♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
प्यास वोँ दिल कि बुझाने कभीआया भि नहि,
प्यास वोँ दिल कि बुझाने कभीआया भि नहि,
कैसा बादल हैं जिसका कोई साया भि नहि।।
बेरुखी इस सें बड़ी औऱ भला क्याँ होगी,
एक् मुद्दत सें हमेंउस नें सताया भि नहि।।
रोज़आता हैं दर-ए-दिल पे वोँ दस्तक देने,
आज तक हमने जिसेपास बुलाया भि नहि।।
सुन लिया केसे ख़ुदा जाने ज़माने भर नें,
वोँ फ़साना जोँ कभी हमने सुनाया भि नहि।।
तुम् तौ शायर होँ ‘क़तील’ औऱ वोँ इकआम सां शख्स़,
उस नें चाहा भि तुम्हारी तरफ औऱ जताया भि नहि।।
__क़तील शिफाई
धन्यवाद भइया आपकीइस सुंदर प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,पाप कां घड़ा भरने दीजिए भइया उसकेबाद हि पापी कां संहार होगा,,,,
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
♡ एक् नया संसार ♡
भाग.《 28 》
अब तक,,,,,,,
"पहले तोँ नहि कररहा थां। " नैना नें अधीरता सें कहा__"फिन जब मैंने यहकहा कि मेरे भाई भाभी स्वयं भि एक् वकील हें औऱ वोँ जब आपको कोर्ट मे घसीटकर लेँ जाएॅगे तबपता चलेगा उन्हें। कोर्ट मे सबके सामने मे चीखचीख कर बताऊॅगी कि आदित्य सिंह नामर्द हैं औऱ बच्चा पैदा नहि कर सकतातब तुम्हारी इज्जत दो कौड़ी कि भि नहि रह जाएगी। बस मेरेइस तरह धमकाने सें उसनेफिन तलाक केँ पेपर्स पर्र अपने साइन किये थें। "
"मगर मुझेयह समझ मे नहि आँ रहा कि तुम्हें इसबात कां पता पहले क्यूं नहि चला कि आदित्य नामर्द हैं?" प्रतिमा नें उलझन मे कहा__"बल्कि यहसभी अब क्यूं हुआ? क्याँ आदित्य कां पेनिस बहोत छोटा हैं याँ फिन उसके पेनिस मे इरेक्शन नहि होता? आख़िर प्राब्लेम क्याँ हैं उसमें?"
"औऱ सबकुछ ठीक हैं भाभी। " नैना नें सिर झुकाते हुए कहा__"मगर मुझे लगता हैं कि उसके स्पर्म मे कमी हैं। जिसकी वजह सें बच्चा नहि होँ पारहा हैं। मैंने बहोत कहा कि एक् बार वोँ डाक्टर सें चेकअप करवा लें मगर वोँ इसबात कों मानने केँ लिए सजधजकर हि नहि हें। "
"ओह, चलो कोईबात नहि। " प्रतिमा नें उसके चेहरे कों सहलाते हुए कहा__"अब तुम् फ्रेश होँ जाओतब तक मे तुम्हारे लिए गरमा गर्म खानां रेडीकर देतीहूॅ। "
नैना नें सिर कों हिलाकर हामीभरी। जबकि प्रतिमा उठकर कमरे सें बाहर् निकल गई। बाहर् आते हि वो चौंकी क्योंकि अजय सिंह दरवाजे कि बाहरी साइड दीवार सें चिपका हुआ खड़ा थां। प्रतिमा कों देखकर वो अजीबढंग सें मुस्कुराया औऱ फिन प्रतिमा केँ संग हि नीचेचला गय़ा।
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अबआगे,,,,,,,
गौरी कों एक् दम सें चुप औऱ कुछ सोचते हुएदेख अभय सिंह सें रहा नं गय़ा। उसके चेहरे पर्र बेचैनी औऱ उत्सुकता प्रतिपल बढ़ती हि चलीजा रही।
"आप् चुप क्यूं होँ गईं भाभी?"अभय नें अधीरता सें कहा__"बताइये न्, मेरेमन मे वोँ सभीकुछ जानने कि तीब्र उत्सुकता जागउठी हैं। मे जल्द सें जल्दसभी कुछ आपसे जानना चाहता हूॅ। "
अभय कि उत्सुकता औऱ बेचैनी देख गौरी केँ चेहरे पऱ अजीब सें भाव उभरेतथा गुलाब कि कोमल कोमल पंखुड़ियों जैसे होठों पऱ फीकी सि मुस्कान उभरआई। उसनेअभय कि तरफ देखने केँ बाद अपने सामने कहीं शून्य मे देखने लगी।
"तुम् मेरे बच्चों कि तरह हि होँ। " गौरी शून्य मे घूरते हुए हि बोलि__"औऱ कोई भि माॅ अपने बच्चों केँ सामने याँ फिन स्वयं बच्चों सें ऐसी बातें नहि कर सकती जिन्हें कहने केँ लिए रिश्ते औऱ मर्यादा इसकी इज़ाज़त हि न् दे। मगर फिन भि कहूॅगी अभय। वक़्त औऱ हालात हमारे सामने कभीकभी ऐसारूप लेकर आँ जाते हें कि हम् फक़त बेबस सें हौ जाते हें। हमें वोँ सभीकुछ करनापड़ जाता हैं जिसे करने केँ बारे मे हम् कभी कल्पना भि नहि करते। ख़ैर, अब जौ कुछ भि मे कहनेजा रहीहूॅ उसमें कई सारी बातें ऐसी भि हें जिन्हें मे स्पष्ट रूप सें तुम् लोगों केँ सामने नहि कह सकती, लेकिन हाॅ तुम् लोगउन बातों कां अर्थ अवश्य समझ सकते होँ। "
