Doctor मां – New Episode
करीब-करीब 10 मिनट तक तीनों खाट पर्र बेजान पड़ेरहे, कमरे मे मात्र एसी कि सनसनाहट औऱ उनकी भारी सांसों कि गूँज थि। अंजलि कां चेहरा अभि भि आर्यन केँ गाढ़े लावे सें सनाहुआ थां, जोँ उसकी ठोड़ी औऱ होंठों पर्र किसी युद्ध केँ सफेद तमगे कि तरहचमक रहा थां। आरामसे होश मे आते हि, अंजलि केँ भीतर कि कामुकता नें एक् औऱ करवटली।
उसने अपनी आँखें खोलीं, जिनमें अभि भि हवस कि लालिमा तैररही थि। उसने अपनी गर्दन घुमाई औऱ बगल मे लेटी कंचन कि ओर देखा।
अंजलि नें बिनाकुछ कहे, मदहोशी मे अपनी कोहनियों केँ बल सहारा लिया औऱ कंचन केँ चेहरे केँ लगभग पहुँच गई। कंचन, जौ अभि भि हाँफरही थि, नें अपनी बड़ी बेहन कि आँखों मे छिपेउस खूंखार निमंत्रण कों भांप लिया।
अंजलि नें अपनेलार औऱ आर्यन केँ वीर्य सें सने होंठों कों सीधे कंचन केँ सूखे होंठों पर्र चिपका दिया। जैसे हि दोनों केँ मुँह मिले, आर्यन केँ पौरुष कां वो नमकीन औऱ तीखा स्वाद कंचन कि ज़बान तक पहुँच गय़ा।
ये अंजलि कि ओर सें एक् 'अघोषित समर्पण' थां। वो चाहती थि कि जिससुख कों उसने अभि-अभि भोगा हैं, उसकी गूँज उसकी बेहन भि महसूस करे। कंचन नें अपनी आँखें मूंदलीं औऱ अंजलि केँ मुँह केँ भीतर अपनीजीभ डाल दि, जैसे वो आर्यन केँ उस 'आखिरी निशान' कि एक्-एक् बूंद कों चख लेना चाहती हौ।
दोनों बहनें एक्-दूसरे केँ मुँह कों किसी प्यासे कि तरह चूसने लगीं। अंजलि केँ होंठों पऱ लगा आर्यन कां वीर्य अबउन दोनों कि लार केँ संग मिलकर एक् कामुक अमृतबन चुका थां।
कंचन कों वो स्वाद महसूस हौ रहा थां जिसे उसनेआज तक कभी नहि चखा थां—आर्यन कां शुद्ध पौरुष। वो अंजलि केँ गालों कों थामकर उस चुंबन कों औऱ भि गहरा करनेलगी। अंजलि केँ मुँह सें निकलने वाली सिसकारियां अब कंचन केँ मुँह केँ भीतर हि दबरही थीं। ये दृश्य ऐसा थां मानोदो शेरनियाँ अपने शिकार केँ अवशेषों कां जश्नमना रहीहों।
आर्यन अपनी मां औऱ मासी कों इसतरह लिपटे हुए देखकर सुन्न रह गय़ा थां। उसकेलिए ये दृश्य किसी भि पोर्न फिल्म सें कहीं अधिक उत्तेजक थां।
वो देखरहा थां कि केसे अंजलि केँ होंठों सें सफेद लावा कंचन केँ मुँह केँ कोनों सें रिसकर उनकी नग्न छातियों पऱ गिररहा हैं। उसके पौरुष नें दोसगी बहनों कों इसकदर एक्-दूसरे कां दीवाना बना दिया थां।
इस नज़ारे नें आर्यन केँ 7 इंच केँ फौलाद कों, जौ अभि कुछदेर पहले शांतहुआ थां, फिन सें जीवित करना शुरुआत कर दिया। उसे अपनी मम्मी औऱ मासी कि इस 'लेस्बियन अदाकारी' कों देखकर एक् नया औऱ पहले सें भि अधिक खतरनाक जोश महसूस होनेलगा।
अंजलि नें कंचन केँ होंठों कों छोड़ते हुए एक् लंबीलार कि लकीर बनाई। उसने कंचन कि आँखों मे आँखें डालकर एक् रहस्यमयी मुस्कान दि।
"कैसा थां कंचन? मेरे बेटे कां स्वाद चख लिया?" अंजलि नें अपनी उंगली सें अपने होंठों कों साफ़ करतेहुए पूछा।
कंचन नें अपने होंठों कों चाटा औऱ मदहोशी मे कहा, "जीजी.यह तोँ अमृत हैं। अबसमझ आया कि तूँ इसके पीछे इतनी पागल क्यूं थि। इसकी एक् बूंद मे हि पूरी कायनात कां नशा हैं। "
कंचन नें अब आर्यन कि ओर देखा, जौ नग्न अवस्था मे खड़ा होकरउन दोनों कों देखरहा थां। रात अभि जवान थि, औऱ आर्यन केँ पौरुष कां स्वाद अबउन दोनों बहनों केँ खून मे दौड़ने लगा थां।
पलंग पऱ मचीउस प्रलयकारी हवस केँ बादअब अंजलि एक् पूरीतरह सें 'कामुक मार्गदर्शक' कि भूमिका मे आँ चुकी थि। उसने कंचन केँ होंठों सें अपना मुँह हटाया औऱ एक् गहरी, मादक साँसली। उसकी नज़रें अब सीधे अपने बेटे आर्यन पर्र टिकीथीं, जोँ उन दोनों बहनों केँ मिलाप कों देखकर फिन सें सुलगरहा थां।
अंजलि नें अपनाहाथ बढ़ाया औऱ आर्यन केँ बालों कों अपनी मुट्ठियों मे जकड़ लिया। उसकीपकड़ मे एक् मां कि ममता नहि, बल्कि एक् मालकिन कां अधिकार थां। उसने धीरे-धीरे सें आर्यन केँ सिर कों नीचे कि ओर दबाया औऱ अपनी नग्न, रसीली बुर कि तरफ इशारा किया, जोँ अभि-अभि कंचन केँ उस 'बनावटी लावे' सें पूरीतरह भीगी हुईँ थि।
आर्यन अपनी मम्मी केँ इशारे कों समझ गय़ा। वो घुटनों केँ बल सरकता हुआ अंजलि कि जाँघों केँ बीच पहुँच गय़ा। सामने उसकी मां कि कामुक गहराइयाँ थीं, जोँ कंचन केँ विसर्जन सें लथपथ होकर सफ़ेद औऱ पारदर्शी द्रव मे चमकरही थीं।
जैसे हि आर्यन नें अपना चेहरा अंजलि कि बुर केँ लगभग लाया, उसे एक् बहोत हि अजीब औऱ तीखीमहक महसूस हुईँ। ये मात्र अंजलि केँ शरीर कि गंध नहि थि, बल्कि इसमें कंचन केँ उस बनावटी अंग सें निकला हुआ वो 'केमिकल औऱ कामुक' स्वाद घुलाहुआ थां।
आर्यन केँ मन मे एक् बिजली सि कौंधी। उसेलग रहा थां कि वो एक् संग अपनी मम्मी औऱ अपनी मासी, दोनों कों चखनेजा रहा हैं। एक् तरफ उसकी जन्मदात्री कि योनि थि औऱ दूसरी तरफ उसकी मासी कां पौरुष—आर्यन कि पुरुष मानसिकता इस 'दोहरे स्वाद' केँ रोमांच सें सातवें आसमान पर्र पहुँच गई। उसकी झिझक पूरीतरह समाप्त होँ चुकी थि; अब वो एक् 'कामुक अन्वेषक' बन चुका थां।
आर्यन नें अपनीजीभ बाहर् निकाली औऱ अंजलि कि बुर कि ऊपरी दरार पऱ उसेफेर दिया।
जैसे हि कंचन कां वो 'लावा' आर्यन कि ज़बान सें टकराया, उसे एक् नमकीन, चिकना औऱ हल्का सां कड़वा स्वाद महसूस हुआ। ये किसी भि चीज़ सें अलग थां। उसने अपनी आँखें बंदकर लीं औऱ पूरी ताकत सें उसरस कों चूसना शुरुआत किया।
जब आर्यन कि गरमजीभ नें अंजलि कि गहराई मे कंचन केँ अंश कों तलाशना शुरुआत किया, तोँ अंजलि केँ मुँह सें एक् तीखी सिसकी निकली। उसने आर्यन केँ सिर कों अपनी जाँघों केँ बीच औऱ भि कसकरदबा लिया। "आह्ह्ह। आर्यन। पीजाउसे। कंचन नें जौ आग छोड़ी हैं, उसे अपनी ज़बान सें ठंडाकर दे बेटा!"
