Doctor मां – New Episode
ऊपर केँ कमरे मे आर्यन नें रातभर कि उधेड़बुन केँ बाद आखिरकार हिम्मत जुटाई। उसने अपनाबैग उठाया, गहरी साँसली औऱ आरामसे सीढ़ियाँ उतरने लगा। उसकादिल अभि भि ज़ोर सें धड़करहा थां। उसेलग रहा थां कि वो मम्मी कां सामना केसे करेगा? क्याँ वो कलरात वालीबात छेड़ेंगी? याँ फिन एक् भारी खामोशी उनकेबीच हमेशा केँ लिए दीवार बन जाएगी?
जब वो नीचे पहुंचा, अंजलि किचन केँ काउंटर पऱ खड़ीगरम चायछान रही थि। वो बिल्कुल शांत औऱ सहजदिख रही थि, जैसेकल रातकुछ हुआ हि न् हौ।
"आँ जा आर्यन, ब्रेकफास्ट लग गय़ा हैं। जल्दकर वरना कॉलेज केँ लिएदेर हौ जाएगी, " अंजलि नें बिना पीछे मुड़े, बहोत हि स्वाभाविक आवाज़ मे कहा।
आर्यन मेज केँ पासआया औऱ कुर्सी घसीटकर बैठ गय़ा। उसने अपनी नज़रें झुकारखी थीं, जैसे फर्श कि टाइल्स मे कोई बहोत ज़रूरी चीज़ ढूँढरहा हौ। वो अपनी प्लेट मे रखे पराँठे कों देख तौ रहा थां, पर्र उसे उठाने कि हिम्मत नहि जुटापा रहा थां। कमरे मे सन्नाटा इतना गहरा थां कि घड़ी कि टिक-टिक भि हथौड़े कि तरहलग रही थि।
अंजलि नें गरमचाय कां कप उसकेपास रखा औऱ उसकेसिर पऱ बहोत हि कोमलता सें हाथ फेरा। उस एक् स्पर्श नें आर्यन केँ अंदर केँ सारे बांध तोड़दिए। उसने अपनी नज़रें ऊपर नहि उठाईं, बस अपनी आवाज़ कों स्थिर रखने कि कोशिश कि।
"मम्मी." उसकी आवाज़ थोड़ी भर्राई हुईँ थि। "मुझे। मुझेकल रात केँ लिए सॉरी कहना हैं। मुझे आपका मोबाइल नहि छूना चाहिए थां। मेरीवजह सें आपको। आपको बुरालगा होगा। मे बस। आपकी फिक्र कररहा थां पर्र मुझे अपनीहद पार नहि करनी चाहिए थि। "
अंजलि नें एक् लंबी औऱ गहरी साँसली। उसने आर्यन केँ सामने वाली कुर्सी खींची औऱ बैठ गई। उसने अपनाहाथ आर्यन केँ हाथ पर्र रखा, जोँ अभि भि कांपरहा थां।
उसने बहोत हि शांत औऱ प्रेम भरी आवाज़ मे कहा, "पगले, सॉरीकिस बात केँ लिए?उस फिक्र केँ लिए जौ तूने अपनी मम्मी केँ लिए दिखाई? याँ उस प्रेम केँ लिए कि तुँ रातभर मेरे कमरे केँ बाहर् खड़ारहा?"
आर्यन नें धीरे-धीरे सें अपनी नज़रें ऊपर उठाईं। उसने देखा कि मां कि आँखों मे कोई क्रोध याँ शर्मिंदगी नहि थि, बल्कि एक् अजीब सां चैन औऱ गर्व थां।
अंजलि नें थोड़ी शरारत भरी मुस्कान केँ संगकहा, "हाँ, मेरा मोबाइल मेरा अपना निजी कोना हैं, औऱ शायद तुँ अभि इतना बड़ा नहि हुआ कि उस कोने कों पूरीतरह समझसके। पर्र इसका मतलबये नहि कि तूनेकोई गुनाह कर दिया। तूँ मेरा बेटा हैं, औऱ तेरी फिक्र हि मेरी सबसे बड़ी दवाई हैं। अबयह 'सॉरी-वोरी' छोड़ औऱ चुपचाप ब्रेकफास्ट कर, वरना टिफिन ठंडा हौ जाएगा। "
आर्यन केँ सीने सें जैसे एक् बहोत बड़ा पत्थर हट गय़ा। उसने एक् हल्की मुस्कान दि औऱ पराँठे कां निवाला तोड़ा। वो समझ गय़ा थां कि नाता चाहे कितना भि परिपक्व (mature) क्यूं नं होँ जाए, मां कि ममता हमेशा उन असहज सच्चाइयों सें बड़ी होती हैं।
नाश्ते कि मेज पऱ अब माहौल थोडा हल्का तौ हुआ थां, मगर एक् अनकही हिचकिचाहट अभि भि हवा मे तैररही थि। अंजलि जानती थि कि आर्यन एक् समझदार औऱ संवेदनशील लड़का हैं, औऱ अगर उसनेइस बात कों यहीं सुलझाया नहि, तोँ शायद वो हमेशा केँ लिए अपनेमन मे एक् गांठ बांध लेगा।
उसनेगरम चाय कां घूँट लिया औऱ बहोत हि शांतभाव सें आर्यन कि ओर देखा, जोँ अब भि थोडा सिमटा हुआ बैठा थां।
"आर्यन, " अंजलि नें बहोत हि कोमल स्वर मे उसे पुकारा। आर्यन नें अपनी नज़रें उठाईं।
"बेटा, कलरात जोँ हुआ। मे चाहती हूं कि तूँ उसे एक् अलग नज़रिए सें देख। देख, हम् सभी इंसान हें। चाहेकोई डॉक्टर होँ, मां होँ याँ बेटा—हर किसी कां अपना एक् निजी संसार होता हैं, अपनीकुछ ज़रूरतें औऱ अपना एक् तरीका होता हैं स्वयं कों शांत रखने कां। "
उसने थोडा रुककर आर्यन केँ हाथ पर्र अपनाहाथ रखा। "कल जोँ तूने देखा याँ सुना, वो कोई बीमारी नहि थि जिसे दवाइयों सें ठीक कियाजा सके। वो बस एक् तरीका थां मेरे अपने तनाव (stress) कों दूर करने कां। कभी-कभी जिस्म औऱ मन कों शांत करने केँ लिए इंसान कों अपने अकेलेपन मे कुछ चीज़ों कां सहारा लेना पड़ता हैं। इसमें न् कुछगलत हैं, नं कुछ शर्मनाक। "
आर्यन खामोशी सें सुनरहा थां। उसे अहसास हुआ कि उसकी मम्मी उसे एक् 'बच्चे' कि तरह नहि, बल्कि एक् 'वयस्क' (adult) कि तरह समझारही हें।
अंजलि नें हल्की मुस्कान केँ संगबात जारीरखी, "औऱ सुन। अगलीबार अगरकभी तुम्हारी तरफरात कों ऐसीकोई आवाज़ सुनाई दे, याँ लगे कि मे बेचैन हूं, तोँ तुम्हारी तरफ पागलों कि तरह घबराने याँ थर्मामीटर लेकर दौड़ने कि ज़रूरत नहि हैं। तेरी मां अपनी देखभाल करना जानती हैं। तुँ बसयहसमझ लेँ कि वोँ मेरा अपना 'मी-वक्त' हैं। "
उसने थोडा मज़ाकिया लहजे मे उसकीनाक खींची, "तूँ बस अपनी पढ़ाई औऱ अपनी लाइफ पर्र ध्यान दे। मेरी फिक्र करना अच्छी बात हैं, पर्र इतनी भि नहि कि तुँ स्वयं कि नींद खराबकर लेँ। समझ गय़ा?"
