झूठा झूला बहेंन कों झुलाया – New Episode
झूठा झूला 4
राघव केँ एक्सीडेंट केँ दोदिन बाद हि मैंने अपना सारा जुगाड़ बिठाया औऱ शहर शिफ्ट हौ गय़ा। मम्मी कों घऱ पर्र अकेला छोड़ना ठीक नहि थां, पऱ रसीला कि हालत देखकर मेरेपास कोई औऱ मार्ग भि नहि बचा थां।
मैंने साइट वाले ठेकेदार सें बात करके अपनी ड्यूटी शहर केँ पास वाले सभी-स्टेशन मे लगवाली, ताकि सुभहकाम निपटाऊँ औऱ बाकी कां टाइम राघव कि दुकान औऱ अस्पताल मे दे सकूं।
राघव कि वोँ दुकान। भइया, सच कहूँ तौ वहा पहुँचकर मेरादिल एकदमबैठ गय़ा। शटर पूरा कालापड़ चुका थां, औऱ अंदरकदम रखते हि जली हुइ प्लास्टिक, मोबिल ऑयल औऱ तांबे केँ तारों कि वोँ कड़वी महक सीधे दिमाग़ पर्र चढ़ती थि।
Three-phase कि जौ बड़ी मोटरें वाइंडिंग केँ लिएआई थीं, वे सभी जलकर कोयला हौ चुकीथीं। दुकान कां पूरा वायरिंग बोर्ड पिघलकर फर्श पर्र आँ गिरा थां। एक् इलेक्ट्रिशियन होने केँ नाते मे समझ गय़ा थां कि यहानए सिरे सें कम सें कम पंद्रह-बीस हजार कां सामान डालना पड़ेगा, तब जाकर दुकान दोबारा खड़ी होगी।
खैर, मैंने हिम्मत नहि हारी। हाथ मे प्लास औऱ टेस्टर पकड़ा औऱ लग गय़ा काम पर्र। दिनभर मे दुकान कां मलबासाफ करता, जले हुए तारों कों काटकर अलग करता औऱ नए सिरे सें मेन स्विच औऱ कट-आउट कि वायरिंग सेट करता थां।
पूरा जिस्म पसीने औऱ कालिख सें सन जाता थां, पर्र मेरे दिमाग़ मे बस एक् हि धुन सवार थि—केसे भि करके राघव कां यह धंधा वापस चालू करना हैं।
साम केँ सातबजे जब मे हाथ-मुँह धोकर अस्पताल पहुँचता, तौ रसीला वहीं वार्ड केँ बाहर् गैलरी मे बैठी मेरा इंतजार कररही होती थि।
मे जैसे हि पास जाता, वोँ अपनी झुकी हुई आँखों सें मेरे मैले कपड़ों औऱ हाथों पऱ लगी कालिख कों देखती। उसकी आँखों मे एक् अजीब सां दर्द औऱ अहसान साफ झलकता थां। वोँ जल्दी उठती औऱ अपनी साड़ी केँ पल्लू सें दबाकर रखी हुइ पानी कि बोतल औऱ टिफिन आगेकर देती।
"भइया, आप् बहोत थकगए होंगे। पहले थोडा पानीपी लो, " वोँ इतनी धीमी औऱ भारी आवाज़ मे कहती कि सीधेदिल पर्र लगती थि।
"मे ठीक हूं रसीला, तूँ अपनीबता। राघव कों होशआया क्याँ?" मे टिफिन खोलते हुए पूछता।
"हाँ, दोपहर कों थोड़ी देर केँ लिएहोश आया थां। डॉक्टर कहरहे थें कि घाव गहरे हें, पऱ खतराटल गय़ा हैं। वोँ बार-बार दुकान केँ बारे मे पूछरहे थें, तौ मैंने कह दिया कि जितेश भइयासभी संभाल रहे हें। यह सुनते हि उनकी आँखों मे आँसू आँ गए.कहरहे थें कि साले साहब पऱ बहोत बड़ाबोझ डाल दिया। "
