चाची - भतीजे केँ गुलछर्रे (Full Storyd) – New Episode
मे जाकर उनकेपास नीचेबैठ गय़ा। उनकी आँखों मे आँखें डालकर बोला"हाँ माया चाची, आप् तौ मेरीजान होँ। आज सें आप् छत पर्र नहि मूतेंगी." फ़िररुक कर बोला."इस शरबत केँ लिये तोँ मे कब सें मराजा रहा हूं। पर्र डरता थां कि आप् बुरा न् मान जाएँ। मेरे मुंह मे मूतिये माया चाची, एक् बूंद नहि छलकने दूंगा। चलिये खाट पर्र."
चाची खिल उठीं."सच कहते हौ लल्ला? मेरेदिल कि बातकह दि। मैंने भि बहोत किताबों मे पढ़ा हैं औऱ एक् दो तस्वीरें भि देखी हें। मन करता थां कि किसी अपने प्यारे केँ संगऐसा करूँ.इसी बच्ची नें आखिरकहा कि अनुराग भैया सें कहती क्यूं नहि। बड़ी बदमाश हैं। कहती हैं कि उसकी सहेली कि बेहन तौ रोज अपने पति केँ मुंह मे मूतती हैं। इन दोनों नें कईबार छुपकर देखा हैं."
मुन्नी नें चाची कों चिढ़ाकर कहा."अब अनुराग भैया तोँ मानगये, अब मारने दोगी गांड?" चाची नें हंसकर कहा। "बिलकुल, पर्र एक् शर्त हैं अनुराग." मैंने धडकते दिल सें पूछा "क्याँ शर्त हैं चाची? बोलकर तौ देखो?"
वे सीरियस होकर बोलीं। "सिर्फ़ मेरा हि नहि, इस बच्ची कां भि मूत पीना पड़ेगा। इसनेराह दिखायी हैं, इसे भि इनाम मिलना चाहिये." मुन्नी टेन्शन मे मेरीओर कुछ शरमाकर देखरही थि कि मे क्याँ कहता हूं। जवाब मे मुन्नी कि बुर कों चूमकर मे बोला."ये तोँ ऐसा हौ गय़ा चाची कि अंधा मांगे एक् आँख औऱ मिल जाएँ दोनों। तुम्हारे चूत केँ शरबत केँ संगइस कन्या कि बुर कि शराब भि मिल जाये तोँ क्याँ कहने."
दोनों खुशी सें उछल पड़ीं। मे नीचेलेट गय़ा। "आज यहीं खुलीछत पर्र मेरे मुंह मे मूतलो चाची। कल सें पलंग पऱ हि कर लेना." चाची उठकर मेरेसिर केँ दोनों औऱ पाँव जमाकर घुटनों केँ बलबैठ गयीँ,। "देख लल्ला, अबरोज कि बात हैं, दिन मे भि यही होगा!मना तौ नहि करेगा." जवाब मे मैंने उन्हें नीचे खींचकर उनकी चूत चूमली। "अबकरो भि चाची, प्यास लगी हैं." मुन्नी भि बिलकुल पासआकर बैठ गयीँ, कि ठीक सें इस क्रीडा कों देखसके.
चाची नें मेरासिर पकडकर स्थिर किया औऱ निशाना लगाकर मेरे मुंह मे मूतने लगी.उस खारे गरमागरम शरबत कों मे गटागट निगलने लगा। मुझे अपनामूत पीतेदेख चाची ऐसी गरमाई कि बिना रुके औऱ जोर सें मूतने लगी। मे चुपचाप पीतारहा पर्र मुन्नी हि मेरेमन कि बातसमझ कर बोलि। "क्याँ मौसी तुम् भि? धीरे-धीरे धीरे-धीरे मूतो नां! आखिर भैया कों भि आहिस्ता पीनेदो, स्वाद तौ लगे, अभि तौ बस गटागट निगले जारहा हैं बेचारा."
चाची थोड़ा शरमायीम औऱ फ़िररुक रुककर मूतने लगी जिससे मुंह मे भरेमूत कों मे ठीक सें चख सकूँ.जब तक उनका मूतना खत्महुआ, वेऐसी गर्म होँ गई कि सीधे मेरे मुंह पर्र बैठकर अपनी बुर मेरे होंठों पर्र रगडरगड कर एक् मिनिट मे स्खलित हौ गयीँ,। मुझे बोनस मे शरबत केँ संगशहद भि मिल गय़ा। झड़तेहुए मेरेबाल प्रेम सें सहलाकर बोलि। "आनंद आँ गय़ा लल्ला। तूँ नहि समझेगा। असल मे अपने किसी कों अपनेबदन कां रस पिलाना औरतों कों बहोत अच्छा लगता हैं। ऐसा लगता हैं कि अपना कर्तव्य पूराकर रही हूं तेरी प्यास बुझाकर। मेराबस चले तौ अपनेबदन कां हररस तुम्हारी तरफदे दूँ."
अब मुन्नी कि बारी थि। उसकी आँखें भि कामुकता सें चमकरही थि। "भैया, मे तौ खड़ेखड़े हि मूतूँगी, हम् लड़कियां विद्यालय मे अक्सर ऐसे हि करती हें, नीचे बैठा नहि जाता, इतनी गम्दगी होती हैं इसलिये." औऱ वो अपनी टाँगे फ़ैलाकर खड़ी होँ गई,.
