JANNAT tairi BAHON (TANGO) main – New Episode
Part -2
खुशी मित्तल औऱ सविता ग्रोवर कि उलझन
उधर, खुशी मित्तल, जोँ एक् बड़ी कंपनी केँ मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) हें, अपने ऑफिस मे थें। वो एक् गंभीर औऱ प्रतिष्ठित शख्स हें, मगर अपनी पत्नि श्वेता केँ जाने केँ बाद वो भावनात्मक रूप सें काफ़ी अकेले पड़गए थें। उनके ऑफिस मे उनकी रीजनल hour हेड, सविता ग्रोवर, आई। सविता एक् तेज़-तर्रार, आकर्षक औऱ बहोत हि काबिल पेशेवर औरतथीं।
सविता नें द्वार (दरवाज़ा) बंद किया औऱ अंदरआते हि एक् ख़ास, अनकहा तनाव कमरे मे फैल गय़ा।
सविता (फाइल टेबल पऱ रखतेहुए): "सर, हमने उत्तरी क्षेत्र (Northern Region) केँ लिएनई भर्ती कि प्रक्रिया पूरीकर ली हैं। आपके कहने पऱ मैंने सारेचेक स्वयं किए हें। "
खुशीजी नें सिर हिलाया, "शुक्रिया, सविता। मे जानता हूं, तुम् हमेशा चीज़ों कों त्रुटिहीन रखती हौ। "
बातें जल्द हि ऑफिस केँ काम सें हटकर निजी बातों कि ओर मुड़गईं। खुशीजी कों श्वेता कि याद सताती थि, औऱ इस भावनात्मक रिक्ति (emotional vacuum) कों भरने केँ लिए वो सविता केँ संग एक् अनूठा नाता रखते थें। ये नाता उनकी शारीरिक ज़रूरतों पऱ आधारित थां, जिसमें सविता उन्हें मात्र हैंड नौकरी तक हि सीमित रखती थि। खुशीजी इस रिश्ते मे भावनात्मक जुड़ाव औऱ श्वेता जी कि अनुपस्थिति कों महसूस करते थें।
मजाजी नें थोडा झिझकते हुएकहा, "सविता, मुझेपता हैं कि मे तुम्हारे काम केँ बदले मे तुम्हें ज्यादा तवज्जो देता हूं। तुम्हारी हाल कि तरक्की."
सविता नें उन्हें बीच मे हि काट दिया। उसकी आवाज़ मे एक् सख़्त आत्म-सम्मान थां।
सविता: "सर, मेरी तरक्की इसलिये हुइ हैं क्योंकि मे काबिल हूं। मे बाज़ार केँ रुझानों कों आपसे बेहतर समझती हूं औऱ मैंने पिछले तीन वर्षों मे रीजनल उत्पादकता (regional productivity) मे $20\%$ कि वृद्धि कि हैं। मे येसभी इसलिये नहि करती कि मे आपकी दिवंगत पत्नि श्वेता कि साथी कि बेहन हूं, औऱ आपको भावनात्मक सहारे कि ज़रूरत हैं। मे ये इसलिये करती हूं क्योंकि मेराकाम हि मेरी पहचान हैं। "
ये सुनकर मजाजी कुछ लम्हा केँ लिएचुप हौ गए।
सविता (थोडा नरम होकर): "श्वेता मेरी बेहन कि सबसे अच्छी यार थि, औऱ मे जानती हूं कि आप् कैसा महसूस करते हें। मे आपकोयहा 'हेल्प' अवश्य कर सकती हूं, क्योंकि आप् उस तनाव सें बाहर् निकल सकें जोँ आप् पर्र बीता हैं, मगर अपनी तरक्की केँ लिए मुझे किसी कि 'हेल्प' कि ज़रूरत नहि हैं। मे अपनी स्थान अपनी मेहनत सें बनाती हूं। "
