♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
हैलो दोस्तो, केसे हें आप् सभी???? उम्मीद करताहूॅ कि आप् सभी बहोत अच्छे होंगे।
दोस्तो, जैसा कि मैने आपकोउस दिन बताया थां कि मे एपसोड लिखरहा हूॅ तोँ यकीनन वोँ सच हि थां। मैने एपसोड कां करीब 40% हिस्सा लिख लिया थां लेकिन मेरी हि लापरवाही कि वजह सें सभीकुछ डिलीट हौ गय़ा। दरअसल मेरा मोबाइल भाग माॅगरहा थां इसलिए मैनेभाग कर दिया। बाद मे मैने देखा कि मेरेफोन मे Jio कां Network हि नहि आँ रहा। मैने बहोत कोशिश कि मगर नाकाम रहा। उसकेबाद मैने मोबाइल कों मार्केट मे दिखाया मगर वहाॅ भि फोनठीक नहि हुआ।
मे दोदिन सें बहोत परेशान होँ गय़ा थां। एक् दुकानदार नें बताया कि फोन मे Software डलवाना पड़ेगा। आज अभि मे किसी औऱ केँ फोन पऱ अपने Jio कां सिम कार्ड डाला हैं औऱ Wi-Fi केँ द्वारा फोन मे नेट चालूकर रखा हैं।
यह तोँ थि मेरी वोँ बात जिसके चलते मे वक़्त पऱ भाग नहि दे पाया। ख़ैर, एपसोड मैने रेडीकर लिया हैं औऱ बहोत जल्द आप् सबके सामने एक् मेगा एपसोड हाज़िर हौ जाएगा।
!! शुक्रिया !!
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
♡ एक् नया संसार ♡
एपसोड.《 50 》
अब तक,,,,,,,,
मे माॅ सें मिला तौ माॅ मेरी वापसी कि बात सें भावुक हौ गईं। उन्हें पता थां कि मे वापसकिस लिएजा रहाहूॅ इसलिए वोँ मुझेबार बार अपना ख़याल रखने केँ लिएकह रही थि। ख़ैर मैने उन्हें आश्वस्त कराया कि मे स्वयं कां ख़याल करूॅगा औऱ मुझेकुछ नहि होगा।
चलने सें पहले मैने सबसे आशीर्वाद लिया औऱ फिन आदित्य केँ संग वापसी केँ लिएचल दिया। मेरेसंग जगदीश अंकल भि थें। पवन औऱ आशा दिदी मुझे अपना ख़याल रखने कां कहा औऱ खुशी खुशी मुझे विदा किया। हलाॅकि मे जानता थां कि वोँ अंदर सें मेरे जाने सें दुखी हें। उन्हें मेरी फिक्र थि। अभय चाचा नें मुझे सम्हल कर रहने कों कहा। करुणा चाची नें मुझे प्रेम दिया औऱ विजयी होने कां आशीर्वाद दिया। मे दिव्या औऱ शगुन कों प्रेम व स्नेह देकर निधी कि तरफ देखा तौ वोँ कहीं नज़र न् आई। मे समझ गय़ा कि वोँ मुझसे मिलना नहि चाहती हैं। इसबात सें मुझे तक़लीफ़ तौ हुई लेकिन फिन मैंने उस तक़लीफ़ कों जज़्ब किया औऱ जगदीश अंकल केँ संग वाहन मे बैठकर वापस रेलवे स्टेशन कि तरफचल दिया।
रेलवे स्टेशन पहुॅच कर मे औऱ आदित्य वाहन सें उतरे। जगदीश अंकल नें मुझे एक् पैकिट दिया औऱ कहा कि मे उसे अपनेबैग मे चुपचाप डाललूॅ। मैनेऐसा हि किया। उसकेबाद जगदीश अंकल सें मेरीकुछ ज़रूरी बातें हुईं औऱ फिन मे औऱ आदित्य प्लेटफार्म कि तरफबढ़ गए। ट्रेन वापसी केँ लिएबस चलने हि वाली थि। हम् दोनो ट्रेन मे अपनी अपनीशीट पऱ बैठगए। मैनेफोन सें रितू दिदी कों मोबाइल किया औऱ उन्हें बताया कि सभी लोगों कों मैने सुरक्षित पहुॅचा दिया हैं औऱ अब मे वापस आँ रहाहूॅ। रितू दिदी इसबात सें खुश होँ गईं। फिन उन्होंने मुझे अख़बार मे छपी ख़बर केँ बारे मे बताया औऱ पूॅछा कि यहसभी क्याँ हैं तौ मैनेकहा कि मिलकर बताऊॅगा।
रितू दिदी सें बात करने केँ बाद मे आदित्य सें बातें करनेलगा। तभी मेरी नज़र एक् ऐसे चेहरे पऱ पड़ी जिसेदेख कर मे चौंक पड़ा औऱ हैरान भि हुआ। मेरेमन मे प्रश्न उठा कि क्याँ उसने मुझेदेख लिया होगा????? मैने अपनी पैंट कि जेब सें रुमाल निकाल कर अपनेमुख पऱ बाॅध लिया औऱ फिन धीरे-धीरे आदित्य सें बातें करनेलगा। लेकिन मेरी नज़रबार बारउस चेहरे पऱ चली हि जाती थि। जिस चेहरे पर्र मे एक् अजीब सि उदासी देखरहा थां।
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अबआगे,,,,,,,,
उधर रितू केँ फार्महाउस पऱ!
सुभह कां नास्ता पानी करने केँ बाद रितू बाहर् कि तरफ निकल गई। बाहर् आकर उसने देखा कि सामने मेनगेट पऱ हरिया काका औऱ शंकर काकाआपस मे कुछ बातें कररहे थें। रितूउन दोनो कों देखते हि उनकीतरफ बढ़चली। कुछ हि वक़्त मे वोँ उन दोनो केँ पास पहुॅच गई। रितू कों अपनीतरफ आतादेख उन दोनों नें अपनीबात बंदकर दि औऱ सम्हल कर खड़े होँ गए।
"क्याँ हालचाल हें आप् दोनो केँ काका?" रितू नें उन दोनों कि तरफदेख कर मुस्कुराते हुए कहा___"आप् दोनों नें नास्ता पानी किया कि नहि?"
