झूठा झूला बहेंन कों झुलाया – New Episode
ठीक हैं भइया आपको मनपसंद आँ रही हैं तोँ आगे कि बताता हूं
भाग 7
किचन कि उस घुटनभरी हवा मे रसीला कि तेज़ चलती साँसों कि आवाज़साफ़ सुनीजा सकती थि। मेरा एक् हाथ दीवार पर्र टिका थां औऱ मेरी नज़रें सीधे उसकी झुकी हुई पलकों पऱ थीं, जौ रह-रहकर काँपरही थीं। अंदर केँ कमरे सें कूलर कि धीमी 'घूँ-घूँ' औऱ राघव केँ खर्राटों कि आवाज़ आँ रही थि, जोँ हमें बार-बार याद दिलारही थि कि हम् एक् जलतेहुए बारूद केँ ढेर पर्र खड़े हें।
"भइया। प्लीज हटिएयहा सें, मेरादम घुटरहा हैं, " रसीला नें बहोत हि दबी औऱ लड़खड़ाती आवाज़ मे कहा, पर्र उसके पैरों नें अपनी स्थान सें हिलने सें मनाकर दिया थां।
मैंने अपनी आवाज़ कों फुसफुसाहट मे बदला, "दम इस गर्मी सें नहि घुटरहा रसीला, दम तौ उससच कों छुपाने सें घुटरहा हैं जिसे तुम् भि जानती होँ औऱ मे भि। विवाह केँ बाद औऱ राघव केँ इस एक्सीडेंट केँ बाद। तूने स्वयं कों बहोत रोक लिया, अब औऱ नहि। " विवाह कों तौ क़रीब 6 महीने हुए थें करीब औऱ एक्सीडेंट कों लगभग 2 महीनों सें ज्यादा हौ गय़ा थां, रशीला भि इतनेसमय सें बिनासुख कां अनुभव किएरही थि
ये कहतेहुए मैंने बिनाकोई मौकादिए, झुककर अपना एक् हाथ उसकीपीठ केँ पीछे डाला औऱ दूसरा उसकी जांघों केँ नीचे। रसीला कुछसमझ पाती, उससे पहले हि मैंने उसे अपनी मज़बूत बाहों मे हवा मे ऊपरउठा लिया।
"भइया!यह क्याँ कररहे होँ। छोड़ो मुझे, कोई देख लेगा!" रसीला केँ मुँह सें एक् दबी हुई चीख निकली, पर्र डर केँ मारे उसने जल्दी अपने दोनों हाथ मेरेगले मे डालदिए ताकि वोँ गिर नं जाए।
"मैंने कहा थां न्। आजऐसा झूला झुलाऊँगा कि तुँ पुरानी सारी कड़वाहट भूल जाएगी, " मैंने सीधे उसकी आँखों मे देखते हुएकहा।
मैंने उसेगोद मे उठाए-उठाए हि किचन केँ कोने कि मद्धम दीवार सें सटा दिया। हवा मे लटके होने कि वजह सें उसका पूरा जिस्म मेरे सीने सें पूरीतरह भींच चुका थां। मेरा लैंड पैंट केँ अंदर लम्हा भर मे लोहे कि रॉड कि तरह सख्त होकर उसकी बुर केँ मुहाने पर्र जा टिका। रसीला नें हवा मे रहतेहुए हि उस सख्ती कों महसूस किया औऱ उसकी आँखें कसकरबंद हौ गईं।
उसने लज्जा औऱ बेबसी केँ मारे अपना मुँह मेरे कंधे पऱ छुपा लिया। मैंने गोद मे पकड़े-पकड़े हि एक् हाथ सें उसके नीले कुर्ते कों ऊपर सरकाया औऱ सलवार केँ नाड़े कों ढीला करकेउसे बस उतना नीचे किया जहाँ सें मार्ग साफ़ हौ सके। इस तड़प नें उसकीउस गीली गुफा कों औऱ भि ज़्यादा तंग (Tight) बना दिया थां।
मैंने उसेगोद मे थोड़ा औऱ ऊपर उछाला औऱ अपने काले, सख्त लैंड कां एक् पूरा ज़ोरदार धक्का नीचे सें ऊपर कि तरफ मारा।
"उफ़्फ़। आअहह। भइया." रसीला कां पूरा शरीरहवा मे हि धनुष कि तरहअकड़ गय़ा। दर्द औऱ मज़े केँ इस तीखे झटके मे उसने मेरे कंधे कों अपने दाँतों सें काट लिया ताकि उसकी आवाज़ बाहर् न् जाए।
मैंने उसे संभलने कां मौका नहि दिया। उसे गोद मे उठाए-उठाए हि मैंने अपनीकमर कि रफ़्तार बढ़ानी शुरुआत कि। मे नीचे सें ऊपर धक्के माररहा थां औऱ रसीला मेरी बाहों मे किसी असली झूले कि तरह ऊपर-नीचे हौ रही थि। हर धक्के केँ संग 'चप-चप' कि आवाज़ किचन केँ सन्नाटे मे गूँजरही थि। उसने अपनी टाँगें मेरीकमर पऱ औऱ मज़बूती सें कसलीं।
वो राघव कि पत्नि थि, पर्र इससमय वोँ सिर्फ़ मेरी रसीला थि, जौ इस'गोद वाले झूले' कि रफ़्तार मे अपनी सारी बंदिशें भूलकर ऊपर-नीचे डोलरही थि।
तभी अचानक अंदर केँ कमरे सें एक् भारी आवाज़ आई—"रसीला। ज़रा पानी देना."