कंचनबगल मे लेटीये नज़ारा देखरही थि। उसेये देखकर एक् अजब किस्म कि 'जीत' महसूस हौ रही थि कि उसका छोड़ाहुआ 'अंश'अब आर्यन केँ मुँह केँ भीतरजा रहा हैं।
कंचन नें अपनाहाथ अंजलि केँ स्तनों पर्र रखा औऱ उन्हें सहलाते हुए आर्यन कों उकसाने लगी। "कैसा हैं स्वाद आर्यन? तेरी मासी औऱ तेरी मां कां मिला-जुला रस.बता, क्याँ ऐसानशा तुम्हे कहीं औऱ मिलेगा?"
आर्यन अब पागलों कि तरह अंजलि कि बुर कों चाटरहा थां। वो अपनी मां कि गहराइयों सें कंचन केँ उस बनावटी वीर्य कि एक्-एक् बूंद निचोड़ लेना चाहता थां। उसेलग रहा थां कि वो इस क्रिया केँ माध्यम सें उन दोनों औरतों कों एक् संग अपनेवश मे कररहा हैं।
खाट पर्र अब सन्नाटा नहि, बल्कि चाटने औऱ सिसकने कि गीली आवाज़ें गूँजरही थीं। आर्यन कां 7 इंच कां फौलाद खाट कि चादर कों फाड़ता हुआफिन सें खड़ा होँ गय़ा थां। उसे महसूस हौ रहा थां कि अंजलि कि बुर मे घुला वो 'कंचन कां स्वाद' उसे एक् नई औऱ भयानक ताकतदे रहा हैं।
अंजलि नें अपनी गर्दन पीछे कि ओर झुका दि, उसकी आँखें उलटगईं। उसेऐसा लगरहा थां जैसे आर्यन अपनी ज़बान सें उसकी आत्मा कों खींचरहा होँ। ये एक् ऐसा 'थ्रीसम' थां जहाँबदन भले हि अलग थें, मगर स्वाद औऱ हवस एक् होँ चुके थें।
बैड पऱ अब कामुकता कां एक् ऐसा 'अंतहीन चक्र'बन चुका थां, जहाँहर बदन दूसरे बदन केँ रस सें जुड़ाहुआ थां। मर्यादा कि दीवारें पहले हि गिर चुकीथीं, अब तौ बस रूहों कां एक्-दूसरे मे विलीन होना बाकी थां।
कंचन, जोँ अब तक मात्र एक् दर्शक बनी अंजलि कि बुर पऱ आर्यन कि जीभ कां तांडव देखरही थि, उसकी सहनशक्ति जवाबदे गई। आर्यन केँ उस 7 इंच केँ फौलाद कि रंगत औऱ उसकीधमक देखकर कंचन कि जांघें फिन सें गीली होनेलगी थीं। उसने अपनी मैक्सी केँ ऊपर केँ हिस्से कों औऱ ढीला किया औऱ एक् भूखी शेरनी कि तरह आर्यन केँ मूसल पर्र झपटपड़ी।
अबखाट पऱ जौ नज़ारा थां, वो किसी भि कल्पना सें परे थां:
कंचन नें आर्यन केँ सख्तअंग कों अपने दोनों हाथों मे जकड़ा औऱ उसे सीधे अपने मुँह केँ गरम अंधेरे मे उतार लिया।
कंचन एक् अनुभवी खिलाड़ी थि। उसने अपनीजीभ कों आर्यन केँ अंग कि सुपारी केँ चारों ओर किसी लट्टू कि तरह घुमाना शुरुआत किया। उसके मुँह कि सक्शन पावर इतनी जबरदस्त थि कि आर्यन कि जांघों केँ बीच कि नसें बिजली केँ झटकों कि तरह फड़कने लगीं। कंचन अपनी आँखें बंदकिए, पूरी शिद्दत सें उस पौरुष कों निगलरही थि जिसे उसनेकुछ देर पहले अपनी बेहन कि बुर मे बरसते देखा थां।
नीचे सें कंचन कां मुँहउसे जन्नत कि सैरकरा रहा थां, मगर आर्यन कां ध्यान अपनी मम्मी अंजलि कि बुर पर्र केंद्रित थां।
आर्यन अंजलि कि बुर कि गहराइयों मे अपनीजीभ कों किसी ड्रिल कि तरहचला रहा थां। उसे अंजलि केँ नैसर्गिक काम-रस औऱ कंचन केँ बनावटी वीर्य कां वो 'वर्जित कॉकटेल' मदहोश कररहा थां। वो अपनी मम्मी कि कोमल पंखुड़ियों कों अपने दांतों सें हल्का सां कुतरता औऱ फिन उन्हें अपनीजीभ सें सहलाता। अंजलि कि बुर अब पूरीतरह सें 'स्वाद कां समंदर' बन चुकी थि।
अंजलि केँ लिएये समय किसी मोक्ष सें कम नहि थां। उसकी आँखें ऊपर कि ओरचढ़ गई थीं, सिर्फ सफेद हिस्सा दिखाई देरहा थां—जोँ इसबात कां संकेत थां कि वो 'चेतना केँ चरम' पऱ हैं।
अंजलि कां बदनबैड पऱ बेजान सां पड़ा थां, मगर उसकीहर नस मे बिजली दौड़रही थि। जब आर्यन कि जीभ उसकी सबसे संवेदनशील स्थान (Clitoris) कों सहलाती, तौ अंजलि कां पूरा शरीर झटके मारता। वो अपने हाथों सें चादर कों इसकदर भींचरही थि कि उसके नाखून खाट मे धंसरहे थें। उसके मुँह सें मात्र रेंगती हुई सिसकारियां निकलरही थीं—"आह्ह्ह। आर्यन। कंचन। मुझेमार डालोआज। बसमत रुको!"
पूरे कमरे मे अबतीन तरह कि गीली आवाज़ें गूँजरही थीं:
कंचन केँ मुँह सें निकलने वाली 'गप-गप' कि आवाज़।
आर्यन कि जीभ केँ चाटने कि 'लप-लप' कि गूँज।
अंजलि कि भारी औऱ टूटी हुई सांसें।
आर्यन कों लगरहा थां कि वो एक् संगदो औरतों कि आत्माओं कों चखरहा हैं। कंचन कां मुँहउसे शक्ति देरहा थां, औऱ अंजलि कां रसउसे पूर्णता कां अहसास करारहा थां। उसे महसूस होँ रहा थां कि वो इसघऱ कां असली 'स्वामी' हैं।
कंचनइस बात सें रोमांचित थि कि वो अंजलि केँ संग मिलकर आर्यन केँ पौरुष कां बटवारा कररही हैं। उसेमज़ा आँ रहा थां कि उसकीजीभ पर्र उस वीर्य कां अंश अभि भि थां जोँ उसने अंजलि केँ होंठों सें चुराया थां, औऱ अब वो सीधे स्रोत सें मज़ा लेँ रही थि।
अंजलि नें अब अपने दोनों पेर आर्यन केँ कंधों पर्र रखदिए, जिससे उसकी बुर औऱ भि ज़्यादा खुल गई। आर्यन नें अपनीगति बढ़ा दि। उधर कंचन नें आर्यन केँ अंडकोषों कों सहलाते हुए उसकेअंग कों गले तक उतारना जारीरखा।
ये एक् ऐसा कामुक लूपबन गय़ा थां जहाँसुख एक् बदन सें दूसरे जिस्म मे बिना किसी रुकावट केँ बहरहा थां। अंजलि कां जिस्म अब पसीने सें पूरीतरह नहा चुका थां औऱ वो फिन सें एक् भयानक विस्फोट कि कगार पऱ थि।
बेडरूम कि दीवारें आजउसपाप कि गवाहबन रहीथीं जिसकी कल्पना सिर्फ सें रूह कांपजाए। कमरे मे एसी कि ठंडक केँ बावजूद गर्मी इतनी थि कि तीनों केँ बदन पसीने सें लथपथ होकरचमक रहे थें। वो समयअब लगभग थां जहाँ वासना कां ये तांडव अपने खूनीचरम पर्र पहुँचने वाला थां।
खाट पर्र बना वो मानवीय त्रिकोण अब कांपरहा थां। आर्यन कि जीभ अंजलि कि गहराई केँ आखिरी छोर कों कुरेद रही थि, जबकि कंचन कां मुँह आर्यन केँ ७इंच केँ फौलाद कों पूरीतरह निगल चुका थां।
