Doctor मां – New Episode
शहर केँ एक् पॉश इलाके मे एक् छोटामगर बहोत हि सलीके सें सजाहुआ प्राइवेट क्लिनिक हैं। बाहर् बोर्ड पर्र लिखा हैं— "डॉ। अंजलि, एम.डी। (General Physician)"।
अंजलि कि उम्र 42 साल हैं, मगरउसे देखकर कोईकह नहि सकता। योग औऱ अनुशासन नें उसकेबदन कों एक् तराशा हुआरूप दिया हैं। उसकी त्वचा अभि भि मखमली हैं, औऱ जब वो सफेद एप्रन पहनती हैं, तोँ उसकी पर्सनैलिटी मे एक् अजीब सां आकर्षण औऱ अधिकार (Authority) झलकता हैं। वो एक् डॉक्टर होने केँ संग-संग एक् मम्मी भि हैं, जौ अपनेघऱ औऱ करियर कों अकेले संभाल रही हैं।
उसका पति, जोँ विदेश मे एक् बड़ा कॉन्ट्रैक्टर हैं, साल मे मुश्किल सें एक् याँ दोबार हि घऱआता हैं। पैसों कि कोईकमी नहि हैं, मगर अंजलि केँ खाट मे पिछले कई सालों सें एक् ठंडी खामोशी पसरी हुईँ हैं। एक् जवान औऱ हसीन महिला केँ बदन कि ज़रूरतें अक्सर उसके डॉक्टर वाले एप्रन केँ नीचेदबी रह जाती हें।
उसका बेटा, आर्यन, अब 19 साल कां होँ चुका हैं। वो कॉलेज मे हैं औऱ दिखने मे बिल्कुल अपने पिता जैसा गठीला औऱ लंबा हैं। आर्यन अक्सर अपनी मम्मी केँ क्लिनिक पर्र हाथ बटाने याँ बस टाइम बिताने चलाआता हैं।
दोपहर केँ दोबजरहे हें। क्लिनिक मे अंतिम मरीजजा चुका हैं। बाहर् धूप तेज़ हैं औऱ क्लिनिक केँ अंदरएसी कि ठंडीहवा एक् अजीब सां चैनदे रही हैं। अंजलि अपनी केबिन मे बैठीकुछ फाइल्स देखरही हैं। सफेद शर्ट केँ ऊपर डॉक्टर कां कोट हैं, औऱ उसने अपने बालों कों एक् जूड़े मे बांधरखा हैं जिससे उसकी लंबी औऱ गोरी गर्दन साफचमक रही हैं।
तभी केबिन कां द्वार (दरवाज़ा) धीरे-धीरे सें खुलता हैं औऱ आर्यन अंदरकदम रखता हैं। क्लिनिक अब पूरीतरह खाली हैं, केवल मम्मी औऱ बेटा इस ठंडे औऱ शांत माहौल मे अकेले हें।
आर्यन केबिन केँ अंदरआता हैं औऱ अपनी मां केँ सामने वाली कुर्सी पऱ आहिस्ता धंस जाता हैं। अंजलि अपनी फाइलें एक् तरफ रखती हैं औऱ चश्मा उतारकर अपनीमेज पऱ रख देती हैं। उसकी आँखों मे थकावट तोँ हैं, मगर बेटे कों देखकर एक् चैनभरी चमक आँ जाती हैं।
"बड़ीदेर कर दि आज? कॉलेज मे कोई एक्स्ट्रा क्लास थि याँ फिन दोस्तों केँ संग कहीं निकल गय़ा थां?" अंजलि नें अपनी कुर्सी केँ पीछेटेक लगाते हुए पूछा।
आर्यन मुस्कुराया, "नहि मम्मी, बस वोँ प्रोजेक्ट सबमिट करना थां। औऱ वैसे भि, बाहर् इतनी गर्मी हैं कि कहीं जाने कां मन हि नहि हुआ। सोचा आपकेसंग हि घऱ चलूँगा। "
अंजलि नें घंटी बजाकर अपने अटेंडेंट कों दोकपगरम चाय लाने कां इशारा किया। अगलेकुछ मिनटों तक उनकेबीच कॉलेज केँ प्रोफेसरों, असाइनमेंट केँ बोझ औऱ आर्यन केँ दोस्तों कि शरारतों पर्र बातें होती रहीं। अंजलि एक् मां कि तरह उसकी बातें सुनरही थि, बीच-बीच मे उसे टोकती औऱ कभी-कभी उसकी किसीबात पर्र खिलखिलाकर हँस पड़ती।
बातों-बातों मे ज़िक्र विदेश मे बैठे आर्यन केँ पिता कां चलपड़ा।
"आज पिताजी कां मोबाइल आया थां सुभह, " अंजलि नें गरमचाय कां कप उठाते हुएकहा। "कहरहे थें कि इसबार कॉन्ट्रैक्ट कुछ अधिक हि बड़ामिल गय़ा हैं। शायद दिवाली पऱ भि उनका आनां मुश्किल होँ। "
आर्यन केँ चेहरे पऱ थोड़ी मायूसी आई। "बापू हमेशा काम मे हि उलझे रहते हें। आपको नहि लगता मां कि उन्हें अब वापस आँ जानां चाहिए? आखिरकब तक हम् ऐसे अलग-अलग रहेंगे? आपको उनकीकमी महसूस नहि होती?"
अंजलि गरमचाय कि चुस्की लेतेहुए कुछ लम्हा केँ लिए खामोश हौ गई। उसकी नज़रें खिड़की सें बाहर् कि धूप पर्र टिकीथीं। "बेटा, ज़िम्मेदारियाँ इंसान कों बहोत दूर लेँ जाती हें। कमी तोँ खलती हैं, पऱ अबआदत सि हौ गई हैं। खैर, तुँ बता.साम केँ खाने मे क्याँ बनवाना हैं? आज तेरा पसन्द मलाई कोफ्ता बनवाऊँ?"
आर्यन अपनी मां केँ चेहरे कों गौर सें देखरहा थां। उसे महसूस हुआ कि मम्मी कि इस सादगी औऱ मुस्कुराहट केँ पीछे एक् अकेलापन हैं जिसे वोँ कभी ज़ाहिर नहि होने देतीं। वे दोनों बहुतदेर तक खाने केँ मेनू, घऱ कि साफ-सफाई औऱ आने वाले संडे केँ प्लान्स पऱ चर्चा करतेरहे।
पूरे क्लिनिक मे केवलउन दोनों कि आवाज़ें गूँजरही थीं। कोई हड़बड़ी नहि थि, बस एक् लंबा औऱ गहरा संवाद थां जोँ मम्मी-बेटे केँ बीच केँ उस मज़बूत धागे कों दिखारहा थां,
केबिन कि खिड़की सें बाहर् कां आसमान अब गहरा नारंगी होनेलगा थां। दिनभर कि तपिशअब हल्की ठंडीहवा मे बदलरही थि। अंजलि नें अपनीमेज पर्र रखी अंतिम फाइलबंद कि औऱ उसे दराज मे रख दिया। उसने अपनी कलाई घड़ी देखी—साढ़े छहबज चुके थें।
"चलो आर्यन, अब निकलना चाहिए। आज वैसे भि क्लिनिक मे बहुतदेर होँ गई, " अंजलि नें उठतेहुए कहा। उसने अपना सफेद डॉक्टर वाला एप्रन उतारा औऱ उसे पीछे टंगे हैंगर पऱ बड़े करीने सें टांग दिया। एप्रन हटने केँ बाद उसकी नीली रेशमी कुर्ती औऱ सफेद ट्राउज़र उसके व्यक्तित्व कों एक् अलग हि कोमलता देरहे थें।
आर्यन भि कुर्सी सें उठा औऱ अपनाबैग कंधे पर्र लटका लिया। "हाँ मां, चलिए। मुझे भि भूख लगनेलगी हैं। "
अंजलि नें अपना हैंडबैग उठाया औऱ एक् बार कमरे कां मुआयना किया कि कहींकोई लाइट याँ एसी खुला तोँ नहि रह गय़ा। वो अपनी चीज़ों कों लेकर हमेशा बहोत अनुशासित रहती थि। जबवे केबिन सें बाहर् निकले, तौ गलियारे मे हल्की छाया थि। अटेंडेंट पहले हि जा चुका थां, इसलिये पूरा क्लिनिक अब मात्र उन दोनों केँ कदमों कि आवाज़ सें गूँजरहा थां।
"आज तुम् ड्राइव करोगे याँ मे करूँ?" अंजलि नें क्लिनिक केँ मुख्य दरवाजे कां ताला लगाते हुए पूछा। चाबियों कां गुच्छा उसकेहाथ मे खनका, जिसकी आवाज़ उस शांतसाम मे साफ सुनाई दि।