राघव कि वोँ नींद मे डूबी आवाज़ सुनते हि हमारे जिस्म जैसे बर्फ कि तरहजम गए। रसीला कि आँखें फटी कि फटीरह गईं, औऱ वोँ हवा मे मेरीगोद मे वैसी हि अटकीरह गई.
रसीला कि फटी आँखें औऱ हवा मे ठिठका उसका शरीर साफ़बता रहा थां कि हमारे पैरों केँ नीचे कां बारूद फटने हि वाला हैं। अंदर केँ कमरे सें राघव केँ उठने औऱ बेड कि चरचराहट कि आवाज़ साफ़ गलियारे तक आँ रही थि।
"भइया। वोँ जागगए। उतारो मुझे." रसीला कि फुसफुसाहट मे मौत कां डर थां। उसने घबराहट मे मेरी बाहों कों इतनी ज़ोर सें भींचा कि उसकी उंगलियों केँ नाख़ून मेरीपीठ मे धँसगए।
मेरादिल भि किसी ख़राब जनरेटर कि तरह धक-धककर रहा थां। नसों मे दौड़ता वोँ सारानशा एक् समय मे हिरन हौ गय़ा। मैंने बिना एक् सेकंड गंवाए रसीला कों धीरे-धीरे सें नीचे फर्श पऱ उतारा। हवा मे लटके होने कि वजह सें जौ मार्ग पूरीतरह जुड़ा हुआ थां, वोँ अलग होते हि 'पट्ट' सें एक् दबी हुईँ आवाज़ हुईँ।
रसीला नें लड़खड़ाते हाथों सें झटपट अपना नीलेरंग कां कुर्ता नीचे किया औऱ सलवार कों ऊपर घसीटकर नाड़ा कसनेलगी। उसकी उंगलियाँ डर केँ मारेइस कदर काँपरही थीं कि नाड़े कि गाँठ हि नहि लगपारही थि।
"तुम्। तुम् बाहर् निकलो। जल्द." उसने किचन केँ कोने मे रखे पानी केँ घड़े कि तरफ भागते हुएकहा। उसका चेहरा पसीने सें तर-बतर थां औऱ होंठ पूरीतरह सूख चुके थें।
मे अपनी पैंट कि चेनऊपर चढ़ाता हुआदबे पाँव किचन सें बाहर् आया औऱ हॉल मे रखी मेज़ केँ पास जाकरऐसे खड़ा होँ गय़ा जैसे मे अब भि बिलों कां हिसाब हि देखरहा थां। पर्र मेरी साँसें इतनी भारीथीं कि मेरा पूरा सीना ऊपर-नीचे होँ रहा थां।
तभी अंदर केँ कमरे कां द्वार (दरवाज़ा) खुला।
राघव दीवार कां सहारा लिए बाहर् आया। उसका सीधाहाथ औऱ छातीअब भि पट्टियों मे लिपटी थि, औऱ उसकी आँखों मे नींद औऱ दवाइयों कां भारीपन साफ़दिख रहा थां। उसनेहॉल मे मुझे खड़े देखा तोँ उसकी सूजी हुइ आँखों मे वही पुरानां भरोसा तैर गय़ा।
"अरे जितेश भइया। तुम् अभि तक गए नहि? दोपहर सें इन कागज़ों मे हि सरखपा रहे हौ क्याँ?" राघव नें बहोत हि कमज़ोर आवाज़ मे मुस्कुराते हुए पूछा।
"हाँ राघव भइया। वोँ कुछबिल पेंडिंग थें, वहीदेख रहा थां, " मैंने अपनीथूक गटकते हुए आवाज़ कों जितना होँ सके नॉर्मल रखने कि कोशिश कि, पऱ मेरे माथे सें पसीना टपककर सीधे मेज़ पऱ रखे कागज़ पऱ गिरा।
ठीक उसी लम्हा रसीला किचन सें बाहर् आई। उसकेहाथ मे स्टील कां पानी कां गिलास थां। उसने अपनी नज़रें पूरीतरह ज़मीन पर्र झुकारखी थीं, पर्र मैंने गौर किया कि उसका कुर्ता पीछे सें थोडा सां मुड़ा हुआ थां। मेरा कलेजा मुँह कों आँ गय़ा।
"लो। पानी पीजिए, " रसीला नें गिलास राघव कि तरफ बढ़ाते हुएकहा। उसकी आवाज़ मे एक् हलकी सि थिरकन थि।
राघव नें अपने बाएंहाथ सें गिलास पकड़ा, दो घूँट पानी पिया औऱ फिन रसीला केँ चेहरे कि तरफ देखा। "रसीला, तेरा चेहरा इतनालाल क्यूं हैं? औऱ इतनी हाँफ क्यूं रही हैं तुँ? किचन मे गर्मी अधिक हैं क्याँ?"