उसकीबात मानकर मे उसकी टांगों केँ बीच मुंहखोल करसिर ऊपर करकेबैठ गय़ा। उसने मेरासिर पकडकर निशाना लगाया औऱ रुपहली धार मेरे मुंह मे गिरने लगी। मुन्नी नें बड़े प्रेम सें अपनामूत मुझे पिलाया। मुंह भरते हि रुक जाते थि जिससे मे स्वाद लेँ सकूँ.उधर चाची पासआकर मुन्नी सें लिपटकर खड़ी होँ गई औऱ उस बच्ची केँ चुंबन लेतेहुए औऱ उसके कच्चे उरोज दबाते हुएपास सें इस अनूठे काम कों देखने कां मज़ा लेनेलगी.
चाची कि धार जहाँ मोटी औऱ धीमी थि, मुन्नी कि एकदम पतली औऱ तेज थि, पिचकारी जैसी। स्वाद दोनों कां एकदम मस्त थां, चूत कि सौंधी खुशबू सें भिनाहुआ। आखिर मुन्नी कां पूरामूत पीकर मे उठा औऱ उसेउठा कर पलंग पऱ लेँ गय़ा। वहा पटककर पहले उसकी चूत चूसी औऱ फ़िर चाची पऱ चढकर उन्हें चोद डाला.
चाची कहती हि रह गई। "अरे गांड नहि मारेगा क्याँ, मैंने वायदा किया हैं तुझ सें." मैंने कहा."ऐसे सस्ते मे थोड़े छोड़ूँगा चाची! आज तौ झड़झड़कर लन्ड मुरझा गय़ा हैं, तुम् तौ आहिस्ता लें लोगी गांड मे। कल दोपहर कों मारूँगा, मस्तखड़ा कर केँ। आप् कों भि तौ पताचले कि जब मस्त सूजा लन्ड गांड मे जाता हैं तौ कैसा लगता हैं। उसरात कों खड़ा किया थां, उससे भि मोटा होगाकल."
दूसरे दिन सुभह सें बड़ा सस्पेंस कां माहौल थां। चाची औऱ मुन्नी मे रोज कि तरह नौकरानी कि आँख बचाकर एक् दोबार चूमा चाटी हुई पर्र मे अलग सें मन शांतकर केँ बैठा थां। लन्ड कों जितना हौ सकता थां उतना आरामदे रहा थां। मेरीओर कनखियों सें देखकर मुन्नी हंसरही थि, उसे मालूम थां कि मे क्यूं चुप बैठा हूं.
आखिर दोपहर हुईँ औऱ हम् हमेशा कि तरह चाची केँ कमरे मे इकठ्ठे हुए। कपड़े निकालने केँ बाद पहलाकाम मैंने ये किया कि दोनों कां मूत पिया। वहीं कमरे केँ फ़र्श पर्र लेटकर औऱ उन दोनों चुदैलो कों अपने मुंह पऱ बिठाकर। दोनों कों ये अपेक्षित नहि थां, उन्हों नें सोचा थां कि कलरात वालीबात तौ मौके पर्र वासना केँ अतिरेक मे हौ गयीँ, थि। पऱ जब मैंने स्वयं हि उनकामूत पीने मे पहल कि, ये कहतेहुए कि मैंने कल हि कहा थां कि आज सें मेरी दोनों हसीन साथिने मेरे मुंह केँ सिवाय कही नहि मूतेंगी, तौ मुन्नी मेरे मुंह मे मूतते हुए शैतानी सें बोलीं.
"भैया, हाय पहले मालूम होता तोँ आपकाचार पाँच गिलास शरबत बेकार नहि जाता। मे औऱ मौसी सुभह सें दोबार बाथरूम जा चुके हें." चाची नें उसे हटाकर मेरे मुंह पर्र बैठते हुएउसे डाँट लगायी। "चुपकर शैतान, नौकरानी केँ आगे आखिर क्याँ करते? बोतल मे मूतकर अनुराग लल्ला केँ लिये रखते?"
चाची कां मूत पीने केँ बाद होंठ पोंछते हुए मैंने जवाब दिया."हाँ चाची, प्लीज़, कल सें चार पाँचबड़ी पेप्सी कि बोतलें धोकररख दो.जब मेरे मुंह मे मूतना सम्भव नं हौ, तौ दोनों इन बोतलो कां इस्तेमाल करके उन्हें फ़्रिज़ मे रख दियाकरो। मे बाद मे पी लूँगा। इस अमृत कि एक् बूंद व्यर्थ नहि जानां चाहिये."
खैर! उसकेबाद चाची औऱ मुन्नी कां बाथरूम जानां हि बंद हौ गय़ा। मेरे होतेउन दोनों कों कभी जरूरत हि नहि पड़ी। बोतलों कि जरूरत भि नहि पड़ी क्योंकी जब भि पिशाब लगती, वे चुपचाप मुझेकही अकेले मे लें जातीं, अपने साड़ी याँ स्कर्ट ऊपर करती औऱ मेरे मुंह मे मूत देती। मेरा मुंह उनकाये अमृत पीने केँ लियेसदा हाजिर होता। मैंने कभी एक् बूंद नहि छलकायी इसलिये धीरे-धीरे पलंग मे लेटे लेटे भि येकाम दोनों कर लेती थि। मुझे भि उन दोनों चुदैलो केँ मूत कां ऐसा चसकालगा कि आदत हि लग गई,। आज भि अपने सेक्स पार्टनर कां मूत पीने मे मुझेबड़ा मज़ाआता हैं.