"मे हि करूँगा मां, आप् थक गई होंगी दिनभर पेशेंट्स देख-देख कर, " आर्यन नें चाबियाँ अपनीओर बढ़ाने कां इशारा किया। अंजलि नें मुस्कुराते हुए चाबियाँ उसेथमा दीं।
वे दोनों सीढ़ियों सें नीचे उतरकर पार्किंग कि ओर बढ़े। पार्किंग लॉट मे अब मात्र अंजलि कि सफेद सेडान खड़ी थि। साम कि हल्की रोशनी वाहन केँ कांच पऱ चमकरही थि। आसपास केँ पेड़ों सें पक्षियों केँ चहचहाने कि आवाज़ें आँ रहीथीं।
कार केँ पास पहुँचकर आर्यन नें रिमोट सें लॉक खोला। बीप-बीप कि आवाज़ हुइ। अंजलि पैसेंजर सीट कि तरफ गई औऱ अपनाबैग पीछे वालीसीट पर्र रखा। कार केँ अंदर बैठने सें पहले उसने एक् बार गहरी सांसली औऱ ढलते सूरज कों देखा।
"आज कि साम कितनी शांत हैं नं, आर्यन?" उसने धीरे-धीरे सें कहा।
आर्यन नें ड्राइवर सीट पऱ बैठते हुए जवाब दिया, "हाँ मम्मी, बहोत। बसअब जल्दघऱ पहुँचकर हाथ-मुँह धोकरगरम चाय पीते हें। "
अंजलि वाहन मे बैठी औऱ दरवाजा बंद किया। वो भारी दरवाजा बंद होने कि आवाज़ उस खामोश पार्किंग मे एक् अंत कि तरह गूँजी—जैसे आज कां कामकाजी दिन ख़त्म हौ गय़ा होँ। आर्यन नें इंजन स्टार्ट किया, हेडलाइट्स जलाईं औऱ कार आरामसे क्लिनिक केँ गेट सें बाहर् निकलकर मुख्य मार्ग कि ओरबढ़ चली।
गाड़ीअब शहर कि मुख्य सड़क पर्र थि, जहाँसाम केँ ट्रैफिक कि पीली लाइटें औऱ हंगामा-शराबा शुरुआत हौ गय़ा थां। केबिन केँ अंदर एक् तरफ इंजन कि दबी हुइ आवाज़ थि औऱ दूसरी तरफएसी कि हल्की सि सरसराहट। आर्यन कां पूरा ध्यान सड़क पऱ थां, औऱ अंजलि बगल वालीसीट पर्र आहिस्ता सिर टिकाए बाहर् भागती रोशनी कों देखरही थि।
"आर्यन." अंजलि नें धीमे सें चुप्पी तोड़ी, "मलाई कोफ्ता कां तौ तूने दोपहर मे कहा थां, पर्र मुझेलग रहा हैं कि संग मे कुछ ताज़ा सब्जियाँ भि होनी चाहिए। फ्रिज मे तौ बसवही दो-चार सूखी हुई भिंडियाँ पड़ी हें। "
आर्यन नें गियर बदलते हुए हल्का सां सिर हिलाया, "मम्मी, आप् जैसा बोलो। वैसे भि बाहर् कां खानां खा-खाकर मे बोर हौ गय़ा हूं। आपकेहाथ कां बना सादा खानां हि बेस्ट होता हैं। "
अंजलि मुस्कुराई, "चापलूसी करना तौ कोई तुझसे सीखे। अच्छा सुन, यहा सें जौ अगलामोड़ हैं, वहा सें गाड़ी मार्केट कि तरफ घुमा लें। पास हि मे वोँ जोँ नया 'मार्ट' खुला हैं नाँ, वहीं चलते हें। वहां सब्जियाँ एकदम फ्रेश मिल जाती हें औऱ थोड़ाघऱ कां दूसरा राशन-पानी भि देख्ना हैं। "
आर्यन नें इंडिकेटर दिया औऱ गाड़ी कों मार्केट वालीलेन मे डाल दिया। साम कां टाइम थां, इसलिये बाज़ार मे बहुत चहल-पहल थि। लोग अपने थैलेलिए इधर-उधर घूमरहे थें।
"मां, आपको नहि लगता कि आप् दिनभर क्लिनिक मे थकने केँ बादयह सभीकाम स्वयं करके अपनी थकावट बढ़ा लेती होँ?" आर्यन नें चिंता जताते हुएकहा, "आप् मुझे लिस्ट दे दियाकरो, मे कॉलेज सें आतेसमय लेँ आया करूँगा। "
अंजलि नें प्रेम सें आर्यन कि तरफ देखा, "अरे बुद्धू, यह गृहस्थी केँ काम थकावट नहि, बल्कि मन कों चैन देते हें। दिनभर मरीज़ों कि बीमारी औऱ उनकी परेशानियों कों सुनने केँ बाद, साम कों ताज़ा टमाटर औऱ पालक चुनना मेरेलिए एक् तरह कि थेरेपी जैसा हैं। औऱ फिन, तेरेसंग इसी बहाने थोड़ी औऱ बातें भि तौ हौ जाती हें। "
गाड़ीअब मार्ट कि पार्किंग मे पहुँच चुकी थि। आर्यन नें एक् खाली स्थान देखकर गाड़ी वहां सलीके सें खड़ीकर दि। इंजनबंद होते हि एक् समय केँ लिए केबिन मे गहरा सन्नाटा छा गय़ा।
"अच्छा चल, तूँ यहीं गाड़ी मे बैठना चाहेगा याँ अंदर चलेगा मेरेसंग?" अंजलि नें अपना पर्स संभालते हुए पूछा।
आर्यन नें मुस्कुराकर दरवाजा खोला, "अकेले आपको इतने सारे थैले थोड़े हि उठाने दूँगा। चलिए, आज आपकी पसन्द कि सब्जियाँ मे उठवाता हूं। "
अंजलि अपनीसीट सें उतरी औऱ गाड़ी कां दरवाज़ा बंद करतेहुए बोलीं, "ठीक हैं, फिन जल्दचल। वरना अच्छी सब्जियाँ तोँ लोग छाँटकर लें जाएँगे, हमारे हिस्से मे बस डंठल हि बचेंगे। "
साम कि हल्की ढलती रोशनी मे मां-बेटा उस जगमगाते हुए मार्ट कि ओरबढ़गए। क्लिनिक कि थकानअब धीरे धीरे एक् आम घरेलू साम कि व्यस्तता मे बदलरही थि।
मार्ट केँ अंदर दाखिल होते हि ठंडीहवा औऱ हल्की रोशनी नें उनका स्वागत किया। आर्यन नें बाहर् सें हि एक् ट्रॉली खींचली औऱ अपनी मां केँ पीछे-पीहार होँ लिया। साम कां वक़्त थां, इसलिये मार्ट मे बहुत चहल-पहल थि, मगर अंजलि कों इनसभी कि आदत थि। वो बहोत हि सलीके सें गलियारों केँ बीच सें मार्ग बनाते हुए सीधे 'प्रोड्यूस सेक्शन' (सब्जी विभाग) कि ओरबढ़ी।
"आर्यन, तुँ वोँ बास्केट देख, औऱ मे जरा टमाटर चेक करती हूं, " अंजलि नें कहा। वो एक्-एक् टमाटर कों हाथ मे उठाकर बड़ेगौर सें देखरही थि। एक् डॉक्टर होने केँ नाते, साफ-सफाई औऱ क्वालिटी कों लेकर वो बहोत ज़्यादा चूजी थि।
आर्यन ट्रॉली पकड़ेखड़ा अपनी मम्मी कों देखरहा थां। अंजलि नें बड़े ध्यान सें लाल औऱ कड़क टमाटर छाँटकर एक् थैली मे डाले, फिन वो खीरे औऱ ताजीहरी मिर्च कि तरफमुड़ गई। "देख, यह खीरे बिल्कुल ताजे हें। सलाद केँ लिए अच्छे रहेंगे, " उसने एक् खीरा आर्यन कि तरफ बढ़ाते हुएकहा।
आर्यन नें मुस्कुराकर उसे ट्रॉली मे रख दिया। "मम्मी, आप् तौ जैसेलैब मे रिसर्च कररही हों, वैसे सब्जियाँ चुनती होँ। "
अंजलि खिलखिलाकर हँसपड़ी, "बेटा, अच्छी सेहत अच्छी किचन सें हि शुरुआत होती हैं। अगर सामान हि बासी होगा, तौ खाने मे वोँ स्वाद कहां आएगा?"