सविता केँ यह शब्दमजा जी कों ये एहसास दिलाते थें कि वो एक् कमज़ोर भावनात्मक पलों मे हें, जबकि सविता एक् मज़बूत पेशेवर हैं। वो दोनों एक् जटिलडोर सें बंधे थें: भावनात्मक सहारा, शारीरिक ज़रूरत, औऱ श्वेता केँ नाम पऱ एक् अनकहा कर्ज़।
सविता कां पति विनोद ग्रोवर भि शहर कि एक् दूसरी बड़ी कंपनी मे मैनेजर थां, औऱ वो अपने रिश्ते कि प्रकृति कों लेकर काफ़ी सतर्क रहती थि। उसकाकाम औऱ व्यक्तिगत सम्मान उसकेलिए सबसेऊपर थां, यहा तक कि मजा मित्तल जैसे शक्तिशाली आदमी केँ सामने भि।
खुशी औऱ सविता: एकतरफ़ा चाहत औऱ बेरुख़ी कां नाता
ऑफिस मे बढ़ती बेचैनी
अगले सप्ताह, मजा मित्तल औऱ सविता ग्रोवर केँ बीच कां अजीब नाता औऱ भि ज्यादा तनावपूर्ण होँ गय़ा थां। खुशीजी कों श्वेता केँ जाने केँ बादजिस भावनात्मक औऱ शारीरिक नज़दीकी कि तलाश थि, वो सविता मे मिल तोँ रही थि, मगर वो हमेशा एक् लक्ष्मण रेखा खींच देती थि। एक् शुक्रवार कि साम, ऑफिस मे करीब ख़ामोशी थि। मजाजी नें सविता कों अपने केबिन मे बुलाया। उन्होंने अपनी कुर्सी घुमाई औऱ खिड़की सें बाहर् देखती साम कि धुंध कों निहारने लगे।
खुशीजी (दबी हुई आवाज़ मे): "सविता। पिछले कुछ महीनों सें। तुम् मेरी सिर्फ़ एक् मित्र याँ hour हेड नहि हौ। मे। मे तुम्हारी तरफ़ आकर्षित महसूस करता हूं। तुम् मेरी ज़िंदगी मे एक् रौशनी कि तरहआई होँ। "
सविता (शांत, मगर सख़्त लहजे मे): "सर, मे आपकी भावनाओं कि कद्र करती हूं। आप् अकेले हें, औऱ मे समझती हूं। मगर जैसा मैंने पहलेकहा, हमारे रिश्ते कि एक् सीमा हैं। "
मजाजी नें अपनी कुर्सी घुमाकर उसकीओर देखा। उनकी आँखों मे उदासी औऱ बेताबी साफ़दिख रही थि। "मुझेये सीमासमझ नहि आती, सविता। तुम् मुझे हैंड नौकरी तक सीमित क्यूं रखती होँ? जब हम् इतने लगभग आँ जाते हें, तोँ मुझे लगता हैं कि तुम् भि। तुम् भि आगे बढ़ना चाहती हौ। मे तुमसे चुदाई (choot marna) करना चाहता हूं, सविता। "
सविता नें अपनी भौहें चढ़ाईं। उसकी पेशेवर मुखौटा (professional mask) टूट गय़ा, मगर उसने जल्दी ख़ुद कों संभाला।
सविता: "आप् मेरी क्षमताओं औऱ मेरी इज़्ज़त कों एक् बारफिन कमआँक रहे हें, खुशीजी। मैंने जोँ कुछ किया हैं, वो सिर्फ़ इसलिये कि मे आपको भावनात्मक रूप सें स्थिर देख्ना चाहती हूं, क्योंकि आप् मेरी बेहन कि सहेली केँ पति हें। मे आपके निजीकाम आती हूं, मगर इसका मतलबये नहि कि मे आपकीहर ज़रूरत पूरी करने केँ लिए बाध्य हूं। "
खुशीजी नें बेचैन होकरमेज पऱ हाथ मारा। "मगर एक् बार। एक् बार तुमने मुझेलिप किस किया थां! वो क्याँ थां? क्याँ वो भि महज़ एक् 'भावनात्मक सहारा' थां?"
