झूठा झूला बहेंन कों झुलाया – New Episode
भाग 9
रात कि वोँ बेकाबू दीवानगी, जब मैंने रसीला कां नाम चिल्लाते हुए सोफे पर्र अपना पानी छोड़ा थां, उसकेबाद हॉल मे एक् गहरा सन्नाटा पसर गय़ा थां। मेरा पूरा जिस्म पसीने सें तर-बतर थां, साँसें धीरे धीरे काबू मे आँ रहीथीं औऱ मे उसी थकावट मे कब गहरी नींद मे सो गय़ा, मुझेपता हि नहि चला।
सुभह केँ ठीकसात बजेजब मेरीआँख खुली, तौ खिड़की सें धूप सीधे मेरे चेहरे पऱ पड़रही थि। रात कि वोँ मूसलाधार बारिश थम चुकी थि, पऱ उमस वैसी हि थि जैसी मेरे भीतर रसीला केँ लिएमची हुईँ थि। मे सोफे सें उठा, अपनी पैंट संभाली औऱ हाथ-मुँह धोने बाथरूम कि तरफ़ बढ़ा।
बाथरूम सें बाहर् निकलते हि मेरी नज़र सीधे किचन पऱ पड़ी। रसीला वहा खड़ीगरम चाय कां पानी उबालरही थि। सुभह कि धूप मे उसका वोँ नीला कुर्ता औऱ पटियाला सलवार देखकर रात कि वोँ पूरी तड़प मेरेमन मे फिन सें ताज़ा हौ गई। जैसे हि मेरे पैरों कि आहट हुई, उसने मुड़कर देखा। हमारी आँखें मिलते हि रसीला केँ गालों पर्र लाली दौड़ गई औऱ उसने जल्दी अपनी पलकें झुकालीं। उसके होंठों कि थिरकन साफ़कह रही थि कि वोँ रात कां अपना वादा भूली नहि हैं।
"गरमचाय रेडी हैं भइया। लें लीजिए, " उसने अपनी आवाज़ कों जितना होँ सके नॉर्मल रखतेहुए कहा, पर्र गरमचाय कां कप पकड़े हुए उसकी उंगलियाँ हलकी सि काँपरही थीं।
मैंने कपहाथ मे लिया औऱ जानबूझकर अपनी उंगलियों कों उसकी हथेलियों सें छुआ दिया। उस हलके सें करंट नें रसीला केँ जिस्म मे एक् सिहरन पैदाकर दि औऱ उसने जल्दी अपनाहाथ पीछे खींच लिया।
तभी अंदर केँ कमरे कां द्वार (दरवाज़ा) खुला औऱ राघव बाहर् आया। दवाइयों केँ असर सें उसका बुखार अब पूरीतरह उतर चुका थां, पऱ उसके चेहरे पऱ एक् अजीब सां संशय औऱ गंभीरता थि। वोँ सीधेहॉल मे आया औऱ सोफे पऱ बैठते हुए मेरी तरफ़ देखने लगा।
"जितेश भइया! तुम् रातभर यहीं सोफे पर्र हि पड़ेरहे? तुमने बहोत तकलीफ उठाई हैं मेरेलिए दोस्त, " राघव नें पहले तोँ अहसानमंद आवाज़ मे कहा, पर्र फिन अचानक उसने रसीला कि तरफ़ देखा औऱ फिन मेरी तरफ़ मुड़ा।
"वैसे भइया.रात कों हॉल मे कोईबोल रहा थां क्याँ?" राघव नें अपनी आँखें सिकोड़ते हुए अचानक पूछा।
ये सुनते हि मेरेगले मे गरमचाय कां घूंट अटकते-अटकते बचा। मेरादिल एक् सेकंड केँ लिए मानो धड़कना भूल गय़ा।
राघवआगे बोला, "मुझेआधी रात कों नींद मे ऐसालगा जैसेकोई बहोत ज़ोर-ज़ोर सें रसीला कां नाम लेँ रहा थां। औऱ कुछ अजीब-अजीब बातें बुदबुदा रहा थां। जैसेकोई बहोत तड़परहा हौ। खिड़की खुली थि क्याँ?"
ये सुनते हि किचन मे खड़ी रसीला केँ हाथ सें गरमचाय कि केतली छूटते-छूटते बची। उसके चेहरे कां रंग पूरीतरह उड़ चुका थां। साला!रात कों रसीला केँ ख्यालों मे हाथ चलाते समय जोँ मे दीवानगी मे उसकानाम चिल्ला रहा थां, वोँ राघव केँ कानों तक पहुँच गई थि। भले हि वोँ नींद कि गोली केँ असर मे थां, पर्र उसके दिमाग़ नें वोँ आवाज़ पकड़ली थि।
मैंने जल्दी अपनी आवाज़ कों कड़क किया औऱ बात संभालते हुएकहा, "अरे राघव भइया, आपकोकोई वहमहुआ होगा। बाहर् इतनी तेज़ बिजली कड़करही थि औऱ तूफ़ानी हवाचल रही थि कि खिड़की केँ काँच बुरीतरह बजरहे थें। मे तौ स्वयं दिनभर कि थकान केँ बादऐसा सोया कि मुझे सुभह हि होशआया। "
रसीला नें भि जल्दी वहा सें अपनी काँपती आवाज़ मे संग दिया, "हाँ जी, हवा बहोत तेज़ थि। आपको दवाई केँ असर मे कुछ कां कुछ सुनाई दिया होगा। "
राघव नें हमारी तरफ़ देखा, उसकी आँखों मे पूरीतरह भरोसा तोँ नहि थां, पर्र उसनेबात आगे नहि बढ़ाई। उसने एक् ठंडी साँसली औऱ कहा, "चलो, शायद मौसम कां हि असर होगा। वैसेआज दोपहर कों फूफाजी आँ रहे हें, मुझे उनकेसंग किसी सरकारी टेंडर केँ सिलसिले मे शहर केँ बड़े बिजली दफ्तर जानां हैं। रसीला घऱ पर्र अकेली रहेगी, तुम् दोपहर मे जरा चक्कर मार लेना। "
राघव कि यहबात सुनते हि मेरे सीने केँ अंदर एक् नया बवंडर उठ खड़ाहुआ। दोपहर कों राघवघऱ पर्र नहि होगा, यानी वोँ पूरा मैदान सिर्फ़ मेरा औऱ रसीला कां होने वाला थां।
मे जल्दी अपनीटूल किट उठाकर सभी-स्टेशन केँ लिए निकल गय़ा। दुकान पऱ औऱ सभी-स्टेशन पर्र मेरामन एक् सेकंड केँ लिए भि नहि लगा। हाथ मे टेस्टर औऱ प्लास पकड़ते हुए भि दिमाग़ मे सिर्फ़ रसीला केँ वोँ गर्म होंठ, उसकी वोँ कड़क छाती औऱ दोपहर कां वोँ सन्नाटा घूमरहा थां।
आखिरकार, दोपहर केँ ठीकदो बजगए। पूराशहर इस तेज़धूप औऱ उमस मे अपने-अपने घरों मे दुबका हुआ थां। गलियों मे एकदम सन्नाटा थां। मैंने अपनी बाइक स्टार्ट कि औऱ उसे तेज़ भगाता हुआ सीधे राघव केँ घऱ केँ सामने आकर खड़ाकर दिया।
मेरादिल इस वक्त किसी नगाड़े कि तरह धड़करहा थां। मैंने आगे बढ़कर दरवाज़े पर्र दोबार हलकी दस्तक दि—'खट.खट। '
एक् सेकंड केँ अंदर हि कुंडी खुली औऱ सामने रसीला खड़ी थि। जैसे हि मैंने अंदरकदम रखा, उसने जल्दी पीछेहाथ करके दरवाज़े कि सांकल कों 'खट' सें चढ़ा दिया। पर्र उसके चेहरे पर्र वोँ कामुक बेताबी नहि, बल्कि एक् अजीब सां खौफ थां।
"क्याँ हुआ रसीला? इतनीडरी हुई क्यूं हैं?" मैंने उसकी काँपती हुईँ कलाई कों पकड़ते हुए पूछा।
"भइया। मेरादिल अभि भि काँपरहा हैं। सुभहजब राघवजी नें वोँ बात पूछी, तोँ मुझेलगा सभी समाप्त हौ गय़ा, " उसने हाँफते हुए मेरे सीने पर्र हाथरख दिया। "वोँ चले तौ गए हें, पऱ मुझेडर लगरहा हैं। "
"डर कि ऐसी कि तैसी रसीला। अब औऱ सबर नहि होता, " मैंने उसे सीधे दीवार सें सटा दिया औऱ मेरे होंठ उसके काँपते होंठों कि तरफ़ बढ़ने हि वाले थें कि। अचानक मेरे पैंट कि जेब मे रखा मोबाइल पागलों कि तरहबज उठा।
इस सन्नाटे मे मोबाइल कि रिंगटोन किसीबम धमाके जैसीलगी। मैंने झटके सें मोबाइल निकाला—स्क्रीन पर्र **'राघव भइया'** कां नामचमक रहा थां।
रसीला औऱ मैंने एक्-दूसरे कि तरफ़ देखा। दोनों केँ चेहरे कां रंगउड़ चुका थां। मैंने काँपती उंगलियों सें फोन रिसीव किया, "हाँ राघव भइया.कहो। "
"जितेश भइया." राघव कि आवाज़ दूसरी तरफ़ सें आँ रही थि, पर्र वोँ बहोत परेशान औऱ हड़बड़ाया हुआ थां। "भइया, एक् बहोत बड़ी मुसीबत हौ गई हैं। हमारी छोटी बेहन पिंकी। जौ शहर केँ हॉस्टल मे रहकर12वीं कि पढ़ाई कररही हैं। उसका अभि-अभि रोतेहुए मोबाइल आया थां। "
"पिंकी? क्याँ हुआउसे भइया?" मैंने पूछा, रसीला भि मेरे लगभग आँ गई औऱ कान लगाकर सुनने लगी।
"पता नहि भइया, वोँ मोबाइल पऱ साफ़-साफ़ कुछबोल नहि रही हैं, बसरोए जारही हैं। कहरही हैं कि हॉस्टल केँ बाहर् कुछ आवारा लड़के उसे परेशान कररहे हें औऱ वार्डन भि उसकीबात नहि सुनरही। वोँ बहोत डरी हुई हैं, " राघव नें हाँफते हुएकहा। "मे यहा फूफाजी केँ संग बिजली दफ्तर केँ साहेब कि केबिन मे फंसाहुआ हूं। ठेके केँ कागज़ात पर्र दस्तखत होँ रहे हें, मे इससमय वहा सें चाहकर भि नहि निकल सकता। जितेश भइया, मेरी बेहन कि इज़्ज़त कां प्रश्न हैं। तुम् जल्दी अपनी बाइक उठाओ औऱ पिंकी केँ हॉस्टल पहुँचो भइया! तुम्हारे अलावा मेरावहा कोई नहि हैं। "
राघव कि आवाज़ मे जौ लाचारी औऱ भरोसा थां, उसने मेरे अंदर केँ गुनाह केँ अहसास कों एक् बारफिन झकझोर दिया। एक् तरफ़ रसीला कां ये तड़पता हुआ शरीर मेरे सामने थां, जोँ कलरात सें अधूरी प्यास लिए खड़ी थि, औऱ दूसरी तरफ़ राघव कि 12वीं क्लास कि मासूम बेहन पिंकी, जौ शहर मे किसी बड़ी मुसीबत मे फंसी थि।
"ठीक हैं राघव भइया, तुम् फिक्र मतकरो। मे अभि इसी वक़्त अपनी बाइक सें शहर केँ लिए निकलरहा हूं। पिंकी कों कुछ नहि होने दूंगा, " मैंने कहा औऱ मोबाइल काट दिया।
मैंने रसीला कि तरफ़ देखा। उसकी आँखों मे इस वक़्त पिंकी केँ लिए चिंता भि थि औऱ मेरेदूर जाने कां वोँ अधूरापन भि।
"भइया। पिंकी केँ पास जाइए। वोँ अभि बच्ची हैं, पता नहि किसहाल मे होगी, " रसीला नें भारीमन सें कहा, पर्र उसकी उंगलियां अभि भि मेरे कुर्ते कों कसकर पकड़े हुएथीं।
मैंने आगे बढ़कर उसके दोनों गालों कों अपने हाथों मे लिया औऱ उसके माथे कों चूमते हुएकहा, "रसीला, पिंकी मेरी भि बेहन हैं। मे उसे संभालकर वापस लाऊंगा।
रसीला नें सिर्फ़ अपनी आँखें बंदकर लीं औऱ एक् गहरी सांसली। मैंने अपनीटूल किट उठाई, घऱ कां द्वार (दरवाज़ा) खोला औऱ धूप कों चीरते हुए अपनी बाइक सीधेशहर केँ हाईवे पर्र दौड़ा दि। मन मे अबदो हि बातें चलरही थीं—पिंकी हॉस्टल मे किस मुसीबत मे हैं, औऱ मेरे लौटने केँ बाद रसीला केँ संगये अधूरी आग क्याँ रूप लेगी!
हाईवे पऱ बाइक कि रफ़्तार अस्सी पारकर चुकी थि, पऱ मेरे दिमाग़ कि रफ़्तार उससे भि तेज़भाग रही थि। हवा केँ थपेड़े सीधे मेरे चेहरे पर्र लगरहे थें, मगर भीतरदो तरह कि आगलगी हुईँ थि। एक् तरफ़ रसीला कां वोँ तड़पता हुआ जिस्म, उसकी कड़क छाती कां वोँ अहसास औऱ वोँ अधूरी छूटी दोपहर मुझे पीछे खींचरही थि; औऱ दूसरी तरफ़ राघव कां वोँ अंधा भरोसा औऱ उसकी मासूम बेहन पिंकी कि सुरक्षा कां प्रश्न मुझेआगे धकेलरहा थां। ऊपर सें राघव कां वोँ सुभह वाला प्रश्न—"रात कों कोई रसीला कां नाम लेकर चिल्ला रहा थां क्याँ?"—मेरे कानों मे किसी हथौड़े कि तरह बार-बार बजरहा थां।
"साला, अगर राघव कों ज़रा भि पक्का शक हौ गय़ा, तौ ये पूराखेल शुरुआत होने सें पहले हि श्मशान बन जाएगा, " मैंने बड़बड़ाते हुए बाइक कां एक्सीलेटर थोडा औऱ खींच दिया।
लगभग पौने एक् घंटे कि अंधाधुंध ड्राइविंग केँ बाद, मे शहर केँ उस इलाके मे पहुंचा जहाँ पिंकी कां गर्ल्स हॉस्टल थां। दोपहर कि कड़कधूप अब ढलनेलगी थि, पर्र उमस अभि भि बरकरार थि। हॉस्टल कि गली केँ मोड़ पर्र पहुँचते हि मुझे माजरा समझ मे आँ गय़ा।
हॉस्टल केँ बड़े लोहे केँ गेट सें कुछ हि दूरी पर्र, एक् पान केँ टिन केँ टिपरे केँ पास तीन-चार आवारा लड़के अपनी बाइकों पर्र बैठेहुए थें। उनके हाथों मे सिगरेट थि औऱ वोँ जानबूझकर हॉस्टल कि खिड़कियों कि तरफ़ देखकर जोर-शोर सें हंसरहे थें, फब्तियां कसरहे थें।
मैंने अपनी बाइक सीधे हॉस्टल केँ गेट केँ सामने रोकी। स्टैंड लगाया औऱ टूलकिट सें अपना वोँ भारी वाला लोहे कां प्लास निकालकर चुपके सें अपनीकमर केँ पीछे पैंट मे खोंस लिया। एक् इलेक्ट्रिशियन केँ लिए उसका औजार हि उसका सबसे बड़ा हथियार होता हैं।
जैसे हि मे गेट केँ अंदर जानेलगा, उन लड़कों मे सें एक् नें जोर सें सीटी बजाई, "अबे ओए! बिजली वाले। अंदर सिर्फ़ लड़कियां रहती हें, तेरा फ्यूज उड़ने कि स्थान कहींकुछ औऱ नं उड़जाए!" बाकीसभी कमीनों कि तरह हंसने लगे।
मेराखून खौलउठा, पर्र मुझे पहले पिंकी कों देख्ना थां। मैंने उनकी तरफ़ एक् खूंखार नज़र डाली औऱ सीधे हॉस्टल केँ अंदरचला गय़ा।
वार्डन केँ केबिन कां द्वार (दरवाज़ा) खुला थां। अंदर पिंकी एक् कोने मे कुर्सी पऱ बैठी सुबकरही थि। उसका चेहरा डर केँ मारे सफेदपड़ चुका थां औऱ उसकी आँखों केँ नीचे रोने कि वजह सें काले घेरेबन गए थें। जैसे हि उसने मुझे देखा, वोँ अपनी कुर्सी सें उछली औऱ सीधेआकर मेरे सीने सें लिपट गई।
"जितेश भइया! आप् आँ गए। मुझे बहोत डरलगरहा थां भइया!" वोँ बुरीतरह काँपते हुए रोनेलगी। 12वीं मे पढ़ने वाली पिंकी अभि भि स्वभाव सें एकदम बच्ची थि। उसकाइस तरह मुझसे लिपटना औऱ 'भइया' पुकारना मेरे भीतर केँ उस पापी इंसान कों झकझोर गय़ा, जोँ कुछ हि देर पहले अपनीसगी बेहन रसीला केँ बदन कों नोचने केँ मंसूबे बनारहा थां। पर्र इस टाइम, मुझे रसीला कां भइया नहि, बल्कि पिंकी कां रक्षक बनना थां।
"शांत होँ जा पिंकी, रोमत। तेरा भइया आँ गय़ा हैं नं, अबकोई तुम्हे हाथ भि नहि लगा सकता, " मैंने उसकीपीठ थपथपाते हुएकहा औऱ सामने बैठी खूसट वार्डन कि तरफ़ देखा, जोँ बड़े धीरे-धीरे फाइलपलट रही थि।
"मैडम, आपकीनाक केँ नीचे हॉस्टल केँ बाहर् लड़के इस बच्ची कों परेशान कररहे हें, औऱ आप् यहा आहिस्ता बैठी हें? राघव भइया नें कहा कि आपने पिंकी कि शिकायत पऱ कोई एक्शन नहि लिया!" मेरी आवाज़ मे सभी-स्टेशन वाली कड़क आँ चुकी थि।
वार्डन नें चश्मा ठीक करतेहुए रूखे स्वर मे कहा, "देखो मिस्टर, हॉस्टल केँ अंदर कि ज़िम्मेदारी मेरी हैं। बाहर् रोड पऱ कौन खड़ा रहता हैं, वोँ पुलिस कां काम हैं। हम् हर लड़की केँ पीछे गार्ड नहि लगा सकते। औऱ वैसे भि, आजकल कि लड़कियां स्वयं हि."
