♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
Shubham bro plz yar, kahani continue karo its my request,
muze lagta h us site से apki kahani ko remove krr दिया गया h, ap एक baar khud check krr lo :biggboss:
And one more important thing ap kisi ko kahani copy paste karne से rok नहीं sakte, iss prakaar की kitni hi sites hogi, jaha के bare mai apko ptaa bi नहीं hoga, और yeh bi hu sakta h waha bi कोई na कोई kisi na kisi की kahani copy karke post krta hi hoga, :biggboss:
ap har जगह ja krr kisi ko mana नहीं krr sakte haen, iss liye ham sabki बात maniye और apni kahani ko continue kijiye, :biggboss:
ismein कोई shak नहीं की ap एक behtareen writer hu.aapka writing style awesome h, ham sab ko apki kahani read karke behad aanand milta h, lekin जब ap iss prakaar की baato से upset hu krr apni kahani beech mai chhod denge too kisi ko bi अच्छा नहीं lagega, baaki ap क्या sochte haen ya क्या chaahte haen yeh ap पर h bro
mein aapse एक बात kahna chahta ho, mein कोई writer नहीं ho, और na hi mene pehle कभी कोई kahani likhi thi, mein bus har sites पर kahaniyan padhta thaa, iss site पर aapki kahani padhi.aapka wrting style देखा.aapki kalpnaao ko देखा, sacch maaniye bro muze बड़ा mazaa आया, aapki hi story padh krr muze laga muze bi likhna चाहिए, too mene likhna start krr दिया.लेकिन yeh hakikat बात h की mein apki wrting style ko hi copy karne की kosis krta ho, mein yeh नहीं janta की mein ismein kitna kaamyaab hu ptaa ho, लेकिन jaisa bi mujhse aata h vaisa likh deta ho,
Ab ap मेरी iss बात से samajh sakte haen bro ap ko और apki kahani ko ham sab kitna like karte haen, iss liye plz ap kahani ko continue karo, dusro पर dhyan mat दो ap, कोई aapka hunar नहीं chura sakta और na hi aapki style ko copy krr sakta h, kyo की yeh god gifted cheeje hoty haen bro.joo har kisi के pas alag alag prakaar की hoty haen, :biggboss:
yeh मेरा aapse aakhiri baar kahna h bro.iske बाद mein कोई comment नहीं karuga, muze joo kahna thaa और joo मेरे dill ❤️ mai thaa woh sab mene aapse kah दिया, अब aapko joo अच्छा lage woh kijiye,
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
♡ एक् नया संसार ♡
एपसोड। 《 26 》
अब तक,,,,,,,,
"शायदइसी लिएराज। " निधि नें कहींखोए हुएकहा थां। उसेइस बात कां आभास हि नहि थां कि वो अपने बड़े भइया कों उसकेनाम सें संबोधित करयहकहा थां। जबकि.
"रराज.???" विराज बुरीतरह चौंका थां। उसने निधि कों स्वयं सें अलगकर उसके चेहरे कि तरफ हैरानी सें देखा।
"क क्याँ हुआ भाई??" निधि चौंकी, उसकोकुछ समझ न् आया कि उसके भइया नें अचानक उसे स्वयं सें अलग क्यूं किया।
"क्याँ बताऊॅ??" विराज नें अजीबभाव सें उसे देखते हुए कहा__"सुना हैं इश्क़ जब किसी केँ सरचढ़ जाता हैं तोँ उस ब्यक्ति कों कुछ ख़याल हि नहि रह जाता कि वो किससे क्याँ बोल बैठता हैं?"
"आप् यह क्याँ कहरहे हें?" निधि नें उलझन मे कहा__"मुझे कुछसमझ नहि आँ रहा?"
"अरे पागल तूने अभि अभि मुझे मेरानाम लेकर पुकारा हैं। " विराज नें कहा__"अरे मेरी बेहन प्यार मे कैसी बावली औऱ बेशर्म होँ गई हैं कि अब वोँ अपने बड़े भइया कां नाम भि लेनेलगी। "
"क क्याऽऽ????" निधि बुरीतरह उछल पड़ी। हैरत औऱ अविश्वास सें उसका मुॅह खुला कां खुलारह गय़ा। फिन सहसाउसे एहसास हुआ कि उसके भइया नें अभि क्याँ कहा हैं। उसका चेहरा लाज औऱ लज्जा सें लाल सुर्ख पड़ता चला गय़ा। नज़रें फर्स पर्र गड़गईं उसकी। छुईमुई सि नज़रआने लगी वो। उसेइस तरह खड़े न् रहा गय़ा। कहीं औऱ मुह छुपाने कों न् मिला तोँ पुनः वो विराज सें छुपककर उसके सीने मे चेहरा छुपा लिया अपना। विराज कों यह अजीब तोँ लगा लेकिन अपनी बेहन कि इसअदा पर्र उसे बड़ा प्रेम आया। जिंदगी मे पहलीबार वो अपनी बेहन कों इसतरह औऱ इतना शर्माते देखा थां।
अबआगे,,,,,,,
विराज अपनी बेहन कों अभि इसतरह शर्माते देख हि रहा थां कि उसकी पैन्ट कि पाॅकेट मे पड़ाफोन बजउठा। दोनो हि फोन कि रिंगटोन सुनकर चौंके।
"आपकाफोन भि न्। " निधि नें बुरा सां मुहबना कर कहा__"ग़लत टाइम पर्र हि बजता हैं। "
"अरे!ऐसा क्यूं कहरही हैं तुँ?" विराज नें पाॅकेट सें फोन निकालते हुएकहा थां।
"अब जाने दीजिए। " निधि विराज सें अलग होकर बोलि__"आप् देखिये, जानेकौन कबाब मे हड्डी बन गय़ा हैं, हाॅ नहि तौ। "
विराज उसकीबात पऱ मुस्कुराया औऱ फोन कि स्क्रीन पऱ फ्लैश कररहे नाम कों देख तनिक चौंका फिन मुस्कुरा कर काॅल कों रिसीव कर कानों सें लगा लिया।
".। " उधर सें जाने क्याँ कहा गय़ा जिसेसुन कर विराज बुरीतरह चौंका।
"यह क्याँ कहरहे हौ तुम्?" विराज नें हैरानी सें कहा थां।
".। " उधर सें फिनकुछ कहा गय़ा।
"भइया तूने बहोत अच्छी ख़बर दि हैं। " विराज खुश होकर बोला__"चल ठीक हैं मे देख लूॅगा। "
".। "
"ओह तौ यहबात हैं। " विराज नें सहसा सपाटभाव सें कहा__"चल कोईबात नहि भइया। देख लेंगे सबको। औऱ हाॅ.सुन, मैने तेराकाम कर दिया हैं ठीक हैं न्? चलरख मोबाइल। "
"किससे बातकर रहे थें आप्?" निधि नें उत्सुकतावश पूछा।
"अपना हि एक् व्यक्ति थां गुड़िया। " विराज नें कहा__"उसने मोबाइल करके बहोत अच्छी ख़बर सुनाई हैं। हमेंअब इसटूर कों यहीं ख़त्म करना होगा। क्योंकि बहोत ज़रूरी काम सें मुझे कहीं जानां हैं। "
"क्याँ मुझे नहि बताएॅगे?" निधि नें तिरछी नज़र सें देखते हुए लेकिन इकअदा सें कहा__"कि ऐसी क्याँ ख़बर सुनाई आपकेउस व्यक्ति नें जिसकी वजह सें आपकोअब जल्द यहाॅ सें निकलना होगा??"
