Diwali ka Jua - 3 (Incest + Adultery) - Diwali Ki Raat - Complete Kahani Part 1
Update 1
रश्मी कों जैसे हि उसके भइया कां मोबाइल आया, वोँ उसी वक्त अपने विद्यालय सें निकल पड़ी.उसकी मां पिछले 20 दिनों सें हॉस्पिटल मे हैं.उन्हें हार्ट अटॅकआया थां.पर्र अब धीरे-धीरे-2 सुधार होँ रहा हैं.पर्र फिन भि डॉक्टर्स कहरहे हें कि 10 दिन औऱ लगेंगे.
रश्मी एक् प्राइवेट विद्यालय मे टीचर थि औऱ हॉस्पिटल मे उसका छोटा भइया मोनू रहता थां.वोँ एक् आवारा किस्म कां लड़का थां औऱ अपनीडील -डोल कि वजह सें गुंडागर्दी भि सीख गय़ा थां वोँ.इसलिये उसकी दोस्ती भि ऐसे लड़को केँ संग हि थि.पर्र जब सें उनकी मां हॉस्पिटल मे थि वोँ आवारगार्दी कर हि नहीं पाता थां.इसलिये 5:30 होते हि वोँ अपनी बेहन कों मोबाइल खड़का देता औऱ उसकेआते हि अपने दोस्तो केँ संग निकल जाता.ज़िम्मेदारी कां ज़रा भि एहसास नहीं थां उसमे.
दिल्ली मे रोहिणी कि एकXXX कॉलोनी मे घऱ थां उनका.बस यही 2 मंज़िला घऱ थां जौ उनके पापा छोड़गये थें.उपर वाले हिस्से मे दो बेडरूम औऱ नीचे रसोई औऱ ड्रॉयिंग रूम.
रश्मी कि उम्र तौ विवाह केँ लायक हौ चुकी थि पऱ घऱ कि पूरी ज़िम्मेदारी उसकेउपर थि.इसलिये वोँ अभि विवाह केँ बारे मे दूर -2 तक सोच भि नहीं सकती थि.
वोँ थि तौ काफ़ी हसीन पर्र बिना मेकअप केँ औऱ सादे कपड़ो मे रहने कि वजह सें कोई उसपर ज्यादा ध्यान नहीं देता थां.लड़को कों वोँ स्वयं हि अपनेपास फटकने नहीं देती थि.क्योंकि प्रेम-व्यार केँ चक्कर मे पड़कर वोँ अपनी ज़िम्मेदारियो सें दूर नहीं होना चाहती थि.
कुल मिलाकर काफ़ी समझदार औऱ घरेलू किस्म कि हसीन सि लड़की थि रश्मी.
औऱ उसका भइया मोनू गुंडा टाइप कां.हल्की दादीमा मूँछ मे रहता थां हमेशा.बिखरे हुए बाल.सिगरेट कि लत्त भि थि उसको.पर्र अपने मोहल्ले मे काफ़ी दबदबा थां उसका.औऱ वोँ अपने कसरती जिस्म कों बुरे कामो मे इस्तेमाल करके थोड़ी बहोत कमाई भि कर लेता थां.पऱ वोँ पैसे वोँ अपने दोस्तो औऱ शराब मे हि उड़ाता.
घऱ कां खर्चा चलाने कि ज़िम्मेदारी सिर्फ़ औऱ सिर्फ़ रश्मी कि हि थि.
उनकेघऱ कां खर्चा वैसे हि बड़ी तंगी मे चलरहा थां। उपर सें मां कि बीमारी नें भि काफ़ी पैसे समाप्त करदिए.
औऱ संग हि संग दीवाली भि आने वाली थि.सिर्फ़ दसदिन बाद.ऐसी हालत मे रश्मी बसयही सोचरही थि कि केसे चलेगी यह जीवन.
रश्मी केँ हॉस्पिटल पहुँचते हि मोनू फ़ौरन वहा सें निकल गय़ा.इतनी जल्द मचाते हुए रश्मी नें उसे पहलीबार देखा थां.