"जुबान संभाल केँ मैडम!" मैंने केबिन कि मेज पर्र इतनीजोर सें हाथ मारा कि वहारखी पेपरवेट हिल गई। "अगर बाहर् पिंकी कों एक् खरोंच भि आई, तोँ पुलिस बाद मे आएगी, पहले मे इस हॉस्टल कां औऱ आपका वोँ हाल करूँगा कि आप् जॉब करनाभूल जाएंगी। "
वार्डन कां मुंहबंद हौ गय़ा। मैंने पिंकी कां हाथ पकड़ा, उसकाबैग उठाया औऱ कहा, "चल पिंकी, अपना सामान संभाल। तुँ अभि इसी वक़्त मेरेसंग घऱचलरही हैं। यहा रहने कि कोई ज़रूरत नहि हैं। "
जैसे हि मे पिंकी कों लेकर हॉस्टल केँ मुख्य गेट सें बाहर् निकला, वोँ चारों लड़के अपनी बाइकों सें उतरकर हमारे रास्ते मे आकर खड़े होँ गए। दोपहर कां सन्नाटा थां, गली मे कोई औऱ नहि थां।
"अबेओए, लड़की कों कहां लेकरजा रहा हैं? अभि तोँ हमारी बात भि पूरी नहि हुईँ इससे, "वही लड़का जिसने पहले सीटी बजाई थि, आगे बढ़कर बोला औऱ उसने पिंकी केँ दुपट्टे केँ कोने कों छूने कि कोशिश कि।
पिंकी डर केँ मारे मेरे पीछेछिप गई।
मेरासबर कां बांधअब पूरीतरह टूट चुका थां। मैंने बिना एक् सेकंड गंवाए, अपनी पैंट केँ पीछे सें वोँ भारी लोहे कां प्लास निकाला औऱ पूरी ताक़त सें उस लड़के केँ मुंह पर्र दे मारा।
*'चटाक!'* कि एक् भयानक आवाज़ हुई। प्लास सीधे उसके जबड़े पऱ लगा। उसके मुंह सें खून कां फव्वारा छूटा औऱ दो दांत टूटकर सीधेरोड पऱ गिरे। वोँ चीखता हुआ ज़मीन पर्र बैठ गय़ा।
"बहनचोद! हाथ केसे लगाया तूनेउसे!" मे पूरीतरह हैवान बन चुका थां। बाकी केँ तीन लड़के कुछसमझ पाते, इससे पहले हि मैंने दूसरे केँ पेट मे अपनी भारीबूट कां ऐसालात मारा कि वोँ नाली मे जा गिरा। तीसरे औऱ चौथे नें जब देखा कि ये इलेक्ट्रिशियन नहि, कोई कसाई हैं, तोँ वोँ अपने घायल दोस्तों कों उठाने कि बजाय अपनी बाइक स्टार्ट करकेवहा सें नौदो ग्यारह हौ गए।
मैंने जमीन पऱ तड़परहे उस पहले लड़के कि शर्ट कां कॉलर पकड़ा, उसेऊपर उठाया औऱ उसकेखून सें सने चेहरे केँ पास अपना प्लास लें जाकर कड़क आवाज़ मे कहा, "आज केँ बादअगर इस हॉस्टल कि तरफ़आँख उठाकर भि देखा, तौ अगलीबार इस प्लास सें तेरी नसें खींच दूंगा। समझा!"
उसनेडर केँ मारेहाँ मे सिर हिलाया। मैंने उसे झटका देकर गिराया, पिंकी कां हाथ पकड़ा जौ फटी आँखों सें अपनेइस 'भइया' कां ये रौद्र रूपदेख रही थि।
"बैठ बाइक पऱ पिंकी, " मैंने कहा।
पिंकी चुपचाप बाइक पर्र पीछेबैठ गई औऱ उसनेडर औऱ गर्व केँ मारे मेरीपीठ कों कसकर पकड़ लिया। मैंने बाइक स्टार्ट कि औऱ उसे वापस गाँव केँ हाईवे कि तरफ़ मोड़ दिया।
साम केँ लगभगचार बजरहे थें। सूरज ढलने कों थां। मेरी बाइक वापस राघव केँ घऱ कि गली मे मुड़ी। मन मे अब एक् नयाजाल बुनरहा थां। पिंकी कों मे सुरक्षित लें आया थां, राघव कां मुझ पर्र भरोसा अब ईश्वर जैसा होने वाला थां। पऱ असलीखेल तोँ अब शुरुआत होना थां। क्योंकि घऱ केँ अंदर रसीला अकेली थि, औऱ उसेये नहि पता थां कि मे पिंकी कों संग लेकरलौट रहा हूं।
जैसे हि मैंने राघव केँ घऱ केँ सामने बाइक रोकी, मेरेदिल कि धड़कन फिन सें बढ़ने लगी। पिंकी बाइक सें उतरी औऱ दौड़कर सीधेघऱ कां द्वार (दरवाज़ा) खटखटाने लगी। अंदर सें जैसे हि कुंडी खुली, सामने रसीला खड़ी थि। पिंकी कों सही-सलामत देखकर रसीला कि आँखों मे आंसू आँ गए, पऱ जैसे हि उसकी नज़र पिंकी केँ पीछे खड़ेमुझ पर्र पड़ी, हमारी आँखें मिलीं।
मेरी आँखों मे वही पुरानी भूख, वही वासना औऱ वही कड़कपन साफ़ थां, जौ कहरहा थां—"पिंकी कां फ़र्ज़ पूराहुआ रसीला। अबइस भइया कि भूख मिटाने कि बारी तेरी हैं। "
पिंकी कों सही-सलामत देखकर रसीला नें उसे जल्दी गले सें लगा लिया। पिंकी रोते-रोते रसीला कों हॉस्टल कि बात औऱ रास्ते मे हुई लड़ाई केँ बारे मे बताने लगी। रसीला उसकीपीठ थपथपा रही थि, मगर उसकी नज़रें लगातार दरवाज़े पर्र खड़ेमुझ पर्र टिकीथीं। मेरी आँखों कि वोँ पुरानी भूख औऱ पैंट केँ अंदरमची वोँ तड़प देखकर रसीला कां पूरा शरीर अंदर हि अंदर काँपरहा थां।
पिंकी जैसे हि हाथ-मुँह धोने केँ लिए अंदर केँ कमरे मे गई, मैंने बिना एक् समय गंवाए आगे बढ़कर हॉल कां मुख्य द्वार (दरवाज़ा) बंद किया औऱ सांकल चढ़ा दि।
रसीला पलटकर किचन कि तरफ़ भागने हि वाली थि कि मैंने उसका मार्ग रोका औऱ उसे सीधे दीवार सें सटा दिया। दोपहर कां वोँ अधूरापन मेरे दिमाग़ कि नसों कों फाड़रहा थां।
"भइया। प्लीज, पिंकी अंदर हैं। कोई आँ जाएगा, " रसीला नें घबराकर दबी आवाज़ मे कहा, उसकी साँसें तेज़ हौ चुकीथीं।
"पिंकी अभि कपड़े बदलरही हैं, उसेआने मे पाँच मिनट लगेंगे, " मैंने उसकी एक् नं सुनी।
मैंने अपना दाहिना हाथ सीधे उसके नीले कुर्ते केँ ऊपर सें उसकी बाईं छाती पऱ रख दिया। बिना ब्रा केँ वोँ कड़क मांस कां लोथड़ा मेरी हथेली मे आते हि रसीला केँ मुँह सें एक् तीखी सिसकी निकली—"ऊँहूँ। भइया."
"कल रात सें तड़पा रखा हैं तूने मुझे रसीला, " मैंने उसकेकान केँ पास अपना मुँह लेँ जाकर पूरी कामुकता सें फुसफुसाया। मेरा दूसरा हाथ उसके कुर्ते केँ नीचे सें होताहुआ उसकी पटियाला सलवार केँ ऊपर आँ गय़ा। मैंने कपड़े केँ ऊपर सें हि उसकी दोनों जाँघों केँ बीच, उस रेशमी गुफा वाले हिस्से पर्र हाथरखा औऱ अपनी हथेलियों सें उसे आरामसे सहलाना शुरुआत किया।
कपड़े कि बंदिश केँ बावजूद मेरी उंगलियों कां दबाव उसकीउस भीगी हुई बुर केँ मुहाने पऱ साफ़ महसूस हौ रहा थां। रसीला नें मज़े औऱ डर केँ मारे अपनी आँखें कसकर भींचलीं। उसने अपनी दोनों टाँगें आपस मे सटाने कि कोशिश कि, जिससे मेरी हथेलियों पर्र उसकी बुर कां रगड़ाव औऱ भि गहरा होँ गय़ा।
"भइया.अहह। मतकरो। पिंकी आँ जाएगी। प्लीज, " वोँ बेबसी सें बेचैनी रही थि, पर्र स्वयं अपनीकमर कों मेरेहाथ कि तरफ़ धकेल भि रही थि।
मैंने उसकी छाती कों ऊपर सें एक् बार औऱ कसकर भींचा औऱ उसकी बुर कों सहलाते हुए अपनी उंगलियों कां एक् कड़क स्ट्रोक ऊपर सें हि मारा। रसीला कां पूरा शरीर धनुष कि तरह अकड़ गय़ा। वोँ पूरीतरह पिघलने हि वाली थि कि अचानक अंदर केँ कमरे केँ दरवाज़े कि कुंडी खुलने कि आवाज़ आई—'खट। '
रसीला नें झटके सें मुझे पीछे धकेला औऱ अपने कुर्ते कों संभालते हुए जल्दी किचन कि तरफ़भाग गई। मे भि अपनी पैंट कों ठीक करताहुआ सोफे पर्र बैठ गय़ा। मेरी पैंट केँ अंदर मेरा वोँ सख्त लोहाइस अधूरी उतावलापन केँ मारेफटा जारहा थां। तभी पिंकी बाहर् आई, औऱ उसकेठीक दो मिनटबाद हि बाहर् दरवाज़े पर्र दस्तक हुई।
राघव फूफाजी केँ संग वापसलौट आया थां।
पिंकी कों घऱ पर्र देखकर राघव कि आँखों मे आँसू आँ गए। जब पिंकी नें उसे बताया कि केसे मैंने हॉस्टल केँ बाहर् उन गुंडों कों दौड़ा-दौड़ा कर पीटा, तौ राघव नें आगे बढ़कर मुझेगले सें लगा लिया।
"जितेश भइया.आज तुमने मेरी बेहन कि इज़्ज़त बचाली। तुम् नं होते तोँ पता नहि क्याँ हौ जाता। इस अहसान कों मे जीवनभर नहि भूलूँगा, " राघव भावुक होकरबोल रहा थां।
मुझे अंदर हि अंदर अपनेइस पापीरूप पऱ हंसी आँ रही थि। जिस राघव कि बेहन कि इज़्ज़त मैंने बाहर् बचाई थि, उसी केँ घऱ केँ अंदर, उसी कि पत्नि औऱ अपनीसगी बेहन रसीला केँ बदन कों मे कपड़ों केँ ऊपर सें मसलकर आया थां। राघव कि आँखों कां वोँ अंधा भरोसा हमारे इसखेल कों औऱ भि खतरनाक बनारहा थां।
उसदिन केँ बाद सें घऱ कां माहौल पूरीतरह बदल गय़ा। पिंकी केँ डर कि वजह सें राघव नें तय किया कि वोँ अबउसे उस हॉस्टल मे नहि पढ़ेगा। पिंकी अबघऱ पर्र हि रहनेलगी थि, जिसकी वजह सें मेरा औऱ रसीला कां अकेले मिलना बिल्कुल मुमकिन नहि हौ पारहा थां।
दिन बीतते जारहे थें, औऱ हमारी यह तड़प एक् खौफनाक आग कां रूप लेतीजा रही थि। जब भि मे साम कों सभी-स्टेशन सें लौटकर राघव केँ घऱआता, तौ रसीला कि आँखें मुझे देखकर प्यासी बिल्लियों कि तरह चमकने लगतीथीं। घऱ मे पिंकी औऱ राघव केँ होने कि वजह सें हम् कुछकर नहि पाते थें, पऱ तड़प बढ़ाने कां कोई मौका नहि छोड़ते थें।
कभी रसीला किचन मे गरमचाय छानरही होती औऱ पिंकी अंदर होती, तोँ मे चुपके सें पीछे सें जाता औऱ जानबूझकर अपना कड़क शरीर उसकीपीठ औऱ चूतड़ों सें सटा देता। रसीला डर केँ मारे काँप उठती, पर्र अपनीकमर कों पीछे कि तरफ़ हलका सां दबा देती।
जब कभी पाँच मिनट केँ लिए अकेले मे मौका मिलता, तौ मे उसकेपास जाकर बेहद गंदी औऱ कामुक बातें करता।
"रसीला। साली, यह पटियाला सलवार पहनना बंदकर दे। जब तुँ चलती हैं औऱ इसके कपड़े कि सरसराहट होती हैं, तोँ दुकान पर्र बैठे-बैठे मेरा लैंड पैंट फाड़ने कों सजधजकर होँ जाता हैं, " मे उसकेकान मे धीरे-धीरे सें कहता।
रसीला शर्माकर अपनी सहेली कि तरह मुस्कुराती औऱ दबी आवाज़ मे बोलती, "तौ मत देखाकरो भइया। वैसे भि रात कों जब वोँ (राघव) मेरेपास सोते हें, तोँ मुझे सिर्फ़ तुम्हारी वोँ बातें यादआती हें। मेरा शरीर पूरीरात पानी छोड़ता रहता हैं। "
हमारी इन गंदी बातों औऱ कभी-कभार कोने मे कपड़ों केँ ऊपर सें छाती भींचने केँ छोटे-छोटे मौकों नें उस बेचैनी कों उस मुकाम पर्र पहुंचा दिया थां, जहाँ हम् दोनों बस फटने हि वाले थें।
### पिंकी कां नया एडमिशन औऱ ट्रेन कां सफ़र
आखिरकार, लगभगदो हफ्ते बाद राघव नें अपने एक् दूर केँ रिश्तेदार कि सहायता सें पिंकी कां एडमिशन शहर सें बहुतदूर, एक् दूसरे बड़े बोर्डिंग विद्यालय मे करवा दिया। वोँ स्थान यहा सें लगभगआठ घंटे केँ ट्रेन केँ सफ़र पर्र थि।
चूँकि राघव कां नया सरकारी टेंडर शुरुआत हौ चुका थां औऱ वोँ काम मे बहोत बुरीतरह फंसाहुआ थां, उसने एक् बारफिन मुझ पर्र अपना वोँ अंधा भरोसा जताया।
"जितेश भइया, पिंकी कां नया विद्यालय बहोत दूर हैं। मेराइस समय जानां मुमकिन नहि हैं। क्याँ तुम् औऱ रसीला जाकर पिंकी कों वहा छोड़ आओगे? तुम् संग रहोगे तोँ मुझेकोई फिक्र नहि होगी, " राघव नें हाथ जोड़ते हुएकहा।
साला!जब उसनेये कहा, तोँ मेरे औऱ रसीला केँ दिल कि धड़कनें रुकगईं। राघव स्वयं अपनी पत्नि औऱ अपनी बेहन कों मेरेसंग आठ घंटे केँ ट्रेन केँ सफ़र पर्र भेजरहा थां, औऱ वोँ भि रात कि ट्रेन मे! हमें अच्छी तरहपता थां कि इस सफ़र मे पिंकी तौ होगी, पऱ ट्रेन केँ उस कूपे (Cabin) केँ अंधेरे मे रसीला कि वोँ आख़िरी दीवार पूरीतरह ढहने वाली थि।
ट्रेन कि टिकटें बुक हौ चुकीथीं। रात केँ ठीकनौ बजे हम् तीनों—मे, रसीला औऱ पिंकी—स्टेशन पहुँचे। रसीला नें आज जानबूझकर एक् हलकी सूती साड़ी पहनी थि, जिसकी पतलीपरत केँ पार सें उसकीकमर कि गोलाई साफ़झलक रही थि। पिंकी अपनेनए विद्यालय कों लेकर थोड़ी नर्वस थि, पर्र रसीला औऱ मेरे चेहरे पऱ उसआने वाले तूफ़ान कि बेचैनी साफ़ देखीजा सकती थि।
ट्रेन स्टेशन पर्र आकर रुकी। हम् अपनी थ्री-टियर एसी (3AC) बोगी केँ अंदर दाखिल हुए। हमारा कूपे बिल्कुल कोने मे थां। पिंकी कों ऊपर कि सीट मिली थि, जबकि नीचे कि दो सीटें मेरे औऱ रसीला केँ नामथीं।
ट्रेन नें एक् लंबा हॉर्न मारा औऱ आरामसे स्टेशन सें आगे बढ़ने लगी। रात केँ ग्यारह बजते-बजते पिंकी थककरऊपर कि सीट पऱ चढ़ गई औऱ कंबल ओढ़कर सो गई। बोगी कि मुख्य लाइटें बुझा दि गईं औऱ सिर्फ़ एक् मद्धम नीली नाइट-लैंप जलरही थि।
ट्रेन कि 'खट-खट। खट-खट' कि आवाज़ केँ बीच, उस नीले अंधेरे मे नीचे कि सीट पऱ मे औऱ मेरी बेहन रसीला अब बिल्कुल आमने-सामने थें। इतने दिनों कि वोँ अधूरी बेचैनी, वोँ दबाहुआ क्रोध औऱ वोँ प्यास। अबइस भागती हुइ ट्रेन केँ सन्नाटे मे अपना पूरा हिसाब चुकता करने केँ लिए रेडी थि।
नीली नाइट-लैंप कि मद्धम रोशनी मे ट्रेन कि 'खट-खट' कि आवाज़ किसी धड़कन कि तरह गूँजरही थि। ऊपर कि सीट पऱ पिंकी गहरी नींद मे सो चुकी थि। नीचे कि सीट पर्र रसीला दीवार सें सटकर बैठी थि, उसकी साड़ी कां पल्लू खिसककर उसकीकड़क छाती सें नीचेगिर चुका थां।
मैंने अपनीसीट सें उठकर रसीला केँ बगल वाली स्थान पऱ कब्ज़ा जमा लिया। इतने दिनों कां सूखा औऱ तड़प मेरी नसों मे बिजली कि तरहदौड़ रही थि। मैंने जैसे हि उसकाहाथ पकड़ा, रसीला नें थरथराते हुए अपनी आँखें बंदकर लीं।
"भइया.मत करो, कोई देख लेगा। पिंकी ऊपर हि हैं, " उसकी फुसफुसाहट मे हमेशा कि तरहवही डर औऱ मज़ा घुलाहुआ थां।
"पिंकी सोरही हैं रसीला। औऱ आज केँ बाद मे औऱ सबर नहि कर सकता, " मैंने कड़क आवाज़ मे कहा औऱ अपनाहाथ सीधे उसकी पतली, नंगीकमर पर्र रख दिया। सूती साड़ी केँ पार सें उसकी त्वचा कि जौ गर्माहट मेरे हाथों कों लगी, मेरा लैंड पैंट केँ अंदर पूरी ताक़त सें अकड़ गय़ा।
मैंने उसे अपनीतरफ़ खींचा औऱ मेरे होंठ उसके काँपते हुए होंठों पर्र जमगए। इतने दिनों कि प्यास एक् झटके मे बाहर् आँ गई। मे पागलों कि तरह उसके निचले होंठ कों चूसने लगा, औऱ रसीला भि अपनी सारी मर्यादा भूलकर मेरे बालों मे उंगलियाँ फंसाकर इस चुंबन कां जवाब देनेलगी। ट्रेन केँ उस कोने वाले कूपे मे हमारी साँसों कि 'सूप-सूप' कि आवाज़ गूँजने लगी।
मेराहाथ उसकी साड़ी केँ पल्लू कों पूरीतरह हटाकर उसके ब्लाउज केँ ऊपर पहुँच गय़ा। इतने दिनों सें जिस छाती कों मात्र कपड़ों केँ ऊपर सें सहलाया थां, आजउसे उंगलियों मे भींचते हि रसीला केँ मुँह सें सिसकी निकली—"मम्म। भइया। आहह-आहह."