"अरे पागल तुझसे भला क्यूं कोईबात छुपाऊॅगा मे?" विराज हॅसा__"चल रास्ते मे बताता हूॅसभी कुछ। "
इसकेबाद दोनो भइया बेहनशिप केँ पायलट कों सूचित करशिप कों वापस लौटने केँ लिएकह दिया। करीब-करीब आधे घंटेबाद वोँ समुंदर केँ किनारे पर्र पहुॅचे। इसबीच विराज नें निधि कों मोबाइल पर्र हुई बातों केँ बारे मे बता दिया थां जिसेसुन कर वो भि खुश हौ गई थि।
शिप सें बाहर् आकर विराज उस स्थान निधि कों लेकर गय़ा जहाॅ पऱ उसकी गाड़ी पार्क कि हुइ थि। दोनो वाहन मे बैठकर घऱ कि तरफ तेज़ी सें बढ़गए थें। इसबीच विराज नें मोबाइल लगाकर किसी सें बातें भि कि थि।
साम होने सें पहले हि जब दोनोघऱ केँ अंदर पहुॅचे तौ माॅ गौरी कों ड्राइंगरूम मे एक् तरफ कि दीवार पर्र लगी बड़ी सि एलईडी टेलीविज़न पर्र सीरियल देखते पाया। गौरी नें जब अपने बच्चों कों देखा तोँ पहले तोँ वोँ चौंकी फिन मुस्करा कर बोलीं__"आँ गए तुम् दोनो?चलो अच्छा किया जौ जल्द हि आँ गए। जाओ दोनो स्वयं कों साफ सुथरा करलोतब तक मे गरमचाय बनाकर लातीहूॅ। "
निधि औऱ विराज दोनो अपने अपने कमरे कि तरफबढ़ गए। कुछ हि देर मे दोनो फ्रेस होकरआए औऱ सोफों पऱ बैठगए। तभी गौरीहाथ मे ट्रेलिए आई औऱ दोनो कों गरमचाय दि औऱ स्वयं भि एक् कपगरम चाय लेकर वहीं सोफे पर्र बैठ गई।
"माॅ चाचा जी आँ रहे हें आज। " विराज नें गरमचाय कि एक् चुश्की लेकर कहा__"औऱ मुझे जल्द हि रेलवे स्टेशन जानां होगा उन्हें रिसीव करने केँ लिए। "
"क्याँ कहरहा हैं तुँ.अभय आँ रहा हैं???" गौरी बुरीतरह चौंकी थि, बोलीं__"पऱ तेरी केसेपता इसका?"
"गाॅव केँ एक् यार नें मुझे मोबाइल पऱ इसबात कि सूचना दि हैं माॅ। " विराज नें सहसा गंभीर होकर कहा__"उसने बताया कि अभय चाचा चुपचाप हि हमसे मिलने केँ लिए गाॅव सें निकले हें। उसनेयह भि बताया कि पिछले दिन हवेली मे कोई बातचीत हौ गई थि औऱ अभय चाचा बहोत गुस्से मे भि थें। "
"ऐसी क्याँ बातचीत हुइ होगी?" गौरी नें मानो स्वयं सें हि प्रश्न किया थां, फिन जल्दी हि बोलीं__"औऱ क्याँ बताया तेरेउस मित्र नें?"
"मुझे तोँ ऐसा लगता हैं माॅ कि कोई गंभीर बात हैं। " विराज नें कहा__"मेरा यारकह रहा थां कि बड़े पिताजी नें अभय चाचा केँ पीछे अपने आदमियों कों लगाया हुआ हैं। इससे तोँ यही लगता हैं कि वोँ अभय चाचा केँ द्वारा हम् तक पहुॅचना चाहते हें। "
"ठीक कहता हैं तूँ। " गौरी नें कहा__"ऐसा हि होगा। औऱ अगरकोई बात होँ गई हैं तौ उससेअभय औऱ उसके पत्नि बच्चों पर्र ख़तरा भि होगा। उन्हें पता नहि हैं कि उनका बड़ा भइया कितना बड़ा कमीना हैं। "
"इसीलिए तौ मे उन्हें लेनेजा रहाहूॅ माॅ। " विराज नें कहा__"चाचा जी कों तोँ शायदइस बात कां अंदेशा भि न् होगा कि उनके पीछे उनके बड़े भइया साहब नें अपने व्यक्ति लगारखे हें। "
"अगरयह सच हैं कि अभय केँ पीछे तेरे बड़े बापू नें अपने व्यक्ति लगारखे हें तौ तूँ केसेअभय कों उन आदमियों कि नज़रों सें बचाकर लाएगा?" गौरी नें कहा__"तुम को तोँ पता भि नहि हैं कि वहाॅ पर्र किन जगहों पऱ वोँ व्यक्ति मौजूद होकरअभय पऱ नज़ररखे हुए हें?"
"आप् फिक्र मत कीजिए माॅ। " विराज नें कहा__"मे चाचा जी कों सुरक्षित वहाॅ सें लेँ आऊॅगा औऱ उन आदमियों कों इसकीभनक भि नहि लगेगी। "
"ठीक हैं बेटे। " गौरी नें सहसा फिक्रमंद हौ कर कहा__"सम्हल कर जानां औऱ अपने चाचा कों सुरक्षित लेकर आनां। "
"ऐसा हि होगामाॅ। " विराज नें कहा__"आप् बिलकुल भि फिक्र मत कीजिए। मे उन्हें सुरक्षित हि लेकर आऊॅगा। "
यहकह विराज सोफे सें उठकर बाहर् कि तरफचला गय़ा। कुछ हि देर मे उसकी गाड़ी हवा सें बातें कररही थि। करीब पन्द्रह मिनटबाद उसकी वाहनमेन रोड सें उतरकर एक् तरफ कों मुड़ गई। कुछदूर जाने केँ बाद विराज नें गाड़ी कों मार्ग केँ किनारे लगाकर उसेबंद कर दिया औऱ बाॅई कलाई पर्र बॅधी रिस्टवाच पर्र ज़रा बेचैनी सें नज़र डाली। उसकेबाद राइट साइड कि तरफबनी हुईँ मार्ग कि तरफ देखने लगा। उसके चेहरे पऱ ऐसेभाव थें जैसे किसी केँ आने कां इन्तज़ार कररहा होँ।
कुछ हि देर मे उस मार्ग सें उसेचार व्यक्ति आतेहुए दिखे। उन चारो आदमियों मे एक् कि वेशभूसा सामान्य थि लेकिन बाॅकी केँ तीनों आदमियों केँ बदन पर्र कुली कि पोशाक थि। थोड़ी हि देरबाद वोँ चारो विराज कि वाहन केँ ड्राइविंग डोर केँ पासआकर खड़े हौ गए।
"आने मे इतना वक़्त क्यूं लगा दिया तुम् लोगों नें?" विराज नें कहा__"मैने तुम् लोगों कों मोबाइल पर्र बोला थां न् कि मुझे एकदम सजधजकर होकर यहीं पर्र मिलना। "
"साहब वोँ रामू कि बेटी कि तबियत बहोत ख़राब थि। " एक् व्यक्ति नें कहा__"इस लिएउसे अस्पताल लेकर जानां पड़ गय़ा थां। उसकेपास पैसे नहि थें तौ हम् सबने पैसों कि ब्यवस्था कि फिनउसे अस्पताल लेँ गए। उसी मे वक़्त लग गय़ा साहब। "
"क्याँ हुआ उसकी बेटी कों?" विराज नें चौंकते हुए पूछा थां।
"पता नहि साहब। "उस ब्यक्ति नें कहा__"एक् हप्ते सें बुखार थि उसे। थोड़ी बहोत गोली दवाई करवाई थि रामू नें। मगरआज दोपहर उसकी तबीयत कुछ अधिक हि बिगड़ गई इसलिए उसे अस्पताल लेकर जानां पड़ गय़ा। "
"चलोकोई बात नहि। " विराज नें कहा__"रामू कों कहो कि पैसों कि चिन्ता नं करे। उसकी बेटी केँ इलाज मे जौ भि रुपया लगेगा उसे हमारी कंपनी देगी। उसकोकहो कि वोँ अपनी बेटी कां इलाज बेहतर तरीके सें करवाए। "
"जी साहब। "उस व्यक्ति नें खुश होकर कहा__"मे अभि उसे बोलता हूॅ। "
कहने केँ संग हि उस व्यक्ति नें अपनी सर्ट कि पाॅकेट सें एक् छोटा सां कीपैड वाला मोबाइल निकाला औऱ उस पर्र रामू कां नम्बर देखउसे लगा दिया। उसने रामू कों सारीबात बताई। उसकेबाद उसने मोबाइल बंदकर दिया।
विराज नें वाहन कि डैसबोर्ड पऱ रखा एक् लिफाफा उठाया। उसमे सें उसने जोँ चीज़ें निकाली वोँ कोई फोटोग्राफ्स थें।
"इनमें सें एक् एक् फोटोग्राफ्स तुम् चारो अपनेपास रखो। " विराज नें कहा__"इस फोटो मे जोँ व्यक्ति हैं उसे अच्छी तरहदेख लो। क्योंकि इस व्यक्ति कों बड़ी सावधानी सें रेलवे स्टेशन केँ बाहर् लाना हैं तुम् लोगों कों। "
"पऱ साहब इतनी भीड़ मे हम् उन्हें खोजेंगे केसे?" एक् व्यक्ति नें कहा__"दूसरी बात क्याँ पताकौन सें डिब्बे मे होंगे वोँ?"
