झूठा झूला बहेंन कों झुलाया – New Episode
भाग 12
राघव भइया नें हॉल मे आते हि अपनाबैग सोफे पऱ पटका औऱ ज़ोर सें आवाज़ दि, "रसीला! ज़रा कड़कगरम चाय बनाना भाग्यवान, आज फैक्टरी मे बहोत काम थां, सिरफटा जारहा हैं। "
रसीला जौ अभि-अभि विक्रांत केँ कमरे सें निकलकर किचन मे आई थि, उसने जल्दी अपनी सांसों कों काबू मे किया, चेहरे सें डर औऱ लाचारी केँ भाव मिटाए औऱ एक् संस्कारी पत्नि कि तरह मुस्कुराते हुए बाहर् आई।
"अभि लाती हूं जी, आप् अंग-अंग धोकर फ्रेश हौ जाइए, " रसीला नें कहा। उसकी आवाज़ मे ज़रा सि भि थरथराहट नहि थि, पऱ उसकी आँखें एक् बारहॉल मे बैठे विक्रांत औऱ कोने मे खड़े मेरे (जितेश) चेहरे सें होकर गुजरीं।
राघव भइया बाथरूम कि तरफचले गए। हॉल मे अब मात्र मे औऱ विक्रांत बचे थें। विक्रांत सोफे पर्र आहिस्ता बैठ गय़ा औऱ अपनी पुस्तक केँ पन्ने पलटने लगा, जैसे दोपहर कों कुछहुआ हि नं हौ। उसने मेरीतरफ देखा औऱ बहोत हि शांत, करीब ठंडे लहजे मे बोला, "जितेश भइया, जरा देख्ना कूलर कां रेगुलेटर शायद ढीला होँ गय़ा हैं, हवाकम आँ रही हैं। "
उसकी आवाज़ मे कोई दुश्मनी नहि थि, पर्र एक् ऐसारोब औऱ हक थां जिसने मेरे अंदरआग लगा दि। मेरामन किया कि साले कां कॉलर पकड़कर उसे यहींठोक दूँ, पऱ मेरी मजबूरी औऱ रसीला कि इज़्ज़त नें मेरेहाथ बांधरखे थें। मैंने बिनाकुछ बोले, घूंट पीकरआगे बढ़कर रेगुलेटर ठीककर दिया।
थोड़ी देर मे राघव भइया फ्रेश होकर सोफे पर्र आकरबैठ गए। रसीला ट्रे मे गरमचाय केँ तीन गिलास औऱ बिस्कुट लेकरआई। उसने पहला गिलास राघव भइया कों दिया, औऱ फिन दूसरा गिलास लेकर विक्रांत कि तरफ बढ़ी।
जब रसीला नें विक्रांत कों गरमचाय कां गिलास पकड़ाया, तौ विक्रांत नें जानबूझकर गिलास पकड़ते समय अपनी उंगलियाँ रसीला कि गोरी उंगलियों पर्र टिकादीं। रसीला कां जिस्म उस छुअन सें एक् समय केँ लिए सिहरउठा, पर्र उसने जल्दी स्वयं कों संभाला। विक्रांत नें रसीला कि आँखों मे सीधे देखते हुए एक् शातिर मुस्कान केँ संगकहा, "धन्यवाद भाभी, सच मे आपकेहाथ कि गरमचाय कां कोई जवाब नहि हैं। "
"अरेहाँ विक्रांत बाबू! रसीला केँ हाथ कि गरमचाय तौ लाजवाब होती हि हैं, " राघव भइया नें गरमचाय कि चुस्की लेतेहुए कहा औऱ हंसने लगे। उन्हें क्याँ पता थां कि उनकासगा छोटा भइयागरम चाय कि आड़ मे किसहक कि बातकर रहा थां।
मे बगल मे बैठागरम चायपी रहा थां, पऱ अंदर हि अंदर मेराखून उबलरहा थां। रसीला नें हमारी जान औऱ राज तोँ बचा लिया थां, पर्र जौ सौदा वोँ करकेआई थि, उसे सोचकर हि मेरे सीने मे जलन कि आग सुलगरही थि। जिस रसीला पऱ मात्र मेराहक थां, अब उसकी लाचारी कां फायदा उठाने केँ लिएये शहरी बाबू लाइन मे खड़ा हौ चुका थां।
रात कां खानां किसीतरह भारीमन सें बीता। राघव भइया जल्द हि थककरऊपर अपने कमरे मे सोनेचले गए। विक्रांत भि बिना किसी सें कुछ बोले अपने कमरे मे गय़ा औऱ कुंडी लगाली।
रात केँ लगभग११ बजे, घऱ मे पूरीतरह सन्नाटा छा चुका थां। रसीला दबे पाँव नीचे मेरे कमरे मे आई औऱ सीधे मेरे सीने सें लगकर फूट-फूटकर रोनेलगी।
"भइया। मे अंदर सें मर गई हूं। विक्रांत नें जोँ शर्तरखी हैं, उसे सोचकर हि मुझे घिन्न आँ रही हैं। पर्र मे क्याँ करती?अगर मे हाँ नहि कहती तौ वोँ राघवजी कों सभीबता देता, " रसीला नें रोतेहुए फुसफुसाया।
मैंने रसीला कों कसकर अपनी बाहों मे भींच लिया। इस टाइम मेरे अंदर क्रोध भि थां औऱ बेबसी भि। मैंने उसके आँसू पोंछे औऱ बहोत हि भारी आवाज़ मे कहा, "रसीला। मुझेपता हैं तूनेये सभी मुझे औऱ इसराज कों बचाने केँ लिए किया हैं। साले विक्रांत नें हमारी मजबूरी कां फायदा उठाया हैं। पऱ अभि हमें शांत रहना होगा। अगर मे उससे लड़ने गय़ा याँ क्रोध दिखाया, तोँ वोँ बात बिगाड़ देगा। "
मैंने उसके चेहरे कों अपने हाथों मे लिया, मेरी आँखों मे जलन साफ़ थि, "अभि वोँ मात्र गरमचाय औऱ हलके-फुलके हक कि बातकर रहा हैं। वोँ देखरहा हैं कि हम् कितना डरते हें। तुँ बस राघव केँ सामने स्वयं कों नॉर्मल रख, औऱ विक्रांत सें जितना हौ सके दूरी बनाकर रख। हमें देख्ना होगा कि वोँ आगे क्याँ चाल चलता हैं। साले कों छोड़ूँगा तोँ मे भि नहि, पर्र सहीसमय आने पऱ। "
रसीला नें मेरे सीने पर्र सिररख दिया। राज तोँ बच गय़ा थां, पऱ अब मेरे औऱ रसीला केँ बीच एक् ऐसी दीवार खड़ी होँ चुकी थि जिसका नाम विक्रांत थां। खेलअब औऱ भि ज्यादा रिस्की औऱ खतरनाक हौ चुका थां, क्योंकि अबइसघऱ मे राघव केँ अंधे भरोसे केँ संग-संग, मेरीजलन औऱ विक्रांत कि शातिर शर्तों कां मुकाबला होने वाला थां।
अगले दो-तीन दिनघऱ मे एक् अजीब औऱ भारी सन्नाटे केँ बीच बीते। ऊपर सें सभीकुछ बिल्कुल नॉर्मल दिखरहा थां—राघव भइया रोज़ कि तरह सुभह अपनी ड्यूटी पर्र चले जाते, विक्रांत हॉल मे अपनी किताबें खोलकर बैठ जाता, औऱ रसीला किचन कां काम संभालती। मगरइस सामान्य सें दिखने वाले रूटीन केँ पीछे हम् तीनों केँ बीच एक् खामोश जंगचल रही थि।
मे जब भि अपने कमरे सें बाहर् निकलता, विक्रांत बहोत हि तमीज़ सें मुझसे बात करता, मगर उसकी आँखों मे अब एक् ऐसीचमक थि जौ मुझेहर लम्हा येयाद दिलाती थि कि रिमोट कंट्रोल अब उसकेहाथ मे हैं। मेराखून उबलता थां, पर्र रसीला औऱ अपनेराज कि खातिर मे ज़हर कां घूंट पीकररह जाता।
रसीला नें विक्रांत सें दूरी बनाने कि पूरी कोशिश कि। वो केवलकाम सें काम रखती, खानां याँ गरमचाय टेबल पऱ रखकर जल्दी किचन मे लौटआती। मगर विक्रांत भि बड़ेशहर कां शातिर लड़का थां; वो समझरहा थां कि रसीला उसे नजरअंदाज करने कि कोशिश कररही हैं। वो सीधेकोई ज़बरदस्ती नहि कररहा थां, बल्कि अपनी शर्तों कों बहोत हि ठंडे औऱ शातिर तरीके सें याद दिलारहा थां।
शुक्रवार कि दोपहर थि। भयंकर उमस औऱ गर्मी थि। राघव भइया फैक्टरी मे थें। मे घऱ कि वायरिंग चेक करने केँ बहाने छत पर्र गय़ा हुआ थां ताकि थोडा अकेला रह सकूं औऱ इस उलझन सें बाहर् निकल सकूं। नीचेघऱ मे मात्र रसीला औऱ विक्रांत थें।
रसीला किचन मे रात केँ लिएआटा गूंथरही थि। गर्मी कि वजह सें उसके माथे पर्र पसीने कि बूंदें आई हुइ थीं। तभी विक्रांत बहोत हि शांत कदमों सें किचन केँ अंदर दाखिल हुआ। उसकेहाथ मे पानी कां खाली गिलास थां।
रसीला नें जैसे हि उसकीआहट सुनी, वो चौंककर पीछेहटी औऱ अपनी साड़ी कां पल्लू ठीक करनेलगी।
"विक्रांत बाबू। पानी चाहिए? मे दे देती हूं, " रसीला नें अपनी आवाज़ कों सामान्य रखने कि कोशिश करतेहुए कहा।
"पानी तोँ मे स्वयं भि लें लूंगा भाभी, " विक्रांत नें फ्रिज सें बोतल निकालते हुए बहोत हि ठंडे लहजे मे कहा। उसने पानी पिया औऱ गिलास स्लैब पर्र रख दिया। पर्र वो किचन सें बाहर् नहि गय़ा। वो वहीं खड़ा होकर रसीला कों देखने लगा।
रसीला कां दिल तेज़ी सें धड़कने लगा, वो दोबारा आटा गूंथने लगी पऱ उसकेहाथ काँपरहे थें।