इतनाकह कर गौरी नें एक् गहरी साॅसली औऱ फिन सें उसीतरह शून्य मे घूरते हुए कहने लगी__"यह सभीतब सें शुरुआत हुआ थां जब मे ब्याह कर अपने पति यानी विजय सिंहजी केँ घऱआई थि। उस टाइम हमारा घऱघऱ जैसा हि थां आज कि तरह हवेली मे तब्दील नहि थां। मे एक् ग़रीब घऱ कि लड़की थि। मेरेमाॅ बाप ग़रीब थें, खेती किसानी करते थें। अपने माता पिता कि मे अकेली हि संतान थि। मेरा नाँ तौ कोई भइया थां औऱ नां हि कोई बेहन। भगवान नें मेरे सिवा मेरेमाॅ बाप कों दूसरी कोई औलाद दि हि नहि थि। इसकेबाद भि मेरेमाॅ बाप कों ईश्वर सें कोई शिकायत नहि थि। वोँ मुझे दिलोजान सें प्रेम व स्नेह करते थें। जब मे बड़ी हुईँ तोँ सब बच्चों कि तरह मुझे भि मेरेमाॅ बाप नें गाॅव केँ विद्यालय मे पढ़ने केँ लिए मेरा दाखिला करा दिया। मे खुशी खुशी विद्यालय जानेलगी थि। लेकिन एक् हप्ते बाद हि मेरा विद्यालय मे पढ़ना लिखना बंद हौ गय़ा। दरअसल मे छोटी सि बच्ची हि तोँ थि। एक् दिन मास्टर जी नें मुझसे कखगघ सुनाने कों कहा तौ मे सुनाने लगी। मगर मुझेआता नहि थां इसलिए जैसेआता वैसे हि सुनाने लगी तौ मास्टर जी मुझे ज़ोर सें डाॅट दिया। उनकी डाॅट सें मे डरकर रोनेलगी। मे अपनेमाॅ बाप इकलौती लाडली बेटी थि। मेरेमाॅ बाप नें कभी मुझे डाॅटा नहि थां शायदयही वजह थि कि जब मास्टर जी नें मुझे ज़ोर सें डाॅटा तौ मुझे बेहददुख व अपमान सां महसूस हुआ औऱ मे रोनेलगी थि। मुझे रोतेदेख मास्टर जी नें मुझेचुप कराने केँ लिएफिन सें ज़ोर सें डाॅटा। उनके द्वारा फिन सें डाॅटे जाने सें मे औऱ भि तेज़ तेज़ रोनेलगी थि। मास्टर जी नें देखा कि मे चुप नहि होँ रहीहूॅ तोँ उन्होंने मुझ पऱ छड़ीउठा दि। दोतीन छड़ी लगते हि मेरा रोना जैसे चीखों मे बदल गय़ा। पूरे विद्यालय मे मेरा रोना चिल्लाना गूॅजने लगा। मेरेइस तरह रोने औऱ चिल्लाने सें मास्टर जी बहोत अधिक गुस्से मे आँ गए। उसी समय एक् दूसरे मास्टर जी मेरा रोना औऱ चिल्लाना सुनकर आँ गए। दूसरे मास्टर जी कों देखकर पहले वाले मास्टर जीरुक गए औऱ इसबीच मे रोतेहुए हि विद्यालय सें भागकर अपनेघऱ आँ गई। घऱ मे उस टाइम मेरे पिता जी भोजनकर रहे थें। मुझेइस तरह रोता बिलखता देख वोँ चौंके। मे रोतेहुए आई औऱ अपने पिता जी सें लिपट गई। मेरे पिता मुझसे पूछने लगे कि किसने मुझे रुलाया हैं तौ मैंने रोते रोतेसभी कुछबता दिया। सारीबात सुनकर मेरे पिता जी बड़ा क्रोध हुएमगर माॅ केँ समझाने पर्र शान्त होँ गए। मगर इस सबसेहुआ यह कि मेरे पिता जी नें दूसरे दिन सें मुझे विद्यालय नहि भेजा। उन्होंने साफकह दिया थां कि जिस विद्यालय मे मेरी बेटी मारकर रुलाया गय़ा हैं उस विद्यालय मे मेरी बेटी अबकभी नहि पढ़ेगी। बस इसकेबाद मे घऱ मे हि पलती बढ़ती रही। उस वक्त मेरीउमर पन्द्रह साल थि जब एक् दिन बाबू जी(गजेन्द्र सिंह बघेल) हमारे घऱआए। बाबूजी कों आसपास केँ सब गाॅव वाले जानते थें। उन्हें कहीं सें पताचला थां कि इस गाॅव मे हेमराज सिंह(पिता जी) कि बेटी हैं जौ बहोत हि खूबसूरत व सुशील हैं। बाबूजी अपने मॅझले बेटे विजय सिंहजी केँ लिए लड़की देखने आए थें। मेरे पिता जी नें बाबूजी कों बड़ेआदर व सम्मान केँ संग बैठाया। घऱ मे जौ भि रुखे सूखेजल पान कि ब्यवस्था उन्होंने वोँ सभी बाबूजी केँ लिए किया। बाबूजी नें मेरे पिता जी कां मान रखने केँ लिए थोडा बहोत जलपान किया उसकेबाद उन्होने