वे आहिस्ता आगेबढ़े। अंजलि नें कुछ ताजी पालक कि गड्डियां उठाईं औऱ फिन अदरक-लहसुन केँ सेक्शन कि ओरचली गई। आर्यन बीच-बीच मे अपनी मनपसंद कि कुछ चीजें, जैसे डार्क चॉकलेट कां एक् पैकेट औऱ कुछ नट्स, चुपके सें ट्रॉली मे डाल देता, जिस पर्र अंजलि उसे तिरछी नज़र सें देखकर मुस्कुरा देती।
"औऱ कुछरह गय़ा मम्मी?" आर्यन नें पूछाजब वे खाने-पीने वाले गलियारे (Aisle) मे पहुँचे।
"हाँ, थोड़ाआटा लेना हैं औऱ शायद चायपत्ती ख़त्म होने वाली हैं, " अंजलि नें जवाब दिया। उन्होंने अगले पंद्रह-बीस मिनटबड़े हि इत्मीनान सें घऱ कि छोटी-मोटी जरूरतों कां सामान इकट्ठा करने मे बिताए। उनकेबीच दालों केँ भाव, साबुन कि खुशबू औऱ घऱ केँ स्टॉक कों लेकर बहुत लंबी बातें हुईं। अंजलि कों अच्छा लगरहा थां कि उसका बेटा इनसभी छोटे कामों मे इतनी दिलचस्पी लेँ रहा हैं।
बिलिंग काउंटर पर्र बहुतभीड़ थि, इसलिये उन्हें लगभगदस मिनट इंतज़ार करनापड़ा। अंजलि नें अपना कार्ड निकाला, मगर आर्यन नें पहले हि अपना मोबाइल निकाल लिया थां। "मम्मी, आजयह मेरीतरफ सें। बापू नें पिछले हफ्ते जौ पैसे भेजे थें, वोँ अभि वैसे हि रखे हें। "
अंजलि नें पहले तोँ मना करना चाहा, पर्र बेटे केँ चेहरे पऱ गर्व देखकर वो मान गई। "ठीक हैं, बड़े साहब। आज आपकी कमाई सें हि घऱ चलेगा। "
सामान पैक होने केँ बाद, आर्यन नें दोनों भारी थैले अपने हाथों मे उठालिए। वे मार्ट केँ ऑटोमैटिक दरवाजों सें बाहर् निकले, जहाँअब रात कि ठंडक औऱ स्ट्रीट लाइट्स कि रोशनी फैल चुकी थि। पार्किंग तक कां मार्ग छोटा थां, मगर आर्यन बड़े ध्यान सें अपनी मम्मी केँ संगकदम सें कदम मिलाकर चलरहा थां ताकिउसे कोई धक्का न् लगे।
गाड़ी केँ पास पहुँचकर आर्यन नें डिक्की (Boot) खोली औऱ सामान कों सलीके सें अंदररखा। अंजलि नें राहत कि सांसली औऱ अपनीसीट कि तरफबढ़ी। "चलो, अब जल्दघऱ चलते हें। काम बहुत हौ गय़ा आज, " उसनेसीट बेल्ट लगाते हुएकहा।
आर्यन नें भि गाड़ी स्टार्ट कि। मार्ट कि भीड़ कों पीछे छोड़ते हुए, उनकी सफेद सेडान अबरात केँ सन्नाटे मे घऱ कि ओर बढ़नेलगी।
वाहन मार्ट कि पार्किंग सें निकलकर मुख्य मार्ग कि ढलती हुईँ रोशनी मे शामिल हौ चुकी थि। रात कां वक़्त थां औऱ शहर कि स्ट्रीट लाइट्स गाड़ी केँ डैशबोर्ड पर्र बारी-बारी सें परछाइयां बनारही थीं। केबिन केँ अंदर एक् बहोत हि आरामदायक औऱ घरेलू सां माहौल थां।
अंजलि नें सीट सें थोडा पीछे झुककर अपनी आँखें मूंदलीं। दिनभर कि थकानअब आहिस्ता बदन पऱ भारीपड़ रही थि। आर्यन नें देखा कि मां थोड़ी शांत हें, तोँ उसने रेडियो कि आवाज़ थोड़ी औऱ कमकर दि।
"आज बहुत सामान होँ गय़ा, हैं नां मम्मी?" आर्यन नें ट्रैफिक पर्र नज़र रखतेहुए चुप्पी तोड़ी।
अंजलि नें आँखें खोलीं औऱ उसकीतरफ देखकर मुस्कुराई। "हाँ, औऱ शुक्र हैं कि तुम् संग थें। वरना अकेले इतने भारी थैले उठाना औऱ फिनकार चलाना। बहुत मुश्किल हौ जाता। सच कहूँ तोँ, अब मुझे महसूस होता हैं कि तुम् वाकई बड़े हौ गए हौ। "
आर्यन थोडा शरमा गय़ा। "बड़ा तौ होना हि थां मम्मी। आखिरकब तक आप् सभीकुछ अकेले संभालती रहेंगी? वैसे भि, पिताजी केँ बिनायह घऱ औऱ क्लिनिक संभालना कोई छोटीबात नहि हैं। मे तोँ बस आपकी थोड़ी सि सहायता कर देता हूं। "
अंजलि कुछसमय केँ लिए खामोश रही, फिन उसने खिड़की केँ बाहर् भागते हुए पेड़ों औऱ दुकानों कों देखते हुएकहा, "तुम्हारे बापू भि बहोत मेहनत कररहे हें वहां। कल मोबाइल पऱ कहरहे थें कि वहां कां प्रोजेक्ट अब आखिरी चरण मे हैं। उन्हें अपनी मेहनत कां फलमिल रहा हैं, मगर मुझे कभी-कभी लगता हैं कि इस चक्कर मे उन्होंने घऱ कां बहोत सारा वक्तखो दिया हैं। तुम्हारी पूरी किशोरावस्था (Teenage) उन्होंने वीडियो फोन पर्र हि देखली। "
आर्यन नें गियर बदलते हुए जवाब दिया, "मुझे उनसेकोई शिकायत नहि हैं मां। मुझेपता हैं वोँ हमारे भविष्य केँ लिए हि वहां हें। मगरहाँ, आपकीकमी कों वोँ कभी पूरा नहि करपाए। घऱ मे जोँ आपकी अहमियत हैं, वोँ किसी औऱ कि नहि हौ सकती। "
अंजलि नें प्रेम सें आर्यन केँ हाथ पऱ अपनाहाथ रखा। "औऱ मेरी हिम्मत तुम् हौ, आर्यन। जब तुम् कॉलेज सें लौटकर क्लिनिक आँ जाते हौ, तौ मेरीआधी थकान तौ वहींमिट जाती हैं। अच्छा यह बताओ, अगले हफ्ते तुम्हारे कुछ एग्जाम्स भि तोँ थें नाँ? उनकी तैयारी कैसीचल रही हैं?"
बातों कां सिलसिला अब आर्यन कि पढ़ाई, उसके कॉलेज केँ नए दोस्तों औऱ आने वाले सेमेस्टर कि चुनौतियों कि ओर मुड़ गय़ा। अंजलि एक् अनुभवी गाइड कि तरहउसे सलाहदे रही थि—कभी करियर कों लेकर, तौ कभी जिंदगी केँ अनुशासन कों लेकर।
"मां, आप् कभी-कभी बिल्कुल अपनी प्रोफेसर वालीटोन मे आँ जाती हें, " आर्यन नें हँसते हुएकहा।
"क्याँ करूँ? डॉक्टर होने केँ संग-संग एक् मां भि तौ हूं। औऱ एक् मां कां कामकभी ख़त्म नहि होता, " अंजलि नें चुटकी लेतेहुए जवाब दिया।
वे इसीतरह छोटी-छोटी बातों मे उलझे रहे—कभी खाने केँ मसालों पर्र चर्चा, तौ कभी पुरानी यादों कां ज़िक्र। वाहनअब उनकी कॉलोनी केँ गेट केँ अंदर दाखिल हौ चुकी थि। सड़कों पऱ अब सन्नाटा थां औऱ मात्र उनकेघऱ कि खिड़कियों सें आती मद्धम रोशनी दिखाई देरही थि।
वाहन आहिस्ता उनकेघऱ केँ पोर्टिको मे आकर रुकी। इंजनबंद होते हि एक् अजीब सि शांति छा गई, जिसमें केवलउन दोनों कि साँसों कि आवाज़ सुनाई देरही थि।
अभि अभि तोँ स्टोरी शुरुआत हुयी हैं मगर जोँ बात इमेजिन करने मे हैं, शब्दों कों पढ़कर जोँ बाकि किसी मे कहा
नई किस्सा केँ लिए बहोत बहोत शुभकामनाएँ! बहोत हि बढ़िया कथा पहलाभाग हि प्यास कों ब्यान कर दिया हैं अगलेभाग कि इंतजार हैं !
Doctor मां – New Episode
ड्राइंग रूम कि लाइट जलाते हि घऱ जगमगा उठा। आर्यन नें सामान केँ थैले सीधे किचन कि स्लैब पर्र रखदिए, जबकि अंजलि सोफे पऱ बैठकर अपनी सैंडल उतारने लगी। दिन भर कि भागदौड़ औऱ क्लिनिक कि व्यस्तता केँ बाद, घऱ कि ये शांति बहोत सुखदलग रही थि।
"ओह, आखिरकार घऱ पहुँच गए, " अंजलि नें एक् लंबी राहत कि सांस लेतेहुए कहा। "आर्यन, तुँ यह सामान यहीं रहनेदे, मे आकरइसे सलीके सें जमा दूँगी। अभि तौ बसऐसा लगरहा हैं कि गर्म पानी सें नहालूँ तोँ सारी थकानमिट जाए। "
आर्यन किचन सें बाहर् आया औऱ बोला, "हाँ मम्मी, आप् जाओ। वैसे भि पसीने औऱ धूल सें बहुत चिपचिपाहट महसूस होँ रही हैं। मे भि अपने कमरे मे जाकर शावर लें लेता हूं, फिन फ्रेश होकर सब्जी काटने मे आपकी सहायता करूँगा। "
अंजलि मुस्कुराते हुएउठी औऱ अपने कमरे कि ओर बढ़नेलगी। "ठीक हैं, तुँ जा। मे भि बस पंद्रह-बीस मिनट मे आती हूं। आज शावर कि बहोत सख्त ज़रूरत हैं। "
आर्यन भि अपने कमरे कि तरफमुड़ गय़ा। "ठीक हैं मम्मी, मिलते हें थोड़ीदेर मे। "
अंजलि अपने बेडरूम मे दाखिल हुईँ औऱ द्वार (दरवाज़ा) धीरे-धीरे सें बंदकर लिया। उसने खिड़की केँ परदे गिराए औऱ अपनाबैग मेज पर्र रखा। वो आईने केँ सामने खड़ी हुई औऱ अपने जूड़े कों खोल दिया, जिससे उसकेघने बाल उसके कंधों पऱ बिखरगए। उसने एक् गहरी सांसली औऱ अपने बाथरूम कि ओरबढ़ गई।
उधर आर्यन भि अपने कमरे मे पहुँच चुका थां। उसने अपनी शर्ट उतारी औऱ तौलिया उठाकर सीधे बाथरूम कां रुख किया। घऱ केँ दो अलग-अलग कोनों मे, मम्मी औऱ बेटा दोनों हि दिनभर कि धूल औऱ थकान कों उतारने केँ लिए सजधजकर थें। बाहर् हॉल मे अब सन्नाटा थां, बस किचन मे रखे ताजे टमाटरों औऱ सब्जियों कि गंधहवा मे घुली हुई थि।
किचन मे पहुँचते हि मसालों औऱ ताजीकटी हुईँ सब्जियों कि एक् मिली-जुली खुशबू हवा मे तैरने लगी। अंजलि नें चॉपिंग बोर्ड निकाला औऱ बहोत हि सलीके सें प्याज काटने लगी। उसकेहाथ बड़ी फुर्ती सें चलरहे थें—सालों कां अनुभव जोँ थां।
आर्यन नें पासआकर चाकू उठाना चाहा, "मम्मी, लाओ प्याज मे काट देता हूं, आपकी आँखों मे पानी आँ जाएगा। "
अंजलि नें मुस्कुराकर उसे कोहनी सें थोडा पीछे धकेला, "अरेहट, तूँ रहनेदे। तुँ काटेगा तौ आधे मोटे औऱ आधे पतले होंगे। फिन ग्रेवी सही नहि बनेगी। तुँ बस धीरे-धीरे वहां स्टूल पर्र बैठ औऱ मुझेयह बता कि तेरेउस नए प्रोजेक्ट कां क्याँ हुआ जिसके बारे मे तूँ कलबता रहा थां?"