"भाभी, दो दिन सें देखरहा हूं। आप् मुझसे बहोत दूर-दूर भागरही हें। गरमचाय भि टेबल पऱ रखकरऐसे भागती हें जैसे मे कोईभूत हूं, " विक्रांत नें थोडा लगभगआते हुए धीमी आवाज़ मे कहा। उसकी आवाज़ मे क्रोध नहि थां, बल्कि वही बड़ेशहर वाली कड़क औऱ शातिर टोन थि।
"ऐसी.ऐसी कोईबात नहि हैं विक्रांत बाबू, काम बहोत रहता हैं बस." रसीला नें नीचे देखते हुएकहा।
"भाभी, मैंने आपसेकहा थां नाँ कि मे भैया कों कुछ नहि बताऊंगा, औऱ मैंने अपना वादा निभाया हैं। मे आज भि भैया केँ सामने उतना हि सीधा हूं, " विक्रांत नें रसीला केँ बिल्कुल लगभगआकर, स्लैब पऱ अपने दोनों हाथ टिकादिए, जिससे रसीला उसके औऱ स्लैब केँ बीच मे घिर गई। "मगर इसका मतलबये नहि हैं कि आप् अपनीबात भूल जाएँ। मैंने आपसे मात्र हक माँगा थां, औऱ आप् मुझसे परायों जैसा व्यवहार कररही हें। मुझेये बिल्कुल अच्छा नहि लगरहा। "
रसीला नें डर औऱ बेबसी सें अपनी आँखें उठाईं, "विक्रांत। प्लीज़, जितेश भइयाआते हि होंगे। "
"आने दीजिए भइया साहब कों। वोँ भि तौ जानते हें नाँ कि हमारी क्याँ बात हुईँ हैं?" विक्रांत नें बेहद शातिर मुस्कान केँ संगकहा। उसने अपना एक् गठीला हाथ धीरे-धीरे सें आगे बढ़ाया औऱ रसीला केँ गाल पऱ आए पसीने कों अपनी उंगली सें साफ किया।
रसीला कां पूरा जिस्म उस छुअन सें काँपउठा। उसकी आँखों मे आँसू आँ गए, पर्र इसबार वो चिल्ला नहि सकती थि, क्योंकि वो जानती थि कि ज़रा सि भि चूक राघव भइया कि जीवन औऱ हमारी इज़्ज़त कों तबाहकर देगी।
"शर्तयाद हैं नाँ भाभी? मुझेइस घऱ मे पराया बनकर नहि रहना हैं, " विक्रांत नें रसीला केँ काँपते चेहरे कों देखते हुए बहोत हि गहराई सें कहा।
ठीक उसी वक़्त,
जैसे हि मे छत सें नीचे उतरा औऱ मेरीनज़र किचन केँ खुले दरवाज़े पर्र पड़ी, मेरेकदम वहींजम गए। विक्रांत रसीला केँ बिल्कुल लगभगखड़ा थां औऱ उसका गठीला हाथ रसीला केँ काँपते चेहरे पर्र थां। मेरी आँखों केँ सामने खूनउतर आया, हाथ कि मुट्ठियाँ कसगईं, पऱ सालापेर आगे नहि बढ़पाए। वोँ खौफनाक रिस्क औऱ राघव भइया कां चेहरा मेरी आँखों केँ सामने आँ गय़ा। मे समझ गय़ा कि अगरइस वक़्त मैंने क्रोध दिखाया, तौ विक्रांत खेल बिगाड़ देगा। मे ज़हर कां घूंट पीकर, दबे पाँव वापस अपने कमरे मे लौटआया औऱ लाचारी मे सिर पकड़कर बैठ गय़ा।
इधर किचन मे, विक्रांत नें जैसे हि जितेश केँ जूतों कि हलकी सि आहट सुनी, उसके चेहरे पऱ एक् शातिर औऱ ठंडी मुस्कान आँ गई। वो जानता थां कि जितेश डर केँ मारे पीछेहट चुका हैं। अब मैदान पूरीतरह साफ़ थां।
उसने बिनाकोई देरीकिए, किचन कां भारी दरवाज़ा अंदर सें बंद किया औऱ खट सें कुंडी चढ़ा दि।
रसीला कां दिल एक् झटके मे हलक मे आँ गय़ा। उसने घबराकर अपनी साड़ी कां पल्लू समेटा, "वि। विक्रांत बाबू, यह क्याँ कररहे होँ? दरवाज़ा क्यूं बंद किया? जितेश भइया बाहर् हि हें."
"कहा नाँ भाभी, भइया साहबअब बीच मे नहि आएंगे। उन्हें अपनाराज प्यारा हैं, " विक्रांत नें बहोत हि शांतमगर कड़क आवाज़ मे कहा। वो रसीला केँ बिल्कुल लगभगआया। दिल्ली केँ जिम मे कमाया हुआ उसका२४ साल कां गठीला, चौड़ा शरीर रसीला केँ भरेहुए खूबसूरती पऱ पूरीतरह हावी हौ रहा थां।
रसीला स्लैब सें सटकरखड़ी थि, उसकी सांसें तेज़चल रहीथीं। विक्रांत नें बिना एक् शब्द बोले, आगे बढ़कर रसीला कि कमर मे हाथ डाला औऱ उसे एक् हि झटके मे घसीटकर सीधे किचन केँ कड़क स्लैब पर्र बैठा दिया। रसीला कि साड़ी कां पल्लू सरककर नीचेगिर गय़ा।
"विक्रांत। प्लीज़ बाबू.ऐसा मतकरो, मे तुम्हारी भाभी हूं." रसीला नें रोतेहुए उसके मजबूत कंधों कों पीछे धकेलना चाह गिया, पऱ विक्रांत कां शरीर लोहे जैसा कड़क थां।
"शर्तयाद हैं नाँ भाभी?आज सें आप् मेरी भि हें, " विक्रांत नें बेहद शातिर औऱ मदहोश आँखों सें सीधे रसीला केँ भीगे चेहरे कों देखा। उसने बिनाकोई सबर दिखाए, रसीला केँ दोनों हाथों कों स्लैब पऱ हि कसकर दबोच लिया औऱ उसके होंठों कों अपने मुँह मे भींच लिया
विक्रांत नें रसीला कों संभलने कां एक् सेकंड भि नहि दिया। उसकाहाथ बिजली कि फुर्ती सें रसीला केँ पेटीकोट केँ अंदर घुसा औऱ उसकी जांघों कों पूरी ताक़त सें बाहर् कि तरफ़ फैला दिया। रसीला कि दोनों सुडौल जांघों केँ बीच उसकी मखमली औऱ पसीने सें भीगी हुईँ बुर किचन कि मद्धम रोशनी मे पूरीतरह साफ़दिख रही थि।
विक्रांत नें बिनाकोई सबर दिखाए, अपनी पैंट कों नीचे सरकाया। दिल्ली केँ जिम मे कसरत करके कमाएहुए उसकेकड़क शरीर केँ नीचे, उसका 9 इंच कां लंबा, मोटा औऱ कड़क लन्ड लोहे केँ सरिये कि तरह बाहर् आँ चुका थां। रसीला नें जबउसकड़क चीज़ कों देखा, तौ उसकेहोश उड़गए।
"विक्रांत। नहि बाबू। इतनाबड़ा। मे बर्दाश्त नहि कर पाऊँगी." रसीला नें रोतेहुए पांव समेटने चाहे।
पऱ विक्रांत नें एक् हि झटके मे रसीला कि दोनों कड़क टांगों कों उठाकर अपने चौड़े कंधों पर्र टिका दिया। उसने अपने भारी लन्ड कि कड़क सुपारी कों रसीला कि टाइट बुर केँ मुहाने पऱ रखा औऱ अपने पूरे शरीर कां वज़नआगे झोंकते हुए, एक् हि खूंखार औऱ कड़क धक्के मे पूरा कां पूरा मोटा लन्ड रसीला कि बुर कों चीरता हुआ अंदर गर्भाशय कि गहराई तक उतार दिया।
"उफ्फफ़फ़। माँ गे.मर गई रे। विक्रांत!"
रसीला कि आँखें फटी कि फटीरह गईं। जैसे हि वोँ कड़क औऱ मोटा लन्ड उसकी बुर केँ चिथड़े उड़ाता हुआ अंदर धंसा, रसीला कां पूरा शरीरकड़क स्लैब सें टकराया। उसकीचीख निकलने हि वाली थि कि विक्रांत नें अपनाकड़क हाथ उसके मुँह पर्र दबा दिया।
"शशश। आवाज़ बाहर् नहि भाभी, अभि तोँ खेल शुरुआत हुआ हैं, " विक्रांत नें उसकेकान केँ पास फुसफुसाया।
अब विक्रांत नें बिना रुके अपनीकड़क कमर कों तेज़ी सें पीछे खींचा औऱ पूरी ताक़त सें आगे मारना शुरुआत कर दिया। हर कड़क धक्के केँ संग उसका पूरा मोटा लन्ड रसीला कि बुर केँ अंदर-बाहर् होँ रहा थां। किचन कां वोँ कड़क स्लैब हिलरहा थां औऱ रसीला कि दोनों भारी छातियाँ ऊपर-नीचे उछलरही थीं। विक्रांत नें रसीला कि बुर कि ऐसी तबाड़तोड़ मार मारी कि रसीला बेबसी औऱ चरमसुख केँ उस सैलाब मे पूरीतरह तड़पउठी।
लगभगआधे घंटे तक बिना रुके, कड़क औऱ खूंखार झटके मारने केँ बाद, जब रसीला कि बुर सें काम-रस कां पानी बहनेलगा औऱ उसका जिस्म ढीलापड़ गय़ा, तब विक्रांत नें एक् अंतिम कड़क धक्का मारा औऱ अपना सारागरम औऱ गाढ़ा वीर्य रसीला कि बुर केँ बिल्कुल अंदर निचोड़ दिया।
उस मंगलवार केँ बाद सें इसघऱ कां पूरा नक्शा हि बदल गय़ा। राघव भइया तौ सुभह फैक्टरी निकल जाते औऱ साम कों थककरसो जाते, मगर उनके पीछे हम् दोनों भाइयों नें मिलकर रसीला कि बुर कां वोँ हाल किया जौ उसने जीवन मे कभी सोचा नहि थां।
अब रसीला कां रोज़ कां रूटीन एकदम फिक्स होँ चुका थां—दिन मे तीनबार उसके शरीर कि कड़क कुटाई होती थि
उस दोपहर विक्रांत केँ हाथ सें चोदे जाने केँ बादइस घऱ कां पूरा ढर्रा हि बदल गय़ा। राघव भइया तोँ सुभह अपनी फैक्टरी कि शिफ्ट पऱ चले जाते औऱ साम कों थककर लौटते, पऱ उनके पीछे हम् दोनों भाइयों नें मिलकर रसीला कि बुर कां वोँ हाल किया जोँ उसने अपनी जीवन मे कभी ख्वाब मे भि नहि सोचा थां। अब रसीला कि दिनभर मे तीनबार अलग-अलग लन्ड सें ऐसी मथाई होती कि उसका पूरा शरीरटूट जाता।