रात केँ वक़्त हॉस्पिटल मे किसी केँ भि रहने कि मनाही थि.वैसे भि देखभाल केँ लिए नर्सेस रहती हि थि.इसलिये रश्मी भि घऱ आँ जाती थि।
घऱ पहुंचकर उसने अपना लोवर औऱ एक् हल्की सि टी शर्ट पहनी औऱ खानां बनाने मे लग गई,.
वोँ रात केँ टाइम अपने अंडरगार्मेंट्स भि उतार देती थि.यही नीयम थां उसकारोज कां.10 बजे तक मोनू भि आँ जाता थां औऱ दोनों मिलकर खानां खाते थें.सुभह वोँ विद्यालय निकल जाती औऱ मोनूनहा धोकर हॉस्पिटल केँ लिए.पिछले दो महीने सें यही नीयमचल रहा थां.
पर्र आज 11 बजने कों होँ रहे थें औऱ मोनू कां कहींपता नहीं थां.रश्मी कों भि काफ़ी भूखलगी थि.उसने उसका नंबरकई बार ट्राइ किया पर्र हरबार वोँ काट देता.आख़िर मे जाकरजब उसने मोबाइल उठाया तौ सिर्फ़ इतना कहकर मोबाइल रख दिया कि 'दिदी, दस मिनिट मे आयाबस.'
दस मिनिट केँ बादजब मोनूआया तौ वोँ काफ़ी खुशलग रहा थां.पर्र रश्मी केँ गुस्से वाले चेहरे कों देखकर वोँ सहम सां गय़ा औऱ चुपचाप अपने कमरे मे जाकर चेंज करने लगा.औऱ कपड़े बदलकर नीचेआया.
रश्मी : "यह होँ क्याँ रहा हैं आजकल.यह जानते हुए भि कि मम्मी हॉस्पिटल मे हैं, तुम् इतनीरात कों मुझे अकेला छोड़कर बाहर् रहते होँ.आख़िर गये कहां थें.औऱ मेरा मोबाइल क्योकाट रहे थें.''
मोनू : "वोँ.मे.जुआ खेलने गय़ा थां.''
वैसे तौ जुआ खेलना उसका हमेशा कां काम थां, पर्र मम्मी हॉस्पिटल मे हैं, ऐसी हालत मे भि वोँ जुआ खेलने सें बाज नहीं आँ रहा, यह रश्मी सें बर्दाश्त नहीं हुआ.उसके मुँह मे जौ भि आया, वोँ उसे कहतीचली गई,.काफ़ी अच्छा-बुरा सुनने केँ बाद अचानक मोनू नें अपनीजेब सें 500 केँ करीब-करीब 45-50 नोट निकाल कर उसके सामने रखदिए.
औऱ उन्हे देखते हि रश्मी कि ज़ुबान पऱ एकदम सें ताला सां लग गय़ा.
मोनू (मुस्कुराते हुए) : "यह जीते हैं मैने.दिदी, आपकोपता हैं नां दीवाली आने वाली हैं.औऱ इसी वक्तऐसी बड़ी-2 गेम्स चलती हैं.औऱ जब आप् मोबाइल पर्र मोबाइल कररहे थें, मेरी एक् बड़ी सि गेम फंसी हुइ थि.इसलिये मोबाइल काटरहा थां.औऱ जैसे हि यह पैसे जीता, मे वहा सें निकलआया.''
इतने पैसे एकसाथ देखकर रश्मी हैरान थि.वोँ महीना भागा-दौड़ी करके सिर्फ़ 15000 कमाती थि.औऱ उसके भइया नें करीब उससे दुगने पैसेकुछ हि घंटो मे लाकर उसके सामने रखदिए थें.
वोँ जुए कों हमेशा सें बुरा मानती थि.पऱ उनके जौ हालात थें, उसमे पैसेअगर जुआ खेलकर भि आए, तोँ उसे उसमेकोई प्राब्लम नज़र नहीं आँ रही थि.
मोनू नें वोँ सारे पैसे ज़बरदस्ती रश्मी केँ हाथों मे रखदिए औऱ बोला : "दिदी, मे उतना भि बुरा नहींहू जितना आप् मुझे समझती हौ.मुझे भि मम्मी कि फ़िक्र हैं.अब मुझे आप् कि तरहकोई नौकरी तोँ देगा नहीं, इसलिये जौ मेरीसमझ मे आता हैं, मे करता हू.औऱयह पहलीबार नहीं हैं कि मैनेजुए मे पैसे जीते हें, पऱ हाँ, इतने पैसे एक् संग पहलेकभी नहीं जीते.पर्र पहले मे उन पैसों कों उड़ा देता थां.पर्र आज केँ बादऐसा नहीं करूँगा.मे भि आपकी सहायता करूँगा.