एहसान कां बोझ
सविता नें धीरे-धीरे सें सिर हिलाया। "हाँ, वो एक् बारहुआ थां। औऱ मे आपकोबता दूँ, वो मैंने इसलिये किया थां ताकि आप् उससमय कां भावनात्मक बोझकम कर सकें जौ आप् पऱ बीता थां। उस एक् किस केँ बाद आपने मुझसे हफ़्तों बात नहि कि थि, आप् शर्मिंदा थें। औऱ हाँ, उस पर्र मे एहसान भि जताती हूं। "उसने सीधे खुशीजी कि आँखों मे देखते हुएकहा।
सविता: "खुशीजी, मुझेकोई ज़रूरत नहि हैं कि मे अपनी तरक्की याँ अपनी सुरक्षा केँ लिए आपकेसंग शारीरिक रूप सें औऱ आगे जाऊँ। मे सक्षम हूं। मे जानती हूं कि आप् मेरी सुंदरता औऱ मेरी नज़दीकी सें तड़पते हें, औऱ मे आपकोये तड़प इसलिये देती हूं ताकि आप् ज़मीन पर्र रहें। मे आपकोहर समयये एहसास कराती हूं कि मे यहा हूं, मगर सिर्फ़ अपनी मर्ज़ी सें। "
मजाजी केँ चेहरे पऱ लाचारी कां भाव आँ गय़ा। वो जानते थें कि सविता सहीकह रही हैं। वो सचमुच बेचैनी रहे थें — उसकी नज़दीकी उन्हें भावनात्मक शांति देती थि, मगर उसकी लगाई सीमाएं उन्हें औऱ भि ज्यादा बेचैन कर देतीथीं। वो चाहते थें कि ये नाता पूरीतरह सें शारीरिक होँ जाए, ताकि उनकी तन्हाई मिटजाए, पऱ सविता उन्हें बस किनारे पऱ रखती थि।
सविता खड़ी हुईँ। "सर, मे जारही हूं। अगले सप्ताह आपकेलिए एक् नया समझौता (new contract) सजधजकर हैं, जिसमें आपका कमीशन बढ़ाया गय़ा हैं। मैंने ये किया हैं, क्योंकि आप् इसके काबिल हें। नं कि इसलिये कि आपने मुझसे औऱ कुछ करने कि उम्मीद रखी थि। "
ये कहकर, सविता बिना किसी भावना कों दर्शाए कमरे सें बाहर् निकल गई।
खुशीजी अपनी कुर्सी पर्र बैठगए। उन्हें महसूस हुआ कि वो इसऔरत केँ हाथों मे पूरीतरह सें बेचैनी रहे हें। वो उसे अपनी पत्नि कि तरह चाहते थें, पऱ वो उन्हें बस एक् मजबूर क्लाइंट कि तरहडील कररही थि, जिसे वो 'हेल्प' कररही थि, मगर अपनी शर्तों पर्र।
उनकादिल दर्द सें भरा थां, उन्हें मालूम थां कि वो जोँ चाहते थें, वो कभी नहि मिलेगा। उनकीये एकतरफ़ा चाहत उन्हें दिन-ब-दिन औऱ भि अकेला महसूस करारही थि।
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Part -3
पिछले पाँच सालों सें, खुशी मित्तल कि ज़िंदगी एक् अजीब भावनात्मक औऱ शारीरिक सूखे सें गुज़र रही थि। अपनी पत्नि श्वेता केँ जाने केँ बाद, वो अंदर सें बुरीतरह टूटगए थें। काम औऱ बच्चों कि देखरेख नें उन्हें व्यस्त रखा थां, मगरबैड कि हररात औऱ दिन कां हर एकांत लम्हा उन्हें श्वेता कि कमी औऱ अपनी शारीरिक बेचैनी कां एहसास कराता थां।
