चाची - भतीजे केँ गुलछर्रे (Full Storyd) - Real Kahani Part 1
सावधानी: इसकथा मे निम्नलिखित विषयों कां विस्तारपूर्वक विवरण हैं। यदिऐसे विषय आपको मनपसंद नहि हैं, तौ कृपया इसकथा कों नां पढे।
विषय:
कौटुम्बिक व्यभिचार (incest), मुख-मैथुन (oral), गुदा-मैथुन (anal), गुदा चुसाई (rimming), मूत्र-सेवन (watersport)
ये एक् अंग्रेजी कथा कां हिन्दी तर्जुमा हैं - कथा कां श्रेय मूल लेखक (अज्ञात) कों जाता हैं
Sabse pahle too ek nayee storyi k liye bhut bhut dhanywad vakharia bhay, Ummeed he kee yeh kahani bi aapki baki kahaniyan kee prakaar kamukta or uttejna say bharpur hongi. Keep posting Bro
Mast h bhay. sai socha thaa mene ye sab chachi and chacha kaa game h pr acha gayi. Chachi bhateje mein kaam krida hongi too majaa bi aayega. Toda samwad or ched chad bi add krna.
चाची - भतीजे केँ गुलछर्रे (Full Storyd) – New Episode
चाचाजी केँ बारबार आग्रह भरेखत आने सें आखिर मैंने ये गर्मी कि छुट्टी अपने गाँव वालेघऱ मे बिताने कां फ़ैसला किया। मे जब गाँव पहुँचा तौ चाचाजी बहोत खुशहुए। चाची कों पुकारते हुए बोले."लो, अनुराग आँ गय़ा तुम्हारा संग देने कों। अनुराग बेटे, अब मे निश्चिंत मन सें दौरे पऱ जा सकता हूं नहि तौ महीना भर अकेले रहकर तुम्हारी चाची बोर हौ जाती."
माया चाची मुस्कराती हुइ मेरीओर देखकर बोलि। "हाँ लल्ला, बहोत अच्छा किया जौ आँ गये। वैसे मैंने अपनी भांजी कों भि चिठ्ठी लिखी हैं, शायद वोँ भि आँ जाये अगले हफ़्ते। तेरेआने कां पक्का नहि थां नाँ इसलिये"
चाचाजी सामान अपनीबैग मे भरतेहुए बोले."चलो, दो सें तीनभले। मे तोँ चला। भाग्यवान संभाल कर रहना। वैसेअब अनुराग हैं तोँ मुझेकोई चिंता नहि। अनुराग बेटे चाची कां पूरा खयाल रखना, उसकीहर जरूरत पूरी करना, अब महीने भरघऱ कों औऱ चाची कों तेरे सहारे हि छोड.कर जारहा हूं" चाचाजी नें बैग उठायी औऱ दौरे पऱ निकलगये.
मेरे राजेशचाचा बड़े हेंडसम व्यक्ति थें। गठीला स्वस्थ शरीर औऱ गेंहुआ रंग। मेरे पापा केँ छोटे भइया थें औऱ गाँव केँ बड़े पुश्तैनी घऱ मे रहते थें। वहीं रहकर एक् अच्छी कंपनी केँ लियेआस पास केँ शहरों मे मार्केटिंग कि जॉब करते थें इसलिये अक्सर बाहर् रहते थें। गाँव केँ घऱ मे चाची केँ सिवाय औऱ कोई नहि थां। पाँचसाल पहले बत्तीस कि आयु मे विवाह कि थि, वो भि घऱ वालों कि जिद पर्र, नहि तौ विवाह करने कां उनकाकभी इरादा नहि थां.
माया चाची उनसेसात आठसाल छोटी थि। वे विवाह मे सिर्फ़ पच्चीस छब्बीस साल कि होंगी। उन्हें अब तक कोई संतान नहि हुइ थि। घऱ वालों कों इसमें कोई आश्चर्य नहि हुआ थां क्योंकी चाचाजी कों पहले सें हि विवाह मे दिलचस्पी नहि थि। मुझे तोँ लगता हैं कि उन्हों नें कभी माया चाची कां चुंबन भि नहि लिया होगा, संभोग तौ दूर कि बातरही.
