Doctor मां – New Episode
पंद्रह मिनटबीत चुके थें, मगर कमरे कां सन्नाटा आर्यन केँ लिए किसी हंगामा सें कम नहि थां। वो आँखें मूँदकर सोने कि नाकाम कोशिश कररहा थां, पऱ उसकाबदन उसके काबू मे नहि थां। चादर केँ नीचे उसका लन्ड अब पूरीतरह सें अकड़ चुका थां औऱ उसमें एक् तेज़टीस उठरही थि। मम्मी कि जांघ कि वोँ रगड़ औऱ उनकेबदन कि वोँ भीनी-भीनी खुशबू उसके दिमाग़ पर्र इसकदर हावी हौ गई थि कि नींद कोसों दूरभाग चुकी थि।
आर्यन सीधा लेटाहुआ छत कों ताड़रहा थां। उसका लन्ड पजामे केँ अंदर इतनी सख्ती सें तनाहुआ थां कि उसे कपड़े कि रगड़ भि अब औऱ ज्यादा उत्तेजित कररही थि। एक् जवान लड़के केँ लिएइस तरह कि शारीरिक प्रतिक्रिया कुदरती थि, मगरजिस परिस्थिति मे वो थां, वहाउसे घोर असहजता महसूस होँ रही थि।
उसकेमन मे एक् अजीब सां द्वंद्व चलरहा थां: "मे यहा मम्मी कि सहायता करनेआया हूं, उन्हें इसलत सें बाहर् निकालने आया हूं। औऱ मेराबदन इसतरह रिएक्ट कररहा हैं? क्याँ मे गलतकर रहा हूं?"
वो अपनी साँसों पर्र काबू पाने कि कोशिश कररहा थां, पऱ जैसे-जैसे वो स्वयं कों शांत करने कि कोशिश करता, उसका ध्यान बार-बार अपने लन्ड कि उस कठोरता पऱ हि चला जाता। उसे महसूस हौ रहा थां कि अगर उसने जल्द हि कुछ नहि किया, तौ ये तनावउसे पागलकर देगा। उसे डर थां कि कहीं नींद मे करवट लेते टाइम उसका उत्तेजित अंगफिन सें मम्मी कों टच नं करजाए, जोँ उनके रिश्ते कि गरिमा केँ लिए बहोत बुरा होता।
वो पलंग पऱ बिल्कुल जम गय़ा थां। उसकाहाथ अनजाने मे चादर केँ ऊपर हि मुट्ठी मे भिंच गय़ा थां। उसेलग रहा थां कि शायद बाथरूम जाकर ठंडे पानी सें मुँह धोना याँ स्वयं कों थोडा शांत करना हि एकमात्र मार्ग हैं। मगरउसे ये भि डर थां कि कहीं उसके उठने कि आहट सें मम्मी कि कच्ची नींद न् टूटजाए औऱ वे उससेकोई प्रश्न नं कर बैठें।
अंजलि अभि भि बगल मे बहोत हि चैनभरी औऱ गहरी साँसें लें रहीथीं। उन्हें अंदाज़ा भि नहि थां कि उनका बेटा इस वक़्त अपनी मर्दानगी औऱ अपनी नैतिकता केँ बीच कितनी बड़ी लड़ाईलड़ रहा हैं। आर्यन केँ माथे पर्र पसीने कि बूंदें चमकरही थीं, औऱ उसका लन्ड अभि भि अपनी पूरी सख्ती केँ संग इंसाफ मांगरहा थां।
नीली नाइट लैंप कि उस मद्धम औऱ मायावी रोशनी मे आर्यन कि नज़रें अनजाने मे अपनी मां केँ चेहरे पऱ ठहरगईं। कमरे कां सन्नाटा अब उसकेदिल कि धड़कन केँ संगताल मिलारहा थां। उसने देखा कि अंजलि केँ चेहरे पऱ एक् ऐसी मासूमियत औऱ शांति थि जोँ पिछले कई सालों सें गायब थि।
अंजलि कां चेहरा तकिये पऱ थोडा तिरछा थां, जिससे उनकेगले कि सुराहीदार बनावट साफ़ दिखाई देरही थि। उनके खुलेहुए बाल पलंग पर्र बिखरे थें, जोँ रोशनी मे रेशम कि तरहचमक रहे थें। आर्यन नें गौर किया कि आज उनकी त्वचा कितनी कोमल औऱ तरोताजा लगरही थि—शायद एक् हफ्ते कि चैनभरी नींद औऱ उस'लत' सें दूरी कां हि येअसर थां।
उनकी सांसें बहोत हि धीमी औऱ लयबद्ध थीं, जिससे उनके सीने पऱ रखी चादर बहोत हि आहिस्ता ऊपर-नीचे हौ रही थि। उस हल्की रोशनी मे उनकीबंद पलकें औऱ गुलाबी होंठों कि बनावट आर्यन कों एक् अलग हि हुस्न कां अहसास करारही थि।
आर्यन केँ मन मे एक् अजीब सां टकराव शुरुआत होँ गय़ा। वो जानता थां कि ये उसकी मां हें, उसकी दुनिया कि सबसे पवित्र हस्ती। मगर एक् पुरुष केँ तौर पऱ, उसकी आँखें उस सौंदर्य कों अनदेखा नहि करपारही थीं। उसे महसूस हुआ कि अंजलि केवल एक् 'मां' हि नहि, बल्कि एक् बेहद आकर्षक महिला भि थीं, जिसे उसने शायदअब तक केवल अपनी ज़रूरतों केँ चश्मे सें देखा थां।
उनकीइस हुस्न औऱ पास सें आती उनकेबदन कि कुदरती गंध नें आर्यन केँ लन्ड केँ तनाव कों औऱ अधिकबढ़ा दिया। वो पजामे केँ अंदरअब पत्थर कि तरह सख्त हौ चुका थां औऱ उसमें एक् मीठी सि खुजली औऱ बेचैनी हौ रही थि।
आर्यन कों स्वयं पर्र क्रोध भि आँ रहा थां औऱ वो स्वयं कों रोक भि नहि पारहा थां। "मे क्याँ सोचरहा हूं? मुझेयहा सें उठ जानां चाहिए, " उसनेमन हि मन स्वयं कों झिड़का। मगर उनकीउस मोहक सूरत नें उसे जैसे वहींजकड़ लिया थां। वो पसीने सें भीगाहुआ थां औऱ उसकी धड़कनें उसकेकान केँ पास हंगामा मचारही थीं।
उसे डर थां कि अगर उसने अपनी नज़रे नहि हटाईं, तोँ शायद वो कोईऐसी भूलकर बैठेगा जिसकी भरपाई कभी नहि हौ पाएगी।
कमरे कि उस मद्धम नीली रोशनी औऱ रात केँ सन्नाटे नें जैसे आर्यन केँ सोचने-समझने कि शक्ति कों सुन्न कर दिया थां। वो जवानी कि उस दहलीज़ पऱ थां जहाँबदन केँ हॉर्मोन्स (hormones) औऱ प्राकृतिक आवेग अक्सर मन कि नैतिकता पऱ हावी हौ जाते हें। 18-19 साल कि उस कच्ची उम्र मे, इसतरह कि उत्तेजना औऱ शारीरिक निकटता कां अनुभव उसकेलिए बिल्कुल नया औऱ भ्रमित करने वाला थां।
आर्यन कां दिल किसी नगाड़े कि तरहबज रहा थां। उसेसमझ नहि आँ रहा थां कि जौ वो महसूस कररहा हैं, वो सही हैं याँ गलत;उसे बसउस लम्हा कि गर्माहट औऱ आकर्षण नें अपनी गिरफ्त मे लेँ लिया थां। उसका लन्ड पजामे केँ अंदर अपनी पूरी कठोरता केँ संगतना हुआ थां, जिससे उसे एक् अजीब सि बेचैनी औऱ दबाव महसूस होँ रहा थां।
पता नहि उससमय उसकेमन मे क्याँ आया, याँ शायद उसके जिस्म केँ अनियंत्रित आवेग नें उसे मजबूर कर दिया—उसने बहोत हि कांपते हुए हाथों सें अपना एक् हाथ धीरे-धीरे सें अंजलि केँ mammay केँ ऊपररख दिया।
जैसे हि उसकी हथेलियों नें उस कोमलता औऱ उभार कों छुआ, आर्यन केँ पूरेबदन मे बिजली जैसी एक् लहर दौड़ गई। चादर केँ पतले कपड़े केँ ऊपर सें भि उसे मां केँ बदन कि वो मखमली गर्माहट औऱ उनकेदिल कि धड़कन साफ़ महसूस हौ रही थि। अंजलि अभि भि गहरी औऱ बेखबर नींद मे थीं, उन्हें अंदाज़ा भि नहि थां कि उनका बेटा, जिसे वो अपना रक्षक मानरही थीं, इस समयकिस मानसिक औऱ शारीरिक द्वंद्व सें गुज़र रहा हैं।
आर्यन कि सांसें अब तेज़ औऱ भारी होँ गई थीं। उसकाहाथ वहींजम गय़ा थां। उसे एक् तरफ तौ उस स्पर्श सें एक् अद्भुत सुखमिल रहा थां, मगर दूसरी तरफउसे अपनी हि इस हरकत पऱ अंदर हि अंदर बहोत डर भि लगरहा थां। उसे महसूस हुआ कि ये स्पर्श उस 'पवित्रता' कि सीमा कों लांघरहा थां जिसे वो अब तक संजोए हुए थां।
उसका लन्ड अब औऱ भि अधिक अकड़ गय़ा थां, औऱ उसेलग रहा थां कि अगर मां इस टाइमजाग गईं, तौ वो कभी भि उनसे नज़रे नहि मिला पाएगा। फिन भि, उस जवानी केँ जोश औऱ पहलीबार महसूस होँ रहेइस शारीरिक आकर्षण नें उसे अपनी स्थान सें हिलने नहि दिया।
कमरे केँ उस भारी सन्नाटे मे आर्यन कां दिल किसी नगाड़े कि तरह धड़करहा थां। उसकाहाथ मां केँ mammay केँ उभार पऱ थमाहुआ थां औऱ उसकी साँसें तेज़थीं। उसेहर समयये डरसता रहा थां कि शायद अंजलि अभि अपनी आँखें खोल देंगी औऱ येसभी एक् भयानक मोड़ लेँ लेगा।
मिनटदर मिनट बीतते गए। घड़ी कि टिक-टिक केँ अलावा कमरे मे औऱ कोई आवाज़ नहि थि। अंजलि कि गहरी औऱ लयबद्ध साँसों मे कोई बदलाव नहि आया। वे उसी मासूमियत औऱ चैन केँ संग सोती रहीं, जैसे उन्हें दुनिया कि किसीबात कि खबर न् हौ।
जब बहुतदेर तक कुछ भि नहि हुआ औऱ अंजलि कि नींद मे कोईखलल नहि पड़ा, तोँ आहिस्ता आर्यन केँ जिस्म कां तनावकम होनेलगा। जौ डरउसे अंदर हि अंदरखा रहा थां, वो अब एक् अजीब सि राहत मे बदल गय़ा। उसे महसूस हुआ कि शायदइस स्पर्श नें मां कि नींद मे कोई बाधा नहि डाली, बल्कि उनके जिस्म कि कुदरती गर्मी औऱ सानिध्य नें आर्यन केँ मन कि उथल-पुथल कों भि आरामसे शांतकर दिया।
