झिलमिल ओढ़नी – New Episode
1st पन्ना
उन खुरदरी दीवारों कों निहारते निहारते भानु कि आँखेसूज गयीँ, थि। कुछकुछ जगहों सें सीमेंट उतरने कि वजह सें इंटे दिखने लगी हैं। कहीकोई गाय कि आकृति बनतीदिख रही हैं तौ कंहीकोई झुरमुट पौधा। वहां शायद एक् स्त्री कि आकृति दिखरही हैं। अबजेल मे आसमान इतनी आसानी सें तौ नहि दीखता कि बदलो मे इन आकृतियों कों खोजा जाये तोँ क्यूं नां इन पुरानी दीवारों मे हि कोशिश करली जाये।
चारपाई कि व्यवस्था सरकार नें नहि कररखी हैं तोँ एक् कम्बल कों निचे बिछाकर सोना पड़ता हैं। मच्छर अबयार बन चुके हैं। पिने केँ पानी केँ मटके मे, जिसके तलवे पर्र काईजम चुकी हैं, पानी ठंडा रहता हैं। मटके कां साथी, एक् लोटा हमेसा संग रहता हैं। लोहार नें बनाया लगता हैं। बहोत तगड़े लोहे सें बना हैं याँ शायद सटील सें। नित्यक्रम मे भि यही लोटाकाम आता हैं औऱ पानी पिने मे भि।
अबजेल कां भि क्याँ बताये आप् लोगो कों। 5 साल हौ गए हैं अपने भानु कों यहा। 2 महीने कि सजा बाकीरही हैं उसकी। पऱ सालायह 2 महीने 5 साल सें लम्बे क्यूं लगरहे हैं। 'क्याँ मे पागल हौ रहा हूं याँ ऐसा सबकेसंग होता हैं यहा'।
भानु कि यही दिनचर्या रहती हैं इस चारदिवारी मे। अबरील तोँ देख नहि सकता नां, तोँ क्यूं नाँ इसघड़े, लोटे औऱ इस कम्बल केँ बारे मे हि 1000 बारसोच लिया जाये। नहि नहि, यह तीनो हि नहि, अपनी तंदरुस्ती पर्र ध्यान भि देता हैं अपना भानु। माना कि प्रोटीन कां श्रोत यहा नहि हैं पर्र सुना हैं दाल मे प्रोटीन होता हैं थोड़ा बहोत। पर्र सालीदाल तोँ ढूंढ़नी पड़ती हैं उस पानी मे। करें तौ क्याँ करे? पऱ जिस्म तौ थोड़ा बहोत बना हि हैं। ऐसे डोळे शोले थोड़ी नां थें जबयहा आया थां। एक् मरियल सां लड़का, बुरे कर्मो कां फलयही मिल गय़ा उसको। जज साहेब नें भि कोईदया नहि दिखाई, 'इस उम्र मे हि यहहाल हैं बेटा?'। मगरअब आँ गए तोँ आँ गए। डर तौ लगता नहि पर्र जैसे जैसेदिन गुजरना शुरुहुए, भानु कों अहसास हौ गय़ा कि सालायह तोँ गलतफस गय़ा मे। धीरे-धीरे धीरे-धीरे उदासी छानेलगी। 6 महीने सोचने कां मौका मिला तोँ उसेलगा कि ऐसे दुःखी रहने सें दिन तोँ नहि कटने वाले।
सरकार कि इतनी उदारता तौ हैं कि जौ पढ़ाई करना चाहते हैं उन्हें किताबे मिल जाती हैं। अपना भानु भि पढ़ता हैं पऱ इंसान कितनी हि देर तक पढ़ सकता हैं तौ कसरत भि करनी शुरु करदी। जब आपकेआस पासकोई ध्यान भंग करने वाली वस्तुए नाँ होँ, जैसेफोन, बाजार याँ तितलियाँ तौ अगर आप् एक् संवेदी प्राणी हैं तोँ स्वयं कों बेहतर बनाने मे लग जाते हैं। यहाजेल मे कुछगुट जरूर हैं जिन्होंने थोड़ा बहोत तंग किया भानु कों पऱ उसने जैसे तैसे अपना बचावकर हि लिया औऱ अबजेल सें बाहर् निकलने हि वाला हैं।