मे चाचाजी कि विवाह मे छोटा थां। तब विवाह केँ जोड़े मे लिपटी वो कमसिन खूबसूरत चाची मुझे बहोत भा गई, थि। उसकेबाद इन पाँच सालों मे मे उन्हें बस एक् बारदो दिन केँ लिये मिला थां। गाँवआने कां मौका भि नहि मिला.आज उन्हें फ़िरदेख कर मुझेबड़ा अच्छा लगा.सच बात तौ ये हैं कि बहोत संयम बरतने पऱ भि न् मानकर मेरा लन्ड खड़ा होनेलगा.
मुझेबड़ा अटपटा लगा क्योंकी चाचाजी कि मे इज्जत करता थां। उनकी जवान पत्नि कि ओर मेरेऐसे विचार मन मे आने सें मुझे लज्जा सि लगी। पर्र एक् तोँ मेरा अठारह साल कां जोश, दूसरे माया चाची कां भरपूर जोबन.वे अबतीस इकतीस साल कि भरी पूरी परिपक्व जवानऔरत थि औऱ घूँघट लियेहुए सादी साड़ी मे भि उनकारूप छुपाये नहि छुपरहा थां.
वेबड़ा सां सिंदूर लगायी हुई थि औऱ बिना लिपस्टिक केँ भि उनके कोमल उभरे होंठलाल लाल गुलाब कि पंखुड़ियों सें लगरहे थें। साड़ी उनके जिस्म मे लिपटी हुइ थि, फ़िर भि उसमें सें भि उनके वक्ष कां उभार नहि छुपता थां। हरी चूड़ियाँ पहने उनकी गोरी बाँहें देखकर सहसा मेरेमन मे विचार आँ गय़ा कि चाची कां शरीर नग्न कैसा दिखेगा? अपनेइस कामुक मन पऱ मैंने फ़िर अपने आप् कों कोस डाला.
मेरीनजर शायद उन्हों नें पहचान ली थि क्योंकी मेरीओर देखकर चाची बड़ी शरारती नजर सें देखकर बोलीं। "कितने जवान होँ गये होँ लल्ला, इतना सां देखा थां तुझेही। विवाह कर डालोअब, गाँव केँ हिसाब सें तौ अब तक तुम्हारी बहू आँ जानां चाहिये."
उनके बोलने केँ औऱ मेरीओर देखने केँ अंदाज सें मे एक् बात जल्दी समझ गय़ा। माया चाची बड़ी "चालू"चीज़ थि। कम सें कम मेरेसंग तोँ बहोत इतरारही थि। मे थोड़ा शरमाकर इधरउधर देखने लगा.
हम् अब अकेले थें इसलिये वे घूँघट छोड.कर अपने कपड़ेठीक करतेहुए मुझसे गप्पे लगाने लगी। उनकेबाल भि बड़े लंबे हसीन थें जिसका उन्हों नें जुड़ा बांधरखा थां। "गरमचाय बनाकर लाती हूं लल्ला." कहकरवे चली गई। अब साड़ी उनकीकमर सें हट गयीँ, थि औऱ उस गोरी चिकनी कमर कों देखकर औऱ उनके नितंब डुलाकर चलने केँ अंदाज सें हि मेरा लन्ड औऱ कसकरखड़ा हौ गय़ा.
वे शायदइस बात कों जानती थि क्योंकी जानबूझ कर अंदर सें पुकार कर बोलीं। "यहीं किचन मे आँ जाओ लल्ला। हाथ मुंह भि धोलो" मेराऐसा कसकरखड़ा थां कि मे उठकरखड़ा होने कां भि साहस नहि कर सकता थां, चलकर उनके सामने जाने कि तोँ दूररही। "बाद मे धो लूँगा चाची, नहा हि लूँगा, गरमचाय आप् यहीं लेँ आइये नाँ प्लीज़."
वेगरम चाय लें करआई। मेरीओर देखने कां अंदाज उनकाऐसा थां कि जैसेसभी जानती थि कि मेरी क्याँ हालत हैं। बातें करतेहुए बड़ीसहज रीति सें उन्हों नें अपनाढला हुआ आँचलठीक किया.ये दस सेकंड कां काम करने मे उन्हें पूरेदो मिनिट लगे औऱ उनदो मिनटों मे पाँचछह बार नीचे झुककर उन्हों नें अपनी साड़ी कि चुन्नटें ठीक कि.