राघव केँ इस सीधे प्रश्न नें हॉल केँ सन्नाटे कों औऱ भि भयानक बना दिया। रसीला कि सिट्टी-पिट्टी गुम हौ गई, उसने एक् समय केँ लिए अपनीडरी हुईँ नज़रें मेरीतरफ घुमाईं, जैसेपूछ रही हौ—"भइया, अब क्याँ करें?"
मुझेलगा कि बसअबखेल ख़त्म हैं, राघव कों सभीसमझ आँ जाएगा।
पऱ मैंने अपनी इलेक्ट्रिशियन वाली फुर्ती दिखाई औऱ बात कों संभालते हुए जल्दी बीच मे कूदपड़ा, "अरेहाँ राघव भइया, किचन कां वोँ छोटा वाला पंखा सुभह सें हि कड़क-कड़क आवाज़ करकेबंद पड़ा हैं। उमस इतनी हैं कि अंदरदो मिनटखड़े होना मुश्किल हैं। मे अभि वहीचेक करनेजा रहा थां कि इसके मोटर कि वाइंडिंग उड़ गई हैं याँ कैपेसिटर शॉटहुआ हैं। "
मेरीबात सुनकर राघव नें एक् लंबी साँस लें ली, "हाँ दोस्त, शहर मे गर्मी बहोत हैं। रसीला, तूँ बाहर् हॉल मे आकरबैठ, कूलर केँ सामने। जितेश भइयाजब तक हें, यहा कां कोईकाम रुकने वाला नहि हैं। "
राघव कां ये अंधा भरोसा मेरे सीने मे किसी जलतेहुए पेचकस कि तरहधँस गय़ा। वो सीधा-साधा आदमी पानी कां गिलास मेज़ पर्र रखकर वापस अपने कमरे कि तरफ बढ़नेलगा। जाते-जाते उसने मुड़कर मुझसे कहा, "जितेश भइया, गरम चाय पीकर जानां। रसीला, भइया केँ लिएकड़क गरमचाय बना देना। "
जैसे हि कमरे कां दरवाज़ा बंदहुआ, हॉल मे फिन सें वही सन्नाटा पसर गय़ा।
रसीला मेज़ केँ कोने कों पकड़कर खड़ी होँ गई। उसके पांवइस कदर काँपरहे थें कि वोँ फर्श पर्र बैठते-बैठते बची। उसने अपनीफटी आँखों सें मेरीतरफ देखा। उसकी आँखों मे अब वोँ तड़प नहि थि, बल्कि एक् खौफनाक गिल्ट थां।
"देखा आपने भइया?" उसने बहोत हि दबी औऱ रोती हुइ आवाज़ मे फुसफुसाकर कहा, "वोँ इंसान हम् पर्र ईश्वर कि तरह भरोसा करता हैं। अगरआज वोँ दो सेकंड पहले आँ जाते, तौ मे कहीं मुँह दिखाने लायक नहि रहती। मम्मी नें ठीक हि कहा थां। इस झूले कि रफ़्तार हमें एक् दिन गहरे कुएं मे गिरा देगी। "
उसने अपने नीले कुर्ते कां पिछला हिस्सा झटके सें ठीक किया औऱ अपनी सलवार कों ऊपर संभालते हुए दुपट्टे सें माथे कां पसीना पोंछने लगी।
मे चुपचाप अपने टूल्स कि किट उठाने लगा। मेराहाथ भि प्लास पकड़ते हुए हलका सां काँपरहा थां। मुझेसमझ आँ गय़ा थां कि राघव कि लाचारी औऱ उसकाये अंधा भरोसा हमारे उस पुराने खेल केँ आड़े आँ रहा थां। रसीला केँ मन मे चाहत तोँ थि, पर्र इसबार डर औऱ अपराधबोध कि दीवार बहोत ऊँची होँ चुकी थि।
"मे चलता हूं रसीला। दुकान कां शटर गिराना हैं, " मैंने अपनीकिट उठाते हुएकहा।
रसीला नें मुड़कर मुझे नहि देखा, वोँ चुपचाप किचन कि तरफबढ़ गई। पऱ जाते-जाते किचन केँ दरवाज़े पर्र वोँ एक् लम्हा केँ लिए रुकी औऱ बिना पीछे मुड़े बोलि, "आजरात मत आनां भइया.अब मुझेइस 'झूले' सें डर लगनेलगा हैं। "
मे कमरे सें बाहर् निकलआया। बाहर् कि तेज़धूप मेरी आँखों मे चुभरही थि, पर्र मेरेमन मे रसीला कि वोँ आख़िरी बात गूँजरही थि। क्याँ ये सचमुच हमारे खेल कां अंत थां, याँ येइस तूफान केँ आने सें पहले कि एक् छोटी सि खामोशी थि?