अंजलि कां पूरा जिस्म किसी बिजली केँ झटके कि तरहऊपर कि ओर मुड़ा। आर्यन कि जीभजब उसकी काम-बिंदु पऱ बिजली कि गति सें रगड़ खानेलगी, तोँ अंजलि कि चेतना लुप्त होनेलगी। उसकी आँखें ऊपर कि ओरचढ़गईं औऱ उसके मुँह सें एक् ऐसी तीखी औऱ फाड़ देने वालीआह निकली जोँ शायद पूरेघऱ मे गूँज गई होगी। उसने अपने दोनों पैरों सें आर्यन केँ सिर कों एक् 'लेग-लॉक' मे जकड़ लिया औऱ अपनीकमर कों पागलों कि तरह पटकने लगी। ठीक उसीसमय, अंजलि कि काम-नदियाँ उफन पड़ीं। उसकागरम औऱ लिसलिसा रस किसी झरने कि तरह आर्यन केँ चेहरे, उसकी आँखों औऱ उसके मुँह मे भर गय़ा। अंजलि कां बदन थरथरा कर ढीलापड़ा, जैसे किसी नें उसकीजान निकाल ली हौ।
अंजलि केँ उस प्रचंड विसर्जन कां स्वाद औऱ उसकी जांघों कां वो कसैला दबाव आर्यन केँ लिए आखिरी प्रहार साबित हुआ। कंचन, जौ नीचे सें किसी वैक्यूम क्लीनर कि तरह आर्यन केँ पौरुष कों खींचरही थि, उसने अपनी रफ्तार कों किसी जंगली जानवर कि तरहबढ़ा दिया। आर्यन केँ गले सें एक् गरजती हुईँ आवाज़ निकली—"आह्ह्ह्ह। मासी। मां। मे गय़ा!" आर्यन कां ७इंच कां मूसल कंचन केँ गले केँ भीतर हि फटनेलगा। एक् केँ बाद एक्, पौरुष कि गरम औऱ गाढ़ी सफेद धारें कंचन केँ गले केँ आखिरी छोर तक जा टकराईं। कंचन नें उन झटकों कों अपनी आँखों सें महसूस किया; वो आर्यन केँ अंग कों छोड़ने केँ बजायउसे औऱ गहराई सें चूसने लगी ताकि एक् भि बूंद बर्बाद न् होँ। वो आर्यन केँ लावे कों किसी अमृत कि तरह गट-गट करके निगलने लगी।
जब विस्फोट शांतहुआ, तोँ कमरे मे एक् भारी औऱ डरावना सन्नाटा छा गय़ा, जिसे मात्र उन तीनों कि टूटती हुईँ सांसें चीररही थीं।
आर्यन कां चेहरा अपनी मम्मी केँ काम-रस सें पूरीतरह भीगाहुआ थां। उसकी आँखों मे वो रसचला गय़ा थां जिससे उसेसभी कुछ धुंधला दिखरहा थां, मगर वो धुंधलापन भि उसे जन्नत जैसालग रहा थां। वो निढाल होकर अपनी मां कि जांघों केँ बीच हि गिरपड़ा।
कंचन नें आर्यन कां अंग अपने मुँह सें निकाला। उसके होंठों केँ कोनों सें आर्यन कां कुछ सफेद लावा रिसकर उसकी नग्न छाती पऱ गिररहा थां। उसने एक् लंबी सांसली औऱ अपनीजीभ सें अपने होंठों कों साफ़ किया, जैसे वो उस स्वाद कों हमेशा केँ लिएकैद करना चाहती हौ।
अंजलि अभि भि वैसी हि लेटी थि, उसकेहाथ चादर कों मुट्ठी मे भींचे हुए थें। उसका विसर्जन इतना भीषण थां कि वो अगले१० मिनट तक हिलने कि स्थिति मे नहि थि।
ये सिर्फ शारीरिक सुख नहि थां, ये मर्यादा कां पूर्ण विसर्जन थां। अंजलि कों मज़ाइस बात कां थां कि उसके बेटे नें उसका 'पानी' निकाला, औऱ आर्यन कों गर्वइस बात कां थां कि उसने अपनी मम्मी औऱ मासी दोनों कों एक् संग उनके घुटनों पर्र लाखड़ा किया।
कंचन नें धीरे-धीरे सें अपनासिर उठाया औऱ आर्यन केँ गाल पर्र लगे अपनी बेहन केँ रस कों अपनी उंगली सें चखा औऱ फिन आर्यन कि आँखों मे देखकर मुस्कुराई।
"आज तौ तूने अपनी मां औऱ मासी दोनों कि प्यास कां अंतकर दिया, मेरेशेर." कंचन कि इस आवाज़ मे एक् ऐसी तृप्ति थि जौ अबइस रिश्ते कों एक् नए औऱ अंधेरे मोड़ पर्र लेँ जाने वाली थि।
बेडरूम कां वो सन्नाटा, जोँ अभि-अभि हुए महा-विस्फोट केँ बाद छाया थां, अचानक एक् ऐसी भयानक चीख सें टूट गय़ा जिसने दीवार कि ईंटों तक कों कँपा दिया। अंजलि औऱ आर्यन, जौ अपनीबंद आँखों केँ पीछे अभि-अभि मिलेसुख केँ स्वप्नलोक मे तैररहे थें, झटके सें हकीकत केँ उस क्रूर धरातल पऱ पटकदिए गए जिसकी उन्होंने कल्पना भि नहि कि थि।
कंचन कि आँखों मे थकान कां नामो-न् निशान नहि थां। पेनकिलर केँ नशे औऱ खाट पऱ बिखरे उस 'त्रिकोणीय लावे' कि महक नें उसे एक् वहशी दरिंदे मे बदल दिया थां। उसका 7 इंच कां वो कठोर औऱ नुकीला राज अभि भि किसी फौलादी खंभे कि तरहतना हुआ थां, मानो वो अंजलि कि मर्यादा केँ अंतिम किले कों ढहाने केँ लिए बेताब हौ।
अंजलि अभि भि औंधे मुँह लेटी हुइ थि, उसका शरीर पसीने औऱ आर्यन केँ वीर्य सें लथपथ थां। कंचन नें एक् शिकारी कि तरह अपनी स्थिति बदली औऱ अंजलि कि उठी हुइ औऱ बेखबर गोल गाँड केँ ठीक पीछेजम गई।
कंचन नें अपने दोनों हाथों सें अंजलि केँ भारी नितंबों कों किसी लोहे केँ शिकंजे कि तरह जकड़ा औऱ उन्हें अलगकर दिया। अंजलि कां वो संकरा औऱ नाजुक 'गुलाबी दरवाज़ा' अब पूरीतरह बेपर्दा थां। कंचन नें बिना किसी लुब्रिकेंट केँ, मात्र पलंग पर्र बिखरे हुए काम-रस कां सहारा लिया औऱ अपनेउस ७इंच केँ मूसल कि सुपारी कों अंजलि केँ पिछले छेद पऱ सेट किया।
बिना किसी चेतावनी केँ, कंचन नें अपनीकमर कों एक् भयानक झटके केँ संगआगे कि ओरदे मारा। 'पट्ट.' कि एक् गूँजती हुइ आवाज़ केँ संग, वो पूरा कां पूरा 7 इंच कां फौलाद अंजलि कि उसतंग औऱ अनछुई गली कों चीरता हुआ अंदरधंस गय़ा।
अंजलि कां बदन किसी बिजली केँ झटके कि तरहहवा मे उछला। उसकेगले सें एक् ऐसी दर्दनाक औऱ फटी हुइ चीख निकली—"आह्ह्ह्ह्ह्ह। माँ रे.मर गईईई!"—जौ सुख कि नहि, बल्कि हाड़-काँप देने वाली पीड़ा कि थि। उसकी आँखें पूरीतरह बाहर् निकलआईं औऱ उसका चेहरा खाट कि चादर मे दब गय़ा।
अंजलि कों लगा जैसे किसी नें उसके जिस्म केँ दो टुकड़े करदिए हों। वो दरवाज़ा, जौ मात्र विसर्जन केँ लिए थां, आज एक् विशाल आक्रमण कों झेलरहा थां। उसकी आँखों केँ सामने अंधेरा छा गय़ा औऱ उसकी उंगलियाँ चादर कों फाड़ते हुए लकड़ी केँ बेड कों खुरचने लगीं।
आर्यन, जोँ बगल मे लेटा थां, अपनी मम्मी कि इसचीख कों सुनकर काँप गय़ा। उसने देखा कि कंचन कि जांघें अंजलि कि मोटी गाँड सें पूरीतरह सट चुकीथीं औऱ अंजलि कां जिस्म दर्द केँ मारे कमान कि तरह मुड़ गय़ा थां।
आर्यन देखरहा थां कि उसकी मां कां सफ़ेद शरीरअब दर्द सें नीलापड़ रहा थां, मगर कंचन रुकने कों रेडी नहि थि। उसने अंजलि कि कमर कों हाथों सें औऱ कस लिया ताकि वो हिल न् सके।
कंचन नें अंजलि केँ कान केँ पास अपना चेहरा लाकर एक् हिंसक आवाज़ मे फुसफुसाया, "बहोत चूस लिया मेरेशेर कों जीजी.अब इस बेहन कां असलीज़हर चख!आज तेरीयह अकड़ मे यहींइसी छेद मे दफ़नकर दूँगी!"