"हम् दोनों नें अभि थोड़ी देर पहले हि नास्ता पानी किया हैं बिटिया। " शंकर नें कहा___"बिंदिया भाभी हमारा बहुत बेहतर तरीके सें ख़याल रखती हें। "
"यह तौ बहोत अच्छी बात हैं काका। " रितू नें कहा___"काकी हें हि इतनी अच्छी कि उन्हें सबकी फिक्र रहती हैं। "
"हाॅयह बात तोँ सच हैं बिटिया। " शंकर नें कहा___"हरिया बहोत क़िस्मत वाला हैं जौ इसे बिंदिया भाभी जैसी जोरू मिली हें। "
"अरेई कां कहथोरे बुड़बक?" हरिया नें बुरा सां मुह बनाते हुए कहा___"भाग्य वालीता ऊ हैं ससुरी जौ हमरे जइसनमरद मिलगवा हैं ऊखा। हम् ता पहिले सें हि क़िस्मत वालाहूॅ रे। "
"देखा बिटिया। " शंकर नें रितू सें कहा___"यह अपने आपको जाने क्याँ समझता रहता हैं? जबकि सच्चाई तौ यही हैं कि जबसे बिंदिया भाभी सें इसका ब्याह हुआ हैं तब सें इसके किस्मत खुलगए हें। "
"खूबसमझ रहाहूॅ रे तोहरी बातन कां। " हरिया नें सिर हिलाते हुए कहा___"तूँ ससुरे ऊखर बहुतै बड़ाई करथैरे। तोहरे मनमा कां हैं ई हम् बहुतै अच्छी तरह सें जानतहूॅ। इतना बुड़बक नं हूॅ हम्। पर्र तूँ ससुरे हमरी एक् बातकान खोल केँ सुन लेँ, अउरऊ याँ केँ कउनवदिन सारे हमरी मेहरारू कां लइकेभाग नं जइहे समझा कां?"
"ओएयह क्याँ बकवास कररहा हैं तुँ?" शंकर नें एकदम सें आवेश मे आकर कहा__"ऐसा तूँ सोच भि केसे सकता हैं मेरे बारे मे? तुँ अच्छी तरह जानता हैं कि मेरेमन मे ऐसी बदनीयती नहि हैं। मे तोँ भाभी कि बहोत इज्ज़त करताहूॅ औऱ उन्हें भाभीमाॅ जैसा हि मानता हूॅ। "
"ईता ससुरे तुँ मुह सें बोलरहा हैं न्। " हरिया नें कहा__"केहू केँ मनमा कां हैं ईकउन जानथै भला, हाॅ?"
"तुँ जैसा हैं वैसा हि दूसरे कों भि समझता हैं। " शंकर नें कहा___"इस लिए मुझे अपनेलिए सफाई देने कि कोई ज़रूरत नहि हैं। भगवान जानता हैं कि मेरे अंदर क्याँ हैं?"
"मे जानती हूॅ काका कि आपकेमन मे किसी केँ लिएकोई मैल नहि हैं। " रितू नें कहा___"हरिया काका तौ आपकोबस छेड़रहे हें मगर मे यहकहरही हूॅ आप् भि विवाह कर लीजिए औऱ मेरेलिए एक् अच्छी सि काकी लेँ आइये। "
"यह क्याँ कहरही हौ बिटिया?" शंकर हॅसा___"अब भलाइस उमर मे कौन लड़की मुझसे ब्याह करेगी? अब तौ यह जिंदगी ऐसे हि कटेगा। "
"अरे अभि भि आप् विवाह कर सकते हें काका। " रितू नें कहा___"औऱ आपको करना हि पड़ेगा। जब आप् विवाह कर लेंगे तब हरिया काका आपकोयह सभीकह कर छेड़ेंगे नहि। "
"हम् ताई ससुरे कां समझाय समझाय केँ थकगयन बिटिया। " हरिया नें कहा___"पर्र ई ससुरा हमरी कउनवबात मानतै नाहीं हैं। कहैं कां ताई हमकाआपन बहुतै बड़का पक्का दोस्त मानथै पर्र ईबात भि सचहाय राम कि ई हमरीबात भि नाहीं सुनत हैं। "
"आप् समझ नहि रहे हें काका। " रितू नें सहसा मुस्कुराते हुए कहा___"शंकर काका कों दरअसल बिंदिया काकी जैसी पत्नि चाहिए। बात भि सही हैं काकाअगर बिंदिया काकी जैसी पत्नि शंकर काका कों भि मिलजाए तौ इनका जिंदगी औऱ भि अधिक सॅवरजाए। "
"कारेईहै बातहा कां?" हरिया काका नें तिरछी नज़र सें शंकर कि तरफ देखा___"अउर अगरईहै बातहा ता ससुरे ईबाततै हमका पहिले काहे नाँ बताएरहे? सरवा बेकार माअब तक ते रॅडवा घूमतरहे। चल अउनवबात नाँ हा। हम् तोहरे खातिर ऊ ससुरी बिंदिया जइसनै जोरू ढूॅढ़ब। हमरे इहाॅ अइसन मेहरारू केर कउनवकमी नाँ हा। "
"यह तौ अच्छी बात हैं काका। " रितू नें मुस्कुरा कर कहा__"आप् जल्द सें वधू कां इंतजाम कीजिए। उसकेबाद चट मॅगनी पट ब्याह होँ जाएगा। औऱ हाॅ शंकर काका कि विवाह कां सारा खर्चा मे करूॅगी। "
"यह तुम् क्याँ कहरही होँ बिटिया?" शंकर काका एकदम सें चौंक पड़ा__"भला मे तुमसे केसे खर्चा करवा सकताहूॅ? अरे तुमको तोँ मे अपनी बेटी हि मानता हूॅ औऱ बेटी सें इसतरह अपनेकाम केँ लिएधन खर्चा करवाना अच्छी बात नहि हैं। मुझेपाप लगेगा बिटिया। "
"आप् भि कमाल करते हें काका। " रितू नें कहा__"जिंदगी भरमाॅ बाप अपने बच्चों केँ ऊपर अपनीपाई पाई खर्च करते रहते हें तोँ क्याँ बच्चों कां फर्ज़ नहि बनता कि वोँ भि अपनेमाॅ बाप केँ ऊपर अपनी कमाई कां पाईपाई खर्चकर दें?अगर आप् मुझे अपनी बेटी मानते हें तौ मे भि तौ आपको अपने पिता जैसा हि मानती हूॅ। औऱ यह मेरी ख़्वाहिश हि नहि बल्कि खुशी कि बात हैं कि मे अपने शंकर काका कि विवाह मे खूब रुपया खर्च करूॅ। मैने फैंसला कर लिया हैं, इसलिए अब आप् इस बारे मे कुछ भि नहि कहेंगे? वरनाकभी बात नहि करूॅगी आपसे। "
रितू कि बातें सुनकर शंकर हैरत सें देखता रह गय़ा उसे। फिन सहसा जाने उसके अंदर कैसा भावनाओं कां तूफान उठा कि उसकी ऑखों सें झरझर करकेऑसू बहचले। उसके चेहरे पऱ एकाएक हि गहन पीड़ा औऱ दुख केँ भावउभर आए। यहदेख कर रितूआगे बढ़ी औऱ उसकी ऑखों सें बहरहे ऑसुओं कों अपने हाॅथ सें पोंछा।
"यह क्याँ काका?" रितू नें कहा__"आप् रोंरहे हें? क्याँ मुझसे कुछ ग़लती हौ गई?"
