झिलमिल ओढ़नी – New Episode
7th पन्ना
लाल आसमान सें बारिश कि कुछ बुँदे गिरना शुरुआत होँ चुकी हैं जोँ एक् मद्धम ध्वनि पैदाकर रही हैं। जैसे किसी अभिशाप कि श्योक्ति होँ रही हौ याँ जैसे मृगतृष्णा मे भटके हिरन कों मौत दिखाई देरही हौ याँ कहाजा सकता हैं जैसे प्रशांत मे कोईनाव भटक गयीँ, होँ, जिस पर्र मात्र एक् नाविक सवार हौ याँ जैसे किसी खरगोश कि आँखों पऱ रौशनी कि किरणपड़ चुकी होँ। आबोहवा मे बिना किसीआग केँ धुंए कि खुसबू घुल चुकी थि औऱ जोधपुर जलना शुरुआत हौ गय़ा थां जैसे जंगल कि आग एक् तिनके सें शुरुआत होकरशहर तक पहुंच जाती हैं। फिरभी जिनका क़त्लहुआ थां वे तिनके नां होकर बरगद केँ पेड़ थें। ठाकुर रामकिशन जैसे जानेमने व्यक्ति कि हत्या कां राज कबतक छुपारह सकता थां। एक् सें पांच, पांच सें पांचसो औऱ पांचसो सें पांच हजार तक बात पहुँचने मे घंटे भि नाँ लगे। चारो सेठों केँ घरो केँ आगेभीड़ इकट्ठा होना शुरुआत होँ गयीँ, थि जिसमे सबसे अधिकलोग ठाकुर रामकिशन केँ घऱ केँ बाहर् आयेहुए थें। जिसघऱ मे पहले सें हि इतने मुश्किल हालात बनेहुए थें उसमेइस घटना नें सब कि कमरतोड़ केँ रख दि थि। सुषमा कां रो रोकर बुराहाल होँ गय़ा थां जिसे पर्वत सिंह भि संभाल पाने मे असमर्थ थां। सुषमा औऱ रामकिशन केँ परिवार केँ लोगो तक यहखबर आया दि गई, थि औऱ वे वहांआने केँ लिए रवाना होँ चुके थें। डीएसपी प्रताप मौका मुआयना करने अपनीटीम केँ संग आँ चुके थें। चारों कि लाश कों मेहरानगढ़ किले कि उत्तरी दिवार केँ पासछोड़ दिया गय़ा थां। किसी कां भि चेहरा पहचान पाना मुश्किल थां। लगरहा थां जैसे तैजाब सें सारेबदन कों जला दिया गय़ा हौ। बॉडी कि आउटलाइनिंग करने केँ बाद पोस्टमार्टम केँ लिए भिजवा दि गई, थि। समाचार ताज़ाखबर सें भरउठे थें। हर किसी कि जुबान पर्र यहीबात हौ रही थि कि इस घटना केँ पीछे किसका हाथ होँ सकता हैं?