आर्यन केँ चेहरे पर्र अब एक् वास्तविक राहतआई। उसेसमझ आँ गय़ा कि मां उससेकुछ छिपा नहि रही हें, बल्कि उसेये बतारही हें कि वो भि एक् हाड़-मांस कि इंसान हें जिनकी अपनी एक् प्राइवेट लाइफ हैं।
"जी मां, मे समझ गय़ा। सॉरीफिन सें, कि मैंने बात कों कुछ औऱ हि समझ लिया थां, " आर्यन नें मुस्कुराते हुएकहा।
"चलअब, मुस्कुराता हुआ कॉलेज जा। औऱ हाँ, रास्ते मे वोँ दूध कां खाली पैकेट डस्टबिन मे डाल देना जोँ तूँ कलरात काउंटर पऱ हि छोड़आया थां, " अंजलि नें हँसते हुएउसे विदा किया।
आर्यन अपनाबैग उठाकर बाहर् निकला, तौ उसे महसूस हुआ कि सुभह कि हवाआज वाकई बहोत ताज़ा हैं। उनकेबीच कां वोँ भारीपन अब एक् गहरीसमझ मे बदल चुका थां।
साम कां टाइम थां। बाहर् आसमान मे गोधूलि कि लालिमा आरामसे धुंधली होकर स्याह हौ रही थि। घऱ केँ अंदर कि फिजाअब बिल्कुल बदल चुकी थि। सुभह कि वोँ हल्की सि हिचकिचाहट औऱ रात कां वोँ भारीपन अब कहीं नहि थां। किचन सें फिनवही चिर-परिचित मसालों कि खुशबू आँ रही थि, जौ इसघऱ कि जीवंतता कां प्रतीक थि।
आर्यन कॉलेज सें वापसआकर हाथ-मुँह धोकर डाइनिंग टेबल पर्र बैठ गय़ा थां। अंजलि नें आज सादामगर मज़ेदार खानां बनाया थां—दाल तड़का, भिंडी कि सब्जी औऱ फुल्के।
"आज कॉलेज मे क्याँ खासहुआ?" अंजलि नें रोटी पऱ घी लगाते हुए बहोत हि सहजता सें पूछा।
आर्यन नें एक् निवाला लिया औऱ बोला, "वही रूटीन मम्मी। बसआज लाइब्रेरी मे थोडा अधिकसमय बिताया। प्रोजेक्ट केँ लिएकुछ पुरानी रिपोर्ट्स देखनी थि। औऱ हाँ, आज तौ कैंटीन कां समोसा खाकर मेरापेट हि भर गय़ा थां, पर्र आपकीदाल कि खुशबू नें फिन सें भूखजगा दि। "
अंजलि नें हँसते हुए उसकी थाली मे एक् औऱ रोटीरखी। "समोसे कम खायाकर, सेहत केँ लिए अच्छे नहि होते। औऱ क्लिनिक मे भि आज बहुतरश थां। मौसमबदल रहा हैं नं, तौ वायरल केँ पेशेंट्स बहोत बढ़गए हें। "
दोनों केँ बीच बातें इतनी सामान्य थीं कि लग हि नहि रहा थां कि कुछ घंटों पहले उनकेबीच कोई असहज स्थिति बनी थि। वे फिल्म कि चर्चा करनेलगे, जोँ अगले हफ्ते रिलीज होने वाली थि। आर्यन नें अपने दोस्तों केँ किसी मज़ाक कां ज़िक्र किया, जिस पर्र अंजलि खिलखिलाकर हँसपड़ी।
खानां समाप्त करने केँ बाद, आर्यन नें अपनी प्लेट उठाई। अंजलि नें उसे देखा औऱ मुस्कुराई, "आजफिन बर्तन धोने कां इरादा हैं क्याँ?"
आर्यन नें मज़ाक मे सिर हिलाया, "नहि मम्मी, आज मेरा कोटा पूरा होँ गय़ा हैं। आज आप् धोइये, मे ज़रा अपनी पढ़ाई समाप्त करता हूं। "
"जा-जा, पढ़ाईकर, " अंजलि नें प्रेम सें उसे झिड़का।
आर्यन जब अपनी सीढ़ियों कि ओरबढ़ा, तोँ उसने पीछे मुड़कर देखा। मम्मी अपनीधुन मे किचन समेटरही थीं। दोनों कों पता थां कि अब उनकेबीच कोई पर्दा नहि हैं, बल्कि एक् ऐसीसमझ हैं जौ शब्दों सें परे हैं। रात कां सन्नाटा अब डरावना नहि, बल्कि एक् चैन देने वाली चादर जैसा थां।
लगभगआधे घंटेबाद, जब आर्यन नें ऊपर अपना थोडा काम निपटा लिया, उसे फिन सें दूध कि यादआई। इसबार उसके कदमों मे वो हिचकिचाहट नहि थि जौ पिछली रात थि। वो सीढ़ियों सें उतरकर सीधे किचन कि ओर बढ़ा।
किचन कां नज़ारा बिल्कुल बदलाहुआ थां। अंजलि अपनाकाम ख़त्म कर चुकी थि। स्लैब बिल्कुल साफ थां, बर्तन अपनी स्थान पऱ सलीके सें लगे थें औऱ सिंक सूखाहुआ थां। अंजलि काउंटर केँ पास खड़ी अपनी अंतिम गरमचाय कां कपहाथ मे लिए खिड़की केँ बाहर् देखरही थि।
आर्यन कों आतादेख वो मुड़ी औऱ मुस्कुराई, "आँ गय़ा दूध पीने? मुझेलगा थां आज तुँ ऊपर हि सो जाएगा। "
आर्यन नें मुस्कुराते हुए शेल्फ सें अपना गिलास निकाला, "बिनादूध केँ नींद कहां आती हैं मम्मी? औऱ वैसे भि, आज तौ मुझेपता हैं कि दूध कहां रखा हैं औऱ टेम्परेचर भि बिल्कुल सही होगा। "
उसने हल्की शरारत केँ संगबात कही, जिस पर्र अंजलि नें बस अपनी आँखें घुमाईं औऱ मुस्कुरा दि। आर्यन नें पतीले सें दूध गिलास मे डाला। दूध अब भि हल्का गुनगुना थां।
"मां, आप् बहोत जल्दकाम ख़त्म कर लेती हें, " आर्यन नें दूध कां घूँट लेतेहुए कहा। "अभि तोँ मैंने सोचा थां कि शायद आप् यहीं मिलेंगी। "
अंजलि नें अपनागरम चाय कां खालीकप सिंक मे रखतेहुए कहा, "आदत होँ गई हैं बेटा। औऱ फिन, घऱ साफ रहता हैं तोँ मन कों भि शांति मिलती हैं। अब तुँ यहदूध समाप्त कर औऱ चुपचाप सोनेजा। कल सुभह जल्द उठना हैं। "
आर्यन नें गिलास खाली किया औऱ उसे सिंक मे धोकररख दिया। "जी मां, आप् भि सो जाइये। आजरात आपको 'बुखार' नहि चढ़ना चाहिए, " उसने बहोत हि दबे स्वर मे, मज़ाक औऱ मासूमियत केँ मेल केँ संगकहा।
अंजलि नें उसे हल्का सां धक्का दिया औऱ हँसते हुए बोलि, "चल बदमाश, अधिक स्मार्ट मतबन। गुड नाइट!"
"गुड नाइट मम्मी!" आर्यन मुस्कुराते हुएऊपर कि ओरबढ़ गय़ा।
किचन कि लाइटबंद करतेहुए अंजलि केँ मन मे एक् गहरा संतोष थां। घऱ मे अबकोई अनकही बात नहि थि, कोई भारीपन नहि थां। सभीकुछ साफ़, पारदर्शी औऱ गरिमापूर्ण थां। रात कि खामोशी अब दोनों केँ लिएचैन भरी थि।
आर्यन सीढ़ियों कि ओरबढ़ा तौ सही, मगर दूसरी याँ तीसरी पायदान पर्र पहुँचते हि उसकेकदम ठिठकगए। उसकेमन मे एक् ऐसा प्रश्न कौंधा जिसने उसे वापस मुड़ने पर्र मजबूर कर दिया। वो धीरे-धीरे सें घूमा औऱ किचन कि दहलीज पऱ खड़ी मम्मी कों देखने लगा।
आर्यन केँ चेहरे पर्र इस टाइम भावनाओं कां एक् अजीब सां संगम थां। उसकी आँखों मे वोँ मासूमियत थि जोँ बचपन मे हुआ करती थि, आवाज़ मे थोड़ी हिचकिचाहट औऱ कलरात कि घटना कों लेकरमन केँ किसी कोने मे दबी हुइ हल्की सि लज्जा।
उसने रेलिंग कों कसकर पकड़ा औऱ धीमी आवाज़ मे पूछा, "मां। एक् बात पूछूँ?"
अंजलि, जोँ किचन कि लाइटबंद करने हि वाली थि, रुक गई। उसने मुड़कर आर्यन कि ओर देखा, "हाँ बेटा, बोल?"
आर्यन नें नज़रें थोड़ी झुकालीं औऱ फिन हिम्मत जुटाकर कहा, "कल रात। जोँ कुछहुआ। उसकेबाद मुझे एक् डरलगरहा हैं। कल तौ मैंने आपकीउन आवाज़ों कों औऱ जिस्म कि गर्मी कों गलतसमझ लिया थां। मगर मां, अगरकभी भविष्य मे आपको वाकई मे तेज़ बुखार होँ याँ सच मे कोई तकलीफ हौ। तौ मुझे केसेपता चलेगा? मे तोँ यही सोचकर रुक जाऊँगा कि शायद आप् अपने 'निजी लम्हा' मे हें। "
प्रश्न बहोत हि गहरा औऱ संजीदा थां। आर्यन कि चिंता जायज़ थि—कहीं कल कि उस घटना कि वजह सें उनकेबीच संवाद कि वोँ डोर नं टूटजाए जोँ मुश्किल टाइम मे कामआती हैं।
अंजलि कुछसमय केँ लिए शांतरही। उसने आर्यन केँ चेहरे पर्र पसरीउस फिक्र कों देखा जोँ बिल्कुल शुद्ध थि। वो धीरे-धीरे सें चलकर सीढ़ियों केँ पासआई औऱ आर्यन केँ कंधे पर्र हाथरखा।
उसने बहोत हि चैनभरी आवाज़ मे कहा, "बेटा, मां औऱ बेटे केँ बीच एक् ऐसा अदृश्य तार होता हैं जिसे किसी 'गलतफहमी' कि ज़रूरत नहि पड़ती। अगरकभी मुझे वाकई तुम्हारी ज़रूरत होगी, तौ मेरी आवाज़ मे वोँ दर्द औऱ पुकार स्वयं-ब-स्वयं आँ जाएगी जिसे तूँ पहचान लेगा। औऱ दूसरी बात."