जवानी केँ उस पहले शारीरिक आवेग औऱ उत्तेजना केँ बाद, अब उसके जिस्म मे एक् सुस्ती औऱ थकान छानेलगी थि। उसका लन्ड, जौ अब तक पत्थर कि तरह सख्त थां, आहिस्ता ढीला पड़ने लगा। वो पसीने सें तर-बतर थां, मगरअब उसकेमन मे वोँ पहले वाली घबराहट नहि थि।
उसी अवस्था मे, अपनी मम्मी केँ बदन कि गर्माहट कों महसूस करतेहुए, आर्यन कि पलकें भारी होने लगीं। उसे अहसास भि नहि हुआ कि कब उसकीसोच औऱ उसकाडर धुंधलाने लगा। पंद्रह-बीस मिनट केँ उस तनावपूर्ण संघर्ष केँ बाद, वो उसी स्थिति मे—अपना हाथ वहींरखे हुए—गहरी औऱ बेखबर नींद कि आगोश मे समा गय़ा।
रात कां वो रहस्यमयी औऱ विचलित करने वालासमय अब एक् शांत औऱ खामोश नींद मे बदल चुका थां।
सूरज कि रोशनी किचन कि खिड़की सें छनकर डाइनिंग टेबल पर्र पड़रही थि, मगरआज उस रोशनी मे कल जैसी गर्माहट औऱ बेफिक्री नहि थि। आर्यन केँ लिएये सुभह किसी भारीबोझ जैसी थि। रात कि वोँ धुंधली यादें औऱ अपनी मां केँ mammay पऱ अनजाने मे रखाहुआ उसका हाथ—ये सभी उसके दिमाग़ मे एक् फिल्म कि तरहचल रहा थां।
नाश्ते कि मेज पऱ सन्नाटा पसरा थां। अंजलि नें हमेशा कि तरह गरमागर्म परांठे औऱ गरमचाय टेबल पर्र रखी।
"आर्यन, आज तुँ बहोत चुप हैं? रात कों नींदठीक सें नहि आई क्याँ?" अंजलि नें प्रेम सें पूछते हुए उसकी प्लेट मे परांठा रखा।
आर्यन नें अपनी नजरें अपनी प्लेट सें ऊपर नहि उठाईं। वो बसदही औऱ परांठे केँ संग ज़बरदस्ती उलझाहुआ थां। "नहि मम्मी। बस थोडा सां सिर भारी हैं, शायद पढ़ाई कां स्ट्रेस होगा, " उसने हकलाते हुए जवाब दिया।
अंजलि कों उसकाये बर्ताव बहोत अजीबलगा। कल तक जौ बेटा चहक-चहक कर बातें कररहा थां, मज़ाक कररहा थां, वो आज आँखें मिलाने सें भि कतरारहा थां। उसनेगौर किया कि आर्यन कां चेहरा थोडा लाल थां औऱ वो बार-बार अपनी उंगलियों कों मरोड़ रहा थां। उसेलगा शायदरात कों सोते वक़्त कोई बुरा सपना देखा होगा याँ तबीयत ढीली होगी, इसलिये उसने अधिक कुरेदना ठीक नहि समझा।
"ठीक हैं, कॉलेज सें आकर थोडा आरामकर लेना। मैंने टिफिन मे तेरी मनपसंद कि सब्जी रख दि हैं, " अंजलि नें उसका माथा चूमने केँ लिएहाथ बढ़ाया, मगर आर्यन अनजाने मे हि थोडा पीछेहट गय़ा।
येदेख अंजलि केँ हाथ ठिठकगए। उनकेमन मे एक् लम्हा केँ लिए उलझनआई, पऱ उन्होंने इसे सुभह कि जल्दबाज़ी समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया।
आर्यन नें जल्द-जल्द अपना टिफिन बैग मे डाला। उसे उस कमरे औऱ उस माहौल सें बाहर् निकलने कि जल्द थि। उसेलग रहा थां जैसे उसके चेहरे पर्र उसकी 'गलती'साफ़ लिखी हुईँ हैं औऱ मम्मी कभी भि उसेपढ़ लेंगी।
"मे चलता हूं मां, लेट होँ रहा हूं, " उसनेबस इतनाकहा औऱ बिना पीछे मुड़े तेज़ी सें घऱ सें बाहर् निकल गय़ा।
सीढ़ियाँ उतरते वक्त उसकेदिल कि धड़कन अभि भि तेज़ थि। उसकेहाथ मे अभि भि उस मखमली अहसास कि सिहरन बाकी थि, जिसने उसेरात भर बेचैन रखा थां। वो कॉलेज तौ जारहा थां, मगर उसकामन उसीखाट औऱ उसी नीली रोशनी वाले कमरे मे अटकाहुआ थां।
डिनर कि मेज पर्र आज वो खनक औऱ ठहाके गायब थें जौ पिछले एक् हफ्ते सें घऱ कि रौनकबने हुए थें। आर्यन नें बमुश्किल दो निवाले खाए औऱ अपनी नजरें थाली मे हि गड़ाए रखीं। अंजलि उसे बार-बार देखरही थि; उसकी ममताभरी नजरें भांप चुकीथीं कि कुछ तोँ बहोत गहरा औऱ बेचैन करने वाला आर्यन केँ मन मे चलरहा हैं।
उसेलगा कि शायद क्लिनिक वालीबात याँ उसकी'लत' कों लेकर आर्यन अब भि किसी Trauma मे हैं, याँ शायदकल रातकुछ ऐसाहुआ जिसे वो कह नहि पारहा।
डिनर केँ बाद, रोज कि तरह आर्यन नें दूध गर्म किया। किचन कि पीली रोशनी मे उसका चेहरा उतराहुआ औऱ थकाहुआ लगरहा थां। अंजलि दबे पाँव पीछे सें आई औऱ काउंटर कां सहारा लेकरखड़ी होँ गई।
"आर्यन." उसने बहोत हि कोमल स्वर मे पुकारा।
आर्यन केँ हाथ सें चम्मच करीब-करीब छूटते-छूटते बचा। "जी मां?" उसने बिना मुड़े जवाब दिया।
"दूध गर्म हौ गय़ा हैं, यहाबैठ मेरेपास, " अंजलि नें पास कि स्टूल कि ओर इशारा किया। आर्यन हिचकिचाते हुए बैठा, उसकेहाथ कांपरहे थें औऱ वो अभि भि अपनी मां कि आँखों मे झाँकने कि हिम्मत नहि जुटापा रहा थां।
अंजलि नें अपनाहाथ उसके ठंडेपड़ चुकेहाथ पर्र रखा। आर्यन कों जल्दी कलरात केँ उस स्पर्श कि यादआई औऱ उसके जिस्म मे एक् सिहरन दौड़ गई।
"बेटा, सुभह सें देखरही हूं, तुँ स्वयं मे नहि हैं। क्याँ बात हैं? क्याँ तुँ अब भि मेरीउस बात (एडिक्शन) कों लेकर परेशान हैं? याँ मुझसे कोई गलती हुई हैं?" अंजलि कि आवाज़ मे एक् अजीब सि फिक्र औऱ दर्द थां।
आर्यन नें घूँटभरा, गलासूख रहा थां। "नहि मम्मी। ऐसाकुछ नहि हैं। बस.मन थोड़ा भारी हैं। "
"मुझसे मत छुपा आर्यन। मे तेरी मम्मी हूं, तेरी धड़कनें पहचानती हूं। तुँ किसी गहरे सदमे मे लगरहा हैं, जैसेकोई बात तुझेही अंदर हि अंदरखा रही हैं। अगर तूँ मुझसे नहि कहेगा, तोँ किससे कहेगा? क्याँ तुम को मेरेसंग सोने मे असहजता (Awkwardness) होँ रही हैं? अगरऐसा हैं, तौ तुँ अपने कमरे मे सो सकता हैं, मे ठीक हूं अब, " अंजलि नें उसे परखते हुएकहा।
आर्यन कां लन्ड पजामे केँ अंदर एक् बारफिन उस पुरानी याद औऱ मां कि आवाज़ कि मिठास सें हरकत करनेलगा। उसे अपनीइस शारीरिक प्रतिक्रिया पऱ इतनी घृणा होँ रही थि कि उसकी आँखों मे आँसू आँ गए। वो बस इतना चाहता थां कि वो सभीउगल दे, पर्र शब्द होंठों तक आकरजम रहे थें।
दूध केँ गिलास सें उठतीभाप आर्यन कि धुंधली आँखों केँ सामने एक् कोहरे जैसीछा गई थि। अंजलि कि ममताभरी आवाज़ औऱ उसकी आँखों मे छिपी फिक्र नें आर्यन केँ संयम कां अंतिम बांध भि तोड़ दिया। उसे लगरहा थां जैसे वो कोई बहोत बड़ा अपराधी हैं, जिसने अपनी हि मां केँ विश्वास औऱ पवित्रता केँ संगछल किया हैं।
जैसे हि अंजलि नें उसके कंधे पर्र हाथरखा, आर्यन केँ बदन मे एक् सिहरन दौड़ी। वो औऱ नहि रुकसका। उसकागला रुंध गय़ा औऱ अगले हि लम्हा, किचन कि उस शांतहवा मे आर्यन कि सिसकियों कि आवाज़ गूँजउठी।
वो फूट-फूट कर रोनेलगा। उसके आंसू रुकने कां नाम नहि लेँ रहे थें। उसने अपना चेहरा अपने दोनों हाथों मे छिपा लिया औऱ उसके कंधे बुरीतरह कांपने लगे। ये मात्र रोना नहि थां, येउस अंतर्द्वंद्व कां विस्फोट थां जौ कलरात सें उसके सीने मे दबाहुआ थां।
अंजलि पूरीतरह चिंता औऱ दहशत मे आँ गई। उसनेऐसा मंजरकभी नहि देखा थां। उसका बहादुर औऱ समझदार बेटा, जौ उसे संभाल रहा थां, आजइसकदर टूट जाएगा, इसकी उसने कल्पना भि नहि कि थि।
"आर्यन! बेटा। क्याँ हुआ? मुझेबता, कोईबात हैं क्याँ? किसी नें कुछकहा? तेरी तबीयत ठीक नहि हैं?" अंजलि बदहवास होकर उसकेपास घुटनों केँ बलबैठ गई औऱ उसके हाथों कों चेहरे सें हटाने कि कोशिश करनेलगी।
आर्यन कि हिचकियाँ बंध गई थीं। वो बस इतनाकह पारहा थां, "मम्मी। मे। मे बहोत बुरा हूं। मे आपकी सहायता करनेचला थां, पर्र मे स्वयं गिर गय़ा। मुझेमाफ़ करदो मां। मुझेमाफ़ करदो। "
अंजलि कां दिलबैठ गय़ा। उसेलगा शायद आर्यन अपनी मां कि उस'लत' कों देखकर अंदर सें इतनाआहत होँ गय़ा हैं कि वो स्वयं कों संभाल नहि पारहा। उसेलगा कि उसके बेटे पऱ इस पूरी स्थिति कां बहोत गहरा ट्रॉमा हुआ हैं।
"चुप होँ जा मेरा बच्चा। तूँ क्यूं बुरा हैं? तूने तौ मुझेनई ज़िंदगी दि हैं। तूँ रोमत, तूँ मुझेडरा रहा हैं, " अंजलि नें उसे अपनेगले सें लगा लिया।
आर्यन कां सिरअब अंजलि केँ उसी सीने केँ पास थां जिसे उसनेकल रातछुआ थां। उस स्पर्श कि याद औऱ अभि कि इस ममताभरी आगोश केँ बीच कां अंतरउसे औऱ भि ज़्यादा कचोटरहा थां। वो उनके सीने सें लगकर औऱ भि ज़ोर सें रोनेलगा, जैसेकोई छोटा बच्चा अपनी गलती पऱ अपनी मम्मी केँ आंचल मे छिपकर माफ़ी मांगरहा हौ।