"नहि नहि बिटिया। " शंकर एकदम सें कह उठा___"तुमसे भलाकोई ग़लती केसे हौ सकती हैं? तुम् तौ एक् नेकदिल बच्ची होँ बिटिया। आज वर्षों बाद इतनी खुशी महसूस हुईँ कि वोँ खुशीऑसू बनकरइन ऑखों सें छलक पड़ी। इस दुनियाॅ मे इससे पहले बहोत दुख दर्दसहे थें मैने। मगर जबसे यहाॅआया हूॅ तौ ऐसालगा जैसे मे अकेला नहि हूॅ बल्कि मेरा भि कोई अपना हैं। जिसे मेरी फिक्र हैं। "
"मे तौ शुरुआत सें हि आपको अपना हि मानती आँ रहीहूॅ काका। " रितू नें कहा___"मगर आप् आज भि मुझे अपना नहि मानते हें। अगर मानते तौ मेरे औऱ हरिया काका केँ पूछने पर्र अपने बारे मे वोँ सभीकुछ बताते जिसकी वजह सें आप् कभी अपनेघऱ नहि जाते हें। "
"उस सबको बताने कां कोई मतलब नहि हैं बिटिया?" शंकर नें कहा___"अतीत किसी कां भि होँ वोँ जब भि यादआता हैं तौ हमेंदुख औऱ उदासियाॅ हि देता हैं। मे उस सबकोयाद नहि करना चाहता। क्योंकि बड़ी मुश्किल सें मैने स्वयं कों इसहद तक सम्हाला हैं। "
"अपने अंदर केँ दर्द कों बयाॅकर देने सें मन कां बोझ बहुत हल्का हौ जाता हैं काका। " रितू नें कहा___"यह तोँ अच्छी बात हैं कि आप् अपनेउस दर्द सें उबरकर आज सम्हल चुके हें। मगरयह भि सच हैं कि अपने अंदर इतने सारेदुख दर्द कों दबा केँ रखना भि अच्छी बात नहि हैं। ऐसे मे वोँ दर्द नासूर बन जाता हैं औऱ हमें एक् समय भि चैन सें जीने नहि देता। इस लिए आप् अपने केँ उसदुख दर्द कों बाहर् निकाल दीजिए औऱ फिननये सिरे सें अपने जिंदगी कि नई शुरूआत कीजिए। "
"रितू बिटिया बहतैभले कि बात करथै शंकरवा। " हरिया नें कहा___"जोँ बीत गय़ा हाउसे ता भूलादे मा हि भलाईहा। हम् सरवा तोसेकब सें रहाहूॅ केँ तूँ अपना ब्याह करके जिंदगी माआगे बढ़। पर्र तूँ ससुरा हमरी सुनतै नाहीं हैं?"
"अब तोँ बिटिया नें अपना फैंसला सुना हि दिया हैं हरिया। " शंकर नें कहा___"औऱ जिस अपनेपन सें सुनाया हैं उसेअगर मे नाँ मानूॅ तौ फिन धिक्कार हि होगामुझ पऱ। इसलिए अब मे अवश्य ब्याह करूॅगा दोस्त। "
"हाॅमगर उससे पहले। " रितू नें कहा___"मे यह भि जानना चाहती हूॅ काका कि आपकेसंग ऐसा क्याँ हौ गय़ा थां जिसकी वजह सें आप् कभी अपनेघऱ नहि जाते औऱ नां हि अपनेघऱ वालों सें कभीकोई मतलब रखते हें? आप् हमें वोँ सभीकुछ अभि बताएॅगे काका। "
"ठीक हैं बिटिया। " शंकर नें गहरी साॅस ली___"तुम् अगर इतना हि ज़ोरदे रही हौ तौ सभीकुछ बताता हूॅ तुम्हें। मे उत्तर प्रदेश केँ एक् छोटे सें गाॅव महोबा कां निवासी हूॅ। मे छोटी जाति कां हूॅ। मेरा बाप बल्ली रावत एक् मिस्त्री थां। जौ मकानों मे ईंटे कि जोड़ाई कां काम करता थां। हम् तीन भइया औऱ दो बेहन थें। मेरीमाॅ बहोत शान्त स्वभाव कि थि। अपनेसब बच्चों कों वो बहोत प्रेम करती थि। भइया बहनों मे मे सबसे बड़ा थां। मे माॅ पर्र गय़ा थां इसलिए मेरा स्वभाव भि सबके प्रति प्रेम भरा हि थां। उससमय मे पच्चीस साल कां होँ गय़ा थां औऱ अपने पिताजी केँ संगरह कर मिस्त्रीगीरी पूरीतरह सीख चुका थां। इसलिए जहाॅ भि काम मिलता मे पिताजी केँ संग हि रहकर उनकेकाम मे हाॅथ बटाता थां। मेरे सहयोग कां असरयह हुआ कि घऱ केँ आर्थिक हालात पहले कि अपेक्षा बहुत बेहतर होँ गए। हमारी जात बिरादरी केँ कुछलोग मेरे पिताजी सें अक्सर मेरा ब्याह कर देने कों कहते रहते थें। पर्र पता नहि पिताजी उन सबकी बातों कों क्यूं अनसुना कर देता थां? इधरपास केँ हि एक् गाॅव मे हमारी हि जात बिरादरी मे एक् लड़की थि चंदा। जिसे मे बहुत मनपसंद करता थां। वोँ भि मुझे बहोत पसन्द करती थि। हमेंजब भि वक्त मिलता हम् एक् दूसरे सें अवश्य मिल लिया करते थें। कहते हें कि इश्क़ मुश्क़ कभी छुपता नहि