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अपने भइया कि ऐसी समझदारी भरी बाते सुनकर रश्मी एक् दम सें अपनीसीट सें उठी औऱ मोनू केँ सिर कों अपनी छाती सें लगाकर सिसकने लगी : "मुझे क्षमा कर देना मेरे भइया.मैने तेरी इतना बुरा-भला कहा.मे वोँ मां कि वजह सें इतनी परेशान थि कि जोँ मेरे मुँह मे आया, वोँ कहतीचली गयीँ,.''
यह मोनू केँ लिए पहला मौका थां जब उसकी बेहन केँ मुम्मे उसके चेहरे पऱ दबे पड़े थें.उसने आज तक अपनी बेहन केँ बारे मे कोई ग़लतबात नहीं सोची थि.पर्र आजजिस तरह सें उसने मोनू केँ सिर कों पकड़कर अपनी छाती सें लगाया थां.औऱ जब मोनू कों यह महसूस हुआ कि रश्मी नें पतली सि टी शर्ट केँ अंदरकुछ भि नहीं पहना हैं तोँ उसेऐसा एहसास हुआ कि उसका चेहरा सीधा उसके नंगे मुम्मो केँ उपररखा हुआ हैं.इतने नर्म औऱ रसीले थें उसके मुम्मे.औऱ उसके शरीर सें निकलरही एक् कुँवारी सि खुश्बू.वोँ तोँ बस अपनी आँखेबंद करकेउस सुगंध कों सूंघता हि रह गय़ा.
रश्मी बोलती जारही थि : "पर्र मोनू, यह रुपया हराम कां हैं.आगे सें कोशिश करना कि अपनी मेहनत कां हि रुपया घऱ लायाकरो.''
उसकीबात सें सॉफ जाहिर थां कि वोँ इन पैसो कों अभि केँ लिएमना नहींकर रही.करती भि केसे.उसे पता थां कि उनसे हॉस्पिटल केँ बिल्स आसानी सें दिएजा सकते हें.
मोनू नें अपनासिर उपर उठाया औऱ बोला : "नहीं दिदी, आप् ऐसा क्योसोच रही हैं.यह दीवाली केँ दिन हैं, इन दिनों मे जुए सें जीतेगये पैसे मेहनत किएहुए पैसों सें कम थोड़े हि होते हें.औऱ आप् केसेकह सकती हैं कि इसमे मेहनत नहीं हैं, इसमे बहोत दिमाग़ लगता हैं.औऱ दिमाग़ लगाकर कमाई हुई रकम भि तोँ मेहनत सें कमाएहुए पैसो केँ बराबर हुइ नां.''
रश्मी केँ पास उसकीबात कां कोई जवाब नहीं थां.उसके दोनो हाथों मे मोनू कां चेहरा थां.जौ उसकी दोनो छातियों केँ बीच सें झाँकता हुआ उसकीतरफ देखरहा थां.इतने लगभग सें औऱ इतने प्रेम सें तौ उसनेआज तक नहीं देखा थां अपने भइया कों.उसने नीचे झुककर उसके माथे कों चूम लिया औऱ बोलीं : "ठीक हैं.पऱ मुझसे वादाकर, दीवाली केँ बाद तुँ यहजुआ नहीं खेलेगा.सिर्फ़ इन्ही दिनों केँ लिएखेल लेँ बस.औऱ अपनी लिमिट मे रहकर.औऱ बाद मे कोई अच्छा सां काम करके मेरीघऱ चलाने मे सहायता करेगा.''
मोनू : "ठीक हैं दिदी.अब जल्द सें खानां लगाओ.बड़ी भूखलगी हैं मुझे.''
औऱ फिन हंसते हुए रश्मी उसकेलिए खानां परोसने लगी.
खानां खातेहुए अचानक रश्मी नें कहा : "तुम् रम्मी खेलते होँ याँ पत्ते पऱ पत्ता.''