अपनीबात रखी। मेरे पिता यहजान कर बड़ाखुश हुए कि ठाकुर साहब अपने बेटे केँ लिए उनकी लड़की कां हाॅथ स्वयं हि माॅगने आए हें। भलाकौन बाप नहि चाहेगा कि उसकी बेटी इतने बड़ेघऱ मे नं ब्याही जाए? औऱ फिन नाताजब स्वयं हि चलकर उनके दरवाज़ा पऱ आया थां तौ इंकार कां प्रश्न हि नहि थां। लेकिन पिता जी कि आर्थिक स्थित अच्छी नहि थि इसलिए लेने देने वालीबात सें घबरारहे थें। बाबूजी जानते थें इसबात कों इसलिए उन्होंने साफकह दिया थां कि हेमराज हमें केवल तुम्हारी लड़की चाहिए जिसे हम् अपनी बेटी औऱ बहूबना सकें। बस फिन क्याँ थां। सभीकुछ तय हौ गय़ा औऱ एक् अच्छे वशुभ मुहूर्त कों मेरी विवाह हौ गई। मुझे नहि पता थां कि मे किसतरह केँ घऱ मे औऱ किसतरह केँ लोगों केँ बीच आँ गई हूॅ?माॅ बाप नें बसयही सीख दि थि कि अपने पति कों भगवान मानना। अपने सासू ससुरजी कि मन सें सेवा करना। बड़ों कां आदरव सम्मान करनातथा छोटों कों प्रेम व स्नेह देना।
एक् लड़की कां नसीब कितना अजीब होता हैं कि बचपन सें जवानी तक अपनेमाॅ बाप केँ पास हॅसी खुशी सें रहती हैं औऱ फिन विवाह होँ जाने केँ बाद वो एक् नयेघऱ मे अपने पति केँ संग एक् नया संसार बनाने केँ लिएचली जाती हैं। अपनेमाॅ बाप केँ घऱ मे उनका निश्छल प्रेम औऱ स्नेह पाकरपली बढ़ी वोँ लड़की एक् दिनउन सबसेदूर चली जाती हैं।
विवाह केँ बादजब मे इसघऱ मे आई तोँ मेरेमन मे डरवभय केँ सिवाकुछ नं थां। अपनेमाॅ बाप सें यूॅ अचानक हि दूर हौ जाने सें हरसमय बस रोना हि आँ रहा थां। पऱ यहसभी तौ हर लड़की कि नियति होती हैं। हर लड़की केँ संग एक् दिनयही होता हैं। ख़ैर, रात हुइ तौ एक् ऐसे इंसान सें मिलना हुआ जोँ किसी फरिश्ते सें कम नं थां। उन्होंने मुझे प्रेम दिया इज्जत दि औऱ इस क़ाबिल बनाया कि जब सुभह हुइ तौ मुझेलगा जैसेयह घऱ शदियों सें मेरा हि थां। मुझेलग हि नहि रहा थां कि मे किसी दूसरे केँ घऱ मे किसी अजनबी केँ पास आँ गई हूॅ। राज केँ पिता ऐसे थें कि उन्होने मुझे इतनाबदल दिया थां। मुझे उनसे प्यार होँ गय़ा औऱ मे जानती थि कि उन्हें भि मुझसे उतना हि प्यार होँ गय़ा थां।
मेरी दोनो ननदें यानी सौम्या औऱ नैनादिन भर मेरेपास हि जमी रहती थि। उन्होने यह एहसास हि नहि होने दिया कि वोँ दोनो मेरेलिए अजनबी हें। माॅ बाबू बड़ाखुश थें। आख़िर उनकी पसन्द कि लड़की उनकीबहू बनकरउस घऱ मे आई थि। ऐसे हि एक् हप्ता गुज़र गय़ा। इन एक् हप्तों मे मेरेमन सें पूरीतरह डरव झिझकजा चुकी थि। मुझेघऱ केँ सबलोग अच्छे लगनेलगे थें। विजयजी सें इतना प्यार हौ गय़ा थां कि उनके बिना एक् समय भि नहि रहा जाता थां। वोँ दिनभर खेतों पऱ काम मे ब्यस्त रहते औऱ साम कों हि घऱआते। जब वोँ कमरे मे मेरेपास आते तौ मुझे रूठी हुईँ पाते। फिन वोँ मुझे मनाते। हरदिन मेरेलिए छुपाकर फूलों कां गजरा स्वयं बनाकर लाते औऱ मेरे बालों मे स्वयं हि लगाते। आईने केँ सामने लें जाकर मुझे खड़ाकर देते औऱ मेरे पीछे खड़े होकरतथा आईने मे देखते हुए मुझसे कहते "मे सारे संसार केँ सामने चीखचीख करयहकह सकताहूॅ कि इस संसार मे तुमसे सुंदर दूसरा कोई नहि। मे तोँ बेकार व निकम्मा थां जानेकिन पुन्य प्रतापों कां यहफल थां जौ तुम् मुझे मिली होँ" उनकीइन बातों सें मे गदगद हौ जाती। मुझे ध्यान हि नं रहता कि मे उनसे रूठी हुई थि। सभीकुछ जैसेभूल जाती मे।
इसबीच मैंने महसूस किया थां कि बड़े भाई औऱ बड़ी दिदी इन दोनो कां ब्यौहार सबसेअलग थां। बड़े भाई विजयजी सें अधिकबात नहि करते थें। उसीतरह प्रतिमा दिदी मुझसे अधिकबात नहि करती थि। हलाॅकि वोँ उस वक्तशहर मे हि रहते थें। पर्र जब भि वोँ दोनोआते तौ उनका ब्यौहार ऐसा हि होता हम् दोनो सें।