उसने आर्यन कि आँखों मे झाँककर मुस्कुराते हुएकहा, "अब तूँ इतना बड़ा औऱ समझदार होँ गय़ा हैं कि तुँ 'दिखावे' औऱ 'हकीकत' केँ बीच कां फर्कसमझ सके। भरोसा रख, अगर कभी मुझे तकलीफ हुईँ, तोँ मे स्वयं तुम्हें आवाज़ दे दूँगी। अबउसबात कों लेकर अपनेमन मे कोईबोझ मतरख। "
आर्यन केँ चेहरे पऱ एक् राहतभरी मुस्कान आँ गई। उसकी सारी उलझनउस एक् जवाब सें सुलझ गई थि।
"थैंकयू मां। गुड नाइट, " उसने हल्के मन सें कहा।
"गुड नाइट, मेरे फिक्रमंद डॉक्टर!" अंजलि नें चुटकी ली औऱ आर्यन मुस्कुराता हुआ तेज़ी सें ऊपर अपने कमरे कि ओरबढ़ गय़ा।
Doctor मां – New Episode
रात कां सन्नाटा एक् बारफिन गहरा चुका थां। घड़ी कि सुइयां 1:00 बजे कां टाइम दिखारही थीं। ऊपर अपने कमरे मे आर्यन गहरी नींद मे थां, मगर अचानक उसकी आँखें खुलगईं। पता नहि कोई सपना थां याँ मन कि कोई गहरी बेचैनी, पऱ उसकी नींद पूरीतरह उड़ चुकी थि।
वो बैड पऱ लेटारहा, मगर उसके दिमाग़ मे एक् प्रश्न बार-बार कौंधरहा थां। क्याँ कलरात जोँ हुआ, वो मात्र एक् इत्तेफाक थां? क्याँ मां आज वाकईठीक हें?
बिना किसी हंगामा केँ, आर्यन खाट सें उठा। आज उसने मोबाइल कि टॉर्च नहि जलाई। वो अंधेरे कां आदी होँ चुका थां। वो दबे पाँव सीढ़ियों सें नीचे उतरा। दिल कि धड़कन आज भि तेज़ थि, पर्र उसमें कल जैसी घबराहट नहि, बल्कि एक् अजीब सि जिज्ञासा थि।
वो मम्मी केँ कमरे केँ दरवाज़े केँ पास पहुंचा। गलियारे मे वही सन्नाटा थां। उसने अपनी साँसें रोकीं औऱ धीरे-धीरे सें अपनाकान दरवाज़े कि लकड़ी सें सटा दिया।
वही आवाज़ें.
आज भि कमरे केँ अंदर सें वही हल्की-हल्की सिसकारियों कि गूँज सुनाई देरही थि। वो टूटी हुईँ साँसें औऱ चादरों कि सरसराहट बिल्कुल कलरात जैसी हि थि। आर्यन कों अब थर्मामीटर कि ज़रूरत नहि थि, न् हि उसेये जानने कि ज़रूरत थि कि मम्मी कों बुखार हैं याँ नहि।
उसेअब समझ आँ गय़ा थां कि ये मम्मी कि दिनभर कि थकान, तनाव औऱ उनके अपने अकेलेपन कों दूर करने कां उनका निजी तरीका थां। वो आवाज़ें जिसे वो कल तक 'तकलीफ' समझरहा थां, वो दरअसल उनकी अपनी एक् दुनिया थि जहाँ वो कुछ पलों केँ लिए केवल 'अंजलि' थीं, नं कि किसी कि मां याँ कोई डॉक्टर।
आर्यन कुछ पलों तक वहीं खड़ारहा। उसके चेहरे पऱ अबकोई हैरानी नहि थि, नं हि कोई बेचैनी। उसने शांति सें अपनासिर दरवाज़े सें हटाया। उसने महसूस किया कि हर इंसान केँ पास एक् ऐसारूम होता हैं जहाँ वो अपनी भावनाओं कों आज़ाद छोड़ देता हैं।
वो बिनाकोई आहटकिए चुपचाप ऊपर अपने कमरे मे वापस आँ गय़ा। पलंग पर्र लेटकर वो छत कि ओर देखने लगा। उसकेमन मे अबकोई कड़वाहट याँ लज्जा नहि थि। उसने सोचा कि मम्मी दिनभर सबकेलिए कितनी मज़बूत बनी रहती हें, शायदरात केँ इनचंद पलों मे हि वो स्वयं कों ढूँढती होंगी।
एक् गहरी औऱ चैनभरी साँस लेकर उसने आँखें मूँदलीं। वो समझ चुका थां कि 'निजता' (Privacy) कां सम्मान करना हि सबसे बड़ी परिपक्वता हैं। इसीसोच केँ संग, कुछ हि देर मे वो गहरी औऱ शांत नींद कि आगोश मे चला गय़ा।
अगली सुभह कि शुरुआत बिल्कुल वैसी हि हुईँ जैसीहर रोज़ होती थि। खिड़की सें आती ताज़ी हवा औऱ किचन सें आती बर्तनों कि खनक नें आर्यन कि नींद खोली। रात कि उसखोज केँ बाद आर्यन केँ मन मे अब एक् अजीब सि शांति थि। वो अब अपनी मां कों मात्र एक् 'अभिभावक' केँ तौर पऱ नहि, बल्कि एक् 'इंसान' केँ तौर पऱ देखपा रहा थां।
नाश्ते कि मेज पऱ सभीकुछ सामान्य थां। अंजलि नें ताज़े पराँठे औऱ दही परोसा। दोनों नें हँसी-मजाक किया, कॉलेज केँ प्रोजेक्ट्स पर्र बात कि औऱ अंजलि नें उसेढेर सारी हिदायतें दीं। रात केँ उस सन्नाटे औऱ उन आवाज़ों कां कोई ज़िक्र नहि थां, पऱ आर्यन केँ बर्ताव मे आज एक् नईतरह कि गंभीरता औऱ सम्मान थां।
"मम्मी, आजसाम कों आप् क्लिनिक मे अकेली होंगी क्याँ?" आर्यन नें गरमचाय कां अंतिम घूँट लेतेहुए पूछा।
अंजलि नें टिफिन पैक करतेहुए कहा, "हाँ बेटा, आज नर्सलता छुट्टी पर्र हैं औऱ साम कों मरीज़ों कां बहुतरश रहता हैं। थोडा हेक्टिक (hectic) होने वाला हैं आज, क्यूं?"