अंजलि उसे सहलाती रही, मगर उसकेमन मे हज़ारों प्रश्न उठरहे थें। उसेसमझ नहि आँ रहा थां कि आखिरकल रात सें ऐसा क्याँ बदल गय़ा कि उसका बेटा आज इतना असहाय महसूस कररहा हैं। वो बसउसे अपने सीने सें चिपकाए रही, जबकि आर्यन केँ आंसुओं सें उसकी साड़ी भीगती जारही थि।
किचन कि उस धुंधली रोशनी मे आर्यन कि सिसकियाँ अब भारी सासों मे बदल चुकीथीं। अंजलि उसे अपने सीने सें लगाएहुए उसकेसिर कों सहलारही थि
आर्यन नें धीरे-धीरे सें अपना चेहरा अंजलि केँ आंचल सें हटाया। उसकी आँखें लालथीं औऱ चेहरा आंसुओं सें भीगाहुआ। उसने एक् लंबी औऱ कांपती हुई सांसली, जैसे वो अपनी पूरी हिम्मत बटोररहा हौ।
"मां। मुझेमाफ़ कर देना। मे। मे आपकी सहायता करनेआया थां, मगरकल रात." आर्यन कि आवाज़ लड़खड़ा रही थि।
अंजलि नें उसके हाथों कों थाम लिया, उसकी धड़कनें तेज़ होँ रहीथीं। "क्याँ हुआकल रात आर्यन? साफ़-साफ़ बोल बेटा। "
आर्यन नें नज़रें झुकालीं, वो अपनी मां कि आँखों मे नहि देखपा रहा थां। "कलरात जब मेरी नींद खुली, तोँ आप् मेरे बहोत लगभगसो रहीथीं। आपकी टांग मेरेऊपर थि औऱ। औऱ मुझे बहोत अजीब सां महसूस हौ रहा थां। मे एक् जवान लड़का हूं मम्मी, मेराबदन मेरे काबू मे नहि रहा। मुझे पसीना आँ रहा थां, मेरा प्राइवेट पार्ट कों कुछ हौ गय़ा थां औऱ मे। मे स्वयं कों रोक नहि पाया। "
अंजलि केँ चेहरे कां रंगउड़ गय़ा, वो बुत बनकरउसे सुनती रही।
आर्यन नें रोतेहुए आगेकहा, "पता नहि मुझे क्याँ हुआ, मैंने। मैंने अपनाहाथ आपके सीने पऱ रख दिया थां। मे बसउसे महसूस करना चाहता थां। मुझेपता थां कि आप् मेरी मां हें, मगरउस समय मेरामन सुन्न हौ गय़ा थां। मे बहुतदेर तक हाथ वहीं रखकर लेटारहा औऱ फिन.फिन मुझे नींद आँ गई। "
आर्यन नें अपनासिर झुका लिया औऱ फूट-फूट कर दोबारा रोनेलगा। "मुझे अपनीनज़र मे गिर जाने कां अहसास हौ रहा हैं मम्मी। मे गंदा हूं। मे आपकी पवित्रता कां सम्मान नहि कर पाया। इसी ग्लानि नें मुझे सुभह सें मार डाला हैं। मे आपसे नज़रें नहि मिलापा रहा थां क्योंकि मुझेलग रहा थां कि मैंने आपके विश्वास कां खून किया हैं। "
किचन मे एक् ऐसी खामोशी छा गई जिसे काटाजा सकता थां। अंजलि केँ हाथ, जौ आर्यन कों सहलारहे थें, हवा मे हि ठिठकगए। उसे यकीन नहि हौ रहा थां कि जिस बेटे कों वो अपनीढाल मानरही थि, वो अपनी हि मां केँ प्रति ऐसी शारीरिक भावनाएं औऱ हरकतकर बैठा।
अंजलि केँ दिमाग़ मे एक् तरफ मां कि ममता थि औऱ दूसरी तरफ एक् स्त्री कि गरिमा। वो अवाक (Shocked) रह गई। उसेसमझ नहि आँ रहा थां कि वो क्रोध करे, रोए याँ अपने बेटे कों संभाले। आर्यन कि इस सच्चाई नें उनकेबीच केँ उस महीन पर्दे कों हटा दिया थां जिसे समाजकभी स्वीकार नहि करता।
किचन कि उस भारी खामोशी मे आर्यन अपनी गर्दन झुकाए, सिसकियाँ भररहा थां। उसेलग रहा थां कि अब शायद आसमान फट जाएगा याँ उसकी मां उसे धक्के मारकर घऱ सें निकाल देंगी। अंजलि केँ चेहरे पऱ पहले तौ हैरानी औऱ सदमे केँ बादलछाए, मगर जैसे हि उसने अपने बेटे कि उस मासूमियत औऱ बेतहाशा डर कों देखा, उसका ममताभरा दिल पसीज गय़ा।
उसने देखा कि आर्यन अपनी हि नज़रों मे कितना गिर चुका हैं। एक् डॉक्टर होने केँ नाते वो जानती थि कि अगरइस वक़्त उसने आर्यन कों डांटा याँ उससे नफरत कि, तौ ये उसके दिमाग़ पर्र एक् ऐसा गहरा ट्रॉमा (Trauma) छोड़ देगा जिसे वो पूरी ज़िंदगी नहि मिटा पाएगा। जवानी कि दहलीज पर्र खड़ा एक् लड़का अपने प्राकृतिक आवेगों (Natural impulses) सें लड़रहा थां औऱ अपनी गलतीमान रहा थां—ये अपने आप् मे उसकी सच्चाई कां सबूत थां।
अंजलि नें एक् गहरी साँसली औऱ अचानक। वो धीरे-धीरे सें मुस्कुरा दि। फिन वो मुस्कुराहट एक् हल्की सि हँसी मे बदल गई।
आर्यन नें चौंककर अपनी गीली आँखों सें मां कि तरफ देखा। उसे समझ नहि आया कि वो रोरहा हैं औऱ मम्मी हँस क्यूं रही हें? क्याँ वो पागल हौ गई हें याँ उसे औऱ भि सज़ा देने वाली हें?
अंजलि नें हँसते हुए अपनेहाथ सें आर्यन केँ आँसू पोंछे औऱ उसकेगाल कों हल्के सें सहलाया।
"बस इतनी सि बात?" अंजलि नें बहोत हि प्रेम औऱ शरारत भरे अंदाज़ मे कहा।
आर्यन हक्का-बक्का रह गय़ा। "मम्मी। आप्। आप् हँसरही हें? मैंने इतनीबड़ी बातकही औऱ आप् कहरही हें कि बस इतनी सि बात?"
अंजलि नें उसे सहारा देकरखड़ा किया औऱ उसेगले सें लगाते हुए बोलीं, "पागल लड़के! तूनेइसे अपनीजान पर्र बना लिया थां? देख आर्यन, तूँ अब बच्चा नहि रहा। तूँ एक् जवान मर्दबन रहा हैं। इस उम्र मे बदन मे हॉर्मोन्स कां उतार-चढ़ाव होना, किसी स्पर्श सें उत्तेजित होँ जानां याँ कुछनया महसूस करना.ये सभी बायोलॉजिकल (Biological) हैं। इसमें तेरीकोई गलती नहि हैं। "
उसने आर्यन कि आँखों मे झाँकते हुए बहोत हि साफ़ लहजे मे कहा, "तूने जोँ किया, वो एक् लम्हा कां भटकाव थां। तूने जानबूझकर मुझेचोट पहुँचाने केँ लिएऐसा नहि किया। अगर तूँ बुरा होता, तोँ आज मेरे सामने खड़ा होकररो नहि रहा होता। तूने अपनी सच्चाई बता दि, यही साबित करता हैं कि तेरा चरित्र कितना साफ़ हैं। "
आर्यन कों जैसे हज़ारों किलो केँ बोझ सें आज़ादी मिल गई। उसकी सिसकियाँ रुकगईं, हालाँकि हिचकियाँ अभि भि आँ रहीथीं।
"मगर मम्मी। मैंने आपकोछुआ। वो गलत थां, " आर्यन नें धीमी आवाज़ मे कहा।
अंजलि नें उसकेसिर पऱ हाथ फेरते हुएकहा, "गलततब होताजब तूँ उसे अपना अधिकार समझता। तुँ डराहुआ हैं क्योंकि तूँ मुझसे प्रेम करता हैं। अब रोनाबंद कर। एक् डॉक्टर कि मम्मी होने केँ नाते मे जानती हूं कि जवानी मे यहसभी चीज़ें कितनी आम होती हें। तुम्हे स्वयं कों 'अपराधी' समझने कि ज़रूरत नहि हैं। तूँ अभि भि मेरावही प्यारा औऱ रक्षक बेटा हैं। "
किचन कां माहौल जौ अभि तक मातम जैसा थां, वो अब एक् अजीब सि शांति औऱ अपनापन मे बदल गय़ा थां। आर्यन कों लगा जैसे उसकी मम्मी नें उसे एक् नई ज़िंदगी दे दि होँ।
आर्यन कों ऐसा महसूस हौ रहा थां जैसे उसके सीने सें कई मनों कां बोझ एक् लम्हा मे उतर गय़ा होँ। उसकी मां कि उस समझदारी भरी हँसी औऱ माफी नें उसे एक् नया जीवनदान दे दिया थां। उसे यकीन नहि होँ रहा थां कि जिसबात कों वो अपनी ज़िंदगी कां सबसे बड़ा गुनाह मानरहा थां, उसकी मम्मी नें उसे एक् डॉक्टर औऱ एक् अभिभावक केँ नज़रिए सें इतनी सहजता सें स्वीकार कर लिया।
किचन कि हवाअब हल्की होँ चुकी थि। आर्यन नें अपनी शर्ट कि आस्तीन सें आँखों केँ बचे-खुचे आँसू पोंछे औऱ एक् गहरी, राहतभरी साँसली। अंजलि उसे बड़े प्रेम सें देखरही थि, जैसेकह रही होँ कि 'पगले, तुँ अभि भि मेरा छोटा बच्चा हि हैं। '
आर्यन नें थोडा संभलते हुएकहा, "मम्मी, आप् वाकई महान हें। मुझेलगा थां कि आजसभी ख़त्म हौ जाएगा। मगर." वो थोडा रुका औऱ अपनी नज़रे झुकाते हुए बोला, "मां, मुझे लगता हैं कि कलरात जौ हुआ, वो दोबारा न् हौ औऱ मे अपनीइस गलती कों सुधार सकूँ, इसलिये आज सें मे अपने कमरे मे हि सोऊंगा। मुझेडर हैं कि कहीं मेरा जिस्म फिन सें बेकाबू न् हौ जाए औऱ मे आपकी गरिमा कों ठेस पहुंचा दूँ। "
अंजलि नें आर्यन कि बात बड़े ध्यान सें सुनी। उसने देखा कि आर्यन अब भि थोडा डराहुआ हैं औऱ स्वयं पर्र भरोसा नहि करपारहा हैं।
अंजलि नें आगे बढ़कर आर्यन कां हाथ थामा औऱ उसे अपनीओर खींचते हुए बहोत हि शांत औऱ सुदृढ़ लहजे मे कहा, "नहि आर्यन, तुँ कहीं नहि जाएगा। तुँ मेरे हि संग सोएगा। "
आर्यन चौंक गय़ा। "मगर मां। अगरफिन सें वैसाकुछ हुआ तोँ?"