"वोँ जनरल डिब्बे मे हि हें। " विराज नें कहा__"इस लिए तुम् लोग केवल जनरल डिब्बे मे हि उन्हें खोजोगे। कहीं औऱ खोजने कि ज़रूरत नहि हैं। बाॅकी तौ सभीकुछ तुम्हें मोबाइल पऱ समझा हि दिया थां मैने। "
"ठीक हैं साहब। " दूसरे व्यक्ति नें कहा__"हम् सभीइस बात कां ख़याल रखेंगे कि उनके पीछेलगे हुएउन आदमियों कों पता न् चलसके कि वोँ जिनका पीछाकर रहे हें वोँ उनकी आॅखों केँ सामने सें केसे गायब होँ गय़ा??"
"वैरीगुड शंकर। " विराज नें कहा__"अभि ट्रेन केँ आने मे वक्त हैं। तब तक मे तुम्हें एक् किराए कि कैब कां इन्तजाम भि कर देताहूॅ। तुम् उन्हें रेलवे स्टेशन सें बाहर् लाओगे, एक् व्यक्ति बाहर् कैब मे बैठा तुम् लोगों कां इन्तज़ार करेगा। जैसा कि अभि तुम् मे सें एक् व्यक्ति कों छोंड़ कर बाकी तीनो कुली केँ वेश मे होँ इसलिए तुम् तीनो मे सें जिसे भि वोँ मिलें तौ उनकेपास जाकर बड़ी सावधानी सें मात्र वही कहना जौ मोबाइल पऱ समझाया थां। "
"ऐसा हि होगा साहब। " एक् अन्य व्यक्ति नें कहा__"आप् बेफिक्र रहिए। "
"अच्छी बात हैं। " विराज नें कहा__"चलो बैठोसभी, हमें निकलना भि हैं अब। "
विराज केँ कहने पऱ चारो व्यक्ति खुशी सें बैठगए जबकि विराज नें गाड़ी कों स्टार्ट करआगे बढ़ा दिया।
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मुम्बई जाने वाली ट्रेन केँ उस जनरलकोच मे भीड़ तौ इतनी नहि थि लेकिन नाम तोँ जनरल हि थां। कोई किसी कों भि बैठने केँ लिएसीट देने कों रेडी नहि थां। कुछलोग ऐसे भि होते हें जोँ ज़बरदस्ती लड़ झगड़कर अपने बैठने केँ लिएसीट कां जुगाड़ कर हि लेते हें। यहाॅ प्रेम इज्जत याँ अनुनय विनय करने वाले कों कोईसीट नहि देता औऱ नाँ हि सीट केँ ज़रा सें भि हिस्से मे कोई बैठने देता हैं। जनरलकोच मे तौ ऐसा हैं कि अगर आप् गाली गलौच याँ लड़ना जानते हें याँ फिन जल्दी हि किसी भि ब्यक्ति पर्र हावी हौ जानां जानते हें तोँ बेहतर हैं। क्योंकि उससे आपको जल्द हि कहीं नं कहींसीट मिल जाती हैं बैठने केँ लिए। मगर उसमें भि शर्तयह होती हैं कि आपकेपास अपनी सुरक्षा केँ लिए अपनेसंग कुछ लोगों कां बैकप होना ज़रूरी हैं वरनाअगर आप् अकेले हें औऱ अकेले हि तोपसिंह बनने कि कोशिश कररहे हें तौ समझिये आपका बुरीतरह पिट जानां तय हैं।
अभय सिंह गर्म मिज़ाज कां व्यक्ति थां। उसेकब किसबात पऱ गुस्सा आँ जाएयह बात वोँ स्वयं हि आज तक जान नहि पाया थां। मगरआज उस पर्र कोई गुस्सा हावी नं हुआ थां। उसनेसीट केँ लिए किसी सें कुछ नहि कहा थां, बल्कि हाॅथ मे एक् छोटा सां थैलालिए वो दरवाजे केँ पास हि एक् तरफकभी खड़ा हौ जाता तोँ कभी वहीं पऱ बैठ जाता। सारीरात ऐसे हि निकल गई थि उसकी।
ट्रेन अपने नियमित वक़्त सें चार घंटेलेट थि। यह तौ भारतीय रेलवे कि कोईनई बात नहि थि लेकिन इस सबसे यात्रियों कों जोँ तकलीफ़ होती हैं उसकाकोई कुछ नहि कर सकता, यह एक् सबसे बड़ी समस्या हैं। यद्यपि अभय कों वक्त कां आभास हि इतना नहि हुआ थां क्योंकि वोँ तौ अपने परिवार औऱ अपने पत्नि बच्चों केँ बारे मे हि सोचता रहा थां। रहरहकर उसकेमन मे यह विचार उठता कि उसने अपनी देवी समान भाभी केँ संग अच्छा नहि किया। उसे अपने भतीजे कां भि ख़याल आता कि केसे वो उसे हमेशा इज्जत व सम्मान देता थां। परिवार मे वही एक् लड़का थां जिस पर्र संस्कार औऱ शिष्टाचार कूटकूट करभरे हुए थें। उसे अपनेइस भतीजे पऱ बड़ा स्नेह औऱ फक्र भि होता थां। उसकी भतीजी निधि उसकी लाडली थि। वो परिवार मे सबसे अधिक निधि कों हि प्रेम औऱ स्नेह देता थां। सभी जानते थें कि अभय गुस्सैल स्वभाव कां थां लेकिन उसका क्रोध कपूर कि तरहउस वक़्त काफूर हौ जाताजब उसकी लाडली भतीजी अपनी चंचलव नटखट बातों सें उसे पहले तौ मनाती फिन स्वयं हि रूठ जाती उससे। उसका अपनी किसी भि बात केँ अंत मे 'हाॅ नहि तोँ' जोड़ देना इतना मधुर औऱ हृदय कों छू लेने वाला होता कि अभय कां सारा क्रोध समय मे दूर होँ जाता औऱ वो अपनी लाडली भतीजी कों खूब प्रेम करता। परिवार कि बाॅकी दो भतीजियाॅ उसकेपास नहि आती थि, क्यूं कि वोँ सभी उससे डरती थि।
अभय कां दिलो दिमाग़ गुज़री हुई बातों कों सोचसोच कर बुरीतरह दुखी होता औऱ उसकी आॅखें भर आतीं। वो अपनेमन मे कईतरह केँ संकल्प लेताहुआ स्वयं केँ मन कों हल्का करने कि कोशिश करतारहा थां।
आख़िर वो टाइम भि आँ हि गय़ा जब ट्रेन मुम्बई केँ कुर्ला स्टेशन पऱ पहुॅची। अभय अपनी सोचों केँ अथाह समुद्र सें बाहर् आया औऱ उठकरगेट कि तरफचल दिया। बहुत भीड़ थि अंदर, लोग जल्द सें जल्द नीचे उतरने केँ लिए जैसेमरे जारहे थें। अभय स्वयं भि लोगों केँ बीच धक्के खातेहुए गेट कि तरफ आँ रहा थां। हलाॅकि खड़ा वो गेट केँ थोडा पास हि थां लेकिन वो इसका क्याँ करता कि पीछे सें आॅधी तूफान बनकरआते हुएलोग बारबार उसे पीछे धकेलकर स्वयं आगे निकल जाते थें। वो बेचारा बेज़ुबान सां होँ गय़ा थां। कदाचित् उसकी मानसिक स्थित उससमय ऐसी नहि थि कि वो लोगों केँ द्वारा स्वयं कों बारबार पीछे धकेल दिये जाने पर्र कोई प्रतिक्रिया करसके।
कुछदेर बाद आख़िर वो गेट केँ पास पहुॅचा औऱ ट्रेन सें नीचेउतर गय़ा। प्लेटफार्म पर्र व्यक्ति हि व्यक्ति नज़रआए उसे। उसे समझ न् आया कि किसतरफ जाए? इतने बड़े मुम्बई शहर मे वो अपनी भाभीव उनके दोनो बच्चों कों कहाॅ औऱ केसे ढूॅढ़ेगा? उसका तोँ स्वयं कां कहीं ठिकाना नहि थां। उसेअब महसूस हुआ कि वोँ कितना असहाय औऱ थकाहुआ लगरहा हैं। भूख औऱ प्यास नें जैसेउस पऱ अब अपनाअसर दिखाना शुरुआत कर दिया थां। वो अपनेसंग खाने पीने कि कोई चीज़ लेकर नहि चला थां। कल अपने साथी केँ घऱ सें खाकर हि चला थां। हलाॅकि इतने बड़ेसफर केँ लिए उसके मित्र कि पत्नि नें खाने कां एक् टिफिन सजधजकर कर दिया थां लेकिन अभय नें जाने क्याँ सोचकर मनाकर दिया थां।
ट्रेन सें उतरकर अभय नें उसीतरफ चलने केँ लिए अपनेकदम बढ़ाए जिसतरफ सारेलोग जारहे थें। अभि वो कुछकदम हि चला थां कि एक् कुली उसकेपास आया औऱ उसके अत्यंत निकटआकर बड़े हि रहस्यमय लेकिन संतुलित स्वर मे बोला__"साहब जी! आपके भतीजे विराज जी आपको लाने केँ लिए हमें भेजे हें। कृपया आप् मेरेसंग जल्द चलें। "
अभय सिंह कों पहले तौ कुछसमझ नं आयाफिन जब उसके विवेक नें काम किया तौ कुली कि इसबात कों समझकर वो बुरीतरह चौंका। उसके चेहरे पऱ अविश्वास केँ भावनाच उठे। उसकेमुख सें हैरत मे डूबाहुआ स्वर निकला__"क् कौन होँ तुम्? औऱ कहाॅ हैं मेरा भतीजा?"