सविता ग्रोवर कां उनकी ज़िंदगी मे आनांइस तड़प कों कम करने केँ बजाय औऱ बढ़ा गय़ा थां। सविता उन्हें भावनात्मक सहारे केँ नाम पर्र नज़दीकी देती थि, मगर उनकी सीमाओं नें मजा कों हमेशा किनारे पर्र रखा। वो जौ अंतरंगता (बुर मारने कि चाहत) चाहते थें, वो उन्हें कभी नहि मिली। वो सविता केँ दिएहुए 'एहसान' केँ एक् लिपकिस औऱ 'हैंड नौकरी' केँ बीच फँसकर रहगए थें, जहाँ उन्हें सिर्फ़ तड़पाया जारहा थां।
साथी कां प्रस्ताव
एक् साम, मजा जी अपने सबसे पुराने यार औऱ अपनी कंपनी केँ चेयरमैन, दीपक कोहली केँ संग एक् एक्सक्लूसिव क्लब मे डिनरकर रहे थें। दीपक, जोँ मजा कि स्थिति सें भली-भाँति परिचित थां, उसेकुछ ज्यादा हि शांत औऱ बुझाहुआ महसूस कररहा थां।
दीपक नें अपना ग्लास नीचेरखा औऱ गंभीरता सें मजा कि ओर देखा। दीपक:"मजा, हम् बचपन केँ साथी हें। मे तुम्हें ऐसे औऱ नहि देख सकता। तुम् अंदर सें मररहे हौ। तुम् इतने बड़े MD होँ, करोड़ों कां बिज़नेस संभालते हौ, पऱ अपनी निजी ज़िंदगी मे ख़ुद कों सज़ादे रहे होँ। "
खुशीजी नें धीमी आवाज़ मे कहा, "ये सज़ा नहि हैं, दीपक। ये। श्वेता केँ प्रति मेरा सम्मान हैं। "
दीपकहँस पड़ा, थोड़ी झुंझलाहट केँ संग। दीपक: "सम्मान! पांचसाल हौ गए, दोस्त! श्वेता स्वर्ग मे तुम्हारी ख़ुशी चाहती होगी। औऱ ये सविता क्याँ कररही हैं? वो तुम्हें 'ज़रूरत' केँ नाम पऱ बस बेवकूफ़ बनारही हैं! वो तुम्हें भावनात्मक रूप सें ब्लैकमेल कररही हैं, औऱ तुम् एक् हैंड नौकरी केँ लिए उसके एहसानों कां बोझढो रहे हौ। ये सरासर ग़लत हैं!"
दीपक नें चारों तरफ़ देखा, फिन अपनी आवाज़ धीमी करतेहुए कहा: दीपक: "देखो, मैंने आजरात तुम्हारे लिए इंतज़ाम कर दिया हैं। शहर मे एक् नया बुटीक अपार्टमेंट खुला हैं, जहाँ बहोत हि उच्च श्रेणी कि एस्कॉर्ट्स (Escorts) हें। कोई 'नॉर्मल' नहि, यह हाई-प्रोफ़ाइल, पढ़ी-लिखी औऱ समझदार लड़कियाँ होती हें। तुम्हारी पहचान ज़ाहिर नहि होगी। "
खुशीजी कां चेहरा फीकापड़ गय़ा। उन्होंने अचानक अपनी प्लेट सें नज़रें हटालीं।
मजाजी (झटके सें): "नहि, दीपक। मे। मे ये नहि कर सकता। "
दीपक: "क्यूं नहि कर सकते? तुम्हें बुर कि ज़रूरत हैं, मजा!ये कोईपाप नहि हैं। तुम् पुरुष हौ! तुम्हारी ज़रूरतें हें। औऱ अगर तुम्हारी सविता जैसी 'आधुनिक देवी' तुम्हारी इस ज़रूरत कों पूरा नहि कररही, तोँ इसे पैसे देकर पूरा करने मे क्याँ हर्ज हैं? वे पेशेवर हें, कोई ड्रामा नहि, कोई भावनात्मक एहसान नहि। "
खुशी कां इनकार