अंजलि नें मुस्कुराते हुए उसकेसिर पर्र हाथ फेरा, "देख बेटा, पिछले एक् हफ्ते सें तेरेसंग सोने कि वजह सें मुझे जोँ चैन मिला हैं, उसकी मुझेअब आदत होँ गई हैं। सच तोँ ये हैं कि अब मुझे अकेले सोने मे डर लगता हैं। वोँ अकेलापन औऱ वोँ पुरानी 'लत' मुझेफिन सें घेर लेगीअगर तुँ मेरेपास नहि रहा। रही बातकल रात कि, तौ वो मात्र एक् शारीरिक प्रतिक्रिया थि, कोईपाप नहि। हम् इसे मिलकर संभालेंगे। "
उसने आर्यन कि आँखों मे आँखें डालकर कहा, "अगर हम् आजडरकर अलगरूम मे सोगए, तोँ हमारे बीच हमेशा केँ लिए एक् पर्दा गिर जाएगा। मे चाहती हूं कि तूँ इस सहजता कों स्वीकार करे। तुँ मेरा बेटा हैं, औऱ मेरा रक्षक भि। आज सें हम् संग हि सोएंगे, औऱ बिना किसी झिझक केँ बातें करेंगे। मुझेतुझ पऱ पूरा भरोसा हैं कि तूँ अपनी सीमाओं कों जानता हैं। "
आर्यन कों अपनी मां कि बातों मे एक् ऐसी शक्ति महसूस हुई जिसने उसकी सारी शंकाओं कों समाप्त कर दिया। उसे लगा कि मां सहीकह रही हें—दौड़ना समाधान नहि हैं, बल्कि संग रहकरउस कमजोरी कों जीतना हि असली बहादुरी हैं।
"ठीक हैं मम्मी। जैसा आप् कहें। मे आपको अकेला नहि छोड़ूँगा, " आर्यन नें अब आत्मविश्वास केँ संगकहा।
उसरात जबवे वापस कमरे मे गए, तोँ माहौल मे कोई तनाव नहि थां। आर्यन नें अपना तकिया लगाया औऱ अंजलि उसकेबगल मे लेट गई। आज कि रात पहले सें कहीं अधिक पारदर्शी औऱ चैनभरी थि। दोनों नें लाइटबंद कि औऱ अंधेरे मे फिन सें पुरानी कहानियों कां सिलसिला शुरुआत हौ गय़ा, जैसेउस 'सच' नें उनकेबीच केँ डर कों हमेशा केँ लिएदफन कर दिया हौ।
Doctor मां – New Episode
अगली सुभहजब सूरज कि पहली किरण कमरे मे आई, तौ वो अपनेसंग एक् नई ताज़गी औऱ गहराचैन लेकरआई थि। आर्यन कि नींद खुली तोँ उसने देखा कि अंजलि पहले हि उठ चुकी थि औऱ किचन सें गरमचाय कि भीनी-भीनी खुशबू आँ रही थि। रात कां वो भारीपन, वो डर औऱ वो सिसकियाँ—सभी जैसे एक् बीतेहुए कल कि बात होँ गई थीं।
नाश्ते कि टेबल पऱ आजफिन सें वही पुरानी रौनकलौट आई थि। आर्यन अब अपनी मां सें नज़रें मिलापा रहा थां। सच बोलने केँ बाद उसकेमन कां कोना-कोना साफ़ होँ चुका थां।
"आज परांठे थोड़े ज़्यादा कुरकुरे बने हें मम्मी, " आर्यन नें मुस्कुराते हुएकहा।
अंजलि नें गरमचाय कां घूँट भरतेहुए उसे प्रेम सें देखा। "अच्छी बात हैं, कम सें कमआज तेरा ध्यान खाने पऱ तोँ हैं, वरनाकल तोँ तुँ बस थाली कों देखरहा थां। " दोनों इसबात पऱ खिलखिलाकर हँसपड़े। कलरात कि उस स्वीकारोक्ति नें उनकेबीच कि दीवार कों गिराकर एक् ऐसापुल बना दिया थां, जहाँअब कोई भि बात 'निषिद्ध' नहि थि।
इन तीन-चार दिनों मे आर्यन कां आत्मविश्वास लौटआया थां। उसेअब अपनी शारीरिक प्रतिक्रियाओं पऱ शर्मिंदगी महसूस नहि होती थि, क्योंकि उसेपता थां कि उसकी मम्मी उसे समझती हैं।
हररात वेसंग सोते, दिन भर कि बातें करते औऱ मज़ाक-मस्ती करतेहुए सो जाते। अंजलि कि वो 'पुरानी लत'अब पूरीतरह एक् धुंधली यादबन चुकी थि। अबउसे किसी बनावटी चैन कि ज़रूरत नहि थि, क्योंकि बेटे कां संग हि उसका सबसेबड़ा 'हीलर'बन गय़ा थां।
एक् साम, जब वेवॉक सें लौटरहे थें, आर्यन नें महसूस किया कि अब उनकेबीच कोई हिचकिचाहट नहि बची हैं। वे एक्-दूसरे केँ हाथ मे हाथ डालकर चलते, जैसे दुनिया केँ सबसे अच्छे मित्र हों। आर्यन नें अपनी मम्मी कों उस अंधेरे सें खींच निकाला थां, औऱ बदले मे अंजलि नें उसे 'वयस्कता' (Adulthood) कि उन उलझनों सें आज़ादी दिला दि थि जौ हर लड़के कों भीतर हि भीतर खाती हें।
घऱअबसच मे एक् स्वर्ग जैसा लगनेलगा थां, जहाँसच बोलने कि आज़ादी थि औऱ हर गलती केँ लिएमाफ़ कर देने वाली ममता।
रात केँ सन्नाटे मे घड़ी कि सुइयां फिन सें 2:00 बजे कां वक़्त दिखारही थीं। कमरे मे वही हल्की नीली रोशनी थि औऱ बाहर् हवाओं कि हल्की सरसराहट। आर्यन कि नींद अचानक खुली, औऱ उसे जल्दी वही पुरानां अहसास हुआ जिसने कुछदिन पहलेउसे हिलाकर रख दिया थां।
आर्यन नें महसूस किया कि अंजलि गहरी नींद मे करवट लेकरफिन सें उसके बिल्कुल लगभग आँ गई थीं। उनका कोमलहाथ आर्यन केँ सीने पर्र रखा थां, औऱ उनकी टांगें अनजाने मे आर्यन केँ लन्ड कों स्पर्श कररही थीं। उनके जिस्म कि वोँ परिचित गर्माहट औऱ त्वचा कि नरमी सीधे आर्यन केँ पौरुष कों जगारही थि।
मगरआज रात, आर्यन केँ मन मे वो प्राचीन 'ट्रॉमा' याँ डर नहि थां। उसेयाद आया कि केसे उसकी मम्मी नें उसकी सच्चाई कों हँसकर स्वीकार किया थां औऱ उसे अपराधी बनने सें बचा लिया थां।
जैसे हि अंजलि कि जांघ कां दबाव उसके लन्ड पर्र बढ़ा, उसमें कुदरती तौर पऱ सख्ती आनेलगी। वो पजामे केँ अंदर आहिस्ता अकड़ने लगा। स्पर्श इतना सीधा औऱ गहरा थां कि आर्यन कि साँसें भारी होने लगीं। उसे महसूस हुआ कि अंजलि नींद मे थोड़ी औऱ लगभग खिसकीं, जिससे उनकेबदन कि रगड़ नें आर्यन केँ अंदर एक् तेज़ सनसनी पैदाकर दि।
आर्यन सीधा लेटाहुआ छत कों देखरहा थां। उसकादिल धड़करहा थां, मगरइस बार वो स्वयं कों 'गंदा' महसूस नहि कररहा थां। वो जानता थां कि ये मात्र एक् शारीरिक सच्चाई हैं।
अंजलि नींद मे बहोत हि चैन सें थीं। उनका चेहरा आर्यन केँ कंधे केँ पास थां औऱ उनकी साँसों कि गर्माहट आर्यन कि गर्दन पर्र महसूस होँ रही थि। आर्यन नें सोचा कि क्याँ वो फिन सें उन्हें दूर हटाए? याँ फिन मां कि उसबात कों यादकरे कि 'येसभी नॉर्मल हैं'।
उसने बहोत हि धीरे-धीरे सें, कांपते हुएहाथ सें अपनी मां कि टांग कों छुआ। इस बार वो डराहुआ नहि थां, बल्कि उस स्पर्श कों समझने कि कोशिश कररहा थां। अंजलि कि त्वचा रेशम जैसी रसीले थि। आर्यन कां लन्ड अब पूरीतरह पत्थर कि तरह सख्त हौ चुका थां औऱ वो चादर केँ नीचे एक् साफ उभारबना रहा थां।
उसेलगा कि शायद मम्मी कों पताचल जाएगा, मगर अंजलि कि गहरी साँसें बतारही थीं कि वे पूरीतरह बेखबर हें। आर्यन नें अपनी आँखें बंदकर लीं औऱ उस अनचाहे मगर सुखद अहसास कों महसूस करनेलगा, जोँ उसके औऱ उसकी मां केँ बीच केँ इसनए, पारदर्शी (Transparent) रिश्ते कां एक् हिस्सा बन चुका थां।
कमरे मे पसरा सन्नाटा अब एक् ऐसी भारी औऱ गर्म खामोशी मे बदल गय़ा थां, जहाँ शब्दों कि ज़रूरत नहि थि। आर्यन कि साँसें तेज़थीं औऱ उसका लन्ड पजामे केँ अंदर अपनी पूरी कठोरता केँ संग अंजलि कि जांघ केँ नीचेदबा हुआ थां। जबउसे बर्दाश्त करना मुश्किल लगा, तौ उसने बहोत हि धीमी, कांपती हुईँ आवाज़ मे अपनी मां कों पुकारा।
"मां। मां."