आर्यन वहीं काउंटर केँ पासरखे स्टूल पऱ बैठ गय़ा औऱ अपनी मां कों काम करतेहुए देखने लगा। "प्रोजेक्ट तोँ ठीकचल रहा हैं मम्मी, बस थोड़ी रिसर्च बाकी हैं। वैसे आप् अकेले सभीकर लेती होँ, मुझे बुरा लगता हैं कि मे बस बैठा रहता हूं। "
"बेटा, मां केँ लिए अपने बच्चे कों खिलाना कोईकाम नहि, चैन होता हैं, " अंजलि नें कड़ाही चढ़ाते हुएकहा। अचानक उसकीनज़र कोने मे रखे खालीदूध केँ जग पऱ पड़ी। वो ठिठक गई। "ओह! एक् गड़बड़ हौ गई। "
आर्यन नें चकित होकर पूछा, "क्याँ हुआ मां? नमक ख़त्म होँ गय़ा क्याँ?"
अंजलि नें अपना माथा पीटा, "नमक नहि रे, हम् मार्ट सें दूध लाना हि भूलगए! सुभह कि गरमचाय औऱ रात कों तेरे पीने केँ लिएदूध बिल्कुल नहि हैं। मेरा ध्यान हि नहि रहा, इतनी सारी सब्जियों केँ चक्कर मे मुख्य चीज़ हि रह गई। "
आर्यन जल्दी खड़ा हौ गय़ा। "कोईबात नहि मम्मी, इसमें इतना परेशान होने वाली क्याँ बात हैं? नीचे नुक्कड़ वाली डेयरी खुली होगी अभि। मे बस पाँच मिनट मे लेकरआता हूं। "
अंजलि नें उसे पर्स सें पैसे देतेहुए कहा, "सुन, ज़्यादा दूरमत जानां, अगर नुक्कड़ वाली दुकान बंद हौ तौ लौट आनां, हम् बिनादूध केँ कामचला लेंगे। रात बहुत होँ गई हैं औऱ मे नहि चाहती कि तूँ बेवजह बाहर् भटके। "
"अरे मम्मी, मे बच्चा नहि हूं अब। आप् बस कड़ाही चढ़ाओ, मे गय़ा औऱ आया, " आर्यन नें चाबी उठाई औऱ मुस्कुराते हुए बाहर् कि ओर लपका।
अंजलि उसे जातेहुए देखती रही। उसके चेहरे पर्र एक् संतोष भरी मुस्कान थि। उसनेगैस धीमी कि औऱ गुनगुनाते हुए मसाले भूनने लगी। घऱ मे मलाई कोफ्ते कि ग्रेवी पकने कि आवाज़ औऱ उसकी खुशबू अब गहराने लगी थि।
"यह लीजिए मां, डेयरी खुली थि, " आर्यन नें दूध कां पैकेट काउंटर पर्र रखतेहुए कहा।
अंजलि नें मुस्कुराकर उसे देखा, "धन्यवाद बेटा। अब जल्द सें हाथ धोकर आँ जा, खानां ठंडा हौ रहा हैं। "
दोनों मेज पऱ आमने-सामने बैठगए। अंजलि नें आर्यन कि थाली मे दो रोटियाँ औऱ कोफ्ता परोसा। पहला निवाला लेते हि आर्यन कि आँखों मे चमक आँ गई। "मम्मी, सच मे। आपकेहाथ केँ खाने कां कोई मुकाबला नहि हैं। होटल कां खानां इसके सामने कुछ भि नहि हैं। "
अंजलि नें धीरे-धीरे सें रोटी कां टुकड़ा तोड़ा, "बस-बस, इतनी तारीफ मतकर। मुझेपता हैं तुम्हारी तरफभूख लगी हैं इसलिये सभी अच्छा लगरहा हैं। "
अगलेआधे घंटे तक उनकेबीच बहोत हि सहज औऱ लंबी बातें हुईं। अंजलि नें उसे अपने मेडिकल कॉलेज केँ दिनों केँ कुछ पुराने किस्से सुनाए, केसे वो औऱ उसके पिता पहलीबार मिले थें। आर्यन बड़े ध्यान सें सुनरहा थां। बातों-बातों मे हँसी-मजाक भि हुआ औऱ दिनभर कि सारी थकान जैसेउस खाने कि मेज पर्र धुल गई।
जब खानां ख़त्म हुआ, तौ मेज पऱ बर्तनों कां ढेरलगा थां। अंजलि उठी औऱ बर्तन समेटने लगी, "चलो, अब मे यहसाफ कर लेती हूं, फिनसो जाते हें। "
आर्यन नें अचानक उसकाहाथ पकड़ लिया औऱ उसे वापस कुर्सी पऱ बिठा दिया। "नहि मम्मी, आज नहि। आज बर्तन मे धोऊँगा। आप् सुभह सें क्लिनिक मे खड़ी रहती हें, फिन आपने बाज़ार मे टाइम बिताया औऱ अब खानां भि बनाया। अब आप् मात्र आराम करेंगी। "
अंजलि नें विरोध करना चाहा, "अरे रहनेदे आर्यन, तूँ थक जाएगा। तेरीकल जल्द कॉलेज भि जानां हैं। "
आर्यन नें ज़िद पकड़ली, "बिल्कुल नहि मम्मी। यह मेराघऱ भि हैं। आप् जाइए अपने कमरे मे औऱ आहिस्ता कोई पुस्तक पढ़िए याँ सो जाइए। मे बसदस मिनट मे सभी चकाचक कर दूँगा। "
अंजलि नें हारमान ली। उसके चेहरे पर्र गर्व औऱ प्रेम कां मिला-जुला भाव थां। "ठीक हैं, बड़े साहब। आज आपकी हुकूमत चलेगी। पर्र ध्यान सें, वोँ कांच केँ गिलास मत तोड़ देना। "
"भरोसा रखिये मां, " आर्यन नें हँसते हुए एप्रन पहना औऱ सिंक कि ओरबढ़ गय़ा।
अंजलि अपने कमरे कि ओरबढ़ी। जाते-जाते उसने मुड़कर देखा, आर्यन बहोत हि तल्लीनता सें बर्तन धोरहा थां। उसेलगा कि उसका बेटा अब वाकई उसकी ताकतबन गय़ा हैं। वो अपने कमरे मे दाखिल हुइ, मद्धम रोशनी वाली नाइट लैंप जलाई औऱ खाट पऱ लेट गई। दिनभर कि भागदौड़ केँ बाद, पलंग कि कोमलता उसेचैन देरही थि।
जब अंजलि किचन मे पहुँची, तोँ वो हैरान रह गई। सिंक पूरीतरह साफ थां, एक् भि बर्तन बाहर् नहि थां औऱ स्लैब कों भि आर्यन नें गीले कपड़े सें पोंछकर चमका दिया थां। डाइनिंग टेबल कि कुर्सियां भि अपनी स्थान पऱ सलीके सें लगीथीं।
"अरेवाउ!" अंजलि केँ मुँह सें धीरे-धीरे सें निकला।
आर्यन वहीं खड़ा अपनाहाथ पोंछरहा थां। मम्मी कों देखकर वो मुस्कुराया, "देख लीजिए डॉक्टर साहब, क्लिनिक कि तरहयहा भि सभी हाइजीनिक (hygienic) हैं याँ नहि?"
अंजलि नें पासआकर उसकेसिर पर्र हाथ फेरा, "तूने तौ वाकई कमालकर दिया आर्यन। मुझेलगा थां तूँ बस बर्तन धोकरछोड़ देगा, पर्र तूने तोँ पूरा रसोई हि चकाचक कर दिया। बहोत बढ़िया!"
आर्यन नें गर्व सें सिर हिलाया। तभी अंजलि कों यादआया कि वो दूध गर्म करनाभूल गई थि। वो स्टोव कि ओरबढ़ी औऱ दूध कां पतीला चढ़ाया।
"सुन आर्यन, " अंजलि नें मुड़कर कहा, "तूने बहोत कामकर लिया। अब तूँ ऊपर अपने कमरे मे जा औऱ आरामकर। मे यहादूध गर्मकर रही हूं, जैसे हि उबल जाएगा, मे यहीं काउंटर पर्र ढककररख दूँगी। तूँ जब सोनेलगे, तौ नीचेआकर अपना गिलास लेकरपी लेना। ठीक हैं?"
आर्यन नें एक् लंबी जम्हाई ली, "ठीक हैं मम्मी। वैसे भि अब मुझे नींद आँ रही हैं। आप् भि अधिकदेर मत जागना। गुड नाइट!"