मजा मित्तल उठे, उनकेहाथ मेज केँ नीचे काँपरहे थें। उनकी आवाज़ मे दुख औऱ दृढ़ता कां अजीब मिश्रण थां। खुशीजी: "तुम् सहीकह रहे हौ, दीपक। मुझे ज़बरदस्त उतावलापन हैं। पिछले पाँचसाल एक्-एक् दिन करके काटे हें। सविता नें जोँ कुछ किया, उसने मुझे तड़पाया अवश्य, पऱ उसनेकभी मुझे इतना नीचे नहि गिरने दिया। "
वो रुके, लंबी साँसली।
मजाजी: "श्वेता मेरी पत्नि थि, दीपक। वो मेरी प्रेमिका थि। मे किसी भि रिश्ते कों उसकेनाम औऱ सम्मान सें ऊपर नहि रखता। मे ये नहि कहरहा कि मे कभी किसी औऱ सें प्रेम नहि करूँगा, मगर मे पैसे देकर एक् एस्कॉर्ट केँ संग अपनी शारीरिक ज़रूरत पूरी नहि कर सकता। "
उनकी आँखों मे एक् अजीब सि लाचारी औऱ उदासी थि।
खुशीजी: "मे एक् रात केँ लिए। सिर्फ़ अपनी शारीरिक उतावलापन मिटाने केँ लिए। अपने आप् कों औऱ श्वेता केँ सम्मान कों किसीऐसी स्त्री केँ सामने बेचना नहि चाहता, जिसके संगकोई भावनात्मक नाता नहि हैं। सविता मुझे तड़पाती हैं, मगर उसके अंदर भि एक् सम्मान हैं, जिसे वो बेचती नहि हैं। औऱ यहीवजह हैं कि मे उसे छोड़ नहि पाता। "
दीपक नें निराशा मे सिर हिलाया। दीपक: "तुम् बहोत जटिल होँ, मजा। बहोत जटिल। "
मजा जी नें अपनाकोट उठाया। "शायद हूं। पर्र मे अपने बच्चों कि आँखों मे गिरना नहि चाहता। मेरी बेटी अनु। वो मां केँ जाने केँ बादघऱ औऱ संस्कारों कों एक् सख़्त रस्सी सें बाँधे हुए हैं। अगरउसे पताचला कि मे एस्कॉर्ट्स केँ पासजा रहा हूं, तौ वो टूट जाएगी। "
"तुमने जोँ ऑफ़र किया, उसकेलिए शुक्रिया, दीपक। पर्र मे अपनी प्यास केँ संग जीनासीख लूँगा। किसी पेशेवर स्त्री केँ हाथों कि कठपुतली बनने सें बेहतर हैं कि मे अपनी तन्हाई मे तड़पूँ। "
वो तेज़ी सें क्लब सें बाहर् निकलगए, अपनी 'उतावलापन' औऱ 'सम्मान' केँ बोझ कों एक् बारफिन अपने कंधे पर्र लादकर। उनकी गाड़ी शहर कि सन्नाटे भरी सड़कों पऱ दौड़रही थि, मगर उनकी आत्मा मे हंगामा औऱ बेचैनी भरी थि।
घऱ कां युद्धक्षेत्र: मानिक-दिव्या कि तकरार औऱ अनु कि बेचैनी
मित्तल परिवार कां घऱ बाहर् सें जितना संभ्रांत (Sophisticated) दिखता थां, अंदर सें उतना हि तनाव औऱ खींचतान सें भराहुआ थां। इसका मुख्य कारण थां मानिक औऱ दिव्या केँ बीच कां कभी न् खत्म होने वाला टकराव। दिव्या कि आँखों मे मानिक केँ लिए जोँ नफ़रत थि — लड़के होने केँ कारण मिली 'एक्स्ट्रा' तवज्जो कों लेकर उपजा असंतोष — वो हर छोटीबात पर्र भड़क उठती थि।
भइया-बेहन कि जंग
आज सुभह कां माहौल भि कुछअलग नहि थां। मानिक CA कि पढ़ाई केँ लिए अपनी नोट्स बुक कों ढूंढरहा थां, जौ उसे नहि मिली। मानिक (चिल्लाते हुए): "दिव्या! मेरी अकाउंट्स कि फ़ाइल कहां रखी हैं? तुम् जानती होँ नं कि कल मेरा टेस्ट हैं!"