"साहबजी अभि आप् अधिककुछ न् बोलिए। " उस कुली नें कहा__"बस मेरेसंग चलिए औऱ अपनायह बैग मुझे दीजिए। औऱ हाॅ, आप् चेहरे सें ऐसा हि दर्शाइये जैसे आप् अपना सामान कुली कों देकर उसकेसंग बाहर् जारहे हें। इधरउधर कहींमत देखिएगा। "
"अरे.ऐसे केसे भइया?"अभय कों कुछसमझ नहि आँ रहा थां कि यह क्याँ हौ रहा हैं उसके संग__"कौन हौ तुम् औऱ यहसभी क्याँ हैं?"
"ओह साहबजी समझने कि कोशिश कीजिए। " कुली नें चिन्तित स्वर मे कहा__"यहाॅ पर्र ख़तरा हैं आपकेलिए। इसलिए जल्द सें चलिए मेरेसंग। स्टेशन सें बाहर् आपके भतीजे विराज जी आपकी इंतज़ार कररहे हें। "
अभय केँ दिलो दिमाग़ मे झनाका सां हुआ। एकाएक हि उसके दिमाग़ कि बत्ती जलउठी। उसकेमन मे विचार उठा कि यह व्यक्ति मुझे जानता हैं औऱ मेरेलिए हि आया हैं, वरना दूसरे किसी व्यक्ति कों यहसभी भला केसेपता होता? दूसरी बातयह विराज कां नाम लें रहा हैं औऱ कहरहा हैं कि मेरा भतीजा स्टेशन सें बाहर् मेरी इंतजार कररहा हैं। मगर ख़तरा किसबात कां हैं यहाॅ??
अभय कों पूरा मामला तोँ समझ न् आया लेकिन उसने इतना ज़रूर किया कि अपनाबैग उस कुली कों दे दिया। कुली उसकाबैग लेकर जल्दी हि पलटा औऱ स्टेशन केँ बाहर् कि तरफचल दिया। उसके पीछे पीछेअभय भि चल दिया। दिमाग़ मे कईतरह केँ विचारों कां अंधड़ सां मचाहुआ थां उसके।
स्टेशन सें बाहर् आकर वोँ कुलीअभय कों लिए एक् टेक्सी केँ पास पहुॅचा। कैब केँ अंदरबैग रखकर कुली नें अभय कों कैब केँ अंदर बैठने कों कहा। मगर अभय नं बैठा, उसने सशंकभाव सें देखा कुली कि तरफ। तब कुली नें एक् तरफ हाॅथ कां इशारा किया। अभय नें उसतरफ देखा तोँ चौंक गय़ा, क्योंकि जिसतरफ कुली नें इशारा किया थां उसतरफ उसका भतीजा विराज खड़ा थां। विराज नें दूर सें हि कैब मे बैठ जाने केँ लिए इशारा किया।
अभय अपने भतीजे कों देखखुश होँ गय़ा औऱ उसने राहत कि सासू भि ली। वो जल्द हि कैब मे बैठ गय़ा। कैब केँ अंदरचार व्यक्ति थें। अभय केँ बैठते हि कैब जल्दी आगेबढ़ गई। अभय कों ऐसा प्रतीत हुआ जैसेयह सभी पहले सें हि प्लान बनाया हुआ थां। लेकिन उसेयह समझ न् आया कि इस सबकी क्याँ ज़रूरत थि? आख़िर यह क्याँ चक्कर हैं?
"तुम् सभीलोग कौन हौ भइया?"कैब केँ कुछदूर जाते हि अभय नें पूछा__"औऱ यहसभी क्याँ चक्कर हैं? मेरा मतलब हैं कि मुझेइस तरह रहस्यमय तरीके सें क्यूं लेँ जायाजा रहा हैं?"
"साहबजी यह तोँ हम् भि नहि जानते कि क्याँ चक्कर हैं?" कुलीबने शंकर नें कहा__"हम् तोँ वहीकर रहे हें जोँ करने केँ लिए विराज साहब नें हमे आदेश दिया थां। "
अभययह सुनकर मन हि मन चौंका कि यह विराज कों साहब क्यूं कहरहा हैं? लेकिन फिन प्रत्यक्ष मे बोला__"ओह, तोँ अभि हम् कहाॅचल रहे हें? औऱ मेरा भतीजा विराज कहाॅ गय़ा? वोँ इसकैब मे क्यूं नहि आया?"
"वोँ अपनी वाहन मे हें साहबजी। " शंकर नें कहा__"वोँ हमेंआगे एक् स्थान मिलेंगे। "
"अ अपनी.क.गाड़ी मे?" अभय करीबउछल हि पड़ा थां। उसेइस बात नें उछाल दिया कि उसके भतीजे केँ पास वाहन कहाॅ सें आँ गई? वो तौ स्वयं भि यहीसमझ रहा थां कि विराज कोई मामूली सां काम करता होगा यहाॅ।
"जी साहबजी। " उधरअभय केँ मनोभावों सें अंजान शंकर नें कहा__"आगे एक् स्थान पऱ हमें विराज साहबमिल जाएॅगे। फिन आपको उनकेसंग उनकी वाहन मे बैठाकर हम् इसकैब कों वापसकर देंगे जहाॅ सें लाए थें। "
"क्याँ मतलब?"अभय चौंका, झटके पऱ झटके खातेहुए पूछा__"कहाॅ सें लाए थें इसे? क्याँ यहकैब तुम्हारी नहि हैं?"