"गुड नाइट बेटा, सोजा, " अंजलि नें उसे जातेहुए देखा।
आर्यन सीढ़ियों कि ओरबढ़ा। उसकारूम पहली मंजिल (First Floor) पर्र थां। सन्नाटे भरेघऱ मे उसकी सीढ़ियाँ चढ़ने कि 'धप-धप' कि आवाज़ गूँजी औऱ फिनऊपर केँ कमरे कां दरवाज़ा बंद होने कि आवाज़आई।
अंजलि अकेली किचन मे खड़ी थि। दूध उबलने कां इंतज़ार करतेहुए वो खामोशी सें खिड़की केँ बाहर् रात केँ अंधेरे कों देखरही थि। उसे महसूस होँ रहा थां कि आज कि साम, सालों बाद, उसे एक् बहोत हि मुकम्मल औऱ शांत अहसास दे गई थि। दूध मे उबालआया, उसनेगैस बंद कि औऱ पतीले कों जाली सें ढंक दिया।
फिन वो भि धीरे धीरे अपने कमरे कि ओरबढ़ गई, ये सोचकर कि उसका बेटा अब वाकई उसकी परछाईं बन चुका हैं।
आर्यन नें अपने कमरे कां द्वार (दरवाज़ा) बंद किया औऱ सीधे अपनी स्टडी टेबल कि ओरबढ़ा। मेज पर्र बिखरी हुइ कुछ किताबें औऱ आधा खुलाहुआ जर्नल उसे उसके अधूरे असाइनमेंट कि याद दिलारहे थें। उसने अपनी टी-शर्ट उतारी, कुर्सी पऱ फेंकी औऱ नंगे जिस्म हि लैपटॉप खोलकर बैठ गय़ा।
अगलेआधे घंटे तक वो पूरीतरह सें अपने कॉलेज केँ काम मे डूब गय़ा। उसनेकुछ नोट्स सजधजकर किए, पिछले हफ्ते केँ छूटेहुए लेक्चर केँ पीडीएफ (PDF) चेककिए औऱ अपने प्रोजेक्ट कि रूपरेखा कों आखिरी रूप दिया। काम समाप्त करने केँ बाद उसने एक् लंबी अंगड़ाई ली औऱ अपनी गर्दन केँ तनाव कों कम करने केँ लिएउसे दोनों तरफ झटका।
"चलो, आज कां कोटा तौ पूराहुआ, " उसने स्वयं सें बुदबुदाते हुए लैपटॉप बंदकर दिया।
अब टाइम थां थोडा 'मी-समय' (mai-waqt) कां। वो अपनेबैड पऱ ढह गय़ा औऱ तकिए कां सहारा लेकर अपना मोबाइल निकाला। सबसे पहले उसने इंस्टाग्राम खोला। रंग-बिरंगी रील्स, दोस्तों कि पार्टियों कि तस्वीरें औऱ मीम्स कि बाढ़ केँ बीच वो बस अंगूठा चलाता रहा। कभी किसी पुरानी साथी कि फोटो पऱ रुकता, तौ कभी किसीफनी वीडियो पऱ मुस्कुरा देता।
इंस्टाग्राम सें मनभरा तौ वो यूट्यूब पऱ चला गय़ा। वहां उसनेकुछ टेक-रिव्यूज देखे औऱ फिनकुछ पुरानी यादों कों ताजा करने केँ लिएकुछ अनप्लग्ड गानों कि प्लेलिस्ट चला दि। मद्धम म्यूज़िक कमरे केँ सन्नाटे मे घुलने लगा। मोबाइल कि स्क्रीन कि नीली रोशनी उसके चेहरे पऱ चमकरही थि औऱ वो बस बिना किसी मकसद केँ एक् वीडियो सें दूसरे वीडियो पऱ स्क्रॉल करतारहा।
रातअब गहरी हौ चली थि। बाहर् कि दुनिया सो चुकी थि, मगर आर्यन कां मन अभि भि उन वीडियो औऱ सूचनाओं केँ समंदर मे तैररहा थां। उसे अहसास हि नहि हुआ कि वक़्त केसेपंख लगाकर उड़ गय़ा। अचानक उसेयाद आया कि नीचे किचन मे मम्मी नें उसकेलिए दूधरखा हैं।
आर्यन नें एक् लंबी जम्हाई ली औऱ पलंग सें उठ खड़ाहुआ। उसने अपनी टी-शर्ट वापस नहि पहनी, बस अपने लोअर मे हि कमरे सें बाहर् निकला। उसेपता थां कि उसकी मम्मी कि नींद बहोत कच्ची हैं, औऱ वो उन्हें इस वक़्त जगाना नहि चाहता थां।
उसने सीढ़ियों पर्र अपने पांव बहोत हि सावधानी सें रखे। हर कदम पऱ वो ध्यान देरहा थां कि लकड़ी कि सीढ़ी कहीं'चूँ' कि आवाज़ न् करदे। पहली मंजिल सें नीचे उतरते वक़्त पूरेघऱ मे एक् अजीब सां, भारी सन्नाटा थां, जिसमें मात्र क्लॉक कि 'टिक-टिक' सुनाई देरही थि।
"मां सोरही होंगी, " उसनेमन हि मन सोचा। उसने नीचेहॉल कि लाइट नहि जलाई, बस अपने मोबाइल कि टॉर्च कि हल्की रोशनी फर्श पऱ डाली ताकि किसी फर्नीचर सें टकरा न् जाए।
अंजलि केँ कमरे कां द्वार (दरवाज़ा) बंद थां औऱ अंदर सें कोई आवाज़ नहि आँ रही थि। आर्यन दबे पाँव किचन कि ओरबढ़ा। रात केँ इसपहर मे किचन कां स्टील औऱ टाइल्स टॉर्च कि रोशनी मे थोड़े ठंडे औऱ चमकदार लगरहे थें।
किचन केँ काउंटर पर्र वही पतीला रखा थां जिसे उसकी मम्मी नें ढककर छोड़ा थां। आर्यन नें टॉर्च कों स्लैब पर्र टिकाया औऱ धीरे-धीरे सें जाली हटाई। दूध अब भि हल्का गुनगुना थां। उसनेपास हि रखा अपना पसंदीदा कांच कां गिलास उठाया। सन्नाटे मे गिलास केँ शेल्फ सें टकराने कि हल्की सि 'खनक' हुई, जिससे आर्यन एक् समय केँ लिए ठिठक गय़ा औऱ मम्मी केँ कमरे कि तरफ देखा।
जब उसे यकीन हौ गय़ा कि सभी शांत हैं, तोँ उसने बहोत हि सावधानी सें पतीले सें दूध गिलास मे डालना शुरुआत किया। दूध केँ गिरने कि धार वाली आवाज़ उस खामोश किचन मे बहोत साफ़ सुनाई देरही थि।
आर्यन नें बहोत हि सावधानी सें अपनेकदम पीछे मोड़े। एक् हाथ मे दूध कां गिलास थां औऱ दूसरे हाथ मे मोबाइल, जिसकी टॉर्च कि रोशनी वो नीचे फर्श पर्र डालरहा थां ताकि मार्ग साफ दिखे। घऱ कां सन्नाटा अब पहले सें कहीं ज़्यादा गहरा महसूस होँ रहा थां, जैसे दीवारें भि सांस लेँ रहीहों।
जैसे हि वो सीढ़ियों कि ओर बढ़ने केँ लिए अपनी मां केँ बेडरूम केँ दरवाजे केँ सामने सें गुजरा, उसकेकदम ठिठकगए।
हवा मे एक् बहोत हि महीन औऱ दबी हुइ आवाज़ तैररही थि। ये आवाज़ इतनी धीमी थि कि अगरघऱ मे ज़रा भि हंगामा होता, तौ शायद सुनाई न् देती। आर्यन नें अपनी साँसें रोकलीं। उसेलगा शायद मम्मी नींद मे कुछबोल रही हें याँ शायदकोई सपनादेख रही हें।
उसकी जिज्ञासा (curiosity) नें उसे रुकने पर्र मजबूर कर दिया। उसने टॉर्च बंद कि औऱ अंधेरे मे हि दीवार कां सहारा लेकर अपनाकान धीरे-धीरे सें दरवाजे कि लकड़ी केँ पास लें गय़ा।
अंदर सें रह-रहकर हल्की-हल्की सिसकारियों कि आवाज़ आँ रही थि। वो आवाज़ किसी दर्द कि नहि थि, बल्कि उसमें एक् अजीब सि बेचैनी औऱ भारीपन थां। ऐसालग रहा थां जैसेकोई अपनी हि साँसों कों काबू करने कि कोशिश कररहा होँ, मगर नाकाम हौ रहा हौ। सिसकारियों केँ बीचबीच मे चादर केँ रगड़ने कि सरसराहट भि साफ सुनाई देरही थि।
आर्यन कां दिल ज़ोर सें धड़कने लगा। वो समझ नहि पारहा थां कि अंदर क्याँ हौ रहा हैं। क्याँ मां कि तबीयत खराब हैं? क्याँ उन्हें कोई तकलीफ हौ रही हैं? याँ फिनइस आधीरात केँ सन्नाटे मे वो कुछऐसा सुनरहा थां जिसकी उसनेकभी कल्पना भि नहि कि थि।
वो वहीं जड़वत (frozen) खड़ारह गय़ा, हाथ मे दूध कां गिलास अब भि वैसा हि थां, मगर उसका पूरा ध्यान उसबंद दरवाजे केँ पीछे छिपीउन सिसकारियों पऱ टिक गय़ा थां।
एक् लम्हा केँ लिए उसने सोचा कि अंदर झाँककर देखे, पऱ फिनउसे लगा कि आधीरात कों मां केँ कमरे मे बिना दस्तक दिए जानां ठीक नहि होगा। घबराहट औऱ उलझन मे, उसने अपनेकदम पीछे खींचे औऱ दबे पाँव सीढ़ियों कि ओरबढ़ गय़ा।
ऊपर अपने कमरे मे पहुँचकर उसने सबसे पहलेदूध कां गिलास मेज पऱ रखा। उसने एक् घूँट भि नहि पिया; उसकीभूख औऱ प्यास जैसे कहीं गायब हौ गई थि। वो अपने पलंग केँ कोने पऱ बैठ गय़ा औऱ अपनी हथेलियों मे सिर टिका लिया।
"क्याँ मम्मी कि तबीयत खराब हैं?" उसने स्वयं सें प्रश्न किया। "क्याँ उन्हें कोई बुरा सपनाआया हैं? याँ फिन क्लिनिक कि थकान कि वजह सें उन्हें तेज बुखार तौ नहि चढ़ गय़ा?"