आर्यन मुस्कुराया औऱ अपनाबैग उठाते हुए बोला, "बस ऐसे हि पूछरहा थां। आप् अपना ध्यान रखना। "
साम केँ ठीक पांचबजे, जब अंजलि अपने केबिन मे एक् मरीज़ कि फाइलदेख रही थि, तभी दरवाज़े पर्र दस्तक हुई। उसनेसिर उठाकर देखा तौ हैरान रह गई। आर्यन दरवाजे पऱ खड़ा थां, उसकी शर्ट कि आस्तीनें मुड़ी हुई थीं औऱ चेहरे पर्र एक् प्यारी सि मुस्कान थि।
"तुम् यहा?इस टाइम?" अंजलि नें चश्मा उतारते हुए पूछा।
"मैंने सोचाआज नर्स नहि हैं, तौ आपकी हेल्प करदूँ। आखिर मे भि तोँ डॉक्टर कां बेटा हूं, पर्चियाँ बनाना औऱ मरीज़ों कों नंबर सें बुलाना तोँ मे भि कर सकता हूं, " आर्यन नें अंदरआते हुएकहा।
अंजलि कि आँखें खुशी सें चमक उठीं। उसे समझ आँ गय़ा कि आर्यन येसभी क्यूं कररहा हैं। वो उसकी थकान औऱ उसकेकाम केँ बोझ कों कम करना चाहता थां।
पूरीसाम आर्यन नें एक् सहायक कि तरह क्लिनिक कां सारा बाहरी काम संभाला। वो मरीज़ों सें शांति सें बातकर रहा थां, फाइलें मैनेज कररहा थां औऱ बीच-बीच मे मम्मी केँ लिए पानी औऱ गरमचाय कां भि इंतज़ाम कररहा थां। अंजलि नें केबिन केँ अंदर सें उसेकाम करते देखा, तोँ उसे अहसास हुआ कि उसका बेटा वाकई बहोत बड़ा औऱ ज़िम्मेदार हौ गय़ा हैं।
काम केँ बीच मे जब भि उनकी नज़रें मिलतीं, एक् मूक संवाद होता—एक् ऐसा नाता जहाँअब शब्दों कि ज़रूरत नहि थि। आर्यन अपनी मम्मी केँ संघर्ष औऱ उनकी मेहनत कों लगभग सें देखरहा थां, औऱ अंजलि अपने बेटे कि उस निस्वार्थ सेवा कों महसूस कररही थि।
क्लिनिक कां व्यस्त टाइम ख़त्म होने केँ बाद, घऱ कि किचन सें आती खुशबू औऱ डाइनिंग टेबल पऱ सजी थालियाँ दिनभर कि थकान कों कम करने केँ लिए बहुतथीं। रात केँ लगभग 9 बजरहे थें। अंजलि औऱ आर्यन आजसंग मे खानां खाने बैठे थें। माहौल मे एक् बहोत हि चैनभरी औऱ घरेलू शांति थि।
अंजलि नें आर्यन कि थाली मे गर्मागर्म दाल परोसी औऱ स्वयं भि सामने बैठ गई। "आजसच मे तूने बहोत बड़ी सहायता कर दि आर्यन। मुझे अंदाज़ा नहि थां कि तूँ इतनी कुशलता सें क्लिनिक कां रश संभाल लेगा। सच कहूँ तौ, आज मुझे थकान बहोत कम महसूस होँ रही हैं। "
आर्यन नें निवाला तोड़ते हुए मुस्कुराकर कहा, "अरे मां, इसमें कौन सि बड़ीबात हैं? बल्कि आज मुझे अहसास हुआ कि आप् अकेले इतनासभी केसे मैनेज करती हें। इतनेतरह केँ लोग, उनकी परेशानियाँ। औऱ आप् सबकेसंग कितनी शांति सें पेशआती हें। सच मे, आप् बहोत 'सुपरवुमन' टाइप कि डॉक्टर हें। "
अंजलि धीरे-धीरे सें हँसी। "सुपरवुमन नहि रे, बस ज़िम्मेदारी हैं। जब मरीज़ ठीक होकर जाता हैं, तौ सभी थकानमिट जाती हैं। पऱ हाँ, आज तेरावहा होना मेरेलिए एक् बड़े सपोर्ट जैसा थां। "
दोनों केँ बीच बातें बहोत हि सरल औऱ गहरीथीं। आर्यन नें कॉलेज केँ कुछ किस्से सुनाए औऱ अंजलि नें अपने मेडिकल कॉलेज केँ दिनों कि कुछ पुरानी यादें साझाकीं। बातचीत कां सिलसिला ऐसा थां कि पता हि नहि चला कि कब डिनर समाप्त हौ गय़ा।
खाने केँ बाद, आर्यन नें अपनी प्लेट उठाई औऱ बहोत हि सहजता सें बोला, "मां, आप् जाकर आराम कीजिये। आज क्लिनिक मे आपने बहोत काम किया हैं। रसोई मे संभाल लूँगा। "
अंजलि उसेगौर सें देखती रही। उसे महसूस हुआ कि आर्यन केँ मन मे जोँ कलरात औऱ आज सुभह कि उलझन थि, वो अब पूरीतरह एक् सम्मान औऱ सेवाभाव मे बदल चुकी थि। अब उनकेबीच कोई पर्दा याँ असहजता नहि बची थि।
"ठीक हैं भइया, आज तूँ हि 'घऱ कां डॉक्टर' बनजा, " अंजलि नें प्रेम सें उसकेगाल थपथपाए औऱ कमरे कि ओर बढ़नेलगी।
आर्यन नें किचन कि लाइट जलाई औऱ बर्तन समेटने लगा। आज रातघऱ कां कोना-कोना एक् अलग हि पवित्रता औऱ मिठास सें भराहुआ थां। दोनों नें एक्-दूसरे केँ व्यक्तित्व केँ उन कोनों कों स्वीकार कर लिया थां जौ अक्सर शब्दों मे नहि कहे जाते।
किचन कि दीवारों पर्र पीली रोशनी कि चमक थि औऱ बाहर् रात कां गहरा सन्नाटा। आर्यन नें दूध कां पतीला चूल्हे पऱ रखा औऱ गैसजला दि। वो धीमे-धीमे चम्मच सें दूध कों हिलारहा थां, तभी पीछे सें हल्की खनक सुनाई दि। अंजलि अपनी नाइट गाउन पऱ शॉल ओढ़े किचन मे दाखिल हुइ।
"अभि तक सोया नहि?" अंजलि नें काउंटर कां सहारा लेकर खड़े होतेहुए पूछा। उसकी आवाज़ मे एक् चैनभरी थकावट थि।
"बस मां, दूध गर्म हौ जाएफिन जाऊंगा, " आर्यन नें अपनी नज़रें पतीले पर्र हि टिकाए रखीं। दूध मे उबालआने हि वाला थां। उसनेगैस धीमी कि औऱ एक् लंबी सांसली।
कलरात सें जौ बातें उसके सीने मे दबीथीं, औऱ आजसाम क्लिनिक मे जोँ उसने महसूस किया थां, वो सभीअब जुबान पऱ आने केँ लिए बेताब थां। उसके चेहरे पऱ एक् हल्की हिचकिचाहट थि, वो शब्दों कों चुनरहा थां ताकिकोई बातगलत न् लगजाए।
"मां." उसने बहोत धीरे-धीरे सें शुरुआत कि।
"हूं?" अंजलि नें उसेगौर सें देखा।
आर्यन नें दूध कों दो गिलासों मे पलटा औऱ एक् गिलास मां कि ओर बढ़ाते हुए बोला, "आज क्लिनिक मे मैंने आपको देखा। आप् दूसरों केँ दर्द कों इतनी आसानी सें सुन लेती हें, उनका इलाज करती हें। पऱ मुझेआज अहसास हुआ कि आप् अपनी थकान, अपना अकेलापन औऱ अपनी ज़रूरतें किसी सें नहि कहतीं। "
वो थोडा रुका, फिन नज़रे झुकाकर बोला, “उस रात मे जोँ कुछ भि समझरहा थां याँ जौ मैंने देखा। मुझे पहलेलगा कि मे शर्मिंदा हूं। पऱ आजदिन भर आपकेसंग रहने केँ बाद मुझेसमझ आया कि आप् भि तौ एक् इंसान हें। आपकी अपनी भि एक् लाइफ हैं जिसे शायद मे अब तक मात्र 'मम्मी' केँ चश्मे सें देखरहा थां। "
उसकी आवाज़ मे थोड़ी लज्जा थि मगर बहोत सारा सम्मान। "मे बसयह कहना चाहता थां कि। आप् जैसी भि हें, आप् दुनिया कि सबसे अच्छी मम्मी हें। औऱ अब मे आपकी प्राइवेसी कां उतना हि सम्मान करूँगा जितना आपकी ममता कां करता हूं। "
किचन मे एक् लम्हा केँ लिए खामोशी छा गई। दूध कि भाप उनकेबीच केँ उस अंतिम धुंधलके कों भि साफकर रही थि। अंजलि नें गिलास थामा औऱ आर्यन कि आँखों मे देखा। उसकी आँखों मे एक् अजीब सि नमी थि, पऱ होठों पर्र एक् ऐसी मुस्कान जौ कहरही थि कि आज उसका बेटा वाकई मे 'बड़ा' हौ गय़ा हैं।
"धन्यवाद आर्यन, " अंजलि नें बस इतना हि कहा, पर्र उनदो शब्दों मे पूरी कायनात कां चैन थां।
आर्यन नें दूध कां गिलास हाथ मे पकड़ा हुआ थां, मगर उसकी नजरें अभि भि नीचे फर्श पर्र थीं। वो अपनीबात कहने केँ लिए पूरी हिम्मत जुटारहा थां। उसेपता थां कि विषय संवेदनशील हैं, मगर उसकी फिक्र उसकी झिझक सें कहीं अधिक बड़ी थि।
आर्यन नें एक् गहरी सांसली औऱ मम्मी कि ओर देखते हुए बहोत हि संजीदगी सें बोल्ना शुरुआत किया।
"मम्मी। उसरात जौ हुआ, उसकेबाद मेरी उत्सुकता (curiosity) बढ़ गई थि। मे समझ नहि पारहा थां कि वोँ सभी क्याँ थां, इसलिये मैंने इसके बारे मे थोडा पढ़ा औऱ रिसर्च कि कि आखिरये सभी क्याँ होता हैं औऱ जिस्म पऱ इसका क्याँ असर पड़ता हैं। "