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2nd panna
"काहे तिलमिला रहा हैं बे? 2 महीने हि तौ हैं। निकल जायेंगे बहनचोद यह भि। जब 5 सालकाट लिए तौ अब क्याँ होँ गय़ा। " जेल मे आने केँ बादबने भानु केँ साथी बलदेव नें कहा।
"तूँ नां समझेगा भड़वे। जब मंजिल पास हौ नाँ, तब औऱ दूर लगने लगती हैं। कां हैं, कि फितरत हैं इंसान कि यह हरामजादी। "
साम केँ वक़्त केदियो कों जेल मे बने छोटे सें पार्क मे घूमने दिया जाता हैं। इन दोनों कि दिनचर्या मे यह शामिल हौ चूका थां कि साम हुयी औऱ दोनों यहाआकर गपसप मारते हैं।
"तेरीयाद तौ बहोत आएगी साले" बलदेव नें घास कि पत्ती कों उखाड़ते हुएकहा औऱ थोड़ा सां दुःखी होँ गय़ा।
"तुँ तोँ ऐसे दुःखी होँ रहा हैं जैसे मेरी घरवाली हौ" भानु नें बलदेव कि बगल मे ऊँगली मारते हुए मज़ाक किया।
"चुपकर साले। एक् तुँ हि तौ यारबना हैं यहा, तभी नाँ कहरहा हूं। "
"मुझेपता हैं मेरीजान। मुझे भि तेरी बहोत याद आएगी। तुँ चिंता नां कर। मे मिलने आऊंगा तुझसे। " भानु नें बलदेव केँ कंधे पर्र हाथ रखतेहुए कहा।
कुछ देरबात करने केँ बाद पहरेदारों नें कोठरी केँ भीतर जाने कां फरमान दे दिया। भानु औऱ बलदेव जैसे केदियो कों 'एक् कोठरी मे एक् केदी' कां नियम थां। कोठरी मे पहुंचकर भानु नें कसरत करनी शुरुआत करदी। उसकेबाद सभी खानां खाते औऱ सो जाते। चुंकि कुछ करने कों थां नहि तोँ भानु कों जल्द सोने कि आदत थि। फिन सुभह 5 बजे सबकोजगा दिया जाता। हर केदी केँ हिस्से कोई नां कोईकाम थां। भानु कां काम थां सुभह उठके अपने आसपास कि 10 कोठरी तक सफाई करना औऱ उसकेबाद सनानागार साफ करना। सफाई कां काम जौ केदी करता उसको पुरेदिन कोई औऱ काम नहि दिया जाता। इसीलिए भानु नें कोई औऱ काम नां चुनकर सफाई कां काम चुना।
आज सप्ताह कां मध्य थां तौ हर केदी अपने घरवालों सें बातकर रहा थां। पिछले हफ्ते भानु अपने घरवालों सें मिला थां आमने सामने, पऱ इसबार केवलबात हि करने दि जाएगी। शामू केँ परिवार मे उसकी दादीमा जोँ अब बूढ़ी होँ गई, हैं, उसके बापू जौ एक् जागीरदार हैं, उसकाबड़ा भइया जौ विदेश मे रहता हैं, उसकेसंग उसकी पत्नि औऱ एक् बेटा भि रहता हैं। भानु कि बेहन जिसका ब्याह हौ चूका हैं। अंत मे भानु कि मां, जौ उसकेदिल केँ सबसेपास हैं।