ऐसे हि चलतारहा। हम् सभीखुश थें लेकिन यहसच थां कि बड़े भाई औऱ दिदी विजयजी औऱ मुझसे हमेशा सें हि उखड़े सें रहते। मैने अक्सर देखा थां कि बड़े भाई किसी न् किसीबात पऱ विजयजी कों उल्टा सीधा बोलते रहते थें। यहअलग बात थि कि विजयजी उनकी किसी भि बात कां बुरा नहि मानते थें औऱ नाँ हि पलटकर कोई जवाब देते थें।
एक् दिन कि बात हैं मे अपने कमरे मे नहाने केँ बाद कपड़े पहनरही थि, मुझेऐसा लगा जैसेछिप करकोई मुझे कपड़े पहनते हुएदेख रहा हैं। मैंने पलटकर देखा तोँ कहींकोई नहि थां। मैंने इसे अपनावहम समझकर फिन सें कपड़े पहनने लगी। तभी कमरे केँ बाहर् सें मेरी बड़ी ननदी सौम्या कि आवाज़ आई। वोँ कहरही थि "बड़े भाई आप् यहाॅ, भाभी केँ कमरे केँ दरवाजे केँ पासछिप कर क्यूं खड़े हें?" सौम्या कि इसबात कों सुनकर मे सन्नरह गई। यहजान कर मेरे पैरों तले सें ज़मीन निकल गई कि जेठ जीछिप कर मुझे कपड़े पहनते हुएदेख रहे थें। मुझे ध्यान हि नहि थां कि मेरे कमरे कां दरवाजा खुलाहुआ हैं। मेरी हालतऐसी होँ गई जैसे काटो तौ एक् बूद भि खून नं निकले। फिनजब मुझेहोश आया तौ अनायास हि जानेकिस भावना केँ तहत मुझे रोना आँ गय़ा। सौम्या जब मेरे कमरे मे आई तोँ उसने मुझे रोता पाया। वो मुझे रोतेदेख हैरान रह गई। उसे किसी अनिष्ट कि आशंका हुईँ। उसने तौ देखा हि थां कि उसका बड़ा भइया मेरे कमरे केँ बाहर् दरवाजे केँ पासछिप कर खड़ा थां। उसे समझते देर न् लगी कि कुछ तोँ हुआ हैं। उसने जल्दी हि मुझे शान्त करने कि कोशिश कि औऱ पूछने लगी क्याँ हुआ हैं? मैंने रोतेहुए यहीकहा कि मुझे तोँ कुछपता हि नहि थां कि कौन दरवाजे केँ पास छिपकर मुझे कपड़े पहनते देखरहा हैं, वोँ तौ तबपता चलाजब तुमने बाहर् जेठ जी सें वोँ सभीकहा थां। मेरी बातें सुनकर सौम्या भि स्तब्ध रह गई। फिन उसनेकहा कि यहबात मे किसी सें न् कहूॅ क्यूं कि घऱ मे शोर होँ जाएगा। इसलिए इसबात कों भूल जाऊॅमगर आइंदा सें यह ख़याल अवश्य रखूॅ कि दरवाजा खुला नं रहे।
उस दिन केँ बाद जेठ जी कां मुझे देखने कां नज़रिया बदल चुका थां। वोँ किसी न् किसी बहाने मुझेदेख हि लेते। मे पन्द्रह साल कि नासमझ हि थि। मुझेसिर पऱ साड़ी द्वारा घूॅघट करने कां भूल जाता थां। जेठ जी मुझे देखते औऱ जब मेरी नज़रउन पर्र पड़ती तोँ वोँ बस मुस्कुरा देते। मुझेयह सभी बड़ा अजीब लगता औऱ मे इस सबसेडर भि जाती।
उधर विजयजी खेतों मे दिनरात मेहनत करते औऱ ज़्यादा सें अधिक मात्रा मे फसल उगाते। शहर मे बेंचकर जौ भि मुनाफा होता वोँ उस सारे पैसों कों बाबूजी केँ हाॅथ मे पकड़ा देते। उन पऱ तौ जैसे पागलपन सवार थां खेतों मे दिनरात मेहनत करने कां। उनकी मेहनत वलगन सें अच्छा खासा मुनाफा भि होता। मे अक्सर उनकेपास खेतों मे उन्हें खानां देने केँ बहाने चली जाती। मुझे उनकेसंग रहना अच्छा लगता थां फिन चाहे वोँ किसी भि स्थान हों। हम् दोनो खेतों मे नयेनये पौधे लगाते औऱ खूब सारी बातें करते।
टाइम गुज़रता रहा। टाइम केँ संगसंग उनका स्वभाव जौ पहले सें हि बदलाहुआ थां वोँ औऱ ज़्यादा बदल गय़ा थां। जेठ जीजब भि बड़ी दिदी केँ संगशहर सें आते तोँ उनकाबस एक् हि काम होता थां.मुझे अधिक सें अधिक देख्ना। घऱ मे अगरकोई नं होता तौ वोँ मुझसे बातें करने कि कोशिश भि करते। लेकिन मे उनकी किसीबात कों कोई जवाब न् देती बल्कि अपने कमरे मे आकर दरवाजा अंदर सें लगा लेती। जैसा कि गाॅवों मे होता हैं कि जेठ व ससुरजी केँ सामने घूॅघट करके हि जानां हैं औऱ उनके सामने कोई आवाज़ नहि निकालना हैं, बात करने कि तोँ बातदूर। इसलिए जेठ जीजब स्वयं हि मुझसे बातें करने औऱ करवाने कि कोशिश करते तोँ मे डर जाती औऱ भागकर अपने कमरे मे जाकर अंदर सें दरवाजा बंदकर लेती। इतना तोँ मे समझ गई थि कि जेठ जी कि नीयत मेरे प्रति सही नहि हैं। मगर किसी सें कह भि नहि सकती थि। मे नहि चाहती थि कि मेरीवजह सें घऱ मे कोईकलह शुरुआत हौ जाए।