अंजलि खामोश रही, वो बस आर्यन कि बातों कों गहराई सें सुनरही थि।
आर्यन नें आगेकहा, "जहाँ तक मैंने पढ़ा औऱ समझा हैं। मे जानता हूं कि ये तनावकम करने कां एक् तरीका हैं, मगर मां, इसे रोज-रोज करना शायदसही नहि हैं। लेखों (articles) मे लिखा थां कि इसकीअति करने सें आपकी सेहत, स्टैमिना (Stamina) औऱ वाइटालिटी पावर (Vitality Power) मे कमी आँ सकती हैं। आप् दिनभर क्लिनिक मे इतनी मेहनत करती हें, इतनी भागदौड़ करती हें। मे नहि चाहता कि किसी भि वजह सें आपकी ऊर्जा कम होँ याँ आपको कमजोरी महसूस होँ। "
उसके चेहरे पर्र कोई निर्णय (judgment) नहि थां, केवल एक् डॉक्टर केँ बेटे कि वैज्ञानिक फिक्र औऱ एक् बच्चे कि अपनी मम्मी केँ प्रति चिंता थि।
उसने धीमी आवाज़ मे बात ख़त्म कि, "मे बस आपकी सेहत कों लेकर फिक्रमंद हूं मम्मी। आप् हम् सबकेलिए बहोत ज़रूरी हें, औऱ आपकी वाइटालिटी हि इसघऱ कि जान हैं। इसलिये। बस अपना ख्याल रखियेगा। "
किचन मे एक् गरिमापूर्ण सन्नाटा पसर गय़ा। अंजलि नें देखा कि आर्यन नें इस विषय कों कितनी परिपक्वता (maturity) केँ संग एक् स्वास्थ्य संबंधी चिंता (health concern) सें जोड़ दिया थां। उसकी बातों मे कोई अश्लीलता नहि थि, बल्कि एक् शुद्ध औऱ वैज्ञानिक दृष्टिकोण थां।
अंजलि नें एक् लंबी सांसली औऱ आर्यन केँ कंधे कों थपथपाते हुएकहा, "तूँ वाकईअब बड़ा हौ गय़ा हैं आर्यन। तूने न् केवल मेरी स्थिति कों समझा, बल्कि एक् डॉक्टर कि तरह मेरी सेहत कि भि फिक्र कि। मे तेरीबात कां ध्यान रखूँगी। अब तूँ फिक्र छोड़ औऱ शांति सें जाकरसो जा। "
अगले पंद्रह दिन आर्यन केँ लिए किसी कशमकश सें कम नहि थें। घऱ कां माहौल ऊपरीतौर पर्र तौ बिल्कुल सामान्य थां—वही सुभह कि गरमचाय, वही क्लिनिक कि बातें औऱ वहीसाम कां संग। मगर आर्यन केँ मन केँ किसी कोने मे एक् बेचैनी घऱकर गई थि।
उसरात कि बातचीत केँ बाद आर्यन कों लगा थां कि शायद चीजें बदलेंगी। उसे उम्मीद थि कि उसकी वैज्ञानिक सलाह औऱ उसकी फिक्र कां मम्मी पर्र असर होगा। मगर हकीकत कुछ औऱ हि थि। पिछले दो हफ्तों सें, जब भि रात केँ सन्नाटे मे घऱ कि लाइटें बुझतीं औऱ आर्यन अपने कमरे मे सोने कि कोशिश करता, उसे नीचे केँ कमरे सें वही चिर-परिचित आहटें सुनाई देतीं।
वो रोज़रात कों जागता, छत कों घूरता औऱ दीवार घड़ी कि टिक-टिक केँ संगउन सिसकारियों कों सुनता। उसेअब उन आवाजों सें कोई'शॉक' नहि लगता थां, बल्कि एक् गहरी चिंता होनेलगी थि।
उसनेगौर किया थां कि पिछले कुछ दिनों मे अंजलि केँ चेहरे पऱ थकान कि लकीरें थोड़ी गहरी होँ गई थीं। सुभहजब वो नाश्ते कि मेज पर्र आती, तोँ उसकी आँखों केँ नीचे हल्के काले घेरे साफ़ दिखते थें। हालाँकि वो मुस्कुराकर अपनी थकान छिपा लेती थि, मगर आर्यन कि पारखी नज़रें देखपा रहीथीं कि उसकी वाइटालिटी औऱ स्टैमिना वाकई प्रभावित होँ रहे थें।
"मम्मी स्वयं एक् डॉक्टर हें, फिन भि वो अपनी सेहत केँ संगये खिलवाड़ क्यूं कररही हें?" आर्यन अक्सर स्वयं सें ये प्रश्न पूछता।
उसकेमन मे कई विचार आते—क्याँ ये तनाव कां कोई बहोत गहरारूप हैं? याँ फिन मां कों मेरी बातों कां बुरालगा औऱ उन्होंने उसे नज़रअंदाज़ कर दिया?उसे अपनी मर्यादा कां भि ख्याल थां, मगर मम्मी कि गिरती सेहत उससे देखी नहि जारही थि। उसने महसूस किया कि केवल एक् बारकह देना बहुत नहि थां।
आजसाम जब वो कॉलेज सें घऱलौट रहा थां, तोँ उसनेमन हि मन एक् कड़ा निर्णय लिया। उसने सोचा कि चुप्पी साध लेने सें समस्या हल नहि होगी। एक् बेटा होने केँ नाते, अगर वो आज अपनी मां कों सही मार्ग नहि दिखा पाया, तोँ शायद वो स्वयं कों कभी क्षमा नहि कर पाएगा।
"आज मुझेफिन सें बात करनी होगी। चाहे कितनी भि हिचकिचाहट क्यूं न् होँ, चाहे माहौल कितना भि असहज क्यूं न् होँ जाए, पऱ मुझे उन्हें समझाना होगा कि ये 'रूटीन' उनकी सेहत केँ लिएठीक नहि हैं। "
घऱ पहुँचते हि उसने देखा कि अंजलि किचन मे साम कि गरमचाय बनारही थि। वो थकी हुइ लगरही थि, उसने अपनी गर्दन कों हल्के सें झटका दिया जैसे कि वो दर्द मे होँ। आर्यन नें अपनाबैग सोफे पर्र रखा औऱ गहरी साँसली। उसने स्वयं कों मानसिक रूप सें रेडी किया कि आज कां संवाद कल केँ दूध वाले संवाद सें कहीं ज़्यादा गंभीर औऱ सीधा होगा।
सूरजढल रहा थां, औऱ आर्यन खिड़की केँ पास खड़ा होकरबस उससही लम्हा कां इंतजार करनेलगा जब वो एक् बारफिन मर्यादा औऱ ममता केँ बीच कां वो पुलपार कर अपनी मां सें बातकर सके।
डिनर केँ बाद कां वक़्त थां। आजरात घऱ कां सन्नाटा कल कि तुलना मे कुछ अधिक भारीलग रहा थां। अंजलि मेजसाफ कररही थि, मगर उसकी हरकतों मे वोँ फुर्ती नहि थि जौ अमूमन होती थि। आर्यन वहीं बैठारहा, उसने अपनाहाथ अपनी मम्मी केँ हाथ पऱ रखा औऱ उन्हें रुकने कां इशारा किया।
"मम्मी, बैठिए। मुझे आपसेकुछ बहोत ज़रूरी बात करनी हैं, " आर्यन कि आवाज़ मे एक् ऐसी दृढ़ता थि जिसे अंजलि टाल नहि सकी। वो धीरे-धीरे सें सामने वाली कुर्सी पऱ बैठ गई।
आर्यन नें कुछसमय खामोशी सें उनकीथकी हुईँ आँखों मे देखा। "पिछले 15 दिनों सें मे देखरहा हूं मम्मी। मैंने आपसेकहा थां कि आपकी सेहतगिर रही हैं, मगरकुछ भि नहि बदला। आपकी आँखें, आपकीयह थकान.सभी कुछबता रही हें कि आप् अभि भि उसी रूटीन मे फंसी हुई हें। क्यूं मां? आप् तौ स्वयं डॉक्टर हें, आप् इसके परिणामों कों मुझसे बेहतर जानती हें। "
अंजलि नें पहले तोँ नज़रे चुराने कि कोशिश कि, मगरजब उसने आर्यन कि आँखों मे छिपी बेपनाह फिक्र देखी, तौ उसका बांधटूट गय़ा। उसने एक् लंबी औऱ बोझिल साँसली औऱ अपना चेहरा अपने हाथों मे छिपा लिया।
"आर्यन." उसकी आवाज़थकी हुई औऱ कंपकपाती हुईँ थि। "मुझेलगा थां कि मे इसे कंट्रोल कर लूंगी। मुझेलगा थां कि तेरीबात सुनने केँ बाद मे रुक जाऊँगी। मगरसच तौ यह हैं कि." वो रुकी, जैसे शब्दगले मे फंसरहे हों।
उसने आर्यन कि ओर देखते हुए बहोत हि बेबसी सें कहा, "बेटा, यहअब मेरी ख़्वाहिश (choice) नहि रही, यह मेरा एक् एडिक्शन (Addiction) बन चुका हैं। "
आर्यन स्तब्ध रह गय़ा। उसनेइस शब्द कि उम्मीद नहि कि थि।
अंजलि नें आगेकहा, "दिनभर कां तनाव, वोँ अकेलापन औऱ फिनरात कां वोँ सन्नाटा। शुरुआत मे यह केवलचैन पाने कां एक् ज़रिया थां। मगरअब, मुझे स्वयं नहि पता कि कबयह मेरी मजबूरी बन गय़ा। मे रात कों लेटी होती हूं, मेरामन कहता हैं कि 'नहि अंजलि, यहगलत हैं, तेरी सेहतगिर रही हैं', मगर मेराबदन मेरीबात नहि सुनता। मे चाहकर भि स्वयं कों रोक नहि पाती आर्यन। मुझे स्वयं सें चिढ़ होने लगती हैं, पर्र मे इस चक्रव्यूह सें बाहर् नहि निकलपा रही हूं। "