मां कां हाल बुरा रहता हैं। बड़ा बेटा जिसने अपने मम्मी बाप कि एक् नां सुनी औऱ विदेश बस गय़ा, जब उनका दूसरा बेटा जेल कि हवाखा रहा होँ तौ उनपर क्याँ बीतरही होती हैं यहबस ईश्वर हि जानता हैं। मम्मी कि आँखों कां तारा हैं बेटा। बाप कों उतनी फुर्सत नहि रहती तोँ पिछले हफ्ते मां हि मिलने आयी थि भानु सें।
सुषमा नाम हैं भानु कि मां कां। जब ब्याह केँ आयी थि अपने ससुराल, तब बाली उम्र थि उसकी। देखते हि देखते 3 बच्चे हौ गए औऱ जिंदगी अपनी पटरी पर्र रफ़्तार पकड़ने लगा। सासू माँ केँ संगखूब बनती हैं सुषमा कि। कभी पलटकर जवाब नाँ देने कि आदत जौ थि उसे। भानु कि तरह ऊँचे हाइट औऱ भारी भरकम काया कि मालकिन सुषमा जबबड़े सें घऱ मे पायल छनकाते हुए चलती तोँ पता लगता किसी ऊँचे घरबार सें हैं। काम चाहे कितना भि होँ, कभी नां थकने कां गुण सुषमा कों विरासत मे मिला हैं। उसकेगोल चेहरे पऱ हमेसा एक् मुस्कान रहती हैं जोँ भानु केँ जेल जाने केँ बाद थोड़ीकम जरूर होँ गई, हैं। उसेपता हैं कि उसके बेटे नें जुर्म किया हैं औऱ उसकीसजा भुगतनी अनिवार्य हैं पऱ मम्मी तोँ मम्मी होती हैं। कभी कभाररो लेती हैं पर्र जब हफ्ते मे किसीदिन बात होँ जाती हैं याँ मिलना होँ जाता हैं तौ उसेयाद रहता हैं कि बेटे केँ सामने आंसूआने पर्र बेटे कां हौसला टूट जायेगा। इसलिये खुदको संभाल करबात करती हैं। पिछले हफ्ते ज़ब मिलने आयी थि तौ उसकामन किया कि लोहे कि उस जाली कों फाड़कर अपने कलेजे केँ टुकड़े कों अपनी बांहो मे लेले। उसका चेहरा चूमे औऱ भाग जायेउसे अपनेसंग लेकेइस दुनिया सें दूर। ऐसा हि हाल भानु कां भि थां। अपनी प्यारी सि मम्मी कां मुखड़ा देखकर उसका सीना पसीज उठता औऱ वोँ अपने कियेहुए कर्मो केँ पछतावे सें भर उठता। अपना माथा पिटता औऱ स्वयं कों गालियां देता।
भानु कां बाप खुदगर्ज नहि हैं पर्र वोँ करे भि तौ क्याँ करे? व्यापार औऱ खेती कां काम इतनाबड़ा हैं कि संभाले नहि संभलता। इसलिये, कम हि बात होँ पाती हैं बेटे सें। घऱ मे एक् नौकरानी हैं जोँ घऱ कां 70 फीसदी काम करती हैं। 30 फीसदी सुषमा केँ हिस्से आता हैं। किसी औऱ कां बनाया हुआ खानां सुषमा कों मनपसंद नहि आता इसलिये स्वयं बनाती हैं। घऱ मे बस दोनों सासू बहु हि रहती हैं। नौकरानी सुभह औऱ साम कों आती हैं, अपनाकाम करती हैं औऱ चली जाती हैं।