आर्यन कों यादआया कि साम कों मां बहुतथकी हुईँ लगरही थीं। एक् डॉक्टर होने केँ बावजूद, वो अपनी सेहत कों अक्सर नजरअंदाज कर देतीथीं। वो सोचरहा थां कि शायद उन्हें सांस लेने मे तकलीफ हौ रही होँ याँ कोई पुरानां दर्दउभर आया होँ। मगर वोँ आवाजें। वेकुछ अलगथीं, कुछऐसी जोँ उसने पहलेकभी नहि सुनीथीं।
वो बैड पऱ लेटा तोँ सही, पर्र उसकी आँखें छत कि ओर टिकीथीं। कमरे कां पंखा एक् हि रफ्तार सें घूमरहा थां, मगर आर्यन कां दिमाग़ घोड़े कि तरहदौड़ रहा थां। "अगर उन्हें वाकई जरूरत हुईँ औऱ मे ऊपर सोतारहा, तोँ?" ये सोचकर उसे अपनी फिक्र होनेलगी।
एक् तरफ मम्मी कि फिक्र थि औऱ दूसरी तरफ वोँ संकोच (hesitation) जौ उसे वापस नीचे जाकर पूछने सें रोकरहा थां। वो बसइसी उधेड़बुन मे लगारहा कि क्याँ उसे नीचे जाकर एक् बारफिन सें चेक करना चाहिए याँ सुभह होने कां इंतजार करना चाहिए। रात कां सन्नाटा अबउसे औऱ भि डरावना औऱ भारी लगनेलगा थां।
Doctor मां – New Episode
खाट कि चादर कों झटककर आर्यन खड़ाहुआ। उसनेदूध केँ गिलास कि ओर देखा जौ मेज पऱ ज्यों कां त्यों रखा थां, पऱ उसकी प्यास अब चिंता मे बदल चुकी थि। उसने बिनाकोई आवाज़किए अपने कमरे कां दरवाज़ा खोला औऱ फिन सें उन्हीं अंधेरी सीढ़ियों कि ओरबढ़ गय़ा।
उसकेदिल कि धड़कनसाफ़ सुनाई देरही थि। वो आहिस्ता, एक्-एक् कदम फूंक-फूंक कर नीचे उतरा। हॉल मे पसरा सन्नाटा अब औऱ भि गहरालग रहा थां। वो सीधा मां केँ बंद दरवाज़े केँ पास पहुंचा।
इसबार उसने संकोच छोड़ दिया औऱ अपनासिर दरवाज़े कि लकड़ी सें बिल्कुल सटा दिया। वो अपनी साँसें रोककर अंदर कि हलचल कों पकड़ने कि कोशिश कररहा थां।
"मां.?" उसने बहोत धीरे-धीरे सें, करीब-करीब फुसफुसाते हुएमन मे कहा।
अंदर सें अभि भि वही हल्की, टूटी-टूटी सिसकारियाँ आँ रहीथीं। आवाज़ इतनी मद्धम थि कि ऐसालग रहा थां जैसेकोई तकिए मे मुँह छिपाकर रोरहा हौ याँ फिन अपनी तकलीफ कों बाहर् आने सें रोकरहा होँ। बीच-बीच मे चादर केँ सरकने औऱ बेड केँ हल्के सें हिलने कि आवाज़ भि आँ रही थि।
आर्यन कि पेशानी पर्र पसीना आँ गय़ा। उसेसमझ नहि आँ रहा थां कि क्याँ उसे दरवाज़ा खटखटाकर पूछना चाहिए? अगर वो सोरही हें औऱ ये मात्र नींद मे हैं, तोँ उन्हें जगाना ठीक नहि होगा। मगर अगर वो दर्द मे हें?
वो वहीं अंधेरे गलियारे मे मूर्ति कि तरहखड़ा रहा। दरवाज़े केँ उसपार सें आतीउन रहस्यमयी सिसकारियों नें उसे एक् ऐसी उलझन मे डाल दिया थां जिससे निकलना उसकेलिए मुश्किल होताजा रहा थां। वो बस वहींखड़ा रहकरये समझने कि कोशिश करतारहा कि आखिरउस बंद कमरे केँ अंदर मम्मी किसहाल मे हें।
आर्यन नें एक् गहरी सांसली, अपने पसीने सें तर हाथों कों पोंछा औऱ अपनी उंगलियों कों मोड़कर दरवाजे कि लकड़ी पऱ टिका दिया।
खट। खट.खट.
दस्तक कि आवाज़ उस सन्नाटे भरेघऱ मे किसी धमाके जैसीलगी। आर्यन कां दिल ज़ोर-ज़ोर सें धड़करहा थां। "मम्मी.?" उसने धीमीमगर स्पष्ट आवाज़ मे पुकारा। "मां, आप् ठीक तोँ हें?"
अंदर सें आँ रही वोँ सिसकारियाँ अचानक रुकगईं। एक् एकदम सें छा जाने वाला सन्नाटा पसर गय़ा। आर्यन वहीं खड़ा इंतजार करनेलगा। 10 सेकंड बीते। 20 सेकंड। कोई जवाब नहि। उसकाडर अब औऱ बढ़ने लगा थां। "मम्मी, द्वार (दरवाज़ा) खोलिए। मुझे आपकी आवाज़ सुनाई देरही थि। क्याँ तबीयत ठीक नहि हैं?"
लगभग 30 सें 40 सेकंड तक कोई हलचल नहि हुई। आर्यन बस दरवाज़े केँ हैंडल कि ओरदेख रहा थां। तभी, अंदर सें कुछ सरसराहट हुइ—जैसे कोई हड़बड़ी मे चादरठीक कररहा होँ याँ खाट सें उठरहा हौ। फिन नंगे पैरों केँ ज़मीन पऱ चलने कि हल्की आवाज़ आई।
अंततः, कुंडी खुलने कि आवाज़ हुइ—कड़क।
द्वार (दरवाज़ा) धीरे-धीरे सें खुला। कमरे केँ अंदर कि मद्धम 'नाइट लैंप' कि रोशनी बाहर् गलियारे मे फैली। अंजलि सामने खड़ी थि। उसकेबाल थोड़े बिखरे हुए थें औऱ चेहरा थोडा लाल थां, जैसेउसे बहोत तेज़ गर्मी लगरही हौ याँ वो अभि-अभि किसी गहरी नींद सें जागी हौ। उसकी साँसें अभि भि थोड़ी भारीथीं।
उसने अपनीशॉल कों थोडा औऱ कसकर लपेटा औऱ आधी खुली आँखों सें आर्यन कों देखा। "आर्यन? इतनीरात कों यहा क्याँ कररहे हौ बेटा? तुम् सोए नहि?" उसकी आवाज़ मे एक् अजीब सि थकावट औऱ भारीपन थां, मगर वो दिखने मे ठीकलग रही थि।
आर्यन नें राहत कि सांसली, पर्र उसकी नज़रें मम्मी केँ चेहरे पर्र टिकीथीं। "मां, मे। मे दूध लेने नीचेआया थां, तोँ आपके कमरे सें कुछ आवाज़ें आँ रहीथीं। मुझेलगा शायद आपको बुखार हैं याँ कोई तकलीफ होँ रही हैं। आप् ठीक तोँ हें न्?"
अंजलि नें एक् फीकी मुस्कान दि औऱ अपने माथे सें पसीना पोंछा। "अरे नहि बेटा, कुछ नहि। बस.बस थोडा बुरा सपनादेख लिया थां औऱ शायदउमस (Humidity) कि वजह सें बेचैनी होँ रही थि। मे बिल्कुल ठीक हूं। तूँ बेकार मे घबरा गय़ा। "
गलियारे कि मद्धम रोशनी मे आर्यन नें एक् कदमआगे बढ़ाया। अंजलि दरवाजे केँ फ्रेम कां सहारा लेकरखड़ी थि, उसकी साँसें अभि भि पूरीतरह सामान्य नहि हुइ थीं।
"मां, आप् कहरही हें कि आप् ठीक हें, मगर आपकी आँखें कुछ औऱ हि कहरही हें, " आर्यन नें धीमी औऱ संजीदा आवाज़ मे कहा।
बिना किसी हिचकिचाहट केँ, आर्यन नें अपना दाहिना हाथ धीरे-धीरे सें उठाया औऱ अपनी हथेलियों केँ पीछे कां हिस्सा अंजलि केँ गाल औऱ माथे पर्र रख दिया। जैसे हि उसकीखाल मां कि त्वचा सें छुई, वो ठिठक गय़ा।
अंजलि कां चेहरा दहकते हुए अंगारे जैसागरम थां। वो तपिश इतनी तेज़ थि कि आर्यन कों महसूस हुआ जैसेउसे वाकई बहोत तेज़ बुखार चढ़आया हौ।
"ओहगॉड! मां, आप् तोँ आग कि तरहतप रही हें!" आर्यन नें चौंकते हुए अपनाहाथ हटाया, मगर उसकी उंगलियों पऱ अब भि वो गर्मी महसूस होँ रही थि। "आपको बहोत तेज़ बुखार हैं। औऱ आप् कहरही हें कि आप् ठीक हें? आप् स्वयं एक् डॉक्टर होकर अपनी सेहत केँ संग इतनी लापरवाही केसेकर सकती हें?"