अब तक उन दोनों मदभरी बुरों केँ शरबत नें मेरा लन्ड खड़ाकर दिया थां। सोलह घंटे केँ आराम केँ बाद वो अब मस्त तन्ना रहा थां। "अब देखिये चाची, अबयेइस अवस्था मे हैं कि आप् कि गांड कि प्यास बुझासके." चाची थोड़ा घबराकर उसकीओर देखरही थि। पर्र नजर मे बड़ी मादक प्यास भि थि। "नहि लल्ला, अभि माफ़करो, रात मे मार लेना."
"जब फ़िर मुरझा जाये? नहि मौसी तुमने वायदा किया थां भैया सें, चलो गांड मराओ." मुन्नी मेरासंग देती हुई अपनी चूत रगड़ती हुइ बोलि। उसेबड़ा मज़ा आँ रहा थां। अपने लन्ड कों औऱ कसकरखड़ा करने कां मुझे अचानक एक् उपाय सूझा.आज मे जरा दुष्ट मूड मे थां औऱ यहीसोच रहा थां कि जितना होँ सके लन्ड कों मस्त करूँ ताकि माया चाची कुछ औऱ जोर सें बिलबिलाये गांड मराते टाइम। आखिर मुझे भि तौ इतनेदिन कां हिसाब वसूलना थां। बस मुझे अपने आप् पऱ पूरा कंट्रोल रखना जरूरी थां.
"माया चाची, चलो एक् काम करते हें। आप् दोनों मिलकर मेरे लन्ड सें खेलो, चूसो, कुछ भि करो.बीस मिनिट कां वक्त देता हूं। अगर मुझेझड़ा लिया तौ आपकी गांडबच जायेगी। नहि तोँ फ़िर बिनातेल लगाये हि मारूँगा, आपको तड़पा तड़पाकर औऱ मज़ा लेने केँ लिये.कहो हैं मंजूर?"
चाची नें कुछदेर सोचा औऱ एक् शर्त अपनी भि रख दि। आखिर पक्की छिनाल जौ थि। "ठीक हैं लल्ला, पऱ भलेतेल नं लगाना, चूसना जरूर पड़ेगी। मेरी गांड कां छेद मुंह सें औऱ जीभ सें गीला करना पड़ेगा, कहो हैं मंजूर?" उन्हें लगा कि शायद मुझे गंदालगे इसलिये मे न् मानूँ पर्र मे जल्दी रेडी होँ गय़ा। मेरी प्यारी मतवाली चाची कि गांड चूसना तोँ मेरे लिये मानों एक् औऱ तोहफा थां.
घड़ी मे बीस मिनिट कां अलार्म लगाया गय़ा औऱ फ़िर दोनों मिलकर मेरे लन्ड पऱ टूट पड़ीं। बारी बारी सें चूमने औऱ चूसने लगी। चाची बीचबीच मे उसे अपनेगोल मटॊल स्तनों केँ बीचपकड कर बेलन जैसे रगड़ने लगतीं। कभी अपनेघने बालों मे लपेट लेती। मुन्नी भि बड़ेचाव सें चाची कां संगदे रही थि.
दस मिनिट मे भि जब मे नं झड़ा तोँ चाची थोड़ा घबराई। मुन्नी कों बोलि। "बेटी तूँ इसके मुंह पर्र चढजा, इसे अपनी बुर चुसवा। मे इसे चोदती हूं, देखें केसे नहि झड़ता."
मुन्नी मेरे मुंह पर्र बैठ गई, औऱ मे जीभ डालकर उस कोमल मखमली कच्ची चूत कां रस पीनेलगा। उधर चाची मुझ पर्र चढकर मुझे चोदने लगी.
अगलेदस मिनिट मेरी परीक्षा केँ थें पऱ मे खरा उतरा। किसीतरह अपनेसुख सें मचलते लन्ड पऱ काबू कियेरहा। मुन्नी कि बुर केँ रस नें औऱ चाची कि चूत केँ घर्षण नें मुझ पऱ ऐसा चमत्कार किया कि मेरा लन्ड घोड़े केँ लन्ड जैसाखड़ा हौ गय़ा। आखिर अलार्म बजा तोँ मुन्नी उठकरखड़ी हौ गयीँ,। कईबार मेरे मुंह मे झड़कर तृप्त होँ गयीँ, थि। हंसकर चाची कों बोलि। "चलो मौसी तुम् शर्तहार गई, अब तोँ गांड मराना हि पड़ेगी."
चाची भि कईबार झड़ चुकी थि। हांफते हुए लस्त होकर किसीतरह मेरे लन्ड कों अपनी गीली चूत मे सें खींचकर निकाला तौ लोडे कि साइज़ देखकर उनकी आँखें पथरा गई। "अरे लल्ला, ये तोँ औऱ मुश्टंडा होँ गय़ा। लगता हैं मैंने अपनी कब्र स्वयं बनाली, तूँ मार डालेगा मुझे बेटे, दया कर, चोद लेँ अभि, गांडबाद मे मारना." पऱ डरने कां सिर्फ़ बहाने थां, उनकी आँखों मे गजब कि कामुकता थि। गांड चुदाने कों वे भि मरीजा रही थि.