मोनू खानां खाते-2 अचानक रुक गय़ा औऱ ज़ोर-2 सें हँसने लगा, औऱ बोला : "हाहाहा, दिदी आप् भि नां, यह बच्चों वालेखेल तोँ घऱ पऱ खेले जाते हें.'' रश्मी नें भि यहबात इसलिये कही थि क्योंकि वोँ स्वयं अपने भइया केँ संग बचपन मे यहीखेल खेलती थि.औऱकई बार क्याँ, हमेशा हि मोनू कों उसमें हरा देती थि.
मोनू : "हम् लोग खेलते हें, तीन पत्ती.यानी फ्लेश ''
रश्मी : "यह केसे होता हैं.''
मोनू : "उम्म्म.आप् ऐसा करो.खानां खाने केँ बाद मे आपकेरूम मे आता हू.वहीं दिखाता हूं कि यह केसे होता हैं.''
रश्मी भि खुश होँ गई,.वैसे भि खानां खाने केँ बाद वोँ रात कों 12 बजे तक जागती रहती थि.ऐसे मे अपने भइया केँ संगकुछ समय गुजारने कि बात सुनकर वोँ काफ़ी खुश हुइ.औऱ उसने खुशी-2हाँ कर दि.
रसोई समेटने केँ बाद वोँ अपने कमरे मे गई,, जहाँ पहले सें हि मोनू अपनेहाथ मे ताश कि गड्डी लेकर उसका प्रतीक्षा कररहा थां.
आने सें पहले रश्मी अपना मुँह अच्छी तरहफेस वॉश सें धोकरआई थि.यहकाम वोँ रोजरात कों करती थि.अपने चेहरे कों चमकाकर रखती थि वोँ हमेशा.इसलिये जब वोँ मोनू केँ पास पहुँची तौ उसका चेहरा ऐसेचमक रहा थां जैसे वोँ अभि नहा धोकरआई हैं.
औऱ मुँह धोने कि वजह सें उसकीटी शर्ट भि आगे सें गीली हौ गयीँ, थि.औऱ इसलिये उसके उभारों वाली स्थान टी शर्ट सें चिपककर पारदर्शी हौ गयीँ, थि.पर्र निप्पल्स वाली स्थान सें नहीं,
सिर्फ़ उपर-2 सें.पऱ इतना गीलापन भि काफ़ी थां मोनू केँ लन्ड कि नोक पर्र गीलापन लाने केँ लिए.आज उसकेसंग लगातार दूसरी बारऐसी घटना होँ रही थि, आज सें पहले उसने अपनी बड़ी बेहन कों ऐसी नज़रों सें देखा हि नहीं थां.दोनो अलग-2 औऱ अपने मे मस्त रहते थें.पऱ आजजिस तरह सें उसने मोनू केँ सिर कों अपने सीने सें लगाया औऱ अब अपनी गीली चुचियों केँ दर्शन भि करवारही हैं.ऐसे मे इंसान कां अपने लन्ड पर्र बस चलना काफ़ी मुश्किल हौ जाता हैं.
रश्मी धम्म सें आकर उसके सामने पालती मारकर बैठ गई, औऱ बोलि : "हांजी.अब बताओ.क्याँ होता हैं यहतीन पत्ती''
मोनू : "जितने भि खेलने वाले होते हें, उन्हे 3-3 पत्ते बाँटदिए जाते हें.औऱ जिसके पत्ते बड़े होंगे, वहीजीत जाएगा.''
रश्मी : "बस.इतना सां.यह तौ बड़ी आसान सि गेम हैं.बिल्कुल बच्चों वाली.हा हा.''
वोँ तोँ ऐसे बिहेव कररही थि जैसे वोँ एक् हि बार मे सीख चुकी हैं.
मोनू : "यह इतना भि आसान नहीं हैं, जितना लगरहा हैं.चलो, मे पत्ते बाँटकर दिखाता हूं.''
औऱ मोनू नें गड्डी कटवाई औऱ फिन 3-3 पत्ते आपस मे बाँट लिए.रश्मी नें फ़ौरन पत्ते उठालिए.