अंजलि नें घबराकर अपनी पलकें झुकालीं औऱ थोडा पीछे हटने कि कोशिश कि। "नहि आर्यन। वो। वो बस शायद कमरे मे घुटन हौ रही थि इसलिये। बुखार नहि हैं मुझे, बस थोडा 'फ्लश' (flush) महसूस होँ रहा हैं। तुँ परेशान मत हौ बेटा, तूँ जासोजा। "
आर्यन नें उसकीबात अनसुनी कर दि औऱ कमरे केँ अंदरकदम रख दिया। "बिल्कुल नहि मम्मी। इस हालत मे मे आपको अकेला नहि छोड़ सकता। आपका पूराबदन गर्म हैं। चलिए, पहलेबेड पर्र लेटिये, मे थर्मामीटर लेकरआता हूं। अगर बुखार अधिकहुआ तोँ हमें अभि दवाई लेनी होगी। "
अंजलि नें अपने बेटे केँ चेहरे पऱ वो कड़कपन औऱ फिक्र देखी, जोँ अक्सर एक् पिता याँ बड़े भइया मे होती हैं। वो कुछबोल नहि पाई, बस खामोशी सें अपनेखाट कि ओरबढ़ गई। आर्यन वहींखड़ा रहा, उसकी नज़रें अपनी मां कि उस बेचैनी कों पढ़ने कि कोशिश कररही थीं, जौ बुखार सें कहीं ज़्यादा गहरीलग रही थि।
"आप् बस यहीं लेटिये मां, मे अभि आया, " आर्यन नें करीब-करीब आदेश देतेहुए कहा औऱ फुर्ती सें गलियारे कि ओर लपका। वो नीचे कि मंज़िल पऱ बनेउस छोटे सें मेडिकल कैबिनेट केँ पास पहुंचा जहाँ अंजलि अपनी ज़रूरी दवाइयाँ औऱ उपकरण रखती थि। उसने कांपते हाथों सें डिजिटल थर्मामीटर निकाला औऱ वापस कमरे कि ओर दौड़ा।
जब वो कमरे मे पहुंचा, अंजलि बैड केँ किनारे बैठी थि, उसकी आँखें आधी झुकी हुईँ थीं औऱ वो गहरी साँसें लें रही थि। कमरे कि मद्धम पीली रोशनी उसके चेहरे कि लालिमा कों औऱ गहरा दिखारही थि।
"लीजिए मां, इसे मुँह मे रखिये, " आर्यन नें थर्मामीटर आगे बढ़ाते हुएकहा।
अंजलि नें धीरे-धीरे सें थर्मामीटर लिया औऱ अपनीजीभ केँ नीचेदबा लिया। पूरारूम एक् भारी सन्नाटे मे डूब गय़ा, जिसमें मात्र दीवार घड़ी कि आवाज़ सुनाई देरही थि। आर्यन वहीं घुटनों केँ बलबैड केँ पासबैठ गय़ा, उसकी नज़रें थर्मामीटर कि छोटी सि स्क्रीन पर्र जमीथीं। उसे एक्-एक् सेकंड एक् घंटे जैसालग रहा थां।
टीप.टीप। टीप.
थर्मामीटर नें बीप कि आवाज़ कि। आर्यन नें झपटकर उसे लिया औऱ रोशनी कि तरफ करके रीडिंग देखी। उसकी आँखें फटी कि फटीरह गईं।
"103.2 डिग्री!" आर्यन केँ मुँह सें करीब एक् चीख निकली। "मां! आपको इतना तेज़ बुखार हैं औऱ आप् कहरही थीं कि आप् ठीक हें? इतना टेम्परेचर तौ डेंजरस हौ सकता हैं!"
अंजलि नें अपनी आँखें मूँदलीं औऱ धीरे-धीरे सें अपनासिर पीछे तकिये पऱ टिका दिया। "आर्यन। वोँ। मुझेलगा शायदबस थकान हैं। मुझे अंदाज़ा नहि थां कि इतना अधिक होगा। "
आर्यन कां चेहरा पीलापड़ गय़ा थां। "थकान सें इतना बुखार नहि आता मां। आपकी साँसें भि तेज़चल रही हें औऱ चेहरा बिल्कुल दहकरहा हैं। मे अभि ठंडे पानी कि पट्टी औऱ पैरासिटामोल लेकरआता हूं। मे आपकोइस हालत मे सोताहुआ नहि छोड़ सकता। "
अंजलि नें कमज़ोरी सें अपनाहाथ उठाकर उसे रोकने कि कोशिश कि, "बेटा, तुँ परेशान मत होँ, मे स्वयं डॉक्टर हूं, मे देख लूँगी."
"आज आप् डॉक्टर नहि, केवल मेरी मम्मी हें, " आर्यन नें उसकीबात काटते हुएकहा। उसकी आवाज़ मे एक् अजीब सि मजबूती थि जोँ अंजलि कों खामोश कर गई। "आप् बस लेटी रहिये, मे सभी संभालता हूं। "
"मां, यह लीजिये। पहलेयह दवाई खाइए, फिन मे पट्टी करूँगा, " आर्यन नें पलंग केँ पास बैठकर दवाई कि गोलीहाथ मे लेतेहुए कहा।
अंजलि नें धीरे-धीरे सें अपनी आँखें खोलीं। उसने दवाई कि ओर देखा औऱ फिन अपना चेहरा दूसरी तरफफेर लिया। "नहि आर्यन। इसकी ज़रूरत नहि हैं। मे। मे बस थोडा सो जाऊँगी तौ सुभह तक ठीक होँ जाऊँगी। दवाइयों सें मुझे वैसे हि सारादिन उलझन रहती हैं। "
आर्यन हैरान रह गय़ा। "क्याँ कहरही हें आप्? आप् स्वयं मरीज़ों कों डांटती हें जब वोँ दवाई नहि लेते, औऱ अब स्वयं बहाने बनारही हें? मम्मी, टेम्परेचर बहोत ज्यादा हैं। "
"अरे बेटा, वोँ। वोँ बस थकावट कि वजह सें 'हीट' (heat) बढ़ गई हैं जिस्म कि, " अंजलि नें तकिये मे अपनासिर थोडा औऱ धंसाते हुएकहा। "अभि दवाई लूँगी तोँ रातभर पसीना आएगा औऱ नींद खराब होगी। तुँ बसजा औऱ सोजा, मे सुभहदेख लूँगी। "
आर्यन नें गिलास मेज पर्र रखा औऱ थोडा सख्त लहजे मे बोला, "सुभह तक कां इंतजार नहि कर सकते। आप् बच्चों कि तरह बहाने बनारही हें। क्याँ आपको कड़वी लगती हैं? याँ फिन आप् बस मुझे परेशान करना चाहती हें?"
