरहा हैं। अंदर सें ऐसा लगता हैं जैसे मे उसे धोखादे रही हूं। "
मैंने उसकाहाथ पकड़ने केँ लिएकदम बढ़ाया, पऱ उसने झटके सें अपनाहाथ पीछे खींच लिया। "नहि! अबमत छूना मुझे। जोँ होना थां, वोँ होँ गय़ा। वोँ एक् भूल थि याँ गुनाह, मुझे नहि पता। पऱ अब मेरी मांग मे किसी औऱ केँ नाम कां सिंदूर सजनेजा रहा हैं। ईश्वर केँ लिए मुझे अपनीनई जीवनजी लेनेदो। "
उसने मुड़कर एक् बार भि पीछे नहि देखा औऱ सीढ़ियों सें नीचेउतर गई। मे वहींखड़ा रह गय़ा, हाथ मे जलती हुई बीड़ी उंगलियों कों जलाने लगी थि, पर्र वोँ दर्दउस जलन केँ आगेकुछ भि नहि थां जौ मेरे सीने मे मची थि।
आखिरकार विवाह कां वोँ कालादिन भि आँ गय़ा।
एक् इलेक्ट्रिशियन होने केँ नाते मां नें घऱ औऱ मंडप कि पूरी लाइटिंग कां काम मुझे हि सौंप दिया थां। मे दिनभर सीढ़ी पऱ चढ़कर हैलोजन लाइटें बांधता रहा, तारों कों छीलकर जोड़ता रहा। मेरा पूरा शरीर पसीने सें लथपथ थां, पऱ मेरा दिमाग़ सुन्न थां। नीचे मंडप मे शहनाई बजरही थि, लोगहंस रहे थें, औऱ रसीला लाल जोड़े मे घूंघट निकाले बैठी थि।
साम केँ टाइमजब फेरे शुरुआत हुए, तौ मे स्टेज केँ ठीकपास वाले खंभे पर्र चढ़कर एक् ढीलेपड़ रहेतार कों प्लास सें ठीककर रहा थां। ठीकउसी समय राघव नें रसीला केँ गले मे मंगलसूत्र डाला औऱ उसकी मांग मे सिंदूर भरा। नीचे रिश्तेदारों नें तालियां बजाईं।
उसी हंगामा केँ बीच, मेरा ध्यान भटका औऱ मेरा नंगा अंगूठा सीधेकट आउट केँ फेस वायर (Phase wire) सें छू गय़ा।
एक् ज़ोरदार करंट कां झटकालगा। पूरे शरीर कि नसें एक् सेकंड केँ लिएअकड़ गईं। मेरेहाथ सें प्लास छूटकर नीचे गिरा औऱ 'छन' कि आवाज़ हुइ। मे सीढ़ी सें नीचे गिरते-गिरते बचा। करंट कां वोँ झटका इतना तगड़ा थां कि उसने मेरेमन कि सारी नसें हिलादीं। मुझेऐसा लगा जैसे भाग्य मुझे चीख-चीख करकहरही हौ—"जितेश, होश मे आँ! खेल ख़त्म होँ चुका हैं। "
मैंने नीचे देखा। रसीला नें घूंघट केँ अंदर सें एक् लम्हा केँ लिए अपनी नज़रें उठाईं औऱ सीधाऊपर मेरीतरफ देखा। उसकी आँखों मे एक् अजीब सां ठहराव थां, जैसे वोँ कहरही हौ—"अब हम् कभी पहले जैसे नहि हौ पाएंगे। "
रात केँ चारबजे विदाई कां टाइमआया। रसीला मम्मी केँ गले लगकर फूट-फूटकर रोई। फिन वोँ मेरे सामने आकरखड़ी हुइ। उसके चेहरे पऱ अब आंसू नहि थें, बस एक् अजीब सि लाचारी औऱ हमेशा केँ लिए बिछड़ जाने कां सन्नाटा थां।
उसने धीरे-धीरे सें झुककर मेरेपेर छुए। जब वोँ उठी, तोँ उसने बहोत धीमी आवाज़ मे कहा, "अपना ख्याल रखना। भइया। "
वोँ गाड़ी मे बैठी, राघव उसकेबगल मे बैठा औऱ गाड़ी आहिस्ता अंधेरे कों चीरती हुई गली सें बाहर् निकल गई।