सुभह कि शुरुआत सबसे पहले राघव भइया केँ सीधे-साधे लन्ड सें होती थि। सुभह लगभग साढ़े पांचबजे, जब बाहर् अंधेरा हि होता औऱ राघव भइया कों सातबजे कि शिफ्ट केँ लिए निकलना होता, तोँ वोँ नींद केँ कड़कपन मे हि ऊपरबैड पऱ रसीला कों दबोच लेते। वोँ बिना किसी तामझाम केँ उसकी साड़ी ऊपर करते औऱ एक् संस्कारी पति कि तरह अपना नॉर्मल साइज कां लन्ड रसीला कि बुर मे डाल देते। रसीला भि आंखें बंद करके चुपचाप पलंग पर्र लेटी रहती औऱ अपने पति कां फर्ज निभाते हुए उनके सीधे-साधे झटके बर्दाश्त करती, औऱ राघव भइयादस मिनट मे अपना वीर्य उसकी बुर मे झाड़कर फ्रेश होनेचले जाते।
राघव भइया केँ सुभहसात बजे फैक्टरी निकलते हि औऱ दोपहर कों डेढ़बजे मेरे अपनी साइट पर्र चले जाने केँ बाद, घऱ मे असलीखेल शुरुआत होता। ठीक दोबजे विक्रांत हॉल सें उठता औऱ सीधे किचन मे जाकर दरवाजा अंदर सें बंद करके कुंडी चढ़ा देता। दिल्ली केँ जिम कां पढ़ा-लिखा वोँ चौबीस साल कां कड़क लौंडा रसीला कों सीधे किचन केँ उसी कड़क पत्थर केँ स्लैब पऱ लिटा देता औऱ अपनी शर्तों केँ रोब मे उसकी दोनों सुडौल जांघों कों उठाकर सीधे अपने चौड़े कंधों पऱ टिका देता। दोपहर कि उस तपतीउमस मे विक्रांत कां वोँ नौइंच कां लंबा, मोटा औऱ कड़क लन्ड लोहे केँ सरिये कि तरह रसीला कि बुर केँ मुहाने पर्र रगड़ता औऱ फिन वोँ बिनाकोई रहमखाए, अपनी पूरी ताकत सें एक् हि खूंखार धक्के मे पूरा कां पूरा मोटा लन्ड उसकी बुर कों चीरता हुआ अंदर तक उतार देता। विक्रांत कां वोँ भारीनौ इंच कां लन्ड जबआधे घंटे तक बुर कि गहराई सें टकराता, तौ रसीला दर्द औऱ चरमसुख सें पूरीतरह बौखला जाती। उसी केँ उस मोटे सरिये कि रोज़ कि तबाड़तोड़ मार नें रसीला कि बुर कों रगड़-रगड़कर एकदम ढीला औऱ चौड़ा करना शुरुआत कर दिया थां।
फिनसाम कों पांचबजे जब मे अपनाकाम समाप्त करकेघऱ लौटता, तोँ राघव भइया केँ आने मे अभि दो घंटे कां समय बाकी होता। विक्रांत दोपहर कां खेल खेलकर अपने कमरे मे पढ़ाई कां नाटककर रहा होता, पर्र मेरे अंदर रसीला केँ शरीर पर्र विक्रांत कां हक देखकर जौ जलन औऱ क्रोध सुलगरहा होता, मे उसे शांत करने केँ लिए साढ़े पांचबजे रसीला कों दबे पाँव नीचे अपने कमरे मे बुला लेता। मे उसेबैड पर्र झुकाकर कुतिया बना देता याँ दीवार सें सटाकर खड़ाकर देता। रसीला कि बुर दोपहर मे विक्रांत कां मोटा लन्ड खाकर पहले सें हि काम-रस सें भीगी औऱ पूरीतरह खुली होती थि। मे अपने अंदर कि पूरी मर्दानगी औऱ गुस्से कों समेटकर अपना कड़क लन्ड मारता, जोँ बिना किसी रुकावट केँ सर्र सें उसकी गहराई मे उतर जाता।
इन तीन अलग-अलग साइज औऱ मिजाज केँ लंडों कों दिन मे तीनबार अपनी बुर केँ अंदर बर्दाश्त करते-करते, कुछ हि हफ़्तों मे रसीला कि बुर कां वोँ टाइटपन पूरीतरह ख़त्म हौ गय़ा। एक् शनिवार कि दोपहर जब राघव भइया ड्यूटी पऱ थें औऱ विक्रांत बाहर् गय़ा थां, मैंने किचन कां दरवाजा बंद करके रसीला कों पीछे सें दबोचा औऱ जैसे हि उसकी जांघों केँ बीच अपनी उंगलियाँ डालीं, मे दंगरह गय़ा। उसकी वोँ बुर जौ पहले एकदम संकरी थि, अबइन तीनों लंडों कि रोज़ कि भयंकर मथाई सें एक् पेशेवर पोर्नस्टार याँ रंडी जैसी चौड़ी औऱ बड़ी होँ चुकी थि। मेरीतीन उंगलियाँ एक् संग बिना किसी ज़ोर केँ उसकी बुर केँ अंदर सरकती चलीगईं औऱ उसके बुर केँ होंठ हमेशा थोड़े खुले रहनेलगे थें। रसीला नें भि लाचारी औऱ एक् अजीब ठरकी मुस्कान सें पीछे मुड़कर मुझे देखा औऱ फुसफुसाए कि भइया, इस घऱ केँ तीनों मर्दों कां लन्ड थमता हि नहि हैं, अब तौ मेरी नीचे कि गुफा इतनी बड़ी होँ चुकी हैं कि किसी कां भि लन्ड इसमें आसानी सें समा जाता हैं। वो पूरीतरह हम् तीनों केँ लन्ड कि गुलाम बन चुकी थि।
मुझे औऱ विक्रांत कों अच्छे सें अंदाज़ा थां कि हम् दोनों मिलकर रसीला कि उस पोर्नस्टार जैसी चौड़ी होती बुर कों बारी-बारी ठिकाने लगारहे हें। इसबात नें हमारे बीचकोई दुश्मनी तौ नहि, पर्र एक् ऐसी कड़क मर्दानगी कि होड़ पैदाकर दि थि जिसने रसीला कि चुदाई कों औऱ भि अधिक खूंखार औऱ हार्डकोर बना दिया। मेरे अंदर सबसे बड़ी खुंदक ये थि कि विक्रांत कां लन्ड भले हि ९इंच कां मोटा सरिया होँ, पऱ रसीला कों सबसे अधिकमजा औऱ तृप्ति मेरे लन्ड सें हि मिलनी चाहिए। इसी चक्कर मे मैंने उसके शरीर कों ऐसे-ऐसे अजीब औऱ कड़क पोज़ मे मोड़ना शुरुआत किया जौ उसने अपनी लाइफ मे कभी सोचे भि नहि थें।
साम केँ साढ़े पांच बजते हि जब रसीला दबे पाँव नीचे मेरे कमरे मे आती, तोँ मेरे अंदर कि जलन एक् जंगली भूखबन जाती। मे बिनाकोई समय गंवाए उसकी साड़ी औऱ पेटीकोट कों एक् हि झटके मे कमर केँ ऊपर बांध देता औऱ उसेखाट केँ किनारे पऱ पेट केँ बल लेटने कों कहता। इस पोज़ मे उसकी भारी गांड पूरीतरह हवा मे ऊपरउठ जाती औऱ उसकी वोँ तीन लन्ड खाकर ढीली औऱ बड़ी होँ चुकी बुर पीछे सें एकदम साफ़खुल जाती। मे उसेइस तरहबैड पर्र आधा लटकाकर, उसके दोनों पैरों कों पूरी ताक़त सें बाहर् कि तरफ़ फैला देता, जिससे उसकी बुर कां भीतरी लाल मांस औऱ उसका बड़ा होँ चुकाछेद पूरीतरह खिंच जाता।
"भइया.यह कैसा पोज़ हैं। स्स्स, बहोत खिंचाव हौ रहा हैं नीचे." रसीला नें गर्दन मोड़कर लाचारी सें कहा।
"चुप रह रसीला, आज तुम कोपता चलेगा कि असली लन्ड कां मजा क्याँ होता हैं, " मैंने कड़क आवाज़ मे कहा औऱ अपने पूरे कड़क लन्ड कि सुपारी कों उसकी काम-रस सें भीगी औऱ खुली हुइ बुर पऱ टिकाया।
मैंने पीछे सें अपनी पूरीकमर कां वज़न झोंकते हुए एक् ऐसा खूंखार औऱ कड़क धक्का मारा कि मेरा पूरा लन्ड उसकी ढीली बुर केँ गोश्त कों चीरता हुआजड़ तक अंदरधंस गय़ा। रसीला केँ मुँह सें एक् तीखीचीख निकली औऱ उसनेबैड कि चादर कों अपने हाथों मे कसकर भींच लिया। बुर भले हि विक्रांत केँ मोटे लन्ड सें चौड़ी होँ चुकी थि, पऱ इस पोज़ मे खिंचाव होने कि वजह सें मेरा लन्ड उसकी दीवारों कों रगड़ता हुआ अंदरजा रहा थां। मे बिना रुके, पूरी बेरहमी सें तबाड़तोड़ औऱ हार्डकोर झटके मारने लगा। हर धक्के केँ संग मेरी जांघें उसकी भारी गांड सें कड़क अंदाज़ मे टकरातीं औऱ थप-थप कि तेज़ आवाज़ पूरे कमरे मे गूँजने लगती।
उसका जिस्म पूरीतरह हिलरहा थां। मैंने उसके दोनों हाथों कों पीछे घसीटकर उसकीपीठ पर्र कसकर दबोच लिया औऱ उसे बिना हिले-डुले लगातार बीस मिनट तक मशीन कि तरह चोदा। रसीला उस अजीब औऱ कड़क पोज़ मे पूरीतरह बेबस थि, उसका पसीना मेरी छाती पर्र लगरहा थां। वो दर्द औऱ बेइंतहा मज़े केँ ऐसेजाल मे फंस चुकी थि कि दबी आवाज़ मे हांफते हुए कहनेलगी, "आहह-आहह भइया। स्स्स। विक्रांत तौ बस मोटा लन्ड डाल देता हैं। पर्र तुम्हारी इसमार कां। कोई जवाब नहि हैं। मजा आँ गय़ा भइया। पूरा अंदर तक हिला दिया तुमने."