"नहि साहबजी, यहकैब तौ हमने किराए पऱ ली थि। " शंकर नें कहा__"विराज साहब नें ऐसा हि कहा थां। बाॅकी सारी बातें वही बताएॅगे आपको। "
अभय उसकीबात सुनकर चुपरह गय़ा। उसेसमझ मे आँ चुका थां कि सारी बातें विराज सें हि पता चलेंगी। क्योंकि इन्हें अधिककुछ पता नहि हैं। शायद विराज नें इन्हें नहि बताया थां। पर्र यहलोग विराज कों साहब क्यूं कहरहे हें? क्याँ वोँ इन लोगों कां साहब हैं? अभय कां दिमाग़ जैसेजाम सां होँ गय़ा थां।
अभय कों यहबात हजम नहि हौ रही थि। मगर उसनेफिन कुछ न् कहा। कैब तेज़ रफ्तार सें कई सारे रास्तों मे इधरउधर चलतीरही। कुछ हि देर मे कैब एक् स्थान पहुॅच कररुक गई। कैब केँ रुकते हि शंकर नीचे उतरा औऱ पीछे कां गेटखोल करअभय कों उतरने कां संकेत दिया। अभय उसके संकेत पर्र कैब सें उतरआया। अभि वो कैब सें उतरकर ज़मीन पर्र खड़ा हि हुआ थां कि तभी।
"प्रणाम चाचा जी। "अभय केँ उतरते हि एक् तरफ सें आकर विराज नें अभय केँ पेर छूकर कहा__"क्षमा कीजिएगा आपकोइस तरह यहाॅ लाना पड़ा। "
"अरे राज तुम्?? सदा हि खुशरहो। " अभय नें कहा औऱ एकाएक हि भावना मे बहकर उसने विराज कों अपनेगले सें लगा लिया, फिन बोला__"आँ मेरेगले लगजा मेराशेर पुत्तर। कदाचित् मेरेदिल कों ठंडकमिल जाए। "
अभय कि आॅखों मे आॅसूछलक आए थें। उसने बड़े ज़ोर सें विराज कों भींच लिया थां। विराज कों भि आज अपने चाचा जी केँ इसतरह गले लगने सें बड़ाचैन मिलरहा थां। आज मुद्दतों बादकोई अपनाइस तरह मिला थां। शिकवे गिले तौ बहोत थें मगरसभी कुछभूल गय़ा थां विराज। कुछदेर ऐसे हि दोनोगले मिलेरहे। फिनअलग हुए। अभय अपने दोनो हाॅथों सें विराज कां खूबसूरत सां चेहरा सहलाकर उसके जिस्म केँ बाॅकी हिस्सों कों देखने लगा।
"कितना दुबला हौ गय़ा हैं मेरा बेटा। " अभय नें भर्राए स्वर मे कहा__"पगले अपनाठीक सें ख़याल क्यूं नहि रखता हैं तुँ? औऱ भ भाभी कैसी हें.औऱ.औऱ वोँ मेरी लाडली गुड़िया कैसी हैं.बता मुझे??"
"सभी लोग एकदमठीक हें चाचा जी। " विराज नें कहा__"चलिए हम् वहीं चलते हें। "
"हाॅहाॅ चलराज। " अभय नें जल्दी हि कहा__"मुझे जल्द सें लेँ चल उनकेपास। मुझे भाभी केँ पास लें चल.मुझे उनसे.। "
वाक्य अधूरा रह गय़ा अभय सिंह कां.क्यूं कि दिलो दिमाग़ मे एकाएक हि तीब्रता सें जज्बातों कां उबाल सां आँ गय़ा थां। जिसकी वजह सें उसकागला भारी हौ गय़ा औऱ उसकेमुख सें अल्फाज़ न् निकलसके।
विराज अपनेसंग अभय कों लिएकुछ हि दूरी पर्र खड़ी अपनी वाहन केँ पास पहुॅचा। फिन उसने गाड़ी कां दूसरी तरफ वालागेट खोलकर अंदरअभय कों बैठाया। इसबीच शंकर नें अभय कां बैग विराज कि गाड़ी केँ अंदररख दिया थां। विराज स्वयं ड्राइविंग डोरखोल कर ड्राइविंग शीट पर्र बैठ गय़ा। खिड़की केँ पास आँ गए शंकर सें उसने कहा__"उस कैब कों वापसकर देना। औऱ यह पैसे रामू कों दे देना, औऱ यह तुम् सभी केँ लिए। "
विराज नें गाड़ी मे हि रखे एक् छोटे सें ब्रीफकेस कों खोलकर उसमे सें दो हज़ार केँ नोटों कि एक् गड्डी शंकर कों पकड़ाया थां जोँ रामू कि बेटी केँ इलाज़ केँ लिए थां बाॅकी अलग सें दोसौ केँ नोटों कि एक् गड्डी उन चारों केँ लिए। पैसे लेकर चारो हि खुशी खुशी वहाॅ सें चलेगए।
विराज नें वाहन स्टार्ट कि औऱ आगेचल दिया। अभय यहसभी देखकर हैरान भि थां औऱ खुश भि।
"यहसभी क्याँ चक्कर थां राज?"अभय नें पूछा__"उन लोगों नें बताया कि यहसभी करने केँ लिए उन्हें तुमने कहा थां, मगरइस सबकी क्याँ ज़रूरत थि भला?"
"ऐसा करना ज़रूरी थां चाचा जी। " विराज नें ड्राइविंग करतेहुए कहा__"क्योंकि आपके पीछेकुछ ऐसे व्यक्ति लगे थें जोँ आपकी निगरानी केँ लिए लगाएगए थें, बड़े पिताजी जी केँ द्वारा। "
"क क्याँ मतलब??"अभय बुरीतरह चौंका थां, बोला__"बड़े भाई नें अपने व्यक्ति मेरे पीछेलगा रखे थें? मगर क्यूं औऱ केसे? औऱ.औऱ तुम्हारी तरफ केसेपता यहसभी?"
"मुझे सबकापता रहता हैं चाचा जी। " विराज नें कहा__"वक़्त औऱ हालात नें सभीकुछ सिखा दिया हैं आपकेइस बेटे कों। कलजब आप् गाॅव सें चले थें तब आपके वहाॅ सें चलने कि सूचना मुझे मेरे एक् यार नें मोबाइल पऱ दि थि। उसने बताया थां कि हवेली मे कुछ बातचीत हौ गई थि औऱ आप् हम् लोगों सें मिलने केँ लिए मुम्बई निकल चुके हें। उसनेयह भि बताया कि आपके पीछे बड़े पिताजी नें अपने व्यक्ति भि लगा दिये हें जोँ यहीं मुम्बई मे हमारी खोज मे नं जानेकब सें मौजूद थें। "
"ओह तौ भाई नें ऐसा भि कर दिया मेरे पीछे?"अभय कां चेहरा एकाएक सुलगता सां प्रतीत हुआ__"खैर कोईबात नहि, उनसे उम्मींद भि क्याँ कि जा सकती हैं? ख़ैर, तौ तुम्हें इस सबकी जानकारी तुम्हारे मित्र नें दि थि मोबाइल केँ माध्यम सें?"
"जी चाचा जी। " विराज नें कहा__"मुझे लगा कहीं आप् पऱ किसी प्रकार कां कोई ख़तरा न् होँ इसलिए मैनेऐसा किया। मे स्वयं स्टेशन केँ अंदर नहि गय़ा क्योंकि संभव हैं बड़े बापू केँ आदमियों कि नज़रमुझ पर्र पड़ जाती, उसकेबाद उनकेलिए हरकाम आसान होँ जाता। इस लिए मैंने उन सबसे बचने कां यह उपाय किया। कुली केँ वेश मे मेरे व्यक्ति आपको सुरक्षित स्टेशन सें बाहर् लेँ आएॅगे। उसकेबाद आपकोकैब मे बैठाकर मेरे व्यक्ति शहर मे तब तक इधरउधर सड़कों मे घूमते जब तक कि उन्हें यह एहसास नं होँ जाए कि किसी केँ द्वारा उनका पीछाअब नहि कियाजा रहा हैं। कहने कां मतलबयह कि अगर बड़े पिताजी केँ व्यक्ति किसीतरह आपकोदेख लियेहों औऱ आपका पीछा करनेलगे हों तोँ मेरे व्यक्ति कैब कों तेज़ रफ्तार मे इधरउधर घुमाकर उन आदमियों कों गोलीदे देंगे। उसकेबाद मेरे व्यक्ति सीधा वहाॅ आँ जाते जहाॅ पऱ मैंने उन्हें अपनेपास आने कों बोला थां। यहाॅ सें मे आपको अपनी गाड़ी मे बैठाकर लें जाता। बड़े बापू केँ व्यक्ति ढूॅढ़ते हि रह जातेउस कैब कों। "
"ओह तौ यह प्लान थां तुम्हारा?" अभययह सोचसोच कर हैरान थां कि उसका इतना संस्कारी औऱ भोला भाला भतीजा आज इतनाकुछ सोचने लगा हैं, बोला__"बहोत अच्छा किया तुमने राज। मे तुम्हारी इस समझदारी सें बहोत खुशहूॅ। " अभयकुछ लम्हा रुका औऱ फिन एकाएक हि उसके चेहरे पऱ दुख केँ भाव आँ गए, बोला__" कितना ग़लत थां मे.अपने गुस्स औऱ अविवेक केँ कारणकभी नहि सोचसका कि वास्तव मे क्याँ सही थां क्याँ ग़लत? अपने देवता जैसे विजय भाई औऱ देवी जैसी अपनी गौरी भाभी पऱ शक किया औऱ उनसेयह भि नं जानने कि कोशिश कि कभी कि उन पर्र लगाएगए आरोपसच भि हें याँ यहसभी आरोप किसी साजिश केँ तहतउन पर्र थोपेगए थें? राज बेटे, अपने देवी देवता जैसे भईया भाभी केँ संग मैनेयह अच्छा नहि किया। ईश्वर मुझेइस सबकेलिए कभी क्षमा नहि करेगा। "
यह कहने केँ संग हि अभय कि आवाज़ भर्रा गई। उसका चेहरा दुख औऱ ग्लानिवश बिगड़ गय़ा। उसकी आॅखों सें आॅसूबह चले। विराज अपने चाचा जी केँ इसरूप कों देखकर स्वयं भि दुखी होँ गय़ा थां। वो जानता थां कि उसके चाचा चाची कां कहींकोई दोष नहि थां। उनका अपराध तौ केवल इतना थां कि उन्हें जौ कुछ बताया औऱ दिखाया गय़ा थां उसी कों उन्होंने सचमान लिया थां। अपने गुस्स कि वजह सें चाचा नें कभीयह जानने कि कोशिश हि नहि कि थि कि सच्चाई वास्तव मे क्याँ थि?