मैंने बिनादेर किए अपना दूसरा हाथ उसकी साड़ी केँ नीचे सरकाया औऱ उसकी पेटीकोट केँ अंदरडाल दिया। उसकी रेशमी, गर्म जाँघों कों सहलाते हुएजब मेरी उंगलियाँ उसकी गीली बुर केँ मुहाने पऱ पहुँची, तोँ वहा कां चिपचिपापन बतारहा थां कि वोँ भि इससमय केँ लिए कितनी तड़परही थि। मे पेटीकोट केँ अंदर हि उसकी बुर कों पूरी ताक़त सें सहलाने लगा, रसीला मज़े केँ मारे अपनीकमर कों मेरे पैंट केँ सख्त उभार पऱ बार-बार रगड़रही थि।
खेल अपनेचरम पऱ थां, बसकुछ हि मिनटों मे रसीला कि वोँ आख़िरी दीवार ढहने वाली थि। कि तभी.
ट्विस्ट: बोगी कां दरवाज़ा औऱ एक् अनजान साया
अचानक, हमारे कूपे केँ बाहर् वाली लोहे कि जालीदार गैलरी मे किसी केँ भारी जूतों कि आवाज़ हुइ—'खट। खट.खट.'
रसीला नें झटके सें अपनी आँखें खोलीं औऱ डर केँ मारे मुझे पीछे धकेल दिया। उसने जल्दी अपना पल्लू संभाला औऱ खिड़की कि तरफ़ मुंह करकेबैठ गई। मैंने भि अपनी पैंट कों संभाला औऱ गहरी साँसें लेतेहुए बाहर् गलियारे कि तरफ़ देखा।
नीली रोशनी मे एक् लंबा, तगड़ा व्यक्ति हमारे कूपे केँ ठीक सामने आकररुक गय़ा। उसकेगले मे कालेरंग कां मफलर थां औऱ उसकी आँखें सीधे हमारी सीट पऱ टिकीथीं। रात केँ दोबजे इस सुनसान बोगी मे उसकाइस तरहखड़ा होना मेरे रोंगटे खड़ेकर गय़ा।
"टिकट दिखाइए." उस व्यक्ति नें बहोत हि भारी औऱ ठंडी आवाज़ मे कहा।
वोँ टीटीई (TTE) थां, पर्र उसके कपड़े औऱ उसका लहजा किसी सरकारी अफसर जैसा नहि लगरहा थां। मैंने जेब सें टिकट निकाला औऱ उसकीतरफ़ बढ़ाया। उसने टिकट पर्र नाम देखा—जितेश, रसीला, पिंकी।
उसने टिकट मुझे वापस दिया, पर्र उसकी गंदी औऱ शातिर नज़रें रसीला कि उस अस्त-व्यस्त साड़ी औऱ उसके चेहरे कि लाली पऱ टिकगईं। वोँ सभीसमझ चुका थां कि बंद अंधेरे मे यहा क्याँ चलरहा थां।
"अगला स्टेशन आने वाला हैं। रात कों कूपे केँ पर्दे खुलेरखा करो, रेलवे मे आवारगी कि इज़ाज़त नहि हैं, " उसने एक् शैतानी मुस्कान केँ संग मुझसे कहा औऱ फिन धीरे-धीरे सें बुदबुदाया, "बेहन केँ संगसफ़र कररहे हौ। याँ किसी औऱ कि अमानत केँ संग?"
ये सुनते हि मेरे शरीर मे क्रोध औऱ खौफ एक् संगदौड़ गय़ा। क्याँ इस व्यक्ति कों हमारे बारे मे कुछपता थां, याँ वोँ मात्र हमें ब्लैकमेल करने कि कोशिश कररहा थां?
इससे पहले कि मे उसेकुछ जवाब देता, वोँ अंधेरे गलियारे मे आगेबढ़ गय़ा। रसीला कां पूरा शरीरडर केँ मारे थर-थर काँपरहा थां, "भइया। वोँ कौन थां? उसनेऐसा क्यूं कहा? क्याँ राघवजी नें."
उस टीटीई कि गंदी मुस्कान औऱ उसकी वोँ अजीबबात मेरे दिमाग़ कि नसों मे हथौड़े कि तरह बजनेलगी। वोँ अंधेरे गलियारे मे आगे तौ बढ़ गय़ा, पर्र मेरे औऱ रसीला केँ बीच जोँ वासना कां भूत सवार थां, उसे एक् लम्हा मे जैसेकाठ मार गय़ा। रसीला नें डर केँ मारे साड़ी कां पल्लू अपनेगले तक कस लिया थां औऱ उसकी आँखें फटी कि फटीरह गई थीं।
"भइया। वोँ कौन थां? उसनेऐसा क्यूं कहा कि किसी औऱ कि अमानत केँ संग होँ? क्याँ राघवजी नें हमारे पीछे." रसीला कि आवाज़ डर केँ मारे लड़खड़ा रही थि, वोँ रोने कि कगार पऱ थि।
"चुपकर रसीला! रोमत, पिंकी जाग जाएगी, " मैंने दबी आवाज़ मे उसे डांटते हुएकहा, फिरभी अंदर सें मेरा स्वयं कां कलेजा मुंह कों आँ रहा थां। "वोँ सालाकोई ब्लैकमेलर होगा याँ कोई ठरकी टीटीई। रात केँ अंधेरे मे हमेंइस तरह लगभग बैठा देखकर अपनी औकात दिखारहा थां। तुँ फिक्र मतकर, तेरेइस भइया केँ रहतेकोई कुछ नहि उखाड़ सकता। "
मैंने बाहर् गलियारे कि तरफ़ झाँककर देखा, दूर-दूर तक कोई नहि थां। सिर्फ़ ट्रेन कि वोँ 'खट-खट' कि आवाज़ औऱ बोगी कि वोँ मद्धम नीली लाइटजल रही थि। रसीला अभि भि थर-थर काँपरही थि। उसकाये डर मुझसे देखा नहि गय़ा। मे फिन सें अपनीसीट सें उठा औऱ उसके बिल्कुल पास जाकरबैठ गय़ा।
"रसीला। डरमत मेरीजान, मे हूं न्, " मैंने उसके काँपते कंधों पऱ हाथरखा।
"नहि भइया, मुझे बहोत अजीबलग रहा हैं। ऐसालग रहा हैं जैसेकोई हमेंदेख रहा हैं। आज रहनेदो। प्लीज भइया, वापस चलेंगे तबदेख लेंगे, " उसने मेरेहाथ कों हटाने कि कोशिश कि।
पऱ साला, मेरे अंदर कि भूखइस वक़्त अपनेचरम पर्र थि। इतने दिनों कि वोँ अधूरी उतावलापन, वोँ कोने मे कपड़ों केँ ऊपर सें छाती भींचना, वोँ बुर सहलाना। औऱ अभि कुछदेर पहले जौ उसके पेटीकोट केँ अंदर मेरी उंगलियों कों उसकी गीली गुफा कां स्वाद मिला थां, उसने मेरे दिमाग़ कों सुन्न कर दिया थां। इस टाइम मुझे न् राघव कां डर थां, नं उस टीटीई कां।
"रसीला, जौ डरता हैं वोँ कभीइस सुख कों नहि भोग पाता। तुँ बस अपनी आँखें बंदकर लें, " मैंने उसकी एक् नं सुनी औऱ उसे अपनी मज़बूत बाहों मे भींच लिया।
इस बार मैंने कोई जल्दबाज़ी नहि कि। उस नीले अंधेरे कां फायदा उठाते हुए मैंने धीरे-धीरे सें उसकी साड़ी केँ पल्लू कों फिन सें हटाया। रसीला नें एक् बार मुझे रोकने केँ लिए अपनाहाथ उठाया, पऱ जैसे हि मेरे होंठ उसकी गर्दन केँ नीचे, उसके कॉलरबोन पर्र जमे, उसके मुँह सें एक् दबी हुइ अहह निकल गई—"ऊँहह। भइया."
ब्लाउज केँ हुक पहले सें हि ढीले थें। मैंने अंधेरे मे हि बिना देखे अपनी उंगलियों सें उसके ब्लाउज कों सामने सें पूरीतरह खोल दिया। अंदर वोँ कड़क, भरी हुई दोनों छातियाँ आज़ाद हौ चुकीथीं। जब मैंने अपनी गर्म हथेलियों मे उन दोनों गोलों कों एक् संग दबोचा, तोँ रसीला कां पूरा शरीर सोफे कि सीट पऱ पीछे कि तरफ़झुक गय़ा। वोँ इतनी कड़कथीं कि मेरी हथेलियाँ छोटीपड़ रहीथीं। मे अंधेरे मे हि झुककर अपने मुँह सें उसकीउन कतरनों कों चूसने लगा। रसीला नें मज़े केँ मारे अपने दोनों हाथ मेरीपीठ पर्र कसदिए औऱ उसके नाखून मेरी शर्ट कों फाड़कर मेरी त्वचा मे धँसने लगे।
"आहह-आहह। भइया। धीरे-धीरे। पिंकी जाग जाएगी." वोँ मज़े औऱ डर केँ उस अनोखे नरक मे गोतेखा रही थि।
मैंने हाथ नीचे सरकाया। पेटीकोट कां नाड़ा खोलने कि स्थान, मैंने उसके ढीले कपड़े कों सीधेऊपर कि तरफ़ सरका दिया। उसकी नंगी, मखमली जांघें अब मेरी उंगलियों केँ नीचेथीं। जैसे हि मेराहाथ उसकी दोनों जांघों केँ बीचउस गीली बुर पर्र पहुंचा, मुझे साफ़ महसूस हुआ कि डर केँ बावजूद उसकी गुफा सें पानी कां सैलाब बहरहा थां। मे अपनीदो उंगलियाँ उसकीउस भीगी हुई दरार पऱ रखकर ऊपर-नीचे तेज़ रफ़्तार सें रगड़ने लगा।
रसीला कां शरीरइस टाइम किसीकटी हुई मछली कि तरह उतावलापन रहा थां। वोँ अपनीकमर कों बार-बार ऊपरउठा रही थि ताकि मेरी उंगलियों कां दबाव औऱ गहरा होँ सके।
"ओह भइया। मम्म.मर गई। क्याँ कररहे हौ." वोँ मदहोशी मे बुदबुदा रही थि।
तभी, उस अंधेरे मे मुझसे एक् बहोत बड़ीभूल होँ गई। दीवानगी केँ उस मोड़ पर्र, जब मेरी उंगलियाँ पूरी ताक़त सें उसकी बुर कों सहलारही थीं औऱ मेरा मुँह उसकी छाती पर्र थां, रसीला केँ मुँह सें मज़े कि वोँ आख़िरी चीख निकलने हि वाली थि कि। अचानक ऊपर कि बर्थ सें कंबल केँ सरकने कि आवाज़ आई।
औऱ उसकेठीक बाद, एक् मासूम, नींद सें भरी आवाज़ उस नीले अंधेरे कों चीरती हुई नीचे आई—"दिदी। पानी देना। बहोत प्यास लगी हैं। "
वोँ पिंकी थि!
ये आवाज़ सुनते हि जैसे हमारे ऊपर किसी नें बर्फ़ कां ठंडा पानीडाल दिया हौ। रसीला नें एक् झटके मे मेरेहाथ कों अपनी टांगों केँ बीच सें बाहर् फेंका औऱ पागलों कि तरह अपने खुलेहुए ब्लाउज कों समेटने लगी। मेरा साला जौ लोहा पूरी ताक़त सें पैंट फाड़कर बाहर् आने कों बेताब थां, वोँ एक् सेकंड मे खौफ केँ मारे सुकड़ गय़ा।
अंधेरे मे भूलये हुईँ कि हड़बड़ाहट मे रसीला कां हाथसीट पर्र रखे पानी केँ बोतल कि स्थान नीचेरखे मेरेटूल किट सें टकरा गय़ा औऱ वोँ भारी लोहे कां प्लास 'झनझना' कर ट्रेन केँ फर्श पर्र गिर पड़ा। उस सन्नाटे मे वोँ आवाज़ इतनी तेज़ थि कि बोगी केँ दूसरे कोने सें भि किसी केँ खाँसने कि आवाज़ आई।
मे फुर्ती सें अपनीसीट कि तरफ़ पीछेहटा औऱ अंधेरे मे हि नीचे गिरा प्लास उठाने केँ लिए झुका। मेरादिल इस टाइम इतनी ज़ोर सें धड़करहा थां कि मुझेलग रहा थां पिंकी कों नीचे तक उसकी आवाज़ सुनाई देरही होगी।
"हाँ। हाँ पिंकी, रुक। मे देती हूं पानी, " रसीला नें अपनी पूरी ताक़त लगाकर अपनी आवाज़ कों नॉर्मल करतेहुए कहा, जबकि उसकेहाथ अभि भि ब्लाउज केँ हुकबंद करने मे काँपरहे थें।
मैंने अंधेरे मे हि बोतल उठाई औऱ रसीला कि तरफ़ बढ़ा दि। रसीला नें ऊपर उठकर पिंकी कों पानी दिया। पिंकी नें दो घूंट पानी पिया, बोतल वापस दि औऱ कहा, "नीचे इतनी आवाज़ किस चीज़ कि हुइ दिदी? औऱ आप् इतनी तेज़-तेज़ साँस क्यूं लें रही हौ? आपकी तबीयत तौ ठीक हैं नं?"