उसके मुँह सें ये सुनते हि मेरा सीने गर्व सें चौड़ा होँ गय़ा। मैंने उसकी बुर कि गहराई मे एक् अंतिम कड़क औऱ सबसे भारी झटका मारा औऱ अपना सारा गर्म वीर्य उसकीउस खुली हुइ गुफा केँ अंदर पूरी ताक़त सें निचोड़ दिया। रसीला वहीं पलंग पऱ अधमरी होकर बिखर गई, औऱ मे ये सोचकर मुस्कुराने लगा कि साला विक्रांत चाहे जितना जोरलगा लें, रसीला कि बुर पर्र असलीराज हमेशा मेरे हि लन्ड कां रहेगा।
bahut hi kaamuk update bhay . Raseeela or Jeetesh bhay k sath ab Vikrant bi aagya game mai .yeh Raseelaa k adventure dekhne mai maza aayega . Raghav k peeth piche khamosh chupke hone wale is pyar k game mai mazaa aarha h
झूठा झूला बहेंन कों झुलाया – New Episode
भाग 13
सुभह औऱ साम केँ इस तबाड़तोड़ सिलसिले औऱ दोपहर मे विक्रांत केँ उसनौइंच केँ मोटे सरिये कि रोज़ कि बेरहम मार नें रसीला कि बुर कि बनावट कों पूरीतरह बदलकर रख दिया थां। जौ बुर कभी एक् संस्कारी घरेलू महिला कि तरह एकदम टाइट औऱ संकरी हुआ करती थि, अब वो चौबीसों घंटे खुली रहने वाली एक् ऐसी गहरी औऱ चौड़ी गुफाबन चुकी थि जिसे देखकर कोई भि कहदे कि ये किसी एक् मर्द केँ बस कि बात नहि हैं। ये बदलाव इतना बड़ा थां कि आखिरकार सीधे-साधे औऱ अनपढ़ राघव भइया केँ अंधे भरोसे कों भि एक् बड़ा झटकालगा।
एक् रविवार कि सुभह, जब फैक्टरी कि छुट्टी थि, राघव भइया सुभह लगभगछह बजे हमेशा कि तरह नींद केँ कड़कपन मे रसीला केँ ऊपर चढ़े। रसीला आंखें बंदकिए बैड पर्र चित लेटी थि, ये सोचकर कि हमेशा कि तरहदस मिनट मे उनकाकाम ख़त्म होगा औऱ वोँ हट जाएंगे। राघव भइया नें अपनी साया-साड़ी ऊपर कि औऱ जैसे हि अपना लन्ड रसीला कि बुर केँ मुहाने पर्र टिकाया, वोँ पूरीतरह ठिठकगए।
उन्होंने बिनाकोई ज़ोर लगाए अपने लन्ड कों आगे बढ़ाया, तौ उनका लन्ड बिना किसी घर्षण याँ रुकावट केँ, एकदम वैक्यूम कि तरह सर्र सें रसीला कि बुर केँ अंदरचला गय़ा। बुर केँ होंठइस कदर ढीले औऱ बड़े होँ चुके थें कि राघव भइया केँ नॉर्मल साइज केँ लन्ड कों अंदर किसी भि दीवार कि छुअन हि महसूस नहि होँ रही थि। ऐसालग रहा थां जैसे किसी बहोत बड़े कुएं मे एक् छोटा सां डंडाडाल दिया गय़ा हौ।
राघव भइया नें दो-चार झटके मारे, पर्र उन्हें अंदर वोँ पुरानां टाइटपन औऱ गर्माहट महसूस हि नहि हुईँ जोँ कुछ महीने पहले तक रसीला कि बुर मे हुआ करती थि। उन्होंने झटके सें अपना लन्ड बाहर् निकाला औऱ चकित होकर रसीला कि जांघों केँ बीचहाथ फेरा। उनकी उंगलियां रसीला केँ उस चौड़े औऱ बड़े होँ चुकेछेद मे बिना किसी रुकावट केँ अंदर तक धंसगईं।
"रसीला। यह क्याँ हैं भाग्यवान? तुम्हारी बुर कों क्याँ हौ गय़ा हैं?" राघव भइया नें हैरान औऱ थोड़े परेशान लहजे मे पूछा, "पहले तौ मेरा लन्ड अंदर डालते समय तुम् कराह उठती थि, इतनी टाइट थि तुम्। पऱ आज तौ ऐसालग रहा हैं जैसे अंदरकोई बंदिश हि नहि बची। यह तोँ पूरीतरह सें खुलकर भोसड़ा बन चुकी हैं!"
पति केँ मुँह सें 'भोसड़ा' जैसा साफ़ औऱ कड़क शब्द सुनकर रसीला केँ कलेजे मे एक् समय केँ लिए छुरी सि चल गई। उसेलगा कि कहींराज न् खुलजाए, पऱ वो अब दो-दो शातिर मर्दों केँ लन्ड खाकर स्वयं भि बेहद चालाक हौ चुकी थि। उसने जल्दी अपनी आँखों मे झूठी लाचारी औऱ दर्द केँ आंसूभरे औऱ राघव भइया केँ गले मे बाहें डालदीं।
"क्याँ बताऊँ जी.जब सें विक्रांत बाबू दिल्ली सें आए हें, घऱ कां काम दुगना होँ गय़ा हैं। दिनभर किचन केँ कड़क स्लैब पऱ खड़े-खड़े आटा गूंथना, भारी बर्तन उठाना औऱ ऊपर-नीचे दौड़ने कि वजह सें पेट केँ नीचेऐसा भारीपन औऱ खिंचाव आया हैं कि मुझे स्वयं अंदर सें सभी ढीला-ढीला महसूस होता हैं। डॉक्टर कहती थि कि कमजोरी औऱ भारीवजन उठाने सें स्त्री कि बच्चेदानी नीचे खिसक जाती हैं औऱ सभी मार्ग बड़ा होँ जाता हैं, " रसीला नें बेहद मासूमियत सें झूठ कि ऐसी पट्टी पढ़ाई कि सीधे-साधे राघव भइया कां दिल पिघल गय़ा।
"अच्छा। ऐसा हैं क्याँ? मुझे तोँ लगा कि कहींकोई औऱ बात." राघव भइया नें एक् राहत कि सांसली, पर्र उनके चेहरे पर्र अपनी पत्नि कि उस खुली हुईँ औऱ पोर्नस्टार जैसी ढीली होँ चुकी बुर कों देखकर एक् अजीब सि हताशा साफ़दिख रही थि। उन्हें क्याँ पता थां कि उनकीपीठ पीछे उनके हि सगे भइया औऱ देवर जी नें मिलकर उनकी पत्नि कि बुर कि मथाई करकेउसे इसहाल पऱ पहुँचाया हैं।
रसीला कि बुर कां वोँ हाल देखने केँ बाद, विक्रांत केँ दिमाग़ मे एक् नया औऱ शातिर आइडिया आया। उसनेसमझ लिया थां कि रसीला अबइसघऱ केँ तीनों मर्दों केँ लन्ड कि पूरीतरह गुलाम बन चुकी हैं, औऱ उसकी बुर केँ संग-संग उसके सब्र कि दीवार भि टूट चुकी हैं।
सोमवार कि दोपहर कां टाइम थां। राघव भइया फैक्टरी गएहुए थें औऱ मे किसीकाम सें बाज़ार निकला हुआ थां। घऱ मे रसीला किचन साफ़कर रही थि। तभी विक्रांत दबे पाँव किचन केँ अंदरआया औऱ बिनाकुछ बोले सीधे अंदर सें कुंडी चढ़ा दि।
रसीला चौंककर पीछे मुड़ी, "विक्रांत बाबू। अभि तोँ दोपहर कि चुदाई समाप्त हुई थि, अबफिन सें क्याँ?"
विक्रांत केँ चेहरे पर्र वही शातिर मुस्कान थि। उसने रसीला कों स्लैब कि तरफ़ नहि धकेला, बल्कि स्वयं किचन मे रखी एक् छोटी प्लास्टिक कि स्टूल पर्र आहिस्ता बैठ गय़ा। उसने रसीला कि आँखों मे सीधे देखते हुए अपनी जींस कि ज़िप नीचे कि औऱ अपनेउस ९इंच केँ लंबे, मोटे औऱ कड़क लन्ड कों बाहर् निकाल लिया। दोपहर कि रोशनी मे उसका वोँ लोहे जैसा सरिया पूरीतरह तान चुका थां।
"आज बुर मारने कां मन नहि हैं भाभी। तुम्हारी बुर तौ रोज़ हि फटती हैं, आजइस देवर जी कि एक् नई ख़्वाहिश पूरीकरो, " विक्रांत नें कड़क आवाज़ मे हुक्म देतेहुए कहा, "चलो, घुटनों केँ बल नीचे बैठो औऱ इसे अपने मुँह मे लो। "
रसीला कां मुँह खुला कां खुलारह गय़ा। उसनेआज तक किसी मर्द कां लन्ड अपने मुँह मे नहि लिया थां। राघव भइया औऱ मे हमेशा सीधे बुर मे हि डालते थें। विक्रांत केँ उस९इंच केँ मोटे अजगर कों देखकर हि उसकादम फूलने लगा।
"नहि विक्रांत बाबू। मुझसे यह नहि होगा। बहोत बड़ा हैं, मेरेहलक मे नहि समाएगा." रसीला नें हाथ जोड़कर पीछे हटने कि कोशिश कि।
"शर्तभूल गईं भाभी? मैंने कहा थां नाँ कि मुझे अपनाहक अपने तरीके सें चाहिए। अगरआज मना किया, तोँ साम कों भैया कों बच्चेदानी खिसकने कि असलीवजह बता दूँगा, " विक्रांत नें अपनी ठंडी, शातिर आँखों सें उसे डराया।
रसीला केँ पासकोई मार्ग नहि थां। वो लाचारी सें भारी सांस लेती हुई किचन केँ कड़क फर्श पऱ अपने घुटनों केँ बलबैठ गई। उसका हसीन चेहरा अब विक्रांत केँ उस कड़क औऱ मोटे लन्ड केँ बिल्कुल सामने थां। विक्रांत केँ लन्ड कि कड़क सुपारी सें काम-रस कि बूंदें टपकरही थीं।
विक्रांत नें आगे बढ़कर रसीला केँ बाल पीछे सें कसकर दबोचलिए, "चलो भाभी, अपना मुँह पूरा बड़ा खोलो, जैसे स्क्रीन पर्र पोर्नस्टार खोलती हें। "
रसीला नें काँपते हुए अपना मुँह खोला। विक्रांत नें बिनाकोई सबर दिखाए, अपने मोटे लन्ड केँ अगले हिस्से कों सीधे रसीला केँ मुँह केँ अंदरठूस दिया। रसीला केँ गले सें एक् दबी हुई आवाज़ निकली, "उगघ्घ."