"भोसड़ी केँ, चूतिये तुझेही किसने बोला उन्हें टपकाने कों?" आतिफ़ गुस्से मे अपने भइया कों गलियां देरहा थां।
"उन्होंने आपके खिलाफ साजिश रची थि भइया। पऱ किसी केँ पासकोई सबूत नहि हैं कि यह क़त्ल मेने किये हैं। "
"तूँ समझ नहि रहा हैं छोटे, बच्चा हैं तुँ। जिनका क़त्ल किया हैं तूने, वोँ सड़क पऱ चलते राहगीर नहि थें। " आतिफ़ नें समझाना चाहा पर्र वोँ जानता थां कि आदिल नहि समझेगा। "अब तुम्हें शहर छोड़ना होगाकुछ दिनजब तक यह मामला ठंडा नां होँ जाये"
"पर्र भइया किसी कों कुछपता हि नहि हैं तोँ कोई अपना क्याँ हि उखाड़ लेगा "
"मादरचोद बात कों समझ, अब अपनेहाथ सें बात निकल चुकी हैं, तुम्हें जैसाकह रहा हूं वैसाकर। आधे घंटे मे तेरेपास गाड़ी आएगी औऱ तूँ बिना अपनी जुबान चलाये उसमे बैठेगा" आतिफ़कड़क आवाज़ मे बोला जिससे आदिल भि डर गय़ा। आतिफ़ केँ लिए आदिल हि उसका सबकुछ थां। वो सबकुछ दाव पऱ लगाकर भि अपने भइया कों बचाना चाहता थां पर्र यह गलतीबड़ी थि।
मुबीर केँ कानो तक हरखबर पहुंच रही थि पऱ वो अभि केँ लिए पीछे रहकर तमाशा देख्ना मनपसंद करता हैं। उसके शैतानी दिमाग़ मे खिचड़ी पकना शुरुआत होँ गयीँ, थि जिससे उसे यकीन हौ गय़ा थां कि जोधपुर उसका होँ जायेगा पर्र आगे क्याँ होगायह तौ समय हि बताएगा।
जेल मे भानु कि कोठरी केँ बाहर् गार्ड आता हैं औऱ आकर भानु सें कहता कि उसे जेलर साहब अपने दफ़्तर मे बुलारहे हैं। भानु जल्द सें दफ़्तर मे पहुँचता हैं तोँ देखता हैं कि जेलर साहब परेशान सें इधर सें उधरडोल रहे हैं। जेलर साहब कों भि पता हैं कि भानु किसकी औलाद हैं इसलिये उसे किसीआम इंसान कि तरह कोठरी मे हि नां बताकर विशेष तौर पऱ इत्तला करना चाहते हैं।
"मे चाहता हूं कि तुम् उस कुर्सी पऱ बैठो" औऱ भानु बिना किसी प्रश्न जवाब केँ बैठ जाता हैं। उसनेआज सें पहले जेलर साहब कों इतने गंभीर रूप मे कभी नां देखा थां जिससे उसेभय कां पालाचढ़ रहा थां। परन्तु अब उससे सब्र नहि होँ पारहा थां।
"बात क्याँ हैं सर? आपनेऐसे मुझे क्यूं बुलाया हैं?"
"देखो भानु, जिस बात कों मे बताने जारहा हूं वोँ संगीन हैं औऱ उसमे तुम्हारे विवेक कि आवश्यकता पड़ने वाली हैं" जेलर केँ चेहरे पऱ गंभीरता औऱ भि बढ़ गई, थि। घड़ी कि टिकटीक लगातार सुनाई देरही थि जिससे पता चलता थां कि वंहा कितनी शांति हैं।
"ठीक हैं सर। मे पुरे विवेक सें काम लूंगा, आप् बताइये क्याँ बात हैं?"