अंजलि नें एक् कमज़ोर सि मुस्कान दि, उसकी साँसें अभि भि भारीथीं। "नहि रे.बसमन नहि कररहा। तूँ समझता क्यूं नहि? मुझेपता हैं मेरेबदन कों क्याँ चाहिए। बस थोड़ी देर शांति सें लेटने दे। "
आर्यन नें देखा कि मम्मी कि ज़िद उनकी कमज़ोरी पर्र भारीपड़ रही थि। उसने दवाई वाली हथेली उनके औऱ लगभग कि। "मम्मी, प्लीज़। मेरेलिए। अगर आप् यह दवाई नहि खाएंगी, तौ मे भि यहीं बैठा रहूँगा, पूरीरात। मे ऊपर नहि जाने वाला। "
अंजलि नें आर्यन कि आँखों मे देखा—वहां मात्र फिक्र औऱ ज़िद थि। उसने महसूस किया कि उसका छोटा सां बेटा आज एक् अभिभावक (guardian) कि तरह बर्ताव कररहा हैं।
"तुँ बहोत ज़िद्दी हौ गय़ा हैं, " अंजलि नें धीरे-धीरे सें फुसफुसाते हुएकहा। उसनेहार मानली औऱ धीरे-धीरे सें उठकर बैठने कि कोशिश कि, मगर बुखार कि वजह सें उसकासिर चकरा गय़ा। आर्यन नें जल्दी आगे बढ़कर उसके कंधे कों सहारा दिया ताकि वो गिर नं जाए।
"मम्मी, येकोई मज़ाक नहि हैं!" आर्यन नें थोडा तेज़ आवाज़ मे कहा, उसकी आँखों मे फिक्र औऱ झुंझलाहट साफ़ थि। "अगर आप् अभि ये दवाई नहि लेंगी, तोँ मे अभि पिताजी कों मोबाइल लगारहा हूं। उन्हें हि देखने दीजिये कि उनकी 'डॉक्टर पत्नि' अपनी सेहत केँ संग क्याँ खिलवाड़ कररही हैं। "
अंजलि नें तकिये मे मुँह छिपा लिया औऱ धीरे-धीरे सें बुदबुदाई, "नहि आर्यन। उन्हें परेशान मतकर। वो वहाकाम मे व्यस्त होंगे। मे। मे बस थोड़ी देर मे लें लूँगी, प्रॉमिस। "
"नहि मां, अभि!" आर्यन नें अपनाहाथ जेब मे डाला, पऱ उसे अहसास हुआ कि उसका मोबाइल ऊपर अपने कमरे मे चार्जिंग पर्र लगारह गय़ा हैं। उसकी नज़रबगल मे बेडसाइड टेबल पऱ रखी अंजलि केँ मोबाइल पर्र पड़ी।
उसने बिना सोचे-समझे झपटकर मम्मी कां मोबाइल उठा लिया। "मे उन्हीं केँ मोबाइल सें पिताजी कों वीडियो कॉलआई करता हूं, तभी आप् मानेंगी। " अंजलि नें उसे रोकने केँ लिएहाथ बढ़ाया, "आर्यन, रुक.मत कर."मगर कमज़ोरी कि वजह सें वो बसखाट पर्र हि रह गई।
आर्यन नें जैसे हि मोबाइल कां लॉक खोला—जोँ शायद अभि हाल हि केँ इस्तेमाल कि वजह सें अनलॉक हि थां—उसकी उंगलियाँ स्क्रीन पर्र ठिठकगईं। उसका चेहरा सफेदपड़ गय़ा औऱ वो जौ कुछ बोलने वाला थां, शब्द उसकेगले मे हि फंसकर रहगए।
मोबाइल केँ ब्राउज़र पऱ एक् एडल्ट साइट खुली हुई थि। स्क्रीन पर्र जौ दृश्य औऱ शब्द थें, वे किसी भि बेटे केँ लिए अपनी मां केँ मोबाइल पऱ देख्ना अकल्पनीय थां। आर्यन कां दिमाग़ सुन्न हौ गय़ा। उसे अचानक उन सिसकारियों, उस तेज़ बुखार जैसी तपिश, औऱ मां केँ चेहरे कि उस अजीब लालिमा कां मतलबसमझ आनेलगा, जिसे वो अब तक 'बीमारी' समझरहा थां।
वहाकोई घृणा (hatred) नहि थि, न् हि कोई क्रोध। थां तौ मात्र एक् गहराशॉक (Shock)। उसेसमझ नहि आया कि वो क्याँ प्रतिक्रिया दे। वो जिस मां कों एक् आदर्श, एक् शांत डॉक्टर औऱ एक् निस्वार्थ ममता कि मूरत मानता थां, उनके व्यक्तित्व कां ये छिपाहुआ पहलू उसके सामने एकदम नग्न होकर आँ गय़ा थां।
अंजलि नें आर्यन केँ चेहरे केँ उड़ते हुएरंग कों देख लिया थां। वो समझ गई थि कि आर्यन नें क्याँ देख लिया हैं। कमरे मे एक् ऐसा सन्नाटा छा गय़ा जोँ किसी भि हंगामा सें अधिक भयानक थां।
आर्यन नें बिना एक् शब्द बोले, बिना मां कि तरफ देखे, धीरे-धीरे सें मोबाइल वापस टेबल पऱ रख दिया। उसकेहाथ हल्के सें कांपरहे थें। उसने दवाई कि गोली औऱ पानी कां गिलास भि वहीं छोड़ दिया। वो मुड़ा औऱ भारी कदमों सें, बिना पीछे मुड़े कमरे सें बाहर् निकल गय़ा। उसकामन सुन्न थां, पेर मशीन कि तरहचल रहे थें। वो सीधाऊपर अपने कमरे कि ओरबढ़ गय़ा, पीछे अपनी मम्मी कों उस स्तब्ध अंधेरे मे अकेला छोड़कर।
आर्यन सीधा लेटाहुआ छत पर्र घूमते पंखे कि परछाईं कों देखरहा थां। कमरे मे मात्र पंखे कि 'सर-सर' सुनाई देरही थि, मगर उसके कानों मे अभि भि नीचे केँ कमरे सें आई वोँ सिसकारियाँ गूँजरही थीं।
उसकी आँखों केँ सामने बार-बार मोबाइल कि वोँ स्क्रीन औऱ उस पर्र खुली साइटघूम रही थि। उसेअब समझ आँ रहा थां कि वोँ '103 डिग्री बुखार' असल मे क्याँ थां। वो जिसेकोई जानलेवा बीमारी समझकर घबरारहा थां, जिसे थर्मामीटर सें नापरहा थां औऱ जिसके लिए दवाइयाँ लाने केँ लिए पागलों कि तरहभाग रहा थां—वो असल मे उसकी मम्मी कि अपनी एक् एकांत औऱ निजी दुनिया कां हिस्सा थां।
"धिक्कार हैं मुझ पऱ!" आर्यन नें अपनी आँखें कसकरबंद करलीं औऱ तकिये मे अपना चेहरा दबा लिया। उसे स्वयं पर्र इतनी लज्जा महसूस हौ रही थि कि उसेलग रहा थां वो अबकभी मां कि आँखों मे आँखें डालकर बात नहि कर पाएगा।
उसे अपनी नादानी पर्र क्रोध आँ रहा थां। "मे कितना बड़ा बेवकूफ हूं, " उसने स्वयं सें बुदबुदाते हुएकहा। "मां बार-बार कहरही थीं कि मे ऊपरचला जाऊँ, वोँ बार-बार कहरही थीं कि वोँ ठीक हें। पर्र मे अपनी ज़िद पऱ अड़ारहा। मैंने जबरदस्ती उनका मोबाइल उठाया, उनकालॉक खोला। मैंने उनकी प्राइवेसी (Privacy) कि धज्जियाँ उड़ादीं। "
वो सोचरहा थां कि मां इस वक़्त नीचे क्याँ महसूस कररही होंगी। क्याँ वो शर्मिंदा होंगी? क्याँ वो डर गई होंगी? एक् तरफउसे उस सच्चाई कों देखकर शॉकलगा थां, तौ दूसरी तरफउसे इसबात कां पछतावा थां कि उसने अपनी मां कों उस स्थिति मे लाखड़ा किया जहाँअब उनकेबीच एक् कभी नं मिटने वाली असहजता (Awkwardness) पैदा हौ गई थि।
पूरीरात वो करवटें बदलता रहा। कभी उसे मां केँ अकेलेपन कां अहसास होता, तोँ कभी अपनी मर्यादा लांघने कां दुःख। सुभह कि पहली किरण तक उसकी आँखों सें नींद कोसों दूर थि। वो बसइसी उधेड़बुन मे थां कि जब सूरज निकलेगा औऱ वो नीचे जाएगा, तौ क्याँ वो दोबारा वही 'नॉर्मल' बेटा बन पाएगा?
रात समाप्त हौ गई थि, मगर आर्यन केँ मन कां द्वंद्व (Conflict) अभि शुरुआत हि हुआ थां।
शुरुआत केँ कुछ मिनट तोँ अंजलि बिल्कुल सुन्न रही। उसे समझ नहि आँ रहा थां कि वो ज़मीन मे धंसजाए याँ उठकर आर्यन कों रोके। उसका चेहरा लज्जा सें लाल थां, औऱ दिल कि धड़कनें अभि भि सामान्य नहि हुईँ थीं। उसे पता थां कि आर्यन नें मोबाइल कि स्क्रीन देखली हैं औऱ इसीवजह सें वो बिनाकुछ बोले, इतनी हड़बड़ी मे ऊपर भागा हैं।
मगर जैसे-जैसे टाइम बीतता गय़ा, उसकी घबराहट एक् अजीब सि शांति औऱ फिन एक् बहोत हि हल्की सि मुस्कान मे बदलने लगी।
उसने अंधेरे मे हि तकिए कों अपनी बाहों मे समेटा औऱ सोचने लगी, "पागल लड़का। कितना डर गय़ा थां। " उसेयाद आया कि केसे आर्यन बदहवास होकर थर्मामीटर लेकरआया थां, केसे उसने 103 डिग्री बुखार कि रीडिंग देखकर करीब अपनीजान निकाल ली थि, औऱ केसे वो एक् छोटे बच्चे कि तरह ज़िदकर रहा थां कि वो उसे दवाई खिलाकर हि मानेगा।
उसे अपने बेटे कि उस मासूमियत औऱ नादानी पर्र अंदर हि अंदर हँसी आँ रही थि। उसेइस बात कि कोई शिकायत नहि थि कि उसने उसका मोबाइल देख लिया, बल्कि उसेइस बात कां चैन थां कि उसका बेटा उसकी इतनी परवाह (Care) करता हैं। उसे अहसास हुआ कि आर्यन अब मात्र उसका बच्चा नहि रहा, बल्कि वो उसकी सेहत औऱ उसकी खुशी कां रक्षक बन गय़ा हैं।
"कितना फिक्रमंद थां मेरेलिए." उसनेमन हि मन सोचा। उसकी वोँ सिसकारियाँ, जिन्हें आर्यन नें 'बीमारी' समझ लिया थां, दरअसल एक् लंबे टाइम केँ अकेलेपन औऱ दबी हुई इच्छाओं कां नतीजा थीं, जिसे वो एक् डॉक्टर होने केँ नाते भि शायदकभी बयां नहि कर पाती।
अंजलि कों हल्की सि शर्मिंदगी तोँ महसूस हौ रही थि कि उसके बेटे नें उसके व्यक्तित्व कां वोँ सिराछू लिया जोँ दुनिया सें छिपा थां, पऱ उसके ममतामयी दिल मे आर्यन केँ लिए प्रेम औऱ बढ़ गय़ा। उसेपता थां कि सुभह होते हि वो आर्यन कों समझा लेगी औऱ फिन सें सभीकुछ 'नॉर्मल' कर देगी।
इसी संतोष औऱ हल्की सि मुस्कान केँ संग, उसकी भारी आँखें धीरे धीरेबंद होने लगीं। दवाइयाँ तौ उसने नहि लीथीं, मगर बेटे कि उस बेपनाह फिक्र नें उसकेमन कों एक् ऐसी शांति दि कि वो गहरी नींद कि आगोश मे चली गई।
Doctor मां - Continue reading next part
Relavant source : click here