रसीला कि आवाज़ मे राघव केँ लिए जौ फिक्र थि, उसे सुनकर मुझे अंदर हि अंदर एक् अजीब सां झटका लगता थां।
भइया, सच बताऊँ तौ इस पूरे मामले मे सबसे टेढ़ा काम थां मेरे अंदर कां वोँ गिल्ट (अपराधबोध)। जब मे वार्ड केँ अंदर जाकर राघव कों देखता थां नं, तौ मेरी हिम्मत जवाबदे जाती थि।
वोँ सीधा-साधा आदमीबेड पर्र पड़ा थां, उसका पूरा सीधाहाथ औऱ छाती सफेद पट्टियों सें बंधी हुई थि। वोँ अपनीउन लाचार आँखों सें मुझे देखता, तौ ऐसा लगता थां जैसे वोँ अपनी बची-कुची जीवन कि चाबी मेरे हाथों मे सौंपरहा होँ।
वोँ बहोत मुश्किल सें अपना बायाँ हाथ उठाता औऱ मेरेहाथ कों पकड़कर बोलता, "जितेश भइया। मे जीवनभर आपकायह अहसान नहि भूलूँगा। अगरआज आप् नं होते, तोँ रसीला मार्ग पऱ आँ जाती। मेरी दुकान, मेरा पूराघऱ। अबसभी आपके भरोसे हैं। "
सोचो दोस्त, उससमय मेरेदिल पर्र क्याँ बीतती होगी। जिस बंदे कि अमानत केँ संग मैंने घऱ कि रातों मे खेल खेला थां, आजवही आदमीहाथ जोड़कर मुझ पर्र अंधा भरोसा कररहा थां।
मेरामन अंदर सें चीख उठता थां—"साले जितेश, तूँ कितना बड़ा कमीना हैं!" पर्र चेहरे पऱ झूठी मुस्कान लाकर मुझे कहना पड़ता थां, "राघव भइया, आप् फिक्र मतकरो। आप् हमारे जीजाजी होँ, हमारी बेहन केँ सुहाग हौ। जब तक मे हूं, दुकान कां एक् तार भि इधर सें उधर नहि होने दूँगा। "
अस्पताल केँ उस माहौल नें हमारे बीच कि दूरी कों एक् अलग हि शक्लदे दि थि। रसीला अब मुझसे भागती नहि थि, बल्कि वोँ परछाई कि तरह मेरे आस-पास रहती थि। जब मे रात कों अस्पताल कि बेंच पर्र थका-हारा सो जाता, तोँ वोँ चुपके सें मेरे पैरों पऱ चादरडाल देती।
हमारे बीचअब वोँ पुरानी वासना वाली बातें नहि होतीथीं, पर्र एक् ऐसी नज़दीकी बनरही थि जोँ उस पुरानी रातों सें भि अधिक गहरी थि।
एक् रात कि बात हैं, लगभग बारहबज रहे थें। पूरा अस्पताल सन्नाटे मे डूबाहुआ थां, बस नर्सों केँ सैंडल कि 'खट-खट' आवाज़ आँ रही थि। रसीला बेंच पर्र बैठी-बैठी ऊँघरही थि। उसकासिर बार-बार झटके सें नीचेगिर जाता थां।
मैंने उसकेपास जाकर धीरे-धीरे सें कहा, "रसीला, तूँ बहोत थक गई हैं। बेड केँ कोने मे थोड़ी स्थान हैं, वहा जाकर थोड़ी देरसिर टिका लेँ। मे यहा बाहर् बैठा हूं। "
उसने आँखें खोलीं, उसकी आँखों मे नींद औऱ थकानभरी हुइ थि। उसने मेरीतरफ देखा औऱ बहोत धीरे-धीरे सें बोलि, "नहि भइया, मुझे अकेले अंदरडर लगता हैं। राघव तौ सोरहे हें। मे यहीं आपकेपास बैठती हूं। "