आज बेटे सें बात होनी हैं तोँ सुषमा खिली खिलीघूम रही हैं। खानां इतनेमन सें बनाया हैं जैसे उसका लाडला घऱआकर खायेगा। दादीमा अपनी चारपाई पऱ बैठी मालाजप रही हैं। पताउसे भि हैं कि आज पोते कां फ़ोन आएगा। सूरज अपनेचरम पर्र हैं, शर्दीयां आने वाली हैं पऱ अभि भि अच्छी धुप खिलतीं हैं। आसमान कां ताराइस परिवार कों देखकर गुस्से मे तपरहा हैं याँ शायदउसे भि दुख होँ रहा हैं।
झिलमिल ओढ़नी – New Episode
3rd पन्ना
"तेरी बहोत यादआती हैं रे। अबजब तूँ जल्द हि आने वाला हैं तौ इंतज़ार औऱ भि मुश्किल होँ गय़ा हैं" सुषमा कि आँखेनम थि पऱ आवाज़ कों तोड़ मरोड़ दिया गय़ा थां ताकि भानु कों अहसास नाँ हौ कि उसकी मां रोरही हैं।
"मुझे भि तेरी बहोत यादआती हैं मां। तेरेहाथ सें खायेहुए अरसा हौ गय़ा। दादीमा केसी हैं?" भानु थोड़ा भावुक थां।
"तेरी दादीमा भि तेरीआस लगाए बैठी हैं लल्ला, चलना तौ हौ नहि पाता, इसलिये माला जपति रहती हैं। " दादीमा कों सुनाई कम देता हैं फिन भि उसे अहसास होँ जाता हैं कि उसकीबात होँ रही हैं।
"तूँ ठीक तोँ हैं नां मां?" भानु कों सुषमा केँ सुबकने कि थोड़ी सि आवाज़आयी, "तूँ रोरही हैं नाँ?"
"हट, मे क्यूं रोनेलगी, मेरे जिगर कां टुकड़ा जल्द हि मेरेपास होगा। इसबार तुम्हारी तरफकही जाने नहि दूंगी। तेरेउन मुये दोस्तों केँ पास तोँ बिलकुल नहि। तुम्हे फसाकर स्वयं आजादघूम रहे हैं। "
"मे स्वयं तुझसे दूर नहि जाउगा इसबार। अच्छा बता, पिताजी केसे हैं? कारोबार केसा हैं?"
"सभी बढ़िया हैं लल्ला। एक् तेरी हि कमी हैं। उनको वक्त कि कमी हमेसा रहती हि हैं। मेरेलिए भि नहि हैं तोँ तुझसे क्याँ बात करेंगे "
"छोड़ नां मम्मी, जबघऱ आऊंगा तब धीरे-धीरे बात करेंगे इस बारे मे। औऱ बता, दिदी केसी हैं?"
"वोँ भि ठीक हैं, दामाद जी कि शराब कि आदतबढ़ गयीँ, हैं तौ थोड़ा परेशान रहती हैं "
"बढ़ गई, हैं? उनको दवाई सुरु करवाई तोँ थि "
"कुछ नाँ होता दवाई सें लल्ला। वोँ सभीछोड़, तूँ अपना ध्यान रख, यहा कि चिंता आकरकर लेना "
"ठीक हैं मम्मी, वक़्त होँ गय़ा हैं, मुझे जानां होगा। अगले हफ्ते भि इसी टाइम करुँगा फ़ोन " पहरेदारों नें वक़्त सीमा कि आवाज़ लगा दि थि।
"ठीक हैं लल्ला, फिन सें कहरही हूं तुँ ध्यान रखना अपना "
औऱ फ़ोनकट जाता हैं।
"केसा हैं मेरा भानु?" दादीमा नें पूछा।
"ठीक हैं अम्मा, अब 2 महीने कि हि तोँ बात हैं। जल्द हि घऱ आँ जायेगा अपना लल्ला। "
दादीमा समाचार सें संतुष्ट होकरफिन माला जपने मे व्यस्त हौ जाती हैं। सुषमा कि उदासी बात करके थोड़ीकम होँ गई, थि। वो भानु केँ कमरे मे जाती हैं औऱ उसकी अलमारी खोलती हैं। जबसजा केँ 5 महीने बाकिरहे थें तबसे सुषमा नें अपने लल्ला केँ लिए खरीददारी करनी शुरुआत करदी थि। ढेर सारे कपडे लेकर उसने भानु कि अलमारी भरदी थि। ऐसालग रहा थां जैसे उसकेबड़े स्वागत कि तैयारी कररही थि।