जैसे हि वोँ ९इंच कां मोटा सरिया उसके मुँह केँ अंदर गय़ा, रसीला कि आँखें फटी कि फटीरह गईं। उसका पूरा मुँहउस मोटे लन्ड सें भर चुका थां। विक्रांत नें उसके बालों कों पकड़कर अपनीकमर कों आगे-पीछे चलाना शुरुआत कर दिया। वो रसीला केँ मुँह कों एक् बुर कि तरह इस्तेमाल कररहा थां। लन्ड जब सीधे उसकेहलक कि गहराई सें टकराता, तौ रसीला कि आँखों सें आँसू बहने लगते औऱ उसके मुँह सें लार टपककर विक्रांत केँ अंडकोषों पर्र गिरने लगी।
"हाँ भाभी.ऐसे हि। पूरा अंदर तक लो." विक्रांत उस कड़क ब्लोजॉब कां मजा लेतेहुए गुर्राया।
विक्रांत लगातार दस मिनट तक बिना रुके रसीला केँ मुँह कि गहराई नापता रहा। रसीला कां पूरा चेहरा लाल होँ चुका थां, पर्र वो अपने देवर जी केँ इस कड़क औऱ नए अंदाज़ केँ सामने पूरीतरह सरेंडर कर चुकी थि। जब विक्रांत कां पानीआने वालाहुआ, उसने रसीला कां मुँह औऱ ज़ोर सें अपने लन्ड पर्र भींच दिया औऱ अपना सारागरम, गाढ़ा वीर्य सीधे रसीला केँ मुँह केँ अंदर, उसकेहलक मे हि झाड़ दिया।
रसीला नें खाँसते हुएउस कड़क स्वाद कों निगला। जब विक्रांत नें अपना लन्ड बाहर् निकाला, तौ रसीला फर्श पर्र हांफती हुई बैठी थि। विक्रांत नें मुस्कुराते हुए अपनी जींसठीक कि औऱ बाहर् निकल गय़ा, ये जानते हुए कि अब रसीला कों मुँह कां चस्का भि लग चुका थां।
साम कों जब मे घऱ लौटा, तौ रसीला किचन मे रात केँ खाने कि तैयारी कररही थि। मगर जैसे हि मेरी नज़र उसके चेहरे पर्र पड़ी, मुझेकुछ अजीबलगा। उसकी आँखें थोड़ी लालथीं औऱ जब उसने मुझसे बात करने केँ लिए मुँह खोला, तौ उसकी आवाज़ मे एक् अजीब सां भारीपन थां।
"भइया, पानी चाहिए?" उसने नीचे देखते हुए पूछा।
मैंने गौर किया कि वो अपनी साड़ी केँ पल्लू सें बार-बार अपने होंठों कों साफ़कर रही थि, जैसेवहा कोई अजीब सां अहसास अब भि बाकी हौ। मेरे अंदर कां शक जल्दी जाग गय़ा। मुझे अच्छी तरहपता थां कि दोपहर मे विक्रांत घऱ पर्र अकेला थां।
मैंने जल्दी किचन कां द्वार (दरवाज़ा) बंद किया औऱ उसे बांह सें पकड़कर दीवार सें सटा दिया। "क्याँ हुआ रसीला? आज तेरी आवाज़ कों क्याँ हुआ हैं? औऱ यह आँखें क्यूं सूजी हुई हें?"
रसीला नें अपनी नज़रें चुरालीं, "कुछ नहि भइया.बस किचन मे मसाले कां झोंकलग गय़ा थां, इसलिये गलाबैठ गय़ा हैं। "
"मुझसे झूठमत बोल, " मैंने कड़क आवाज़ मे कहा औऱ उसकी ठुड्डी पकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठाया। जब मैंने उसके होंठों केँ कोने पऱ जमी सूखीलार कि एक् पतली लकीर देखी, तौ मेरामन जल्दी पूरी किस्सा समझ गय़ा। विक्रांत नें आज बुर छोड़कर रसीला केँ संगकुछ नयाखेल खेला थां।
"साले नें आज तेरे मुँह मे दिया थां नाँ?" मैंने सीधे औऱ कड़क शब्दों मे पूछा।
रसीला केँ सब्र कां बांधटूट गय़ा। उसने अपनी आँखें बंदकर लीं औऱ उसकी आँखों सें आँसू बहनेलगे। उसने धीरे-धीरे सें सिर हिलाकर हाँकहा औऱ फुसफुसाकर बोलीं, "भइया। वोँ बहोत बेरहम हैं। आज उसने मुझे घुटनों केँ बल बिठाया औऱ अपना पूरा९ इंच कां मोटा सरिया मेरेहलक मे ठूस दिया। मे मना करतीरही, पऱ उसने राघवजी कां डर दिखाकर मेरा मुँहदबा दिया। मुझे सांस लेने मे तकलीफ हौ रही थि, पर्र वोँ रुका नहि। औऱ आखिर मे उसने अपना सारा गंदा पानी मेरे मुँह केँ अंदर हि छोड़ दिया। "
ये सुनते हि मेरे सीने मे जलन औऱ मर्दानगी कि एक् भयंकर आग सुलगउठी। विक्रांत नें मेरी स्त्री कों इसहद तक झुका दिया थां कि अब वो उसके मुँह कां स्वाद भि बदल चुका थां। मेरे अंदर एक् अजीब सि सनक सवार हौ गई। अगर विक्रांत उसका मुँह लें सकता हैं, तौ मे पीछे क्यूं रहूँ? मुझे रसीला केँ इसनए औऱ ठरकीरूप पर्र अपना भि पूराहक चाहिए थां।
मैंने बिनाकोई देरीकिए अपनी जींस कां बटन खोला औऱ ज़िप नीचे सरका दि। मेरा लन्ड इस गुस्से औऱ जलन मे पहले सें हि लोहे कि तरह कड़क हौ चुका थां।
"भइया। अभि नहि, मेरागला अभि भि दुखरहा हैं." रसीला नें घबराकर मेरेहाथ पकड़े।
"जब उसका९ इंच कां मोटा लन्ड झेल लिया, तोँ मेरा क्यूं नहि?" मैंने कड़क आवाज़ मे कहा औऱ उसके बालों कों पीछे सें पकड़कर उसका चेहरा नीचे कि तरफ झुकाया। "खोलो अपना मुँह। "
रसीला नें समझ लिया कि इसघऱ केँ मर्दअब उसे किसी भि तरह छोड़ने वाले नहि हें। उसने लाचारी सें अपनी आँखें बंदकीं औऱ अपना मुँह पूराखोल दिया। मैंने बिनाकोई रहम दिखाए अपने कड़क लन्ड कों सीधे उसके मुँह केँ अंदरडाल दिया।
चूँकि दोपहर मे विक्रांत नें उसका मुँह पहले हि साफ़कर दिया थां, इसलिये मेरा लन्ड रसीला केँ मुँह कि गहराई मे बिना किसी रुकावट केँ सीधे उसकेहलक तक पहुँच गय़ा। रसीला नें कड़क अंदाज़ मे मेरे लन्ड कों चूसना शुरुआत किया। उसकीजीभ कि गर्माहट औऱ लार नें मेरे लन्ड कि नसों कों औऱ भि ज़्यादा कड़ककर दिया। मे उसके बालों कों पकड़कर लगातार अपने कड़क धक्के उसके मुँह मे मारने लगा।
अब रसीला इसघऱ मे पूरीतरह सें एक् खिलौना बन चुकी थि, जिसका मुँह औऱ बुर दोनों भाइयों कि भूख मिटाने कां जरिया बन चुके थें। जब मेरा पानीआने कां टाइमहुआ, मैंने अपना लन्ड बाहर् नहि निकाला औऱ अपना सारागरम वीर्य सीधे उसके मुँह मे, उसके दांतों औऱ जीभ केँ ऊपर हि छोड़ दिया। रसीला नें बिना किसी हिचकिचाहट केँ उसे भि निगल लिया।
खेल अब पूरीतरह सें कंट्रोल सें बाहर् हौ चुका थां। रसीला अब केवल एक् घरेलू स्त्री नहि रही थि, बल्कि वो हम् दोनों भाइयों केँ कड़क मिजाज औऱ नई-नई फरमाइशों कों पूरा करने वाली एक् पूरीतरह रेडी हौ चुकी रंडीबन चुकी थि।
रात केँ लगभगआठ बजे राघव भइया फैक्टरी कि अपनी कड़क ड्यूटी ख़त्म करकेघऱ लौटे। वोँ हाथ-मुँह धोकर सीधे डाइनिंग टेबल पऱ बैठगए। आज उनके चेहरे पऱ थकान सें अधिक एक् अजीब सि बेचैनी थि। सुभह जौ रसीला कि खुली हुई बुर कां भोसड़ा उन्होंने देखा थां, वोँ बात उनके सीधे-साधे दिमाग़ सें निकल नहि रही थि।
रसीला किचन सें खानां परोसने केँ लिए बाहर् आई। दोपहर मे विक्रांत कां मोटा९ इंच कां सरिया औऱ साम कों मेरे कड़क लन्ड कां पूरा स्वाद चखने केँ बाद, उसके चेहरे पर्र एक् अलग हि ठरकी औऱ लाचार चमक थि। उसके होंठअब भि थोड़े सूजेहुए थें।
"लोजी, गर्म-गर्म रोटियां, " रसीला नें थाली राघव भइया केँ सामने रखतेहुए कहा।
राघव भइया नें रसीला कों ऊपर सें नीचे तक देखा। फिन उन्होंने हॉल मे बैठे विक्रांत औऱ बगल मे खड़े मेरीतरफ़ देखा। "विक्रांत बाबू, जितेश। तुम् दोनों भि आकर बैठो, संग मे हि खानां खाते हें। "
हम् दोनों भि टेबल पर्र बैठगए। रसीला हम् तीनों कों खानां परोसरही थि। जब वोँ झुककर विक्रांत कि थाली मे सब्जी डालरही थि, तोँ उसकी साड़ी कां पल्लू थोडा सरक गय़ा। विक्रांत नें बड़े शातिर अंदाज़ मे राघव भइया कि नज़र बचाकर अपनी उंगली रसीला कि गोरीकमर पऱ चुभाई। रसीला केँ मुँह सें हलकी सि सिसकी निकलने हि वाली थि, पऱ उसने जल्दी अपने होंठों कों भींच लिया—वही होंठ जोँ आज दिनभर मे दोबार लन्ड चूस चुके थें।
राघव भइया नें रोटी कां निवाला तोड़ा औऱ अचानक रसीला सें बोले, "रसीला, ज़रा पानी देना। औऱ हाँ, दोपहर कों मैंने वोँ वैदजी वाली दुकान सें एक् पुड़िया ली थि, कमजोरी वाली। वोँ ज़रा अलमारी सें निकाल देना। तुम्हारी यह बच्चेदानी वाली बीमारी मुझेठीक नहि लगरही। सुभह तोँ मार्ग बिल्कुल."