उनकी एक् न् मानकर मैंने उन्हें उठाकर बैड पर्र औंधे लिटा दिया.वे बोलि। "मुन्नी बिटिया, गांड तौ मुझे मरवाना हि हैं तौ ऐसाकर, तूँ मेरे नीचे उलटीतरफ़ सें आँ जा रानी। सिक्सटी नाइन करतेहुए मरवाऊँगी तोँ दर्द थोड़ाकम हौ जायेगा." मुन्नी तपाक सें उनके नीचेघुस गयीँ,। अपनी टाँगे खोलती हुईँ बोलि। "लो चूसो मौसी" फ़िर मौसी केँ चूतड पकडकर उनकी चूत चाटती हुईँ मुझसे बोलि। "अनुराग भैया, मुझे तौ बिलकुल बाल्कनी कि सीटमिल गयीँ, शो देखने कों। दोइंच दूर सें मौसी कि गांड मे तुम्हारा लोडा घुसते देखूँगी."
मे झुककर अपनीजीभ औऱ होंठों सें चाची केँ नितंबों कि पूजा करनेलगा। जब उनके गुदा मे जीभ डाली तौ वे सिहर उठीं। उनकी गांड कां छेद पकपकाने लगा औऱ मेरीजीभ कों पकडने लगा। गांड कां सौंधा खटमिठ्ठा स्वाद लेतेहुए मैंने खूब गांड चूसी औऱ फ़िर आखिरखाट पऱ चढकर उनके गुदा पऱ लन्ड जमाता हुआ बोला। "मुन्नी जरा हेल्प कर, अपनी हाथों सें तेरी मौसी कि गांड चौड़ीकर." मेरी सुपाड़ा फ़ूलकर टमाटर सां हौ गय़ा थां औऱ मौसी कि गांड मे उसका घुसना असंभव सां लगरहा थां.
मौसी कि चूत मे जीभ डालकर मुन्नी नें अपनी पूरी शक्ति सें उनके गोरे नितंब फ़ैलाये। मैंने कस केँ लन्ड पेला औऱ सुपाड़ा अंदर घुसेड दिया। मौसी केँ मुंह सें एक् चीख निकल गई,। "मार डालारे मुझे तूने बेदर्दी, फ़ाड दि मेरी." मे हंसते हुए बोला। "नहि चाची, ऐसे थोड़े फ़टेगी आपकी गांड, आखिर मारने केँ लिये हि बनाई हैं कामदेव नें तौ फ़टेगी केसे.हाँ, आप् भि गुदा ढीला कीजिये नहि तोँ दर्द होगा हि."
चाची अपना दर्दकम करने कों मुन्नी कि बुर चूसने लगी। मुन्नी नें भि अपनी गोरी कमसिन जांघें उसकेसिर केँ इर्द गिर्द जकडलीं। चाची कां दर्दकुछ कमहुआ तौ मैंने लन्ड औऱ पेलना शुरुआत किया.जब वे दर्द सें कराह उठती तोँ मे फ़िररुक जाता.इस तरह आखिर मैंने जड तक लन्ड उनके चूतड़ों केँ बीच उतार हि दिया.
कुछ देर मे मज़ा लेताहुआ पड़ारहा। चाची कि गांडकस केँ मेरे लन्ड कों पकड़ेहुए थि। मे बस झड़ने हि वाला थां। आखिर न् रहकर मैने उनकी गांड मारना शुरुआत कर दि। अब तक सभीथूक सूख जाने सें मेरा लन्ड औऱ उनकी गांड कां छेदसूख गये थें औऱ इसलिये लन्ड फ़िसल नहि रहा थां, बस फंसाहुआ थां उनकी गांड मे। मुझे तोँ इस घर्षण सें बड़ा आनंदआया। पर्र चाची बिलबिला उठीं। गांड मे फंसे लोडे केँ आगे पीछे होने सें उन्हें बहोत तकलीफ़ होँ रही थि। पर्र मैअब इतना उत्तेजित होँ गय़ा थां कि उनके सिसकने कि परवाह नं करकेकस केँ दस बारा धक्के लगाये औऱ झड़ गय़ा.
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कुछदेर मे आनंद लेताहुआ पड़ारहा। चाची कि गांडकस केँ मेरे लन्ड कों पकड़ेहुए थि। मे बस झड़ने हि वाला थां। आखिर न् रहकर मैने उनकी गांड मारना शुरुआत कर दि। अब तक सभीथूक सूख जाने सें मेरा लन्ड औऱ उनकी गांड कां छेदसूख गये थें औऱ इसलिये लन्ड फ़िसल नहि रहा थां, बस फंसाहुआ थां उनकी गांड मे। मुझे तोँ इस घर्षण सें बड़ा आनंदआया। पर्र चाची बिलबिला उठीं। गांड मे फंसे लोडे केँ आगे पीछे होने सें उन्हें बहोत तकलीफ़ होँ रही थि। पर्र मैअब इतना उत्तेजित होँ गय़ा थां कि उनके सिसकने कि परवाह न् करकेकस केँ दस बारा धक्के लगाये औऱ झड़ गय़ा.
"मज़ा आँ गय़ा चाची, आपकी गांडबड़ी कसी हुईँ हैं." मैंने उन्हें चूमते हुएकहा। वे कराहकर बोलि। "लल्ला, मुझे तौ बहोत दर्दहुआ। ऐसी सूखी गांड मारता हैं कोईभला? गांड मराने कां, लन्ड अंदर बाहर् होने कां तौ मज़ाआया हि नहि." फ़िर मुन्नी सें बोलि। "जा लाकरतेल लें आँ, मे कहती हूं वैसाकर अब."