अंजलि केँ पिछले दरवाज़ा कि मांसपेशियां उस७इंच केँ बोझ कों झेलने केँ लिएतड़प रहीथीं। हर बीतते सेकंड केँ संग वो अंग उसकी आंतों तक अपनी मौजूदगी दर्जकरा रहा थां। अंजलि कि चीखें अब रुंधे हुएगला औऱ सिसकियों मे बदल गई थीं। उसे समझ नहि आँ रहा थां कि वो अपनी बेहन सें भीख मांगे याँ इस अनचाहे सुख मे डूबजाए।
कंचन नें अब अपनीकमर कों आहिस्ता हिलाना शुरुआत किया। हर इंच कां बाहर् निकलना औऱ फिन वापस अंदर धंसना अंजलि केँ लिएमौत औऱ ज़िंदगी केँ बीच कां फासला थां। बैड पर्र बिखरा आर्यन कां लावाअब उसरगड़ केँ कारण गुलाबी होनेलगा थां, जौ इसबात कां संकेत थां कि मर्यादा कि आखरी दीवार लहूलुहान हौ चुकी हैं।
इसकथा कों बहोत हि जल्द पूरी पढने केँ लिए लेखक कों संदेश कर सकते हैं औऱ संग हि इसे हि रोमांचक कहानियो केँ लिए
खाट पर्र उस टाइम जोँ मंजर थां, वो किसी नर्क केँ सबसे गहरे औऱ कामुक अंधेरे जैसा थां। अंजलि केँ पिछले दरवाज़ा पर्र कंचन कां वो 7 इंच कां हिंसक प्रहार इतना अचानक औऱ सूखा थां कि अंजलि कि रूह तक कांप गई थि। वो दर्द केँ मारेखाट पर्र प्यास रही थि, उसकी सिसकियाँ अब टूटते हुए शब्दों मे बदलरही थीं।
आर्यन अपनी मम्मी कि येतड़प देखरहा थां। उसके भीतर एक् तरफ अपनी मम्मी केँ लिए हमदर्दी थि, तोँ दूसरी तरफउस 'वर्जित दृश्य' नें उसकी उत्तेजना कों पागलपन कि हद तक बढ़ा दिया थां। उसेसमझ आँ गय़ा थां कि कंचन कां वो फौलादी अंग अंजलि कि तंग गलियों कों बुरीतरह छीलरहा हैं क्योंकि वहा चिकनाहट कां नामो-निशान नहि थां।
आर्यन कों इस वक़्त एक् बहोत हि विचित्र औऱ वहशी ख्याल आया। उसने अपनी मम्मी कि पीड़ा कों कम करने केँ लिए स्वयं कों उस 'हिंसक मिलन' कां हिस्सा बनाने कां फैसला किया।
आर्यन धीरे-धीरे सें नीचे झुका औऱ अपनी मम्मी कि उठी हुईँ गोल गाँड केँ बिल्कुल लगभग अपना चेहरा लेँ आया। वहा कंचन कां ७इंच कां अंग अंजलि कि आंतों कों चीरते हुए अंदर-बाहर् हौ रहा थां।
आर्यन नें अपनीजीभ बाहर् निकाली औऱ जहाँ कंचन कां अंग अंजलि केँ लालपड़ चुके पिछले दरवाज़ा मे धंसरहा थां, उस प्रवेश दरवाज़ा कों अपनीजीभ सें चाटना शुरुआत किया।
जैसे हि आर्यन कि गरम औऱ गीलीजीभ नें उस सूखेरगड़ वाले हिस्से कों छुआ, अंजलि केँ बदन मे एक् सिहरन दौड़ गई। आर्यन कंचन केँ अंग केँ चारों ओर अपनीथूक औऱ जीभ कि नमी फैलारहा थां ताकि घर्षण (Friction) कम हौ सके।
अंजलि केँ लिएये अनुभव अब 'दर्द औऱ परमानंद' कां एक् ऐसा मिश्रण बन गय़ा थां जिसे दिमाग़ स्वीकार नहि करपारहा थां।
जैसे-जैसे आर्यन कि जीभउस दरवाज़ा कों गीलाकर रही थि, कंचन कां अंग अंदर जानां थोड़ा आसान होनेलगा। अंजलि कि चीखें अब धीमी पड़कर लंबी आहों मे बदलने लगीं।
अंजलि ये सोचकर पागल होँ रही थि कि उसका बेटा उसकीउस स्थान कों चाटरहा हैं जहाँ उसकी बेहन एक् मर्द कि तरहउसे रौंदरही हैं। येसोच हि उसे एक् ऐसी विकृत उत्तेजना देरही थि कि उसका जिस्म अब दर्द केँ बावजूद उसअंग कों औऱ गहराई मे खींचने लगा।
कंचन नें जब महसूस किया कि नीचे सें आर्यन कि जीभ उसकेअंग कों मार्ग देरही हैं, तौ उसकी रफ्तार औऱ भि वहशी होँ गई।
कंचनअब अंजलि कि कमर पकड़कर उसे झटकेदे रही थि, औऱ हर झटके केँ संग आर्यन उस दरवाज़ा कों औऱ भि ज़्यादा गीलाकर रहा थां। आर्यन केँ चेहरे पर्र अंजलि केँ पिछले हिस्से कि गंध औऱ कंचन केँ पसीने कि महकमिल चुकी थि। वो पागलों कि तरहउस 'घर्षण' कों चखरहा थां।
ऊपर सें कंचन कि धमक, बीच मे अंजलि कि तड़प औऱ नीचे आर्यन कि लपलपाती जीभ—बैड पऱ अब केवल गीली आवाज़ें गूँजरही थीं। आर्यन कि जीभअब कंचन केँ अंग केँ संग-संग अंजलि केँ उस नाजुक छेद केँ भीतर तक जाने कि कोशिश कररही थि।
अंजलि नें अपनासिर पीछे कि ओर मोड़ा औऱ आर्यन कि आँखों मे देखा। उसकी आँखों मे आँसू थें, मगरउन आँसुओं मे एक् अनंतहवस चमकरही थि। उसने टूटी आवाज़ मे कहा, "आर्यन। औऱ गीलाकर। अपनी मां कों इसआग सें बचा लेँ बेटा। कंचन, मुझे औऱ ज़ोर सें मारो!"
आर्यन अब पूरीतरह डूब चुका थां। उसने अपनी उंगलियों कां भि इस्तेमाल करना शुरुआत किया, अंजलि कि रसीली गाँड केँ दोनों हिस्सों कों फैलाकर अपनीजीभ कों उस 'युद्ध क्षेत्र' मे झोंक दिया जहाँ कंचन कां ७इंच कां फौलाद तांडव कररहा थां।
Doctor मां – New Episode
कलम केँ कलाकार होँ आप्
बिल्कुल नईसोच कां प्रदर्शन
सवालयह क्याँ लिंग परिवर्तन केँ बाद इतना कामुक कोई हौ सकताहे ?
आप् किसी अन्य फोरम पऱ भि हौ ?