अंजलि कि आँखों मे आँसू थें—एक् ऐसी मम्मी केँ आँसू जोँ अपने हि मन केँ सामने हार चुकी थि। वो एक् सफल डॉक्टर थि, एक् आदर्श मां थि, मगरइस एक् निजी कमज़ोरी नें उसे भीतर सें झकझोर दिया थां।
आर्यन कों अब क्रोध नहि, बल्कि अपनी मां केँ लिए गहरी सहानुभूति महसूस हुइ। उसने देखा कि उसकी मां किसी 'बुराई' मे नहि, बल्कि एक् 'बीमारी' कि गिरफ्त मे थि।
"मम्मी, आपनेइसे स्वीकार किया, यही सबसेबड़ी बात हैं, " आर्यन नें उनकाहाथ मजबूती सें थामते हुएकहा। "अगरयह एडिक्शन हैं, तौ हम् इससे लड़ेंगे। आप् अकेली नहि हें। अबइसे रोकना मेरी भि ज़िम्मेदारी हैं। "
आर्यन नें अपनी मम्मी कि आँखों मे झाँका। वहा ग्लानि औऱ बेबसी कि एक् गहरीपरत थि। उसने महसूस किया कि सलाह औऱ उपदेशों कां वक़्त अब निकल चुका हैं; अब वक्त थां संगखड़े होने कां। एक् डॉक्टर जब स्वयं मरीज़बन जाए, तौ उसेदवा सें अधिक देखभाल कि ज़रूरत होती हैं।
आर्यन नें एक् समय केँ लिए भि झिझक नहि दिखाई। उसने अंजलि केँ हाथों कों अपने हाथों मे थोड़ा औऱ कस लिया।
"मां, अकेलेपन सें लड़ना आसान नहि होता, औऱ जबकोई चीज़लत बनजाए, तोँ इच्छाशक्ति भि जवाबदे देती हैं, " आर्यन नें बहोत हि शांत औऱ सुलझे हुए लहजे मे कहा। "आप् स्वयं कों रोक नहि पारही हें क्योंकि रात कां वोँ सन्नाटा आपको मजबूर कर देता हैं। इसलिये, मैंने एक् फैसला किया हैं। "
अंजलि नें सवालिया नज़रों सें उसे देखा।
आर्यन नें एक् हल्की मुस्कान केँ संगकहा, "आज सें मे आपकेसंग आपके हि कमरे मे सोऊंगा। बिल्कुल वैसे हि, जैसे मे बचपन मे सोया करता थां। "
अंजलि केँ चेहरे पऱ हैरानी केँ भाव थें। "मगर आर्यन। तुँ अबबड़ा होँ गय़ा हैं, तेरा अपना स्पेस हैं। औऱ मे नहि चाहती कि मेरीवजह सें तेरी नींद खराब होँ। "
"मेरी नींद आपकी सेहत सें बढ़कर नहि हैं मां, " आर्यन नें दृढ़ता सें कहा। "जब मे छोटा थां औऱ मुझेडर लगता थां, तब आप् मुझे अपनेपास सुलाती थीं। आज आपको मेरी ज़रूरत हैं। जब मे आपकेपास रहूँगा, तौ आप् अकेला महसूस नहि करेंगी। हम् बातें करेंगे, पुरानी यादें ताज़ा करेंगे औऱ जब तक आपको गहरी नींद नहि आँ जाएगी, मे वहीं रहूँगा। आपकीयह लत केवलतभी टूटेगी जब वोँ 'अकेलापन' समाप्त होगा। "
अंजलि कि आँखों सें एक् आँसूटपक कर आर्यन केँ हाथ पर्र गिरा। उसे यकीन नहि होँ रहा थां कि उसका बेटा इतनाबड़ा औऱ समझदार हौ गय़ा हैं कि वो उसकी गरिमा कों ठेस पहुँचाए बिनाउसे इस दलदल सें निकालने केँ लिए स्वयं कों समर्पित कररहा हैं।
"तुम्हारी तरफसच मे लगता हैं कि इससे फर्क पड़ेगा?" अंजलि नें धीमी आवाज़ मे पूछा।
"पक्का पड़ेगा मम्मी, " आर्यन नें मुस्कुराते हुए उसकाहाथ थामकर उसेखड़ा किया। "चलिए, आज सें हमारा यहनया रूटीन शुरुआत होता हैं। आप् चलिए, मे दूध लेकरआता हूं। "
उसरात, सालों बाद आर्यन अपना तकिया लेकर अपनी मां केँ कमरे मे गय़ा। उसने कमरे कि वोँ भारी औऱ तनावपूर्ण खामोशी कों समाप्त करने केँ लिए हल्की-फुल्की बातें शुरुआत कीं। वो खाट केँ एक् तरफलेट गय़ा, औऱ अंजलि दूसरी तरफ।
अंजलि कों बहोत वक़्त बाद एक् ऐसी सुरक्षा औऱ चैन कां अहसास हुआ जिसकी उसेकमी थि। उसेलगा कि उसकेपास अब एक् ऐसा प्रहरी (Guardian) हैं जौ उसे स्वयं उसकी कमज़ोरियों सें बचा लेगा। उस रात, कमरे मे कोई सिसकी नहि थि, कोई छटपटाहट नहि थि; बस मां-बेटे कि धीमी गुफ्तगू थि जोँ धीरे धीरेचैन भरी नींद मे तब्दील हौ गई।
Doctor मां – New Episode
अगली सुभहजब खिड़की सें सूरज कि पहली किरण कमरे मे आई, तौ उसने एक् बहोत हि शांत औऱ पवित्र दृश्य देखा। सालों बाद अंजलि कि नींद बिना किसी मानसिक बोझ याँ थकान केँ खुली थि। उसके चेहरे पऱ वो भारीपन नहि थां जोँ पिछले पंद्रह दिनों सें घऱकर गय़ा थां।
नाश्ते कि मेज पऱ आज कां नज़ारा कुछअलग हि थां। अंजलि नें आज सादे परांठे नहि, बल्कि आर्यन कि मनपसंद कां खास पोहा औऱ अदरक वालीगरम चाय बनाई थि। उसकीचाल मे एक् नई ऊर्जा थि औऱ आँखों मे वोँ चमक वापसलौट आई थि, जौ कहींखो गई थि।
"आज तोँ नींद बहोत गहरीआई, " अंजलि नें गरमचाय कां कप आर्यन कि ओर बढ़ाते हुए मुस्कुराकर कहा। उसकी आवाज़ मे वोँ खनक थि जोँ आर्यन नें बहोत वक्त सें नहि सुनी थि।
आर्यन नें पोहे कां लुत्फ लेतेहुए कहा, "सच मे मां! औऱ मुझे तौ पता हि नहि चला कि कब बातें करते-करते हम् सोगए। आपकी वोँ मेडिकल कॉलेज वालीकथा सुनते-सुनते मुझेकब नींदआई, याद हि नहि। "
अंजलि नें कुर्सी घसीटकर उसके सामने बैठते हुएकहा, "पता हैं आर्यन, मुझे अहसास हि नहि हुआ थां कि बस किसी कां संग होना कितना बड़ा फर्क पैदाकर सकता हैं। रातभर मुझे एक् बार भि वोँ बेचैनी नहि हुई। मुझेलग रहा हैं जैसे मेरामन बहोत हल्का हौ गय़ा हैं। "
आर्यन नें मां कां हाथ थामकर संजीदगी सें कहा, "मैंने कहा थां न् मम्मी, अकेलापन हि हर मुश्किल कि जड़ होता हैं। अबजब हम् संग हें, तोँ वोँ 'एडिक्शन' आपकोछू भि नहि पाएगा। आज आपका चेहरा बहोत फ्रेश लगरहा हैं, क्लिनिक मे मरीज़ भि कहेंगे कि आज डॉक्टर साहिबा बहोत खुश हें। "
दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े। नाश्ते केँ दौरान वेअबउस पुरानी समस्या पर्र नहि, बल्कि आने वालेकल कि योजनाओं पर्र बातें कररहे थें। वे छुट्टियों मे कहीं बाहर् घूमने जाने कि प्लानिंग करनेलगे औऱ उन किताबों केँ बारे मे चर्चा कि जौ वेसंग मिलकर पढ़ सकते थें।
अंजलि कों महसूस हुआ कि उसके बेटे नें न् मात्र उसे एक् बुरीलत सें बचाया हैं, बल्कि उनके रिश्ते कों एक् ऐसे पायदान पऱ लेँ आया हैं जहाँ सम्मान औऱ विश्वास कि जड़ें बहोत गहरी हें।
गरमचाय समाप्त करकेजब आर्यन अपनाबैग उठाकर कॉलेज केँ लिए निकलने लगा, तौ अंजलि नें उसे दरवाज़े तक छोड़ा। "साम कों जल्द आनां, मे तेरी पसन्द कि खीर बनाऊँगी, " उसने प्रेम सें कहा।
"बिल्कुल मम्मी! औऱ साम कों फिन सें ढेर सारी बातें करेंगे, " आर्यन नें हाथ हिलाते हुए विदाली।
आजहवा मे एक् अलग हि मिठास थि। घऱअब केवलचार दीवारों कां ढांचा नहि थां, बल्कि एक् ऐसा सुरक्षित किलाबन गय़ा थां जहाँ ममता औऱ समझदारी नें मिलकर हर बुराई कों बाहर् कां मार्ग दिखा दिया थां।
रात कि खामोशी एक् बारफिन घऱ पर्र दस्तक देरही थि, मगरआज इस खामोशी मे कोईबोझ नहि थां। डिनर केँ बाद आर्यन औऱ अंजलि अपने कमरे मे आँ गए। कमरे कि हल्की नीली नाइट लैंप कि रोशनी मे माहौल बहोत हि शांत औऱ सुरक्षित महसूस होँ रहा थां।
खाट पऱ लेटेहुए आर्यन नें तकिया ठीक किया औऱ बोला, "मम्मी, आज क्लिनिक मे वोँ खन्ना जीआए थें क्याँ? जोँ हमेशा अपनी बीमारी सें ज़्यादा अपनी पड़ोसन केँ झगड़ों कि बात करते हें?"