मोनू : "अरे.दिदी, ऐसे एकदम सें नहीं उठाते.पहले ब्लाइंड चलनी पड़ती हैं। औऱ अगर आपके पत्ते अच्छे हुए तोँ आप् चालचल सकती होँ ''
औऱ फिन मोनूउसे ब्लाइंड औऱ चाल केँ बारे मे बताने लगा.औऱ ब्लाइंड औऱ चाल केँ बारे मे अच्छी तरह सें समझकर वोँ बोलीं : "कोईबात नहीं.अगली बार सें ध्यान रखूँगी.पर्र इन पत्तो कां क्याँ करू.यह बड़े कहलाएँगे याँ नहीं.''
इतना कहकर उसने अपने तीनों पत्ते मोनू केँ सामने फेंक दिए.वोँ तीनों इक्के थें.
मोनू : "वाव दिदी.इक्के कि ट्रेल.पहली बार मे हि आपकेपास इक्के कि ट्रेल आई.बहोत बाड़िया.आपको पता हैं, इनकेआगे कुछ भि नहीं चलता.यह सबसे बड़े होते हें.सामने वाले केँ पास चाहेकुछ भि होँ, आपसेजीत नहीं सकता.''
रश्मी (आँखे घुमाते हुए ) : "कुछ भि.आँ हाँन.''
औऱ नाँ चाहते हुए भि रश्मी कि नज़रें घूमती हुईँ मोनू केँ शॉर्ट्स कि तरफचली गई,.औऱवहा पऱ उठरहा तंबू उसकी नज़रों सें छुपा नहींरह सका
। रश्मी कों तौ अपनी आँखो पर्र विश्वास हि नहीं हुआ.ऐसा उसनेजान बूझकर नहीं किया थां.ऐसे हि उसकी नज़रें घूमती हुईँ वहाचली गई, थि.औऱ वोँ इतनी भि नासमझ नहीं थि कि इतने बड़े उभार कां मतलब नां समझसके.
असल मे वोँ दुनिया केँ सामने तोँ भोली भाली बनकर रहती थि.पर्र अपनी जीवन मे वोँ एक् नंबर कि ठरकी थि.वोँ होती हैं नाँ घुन्नी टाइप कि लड़कियाँ, जौ अपने आप् कों दुनिया कि नज़रों सें छुपाकर रखती हैं.पऱ अंदर सें बड़ी चालू होती हैं.ठीक वैसी हि थि रश्मी भि.उसने आज तक कभी भि सेक्स नहीं किया थां.पऱ सेक्स सें जुड़ी बातेउसे हमेशा उत्तेजित करती थि.विद्यालय / कॉलेज मे भि वोँ लड़को सें दूर रहती थि.पऱरोज रात कों उन्ही लड़को केँ बारे मे सोच-सोचकर फिंगरिंग किया करती थि.यह उसका अभि तक कां नीयम थां, इसलिये उसे सोते-2रोज 12 बज जाते थें.अपने फोन पर्र वीचेट पऱ चेटिंग करना.फेक नाम सें एफबी पऱ अकाउंट भि बनाया हुआ थां उसने औऱ उसमें वोँ लड़को सें रोजरात कों चेटिंग करती थि.अपने फोन सें अपनी बुर कि औऱ मुम्मों कि पिक्स उन्हे भेजकर उत्तेजित भि करती थि.पर्र किसी सें मोबाइल पर्र बात नहीं करती थि औऱ नां हि किसी केँ सामने खुलकर आती थि.यानी अपना चेहरा हमेशा छुपाकर हि रखती थि.
औऱ जब मोनू नें यहबात बोलीं तोँ अपनीआदत सें मजबूर उसकी नज़रें उसके लन्ड वाली स्थान पर्र चली हि गयीँ,.
औऱ फिन नां जाने क्याँ सोचकर उसने अपनी नज़रें घुमा ली.पर्र उनमे आँ चुका गुलाबीपन मोनू सें छुपा नं रहसका.
मोनू : "क्याँ हुआ दिदी.आप् एकदम सें चुप सि क्यूं हौ गई,.''
रश्मी : "बस.ऐसे हि.उम्म्म्म एक् बात पूछू तुझसे मोनू.''
मोनू : "हाँ दिदी.पूछो.''
रश्मी : "मे तेरी कैसी लगतीहू.''