इसलिए इसबात कां पता मेरे पिताजी कों भि होँ गय़ा थां। जिससे पिताजी मुझे इसकेलिए डाॅट भि देता थां कभीकभी। ख़ैरसभी कुछठीक हि चलरहा थां कि एक् दिनहर दिन कि भाॅति मे पिताजी केँ संगकाम पऱ गय़ा हुआ थां। गाॅव मे हि काम चालू थां तौ दोपहर केँ वक़्त सहसा मेरी बेहन रीना भागते हुएआई औऱ बताया कि अम्मा मर गई हैं। उसकीबात सुनकर हम् दोनो बाप बेटा भौचक्के सें रहगए। मुझे तौ यकीन हि नहि हुआ कि अम्मा मर गई हैं। रीना नें बताया कि अम्मा नहाने केँ लिए बाल्टी कों रस्सी सें बाॅधकर कुएॅ सें पानी खींचरही थि। तभी जाने केसे उसका पाॅव फिसल गय़ा औऱ वोँ कुएॅ मे गिर गई। अम्मा कों तैरना नहि आता थां इसलिए वोँ पानी मे डूब गई औऱ मर गई। रीना नें बताया कि जब बहुतदेर तक अम्मा नहाकर नं आई तोँ वो घऱ केँ पिछवाड़े पऱ बने कुएॅ मे यह देखने गई कि अम्मा अब तक आई क्यूं नहि? मगर कुएॅ मे अम्मा कों नं पाकर रीना कुएॅ केँ आसपास देखने लगी। फिन सहसा उसकी नज़र कुएॅ केँ अंदर पड़ी तौ अम्मा कों पानी कि सतह पऱ औधे मुॅह लेटी पाया। रीना कों समझते देर नं लगी कि अम्मा मर गई हैं, बसयहकथा थि अम्मा केँ मर जाने कि। रीना कि सारी बातें सुनकर हम् दोनो बाप बेटा काम छोंड़ करघऱ आँ गए। गाॅव केँ कुछ लोगों कि सहायता सें मेरे भाईयों नें अम्मा कों कुएॅ सें निकाल लिया थां।
अम्मा केँ मर जाने कां दुख सबसे ज़्यादा मुझे थां। मगरअब होँ भि क्याँ सकता थां। अम्मा कां क्रिया कर्म किया गय़ा औऱ कुछदिन मे फिन सें हमारी दिन चर्या पहले जैसी चलनेलगी। अबघऱ मे रोटी पानी मेरी दोनो बहनें हि बनाती थि। मेरेसब भइया बेहन बड़े हौ गए थें औऱ जवान भि। अम्मा केँ मर जाने कां दुख मेरे अंदरबना हि रहा पर्र मे किसी केँ सामने उसदुख कों दिखाता नहि थां। कुछदिन बाद एक् बदलाव यहहुआ कि पिताजी अक्सर रात कों देसी ठर्रा(शराब) लगाकर घऱआने लगा औऱ घऱ मे सबको अनाप शनाप बकनेलगा औऱ गालियाॅ भि देनेलगा। हम् सभी पिताजी केँ दारू पीने सें परेशान सें होनेलगे। इधर एक् बदलाव यह भि हुआ कि पिताजी मुझेकाम पर्र लगाकर स्वयं चारचार घंटे केँ लिए गायब होँ जाता। जबकि मे सारादिन काम मे लगा रहता औऱ फिनदिन ढले हि घऱ वापसआता। ऐसे हि दिन गुज़रते रहे।
ऐसे हि एक् दिन मे साम कों घऱ पहुॅचा। हाथमुह धोकर खाया पिया औऱ फिनघऱ केँ बाहर् मैदान मे चारपाई लगाकर उसमें लेट गय़ा। दिनभर केँ काम सें मे बहुतथक जाता थां इसलिए लेटते हि मुझे नींद आँ गई। अभि मुझे सोयेहुए कुछ हि टाइम गुज़रा थां कि सहसा किसी नें मेरीपीठ पऱ ज़ोर कि लात मारी। जिससे मे चारपाई केँ नीचें गिर गय़ा। अचानक हुएइस हमले सें पहले तोँ मुझेकुछ समझ नं आया लेकिन फिन जल्दी हि मेरे अंदर गुस्से कां उबाल आँ गय़ा। मेरी नज़र मुझेलात मारने वाले पर्र पड़ी। देखा तौ चारपाई केँ उसपार नशे मे झूमता पिताजी खड़ा थां।
"पिताजी तुमने मुझे मारा क्यूं?" मे लगभर नाराज़गी भरेभाव सें पूछा___"औऱ यह क्याँ तुम् हर रोज़ देसी दारू चढ़ा केँ आँ जाते हौ। यह अच्छी बात नहि हैं पिताजी। "
"बकवास नाँ कर समझा। " पिताजी नशे मे झूमता हुआ गरजा___"मे कुछ भि करू तुम्हें इससे क्याँ मतलब? मे अपने पैसों कि दारू पीताहूॅ तेरे बाप कि नहि समझा। "
"मेरे बाप तोँ तुम् हि हौ पिताजी। " मैने कहा___"मे यह नहि कहता कि तुम् दारू न् पियों मगररोज रोज पीना अच्छी बात नहि हैं। इससे तुम्हारी तबियत ख़राब हौ जाएगी। "
"अरे वोँ सभी छोंड़। " पिताजी नें हाॅथ कों ऊपर सें नीचे कि तरफ झटकते हुए कहा___"यह बता कि तूँ अपनीनई नवेली अम्मा सें मिला कि नहि?"
"नई नवेली अम्मा??" मे एकदम सें चकरा गय़ा__"यह तुम् क्याँ बोलरहे होँ पिताजी?"