राघव भइया नें भइया औऱ देवर जी केँ सामने साफ़-साफ़ 'भोसड़ा' शब्द नहि बोला, पऱ उनका इशारा एकदम साफ़ थां।
ये सुनते हि टेबल पर्र एक् सन्नाटा छा गय़ा। विक्रांत नें अपनी शातिर नजरें उठाईं औऱ रसीला कि तरफ़ देखकर मुस्कुराया। उसे अच्छे सें पता थां कि रसीला कि बुर केँ भोसड़ा बनने कि असलीवजह क्याँ हैं। मैंने भि अपनी नज़रें झुकालीं, क्योंकि मेरे कड़क लन्ड नें भि साम कों उसछेद कों औऱ बड़ा करने मे कोईकसर नहि छोड़ी थि।
रसीला पानी कां गिलास टेबल पर्र रखतेहुए बोलीं, "जी वोँ पुड़िया मैंने रख दि हैं, आप् खानां खाकरखा लेना। "
"हाँ भैया, भाभी कि सेहत कां ध्यान तोँ रखना हि पड़ेगा। शहर केँ डॉक्टर तोँ बहोत कुछ कहते हें, पऱ घरेलू इलाज हि सबसे कड़क होता हैं, " विक्रांत नें अपनी ज़बान कों अपने होंठों पर्र फेरते हुएकहा, जैसे वोँ रसीला कों याद दिलारहा होँ कि कल दोपहर कों फिन सें उसे क्याँ चूसना हैं।
खानां समाप्त होने केँ बाद राघव भइयादवा खाकरऊपर सोनेचले गए। विक्रांत भि एक् कड़क औऱ ठंडी मुस्कान केँ संग अपने कमरे मे चला गय़ा।
रात केँ ग्यारह बजे, जब पूराघऱ सो चुका थां, रसीला दबे पाँव नीचे मेरे कमरे मे आई। उसने अंदरआते हि द्वार (दरवाज़ा) बंद किया औऱ सीधे मेरेगले लग गई। उसका पूरा शरीर हाँफरहा थां।
"भइया। मे तोँ अंदर सें पूरी काँप गई थि। अगर राघवजी कों ज़रा सां भि शक होँ गय़ा कि मेरी बुर डॉक्टर कि वजह सें नहि, बल्कि आप् दोनों केँ लन्ड कि वजह सें भोसड़ा बनी हैं, तौ अनर्थ हौ जाएगा, " रसीला नें मेरी छाती पऱ अपना सूजाहुआ मुँह टिकाते हुए फुसफुसाया।
मैंने उसेकमर सें कसकर अपने लगभग खींचा। अब रसीला कि वोँ संस्कारी भाभी वालीछवि पूरीतरह समाप्त होँ चुकी थि। वोँ अब एक् ऐसी स्त्री बन चुकी थि जिसके मुँह औऱ बुर कि भूख हम् दोनों भाइयों नें मिलकर सातवें आसमान पऱ पहुंचा दि थि।
इसघऱ केँ कड़कखेल कां असली औऱ सबसे खूंखार मोड़अब आने वाला थां। जब रसीला कां मुँह औऱ बुर दोनों भाइयों केँ लन्ड कां स्वाद चखकर पूरीतरह खुल चुके थें, तौ अब उसकेबदन कां इकलौता औऱ सबसे टाइट हिस्सा बचा थां—उसकी गोल औऱ भारी गांड, जिसकी सीलआज तक राघव भइया नें भि नहि छुई थि।
येतय थां कि जौ भि रसीला कि गांड कि सील तोड़ेगा, इसघऱ केँ खेल पर्र असलीराज उसी कां होगा। औऱ ये कारनामा करने केँ लिए विक्रांत नें पहले सें हि अपनी शातिर बिसात बिछारखी थि।
मंगलवार कि सुभह जैसे हि सातबजे राघव भइया फैक्टरी केँ लिए निकले, मैंने सोचा कि मे अंदर जाकरखेल शुरुआत करूँ। मगर मुझसे पहले हि विक्रांत बिल्ली केँ कदमों सें रसीला केँ कमरे मे दाखिल हौ चुका थां। उसने अंदर सें द्वार (दरवाज़ा) बंदकर लिया थां। मे बाहर् खड़ा होकर दीवार सें कान लगाकर सुनने लगा।
रसीला बैडठीक कररही थि कि विक्रांत नें पीछे सें आकर उसकी भारी गांड पर्र अपना कड़कहाथ दे मारा। थप कि एक् कड़क आवाज़ आई।
"उफ्फ! विक्रांत बाबू। सुभह-सुभह क्याँ हैं? अभि तौ भैया गए हें, " रसीला नें अपनी चौड़ी हौ चुकी बुर कों छुपाते हुएकहा।
"भाभी, तुम्हारी आगे कि गुफा तोँ भैया औऱ जितेश भइया नें मिलकर पहले हि भोसड़ा बना दि हैं। उसमें अब मेरे९ इंच केँ लन्ड कों वोँ मजा नहि आँ रहा जोँ पहलेदिन आया थां, " विक्रांत नें बहोत हि बेरहम औऱ कड़क आवाज़ मे कहा। उसनेजेब सें वैसलीन कि एक् डिब्बी निकाली औऱ उसेबेड पर्र रख दिया। "आज मुझेइस घऱ मे अपना असली झंडा गाड़ना हैं। आज मे तुम्हारी पीछे कि सील तोडूँगा। "
रसीला नें जैसे हि वैसलीन कि डिब्बी औऱ विक्रांत केँ इरादे कों समझा, उसके चेहरे कां रंगउड़ गय़ा। गांड कि चुदाई कां नाम सुनकर हि उसकीरूह काँपउठी।
"नहि विक्रांत। प्लीज़ बाबू.ऐसा मत करना! मे मर जाऊँगी। वोँ मार्ग बहोत छोटा हैं, तुम्हारा इतना बड़ा९ इंच कां मोटा सरिया वहाकभी नहि जाएगा। प्लीज़ मेरीजान लेँ लो पर्र वहामत मारो, " रसीला रोतेहुए विक्रांत केँ पैरों मे गिरने लगी।
"चुपचाप इस तकिए पऱ अपनी गांडऊपर उठाकर औंधे मुँहलेट जाओ भाभी, वरनाराज खोलने मे मुझे एक् सेकंड नहि लगेगा, " विक्रांत नें कड़क अंदाज़ मे हुक्म दिया।
रसीला लाचारी सें काँपती हुइ पलंग पर्र पेट केँ बललेट गई। विक्रांत नें बिनाकोई रहमखाए उसकी साड़ी औऱ पेटीकोट कों पूराऊपर उसकीपीठ तक समेट दिया। रसीला कि वोँ गोरी, भारी औऱ गोल गांड पूरीतरह नंगी होकर बाहर् आँ चुकी थि। उसकेबीच मे उसकी गांड कां छोटा सां, कड़क औऱ बंदछेद साफ़दिख रहा थां जिसकी सीलआज तक बिल्कुल सुरक्षित थि।
विक्रांत नें वैसलीन कि डिब्बी खोली औऱ ढेर सारा वैसलीन अपनी उंगलियों पऱ लेकर रसीला केँ उसतंग छेद पऱ रगड़ना शुरुआत किया। ठंडी वैसलीन लगते हि रसीला कां जिस्म सिहरउठा। विक्रांत नें अपनी उंगली कों ज़ोर सें अंदर ठूसने कि कोशिश कि, तौ रसीला उतावलापन उठी, "आहह-आहह भइया.मर गई। बहोत दर्द होँ रहा हैं!"
बाहर् खड़ा मे येसभी सुनरहा थां। मेरे सीने मे आगलगी हुईँ थि कि साला मेरे देखते-देखते विक्रांत रसीला कि गांड कि सील तोड़रहा थां। मगर मे चाहकर भि अंदर नहि जा सकता थां।
विक्रांत नें अपनी जींस नीचे कि औऱ उसका९ इंच कां काला, मोटा औऱ लोहे जैसा कड़क लन्ड पूरीतरह तानकर बाहर् आँ गय़ा। उसने अपने पूरे लन्ड पऱ अच्छी तरह वैसलीन मली ताकि वोँ रसीला केँ उस कुंवारे छेद कों फाड़सके। उसने रसीला कि दोनों कूल्हों कों अपने मजबूत हाथों सें पकड़कर बाहर् कि तरफ़ खींचा, जिससे उसकी गांड कां छेद थोडा फैला।
उसने अपने कड़क लन्ड कि भारी सुपारी कों रसीला केँ उसतंग, बंदछेद पऱ टिकाया।
"विक्रांत बाबू.मत करो। आहह-आहह। छोड़दो मुझे." रसीला खाट कि चादर कों दांतों सें भींचकर रोरही थि।
विक्रांत नें अपने पांव जमाए, अपनी कड़ककमर कों पीछे खींचा औऱ बिनाकोई तरसखाए, अपने पूरे शरीर कां वज़नआगे झोंकते हुए एक् हि भयंकर, खूंखार औऱ कड़क धक्के मे अपने मोटे लन्ड कां आधा हिस्सा रसीला कि कुंवारी गांड कि सील कों चीरता हुआ अंदरठूस दिया।
"अउउउघ्घ्घ्घ। भइया.मर गई रे। बाप रे.फट गई मेरी गांड। निकालो इसे!"
