Mohanpur ( ek chuddakad gaon ) - Maa aur gaon – New Episode
नानीहाल कि सुभह: किचन मे राज़ औऱ बढ़ती भूख कां तूफ़ान
"भइया, रात कि छत वाली घटना केँ बाद, मेरे औऱ सनी केँ दिमाग़ मे एक् तूफ़ान सां उठरहा थां। मामीजी प्रेमा कों पूरा नंगा नहाते देख्ना, औऱ फिन एक्-दूसरे सें अपनी माओं कि दबी हुइ चाहतों केँ बारे मे खुलकर बात करना.यह सभी मेरे6-इंच कड़कटूल कों औऱ कॉन्स्टेंट हंगर वाली आँखों कों एक् नई हि दिशादे गय़ा थां। नानीहाल कि हवा मे अब सिर्फ़ रिश्ते नहि, बल्कि एक् अजीब सि गरमाहट, एक् अनकही प्यास घुल चुकी थि। "
सुभह हुइ, औऱ कमरे मे हल्की-हल्की धूप छनकर आँ रही थि। मे औऱ सनी दोनों हि देर तक खाट पर्र पड़ेरहे, रात केँ दृश्यों औऱ बातों केँ नशे मे चूर। जब आख़िरकार उठे, तौ देखाघऱ मे पहले सें हि चहल-पहल शुरुआत होँ चुकी थि। किचन सें आती आवाज़ें औऱ ताज़े नाश्ते कि ख़ुशबू नें मुझे औऱ जगा दिया। मे कपड़े पहनकर नीचेआया, औऱ मेरे क़दम अपने आप् किचन कि तरफ़ खिंचे चलेगए। मेरा कड़कटूल अंदर हि अंदरजाग चुका थां, औऱ मे जानता थां कि येदिन कुछनया लेकरआने वाला हैं।
किचन मे हमेशा कि तरह त्योहार जैसा माहौल थां। सभ्या मम्मी, पुष्पा मौसी (निर्मला), प्रेमा मामीजी, औऱ राधा मामीजी। सभी मिलकर कामकर रहीथीं। सबकी 44-38-44 कि फिगर याँ उसके आस-पास कि, देसी औऱ भरपूर। उनकीकसी हुई साड़ियाँ औऱ टाइट ब्लाउज़ उनके मोटे बूब्स औऱ भरपूर कूल्हों कों हर हरकत केँ संग उजागर कररहे थें। हर महिला एक् रसभरी फल कि तरहलग रही थि, जिसे तोड़ने कां मन होँ।
किचन मे दहकती नज़दीकी: प्रेमा मामीजी औऱ राधा मामीजी कां खेल
मे किचन केँ दरवाज़े पर्र हि खड़ा होँ गय़ा, एक् शिकारी कि तरह सबको निहार रहा थां। सभ्या मम्मी औऱ पुष्पा मौसी एक् तरफ़ सब्ज़ियाँ काटरही थीं, औऱ उनकेबीच चलती फुसफुसाहटें बतारही थीं कि उनकेपास भि कहने कों बहोत कुछ हैं। प्रेमा मामीजी दूसरी तरफ़आटा गूँथरही थीं, उनकी बाहें औऱ कसी हुई कलाईयाँ हर गूंध केँ संगहिल रहीथीं। राधा मामीजी पास हि पूरियाँ तलरही थीं, गरम तेल कि कड़ाही सें आती आवाज़ औऱ घी कि ख़ुशबू पूरे माहौल कों औऱ गरमारही थि। उनकीचाल, उनकीकमर कां बल.सभी कुछ मेरे अंदर कि आग कों औऱ भड़का रहा थां।
"तभी प्रेमा मामीजी अपनी स्थान सें थोडा हिलीं औऱ मुझसे टकरागईं। उनकेहाथ आटे सें सने थें, औऱ उनकी साड़ी कां पल्लू थोडा हट गय़ा थां, जिससे उनके भरपूर बूब्स औऱ गहरी नाभि साफ़दिख रही थि, जैसे वो मुझे अपनी तरफ़ बुलारही होँ। उन्होंने शरमाते हुएकहा, 'अरे अर्जुन बेटा, ध्यान कहां हैं तुम्हारा? टकरा क्यूं गए?' उनकी आवाज़ मे थोड़ी घबराहट थि, पर्र आँखों मे एक् चमक भि, जैसे वो जानती हों कि मे उन्हें कलरात देख चुका हूं। "
मैंने एक् हल्की सि मुस्कान दि, वही मेरी परमानेंट टीज़ वाली। "मामीजी, आपकारूप हि ऐसा हैं कि नज़र हटती नहि हैं। क्याँ करूँ? आप् तोँ साक्षात् लक्ष्मी कां रूप हौ, " मेरी आवाज़ मे शरारत औऱ एक् छुपाहुआ इशारा थां। प्रेमा मामीजी केँ गाल औऱ गहरेलाल होँ गए, पऱ उन्होंने अपनी नज़रें मुझसे हटाई नहि। उनकी आँखों मे एक् हल्की सि चमक भि थि, जैसे वो मेरी बातों कां मजा लेँ रहीहों।
राधा मामीजी कि शरारत: पूरियों कां बहाने औऱ हाथों कां खेल
जैसे हि प्रेमा मामीजी थोडा पीछे हटीं, राधा मामीजी मेरेपास आईं। उनकेहाथ मे गरम-गरम पूरियों कि टोकरी थि, जिसकी ख़ुशबू नें मेरापेट औऱ मन दोनों ललचा दिया। "अरे अर्जुन बेटा, आँ गए? ब्रेकफास्ट करलो। रात कों क्याँ छत पर्र तारेगिन रहे थें? इतनीदेर सें जागे होँ। " उनकी आवाज़ मे मज़ाक थां, औऱ उनकी मोटी गांड औऱ भरपूर हिप्स उनके चलने सें ऐसेहिल रहे थें कि मेरा कड़कटूल औऱ उत्तेजित हौ गय़ा। उनका जिस्म पूरीतरह सें देसी रसभरी जैसा थां, औऱ हरकदम केँ संग वो मुझे अपनी तरफ़ खींचरही थीं।
"राधा मामीजी नें जानबूझकर टोकरी मेरेहाथ मे ऐसे दि कि उनकाहाथ मेरेहाथ कों छूजाए। उनकीगरम औऱ रसीले उँगलियों कां एहसास होते हि मेरा जिस्म सिहरउठा, औऱ मेरा कड़कटूल उछल पड़ा। उन्होंने फिनकहा, 'अरे बेटा, तुम्हारे हाथ तौ बड़ेगरम हें। रात कों कुछ अधिक हि गर्मी चढ़ गई थि क्याँ? याँ किसी नें रात मे गर्मी बढ़ा दि थि?'" उनकी आँखों मे मसालेदार गॉसिप वालीचमक थि, जोँ अब एक् नई चाहत औऱ जिज्ञासा मे बदल गई थि। वो मुझसे कुछ कहना चाहती थीं, कुछ जानना चाहती थीं।
मे समझ गय़ा, भइया। राधा मामीजी भि मुझसे एक् खेलखेल रहीथीं। उनकी बातों मे साफ़पता चलरहा थां कि वो भि इस माहौल कां पूरामजा लें रहीथीं। मैंने एक् गहरी साँसली औऱ उनकी आँखों मे देखा, जहाँअब उत्सुकता औऱ मस्ती दोनों थें।
सनी कां आगमन: एक् औऱ नज़ारा औऱ आँखों मे राज़
ठीक उसीसमय, सनी किचन मे आया। वो अपने बालों कों ठीककर रहा थां, पर्र उसकी आँखें सीधीमुझ पर्र औऱ राधा मामीजी पर्र पड़ीं। उसके चेहरे पऱ एक् नॉटी मुस्कान आँ गई, औऱ उसने एक् आँख मारी। वो समझ गय़ा कि यहा भि कुछ नां कुछचल रहा हैं। वो सीधा प्रेमा मामीजी केँ पास गय़ा, जौ अब भि आटा गूँथरही थीं।
सनी नें जानबूझकर प्रेमा मामीजी केँ पीछे सें हाथ बढ़ाया ताकिआटा लेँ सके। उसकेहाथ मामीजी कि गोलकमर कों छूगए, औऱ उसने हल्का सां दबा भि दिया। प्रेमा मामीजी एक् लम्हा कों चौंकगईं, उनका जिस्म थरथराया, पर्र फिनकुछ बोलीं नहि। सनी नें मेरी तरफ़ देखा औऱ आँख मारी, जैसेकह रहा हौ, 'देख भइया, मे भि कम नहि हूं। ' मैंने भि मुस्कुरा दिया, अपनी आँखों सें उसे जवाब देतेहुए।
ये सुभह, भइया, सिर्फ़ नाश्ते कि सुभह नहि थि। ये नानीहाल मे एक् नए, बोल्ड खेल कि शुरुआत थि। किचन कि गरमाहट, माओं औऱ मामियों कि रसभरी फिगर, औऱ हमारी कॉन्स्टेंट हंगर.सभी कुछ एक् बड़े 'धमाके' कि तरफ़ इशारा कररहा थां। नानीहाल कि यह दीवारें अब अनकहे राज़ों औऱ दबी हुई इच्छाओं कि गवाह बनने वालीथीं। हरकदम, हर नज़र, औऱ हर छुअन, रिश्तों कि उन बारीक हदों कों पारकर रही थि, जिन्हें समाज नें सदियों सें बांधरखा थां।