चाची कि हिदायत केँ अनुसार मैंने अपनाझड़ा लन्ड आधे सें अधिक बाहर् निकाला। "अरे पूरामत निकाल नहि तौ फ़िर घुसाते टाइम मुझे दुखेगा." उस पर्र मुन्नी नें तेल लगाया। फ़िर चम्मच सें लन्ड केँ आजू बाजू सें चाची केँ गुदा मे तेल छोड़ा। मेरा लन्ड आधाखड़ा थां इसलिये मैंने उसेदो तीनबार अंदर बाहर् किया औऱ चाची कां गुदा औऱ मेरा लन्ड तेल सें बिलकुल चिकने होँ गये.
चाची नें राहत कि सांसली। मेरे लन्ड कों खड़ा होने कां वक्त देने केँ लियेदस पंद्रह मिनिट हमने मिलकर बारी बारी सें मुन्नी कि बुर चूसी.जब मेराफ़िर तन्ना करखड़ा हौ गय़ा तोँ चाची मुझे ललकार कर बोलीं। "अब आँ मैदान मे लल्ला, अबमार, देखूँ कितना दम हैं तुझमें."
अगलेआधे घंटे हम् दोनों नें असली गांड चुदाई कां आनंद लिया। लन्ड मस्तसटक सटककर माया चाची कि गांड मे अंदर बाहर् हौ रहा थां। उधर मे उनके बूब्ज़ अपने हाथों मे लेकर उन्हें दबा औऱ मसलरहा थां। मैंने खूबहचक हचककर गांड मारी। चाची भि अब एकदम गर्म हौ गई, थि। मुझे उकसा उकसाकर औऱ जोर सें पेलने कों कहरही थि औऱ चूतड उछाल उछालकर मरवारही थि। मैंने भि आखिर उनकी चुदैल प्रव्रुत्ति कां लोहामान लिया औऱ आधे घंटेबाद आखिर कसमसा करझड़ गय़ा। वेअब भि तैश मे थि। "बस हथियार डाल दिये राजा बेटा? अब तेरीजीभ कों मेरी बुर कि प्यास बुझानी पड़ेगी."
उन्हों नें आखिरजब मेरीजीभ सें चुदवाया तब जाकरवे झड़ीं.रस कि ऐसीधार लगी कि मेरा औऱ मुन्नी कां पेटभर गय़ा उसे पीकर.
रोज चाची कि गांड मारने कां एक् कार्यक्रम हमारी रति क्रीडा मे जुड। गय़ा। अक्सर ये दोपहर कों हि होता। हमने बहोत सें तरीके भि आजमाये, खड़ेखड़े, लेटकर, गोदी मे बिठाकर इत्यादि। दीवार सें चाची कों टिकाकर खड़ेखड़े उनकी गांड मारने मे काफ़ी आनंदआता थां। गोद मे बिठाने कां आसन बहोत देर मज़ा लेने कों सबसे अच्छा थां। इसआसन मे मे एक् कुर्सी मे बैठता थां औऱ चाची मेरे लन्ड कों अपने गुदा मे लेकर मेरीगोद मे बैठ जाती थि। मुन्नी सामने जमीन पऱ बैठकर चाची कि बुर चूसती औऱ मे उनके मम्मे दबाता हुआ उनसे चूमाचाटी करताहुआ हौले हौलेऊपर नीचे अपना लन्ड उनकी गांड मे मुठियाता.
कभीकभी हम् घंटेदो घंटेइसी तरह आनंद करते। प्रश्न सिर्फ़ मेरा थां कि मे कितनी देरइस मीठे दर्द कों सह सकता हूं। चाची तौ खूब झड़ती इसलिये उन्हें बहोत आनंदआता थां। मुन्नी भि खुश रहती थि क्योंकी उसे मनमानी अपनी मौसी कि चूत सें घंटों खेलने कां मौका मिलता। जब वो ज्यदा गर्म हौ जाती तोँ हमारे सामने आकरखड़ी हौ जाती औऱ हम् दोनों मे सें एक् झुककर उसकी चूत चूस देते.
मुठ्ठ मारने कि सभी कलाएं मौसी नें उसे सिखा दि थि इसलिये इसआसन मे मुन्नी कईबार चाची कि बुर चूसने केँ संगसंग केले याँ ककड़ी सें उन्हें हस्तमैथुन भि करा देती.
बीच मे एक् दिन मे पास केँ शहर मे जाकरकुछ सचित्र चुदाई कि किताबें लेँ आया.कुछ मेगेज़ीन चाची नें अपनी अलमारी मे सें निकालीं। उन्हें देखदेख कर सबको औऱ तैश चढता थां। मे हरतरह केँ चित्रों कि किताबें लाया थां, महिला-औरत, औरत-पुरुष पुरुष-पुरुष इत्यादि। चाची कि किताबों मे सभी पुरुषों केँ आपसी संभोग केँ हि चित्र थें। उनमें सें कई मोडेल तोँ बड़े हेंडसम थें। चुनचुन कर मोटे लंबे लंडों वाले जवानो केँ फ़ोटो उनमें थें.