अंजलि कि नींद टूटी। उसने अपनी पलकें झपकाईं औऱ उसे जल्दी वस्तु स्थिति (Reality) कां अंदाज़ा हौ गय़ा। उसे महसूस हुआ कि उसकी जांघ आर्यन केँ उस सख्त हिस्से पऱ टिकी हुइ हैं जौ पिछले कुछ दिनों सें उनकेबीच चर्चा औऱ तनाव कां विषयबना हुआ थां।
अंजलि नें कोई हड़बड़ी नहि दिखाई। उसने न् तोँ अपना पांव हटाया औऱ न् हि कोई हैरानी जताई। वो बसकुछ पलों तक आर्यन कि आँखों मे देखती रही। उन आँखों मे डर थां, उत्तेजना थि औऱ एक् अनजाना प्रश्न थां।
अंजलि नें एक् गहरी औऱ समझदारी भरी साँसली। उसनेतय कर लिया थां कि वो अपने बेटे कों अब औऱ किसी 'गिल्ट' याँ 'ट्रॉमा' मे नहि रहने देगी। उसने बहोत हि सहजता सें अपनी स्थिति बदली—मगर दूर जाने केँ लिए नहि, बल्कि औऱ लगभगआने केँ लिए।
वो धीरे-धीरे सें बैड पऱ थोडा ऊपर कि ओर सरकी।
उसने अपनी जांघ कों पूरीतरह सें आर्यन केँ लन्ड केँ ऊपरजमा दिया। उस सीधे दबाव औऱ जांघ कि मखमली रगड़ सें आर्यन केँ जिस्म मे बिजली जैसी एक् लहर दौड़ गई। उसका लन्ड अब औऱ भि अधिक अकड़ चुका थां। अंजलि नें वहीं रुककर आर्यन कां हाथ पकड़ा। उसकाहाथ पसीने सें गीला औऱ कांपरहा थां।
अंजलि नें बिनाकुछ बोले, आर्यन केँ उसहाथ कों उठाया औऱ धीरे-धीरे सें अपने Boob केँ ऊपररख दिया।
आर्यन केँ होशउड़ गए। उसने महसूस किया कि उसकी हथेली मां केँ उसनरम औऱ गर्म उभार पर्र हैं, जिसे उसनेकुछ रात पहले अनजाने मे छुआ थां। मगरइस बारये 'अनजाना' नहि थां—ये मां कि अपनी मर्जी औऱ स्वीकृति थि।
कमरे कि उस नीली रोशनी मे दोनों एक्-दूसरे कों देखरहे थें। अंजलि कि आँखों मे एक् अजीब सि शांति औऱ 'सुरक्षा' कां भाव थां। उसने जैसेमौन रहकरये मेसेज दे दिया थां कि 'अगर तुम्हे इस स्पर्श सें चैन मिलता हैं औऱ तेरी उत्तेजना शांत होती हैं, तौ मुझेकोई ऐतराज नहि हैं। '
आर्यन कां हाथउस गोलाई कों महसूस कररहा थां, औऱ उसका लन्ड मम्मी कि जांघों केँ बीचउस गर्मी कां मजा लें रहा थां जिसे वो अब तक मात्र सपनों मे याँ डर मे महसूस करता थां। उसरात, मम्मी औऱ बेटे केँ बीच कां वो 'पर्दा' पूरीतरह सें हट गय़ा थां। कोई शब्द नहि बोला गय़ा, मगरउस स्पर्श नें सभीकुछ कह दिया थां।
उसरात कमरे कि नीली रोशनी मे एक् अनजानी शांति छा गई थि। आर्यन कां हाथ अंजलि केँ Boob कि गर्माहट कों महसूस कररहा थां औऱ अंजलि कि जांघ कां दबाव सीधे उसके लन्ड पर्र थां। आरामसे वो उत्तेजना एक् गहरेचैन मे बदल गई औऱ दोनों इसी अवस्था मे एक्-दूसरे केँ लगभग गहरी नींद मे सोगए।
अगली सुभहजब सूरज कि किरणें कमरे मे आईं, तौ माहौल मे कोई घबराहट नहि थि। अंजलि नें तयकर लिया थां कि वो इस मामले कों पूरीतरह सें सुलझा देगी ताकि आर्यन केँ मन मे 'पाप' याँ 'ग्लानि' कां एक् कतरा भि न् बचे।
नाश्ते केँ बाद, जब घऱ मे सभी शांत थां, अंजलि नें आर्यन कों अपनेपास बुलाया औऱ उसे सोफे पऱ अपनेबगल मे बिठाया। उसने आर्यन कां हाथ अपनेहाथ मे लिया औऱ बहोत हि शांत औऱ गंभीर स्वर मे बात शुरुआत कि।
"आर्यन, कलरात जोँ हुआ, उस बारे मे मे तुझसे कुछ कहना चाहती हूं, " अंजलि नें उसकी आँखों मे झाँकते हुएकहा।
आर्यन नें नज़रें थोड़ी झुकाईं, मगरइस बार वो कांप नहि रहा थां।
अंजलि नें बहोत हि सुलझे हुए लहजे मे कहा, "देख बेटा, कलरात जोँ हुआ वो पूरीतरह सें नॉर्मल (Normal) हैं। एक् डॉक्टर केँ तौर पऱ औऱ तेरी मम्मी केँ तौर पऱ मे जानती हूं कि मानवबदन केसेकाम करता हैं। हम् दोनों पिछले कुछ वक्त सें जिस मानसिक तनाव औऱ अकेलेपन सें गुज़र रहे थें, उसमें एक्-दूसरे कां शारीरिक सानिध्य (Physical Proximity) हमेंचैन देरहा हैं। "
उसने आर्यन केँ हाथ कों सहलाते हुएआगे कहा, "इसमें गिल्ट (Guilt) महसूस करने कां कोई मतलब नहि हैं। "
आर्यन नें धीरे-धीरे सें पूछा, "मगर मम्मी। क्याँ येगलत नहि हैं? लोग क्याँ कहेंगे?"
अंजलि नें दृढ़ता सें जवाब दिया, "गलत औऱ सही कि परिभाषा समाजतय करता हैं, मगर हमारी स्थिति अलग हैं। हमनेकुछ भि गलत नहि किया हैं। हम् एक्-दूसरे कि ढालबने हुए हें। अगर मेरा स्पर्श तुम्हारी तरफ शांत करता हैं औऱ तेरी मौजूदगी मुझेउस पुरानी 'लत' सें दूर रखती हैं, तौ ये हमारे लिए एक् दवा (Medicine) कि तरह हैं। हमारे बीच जोँ विश्वास हैं, वही सबसे बड़ी सच्चाई हैं। "
उसने आर्यन कों समझाते हुएकहा कि बदन कि ज़रूरतें औऱ हॉर्मोन्स कां असर प्राकृतिक हैं। अगरवे इसे एक्-दूसरे केँ संग सहजता सें स्वीकार कर लेते हें, तोँ ये किसी अपराध केँ दायरे मे नहि आता।
"मे चाहती हूं कि तूँ स्वयं कों कोसना बंदकरे। हम् दोनों एक्-दूसरे कि ज़रूरत हें औऱ इस'संग' मे कोई गंदगी नहि हैं, केवल एक् अटूट भरोसा हैं। "
आर्यन कों अपनी मां कि इन बातों सें एक् अद्भुत मानसिक शक्ति मिली। उसे अहसास हुआ कि उसकी मां कितनी आधुनिक औऱ समझदार सोच रखती हें। उन्होंने एक् झटके मे उसकेमन केँ सारे अंधेरे कों साफकर दिया थां। अब उनकेबीच कोई पर्दा नहि थां, मात्र एक् गहरीसमझ औऱ बिना किसी शर्त कां संग थां।
रात कां टाइम थां औऱ पूरेघऱ मे एक् ऐसी खामोशी थि जौ उदासी वाली नहि, बल्कि चैनभरी थि। रसोई सें बर्तनों कि खनक औऱ मसालों कि खुशबू आँ रही थि। आर्यन औऱ अंजलि अबउसदौर सें बाहर् निकलआए थें जहाँवे एक्-दूसरे सें नजरें चुराते थें। अब उनकेबीच एक् ऐसी पारदर्शिता आँ गई थि जिसने उनके रिश्ते कों औऱ भि गहरा औऱ दोस्ताना बना दिया थां।
डिनर कि टेबल पऱ अंजलि नें गरमा-गर्म कढ़ी-चावल परोसे। आर्यन नें पहला निवाला लिया औऱ अपना चेहरा बिगाड़ लिया।
"मां, आजनमक थोडा कम नहि लगरहा? याँ फिन मेरा टेस्ट खराब होँ गय़ा हैं?" आर्यन नें शरारत सें अंजलि कि तरफ देखते हुएकहा।
अंजलि नें जल्दी अपनी प्लेट सें एक् चम्मच चखा औऱ फिन आर्यन कों ताड़कर देखा। "बिल्कुल ठीक हैं! तेरीबस बहाने चाहिए मेरी कुकिंग मे मीन-मेख निकालने कां। अगलीबार सें स्वयं बना लेना, फिन पता चलेगा। "
आर्यन हँस पड़ा। "अरे मां, मे तौ बसचेक कररहा थां कि आप् कितनी जल्द चिढ़ती हें। वैसे कढ़ी लाजवाब बनी हैं, बस पकोड़े थोड़े औऱ सॉफ्ट होँ सकते थें। "
"अच्छा? औऱ कल जोँ तूनेजली हुईँ ऑमलेट खिलाई थि, उसका क्याँ?" अंजलि नें चिढ़ाते हुएकहा औऱ आर्यन केँ गाल पर्र हल्की सि चपतलगा दि।
पूरे डिनर केँ दौरान दोनों इसीतरह एक्-दूसरे कि टांग खींचते रहे। ये नोकझोंक उनकेबीच केँ उस भारीपन कों पूरीतरह ख़त्म कर चुकी थि जौ पिछले दिनों केँ वाकये सें पैदाहुआ थां। आर्यन कों महसूस होँ रहा थां कि उसकी मम्मी अब मात्र एक् गार्जियन नहि, बल्कि उसकी सबसे अच्छी मित्र बन चुकी हें जिनसे वो दुनिया कि कोई भि बातकर सकता हैं।
खानां खाने केँ बाद आर्यन नें ज़िद कि कि आज बर्तन वो धोएगा।
"तुँ रहनेदे आर्यन, सुभह कॉलेज भि जानां हैं, " अंजलि नें कहा।
"नहि मम्मी, आज 'डॉक्टर साहिबा' कों आराम मिलना चाहिए। आखिर पूरेदिन पेशेंट्स कों जौ झेला हैं आपने, " आर्यन नें मुस्कुराते हुए उन्हें सोफे कि तरफ धकेल दिया।
अंजलि सोफे पऱ बैठकर अपने बेटे कों काम करतेदेख रही थि। उसे यकीन नहि होँ रहा थां कि जौ लड़काकुछ दिन पहले तक अपनी पहचान औऱ जवानी कि उलझनों मे खोयाहुआ थां, वो आज इतना ज़िम्मेदार औऱ खुशमिजाज हौ गय़ा हैं। उसे अहसास हुआ कि उसने आर्यन कों 'माफ' करके औऱ उसरात कि बात कों 'नॉर्मल' बताकर न् मात्र उसे बचाया, बल्कि अपने अकेलेपन कां सबसे सुंदर इलाज भि ढूँढ लिया।
रात केँ 11 बजरहे थें। घऱ कि लाइटें आरामसे बंद होने लगीं।
"आर्यन, जल्द आँ जा। मुझे नींद आँ रही हैं, " अंजलि नें अपने कमरे सें आवाज़ लगाई।
आर्यन नें रसोई कि लाइटबंद कि औऱ मुस्कुराते हुए अपने कमरे कि ओर नहि, बल्कि मां केँ कमरे कि ओरबढ़ गय़ा। अबउसे पता थां कि उसे कहां होना चाहिए औऱ अंजलि कों भि पता थां कि उसकाचैन कहां हैं।
रात केँ 12 बज चुके थें। कमरे मे सन्नाटा थां, मगर वो सन्नाटा खामोश नहि थां; उसमें एक् अजीब सि गर्माहट औऱ भारीपन थां। आर्यन औऱ अंजलि दोनों लेटेहुए थें, मगर नींद किसी कि आँखों मे नहि थि। पंखे कि हल्की आवाज़ औऱ एक्-दूसरे कि सांसों कि लयसाफ़ सुनाई देरही थि।
अंजलि कि पीठ आर्यन कि तरफ थि, मगरउसे महसूस हौ रहा थां कि आर्यन जागाहुआ हैं औऱ बेचैन हैं। उधर आर्यन केँ मन मे एक् तूफान उठाहुआ थां। मम्मी कि कही हुइ बातें—"ये सभी नॉर्मल हैं, " "इसमें कोई गिल्ट नहि हैं"—उसके कानों मे गूँजरही थीं। उसकी जवानी कां जोश औऱ उस स्पर्श कि यादउसे सोने नहि देरही थि।
आखिरकार, अपनी धड़कनों पऱ काबू पातेहुए, आर्यन कि रुँधी हुई आवाज़ अंधेरे कों चीरते हुए निकली।
"मां." उसने बहोत हि धीमी औऱ कांपती हुईँ आवाज़ मे पुकारा।
अंजलि धीरे-धीरे सें मुड़ी औऱ उसकी आँखों मे झाँका। नीली रोशनी मे उसकी आँखें चमकरही थीं। "जाग रहा हैं? क्याँ हुआ बेटा?"
आर्यन नें एक् लंबी साँसली, जैसे वो अपनी सारी हिम्मत बटोररहा होँ। "मम्मी। मुझे नींद नहि आँ रही। कल रात जोँ हुआ। औऱ जोँ आपने सुभहकहा। उसकेबाद सें मेरामन बस एक् हि स्थान अटका हैं। "
उसने थोडा रुककर, अंजलि कि आँखों मे सीधे देखते हुए वो बातकह दि जिसे कहने कि हिम्मत शायद हि कोई बेटा कर पाता।
"मम्मी। क्याँ मे। क्याँ मे आपके वोँ छू सकता हूं? फिन सें। इसबार होश मे?"