रसीला नें खिड़की कि तरफ़ देखते हुएकहा, "कुछ नहि पिंकी। वोँ हवा बहोत तेज़ हैं बाहर्, औऱ खिड़की कां कांचबजा थां। तुँ सोजा। "
पिंकी वापसलेट गई। पर्र नीचे, उस नीले अंधेरे मे, मे औऱ रसीला अब एक्-दूसरे कां चेहरा भि नहि देखपा रहे थें। साला, वासना कां वोँ पूराभूत एक् समय मे गायब हौ चुका थां औऱ उसकी स्थान लेँ ली थि उसखौफ नें, जिसने हमेंये अहसास करा दिया थां कि हम् कितनी बड़ीआग सें खेलरहे हें। ट्रेन अपनी रफ़्तार सें भागीजा रही थि, पर्र कूपे केँ अंदर कां वोँ सन्नाटा अब जानलेवा होँ चुका थां।
सुभहजब ट्रेन उस अजनबी शहर केँ स्टेशन पर्र रुकी, तोँ हम् दोनों कि आँखों मे रातभर जागने कि थकान औऱ वोँ खौफ साफ़दिख रहा थां। पिंकी केँ नए बोर्डिंग विद्यालय पहुँचकर एडमिशन कां सारा कागज़ी काम निपटाते-निपटाते साम केँ सातबज गए। विद्यालय केँ हॉस्टल केँ नियमों केँ मुताबिक, पैरेंट्स याँ गार्जियन रात कों वहा नहि रुक सकते थें। राघव कां मोबाइल आया कि रात कि कोई ट्रेन नहि हैं, इसलिये हम् दोनों कों शहर केँ हि किसी होटल मे रुकना होगा औऱ पिंकी कों सुभह ग्यारह बजे फाइनल शिफ्टिंग केँ लिए विद्यालय छोड़ना होगा।
विद्यालय सें बाहर् निकलते हि आसमान मे काले बादलघिर आए थें औऱ मूसलाधार बारिश शुरुआत हौ गई। पिंकी कां सामान औऱ हम् दोनों पूरीतरह भीग चुके थें। मैंने रेलवे स्टेशन केँ पास हि एक् साधारण सां होटल देखा औऱ हम् तीनों अंदरचले गए।
काउंटर पऱ बैठे मैनेजर नें हमें घूरा। मैंने बिनाकोई रिस्क लिए सीधेकहा, "दो कमरे चाहिए। एक् मे यह दोनों लेडीज रहेंगी, औऱ एक् मे मे। "
मैनेजर नें हमेंरूम नंबर 203 औऱ 204 कि चाबियाँ थमादीं। दोनों कमरे बिल्कुल आमने-सामने थें। रूम केँ अंदर पूरीतरह अंधेरा थां क्योंकि उस पूरे इलाके कि बिजली गुल हौ चुकी थि। वेटर नें दोनों रूम मे एक्-एक् मोमबत्ती जलाकर रख दि।
भीगने कि वजह सें पिंकी औऱ रसीला जल्दी अपने कमरे (203) मे कपड़े बदलने औऱ आराम करनेचली गईं। मे अपने कमरे (204) मे आया। भारीउमस, दिनभर कि थकावट औऱ रात केँ उस अधूरेपन केँ मारे मेरा दिमाग़ फटाजा रहा थां। मुझसे औऱ सबर नहि हुआ, तौ मैंने चुपके सें अपनेबैग सें किंगफिशर बियर कि वोँ कैन निकाली जिसे मैंने स्टेशन सें आतेसमय रास्ते मे छुपाकर खरीदा थां। कमरे केँ सन्नाटे मे मैंने वोँ कड़क ठंडी बियर एक् हि सांस मे हलक केँ नीचे उतारली। बियर कां वोँ तीखानशा सीधे मेरे दिमाग़ पर्र चढ़ गय़ा औऱ मेरी नसों मे वासना कि आग औऱ तेज़भड़क उठी।
रात केँ लगभग बारहबजे, बाहर् बादलों कि गड़गड़ाहट औऱ बारिश कां हंगामा अपनेचरम पऱ थां। तभी मेरे कमरे केँ दरवाज़े पर्र हलकी सि दस्तक हुईँ—'खट। खट। '
मैंने फुर्ती सें उठकर द्वार (दरवाज़ा) खोला। मोमबत्ती कि मद्धम रोशनी मे सामने रसीला खड़ी थि। उसने अपनी भीगी हुई साड़ी बदलली थि औऱ अब वोँ एक् ढीले-ढाले कुर्ते औऱ सलवार मे थि।
"भइया। वोँ सो गई हैं, " रसीला नें काँपते हुए होठों सें फुसफुसाया। "पर्र मुझे बहोत डरलगरहा हैं। इस अजनबी शहर मे, इस अंधेरे कमरे मे अकेले नींद नहि आँ रही। मे आपकेपास आँ जाऊँ?"
मैंने बिनाकुछ बोले उसकाहाथ पकड़ा औऱ उसे अपने कमरे केँ अंदर खींच लिया। द्वार (दरवाज़ा) बंद करके जैसे हि मैंने सांकल चढ़ाई, रसीला सीधे मेरे सीने सें लिपट गई। बियर केँ नशे औऱ इतने दिनों कि तड़प नें मेरे सोचने-समझने कि शक्ति समाप्त कर दि थि। मैंने अंधेरे मे हि उसके कुर्ते केँ ऊपर सें उसकी दोनों कड़क छातियों कों अपनी हथेलियों मे भींचना शुरुआत किया। रसीला केँ मुँह सें एक् तीखी सिसकी निकली—"ऊँहूँ। भइया। धीरे-धीरे."
"आजकोई नहि हैं रसीला। आज पूरा हिसाब होगा, " मैंने उसकेकान केँ पास फुसफुसाया औऱ उसेबेड कि तरफ़ लेँ गय़ा।
लगभगआधे घंटे तक उस मद्धम मोमबत्ती कि रोशनी मे मैंने बियर केँ नशे मे धुत होकर उसकेबदन कि एक्-एक् कतरन कों बेदर्दी सें चूस डाला। रसीला पूरीतरह मदहोश हौ चुकी थि, उसका जिस्म पानीछोड़ रहा थां। तभी उसने मेरेगले मे बाहें डालकर धीरे-धीरे सें कहा, "भइया। मे जरा वाशरूम होकरआती हूं, औऱ पिंकी केँ कमरे कां दरवाज़ा भि देखआती हूं कि कहीं खुला न् रह गय़ा हौ। आप् यहीं रुकना। "
वोँ उठी, उसने अपने कपड़े संभाले औऱ कमरे सें बाहर् निकल गई।
अंधेरे मे भयानक भूल
दस मिनटबीत गए, पर्र वोँ वापस नहि आई। मेरे शरीर कि आग औऱ बियर कां नशाइस समय अपनी आख़िरी हदपार कररहा थां। मुझसे औऱ सबर नहि हुआ। मैंने सोचा कि रसीला शायदडर केँ मारे अपने कमरे मे हि रुक गई होगी याँ मेरा इंतज़ार कररही होगी।
हॉल मे पूरीतरह घाघ अंधेरा थां। मोमबत्ती भि बुझ चुकी थि। मे बिनाकोई आवाज़ किए, सिर्फ़ अंडरवियर मे, दबे पाँव सामने वाले कमरे (203) कि तरफ़बढ़ा। दरवाज़ा हलका सां खुलाहुआ थां।
अंधेरे कमरे केँ अंदरबेड पर्र एक् साया चादर ओढ़करसो रहा थां। बाहर् कड़कती बिजली कि हलकी सि रोशनी खिड़की सें अंदरआई, जिससे मुझेबस उसबदन कां उभार दिखाई दिया। मेरे दिमाग़ पर्र शराब औऱ वासना कां ऐसाभूत सवार थां कि मैंने आव देखा न् ताव, सीधेबेड पर्र चढ़ गय़ा औऱ चादर केँ अंदरघुस गय़ा।
मैंने पीछे सें उसबदन कों अपनी मज़बूत बाहों मे दबोच लिया। मेरा सीधाहाथ सीधे कुर्ते केँ अंदरघुस गय़ा औऱ मैंने उसकड़क, गोल छाती कों पूरी ताक़त सें भींच दिया। मेराकड़क उभार सीधे पीछे सें उन चूतड़ों केँ बीचजा धँसा।
"रसीला। साली, बहोत तड़पाया हैं तूने, " मैंने मदहोशी मे उसकेकान केँ पास अपना मुँह लेँ जाकर बेहद गंदीबात फुसफुसा दि औऱ उसकी गर्दन पऱ अपने दाँतगड़ा दिए।
पर्र जैसे हि मैंने वोँ छाती भींची, मुझे एक् तगड़ा झटकालगा। वोँ उभार रसीला जितना भारी नहि थां। वोँ छोटा औऱ बहोत कड़क थां। औऱ जैसे हि मेरे मुँह सें वोँ गंदीबात निकली, उस शरीर नें डर केँ मारे एक् भयानक करवटली।
बाहर् एक् बहोत तेज़ बिजली कड़की, जिसने पूरे कमरे कों एक् सेकंड केँ लिए सफेद रोशनी सें भर दिया। औऱ उस रोशनी मे जौ चेहरा मेरे सामने थां, उसे देखकर मेरे पैरों केँ नीचे सें ज़मीन क्याँ, पूरा ब्रह्मांड खिसक गय़ा। बियर कां वोँ पूरानशा एक् सेकंड मे काफूर हौ गय़ा औऱ ठंडे पसीने कि बूंदें मेरी रीढ़ कि हड्डी सें नीचे उतरने लगीं।
वोँ रसीला नहि थि। वोँ पिंकी थि!
पिंकी फटी हुई आँखों सें, डर केँ मारे काँपती हुई सीधेबेड केँ कोने सें सट गई। उसका कुर्ता ऊपरसरक चुका थां औऱ उसकी छाती पऱ मेरी उंगलियों केँ लाल निशान साफ़दिख रहे थें। वोँ अपनी दोनों हथेलियों सें अपना मुँहबंद किए मुझेदेख रही थि, जैसे उसनेकोई भूतदेख लिया होँ।
"जि। जितेश भइया?? आप्। आप् यहा?" पिंकी कि आवाज़खौफ केँ मारेहलक मे फंस गई थि।
साला! अंधेरे औऱ बियर केँ नशे मे मुझसे ये क्याँ भूल होँ गई थि? रसीला वाशरूम गई थि, औऱ मे गलती सें पिंकी केँ बेड पऱ आँ गय़ा थां। राघव कां वोँ अंधा भरोसा, पिंकी कां मुझे रक्षक मानना, औऱ मेराये पापीरूप। सभी एक् लम्हा मे आमने-सामने खड़े थें।
मैंने जल्दी अपनेहाथ पीछे खींचे औऱ हड़बड़ाहट मे चादर कों संभाला। नशे औऱ खौफ कि मिली-जुली आवाज़ मे मेरे मुँह सें बस इतना हि निकला, "पिं। पिंकी। वोँ। वोँ कमरे मे बहोत अंधेरा थां। औऱ बियर केँ चक्कर मे मुझे। मुझेलगा ये मेरारूम हैं। "
पिंकी नें अभि भि डर केँ मारे अपना मुँहबंद कररखा थां, उसकी आँखें आंसुओं सें भर चुकीथीं। खेलअब सिर्फ़ वासना कां नहि, बल्कि जीवन औऱ मौत कां बन चुका थां।
पिंकी कि वोँ फटी हुईँ औऱ आँसूभरी आँखें अंधेरे मे भि मेरे सीने कों चीररही थीं। कमरे कां सन्नाटा इतना गहरा थां कि बाहर् गिरती मूसलाधार बारिश औऱ बादलों कि गड़गड़ाहट भि मुझे सुनाई नहि देरही थि, बस मेरे स्वयं केँ दिल कि धड़कन किसी नगाड़े कि तरह गूँजरही थि।
मे जल्दी बेड सें नीचे उतरा। मेरा पूरा शरीर काँपरहा थां। बियर कां जोँ सुरूर कुछदेर पहले दिमाग़ पऱ हावी थां, वोँ अब पूरीतरह सें ठंडेडर मे बदल चुका थां।
"पिंकी। मेरीबात सुन। तूँ जैसासोच रही हैं वैसाकुछ नहि हैं। बाहर् बिजली नहि थि, पूरारूम एक् जैसादिख रहा थां। औऱ बियर केँ नशे मे मे समझ नहि पाया कि मे कौन सें रूम मे आँ गय़ा, " मे अपनी आवाज़ कों जितना होँ सके धीमा औऱ लाचार बनाने कि कोशिश कररहा थां, ताकि वोँ चिल्ला न् दे। अगर पिंकी इस टाइमचीख पड़ती, तौ पूरे होटल केँ सामने मेरी इज़्ज़त कां कबाड़ा हौ जाता औऱ राघव तक बात पहुँचते हि सभीकुछ ख़त्म होँ जाता।
पिंकी नें धीरे-धीरे सें अपने मुँह सें हाथ हटाया। उसकी साँसें अभि भि तेज़चल रहीथीं औऱ वोँ अपने कुर्ते कों नीचे घसीटकर अपनी छाती कों ढकने कि कोशिश कररही थि, जहाँ मेरी उंगलियों कां दबाव अभि भि महसूस हौ रहा थां।
"जितेश भइया। आप्। आप् बियर पीते होँ? औऱ रात केँ इस टाइम." पिंकी कि आवाज़ रुआँसी हौ गई थि। वोँ अभि 12वीं कि मासूम बच्ची थि, उसे क्याँ पता थां कि जिस भइया कों वोँ ईश्वर मानरही थि, वोँ अंदर सें कितना बड़ा पापी हैं।
"हाँ पिंकी, गलती होँ गई। वोँ दिनभर कि थकान औऱ सभी-स्टेशन कि टेंशन कि वजह सें मैंने थोड़ी सि लेँ ली थि। मुझेमाफ़ करदे। अपनी दिदी कों कुछमत बताना, नहि तोँ राघव भइया कां दिलटूट जाएगा। वोँ मुझ पऱ कितना भरोसा करते हें, " मैंने उसके सामने हाथजोड़ दिए। साला, इस वक़्त अपनी चमड़ी बचाने केँ लिए मुझे उसके सामने गिड़गिड़ाना पड़रहा थां।
पिंकी नें कुछ नहि कहा, उसनेबस रोतेहुए अपनासिर घुटनों मे छुपा लिया।
मे दबे पाँव उल्टे पेर कमरे सें बाहर् निकला औऱ गलियारे केँ घाघ अंधेरे कों पार करताहुआ सीधे अपने कमरे (204) मे आँ गय़ा। जैसे हि मैंने दरवाज़ा बंद किया, मेरीपीठ दीवार सें टिक गई औऱ मे फर्श पर्र बैठ गय़ा। मेरा माथा पसीने सें तर थां।
"साला!आज तोँ बच गय़ा, पर्र अगर सुभह पिंकी नें रसीला कों सभीबता दिया, याँ राघव कों मोबाइल कर दिया, तौ मेरा क्याँ होगा?" मेरेमन मे यही प्रश्न बार-बार घूमरहा थां।
तभी बाथरूम कि तरफ़ सें आहट हुइ औऱ रसीला बाहर् आई। वोँ अपने कमरे मे जाने कि बजाय सीधे मेरे कमरे केँ अंदर आँ रही थि। अंधेरे मे उसे नहि पता थां कि पिछले दस मिनट मे बाहर् क्याँ बवंडर मच चुका हैं।
"भइया। क्याँ हुआ? आप् फर्श पर्र क्यूं बैठे हौ? पिंकी केँ कमरे कां दरवाज़ा तोँ बंद थां, मे देखकर आई हूं, " रसीला नें मेरेपास आकर मेरे कंधे पऱ हाथरखा।
मैंने झटके सें उसकाहाथ हटाया औऱ उठकरखड़ा होँ गय़ा।
"रसीला। बहोत बड़ा अनर्थ होँ गय़ा। तूँ जब वाशरूम गई थि, तौ मे बियर केँ नशे मे तेरे धोखे मे सामने वाले कमरे मे चला गय़ा। औऱ। औऱ मैंने पिंकी कों रसीला समझकर दबोच लिया, " मैंने बहोत हि दबी औऱ काँपती हुइ आवाज़ मे सचउगल दिया।
"क्याँ???" रसीला केँ मुँह सें एक् चीख निकलने हि वाली थि कि मैंने जल्दी अपनाहाथ उसके मुँह पर्र रख दिया।
रसीला कि आँखें खौफ केँ मारे वैसी हि फ़टगईं जैसीकुछ देर पहले पिंकी कि फटीथीं। उसका पूरा जिस्म जड़ होँ गय़ा। जिस पवित्र रिश्ते औऱ मर्यादा कि दुहाई वोँ बार-बार देती थि, आजउसखेल मे उसकी अपनी मासूम ननदीपिस चुकी थि।
"भइया। आपनेये क्याँ कर दिया? वोँ बच्ची हैं। अगर उसने राघवजी कों बता दिया, तोँ हम् कहीं केँ नहि रहेंगे। वोँ अभि इसी टाइम हम् दोनों कों जान सें मार देंगे, " रसीला केँ आँसू मेरी हथेली पर्र गिरने लगे।
"अब जोँ होना थां वोँ हौ गय़ा रसीला। इस वक़्त रोने सें कुछ नहि होगा। सुभह ग्यारह बजे हमेंउसे बोर्डिंग विद्यालय मे छोड़ना हैं। उससे पहले हमें पिंकी कों किसी भि तरह मनाना होगा, उसे समझाना होगा कि वोँ एक् ग़लती थि। अगर वोँ मान गई, तौ यहराज़ हमेशा केँ लिएइस कमरे मे दफ़न होँ जाएगा, " मैंने रसीला केँ कंधे पकड़कर उसे हिलाते हुएकहा।
जब मैंने यह रसीला कों बताया सभी तौ उसनेकहा कि तुमने उसकोनसे मे पकड़ा वोँ सायद वोँ मान भि लें कि गलती हुईँ नसे मे थां पर्र जौ तुमने मेरानेम लेके कबाड़ा किया हैं उसका क्याँ ? मेनबात तौ यह हैं औऱ यह सुनते हि मेरे दिमाग़ लाइट हुई ओ तेरी कि
साला, बात तौ तुम्हारी एकदमसही हैं! जब पिंकी नें कान सें सुन हि लिया थां कि मे बियर केँ धुत्त नशे मे भि 'रसीला' कां नाम लेँ रहा थां औऱ उसे दबोचने कि बातें कररहा थां, तौ वोँ 12वीं कि बच्ची होने केँ बावजूद इतनी नासमझ नहि थि। वोँ एक् झटके मे समझ गई कि उसके भइया औऱ उसकीसगी भाभी केँ बीचपीठ पीछेकौन सां गंदा औऱ खौफनाक खेलचल रहा हैं।
अबजब चोरी पकड़ी हि गई थि औऱ राघव तक बात पहुँचने कां मतलब सीधेमौत थां, तौ मेरे पापी दिमाग़ नें इसनरक सें निकलने कां एक् हि अंतिम औऱ सबसे खतरनाक मार्ग सोचा—पिंकी कों डरा-धमकाकर याँ मज़े कां चस्का देकरइस खेल कां हिस्सा बनालो! जब वोँ स्वयं इस दलदल मे उतर जाएगी, तौ वोँ चाहकर भि राघव याँ किसी औऱ केँ सामने मुंह खोलने लायक नहि बचेगी।
सुभह केँ ठीकचार बजरहे थें। बाहर् मूसलाधार बारिश कि रफ़्तार अब थोड़ी थमी थि, पऱ आसमान मे अभि भि घना काला अंधेरा छायाहुआ थां। बियर कां कड़कनशा पूरीतरह उतर चुका थां, मगर मेरे भीतर कि घबराहट अब एक् नई रणनीति मे बदलरही थि।
जब मैंने अपने कमरे मे रसीला कों सभीसच बताया, तौ वो खौफ केँ मारे काँपउठी। मैंने उसे समझाया, "रोने सें कुछ नहि होगा रसीला। पिंकी नें मेरा मुंह सें तेरानाम सुन लिया हैं, वोँ सभीजान चुकी हैं। अगर वोँ सुभह राघव कों मोबाइल करेगी, तौ हम् दोनों कहीं केँ नहि रहेंगे। तुँ बस मेरे पीछे आँ औऱ जैसा मे करता हूं, वैसा होनेदे। "
रसीला नें रोतेहुए हाँ मे सिर हिलाया। हम् दोनों दबे पाँव वापसरूम नंबर 203 केँ अंदर दाखिल होँ गए।
पिंकी बेड पऱ एक् कोने मे घुटनों मे सिरदिए अभि भि सिसकरही थि। जैसे हि दरवाज़ा खुला औऱ उसने मुझे औऱ अपनी भाभी रसीला कों एक् संग अंदरआते देखा, उसकी आँखों मे नफरत औऱ असमंजस साफ़ दिखने लगा।
"दिदी। तुम्? तुम् अपनेसगे भइया केँ संग." पिंकी कि आवाज़ नफरत सें कांपउठी। "तुम् दोनों सगे भइया-बेहन होकर इतना घिनौना कामकर रहे होँ? मे अभि भैया कों मोबाइल करकेसभी बताऊंगी!"