उस दोपहर केँ बाद पूरेतीन दिन तक मे राघव केँ घऱ नहि गय़ा। दुकान पऱ हि दिन-भर काम करता, मोटरों केँ तारों मे स्वयं कों उलझाए रखता औऱ रात कों अपनेउसी सूने किराए केँ कमरे मे आकरसो जाता। दिमाग़ मे बार-बार रसीला कि वोँ आख़िरी बात गूँजती रहती थि—"अब मुझेइस 'झूले' सें डर लगनेलगा हैं। "
मुझे लगनेलगा थां कि शायद राघव केँ उस अंधे भरोसे नें रसीला केँ भीतर केँ गुनाह कों पूरीतरह जगा दिया हैं औऱ अब वोँ दोबारा कभी मेरी तरफ़ नहि देखेगी।
पर्र चौथेदिन साम कों अचानक मौसम नें फिनवही पुरानां रंग दिखाया। शहर मे तेज़धूल भरी आंधी चलनेलगी औऱ आसमान मे काले बादलघिर आए। मे दुकान कां शटर गिराकर अभि अपने कमरे पऱ पहुंचा हि थां कि मूसलाधार बारिश शुरुआत होँ गई। बिजली कि कड़कड़ाहट केँ संग हि पूरे इलाके कि लाइटगुल हौ गई।
मे मोमबत्ती जलाकर बैड पऱ लेटा हि थां कि मेरेफोन कि स्क्रीन चमकउठी। रसीला कां मोबाइल थां।
मैंने झट सें मोबाइल उठाया, "हाँ रसीला."
"भइया। कहां होँ आप्?" उसकी आवाज़ मे वही पुरानी घबराहट औऱ डर साफ़ महसूस होँ रहा थां जौ गाँव वालेघऱ मे लाइट जाने पऱ होता थां।
"मे अपने कमरे पऱ हूं। क्याँ हुआ?सभी ठीक तौ हैं नं?" मैंने पूछा।
"नहि भइया। राघव कों साम सें बहोत तेज़ बुखार चढ़ गय़ा हैं। वोँ दर्द सें कराहरहे हें। घऱ मे रखी दवाइयाँ ख़त्म हौ चुकी हें औऱ बाहर् इतनी तेज़ आंधी-बारिश हैं कि मुझेसमझ नहि आँ रहा मे क्याँ करूँ। लाइट भि नहि हैं, मुझे बहोत डरलगरहा हैं." बोलते-बोलते उसकागला रुँध गय़ा।
"तुँ डरमत, मे अभि आँ रहा हूं, " मैंने जल्दी कहा।
मैंने अपनी रेनकोट पहनी, टॉर्च उठाई औऱ पास केँ मेडिकल स्टोर सें बुखार कि दवाइयाँ लेकर सीधे राघव केँ घऱ कि तरफ़ बाइकभगा दि। पानी कां थपेड़ा चेहरे पऱ लगरहा थां, पर्र मेरेमन मे सिर्फ़ रसीला कां वोँ डरताहुआ चेहरा घूमरहा थां।
जब मैंने उनकेघऱ कां द्वार (दरवाज़ा) खटखटाया, तौ रसीला नें जल्दी कुंडी खोली। मोमबत्ती कि मद्धम रोशनी मे उसका चेहरा पीला पड़ाहुआ थां। वही नीलेरंग कां सूट-सलवार पहना थां उसने। मुझे देखते हि उसकी आँखों मे पानीभर आया, "भइया। आप् आँ गए। "
मे सीधे अंदर केँ कमरे मे गय़ा। राघवबेड पर्र पड़ा थां, पट्टियों सें ढके उसके शरीर पऱ कंबल लिपटा थां औऱ वोँ तेज़ बुखार मे बड़बड़ा रहा थां। मैंने रसीला सें पानी मँगाया औऱ दवा उसके मुँह मे डाली। फिन उसके माथे पर्र ठंडे पानी कि पट्टियाँ रखनी शुरुआत कीं।
लगभगदो घंटे कि मशक्कत केँ बाद, रात केँ बारहबजे राघव कां बुखार थोडा उतरा औऱ दवा केँ असर सें वोँ गहरी नींद मे सो गय़ा।
कमरे सें बाहर् आकर मे हॉल मे सोफे पऱ बैठ गय़ा। जिस्म पसीने औऱ बारिश केँ पानी सें चिपचिपा हौ रहा थां। रसीला किचन सें बाहर् आई, उसकेहाथ मे वही नीलेरंग कां दुपट्टा थां जिससे वोँ अपने माथे कां पसीना पोंछरही थि।
"अब वोँ ठीक हें, सोरहे हें, " मैंने बहोत धीमी आवाज़ मे कहा।
रसीला सोफे केँ पासआकर खड़ी हौ गई। मोमबत्ती कि पीली रोशनी मे उसकी सलवार-कुर्ते कि सिलवटें औऱ उसकी तेज़ चलती साँसें साफ़दिख रहीथीं। बाहर् बारिश कि 'टप-टप' आवाज़ उस सन्नाटे कों औऱ गहराकर रही थि।
"तीनदिन सें आप् आए क्यूं नहि भइया?" उसने अपनी नज़रें झुकाकर बहोत हि दबी ज़ुबान मे पूछा।
"तूने हि तोँ कहा थां कि तुम्हें अबडर लगनेलगा हैं." मैंने सीधे उसकी आँखों मे देखते हुएकहा।
रसीला नें एक् गहरी साँसली, उसकी पलकें काँप उठीं। उसने अपने दुपट्टे कों उंगलियों मे मरोड़ते हुएकहा, "डर तोँ आज भि लगरहा हैं भइया। पऱ जब मुसीबत आती हैं, तौ इसदिल कों आपके अलावा कोई औऱ सूझता हि नहि। मे बहोत कोशिश करती हूं स्वयं कों रोकने कि, पऱ."