नानीहाल कि सुभह: धीमी होतीचाल, बढ़ती बेचैनी
"भइया, किचन कि गरमाहट औऱ प्रेमा मामीजी व राधा मामीजी केँ संगहुए छोटे-मोटे समय मेरे दिमाग़ मे घूमरहे थें। सनी केँ संग कि रात कि बातें, औऱ सभ्या मां व पुष्पा मौसी कि मौजूदगी। सभीकुछ एक् अजीब सि बेचैनी पैदाकर रहा थां। मेरी6-इंच कड़कटूल अंदर हि अंदर सुलगरही थि, पर्र आज मैंने ख़ुद कों थोडा धीमा रखने कां फ़ैसला किया थां। ये हफ़्ता लंबा थां, औऱ मे किसी भि 'धमाके' कों जल्दबाज़ी मे नहि भुनाना चाहता थां। "
नाश्ते केँ बाद, नानीहाल मे दिन कि धीमी-धीमी शुरुआत हुईँ। बड़े-बुज़ुर्ग अपने पुराने किस्से सुनारहे थें, बच्चे आँगन मे खेलरहे थें, औऱ महिलाएँ घऱ केँ कामों मे लगीथीं। माहौल मे एक् अजीब सि शांति थि, मगर मेरे अंदर कि हलचल साफ़ महसूस होँ रही थि।
आँगन कि शांति: नज़रें करती इशारा
मे आँगन मे पड़ी एक् चारपाई पर्र बैठ गय़ा। मेरी नज़रें अब भि इधर-उधर घूमरही थीं, हर चेहरे कों, हरचाल कों स्कैन कररही थीं। मैंने देखा, सभ्या मां आँगन केँ कोने मे बैठकर कुछ सुखारही थीं। उनकी साड़ी कां पल्लू उनकीपीठ पर्र कसरहा थां, औऱ उनके भरपूर कूल्हे हर हरकत केँ संगझूल रहे थें। उनकीकमर ऐसेलग रही थि जैसेकोई कलाकृति हौ। मुझेयाद आया, वाहन मे रणवीर कि गोद मे उनकी नज़दीकी, औऱ उनके खुलेहुए ब्लाउज़ केँ बटन। मेरे अंदरफिन सें एक् हल्की सि आग भड़की, पर्र मैंने उसेदबा लिया।
पास हि, पुष्पा मौसी (निर्मला) कुछ कपड़े धोरही थीं। उनका भारी-भरकम शरीर पानी मे भीगने सें औऱ भि अधिक 'रसभरी' लगरहा थां। उनके टाइट ब्लाउज़ सें उनके मोटे बूब्स कि हर हलचल साफ़दिख रही थि। उन्होंने एक् बार मेरी तरफ़ देखा औऱ हल्की सि मुस्कान दि। मेरी आँखों नें उस मुस्कान कों पकड़ लिया, जिसमें हमारी पिछली 'मस्ती' कि यादें ताज़ा थीं।
सनी औऱ पूजा: एक् नयाकोण
कुछदेर बाद, सनी भि आँगन मे आँ गय़ा। उसने मुझे देखा औऱ एक् हल्की सि आँख मारी, जैसेरात केँ राज़ कों याद दिलारहा होँ। वो सीधा पूजा केँ पास गय़ा, जोँ हरिराम मामाजी कि बेटी थि औऱ मेरी बेहन वंशिका जैसी हि 38-34-38 फिगर वाली थि। पूजा अपनी 'साइडआई क्वीन' वाली नज़रें अक्सर इधर-उधर घुमाती रहती थि।
सनी औऱ पूजा बातें करनेलगे, औऱ मैंने देखा कि सनी बार-बार पूजा कि तरफ़ मुड़कर देखरहा थां, उसकी आँखों मे एक् नईचमक थि। पूजा भि थोड़ी शर्मा रही थि, पर्र उसके चेहरे पर्र एक् उत्सुकता थि। मे समझ गय़ा, भइया। सनी अब सिर्फ़ अपनी मामीजी प्रेमा तक हि सीमित नहि रहने वाला थां। इस नानीहाल मे हर नाता एक् नए दायरे मे बंधरहा थां।
धीमे क़दमों सें आगे बढ़ता दिन
दिन आहिस्ता आगेबढ़ रहा थां। कोई ख़ास घटना नहि हुइ, कोई बड़ा 'धमाका' नहि। बस, नज़रों कां खेलचल रहा थां, औऱ दबी हुइ इच्छाएँ हवा मे घुलरही थीं। प्रेमा मामीजी औऱ राधा मामीजी भि घऱ केँ कामों मे व्यस्त थीं, पऱ उनकीचाल मे, उनकी आँखों मे, एक् नई जागरूकता थि। शायद, उन्हें भि महसूस होँ रहा थां कि इसघऱ मे अबकुछ बदल चुका हैं।
मे जानता थां, भइया, ये सिर्फ़ दिन कि शुरुआत थि। नानीहाल कां ये एक् हफ़्ता अभि बाक़ी थां, औऱ यहाहर लम्हा एक् नया राज़ खुलने वाला थां। मेरे अंदर कां शिकारी अभि जागाहुआ थां, पर्र वो इंतजार कररहा थां सही मौक़े कां।
हरतालिका तीज:हरी साड़ी, व्रत औऱ एक् गुप्त नज़ारा
"भइया, नानीहाल मे दिन धीमीचाल सें आगेबढ़ रहा थां, पर्र मेरे अंदर कि आगकम नहि हुई थि। प्रेमा मामीजी औऱ राधा मामीजी केँ संग किचन मे जोँ नज़दीकियाँ बढ़ीथीं, औऱ सनी केँ संग कि रात कि बातें, सभी मेरे दिमाग़ मे घूमरही थीं। मेरी6-इंच कड़कटूल हर लम्हा कुछनया ढूँढरही थि, औऱ मेरी कॉन्स्टेंट हंगर वाली आँखें किसी भि मौक़े कों छोड़ने वाली नहि थीं। "
आज हरतालिका तीज कां त्यौहार थां। पूरे गाँव मे औऱ ख़ासकर नानीहाल मे एक् अलग हि रौनक थि। सब महिलाएँ, छोटी बच्चियों सें लेकर बड़ी उम्र कि औरतों तक, हरेरंग कि साड़ियों मे सजी हुई थीं। उनके हाथों मे मेहंदी लगी थि, माथे पऱ बिंदिया चमकरही थि, औऱ गले मे भारी गहने थें। उन्होंने ईश्वर शिव औऱ पार्वती कां व्रतरखा थां, औऱ घऱ मे भजन-कीर्तन कां माहौल थां।
नारी शक्ति कां येरूप देखकर भि मेरी शिकारी नज़रें शांत नहि हुईं। मैंने देखा, सभ्या मम्मी अपनी सबसे ख़ूबसूरत हरी साड़ी मे सजीथीं, उनके भरपूर बूब्स औऱ ब्रह्मांड जैसी गांड साड़ी केँ अंदर सें भि साफ़दिख रही थि। पुष्पा मौसी (निर्मला), प्रेमा मामीजी, औऱ राधा मामीजी भि सजी हुई थीं, हर कोई अपनी-अपनी भरपूर देसी फिगर मे औऱ भि आकर्षक लगरही थि। उनकेबीच वंशिका, रितिका, कोमल, नेहा, पूजा, औऱ स्वीटी जैसी कुंवारी लड़कियाँ भि थीं, जोँ टाइट सलवार औऱ साड़ियों मे अपनी जवानी कां जलवा दिखारही थीं।
दोपहर मे, भजन-कीर्तन कां दौर शुरुआत हुआ। सब महिलाएँ आँगन मे एक् संग बैठीथीं, गीतगा रहीथीं औऱ पूजा कि तैयारियाँ कररही थीं। माहौल भक्तिमय थां, पर्र मेरे दिमाग़ मे कुछ औऱ हि चलरहा थां। मे एक् तरफ़ बैठासभी कुछदेख रहा थां, मेरी नज़रें हर चेहरे पर्र, हरचाल पर्र ठहररही थीं।
सभ्या मम्मी कि बेचैनी: एक् अनदेखा मौक़ा
पूजा कां कार्यक्रम चलरहा थां औऱ भजन अपनी पूरीगति पर्र थें। सब महिलाएँ तन्मयता सें गारही थीं, औऱ उनके चेहरे पऱ व्रत कि थकान केँ संग-संग एक् धार्मिक चमक भि थि। तभी मैंने देखा, सभ्या मां केँ चेहरे पर्र एक् अजीब सि बेचैनी थि। वो बार-बार करवटबदल रहीथीं, उनकी आँखों मे एक् अजीब सि उतावलापन थि। मे समझ गय़ा, भइया, उसे ज़ोर सें पेशाब लगी थि। व्रत केँ कारण उसने पानी भि कम पिया होगा, औऱ अब जिस्म कों आराम चाहिए थां।