"ठीक हि तोँ बोलरहा हूॅ बुड़बक। " पिताजी लड़खड़ा सां गय़ा___"अरे आज मे तुम् सबकेलिए एक् नई अम्मा लें आयाहूॅ। मे जानता हूॅ कि अपनी अम्मा केँ मर जाने सें तुम् सभी बहोत दुखी थें इसलिए मैनेफिन सें ब्याह कर लिया औऱ तुम् सबकेलिए एक् अम्मा लेँ आया। "
मे पिताजी कि बातसुन करउछल पड़ा थां। हैरत सें ऑखें फाड़े नशे मे झूमते पिताजी कों देखेजा रहा थां। लेकिन तभी मुझे एहसास हुआ कि लगता हैं पिताजी कों दारू ज़्यादा चढ़ गई हैं इसलिए अनाप शनापबके जारहा हैं।
"अंदरजाओ पिताजी। " फिन मैने कहा___"तुम्हें दारूआज अधिकचढ़ गई हैं। इसलिए अंदरजाओ औऱ जौ थोडा बहोत खानां खानां होँ खाओ औऱ आहिस्ता सोजाओ। "
"तूँ साले मुझेबता रहा हैं कि मुझेचढ़ गई हैं?" पिताजी एकदम सें चीख पड़ा थां, बोला___"अरे इतनी सि बार बराबर दारू मुझे नहि चढ़ती मादरचोद। मे जौ कहरहा हूॅउसे मानता क्यूं नहि? चल आँ मेरेसंग तुम्हें दिखाता हूॅ कि अंदर तेरीनई अम्मा हैं कि नहि। "
पिताजी मेरा हाॅथ पकड़कर अंदर कि तरफ खींचकर लेँ जानेलगा। मे चाहता तौ अपना हाॅथ एक् झटके मे उससे छुड़ा लेतामगर मे कोई बखेड़ा नहि करना चाहता थां इसलिए उसके खींचने पर्र उसके पीछे पीछे अंदर कि तरफ खिंचता चला गय़ा। अंदर बरामदे मे मेरेसब भइया बेहन बैठे थें। घऱ कच्चे घर-मकान कां थां। बाहर् सें आने पर्र पहले बड़ा सां बरामदा पड़ता थां, उसकेबाद दो कमरे थें। जिसमे एक् कमरे मे सामान वगैरा रखा रहता थां। जबकि दूसरा रूम पिताजी कां थां। कमरे मे जोँ लकड़ी कां दरवाजा थां उसमें अंदर कि तरफ कुण्डी नहि थि।
पिताजी मुझे खींचते हुएउसी कमरे कि तरफ बढ़ा औऱ झटके सें कमरे कां दरवाजा खोलकर अंदर दाखिल होँ गय़ा। जबकि मैंने जल्दी हि अपना हाॅथ छुड़ा लिया थां। अंदर दाखिल होते हि पिताजी ऊॅची आवाज़ मे एक् तरफ उॅगली कां इशारा करतेहुए बोला___"यह देख शंकर, यह हैं तेरीनई अम्मा। अरेदेख नं बेटीचोद तुम्हे यकीन नहि हौ रहा थां न्। देखयह बैठी हैं तेरी अम्मा चारपाई पऱ। "
मैंने अंदर कि तरफसिर करके चारपाई कि तरफ देखा तौ चौंक पड़ा। सच मे अंदररखी चारपाई पर्र कोई स्त्री बैठी थि। नई साड़ी मे बड़ा सां घूॅघट किये थि वो। इसलिए मे उसका चेहरा नं देखसका। पर्र इतना बहुत थां मुझे हैरत मे डालने केँ लिए। मे उस महिला कों देखने केँ बाद आश्चर्य सें पिताजी कि तरफ देखा। मुझे अपनीतरफ देखता देख पिताजी बड़े अजीबभाव सें मुस्कुराया औऱ फिन कमरे सें बाहर् बरामदे मे आँ गय़ा।
"क्यूं पिताजी?" मैने भारी आवाज़ मे कहा__"क्यूं कियाऐसा? हम् कोई बच्चे तोँ नहि थें जौ हम् अम्मा केँ बिराजी नहि सकते थें। तुम् तोँ देख हि रहे होँ पिताजी कि तुम्हारे बच्चे स्वयं अब ब्याह करने लायक होँ गए हें फिन स्वयं ब्याह करने कि क्याँ ज़रूरत थि तुम्हें?"
"ज़रूरत थि बेटवा। " पिताजी नें कहा___"बल्कि बहोत ज़रूरत थि मुझे। तेरी अम्मा तौ मर गई मगर मेरी जज्ञस्मानी ज़रूरतों कों अबकौन पूरी करता? वैसे तेरी अम्मा केँ रहतेहुए भि कुछ नहि होता थां। अच्छा हुआ सालीमर गई। मुझ पऱ औऱ मेरे लौड़े पर्र ज़रा सां भि तरस नहि आता थां उसे। जब भि उससे कहता कि आज बहोत दिलकर रहा हैं एक् बारदे दो तौ सालीऐसी बिदकती थि जैसे दुधारू गाय हौ। "
"यह तुम् क्याँ बकवास कररहे होँ पिताजी?" मैने पूरी शक्ति सें चीखते हुए कहा___"लज्जा आनी चाहिए तुम्हें अपने बेटे केँ सामने उसकी अम्मा केँ लिएऐसा बोलने पऱ। "
"इसमें लज्जा कैसी बछुवा?" पिताजी ढिठाई सें मुस्कुराया___"जोँ सचबात हैं वही तोँ बोलरहा हूॅ मे। "
"मुझे नहि सुनना तुम्हारी यह बेहूदा बातें। " मैने गुस्से सें कहा औऱ पलटकर बाहर् कि तरफ अपनी चारपाई केँ पास आँ गय़ा। मेरा दिमाग़ बहोत ज़्यादा ख़राब हौ गय़ा थां। मगरयह भि सच थां कि अब हौ भि क्याँ सकता थां?