उसकीबात अधूरी रह गई, पर्र उसकी आँखों कि वोँ पुरानी चमक औऱ होंठों कि थिरकन नें मुझेसभी बता दिया। रसीला कां वोँ गिल्ट इस तूफानी रात केँ सन्नाटे औऱ अकेलेपन केँ आगे घुटने टेक चुका थां।
मैंने बिना एक् सेकंड गंवाए सोफे सें उठकर उसकाहाथ पकड़ लिया। इस बार उसकेहाथ कि मेहंदी पूरीतरह गायब थि, पऱ उसकी हथेलियों कि वोँ पुरानी गर्माहट वैसी हि थि।
"मैंने कहा थां न् रसीला। इस झूले कि आदत एक् बारपड़ जाए, तोँ इसेकोई रोक नहि सकता, " मैंने फुसफुसाते हुएउसे अपनी तरफ़ खींचा।
रसीला नें एक् बार मुड़कर राघव केँ बंद कमरे कि तरफ़ देखा, उसकी साँसें इतनी तेज़ हौ गईं कि उसका सीना तेज़-तेज़ धड़कने लगा। उसने अपनी आँखें कसकरबंद करलीं औऱ अपनासिर सीधे मेरी छाती पर्र टिका दिया।
"आज राघव कि शपथ। मुझेफिन सें उसी झूले पऱ बैठादो भइया। मे अब औऱ नहि सह सकती, " उसने बहोत हि बेताब होकर मेरे कंधे कों जकड़ लिया।
बाहर् बारिश औऱ तेज़ हौ गई थि, औऱ हॉल केँ उस मद्धम अंधेरे मे हमारा वोँ पुरानां, झूठा झूला एक् बारफिन सें अपनी पूरी रफ़्तार पकड़ने केँ लिए रेडी थां।
झूठा झूला बहेंन कों झुलाया – New Episode
इतना प्रेम देने केँ लिए शुक्रिया कथा कों, औऱ जोँ लोग मुजसे बात करना चाहते इह याँ कुछ पूछना याँ सुझाव चाहते थें वोँ पूछ सकते मे जरूर कोसिश करूँगा सबको जवाबदे सकू
अब तक भइया बेहन केँ बीच कामुक वार्तालाप न् केँ बराबर हैं कृपया उल्लेखीत करें शुक्रिया jangali
झूठा झूला बहेंन कों झुलाया – New Episode
भाग 8
रसीला केँ मुँह सें जैसे हि वोँ बेबस फुसफुसाहट निकली—"मुझे फिन सें उसी झूले पर्र बैठादो भइया। मे अब औऱ नहि सह सकती"—मेरे अंदर कां शैतान पूरीतरह जाग गय़ा। शरीर कि सारी नसेंतन गईं औऱ पैंट केँ अंदर मेरा लैंड किसी तपती हुइ लोहे कि रॉड कि तरह छटपटाने लगा।
मैंने बिना एक् लम्हा गंवाए आगे बढ़करउसे सीधे सोफे कि पीठ सें सटा दिया। मेरा एक् हाथ उसकी पतलीकमर पऱ थां औऱ दूसरा सीधे उसके नीले कुर्ते केँ ऊपर उसकी छाती पर्र जा टिका।
"भइया। ऊँहूँ." रसीला केँ मुँह सें सिर्फ़ आधी सिसकी हि निकलपाई थि कि मैंने अपने होंठ सीधे उसके काँपते हुएगरम होंठों पर्र रखदिए।
शुरुआत मे उसने घबराहट मे अपनेहाथ मेरी छाती पऱ रखकर मुझे पीछे धकेलने कि एक् नाकाम कोशिश कि, पऱ मेरे होंठों कि भूख इतनीतेज़ थि कि उसने उसकी बची-कुची हिम्मत भि छीनली। मैंने उसके निचले होंठ कों अपने दाँतों केँ बीच हल्का सां दबाकर चूसना शुरुआत किया, तोँ रसीला कां पूरा जिस्म ढीलापड़ गय़ा। उसकी आँखें बंद होँ गईं, उसके मुँह सें एक् गहरी, गर्मअहह निकली औऱ उसकेहाथ मेरेगले मे कसगए। वोँ भि पूरी दीवानगी सें मेरे चुंबन कां जवाब देनेलगी।
हॉल केँ उस सन्नाटे मे बाहर् गिरती बारिश केँ बीच हमारी साँसों कि 'सूप-सूप' औऱ होंठों केँ टकराने कि आवाज़ गूँजने लगी।
चूमते-चूमते हि मैंने अपनाहाथ उसके कुर्ते केँ अंदरडाल दिया। बिना ब्रा केँ उसकी वोँ कतरनें इतनीकड़क औऱ भरी हुईँ थीं कि मेरी पूरी हथेली मे भि नहि समारही थीं। जैसे हि मेरी उंगलियों नें उसकीउस गर्म, मखमली छाती कों कसकर भींचा, रसीला केँ मुँह सें चुंबन केँ बीच मे हि एक् तीखी, बेबस आवाज़ निकली—"मम्म। आअहह। भइया."