वो धीरे-धीरे सें उठीं, औऱ बिना किसी कों कुछ बताए, घऱ केँ पीछे वाले हिस्से कि तरफ़चल दीं, जहाँ बाथरूम दूर थां औऱ अक्सर लोग बाहर् हि ज़रूरत पड़ने पऱ जाते थें। उनकीचाल मे तेज़ी थि, औऱ उनके भारी कूल्हे साड़ी केँ अंदर सें औऱ भि ज्यादा हिलरहे थें।
मैंने जल्दी अपने अंदर कि शिकारी प्रवृत्ति कों जगाया। ये मौक़ा थां, भइया! मुझेपता थां कि वो कहां जारही हैं, औऱ मे उसे अकेला नहि छोड़ सकता थां। मे चुपके सें उसके पीछे हौ लिया, मेरी साँसें तेज़ हौ चुकीथीं। मे दीवार केँ पीछेछुप गय़ा, ताकि वो मुझेदेख न् पाए।
गुप्त नज़ारा: एक् समय मे खुलते राज़
सभ्या मम्मी एक् कोने मे पहुँचीं, जहाँकुछ घनी झाड़ियाँ थीं। उन्होंने एक् बार चारों तरफ़ देखा, ये सुनिश्चित करने केँ लिए कि कोई नहि हैं। उनकी नज़रें थोड़ी घबराई हुइ थीं, पऱ ज़रूरत इतनी अधिक थि कि वो अब औऱ इंतजार नहि कर सकतीथीं।
फिन, भइया, वो लम्हा आया जिसकी मे उम्मीद कररहा थां। सभ्या मम्मी नें धीरे-धीरे सें अपनीहरी साड़ी कों ऊपर उठाना शुरुआत किया। उनकी भरपूर जाँघेंऔर गोरी चमड़ी आहिस्ता मेरे सामने आँ रहीथीं। साड़ी उनके घुटनों सें ऊपरउठी, फिन उनकी जाँघों तक पहुँची, औऱ आख़िरकार उनकी मोटी गांड कां ऊपरी हिस्सा दिखना शुरुआत होँ गय़ा। उनकेबदन कां हर वक्र, हर उभार, अब मेरे सामने थां। मेरा6-इंच कड़कटूल ज़ोर सें झटका मारा, जैसे वो इस नज़ारे कां इंतजार कररहा होँ।
साड़ी कों कमर तक उठाने केँ बाद, सभ्या मम्मी नें एक् गहरी साँसली। फिन, उन्होंने धीरे-धीरे सें अपनी नीचे पहनी हुइ चड्डी कों नीचे करना शुरुआत किया। उनकी मोटी गांड औऱ भरपूर हिप्स चड्डी केँ नीचे जाने सें औऱ भि साफ़दिख रहे थें। चड्डी उनके घुटनों तक आई, औऱ फिन ज़मीन पर्र गिर गई। अब वो पूरीतरह सें मेरे सामने अधूरी नग्न खड़ीथीं, उनकी साड़ी कमर तक उठी हुई थि, औऱ चड्डी पैरों केँ पास पड़ी थि। उनकी भरपूर जवानी, जौ हमेशा साड़ियों मे छुपी रहती थि, अब मेरे सामने खुली थि।
उन्होंने सावधानी सें अपनी स्थान ली, औऱ धीरे-धीरे सें नीचेबैठ गईं। उनके भारी कूल्हे ज़मीन पऱ टिके, औऱ उन्होंने राहत कि साँसली। पेशाब कि आवाज़ साफ़ सुनाई देरही थि, जोँ मेरे कानों मे म्यूज़िक कि तरह गूँजरही थि। उनकी आँखों मे अब सिर्फ़ राहत थि, व्रत कि थकान औऱ जिस्म कि ज़रूरत नें उन्हें किसी औऱ चीज़ केँ बारे मे सोचने कां मौक़ा नहि दिया।
मे वहा खड़ा थां, एक् पत्थर कि मूर्ति कि तरह, इस नज़ारे कों अपनी आँखों मे समेटता हुआ। सभ्या मां, जोँ बाहर् सें पूजा-पाठ वाली मम्मी थीं, औऱ पतिव्रता कि प्रतीक मानी जातीथीं, इससमय मे मेरी नज़रों केँ सामने अपनी सबसे कच्ची अवस्था मे थीं। उनके चेहरे पर्र कोई लज्जा नहि थि, बस जिस्म कि पुकार कां जवाब थां।
एक् नया अहसास: मां केँ लिए बढ़ती चाहत
जब वो पेशाब कर चुकीं, तौ उन्होंने धीरे-धीरे सें उठना शुरुआत किया। पहले उन्होंने अपनी चड्डी ऊपर खींची, फिन साड़ी कों नीचे किया। उनकीहर हरकत इतनी धीमी थि कि मे सभीकुछ साफ़देख पारहा थां। जब वो पूरीतरह सें उठगईं, तौ उन्होंने एक् आख़िरी बार चारों तरफ़ देखा, ये सुनिश्चित करने केँ लिए कि कोई नहि थां। फिन वो धीरे-धीरे सें पूजा केँ स्थल कि तरफ़ वापसचल दीं, जैसेकुछ हुआ हि न् हौ।
मे वहाकुछ देर तक खड़ारहा, इस नज़ारे केँ प्रभाव मे। सभ्या मम्मी नें अनजाने मे हि सही, मुझे एक् ऐसा राज़ दिया थां, जौ अब मेरे अंदर औऱ गहराउतर गय़ा थां। इस घटना नें मेरे अंदर अपनी मम्मी केँ लिए एक् नई हि तरह कि चाहतजगा दि थि। ये सिर्फ़ शारीरिक आकर्षण नहि थां, बल्कि एक् ऐसी भावना थि जौ रिश्तों कि हर मर्यादा कों तोड़ने केँ लिए सजधजकर थि।
मे जानता थां, भइया, ये हरतालिका तीज कां त्यौहार, अब सिर्फ़ व्रत औऱ भजन कां त्यौहार नहि थां। ये एक् ऐसा लम्हा थां जिसने मुझे सभ्या माँके औऱ क़रीब ला दिया थां, एक् ऐसे रास्ते पऱ जहाँ वापसी नामुमकिन थि। नानीहाल कि यह दीवारें, यह झाड़ियाँ, अब हमारे बीच केँ इस गुप्त राज़ कि गवाहबन चुकीथीं।
हरतालिका तीज कि रात: 'मज़बूत इंजन' औऱ दबी इच्छाओं कां विस्फोट (अर्जुन कि अनुपस्थिति मे)
सामढल चुकी थि औऱ हरतालिका तीज कां व्रत पूरा होँ गय़ा थां। महिलाओं नें चंद्र दर्शन कर पानी पिया औऱ अपना व्रत खोला। घऱ मे प्रसाद औऱ पकवानों कि ख़ुशबू फैल चुकी थि। सभीलोग खा-पीकर थक चुके थें। पुरुष एक् तरफ़ बैठकर बातें कररहे थें, औऱ बच्चे आँगन मे खेलरहे थें।
कमरे कि खामोशी: पुष्पा औऱ सभ्या कां एकांत
रात काफ़ी होँ चुकी थि। नानीहाल केँ बड़ेघऱ मे, लोग अलग-अलग रूम मे सोनेचले गए थें। सभ्या मां औऱ पुष्पा मौसी (निर्मला) एक् कमरे मे थीं, जहाँवे एक् संग रुकने वालीथीं। उन्होंने अपनीहरी साड़ियाँ बदल दि थीं औऱ अब हल्की, ढीली साड़ियों मे थीं। कमरे मे हल्की रोशनी थि, औऱ हवा मे फूलों कि भीनी-भीनी ख़ुशबू घुलरही थि।
पतियों पर्र बातें: 'आज भि सांड' कां प्रमाण
सभ्या नें गहरी साँस लेतेहुए कहा, "दिदी, आज तौ व्रत करके जिस्म टूट गय़ा। "
पुष्पा नें हँसते हुए जवाब दिया, "हाँ, बेहन। पर्र क्याँ करें? इनकी लंबी उम्र केँ लिए करना पड़ता हैं। वैसे, बता, तेरे राघव कां इंजनअब कैसाचल रहा हैं? अभि भि वैसे हि कड़क हैं याँ ठंडापड़ गय़ा हैं?" उसकी आवाज़ मे एक् शरारती टोन थि।
सभ्या हल्की सि हँसी। "अरे दिदी, क्याँ पूछती हौ? मेरा राघव तौ आज भि वैसे हि सांड हैं। चाहे जितनी उम्र होँ जाए, उनका इंजनकभी धीमा नहि पड़ता। रोज़ कां वहीजोश, वही ताक़त। " उसकी आवाज़ मे एक् गर्व थां। "कभी-कभी तौ सोचती हूं, थकते नहि हें क्याँ! अभि भि वोँ जवानी वालीआग हैं, वोँ पागलपन हैं। "
"हाँ, बिलकुल ठीककह रही हैं!" पुष्पा नें भि अहह भरतेहुए कहा। "मेरे दिनेश कां भि वहीहाल हैं। उम्र कां असर दिखता हि नहि इनपर। पहले तौ सांड कि तरह कूदते थें बैड पऱ, औऱ आज भि कोईकमी नहि। बस, अपनी मर्ज़ी सें चलते हें, औऱ वोँ भि पूरी ताक़त सें। मजा तोँ आज भि पूराआता हैं!"