मोनू : "आप्.मतलब.आप् तौ अच्छी हि होँ दिदी.इसमे पूछने वाली क्याँ बात हैं.''
रश्मी : "अरे नहीं बुद्धू.मेरा पूछने कां मतलब.देखने मे.कैसी हूं मे.''
इतना कहकर उसने अपनी ज़ुल्फो मे हाथ फेरा.अपने खुलेहुए बाल पीछेकिए.
औऱ अपना सीना बाहर् कि तरफ़ निकाल करऐसे पोज़ दिया जैसेकोई फोटो सेशन हौ रहा हौ वहा.
मोनू कि नज़रें रश्मी कि हर हरकत पऱ थि.उसके नाज़ुक हाथों कां जुल्फे पकड़कर पीछे करना.अपने चेहरे पर्र उँगलियों कों फेरना, बालों कों कान केँ पीछे अटकाना.सभी वोँ ऐसेदेख रहा थां जैसे वोँ सभी रश्मी उसकेलिए हि कररही होँ.
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मोनू अपनी बेहन कि सुंदरता देखकर हैरान हुएजा रहा थां.उसे पता तोँ थां कि वोँ हसीन हैं.पऱ इतनी सेक्सी भि हैं, यहआज हि पताचला उसको.अभि तोँ उसनेकोई मेकअप नहीं किया हुआ.अपने गुलाबी होंठों पर्र लाल लिपस्टिक, आँखो मे रश्मी औऱ चेहरे पर्र मेकअप करने केँ बाद तौ यह कयामत हि लगेगी
रश्मी : "क्याँ सोचने लगे अब.कहो नाँ.''
मोनू (झेंपता हुआ सां) : "बोल तोँ दिया दिदी.आप् अच्छी हौ.चलो अबआगे देखो.मे दोबारा पत्ते बाँटरहा हू.''
औऱ मोनू नें बात बदलते हुएफिन सें 3-3 पत्ते बाँट दिए.यह काम उसने इसलिये भि किया थां कि रश्मी कि ऐसी बातें सुनकर उसके लन्ड नें अपना पूरा आकार लेँ लिया थां
औऱ वोँ अंडरवीयर मे ऐसेफँस गय़ा थां कि उसेसही करने केँ लिए वोँ अपनेहाथ नीचे भि नहींकर पारहा थां.क्योंकि अपनी बड़ी बेहन केँ सामने वोँ केसे अपने लन्ड कों हाथ लगाता भला.इसलिये उसनेबात बदलने मे हि भलाई समझी ताकी उसका लन्ड नीचेबैठ जाए
अब कि बार रश्मी नें पत्ते नहीं उठाए.
रश्मी : "पर्र तुमने तोँ कहा थां कि ब्लाइंड चलने केँ लिए पैसे चाहिए होते हैं.अब क्याँ हम् दोनो भि पैसो सें खेलें क्याँ.''
मोनू : "नहीं.उसके बदलेकुछ भि रख देते हैं.''
इतना कहकर वोँ इधरउधर देखने लगा.
रश्मी केँ मन मे तब तक एक् बात आँ चुकी थि, वोँ बोलीं : "एक् काम करते हैं.ब्लाइंड याँ चाल केँ बदले हम् एक् दूसरे सें प्रश्न करेंगे.औऱ सामने वाला उसके जवाब बिल्कुल सच मे देगा.कहो मंजूर हैं.''
मोनू कों समझ नहींआया कि उसकी बेहन करना क्याँ चाहती हैं.पऱ वोँ समझ चुका थां कि रश्मी उसे फंसाना चाहती हैं, जोँ भि थां, उसमें वोँ फंसना नहीं चाहता थां
मोनू : "क्याँ दिदी.आप् भि नाँ.इसमे मजा नहीं आएगा.रूको.मे पैसे लेकरआता हू.उससे हि खेलते हैं.याँ फिन माचिस कि तिल्लिया लेकरआता हू, उन्हे आपस मे बाँट लेंगे, उनसे खेलेंगे.''
रश्मी : "नहीं.अब तोँ मे ऐसे हि खेलूँगी.वरना तुम् उठाओयह पत्ते औऱ जाओ अपने कमरे मे.मुझे भि नींद आँ रही हैं.''