मैंने अपनी उंगलियों कां दबाव थोड़ा औऱ बढ़ा दिया। अंगूठे सें उसकेकड़क होँ चुके निप्पल कों मसला, तोँ उसका पूरा शरीरमज़े औऱ तड़प केँ मारे थरथरा उठा। वोँ हवा मे अपनीकमर कों मेरे पैंट केँ उस सख्त हिस्से सें बार-बार रगड़ने लगी, जिससे मेरी नसें फटने कों हौ गईं। मेराहाथ उसकी सलवार केँ नाड़े तक पहुंचा, मैंने उसे ढीला करने केँ लिए उंगलियाँ बढ़ाईं हि थीं कि.
तभी अचानक रसीला नें पूरी ताक़त लगाकर अपना मुँह मेरे होंठों सें अलगकर लिया। वोँ बुरीतरह हाँफरही थि, उसकी आँखें वासना औऱ डर केँ मारे पूरीलाल होँ चुकीथीं। उसने झटके सें मेराहाथ अपनी छाती सें हटाया औऱ पीछेहट गई।
"नहि। प्लीज भइया.आज नहि." उसने अपनी उंगलियों सें अपने बिखरे बालों औऱ कुर्ते कों संभालते हुएकहा। उसकी छाती अभि भि तेज़-तेज़ ऊपर-नीचे होँ रही थि।
"रसीला! यह क्याँ कररही हैं? इसमोड़ पर्र लाकरमत रोक मुझे." मे पागल होने कि कगार पर्र थां, मेरागला सूख चुका थां औऱ पैंट केँ अंदर कि तड़प मुझेचीर रही थि।
"अगरआज सभीकुछ होँ गय़ा भइया, तौ मे कल सुभह राघव कां सामना नहि कर पाऊँगी, " उसने रोतेहुए बहोत हि दबी आवाज़ मे कहा। "आज रात.इस तड़प कों यहीं रहनेदो। अपनेइस कड़कपन कों दबाकर रखो। औऱ मुझे भि इसआग मे जलनेदो। कल दोपहर। जब वोँ यहा नहि होंगे। तब मे स्वयं तुम्हें उस पुराने झूले पर्र बैठने सें नहि रोकूँगी। पर्र आजरात। प्लीज रुकजाओ। "
ये कहकर उसने एक् आख़िरी बार मेरी पैंट केँ उस उभरेहुए हिस्से कि तरफ़ देखा, उसकी आँखों मे एक् अजीब सि प्यास औऱ तड़पसाफ़ दिखाई देरही थि। उसने झटके सें अपना मुँह मोड़ा औऱ दबे पाँव अंदर केँ कमरे कि तरफ़भाग गई। कमरे कां दरवाज़ा बहोत धीरे-धीरे सें बंदहुआ औऱ कुंडी गिरने कि आवाज़आई।
मे वहीं सोफे पर्र गिरपड़ा। मेरे होंठों पर्र अब भि उसकीलार कां स्वाद थां औऱ मेरी हथेलियों मे उसकी छाती कि वोँ मखमली गर्माहट अभि भि महसूस हौ रही थि। पैंट केँ अंदर मेरा अंगारा अब औऱ भि ज़्यादा लाल होकरतड़प रहा थां, औऱ मे जानता थां कि पूरीरात मुझेइसी अधूरी प्यास केँ संग करवटें बदलते हुए गुज़ारनी हैं।
हॉल केँ उस सन्नाटे मे मोमबत्ती कि आख़िरी लौ भि फड़फड़ाकर बुझ गई औऱ चारों तरफ़घाघ अंधेरा पसर गय़ा। बाहर् बादलों कि गड़गड़ाहट औऱ मूसलाधार बारिश कि आवाज़अब औऱ भि तेज़ होँ चुकी थि, पऱ मेरे कानों मे मात्र रसीला कि वोँ आख़िरी बात गूँजरही थि—"कल दोपहर। मे स्वयं तुम्हें नहि रोकूँगी। "
सोफे पर्र लेटे-लेटे मेरी पैंट केँ अंदरमची वोँ तड़पअब बर्दाश्त सें बाहर् हौ रही थि। उसकी छाती कि वोँ कड़क छुअन औऱ उसके होंठों कि वोँ मीठीलार मेरे दिमाग़ कि नसों कों पूरीतरह पागलकर चुकी थि। ऐसालग रहा थां कि बदन केँ अंदरकोई खौफनाक ज्वालामुखी फटने कों सजधजकर हैं।
मैंने बिनादेर किए अपनी पैंट केँ बटन खोले औऱ नीचे सरका दिया। अंधेरे मे मेरा वोँ सख्त औऱ नसों वाला लैंड बाहर् आते हि कड़ककर पेट सें जालगा। जैसे हि मेरे पसीने सें भीगेहाथ कि ठंडी छुअनउस तपतेहुए लोहे पर्र पड़ी, मेरे मुँह सें एक् गहरी औऱ भारी सिसकी निकल गई।
मैंने अपनी उंगलियों कि ग्रिप मज़बूत कि औऱ ऊपर-नीचे तेज़ रफ़्तार मे हाथ चलाना शुरुआत किया।
बाहर् बादलों कि गड़गड़ाहट औऱ मूसलाधार बारिश नें जैसे पूरेशहर कों घेररखा थां। हॉल केँ उस गहरे अंधेरे मे, सोफे पर्र नंगे जिस्म पड़े-पड़े मेरेहाथ कि रफ़्तार अब किसी बेकाबू मशीन जैसी होँ चुकी थि। बंद कमरे केँ अंदर राघवसो रहा थां, पर्र मेरे दिमाग़ सें डर कां हर एक् कतरा गायब होँ चुका थां। नस-नस मे सिर्फ़ रसीला कां वोँ नशा औऱ उसकी छाती कि वोँ कड़क छुअनदौड़ रही थि।
मैंने अपनेहाथ कि पकड़ कों औऱ मज़बूत किया औऱ ऊपर-नीचे पूरी ताक़त सें स्ट्रोक मारने लगा। इस बार मुझसे अपनी आवाज़ दबाई नहि जारही थि। बाहर् कड़कती बिजली केँ हंगामा केँ बीच मैंने पूरी दीवानगी मे, थोड़ेज़ोर सें उसकानाम पुकारा, "रसीला। आअहह। रसीला। देख क्याँ हालकर दिया हैं तूने मेरा!"