दिव्या, जौ अपने कमरे मे बैठकर डॉक्टरी कि मोटी किताबें पढ़रही थि, जल्दी तल्ख़ होकर बाहर् आई।
दिव्या (तेज़ आवाज़ मे): "ज़रा ऊँची आवाज़ मे बातमत करना, मानिक! औऱ मुझे क्याँ पता तेरी फ़ाइल कहां हैं? क्याँ मे तेरी निजी असिस्टेंट हूं? याँ तेरी देखभाल करने वाली नौकरानी?"
मानिक: "ओह!यह हि तोँ प्रॉब्लम हैं। तुम् हमेशा एक् मरीज़ जैसी शक्ल बनाकर बैठी रहती हौ। क्याँ फ़र्क पड़ता हैं अगर मे तुमसे पूछलूँ? तुम्हें तौ वैसे भि पिताजी सें अधिक तवज्जो मिलती हैं, थोडा काम तौ कर लियाकर। "
दिव्या (गुस्से सें लाल):"बस यहींरुक जा! मुझे ज्यादा तवज्जो मिलती हैं? हाँ?ये मतभूल कि तुम्हारी $50, 000$ कि कोचिंग फ़ीस पिताजी नें बिना पूछेभर दि थि, जबकि मेरे NEET केँ ट्यूशन केँ लिए मुझेहर बार लड़ना पड़ता हैं! तुम् घऱ केँ 'हीरो' हौ, इसलिये तुम् कुछ भि कह सकते होँ। "
मानिक (ताने मारते हुए): "औऱ तुम्! तुम् घऱ कि 'शहीद' हौ। हमेशा यह साबित करने कि कोशिश करती रहती हौ कि तुम् कितनी मेहनत करती होँ। जाकर पढ़ो, डॉक्टर साहिबा! शायद उससे तुम्हारा स्वभाव थोडा ठीक हौ जाए। "
तभी, सबसे छोटीपरी (18) बीच मे आई। वो हमेशा अपने भइया कां पक्ष लेती थि, क्योंकि मानिक उसकेलिए बाहर् सें चॉकलेट औऱ उसकी पसन्द कि चीज़ें लाता थां, औऱ वो उसे 'प्यारा भइया' मानती थि।
परी (दिव्या कों चिढ़ाते हुए): "दिदी, क्यूं मानिक भैया सें रोज़ लड़ती हौ? वो तोँ बसपूछ हि रहे थें। तुम् हि हमेशा हरबात कों इतना बढ़ा देती हौ। "
दिव्या कां ग़ुस्सा अबपरी पर्र भि उतरआया। दिव्या कों हमेशा लगता थां कि परी मानिक कि तरफ़दारी इसलिये करती हैं क्योंकि उसे मानिक सें छोटे-मोटे फ़ायदे मिलते हें।
दिव्या (परी कों घूरते हुए): "तुम् बीच मे मतकहो, परी! तुम् हमेशा अपने प्यारे भैया कां पक्ष लोगी हि, क्योंकि वो तुम्हें हर दूसरे दिन महंगे गैजेट्स लाकर देता हैं। तुम् भि उसी कि तरह हौ — सिर्फ़ फ़ायदा देखती हौ। तुम् तीनों केँ कारण हि इसघऱ मे शांति नहि हैं। "
परी कि आँखें भरआईं। मानिक नें जल्दी परी कां हाथ पकड़ लिया।
मानिक: "अब बहोत हौ गय़ा, दिव्या! परी कों कुछमत कहना। अगर तुम्हें कोई प्रॉब्लम हैं, तौ मुझसे बातकरो। तुम् ख़ुद कों इतनी गंभीर बनाकर क्यूं रखती होँ कि तुम् किसी कों भि मनपसंद नहि करती?"