खैरकुछ हि वक़्त मे विराज अपनेघऱ पहुॅच गय़ा। एक् बड़े सें मेनगेट पऱ दो गार्ड खड़े थें। विराज कि वाहन देखते हि दोनो गार्ड्स नें मेनगेट खोला। उसकेबाद विराज नें गाड़ी कों अंदर कि तरफ बढ़ा दिया। लम्बे चौड़े लान सें चलतेहुए उसकी गाड़ी पोर्च मे आकर खड़ी हौ गई। दोनो चाचा भतीजा अपनी अपनीतरफ कां गुटखोल कर नीचे उतरे। अभय कि नज़रजब सामने बड़े सें बॅगला टाइपघऱ पर्र पड़ी तोँ वो आश्चर्यचकित सां होकर देखने लगाउसे। इधरउधर दृष्टि घुमाकर देखने लगाहर चीज़ों कों।
"राज बेटा यह कहाॅ आँ गए हम्?" अभय नें अजीबभाव सें पूॅछा__"यह तोँ किसी बहोत हि बड़े व्यक्ति कां बॅगला लगता हैं। "
"आपने बिलकुल सहीकहा चाचा जीयह किसी बहोत बड़े व्यक्ति कां हि बॅगला हैं मगर। " विराज नें कहा__"मगर अबयह बॅगला औऱ यहसभी प्रापर्टी आपकेइस राज बेटे कि हि हैं। "
"क् क्याऽऽ?????" अभय बुरीतरह चौंका थां। आश्चर्य औऱ अविश्वास सें उसकामुह खुला कां खुलारह गय़ा, बोला__"यह यहसभी तेरा हैं?? मगरयह सभी तेरा केसे होँ गय़ा राज? क्याँ तुँ सचकहरहा हैं?"
"चलिए अंदर चलते हें। " विराज नें हल्के सें मुस्कुरा करकहा__" माॅ औऱ गुड़िया आपका इन्तज़ार कररही हें। "
अभय विराज कि इसबात पऱ उसकेसंग बॅगले केँ अंदर कि तरफ बढ़ा हि थां कि कोई तेज़ी सें आया औऱ एक् झटके सें उससे लिपट गय़ा। अभयइस सबसे पहले तोँ हड़बड़ाया फिनजब उसकी नज़र लिपटने वाले पर्र पड़ी तौ अनायास हि मुस्कुरा उठा वो।
"अरेयह तौ मेरी लाडली गुड़िया हैं। " अभय नें निधि केँ सिर पऱ स्नेह सें हाथ फेरते हुए कहा__"राज, यह मेरी गुड़िया हैं, यह.। "
अभय कां गलाभर आया, उसके जज्बात उसके काबू मे नं रहे। उसने निधि कों अपने सें छुपका लिया औऱ रो पड़ा वो। उसेइस ख़याल नें बुरीतरह रुला दिया कि आज मुद्दतों केँ बाद उसने अपनी गुड़िया पऱ अपना प्रेम लुटाने कों मिला हैं। इसके पहले तौ वो जैसे पत्थर कां बन गय़ा थां। उसके दिलो दिमाग़ मे इन सबकेलिए गुस्स औऱ घृणाभर दि गई थि। पहलेजब उसकी भाभी औऱ गुड़िया खेतों पऱ बने घर-मकान केँ एक् कमरे मे रहतीथीं तोँ वो किसी किसीदिन जाता थां मगरफिन जैसे हि उसेउस सबका ख़याल आता वैसे हि उसकामन गुस्स औऱ गुस्से सें भर जाता औऱ वो पत्थर कां बनकर वापसचला आता। अपनी लाडली कों प्रेम व स्नेह देने केँ लिए वो बेचैनी जातामगर आगे बढ़ने सें हमेशा हि स्वयं कों रोंक लेता थां वो।
"आप् आँ गए नं चाचू" निधि नें रोतेहुए कहा__"मे जानती थि कि आप् मेरे बिना अधिकदिन नहि रह सकेंगे वहाॅ पर्र। मगरआने मे इतनीदेर क्यूं कर दि आपने? जाइये आपसेबात नहि करना मुझे, हाॅ नहि तौ। "
यहकहकर निधि अपने चाचू सें अलग हौ गई औऱ रूठकर एक् तरफ कों मुहकर लिया। अभय कों लगा कि उसका हृदयफट जाएगा। अपनी गुड़िया केँ मुख सें बसयही सुनने केँ लिए तौ तरस गय़ा थां वो। 'हाॅ नहि तोँ' जानेइन शब्दों मे ऐसा क्याँ थां कि सुनकर अभय कों लगा कि इन शब्दों कों सुनने केँ बादइस समयअगर उसे मृत्यु भि आँ जाए तौ उसेकोई ग़म न् होगा।
"तूँ रूठ जाएगी तोँ मे समझूॅगा कि मुझसे यह सारा संसार रूठ गय़ा मेरी बच्ची। " अभय नें प्यास कर कहा__"यहाॅ तक कि वोँ भगवान भि। औऱ फिन उसकेबाद मेरेलिए एक् समय भि जीने कां कोई मतलब नहि रह जाएगा। "
"नं नहि चाचू नहि। " निधि जल्दी हि अभय सें लिपट गई। उसकी आॅखों सें आॅसूबह चले। रोतेहुए बोलीं__"प्लीज ऐसामत कहिए। आप् तौ मेरे सबसे अच्छे चाचू हें। मे आपसे नाराज़ नहि हूॅ। औऱ हाॅआज केँ बादऐसा कभीमत बोलियेगा नहि तोँ सच मे मे आपसेबात नहि करूॅगी, हाॅ नहि तौ। "
जाने कितनी हि देर तक अभय अपनी लाडली कों स्नेह औऱ प्रेम केँ वशीभूत हुए स्वयं सें छुपकाए रहा। उसकेसिर पऱ प्रेम सें हाॅथ फेरता रहा। विराज यहसभी नम आॅखों सें देखता रहा।
"अगर अपनी लाडली भतीजी सें मिलना जुलना होँ गय़ा हौ तौ अपनी भाभी सें भि मिललो अभय। " सहसा गौरी कि यह आवाज़ गूॅजी थि वहाॅ। वो बहुतदेर सें बॅगले केँ मुख्य दरवाजे पऱ खड़ीयह सभीदेख रही थि। उसकी आॅखों मे भि आॅसू थें।
गौरी कि इस आवाज़ कों सुनकर अभय औऱ निधि एक् दूसरे सें अलगहुए। अभय नें पलटकर गौरी कि तरफ देखा। जौ उसी कि तरफ करुणभाव सें देखरही थि। उसकी आॅखों मे अपनेलिए वहीआदर वही स्नेह देखकर अभय कां दिलो दिमाग़ अपराध बोझ सें भर गय़ा। उसे स्वयं पर्र इतनी लज्जा औऱ ग्लानी महसूस हुइ कि उसेलगा यह धरतीफटे औऱ वो उसमें रसातल तक समाता चलाजाए। दिलो दिमाग़ मे भावनाओं कां तेज़ तूफान चलनेलगा। हृदय कि गति तीब्र हौ गई। उसे अपनी स्थान पर्र खड़े रहना मुश्किल सां प्रतीत होनेलगा।
बड़ी मुश्किल सें उसने स्वयं कों सम्हाला औऱ नयनों मे नीरभरे वो तेज़ी सें गौरी कि तरफ बढ़ा। गौरी केँ पास पहुॅचते हि वो अपनी देवी समान भाभी केँ पैरों मे करीब-करीब लोट सां गय़ा। उसके जज्बात उसके काबू सें बाहर् हौ गए। फूट फूटकर रो पड़ा वो। मुह सें कोई वाक्य नहि निकलरहे थें उसके।
अपने पुत्र समान देवरु कों इसतरह बच्चों कि तरह रोतेदेख गौरी कां हृदय हाहाकार करउठा। वो जल्द सें नीचे झुकी औऱ अभय कों उसके दोनो कंधों सें पकड़कर बड़ी मुश्किल सें उठाया उसने। अभय उससे नज़र नहि मिलापा रहा थां। उसका समूचा चेहरा आॅसुओं सें तर थां।
"अरेऐसे क्यूं रहे होँ पागल?" गौरी स्वयं भि रोतेहुए बोलि__"चुप हौ जाओ। तुम् जानते होँ कि मैने हमेशा तुम्हें अपने बेटे कि तरह समझा हैं। इसलिए तुम्हें इसतरह रोतेहुए नहि देख सकती। चुप हौ जाओअभय। अब बिलकुल भि नहि रोना। "
यह कहकर गौरी नें अभय कों अपने सीने सें लगा लिया। अपनी भाभी कि ममताभरी इन बातों सें अभय औऱ भि सिसक सिसककर रो पड़ा। उसकी आत्मा चीखचीख कर जैसे उससेकह रही थि 'देख लें अभयजिस देवी समान भाभी पर्र तूनेशक किया थां औऱ उनकेऊपर लगाएगए आरोपों कों सचसमझ कर उनसेमुह मोड़ लिया थां, आजवही देवी समान भाभी तुम्हें अपने बेटे कि तरह प्रेम व स्नेह देकर अपने सीने सें लगारखी हैं। उसकेमन मे लेश केवल भि यह ख़याल नहि हैं कि तुमने उनके औऱ उनके बच्चों सें किसतरह मुह मोड़ लिया थां?'