जेलरखुद कों रेडी करता हैं औऱ यह बुरीखबर भानु कों देता हैं
"तुम्हारे पापा कां क़त्लकर दिया गय़ा हैं"
सदमे कि लहर भानु केँ जिस्म केँ हर हिस्से मे पहुँच जाती हैं पर्र उसका दिमाग़ उसे बताता हैं कि शायद उसनेकुछ गलतसुन लिया होँ। उसेपता हैं कि उसका बाप कितना रुतबा रखता हैं इसलिये उसे विश्वास नहि होता।
"यह आप् क्याँ कहरहे हैं सर? शायद आपकोकोई गलतफहमी होँ गई, हैं" भानु कोशिस कररहा थां कि जौ उसने सुना वोँ एक् गलती सें निकला हुआ वाक्य हौ औऱ जेलर साहबउस गलती कों सुधारने कि कोशिस करेंगे।
"मुझेकोई गलतफहमी नहि हैं, तुमने जोँ सुना वोँ सही हैं, आजसाम कों उनकीलाश किले केँ पास मिली हैं"
इतना सुनना थां औऱ भानु कों स्थिति कां एहसास होता हैं। उसका दिमाग़ फिनकाम करनाबंद कर देता हैं फिन भि उसे विश्वास नहि होँ पारहा थां कि जोँ उसने सुना वोँ सही हैं याँ नहि। उसकी नजरें शून्य मे चली जाती हैं औऱ वोँ मौन होँ जाता हैं। तभी अचानक एक् दहाड़ केँ संग वोँ रो उठता हैं। जेलरभाग करआता हैं औऱ उसेपकड़ लेता हैं।
"नहि नहि नहि, कह दीजिये यहझूठ हैं" भानुफूट फूटकर रोने लगता हैं औऱ जेलरउसे शांत करवाने लगता हैं। किसी औऱ कैदी कि केँ संगअगर यह घटना हुईँ होती तौ जेलर ध्यान भि नहि देता पऱ भानु कों वोँ बड़े भइया जैसे ढाँढस बँधारहा थां।
"यहसच हैं भानु, आपसी दुश्मनी केँ चलते तुम्हारे पापा औऱ उनकेसंग तीन अन्यबड़ी हस्तियों कां भि क़त्लहुआ हैं। "
भानु लगातार रोयेजा रहा थां पर्र एक् मर्द, स्त्री कि तरह ज़्यादा देर नहि रो सकता, उसे अपने सें अधिक अपने परिवार कि फ़िक्र रहती हैं। भानु कों भि यादआता हैं कि उसकी मां औऱ दादीमा घऱ पर्र अकेली हैं। अगर उसके बाप कों मार दिया गय़ा थां तोँ होँ सकता हैं उन्हें भि खतरा होँ.
"सर, मेरी मम्मी."
"उसकी चिंता मतकरो, उनकी सिक्योरिटी केँ इंतज़ाम कियेजा चुके हैं, अभि केँ लिए तुम् स्वयं कों सम्भालो वरना उन्हें कौन संभालेगा जौ अबबस तुम्हारे भरोसे हैं"
डीएसपी प्रताप कां ठाकुर केँ करीबी होने सें उनके परिवार कि सुरक्षा बढ़ाना लाजमी थां जिससे भानु केँ घऱ केँ प्रवेश दरवाज़ा पर्र सुरक्षा टुकड़ी तैनात कर दि गयीँ, थि।
"तुम्हे आज कि रात यहीं गुजारनी होंगी, कल तुम्हे अपने पिता कां आखिरी संस्कार करने जानां हैं"
भानु कों समझ मे आता हैं कि इस वक़्त रोने सें कुछ नहि होने वाला। उसकेमन मे चिंता कि लहरे थि औऱ दिमाग़ मे एक् प्रश्न कि ऐसाकौन कर सकता हैं। जल्द हि वो प्रश्न गुस्से मे तब्दील होने लगता हैं। दुख, पीड़ा, दर्द औऱ गुस्से केँ मिलेजुले भाव उसकेमन कों घेरने लगते हैं।
निर्मल मन केँ सफ़ेद पन्ने पऱ खून केँ दाग़लग चुके थें। ऐसेघाव जौ दुनिया केँ किसी भि उत्पाद सें दूर करना असंभव थां। गुस्से कि ज्वाला फड़क चुकी थि जोँ भानु कों जुर्म कि दुनिया मे धकेल सकती थि। इन सबसे पहलेउसे एक् बेटे केँ फ़र्ज निभाना होगा औऱ अपने पिता कि नैया कों जग दरिया केँ पार करवाना होगा। चाहे नां चाहे हालात बदल चुके थें औऱ टाइम बैठायह नाटकबुन रहा थां अपनेमजे केँ लिए। रंगत गमगीन थि औऱ रात लम्बी, सुभह अपनेसंग क्याँ लाती हैं इस संस्य केँ संग सलाम.