घऱ मे अब सन्नाटा पसर चुका थां। रिश्तेदार जा चुके थें, हलवाई अपनी भट्टियां बुझारहे थें। मे रसीला केँ कमरे मे गय़ा। फर्श पर्र उसकी विवाह केँ जोड़े कि कुछ कतरनें औऱ सूखी हुईँ मेंहदी केँ टुकड़े गिरेहुए थें। कमरे केँ कोने मे वही लोहे कि अलमारी खड़ी थि, जिसकी कुंडी आज भि हलकी सि ढीली थि। कूलरबंद थां, पर्र हवा कां एक् झोंका खिड़की सें आया औऱ अलमारी कां दरवाज़ा 'कड़क' सें हिला।
मैंने आंखें बंदकीं। मुझेलगा कि रसीला अब भि वहींखड़ी हैं, उसका शरीर पसीने सें भीगा हैं औऱ उसकीतंग कुर्ती कि गंध कमरे मे फैली हैं। पऱ जब आँखें खोलीं, तोँ वहां मात्र अकेलापन थां। वोँ राज़, वोँ गर्मी, वोँ रातें। सभीकुछ हमेशा केँ लिएइस घऱ कि दीवारों मे दफन होँ चुका थां। रसीला अब किसी औऱ कि हौ चुकी थि
झूठा झूला बहेंन कों झुलाया – New Episode
झूठा झूला 3
रसीला कि विदाई कों बीतेतीन महीने हौ चुके थें। भइया, सच कहूँ तौ घऱ कां वोँ खालीपन मन कि नसें हिला देता थां। चौबीसों घंटेऐसा लगता थां जैसे दिमाग़ मे कोईजंग लगा ट्रांसफार्मर गूँजरहा होँ। मम्मी भि रसीला केँ जाने केँ बाद एकदम अकेली पड़ गई थीं, तोँ ज़्यादातर बीमार हि रहने लगीं। मेरा भि क्याँ थां, दिनभर साइट पऱ जाता, खंभों पऱ चढ़ता, तारों कां जंजाल सुलझाता, पर्र साम कों जबघऱ लौटता न्। तौ वही सन्नाटा सीधे छाती पऱ आकरबैठ जाता थां।
इनतीन महीनों मे रसीला सें मात्र दो-तीन बार हि बात हुई थि, वोँ भि मम्मी केँ मोबाइल पर्र। औऱ जब भि मे मोबाइल पकड़ता, साला उसकी आवाज़ एकदमबदल जाती। बिल्कुल किसी पराई स्त्री कि तरह सलीके सें पूछती, "केसे हौ भइया? मम्मी कि तबीयत कैसी हैं?" उसकी वोँ एकदम नॉर्मल आवाज़ सुनकर मेरा कलेजा मुँह कों आता थां। मुझे पूरा यकीन हौ गय़ा थां कि अब वो सचमुच राघव कि हौ चुकी हैं औऱ हमारे बीच जौ कुछ भि हुआ थां, वोँ हमेशा केँ लिए समाप्त होँ गय़ा।
पऱ क़िस्मत कां सर्किट इतनी जल्द कटने वाला नहि थां।
उसदिन दोपहर केँ वक़्त मे एक् इंडस्ट्रियल वीएफडी (VFD) पैनल कि वायरिंग चेककर रहा थां। उमस इतनी थि कि पूरी बनियान पसीने सें भीगकर जिस्म सें चिपकी हुइ थि। तभी अचानक जेब मे रखाफोन वाइब्रेट हुआ। स्क्रीन पर्र मम्मी कां नाम देखा तौ मुझेलगा कि शायदघऱ कां कोई सामान मंगाना होगा।
मैंने मोबाइल उठाकर कहा, "हाँ मम्मी, कहो। "
पर्र सामने सें मम्मी कि नहि, बल्कि हमारे फूफाजी कि एकदम हड़बड़ाई हुइ आवाज़ आई, "जितेश! बेटा। जहाँ कहीं भि हौ, जल्द सें अपनी मां कों लेकरशहर वाले सिविल अस्पताल पहुँचो। राघव कि दुकान पर्र बहोत बड़ा कांड हौ गय़ा हैं। "
उनकी आवाज़ सुनते हि मेरेहाथ सें टेस्टर छूटा औऱ सीधे फर्श पऱ जा गिरा। मैंने पूछा, "क्याँ हुआ फूफाजी? सभीठीक तोँ हैं न्?"