कमरे कां तापमान जैसे एक् डिग्री औऱ बढ़ गय़ा। अंजलि नें अपनी पलकें नहि झपकाईं। वो बसउसे देखती रही। उसे आर्यन कि आवाज़ मे कोईहवस नहि, बल्कि एक् अजीब सि मासूमियत, जिज्ञासा औऱ उस 'स्वीकृति' कि तलाश दिखी जोँ उसने सुभहउसे दि थि।
अंजलि नें कोई क्रोध नहि दिखाया। वो जानती थि कि अगर उसनेआज मना किया याँ झिड़का, तौ जोँ 'पारदर्शिता' उन्होंने बनाई हैं, वो फिन सें ढह जाएगी। उसने महसूस किया कि आर्यन उससेकुछ 'छुपकर' नहि कररहा, बल्कि अपनी मम्मी सें 'इजाज़त' मांगरहा हैं।
अंजलि नें धीरे-धीरे सें मुस्कुराते हुए अपनी चादर थोड़ी नीचे कि औऱ आर्यन कां हाथ पकड़कर उसे अपने Boob केँ ऊपररख दिया।
"अगर इससे तुम्हारी तरफचैन मिलता हैं औऱ तेराडर समाप्त होता हैं। तौ तूँ छू सकता हैं आर्यन। मैंने कहा थां न्, हमारे बीचअब कुछ भि गलत नहि हैं, " अंजलि कि आवाज़ मे एक् अजीब सि स्थिरता औऱ ममता थि।
जैसे हि आर्यन कि हथेलियों नें उस कोमल औऱ भारी उभार कों छुआ, उसके पूरेबदन मे एक् करंट सां दौड़ गय़ा। इसबार वो 'चोरी' नहि कररहा थां, बल्कि उसकी मम्मी नें स्वयं उसेये अधिकार दिया थां। उसके लन्ड नें पजामे केँ अंदर अपनी पूरी ताकत सें सिर उठाया, मगर उसका ध्यान अबउस रेशमी स्पर्श पर्र थां।
आर्यन नें धीरे धीरे अपनी उंगलियाँ चलानी शुरुआत कीं। उसे अंजलि केँ दिल कि धड़कन अपनी हथेली केँ नीचे महसूस हौ रही थि। वो लम्हा उनके रिश्ते कि पुरानी सारी परिभाषाओं कों जलाकर राखकर रहा थां औऱ एक् ऐसीनई दुनिया बनारहा थां जहाँ केवलवे दोनों थें—बिना किसी पर्दे केँ, बिना किसी लज्जा केँ।
कमरे कि उस मद्धम रोशनी मे आर्यन कां हाथ अंजलि केँ Boob कि कोमलता कों महसूस कररहा थां। उसकेलिए ये अहसास बिल्कुल नया औऱ जादुई थां। एक् जवान लड़के केँ मन मे उठी जिज्ञासा औऱ जिस्म कि उत्तेजना नें उसे औऱ भि बेबाक बना दिया थां।
उसने बहोत हि धीरे-धीरे सें अपनी उंगलियां उस गोलाई पर्र फिराईं औऱ अपनी मां कि आँखों मे देखते हुए एक् मासूम सां प्रश्न कर दिया।
"मम्मी। ये इतने सॉफ्ट क्यूं हें? मैंने अपनी लाइफ मे कभीऐसी चीज़ नहि देखी। मेरा मतलब हैं, कभीछुई नहि। ये अहसास इतनाअलग औऱ चैन देने वाला क्यूं हैं?" आर्यन कि आवाज़ मे एक् अजीब सि हैरानी थि।
अंजलि नें उसकीइस मासूमियत पर्र एक् हल्की सि मुस्कान दि। उसने आर्यन कां हाथ हटाया नहि, बल्कि उसे वहीं थामेरखा ताकि वो सहज महसूस करे।
"पगले, ये कुदरत कि बनावट हैं, " अंजलि नें एक् डॉक्टर केँ लहजे मे समझाना शुरुआत किया। "बायोलॉजिकल तौर पऱ, महिलाओं केँ सीने मे मुख्य रूप सें फैटी टिश्यू औऱ ग्रंथियां होती हें। ये कोमलता इसलिये होती हैं ताकिवे एक् बच्चे केँ लिए पोषण कां ज़रिया बन सकें। ये बदन कां सबसे संवेदनशील औऱ ममताभरा हिस्सा होता हैं। "
आर्यन मंत्रमुग्ध होकरसुन रहा थां। उसका लन्ड पजामे केँ अंदर अपनी पूरी कठोरता केँ संग अंजलि कि जांघ सें सटाहुआ थां, मगर उसकामन इस वक़्त मां कि बातों मे खोया थां।
अंजलि नें थोडा हँसते हुएआगे कहा, "औऱ तुम्हारी तरफआज ये इतना'नया' लगरहा हैं? तुम कोयाद भि नहि होगा कि बचपन मे तूने मुझेइस चीज़ केँ लिए कितना परेशान किया हैं। जब तूँ छोटा थां, तौ बिनाइसे पकड़े याँ मुँह मे लिए सोता हि नहि थां। घंटों तक तूँ यहीं चिपका रहता थां, औऱ अगर मे ज़रा भि दूर होती, तौ तूँ पूराघऱ सिर पर्र उठा लेता थां। "
ये सुनकर आर्यन कां चेहरा लज्जा सें लाल होँ गय़ा। "सच मे मम्मी? मे इतना जिद्दी थां?"
"जिद्दी? तुँ तोँ आफत थां!" अंजलि नें मज़ाक मे उसकीनाक खींची। "आज तुँ इसे एक् 'मर्द' कि नज़र सें देखरहा हैं औऱ तुम्हारी तरफये उत्तेजित कररहा हैं, मगर मेरेलिए तुँ आज भि वही छोटा आर्यन हैं जिसेइसी सीने सें लगकरचैन मिलता थां। इसीलिए मैंने कहा कि इसमें कुछ भि 'गंदा' नहि हैं। ये केवल एक् चक्र हैं जौ घूमकर वापस वहीं आँ गय़ा हैं। "
आर्यन नें अब औऱ भि विश्वास केँ संगउस उभार कों अपनी हथेली मे भर लिया। उसे महसूस हुआ कि मां कि इस बेबाकी नें उसके अंदर केँ सारे'पाप' कों धो दिया हैं। उसे अपनी मां केँ बदन सें अबडर नहि लगरहा थां, बल्कि एक् गहरा लगाव महसूस हौ रहा थां।
"तौ क्याँ मे। मे इसे थोडा औऱ महसूस कर सकता हूं? जैसे बचपन मे करता थां?" आर्यन नें धीरे-धीरे सें फुसफुसाते हुए पूछा।
कमरे कि नीली रोशनी मे आर्यन कां हाथअब पूरीतरह सें अंजलि केँ Boob कि गोलाई पर्र जम चुका थां। जैसे-जैसे वो उसे सहलारहा थां, उसकेमन मे एक् औऱ जिज्ञासा उठी। उसने महसूस किया कि जब वो छूता हैं, तोँ अंजलि कि सांसें भि थोड़ी भारी होँ रही हें।
उसने अपनी मम्मी कि आँखों मे झाँकते हुए बहोत हि धीमे सें पूछा, "मम्मी। जैसा कि आपनेकहा कि ये बहोत संवेदनशील हिस्सा हैं। तोँ क्याँ जब मे इसेइस तरहछू रहा हूं, तौ आपको भि वैसी हि संवेदना महसूस होती हैं जैसी मुझे हौ रही हैं? क्याँ आपको भि अच्छा लगरहा हैं?"
अंजलि नें एक् लंबी औऱ गहरी सांसली। उसने महसूस किया कि आर्यन अब मात्र एक् जिज्ञासु बच्चा नहि रहा, बल्कि वो एक् पुरुष कि सहज संवेदनाओं कों समझने कि कोशिश कररहा हैं। उसने सच्चाई कों छुपाने कि कोशिश नहि कि।
"हाँ आर्यन, " अंजलि नें बहोत हि शांत औऱ मधुर आवाज़ मे कहा। "जैसा कि मैंने तुम्हें बताया, ये जिस्म कां सबसे संवेदनशील हिस्सा होता हैं। यहा कि नसें सीधे दिमाग़ औऱ भावनाओं सें जुड़ी होती हें। जब तूँ इसेइस तरह कोमलता सें छूता हैं, तोँ मुझे भि वैसी हि झनझनाहट औऱ सुखद अहसास होता हैं। "
उसने आर्यन केँ हाथ केँ ऊपर अपनाहाथ रखा औऱ उसे थोडा औऱ ज़ोर सें दबाया।
"देख बेटा, जिस्म कि बनावट ऐसी हैं कि स्पर्श चाहे ममताभरा हौ याँ आकर्षण भरा, बदन अपनी प्रतिक्रिया देता हि हैं। एक् स्त्री केँ तौर पऱ, मुझे भि ये महसूस होता हैं। औऱ सच तोँ ये हैं कि पिछले कई सालों सें मे जिस अकेलेपन औऱ 'लत' सें लड़रही थि, उसमें ये स्पर्श मुझे एक् अजीब सां चैन औऱ 'जीवित' होने कां अहसास देरहा हैं। "
अंजलि नें उसकी आँखों मे देखते हुएआगे समझाया, "संवेदना होनागलत नहि हैं, आर्यन। ये जिंदगी कां हिस्सा हैं। अगर मेरे जिस्म कों तेरे स्पर्श सें अच्छा लगरहा हैं, तोँ इसका मतलबये नहि कि मे 'बुरी मम्मी' हूं। इसका मतलब केवलये हैं कि हम् दोनों इंसान हें औऱ हमें एक्-दूसरे कि गर्माहट कि ज़रूरत हैं। "
आर्यन केँ लिएये सुनना किसी जादू सें कम नहि थां। उसेअब तक लगरहा थां कि शायद वो अकेले हि इस तूफान मे जलरहा हैं, मगर मम्मी कि इस बेबाकी नें उसेये अहसास दिलाया कि वे दोनों एक् हि नाव मे सवार हें।
आर्यन कां लन्ड अब पजामे कि सीमाएं तोड़ देने कों बेताब थां। अंजलि कि जांघों केँ बीच उसकी रगड़ औऱ सीने पर्र उसका हाथ—इन दोनों संवेदनाओं नें उसे एक् ऐसी दुनिया मे पहुंचा दिया थां जहाँ केवलवे दोनों थें।
"तोँ मम्मी। क्याँ हम् इसीतरह। रोज़। एक्-दूसरे कों महसूस कर सकते हें?" आर्यन नें करीब फुसफुसाते हुए पूछा।
अंजलि नें उसे अपनी बाहों मे औऱ कस लिया। "जब तक तुझेही इसकी ज़रूरत हैं औऱ मुझे इससेचैन मिलता हैं। हम् ऐसे हि रहेंगे। अबसोजा, मेरा बच्चा। "
उसरात, आर्यन अपनी मां केँ सीने पर्र हाथरखे औऱ उनके जिस्म कि गंध लेतेहुए एक् ऐसी गहरी नींद मे सोया, जैसी उसने बचपन केँ बादकभी नहि ली थि।
Doctor मां – New Episode
सुभह कि सुनहरी धूप खिड़की केँ पर्दों सें छनकर कमरे मे आँ रही थि। आज कि सुभह वाकई मे तरोताजा थि। आर्यन कि नींदजब खुली, तोँ उसके चेहरे पऱ एक् ऐसी शांति थि जोँ पिछले कई रातो सें गायब थि। रातभर अपनी मम्मी केँ बदन कि गर्माहट औऱ उस 'मखमली अहसास' कों महसूस करने केँ बाद, उसकेमन कां सारा भारीपन धुल चुका थां।
अंजलि भि किचन मे गुनगुनाते हुए ब्रेकफास्ट बनारही थि। उसके चेहरे पर्र भि एक् अलग हि चमक थि—जैसे किसी नें एक् बोझिल पत्थर कों उसके सीने सें हटा दिया होँ।
नाश्ते कि टेबल पऱ आजआलू केँ परांठे औऱ मक्खन कि गंध फैली हुई थि। आर्यन नें अपनी कुर्सी खींची औऱ अंजलि कि तरफ देखा। अंजलि नें मुस्कुराते हुएगरम चाय कां कप उसकीओर बढ़ाया।
"आज तोँ बड़ी जल्दउठ गय़ा? रात कों तोँ देर तक जागरहा थां, " अंजलि नें शरारत भरी नज़रों सें उसे देखते हुएकहा।