दोनो हि सूरत मे रश्मी अपना फायदा देखरही थि.अगर वोँ खेलने केँ लिएमान जाता तौ वोँ उससे अपनी पसन्द केँ प्रश्न करकेकुछ सच उगलवाती.औऱ अगर वोँ चला जाता तोँ रोजरात कि तरह चेटिंग वगेरह करतेहुए मुठ मारती.औऱ वैसे भि आज वोँ कुछ ज्यादा हि उत्तेजित होँ रही थि.पता नहीं क्यो.
वापिस जाने कि बात सुनते हि मोनू हड़बड़ा सां गय़ा.आज पहलीबार तौ उसे अपनी बड़ी बेहन कों ऐसे देखने कां मौका मिला थां.औऱ उपर सें वोँ थोडा नॉटी भि बिहेव कररही थि.ऐसे मे वापिस जानां मतलबहाथ मे आया मौकाखो देने जैसा हि थां.
हमेशा अपनी 'बेहन' कों 'बेहन' कि नज़र सें देखने वाला मोनू अचानक सें हि उसे एक् 'लड़की' कि नज़र सें देखने लग गय़ा.औऱ देखे भि क्यो नां.हसीन तोँ थि हि वोँ.अपनी अदाओं कां चमत्कार वोँ ऐसेचला रही थि जैसेकोई किसी कों पटाने केँ लिए करता हैं.अब उसकीसमझ मे यह नहीं आँ रहा थां कि उसकी हरकतों कों वोँ क्याँ समझे.पऱ जौ भि थां अभि तक तोँ मोनू कों मजा हि आँ रहा थां.औऱ ऐसे मज़े कों वोँ खोना नहीं चाहता थां.
मोनू : "ठीक हैं दिदी.जैसा आप् बोलो.''
औऱ वोँ फिन सें वहीबैठ गय़ा औऱ पत्ते बाँटने लगा.रश्मी केँ होंठों पर्र विजयी मुस्कान तैर गई,.
रश्मी नें भि आज सें पहले अपने भइया केँ बारे मे ऐसा नहीं सोचा थां.पऱ वोँ सोचरही थि कि केसे वोँ अब तक रोजरात कों इस कमरे मे सोतेहुए अपनी बुर कि मालिश करती हैं औऱ बिल्कुल संग वाले कमरे मे हि उसका जवान भइया भि सोता हैं.उसके इतनीपास रहतेहुए वोँ यहसभी काम करती हैं.सिर्फ़ एक् दीवार हि तौ हैं बीच मे.औऱअगर वोँ दीवार भि नां हौ तोँ.औऱ वोँ उसके सामने हि नंगी होकर अपनी बुर रगड़रही होँ तोँ.यह सोचते हि उसके पूरे जिस्म मे एक् सिहरन सि दौड़ गई,.उसके होंठ काँपने लगे.उपर वाले भि.औऱ नीचे वाले भि.
मोनू : "अब क्याँ हुआ दिदी.आपकी ब्लाइंड हैं.पूछो.क्याँ पूछना हैं.''
पूछना तौ रश्मी बहोत कुछ चाहती थि.पर्र फिन भि अपने होंठों कों दांतो सें काटकर बड़ी मुश्किल सें अपने आप् पर्र काबू किया औऱ बोलीं : "तेरी.तेरी.एक् गर्लफ्रेंड थि नाँ.वोँ अभि भि हैं क्याँ.औऱ क्याँ नाम हैं उसका.''
मोनू कि आँखेगोल होँ गई,.उसने तोँ सोचा भि नहीं थां कि यह बातें इतनी पर्सनल भि हौ सकती हैं.
औऱ यह रश्मी कों केसेपता चला कि उसकी एक् गर्लफ्रेंड हैं.यहबात तोँ उसनेआज तक उसे नहीं बताई.वोँ अधिक बाते करता हि नहीं थां रश्मी केँ संग.इसलिये वोँ हैरान हौ रहा थां कि यह रश्मी आज एकदम सें क्यूं उसकी पर्सनल जीवन केँ बारे मे पूछरही हैं.
मोनू : "वोँ.थि याँ नहीं थि.आप् क्योपूछ रही होँ.औऱ आपको केसेपता कि मेरी एक् जीएफ थि.''