इस सारे कार्य कां उद्देश्य सिर्फ़ एक् थां, अपने स्तनों कां उभार दिखाकर मेराकाम तमां करना जिसमें माया चाची शत प्रतिशत सफ़लरही। उसलाल लो-कट कि चोली मे उनके उरोजसमा नहि पारहे थें। जबवे झुकी तौ उन गोरे मांसल गोलों केँ बीच कि खाई मुझेऐसी उत्तेजित कर गई कि अपने हाथों कों मैंने बड़ी मुश्किल सें अपने लन्ड पर्र जाने सें रोका नहि तोँ हस्तमैथुन केँ लिये मे मराजा रहा थां.
मेराहाल देखकर चाची नें मुझ पऱ तरस खाया औऱ अपना छिछोरापन रोककर मेरारूम ठीक करने कों ऊपरचली गई। मुझे अपना लन्ड बिठाने कां वक़्त देकरकुछ देरबाद बातें करती हुइ मुझे कमरे मे लेँ गई,। "साम हौ गयीँ, हैं अनुराग, तुम् नहालो औऱ नीचे आँ जाओ। मे खाने कि तैयारी करती हूं."
"इतनी जल्द खानां चाची?" मैंने पूछा.वे मेरीपीठ पर्र हाथरख कर बोलीं। "जल्द खानां औऱ जल्द सोना, गाँव मे तौ यही होता हैं लल्ला। तुम् भि आदतडाल लो." औऱ बड़े अर्थपूर्ण तरीके सें मेरीओर देखकर वे मुस्कुराने लगी.
मे हड़बड़ा गय़ा। किसीतरह अपने आप् कों संभाल कर नहाने जानेलगा तौ पीछे सें चाची बोलि। "जल्द नहाना अच्छे बच्चों जैसे, कोई शरारत नहि करना अकेले मे" औऱ खिलखिलाती हुईँ वे सीढ़ियाँ उतरकर किचन मे चली गई। मे थोड़ा शरमा गय़ा क्योंकी मुझेलगा कि उनका इशारा इसतरफ़ थां कि नहाते हुए मे हस्तमैथुन न् करूँ.
चाची केँ इसखेल सें मेरेमन मे एक् बड़ी हसीनआशा जागउठी। औऱ वो आशा विश्वास मे बदल गई, जब मे नहाकर किचन मे पहुँचा। अब मे पूरी तैयारी सें आया थां। मनमार कर किसीतरह मैंने अपने आप् कों हस्तमैथुन करने सें रोका थां। बाद मे लन्ड कों खड़ापेट सें सटाकर औऱ जाँघिया पहनकर ऊपर सें उसी पर्र मैंने पाजामे कि नाड़ी बांधली थि औऱ ऊपर सें कुर्ता पहन लिया थां। अब मे चाहे जितना मज़ा लें सकता थां, लन्ड खड़ा भि होता तोँ किसी कों दिखता नहि.
चाची किचन कि तैयारी कररही थि। मे वहीं कुर्सी पऱ बैठकर उनसे बातें करनेलगा। चाची नें कुछ बैंगन उठाये औऱ हंसिया लेकर उन्हें काटने मेरे सामने जमीन पऱ बैठ गई। अपनी साड़ी घुटनों केँ ऊपरकर केँ एक् टांग उन्हों नें नीचेरखी औऱ दूसरी मोडकर हँसिये केँ पाट पऱ अपना पाँवरखा। फ़िरवे बैंगन काटने लगी.
उनकी गोरी चिकनी पिंडलियों औऱ सुंदर पैरों कों मे देखता हुआ आनंद लेनेलगा। वेबड़े सहजभाव सें सब्जी काटरही थि। अचानक मुझे जैसेशॉक लगा औऱ मेरा लन्ड ऐसे उछला जैसेझड़ जायेगा। हुआये कि चाची नें धीरे-धीरे बैठने कों थोड़ाहिल डुलकर अपनी टाँगे औऱ फैलाई। इस सें उनकी गोरी नग्न जांघें तौ मुझे दिखी हि, उनकेबीच कालेघने बालों सें आच्छादित उनके गुप्तांग कां भि दर्शन हुआ। माया चाची नें साड़ी केँ नीचेकुछ नहि पहना थां.