आर्यन थोडा सां मुस्कुराया औऱ गरमचाय कां घूँट लिया। फिन उसने बहोत हि संजीदगी (Seriousness) सें अंजलि कां हाथ अपनी हथेली मे लिया।
"मां। मे बस आपको थैंकयू बोल्ना चाहता थां। कलरात केँ लिए। औऱ उससभी केँ लिए जोँ आपने मुझे समझाया, " आर्यन कि आवाज़ मे एक् गहरा सम्मान औऱ अपनापन थां।
अंजलि नें उसे टोकना चाहा, पऱ आर्यन नें अपनीबात जारीरखी।
"सच कहूँ तौ, मुझेडर थां कि मे अपनीइन भावनाओं केँ नीचेदब जाऊँगा। मुझे लगता थां कि मे कोई गुनाह कररहा हूं। मगर आपनेजिस तरह सें मुझे अपनी संवेदनाओं केँ बारे मे बताया औऱ मुझे वो हक दिया। उससे मुझेऐसा महसूस हुआ जैसे मे फिन सें जीउठा हूं। आपने मुझे 'मर्दानगी' केँ उसडर सें बाहर् निकाल लिया जौ मुझे अंदर हि अंदरखा रहा थां। "
अंजलि नें बड़े प्रेम सें आर्यन केँ हाथ कों थपथपाया। "पगले, धन्यवाद किसबात कां? मैंने वही किया जोँ एक् मां औऱ एक् यार कों करना चाहिए। अगर मे तुम्हारी तरफ नहि समझती, तौ कौन समझता? औऱ देख, आज तुँ कितना खुश औऱ रिलैक्स दिखरहा हैं। यही मेरेलिए सबसे बड़ा ईनाम हैं। "
आर्यन नें मुस्कुराते हुए परांठे कां निवाला लिया। "सही कहरही हें आप् मां। आज मुझे कॉलेज जाने मे कोई झिझक नहि होँ रही। मुझेलग रहा हैं कि मे दुनिया कां सामना कर सकता हूं क्योंकि घऱ मे मेरा'चैन' मेरेपास हैं। "
अंजलि कि आँखों मे ममता कि एक् बूंदछलक आई। "बस, यही आत्मविश्वास मुझे चाहिए थां। अब जल्द सें ब्रेकफास्ट ख़त्म कर, वरनादेर हौ जाएगी। "
दोनों नें हँसते-खेलते ब्रेकफास्ट किया। अब उनकेबीच कोईऐसी दीवार नहि थि जिसे लांघने मे डरलगे। वे जानते थें कि रातफिन आएगी, औऱ वो नीली रोशनी वालारूम फिन सें उनकेउन 'निजी' औऱ 'सच्चे' पलों कां गवाह बनेगा।
साम कि ढलती रोशनी केँ संगघऱ मे एक् अलग हि मादकता औऱ चैनघुल गय़ा थां। अब आर्यन औऱ अंजलि केँ बीच वो 'पर्दा' नहि थां, जिसने उन्हें हफ्तों तक बेचैन रखा थां। आज कां दिन दोनों केँ लिए बहोत हल्का औऱ खुशहाल रहा। रात केँ खाने कां समयहुआ, तोँ डाइनिंग टेबल पऱ माहौल पहले सें कहीं अधिक जीवंत थां।
अंजलि नें आजरात केँ खाने मे पनीर कि सब्ज़ी औऱ गरमा-गर्म फुल्के बनाए थें। आर्यन टेबल पर्र बैठा अपनी मां कों देखरहा थां, जोँ किचन मे काम करतेहुए आजकुछ अधिक हि फुर्तीली औऱ आकर्षक लगरही थीं।
"आज तोँ बड़ी खुशबू आँ रही हैं मां, पनीर मे कुछखास डाला हैं क्याँ?" आर्यन नें अपनी कुर्सी कों थोडा आगे खिसकाते हुए पूछा।
अंजलि नें एक् तिरछी नज़रउस पर्र डाली औऱ मुस्कुराते हुए बोलि, "खास क्याँ होगा?बस वही मसाले हें। पऱ हाँ, आज बनाने कां 'मन' थोडा अधिक अच्छा थां। "
आर्यन नें शरारत सें अपनी भौहें ऊपरकीं। "अच्छा? तभी मे कहूँ कि आज सब्ज़ी इतनी। 'नर्म' औऱ 'रसीली' क्यूं लगरही हैं? बिल्कुल कलरात केँ अहसास जैसी। "
अंजलि कां हाथ एक् लम्हा केँ लिए चकला-बेलन पऱ ठिठका। उसने पलटकर आर्यन कों देखा, उसकी आँखों मे एक् हल्की सि चमक औऱ शरारत थि। "बड़ा होँ गय़ा हैं तूँ, अब बातों कों घुमाना भि सीख गय़ा हैं? 'नर्म' चीज़ों कि कद्रकुछ ज़्यादा हि करनेलगा हैं आजकल। "
आर्यन थोडा सां झेंपा, पऱ फिन उसने हिम्मत जुटाई। "अब क्याँ करें मम्मी, जब 'उस्ताद' इतना अच्छा सिखाने वाला होँ, तौ शागिर्द तौ निखरेगा हि नं? आखिरकल रात आपने हि तोँ कहा थां कि 'कुदरत कि बनावट' कों समझना चाहिए। "
अंजलि नें हँसते हुए अपनी थाली उसके सामने रखी। "ज्यादा बातें मतबना। चुपचाप खानां खा, वरनाये 'नर्म' पनीर ठंडा होकर सख्त हौ जाएगा, फिनमत कहना कि मजा नहि आया। "
"सख्त चीज़ें तोँ वैसे भि आजकल मुझे परेशान कररही हें मम्मी, पनीर कां नरम होना हि बेहतर हैं, " आर्यन नें बहोत हि हल्के डबल मीनिंग अंदाज़ मे कहा।
अंजलि केँ जिस्म मे एक् सिहरन दौड़ गई। "अच्छा जी? तोँ तुम्हे 'नरमी' कां इतनाशौक हौ गय़ा हैं? ध्यान रख, कहींयह शौक तुम्हे रातभर जागने पऱ मजबूर न् करदे। "
"जागने मे जौ मजा हैं, वोँ सोने मे कहां? औऱ फिन, जब नींद नं आए तौ 'लोरी' सुनाने केँ लिए आप् तोँ हें हि, " आर्यन नें अपनी आवाज़ कों थोडा धीमा औऱ गहरा करतेहुए कहा।
अंजलि नें गरमचाय कां घूँट लिया औऱ उसे एक् गहरी नज़र सें देखा। "लोरी सुनाऊँगी याँ कुछ औऱ। ये तौ वक़्त हि बताएगा। फिलहाल खानां समाप्त कर, फिन देखते हें कि आजरात तेरी 'जिज्ञासा' तुम्हारी तरफ कहां लेँ जाती हैं। "
पूरे डिनर केँ दौरान वेइसी तरह कि हल्की-फुल्की औऱ अर्थपूर्ण बातें करतेरहे। हवा मे अब एक् अनजानी सि उत्तेजना औऱ गहरा खिंचाव थां। दोनों जानते थें कि खानां ख़त्म होने केँ बाद, जब लाइटें बंद होंगी, तौ वो नीली रोशनी वालारूम फिन सें उनकेनए प्रयोगों औऱ स्पर्शों कां गवाह बनेगा।
रात केँ सन्नाटे मे कमरे कि वही जानी-पहचानी नीली रोशनी एक् जादुई माहौल बनारही थि। डिनर केँ वक्त कि वोँ हल्की-फुल्की शरारत औऱ 'डबल मीनिंग' बातों नें हवा मे एक् मीठी सि बेचैनी घोल दि थि। जैसे हि दोनों खाट पऱ लेटे, कमरे कां तापमान अचानक बढ़ता हुआ महसूस हुआ।
आर्यन सीधा लेटाहुआ थां, मगर उसकी साँसें तेज़थीं। उसने करवटली औऱ अपनी मम्मी कि ओर देखा। उसकी आँखों मे एक् अजीब सि बेबसी, एक् गहरी चाहत औऱ जैसेकुछ 'मांगने' वाली मासूमियत थि। वो बिना बोले हि अपनी मम्मी सें उस सुखद स्पर्श कि भीख मांगरहा थां जिसने उसकी रातों कि नींद औऱ दिन कां सुकून छीन लिया थां।
अंजलि नें उसकीउन प्यासी औऱ मांगने वाली आँखों कों देखा। उसने महसूस किया कि आर्यन अब पूरीतरह सें उसके प्रभाव मे हैं औऱ उसकाबदन उस 'कोमलता' केँ लिए बेचैनी रहा हैं।
अंजलि केँ चेहरे पर्र एक् बहोत हि दिलकश औऱ समझदारी भरी मुस्कान आई। उसने धीरे-धीरे सें करवटली औऱ आर्यन केँ चेहरे केँ लगभगआकर फुसफुसाते हुएकहा, "इतनेगौर सें क्याँ देखरहा हैं? डरमत। आँ, छू लें। "
जैसे हि अंजलि नें यह शब्दकहे, आर्यन केँ दिल कि धड़कन मानो एक् लम्हा केँ लिएरुक गई। उसने कांपते हुए अपने दोनों हाथ बढ़ाए। इसबार उसकी उंगलियों मे झिझककम औऱ पाने कि उतावलापन ज्यादा थि। उसने धीरे-धीरे सें अंजलि केँ mammay पऱ अपनी हथेलियां जमादीं।
"अहह." आर्यन केँ मुँह सें एक् धीमी कराह निकली।
जैसे हि उसकी हथेलियों नें उन भारी औऱ रेशमी उभारों कों महसूस किया, उसके लन्ड नें पजामे केँ अंदर अपनी पूरी ताकत सें एक् झटका लिया। वो अब इतना सख्त हौ चुका थां कि पजामे कां कपड़ा उसे छोटापड़ रहा थां।
अंजलि नें अपनी आँखें बंदकर लीं औऱ आर्यन केँ हाथों कि हरकतों कों महसूस करनेलगी। "आर्यन। तुँ कलकहरहा थां न् कि तुम को 'नरमी' पसन्द हैं? देख लें, येसभी तेरा हि हैं। तुँ जितना चाहेइसे महसूस कर सकता हैं, " अंजलि कि आवाज़ अब थोड़ी भारी औऱ गहरी हौ गई थि।
आर्यन अब केवलछू नहि रहा थां, बल्कि वो आहिस्ता उन्हें अपनी मुट्ठी मे भरने कि कोशिश कररहा थां। उसे अंजलि केँ बदन कि गंध औऱ उनकी तेज़ होती साँसों नें दीवाना बना दिया थां। वो अपनी उंगलियों सें उस 'संवेदनशीलता' कों टटोलरहा थां जिसके बारे मे मम्मी नें कलरात बताया थां।
कमरे कि उस नीली रोशनी मे, मम्मी औऱ बेटे केँ बीच कां ये दृश्य किसी पवित्र मर्यादा औऱ शारीरिक आकर्षण केँ बीच कि उस धुंधली लकीर पऱ खड़ा थां, जिसेअब वे दोनों पारकर चुके थें।
रात केँ उस सन्नाटे मे कमरे कि गर्मी औऱ बढ़ गई थि। आर्यन कि हथेलियाँ अंजलि केँ सीनों (mammay) कि गोलाई कों आहिस्ता सहलारही थीं। मगर तभीउसे अपनी उंगलियों केँ नीचेकुछ बहोत हि अलग औऱ 'सख्त' महसूस हुआ।
अंजलि केँ मखमली औऱ नरम उभारों केँ बिल्कुल बीचों-बीच, कपड़े केँ ऊपर सें हि दो छोटी, दाने जैसी चीज़ें उभरी हुई थीं जौ पत्थर कि तरहकड़क महसूस हौ रहीथीं। आर्यन नें अपनी उंगलियों सें उन्हें हल्का सां दबाया औऱ फिन अपनी मम्मी कि आँखों मे झाँका।
आर्यन कि साँसें अब औऱ भि तेज़ होँ चुकीथीं। उसने अपनी उंगली सें उस उभरेहुए हिस्से कों गोल-गोल घुमाते हुए बहोत हि धीमी औऱ जिज्ञासु आवाज़ मे पूछा।
"मम्मी। ये क्याँ हैं? अभि तौ आपनेकहा थां कि यह बहोत सॉफ्ट होते हें, मगरइस सॉफ्ट-सॉफ्ट केँ बीचयह दोनों हिस्से इतनेकड़क क्यूं हौ गए हें? यह उंगली पर्र चुभरहे हें मम्मी."