दोनों कुछदेर चुप रहीं, अपने पतियों कि मर्दानगी पर्र गर्व करती हुइ, पर्र उनकी आँखों मे एक् अलग हि दबी हुईँ चाहत कि चमक थि।
जवानी कि यादें: पवित्रता कां दावा औऱ दबीआग
"याद हैं दिदी, " सभ्या नें आवाज़ मे पुरानी यादें भरतेहुए कहा, "जब हम् कुंवारे थें? वोँ होली केँ दिन। गाँव केँ लड़कों कि नज़रें। औऱ वोँ शरारतें। कितना जोश थां तब। "
"अरे मतपूछ, बेहन!" पुष्पा नें अचानक उत्तेजित होतेहुए कहा। "मुझे तौ याद हैं, जब तूँ छोटी थि, तौ कितनी शरारती थि। औऱ तेरी जवानी तोँ जैसेआग थि! सभी लड़के तेरी तरफ़ देखते थें। तेरे भरपूर कूल्हे औऱ छाती कों साड़ियों केँ ऊपर सें घूरते रहते थें। पर्र हम् कितनी पवित्र थीं नां? किसी कों छूने तक नहि दिया। "
"हाँ, दिदी, बिलकुल सहीकह रही हौ!" सभ्या नें भि मज़ाक मे कहा। "औऱ तुम्, दिदी! तुम् भि कम नहि थीं। तुम्हारी तौ फिगर हि ऐसी थि कि सभी देखते रह जाते थें। मुझेयाद हैं, एक् बार हम् नदी नहाने गए थें, औऱ तुम्हारी वोँ भरी हुई छाती.सभी साफ़दिख रही थि। गाँव केँ जवान लड़के तौ तुम्हें देखकर पागल हौ जाते थें। पर्र हमने अपनी पहली चुदाई सिर्फ़ अपने पतियों सें हि कराई। कितनी सीधीथीं हम्। "
दोनों कि आवाज़ों मे अब एक् नई हि तरह कि उत्तेजना थि। वे अपनी जवानी, अपनी कामुकता औऱ अपनी 'पवित्रता' कों यादकर रहीथीं, पऱ उन बातों केँ पीछे एक् दबी हुईँ आग थि, जोँ शायदअब तक शांत नहि हुई थि।
नज़दीकी बढ़ती हुईँ: छुअन कां पहलाकदम
दोनों कुछदेर तक पुरानी बातें करती रहीं, फिन पुष्पा नें करवट बदली औऱ सभ्या केँ औऱ क़रीब आँ गईं। "सभ्या, तेरीबात सुनकर मुझे वोँ दिनयाद आँ गए, जब हम् लड़कपन मे थें। तूँ मुझे कितनी अच्छी लगती थि, बिलकुल गुड़िया जैसी। "
पुष्पा नें धीरे-धीरे सें अपनाहाथ सभ्या कि बांह पर्र रखा। सभ्या केँ जिस्म मे एक् हल्का सां कंपनहुआ, पऱ उसने रोका नहि। पुष्पा कां हाथ आरामसे सभ्या कि बांह सें ऊपर कि तरफ़ बढ़ा, उसके कंधे कि तरफ़, औऱ फिन धीरे-धीरे सें उसकी गर्दन कों छुआ।
"मुझेयाद हैं, बेहन, " पुष्पा नें फुसफुसाते हुएकहा, "एक् बार तूने मुझेगले लगाया थां, औऱ तेरे नरम-नरम बूब्ज़ मेरे जिस्म सें छूगए थें। मुझेउस दिन बड़ा अजीबलगा थां, पर्र अच्छा भि लगा थां। "
सभ्या कि साँसें तेज़ होँ गईं। उसने धीरे-धीरे सें अपनाहाथ उठाया औऱ पुष्पा कि कमर पऱ रखा। "दिदी। तुम् भि तोँ तब कितनी भरी हुई थीं। तुम्हारी छाती देखकर लगता थां जैसेदो तरबूज़ रखेहों। "
समलैंगिक संबंध: पहलाकदम औऱ बढ़ती आग
अब माहौल पूरीतरह बदल चुका थां। दोनों कि आवाज़ों मे शरम नहि, बल्कि एक् गहरी चाहत थि। पुष्पा नें हिम्मत कि औऱ अपनाहाथ सभ्या केँ ब्लाउज़ केँ ऊपर सें उसके भरपूर बूब्ज़ पर्र रखा। सभ्या नें एक् गहरी साँसली, औऱ उसकी आँखें बंद होँ गईं।
"अहह। दिदी." सभ्या नें सिसकते हुएकहा।
पुष्पा नें धीरे-धीरे सें sabhya केँ बूब्ज़ कों दबाना शुरुआत किया। "तेरीयह छाती तौ हमेशा सें हि ऐसीभरी हुई थि, सभ्या। कितनी रसीली हैं। "
फिन, पुष्पा नें धीरे-धीरे सें अपनाहाथ sabhya कि साड़ी केँ अंदर डाला, औऱ उसकेपेट कों सहलाया, उसकी रसीले नाभि कों छूतेहुए। sabhyaका जिस्म पूरीतरह सें थरथरा रहा थां। उसने भि हिम्मत कि औऱ पुष्पा केँ ब्लाउज़ केँ अंदर अपनाहाथ डाला, औऱ उसके मोटे बूब्स कों सहलाने लगी।
"दोनों एक्-दूसरे केँ जिस्म कों छूने लगीं, उनकीदबी हुई इच्छाएँ बाहर् आँ रहीथीं। पुरानी यादें, औऱ जवानी कि अधूरी चाहतें। सभीकुछ उन्हें एक्-दूसरे कि तरफ़ धकेलरहा थां। वे दोनों धीरे धीरे एक्-दूसरे केँ औऱ क़रीब आईं, उनके होंठ एक्-दूसरे कों छूनेलगे, औऱ एक् लंबी, गहरीकिस शुरुआत हौ गई। "
उनके साँसों कि आवाज़, उनके जिस्मों केँ रगड़ने कि आवाज़। सभीकुछ कमरे कि शांति मे साफ़ सुनाई देरहा थां। ये सिर्फ़ एक् शुरुआत थि। नानीहाल कि इसरात मे, सभ्या मम्मी औऱ पुष्पा मौसी नें रिश्तों कि हर सीमा कों लांघ दिया थां। ये समलैंगिक संबंध उनकेलिए एक् नया अनुभव थां, जौ उनकी सालों कि दबी हुईँ इच्छाओं कां विस्फोट थां।
इसरात केँ बाद, मोहनपुर केँ रिश्तों कि परिभाषा हमेशा केँ लिएबदल जाएगी।
हरतालिका तीज कि रात:देह कि प्यास औऱ नई सीमाएं (पार्ट 2)
रात गहरी होँ चुकी थि। नानीहाल केँ उस कमरे मे जहाँ सभ्या औऱ पुष्पा लेटीथीं, अब पूरीतरह सें खामोशी छा गई थि, मगरये खामोशी उनके अंदर सुलगरही आग कां परिणाम थि। पतियों कि मर्दानगी पर्र गर्वभरी बातें करने केँ बाद, अपनी जवानी कि यादें ताज़ा करतेहुए, उन्होंने एक्-दूसरे मे उस अधूरी प्यास कों पा लिया थां, जौ कभी उनके अपने 'सांड' पतियों सें भि पूरी नहि हुईँ थि।
निर्वस्त्र देह: सीमाएं टूटती हुइ
एक् गहरी, लंबीकिस केँ बाद, सभ्या औऱ पुष्पा कि सांसें तेज़चल रहीथीं। उनके होंठअलग हुए, मगर उनकी आँखें एक्-दूसरे मे खोई हुईँ थीं। पुष्पा नें धीरे-धीरे सें अपनाहाथ सभ्या केँ गाल पऱ रखा।
"सभ्या, " पुष्पा कि आवाज़ एक् फुसफुसाहट मे बदल गई, "आजरात। मुझेऐसा लगरहा हैं जैसे हम् वापस अपनी जवानी मे आँ गए हें। "
सभ्या नें अपनी आँखें बंदकर लीं। "मुझे भि, दिदी। ऐसालग रहा हैं जैसे मे सालों सें इस लम्हा कां इंतजार कररही थि। "
फिन, बिना किसी औऱ शब्द केँ, पुष्पा नें धीरे-धीरे सें सभ्या कि ढीली साड़ी कां पल्लू हटाया। सभ्या नें भि अपनी साड़ी कां आँचलहटा दिया। उनके ब्लाउज़ अभि भि अपनी स्थान पऱ थें, मगर उनकी आँखों मे अब एक् नया आमंत्रण थां।
पुष्पा नें धीरे-धीरे सें सभ्या केँ ब्लाउज़ केँ बटन खोलना शुरुआत किया। एक्-एक् करकेबटन खुलते गए, औऱ सभ्या केँ भरपूर बूब्ज़ आरामसे सामने आनेलगे। उनका टाइट ब्लाउज़ उनके मोटे बूब्स पऱ कसरहा थां, औऱ अब वो पूरीतरह सें आज़ाद होने कों बेताब थें। जब आख़िरी बटन खुला, तोँ सभ्या नें गहरी साँसली, औऱ उसकेगोल, कसेहुए बूब्ज़ उसकी आँखों केँ सामने उभरआए, जैसेदो बड़े तरबूज़ हों।
सभ्या नें भि हिम्मत कि औऱ पुष्पा केँ ब्लाउज़ केँ बटन खोले। पुष्पा कि भि 44-38-48 फिगर थि, औऱ उसके भारी बूब्स भि ब्लाउज़ सें बाहर् आते हि पूरीतरह सें फैलगए। दोनों केँ ब्लाउज़ एक् तरफ़ गिरे, औऱ अबवे सिर्फ़ पेटीकोट औऱ साड़ियों मे थीं, जौ उनकीकमर पऱ कसकर बंधीथीं।
"दिदी, तुम् तौ हमेशा सें हि इतनीभरी हुइ थीं, " सभ्या नें फुसफुसाते हुएकहा, औऱ अपनाहाथ पुष्पा केँ एक् मम्मों पर्र रखा। उसकी त्वचा नर्म औऱ रसीले थि।
"औऱ तेरीयह जवानी, सभ्या, " पुष्पा नें जवाब दिया, सभ्या केँ दूसरे मम्मों कों सहलाते हुए। "मुझेयाद हैं, गाँव केँ लड़के केसे तेरी तरफ़ देखते थें। "
दोनों नें एक्-दूसरे केँ स्तनों कों आरामसे सहलाना शुरुआत किया। उनकी साँसें तेज़ हौ चुकीथीं, औऱ उनकी आँखों मे अब सिर्फ़ वासना थि। वे अपनी साड़ियों औऱ पेटीकोट कों हटाने मे अब औऱ देर नहि करना चाहती थीं।
"चलो, बेहन, " पुष्पा नें कहा, औऱ धीरे-धीरे सें अपनी साड़ी औऱ पेटीकोट कों ऊपर खींचना शुरुआत किया। सभ्या नें भि उसकासंग दिया। एक्-एक् करके कपड़े उनकेबदन सें अलग होतेगए, औऱ चंद पलों मे, दोनों बहनें पूरीतरह सें निर्वस्त्र एक्-दूसरे केँ सामने लेटीथीं। कमरे कि हल्की रोशनी मे उनके भरपूर, रसभरी बदनचमक रहे थें। सभ्या कि ब्रह्मांड जैसी गांड औऱ पुष्पा केँ मोटे कूल्हे अब पूरीतरह सें खुले थें। उनकी मोटी-मोटी जांघें औऱ गोलेदार पेटअब पूरीतरह सें एक्-दूसरे केँ लिए उपलब्ध थें।
देह कि प्यास: चुसाई कां खेल
अब कोई लज्जा नहि थि, कोई हिचकिचाहट नहि। वे दोनों अपनी जवानी कि अधूरी प्यास बुझाने कों सजधजकर थीं।
पुष्पा नें धीरे-धीरे सें अपना मुँह सभ्या केँ बूब्ज़ केँ पास लाया औऱ उसके निप्पल कों अपने होंठों मे लें लिया। सभ्या केँ मुँह सें एक् धीमी सि अहह निकली। पुष्पा नें आरामसे सभ्या केँ निप्पल कों चूसना शुरुआत किया, जैसेकोई बच्चा मां कां दूधपी रहा होँ। उसकीजीभ सभ्या केँ मम्मों केँ चारों ओरघूम रही थि, उसे उत्तेजित कररही थि।
"अहह। दिदी। कितना अच्छा लगरहा हैं." सभ्या नें कहा, अपनी आँखें बंद करतेहुए।