रश्मी : "गेम कां रूल हैं यह.तुम्हे बताना पड़ेगा.मुझे केसेपता वोँ बात रहनेदे.''
मोनूफँस चुका थां.वोँ सोचने लगा कि अगरउसे यहबात पता हैं तौ उसके सामने झूठ बोलने कां कोई फायदा नहीं हैं.
मोनू : "जी.वोँ अभि भि हैं.औऱ उसकानाम रुची हैं.''
रुची कां नाम सुनते हि रश्मी कां दिमाग़ सुन्न सां हौ गय़ा.यह तौ उसकी बचपन कि सहेली थि.जिसके संग वोँ पिछले 2 सालो सें बात नहींकर रही.दोनो मे किसीबात कों लेकर इश्यू होँ गय़ा थां इसलिये.
पर्र उसका स्वयं कां भइया, उसकी सबसे करीबी सहेली केँ संगलगा हुआ हैं, यह उसने सोचा भि नहीं थां.
रश्मी : "रुची केँ संग.ओह्ह्ह्ह मायगॉड.पऱ यहकब सें चलरहा हैं.मुझे तौ पता भि नहीं.''
मोनू : "आप् एक् हि बार मे दो प्रश्न नहींपूछ सकती.अब मेरी ब्लाइंड हैं.यानी प्रश्न पूछने कि बारीअब मेरी हैं.''
मोनू अपने आप् कों बड़ा समझदार समझरहा थां उस वक्त.उसने मुस्कुराते हुएवही सवाल अपनी बेहन सें भि पूछ लिया : "आपकाकोई बाय्फ्रेंड हैं क्याँ.याँ कभीरहा होँ.क्याँ नाम हैं उसका.''
रश्मी नें सपाट चेहरे सें उत्तर दिया : "नहीं.कोई थां हि नहीं तोँ नाम किसका बताऊ.''
बेचारा मोनू अपना सां मुँह लेकररह गय़ा.
वैसेइन बातो कां कोई मतलब नहीं थां.दोनो भइया बेहन नें आज सें पहलेकभी इस विषय पर्र बात नहीं कि थि.उन्हे थोडा अटपटा भि लगरहा थां.पर्र मजा भि बहोत आँ रहा थां.ख़ासकर रश्मी कों.वोँ तौ समझ चुकी थि कि इसगेम केँ ज़रिए वोँ आजसभी कुछ उगलवा लेगी मोनू सें.जोँ वोँ हमेशा सें उससे पूछना चाहती थि.पर्र शरम केँ मारेकभी पूछने कि हिम्मत हि नहीं हुईँ.
रश्मी : "अब मेरी बारी.अब यह बताओ.रुची केँ संग तुमने क्याँ -2 किया हैं.''
यह उसकी ब्लाइंड थि.
मोनू (झल्लाकर) : "आप् भि नाँ दिदी.यह केसे प्रश्न पूछरही हैं.मुझे लज्जा आँ रही हैं.''
रश्मी : "एक् लड़का होकर भि तूँ ऐसे शरमारहा हैं.रहने दे.मुझे नहीं खेलनी यहगेम शेम.तुँ जा अपने कमरे मे.मुझे वैसे भि नींद आँ रही हैं.''
यह तौ जैसे उसके स्वाभिमान पर्र चोटकर दि थि रश्मी नें.वोँ एकदम सें तैश मे आकर बोला : "मुझेकोई शरम-वरम नहींआती.यह तौ तुम्हारा लिहाज कररहा हू.वरना मुझेयह बाते बताने मे कोई फ़र्क नहीं पड़ता.''
रश्मी (चटखारे लेतेहुए) : "तोँ बता नाँ.चुप क्यूं हैं अभि तक.बोल, क्याँ-2 किया हैं तुम् दोनो नें अभि तक.''
रश्मी फुलटू मूड मे आँ चुकी थि अब तक.औऱ शायदयह भि भूल चुकी थि कि वोँ क्याँ पूछरही हैं औऱ किससे.
मोनू : "हमने.वोँ किस्सस वगैरह.हग्स.उम्म.एंड फकिंग भि.''
Diwali ka Jua - 3 (Incest + Adultery) - Diwali Ki Raat - Next part miss mat karna
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