मन केँ परदे पर्र सिर्फ़ उसका वोँ चेहरा घूमरहा थां जब वोँ मेरे होंठों कों चूसरही थि। मैंने हाथ कि रफ़्तार कों औऱ तेज़ करतेहुए, बंद दरवाज़े कि तरफ़ देखकर पूरी बेताबी सें फुसफुसाया, "साली। कितनी कड़क हौ गई हैं तेरीयह छाती। जब कुर्ते केँ अंदरहाथ डाला थां, तौ पूरी हथेली छोटीपड़ रही थि। कल दोपहर कों। कल दोपहर कों इस नीले कुर्ते औऱ पटियाला सलवार केँ चिथड़े उड़ा दूँगा। एक्-एक् इंच चूसूँगा तेरा."
मेरा पूरा जिस्म पसीने सें भीग चुका थां। हर स्ट्रोक केँ संग 'चप-चप' कि आवाज़ आँ रही थि औऱ मेरे मुँह सें गंदी, कामुक बातें स्वयं-ब-स्वयं निकलरही थीं, "बहोत तड़पाया हैं नं तूने मुझेछह महीने सें। कलउस पुराने झूले पऱ ऐसा बैठाकर हिलाऊँगा कि तेरीयह चीखें पूरा मोहल्ला सुनेगा। रसीला। मेरी रसीला."
नसों कां तनावअब अपनी आख़िरी हदपार कररहा थां। रीढ़ कि हड्डी मे एक् जानलेवा करंट दौड़ा औऱ मेरा पूरा शरीर सोफे पऱ धनुष कि तरहअकड़ गय़ा।
"ओह्ह। रसीलाअअहह.!"
एक् आख़िरी भारीचीख केँ संग मेरे अंदर कां वोँ तपताहुआ गर्म लावा झटके सें बाहर् उबलपड़ा। एक् केँ बाद एक् कईतेज़ औऱ गर्म छर्रे अंधेरे मे सोफे औऱ फर्श पऱ बिखरते चलेगए। मेराहाथ वहींथम गय़ा औऱ मे बुरीतरह हाँफते हुए सीधे सोफे पर्र पीछे कि तरफ़गिर पड़ा।
मेरा सीना तेज़-तेज़ ऊपर-नीचे हौ रहा थां, शरीर पूरीतरह ढीलापड़ चुका थां, पऱ आँखों मे अब भि वही जूनून थां क्योंकि रात कि यहतड़प अब शांत होँ चुकी थि औऱ कल दोपहर कां असलीखेल शुरुआत होने मे बसकुछ हि घंटे बाकी थें।
काम पूरीतरह निपट चुका थां। मेरा पूरा शरीर पसीने सें तर-बतर, सोफे पऱ ढीलापड़ा हुआ थां औऱ साँसें धीरे धीरे अपनी सामान्य रफ़्तार पर्र लौटरही थीं। पऱ जिस्म कि इस शांति केँ बावजूद, दिमाग़ केँ परदे पर्र सें रसीला कां वोँ चेहरा औऱ उसकी यादें एक् लम्हा केँ लिए भि ओझल नहि होँ रहीथीं।
मैंने अपनी आँखें बंदकीं औऱ अंधेरे हॉल कि छत कि तरफ़ देखते हुए एक् गहरी साँसली। चेहरे पऱ एक् शैतानी मुस्कान स्वयं-ब-स्वयं तैर गई।
"रसीला। आजरात तोँ तूने अपनीइस नाँ-नुकुर सें मुझे बहोत तड़पा लिया, " मैंने बहोत हि दबी, पऱ एक् कड़क औऱ ठंडी आवाज़ मे बंद कमरे केँ दरवाज़े कि तरफ़ देखकर बुदबुदाया। "पऱ कल दोपहर। कल दोपहर जब राघवघऱ पऱ नहि होगा, तब तेरीयह सारी बंदिशें औऱ यह गिल्ट धरा कां धरारह जाएगा। "
मैंने करवटली औऱ उस सोफे केँ कोने कों देखा जहाँकुछ देर पहले वोँ मेरे सीने सें चिपकी हुईँ थि। उसकी यादों नें मेरेमन मे कल कां पूरा नज़ारा साफ़कर दिया थां।
"कलजब तूँ किचन मे खड़ी होगी नं, तौ पीछे सें आकर तुझेही ऐसा दबोचूँगा कि तेरीचीख निकल जाएगी। ये जौ तेरा नीला कुर्ता हैं न्। इसके एक्-एक् बटन कों अपने दाँतों सें घसीटकर अलग करूँगा। औऱ वोँ पटियाला सलवार, जिसके नाड़े कों छूने सें आज तूने मुझेरोक दिया थां। कलउसे एक् हि झटके मे तेरे पैरों सें नीचे खींच दूँगा। "
ख्यालों हि ख्यालों मे मे उसेकल केँ उसखेल कां मज़ाचखा रहा थां।