वोँ उठी नहि, बल्कि उसने बेंच पर्र हि थोडा सरककर मेरेलिए स्थान बनाई। हम् दोनों उस ठंडी स्टील कि बेंच पर्र एकदम सटकरबैठ गए।
अस्पताल कि उमस औऱ उस सन्नाटे मे, तीन महीने बाद पहलीबार रसीला कां कंधा मेरे कंधे सें टचहुआ। इसबार वोँ झटके सें दूर नहि भागी, नं हि उसने अपनी साड़ी कां पल्लू खींचा। वोँ बस खामोश बैठीरही, जैसेउस कड़कती धूप मे उसेकोई घना पेड़मिल गय़ा हौ।
मैंने भि कोई हरकत नहि कि। मेराहाथ बेंच पर्र पड़ा थां, औऱ रसीला नें धीरे-धीरे सें अपनी उँगलियाँ मेरेहाथ केँ पासला टिकाईं।
उस स्पर्श मे कोई वासना नहि थि, भइया.बस एक् उतावलापन थि, एक् लाचारी थि औऱ एक् ऐसा राज़ थां जोँ राघव केँ इस हादसे केँ बाद औऱ भि अधिकउलझ चुका थां।
मुझेसमझ आँ गय़ा थां कि भले हि राघव उसका पति बन चुका हैं, पऱ इस मुसीबत कि घड़ी मे रसीला कि डोरआज भि अंदर हि अंदर मुझसे हि बंधी हुइ थि।
भइया मेरा औऱ तेरानेम सेम हैं तोँ तेरी बेहन भि मेरी बेहन हुइ वैसे तेरे जैसा हि प्रेम दूँगा बेहन कों किस्सा पढ़कर हि खड़ा होँ गय़ा
झूठा झूला बहेंन कों झुलाया – New Episode
झूठा झूला 5
दोस्त भइया, वक्त कां पहिया घूमा औऱ लगभगदो महीने बीतगए। मैंने सुबह-शाम एक् करके राघव कि दुकान कों दोबारा पैरों पऱ खड़ाकर दिया थां। नया वायरिंग बोर्ड, नई मशीनें औऱ जोँ भि पेंडिंग सरकारी ठेके थें, उन्हें साइट पऱ जाकर स्वयं पूरा किया।
बाजार मे राघव कां नाम खराब नहि होने दिया औऱ अस्पताल कां पूराबिल भि अपनी गाढ़ी कमाई सें चुकाया। राघवअब आहिस्ता रिकवर होँ रहा थां, फिरभी उसका सीधाहाथ अभि भि पूरीतरह काम नहि करपारहा थां, पऱ वोँ घऱलौट आया थां।
इससभी केँ बीच, मे भि उसीशहर मे राघव केँ घऱ केँ पास एक् छोटा सां रूम किराए पर्र लेकर रहनेलगा थां, ताकि दुकान औऱ उनकेघऱ कां ध्यान रख सकूं। राघवमुझ पऱ अब ईश्वर कि तरह भरोसा करनेलगा थां। जब भि मे उनकेघऱ जाता, वोँ अपनी लाचार आँखों सें मुझे देखता औऱ कहता, "जितेश भइया, तुम् भइया नहि, मेरेलिए साक्षात ईश्वर कां रूप बनकरआए हौ। "
पर्र भइया, सच बताऊँ तौ इस पूरे वक्त मे मेरे अंदर जौ हलचलमची थि, वोँ शांत होने कां नाम नहि लें रही थि। रात कों जब मे अपने सूने कमरे मे अकेला लेटा रहता, तौ दिमाग़ मे बस एक् हि प्रश्न चौबीसों घंटे कीड़े कि तरह कुतरता रहता थां—"क्याँ रसीला केँ मन मे अब भि मेरेलिए वही पुरानी तड़प बाकी हैं? क्याँ वोँ अब भि मुझसे जुड़ना चाहेगी, याँ राघव कि इस लाचारी नें उसे पूरीतरह बदल दिया हैं?"