अभय अपनी आत्मा कि इन बातों सें बहोत अधिक दुखी होँ गय़ा। उसे स्वयं सें बेहद घृणा सि होनेलगी थि।
"मुझेइस प्रकार अपने ममता केँ आचल मे मत छुपाइये भाभी। "अभय गौरी सें अलग होकर बोला__"मे इस लायक नहि हूॅ। मे तौ वोँ पापीहूॅ जिसके अपराधों केँ लिएकोई माफ़ नहि हैं। अगरकुछ हैं तोँ केवल सज़ा। हाॅ भाभी.मुझे सज़ा दीजिए। मे आप् सबका गुनहगार हूॅ। "
"यह कैसी पागलपन भरी बातें कररहे हौ अभय?" गौरी नें दोनो हाॅथों केँ बीचअभय कां चेहरा लेकर कहा__"किसने कहा तुमसे कि तुमने कोई अपराध किया हैं? अरे पगले, मैंने तोँ कभीयह समझा हि नहि कि तुमने कोई अपराध किया हैं। औऱ जब मैनेऐसा कुछ समझा हि नहि तोँ माफ़किस बात केँ लिए?हाॅ यहदुख ज़रूर होता थां कि जिसअभय कों मे अपने बेटे कि तरह मानती थि वो जाने क्यूं अपनी भाभीमाॅ सें अब मिलने नहि आता? क्याँ उसकी भाभीमाॅ इतनी बुरीबन गई थि कि वोँ अब मुझसे बात करने कि तोँ बात हि दूर बल्कि नज़र भि नाँ मिलाए?"
"इसीलिए तोँ कहरहा हूॅ भाभी। "अभय रो पड़ा__"इसी लिए तौ.कि मे अपराधी हूॅ। मेरायह अपराध माफ़ केँ लायक नहि हैं। मुझे इसकेलिए सज़ा दीजिए। "
"मैंने तुम्हें हमेशा अपना बेटा हि समझा हैं अभय। " गौरी नें अभय कि आॅखों सें आॅसू पोंछते हुए कहा__"इस लिएमाॅ अपने बेटे कि किसी ग़लती कों ग़लती नहि मानती। बल्कि वो तौ उसे नादान समझकर प्रेम व स्नेह हि करने लगती हैं। चलो, अब अंदरचलो। "
गौरी नें यहकहअभय कों उसके कंधों सें पकड़कर अंदर कि तरफचल दि। उसके पीछे विराज औऱ निधि भि अपनी अपनी आॅखों सें आॅसू पोंछकर चल दिये।
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"तुम् लोगसभी केँ सभी एक् नम्बर केँ निकम्मे होँ। " उधर हवेली मे अजय सिंह मोबाइल पऱ दहाड़ते हुएकह रहा थां__"किसी काम केँ नहि होँ तुम् लोग। पिछले एक् महीने सें तुम् लोग वहाॅ पऱ सिर्फ मेरे रुपयों पऱ ऐश फरमारहे हौ। एक् अदना सां काम सौंपा थां तुम् लोगों कों औऱ वो भि तुम् लोगों सें नहि हुआ। हर बार अपनी नाकामी कि दास्तान सुना देते हौ तुम् लोग। "
".। " उधर सें कुछकहा गय़ा।
"कोई ज़रूरत नहि हैं। " अजय सिंह गस्से मे गरजते हुए बोला__"तुम् लोगों केँ बस कां कुछ नहि हैं। इसलिए जल्दी चलेआओ वहाॅ सें। "
यहकहकर अजय सिंह नें मारे गुस्से केँ लैंड लाइन मोबाइल केँ रिसीवर कों केड्रिल पऱ करीब-करीब पटक सां दिया थां। उसकेबाद ड्राइंगरूम केँ फर्स पऱ बिछे कीमती कालीन कों रौंदते हुएआकर वो वहीं सोफे पऱ धम्म सें बैठ गय़ा।
सामने केँ सोफे पऱ बैठी प्रतिमा गुस्स औऱ गुस्से मे उबलते अपने पति कों एकटक देखती रही। इस वक़्त कुछ भि बोलने कि हिम्मत नहि हुई थि उसमे। जबकि अजय सिंह कां चेहरा गुस्से मे तमतमाया हुआलाल सुर्ख पड़ गय़ा थां। कुछसमय शून्य मे घूरते हुए वो लम्बी लम्बी साॅसें लेतारहा। उसकेबाद उसनेकोट कि जेब सें सिगारकेस निकाला औऱ उससे एक् सिगार निकाल कर होठों केँ बीचदबा करउसे लाइटर सें सुलगाया। दोचार लम्बे लम्बे कश लेने केँ बाद उसने उसके गाढ़े सें धुएॅ कों अपनेनाक औऱ मुह सें निकाला।
"तुझेही तौ कुत्ते सें भि बदतरमौत दूॅगा हरामज़ादे। " सहसा वो दाॅत पीसते हुएकह उठा__"बस एक् बार मेरे हाॅथलग जा तूँ। उसकेबाद देख कि क्याँ हस्र करताहूॅ तेरा?"
"क्याँ बात हैं अजय?" प्रतिमा नें सहसा मौके कि नज़ाक़त कों देखकर पूछा__"मोबाइल पर्र क्याँ बातें बताई तुम्हारे आदमियों नें?"
"सबकेसभी हरामज़ादे निकम्मे हें। " अजय सिंह कुढ़ते हुए बोला__"आने दो सालों कों एक् लाइन सें खड़ा करके गोली मारूॅगा मे"
"अरे पर्र बात क्याँ हुई अजय?" प्रतिमा चौंकी थि__"तुम् इतना गुस्से मे क्यूं पगलाए जारहे हौ?"
"तोँ क्याँ करूॅ मे?" अजय सिंह जैसे बिफर हि पड़ा, बोला__"अपने आदमियों कि एक् औऱ नाकामी कि बातसुन कर क्याँ मे कत्थक करनेलग जाऊॅ?"