अंजलि खिलखिलाकर हँसपड़ी। "हाँ!आज तौ हद हि हौ गई। उन्हें जुकाम थां, पऱ वोँ मुझेयह समझारहे थें कि उनकेघऱ केँ सामने वाली आंटी नें केसे उनके गमले थोड़े बाईंतरफ खिसका दिए। आधा घंटा तौ उन्होंने केवल गमलों कि पॉलिटिक्स पऱ निकाल दिया!"
आर्यन नें हाथ सें इशारा करतेहुए खन्ना जी कि मिमिक्री कि, "डॉक्टर साहिबा, आप् दवा तोँ देरही हें, पर्र क्याँ आपकेपास उन गमलों कां कोई इलाज हैं?"
दोनों कमरे मे ज़ोर-ज़ोर सें हँसने लगे। हँसी केँ यह गुब्बारे उस कमरे कि सारी पुरानी यादों औऱ भारीपन कों उड़ा लेँ जारहे थें। हँसते-हँसते अंजलि कि आँखों मे खुशी केँ आँसू आँ गए। उसे याद भि नहि थां कि वो पिछली बारइस तरहकब बेफिक्र होकर हँसी थि।
"तूँ नाँ। बिल्कुल अपने पिताजी पऱ गय़ा हैं, वैसी हि फालतू कि बातें करके हँसाना जानता हैं, " अंजलि नें अपना कंबल ओढ़तेहुए कहा।
"अरे मम्मी, हँसना सबसेबड़ी थेरेपी हैं, " आर्यन नें थोड़ा गंभीर होतेहुए मगर प्रेम सें कहा। "अब देखिये, रात केँ सवा ग्यारह बजरहे हें औऱ हमें नींदआने लगी हैं। कोई तनाव नहि, कोई बेचैनी नहि। बस अच्छे जोक्स औऱ आपकीयह प्यारी सि हँसी। "
अंजलि नें आर्यन कि तरफ करवटली औऱ उसकेसिर पर्र हाथ फेरते हुए बोलीं, "थैंकयू आर्यन। मुझे वापस 'मे' बनाने केँ लिए धन्यवाद। "
"गुड नाइट मां, अब आँखें बंद कीजिये। " आर्यन नें लाइटबंद करतेहुए कहा।
"गुड नाइट बेटा, " अंजलि नें चैन सें अपनी आँखें मूंदलीं।
अंधेरे कमरे मे अब केवलदो इंसानों कि शांत औऱ गहरी साँसों कि आवाज़ थि। कोई पुरानी लत, कोई अकेलापन अबउस कमरे कि चौखटपार करने कि हिम्मत नहि करपारहा थां। कुछ हि मिनटों मे दोनों गहरी औऱ मीठी नींद कि आगोश मे समागए।
देखते-देखते एक् सप्ताह बीत गय़ा। येसात दिनउस घऱ केँ लिए किसी बड़े बदलाव सें कम नहि थें। जौ घऱकभी भारी खामोशी औऱ अनकहे तनावों सें भरा रहता थां, अबवहा सुभह कि गरमचाय केँ संग हँसी कि गूँज सुनाई देती थि औऱ रात केँ सन्नाटे कि स्थान चैनभरी नींद नें लें ली थि।
इनसात दिनों मे आर्यन औऱ अंजलि कां नाता एक् नए धरातल पऱ पहुँच गय़ा थां। अबये केवल मम्मी-बेटे कां नाता नहि थां, बल्कि दोऐसे दोस्तों कां संग थां जोँ एक्-दूसरे कि परवाह बिनाकहे करना जानते थें।
हररात आर्यन अपना तकिया औऱ पढ़ाई कां सामान लेकर मां केँ कमरे मे पहुँच जाता। वे कभी किसी पुस्तक पर्र चर्चा करते, कभी आर्यन उसे अपने कॉलेज केँ 'गॉसिप्स' सुनाता, तोँ कभी अंजलि उसे पुराने किस्से सुनाती।
जौ एडिक्शन (लत) अंजलि केँ लिए एक् बेबसी बन चुका थां, वो अब पूरीतरह गायब हौ चुका थां। उसकामन अबरात केँ उस 'अंधेरे कोने' मे नहि भागता थां, क्योंकि वो कोनाअब आर्यन कि बातों औऱ ठहाकों सें भर गय़ा थां।
एक् हफ्ते केँ भीतर हि अंजलि कि कायापलट गई थि। उसकी आँखों केँ नीचे केँ काले घेरे गायब होँ गए थें, चेहरे पर्र एक् कुदरती चमक (Natural Glow) लौटआई थि औऱ क्लिनिक मे उसकी ऊर्जा (Energy) पहले सें कहीं ज़्यादा बढ़ गई थि।
एक् सप्ताह पूरा होने पऱ, शनिवार कि साम कों दोनों नें संग मे डिनर बनाया। रसोई मे म्यूज़िक बजरहा थां औऱ दोनों संग मे सब्जियाँ काटरहे थें।
"मां, आपनेगौर किया?" आर्यन नें टमाटर काटते हुए पूछा। "आज पूरेसात दिन हौ गए हें औऱ आपने एक् बार भि सिरदर्द याँ थकान कि शिकायत नहि कि। "
अंजलि रुक गई औऱ उसने खिड़की केँ बाहर् ढलते सूरज कों देखा। उसने महसूस किया कि उसकी वाइटालिटी (Vitality) औऱ काम करने कि शक्ति अबचरम पऱ थि। "तूँ सहीकह रहा हैं आर्यन। मुझेअब याद भि नहि आता कि वोँ बेचैनी कैसी होती थि। मुझे लगता हैं कि मैंने उसलत कों बहोत पीछे छोड़ दिया हैं। अब मुझे उसकी ज़रूरत हि महसूस नहि होती। "
आर्यन नें मुस्कुराकर मम्मी कों देखा। उसे गर्व थां कि उसने अपनी मम्मी कों उस दलदल सें बाहर् निकाल लिया थां।
उसरात भि, जबवे सोने केँ लिए लेटे, तोँ कोईडर नहि थां। अंजलि कों अहसास हुआ कि जिंदगी मे 'विकल्प' हमेशा होते हें, बस हमेंसही हाथ थामने कि ज़रूरत होती हैं। आर्यन केँ खर्राटों कि हल्की आवाज़ अंजलि केँ लिए किसी लोरी सें कम नहि थि। उसनेचैन सें अपनी आँखें बंदकीं औऱ एक् ऐसी दुनिया मे खो गई जहाँ केवल शांति थि।
रात केँ सन्नाटे मे घड़ी कि सुइयां 2:00 बजे कां समय दिखारही थीं। कमरे मे हल्की नीली रोशनी बिखरी हुई थि। अचानक आर्यन कि नींद खुली। शायदउसे थोड़ी गर्मी महसूस हौ रही थि याँ शायद नींद कां झोंका टूट गय़ा थां।
जैसे हि उसकी चेतना वापसआई, उसे अपने जिस्म पर्र एक् भारीपन कां अहसास हुआ।
आर्यन नें महसूस किया कि उसकी मम्मी, जौ गहरी नींद मे थीं, सोते-सोते अनजाने मे उसकीओर खिसकआई थीं। अंजलि कां एक् हाथ आर्यन केँ सीने पऱ रखाहुआ थां, औऱ उनकी टांगें आर्यन कि टांगों केँ ऊपर चढ़ी हुई थीं। बचपन मे ये एक् बहोत हि सामान्य बात थि—जब वो छोटा थां, तौ इसीतरह मम्मी सें चिपककर सोता थां।
मगरआज, 15 दिनों कि इस मशक्कत औऱ 'एडिक्शन' वाली बातचीत केँ बाद, आर्यन कों ये स्पर्श थोडा अजीबलगा।
उसकेमन मे एक् अजीब सि कशमकश शुरुआत होँ गई। एक् तरफ तौ येवही ममताभरा स्पर्श थां जिसे वो बचपन सें जानता थां, मगर दूसरी तरफ, अब वो एक् वयस्क (Adult) थां। उसेयाद आया कि केसे पिछले कुछ दिनों सें वेइस 'अकेलेपन' औऱ 'लत' सें लड़रहे थें।
उसने अंधेरे मे अपनी मम्मी केँ चेहरे कि ओर देखा। अंजलि बहोत हि मासूमियत औऱ चैन सें सोरही थीं। उनके चेहरे पर्र वो बेचैनी बिल्कुल नहि थि जौ 'उस'लत केँ दौरान हुआ करती थि। ऐसालग रहा थां जैसे उन्हें सालों बादकोई सुरक्षित ठिकाना मिला हौ।
आर्यन कां दिल ज़ोर सें धड़कने लगा। उसे समझ नहि आँ रहा थां कि वो क्याँ करे।
क्याँ वो धीरे-धीरे सें मां कां हाथहटा दे?