आगे स्टोरी किसरूप मे होगी कल्पना हि कर सकतेहे
साधुवाद
Doctor मां – New Episode
रात केँ उस तीसरे पहर मे, बेडरूम कि पीली रोशनी अबहवस, पसीने औऱ मर्यादाओं केँ टूटने कि महक सें भारी हौ चुकी थि। पलंग पऱ जोँ दृश्य अबउभर रहा थां, वो कामुकता औऱ वर्जनाओं केँ इतिहास कां सबसे काला औऱ उत्तेजक अध्याय थां। अंजलि, जोँ कुछदेर पहले तक सिर्फ एक् मां थि, अबदो वहशी दरिंदों केँ बीच फँसी एक् ऐसी 'काम-दासी' बन चुकी थि जिसकी रूह औऱ देह, दोनों कों उसके अपनों नें हि नीलाम कर दिया थां।
अंजलि अबबैड पर्र पीठ केँ बल लेटी हुई थि। उसकी टाँगें हवा मे उठी हुई थीं औऱ घुटनों केँ पास सें मुड़ी हुइ थीं। कंचन, जिसने अपनी मैक्सी कों अपनीकमर तक समेट लिया थां, अंजलि कि जाँघों केँ बीचइस तरहजमी थि जैसेकोई कुशल शिकारी अपने शिकार केँ सबसे नाजुक हिस्से पऱ कब्ज़ा कर चुका होँ। कंचन कां वो 7 इंच कां कृत्रिम फौलाद अब अंजलि कि रसीली गाँड केँ संकरे औऱ सूखे रास्ते कों पूरीतरह सें अपना गुलाम बना चुका थां।
कंचन कि आँखों मे इस टाइमकोई ममता नहि थि, बल्कि अपनीबड़ी बेहन कों पूरीतरह सें 'रौंद' देने कां एक् हिंसक जुनून थां। वो अपनीकमर कों किसी मशीन कि तरहचला रही थि। बिना किसी लुब्रिकेंट केँ, वो 7 इंच कां अंगजब अंजलि कि नाजुक आंतों कि दीवारों सें रगड़ खाताहुआ अंदर जाता, तौ अंजलि केँ पूरे शरीर मे एक् सिहरन दौड़ जाती।
कमरे मे 'पट्ट-पट्ट' कि आवाज़ गूँजरही थि, जौ इसबात कां सबूत थि कि कंचन कि जाँघें अंजलि केँ नितंबों सें कितनी बेरहमी सें टकरारही हें। अंजलि कां पिछला दरवाज़ा अबलाल पड़ चुका थां, औऱ उस सूखे घर्षण केँ कारण उठने वालीजलन उसेमौत जैसा अहसास देरही थि।
अंजलि कों दर्द सें तड़पता देख आर्यन केँ भीतर कां 'बेटा' औऱ 'प्रेमी' दोनों एक् संगजाग उठे। उसे समझ आँ गय़ा थां कि उसकी मां इस सूखे प्रहार कों ज़्यादा देरसहन नहि कर पाएगी। वो एक् जंगली जानवर कि तरह अंजलि केँ पेट केँ ऊपरचढ़ गय़ा औऱ अपनी स्थिति इसतरह सेट कि कि उसका चेहरा सीधेउस स्थान केँ ऊपर आँ गय़ा जहाँ कंचन कां अंग अंजलि कि मोटी गाँड केँ भीतरसमा रहा थां।
आर्यन नें अपना मुँह खोला औऱ अपनी लंबी, गीलीजीभ कों उस 'युद्ध-क्षेत्र' मे झोंक दिया। वो पागलों कि तरहउस स्थान कों चाटने लगा जहाँ कंचन कां अंग अंजलि केँ पिछले छेद मे धंसरहा थां। आर्यन कि जीभ कंचन केँ उस सख्तअंग केँ चारों ओरघूम रही थि, उसे अपनीलार सें नहलारही थि ताकि वो अंजलि केँ भीतर आसानी सें फिसलसके।
आर्यन केँ लिएये अनुभव बेहद अजीब औऱ उत्तेजक थां। उसकी ज़बान पर्र अंजलि केँ बदन कि महक, पसीने कां नमकीन स्वाद औऱ कंचन केँ उस'अंग' कि कड़वाहट एक् संगमिल रही थि। वो अपनी मम्मी कि पीड़ा कों कम करने केँ लिए अपनी पूरीथूक उसछेद केँ मुहाने पर्र उड़ेलरहा थां।
इस स्टोरी कों बहोत हि जल्द पूरी पढने केँ लिए लेखक कों संदेश कर सकते हैं औऱ संग हि इसे हि रोमांचक कहानियो केँ लिए
अंजलि कि आँखें पूरीतरह ऊपर कि ओरचढ़ गई थीं। वो एक् ऐसे 'सेंसरियल ओवरलोड' मे थि जहाँ दर्द औऱ मज़ा एक्-दूसरे मे इसकदर घुलगए थें कि उन्हें अलग करना नामुमकिन थां।
उसे नीचे सें कंचन कां वो कठोरअंग अपनी गहराइयों कों फाड़ता हुआ महसूस होँ रहा थां, औऱ ऊपर सें अपने हि बेटे कि गरम औऱ गीलीजीभ उसघाव कों सहलाती हुईँ लगरही थि। ये विरोधाभास अंजलि केँ मन कि नसों कों हिलारहा थां। उसके मुँह सें सिर्फ टूटी हुइ सिसकारियां निकलरही थीं—"आह्ह्ह। आर्यन। औऱ गीलाकर। माँ रे। कंचन। तुँ मार डालेगी मुझे। औऱ ज़ोर सें!"
अंजलि इस वक्तसोच रही थि कि वो कितनी 'पतित' महिला हैं। उसका बेटा उसकीउस स्थान कों चूमरहा हैं जहाँ उसकी बेहनउसे एक् मर्द कि तरहभोग रही हैं। इससोच नें उसके भीतर एक् ऐसी विकृत कामुकता पैदा कि कि उसकी अपनी बुर सें काम-रस कां फव्वारा फूटपड़ा, जोँ पलंग कि चादर कों पूरीतरह भिगोने लगा।
खाट पऱ अबतीन जिस्मों कां एक् ऐसाढेर थां जहाँये पहचानना मुश्किल थां कि कौन सां हाथ किसका हैं। कंचन नें अब अपनी रफ्तार कों औऱ बढ़ा दिया। उसे मज़ा आँ रहा थां कि आर्यन कि जीभ उसकेअंग कों मार्ग देरही हैं।
"देख आर्यन। देख अपनी मम्मी कि यहतड़प!" कंचन नें चिल्लाते हुए एक् औऱ ज़ोरदार धक्का मारा। "आज इसकीयह संकरी गली मे हमेशा केँ लिए चौड़ीकर दूँगी। चाटइसे। औऱ गीलाकर अपनी मां कों!"
आर्यन अब पूरीतरह बेकाबू थां। उसने अपनी उंगलियों सें अंजलि कि रसीली गाँड केँ दोनों हिस्सों कों औऱ भि फैला दिया ताकि कंचन कां अंग औऱ भि गहराई तक जासके। वो अपनी मां कि पीड़ा कों चखरहा थां। उसेउस 'सूखीरगड़' कि आवाज़ औऱ आर्यन कि जीभ केँ 'चप-चप' करने कि आवाज़ केँ बीच एक् रूहानी म्यूज़िक सुनाई देरहा थां।
अंजलि कां बदनअब पसीने सें इतना लथपथ हौ गय़ा थां कि वो खाट पर्र फिसलरही थि। आर्यन कि जीभ केँ कारणअब कंचन कां ७इंच कां फौलाद अंजलि केँ भीतर किसीतेल लगी तलवार कि तरह अंदर-बाहर् होँ रहा थां। दर्दअब आरामसे एक् गहरे औऱ सुन्न कर देने वालेनशे मे बदलरहा थां।
अंजलि नें अपने दोनों हाथऊपर उठाए औऱ आर्यन केँ सिर कों कसकरपकड़ लिया। उसने अपनीकमर कों ऊपर कि ओर झटका दिया, जिससे कंचन कां अंग उसकी आंतों केँ औऱ भि लगभग पहुँच गय़ा। उससमय, उन तीनों कि रूहें एक् ऐसे 'कामुक नरक' मे समागईं जहाँ सें वापसी कां कोई मार्ग नहि थां।
कमरे मे मात्र तीन आवाज़ें बचीथीं: कंचन केँ धक्कों कि धमक, आर्यन कि जीभ कि गीली सराहट, औऱ अंजलि कि अनंत औऱ सुखद पीड़ा कि गूँज
रात कां सन्नाटा अब पूरीतरह सें कामुक आहों औऱ गीले स्पर्शों कि ध्वनियों सें भर चुका थां। अंजलि, जोँ कुछदेर पहले तक दर्द सें कराहरही थि, अब आर्यन कि जीभ कि चिकनाहट औऱ कंचन केँ धक्कों केँ सामंजस्य सें एक् ऐसी मदहोशी मे पहुँच गई थि जहाँ पीड़ा भि सुखबन गई थि। उसके जिस्म केँ हरपोर सें पसीना बहरहा थां औऱ उसकी कामुकता अब अपनेचरम शिखर कि ओर बढ़ने कों बेताब थि।
खाट पर्र स्थिति अब एक् बहोत हि जटिल औऱ उत्तेजक '69 पोजीशन' जैसीबन चुकी थि
अंजलि पीठ केँ बल लेटी थि।
कंचन उसकी जाँघों केँ बीच बैठकर उसकीगोल गाँड माररही थि।
आर्यन, अंजलि केँ पेट पऱ उलटा लेटाहुआ थां, जिसका चेहरा अंजलि कि मोटी गाँड कि तरफ थां औऱ उसका अपना 7 इंच कां फौलाद अंजलि केँ चेहरे कि ओरतना हुआ थां।
अंजलि केँ भीतरअब एक् अजीब सि बिजली दौड़ने लगी। उसे अब मात्र भोग्या बनकर नहि रहना थां, उसे भि उस अमृत कां स्वाद चखना थां जोँ उसके बेटे केँ अंगों सें फूटने कों बेताब थां। उसने अपनीकमर कों एक् ज़ोरदार झटका दिया, जिससे ऊपर लेटे आर्यन कां संतुलन बिगड़ गय़ा औऱ वो थोड़ा औऱ आगे कि ओर खिसक गय़ा।