अस्पताल कि सीढ़ियों पऱ जब उसने मेरा जैकेट ओढ़ा थां औऱ मेरे कंधे पऱ सिररखा थां, उसकेबाद सें हमारे बीचकोई ऐसीबात नहि हुईँ थि। घऱ लौटने केँ बाद वोँ चौबीसों घंटे राघव केँ आस-पास रहती, उसकी दवाइयाँ संभालती, उसे खानां खिलाती।
पऱ जब भि मे वहा जाता औऱ हमारी नजरें आपस मे टकराती थीं, तौ उन आँखों मे एक् अजीब सां सस्पेंस रहता थां। वोँ न् तोँ पूरीतरह पराई लगती थि, औऱ न् हि खुलकर सामने आँ रही थि। वोँ जोँ एक् अनकहा राज़ हमारे बीच थां, वोँ उसघऱ कि हवा मे भारीउमस कि तरहतैर रहा थां। मुझेसमझ नहि आँ रहा थां कि वोँ सचमुच बदल गई हैं याँ केवल मौके केँ इंतज़ार मे स्वयं कों रोके बैठी हैं।
फिन एक् दिन वोँ मौका आँ हि गय़ा जिसने मेरेइस प्रश्न कां जवाब आधा-अधूरा हि सही, पऱ दे दिया।
दोपहर कां वक़्त थां, तेजधूप खिड़की सें सीधे कमरे केँ फर्श पर्र आँ रही थि। राघव कों दवाइयों कि भारीडोज़ दि गई थि, जिसकी वजह सें वोँ अंदर केँ कमरे मे गहरी नींद मे सोयाहुआ थां। घऱ मे एकदम सन्नाटा पसरा थां, बस पुरानां सीलिंग पंखा 'चर-चर' कि आवाज़कर रहा थां। मे हॉल मे बैठा दुकान केँ कुछबिल औऱ पैसों कां हिसाब पुस्तक देखरहा थां।
तभी रसीला किचन सें निकलकर बाहर् आई। उसकेहाथ मे ठंडे पानी कां एक् गिलास थां। उसने चुपचाप गिलास मेज़ पर्र रखा। आज उसनेवही नीलेरंग कां प्राचीन सूटपहन रखा थां जोँ वोँ विवाह सें पहले अक्सर हमारे घऱ पऱ पहनती थि। उमस कि वजह सें उसके माथे पऱ पसीने कि छोटी-छोटी बूंदें चमकरही थीं।
मैंने पानी कां गिलास उठाया, एक् घूँट लिया औऱ सीधे उसकी आँखों मे देखा। "राघवसो गय़ा?" मैंने बहोत दबी आवाज़ मे पूछा।
"हाँ, अभि-अभि आँखलगी हैं उनकी, " वोँ अपनी साड़ी केँ पल्लू कों उँगलियों मे भीचते हुए बोलीं। वोँ जाने केँ लिए मुड़ी, पर्र इसबार उसकेकदम थोड़े धीमे थें, जैसे वोँ स्वयं भि वहा रुकना चाहती होँ।
मेरादिल इतनीteज़ धड़का कि लगा अभि छाती फाड़कर बाहर् आँ जाएगा। विवाह केँ बाद पहलीबार हम् इसतरह अकेले थें। मैंने बिना सोचे-समझे आगे बढ़कर उसकाहाथ पकड़ लिया।
जैसे हि मेरी उँगलियों नें उसकी कलाई कों छुआ, रसीला एक् सेकंड केँ लिए पूरीतरह ठिठक गई। उसने अपनाहाथ छुड़ाने कि कोई कोशिश नहि कि, बस वहींजमी रही। उसकीपीठ मेरीतरफ थि औऱ उसकी साँसें अचानक भारी होनेलगी थीं।
"रसीला। सच-सचबता, तुँ खुश हैं न्? मुझेभूल तोँ नहि गई?" मैंने अपनी आवाज़ कों जितना होँ सके धीमा रखतेहुए पूछा।