मे अपने अंदर हज़ारों तरह कि बातें लिए चुपचाप चारपाई पऱ लेट गय़ा। मुझे पिताजी पऱ बहोत क्रोध आँ रहा थां। मगर मे कुछकर नहि सकता थां। इसलिए अपने गुस्से कों बड़ी मुश्किल सें काबू कियेहुए ऑखेंबंद करके सोने कि कोशिश करनेलगा थां। मगर कम्बख्त ऑखों मे नींद कां दूरदूर तक कोई आभास भि नहि होँ रहा थां।
अभि मुझे लेटेहुए कुछ हि देर हुइ थि कि तभी अंदर सें किसी स्त्री कि चीख सुनाई दि। मेरी ऑखेंखुल गईंमगर मे उठा नहि। मे समझ चुका थां कि पिताजी अपनीनई नवेली जोरू केँ पास हि होगा औऱ उसकेसंग वहीकर रहा होगा जोँ हर विवाह शुदा मर्द महिला करते हें विवाह केँ बाद। इस लिए मे चुपोआप लेटारहा। मे इसबात सें हैरान अवश्य हुआ कि पिताजी कों ज़रा भि लज्जा नहि हैं कि घऱ मे उसकेपाॅ पाॅच जवान बच्चे मौजूद हें औऱ वोँ कमरे सें क्याँ सुनारहा हैं उन्हें।
मे यहसभी सोच हि रहा थां कि एक् बारफिन सें मेरे कानों मे स्त्री कि चीख़ सुनाई दि संग हि पिताजी कि गालियाॅ भि। लेकिन इसबार मे चीख़सुन कर बुरीतरह उछल पड़ा थां। क्योंकि चीख़ मे शामिल मेरानाम थां। उस आवाज़ कों मे लाखों मे पहचान सकता थां। यह चंदा कि चीख़ थि। जीहाॅ, यह चंदा हि थि। मगर मे चकितइस बात पऱ थां कि वोँ यहाॅ केसे? अभि मे यहसभी सोच हि रहा थां कि एक् बारफिन सें ज़ोरदार चीख़ मेरे कानों पर्र पड़ी। इस बार मुझे स्पष्ट सुनाई दिया औऱ मुझे बिलकुल भि संदेह नं हुआ। यह यकीनन चंदा हि थि, मेरी चंदा। यह जानकर कि वोँ चीख़ मेरी चंदा कि हि हैं मे एकदम सें पागल सां हौ गय़ा औऱ चारपाई सें उतरकर बिजली कि सि तेज़ी सें अंदर कि तरफ भागा। पलक झपकते हि मे बरामदे मे पहुॅच गय़ा।
मेरी नज़र कमरे केँ दरवाजे केँ पास खड़े मेरे मॅझले भइयाजगन पर्र पड़ी। वोँ अधखुले दरवाजे सें कमरे केँ अंदर कि तरफदेख रहा थां। यहदेख कर मेराखून खौल गय़ा। मुझेलगा कि वोँ अंदर वोँ सभीदेख रहा हैं जौ कदाचित मेरा पिताजी मेरी चंदा केँ संग करने कि कोशिश कररहा होगा। मे भलायह केसे बर्दास्त कर सकता थां? मैने देखा कि बरामदे केँ दाहिनी तरफ मेरी दोनो बहने यानी रीनातथा मीना ज़मीन पर्र हि एक् पुरानां चद्दर बिछाकर लेटी हुई थि औऱ उनकेबगल सें हि मेरा छोटा भइयामदन लेटाहुआ थां। बरामदे केँ बाईंतरफ कोने मे किचन थि।
जगन कों इसतरह चोरी छुपे अंदर कि तरफ देखते हुएदेख कर मे तेज़ी सें उसकीतरफ बढ़ा औऱ पीछे सें हि उसकी शर्ट कां कालर पकड़कर अपनीतरफ खींचा औऱ फिनउसे पलटाकर एक् झन्नाटेदार थप्पड़ उसकेगाल पऱ रसीदकर दिया। उसकोइस सबकी उम्मींद हर्गिज़ भि नं थि। इधर मे इतने पर्र हि नं रुका थां, बल्कि उसको पकड़कर पूरी शक्ति सें एक् तरफ उछाल दिया। वोँ लड़खड़ाता हुआ दीवार सें टकराया औऱ नीचेगिर गय़ा। तभी मेरे कानों मे चंदा कि चीख़फिन सें पड़ी। मेरा ध्यान उसतरफ गय़ा तोँ मे जगन कि तरफ नं जाकर पलटा औऱ तेज़ी सें कमरे केँ अंदर कि तरफ दौड़ गय़ा।
कमरे केँ अंदर कां नज़ारा देखकर मे गुस्से सें पागल हौ गय़ा। मेरा पिताजी चंदा केँ ऊपर चढ़ाहुआ उसका ब्लाऊज फाड़रहा थां। नशे कि हालत मे उसे ज़रा भि होश नहि थां कि वोँ क्याँ कररहा हैं? पिताजी केँ नीचेदबी चंदा बुरीतरह छटपटाए जारही थि औऱ चीखेजा रही थि। यहसभी देखकर मे उसतरफ बिजली कि सि तेज़ी सें लपका औऱ फिन मैने पिताजी कों पीछे सें पकड़कर पूरी ताकत सें अपनीतरफ खींचा औऱ फिन कमरे केँ फर्श पऱ करीब फेंक दिया। पिताजी नशे मे लड़खड़ाता ज़मीन पऱ लुढ़कता चला गय़ा थां।
"तेरी हिम्मत केसे हुइ मेरी चंदा कों इसतरह हाॅथ लगाने कि?" मैने गुस्से सें चीखते हुए झुका औऱ पिताजी कों दोनो हाॅथों सें पकड़कर उठा लिया___"तुँ इतनागिर गय़ा हैं कि तुम कोयह भि होश नहि आया कि तूँ किसके संगयह नीचता कररहा हैं?"
"अबे छोंड़ मादरचोद। " पिताजी नशे मे ज़ोर सें चिल्लाया__"मुझे अपनीनई नवेली मेहरिया केँ संग सुहागरात मना लेनेदे। साला कैसा बेटा हैं तूँ कि अपने बाप कों उसकी मेहरारू केँ पास भि नहि जाने देता?"
"ज़ुबान कों लगामदे पिताजी। " मैने पिताजी केँ कालर कों पकड़कर उसे झकझोरते हुए कहा___"वरना यहीं पऱ ज़िंदा गाड़ दूॅगा तुम को। तेरीपता थां न् कि मे चंदा कों पसन्द करताहूॅ औऱ उसी सें विवाह करना चाहता हूॅ इसके बावजूद तूने मेरी चंदा सें ब्याह कर लिया। ऐसा क्यूं किया पिताजी? चंदा तौ तेरी अपनी बेटी केँ समान हि थि फिन क्यूं उससे ब्याह किया तूने? तुम्हें अपनेइस बेटे कि खुशियों कां ज़रा भि ख़याल नहि आया?"