सभ्या नें भि अपनी बारीली। उसने अपना मुँह पुष्पा केँ एक् बूब्ज़ पर्र रखा औऱ उसे धीरे-धीरे सें चूसना शुरुआत किया। पुष्पा केँ निप्पल जल्दी कड़क हौ गए, औऱ उसने भि एक् लंबीअहह भरी। दोनों बहनें अब एक्-दूसरे केँ स्तनों कों पूरीलगन सें चूसरही थीं, उनकी जीभें, होंठ औऱ साँसें एक्-दूसरे मे समारही थीं।
स्तनों कों चूसते हुए, पुष्पा कां हाथ आरामसे नीचे कि तरफ़ बढ़ा। उसने सभ्या कि रसीले नाभि कों छुआ, औऱ फिन अपनाहाथ औऱ नीचे लेँ गई, जहाँ सभ्या कि मोटी, गोल योनि थि। उसने धीरे-धीरे सें अपनी उंगलियों सें सभ्या कि योनि केँ ऊपरी हिस्से कों सहलाया।
"पुष्पा दिदी। अहह." सभ्या नें अपनी टांगें हल्की सि फैलादीं।
पुष्पा नें अपना एक् हाथ सभ्या कि जांघों केँ बीचरखा औऱ धीरे-धीरे सें उसकी योनि कों छूना शुरुआत किया। उसकी उंगलियाँ आरामसे अंदर जाने कि कोशिश कररही थीं। सभ्या कां जिस्म पूरीतरह सें संवेदनशील होँ चुका थां, औऱ वो पुष्पा कि हर छुअन पर्र प्रतिक्रिया देरही थि।
सभ्या नें भि अपनाहाथ पुष्पा कि योनि कि तरफ़ बढ़ाया। पुष्पा कि योनि भि काफ़ी भरी हुई औऱ रसीली थि। सभ्या नें धीरे-धीरे सें उसे सहलाना शुरुआत किया, औऱ फिन अपनी उंगलियों सें पुष्पा केँ योनिद्वार कों महसूस किया।
"बेहन.अहह। सभ्या." पुष्पा नें अपनीकमर हल्की सि ऊपर उठाई।
गहराई औऱ पागलपन: एक्-दूसरे मे खोई हुइ
दोनों बहनें अब एक्-दूसरे कों उत्तेजित करने मे पूरीतरह सें लीनथीं। उनकी आवाज़ें कमरे मे गूँजरही थीं, औऱ उनके जिस्मों कां मिलनअब एक् नए स्तर पऱ पहुँच रहा थां। वे अपनी जवानी केँ उन दिनों कों यादकर रहीथीं, जबवे पवित्रता कां दावा करतीथीं, मगरअब उनकीदेह कि प्यास उन्हें एक्-दूसरे मे मिलरही थि।
पुष्पा नें सभ्या केँ स्तनों कों चूसते हुए अपनी उंगलियों सें उसकी योनि मे हल्का दबाव बनाना शुरुआत किया, जैसे वो उसे अंदर लेना चाहती होँ। सभ्या भि पुष्पा कि योनि कों सहलारही थि, उसकी उंगलियाँ उसके योनिद्वार केँ चारों ओरघूम रहीथीं।
कमरे मे सिर्फ़ उनकी साँसों, आहों औऱ जिस्मों केँ रगड़ने कि आवाज़ें थीं। हरतालिका तीज कि वोँ रात, नानीहाल केँ उस छोटे सें कमरे मे, दो बहनें अपनीदबी हुइ इच्छाओं कों पूरी आज़ादी सें जीरही थीं। ये सिर्फ़ समलैंगिक संबंध नहि थां, बल्कि दो आत्माओं कां मिलन थां, जोँ सालों सें एक्-दूसरे कि तलाश मे थीं। उनकी 'पवित्रता' कां आवरणअब पूरीतरह सें उतर चुका थां, औऱ उनकीदेह कि प्यास हि उनकी सबसे बड़ी सच्चाई थि।
हरतालिका तीज कि रात:देह कि प्यास औऱ नई सीमाएं (पार्ट 3 - चरम कि ओर)
रात अब अपनेचरम पर्र थि। सभ्या औऱ पुष्पा नानीहाल केँ उस कमरे मे पूरीतरह सें निर्वस्त्र एक्-दूसरे मे खोई हुईँ थीं। स्तनों कि चुसाई औऱ योनि कों सहलाने केँ बाद, उनकीदेह कि प्यास औऱ बढ़ गई थि। उनके पतियों कि 'सांड' जैसी मर्दानगी कि कहानियाँ अबदूर कि कौड़ी लगरही थीं, क्योंकि इस लम्हा मे, सिर्फ़ उनकी अपनी इच्छाएँ हि मायने रखतीथीं।
69 कां खेल:जीभ सें गहराइयाँ
पुष्पा नें सभ्या केँ बूब्ज़ कों छोड़ दिया, मगर उनकी आँखें अभि भि एक्-दूसरे मे बसी हुई थीं। एक् लम्हा कों वे दोनों बस लेटी रहीं, अपनी साँसों कों नियंत्रित करने कि कोशिश करती हुईं। फिन, पुष्पा नें धीरे-धीरे सें एक् टांग उठाई औऱ सभ्या केँ ऊपर सें घूमकर दूसरी तरफ़ आँ गईं।
"सभ्या, " पुष्पा नें फुसफुसाते हुएकहा, उनकी आवाज़ मे अब एक् नया हि आत्मविश्वास थां, "क्याँ तूनेकभी। कुछ औऱ आज़माया हैं?"
सभ्या नें धीरे-धीरे सें सिर हिलाया, उसकी आँखें चमकरही थीं। "नहि, दिदी। कभी नहि। "
"तोँ आज आज़मा लें, " पुष्पा नें कहा, औऱ धीरे-धीरे सें अपनी स्थिति बदलनी शुरुआत कि। उसने अपनेबदन कों इसतरह सें घुमाया कि उसका मुँह सभ्या कि योनि केँ पास आँ गय़ा, औऱ सभ्या कां मुँह पुष्पा कि योनि केँ पास। वे दोनों अब 69 कि स्थिति मे थीं, एक्-दूसरे कि कामुकता कां सामना करती हुईं, निर्वस्त्र औऱ बेताब।
इस स्थिति मे आते हि, दोनों केँ मुँह सें एक् हल्की सि अहह निकली। उनके भरपूर बदन एक्-दूसरे सें पूरीतरह सें सटेहुए थें, उनकी मोटी जांघेंएक-दूसरे कों छूरही थीं, औऱ उनकी भरपूर छातियाँ ज़मीन पऱ फैली हुई थीं।
रस कि प्यास: जीभों कां चमत्कार
पुष्पा नें पहलावार किया। उसने धीरे-धीरे सें अपनीजीभ सभ्या कि मोटी, रसीली योनि केँ ऊपरी हिस्से पर्र रखी। सभ्या कां जिस्म झटकाखा गय़ा, औऱ उसके मुँह सें एक् ज़ोरदार अहह निकली। पुष्पा नें अपनीजीभ सें सभ्या कि योनि केँ क्लिटोरिस कों हल्के सें सहलाना शुरुआत किया। सभ्या नें अपनी टांगें औऱ फैलादीं, औऱ उसका जिस्म पूरीतरह सें पुष्पा कि जीभ केँ इशारों पऱ नाचने लगा।
"अहह। दिदी। औऱ। औऱ तेज़." सभ्या नें मुँह खोलकर कहा, उसकी साँसें बेक़ाबू हौ चुकीथीं।
पुष्पा नें सभ्या कि योनि कों चूसना शुरुआत किया, उसकीजीभ अंदर-बाहर् हौ रही थि, सभ्या केँ जिस्म सें बहने वालेरस कों वो पूरा स्वाद लें रही थि। सभ्या कां रस मीठा औऱ नमकीन थां, औऱ पुष्पा उसे पूरापी रही थि, जैसे वो अमृत होँ। सभ्या कि योनि पूरीतरह सें गीली होँ चुकी थि, औऱ उसकीमहक पूरे कमरे मे फैलरही थि, दोनों कों औऱ उत्तेजित कररही थि।
सभ्या कां पलटवार: पुष्पा कि प्यास
सभ्या भि पीछे नहि थि। पुष्पा कि योनि उसके मुँह केँ ठीक सामने थि, भरी हुई औऱ उत्तेजित। सभ्या नें धीरे-धीरे सें अपनीजीभ पुष्पा कि रसीली योनिपर रखी। पुष्पा कां बदन भि झटके सें उछल पड़ा, औऱ उसके मुँह सें एक् तीव्र अहह निकली। सभ्या नें पुष्पा केँ क्लिटोरिस कों अपनीजीभ सें चूसना शुरुआत किया, आरामसे, फिन औऱ तेज़।
"बेहन। सभ्या। अहह। ज़ोर सें." पुष्पा नें कहा, उसकी आँखें बंदथीं औऱ उसका जिस्म हवा मे उठरहा थां।
सभ्या नें पुष्पा कि योनि कों पूरीलगन सें चूसना शुरुआत किया। उसकीजीभ पुष्पा केँ योनिद्वार केँ अंदर-बाहर् हौ रही थि, औऱ वो उसकेरस कों पूरापी रही थि। पुष्पा कां रस भि मीठा औऱ नशीला थां, औऱ सभ्या उसे पूरा स्वाद लें रही थि, जैसे वो सालों कि प्यास बुझारही होँ। पुष्पा कि योनि पूरीतरह सें गीली औऱ चिपचिपी हौ चुकी थि।
दोनों बहनें अब पूरीतरह सें इस 69 केँ खेल मे खोई हुईँ थीं। उनकी जीभें एक्-दूसरे कि कामुकता मे गोतेलगा रहीथीं, एक्-दूसरे कां रसपीरही थीं, औऱ एक्-दूसरे कों चरमसुख कि तरफ़ धकेलरही थीं। उनकेबदन कि हरनस, हर कोशिका उत्तेजित होँ चुकी थि। उनकी मोटी जांघें हवा मे थीं, औऱ उनके भरपूर कूल्हे हर चुसाई केँ संगहिल रहे थें।
वासना कां चरम:दो आत्माओं कां मिलन
कमरे मे सिर्फ़ उनकी साँसों कि आवाज़ें थीं, उनके होंठों औऱ जीभों केँ गीले होने कि आवाज़, औऱ उनके शरीरों केँ रगड़ने कि आवाज़। वे दोनों अपनी 'पवित्रता' केँ उन दावों कों भूल चुकीथीं, जोँ उन्होंने अपनी जवानी मे किए थें। अब उनकी सच्चाई उनकीदेह कि प्यास थि, जिसेवे एक्-दूसरे केँ ज़रिए बुझारही थीं।
पुष्pa नें sabhya कि योनि कों चूसते हुए अपनी उंगलियों सें उसकी मोटी जांघों कों सहलाना शुरुआत किया, उन्हें औऱ फैलाने कि कोशिश करती हुइ। sabhya भि पुष्pa कि योनि कों चूसते हुए अपने हाथों सें उसकी भरपूर छाती कों मसलरही थि, औऱ उसके निप्पल कों अपनी उंगलियों सें खींचरही थि।
दोनों नें एक् संग अपनीगति तेज़ कि। उनकी जीभें औऱ तेज़ी सें एक्-दूसरे केँ अंदर-बाहर् हौ रहीथीं, औऱ उनके मुँह सें आहों कां हंगामा औऱ बढ़ गय़ा थां। वेअब अपनेचरम पऱ पहुँच रहीथीं। एक् संग, दोनों केँ जिस्म मे एक् तेज़ कंपनहुआ, औऱ वे दोनों एक् संगचरम सुख कों प्राप्त हुईं। उनकेबदन मे एक् तीव्र झटकालगा, औऱ वे दोनों एक्-दूसरे पर्र गिरगईं, थक चुकीथीं, पऱ पूरीतरह सें संतुष्ट।
उनकी साँसें अब भि तेज़ी सें चलरही थीं, औऱ उनके जिस्म पसीने सें भीगेहुए थें। वे थोड़ी देर तक वैसे हि 69 कि स्थिति मे लेटी रहीं, अपनी जीभों सें एक्-दूसरे केँ रस कां आख़िरी स्वाद लेती हुईं। ये सिर्फ़ एक् समलैंगिक संबंध नहि थां, येदो बहनों कि आत्माओं कां मिलन थां, जोँ सालों कि अधूरी प्यास केँ बाद एक्-दूसरे मे अपना सच्चा चैनपा चुकीथीं।
क्याँ येरात उनके रिश्ते कों हमेशा केँ लिएबदल देगी? औऱ क्याँ इस'चरम' सुख केँ बाद, उनकीयह गुप्त रातें जारी रहेंगी याँ किसी औऱ मोड़ पर्र ख़त्म होंगी?