उधर विजयजी कि मेहनत सें घऱ मे ढेर सारा रुपया आनेलगा थां। बाबूजी अपनेइस बेटे सें बड़ाखुश थें। मुझसे भि खुश थें क्योंकि मे उनकी नज़र मे एक् आदर्श बहू थि। एक् बार जेठ जीफिन आएशहर सें। लेकिन इसबार वोँ पैसों केँ लिएआए थें क्योंकि उन्हें शहर मे स्वयं कां कारोबार करना थां। उन्होने बाबूजी सें इस बारे मे बात कि औऱ उनसे पैसे मागे। इस बाबूजी नाराज़ भि हुए। पैसों केँ बारे मे उन्होने यहीकहा कि यहसभी पैसे विजय कि मेहनत कां नतीजा हैं इसलिए उससे पूछना पड़ेगा। बाबूजी कि इसबात नें जेठ जी केँ मन मे विजयजी केँ लिए औऱ भि ज़हरभर गय़ा। मुझेआज भि नहि पता कि ऐसी क्याँ वजह थि जिसकी वजह सें जेठ जी केँ मन मे अपनेइस भइया केँ लिए इतना ज़हरभरा हुआ थां? जबकि सभी जानते थें कि विजयजी हमेशा उनकाआदर व सम्मान करते थें। उनकी किसी भि बात कां बुरा नहि मानते थें। ख़ैर, रुपया लेकर जेठ जीशहर चलेगए। इसबार जब वोँ आए थें तोँ किसी भि दिन उन्होंने वोँ हरकतें नहि कि जोँ इसके पहले करते थें मुझे देखने कि। शहर मे जेठ जी नें स्वयं कां कारोबार शुरुआत कर लिया। इधर विजयजी केँ ज़ेहन मे यहभूत सवार होँ गय़ा थां कि घऱ कों तुड़वा करइसे नये सिरे सें बनवाकर हवेली कां रूप दियाजाए। उन्होने बाबू कि सहमति सें हवेली कि बुनियाद रखी। हवेली कों सजधजकर करने मे भारी रुपया खर्चहुआ। यहाॅ तक कि बाद मे हवेली कां बाॅकी काम कर्ज लेकर करना पड़ा। जेठ जी नें रुपया देने सें इंकार कर दिया।
इस बीच बड़ी दिदी कों एक् बेटी हुईँ। इसकापता भि हम् सबकोबाद मे चला थां। ख़ैर, जब वोँ शहर सें आए तोँ बाबूजी इसखबर सें नाराज़ तौ हुए लेकिन फिन हमेशा कि तरह हि चुपरह गए।
मे इसबात सें खुश थि कि जेठ जीअब चोरी छिपे मुझे देखने वाली हरकतें करनाबंद कर दिये थें। इसबीच अभय नें भि अपनी पसन्द कि लड़की सें विवाह करली। बाबूजी इसबात सें नाराज़ हुएमगर कर भि क्याँ सकते थें? मगर करुणा कां आचरण बहोत अच्छा थां, वोँ पढ़ी लिखी थि मगर उसमें संस्कार भि थें। मे उसे अपनी छोटी बेहनबना करखुश थि। हम् दोनों कां आपस मे बड़ा प्यार थां। कोईकह हि नहि सकता थां कि वोँ मेरी देवरानी हैं। अभय गुस्सैल स्वाभाव केँ अवश्य थें लेकिन उनके अंदर अपने सें बड़ों कां आदर सम्मान करने कि भावना थि। प्यार केँ चक्कर मे छोटी ऊम्र हि उन्होने विवाह करली थि। मगर बाबूजी शायदइस लिएचुप रहगए थें क्योंकि वोँ अपने पैरों पर्र खड़े थें। गाॅव केँ हि सरकारी विद्यालय मे अध्यापक थें वोँ।
इधर हवेली बनकर रेडी हौ चुकी थि। कर्ज़ भि बहुत हौ गय़ा थां मगर विजयजी केँ लिए तौ जैसेयह कर्ज़ कोई मायने हि नहि रखता थां। बाबूजी नें हवेली केँ रेडी होने पऱ बड़े धूमधाम सें गृह प्रवेश कां उत्सव मनाया। शहर सें बड़े भाई औऱ दिदी भि आईं। हवेली देखकर वोँ दोनो हि हैरान थें लेकिन प्रत्यक्ष मे हमेशा कि तरह हि ग़लतियाॅ बतारहे थें। बाबूजी सभी जानते भि थें औऱ समझते भि थें लेकिन हमेशा चुप रहते।