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8th पन्ना
हवाएं जोरों सें चलकर काले बादलों कों अपनेसंग बहारही हैं जिस कारण बारिश नहि होँ पारही पऱ दिन काला जरूरदिख रहा हैं जैसे तूफान आने वाला होँ। लकड़ियों कि सेज पर्र लाश सुला दि गई, थि औऱ भानु मटकी कों कंधे पर्र रखकर पानी कि तारबना रहा थां। कहा जाता हैं कि जबतार बनाई जाती हैं तौ वोँ एक् बार मे बननी चाहिए वरना अपशगुन होता हैं। पऱ क्याँ एक् बेटे केँ लिए इससेबड़ा अपशगुन होँ सकता हैं कि उसकेसर सें बाप कां सायाहट जाये? आंसू तोँ नहि थें उसकी आँखों मे, शायदजेल जाने सें नाँ बचाने केँ कारणकुछ नफरत केँ बीजपड़ गए थें उसकीमन कि ज़मीन पऱ याँ होँ सकता हैं अपने गुस्से कों ठंडा नाँ होने देना चाहता होँ, जोँ भि हौ, बहोत बुरा घटित हौ गय़ा थां। पौराणिक विचारों केँ अनुसार औरतें दाह संस्कार पर्र नहि आँ सकती जिसे भानु कां परिवार भि मानता हैं तोँ सुषमा औऱ दादीमा घऱ पर्र हि रही। उन्हें सँभालने कि जिम्मेदारी बाकी महिलाओ कों दे दि गयीँ, थि।
चिताकुछ देरजली औऱ भीड़ अपने अपनेघरो कि औऱ प्रस्थान होना शुरुआत हौ गई,। इतने लोगों कों देखकर भानु कों यहबात समझ मे आती हैं कि उसके बाप कां कितना नाम हैं शहर मे। जोँ बचे थें उनमे नामचीन लोग शामिल थें। पऱ आखिर मे MLA भरत सिंह हि भानु केँ संगबचे रहगए थें वहां। भानुउस आग मे खोया खोया सां देखरहा थां जैसे मूरतबन गय़ा हौ। जबभरत सिंह केँ जाने कां वक़्तहुआ तोँ वे भानु केँ पासआये औऱ उसके कंधे पऱ हाथ रखकर बोले
"ईश्वर कि मर्जी केँ आगे हम् इंसान बस प्यादे हैं भानु बेटा। वोँ जब जिसे चाहता हैं अपनेपास बुला लेता हैं। ईश्वर तुम्हारे पापा कि आत्मा कों शांति देवें यहीं प्रार्थना हैं। "
वोँ आवाज़ जैसे उसने सुनी हि नां हौ, उसकी बुद्धिधारा अपने पिता केँ संग बिताये कुछचंद लम्हो कों फिन सें जिवंत कररही थि।
"हमनेपता किया कि तुम्हारे 2 महीने बचे हैं सजा केँ, कोशिस करुँगा कि इनकोकुछ कम करवा सकूँ" इतना कहकर उन्होंने भानु कां कन्धा थपथपाया औऱ चलपड़े। अबबचे थें तोँ भानु, चिता औऱ बहती हुइ हवा। विचारों कां शैलाब उमड़उमड़ कर आँ रहा थां पऱ उनपर पाबंदी लगाएं तोँ लगाएं केसे?