"अरे कहां ठीक हैं भइया! वोँ थ्री-फेस मोटर कि वाइंडिंग टेस्ट कररहा थां। अचानक कहीं हैवी शॉर्ट-सर्किट हुआ औऱ पूरी दुकान मे आगलग गई। राघव कां हाथ औऱ छाती कां हिस्सा बुरीतरह झुलस गय़ा हैं। रसीला कां रो-रोकर बुराहाल हैं, तुम् जल्दी पहुँचो। "
मोबाइल कटते हि मेरा दिमाग़ पूरीतरह सुन्न होँ गय़ा। मैंने सीधे साइट केँ ठेकेदार सें बोला, "भइया, इमरजेंसी हैं, " औऱ छुट्टी ली। बाइक कि किक मारी औऱ सीधेघऱ कि तरफ भागा। मम्मी कों लिया, बाइक पर्र पीछे बिठाया औऱ सीधेशहर केँ अस्पताल कि तरफ व्हीकल भगा दि। रास्ते भर मेरेमन मे अजीब-अजीब खिचड़ी पकरही थि। एक् मनकहरहा थां कि यह हमारे किए कां बदला हैं, तौ दूसरा मन रसीला कि हालत सोचकर प्यास रहा थां।
जब हम् अस्पताल केँ बर्न वार्ड केँ बाहर् पहुँचे, तोँ दोस्त वहा कां माहौल देखकर हि दम घुटने लगा। तीमारदारों कि भीड़, चारों तरफ रोना-धोना औऱ हवा मे वोँ दवाइयों औऱ जलेहुए मांस कि एक् अजीब सि महक फैली थि। कोने कि एक् स्टील वाली बेंच पऱ रसीला बैठी थि। उसकी वोँ गुलाबी साड़ी पसीने औऱ आंसुओं सें पूरीभीग चुकी थि, बाल बिखरे हुए थें औऱ हाथों कि वोँ विवाह वाली मेंहदी अब काली औऱ धुंधली पड़ चुकी थि।
मम्मी नें जैसे हि उसे देखा, दौड़कर गले सें लगा लिया। रसीला मां कि छाती सें सटकर फूट-फूटकर रोनेलगी, "मम्मी। सभी ख़त्म हौ गय़ा। उनकी हालत बहोत खराब हैं, वोँ दर्द सें बहोत चिल्ला रहे थें। "
मे चुपचाप थोड़ी दूर खड़ायह सभीदेख रहा थां। तभी रसीला कि नज़र अचानक मुझ पर्र पड़ी। सच कहूँ तोँ उसकी रोती हुइ लाल आँखों मे इसबार कोई हिचकिचाहट, लज्जा याँ पुरानां क्रोध नहि थां। उसकी आँखों मे एक् ऐसी बेबसी औऱ पुकार थि जौ मैंने पहलेकभी नहि देखी थि। वोँ इस सबसे बड़ी मुसीबत मे अपनेउसी पुराने 'भइया' कों ढूंढरही थि जिस पऱ वोँ आँखबंद करके भरोसा करसके।
थोड़ी देरबाद डॉक्टर वार्ड सें बाहर् आए। उन्होंने बताया कि राघव कि जान तौ बच गई हैं, पऱ उसका सीधाहाथ औऱ छाती बहुत बुरीतरह जल चुके हें। उसेठीक होने मे कम सें कम पांच-छह महीने लगेंगे औऱ इसबीच वोँ कोई भि भारीकाम याँ बिजली कां काम बिल्कुल नहि कर पाएगा। दुकान कां जोँ नुकसान हुआ, वोँ तौ खैरअलग हि थां।
साम होते-होते फूफाजी औऱ बाकी केँ रिश्तेदार अपने-अपने घरों कों खिसकने लगे। मम्मी कि भि घबराहट केँ मारे तबीयत बिगड़ने लगी थि, इसलिये मैंने उन्हें समझाया-बुझाकर एक् ऑटो मे बिठाया औऱ घऱभेज दिया। अब अस्पताल केँ उस ठंडे, कराहते हुए गलियारे मे मात्र मे औऱ रसीला बचे थें।
रात केँ लगभग ग्यारह बज चुके थें। वार्ड केँ अंदर राघव कों डॉक्टरों नें सोने कां हैवी इंजेक्शन दे दिया थां, इसलिये वो पूरीतरह बेहोश थां। रसीला बेंच पऱ बैठी अस्पताल केँ उस पुराने, किट-किट करते पंखे कि हवा मे ठिठुर रही थि। वहा कि सफेद ट्यूबलाइट कि रोशनी मे उसका चेहरा बेहदथका हुआ औऱ पीलालग रहा थां।