"बकवास नां कर हरामखोर। " पिताजी मुझसे छूटने कि कोशिश करतेहुए चीखा___"वोँ तेरी अम्मा हैं समझे। बार बार मेरी चंदा मेरी चंदा कि रट क्यूं लगारहा हैं तूँ?"
"क्योंकि चंदा मेरी हि थि पिताजी। " मैने चीखा___"मे उससे प्यार करता थां औऱ करता रहूॅगा। तुँ भि तौ जानता थां यहसभी। फिन क्यूं उससे ब्याह रचाया तूने? क्यूं अपने बेटे कां गर बसने सें पहले हि उजाड़ दिया तूने?अरे तुम को अपना ब्याह हि करना थां तौ किसी दूसरी लड़की सें कर लेता पिताजी। चंदा सें ब्याह करके तूने मेरी खुशियों कां गला क्यूं घोंट दिया?"
"अरे मुझेकुछ नहि पता थां इस बारे मे। " पिताजी नें कहा__"औऱ फिनअगर तुँ चंदा कों पसन्द हि करता थां औऱ उससे ब्याह हि करना चाहता थां तोँ तुम को बताना चाहिये थां न्। पर्र तूने तोँ कभी बताया हि नहि। अबअगर मैने उससे ब्याह कर लिया तौ इसमे मेरी क्याँ ग़लती हैं?"
"सारी ग़लती हैं तेरी। " मे पूरी शक्ति सें चीखा___"तूने चंदा सें उसकी मर्ज़ी केँ बिना ब्याह किया हैं। यहबात मे अच्छी तरह जानता हूॅ। तूने चंदा केँ बाप कों पैसों कां लालच दिया होगा। तभी चंदा केँ बाप नें अपनी बेटी कां ब्याह तुझसे किया होगा। उस कसाई कों भि अपनी बेटी कि खुशियों सें कोई लेना देना नहि थां। तभी तौ ऑखबंद करके उसने एक् बूढ़े सें अपनीकम उमर बेटी कां ब्याह कर दिया। मुझेपता हैं कि चंदाइस ब्याह हेखुश नहि हैं। अगरखुश होती तौ वोँ इसतरह चीखती नहि। "
"अरे शुरुआत शरु मे हर स्त्री थोडा बहोत चीखती हैं उर घबराती हैं। " पिताजी नें कहा___"मगर जब एक् बार लौड़ा अंदर गय़ा तौ सारी घबराहट औऱ सारा चीखना बंद हौ जाता हैं। वही तौ करनेजा रहा थां मे। मगर ससुरी ज़्यादा हि उछलरही थि। मगरकोई बात नहि, सुहागरात तोँ मे मना केँ हि रहूॅगा। "
मे पिताजी कि इसबात सें बुरीतरह तिलमिला गय़ा। मेरे अंदर गुस्से कि ज्वाला धधकउठी। मे पिताजी कों खींचकर कमरे सें बाहर् लाया औऱ बरामदे मे लाकर ज़ोर कां झटकादे कर ज़मीन पऱ पटक दिया। पिताजी केँ मुख सें दर्द मे डूबीचीख निकल गई। वोँ मुझे गंदी गंदी गालियाॅ बकनेलगा। मेरा क्रोध औऱ बढ़ गय़ा। मैंने उसेउठा कर दीवार सें सटा दिया औऱ उसकी गर्दन पर्र अपने दोनों हाॅथ ताकत सें जमा दिये। नतीजा यहहुआ कि पिताजी बुरीतरह छटपटाने लगा। उसकी ऑखें बाहर् कों निकलने केँ लिए आतुर होँ उठीं। मुझे गुस्से मे अबकुछ भि दिखाई नहि देरहा थां। मे मजबूती सें पिताजी कां गला दबाएजा रहा। तभी पीछे सें किसी नें मेरेसिर पर्र किसीठोस चीज़ कां वार किया। मेरेहलक सें चीख़ निकल गई। ऑखों केँ सामने पहले तौ रंग बिरंगे तारे नाचे उसकेबाद ऑखों केँ सामने अॅधेरा सां छाताचला गय़ा। मे दोनो हाॅथों सें अपनासिर थामे लहराकर वही बरामदे कि ज़मीन पर्र धड़ाम सें गिर पड़ा। उसकेबाद मुझेयाद नहि कि आगे क्याँ हुआ?
जब मुझेहोश आया औऱ मेरी ऑखें खुलीं तोँ एकाएक हि तेज़ प्रकाश सें मेरी ऑखें चुॅधिया गईं। मैने धीरे-धीरे धीरे-धीरे करके अपनी ऑखें खोलीं तोँ ऑखों केँ सामने खुला आसमान नज़रआया। पहले तोँ मुझेकुछ समझ नं आया इसकेबाद जब मैने ग़ौर सें हर चीज़ कों देखा तौ थोडा थोडा समझआया। मैने झटके सें उठने कि कोशिश कि तौ मेरेमुख सें दर्दभरी कराह निकल गई। सिर केँ पिछले भाग मे तेज़ पीड़ा हुइ थि। मेरा एक् हाॅथ स्वतः हि उस चोंट वाले हिस्से पऱ चला गय़ा। मुझे मेरे हाॅथ मे कुछ चिपचिपा सां महसूस हुआ। मे धीरे-धीरे धीरे-धीरे करकेउठा औऱ वहीं पर्र बैठ गय़ा।
बैठकर मैनेइधर उधर देखा तौ पताचला कि मे किसीखेत केँ बीच पऱ बैठाहुआ हूॅ। एक् तरफ करीबदो सौगज कि दूरी पऱ गाॅव कि आबादी दिखरही थि। किनारे पर्र बने अपनेघऱ कों पहचानने मे मुझ ज़रा भि देर न् लगी। इसका मतलब मे अपनेघऱ केँ पिछवाड़े हि दोसौगज कि दूरी पर्र थां। मेरे दिमाग़ नें काम करना शुरुआत किया तौ मेरी ऑखों केँ सामने पिछली रात कि सारी घटना किसी चलचित्र कि भाॅति घूमने लगी।