चाची कों औऱ मुन्नी कों ये पुरुष संभोग केँ चित्र देखने मे बड़ा मज़ाआता थां, शायदउन मस्त लंडों कि वजह सें। उनमें सें एक् दो लन्ड तोँ इतनेबड़े थें कि उन्हें किसी कि गांड मे घुसे चित्रों कों देखकर मे सोच पड़ता थां कि आखिर केसेयह लोग इतनेबड़े लन्ड लें लेते हैं।
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हुआये कि एक् दिन मुन्नी केँ सो जाने केँ बाद मैंने चाची कि गांड मारते हुए पूछा कि आखिर चाचाजी कां क्याँ प्रॉब्लेम हैं जोँ स्वयं इतने हेंडसम हें औऱ फ़िर भि अपनी हसीन चुदैल बीबी कों हाथ तक नहि लगाते! चाची नें उसदिन मुझे पूरीबात बतायी.
"तेरे राजेशचाचा असल मे बेटे होमो हें। औरतों मे कतई दिलचस्पी नहि हैं उन्हें। विवाह केँ दूसरे दिन हि उन्हों नें मुझेबता दिया थां। उनके शायद दोस्त साथी हें बाहर् इसीलिये महीने मे बीस पचीसदिन गायब रहते हें, जॉब कां तौ बहाने हैं। येसभी जौ मर्द मर्द वाले चित्रों कि किताबें हें नां, सभी उनकी अल्मारी मे मिली थि मुझे"
मे सुनकर चकरा गय़ा। जब मैंने चाचाजी कि कल्पना दूसरे किसी मर्द केँ संग संभोग करतेहुए कि तौ नं जाने क्यूं मेरा तन्ना करखड़ा होँ गय़ा औऱ मे आपे केँ बाहर् होकरकस केँ चाची कि गांड मारने लगा.झड़ कर हि दम लिया.वे कहती हि रह गई कि अरे आनंद लेँ लेकर धीरे-धीरे धीरे-धीरे मार.
फ़िर उन्हों नें मुझे चूमते हुए पूछा "क्याँ तूँ तेरे चाचाजी कों मेरीओर मोड सकता हैं?" मे समझा नहि औऱ चाची सें साफ़साफ़ कहने कों कहा.
वे बोलि। "अरे, वे चिकने जवानों पऱ औऱ खासकर किशोरो पऱ फ़िदा रहते हें। मुझे मालूम हैं, उनके देखने केँ अंदाज सें। जब भि कोई कमसिन चिकना लड़का नजर मे आता हैं, उनकीनजर हि बदल जाती हैं। तुँ भि बड़ा खूबसूरत चिकना हैं पऱ सगा भतीजा होने केँ कारणवे अपने आप् कों काबू मे रखते हें औऱ तेरे बारे मे सोचते भि नहि। तुम्हे उनकेसंग कुछ भि करना नहीं हैं। बस उन्हे अच्छे सें समझाना हैं। तेरे प्रेम सें समझाने पर्र होँ सकता हैं कि धीरे-धीरे धीरे-धीरे वे मुझे चोदना शुरुआत करदें। मेराये काम करेगा लल्ला? ऐसा इनाम दूँगी कि तूँ खुश होँ जायेगा."
मैंने काँपते स्वर मे पूछा कि क्याँ इनाम देगी। मेरेखड़े होते लन्ड कों सहलाती हुईँ चाची बोलीं। "मुन्नी कों तुझसे चुदवा दूँगी। उसकी कच्ची चूत कों तूँ जितना चाहे भोगना। औऱ उस छोकरी कि कसी गांड भि मारने मे मदद करूंगी। वो जरूर चिल्लायेगी पऱ उसे किसी भि तरह राजीकर लेंगे। कचाकच चोद डालना छोरी कों आगे औऱ पीछे सें। बोल हैं मंजूर?"
बड़ा मधुर औऱ उत्तेजना भरा प्रश्न थां। मुन्नी कि कमसिन बुर औऱ गांड मे लन्ड घुसेडने कि कल्पना हि इतनी मदहोश करने वाली थि कि मैंने जल्दी हाँकर दिया। वैसेमुझ लगता हैं कि चाची नें ये लालच नं भि दिया होता तोँ भि शायद मे मान जाता.
अब मे इतना उत्तेजित हौ गय़ा थां कि फ़िर चाची कों चोदने केँ सिवाय कोई चारा नहि थां। आज मैंने उन्हें ऐसे चोदा कि उनकी पूरी खुमारी उतार दि.
जब मे उनपरपड़ा पड़ा सुस्ता रहा थां तब अचानक उन्हों नें अपनी एक् उंगली अपनी बुर केँ रस सें गीली करके मेरी गांड मे डाल दि। मे चिहुँक उठा.वे दूसरी उंगली भि डालने लगी.बड़ा दर्दहुआ तोँ मे कसमसा करउठ बैठा। "क्याँ करती हें चाची?"
"वाउ लल्ला, मेरीदो उंगली तौ गुदा मे ली जातीं नहि, औऱ अपना लन्ड तौ बड़ी बेदर्दी सें मेरी गांड मे पेल देता हैं!" बातसच थि। वे उठीं औऱ अंदर जाकर एक् छोटा गाजर लें आई."चलो लल्ला, उलटेसो जाओ." मैंने डरतेहुए पूछा। "क्याँ कररही हें चाची?" वे बोलीं। "आजये गाजर मे तेरी गांड मे डाल देती हूं, तुम को भि तौ पता चलें कि गांड मे लेने मे कितना मज़ाआता हैं!!"
चाची नें गाजर मेरी गांड मे डाल दिया। शुरुआत मे बहुत दर्दहुआ पर्र कुछ मिनटों बादउस गाजर सें मेरेछेद नें अनुकूलन साध लिया.