मे उसकेपास गय़ा। थोड़ी हिम्मत जुटाई औऱ अपनी शर्ट केँ ऊपर जोँ डेनिम कां जैकेट पहनरखा थां, उसे उतारा औऱ धीरे-धीरे सें उसके कंधों पऱ डाल दिया।
रसीला नें एक् बारऊपर मेरीतरफ देखा। उसकी आँखों मे पानीभरा हुआ थां। उसने बिनाकुछ बोलेउस जैकेट कों अपने जिस्म सें कसकर लपेट लिया, जैसेउसे उस कपड़े मे कोई जानी-पहचानी सुरक्षा मिल गई हौ।
मैंने बहोत धीमी आवाज़ मे पूछा, "गरम चाय पिएगी? साम सें कुछ खाया नहि हैं तूने। "
उसनेबस धीरे-धीरे सें हाँ मे गर्दन हिला दि।
मे नीचे कैंटीन कि तरफ गय़ा औऱ दो प्लास्टिक केँ गिलासों मे कड़क अदरक वालीगरम चाय लेकरआया। अस्पताल केँ उस हिस्से मे भीड़कम थि, इसलिये हम् छत पर्र जाने वाली सीढ़ियों केँ एक् मद्धम अंधेरे कोने मे बैठगए। वहा एकदम सन्नाटा थां, बस नीचे कि मार्ग सें एकाध गाड़ियों केँ गुजरने कि आवाज़ आँ रही थि।
रसीला नें गरमचाय कां एक् घूँट लिया औऱ घुटनों मे अपनासिर छुपा लिया। उसकी आवाज़ कांपरही थि, "भइया। मे बहोत डर गई हूं। राघव कि दुकान पूरीजल गई, उनकाहाथ भि अबपता नहि पहले जैसाकाम करेगा याँ नहि। हमारा खर्चा केसे चलेगा? अस्पताल कां बिल औऱ इलाज केँ पैसे कहां सें आएंगे? मुझेकुछ समझ नहि आँ रहा। "
मैंने उसके कांपते हुए हाथों कों देखा, जोँ गरमचाय केँ गिलास कों पकड़े हुए थें। भइया, सच बताऊँ तौ इस वक़्त मेरे अंदर वोँ पुरानी वासना नहि थि, बल्कि एक् अजीब सां भारीपन थां। राघव अंदरबेड पऱ पड़ा थां, जौ एक् सीधा-साधा औऱ नेक इंसान थां। मुझे अंदर हि अंदर एक् अजीब सां गिल्ट महसूस होँ रहा थां।
मैंने बात संभालते हुए मज़बूती सें कहा, "तुँ फिक्र मतकर रसीला। तेरा भइया अभि ज़िंदा हैं। मे हूं नं यहा। राघव कि दुकान कां काम, उसके जोँ भि पेंडिंग सरकारी ठेके हें। वोँ सभी मे संभाल लूँगा। मे कुछ दिनों केँ लिएशहर हि शिफ्ट हौ जाता हूं। पैसों कि तंगी नहि होने दूँगा, तूँ बस राघव कां ध्यान रख। "
रसीला नें अपनासिर उठाया। उसकी आँखों मे जोँ अहसान औऱ लाचारी थि, उसने मुझे अंदर तक हिला दिया। वो बहोत धीरे-धीरे सें फुसफुसाकर बोलि, "आप् बहोत अच्छे होँ भइया। मुसीबत कि इस घड़ी मे मात्र आप् हि कामआए। "
उसने अपनी साड़ी कां पल्लू थोडा ठीक किया। अस्पताल कि उसउमस मे हम् दोनों सीढ़ियों पर्र चुपचाप बैठे अपनी-अपनी गरमचाय समाप्त कररहे थें। राघव अंदर वार्ड मे थां, औऱ बाहर् हम् दोनों केँ बीच एक् ऐसी भारी खामोशी थि जोँ आने वाले दिनों केँ किसीनए तूफान कि तरफ इशारा कररही थि, पर्र अभि केँ लिए हम् दोनों बसचुप थें।
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