मे शरमा गय़ा औऱ बहोत उत्तेजना भि हुईँ। पहले मैनेये समझा कि उन्हें पता नहि हैं कि उनकासभी खजाना मुझेदिख रहा हैं इसलिये झेंपकर नजर फ़िराकर दूसरी ओर देखकर मे उनसे बातें करनेलगा। पऱ वे कहां मुझे छोड़ने वाली थि। दो हि मिनिट मे शरारत भरे अंदाज मे वे बोलि। "चाची क्याँ इतनी बुरी हैं लल्ला कि बात करते वक़्त उसकीओर देख्ना भि नहि चाहते?"
मैंने मुडकर उनकीओर देखा औऱ कहा। "नहि चाची, आप् तौ बहोत खूबसूरत हें, अप्सरा जैसी, मुझे तौ लगता हैं आप् कों लगातार देखता रहूँ पऱ आप् बुरा न् मान जाएँ इसलिये घूरना नहि चाहता थां."
"तौ देखो नां लल्ला। ठीक सें देखो। मुझे भि अच्छा लगता हैं कि तेरे जैसाकोई प्यारा जवान लड़का प्रेम सें मुझे देखे। औऱ फ़िर तोँ तूँ मेरा भतीजा हैं, घऱ कां हि लड़का हैं, तेरे तकने कों मे बुरा नहि मानती" कहकरउस मतवाली नारी नें अपनी टाँगे बड़ी सहजता सें औऱ फ़ैला दि औऱ बैंगन काटती रही.
अब तोँ शक कि कोई गुंजाइश हि नहि थि। चाची मुझे रिझारही थि। मे भि शरमछोड। करनजर जड़ाकर उनकेउस मादकरूप कां मजा लेनेलगा। गोरी फ़ूली चूत पऱ खूब रेशमी कालेबाल थें औऱ मोटी चूत केँ बीच कि गहरी लकीर थोड़ीखुल कर उसमें सें लाललाल योनिमुख कि भि हल्की झलकदिख रही थि.
पाँच मिनिट केँ उसकाम मे चाची नें पंद्रह मिनिट लगाये औऱ मुझसे जानबूझ कर उकसाने वाली बातें कि। मेरी गर्लफ़्रेन्ड्स हें याँ नहि, क्यूं नहि हें, आज केँ लड़के लड़कियां तौ बड़े चालू होते हें, मेरे जैसा हसीन जवान लड़का अब तक इतनादबा हुआ क्यूं हैं इत्यादि इत्यादि। मे समझ गय़ा कि चाची जरूरमुझ पर्र मेहरबान होंगी, शायदउसी रात मे खुश भि हुआ औऱ चाचाजी कां सोचकर थोड़ी अपराधीपन कि भावना भि मन मे हुईँ.
आखिर चाची उठीं औऱ खानां बनाने लगी। मे बाहर् केँ कमरे मे जाकर पुस्तक पढ़नेलगा। अपनी उबलती वासना शांत करने कां मुठ्ठ मारने केँ सिवाय कोई चारा नहि थां इसलिये मन लगाकर जोँ सामने दिखा, पढ़तारहा। कुछ वक्तबाद चाची नें खाने पर्र बुलाया औऱ हम् दोनों नें मिलकर बिलकुल यारों जैसी गप्पें मारते हुए खानां खाया.
खानां ख़त्म करके मे अपने कमरे मे जाकर सामान अनपैक करनेलगा। सोचरहा थां कि चाची कहां सोती हें औऱ आजरात केसे कटेगी। तभीवे ऊपरआई औऱ मुझेछत पऱ बुलाया। "अनुराग, यहा आँ औऱ बैड लगाने मे मेरे सहायता कर."
मे छत पऱ गय़ा। मेरादिल डूबाजा रहा थां। गरमी केँ दिन थें। साफ़ थां कि सभीलोग बाहर् खुले मे सोते थें। ऐसी हालत मे क्याँ बात बननी थि चाची केँ संग.छत पऱ दो खाटें थि। हमने उनपर गद्दियाँ बिछाई। "गरमी मे बाहर् सोने कां मज़ा हि औऱ हैं लल्ला" कहकर मुझे चिढ़ाती हुई वे मच्छरदानियाँ लेनेचली गई.