अनु कि बढ़ती बेचैनी
ये सारा हंगामा औऱ ड्रामा घऱ कि सबसे बड़ी बेटी अनु (25) केँ लिए रोज़ाना कां सिरदर्द बन गय़ा थां। अनु अपने ऑफिस 'विवाह कि डोली' केँ तनाव औऱ घऱ केँ नियमों कों लेकर पहले सें हि सख़्त थि। इन झगड़ों सें वो औऱ भि अधिक परेशान औऱ खींची-खींची रहती थि। अनु अपने कमरे सें तेज़ी सें बाहर् आई, उसके चेहरे पर्र गहरी झुंझलाहट थि।
अनु (ज़ोर सें): "बस! क्याँ होँ रहा हैं येसभी? येघऱ हैं याँ मछली बाज़ार? तुम् तीनों कों ज़रा भि लिहाज़ नहि हैं कि पिताजी ऑफिसजा रहे हें, औऱ घऱ मे कोई शांति होनी चाहिए?"
उसकी सख़्त आवाज़ सुनकर तीनों एक् समय केँ लिएचुप होँ गए।
अनु (दिव्या सें): "दिव्या! तूँ बड़ी हैं, तुम कोपता हैं कि मानिक कां टेस्ट हैं। तुँ चुपचाप उसकी सहायता कर सकती थि याँ कम सें कम अपनी पढ़ाई पऱ ध्यान देती। तेरे डॉक्टर बनने कां क्याँ फ़ायदा अगर तेरा स्वभाव हि किसी मरीज़ कों डरादे?"
अनु (मानिक सें): "औऱ मानिक! तुम् छोटे भइया हौ। तुम् क्यूं दिव्या कों उकसाते हौ? तुम्हें पता हैं कि वो क्यूं नाराज़ रहती हैं। "
अनु(परी सें): "परी! तुम्हारा काम सिर्फ़ पढ़ना हैं। किसी कि लड़ाई मे तुम्हें जजमेंट देने कि ज़रूरत नहि हैं। "
उसने गहरी साँसली, "मे पागल होँ जाऊँगी तुम् लोगों केँ कारण। मे बाहर् कि दुनिया संभालती हूं, क्लाइंट्स कों शांत करती हूं, औऱ तुम् लोगघऱ कों 'युद्धक्षेत्र' बनाकर रखते होँ! अगर अगलीबार मैंने ये हंगामा सुना, तौ मे पिताजी कों तुम्हारी सारी सहूलियतें बंद करने कों कह दूँगी। अब मानिक, अपनी फ़ाइल ढूंढो, औऱ दिव्या, अपने कमरे मे जाओ!"
मानिक औऱ दिव्या एक् दूसरे कों घूरते हुए अपने-अपने रास्ते चलेगए, मगर उनके चेहरे पऱ अब भि पुरानी दुश्मनी कि लकीरें खिंची हुईँ थीं। परी डरकर चुपचाप अपने कमरे मे चली गई।
अनु अकेली खड़ीरही। उसने अपने माथे कों सहलाया। उसे महसूस हुआ कि मम्मी केँ जाने केँ बाद उसनेघऱ कि व्यवस्था तौ सँभाल ली हैं, मगर वो अपने भइया-बहनों केँ बीच केँ भावनात्मक संतुलन कों कभी नहि सँभाल पाई। ये रोज़ कि तकरार उसके सख़्त स्वभाव कों औऱ ज्यादा कठोरबना रही थि।
JANNAT tairi BAHON (TANGO) main – New Episode
दोस्तों यह स्टोरी कुछ डिफरेंट हैं इसलिये इसे हिंदी फॉण्ट मे लिखा हैं, पता नहि आपको पसन्द भि आएगी याँ नहि क्यूंकि यह मेरी रूटीन कि कहानियों सें अलग हैं थोड़ा
JANNAT tairi BAHON (TANGO) main - Aage kya hua? Next part padhiye
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