ऐसे हि चारसाल गुज़र गए औऱ मुझे एक् बेटा हुआ। मेरे बेटे केँ जन्म केँ चारदिन बाद बड़े भाई औऱ दिदी कों फिन सें एक् बेटी हुई। बाबूजी नें अपने पोते केँ जन्म पऱ बड़े धूमधाम सें उत्सव मनाया। बड़े भाई औऱ दिदी इससे नाराज़ हुए। उनका कहना थां कि उनकी बेटियों केँ जन्म उत्सव नहि मनाया जबकि विजय केँ बेटे केँ जन्म पर्र बड़ा उत्सव मनारहे हें आप्। उनकीइन बातों सें बाबूजी कां क्रोध उसदिन जैसेफट पड़ा थां। उन्होंने गुस्से मे बहोत कुछ सुना दियाउन दोनो कों। बात भि सही थि। दरअसल वोँ दोनो स्वयं कों हम् सबसेअलग करलिए थें। शहर मे स्वयं कां कारोबार औऱ बड़ा सां एक् घऱ थां उनकेपास। शायदइसी कां घमंड होनेलगा थां उन्हें। वोँ सोचते थें कि कहीं हम् लोग उनके कारोबार औऱ शहर केँ घर-मकान मे हिस्सा न् मागने लगेंइस लिए वोँ हमेशा हम् सबसेकटे कटे सें रहते। जबकि यहा हवेली औऱ ज़मीन जायदाद मे अपनाहक़ समझते थें।
गौरीकुछ लम्हा केँ लिए रुकी औऱ गहरी साॅसें लेनेलगी। सभीलोग साॅस बाधे उसकी बातें सुनरहे थें।
"मे जानती हूॅअभय कि मैने अभि जोँ कुछकहा उस सबको तुम् जानते हौ। " गौरी नें कहा__"तुम् सोचरहे होगे कि मे यहसभी तुम्हें क्यूं बतारही हूॅ जबकि मुझे तोँ मात्र वोँ सभी बताना चाहिए जोँ इन लोगों नें मेरे औऱ मेरे पति केँ संग किया थां। ख़ैर, यह सभी बताने कां मतलबयही थां कि जौ कुछहुआ उसकी बुनियाद उसकी शुरूआत यहीं सें हुई थि। ज़हर केँ बीज यहीं सें बोना शुरुआत हुए थें।
राजजब दोसाल कां हुआ तौ मेरी बड़ी ननदी सौम्या कि विवाह कि बातचली। बाबूजी नें बड़े भाई कों मेसेज भेजवाया औऱ कहा कि वोँ अपनी बेहन कि विवाह केँ लिए अपनीतरफ सें क्याँ खर्चा कर सकते हें? बाबूजी बात सें बड़े भाई नें रुपया देने सें साफ इंकार कर दिया थां। उनका कहना थां कि उनका कारोबार आजकल बहोत घाटे मे चलरहा हैं इसलिए वोँ पैसे नहि पाएॅगे। बाबूजी उनकीइस बात सें बेहददुख हुआ। बाबूजी केँ दुख कां जब विजयजी कों पताचला तोँ वोँ खेतों सें आकर हवेली मे बाबूजी सें मिले। उन्होने बाबूजी सें कहा कि आप् किसीबात कि फिक्र न् करें, सौम्या कि विवाह बड़े धूमधाम सें हि होगी। बाबूजी जानते थें कि हवेली बनाने मे जोँ कर्जा हुआ थां उसे विजयजी नें कितनी मेहनत करके चुकाया थां। इसकेबाद कहींफिन सें न् कर्ज़ा होँ जाए। खैर, सौम्या कि विवाह हुई औऱ वैसे हि धूमधाम सें हुइ जैसा कि विजयजी नें बाबूजी सें कहा थां। शहर सें बड़े भाई औऱ दिदी भि थें, वोँ दोनो हैरान थें लेकिन सामने पऱ यही कहते फिलते बाबूजी सें कि इतना खर्च करने कि क्याँ ज़रूरत थि? इससे जोँ कर्ज़ हुआ हैं उसे मेरेसिर पऱ मतमढ़ दीजिएगा। बाबूजी इसबात सें बेहद क्रोध हुए। कहनेलगे कि तुम् तौ वैसे हि स्वयं कों सबसेअलग समझते होँ, तुम्हें किसीबात कि चिन्ता करने कि कोई ज़रूरत नहि हैं। मेरेदो दो सपूत अभि बाॅकी हें जोँ मेराहर तरह सें संग देंगे औऱ दे भि रहे हें। सौम्या कि विवाह केँ तीसरे दिन बड़े भाई नें बाबूजी सें कहा कि अगर आप् यह समझते हें कि मे आप् सबसे स्वयं कों अलग समझता हूॅ तोँ आप् मुझे सचमुच हि अलगकर दीजिए। यहरोज रोज कि बेज्जती मुझसे नहि सुनी जाती। बाबूजी नें कहा कि तुम् तौ अलग हि हौ अबकिस तरहअलग करें तुम्हें? तौ बड़े भाई नें कहा कि मेरे हिस्से मे जौ भि आता होँ उसे मुझेदे दीजिए। हवेली मे औऱ ज़मीनों मे जौ भि मेरा हिस्सा हौ। बाबूजी उनकीइस बात पऱ क्रोध होँ गए। कहनेलगे कि तुम्हारा हवेली मे तभी हिस्सा हौ सकता हैं जब तुम् अपने हिस्से कि कीमत दोगे। क्योंकि हवेली मे तुमने अपनीतरफ सें एक् पैसा भि नहि लगाया। हवेली मे जौ भि पैसा रुपया लगा औऱ जोँ भि कर्ज़ा हुआउस सबको अकेले विजय नें चुकता किया हैं। हाॅअगर विजय चाहे तौ अपनी मर्ज़ी सें तुम्हें बिना कीमत चुकाए हवेली मे हिस्सा दे सकता हैं।