थोड़ीदूर खड़ीजीप मे बैठे पुलिस केँ सिपाहिओ कों भरत सिंह केँ निर्देश थें कि भानु जितनी देर वहां रहना चाहेउसे रहने दिया जाये। जब देहराख हौ गई, तौ भानुखुद हि उनकी औऱ चलपड़ा। उसेघऱ जाने नहि दियाजा सकता थां फिरभी वो अपनी मम्मी, दादीमा औऱ बेहन सें मिल चूका थां जिसे मिलना कहना व्यर्थ थां क्युकि उन तीनो कां हि रो रोकर बुराहाल थां।
जैल मे पहुंचते हि बलदेव नें भानु कों गलेलगा लिया। खबर जिस तेजी सें फैली थि, उससे आतिफ़ कों पतालग चूका थां कि भानु किसका बेटा हैं। उसेये भि पता थां कि आदिल द्वारा कियेगए इन कत्लो कां किसी केँ पासकोई सबूत नहि थां तौ भानु कों इसबात कां अंदेशा होना नामुमकिन हि थां, इसलिये वो बेफिक्र थां। फ़िक्र होँ भि तोँ किसबात कि, उसके आसपास इतने व्यक्ति रहते थें जैल मे भि।
रात अपनेपेर पसार चुकी थि परन्तु भानु कि आँखों मे नींद कां नामोनिशान नहि थां। 2 दिन पहले हि तोँ मां सें बात हुई थि, बापूठीक थें एकदम। अचानक यह क्याँ हुआ? क्यूं हुआ? किसने किया? इन्ही सभी सवालों नें उसके दिमाग़ कों घेररखा थां। कहा जाता हैं सपारटन राज्य केँ योद्धा जब अपना प्रशिक्षण लेते थें तौ उन्हें एक् बात सिखाई जाती थि कि प्यार औऱ गम, इन दोनों सें हि बचके रहना हैं क्युकि यह दोनों हि एक् योद्धा कों कमजोर बनाते हैं, पऱ भानु मे यहगुण बिना सिखाये हि उत्पन्न होँ गय़ा थां। एक् असली मर्द कि तरह उसने अपने पिता कि मौत कां थोड़ी हि देरगम मनाया औऱ अब गुस्से सें सुलगने लगा थां। वोँ उन लोगो मे सें नहि हैं जौ गांधीजी द्वारा सिखाये गएदो थप्पड़ खाने वाले नियम पर्र चले। बदले कि भावना विसंगत नाँ होकर एकत्र होँ गयीँ, थि। बाजुओं मे खून कां दौराबढ़ गय़ा थां। फर्श पऱ दोनों हाथो केँ बलबदन कों ऊंचाउठा दिया औऱ दंड मारने लगा, एक्, दो, तीन औऱ नाँ जाने कितने लगादिए, आँखेनम जरूर थि पऱ अश्रु धरती पऱ नहि गिररहे थें। ऐसालग रहा थां जैसे ज्वालामुखी कि मुलाकात परमाणु बम सें हौ गई, होँ। उसे जोँ चेहरे दिखरहे थें उनमे सें किसी केँ द्वारा उसके बाप कां क़त्ल करना असंभव सां प्रतीत होँ रहा थां। वोँ तोँ यह भि नहि जानता थां कि उसके बाप केँ साथीकौन थें औऱ दुश्मन कौन?इन पांच सालो मे वे किससे मिलते होंगे औऱ किसके संग उनका बिज़नेस चलरहा होगा। जौ भि होँ, वोँ नहि रुकेगा, अब तोँ बिलकुल नहि, सहीराह पऱ चलने केँ इंतज़ार मे वो भोला लड़का खतरों केँ रास्ता पर्र आनपड़ा थां, जिनकी मंजिल कँहा हैं किसी कों पता नहि।
(मुबीर केँ अड्डे पऱ )
"भइयाअब सही मौका हैं उस आतिफ़ कों ठिकाने लगाने कां। मेने जोँ प्लान बताया हैं उसमे कितना दम हैं आप् समझ हि गए होंगे" सेखु नें बड़े घमंड सें बुद्धि प्रदर्शन किया जिसके जवाब मे मुबीर नें सिगरेट कां कश लगाया।
"दम तौ हैं, वोँ मानेगा?" मुबीर कों यकीन नाँ हुआ।
"उसका बाप मरा हैं भइया, इन अच्छे इंसानों कि यहीं तोँ बात होती हैं कि यह अपने परिवार कों अपनीजान सें ज़्यादा चाहते हैं " सेखु नें पासा फेंका।
"जरा सि भि गड़बड़ हुईँ तोँ प्रॉब्लम होँ जाएगी साले"