जैसे हि आर्यन कां बदनआगे सरका, उसका धधकता हुआअंग अंजलि केँ होंठों केँ बिल्कुल लगभग आँ गय़ा। अंजलि नें बिना एक् लम्हा कि देरीकिए अपने दोनों हाथों सें आर्यन कि जाँघों कों जकड़ा औऱ अपनी गर्दन ऊपरउठा कर आर्यन केँ पूरे केँ पूरे 7 इंच केँ मूसल कों एक् हि झटके मे अपने मुँह केँ भीतरभर लिया।
आर्यन, जौ अब तक नीचे अंजलि कि भारी गाँड कों गीला करने मे मगन थां, इस अचानक हुए 'हमले' सें सुन्न रह गय़ा। उसे उम्मीद नहि थि कि उसकी मम्मी इस हालत मे भि उसकेअंग कों निगल लेगी। अंजलि कां गरम मुँह औऱ उसकीजीभ कां दबाव मिलते हि आर्यन केँ मुँह सें एक् चीख निकल गई।
अब नज़ारा किसी महा-संगम जैसा थां
कंचन अभि भि अंजलि कि मोटी गाँड मे निर्दयता सें अपने७ इंच केँ राज कों अंदर-बाहर् कररही थि।
अंजलि कंचन केँ धक्कों कों झेलते हुए आर्यन केँ अंग कों पागलों कि तरहचूस रही थि। उसकेगले कि मांसपेशियां आर्यन केँ पौरुष कों बुरीतरह भींचरही थीं।
आर्यन, जिसका चेहरा अभि भि अंजलि कि गोल गाँड केँ लगभग थां, अपनी मम्मी केँ मुँह कि गर्मी औऱ मासी केँ धक्कों केँ बीच एक् 'सैंडविच' बन चुका थां।
अंजलि इस टाइम एक् संग 'भोगने' औऱ 'भोगे जाने' केँ दोहरा मजा लें रही थि। कंचन कां अंगजब उसकी गहराइयों कों छूता, तोँ वो अनजाने मे हि आर्यन केँ अंग कों औऱ ज़ोर सें चूसने लगती।
आर्यन कों समझ नहि आँ रहा थां कि वो कहां ध्यान दे। नीचे उसकी मां कि रसीली गाँड कि गंध औऱ ऊपर उसकी मम्मी केँ मुँह कि मखमली पकड़। उसकीरीढ़ कि हड्डी मे करंटदौड़ रहा थां। उसने अपनी मुट्ठियों सें चादर कों जकड़ लिया औऱ अपनीकमर कों अंजलि केँ मुँह केँ भीतर झटकने लगा।
कंचनये नज़ारा देखकर औऱ भि पागल होँ गई। "वाउ जीजी! पीछे सें मार भि खारही हैं औऱ सामने सें बेटे कां रस भि चखरही हैं! तुँ तोँ सच मे हवस कि देवी निकली!" कंचन नें अपनी रफ्तार औऱ बढ़ा दि, जिससे अंजलि कां बदन आर्यन केँ ऊपर बार-बार उछलरहा थां।
कमरे मे अब सिर्फ गीली आवाज़ें थीं—'पट्ट-पट्ट' कि धमक, अंजलि केँ मुँह सें आती 'गप-गप' कि गूँज औऱ आर्यन कि भारी सांसें। अंजलि कां गलाअब पूरीतरह सें आर्यन केँ अंग सें भर चुका थां। वो कंचन केँ हर प्रहार कां जवाब आर्यन कों चूसकर देरही थि।
ये एक् ऐसा 'अंतहीन काम-चक्र' थां जहाँ मम्मी, बेटा औऱ मौसी, तीनों अपनी पहचान खोकर मात्र मांस केँ पुतले बन चुके थें। अंजलि कि आँखें बंदथीं, मगर उसके चेहरे पऱ छाई वो शैतानी मुस्कान बतारही थि कि उसेइस 'दोहरे आक्रमण' मे अपनी ज़िंदगी कां सबसेबड़ा चैनमिल रहा हैं।
खाट पर्र इस टाइम जौ हौ रहा थां, उसने आर्यन केँ मन कि तार्किक शक्ति कों पूरीतरह शून्य कर दिया थां। आर्यन केँ लिएये सिर्फ शारीरिक क्रिया नहि थि, बल्कि उसके 'पुरुष-अहंकार' कि वो पराकाष्ठा थि जहाँ पहुँचने कां सपनाहर मर्द अपनेमन केँ सबसे अंधेरे कोने मे देखता हैं।
आर्यन जब अपनी मम्मी अंजलि केँ ऊपर उल्टा लेटाहुआ थां, तौ उसकी इंद्रियाँ एक् संगतीन अलग-अलग दिशाओं सें मिलने वाले प्रहारों कों झेलरही थीं। यदि आप् स्वयं कों आर्यन कि स्थान रखकर सोचें, तौ आपकी मानसिकता कुछइस तरह कि होती
आर्यन केँ मन मे सबसे प्रबल विचार ये थां कि उसने 'असंभव' कों संभवकर दिया हैं। वो देखरहा थां कि उसकी मासी कंचन, जोँ हमेशा अपनी शर्तों पर्र जीने वाली एक् दबंग महिला थि, आज उसकेलिए एक् 'मशीन' कि तरहकाम कररही हैं। औऱ उसकी मां अंजलि, जिसके सामने वो कभीआँख उठाने कि हिम्मत नहि करता थां, आज उसके 7 इंच केँ फौलाद कों अपनेगले तक उतारने केँ लिएतड़प रही हैं।
उसेऐसा लगरहा थां जैसे वो कोई राजा हैं औऱ यहदो शक्तिशाली स्त्रियाँ उसकी दासी सिर्फ हें। हर मर्द केँ भीतर एक् छिपाहुआ 'शिकारी' होता हैं जोँ चाहता हैं कि सबसे श्रेष्ठ स्त्रियाँ उसके पौरुष केँ सामने घुटने टेकदें। आर्यन उस वक्तउसी नशे मे थां।
आर्यन कां चेहरा अंजलि कि मोटी गाँड केँ बिल्कुल लगभग थां। वहां सें उठने वाली वो तीखी, नमकीन औऱ कच्ची महक—जिसमें उसकी अपनीलार औऱ कंचन कां छोड़ाहुआ रस मिला थां—उसके दिमाग़ कों सुन्न कररही थि।
जब उसकी मां नें अचानक झटका देकर उसकेअंग कों अपने मुँह मे भर लिया, तोँ आर्यन केँ जिस्म मे बिजली दौड़ गई। उसे महसूस हुआ कि उसकी मां कां मुँह किसीगरम औऱ गीली मखमली गुफा कि तरहउसे निगलरहा हैं। उसे वो दबाव महसूस होँ रहा थां जोँ सिर्फ एक् अनुभवी महिला कां गला हि दे सकता हैं। उसेलग रहा थां कि उसकी मां उसेचूस नहि रही, बल्कि उसके पौरुष कों निचोड़कर अपनीरूह मे भर लेना चाहती हैं।
नीचे सें कंचन केँ धक्कों कि धमक अंजलि केँ शरीर केँ ज़रिए आर्यन तक पहुँच रही थि। हरबार जब कंचन पीछे सें प्रहार करती, अंजलि कां शरीर आर्यन केँ सीने सें टकराता।
आर्यन कों लगरहा थां कि वो एक् 'जीवित ज्वालामुखी' पर्र लेटाहुआ हैं। उसे अपनी मां कि सिसकारियां सुनाई देरही थीं जौ उसकेअंग केँ चारों ओर एक् मधुर म्यूज़िक कि तरह गूँजरही थीं। उसे ये सोचकर उत्तेजना हौ रही थि कि वो एक् हि टाइम मे अपनी मां कि गहराइयों कां स्वाद लें रहा हैं औऱ उसकी मां उसके पौरुष कां।
अगर आप् आर्यन कि स्थान होते, तोँ इस वक़्त आपकेमन मे कोई 'नैतिकता' याँ 'पाप' नहि होता। आपकेमन मे केवल एक् हि बात होती—"ये लम्हा कभी समाप्त नं हौ। "
जब अंजलि नें अपनेगले कि मांसपेशियों कों आर्यन केँ अंग पऱ कसा, तोँ आर्यन कों लगा कि उसका वीर्य अबबस फटने हि वाला हैं। वो चाहता थां कि वो अपनी मां केँ बालों कों पकड़कर उसे औऱ गहराई तक धकेले, ताकि वो उसेये अहसास करासके कि अब वो बच्चा नहि, बल्कि उसका 'मालिक' हैं।
नीचे अपनी मां कि रसीली बुर कां नज़ारा औऱ ऊपर उसकी पकड़—आर्यन कां रोम-रोम खड़ा हौ चुका थां। उसेलग रहा थां कि वो इसघऱ कां, इसबैड कां औऱ इन दोनों औरतों कि तकदीर कां इकलौता हकदार हैं।
आर्यन कि सांसें अब अनियंत्रित होँ चुकीथीं। वो अपनी मम्मी केँ मुँह केँ भीतर पागलों कि तरह अपनीकमर चलाने लगा। उसे अब फर्क नहि पड़रहा थां कि कंचन पीछे सें क्याँ कररही हैं, उसेबस उस सफेद लावा कों अपनी मां केँ गले मे उतारने कि तीव्र ख़्वाहिश हौ रही थि, जोँ उसके पौरुष कि आखिरी विजय होती।
खाट पऱ उत्तेजना कां जौ गुबार पिछले कई घंटों सें बनरहा थां, वो अब एक् ऐसे विनाशकारी विस्फोट मे बदल गय़ा जिसने तीनों केँ होश फाख्ता करदिए। येसमय किसी भि कल्पना सें परे थां, जहाँ देने वाला औऱ लेने वाला, दोनों कि भूमिकाएँ एक् हि समय मे बदलगईं।