उसने धीरे-धीरे सें अपनी गर्दन घुमाई। उसकी आँखों मे इसबार राघव कि पत्नि होने कां वोँ सख्त पर्दा नहि थां। उसकी आँखों मे वही पुरानी झिझक, वही डर औऱ एक् कड़कती हुईँ तड़पसाफ़ दिखाई देरही थि। उसकी निचली ओठ दाँतों केँ बीचदबी हुईँ थि, जोँ उसकी अंदरूनी कशमकश कों साफ़ बयांकर रही थि।
"भइया.ऐसी बातें मतकरो, वोँ अंदरसो रहे हें, " उसकी आवाज़ कांपरही थि, पर्र उस 'भइया' शब्द मे इसबार कोई दूरी नहि थि, बल्कि एक् ऐसी बेबसी थि जौ साफ़कह रही थि कि वोँ अंदर हि अंदर स्वयं कों रोकरही हैं।
उसने अपनाहाथ धीरे-धीरे सें खींचा औऱ किचन कि तरफबढ़ गई, पर्र कमरे सें भागी नहि। वोँ किचन केँ दरवाज़े पर्र जाकरखड़ी होँ गई औऱ मुड़कर एक् आख़िरी बार मुझे देखा। उसकीउस एक् आख़िरी नज़र नें मेरेमन कि सारी हलचल कों एक् नया मार्ग दे दिया थां।
मुझेसमझ आँ गय़ा थां कि भले हि सामाजिक तौर पऱ वोँ किसी औऱ कि होँ चुकी थि, पर्र वोँ पुरानी आग अभि भि अंदर कहीं सुलगरही थि, जिसे एक् छोटा सां झोंका फिन सें भड़का सकता थां।
झूठा झूला बहेंन कों झुलाया – New Episode
झूठा झूला 6
दोपहर कि उस खामोशी मे रसीला किचन केँ दरवाज़े पर्र टिककर खड़ी हौ गई। उसकेहाथ मे अब भि वोँ खाली गिलास थां, जिसे वोँ उँगलियों सें बार-बार घुमारही थि। अंदर केँ कमरे सें राघव केँ भारी साँस लेने कि आवाज़ आँ रही थि, पऱ बाहर् हॉल मे हम् दोनों केँ बीच एक् अलग हि सन्नाटा थां।
उसने एक् बार मुड़कर खिड़की सें बाहर् देखा, जहाँ बाहर् धूप इतनी तेज़ थि कि हवा भि कांपती हुईँ दिखरही थि। फिन उसने बहोत धीरे-धीरे सें अपनी नज़रें घुमाईं औऱ सीधे मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों मे इसबार एक् अजीब सि कड़वाहट औऱ पुरानी यादें एक् संगतैर रहीथीं।
"याद हैं भइया." उसकी आवाज़ इतनी धीमी थि कि मुझे सुनने केँ लिए थोडा आगे झुकना पड़ा। "विवाह सें पहलेजब सावनआया थां, तोँ हमारे उस पुराने नीम केँ पेड़ पऱ एक् झूला पड़ा थां। तब हम् कितने बेफिक्र होकरउस झूले पर्र झूलते थें। ऐसा लगता थां जैसे जीवन मे कोई बंदिश हि नहि हैं। "
उसने एक् ठंडी साँसली औऱ अपनी साड़ी केँ पल्लू कों कसकरभीच लिया। "पऱ अब.अब तोँ ऐसा लगता हैं जैसे वोँ झूला हि कहींखो गय़ा हैं। राघव अंदर पड़े हें, उनका वोँ हाथ। डॉक्टर कहते हें पता नहि कब पहले जैसा होगा। अब इसघऱ मे नं वोँ पुरानी रौनकबची हैं, न् वोँ चैन। जीवन जैसे एक् हि स्थान पऱ आकरफंस गई हैं। "