"आप् टेंसन मतलो भइया, बस हाँकहो औऱ आपको आतिफ़ सें छुटकारा मिल जायेगा"
"ठीक हैं, जोँ कुछ तुझेही चाहिए उसे देने केँ लिए वोँ तेरीमिल जायेगा, अब औऱ नहि जीनाउस आतिफ़ केँ खौफ मे"
जागीरदारों कि हत्याओं मे सबका नुकसान हुआ थां मुबीर कों छोड़कर क्युकि उसे अपने मकसद कों पूरा करने कां मार्ग नजर आँ गय़ा थां। अगर उसकायह प्लान सफल होता हैं तोँ वो अकेला राजाबन जायेगा राजस्थान केँ काले कारोबार कां, जिसके हाथ मे सत्ता कि हरबड़ी हस्ती होंगी औऱ जिसका कोईबाल भि बांका नहि कर पायेगा। शक्ति कि इसभूख मे वक़्त किसके पल्ले अपना फैसला डालता हैं यह वक़्त कों हि पता हैं। गमगीन रात कि चादरफ़ैल चुकी हैं औऱ कुछबड़ा होने केँ आसार बननेलगे हैं। सुभह कां सूरज क्याँ लाता हैं जानने केँ लिए सलाम.
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9th पन्ना
"अगर वोँ नां माना तौ? किसी सें कुछकह दिया उसने तोँ पता हैं नां क्याँ अंजाम होगा?"भरत सिंह नें मुबीर सें हाथ मिला लिया थां औऱ हाथ मिलाते हि दोनों नें पहलीचाल चलने कि तैयारी शुरुआत करदी थि।
"मानेगा, सेखु केँ प्लान मे दम हैं। आप् बस मीटिंग करवाओ दोनों कि"मुबीर नें यकीन दिलवाया।
"मीटिंग होँ जाएगी, पर्र याद रखना, अगर प्लान फ़ैलहुआ तोँ हमारा तुम्हारा कोई वास्ता नाँ होगा। स्वयं हि बचना होगा आतिफ़ सें" राजनीतिज्ञ भरत सिंह नें अपने बचने कि तैयारी पहले हि करली थि।
"भानु किसी भि हालत मे पकड़ा नहि जायेगा, इतनाबड़ा कारोबार गड्ढे मे नहि जाने दियाजा सकता। रामकिशन केँ बादवही मालिक बनेगा औऱ हम् उसे अपने पल्ले रखना चाहते हैं" भरत सिंह नें दोबारा चेताया।
"किसी केँ पासकोई सबूत नहि होगा कि भानु नें यहकाम किया हैं, आप् बसहरी झंडी दिखाओ MLA साहब, बाकी हम् पऱ छोड़दो"
प्लान बन चूका थां, अब बारी थि भानु सें मिलने कि, क्युकि सेखु नें हि प्लान बनाया थां तौ यह भि सही थां कि वोँ हि मिलने जायेगा भानु सें, पर्र जैल मे सीधेतौर पर्र मिलना सही नहि होगा इसलिये भानु कों हि बाहर् लाना होगा।
"आपने अभि तक नहि बताया कौन हैं आप्? औऱ मुझेयहा क्यूं लाया गय़ा हैं?" मेहरानगढ़ किले कि पीछे कि ईमारतो मे सें एक् केँ कमरे मे बैठे भानु नें सेखु सें पूछा। कमरे केँ बाहर् 20 सें 30 व्यक्ति खड़े थें जिनके पास असले कि कोईकमी नहि थि। सेखु कि बनियान पऱ लगे माइक्रोफ़ोन सें मुबीर औऱ भरत सिंह सारीबात सुन रहें थें। भरत सिंह कि पहुंच कितनी हैं यहइसबात सें हि पता लगाया जा सकता हैं कि एक् कैदी कों उसने बिना किसी कों खबरहुए जैल सें निकाल लिया थां।
"मेरानाम सेखु हैं, मे मुबीर भइया केँ लिएकाम करता हूं औऱ तुम्हे यंहा लाया गय़ा हैं तुम्हारे पापा केँ क़त्ल कि जानकारी देने केँ लिए" सेखु नें बिनाझूठ बोले बताया। उसे अपनी योजना पर्र इतना विश्वास थां कि उसने झूठेनाम कां प्रयोग भि नहि किया।
अपने पिता कां जिक्र आते हि भानु कि भोंहे तन गई, औऱ बिना एक् समय गवाए उसने पूछा, "मेरे पापा केँ बारे मे? क्याँ जानते हैं आप्? किसने मारा हैं उन्हें?"