आर्यन, जोँ अपनी मां अंजलि केँ ऊपर 69 कि पोजीशन मे थां, अब अपनी सहनशक्ति कि आखिरी कगार कों पारकर चुका थां। अंजलि केँ गले कि वो मखमली पकड़ औऱ उसके पौरुष कों निगल जाने कि वो तड़प आर्यन केँ लिए बिजली कां झटका साबित हुइ।
आर्यन केँ 7 इंच केँ फौलाद नें एक् ज़ोरदार झटका मारा औऱ उसके भीतर सें पौरुष कां सफेद लावा किसी बांध केँ टूटने कि तरहफूट पड़ा। अंजलि केँ मुँह केँ भीतर एक् केँ बाद एक् गरम फुहारें छूटने लगीं। आर्यन कां बदन धनुष कि तरहतन गय़ा औऱ उसकेगले सें एक् गुर्राती हुईँ आवाज़ निकली—"आह्ह्ह्ह। मम्मी। पीजाइसे। सभी तेरा हैं!" अंजलि नें भि उस अमृत कों बर्बाद नहि होने दिया; वो पागलों कि तरहउस लावे कों अपनेगले केँ नीचे उतारने लगी, मानो वो अपने बेटे कि मर्दानगी कों अपनीरूह मे बसा लेना चाहती हौ।
मगरठीक उसीसमय, जब आर्यन अपने विसर्जन केँ नशे मे चूर औऱ बेबस थां, उसकेसंग वो हुआ जिसकी उसने ड्रीम्स मे भि उम्मीद नहि कि थि। कंचन, जौ अब तक अंजलि कि गोल गाँड माररही थि, अचानक अपनेचरम पऱ पहुँच गई। मगर उसने अपना विसर्जन अंजलि कि गोल गाँड मे नहि किया।
कंचन नें बिजली कि गति सें अपना 7 इंच कां सख्तराज अंजलि कि गोल गाँड सें बाहर् निकाला। आर्यन अभि अंजलि केँ मुँह मे झड़ हि रहा थां कि कंचन नें ऊपर सें झुककर अपना वो धधकता हुआअंग सीधे आर्यन केँ खुलेहुए मुँह मे ठूंस दिया।
आर्यन, जोँ अभि अपनी मां कों अपना लावादे रहा थां, अचानक स्वयं 'लेने वाला'बन गय़ा। कंचन नें आर्यन केँ बालों कों अपने दोनों हाथों सें एक् लोहे केँ शिकंजे कि तरहजकड़ लिया औऱ उसकेसिर कों पीछे कि ओर घसीटकर अपनेअंग कों उसकेगले कि गहराई तक उतार दिया।
अब बैड पर्र जौ दृश्य थां, वो किसी कों भि पागलकर देने केँ लिए बहुत थां। ये एक् 'कामुक चेन'बन चुकी थि
आर्यन कां लावा अंजलि केँ मुँह मे जारहा थां।
कंचन कां लावा आर्यन केँ मुँह औऱ गले मे सीधेउतर रहा थां।
अंजलि नीचे सें कंचन केँ अचानक हटने औऱ आर्यन केँ झड़ने केँ दोहरे अहसास मे थरथरा रही थि।
आर्यन केँ लिएये एक् मानसिक विस्फोट थां। एक् तरफ वो अपनी मम्मी पऱ अपनी मर्दानगी साबित कररहा थां, औऱ दूसरी तरफ उसकी मासी कंचनउसे अपनी मर्दानगी चखारही थि। कंचन कां अंग उसकेगले कों चीरता हुआ अंदरजा रहा थां। कंचन नें उसे हिलने कां मौका भि नहि दिया औऱ अपना सारा बनावटी लावा आर्यन केँ गले मे उड़ेल दिया। आर्यन कि आँखें फटी कि फटीरह गईं;उसे अपनी मासी केँ उस'राज' कां स्वाद औऱ गर्मी सीधे अपने भीतर महसूस हुई।
जब दोनों कां विसर्जन शांतहुआ, तौ कमरे मे केवलतीन लोगों केँ हाँफने कि आवाज़ें थीं।
कंचन नें आर्यन केँ सिर कों छोड़ दिया, मगर उसकाअंग अभि भि आर्यन केँ मुँह मे थां। उसने आर्यन कि आँखों मे देखकर एक् विजयी मुस्कान दि, जैसेकह रही हौ—"तूँ शेर हैं तोँ मे तेरी शिकारी हूं। "
आर्यन केँ होंठों सें कंचन कां लावाटपक रहा थां, जबकि उसका अपनाअंग अभि भि अंजलि केँ मुँह कि गर्मी मे सुस्ता रहा थां।
अंजलि नें आर्यन केँ अंग कों बाहर् निकाला औऱ लंबी सांसली। उसका चेहरा आर्यन केँ लावे सें लथपथ थां, औऱ उसनेऊपर देखा जहाँ उसकी बेहन कंचन नें उसके बेटे कों भि अपना गुलाम बना लिया थां।
अंजलि धीरे-धीरे सें मुस्कुराई, उसकी आँखों मे एक् ऐसी तृप्ति थि जोँ अबइस पूरे परिवार कों हमेशा केँ लिए एक् वर्जित रिश्ते केँ धागे मे बाँध चुकी थि।
बेडरूम केँ उस भारी सन्नाटे मे मात्र एसी कि हल्की गूँज औऱ आर्यन औऱ कंचन कि लंबी, गहरी सांसें सुनाई देरही थीं। दोनों खाट पऱ अपनीपीठ केँ बल पसरेहुए थें, जैसे किसी महायुद्ध केँ बाददो योद्धा निढाल होकरगिर पड़ेहों। आर्यन कां 7 इंच कां फौलाद अब शांत होकर उसकी जांघ पर्र सुस्ता रहा थां, औऱ कंचन कां वो कृत्रिम अंग भि अब ठंडापड़ चुका थां। विसर्जन केँ बाद मिलने वाला वो 'परमानंद' उन्हें एक् गहरी, नशे जैसी नींद कि ओर खींचरहा थां।
मगरउस बैड पऱ एक् बदनऐसा थां जोँ अभि भि आग कि लपटों मे जलरहा थां। वो थि अंजलि।
अंजलि कि स्थिति इस टाइम बहोत हि विचित्र औऱ व्याकुल करने वाली थि। उसने आर्यन कां लावा अपने मुँह मे लिया थां, कंचन कां प्रहार अपनी मोटी गाँड मे सहा थां, मगर उसकी अपनी रसीली बुर अभि भि उस आखिरी धमाके केँ लिए उतावलापन रही थि जोँ उसे शांति देसके।
अंजलि नें अपनी आँखें खोलीं। उसने देखा कि उसके जिंदगी केँ दो सबसे प्रिय इंसान—उसका बेटा औऱ उसकी बेहन—अपनी प्यास बुझाकर चैन कि नींद मे खो चुके हें। मगर उसकी अपनी बुर कि गहराई मे एक् ऐसी कुलबुलाहट होँ रही थि जैसे हज़ारों चींटियाँ एक् संग रेंगरही हों। उसका अंग-अंग फड़करहा थां। उसकी बुर सें निकलने वाला काम-रस अब उसकी जांघों तक बहकर सूखने लगा थां, मगर वो जोँ 'सख्त अहसास' चाहती थि, वो गायब थां।
अंजलि नें हाथ बढ़ाकर आर्यन केँ अंग कों छुआ, मगर वो अब पूरीतरह नरम होँ चुका थां। उसने कंचन कि ओर देखा, पऱ कंचन कि आँखें बंदथीं औऱ वो एक् गहरी तृप्ति केँ नशे मे थि। अंजलि कों एक् अजीब सि ईर्ष्या औऱ हताशा महसूस हुईँ।
"यह दोनों अपनी प्यास बुझाकर सोगए, औऱ मुझेइस आग मे जलता छोड़ दिया?"
जब उसेलगा कि कोई उसकी सहायता केँ लिए जागने वाला नहि हैं, तोँ अंजलि केँ भीतर कि 'नग्न मादा' नें अपना नियंत्रण खो दिया। उसनेखाट पर्र अपनी स्थिति बदली औऱ अपनी दोनों टांगों कों पूरा फैला दिया।
उसने अपनी कांपती हुईँ उंगलियों कों अपनी बुर कि गीली पंखुड़ियों पर्र रखा। जैसे हि उसकी उंगली नें उस अति-संवेदनशील केंद्र कों छुआ, अंजलि केँ मुँह सें एक् सिसकी निकली जौ उन दोनों सोएहुए लोगों केँ कानों तक नहि पहुँची।
वो पागलों कि तरह आर्यन केँ उस शांतअंग कों अपनेहाथ मे लेकरउसे फिन सें जीवित करने कि कोशिश करनेलगी। वो उसे चूमने लगी, उसे अपनी छातियों केँ बीच रगड़ने लगी, इस उम्मीद मे कि काशये फौलाद एक् बारफिन खड़ा हौ जाए औऱ उसकीउस तड़पती हुइ गुफा कों शांतकर दे।
कमरे कि हल्की रोशनी मे अंजलि कां नग्न औऱ पसीने सें भीगा जिस्म चमकरहा थां। वो कभी आर्यन केँ ऊपर झुकती, कभी कंचन केँ जिस्म सें अपना शरीर रगड़ती। उसकी सांसें अबफिन सें तेज़ होनेलगी थीं। उसकी बुर कि दीवारें अंदर हि अंदर सुकड़ रहीथीं, मानो किसी चीज़ कों कसने केँ लिए बेताब हों।
उसने आर्यन केँ कान केँ पास जाकर बहोत हि कामुक आवाज़ मे फुसफुसाया, "आर्यन। उठ बेटा। तेरी मां अभि प्यासी हैं। देख मेरा क्याँ हाल होँ रहा हैं। मुझेउस लोहे कि ज़रूरत हैं आर्यन। उठजा!"