जब उसने वोँ 'झूले' वालीबात कही, तौ मेरामन सीधे गाँव केँ उस पुराने घऱ केँ कोने मे चला गय़ा। मुझेसमझ आँ रहा थां कि वोँ सिर्फ़ एक् बचपन केँ झूले कि बात नहि कररही थि। वो उस आज़ादी, उस बेफिक्री औऱ हमारे बीच केँ उस अनकहे रिश्ते कों यादकर रही थि जौ विवाह केँ बादइस नएशहर औऱ राघव कि लाचारी केँ बीच कहीं दबकररह गय़ा थां। राघव केँ एक्सीडेंट नें उसे एक् ऐसी ज़िम्मेदारी मे बाँध दिया थां जहाँ सें वोँ नं आगेबढ़ पारही थि औऱ नं पीछेहट सकती थि।
"रसीला." मैंने उसे टोकना चाहा।
पऱ उसने अपनाहाथ उठा दिया, जैसे वोँ मुझे औऱ बोलने सें रोकना चाहती होँ। "अबकुछ मत कहना भइया। बस जोँ चलरहा हैं, उसे चलनेदो। तुम् दुकान संभाल रहे हौ, यही बहोत बड़ीबात हैं। "
उसने अपनी आँखें नीचेकर लीं औऱ किचन केँ अंदरचली गई। बर्तन रखने कि 'खट' सें आवाज़ हुईँ औऱ वोँ फिन सें अपनेकाम मे जुट गई। मे वहीं मेज़ पर्र रखे बिलों कों देखता रह गय़ा। मुझे साफ़समझ आँ गय़ा थां कि उसके अंदर भि वही उथल-पुथल मची हैं जौ मेरे सीने मे थि, पर्र राघव केँ इसखाट पऱ पड़े होने केँ कारण, हम् दोनों केँ बीच एक् बहोत भारी औऱ मजबूर खामोशी खड़ी होँ चुकी थि।
किचन सें बर्तनों कि हल्की-हल्की आवाज़ आँ रही थि, पर्र मेरेमन मे उसकीवही 'झूले' वालीबात घूमरही थि। मुझसे रहा नहि गय़ा। मे मेज़ पर्र रखे बिलों कों वहीं छोड़कर उठा औऱ आरामसे किचन केँ दरवाज़े केँ पास जाकर खड़ा होँ गय़ा।
रसीला पीठ घुमाकर शेल्फ पऱ डिब्बे रखरही थि। उसका पूरा ध्यान अपनेकाम मे थां, याँ शायद वोँ स्वयं कों व्यस्त दिखाने कि कोशिश कररही थि।
मैंने दरवाज़े केँ चौखट पर्र हाथ टिकाया औऱ बहोत हि दबी, शांत आवाज़ मे पूछा, "रसीला."
वो चौंककर मुड़ी। उसकी आँखों मे एक् लम्हा केँ लिए घबराहट आई।
मैंने सीधे उसकी आँखों मे देखते हुए, लहजे कों थोडा गहरा किया औऱ कहा, "अगर मे कहूँ कि वोँ प्राचीन नीम कां पेड़ औऱ वोँ झूलाआज भि वहीं हैं। तौ क्याँ तुँ फिन सें उस झूले पर्र झूलना चाहेगी?"
मेरीबात सुनते हि रसीला केँ हाथ वहींरुक गए। उसके चेहरे कां रंग एक् लम्हा केँ लिए उड़ा, औऱ फिन अचानक उसकी गालों पर्र एक् हल्की सि लाली दौड़ गई। वो अच्छी तरहसमझ गई थि कि मे यहा केवल बचपन केँ खेल याँ सावन केँ झूले कि बात नहि कररहा थां। मेरी बातों केँ पीछे छिपा वोँ पुरानां, गहरा इशारा सीधे उसकेदिल पर्र जाकरलगा थां।
उसने जल्दी अंदर केँ कमरे कि तरफ़ देखा, जहाँ राघवसो रहा थां। उसकी साँसें थोड़ी तेज़ होँ गईं औऱ उसने अपनी साड़ी कां पल्लू उँगलियों मे कसकर लपेट लिया।
"भइया। आप् भि क्याँ अजीब बातें करते हौ, " उसकी आवाज़ मे एक् अजीब सि थिरकन थि, जिसमें डर भि थां औऱ एक् छुपी हुईँ चाहत भि। "अब वोँ दिन कहां रहे। अब तोँ बसयह चौका-बर्तन औऱ ज़िम्मेदारियाँ हि मेरी ज़िंदगी कां झूलाबन चुकी हें। "