Mohanpur ( ek chuddakad gaon ) - Maa aur gaon – New Episode
हरतालिका तीज कि सुभह: एक् नया रहस्य
रात अपनी सारी रंगीनियों केँ संग गुज़र चुकी थि। कमरे केँ अंदर, सभ्या औऱ पुष्पा एक्-दूसरे सें लिपटी हुइ थीं, उनकी साँसें आरामसे सामान्य होँ रहीथीं। एक्-दूसरे कां 'रस' पीने केँ बाद, उनके चेहरों पर्र एक् अजीब सि शांति औऱ संतुष्टि थि।
"दोनों बहनें धीरे-धीरे सें हँसीं, " उनकी हँसी मे रात कि घटनाओं कि गूँज थि, एक् अनकहा राज़ जोँ सिर्फ़ उन्हीं केँ बीच थां। थोड़ी देरबाद, थकान औऱ संतुष्टि नें उन्हें अपनी आगोश मे लें लिया, औऱ वे गहरी नींद मे सोगईं।
अगली सुभह नानीहाल मे सभीकुछ सामान्य थां। सूरज कि किरणें खिड़की सें अंदर आँ रहीथीं, पक्षियों कां चहचहाना सुनाई देरहा थां। घऱ मे चहल-पहल शुरुआत होँ चुकी थि, जैसे बीतीरात कुछहुआ हि न् होँ। सभ्या औऱ पुष्पा भि उठगईं, औऱ उन्होंने भि अपने चेहरे पऱ एक् सामान्य मुस्कान बिखेर ली, जैसेरात कि घटनाएँ सिर्फ़ एक् ख़ूबसूरत सपनारही हों। वे फिन सें अपनी रोज़मर्रा कि दिनचर्या मे शामिल होँ गईं, भजन-कीर्तन औऱ घऱ केँ कामों मे हाथ बंटाने लगीं।
अर्जुन कां नया ठिकाना: खेतों मे एक् अनचाहा नज़ारा
मे (अर्जुन) भि सुभहउठ गय़ा थां। मेरे दिमाग़ मे रात कि बातें औऱ सभ्या मम्मी कों झाड़ियों मे देखने कां नज़ारा घूमरहा थां। मेरा6-इंच कड़क टूलसुबह सें हि अपनी उपस्थिति दर्जकरा रहा थां। नानीहाल केँ शांत माहौल मे मेरामन नहि लगरहा थां, औऱ मैंने सोचा कि क्यूं नं खेतों कि तरफ़ घूमने चलाजाए। बचपन सें हि मे गाँव केँ खेतों औऱ गलियों सें वाकिफ़ थां, जहाँ मेरे नानीहाल केँ मित्र भि रहते थें।
मे धीरे धीरे गाँव केँ बाहरी खेतों कि तरफ़चल पड़ा। हवा मे मिट्टी कि सोंधी ख़ुशबू थि, औऱ दूर-दूर तक हरियाली फैली हुईँ थि। चलते-चलते मे एक् ऐसी स्थान पहुंचा जहाँघने पेड़ औऱ झाड़ियाँ थीं, औऱ गाँव कां मार्ग थोडा सुनसान थां। येवही इलाक़ा थां जहाँ बचपन मे हम् साथी खेला करते थें।
श्यामा औऱ सरपंच: एक् चौंकाने वालासच
तभी मेरी नज़रकुछ दूरी पऱ पड़ी। मैंने देखा, कुछ हलचल थि। मे पेड़ों केँ पीछेछिप गय़ा औऱ ध्यान सें देखने लगा। भइया, जोँ नज़ारा मैंने देखा, उसने मुझे हिलाकर रख दिया।
वहा मेरी नानीहाल केँ बचपन केँ मित्र कि मां, श्यामा, औऱ गाँव केँ पहलवान सरपंच साहब थें! श्यामा करीब 40-42 साल कि होगी, भरपूर बदन वाली, शायद 42-36-42 कि फिगर होगी। उसकाबदन पूरीतरह सें देसी औऱ गठाहुआ थां। वोँ एक् आम गाँव कि महिला कि तरह साड़ी पहने थि, पर्र उसकी साड़ी थोड़ी अस्त-व्यस्त थि।
औऱ सरपंच साहब! वोँ करीब 50-55 साल केँ होंगे, मज़बूत बदन वाले, पूरे पहलवान जैसे। उनकी धोती भि थोड़ी ढीली थि।
मे अपने कॉन्स्टेंट हंगरइन आइज़ औऱ 6-इंच कड़कटूल केँ संग वहींजम गय़ा।
"सरपंच साहब, यहा। इसतरह?" श्यामा कि आवाज़ मे हल्की हिचकिचाहट थि, पऱ उसके चेहरे पर्र एक् अलग हि लालिमा थि।
"अरे श्यामा, क्याँ बात करती हौ! जबसे तुम्हें इसहरी साड़ी मे देखा हैं, मन नहि मानता, " सरपंच साहब नें अपनी भारी आवाज़ मे कहा, औऱ उन्होंने श्यामा कों अपनी तरफ़ खींचा।
श्यामा नें हल्का सां विरोध किया, पऱ सरपंच साहब नें उसकी भरपूर छाती पर्र अपनाहाथ रख दिया। श्यामा केँ मुँह सें एक् हल्की सि अहह निकली। सरपंच साहब नें उसकी साड़ी कों औऱ ऊपर किया, औऱ उसकी मोटी जांघें साफ़ दिखने लगीं।
फिन, सरपंच साहब नें अपनी धोती ढीली कि औऱ श्यामा कों नीचे ज़मीन पर्र लिटा दिया। श्यामा कि साड़ी पूरीतरह सें ऊपरसरक चुकी थि, औऱ उसका भरपूर, देसीबदन मेरे सामने थां। उसके मोटे बूब्स ऊपर कि तरफ़उठे हुए थें, औऱ उसकीकसी हुई योनि सरपंच साहब केँ सामने थि।
सरपंच साहब नें बिना किसी देरी केँ श्यामा केँ ऊपर अपनी स्थान बनाई। उनके जिस्मों केँ रगड़ने कि आवाज़ औऱ श्यामा कि हल्की-हल्की सिसकियाँ मुझे साफ़ सुनाई देरही थीं। सरपंच साहब पूरेजोश मे थें, औऱ श्यामा भि अब पूरीतरह सें संगदे रही थि।
"अहह। सरपंच साहब। औऱ तेज़." श्यामा नें फुसफुसाते हुएकहा, उसकी आवाज़ मे दर्द औऱ खुशी दोनों थें।
मे पेड़ों केँ पीछे छिपा, इस नज़ारे कों अपनी आँखों मे समेटरहा थां। ये गाँव, जोँ बाहर् सें शांत औऱ पवित्र दिखता थां, अंदर सें ऐसे राज़ छुपाए हुए थां, जिनकी मैंने कल्पना भि नहि कि थि। मेरी नानीहाल कि ज़मीन पऱ, बचपन केँ मित्र कि मां औऱ गाँव केँ सरपंच केँ बीचचल रहाये खेल, मेरे अंदर कि आग कों औऱ भड़का रहा थां।
खेतों कां राज़: श्यामा औऱ सरपंच कां बेख़ौफ संभोग
"भइया, श्यामा औऱ सरपंच कों खेतों मे उसतरह देखने केँ बाद, मेरा6-इंच कड़कटूल औऱ कॉन्स्टेंट हंगर वाली आँखें औऱ अधिक बेचैन हौ उठीथीं। मुझेलगा कि ये गाँव, ये नानीहाल, जितना शांत दिखता हैं, उतना हैं नहि। हर तरफ़ एक् अनकहा खेलचल रहा थां, औऱ अब मे भि उसखेल कां हिस्सा बन चुका थां। "
मे उसी झाड़ियों केँ पीछे छिपारहा, जहाँ मैंने श्यामा औऱ सरपंच कों देखा थां। मेरा दिमाग़ तेज़ी सें चलरहा थां। मुझेलगा कि जैसे प्रकृति मुझेकुछ औऱ दिखाना चाहती हैं, कुछऐसा जोँ मेरी प्यास कों औऱ बढ़ादे। मैंने अपनी स्थान बदली औऱ थोड़ी औऱ घनी झाड़ियों केँ पीछेछिप गय़ा, जहाँ सें मुझे औऱ भि साफ़दिख सके। हवा मे एक् अजीब सि गर्मी थि, औऱ मुझे लगनेलगा कि कुछ होने वाला हैं।
श्यामा औऱ सरपंच: एक् चौंकाने वालासच
तभी मेरी नज़रकुछ दूरी पऱ पड़ी। मैंने देखा, कुछ हलचल थि। मे पेड़ों केँ पीछेछिप गय़ा औऱ ध्यान सें देखने लगा। भइया, जौ नज़ारा मैंने देखा, उसने मुझे हिलाकर रख दिया।
वहा मेरी नानीहाल केँ बचपन केँ यार कि मां, श्यामा, औऱ गाँव केँ पहलवान सरपंच साहब थें! श्यामा करीब-करीब 40-42 साल कि होगी, भरपूर बदन वाली, शायद 42-36-42 कि फिगर होगी। उसकाबदन पूरीतरह सें देसी औऱ गठाहुआ थां। वोँ एक् आम गाँव कि महिला कि तरह साड़ी पहने थि, पऱ उसकी साड़ी थोड़ी अस्त-व्यस्त थि।