"देखो भानु, जोँ नाम मे तुम्हे बताने जारहा हूं, वोँ एक् बड़ानाम हैं। इसकी शुरूआत कहां सें होती हैं औऱ इसमें तुम्हारे पिता कि क्याँ भूमिका हैं यह जाने बगैर मे तुम्हे नहि बता सकता"पलक झपकने सें भि तेज भानु नें गुस्से मे आकर सेखु कि गिरेबान पकड़ली औऱ उसेहवा मे उठा दिया।
"तुँ मुझेइसी टाइम उसकानाम बता वरना उससे पहले तेरे जिस्म सें प्राण अलगकर दूंगा साले" भानुगरज उठा परन्तु सेखु कों पहले सें हि यह अंदाजा थां कि भानुइस तरह कां बर्ताव कर सकता हैं इसलिये वो घबराया नहि।
"देखो भानु" सेखु सें बड़ी मुश्किल सें यह शब्द बोलेजा रहे थें, भानु कि ताकत देखकर उसे बहोत आश्चर्य हौ रहा थां औऱ उधरइन दोनों कि बातें सुनरहे भरत सिंह औऱ मुबीर कों योजना विफल होतीनजर आँ रही थि।
"पूरीबात सुने बगैर तुम् इसीतरह सें गलत फैसला लोगे, प्लीज मेरीबात सुनो भइया" भानु नें जबयह सुना तौ उसका विवेक थोड़ाकाम कर गय़ा औऱ उसने एक् झटके सें उसे निचे उतार दिया। सेखुगला छूटते हि खाँसने लगा।
"क्याँ खाता हैं भइया?" सेखु अपनागला सेहलाता हुआ पूछता हैं।
"अब बकना शुरुआत कर, इसबार मुझसे नियंत्रण होगा याँ नहि मुझे भि नहि पता" भानु गुस्से मे तपरहा थां। दोनों वापिस कुर्सीयो पऱ बैठ जाते हैं औऱ सेखु पानी पीकर स्वयं कों संभालता हैं।
"इसबात कि शुरुआत बहोत पहले हुईँ थि." औऱ सेखु, भानु कों हर एक् बात सें रूबरू करवाता हैं कि केसे उसके पिता औऱ अन्य जागीरदारों नें मिलकर आतिफ़ कों रास्ते सें हटाने कां फैसला लिया थां औऱ क्याँ क्याँ गड़बड़ हुइ थि। भानु कों विश्वास नहि हुआ कि आतिफ़ याँ आतिफ़ कां भइयाऐसा कुछकर सकता हैं।
"तुम्हे अंदाजा भि नहि हैं कि आतिफ़ औऱ उसका भइयाकिस हद तक गिर सकते हैं। धंधा तौ मुबीर भइया भि करते हैं पऱ उन्होंने आजतक किसी अच्छे इंसान कों कभी नहि मारा। तुम्हे एक् औऱ बातपता होनी चाहिए" सेखु कां यह पहलाझूठ थां।
"वोँ क्याँ हैं बता, अब सभी जानना हैं मुझे" भानु कि दिलचस्पी बढ़ गई, थि।
"आतिफ़ मात्र जागीरदारों तक नहि रुकेगा, उनके परिवार कों भि मार डालेगा ताकि उसकाखौफ बनारहे" सेखु नें इसबार झूठ बोला क्युकि वोँ भानु केँ मन मे अपने परिवार केँ लिएडर पैदा करना चाहता थां। इतना सुनना थां कि भानु गुस्से सें खोलने लगा।
"उससे पहले मे हि उसे मिट्टी मे मिला दूंगा" भानु दहाड़ा जिससे दीवारें कांपने लगी परन्तु अभि तोँ सेखु नें जाल बिछाया हि नहि थां, अब बारी थि पासा फेंकने कि। उसतरफ भरत सिंह औऱ मुबीर केँ कानखडे होँ चुके थें। सेखु नें आगे बढ़कर भानु कों रोका
"रुको भानु, पहले मेरीबात सुनो."