बीचबीच मे जब उसकामन होता तोँ भानु केँ कमरे मे आकर उसकेलिए ख़रीदा हुआ सामान देख लेती औऱ खुश हौ जाती। जब इंसान किसी अपने कि राहदेख रहा होता हैं तोँ उसकाइस तरह कां बर्ताव लाजमी होता हैं। औऱ भानु तोँ उसकेलिए उसकीजान थां। उसकारूम ऐसेसजा रहता थां जैसेकोई महाराज हौ। नौकरानी कों निर्देश थें कि वो भानु केँ कमरे मे प्रवेश नां करे।
कपड़ो कि एक् एक् तहसही करके सुषमा अपने कमरे मे जाती हैं औऱ सफाई केँ काम मे लग जाती हैं। इधरजेल मे भानु अपनी पुस्तक पढ़रहा थां जिसमे आदमी कि मानसिकता केँ बारे मे अलगअलग विचार भरेहुए थें। इन 5 सालो मे भानु नें ऐसेऐसे विषयो पर्र सेंकड़ो किताबे पढ़ डाली थि। उसका विवेक इतना तीव्र हौ गय़ा थां जैसे किसी देवता कां होता हैं। कभीकभी वो घंटो तक पठन करता रहता, उसे वक़्त कां भान नहि रहता पऱ इसी दिनचर्या कि बदौलत उसने इतना लम्बा वक्तकाट लिया थां।
जेल केँ कई कर्मचारी उसके स्वाभाव सें ख़ुश थें। वो कभी किसी केँ संग झगड़ा नहि करता थां। जेल मे सबसे अधिक रोबदार गुंडे आतिफ़ कां पैरजब एक् बार टुटा, तोँ भानु नें हि भागकर उसका इलाज किया। आतिफ़ केँ डर केँ कारणकोई उसकेपास नहि आया पऱ भानु कि हिम्मत देखकर आतिफ़ बहोत खुशहुआ औऱ उसनेउसे जुबान दि कि जिंदगी मे जबकभी जरूरत पड़े, एक् बार जरूरयाद करे। आतिफ़ द्वारा बोलेगए शब्दो कां इतनाअसर हुआ कि भानु केँ संगउस जेल मे कोई भि पन्गा नहि लेता। पऱ भानु कों इनसभी सें वैसे भि कोई मतलब नहि थां। वो बस अपनीधुन मे रहना पसन्द करता थां।
जेल केँ माहौल मे आप् खुद कि कीमत पहचान जाते हैं, ऐसा हि कुछ भानु केँ संगहुआ। आजादी कां क्याँ मूल्य होता हैं उसेपता चल चूका थां। उसने जिंदगी मे कभी किसीगलत रास्ता पऱ नां चलने कि शपथखा ली थि। अपने बाप सें ज़्यादा जल्द अमीर बनने कि चाहत मे उसके द्वारा उठाये गएकदम उसे एहसास दिलारहे थें कि हर एक् चीज कां एक् निश्चित वक़्त औऱ एक् निश्चित गति होती हैं। इंसान महज एक् खिलौना हैं जोँ हरबार अपनेमन कि नहि कर सकता।
अपनी प्यारी मम्मी सें इसतरह दूर रहना औऱ अपनों कि छत्र छाया सें पराया होँ जानां उसे हमेसा खटकता थां। पऱ अब पछताने सें कुछ नहि होने वाला। जौ होना थां हौ गय़ा। अब मायने रखता थां उसका बदलना औऱ आने वालेकल कों हसीन बनाना।
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