वापसआई तौ दोनों मच्छरदानियाँ फ़टी निकलीं। माया चाची मेरी नजरों मे नजरडाल कर बोलीं। "मच्छर तौ बहोत हें अनुराग, सोने नहि देंगे। गरमी इतनी हैं कि नीचे सोया नहि जायेगा। ऐसाकर, तूँ खाटें सरकाकर मिला लेँ, मे डबल वाली मच्छादानी लें आती हूं। तुँ शरमायेगा तोँ नहि मेरेसंग सोने मे? वैसे मे तेरी चाची हूं, माँ जैसी हि समझ लें."
मे शरमाकर कुछ बुदबुदाया। चाची मंदमंद मुस्कराकर डबल मच्छरदानी लेनेचले गई। वापसआई तौ हम् दोनों उसे बांधने लगे। मैंने साहस करके पूछा। "चाची, आजू बाजू वाले देखेंगे तोँ नहि." वेहंस पड़ीं। "इसका मतलब हैं तूनेछत ठीक सें नहि देखी." मैंने गौर किया तौ समझ गय़ा। आसपास केँ घरों सें हमारा घर-मकान बहोत ऊंचा थां। दीवाल भि अच्छी ऊंची थि। बाहर् कां कोई भि छत पर्र नहि देख सकता थां.
तभी चाची नें मीठा ताना मारा। "औऱ लोग देखें भि तोँ क्याँ हुआ बेटे। तुँ तौ इतना सयाना बच्चा हैं, जल्दी सो जायेगा सिमटकर." मैंने मन हि मनकहा कि चाची मौकादो तोँ दिखाता हूं कि ये बच्चा तुम्हारे मतवाले जिस्म कां केसेरस निकालता हैं.
आखिर चाची नीचे जाकर ताला लगाकर बत्ती बुझाकर ऊपरआई। मे तब तक मच्छरदानी खोंसकर अपनी बिस्तर पर्र लेट गय़ा थां। चाची भि दूसरी ओर सें अंदरआकर दूसरी बिस्तर पर्र लेट गई.
पास सें चाची केँ जिस्म कि मादक खुशबू नें फ़िर अपना चमत्कार दिखाया औऱ मेरा मस्तखड़ा होँ गय़ा। चाची भि गप्पें मारने केँ मूड मे थि औऱ फ़िरवही गर्लफ़्रेन्ड वाली बातें मुझसे करनेलगी। मेरा लन्ड अब तक अपनी लगाम सें छूटकर पाजामे मे तंबूबना करखड़ा हौ गय़ा थां.
चाची - भतीजे केँ गुलछर्रे (Full Storyd) – New Episode
हल्की चाँदनी थि इसलिये काफ़ीसाफ़ सभीदिख रहा थां। लन्ड केँ तंबू कों छुपाने केँ लिये मे करवटबदल करपीठ चाची कि ओर करकेलेट गय़ा तौ हंसकर उन्हों नें मेरीकमर मे हाथ डालकर मुझेफ़िर अपनीओर मोड़ा। "शरमाओ मत लल्ला, क्याँ बात हैं, ऐसे क्यूं बिचकरहे होँ?"
मुझे अपनीओर खींचते हुए उनकाहाथ मेरे लन्ड कों लगा औऱ वे हंसने लगी."ये बात हैं, सचमुच बड़ा हौ गय़ा हैं मेरा प्यारा भतीजा। पर्र ये क्यूं हुआरे, किसी गर्लफ्रेंड कि याद आँ रही हैं?" कहकर उन्हों नें सीधा पाजामे केँ ऊपर सें हि मेरे लन्ड कों पकड लिया औऱ सहलाने लगी.
अब तौ मेरा औऱ रुकना मुश्किल थां। मे सरककर उनकीओर खिसका औऱ उनकेबदन पऱ अपनी बांह डालकर चिपट गय़ा जैसे बच्चा माँ सें चिपटता हैं। उनके सीने मे मुंह छुपाकर मे बोला। "चाची क्यूं तरसाती हें मुझे? आप् कों मालूम हैं कि आपकेरूप कों देखकर साम सें मेरा क्याँ हाल हैं."
चाची नें मेरा मुंहऊपर किया औऱ जोर सें मुझेचूम लिया। "तोँ मेरा भि हालकुछ अच्छा नहि हैं लल्ला। तेरेइस प्यारे जवानबदन कों देखकर मेरा क्याँ हाल हैं, मे हि जानती हूं."