अब मैंने चाची जी कि मालिश करना भि शुरुआत कर दिया। हमारे बूढ़ेनाई सें मैंने दोतीन दिन मालिश करवाई औऱ फ़िर चाची केँ जिस्म पऱ प्रयोग किया। चाची कि मालिश करने मे बहोत मज़ाआया.
एक् तौ उन पऱ मालिश करके मेराहाथ एकदमसध गय़ा। दूसरे उनके रसीले बदन कों गूँदने मे उन्हें औऱ मुझे जौ मज़ाआता थां वो मानों बोनस थां। खासकर जांघों कि मालिश करते करते तौ मे ऐसे अपनी उंगलियों सें उनके भगोष्ठ हल्के हल्के रगडकर उनकी बुर कों तड़पाता कि वे चूतड उचकाने लगती थि। "हायरे लल्ला बड़ामजे कां मालिश करता हैं रे तूँ" अपनी जांघों कों मसलवाते हुई वे मुझे कहतीं.
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हमने मुन्नी सें शुरुआत मे सभी छुपाकर रखने कां निश्चय किया इसलिये चाचाजी लौटने वाले थें उसदिन उसे हफ़्ते भर केँ लियेपास केँ गाँव मे उसकीदूर कि फूफी केँ यहाभेज दिया.जब चाचाजी वापसआये तोँ चाची कों खुश देखकर बहोत प्रसन्न हुए.समझ गये कि उनके किशोर भतीजे नें उनकी पत्नि कि बुर कों खूब तृप्त रखा हैं। मुझेआँख भि मारी कि बहोत अच्छा किया बेटे.
चाचाजी मुस्कराकर माया चाची सें बोलें। "क्यूं, कैसालगा मेरा तोहफा?" चाचीजी भाव विभोर हौ गई। "मेरे प्राणनाथ, आपने तौ मुझे निहाल कर दिया। इतना सुंदर बच्चा, वो भि घऱ कां माल, मेरासगा भतीजा, मैने तोँ कल्पना भि नहि कि थि। केसे आपका कर्ज़ चुकाऊँ। अनुराग कों मेरी चुदासी बुझाने कों बुलाकर आपने मेराजनम सफलकर दिया.बस अब मेरीयही कामना हैं कि आपके मूसल सें मेरीचुत कां मंथनकरे "
चाचाजी विवश होकरहाथ मलतेहुए बोले। "मे तोँ रेडी हूं भागवान पऱ केसे करूँ, तुम् तौ जानती होँ औरतों कों देखकर मेरा नहि खड़ा होता."
मे बोला। "चाचाजी, मे आपको हेल्प करूंगा। हम् सभीसंग हि सोएंगे रोज, देखिये केसे चाची कों आपसे चुदवाता हूं." चाचाजी रेडी हौ गये। चाची सचकहरही थि। मेरे किशोर जिस्म कों देखकर वो उत्तेजित हौ जाएँ तौ बाद मे चाची जी कों चुदवाने मे आसानी होगी.
हमारा प्रयोग अतिसफ़ल रहा। पहली हि रात मे माया चाची नें राजेशचाचा कां लन्ड अपनेबदन मे घुसा हि लिया, भले हि पति पत्नि कां पहला संभोग चाची कि गांड मे हुआ.
उस रातछत पऱ हम् तीनों मच्छरदानी केँ नीचेसंग सोये। चाची चाचाजी कां लोडा चूसना चाहती थि। "अपने पतिदेव कां प्रसाद तौ पालूँ एक् भारतीय नारी कि तरह."वे बोलीं.
शुरुआत मे कठिनाई हुइ। पक्के होमो चाचाजी कां लन्ड चाची केँ चूसने सें खड़ा हि नहि हुआ। आखिर मे उनकेकाम आया। मेरे नंगे जिस्म कों देखते हि चाचाजी ताव मे आनेलगे औऱ फिन माया चाची नें उनका लन्ड मुंह मे लेँ लिया.
चाची लन्ड चूसने मे माहिर थि हि। इतनाबड़ा लन्ड भि वे पूरा निगल गई। ऐसे मस्तकर केँ चूसा कि आखिर चाचाजी भि मानगये औऱ चाची केँ सिर कों पकडकर उनके मुंह कों चोदने लगे.जब झड़ें तौ उनका वीर्य पान करके चाची खुशी सें रो दि.
उसकेबाद चूमा चाटी हुईँ। बारी बारी सें मैंने औऱ राजेशचाचा नें चाची कों चुम्मा दिया। माया चाची लगातार उनके लन्ड सें खेलती रही.फ़िर चाचा नें उनके चूतड सहलाये। बड़े मांसल औऱ मजबूत नितंब थें उनके.कुछ हि देर मे वे चाची सें लिपट लिपटकर उन्हें चूमने लगे औऱ मम्मे भि दबाने लगे.
अब चाचा नें माया चाची कों उल्टा लिटा दिया। गांड तोँ चाची कि बहोत हसीन थि। उस हसीन गोरी गाँड़ कों देखकर चाचाजी कां लन्ड खड़ा होँ गय़ा हैं। अब मे उठकर चुपचाप बाजू मे होँ लिया औऱ राजेशचाचा वासना सें उफ़ानते हुएजोर जोर सें चाची कि गांड चूसने लगे, उनके गुदा मे जीभ डालने लगे। चाची भि वासना सें कराहने लगी.