अंजलि केँ मुँह सें एक् हल्की सि 'अहह' निकली औऱ उसने अपनी आँखें मूँदलीं। आर्यन कां वो सीधा प्रश्न औऱ उसकी उंगलियों कां वो दबाव अंजलि केँ बदन मे बिजली केँ झटके जैसा अहसास पैदाकर रहा थां।
उसने अपनी आँखें खोलीं, जिनमें अब एक् अजीब सि चमक औऱ 'मदहोशी' थि। उसने एक् गहरी औऱ कांपती हुई साँसली औऱ धीरे-धीरे सें समझाना शुरुआत किया।
"आर्यन। इसे निप्पल कहते हें। जैसे मैंने तुम्हे बताया थां कि ये जिस्म कां सबसे संवेदनशील हिस्सा होता हैं, वैसे हि ये उत्तेजना कां थर्मामीटर भि होता हैं। " अंजलि कि आवाज़अब पहले सें कहीं ज़्यादा भारी औऱ लड़खड़ा रही थि।
उसने आर्यन कां हाथ पकड़कर उसे थोड़ा औऱ ज़ोर सें दबाया। "जब तूँ इन्हें इसतरह सहलाता हैं औऱ जब मेराबदन तेरे स्पर्श सें उत्तेजित होता हैं, तौ यह अपने आप् कड़क हौ जाते हें। येइसबात कां संकेत हैं कि मुझे तेराये छूना। बहोत अच्छा लगरहा हैं। मेरा जिस्म तुझेही 'रिस्पॉन्स' देरहा हैं, बेटा। "
आर्यन केँ होशउड़ गए। उसे यकीन नहि हौ रहा थां कि उसकी मम्मी कां जिस्म उसके छूने सें इसतरह प्रतिक्रिया देरहा हैं। उसका लन्ड पजामे केँ अंदर अपनीचरम सीमा पऱ थां औऱ उसकी नसों मे खून तेज़ी सें दौड़रहा थां।
"मतलब। आपको भि उतना हि मज़ा आँ रहा हैं जितना मुझे?" आर्यन नें करीब फुसफुसाते हुए पूछा।
अंजलि नें अपनासिर धीरे-धीरे सें हिलाया। "हाँ। औऱ भि ज़्यादा। तुँ जितना इन्हें छेड़ता हैं, उतनी हि सिहरन मेरे पूरे शरीर मे दौड़ती हैं। अब तूँ हि देख लेँ, कुदरत नें इस कोमलता केँ बीच कितनी गहराई छिपाई हैं। "
आर्यन नें अब औऱ भि बेबाकी सें उनकड़क निप्पल्स कों अपनी उंगलियों केँ बीच दबाना औऱ मसलना शुरुआत कर दिया। अंजलि कां बदनखाट पर्र आरामसे अकड़ने लगा थां औऱ उसकी भारी साँसें कमरे केँ सन्नाटे कों चीररही थीं।
कमरे कि उस मदहोश कर देने वाली नीली रोशनी मे वक़्त जैसेठहर गय़ा थां। आर्यन कि उंगलियाँ अंजलि केँ कपड़ों केँ ऊपर सें उन सख्त निप्पल्स कों महसूस कररही थीं, मगर अब उसकेमन कि प्यास केवल स्पर्श सें नहि बुझरही थि। वो उस कोमलता औऱ उस उभार कों साक्षात् देख्ना चाहता थां, बिना किसी रुकावट केँ।
उसकागला सूखरहा थां औऱ दिल इतनी ज़ोर सें धड़करहा थां कि उसे अपनी पसलियों पर्र उसकीचोट महसूस हौ रही थि।
आर्यन नें अपनी उंगलियाँ थोड़ी देर केँ लिए रोकीं औऱ बहोत हि धीमी, कांपती हुइ आवाज़ मे अपनी मम्मी कि आँखों मे झाँकते हुएकहा।
"मां। क्याँ मे। क्याँ मे इन्हें देख औऱ छू सकता हूं?"
अंजलि नें थोड़ी हैरानी सें उसे देखा औऱ हल्की सि मुस्कान केँ संगकहा, "पगले, तुँ अभि क्याँ कररहा हैं? तुँ इन्हें छू हि तौ रहा हैं औऱ क्याँ कररहा हैं?"
आर्यन कि हिचकिचाहट अब औऱ बढ़ गई थि। उसने अपनी नज़रें झुकालीं औऱ अपनी मां केँ कुर्ते केँ गले कि ओर इशारा करतेहुए बहोत हि दबी आवाज़ मे कहा, "ऐसे नहि मां। मेरा मतलब हैं। बिना कपड़ों केँ। मे इन्हें बिल्कुल लगभग सें। अपनी आँखों सें देख्ना चाहता हूं। "
कमरे मे जैसे सन्नाटा औऱ गहरा हौ गय़ा। अंजलि कि साँसें एक् लम्हा केँ लिएरुक गईं। उसने सोचा नहि थां कि आर्यन इतनी जल्द औऱ इतनी बेबाकी सें ये मांगकर देगा। मगर फिन उसने देखा कि उसका बेटा कितनी उम्मीद औऱ कितनी सच्चाई सें उससेये 'इजाज़त' मांगरहा हैं।
अंजलि कों अपनीकही हुई बातयाद आई—"येसभी नॉर्मल हैं। " उसने महसूस किया कि अगर वो आजयहा रुक गई, तौ शायद आर्यन फिन सें उसी 'गिल्ट' केँ अँधेरे मे चला जाएगा।
अंजलि नें एक् लंबी औऱ गहरी साँसली। उसने धीरे-धीरे सें अपनाहाथ ऊपर उठाया औऱ अपने कुर्ते केँ बटनों कि ओर लेँ गई। उसकी उंगलियाँ भि थोड़ी कांपरही थीं, मगर उसकी आँखों मे आर्यन केँ लिए एक् अजीब सि 'स्वीकृति' थि।
"ठीक हैं आर्यन। अगर तेरी जिज्ञासा तुझेही यहा तक लें आई हैं, तौ मे तुझेही रोकना नहि चाहती। देख लें कि कुदरत नें क्याँ बनाया हैं, " अंजलि नें बहोत हि कोमल आवाज़ मे कहा।
उसने आरामसे अपने कुर्ते केँ बटन खोले औऱ कपड़े कों अपने कंधों सें थोडा नीचे खिसका दिया। जैसे हि कपड़ा हटा, कमरे कि उस मद्धम रोशनी मे अंजलि केँ वो दूधिया सफेद औऱ भारी mammayआर्यन कि आँखों केँ सामने थें। उनके बीचों-बीच वो गुलाबी-भूरे रंग केँ सख्त निप्पल्स बिल्कुल किसी नगीने कि तरहचमक रहे थें।
रात केँ अभि 11:30 हि बजे थें। कमरे कि मद्धम नीली रोशनी अंजलि केँ सुडौल औऱ नग्न ऊपरी जिस्म पर्र पड़कर एक् जादुई चमक पैदाकर रही थि। आर्यन कि आँखें फटी कि फटीरह गई थीं। उसने अपनी ज़िंदगी मे पहलीबार किसीऔरत कों इसरूप मे देखा थां, औऱ वो भि अपनी हि मम्मी कों।
अंजलि केँ उन भारी औऱ मखमली mammay कि गोलाई औऱ उनके बीचों-बीच चमकते हुएवे सख्त निप्पल्स। येसभी आर्यन केँ लिए एक् 'विजुअल शॉक' जैसा थां।
आर्यन कां दिल इतनी तेज़ धड़करहा थां कि उसेलगा वो सीना चीरकर बाहर् आँ जाएगा। उसके दिमाग़ मे हज़ारों नसें एक् संग फटने कों रेडीथीं। उत्तेजना, घबराहट, सुखद अहसास औऱ उस 'नग्न' सत्य कों एक् संग स्वीकार करना उसके किशोर मन केँ लिए बहोत भारीपड़ गय़ा।
जैसे हि उसने अपना कांपता हुआहाथ उन नग्न कोमलताओं कि ओर बढ़ाया, अचानक उसकेसिर मे एक् तेज़ चकराने जैसा अहसास हुआ। आँखों केँ सामने अंधेरा छानेलगा औऱ आवाज़ें गूँजने लगीं। वो उस 'अति-उत्तेजना' कों बर्दाश्त नहि कर पाया औऱ खाट पऱ पीछे कि ओर लुढ़क गय़ा।
वो बेहोश हौ चुका थां।
अंजलि घबरा गई। "आर्यन! आर्यन! क्याँ हुआ बेटा?" उसने जल्दी अपना कुर्ता संभाला औऱ आर्यन केँ चेहरे पर्र थपकियाँ देनेलगी। मगर आर्यन एक् गहरी औऱ बेसुध नींद (Shock-induced sleep) मे जा चुका थां। अंजलि नें राहत कि सांसली कि वो केवल बेहोश हुआ हैं। उसनेउसे प्रेम सें कंबल ओढ़ाया, उसके माथे कों चूमा औऱ स्वयं भि उसकेबगल मे लेट गई।
सूरज कि तेज़ रोशनी जब आर्यन कि आँखों पऱ पड़ी, तौ उसकी नींद टूटी। वो झटके सें उठकरबैठ गय़ा। उसकासिर थोडा भारी थां। उसेयाद आया कि कलरात क्याँ हुआ थां—वो नग्न मंजर, वो 'निप्पल्स' कि कड़वाहट, औऱ मम्मी कि वो 'खुली अनुमति'।
उसने देखा कि अंजलि कमरे मे नहि थि, शायद वो किचन मे ब्रेकफास्ट बनारही थि। आर्यन नें अपने जिस्म कि ओर देखा, उसका लन्ड सुभह कि कुदरती सख्ती केँ संग अकड़ाहुआ थां। कलरात जोँ उसने देखा थां, वो उसके दिमाग़ मे किसी फिल्म कि तरहघूम रहा थां।
वो उठकर बाथरूम कि ओरबढ़ा, मगर उसकेमन मे एक् हि प्रश्न थां—"क्याँ वो सच थां याँ कोई सपना?"
तभी किचन सें अंजलि कि आवाज़ आई, "उठ गय़ा आर्यन? जल्द फ्रेश होकर आँ जा, ब्रेकफास्ट सजधजकर हैं। "
आर्यन कि धड़कनें फिन सें तेज़ हौ गईं। वो सोचरहा थां कि अब वो मम्मी कां सामना केसे करेगा? क्याँ मां कलरात कि उस 'अधूरी' बात कों आगे बढ़ाएँगी याँ फिन सें सभी नॉर्मल होँ जाएगा?
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