वो बेड सें उठकर अपना मोबाइल उठाने हि वाली थि कि मैंने आगे बढ़कर उसकाहाथ दबोच लिया औऱ सीधे उसकी आँखों मे झाँका।
"हाँ, कर दे मोबाइल राघव कों पिंकी!" मैंने अपनी आवाज़ कों बेहदकड़क औऱ गंभीर करतेहुए कहा। "पऱ मोबाइल करने सें पहले एक् बातसुन लें। मे औऱ तेरी दिदी एक्-दूसरे कों चाहते हें। ट्रेन मे भि जोँ तूने सुना, वोँ हम् दोनों कि मर्जी सें हौ रहा थां। आजअगर तूने राघव कों कुछ भि बताया, तौ मे तोँ जेल जाऊँगा, पर्र तेरीयह सगी दिदी लोक-लाज केँ मारेइसी वक़्त इसी होटल कि छत सें कूदकर जानदे देगी। बोल, क्याँ तुँ अपनी भाभी कि मौत चाहती हैं?"
मेरीबात सुनते हि पिंकी केँ पैरों केँ नीचे सें ज़मीन खिसक गई। उसने रसीला कि तरफ़ देखा, जौ सचमुच बदनामी केँ डर सें पागलों कि तरहरो रही थि। रसीला नें पिंकी केँ हाथपकड़ लिए, "पिंकी, हमसे गुनाह होँ गय़ा। पर्र अगर तूने राघव कों बताया तोँ दो लाशें गिरेंगी। अपनीइस दिदी केँ सुहाग औऱ जीवन कि भीख मांगती हूं तुझसे। "
भाभी कां रोना औऱ भइया कि मौत कि धमकी सुनकर पिंकी अंदर सें पूरीतरह टूट गई। उसका क्रोध ठंडेडर मे बदल गय़ा। समाज औऱ बदनामी केँ इसजाल नें उसे लाचार कर दिया।
"ठीक हैं। ठीक हैं दिदी, मे भैया कों कुछ नहि बोलूंगी। तुम् रोमत। प्लीज भइया, अब आप् अपने कमरे मे जाओ, " वो रोतेहुए बेड पर्र बैठ गई। उसने राघव कों नं बताने कां फैसला कर लिया थां।
पिंकी नें जब रोतेहुए अपनीसगी भाभी कि जीवन औऱ भइया कों जेल सें बचाने केँ लिए राघव कों कुछ नं बताने कां फैसला कर लिया, तौ मेरे सीने पऱ रखा वोँ भारी पत्थर एक् झटके मे हट गय़ा। हम् दोनों पूरीतरह आश्वस्त हौ चुके थें कि अबयेराज इसी कमरे मे दफ़न रहेगा।
पिंकी नें चादर ओढ़कर अपनी आँखें बंदकर लीं। मैंने रसीला कि तरफ देखा, उसकी आँखों मे भि अबखौफ कि स्थान एक् अजीब सां चैन औऱ वही पुरानी दबी हुईँ प्यास तैरने लगी थि। मैंने रसीला कां हाथ पकड़ा औऱ हम् दोनों दबे पाँवरूम नंबर 203 सें बाहर् निकलआए।
अपने कमरे (204) मे आते हि मैंने द्वार (दरवाज़ा) बंद किया औऱ सांकल कों इतनी ज़ोर सें चढ़ाया कि उसकी आवाज़ पूरे कमरे मे गूँजउठी। अबकोई डर नहि थां, कोई पाबंदी नहि थि, औऱ न् हि पिंकी केँ जागने कां कोईखौफ थां। बियर कां नशाभले उतर चुका थां, पऱ रसीला केँ शरीर कों पूरीतरह पाने कां जोँ जूनून थां, वोँ अब सातवें आसमान पर्र थां।
मैंने पलटकर रसीला कों देखा। वोँ दीवार सें सटकर खड़ी थि, उसकी साँसें तेज़-तेज़ चलरही थीं। इतने दिनों कि वोँ अधूरी तड़प, वोँ कोने मे कपड़ों केँ ऊपर सें छाती भींचना, वोँ ट्रेन कां छूटाहुआ खेल.सभी मिलकर हमारे भीतर एक् ज्वालामुखी कि तरहफट चुके थें।
"भइया.अब तोँ कोईडर नहि हैं न्?" रसीला नें अपनी मदहोश आँखों सें मुझे देखते हुए पूछा।
"अब केवल मे हूं औऱ तुँ हैं रसीला." मैंने कहा औऱ चीते कि तरह झपटकर उसे अपनी मज़बूत बाहों मे दबोच लिया।
मेरे होंठ सीधे उसकी गर्दन पर्र जमगए। मैंने पागलों कि तरह उसकी त्वचा कों चूसना शुरुआत किया। रसीला केँ मुँह सें एक् तीखी औऱ गहरी सिसकी निकली—"आहह-आहह। भइया." उसने अपने दोनों हाथ मेरीपीठ पऱ कसदिए।
मैंने बिना एक् सेकंड गंवाए उसके कुर्ते कों दोनों हाथों सें पकड़ा औऱ एक् हि झटके मे उसकेसिर केँ ऊपर सें घसीटकर बाहर् फेंक दिया। रसीला कां सफ़ेद, सुडौल जिस्म अब मद्धम रोशनी मे मेरे सामने आधा नंगा हौ चुका थां। उसकी वोँ भारी, कड़क छातियाँ, जिन्हें मैंने ट्रेन मे मात्र छूकर छोड़ दिया थां, आज पूरीतरह आज़ादथीं। मैंने अपनी दोनों हथेलियों मे उन दोनों कड़क गोलों कों भींचा। वोँ इतनीभरी हुइ थीं कि मेरी उंगलियों केँ बीच सें मांस बाहर् आँ रहा थां।
"ओह भइया.मर गई। धीरे-धीरे। बहोत कड़कहाथ लगारहे हौ, " रसीला मज़े केँ मारेबेड पऱ पीछे कि तरफ गिरने लगी।
मैंने उसेबेड पऱ सीधा लेटाया औऱ स्वयं उसकेऊपर आँ गय़ा। मेराहाथ उसकी पटियाला सलवार केँ नाड़े पर्र गय़ा। मैंने एक् हि झटके मे नाड़ा खोला औऱ सलवार कों उसकी जांघों सें नीचे सरका दिया। रसीला अबबैड पर्र पूरीतरह नंगी हौ चुकी थि। उसकी दोनों भारी, मखमली जांघों केँ बीच उसकी वोँ भीगी हुई रेशमी गुफा साफ़चमक रही थि। इतने दिनों कि तड़प कि वजह सें उसकी बुर सें पानी कां सैलाब पहले हि बहरहा थां।
मैंने अपने कपड़े उतारे। मेरा वोँ सख्त, कड़क लोहाइस समय फटने कों सजधजकर थां। मैंने रसीला कि दोनों टांगों कों उठाकर अपने कंधों पऱ रखा, जिससे उसकी वोँ गहराई पूरीतरह मेरे सामने खुल गई।
मैंने अपने लोहे कि कड़कनोक कों उसकी बुर केँ मुहाने पर्र सेट किया। रसीला नें मज़े औऱ बेचैनी केँ मारेबेड कि चादर कों अपने दोनों हाथों सें कसकर जकड़ लिया।
"भइया.अब औऱ मत तड़पाओ। डालदो पूरा, " वोँ मदहोशी मे पागलों कि तरह बड़बड़ा रही थि।
मैंने अपनीकमर कों पीछे खींचा औऱ पूरी ताक़त सें एक् तबाड़तोड़ धक्का अंदर कि तरफमार दिया।
रसीला कि वोँ तंग, रसीली दीवारें मेरे कड़क लोहे कों चूसती चलीगईं औऱ मेरा वोँ पूरा सख्त हिस्सा एक् हि झटके मे उसकी गहराई कों चीरता हुआजड़ तक अंदरधँस गय़ा।
"ओहहहहह भाईआईआई। अहह.मर गई." रसीला केँ मुँह सें एक् लंबी, तीखी सिसकी निकली औऱ उसकी आँखें पूरीतरह ऊपर कि तरफघूम गईं। उसकी बुर कां कसाव इतना जबरदस्त थां कि मुझेलगा मेरादम निकल जाएगा।
मैंने बिना रुके अपनीकमर कि रफ़्तार बढ़ाई औऱ ताबड़तोड़ धक्के मारने शुरुआत करदिए। कमरे केँ सन्नाटे मे हमारे जिस्मों केँ टकराने कि 'चप-चप। चप-चप' कि आवाज़ गूँजने लगी। हर धक्के केँ संग मेरा पूरा उभार उसकी बुर कि गहराई सें टकरारहा थां औऱ रसीला मज़े केँ उसचरम नरक मे अपनीकमर कों बार-बार ऊपर कि तरफ धकेलरही थि ताकि मेरा लोहा औऱ अंदरजा सके।
"हाँ भइया। औऱ तेज़। अपनीइस साली कों पूराफाड़ दोआज। आहह-आहह." वोँ पूरीतरह अपनी मर्यादा भूलकर गंदी बातें करनेलगी थि।
मैंने उसकी दोनों छातियों कों अपने हाथों मे कसकर भींचा औऱ धक्कों कि रफ़्तार कों दुगना कर दिया। लगभगबीस मिनट तक उसबेड पर्र मैंने रसीला केँ शरीर कि एक्-एक् कतरन कां पूरारस निचोड़ डाला। हमारी साँसें इसकदर फूलरही थीं जैसे हम् कोईजंग लड़कर आँ रहेहों। आखिरकार, एक् बेहद कड़क औऱ गहरे धक्के केँ संग मेरा औऱ रसीला कां वोँ चरम पानी एक् संग उसकी गहराई मे छूट गय़ा। रसीला नें मुझे अपनी बाहों मे कसकर भींच लिया औऱ वोँ पूरीतरह शांत होँ गई।
सुभह कि धूपअब कमरे मे पूरीतरह फैल चुकी थि। राघव कां वोँ अंधा भरोसा टूटकर बिखर चुका थां। रसीला केँ संगये हिसाब तौ चुकता होँ गय़ा थां, पऱ हमेंपता थां कि सामने वाले कमरे मे पिंकी बैठी हैं,
झूठा झूला बहेंन कों झुलाया – New Episode
भाग 10
रसीला केँ शरीर कां पूरारस निचोड़ने केँ बाद, हम् दोनों उसीतरह नंगेबेड पऱ पड़े हांफरहे थें। हमारे शरीर पसीने सें लथपथ थें औऱ कमरे मे छाए सन्नाटे मे केवल हमारी तेज चलती सांसों कि आवाज़ आँ रही थि। इतने दिनों कि जौ उतावलापन औऱ सूखा थां, वोँ आजइस होटल केँ कमरे मे पूरीतरह शांत हौ चुका थां।
लगभगआधे घंटेबाद, जबहोश पूरीतरह ठिकाने आया, तोँ खिड़की सें आती सुभह कि तेजधूप नें याद दिलाया कि हम् कहां हें औऱ हमारे आसपास क्याँ चलरहा हैं।
"भइया.अब उठो, आठ बजने वाले हें। पिंकी कों ग्यारह बजे तक बोर्डिंग विद्यालय छोड़ना हैं, " रसीला नें ढीलेपड़ चुके शरीर कों समेटते हुए चादर कों अपनेऊपर खींचा। उसकी आवाज़ मे अब वोँ पहले वालाडर नहि थां, बल्कि एक् अजीब सां चैन औऱ अपने भइया केँ प्रति समर्पण थां।
मैंने उठकर अपनी पैंट पहनी औऱ वाशरुम जाकर चेहरे पर्र ठंडा पानी मारा। आईने मे स्वयं कों देखा तौ बियर केँ नशे औऱ वासना कि स्थान अब एक् नई कूटनीति चेहरे पर्र साफ़दिख रही थि। पिंकी वाला मामला भले हि रात कों शांत हौ गय़ा थां, पऱ अभि भि वोँ एक् ऐसी ढीली कड़ी थि जौ कभी भि हमारे इसमहल कों ढहा सकती थि।
मे बाहर् आया, रसीला भि तब तक अपने कपड़े ठीककर चुकी थि।
"तुँ रेडी हौ जा रसीला, मे सामने वाले कमरे मे जाकर पिंकी कां मूड देखता हूं कि उसके दिमाग़ मे क्याँ चलरहा हैं, " मैंने कड़क आवाज़ मे कहा।
मैंने अपने कमरे कां दरवाजा खोला औऱ गलियारे कों पार करताहुआ रूम नंबर 203 केँ सामने पहुंचा। मेरादिल एक् बारफिन थोडा तेज धड़का, पर्र मैंने स्वयं कों संभाला औऱ दरवाजे पर्र हलकी सि दस्तक दि।
"पिंकी। दरवाजा खोलो, " मैंने आवाज़ दि।
कुछ हि सेकंड मे दरवाजा खुला। सामने पिंकी खड़ी थि। उसने बोर्डिंग विद्यालय जाने वाले अपने कपड़े पहनलिए थें, पऱ उसका चेहरा उतराहुआ थां औऱ आँखें अभि भि हलकी सूजी हुइ थीं। मुझे सामने देखते हि उसने अपनी नजरें नीचे झुकालीं।
"रेडी हौ गई तूँ?" मैंने कमरे केँ अंदरकदम रखतेहुए पूछा औऱ दरवाजा पीछे सें बंदकर लिया।
"हाँ भइया। सारा सामान पैक हैं, " उसने बहोत हि धीमी औऱ सहमी हुईँ आवाज़ मे कहा। रात केँ उस वाकये केँ बाद वोँ मुझसे सीधे आँखें मिलाने कि हिम्मत नहि करपारही थि।
मे उसके लगभग गय़ा औऱ उसके ठंडेपड़ चुकेहाथ कों अपनेहाथ मे लिया। पिंकी एक् लम्हा केँ लिए सिहरी, पर्र उसने अपनाहाथ पीछे नहि खींचा।
"देख पिंकी, रात जोँ कुछ भि हुआ। चाहे वोँ बियर केँ नशे मे मेरी गलती थि याँ तेरा वोँ सभीसुन लेना, उसे अब एक् बुरा सपना समझकर भूलजा। तूँ अब बड़े विद्यालय मे जारही हैं, अच्छे सें पढ़ाई करना। राघव भैया कों मोबाइल पर्र बस इतनी हि बात बताना जितनी जरूरी होँ। समझ गई नं?" मैंने उसके दिमाग़ पऱ दोबारा वही मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया ताकि वोँ अपनीशपथ सें पीछे न् हटे।
पिंकी नें धीरे-धीरे सें अपनी आँखें उठाईं, उनमें अभि भि नफरत औऱ लाचारी कां मिला-जुला भाव थां।
"मैंने दिदी कों शपथ दि हैं भइया, मे भैया कों कुछ नहि बोलूंगी। मुझेपता हैं कि अगर मैंने कुछकहा तौ भैया टूट जाएंगे औऱ दिदी। दिदी जानदे देंगी। पर्र." वोँ बोलते-बोलते रुक गई औऱ उसकी नजरें मेरी पैंट केँ उस हिस्से पऱ गईं जहाँरात कों उसने मेरे मर्द होने कां पहला खौफनाक अहसास महसूस किया थां।