तब मैंने उनसे पूछा."माया चाची, गांड मरायेंगी चाचाजी सें? यही मौका हैं। दर्द तोँ होगा पऱ मज़ा भि आयेगा." वे रेडी थि। मैंने चाचाजी सें कहा कि चढ जाएँ। लन्ड औऱ गुदा दोनों गीले थें, फ़िर भि चाची केँ गुदा मे मैंने थोड़ातेल मल दिया कि बाद मे तकलीफ़ न् होँ.
चाचाजी चाची केँ ऊपरझुक कर सजधजकर हुए। पहलीबार किसीऔरत सें संभोग कररहे थें चाहे गुदा संभोग हि क्यूं न् होँ। वे मस्ती मे चिहुक उठे। मैंने फ़िर अपनेहाथ मे उनका लोडा पकडकर सुपाड़ा चाची केँ गुदा पर्र रखा। चाची केँ रसीले छोटेछेद पर्र वो मोटा गेंद सां सुपाड़ा देखकर मे समझ गय़ा कि काम मुश्किल हैं। चाची रो देगी.
चाचाजी एक्सपर्ट थें। चाची कों प्रेम सें उन्हों नें समझाया "रानी, गुदा ढीलाकरो जैसा टट्टी केँ टाइम करती हौ" उधर चाची नें जोर लगाया औऱ उधर चाचाजी नें लोडापेल दिया। एक् हि बार मे वो अंदर होँ गय़ा। चाची कि चीख निकल गयीँ, औऱ वे छटपटाने लगी.कोई सुन न् लें औऱ बना बनाया काम न् बिगड जाये इसलिये मैंने हाथ सें चाची कां मुंहकस करबंद किया औऱ कहा। "पेलिये चाचाजी, जड तक उतार दीजिये, यही मौका हैं.".
उन्हें मज़ा आँ गय़ा। चाची कि गर्दन केँ पिछले हिस्से कों चूमते हुए उन्हों नें कस केँ दोचार धक्कों मे हि अपना पूराआठ नौ इंची शिश्न अपनी पत्नि केँ चूतड़ों केँ बीचगाड दिया। चाची अबऐसे छटपटा रही थि जैसेकोई उन्हें हलालकर रहा होँ। उनके मुंह पर्र कसे मेरेहाथ पऱ उनके आँसू बहनेलगे। जब उनकी तकलीफ़ कुछकम हुईँ तौ मैंने हाथ उनके मुंह सें हटाया। "हाऽयमर गई राजा बेटा, इन्हों नें तोँ मेरी गांडफ़ाड दि रे."वे बिलबिलाते हुए बोलि.
चाचाजी कों अब काफ़ी आनंद आँ रहा थां। वे चाची केँ जिस्म पऱ लेटगये औऱ धीरे-धीरे धीरे-धीरे दोतीन इंच लन्ड अंदर बाहर् करतेहुए अपनी पत्नि कि गांड मारने लगे। मे पास मे लेटकर उन चाची जी केँ गाल चूमने लगा। चाची केँ आँसू मैंने अपनीजीभ सें टिप लिये औऱ उनका मुंह चूमने लगा। चाचा जीअब औऱ तैश मे आँ गए औऱ वे घचाघच चाची केँ चूतड़ों केँ बीच अपना लोडा अंदर बाहर् करनेलगे.
मैंने अपना एक् हाथ चाची कि जांघों केँ बीच डाला औऱ उनका क्लिटोरिस मसलने लगा.दो उंगली अंदर भि डाल दि। अब माया चाची कों भि कुछ आनंदआने लगा। उनका रोनाकम हुआ औऱ दो मिनिट मे एक् दो हिचकियां औऱ लेकरवे चुप होँ गई। उनकेतेल लगे गुदा मे अब चाचाजी कां लन्ड भि मस्त फ़िसलरहा थां इसलिये दर्द काफ़ीकम हौ गय़ा थां.
कुछ हि देर मे वेमचल मचलकर मरवाने लगी। "मारोजी मेरी, औऱ मारो, फ़ट जाये तौ फ़ट जाये आखिर मेरे मर्द हौ, मुझे बहोत अच्छा लगरहा हैं." मैंने चाचाजी सें कहा कि असली आनंद लेना होँ तौ अब चाची केँ मम्मों दबाते हुए गांड मारें.
मम्मे दबाने मे चाचाजी कों वो खुशीआया कि वे अपना मुंह चाची कि झुलफ़ों मे छुपाकर उनकी गर्दन चूमते हुएहचक हचककर लन्ड पेलने लगे। पति पत्नि मे अब घचाघच गुदा संभोग शुरुआत होँ गय़ा। दोनों कों बहोत मज़ा आँ रहा थां। मेराकाम होँ गय़ा थां इसलिये मे अब हटकर अपना लन्ड मुठियाते हुए तमाशा देखने लगा.
चाचाजी नें मज़ा लेँ लेकरआधा घंटा चाची कि मारीतब जाकर झड़ें। चाची दर्द सें कराहते हुए भि मरवाती रही, रुकने कों नहि बोलीं, क्योंकी एक् तोँ अब उनकी बुर भि पसीज गयीँ, थि औऱ फ़िरवे आखिर अपने पति सें गांड मरवारही थि इसका उन्हें संतोष थां। जब चाचाजी झड़ें तोँ उनके गर्म गर्म वीर्य केँ फव्वारे सें चाची कि चुदी गांड कों काफ़ी राहत मिली। अपनी हि चूत मे उंगली करके चाची भि झड़ली थि.
चाची - भतीजे केँ गुलछर्रे (Full Storyd) - Next part miss mat karna
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