औऱ सरपंच साहब! वोँ करीब-करीब 50-55 साल केँ होंगे, मज़बूत बदन वाले, पूरे पहलवान जैसे। उनकी धोती भि थोड़ी ढीली थि।
मे अपने कॉन्स्टेंट हंगरइन आइज़ औऱ 6-इंच कड़कटूल केँ संग वहींजम गय़ा।
"सरपंच साहब, यहा। इसतरह?" श्यामा कि आवाज़ मे हल्की हिचकिचाहट थि, पर्र उसके चेहरे पर्र एक् अलग हि लालिमा थि।
"अरे श्यामा, क्याँ बात करती हौ! जबसे तुम्हें इसहरी साड़ी मे देखा हैं, मन नहि मानता, " सरपंच साहब नें अपनी भारी आवाज़ मे कहा, औऱ उन्होंने श्यामा कों अपनी तरफ़ खींचा।
श्यामा नें हल्का सां विरोध किया, पऱ सरपंच साहब नें उसकी भरपूर छाती पर्र अपनाहाथ रख दिया। श्यामा केँ मुँह सें एक् हल्की सि अहह निकली। सरपंच साहब नें उसकी साड़ी कों औऱ ऊपर किया, औऱ उसकी मोटी जांघें साफ़ दिखने लगीं।
फिन, सरपंच साहब नें अपनी धोती ढीली कि औऱ श्यामा कों नीचे ज़मीन पर्र लिटा दिया। श्यामा कि साड़ी पूरीतरह सें ऊपरसरक चुकी थि, औऱ उसका भरपूर, देसीबदन मेरे सामने थां। उसके मोटे बूब्स ऊपर कि तरफ़उठे हुए थें, औऱ उसकीकसी हुइ योनि सरपंच साहब केँ सामने थि।
सरपंच साहब नें बिना किसी देरी केँ श्यामा केँ ऊपर अपनी स्थान बनाई। उनके जिस्मों केँ रगड़ने कि आवाज़ औऱ श्यामा कि हल्की-हल्की सिसकियाँ मुझे साफ़ सुनाई देरही थीं। सरपंच साहब पूरेजोश मे थें, औऱ श्यामा भि अब पूरीतरह सें संगदे रही थि।
"अहह। सरपंच साहब। औऱ तेज़." श्यामा नें फुसफुसाते हुएकहा, उसकी आवाज़ मे दर्द औऱ मजा दोनों थें।
"अब नहि, मादरचोद! अब तौ तेरी गांड फाड़ूँगा!" सरपंच नें एक् झटके मे श्यामा कों ज़मीन पर्र गिरा दिया। उनकीहरी साड़ी औऱ पेटीकोट पूरीतरह सें ऊपरसरक गए थें, औऱ वो अब मेरे सामने निर्वस्त्र थीं। उनकी भरपूर जांघें, मोटी गांड, औऱ गुलाबी योनि मेरे सामने खुली थि। मेरा6-इंच कड़कटूल पूरीतरह सें खड़ा हौ चुका थां।
सरपंच नें अपनी धोती हटाई, औऱ उनका मोटा, लंबा लन्ड बाहर् आँ गय़ा, जोँ गुस्से मे औऱ तेज़ी सें धड़करहा थां। उन्होंने बिना किसी देरी केँ श्यामा कि टांगों कों फैलाया औऱ उनकेऊपर अपनी स्थान बनाई।
"चुप रह, भोसड़ी! आज तेरीऐसे चोदूँगा कि याद रखेगी!" सरपंच नें श्यामा कि योनि पर्र अपना लन्ड रखा औऱ एक् झटके मे उसे अंदर धकेल दिया।
श्यामा केँ मुँह सें एक् चीख निकली, जोँ जल्दी सरपंच केँ होंठों सें दब गई, क्योंकि उन्होंने उसे ज़बरदस्ती किस करना शुरुआत कर दिया।
"हाँ। ऐसे हि। गांडू! आज तेरी सारी गर्मी निकाल दूँगा!" सरपंच नें तेज़ी सें धक्के लगाने शुरुआत करदिए। उनके जिस्म केँ हर धक्के केँ संग, श्यामा कां भरपूर शरीरहिल रहा थां, औऱ उसकी आहें औऱ सिसकियाँ हवा मे गूँजरही थीं।
"नहि। अहह। सरपंच साहब। धीमे." श्यामा नें कहा, उसकी आँखों मे आँसू थें।
"धीमे? क्यूं कुतिया? तूँ तौ स्वयं चाहती हैं नां? यहदेख, तेरी बुर कितनी गीली हैं! तूँ तोँ बस चाहती हैं कि कोई बड़ा लन्ड तेरी बुर फाड़े!" सरपंच नें अपनीगति औऱ तेज़कर दि, उनकी आवाज़ मे जीत कां अहंकार थां।
श्यामा अब पूरीतरह सें बेबस थि, औऱ आरामसे उसका विरोध कम होँ गय़ा। दर्द केँ संग-संग, उसे एक् अजीब सां खुशी भि आँ रहा थां। उसके मोटे बूब्स ऊपर-नीचे हौ रहे थें, औऱ उसकी भरपूर योनि सरपंच केँ मोटे लन्ड कों पूरीतरह सें निगलरही थि।
मे झाड़ियों केँ पीछे खड़ासभी कुछदेख रहा थां। मेरी साँसें तेज़थीं, औऱ मेरा लन्ड दर्दकर रहा थां। मेरी आँखों केँ सामने एक् गाँव कि स्त्री औऱ गाँव केँ सरपंच केँ बीचचल रहाये खेल, मेरे अंदर कि आग कों औऱ भड़का रहा थां।
नानीहाल कि किचन: छोटी मामीजी औऱ अर्जुन कां बढ़ता मज़ाक
"भइया, खेतों मे श्यामा औऱ सरपंच केँ बीच जौ कुछ भि देखा, उसने मेरे अंदर कि आग कों औऱ भड़का दिया थां। मुझेलगा जैसेअब मेरा6-इंच कड़कटूल औऱ मेरी कॉन्स्टेंट हंगर वाली आँखें किसी भि मर्यादा कों मानने कों सजधजकर नहि थीं। नानीहाल कि हर स्त्री, हर नाता, अब मेरेलिए एक् नई चुनौती बन चुका थां। "
खेतों सें वापसआते हि मेरामन अजीब सां विचलित थां। वोँ नज़ारा मेरे ज़हन सें हट नहि रहा थां। मे सीधे अपने कमरे मे नहि गय़ा, बल्कि किचन कि तरफ़चल पड़ा। मुझेकुछ पीने कां मन थां, औऱ मे जानता थां कि वहाकोई न् कोई अवश्य मिलेगा।
किचन मे छोटी मामीजी: एक् नया निशाना
जैसे हि मे किचन केँ दरवाज़े पर्र पहुंचा, मैंने देखा कि वहा सिर्फ़ छोटी मामीजी राधाथीं। वो कुछ बर्तन साफ़कर रहीथीं, औऱ उनकी मोटी गांड औऱ भरपूर हिप्स हर हरकत केँ संगहिल रहे थें। उनकी फिगर 44-38-44 कि थि, औऱ उनकीकमर कां बलऐसा थां कि कोई भि मर्दउसे देखता रहजाए। वो एक् हल्की गुलाबी साड़ी मे थीं, जौ उनके जिस्म पर्र कसरही थि।
मैंने जानबूझकर खाँसा ताकि उन्हें मेरी मौजूदगी कां एहसास हौ। उन्होंने पलटकर देखा, औऱ उनके चेहरे पर्र एक् हल्की सि मुस्कान आँ गई।
"अरे अर्जुन बेटा! तुम् कहां थें? इतनीदेर सें कहां घूमरहे थें?" राधा मामीजी नें पूछा, उनकी आवाज़ मे थोड़ी शरारत थि।
"बस मामीजी, ऐसे हि खेतों कि तरफ़चला गय़ा थां। मन नहि लगरहा थां, सोचा थोड़ी ताज़ी हवा लें लूँ, " मैंने कहा, औऱ मेरी नज़रें सीधे उनकी गांडपर थीं, जौ उनकी साड़ी मे औऱ भि ज्यादा आकर्षक लगरही थि।
"अरे बेटा, गाँव कि हवा तोँ बड़ी ताज़ी होती हैं, पऱ कहीं अधिक ताज़ी हवालग न् जाए, " राधा मामीजी नें मुस्कुराते हुएकहा, उनकी आँखों मे वही मसालेदार गॉसिप वालीचमक थि, जौ अब एक् टीज़िंग स्माइल मे बदल चुकी थि।
गांड पर्र मज़ाक: एक् शरारती संवाद
मैंने उनकेपास आकर पानी कां गिलास उठाया। "मामीजी, आपकोपता हैं, गाँव कि हवा सें अधिक तोँ आप् हि ज्यादा ताज़ी औऱ मीठी लगती होँ। " मेरी आवाज़ मे खुली शरारत थि।
राधा मामीजी केँ गाल हल्के सें लाल हौ गए, पऱ उन्होंने अपनी हँसी नहि रोकी। "अरे बेटा, तुँ भि नाँ! तेरी ज़ुबान तोँ बड़ी तेज़ हैं। क्याँ शहरों सें यहीसभी सीखकर आए हौ?"