रसीला केँ मुँह सें एक् ऐसी खौफनाक औऱ चीखने वाली आवाज़ निकली जौ गले मे हि घुटकर रह गई। उसकी गांड कां वोँ तंगछेद विक्रांत केँ मोटे सरिये कों झेल नहि पारहा थां औऱ उसकीसील टूटने कि वजह सें वहा सें खून कि हलकी सि लकीर बाहर् आँ गई। रसीला कां पूरा जिस्म दर्द सें काँपने लगा औऱ उसकी आँखें फटी कि फटीरह गईं।
मगर विक्रांत बड़ेशहर कां बेरहम खिलाड़ी थां। उसने रसीला कों संभलने कां मौका नहि दिया। उसने रसीला कि कमर कों कसकर पकड़ा औऱ अपनी कड़ककमर सें छोटे-छोटे पर्र भारी झटके मारने शुरुआत किए, ताकि उसका पूरा९ इंच कां लन्ड उसनए रास्ते कों पूरीतरह खोलदे।
हाथ दीवार पर्र कसगए। विक्रांत नें रसीला कि पीछे कि सील तोड़कर इसघऱ मे अपना सबसे बड़ारोब जमा दिया थां। मेरे सीने मे गुस्से औऱ मर्दानगी कि भयंकर आग सुलगरही थि। पहले मेरे दिमाग़ मे आया कि मे सीधे अंदर जाकर विक्रांत सें भिड़ जाऊँ, पर्र फिन मुझेयाद आया कि लड़ाई-झगड़े सें खेल बिगड़ जाएगा।
तभी मेरेमन मे दूर हॉस्टल मे रहरही विक्रांत कि सगी बेहन, पिंकी कां चेहरा आया। वोँ 12वीं कि पढ़ाई केँ लिएघऱ सें दूर हैं, पर्र हैं तौ इसी विक्रांत कां खून! मैंने दीवार पऱ एक् कड़क घूंसा मारा औऱ मन हि मन अपनी सबसे बड़ी प्रतिज्ञा ली—“बेटा विक्रांत, तूँ यहा मेरी स्त्री कि पीछे कि सील तोड़कर स्वयं कों बहोत बड़ा खिलाड़ी समझरहा हैं नां? पर्र यह तेरी सबसे बड़ीभूल हैं। अब मेरीयह कड़क प्रतिज्ञा हैं कि जैसे हि पिंकी अपनी12वीं कि परीक्षा ख़त्म करके छुट्टियों मे इसघऱ मे पेर रखेगी, मे साले तेरेइस घमंड केँ चिथड़े उड़ा दूँगा। उसकीउस कुंवारी जवानी, उसकी टाइट बुर औऱ उसकी पीछे कि सील पऱ पहलाहक मेरेइसी कड़क लन्ड कां होगा। तूने मेरी रसीला कों भोसड़ा बनाया हैं, मे तेरीसगी बेहन कों इसघऱ कि सबसे बड़ी रंडी बनाकर तुझसे सूद समेत बदला लूँगा। ”
इस कड़क प्रतिज्ञा कों अपनेदिल मे दबाकर मेरे अंदर कां क्रोध एक् ठंडी औऱ शातिर मुस्कान मे बदल गय़ा। अब मुझेबस पिंकी केँ छुट्टियों मे घऱआने कां इंतजार करना थां।
तभी किचन कां द्वार (दरवाज़ा) खुला। विक्रांत अपनी पैंट कि ज़िप चढ़ाते हुए, चेहरे पऱ एक् बेहद अहंकारी औऱ ठरकी मुस्कान लिए बाहर् निकला। उसने मुझे गैलरी मे खड़ा देखा, तोँ उसकी आँखें चमक उठीं। उसे अंदाज़ा हौ चुका थां कि मैंने अंदर कि सारी आवाज़ें सुनली हें।
"क्याँ हुआ जितेश भइया? सुभह-सुभह चेहरे पर्र इतना क्रोध क्यूं हैं? अंदर भाभी कों ज़रा संभाल लो, बड़ेशहर केँ झटके हें, थोड़ी ढीलीपड़ गई हें, " विक्रांत नें मेरे कंधे पऱ हाथ रखकर बेहद शातिर अंदाज़ मे चुटकी ली।
मैंने उसकेहाथ कों झटके सें हटाया औऱ अपनी आँखों केँ गुस्से कों छुपाते हुएकहा, "कोईबात नहि विक्रांत बाबू, टाइम-समय कि बात हैं। अभि तोँ खेल शुरुआत हुआ हैं। "
विक्रांत हंसता हुआ अपने कमरे मे चला गय़ा। मे जल्दी किचन केँ अंदर दाखिल हुआ। अंदर कां नज़ारा देखकर मेरी आँखें फटी कि फटीरह गईं। रसीला किचन केँ कड़क स्लैब पर्र औंधे मुँह गिरी पड़ी थि, उसकी साया-साड़ी पूरीतरह ऊपरउठी हुईँ थि। उसकी भारी गांड पऱ अब भि वैसलीन कि चमक थि औऱ उसकेउस तंग, लाल हौ चुकेछेद सें खून कि कुछ बूंदें रिसकर स्लैब पऱ गिरी हुई थीं। वो दर्द केँ मारे सिसकियाँ लें रही थि।
bhay behan kaa pyar dekh k mazaa aagya.or sath hi mai Raseela kaa Vikrant say blackmail hnaa or Raaz rakhne k liye uss say shart rakh k uski hojana bi alag romanchak tajurba de Raha h
झूठा झूला बहेंन कों झुलाया – New Episode
विक्रांत केँ उस अहंकारी ताने कों सुनकर मैंने अपने गुस्से कों अंदर हि दबा लिया। उस टाइम रसीला कि हालत देखकर मैंने उसे छूनाठीक नहि समझा। मैंने आगे बढ़कर उसकेऊपर साड़ी डाली, उसे संभाला औऱ चुपचाप किचन सें बाहर् निकल गय़ा। मन हि मन मैंने तयकर लिया थां कि बदला तोँ पूरा होगा, मगर सहीसमय औऱ सही स्थान पर्र।
इसकेठीक दोदिन बाद, सुभह कि बस सें हमारी मां गाँव सें वापसघऱ लौटआईं। राघव भइया नें हि उन्हें मोबाइल करके बुला लिया थां क्योंकि उन्हें लगरहा थां कि रसीला कि 'बीमारी' औऱ कमजोरी केँ चलतेघऱ संभालने केँ लिए मम्मी कां होना ज़रूरी हैं। मां केँ पेरघऱ मे पड़ते हि माहौल एकदम संस्कारी औऱ कड़क पहरे वाला होँ गय़ा।
मां हरसमय किचन औऱ आँगन मे हि रहतीथीं, जिसकी वजह सें मुझे औऱ विक्रांत, दोनों कों रसीला केँ लगभग जाने कां ज़रा सां भि मौका नहि मिलरहा थां। जब भि मे कोई बहाने बनाकर रसीला केँ कमरे कि तरफ जाता, मां वहीं बैठीकुछ न् कुछकाम कररही होतीथीं। कई दिनों कि इस कड़क दूरी नें मेरे अंदर केँ लन्ड कि आग कों औऱ ज़्यादा भड़का दिया थां। रसीला भि अंदर हि अंदर बेचैनी रही थि, क्योंकि उसे भि अबइस भारीखेल कि आदत होँ चुकी थि औऱ मां केँ पहरे सें उसकीभूख औऱ बढ़ गई थि।
आखिरकार, जब बर्दाश्त सें बाहर् होँ गय़ा, तोँ मैंने एक् शातिर मार्ग निकाला। एक् दोपहर जब मम्मी पड़ोस मे किसी भजन-कीर्तन मे गईं औऱ राघव भइया फैक्टरी मे थें, मैंने रसीला कों इशारा किया। मैंने शहर केँ एक् सुनसान इलाके केँ एक् एवरेज होटल मे अपने नकलीनाम सें एक् रूमबुक किया। रसीला बुर्का ओढ़कर मेरेसंग बाइक पऱ बैठ गई औऱ हम् सीधे होटल केँ रूम नंबर२०४ मे दाखिल होँ गए।
कमरे कां द्वार (दरवाज़ा) बंद होते हि कई दिनों कि भूखी मर्दानगी पूरीतरह फट पड़ी। मैंने बिनाकोई बातकिए रसीला केँ कपड़े तार-तार करदिए। रसीला भि कई दिनों कि प्यासी थि, उसने जल्दी बेड पर्र घुटने औऱ हाथ टिकादिए। उसकी वोँ भारी, गोल गांडहवा मे ऊपरउठ चुकी थि। विक्रांत कि दि हुई मार केँ जख्मअब भर चुके थें, मगर उसकी बुर पहले सें हि पूरीतरह खुली औऱ काम-रस सें भीगी हुईँ थि।
मैंने बिनाकोई देरीकिए अपने लोहे जैसे कड़क लन्ड कों उसकी बुर केँ मुहाने पऱ टिकाया औऱ एक् हि खूंखार औऱ भारी धक्के मे पूरा अंदरठूस दिया।
"अउउउघ्घ्घ्घ। भइया." रसीला केँ मुँह सें सिसकी निकली। मे बिना रुके, गुस्से औऱ कड़क अंदाज़ मे उसे डॉगी स्टाइल मे तबाड़तोड़ पेलरहा थां। कमरे मे थप-थप कि भयंकर आवाज़ गूँजरही थि औऱ मे उसे गंदी-गंदी गालियाँ बकतेहुए अपनी पूरी भड़ास निकाल रहा थां।
हम् दोनों इस तबाड़तोड़ चुदाई केँ चरमसुख मे पूरीतरह डूबेहुए थें कि अचानक एक् खौफनाक हादसा होँ गय़ा।
होटल पऱ पुलिस कि अचानक कड़करेड पड़ गई। इससे पहले कि हमें संभलने कां मौका मिलता, कमरे केँ दरवाज़े कां लॉक डुप्लिकेट चाबी सें खट सें खुला औऱ भारी बूटों कि कड़क आवाज़ केँ संगतीन पुलिस वाले सीधे अंदरघुस आए।
"ओए! खड़े होँ जाओ सालो!यह क्याँ धंधाचल रहा हैं यहा?" एक् मोटे पुलिस वाले नें कड़क आवाज़ मे चिल्लाकर कहा।
हम् दोनों पूरीतरह सें नंगे, उसी चोदम्पति कि हालत मे रंगे हाथों पकड़लिए गए। मेरा लन्ड रसीला कि बुर केँ अंदर हि थां औऱ हम् दोनों केँ होशउड़ चुके थें। एक् दूसरे पुलिस वाले नें जल्दी अपना सरकारी फोन निकाला औऱ हमारी उसी नग्न, कामुक हालत कां पूरा वीडियो प्रूफ बनाना शुरुआत कर दिया।
मैंने घबराकर बात संभालने कि कोशिश कि, "सर.सर। प्लीज़। छोड़ दीजिए, यह मेरी पत्नि हैं। हम् बसयहा आराम करनेआए थें। "
"तेरी पत्नि हैं?" मोटे पुलिस वाले नें मेरी आईडी औऱ रजिस्टर कां नकलीनाम देखते हुए शातिर अंदाज़ मे हँसा, "साले, शक्ल सें हि तुँ चोरलग रहा हैं। तेरी आईडी पऱ नामकुछ औऱ हैं औऱ रजिस्टर मे कुछ औऱ। औऱ इसकी मांग मे सिंदूर तक नहि हैं! हमें चूनालगा रहा हैं? चल साले थाने, वहीं तेरीइस नकली विवाह कां कड़कभूत उतारते हें, " तीसरे पुलिस वाले नें मुझे एक् कड़क थप्पड़ रसीद करतेहुए कहा।
पुलिस वाले हमेंउसी बदनामी केँ डर औऱ खौफ मे जीप मे बैठाकर सीधे पुलिस स्टेशन केँ एक् सुनसान, अंदरूनी कमरे मे लेँ गए। रसीला डर केँ मारे अपनी साड़ी समेटे रोरही थि, औऱ मे उनके पैरों मे गिरने कों सजधजकर थां क्योंकि अगरये बात याँ वीडियो घऱ पर्र मां याँ राघव भइया केँ पास पहुँच जाता, तौ अनर्थ होँ जाता।
"देखो भइया, केस दर्जहुआ तौ अनैतिक व्यापार (immoral trafficking) केँ चक्कर मे तुम् दोनों सीधेजेल जाओगे औऱ समाज मे जोँ थू-थू होगी वोँ अलग। अगर यहा सें बिना किसी लिखा-पढ़ी केँ छूटना हैं, तौ इसमाल कों हमारे हवाले करना होगा, " मोटे पुलिस वाले नें अपनी कड़क बेल्ट ढीली करतेहुए रसीला कि तरफ़ देखा।
बदनामी औऱ जेल केँ खौफ केँ सामने हमारी सारी कड़क हेकड़ी मिट्टी मे मिल चुकी थि। रसीला नें रोतेहुए मेरीतरफ़ देखा, पर्र मेरेपास कोई मार्ग नहि थां। मैंने लाचारी सें अपनी आँखें बंदकर लीं।
"चल री रांड, बहोत मजा लेँ रही थि नां होटल केँ कमरे मे? अब सरकारी कानून कां कड़क डंडा भि झेल, " पुलिस वाले नें रसीला कि साड़ी कों एक् हि झटके मे कमर तक उठा दिया औऱ उसे कमरे कि कड़क लकड़ी कि मेज़ पऱ घुटनों केँ बल बिठाकर जबरन घोड़ी बना दिया।
रसीला उस मेज़ पर्र लाचारी सें रोतेहुए घोड़ी बनी खड़ी थि। जब पहले पुलिस वाले नें अपना पैंट नीचे किया, तोँ उसकी नज़र रसीला कि उस बुर पर्र पड़ी जौ पहले सें हि हम् दोनों भाइयों केँ सरियों कों झेलकर पूरीतरह चौड़ी औऱ ढीली हौ चुकी थि।
उसकी बुर कां वोँ भोसड़ा औऱ ढीलाहाल देखकर पुलिस वाला कड़क अंदाज़ मे हँसा औऱ गंदी गाली देतेहुए बोला, "अबे देखोरे! इस साले नें तौ अपनीइस नकली पत्नि कि बुर कों मार-मारकर पहले हि पूरा कुआंबना रखा हैं! यहकोई शरीफ़ महिला नहि हैं, यह तौ साली पैदाइशी रांड हैं!"