कुछ भि बातें करने कां अबकोई मतलब नहि थां। हम् दोनों हि बुरीतरह सें कामातुर थें। एक् दूसरे कों लिपटकर जोरजोर सें एक् दूसरे केँ होंठ चूमने लगे। चाची केँ उन मुलायम होंठों केँ चुंबन नें कुछ हि देर मे मुझेचरम सुख कि कगार पऱ लाकररख दिया। उनका आँचलअब ढल गय़ा थां औऱ चोली मे सें उबलकर बाहर् निकलरहे वे उरोज मेरी छाती सें भिड़ें हुए थें। मेरा उत्तेजित शिश्न कपड़ों केँ ऊपर सें हि उनकी जांघों कों धक्के माररहा थां.
मेरे मुंह सें एक् आह निकली औऱ चाची नें चुंबन तोड.कर मेरे लन्ड कों टटोला औऱ फ़िर मुझेचित लिटा दिया। "लल्ला अब तुम्हारी खैर नहि, मुझे हि कुछ उपाय करना होगा." कहकरवे मेरे बाजू मे बैठ गई औऱ पाजामे केँ बटनखोल कर मेरे जांघिये कि स्लिट मे सें उन्हों नें मेरा उछलता लन्ड बाहर् निकाल लिया.
चाँदनी मे मेरा तन्नाया लन्ड औऱ उसका सूजालाल सुपाड़ा देखकर उनके मुंह सें भि एक् आह निकल गई,। उसेहाथ मे लेकर पुचकारते हुएवे बोलि। "हायराम कितना प्यारा हैं, मे तोँ निहाल हौ गई, मेरे राजा."
औऱ झुककर उन्हों नें मेरा सुपाड़ा मुंह मे लें लिया औऱ चूसने लगी। उनकीजीभ केँ स्पर्श सें मे ऐसा तड़पा जैसे बिजली छू गई, हौ। झुकी हुइ चाची कि चोली मे सें उनके मम्मे लटककर जूसी फलों जैसे मुझे लुभारहे थें। इतने मे चाची नें आवेश मे आकर अपना मुंह औऱ खोला औऱ मेरा पूरा लन्ड जड तक निगल लिया जैसे गन्ना होँ.
"चाची, ये क्याँ कररही हें? मे झड़ जाऊंगा आप् केँ मुंह मे" कहकर मैंने उनका मुंह हटाने कि कोशिश कि तौ उन्हों नें हल्के सें अपने दांतों सें मेरे लन्ड कों काटकर मुझे सावधान किया औऱ आँखमार दि। उनकीनजर मे गजब कि वासना थि। फ़िर मुंह सें मेरे लन्ड कों जकड़कर उसपरजीभ फ़िराती हुईँ वेजोर जोर सें मेरा लोडा चूसने लगी.
दो हि मिनिट मे मैंने मचलकर उनकेसिर कों पकड लिया औऱ कसमसा करझड़ गय़ा। मुझेलग रहा थां कि वेअब मुंह मे सें लन्ड निकाल लेंगी पऱ वे तोँ ऐसे चूसने लगी जैसे गन्ने कां रस निकाल रहीहों। पूरा वीर्य निगलकर हि उन्हों नें मुझे छोड़ा.
मे चितपड़ा हांफता हुआइस स्वर्गिक स्खलन कां आनंद लें रहा थां। मुंह पोंछती हुई चाची फ़िरमुझ सें लिपट गयीँ, औऱ मेरे गालों औऱ होंठों कों बेतहाशा चूमने लगी। "लल्ला, तुम् तौ एकदम कामदेव हौ मेरे लिये, मे तोँ धन्य होँ गयीँ, तेरा प्रसाद पाकर" "आप् कों गंदा नहि लगा चाची?" "अरे बेटे तूँ नहि समझेगा, ये तौ एकदम गाढ़ी मलाई हैं मेरे लिये.अब तुँ देखता जा, इनदो महीनों मे तेरी कितनी मलाई निकालती हूं देख."
मुझे बेतहाशा चूमते हुएवे फ़िर बोलि। "तुम् बड़े पोंगा पंडित निकले लल्ला। साम सें तुम को रिझारही हूं पर्र तुँ तौ शरमा हि रहा थां छोकरियों कि तरह." मैंने उनकेगाल कों चूमकर कहा। "नहि चाची, मे तौ कब कां आपका गुलाम होँ गय़ा थां। बसडर लगता थां कि चाचाजी कों पताचल गय़ा क्याँ सोचेंगे."