"पऱ क्याँ पिंकी?" मैंने उसकी ठुड्डी कों उंगली सें ऊपर उठाते हुए पूछा।
"पऱ मुझे आपसेडर लगरहा हैं। मुझे नहि पता थां कि आप् अंदर सें ऐसे हौ." उसने फुसफुसाते हुएकहा।
मे समझ गय़ा कि पिंकी केँ दिल मे जोँ डर बैठा हैं, वहीडर आने वाले वक्त मे मेरेलिए सबसे बड़ा हथियार बनने वाला थां। वोँ सगे भइया-बेहन केँ इसराज कों छुपाने कि मज़बूरी मे इसकदर दब चुकी थि कि अब वोँ कभी भि मेरेइस चंगुल सें आज़ाद नहि होँ सकती थि। हॉस्टल केँ इसनएसफर मे, मे जब भि इसशहर आऊंगा, पिंकी कां येडर औऱ उसकीये लाचारी हि उसे मेरेइस खेल कां अगला मोहरा बनाएगी।
"डरने कि जरूरत नहि हैं पिंकी। तेराये भइयाजब तक जिंदा हैं, तुम्हारी तरफकोई आंच नहि आएगी। बस हमारी बातें हमारे बीच रहनी चाहिए, " मैंने उसकी मखमली गाल कों हलके सें थपथपाया।
तभी दरवाजे पर्र रसीला नें दस्तक दि। वोँ भि पूरीतरह सजधजकर होकर आँ चुकी थि। हम् तीनों नें सामान उठाया, होटल कां बिल चुकाया औऱ बाहर् खड़ीकैब मे बैठगए।
बोर्डिंग विद्यालय केँ बड़े सें गेट केँ सामने जब पिंकी अपना सामान लेकर अंदर जानेलगी, तौ उसने पलटकर एक् अंतिम बार मुझे औऱ रसीला कों देखा। उसकीउस अंतिम नजर मे ये साफ़ लिखा थां कि वोँ अब हमेशा केँ लिए हमारे इसराज कां हिस्सा बन चुकी हैं।
पिंकी कों अंदर छोड़कर जब मे औऱ रसीला वापस स्टेशन कि तरफ बढ़े, तौ राघव कां मोबाइल आया।
"हाँ जितेश! पिंकी कों छोड़ दिया?सभी ठीक-ठाक तौ रहा नं भइया?" राघव कि वही भरोसेमंद आवाज़ गूंजी।
मैंने रसीला कि तरफ देखा, जिसने मुस्कुराते हुए मेरी जांघ पऱ अपनाहाथ रख दिया थां।
"हाँ राघव भइया.सभी बिल्कुल ठीकरहा। पिंकी बहोत खुश हैं, औऱ आपकी अमानत कों मैंने पूरीतरह सुरक्षित संभाल लिया हैं। आप् बिल्कुल फिक्र मतकरो, " मैंने मोबाइल पऱ हंसते हुएकहा औऱ रसीला कि साड़ी केँ पल्लू कों अपनी उंगलियों मे समेट लिया।
स्टेशन पहुँचते हि ट्रेन केँ आने मे अभि आधा घंटा बाकी थां। मैंने औऱ रसीला नें कोने वाले बेंच पर्र अपनी स्थान बनाई। दिन कि चटकधूप मे रेलवे स्टेशन पऱ लोगों कि भारी भीड़ थि, पर्र उस भीड़ केँ बीच भि रसीला कि उंगलियाँ बेंच केँ नीचे सें मेरी जांघ कों हलके सें दबारही थीं। जोँ स्त्री कुछ घंटे पहलेखौफ सें काँपरही थि, अब वोँ इसकदर बेफिक्र हौ चुकी थि जैसे उसने जीवन कि सबसे बड़ी बाज़ी जीतली होँ।
"भइया। पिंकी अब हॉस्टल मे अकेली रहेगी। आपको क्याँ लगता हैं, वोँ सच मे राघवजी सें कुछ नहि कहेगी न्?" रसीला नें अपनी आवाज़ कों धीमा रखतेहुए सीधे मेरेकान केँ पासआकर पूछा। उसकी साँसों कि गर्माहट मेरे चेहरे पर्र महसूस हौ रही थि।
"तूँ फिक्र मतकर रसीला, " मैंने उसकेहाथ केँ ऊपर अपनाहाथ रखतेहुए कड़क आवाज़ मे कहा। "पिंकी अब मात्र राघव कि बेहन नहि हैं, वोँ इसखेल कां हिस्सा बन चुकी हैं। उसे अच्छे सें पता हैं कि अगर वोँ मुँह खोलेगी, तौ बदनामी कां सबसे पहला कीचड़ उसी कि छाती पर्र आकर गिरेगा। औऱ वैसे भि, जब अगलीबार मे इसशहर मे बिजली केँ काम केँ सिलसिले मे याँ उससे मिलने आऊँगा। तब वोँ मेरेइस अहसान औऱ डर केँ जाल सें बाहर् नहि भाग पाएगी। जोँ शुरुआत आज सुभह अधूरी रह गई थि, उसे अगलीबार पूरी ताक़त सें अंजाम दूँगा। "
मेरीबात सुनकर रसीला कि आँखें मज़े औऱ वासना केँ मारेचमक उठीं। उसे इसबात कां कोई अफ़सोस नहि थां कि उसकी ननदीइस दलदल मे फँसने जारही हैं, बल्कि उसेइस बात कि तसल्ली थि कि उसका अपना भइया औऱ उसकायह सुहाग-रूपी सुखअब पूरीतरह महफूज़ थां।
"आप् बहोत शातिर होँ भइया." रसीला नें मुस्कुराते हुए अपनी साड़ी केँ पल्लू कों थोडा औऱ ठीक किया। "राघवजी तौ बसनाम केँ मर्द हें, असली मर्द कां दम औऱ दिमाग़ तौ आपकेपास हैं। "
तभी स्टेशन केँ लाउडस्पीकर पऱ हमारी ट्रेन कि एनाउंसमेंट गूँजउठी। ट्रेन आकर रुकी औऱ हम् दोनों एक् बारफिन उसी बोगी केँ अंदर दाखिल हुए। पऱ इसबार माहौल अलग थां। रात कां वोँ खौफ औऱ बियर कां वोँ नशाअब एक् साफ़ औऱ गहरे प्लान मे बदल चुका थां।
जैसे हि ट्रेन नें रफ़्तार पकड़ी, रसीला नें खिड़की कि तरफ़ मुंहकर लिया औऱ मैंने अपनी पैंट केँ ऊपर सें अपनेउस कड़क लोहे कों सहलाया, जोँ आज सुभह रसीला कि गहराई नापने केँ बाद भि अभि पूरीतरह शांत नहि हुआ थां। मुझेपता थां कि घऱ वापस पहुँचने केँ बाद, राघव कि नाक केँ नीचे, हमारी किचन औऱ उस सूने कमरे मे येखेल औऱ भि खौफनाक औऱ तबाड़तोड़ होने वाला हैं। औऱ इसखेल कि तीसरी मोहरा, पिंकी, अबशहर केँ उस हॉस्टल मे बैठी हमारी अगलीचाल कां इंतजार कररही थि।
स्टेशन पहुँचते हि ट्रेन केँ आने मे अभि आधा घंटा बाकी थां। मैंने औऱ रसीला नें कोने वाले बेंच पऱ अपनी स्थान बनाई। दिन कि चटकधूप मे रेलवे स्टेशन पर्र लोगों कि भारी भीड़ थि, पऱ उस भीड़ केँ बीच भि रसीला कि उंगलियाँ बेंच केँ नीचे सें मेरी जांघ कों हलके सें दबारही थीं। जौ स्त्री कुछ घंटे पहलेखौफ सें काँपरही थि, अब वोँ इसकदर बेफिक्र हौ चुकी थि जैसे उसने जीवन कि सबसे बड़ी बाज़ी जीतली हौ।
"भइया। पिंकी अब हॉस्टल मे अकेली रहेगी। आपको क्याँ लगता हैं, वोँ सच मे राघवजी सें कुछ नहि कहेगी नं?" रसीला नें अपनी आवाज़ कों धीमा रखतेहुए सीधे मेरेकान केँ पासआकर पूछा। उसकी साँसों कि गर्माहट मेरे चेहरे पर्र महसूस हौ रही थि।
"तूँ फिक्र मतकर रसीला, " मैंने उसकेहाथ केँ ऊपर अपनाहाथ रखतेहुए कड़क आवाज़ मे कहा। "पिंकी अब केवल राघव कि बेहन नहि हैं, वोँ इसखेल कां हिस्सा बन चुकी हैं। उसे अच्छे सें पता हैं कि अगर वोँ मुँह खोलेगी, तोँ बदनामी कां सबसे पहला कीचड़ उसी कि छाती पर्र आकर गिरेगा। औऱ वैसे भि, जब अगलीबार मे इसशहर मे बिजली केँ काम केँ सिलसिले मे याँ उससे मिलने आऊँगा। तब वोँ मेरेइस अहसान औऱ डर केँ जाल सें बाहर् नहि भाग पाएगी। जोँ शुरुआत आज सुभह अधूरी रह गई थि, उसे अगलीबार पूरी ताक़त सें अंजाम दूँगा। "
मेरीबात सुनकर रसीला कि आँखें मज़े औऱ वासना केँ मारेचमक उठीं। उसे इसबात कां कोई अफ़सोस नहि थां कि उसकी ननदीइस दलदल मे फँसने जारही हैं, बल्कि उसेइस बात कि तसल्ली थि कि उसका अपना भइया औऱ उसकायह सुहाग-रूपी सुखअब पूरीतरह महफूज़ थां।
"आप् बहोत शातिर होँ भइया." रसीला नें मुस्कुराते हुए अपनी साड़ी केँ पल्लू कों थोडा औऱ ठीक किया। "राघवजी तौ बसनाम केँ मर्द हें, असली मर्द कां दम औऱ मन तोँ आपकेपास हैं। "
तभी स्टेशन केँ लाउडस्पीकर पऱ हमारी ट्रेन कि एनाउंसमेंट गूँजउठी। ट्रेन आकर रुकी औऱ हम् दोनों एक् बारफिन उसी बोगी केँ अंदर दाखिल हुए। पऱ इसबार माहौल अलग थां। रात कां वोँ खौफ औऱ बियर कां वोँ नशाअब एक् साफ़ औऱ गहरे प्लान मे बदल चुका थां।
जैसे हि ट्रेन नें रफ़्तार पकड़ी, रसीला नें खिड़की कि तरफ़ मुंहकर लिया औऱ मैंने अपनी पैंट केँ ऊपर सें अपनेउस कड़क लोहे कों सहलाया, जौ आज सुभह रसीला कि गहराई नापने केँ बाद भि अभि पूरीतरह शांत नहि हुआ थां। मुझेपता थां कि घऱ वापस पहुँचने केँ बाद, राघव कि नाक केँ नीचे, हमारी किचन औऱ उस सूने कमरे मे येखेल औऱ भि खौफनाक औऱ तबाड़तोड़ होने वाला हैं। औऱ इसखेल कि तीसरी मोहरा, पिंकी, अबशहर केँ उस हॉस्टल मे बैठी हमारी अगलीचाल कां इंतजार कररही थि।
घऱ वापस लौटने केँ बाद, माहौल ऊपर सें बिल्कुल शांतदिख रहा थां। राघव अपनी रोज़ कि ड्यूटी पऱ जानेलगा थां औऱ उसेइस बात कां रत्ती भर भि अंदाज़ा नहि थां कि उसकीपीठ पीछे, उसी केँ घऱ मे, भरोसे कि धज्जियाँ उड़ चुकी हें। पिंकी हॉस्टल मे सुरक्षित थि, औऱ यहा हमारे सिर सें बदनामी कां डर पूरीतरह हट चुका थां।
इस रिकवरी केँ बाद, अब येखेल रोज़ कां नियमबन गय़ा। रोज़ सुभहजब राघव अपनी टिफिन उठाकर काम पऱ निकल जाता, तौ घऱ मे मात्र मे औऱ रसीला अकेले बचते। रसीला किचन कां काम आधा-अधूरा छोड़, दरवाजे कि कुंडी चढ़ाकर सीधे मेरे कमरे कि तरफ भागती।
"भइया। जल्दकरो, राघवजी केँ आने मे अभि चार-पांच घंटे हें, " रसीला कमरे मे आते हि अपनी साड़ी कां पल्लू गिराते हुए मदहोशी मे फुसफुसाती।
अब हमारे बीचसगे भइया-बेहन कि वोँ अंतिम हिचक भि ख़त्म होँ चुकी थि। मे रोज़ सुभह रसीला कों बेड पऱ पटकता औऱ बिना किसी पाबंदी केँ उसकेबदन केँ एक्-एक् हिस्से कां रस निचोड़ता। उसकी वोँ भारी, कड़क छातियाँ औऱ उसकी वोँ रसीली गहराई रोज़ सुभह मेरे तबाड़तोड़ धक्कों सें तृप्त होती। कमरे मे 'चप-चप' कि आवाज़ औऱ रसीला कि दबी-कुचली सिसकियाँ रोज़ कां सन्नाटा चीरती थीं। वो पूरीतरह सें इस भइया केँ वश मे आँ चुकी थि।
पर्र स्टोरी कां असलीमज़ा तबआता, जबसाम कों राघव थका-हारा घऱ लौटता।
साम कों जब राघवआता, तौ रसीला एक् संस्कारी पत्नि कि तरह उसकेपेर धोती, उसे गरमचाय देती। राघव सोफे पऱ बैठकर गरमचाय कि चुस्की लेता औऱ रसीला कि तरफ प्रेम सें देखकर कहता, "रसीला, सच मे तुम् जैसी पत्नि पाकर मेरी जीवन संवर गई हैं। औऱ जितेश जैसा साला मिला हैं, जौ पूरेघऱ कों संभाल कर रखता हैं। "
मे बगल मे बैठकर मात्र मुस्कुरा देता। साला, मन हि मन मुझे हंसीआती कि जिस महिला कों ये अपना सुहाग समझरहा हैं, उसेकुछ घंटे पहले हि मैंने बैड पऱ पूरीतरह निचोड़ा हैं।
रात कों जब सोने कां समयआता, तोँ राघव अपने तरीके सें रसीला केँ पास जाता। वो शादीशुदा जीवन केँ तहत रसीला कों कमरे मे लें जाता औऱ अपनाहक जताते हुएउसे पेलना शुरुआत करता। रसीला ऊपर केँ कमरे मे राघव केँ नीचे लेटी रहती, पऱ उसका दिमाग़ औऱ उसकी यादें अभि भि सुभह वाले मेरे कड़क धक्कों मे बसी होतीं। राघव अपनी कमज़ोर औऱ थकी हुई रफ़्तार सें अपनाकाम ख़त्म करता, औऱ रसीला बस चुपचाप सह लेती क्योंकि उसे राघव कों खुश रखना थां ताकिकोई शक न् होँ।
नीचे अपने कमरे मे लेटाहुआ, मे ऊपर कि छत कों देखता औऱ राघव केँ धक्कों कि हलकीथाप सुनता। मुझेकोई जलन नहि होती थि, बल्कि एक् अजीब सां ठरकीमज़ा आता थां। मुझेपता थां कि राघव चाहे जितना ज़ोरलगा लें, रसीला केँ बदन कि असली चाबी औऱ उसकी असली प्यास अबइस भइया केँ पास हि गिरवी रखी हैं।
ये सिलसिला हफ़्तों चलतारहा। राघव अपनी हि दुनिया मे खुश थां, रसीला रोज़ सुभह मेरे पलंग कि रानी बनती थि!