उसने अपनी आँखें नीचेकर लीं, पऱ इसबार उसने मुझेवहा सें जाने केँ लिए नहि कहा। वो बस चुपचाप खड़ीरही, जैसे मेरीउस बात नें उसके अंदर केँ सोएहुए तूफ़ान कों फिन सें जगा दिया हौ। हम् दोनों केँ बीच कि वोँ खामोशी अब औऱ भि अधिक भारी औऱ रहस्यमयी होँ चुकी थि।
मैंने एक् कदम औऱ आगे बढ़ाया, मेरी आवाज़ अब औऱ भि धीमी औऱ गहरी हौ चुकी थि। मैंने उसकी आँखों मे झांकते हुएकहा, "ज़िम्मेदारियाँ अपनी स्थान हें रसीला, पर्र दिल कों मार देना कहां कां इंसाफ़ हैं? मे सचकहरहा हूं। इसबार तुम्हें ऐसा झूला झुलाऊँगा कि तुम् खुशी सें पागल होँ जाओगी। पुरानी सारी कड़वाहट औऱ यह चौके-बर्तन कां बोझसमय भर मे भूल जाओगी। "
मेरीइस बात नें जैसे किचन कि बची-खुची हवा कों भि भारीकर दिया।
रसीला नें झटके सें अपनी आँखें उठाईं। उसकी आँखों मे इसबार केवलडर नहि थां, बल्कि एक् अजीब सि कशमकश थि—जैसे कोई सूखी ज़मीन पर्र पहली बारिश कि बूंदें गिरते देखरहा होँ, पर्र उसे छूने सें डररहा हौ। उसने अपनी कांपती उंगलियों सें साड़ी केँ पल्लू कों औऱ कस लिया।
"आप्। आप् होश मे तोँ हें?" उसने बहोत हि दबी ज़ुबान मे कहा, उसकी सांसें साफ़ सुनीजा सकतीथीं। "अगर राघव नें सुन लिया, याँ किसी औऱ कों भनक भि लग गई, तौ." वो अपनीबात पूरी नहि करपाई, पऱ उसका चेहरा साफ़बता रहा थां कि उसके भीतर कि चाहत औऱ बाहर् कां डरइससमय एक्-दूसरे सें बुरीतरह टकरारहे थें।
उसकी घबराहट कों अनदेखा करतेहुए अपनी आवाज़ कों औऱ धीमा किया, मानो शब्द मात्र उस तक हि पहुँच रहेहों। "डर कों बीच मे मतलाओ, रसीला। सच तौ ये हैं कि पिछले दो महीनों सें तुमने भि उस आज़ादी कों महसूस नहि किया हैं। तुम्हें भि इसकी उतनी हि ज़रूरत हैं जितनी मुझे। ज़िम्मेदारियों केँ पीछे अपने-आप् कों कब तक छुपाओगी?"
मेरीबात सीधे उसकेउस दर्द पऱ लगी जिसे वो अब तक दबाए बैठी थि।
रसीला केँ होंठ हल्के सें कांपे, पर्र इसबार उसनेकोई दलील नहि दि। उसकी झुकी हुईँ पलकें औऱ तेज़ चलती सांसें गवाही देरही थीं कि वो अंदर सें पूरीतरह टूटरही थि। सामाजिक मर्यादा, राघव कां डर औऱ स्वयं कि दबी हुई इच्छाएं—सभी मिलकर उसके भीतर एक् बवंडर खड़ाकर रहे थें।
उसने धीरे-धीरे सें शेल्फ कां सहारा लिया, जैसे उसके पांव उसकाबोझ उठाने सें मनाकर रहेहों। किचन कि उस मद्धम रोशनी मे, हम् दोनों केँ बीच कि दूरीअब औऱ कम होँ चुकी थि, औऱ हवा मे फैलाये तनाव किसी भि समय एक् नया मोड़ लें सकता थां।
झूठा झूला बहेंन कों झुलाया - Next part mein bada twist
Relavant source : click here