याँ फिनइसे एक् सामान्य 'स्लीपिंग पोस्चर' (Sleeping posture) समझकर सोजाए?
उसे थोडा संकोच (Awkwardness) महसूस हौ रहा थां। उसेलगा कि कहीं मम्मी कि नींद नं खुलजाए औऱ वे असहज महसूस न् करने लगें। उसने बहोत हि सावधानी सें, बिनाकोई आहटकिए, अपनी साँसों कों नियंत्रित किया। उसे अहसास हुआ कि मां शायद अनजाने मे उस सुरक्षा (Security) कों ढूँढरही थीं जौ उन्हें इसलत सें दूररख रही थि।
उसने अपनी नज़रें छत कि ओरकरलीं। वो अजीब सां अहसास अभि भि बनाहुआ थां, मगर उसने स्वयं कों समझाया कि ये केवल एक् मम्मी कां अपने बेटे पर्र अटूट भरोसा हैं। वो लगभगआधे घंटे तक वैसे हि बुतबना लेटारहा, जब तक कि उसकी आँखों मे दोबारा नींद कां बोझ नहि आँ गय़ा।
रात केँ सन्नाटे मे घड़ी कि सुइयां अब 3:00 बजे कां समय दिखारही थीं। कमरे कि हल्की नीली रोशनी मे सभीकुछ धुंधला सां थां। आर्यन कि नींद एक् बारफिन खुली, मगर इसबार झटके सें। उसे अपने जिस्म केँ निचले हिस्से मे एक् अजीब सि गर्मी औऱ भारीपन कां अहसास हुआ।
नींद औऱ होश केँ बीच झूलते हुए आर्यन नें महसूस किया कि अंजलि सोते-सोते औऱ भि लगभग खिसकआई थीं। उनकी टांगअब आर्यन केँ बदन पर्र बहुतऊपर कि ओर थि औऱ अनजाने मे वो आर्यन केँ निजी अंगों (Private area) कों स्पर्श कररही थि।
अंजलि गहरी औऱ बेफिक्र नींद मे थीं, उनकी सांसें बिल्कुल स्थिर थीं। मगर उनके जिस्म कि कुदरती गर्मी औऱ उस अनचाहे स्पर्श नें आर्यन केँ जिस्म मे एक् अजीब सि सनसनी पैदाकर दि थि। वो एक् जवान लड़का थां औऱ शारीरिक रूप सें इसतरह केँ स्पर्श केँ प्रति संवेदनशील थां। उस स्पर्श सें उसे एक् हल्की सि सिहरन महसूस होनेलगी, जोँ उसे अंदर तक झकझोर रही थि।
उसकादिल अब ज़ोर-ज़ोर सें धड़कने लगा थां। उसकेमन मे विचारों कां बवंडर उठ खड़ाहुआ:
"क्याँ मम्मी कों पता हैं? नहि, वो तोँ गहरी नींद मे हें। "
"क्याँ मुझे उन्हें जगाना चाहिए? नहि, इससेवे बहोत शर्मिंदा हौ जाएंगी। "
"क्याँ मुझेबस धीरे-धीरे सें हट जानां चाहिए?"
उसे बहोत हि अजीब औऱ असहज (Awkward) महसूस हौ रहा थां। एक् तरफ उनकी मम्मी कि वोँ पवित्र ममता थि जिसने उसे बचपन सें पाला थां, औऱ दूसरी तरफये एक् अनजाना शारीरिक दबाव थां जिसने उसके जिस्म मे प्राकृतिक प्रतिक्रिया (Natural response) पैदाकर दि थि। वो अपनी स्थान पऱ बिल्कुल जम गय़ा थां, हिलने-डुलने सें भि डररहा थां कि कहींकोई गलत हरकत नं होँ जाए याँ मम्मी जाग नं जाएं।
उसे अहसास हुआ कि मां शायद अपनीउस 'लत' (Addiction) कों छोड़ने केँ संघर्ष मे अनजाने मे एक् 'सहारे' याँ 'सुरक्षा' कि तलाशकर रहीथीं, मगरये स्थिति अब आर्यन कि सहनशक्ति औऱ उसकी नैतिकता कि परीक्षा लें रही थि। वो पसीने सें तर-बतर हौ रहा थां, जबकि बाहर् कां मौसम ठंडा थां।
रात केँ उस सन्नाटे मे कमरे कि हवा जैसे भारी होँ गई थि। आर्यन कां पूरा जिस्म पसीने सें भीग चुका थां। अंजलि कि टांग कां दबाव औऱ उनके जिस्म कि कुदरती गर्मी अब सीधे उसके लन्ड पऱ महसूस हौ रही थि। अंजलि गहरी नींद मे थीं, मगर उनके जिस्म कां वो अनजाना स्पर्श आर्यन केँ पौरुष कों जगाने केँ लिए बहुत थां।
आर्यन नें महसूस किया कि उसका लंडधीरे-धीरे-धीरे कड़ा होनेलगा थां औऱ उसमें एक् तेज़ सनसनी दौड़रही थि। उसे अपनीइस शारीरिक प्रतिक्रिया पर्र बहोत हि असहज (Awkward) औऱ अंदर हि अंदर ग्लानि महसूस होँ रही थि। "ये मेरी मां हें, " वो बार-बार अपनेमन कों समझारहा थां, मगर जिस्म कि प्राकृतिक उत्तेजना उसके काबू सें बाहर् हौ रही थि।
अंजलि कि जांघ कां घेराअब उसके लन्ड केँ बिल्कुल ऊपर थां, औऱ उनके हिलने-डुलने सें जोँ रगड़ पैदा हौ रही थि, वो आर्यन कि बर्दाश्त सें बाहर् होतीजा रही थि। उसेडर थां कि अगरये उत्तेजना औऱ बढ़ी, तौ शायद उसकी मम्मी कि नींदखुल जाए औऱ वेइस स्थिति कों देखकर लज्जा सें पानी-पानी होँ जाएं।
उसनेतय किया कि वो इसतरह बुत बनकर नहि लेटारह सकता। उसे अपनी मां कों धीरे-धीरे सें सही स्थिति मे लाना हि होगा ताकिये असहज स्पर्श ख़त्म होँ सके।
उसने अपनी सांसें रोकीं औऱ बहोत हि सावधानी सें अपनाहाथ चादर केँ नीचे लें गय़ा। उसकादिल इतनी ज़ोर सें धड़करहा थां कि उसे अपनी पसलियों मे उसकीचोट महसूस होँ रही थि। उसने बहोत हि कोमलता सें अंजलि कि टांग केँ पास अपनाहाथ रखा। वो नहि चाहता थां कि मां अचानक जाग जाएं।
उसने अपनी उंगलियों सें आरामसे मम्मी कि टांग कों ऊपर कि ओर सें पकड़कर थोडा सरकाने कि कोशिश कि। जैसे हि उसने स्पर्श किया, उसे अंजलि कि त्वचा कि मखमली नरमी औऱ उस'लत' केँ कारणआने वाली जिस्म कि तपिश महसूस हुई। उसकाहाथ हल्का सां कांपरहा थां।
उसने इंच-दर-इंच बहोत हि धीरज केँ संग मां कि टांग कों अपने लन्ड केँ ऊपर सें हटाकर थोडा बगल कि ओर खिसकाना शुरुआत किया। हर सेकंड उसेलग रहा थां कि मम्मी अभि आँखें खोल देंगी। वो पसीने सें तर-बतर थां, मगर उसका पूरा ध्यान मात्र इसबात पर्र थां कि वो इस 'असहज' स्थिति सें बाहर् निकलसके औऱ अपनी मां कि गरिमा कों भि ठेस न् लगनेदे।
आखिरकार, उसने उनकी टांग कों सुरक्षित दूरी पर्र कर दिया। मगर उस स्पर्श औऱ उस गर्माहट नें आर्यन केँ मन औऱ जिस्म मे एक् ऐसी हलचलमचा दि थि, जिसे शांत करनाअब उसकेलिए नामुमकिन लगरहा थां।
Doctor मां - Kahani ab aur interesting hogi
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