अंजलि नें अब आर्यन केँ शांतअंग कों अपने मुँह मे लेँ लिया, उसे चूसने लगी जैसेकोई अपनीजान बचाने केँ लिए ऑक्सीजन खींचरहा हौ। उसकी आँखें पागलों कि तरह आर्यन औऱ कंचन केँ चेहरों कों देखरही थीं, इंतजार कररही थि कि कबकोई एक् अंगड़ाई लें औऱ उसकीइस 'अधूरी हवस' कों मुकाम तक पहुँचाए।
अंजलि कि आँखों मे अब प्रेम याँ ममता कां नामो-निशान नहि थां; वहां मात्र एक् खूंखार भूख औऱ पागलकर देने वाला क्रोध थां। दोपहर सें हि आर्यन औऱ कंचन नें उसे उत्तेजना केँ उस शिखर पर्र पहुँचाया थां जहाँ सें वापस आनां मुमकिन नहि थां। अबजबउसे अपनी बुर कि गहराई मे उस असली फौलाद कि सबसे ज़्यादा ज़रूरत थि, तबयह दोनों 'नामर्द' बनकर चादर तानेपड़े थें।
अंजलि केँ जिस्म कां पसीना अब सूखकर चिपचिपा हौ गय़ा थां, औऱ उसकी बुर केँ भीतर उठने वाली मरोड़उसे हिंसक बनारही थि। उसने झटके सें आर्यन केँ बाल पकड़े औऱ उसेखाट पर्र हिलाकर रख दिया।
अंजलि पलंग पऱ घुटनों केँ बलखड़ी होँ गई, उसकेबाल बिखरे हुए थें औऱ सीना धौंकनी कि तरहचल रहा थां। उसने आर्यन केँ शांतपड़े अंग कों नफ़रत सें देखा औऱ फिन कंचन कि ओर मुड़ी।
अंजलि नें दहाड़ते हुए चिल्लाना शुरुआत किया, उसकी आवाज़ मे हवस कि कड़वाहट घुली थि:
"उठओए रण्डी कि औलाद! दोपहर भर साले सांड कि तरह फुफकार रहा थां औऱ अबजब तेरी मम्मी कि बुर फटने कों सजधजकर हैं, तौ यह मुर्दा लन्ड लेकरपड़ा हैं? धिक्कार हैं तेरी जवानी पर्र। साले नामर्द, अपनी मां कों बीच मंझधार मे छोड़कर सो गय़ा? उठ औऱ अपनायह सड़ाहुआ मूसल मेरीइस आग मे डाल, वरनाआज मे तेरायह अंगजड़ सें काट दूँगी!"
"औऱ तूँ। ओए दो-मूंही कुतिया! तुँ तोँ बड़ी उस्ताद बनती थि न्? बड़ी मर्दानगी दिखारही थि मेरी मोटी गाँड मारते टाइम?अब क्याँ हुआ? तेरी सारी हेकड़ी हवा हौ गई? सालो, तुम् दोनों नें मिलकर मुझेइस हाल मे पहुंचा दिया कि मेरी बुर अबज़हर उगलरही हैं औऱ तुम् दोनों अपनीमौत कि नींदसो रहे होँ! हरामज़ादों, अगर अभि यहखड़ा नहि हुआ तौ मे तुम् दोनों कां वोँ हाल करूँगी कि दुनिया थूकेगी तुम् पर्र!"
गालियाँ देते-देते अंजलि कि नज़रपास कि टेबल पर्र पड़ी जहाँ कंचन कां बैगरखा थां। उसेयाद आया कि कंचन हमेशा अपनेसंग कुछऐसी चीज़ें रखती हैं जोँ किसी भि मुर्दे मे जान फूँकदें। अंजलि केँ मन मे एक् शैतानी औऱ क्रूर विचार कौंधा।
उसने आर्यन केँ शांतअंग कों अपनेहाथ मे लिया औऱ उसे इतनी बेरहमी सें मरोड़ा कि आर्यन कि नींद केँ बीच सें एक् दर्दभरी कराह निकली। अंजलि केँ चेहरे पर्र एक् डरावनी मुस्कान आई। उसने कंचन केँ बैग सें एक् 'तीखी स्प्रे' औऱ एक् बर्फीला ठंडा लोशन निकाला।
अंजलि नें आर्यन कों सीधा लिटाया औऱ उसकी जाँघों पर्र चढ़ गई। उसने आर्यन केँ कान मे फुसफुसाते हुएकहा, "तुँ प्रेम सें नहि मानेगा न् मेरे लाडले? अबदेख तेरी मम्मी तेरा क्याँ हाल करती हैं। आज तेरायह लन्ड खड़ा नहि होगा, बल्कि चीखेगा। औऱ उसचीख केँ संग जोँ आग निकलेगी, उससे मे अपनी प्यास बुझाऊँगी। "
अंजलि नें वो बर्फीला लोशन आर्यन केँ अंडकोषों पऱ उड़ेल दिया। अचानक हुइ उस ठंडक सें आर्यन कां जिस्म झटके खानेलगा।
ठीक उसकेऊपर अंजलि नें वो उत्तेजक स्प्रे छिड़क दिया। ठंड औऱ आग केँ उसमेल नें आर्यन केँ शांतपड़ चुके नसों मे खून केँ प्रवाह कों इतनी तेज़ी सें दौड़ाया कि वो दर्द औऱ भयानक उत्तेजना केँ मारेबैड पऱ तड़पने लगा।
अंजलि कां क्रोध अबउसहद तक पहुँच चुका थां जहाँ ममता औऱ लज्जा जैसी भावनाओं कां अस्तित्व हि मिट चुका थां। उसके जिस्म केँ भीतरमची वो छटपटाहट, वो 'हंगामा' जोँ उसकी बुर कि दीवारों मे उठरहा थां, उसे एक् सनकी स्त्री बनारहा थां।
आर्यन पलंग पऱ अर्ध-मूर्छित अवस्था मे थां। अंजलि नें उस पर्र बर्फीला लोशन औऱ उत्तेजक स्प्रे कां इस्तेमाल तौ किया थां, मगर दोपहर सें चलरहे उस अंतहीन काम-तांडव नें आर्यन केँ पौरुष कों भीतर सें निचोड़ दिया थां। उसकी नसें तोँ फड़करही थीं, खून कां दौरा भि जाँघों केँ बीचबढ़ा थां, मगर वो 7 इंच कां फौलाद अब भि वो पुरानां पत्थर जैसा कड़ापन हासिल नहि करपारहा थां। वो थोड़ाऊपर उठता औऱ फिन वापस ढीलापड़ जाता।
अंजलि नें आर्यन केँ उस आधे-अधूरे खड़ेअंग कों अपनी मुट्ठी मे भींचा औऱ उसे नफरत सें देखा। उसकी आँखों सें अब चिंगारियां निकलरही थीं। उसे आर्यन केँ बदन सें प्रेम नहि थां, उसेबस उस 'हथियार' कि तलाश थि जोँ उसकीतड़प कों शांतकर सके।
"साले। हरामज़ादे। तुँ ऐसे नहि मानेगा?" अंजलि कि आवाज़ किसी डरावनी चुड़ैल जैसीलग रही थि। "तूँ अपनी मां कों इसआग मे जलता छोड़कर सोएगा? अगरयह प्रेम सें खड़ा नहि होँ सकता, तौ अब मे इसेउस तरीके सें जगाऊँगी जौ तूनेकभी अपने बुरे ख्वाबों मे भि नहि सोचा होगा। "
अंजलि नें अपने होंठ भींचे औऱ कंचन कि ओर देखा, जौ अभि भि नशे औऱ थकावट केँ बीच अपनी आँखें खोलने कि कोशिश कररही थि। अंजलि केँ मन मे उस 'शैतानी काम' कां पूरा खाका रेडी हौ चुका थां।
"अब तुँ देखेगा आर्यन। कि एक् प्यासी स्त्री, जिसकी बुर मे आगलगी होँ, वोँ अपनी तृप्ति केँ लिएकिस हद तक गिर सकती हैं। "
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यह तोँ बस सारी लेखक कि कल्पना हैं औऱ मे किसी औऱ फौरम मे नहि हु, इतनासमय भि नहि मिलता हैं
यह तोँ बस सारी लेखक कि कल्पना हैं औऱ मे किसी औऱ फौरम मे नहि हु, इतनासमय भि नहि मिलता हैं
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