"एक् औऱ नाकामी???" प्रतिमा उछल सि पड़ी थि, बोलि__"यह क्याँ कहरहे हौ तुम्?"
"हाॅ प्रतिमा। " अजय सिंह बोला__"मोबाइल पर्र मेरे आदमियों नें बताया कि अभय उन्हें गच्चा दे गय़ा। "
"गच्चा दे गय़ा??" प्रतिमा नें नां समझने वालेभाव सें कहा__"इसका क्याँ मतलबहुआ?"
"मेरे आदमियों केँ अनुसार। " अजय सिंह नें कहा__"अभय उन्हें ट्रेन सें उतरते हुए दिखा। उसकेबाद वो किसी कुली कों अपनाबैग देकर उसकेसंग स्टेशन केँ बाहर् चला गय़ा। बाहर् आकर वो एक् कैब मे बैठा औऱ वहाॅ सें आगेबढ़ गय़ा। मेरे व्यक्ति भि उसकैब केँ पीछेलग गए। मगर उसकेबाद वोँ कैब अचानक हि कहीं गायब होँ गई। मेरेउन आदमियों नें उसकैब कों बहोत ढूॅढ़ा मगर कहीं उसकापता नहि चलसका। "
"यह तौ बड़ी हि अजीबबात हैं। " प्रतिमा नें हैरानी सें कहा__"कहीं ऐसा तौ नहि कि अभय कों इसबात कां शक़ होँ गय़ा हौ कि कोई उसका पीछाकर रहा हैं औऱ उसनेकैब वाले सें कहा होँ कि वो पीछा करने वालों कों गच्चा देदे। "
"हौ सकता हैं। " अजय सिंह नें सोचने वालेभाव सें कहा__"मेरे व्यक्ति नें बताया कि अभय केँ पासजब कुलीआया तौ उनकेबीच पता नहि क्याँ बातें हुईं थि जिसकी वजह सें अभय केँ चेहरे पर्र चौंकने वालेभाव उभरे थें। ऐसालगा जैसे वो किसीबात पर्र चौका हौ औऱ वो उस कुली केँ संग जाने केँ लिए रेडी न् हुआ थां। मगरफिन बाद मे वो आसानी सें अपनाबैग कुली कों दे दिया औऱ चुपचाप उसके पीछे पीछेचल भि दिया थां। चलते टाइम भि उसके चेहरे पर्र गहनसोच व उलझन केँ भाव थें। "
"हाॅ तोँ इसमें इतना विचार करने कि क्याँ बात हैं भला?" प्रतिमा नें कहा__"ऐसा तौ होता हि हैं कि आमतौर पर्र कुलियों कि बात पऱ यात्री लोग इतनी आसानी सें आते नहि हें। दूसरी बातअभय कि उस वक्त कि मानसिक स्थित भि ऐसी नहि रही होगी कि वो इसतरह किसी कुली केँ संग कहींचल दे। "
"हौ सकता हैं कि तुम्हारी बातठीक हौ मगर। "अजय सिंह बोला__"मगर इसमें भि सोचने वालीबात तोँ हैं हि कि कुली नें ऐसा क्याँ कहा कि सुनकर अभय बुरीतरह चौंका थां औऱ फिनबाद मे रहस्यमय तरीके सें उस कुली केँ संगचल दिया थां? कहने कां मतलबयह कि उसकीहर एक्टीविटी रहस्यमय लगी थि। "
"अगरऐसा हैं भि तोँ इसमें हम् क्याँ कर सकते हें?" प्रतिमा नें कहा__"क्योंकि अभयनाम कां पंछी तोँ आपके आदमियों कि आॅखों केँ सामने सें गायब हि होँ चुका हैं अब। "
"यहसभी मेरेउन हरामज़ादे आदमियों कि वजह सें हि हुआ हैं प्रतिमा। खैर छोड़ो यहसभी। " अजय सिंह नें गहरी साॅस लेकर कहा__"यह बताओ कि तुमने अपनाकाम कहाॅ तक पहुॅचाया?"
"अ अपनाकाम??" प्रतिमा नें नां समझने वालेभाव सें कहा__"कौन सें काम कि बातकर रहे हौ तुम्?"
"तुम् अच्छी तरह जानती होँ प्रतिमा कि मे किसकाम केँ बारे मे पूछरहा हूॅ तुमसे?" अजय सिंह कां लहजा सहसा पत्थर कि तरह कठोर हौ गय़ा__"औऱ अगर तुम् इसकाम मे सीरियस नहि हौ तोँ बतादो मुझे। अपने तरीके सें शिकार करनाभली भाॅति आता हैं मुझे। "
"ओह तोँ तुम् उसकाम केँ बारे मे पूछरहे होँ?" प्रतिमा कों जैसे ख़याल आया__"दोस्त तुम् तोँ जानते होँ कि यह करना इतना आसान नहि हैं। भला मे केसे अपनी बेटी सें यहकह सकूॅगी कि बेटी अपने बाप केँ पासजा औऱ उनके नीचेलेट जा। ताकि तेरे मदमस्त यौवन कां तेरा बाप भोगकर सके। "
"अच्छी बात हैं प्रतिमा। " अजय सिंह नें ठंडे स्वर मे कहा__"अब तुम् कुछ नहि करोगी। जौ भि करुॅगा अब मे हि करूॅगा। "
"नं नहि नहि अजय। " प्रतिमा बुरीतरह घबरा गई, बोलीं__"तुम् स्वयं सें कुछ नहि करोगे। मे अतिसीघ्र हि अपनी बेटी कों तुम्हारे नीचे सुलाने केँ लिए रेडीकर लूॅगी। "
"अब तुम्हारी इन बातों पर्र ज़रा भि यकीन नहि हैं मुझे। "अजय नें कहा__"बहोत देखली तुम्हारी कोशिशें। तुमने करुणा केँ बारे मे भि यहीकहा थां औऱ अब अपनी बेटी केँ लिए भि यहीकह रही हौ। तुम्हारी कोशिशों कां क्याँ नतीजा निकलता हैं यह मे देख चुकाहूॅ। इसलिए अब मे स्वयं यहकाम करूॅगा औऱ तुम् मुझे रोंकने कि कोशिश नहि करोगी। "
"पऱ अजययह तुम् ठीक.। " प्रतिमा कां वाक्य बीच मे हि रह गय़ा।
"बस प्रतिमा, अबकुछ नहि सुनना चाहता हूॅ मे। " अजय सिंहकह उठा__"अब तुम् मात्र देखो औऱ उसकामजा लो। "
प्रतिमा देखती रह गई अजय कों। उसकादिल बुरीतरह घबराहट केँ कारण धड़कने लगा थां। चेहरा अनायास हि किसीभय केँ कारण पीलापड़ गय़ा थां उसका। मन हि मन भगवान कों यादकर उसने अपनी बेटी कि सलामती कि दुवा कि।
भाग हाज़िर हैं दोस्तो,,,,,,
me new ho iss kahani pr or aapke sare updates do din mai padh liye h bas itna kahunga aapki kahani zabardast h tabhi too kisi or ne copy paste kee khair kahani continue karen yahi nivedan h aapse maira
If you have some reservation about kahani, not only this, any kahani, just stop reading it. In my opinion, you have no right too ask the writer of any thread too stop it claiming it too be bakwas.
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
Behad hi shandaar aur jabardast update bhay.
bhut khoob superb.
Ek behtareen update bhay.
Aapne bade hi Kamal से dikhaya hain sari baton ko.
Viraj के pas samachar pahunchna, उसका Sara bandobast Apne ChaCha Abhay के liye.
Abhay से bhent aur Viraj Nidhi aur Gauri की emotional baten.
Sb jabardast.
Mzaaaa aa gya bhay waah.
ye sala Ajay jyada kamina sala.
aur moorti dar rahi hain sali jub apni beti की Bari aayi too Bhagwan से guhar.
halanki beti ko kuchh mt karwana yar.
aur अब,
Aage kaa intjar
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) - Next part miss mat karna
धन्यवाद भइया आपकीइस प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,, अपनीराय औऱ सुझाव सें अवगत कराते रहें,भाग हाज़िर हैं,,,,
आपकेइस प्रेम कां धन्यवाद भइया,,,,, औऱ धन्यवाद आपकीइस सुंदर प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,
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