झूठा झूला बहेंन कों झुलाया – New Episode
भाग 11
एक् साम राघवजब फैक्टरी कि कड़क बारह घंटे कि ड्यूटी करकेघऱ लौटा, तोँ उसके चेहरे पर्र थकान सें अधिक एक् अजीब सि उत्सुकता औऱ खुशी थि। उसने सोफे पर्र अपनाबैग पटका औऱ रसीला कों आवाज़ दि, जोँ उससमय किचन मे रात केँ खाने कि तैयारी कररही थि। मे भि अपने कमरे मे बैठा एक् Multimeter साफकर रहा थां, राघव कि आवाज़ सुनकर मे भि बाहर् हॉल मे आँ गय़ा।
"रसीला! जितेश भइया!जरा बाहर् आओ, एक् बहोत बड़ी खुशखबरी हैं, " राघव नें मिठाई कां डिब्बा टेबल पर्र रखतेहुए कहा।
रसीला अपनी साड़ी केँ पल्लू सें हाथ पोंछती हुइ बाहर् आई, "क्याँ बात हैं जी?आजबड़े खुशदिख रहे हौ?"
"अरेखुश क्यूं नं हूं! मेरेसगे छोटे भइया विक्रांत कां मोबाइल आया थां। दिल्ली मे उसकी पढ़ाई पूरी हौ गई हैं औऱ अब वोँ आगे कि सरकारी जॉब कि तैयारी केँ लिए अगले हफ्ते हमारे हि घऱ रहने आँ रहा हैं, " राघव नें चहकते हुएकहा। फिन उसने मेरीतरफ देखा, "जितेश भइया, मेरा वोँ छोटा भइया हैं पर्र वोँ आज तक तुम् लोगों सें कभीमिल नहि पाया। यहा तक कि जब मेरी औऱ रसीला कि विवाह हुईँ थि, तब उसकी फाइनल एग्जाम्स चलरही थीं औऱ दिल्ली केँ उसबड़े कॉलेज केँ कड़े नियमों कि वजह सें उसे छुट्टी नहि मिलपाई थि। वोँ विवाह मे भि नहि आँ पाया थां। "
राघव तोँ अपनी हि धुन मे खुश थां, पऱ उसकीये बात सुनते हि मेरे औऱ रसीला केँ बीच एक् सेकंड केँ लिए सन्नाटा खिंच गय़ा। हमने एक्-दूसरे कि तरफ देखा। हमारे इस सुलगते हुएघऱ मे, जहाँ राघव कि नाक केँ नीचे हमारा ये गंदाखेल रोज़ कां नियमबन चुका थां, अब एक् तीसरे औऱ सगे रिश्तेदार कि एंट्री होनेजा रही थि।
अब मे आपकोउस विक्रांत केँ बारे मे थोड़ा खुलकर बताता हूं कि वोँ असल मे चीज़ क्याँ थां।
विक्रांत दिखने मे तौ राघव कां सगा छोटा भइया थां, पऱ उसका मिजाज औऱ खून राघव सें बिल्कुल अलग थां। वोँ बचपन सें हि दिल्ली जैसेबड़े शहर मे अपनी फूफी केँ पास रहकर पढ़ा-बढ़ा थां। दिल्ली कि बड़ी गाड़ियों, मॉडर्न लाइफस्टाइल औऱ वहा केँ खुलेपन नें उसे बहोत कम उम्र मे हि बहुततेज औऱ शातिर बना दिया थां। उम्र उसकीयही कोई२४ साल कि थि, पर्र जिस्म जिम जाकर एकदम गठीला, चौड़ा औऱ कड़क लोहे जैसाबना चुका थां। वोँ गाँव-गांव केँ सीधे-सादे लड़कों जैसा बिल्कुल नहि थां; उसकी आँखों मे बड़ेशहर कि वोँ चालाक ठरकसाफ़ झलकती थि जोँ किसी भि चीज़ कों भांपने मे माहिर होती हैं।
खैर, राघव नें तौ साफ़कह दिया थां, "जितेश भइया, तुम् बड़े होँ, अब विक्रांत यहा आएगा तोँ तुम् दोनों सगे भाइयों कि तरह रहना औऱ उसे किसीचीज़ कि कमीमत होने देना। "
मैंने मुस्कुराकर हाँ तोँ कह दिया, पर्र अंदर हि अंदर मेरा दिमाग़ चालू हौ चुका थां। रसीला भि रात कों जब मेरे कमरे मे आई, तौ उसके चेहरे पऱ भि एक् घबराहट थि।
"भइया। वोँ दिल्ली सें आँ रहा हैं। राघवजी तोँ सीधे हें, पर्र सुना हैं विक्रांत बहोत तेज़ हैं। हमारी विवाह मे भि नहि आया थां, तौ वोँ मुझेठीक सें जानता भि नहि। अगरउसे हमारे बारे मे थोड़ा भि शकहुआ, तौ क्याँ होगा?" रसीला नें मेरे सीने पऱ हाथ रखकर घबराते हुए पूछा।
"तुँ फिक्र मतकर रसीला, " मैंने उसके ब्लाउज केँ अंदरहाथ डालकर उसकीकड़क छाती कों पूरी ताक़त सें भींचा। "वोँ शहरी बाबू चाहे जितना भि तेज़ हौ, इसघऱ कां राजा मे हूं। उसेभनक भि नहि लगेगी कि उसकीपीठ पीछेइस घऱ केँ बंदरूम मे क्याँ पकरहा हैं। तुँ बस अपनेइस भइया पर्र भरोसा रख। "
औऱ फिन, ठीक एक् हफ्ते बाद वोँ जून कां दिनआया, जब सुभह कि ट्रेन सें विक्रांत हमारे शहर केँ स्टेशन पऱ उतरा औऱ सीधे हमारे घऱ पहुंचा.
ऑटो सें जब वोँ अपना भारीबैग लेकर उतरा, तौ उसे देखकर पहली नज़र मे साफ़लग रहा थां कि वोँ बड़ेशहर केँ एक् अच्छे माहौल मे पढ़ा-लिखा लड़का हैं। हल्के नीलेरंग कि जींस औऱ सफेद शर्ट पहने, एकदम कड़क औऱ गठीले शरीर कां २४साल कां जवान लड़का।
"नमस्कार भाभी, नमस्कार जितेश भइया, "घऱ केँ अंदरआते हि विक्रांत नें बहोत हि तमीज़ सें रसीला केँ पांवछुए औऱ फिन मुझसे बड़ेअदब सें हाथ मिलाया।
राघव भइया कि विवाह मे वोँ अपनी फाइनल एग्जाम्स औऱ फूफी केँ सख्त नियमों कि वजह सें नहि आँ पाया थां, इसलिये रसीला कों वोँ पहलीबार देखरहा थां। रसीला नें भि मुस्कुराकर झट सें अपनेसिर कां पल्लू ठीक किया औऱ बोलि, "जीतेरहो विक्रांत। सफर सें थकगए होगे, तुम् बैठो मे पानी औऱ गरमचाय लाती हूं। "
शुरुआती दस-बारह दिन बिल्कुल सीधे औऱ शांत तरीके सें बीते। विक्रांत कां पूरा ध्यान केवल अपनी पढ़ाई पऱ थां। राघव भइया सुभह७ बजे अपनी फैक्टरी कि लंबी शिफ्ट पऱ निकल जाते, औऱ उनके जाते हि विक्रांत हॉल मे कूलर केँ सामने अपनी बड़ी-बड़ी किताबें औऱ नोट्स खोलकर बैठ जाता। जब भि रसीला उसेगरम चाय याँ खानां देने जाती, वोँ हमेशा नज़रें नीचे करके 'धन्यवाद भाभी' बोलता औऱ वापस अपनी पढ़ाई मे लग जाता। वोँ सच मे बहोत सीधा औऱ अपनेकाम सें काम रखने वाला लड़का थां।
रसीला भि रात कों जब चुपके सें मेरे कमरे मे आती, तौ मुझसे कहती, "भइया, विक्रांत तौ बहोत सीधा औऱ संस्कारी लड़का हैं। रात-दिन बस अपनी किताबों मे हि खोया रहता हैं, उसेघऱ कि किसीबात सें कोई मतलब हि नहि हैं। "
"हाँ, लड़कासच मे बहोत सीधा औऱ सुलझा हुआ हैं, " मैंने रसीला कों अपनी बाहों मे भींचते हुएकहा थां।
चूँकि विक्रांत अपनी पढ़ाई मे पूरीतरह डूबा रहता थां, इसलिये कुछ दिनों बाद हमारे मन सें वोँ शुरुआती हिचक औऱ डर बिल्कुल समाप्त होँ गय़ा। हमें लगनेलगा कि वोँ लड़का अपनी किताबों सें बाहर् देखता हि नहि हैं।
फिनआया वोँ मंगलवार कां दिन। बाहर् भयंकर गर्मी थि औऱ उमस बहोत अधिक थि। राघव भइया हमेशा कि तरह अपनी फैक्टरी कि ड्यूटी पर्र थें। विक्रांत बाहर् हॉल मे अपनी किताबों केँ ऊपर हि आँखें मूंदकर लेटाहुआ थां, ऐसालग रहा थां जैसे पढ़ते-पढ़ते थककरसो गय़ा हौ।
इधर किचन मे रसीला दोपहर केँ खाने कि तैयारी कररही थि। उसउमस भरी गर्मी औऱ पसीने कि वजह सें उसकी साड़ी कां पल्लू सरककर उसकीकमर पर्र लिपटा हुआ थां औऱ उसकी गोरी, सुडौल पीठ किचन कि मद्धम रोशनी मे पूरीतरह सें चमकरही थि।
मे अपने कमरे सें निकला। हॉल सें गुजरते टाइम मैंने देखा कि विक्रांत गहरी नींद मे सोयाहुआ हैं। हमारे दिमाग़ सें डरअब पूरीतरह गायब होँ चुका थां। मे दबे पाँव किचन केँ अंदर दाखिल हुआ औऱ बिनाकोई आवाज़ किए, पीछे सें रसीला केँ पेट पऱ अपने दोनों कड़कहाथ डालदिए.
जैसे हि मेरे कड़कहाथ रसीला केँ पेट पर्र पड़े, वो एक् झटके मे सिहरउठी। उसने पीछे मुड़कर देखा औऱ जब मेरी प्यासी आँखें देखीं, तौ उसकी घबराहट एक् मदहोश मुस्कान मे बदल गई।
"भइया। क्याँ कररहे हौ? वोँ बाहर् सोरहा हैं, उठ गय़ा तौ?" रसीला नें बहोत हि धीमी आवाज़ मे फुसफुसाते हुएकहा, पऱ उसका शरीर जल्दी मेरे स्पर्श केँ आगे ढीलापड़ गय़ा।
"सोरहा हैं वोँ गहरी नींद मे, तुँ फिक्र मतकर, " मैंने अपनी भारी आवाज़ मे कहा औऱ उसे घुमाकर सीधे किचन केँ कड़क स्लैब सें सटा दिया।
इतने दिनों कि छिपी हुई उतावलापन औऱ विक्रांत केँ आने केँ बाद सें जौ थोड़ी-बहोत पाबंदी लगी थि, वो उस तपती दोपहर मे एक् झटके मे पिघल गई। मैंने बिना एक् सेकंड गंवाए रसीला केँ भीगे होंठों कों अपने मुँह मे भींच लिया। रसीला कि आँखें मदहोशी मे बंद होँ गईं औऱ उसने अपनी दोनों बाहें मेरी गर्दन मे कसदीं। मेरा एक् हाथ उसकी पतली साड़ी केँ अंदर घुसा औऱ ब्लाउज कों ऊपर सरकाते हुए उसकी भारी, कड़क छाती कों पूरी ताक़त सें मसलने लगा। रसीला केँ मुँह सें दबी-कुचली सिसकियाँ फूट पड़ीं—"आहह-आहह। भइया। स्स्स। कोई आँ जाएगा."
हम् दोनों इस कड़क फोरप्ले औऱ चूमा-चाटी मे इसकदर अंधे होँ चुके थें कि हमेंइस बात कां अंदाज़ा हि नहि रहा कि हमारी लापरवाही कितनी भारी पड़ने वाली हैं।
दरअसल, बाहर् हॉल मे कूलर कि आवाज़ केँ बीच, किचन सें आने वाली रसीला कि चूड़ियों कि खनक औऱ हमारी दबी हुईँ सांसों कि आवाज़ नें विक्रांत कि नींदखोल दि थि। वो पानी पीने केँ बहाने किचन कि तरफ बढ़ा। जैसे हि उसने किचन केँ दरवाज़े पर्र लगे पतले पर्दे कों थोडा सां सरकाया, अंदर कां नज़ारा देखकर उसके पैरों केँ नीचे सें ज़मीन खिसक गई।
फूफी केँ यहा दिल्ली मे रहकर पढ़ाई करने वाला सीधा-साधा विक्रांत, जोँ अपनीइस नई भाभी कों एक् संस्कारी रूप मे देखता आया थां, वो येसोच भि नहि सकता थां कि उसके अपने बड़े भइया कि पत्नि, अपने हि सगे भइया (जितेश) कि बाहों मे इसतरह खोई हुई हैं। विक्रांत कि आँखें फटी कि फटीरह गईं। उसकामन पूरीतरह सुन्न होँ गय़ा।
सगे भइया-बेहन केँ बीचइस खौफनाक औऱ ठरकीखेल कों अपनी आँखों केँ सामने लाइव चलते देख्ना उसकेलिए एक् ज़बरदस्त झटका थां। वो न् तोँ चिल्ला पाया, न् पीछेहट पाया। वो वहीं पर्दे केँ पीछे खड़ा, अपनी सांसें रोककर उस नज़ारे कों देखने लगा।
तभी रसीला नें मदहोशी मे अपनी आँखें खोलीं औऱ उसकी नज़र सीधे दरवाज़े कि दरार सें झांकती विक्रांत कि फटी हुइ औऱ हैरान आँखों पर्र पड़ गई।
"भा। भइया। विक्रांत." रसीला नें थरथराते हुए मुझे पीछे धकेला, उसका चेहरा डर केँ मारे बिल्कुल सफेदपड़ चुका थां, जैसे उसके शरीर कां पूराखून सूख गय़ा होँ।
मैंने बिजली कि फुर्ती सें पलटकर देखा। विक्रांत दरवाज़े केँ पीछे खड़ा काँपरहा थां, उसका चेहरा लाल हौ चुका थां औऱ वो हमें हि देखरहा थां। हमारे बीच कां वोँ बरसों कां राज, जौ राघव कि नाक केँ नीचे सुरक्षित थां, आज विक्रांत केँ सामने पूरीतरह खुल चुका थां।
विक्रांत केँ पकड़े जाने केँ बाद, उस दोपहर घऱ मे जैसेमौत कां सन्नाटा पसर गय़ा थां। विक्रांत बिनाकुछ बोले, झटके सें पीछेहटा औऱ अपने कमरे मे जाकर अंदर सें द्वार (दरवाज़ा) बंदकर लिया। किचन मे रसीला केँ घुटने काँपरहे थें, वो वहीं ज़मीन पर्र बैठ गई औऱ फूट-फूटकर रोनेलगी। उसका पूरा जिस्म डर केँ मारे थरथरा रहा थां।
"भइया.अब सभी ख़त्म होँ गय़ा। विक्रांत राघवजी कों सभीबता देगा। मे जानदे दूँगी भइया, मे राघवजी कां सामना नहि कर पाऊँगी, " रसीला नें रोतेहुए मेराहाथ पकड़ लिया।
मैंने उसे उठाया औऱ दबे पाँव अपने कमरे मे लें आया। मेरा अपना दिमाग़ सुन्न थां, पर्र एक् शातिर भइया होने केँ नाते मुझेपता थां कि अगरइस टाइम हौसला हारा, तौ हम् दोनों सीधेजेल याँ श्मशान पहुँचेंगे। मैंने रसीला कों बेड पर्र बैठाया, उसे पानी पिलाया औऱ उसके आँसू पोंछे।
"चुप हौ जा रसीला, रोने सें कुछ नहि होगा। अब मेरीबात ध्यान सें सुन, " मैंने उसकी आँखों मे आँखें डालकर बहोत हि गंभीर औऱ भारी आवाज़ मे कहा। "विक्रांत दिल्ली सें आया हैं, सीधा हैं, मगर जवान हैं। उसने हमेंइस हाल मे देख लिया हैं। अगर हमेंइस राज कों हमेशा केँ लिएदफन रखना हैं औऱ राघव तक बात पहुँचने सें रोकनी हैं, तौ हमें विक्रांत कों डराना नहि हैं, बल्कि उसे अपनेसंग इसखेल मे शामिल करना होगा। "
रसीला नें चौंककर अपनी सूजी हुईँ आँखें उठाईं, "शामिल? भइया, आप् क्याँ कहरहे होँ? वोँ राघवजी कां सगा छोटा भइया हैं, वोँ क्यूं हमारी बात मानेगा?"