"आज जोँ तूने अपनीइन कड़क कतरनों कों बस थोड़ा सां छूने दिया थां, कलउन पऱ अपनी उंगलियों केँ ऐसे निशान छोड़ूँगा कि तूँ आईने मे देखकर शर्माएगी। तेरीउसी किचन केँ प्लेटफॉर्म पर्र उल्टा लेटाकर, पीछे सें जब अपना पहला धक्का मारूँगा नं। तब तुँ चिल्लाएगी—'भइया धीरे-धीरे। ' पर्र कल मे रुकने वाला नहि हूं। तुम को तड़पा-तड़पा कर, इस'गोद वाले झूले' पर्र ऐसा नचाऊँगा कि तुँ राघव कां नाम तक भूल जाएगी। "
मैंने एक् ठंडी औऱ गहरी साँसली, अपने शरीर पर्र आँ रही उसकी चमेली कि खुशबू कों महसूस किया औऱ अपनी पैंट कों ऊपर संभालते हुए सोफे पऱ सीधालेट गय़ा।
"आजरात जितनी मर्जी नींद पूरीकर लें रसीला। कल दोपहर तेरीइस गीली गुफा मे ऐसा तूफ़ान लाऊँगा कि तुँ हफ़्तों तक ठीक सें चल नहि पाएगी। "
अब मुझेकल दोपहर कि उसधूप औऱ सन्नाटे कां इंतज़ार थां, जहाँ रसीला कां येडर हमेशा-हमेशा केँ लिए मेरीइस दीवानगी केँ आगेदम तोड़ने वाला थां।
हॉल केँ उस ठंडे अंधेरे मे लेटे-लेटे मेरी आँखों सें नींद पूरीतरह गायब थि। दीवार घड़ी कि हर एक् 'टिक-टिक' जैसेकल दोपहर केँ उसआने वाले तूफ़ान कां इशारा कररही थि।
मैंने करवट बदली औऱ उसबंद दरवाज़े कि तरफ़ देखते हुए, जहाँ मेरीसगी बेहन रसीला इससमय सोरही थि, बहोत हि दबी औऱ मज़बूत आवाज़ मे फुसफुसाया, "मेरी बेहन। तुझेही इतनाखुश कर दूँगा कि तूँ कलरात केँ इस सारे दर्द औऱ बेचैनी कों भूल जाएगी। "
येकोई मामूली खेल नहि थां। येउस पवित्र रिश्ते कि आड़ मे छिपी वोँ बेकाबू आग थि, जिसने हम् दोनों कों इस मोड़ पऱ लाकर खड़ाकर दिया थां। रसीला भले हि ऊपर सें राघव केँ डर औऱ समाज केँ गिल्ट कि दुहाई देरही थि, पऱ मे अच्छी तरह जानता थां कि जब मेराहाथ उसकीकमर पर्र फिसलता हैं, तोँ उसका पूरा शरीर केसेमोम कि तरह पिघल जाता हैं।
"कल दोपहर जब वोँ द्वार (दरवाज़ा) बंद होगा नं रसीला, तौ मे तेरेइस भइया वाले रिश्ते कां वोँ पूराहक वसूल करूँगा जिसे तुँ भि अंदर हि अंदर चाहती हैं। तूनेआज मुझेआधा चूमकर जौ प्यासा छोड़ा हैं, कल तेरीउस पटियाला सलवार कों उतारकर तुम्हारी तरफउस किचन केँ काउंटर पर्र इसतरह संभालूँगा कि तेरीरूह तक काँप उठेगी। "
सोफे कि चादर कों उंगलियों मे भींचते हुए मेरे दिमाग़ मे सिर्फ़ उसकी वोँ झुकी हुईँ पलकें औऱ उसकी वोँ कड़क छातीघूम रही थि।
"तुम्हें दुनिया कि हर बंदिश सें आज़ाद करके, कल उस'गोद वाले झूले' पऱ ऐसासुख दूँगा कि तुँ स्वयं अपनी आँखों मे आँसूलिए मुझसे औऱ गहरे धक्के माँगेगी। बसकुछ घंटे औऱ। फिन देख्ना तेराये भइया तुम्हें केसे खुशियों केँ उसनरक मे लेँ जाता हैं जहाँ सें तूँ कभी वापस नहि आनां चाहेगी। "
सुभह कि पहली किरण फूटने मे अब ज्यादा समय नहि थां, औऱ मेरे अंदर कां जूनून कल दोपहर केँ उस सन्नाटे कों चीरने केँ लिए पूरीतरह रेडी हौ चुका थां।
झूठा झूला बहेंन कों झुलाया - Continue reading for full story
एपसोड दो भइया मे भि महेनत कररहा हूं बहेंन कों पटाने कि पर्र साला बहुत मुस्किल हैं साला पऱ हारनई मानूँगा
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