"अब मुझेकुछ नहि सुनना, उस आतिफ़ कों मारे बगौर मुझे सुकून नहि मिलेगा, मे मेरे बाप कां बदला लूंगा, सालेछोड़ मुझे." भानु नें सेखु कों धक्का दिया जिससे वो गिर गय़ा औऱ भानु दरवाजा खोलने केँ लिएआगे बढ़ता हैं पऱ इससे पहले वो दरवाजा खोले सेखु नें अगलीचाल चलदी.
"औऱ तुम्हारी मां कां क्याँ होगा" अपनी मां कां जिक्र आते हि भानु केँ कदम जँहा थें वंहीरुक गए।
"क्याँ तुमने सोचा हैं कि आतिफ़ कों मारने केँ बाद तुम् उसजैल सें कभी निकल पाओगे याँ नहि? क्याँ तुमने यह सोचा हैं कि तुम् फिनकभी अपनी मम्मी सें मिल पाओगे याँ नहि?" भानु कां पारा औऱ ऊँचाचढ़ जाता हैं जब सेखुबार बार उसकी मां कां जिक्र करता हैं। वो फुर्ती सें उसकेपास आता हैं औऱ दोबारा उसकी गिरेबान पकड़ लेता हैं।
"गन्दी नाली केँ कीड़े, तूने फिरसे मेरी मम्मी कां नाम लिया तोँ तेरी यहींगाड़ दूंगा"
"मे बस इतना कहना चाहता हूं कि जरा सोचो, इस तरह आतिफ़ कों मारने सें तुम् भि नहि बच पाओगे, जिन पांच सालो कों जैल तुमने बड़ी मुश्किल सें काटे हैं वोँ फिरसे लम्बे होँ जाएंगे" भानु कां विवेक फिरसे जागा। उसे इसबात कि फ़िक्र तोँ अब नहि रही थि कि उसे आतिफ़ कों मारने केँ बाद फिरसे जैल कि सजा काटनी पड़ेगी क्युकि वो बदले कि आग मे जलरहा थां परन्तु उसकामन बारबार अपनी मां कों याद करनेलगा थां। उसेयाद आता हैं कि केसे उसकी मम्मी उससेछुप छुपकर रोया करती थि फ़ोन पर्र, कितना तरसरही होंगी वोँ अपने लाडले कों अपने सीने सें लगाने केँ लिए, क्याँ आतिफ़ कों मारने केँ बाद वो अपनी मां सें दूररह पायेगा? क्याँ वो कभी अपनी दादीमा औऱ बेहन कों देखे बगैररह पायेगा? नाँ जानेउसे कितनी बड़ी औऱ लम्बी सजा मिले। वो तोँ जैल मे अपनी जीवन गुज़ार लेगा पऱ क्याँ उसका परिवार उसके बिना जिंदगी बसरकर लेगा? क्याँ आतिफ़ कों इसतरह शरेआम मारने सें उसका भइया आदिल उसके परिवार कों उसकी सुरक्षा केँ बिनामार नहि देगा?
सेखु द्वारा चली गई, चाल सें भानुरुक गय़ा थां। उसकेहाथ ढीलेपड़ जाते हैं औऱ सेखु आजाद होँ जाता हैं। वो देखता हैं कि उसकीचाल कामयाब हौ गयीँ, हैं.
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