मैंने रसीला केँ ठंडेपड़ चुके चेहरे कों अपने हाथों मे लिया औऱ बहोत हि इमोशनल मगर रियलिस्टिक अंदाज़ मे समझाया, "देख रसीला, वोँ भले हि राघव कां भइया हैं, पर्र हैं तोँ एक् २४साल कां जवान लड़का हि। आज किचन मे जब उसने तुम्हारी तरफइस मदहोश हालत मे देखा होगा, तौ उसके अंदर कां मर्द भि जागा होगा। अब इस दलदल सें निकलने कां केवल एक् हि मार्ग हैं। तुम्हे अपने खूबसूरती कां इस्तेमाल करना होगा। तुम्हें स्वयं आगे बढ़कर उसे मनाना होगा। "
ये सुनते हि रसीला कां चेहरा औऱ पीलापड़ गय़ा, "नहि भइया। मुझसे ये नहि होगा। मे आपकी बेहन हूं, मैंने आपकेआगे अपनासभी कुछहार दिया क्योंकि मे आपसे प्रेम करती हूं। पऱ विक्रांत। वोँ मेरा देवर जी हैं। "
"रसीला, मेरीबात समझ!" मैंने उसकी छाती पऱ हाथ रखकरउसे अपने लगभग खींचा। "येकोई शौक नहि, हमारी मजबूरी हैं। अगर विक्रांत नें राघव कों बता दिया, तौ राघव तौ जीते-जी मर हि जाएगा, पर्र हमारा क्याँ होगा? समाज हमें जीने नहि देगा। तुम को विक्रांत केँ पास जानां होगा, उससेबात करनी होगी, अपनी लाचारी औऱ आँसू दिखाने होंगे। जब एक् जवान देवरु केँ सामने उसकी भाभीइस तरह रोएगी, अपनी इज़्ज़त कि भीख माँगेगी, औऱ संग मे अपनी हुस्न कां हल्का सां जलवा दिखाएगी। तोँ दुनिया कां कोई भि मर्द पिघल जाता हैं। वोँ आसानी सें नहि मानेगा, वोँ नखरे दिखाएगा, शायद क्रोध भि करेगा, पर्र तुझेही हार नहि माननी हैं। "
रसीला मेरी तरफ़ देखती रही। उसकी आँखों मे एक् तरफ़ अपने भइया केँ लिए बेइंतहा प्रेम औऱ समर्पण थां, तौ दूसरी तरफ़ अपनी पूरी गृहस्थी उजड़ने कां भयानक खौफ। वो समझ चुकी थि कि येखेल अबउस मोड़ पऱ आँ चुका थां जहाँ अपनी इज़्ज़त औऱ जान बचाने केँ लिएउसे अपने देवर जी केँ सामने भि झुकना हि पड़ेगा।
"अगर.अगर इससे हमारे इसराज कि उम्र बढ़ती हैं भइया, औऱ आपकीजान बचती हैं। तोँ मे ये भि करूंगी, " रसीला नें भारीमन सें, अपने आँसू पोंछते हुएकहा। उसकी आवाज़ मे एक् अजीब सि लाचारी औऱ रोना थां।
साम केँ लगभग४ बजरहे थें। राघव केँ आने मे अभि दो घंटे बाकी थें। मैंने रसीला कों इशारा किया। रसीला नें अपनी साड़ी ठीक कि, चेहरे कों साफ़ किया औऱ काँपते हुए कदमों सें विक्रांत केँ कमरे कि तरफ़ बढ़ी। उसने विक्रांत केँ बंद दरवाज़े पर्र बहोत हि हलकी सि दस्तक दि।
"विक्रांत। द्वार (दरवाज़ा) खोलो बाबू, भाभी हूं." रसीला कि रुआंसी आवाज़ सन्नाटे कों चीरती हुईँ गूँजी।
अंदर सें कोई आवाज़ नहि आई। रसीला नें एक् बारफिन काँपते हुए हाथों सें दरवाज़े पऱ दस्तक दि, "विक्रांत। प्लीज़ द्वार (दरवाज़ा) खोलो। मेरीबात सुनलो बाबू। तुम्हारे भैया केँ आने कां समय होँ रहा हैं। "
कुछ सेकंड कां भारी सन्नाटा पसरारहा, औऱ फिनखट कि आवाज़ केँ संग कुंडी खुली। विक्रांत दरवाज़े पऱ खड़ा थां। उसका चेहरा गुस्से औऱ हैरानी सें लाल थां, औऱ उसकी आँखें सीधे रसीला केँ चेहरे पऱ टिकीथीं। उसनेकुछ नहि कहा, बस पीछे हटकर कमरे केँ कोने मे जाकर खड़ा होँ गय़ा, जौ इसबात कां इशारा थां कि वो बात करने कों रेडी हैं।
रसीला दबे पाँव अंदरआई औऱ धीरे-धीरे सें द्वार (दरवाज़ा) बंदकर दिया। कमरे मे खिड़की सें आँ रहीसाम कि मद्धम रोशनी थि। रसीला नें जब विक्रांत कि तरफ़ देखा, तौ उसके सब्र कां बांधटूट गय़ा। वो सीधे विक्रांत केँ पैरों केँ पास घुटनों केँ बलबैठ गई औऱ उसकेहाथ पकड़कर फूट-फूटकर रोनेलगी।
"विक्रांत। मुझे क्षमा करदो बाबू। हमसे बहोत बड़ापाप हौ गय़ा हैं, " रसीला नें सिसकते हुएकहा, उसके आँसू विक्रांत केँ हाथों पऱ गिररहे थें। "पर्र ईश्वर केँ लिए अपने भैया कों कुछमत बताना। वोँ सीधे-सादे इंसान हें, ये सदमा बर्दाश्त नहि कर पाएंगे। हमारा पूरा हंसता-खेलता परिवार बिखर जाएगा। "
विक्रांत नें झटके सें अपनाहाथ छुड़ाया औऱ भारी आवाज़ मे बोला, "भाभी! आप् यह क्याँ कहरही हें? भैया आप् पर्र आँखबंद करके भरोसा करते हें। औऱ जितेश भइया। वोँ तौ इसघऱ केँ बड़े हें। आप् दोनों मिलकर भैया कि पीठ मे इतना बड़ा छुरा घोंपरहे थें? दिल्ली मे मैंने दुनिया देखी हैं भाभी, पऱ अपने हि घऱ मे ऐसा। मैंने कभी ड्रीम्स मे भि नहि सोचा थां। "
विक्रांत कि आवाज़ मे क्रोध भि थां औऱ एक् गहरीचोट भि। वोँ अपनी किताबों औऱ आदर्शों कि दुनिया सें अचानक इस कड़वी सच्चाई केँ सामने खड़ा थां।
रसीला नें अपने आँसू पोंछे औऱ धीरे-धीरे सें उठकर खड़ी हुईँ। इस भावुक समय मे, उसकी साड़ी कां पल्लू एक् बारफिन उसके काँपते कंधों सें सरक गय़ा थां। पसीने औऱ आँसुओं सें भीगा उसका गोरा चेहरा औऱ उसकी लाचारी इस टाइम किसी भि मर्द केँ दिल कों पिघलाने केँ लिए बहुत थि। वो विक्रांत केँ बिल्कुल लगभगआई, इतनी लगभग कि विक्रांत कों रसीला कि तेज़ चलती सांसों कि गर्माहट महसूस होनेलगी।
"मे जानती हूं विक्रांत, तुम् हमेंकभी क्षमा नहि करोगे, " रसीला नें अपनी रुआंसी, भारी औऱ बेहद संजीदा आवाज़ मे सीधे उसकी आँखों मे देखते हुएकहा। "येसभी केसे शुरुआत हुआ, मे तुम्हें नहि समझा सकती। पर्र आज मेरी, तुम्हारे भैया कि औऱ इसघऱ कि इज़्ज़त पूरीतरह तुम्हारे हाथ मे हैं। तुम् जोँ सज़ा दोगे, मुझे मंज़ूर हैं। तुम् जोँ कहोगे, मे वोँ करूंगी। बस अपने भैया केँ सामने इसघऱ कों श्मशान मत बनाना। "
'तुम् जौ कहोगे, मे वोँ करूंगी.'—रसीला केँ मुँह सें निकले इन शब्दों औऱ उसकी आँखों मे छिपी बेबसी नें विक्रांत केँ भीतर एक् अजीब सि हलचल पैदाकर दि।
विक्रांत नें पहलीबार भाभी कों इतने लगभग सें देखा थां। गुस्से केँ पीछे छुपा उसका एक् जवान मर्द कां वजूदअब आरामसे रसीला केँ इस खूबसूरती औऱ लाचारी केँ आगे डगमगाने लगा थां। उसकी नज़रें रसीला केँ भीगे होंठों औऱ उसके काँपते हुए शरीर पर्र ठहरगईं। वो आसानी सें मानने वाला नहि थां, शहर कां पढ़ा-लिखा लड़का थां, पऱ इस टाइम उसकी सांसें भि भारी होनेलगी थीं।
"आप्। आप् अपनी इज़्ज़त बचाने केँ लिएकुछ भि करने कों सजधजकर हें भाभी?" विक्रांत नें अपनी आवाज़ कों कड़क रखने कि कोशिश कि, पर्र उसमें अब गुस्से सें अधिक एक् अजीब सां खिंचाव आँ चुका थां।
बाहर् कमरे मे खड़ा मे, दरवाज़े कि दरार सें उनकेबीच कि इस कशमकश कों देखरहा थां। मुझे साफ़समझ आँ रहा थां कि रसीला केँ आँसू औऱ उसके खूबसूरती कां चमत्कार कामकर रहा थां, पर्र विक्रांत इतनी आसानी सें घुटने टेकने वालों मे सें नहि थां। खेलअब एक् बहोत हि नाज़ुक औऱ गहरे मोड़ पर्र आँ चुका थां।
रसीला नें विक्रांत कि आँखों मे आएउस बदलाव कों भाँप लिया। एक् स्त्री होने केँ नाते वो समझ चुकी थि कि देवरु कां क्रोध अब आहिस्ता एक् जवान मर्द कि कशमकश मे बदलरहा थां। उसने अपनी भारी पलकें उठाईं, जिनमें अभि भि आँसूतैर रहे थें, औऱ बेहद धीमी, भावुक आवाज़ मे कहा:
"हाँ विक्रांत। इसघऱ कों उजड़ने सें बचाने केँ लिए, अपने सुहाग कि लाज रखने केँ लिए.ये अभागन कुछ भि करने कों सजधजकर हैं। तुम् जोँ चाहो, जैसा चाहो, जोँ शर्त रखना चाहोरख लो बाबू.बस अपने भैया कों कुछमत कहना। "
विक्रांत नें एक् गहरी सांसली। वो कुछकदम पीछेहटा औऱ खिड़की कि तरफ मुड़ गय़ा, जहाँ सें साम कि धुंधली रोशनी उसके गठीले जिस्म पऱ पड़रही थि। कमरे मे मात्र रसीला केँ सुबकने कि हलकी आवाज़ आँ रही थि। विक्रांत बहुतदेर तक चुपरहा, जैसे अपने अंदरचल रहेसही औऱ गलत केँ तूफान सें लड़रहा होँ। वो दिल्ली कां पढ़ा-लिखा लड़का थां, वो जानता थां कि जौ उसने देखा हैं वो एक् बहोत बड़ापाप हैं, पर्र उसके सामने इस वक़्त उसकी बेहद हसीन औऱ लाचार भाभी खड़ी थि, जोँ अपनी पूरी इज़्ज़त उसके कदमों मे डाल चुकी थि।
आखिरकार, वो दोबारा रसीला कि तरफ पलटा। उसकी आँखों मे अब वो प्राचीन क्रोध नहि थां, बल्कि एक् गहरा, भारी सन्नाटा औऱ एक् अजीब सि शर्त थि।
"ठीक हैं भाभी। मे भैया कों कुछ नहि बताऊंगा, " विक्रांत नें बहोत हि गंभीर औऱ ठंडे लहजे मे कहा।
ये सुनते हि रसीला केँ चेहरे पऱ जैसे जीवन वापसलौट आई, "सचमुच विक्रांत बाबू? तुम्हारा ये अहसान मे जीवनभर."
"पूरीबात सुन लीजिए भाभी, " विक्रांत नें उसेबीच मे हि टोकते हुए उसकी आँखों मे सीधे देखा। "मैंने कहा कि मे भैया कों कुछ नहि बताऊंगा, पर्र इसका मतलबये नहि हैं कि मे इससभी कों भूल गय़ा हूं। मेरी एक् शर्त हैं। आज केँ बाद, जौ कुछ भि इसघऱ केँ बंदरूम मे होगा, उससे मे अपनी आँखें फेर लूंगा। मगर बदले मे, मुझे भि इसघऱ मे पराया बनकर नहि रहना हैं। जब आप् जितेश भइया केँ लिए किचन कां दरवाजा बंदकर सकती हें, तौ इस देवर जी कों भि हक़ मिलना चाहिए कि जब उसकामन करे, वोँ अपनी भाभी केँ हाथ कि कड़कगरम चाय। अपने तरीके सें पीसके। "
विक्रांत केँ मुँह सें इतनीसाफ औऱ भारी शर्त सुनकर रसीला कां दिल एक् झटके केँ लिएथम गय़ा। वो समझ चुकी थि कि विक्रांत कां इशारा किसतरफ थां। वो आसानी सें नहि माना थां; उसनेचुप रहने कि एवज मे रसीला केँ उसबदन औऱ खूबसूरती कां एक् हिस्सा मांग लिया थां, जिस पऱ अब तक मात्र मेराराज थां।
रसीला नें एक् बार मुड़कर बंद दरवाज़े कि तरफ देखा, जिसके पार मे खड़ासभी सुनरहा थां। फिन उसने एक् गहरी, भारी सांसली औऱ अपनी आँखें बंद करके धीरे-धीरे सें अपनासिर हाँ मे हिला दिया।
"जैसी तुम्हारी मर्जी विक्रांत। आज सें ये भाभी तुम्हारी भि हुई, " रसीला नें बेहद भावुक औऱ डूबी हुई आवाज़ मे अपनीहार स्वीकार करतेहुए कहा।
विक्रांत केँ चेहरे पर्र एक् धीमी, शातिर मुस्कान तैर गई। उसनेआगे बढ़कर रसीला केँ काँपते हुए कंधे पऱ हाथरखा औऱ उसकी साड़ी केँ सरकेहुए पल्लू कों बहोत हि सलीके सें वापस उसके कंधे पऱ रख दिया। इस छुअन मे एक् नयाहक औऱ एक् नई शुरुआत छिपी थि।
"अब आप् जाइए भाभी, भैया केँ आने कां समय हौ रहा हैं। गरमचाय बनाइए, आज मे भि आपकेहाथ कि गरमचाय चैन सें पिऊंगा, " विक्रांत नें कहा।
रसीला कमरे सें बाहर् निकली। उसका चेहरा लाल थां औऱ आँखों मे एक् अजीब सि लाचारी केँ संग-संग राहत भि थि। जब वो मेरेपास सें गुजरी, तौ उसने मात्र इतना फुसफुसाया, "राजबच गय़ा भइया। पऱ खेलअब बदल चुका हैं। "
ठीकआधे घंटेबाद, ६बजे राघव भइया केँ स्कूटर कि आवाज़ बाहर् गूँजी। वो हमेशा कि तरह थके-हारे मुस्कुराते हुएघऱ केँ अंदर दाखिल हुए, इस बात सें पूरीतरह बेखबर कि उनकी गैर-मौजूदगी मे उनकेसगे भइया औऱ उनकी पत्नि केँ बीच भरोसे कां एक् नया औऱ गहरा सौदा होँ चुका थां।
झूठा झूला बहेंन कों झुलाया - Next part mein bada twist
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