"हाँसर, इसके दोनों छेदों कां मिज़ाज देखकर हि लगरहा हैं कि यह रोज़ कई-कई लन्ड झेलती हैं, " दूसरे पुलिस वाले नें भि अपनी पैंट उतारते हुए गंदी टिप्पणी कि।
बिना किसीरहम केँ, पहले पुलिस वाले नें रसीला कि उस चौड़ी होँ चुकी बुर मे अपना कड़क लन्ड एक् हि झटके मे ठूस दिया। रसीला दर्द औऱ लज्जा केँ मारेउस सरकारी मेज़ पऱ अपनीजीभ बाहर् निकाले चीखउठी, मगर उसकी आवाज़ सुनने वालावहा कोई नहि थां। तीनों पुलिस वाले बारी-बारी सें रसीला कों उस कमरे मे बेरहमी सें लाइनमार रहे थें, औऱ मे कोने मे खड़ा अपनी हि बेहन कों कानून केँ रखवालों केँ कड़क लंडों पर्र कढ़ाई कि तरह उबलते हुए देखने पर्र मजबूर थां।
पहला राउंड समाप्त होने केँ बाद रसीला सरकारी मेज़ पर्र पूरीतरह पसीने सें तर औऱ अधमरी होकरगिर पड़ी थि। उसकी आँखें सूजी हुइ थीं औऱ वो हाँफरही थि। मुझेलगा कि शायदअब यहलोग हमें छोड़ देंगे, पर्र पुलिस वालों कि हवस अभि शांत नहि हुई थि। वोँ वीडियो प्रूफ हाथ मे होने कि वजह सें पूरीतरह बेखौफ थें।
"क्यूं बे, एक्-एक् करके तोँ बहोत नखरे दिखारही थि। अब असली सरकारी मेहमाननवाज़ी कां दूसरा राउंड शुरुआत होगा, " मोटे पुलिस वाले नें कड़क आवाज़ मे हँसते हुए अपनी बेल्ट फिन सें खोली।
इस दूसरे राउंड मे उन्होंने सारी मर्यादाएं औऱ रहम कों पूरीतरह ताक पर्र रख दिया। दूसरे पुलिस वाले नें रसीला कों बाल सें पकड़कर फिन सें मेज़ पऱ कड़क अंदाज़ मे घोड़ी बनने पऱ मजबूर किया। रसीला कां जिस्म दर्द सें काँपरहा थां, पऱ पुलिस वालों केँ कड़क रवैये केँ आगे उसकी एक् नहि चली।
इस बार पहले औऱ दूसरे पुलिस वाले नें एक् संग रसीला कों घेर लिया।
"अबे ओए, तूँ आगे कां मोर्चा संभाल, पीछे कि यहतंग सुरंग आज मे पूरीतरह साफ़ करूँगा, " दूसरे पुलिस वाले नें गंदी गाली बकतेहुए कहा।
रसीला नें जैसे हि देखा कि इस दूसरे राउंड मे दोनों पुलिस वाले एक् संग नंगे होकर उसके बिल्कुल लगभग आँ चुके हें, उसकेहोश उड़गए। "नहि साहब। प्लीज़। एक् संगमत मारो। बहोत दर्द हौ रहा हैं, मे मर जाऊँगी." वो बुरीतरह गिड़गिड़ाने लगी।
"चुप रह रांड!आज तुम्हे कानून केँ दोनों कड़क डंडे एक् संग हि चखने पड़ेंगे!" पहले पुलिस वाले नें कड़क आवाज़ मे डांटा।
एक् पुलिस वाला रसीला केँ ठीकआगे खड़ाहुआ औऱ दूसरा उसकी भारी गांड केँ पीछे। बिना किसीरहम केँ, दोनों नें एक् संग अपने लंडों कों रसीला केँ दोनों छेदों पऱ टिकाया। औऱ फिन, अपनी पूरीकमर कि ताक़त झोंकते हुए दोनों नें एक् हि भयंकर, बेरहम औऱ कड़क धक्के मे अपने पूरे लन्ड एक् संग उसकी बुर औऱ गांड केँ अंदरठूस दिए।
"अउउउघ्घ्घ्घ। भइया.बचा लो.फट गई रे बाप रे!" रसीला केँ मुँह सें एक् ऐसी खौफनाक औऱ तीखीचीख निकली जोँ उसबंद कमरे कि कड़क दीवारों सें टकराकर गूँजउठी। उसकी आँखें पूरीतरह बाहर् उबलआईं, औऱ दर्द केँ मारे उसका पूरा जिस्म मेज़ पऱ कसमसाने लगा।
अब रसीला इस दूसरे राउंड मे पूरीतरह सें डबल-पेनिट्रेशन (एक् संगदो लन्ड) केँ खूंखार शिकंजे मे फंस चुकी थि। आगे कि बुर मे पहला पुलिस वाला औऱ पीछे कि गांड मे दूसरा पुलिस वाला, दोनों मिलकर एक् संग मशीन कि तरह तबाड़तोड़ झटके मारने लगे।
कमरे केँ अंदर थप-थप औऱ रसीला कि दबी-कुचली सिसकियों कि आवाज़ गूँजरही थि। दोनों पुलिस वाले एक्-दूसरे कों देखकर गंदी गालियाँ बकरहे थें औऱ रसीला कों पूरी बेरहमी सें पेलरहे थें। रसीला उस सरकारी मेज़ पऱ घोड़ी बनी, अपनीजीभ बाहर् निकाले हाँफरही थि। उसका जिस्म इस दोहरी मार केँ सामने पूरीतरह टूट चुका थां।
तीसरा पुलिस वाला कोने मे खड़ा होकर अपनेफोन सें इस खूंखार औऱ कड़कखेल कां पूरा वीडियो रिकॉर्ड कररहा थां औऱ हँसते हुएकह रहा थां, "साली रांड कां हाल देखो, दूसरे राउंड मे दोनों तरफ सें कड़क डंडे खाकर केसे उतावलापन रही हैं!"
मे कोने मे खड़ा लाचारी औऱ खौफ सें काँपरहा थां। मेरी अपनी बेहन कानून केँ रखवालों केँ बीच एक् कुतिया कि तरह पीसीजा रही थि, मगरउस वीडियो प्रूफ औऱ बदनामी केँ डर सें मेरे अंग-अंग पूरीतरह बंधेहुए थें।
दोनों पुलिस वालों नें रसीला केँ दोनों छेदों मे एक् संग अंतिम कुछ खूंखार औऱ कड़क धक्के मारे, औऱ गंदी गालियां बकतेहुए अपना सारा पानी उसकेबदन केँ अंदर हि निचोड़ दिया। रसीला उस सरकारी मेज़ पर्र पूरीतरह बेदम औऱ अधमरी होकर बिखर गई, उसकी सांसें उखड़रही थीं औऱ आँखों सें आँसू लगातार बहरहे थें।
दोनों पुलिस वालों नें हंसते हुए अपनी पैंटऊपर चढ़ाई औऱ बेल्ट कड़क अंदाज़ मे बांधी। तीसरा पुलिस वाला, जौ फोन सें वीडियो रिकॉर्ड कररहा थां, उसने मोबाइल जेब मे रखा औऱ मेरीतरफ देखा।
"हाँ तोँ भइया, हमारी मेहमाननवाज़ी पूरी हौ गई औऱ इस रांड कां मिज़ाज भि थोडा ठंडा होँ गय़ा, " मोटे पुलिस वाले नें मेज़ पऱ थपकी मारते हुएकहा, "अबबात आती हैं इस वीडियो कि औऱ तुम् दोनों कि इज़्ज़त कि। हम् कोई कसाई नहि हें, हमारा मनोरंजन होँ गय़ा, तौ हम् बात कों आगे नहि बढ़ाना चाहते। "
उसने वीडियो रिकॉर्ड करने वाले पुलिस वाले कों इशारा किया। उसने मेरे सामने फोन कि स्क्रीन घुमाई, जहाँ रसीला कि उस नग्न औऱ डबल-पेनिट्रेशन वाली चुदाई कि पूरी क्लिप साफ़दिख रही थि। उसने मेरे सामने हि 'डिलीट' बटन दबाया औऱ फिन 'रिसेंटली डिलीटेड' फोल्डर मे जाकरउस वीडियो प्रूफ कों हमेशा केँ लिए पूरीतरह मिटा दिया।
"यह लो, वीडियो पूरीतरह साफ। अब इसबात कां कोई सबूत नहि बचा हैं। अपनीइस पत्नि कों संभालो, इसके कपड़े पहनाओ औऱ यहा सें सीधेदफा होँ जाओ। मगर याद रखना, अगलीबार अगरइस शहर केँ किसी होटल मे दोबारा दिखे, तोँ सीधे हवालात कि कड़कहवा खिलाएंगे, " पुलिस वाले नें कड़क लहजे मे चेतावनी दि।
मैंने जल्दी राहत कि एक् गहरी सांसली। बदनामी कां वोँ खौफनाक खतराअब टल चुका थां। मैंने काँपते हाथों सें रसीला कि साड़ी उठाई औऱ उसेढक दिया। रसीला रोतेहुए आरामसे खड़ी हुईँ, उसने अपने कपड़े ठीककिए औऱ हम् दोनों बिना पीछे मुड़े उस पुलिस स्टेशन केँ कमरे सें बाहर् निकलआए।
जब हम् बाहर् आए, तोँ दोपहर ढल चुकी थि। रसीला बाइक पर्र पीछे बैठी थि, उसका जिस्म दर्द सें टूटरहा थां औऱ वो पूरीतरह खामोश थि। हम् दोनों जानते थें कि घऱ पर्र मम्मी औऱ राघव भइया हमारा इंतजार कररहे होंगे, औऱ इस कड़कराज कों अब हम् दोनों कों हमेशा केँ लिए अपने सीने मे दफन रखना थां।
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