बाबूजी कि बात सें बड़े भाई नाराज़ हौ गए। कहनेलगे कि विजय होताकौन हैं मुझे हिस्सा देने वाला। उस मजदूर केँ सामने मे हाॅथ फैलाने नहि जाऊॅगा। मुझे आपसे हिस्सा चाहिए। उनकीइन बातों सें बाबूजी भि क्रोध हौ गए। कहनेलगे कि अगरऐसी बात हैं तोँ तुम्हें भि अपने कारोबार औऱ शहर केँ घर-मकान मे दोनो भाइयों कों हिस्सा देना होगा। तुम्हारा कारोबार तौ वैसे भि विजय केँ हि पैसों कि बुनियाद पऱ खड़ाहुआ हैं। बाबूजी इसबात सें बड़े भाई नें साफकह दिया कि मेरे कारोबार औऱ शहर केँ घर-मकान मे किसी कां कोई हिस्सा नहि हैं। तोँ बाबूजी नें भि कह दिया कि फिन तुम् भि यहभूल जाओ कि तुम्हारा इस हवेली मे औऱ ज़मीनों मे कोई हिस्सा हैं।
बाबूजी कि इसबात सें बड़े भाई क्रोध हौ गए। कहनेलगे कि यह आप् ठीक नहि कररहे हें। आप् बाप होकर भि अपने बेटों केँ बीच पक्षपात कररहे हें। बाबूजी नें कहा कि तुम् अपने आपको होशियार समझते हौ कि तुम् सबके हिस्सा लेँ लो औऱ तुमसे कोई न् लें। यह कहाॅ कां न्याय कररहे हौ तुम्? अरे तुम् तोँ बड़े भइया होँ, तुम्हें तोँ स्वयं सोचना चाहिए कि तुम् अपने छोटे भाइयों कां भलाकरो औऱ भला हि सोचो।
बाबूजी कि इन बातों सें बड़े भाई कुछ नं बोले औऱ पांव पटकते हुए वापसशहर चलेगए। उधरयह सारी बातें जब विजयजी कों पता चलीं तौ वोँ बाबूजी सें बोले कि आपको बड़े भाई सें ऐसा नहि कहना चाहिए थां। भला क्याँ ज़रूरत थि उनसेयह कहने कि कि हवेली मे हिस्सा तभी मिलेगा जब वोँ अपने हिस्से कि कीमत चुकाएॅगे? मैनेयह सोचकर यहसभी नहि किया थां कि बाद मे मे अपने हि भाइयों सें हवेली कि कीमत वसूल करूॅ। बाबूजी बोले इतना महानमत बनो बेटे। यह दुनिया बहोत बुरी हैं, यहाॅ बड़े खुदगर्ज़ लोग रहते हें। वक़्त केँ संग स्वयं कों भि बदलो बेटा। वरनायह दुनिया तुम् जैसेनेक औऱ सच्चे ब्यकित कों जीने नहि देगी। बाबूजी कि इसबात पऱ विजयजी बोले जैसे सूरज अपना रोशनी फैलाने वाला स्वभाव नहि बदल सकता वैसे हि मेरा स्वभाव भि नहि बदल सकता। आप् औऱ माॅ कि सेवा करूॅ छोटे भइया केँ लिए स्वयं कि सारी खुशियाॅ निसार करदूॅ। भला क्याँ लेकर जाऊॅगा इस दुनियाॅ सें? सभी यहीं तोँ रह जाएगा नं बाबूजी। इंसान कि सबसे बड़ी दौलतव पूॅजी तोँ वोँ हैं जिसे पुन्य कहते हें। एक् यही तौ लेकर जाता हैं वो ईश्वर केँ पास।
विजयजी कि इन बातों सें बाबूजी अवाक् रहगए। कुछ देरबाद बोले तूँ तोँ कोई फरिश्ता हैं बेटे। मन सें बैरागी हैं तुँ। तेरी किसीधन दौलत कां मोह नहि हैं। जब तुँ पढ़ता लिखता नहि थां न् तोँ दिनरात कोसता थां तुम्हे। सोचता थां कि कैसा निकम्मा बेटा दिया थां मुझे ईश्वर नें मगरभला मुझे क्याँ पता थां कि वही निकम्मा बेटा एक् दिन इतना महान निकलेगा। मुझे तुझपे गर्व हैं बेटे। मगर मेरी एक् बात हमेशा याद रखना कि दूसरों खुश रखने केँ लिए स्वयं कां बने रहना भि ज़रूरी होता हैं।
बाबूजी कि इसबात कों सुनकर विजयजी मुस्कुराए औऱ फिन सें अपनी कर्मभूमि यानी खेतों पऱ चलेगए। बाबूजी कि बातों मे छुपे किसी अर्थ कों शायद विजयजी समझ नहि पाए थें। मगर बाबूजी कों शायद भविष्य दिख गय़ा थां।
उधरशहर मे बड़े भाई औऱ दिदी इसबार कुछ औऱ हि खिचड़ी पकारहे थें। सौम्या कि विवाह कों एक् महीना हौ गय़ा थां जब बड़े भाई औऱ दिदी कों तीसरी औलाद केँ रूप मे एक् बेटा हुआ थां। वोँ दोनोशहर सें आए थें घऱ। इसबार बाबूजी नें उनके बेटे केँ जन्म पर्र राज केँ जन्मोत्सव सें भि ज़्यादा उत्सव मनाया कारणयही थां कि बड़े भाई औऱ दिदी कों यह नं लगे कि हमेंकोई खुशी नहीं हुइ हैं उनके बेटे केँ जन्म पऱ। बड़े भाई स्वयं भि उत्सव मे खूब रुपया बहारहे थें। वोँ दिखाना चाहते थें कि वोँ किसी सें कम नहि हें। ख़ैर, इस बार एक् नई चीज़ देखने कों मिली। वोँ यह थि कि बड़े भाई औऱ दिदी हम् सभी सें बड़े अच्छे तरीके सें मिलजुल रहे थें। विजयजी