वे मुझे प्रेम सें चपतमार कर बोलीं। "तोँ इसलिये तूँ दबादबा थां इतनीदेर। मूरखकही कां, उन्हें सभी मालूम हैं." मेरे आश्चर्य पर्र वे हंसने लगी.
"ठीक कहरही हूं अनुराग। मे कब सें भूखी हूं। तेरे चाचाजी भले व्यक्ति हें पर्र अलग किस्म केँ हें। उन्हें जरा भि मेरे जिस्म मे दिलचस्पी नहि हैं। इतनेदिन मैंने सब्र किया, ऐसे भले व्यक्ति कों मे धोखा नहि देना चाहती थि। परपुरुष कि ओरआँख उठाकर भि नहि देखा। पर्र पिछले महीने मे इनसेखूब झगड़ी। आखिर जीवनऐसे केसे कटेगी। वे भि जानते औऱ समझते हें। बोले, अच्छा जवान लड़का घऱ मे हि हैं, उसे बुला लियाकर जबमन चाहे। तूँ उसकेसंग कुछ भि कर, मुझे बुरा नहि लगेगा। इसलिये तौ तीनमाह सें वे तुम्हें चिठ्ठी लिखकर आने कां आग्रह कररहे हें। औऱ तूँ हैं कि इतने दिनों मे आया हैं."
मेरेमन कां बोझउतर गय़ा। मेरा मार्ग साफ़ थां। मैंने चाची सें पूछा कि आखिर क्यूं राजेशचाचा कों उन जैसी हसीनऔरत सें भि लगाव नहि हें। वेहंस करटाल गई। मुझे चूमते हुए बोलीं कि बाद मे टाइमआने पऱ बताएंगी.
औऱ देर नं करके मैंने कसकर चाची कों बाँहों मे भर लिया। उनकी वासना अब तक चौगुनी हौ गई, थि। झट सें अपने ब्लाउज़ केँ सामने वालेबटन उन्हों नें खोल दिये औऱ उनके मोटे मोटे मम्मों उछलकर बाहर् आँ गये। स्तनों कि निप्पल एकदमतन कर अंगूर जैसीखड़ी थि। उन्हों नें झुककर एक् बूब्ज़ मेरे मुंह मे दे दिया औऱ मुझ पर्र चढकर मेरेऊपर लेट गई। मुझे बाँहों मे भींचकर अपनी टांगों मे मेरीकमर जकड़कर वेऊपर सें धक्के लगाने लगी मानों काम क्रीडा कररही हों.
उनकातना मूंगफली जैसा निप्पल मुंह मे पाकर मुझेऐसी खुशी हुइ जैसी एक् बच्चे कों माँ कां निप्पल चूसते हुए होती हैं। मैंने भि अपनी बाँहें उनके इर्द गिर्द भींचलीं औऱ निप्पल चूसता हुआ उनकी चिकनी पीठ औऱ कमर पर्र हाथ फ़ेरने लगा.फ़िर उनके नितंब साड़ी केँ ऊपर सें हि दबाने लगा.वे ऐसी बिचकी कि जैसे बिच्छू नें डंक मारा हौ। मेरे चेहरे कों उन्हों नें छाती पऱ औऱ कसकर भींच लिया औऱ आधा मम्मों मेरे मुंह मे ठूंस दिया.
उसे चूसता हुआ मे अब सोचने लगा कि चाची कों चोदने मिले तौ क्याँ मजाआये। दस हि मिनिट मे मेरा जवान लन्ड फ़िरऐसा खड़ा होँ गय़ा थां जैसेकभी बैठा हि न् होँ। किसीतरह निप्पल मुंह मे सें निकाल कर चाची सें बोला। "माया चाची, कपड़े निकाल दीजिये नाँ, आपकाये शरीर देखने कों मे मराजा रहा हूं." वे बोलीं। "नहि लल्ला, कुछ भि होँ, हम् छत पऱ हें, पूरा नंगा होने मे कम सें कमआज कि रात सावधानी करनाठीक हैं। कल सें देखेंगे औऱ दोपहर कों तौ घऱ मे हम् अकेले हें हि"
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