"नहि मामीजी, यहसभी तौ यहाआकर हि सीखा हैं। आप् जैसी मामियों कों देखकर कौन नहि सीखेगा?" मैंने उनके औऱ क़रीब आकरकहा। अब मे उनके पीछे खड़ा थां, औऱ मेरी नज़रें उनकी मोटी गांड पऱ टिकी हुइ थीं।
"अच्छा? औऱ क्याँ सीखा हैं?" राधा मामीजी नें जानबूझकर अपनीकमर हल्की सि घुमाई, जिससे उनकी गांड मेरे औऱ क़रीब आँ गई।
"यही कि कुछ चीज़ें दूर सें जितनी अच्छी लगती हें, पास सें उससे भि ज्यादा अच्छी लगती हें, " मैंने फुसफुसाते हुएकहा, औऱ मेरी नज़रें अभि भि उनकी गांड पर्र थीं। "ख़ासकर आपकीयह। पीछे वाली। चीज़। " मैंने जानबूझकर धीमी आवाज़ मे कहा, ताकि सिर्फ़ वहीसुन सकें।
राधा मामीजी कि साँसें तेज़ होँ गईं। वो ज़रा भि हिचकिचाई नहि। उन्होंने हल्की सि हँसी। "अच्छा? औऱ तुम्हारी तरफ क्याँ लगता हैं, मेरीयह 'पीछे वाली चीज़' कैसी हैं? क्याँ इतनी अच्छी लगती हैं?" उन्होंने अपनीकमर कों औऱ हल्का सां मटकाया।
"मामीजी, इतनी अच्छी लगती हैं कि बसमन करता हैं। वहीं पर्र। हाथरख दूँ, " मैंने कहा, मेरी आवाज़ मे एक् अजीब सि गहराई थि।
राधा मामीजी थोड़ी देरचुप रहीं, फिन हँसी। "अरे बेटा! तूँ तोँ बड़ा शैतान होँ गय़ा हैं। ऐसा क्यूं लगता हैं तेरी?"
"क्यूं कि मामीजी, आपकीयह जौ कमर हैं नां, यह पूरीगोल, औऱ उसके नीचेयह जोँ उभार हैं। यह पूरा गोलाकार। औऱ जब आप् ऐसे मुड़ती होँ, तौ यह जोँ हिलता हैं। अहह!बस मन करता हैं कि हाथलगा कर देखूँ, कितना रसीले हैं, " मैंने पूरी डीटेल मे बताया, मेरी आँखें उनकी गांड पर्र टिकीथीं। मेरा लन्ड अब पूरीतरह सें खड़ा होँ चुका थां।
राधा मामीजी नें एक् गहरी साँसली, पर्र वो शरमाई नहि। उसकी आँखों मे अब एक् नईआग थि। "औऱ अगर मैंने तुम्हें छूने दिया, तौ क्याँ करोगे? सिर्फ़ छूकर छोड़ दोगे, याँ कुछ औऱ भि मन करेगा?" उनकी आवाज़ मे चुनौती थि।
चुनौती औऱ बढ़ती वासना
"मामीजी, " मैंने धीरे-धीरे सें उनके औऱ क़रीब आकरकहा, अब मेरी उँगलियाँ उनकी साड़ी कि किनारों कों छूरही थीं, "सिर्फ़ छूकर केसे छोडूंगा? आपकीयह जोँ गोल गांड हैं नां, इसका तोँ हरइंच चूमने कां मन करता हैं। औऱ अगर एक् बारछू लूँ, तौ फिन तोँ बस.उसे दबाने कां मन करेगा, औऱ फिन। औऱ फिन तोँ बस." मैंने जानबूझकर बात अधूरी छोड़ दि।
राधा मामीजी नें अपने बर्तन धोनाबंद कर दिया। वो पलटकर मेरे सामने खड़ी होँ गईं, उनके होंठों पऱ एक् शरारती मुस्कान थि। "अच्छा? औऱ क्याँ? बोल नाँ बेटा, बोल। क्याँ मन करेगा?" उनकी आँखें मेरी आँखों मे गहराई सें देखरही थीं।
मैंने धीरे-धीरे सें अपनाहाथ बढ़ाया औऱ उनकेकमर केँ ठीकऊपर, साड़ी पऱ हल्की सि उंगली फेरी। "मन करेगा कि आपकीयह जौ मोटी गांड हैं नाँ मामीजी। इसको कसकर पकड़लूँ, औऱ फिन."
राधा मामीजी केँ बदन मे एक् कंपनहुआ। उन्होंने अपनी आँखें हल्की सि बंदकीं, औऱ उनके मुँह सें एक् हल्की सि अहह निकली। "अर्जुन। तूँ तौ। तुँ तौ बिलकुल अपनी दिदी (पुष्पा) जैसा हि हैं। " उन्होंने मेरी आँखों मे देखते हुएकहा, उनकी आवाज़ मे एक् नई हि तरह कि उत्तेजना थि।
मे जानता थां, भइया, कि ये सिर्फ़ शुरुआत थि। नानीहाल मे अबकोई भि स्त्री सुरक्षित नहि थि, औऱ हरकोई अपनीदबी हुईँ इच्छाओं कों बाहर् निकालने कों सजधजकर थां। छोटी मामीजी राधा केँ संगये मज़ाक अब एक् नए मोड़ पऱ पहुँच चुका थां, जहाँ सें वापसी नामुमकिन थि।
राघवेंद्र औऱ सभ्या: मोहनपुर कि रात
नानीहाल मे सब किरदारों केँ राज़ औऱ दबी इच्छाएँ अब खुलकर सामने आँ रही हें, औऱ माहौल मे एक् अजीब सां तनाव औऱ उत्तेजना घुली हुईँ हैं। ऐसे मे राघवेंद्र अपनी पत्नि सभ्या कों वापस मोहनपुर लें जाने केँ लिए पहुँच गए हें।
रात कां खानां ख़त्म होने केँ बाद, राघवेंद्र औऱ सभ्या अपने कमरे मे अकेले थें। दिनभर कि थकान औऱ अनकहे तनाव केँ बीच, उनकेबीच कि चिंगारी फिन सें भड़कउठी। सभ्या नें राघवेंद्र कों बताया थां कि उनका "इंजनआज भि 'सांड' जैसा मज़बूत हैं, " औऱ आजरात येबात सच साबित होने वाली थि।
कमरे कि हल्की रोशनी मे, उन्होंने एक्-दूसरे कों बाहों मे भर लिया। कपड़ों कि परतें एक्-एक् कर हटने लगीं, औऱ उनकेबदन एक्-दूसरे मे सिमटगए। शुरुआत धीरे-धीरे औऱ भावुक थि, मगर जल्द हि जुनून हावी हौ गय़ा।
राघवेंद्र नें सभ्या कों खाट पऱ धकेल दिया, औऱ वे मिशनरी पोजीशन मे आँ गए। "पुच पुचपुच" कि आवाज़ केँ संग उनके जिस्म एक् होँ गए। सभ्या कि साँसें तेज़ होँ गईं, औऱ उसने राघवेंद्र कों कसकर पकड़ लिया।
फिन वे डॉगी स्टाइल मे आँ गए। "थपथप थप" कि गूँज कमरे मे फैल गई, जब राघवेंद्र नें अपनी पूरी ताकत सें सभ्या कि "गांड" पर्र ज़ोर लगाना शुरुआत किया। सभ्या कि आहें औऱ सिसकियाँ अब औऱ तेज़ हौ चुकीथीं।
इसकेबाद, सभ्या नें काउगर्ल पोजीशन लेँ ली। वो राघवेंद्र केँ ऊपर सवार थि, औऱ अपने जिस्म कों ऊपर-नीचे करतेहुए "पुर्र पुर्र" औऱ "फुस्स फुस्स" कि आवाज़ें निकाल रही थि। राघवेंद्र नीचे सें उसे निहार रहे थें, औऱ उनके चेहरे पर्र संतोष कां भाव थां।
उनके जुनून नें उन्हें ओरल प्ले कि ओर धकेला। दोनों नें एक्-दूसरे कों जीभ सें संतुष्ट किया, "रस" कां आदान-प्रदान किया, जिससे उनकी उत्तेजना औऱ बढ़ गई। इस दौरान "थप पचाच" जैसी गीली आवाज़ें आँ रहीथीं।
एक् लंबे औऱ बेकाबू संभोग केँ बाद, दोनों हाँफते हुए एक्-दूसरे कि बाहों मे ढीलेपड़ गए। मोहनपुर कि येरात उनके रिश्ते मे एक् नया मोड़ लेँ चुकी थि, जहाँ शारीरिक इच्छाएँ औऱ भावनात्मक बंधन एक् संग घुलमिल गए थें।
Mohanpur ( ek chuddakad gaon ) - Maa aur gaon - Continue reading next part
- 1
- 2
Relavant source : click here