सें भि उन्होने अच्छे तरीके सें बातें कि। एक् दिन बड़े भाई खेतों पर्र घूमने गए। वहाॅ पऱ उन्होने देखा कि ज़मीनों पर्र बहुत अच्छी फसलउगी हुइ थि। बगल सें जौ बंज़र सां पहले बड़ा सां मैदान हुआ करता थां अब वहाॅ पर्र अच्छे खासे पेढ़ लगाएजा चुके थें। खेतों पर्र एक् तरफ बड़ा सां घर-मकान भि बनरहा थां। खेतों पर्र बहोत सें मजदूर कामकर रहे थें। विजयजी नें बड़े भाई कों वहाॅ पर्र देखा तौ वोँ भागकर उनकेपास आए औऱ बड़ेआदर व सम्मान सें उन्हें खेतों केँ बारें मे तथा फसलों सें होने वाली आमदनी केँ केँ बारे मे बताने लगे। उन्होंने यह भि बताया कि दूसरी तरफ जौ बीस एकड़ कि खाली ज़मीन पड़ी थि उसमें मौसमी फलों केँ बाग़ लगाने कि तैयारी हौ रही हैं। उससे बहुत ज़्यादा आमदनी होगी।
ऐसे हि बातें चलतीरही फिन बातों हि बातों मे जब हवेली कां ज़िक्र आया तौ विजयजी नें स्वयं कहा कि हवेली मे सबका बराबर कां हिस्सा हैं वोँ जब चाहें लेँ सकते हें। उन्हें कोई कीमत नहि चाहिए। यहसभी अपनो केँ लिए हि तौ बनाया गय़ा हैं। विजयजी कि इन बातों सें बड़े भाई खुश होँ गए। लेकिन उनकेमन मे शायदकुछ औऱ हि थां जोँ उस टाइमसमझ नहि आया थां।
ऐसे हि टाइम गुज़रता रहा। इसी बीच मुझे एक् बेटी हुइ औऱ दसदिन बाद करुणा नें भि एक् खूबसूरत सि बच्ची कों जन्म दिया। राज उससमय चारसाल कां होँ गय़ा थां। वोँ दिनभर अपनीउन दोनो बहनों केँ संग हि रहता, औऱ उनकेसंग हि हॅसता खेलता। शहर सें बड़े भाई औऱ दिदी भि आए थें। सबकेलिए कपड़े भि लाए थें। हम् सभी बेहदखुश थें इस सबसे।
इस बीच एक् परिवर्तन यहहुआ कि बड़े भाई शहर सें हप्ते मे एक् दोदिन केँ लिए हवेली आनेलगे थें। माॅ बाबूजी सें वोँ बड़े सम्मान सें बातें करते औऱ खेतों पऱ भि जाते। वहाॅ देखते सुनते सभी। मे औऱ करुणा घऱ केँ सारेकाम करती। उसकेबाद मे खेतचली जाती विजयजी केँ पास। खेतों मे जौ घर-मकान बनरहा थां वोँ बन गय़ा थां।
इसबीच बच्चे भि बड़े होँ रहे थें। राज पाॅचसाल कां हुआ तौ उसका विद्यालय मे दाखिला करा दियाअभय नें। गर्मियों मे जब विद्यालय कि छुट्टियाॅ होती तोँ बड़े भाई औऱ दिदी केँ बच्चे भि शहर सें गाॅव हवेली मे आँ जाते। सभी बच्चे एक् संग खेलते औऱ खेतों मे जाते। बड़े भाई कि बड़ी बेटी रितू अपनीमाॅ पर्र गई थि। वोँ ज़्यादा हम् लोगों सें घुलती मिलती नहि थि। शिवा अपने बाप पर्र हि गय़ा थां। वो अपनी चीज़ें किसी कों नहि देता थां औऱ दूसरों कि चीज़ें लड़ झगड़कर लेँ लेता थां। राज सें अक्सर उसकी लड़ाई हौ जाती थि। बच्चे तोँ नासमझ होते हें उन्हें अच्छे बुरे कां ज्ञान कहाॅ होता हैं। इसलिए अगर इनकीआपस मे कभी लड़ाई होती तौ जेठानी जी अक्सर नाराज़ होँ जातीथीं। बड़ी मुश्किल सें गर्मियों कि छुट्टियाॅ कटती औऱ जेठानी जी अपने बच्चों कों लेकरशहर चली जातीं।
दोस्तो, भाग हाज़िर हैं,,,,,,
अगलेभाग सें फ्लैशबैक कों शार्ट करके लिखूॅगा,
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
Nice superb update bhay, too Gauri ney aapni story suru kahin दिया, dekhtey hey agey sabka क्या reaction hotha hey। bhay एक बात hey flashback jyadah maat khicho, jeysey आज की update की jtadatar hissa pehley bi dikhaya ap ney, too अगर joo pehley dikhaya woh sort mey aur joo नहीं dikhaya woh detail mey dikhay too sayed achcha hoga, बुरा maat manna bhay yeh baas मेरा एक request hey baki ap writer hu achcha jantey hu की story ko keysey agey baraya jay
keep it up and as always waiting for
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