सभी कुछयाद आते हि मुझे सबसे पहले चंदा कां ख़याल आया। मेरेमन मे विचार उठा कि चंदा कैसी होगीअब? पिछली रात पिताजी नें क्याँ किया होगा उसकेसंग? कहीं पिताजी नें चंदा कि इज्ज़त तोँ तारतार तौ नहि कर दिया?हे ईश्वर, अब क्याँ होगा? मेरी चंदालुट गई होगी औऱ मे अपनी चंदा कि सुरक्षा भि नं करसका। यहसभी विचार मन मे आते हि मे एकदम सें दुखी हौ गय़ा औऱ मेरी ऑखों सें ऑसूबह चले। मुझे चंदा कि बेहद फिक्र होनेलगी। इसलिए अपने दर्द कि परवाह किये बिना मे उठा औऱ अपनेघऱ कि तरफ तेज़ी सें बढ़चला। मैने महसूस किया कि यह सुभह कां टाइम थां। आसमान मे सूर्य कां प्रकाश अभि अधिक तेज़ नं हुआ थां।
मे अपनेघऱ कि तरफ तेज़ी सें बढ़ता चलाजा रहा थां। मेरेमन मे बस एक् हि बातचल रही थि कि चंदा कैसी होगीअब? मे ईश्वर सें प्रार्थना भि करताजा रहा थां कि चंदा कों कुछ न् हुआ होँ। कुछ हि टाइम मे मे घऱ केँ पिछवाड़े कि तरफ पहुॅच गय़ा। एक् तरफवही कुआॅ थां जिसमें गिरकर मेरी अम्मा मर गई थि। कुएॅ वाली स्थान सें कुछ हि दूरी केँ फाॅसले सें चलतेहुए मे घऱ केँ पिछवाड़े पऱ आँ गय़ा। पीछे कि दीवार सें चलतेहुए मे उस हिस्से पऱ आया जहाॅ पर्र घऱ कि दीवार ख़त्म होँ जाती थि औऱ फिन लकड़ी कि बाउंड्री चारोतरफ सें बनाई गई थि। मे लकड़ी कि उस बाउंड्री केँ शुरूआती हिस्से पर्र आया हि थां कि मेरे कानों मे मेरे मॅझले भइयाजगन कि आवाज़ पड़ी तोँ मे रुक गय़ा।
"रीना नें सहीसमय पऱ शंकर केँ सिर पऱ लट्ठ मारी थि पिताजी। " जगन कि आवाज़___"वरना तुम्हारा तोँ कल्याण हि कर दिया थां शंकर नें। "
"हाॅयह तोँ सहीकहा तूने। " पिताजी कि आवाज़___"सभी कुछ वैसा हि करना थां जैसा कि हमने तरकीब बनाई थि। मगर तूने अपनाकाम सही सें नहि कियाजगन। वरना शंकर कों इतना क्रोध नहि आता औऱ नाँ हि तुम्हें उससेमार खानी पड़ती। "
"यह दरवाजे सें तुम्हारी औऱ चंदा कि फिल्म देखरहा थां पिताजी। " मदनकह उठा___"जबकि मैने औऱ रीना नें इसेमना भि किया थां कि तरकीब केँ अनुसार हमें चुपचाप यहीं पऱ लेटे रहना हैं। मगरयह नहि माना औऱ अंदर कि फिल्म देखने लगा। उधर जैसे हि चंदा कि चीख़ शंकर केँ कानों मे वैसी हि वोँ दौड़ते हुए यहाॅ आँ गय़ा औऱ दरवाजे पर्र जगन कों इसतरह अंदर कि तरफ झाॅकते देखउसे गुस्स आँ गय़ा। बसफिन तौ इसको पिटना हि थां पिताजी। "
"हाॅथ तोँ मे भि उठा सकतामदन। " जगन नें तीखेभाव सें कहा___"मगर मैने सोचा कि उससेकाम नं बिगड़ जाए। इस लिए मैनेउस कमीने शंकर पर्र हाॅथ नहि उठाया। वरना क्रोध तौ मुझे भि भयंकर आँ गय़ा थां उस पऱ। "
"अच्छा हुआ कि तुमने हाॅथ नहि उठाया उस पर्र। " रीना नें कहा___"वरना कुछ औऱ हि होने लगता औऱ हमारा खेल बिगड़ जाता। "
"यह सभी तौ ठीक हैं पिताजी। " मीना कि आवाज़___"मगर मुझेअब तक यहसमझ नहि आया कि यहसभी चक्कर क्याँ हैं? मतलबयह कि अम्मा केँ रहने पऱ भि औऱ उसके मरने केँ बाद भि तुम्हारी जिस्मानी ज़रूरत तौ हम् दोनो बहनें मिलकर पूरीकर हि देतीथीं। फिन तुम्हें चंदा सें ब्याह करने कि क्याँ ज़रूरत पड़ गई? क्याँ इसलिए कि अब तुम्हारा हमसेदिल भर गय़ा हैं? दूसरी बात शंकर भइया कों इसमें लपेटने कां क्याँ मतलब हैं?"
"यह सारा चक्कर तौ इसजगन कि वजह सें हि चलाना पड़ा मेरी राॅड बेटी। " पिताजी कि आवाज़___"असल बातयह थि कि इसे भि पताचल गय़ा थां कि शंकर चंदा सें प्यार करता हैं औऱ उससे ब्याह करना चाहता हैं। अबभला जगनयह केसे बरदास्त कर लेता कि उसका बड़ा भइया जिसे वोँ बचपन सें हि पसन्द नहि करता हैं वोँ किसीवजह सें खुश होँ जाए?इस लिए शंकर औऱ चंदा केँ विषय मे पता चलते हि यह मेरेपास आया औऱ मुझसे बोला कि शंकर कां ब्याह चंदा सें किसी भि कीमत पऱ नहि होना चाहिए। इसने एक् दोबार चंदा कों देखा थां इसवजह सें यह भि उसे पसन्द करनेलगा थां। मगरइसे यहबात अच्छी तरहपता थि कि चंदा इसके प्यार कों स्वीकार नहि करेगी। इसलिए इसने सोचा कि अगर चंदा इसकी नहि तौ शंकर कि भि नहि होगी। मैने इससे पूछा कि फिनयह चाहता क्याँ हैं तौ इसनेकहा कि कुछऐसा करो पिताजी कि चंदाइस घऱ मे हमेशा केँ लिए आँ जाए औऱ हम् सभीमिल कर जिंदगी भरउसे भोगें। बात क्योंकि सबकेभले कि थि इसलिए मुझे भि इसकीबात पसन्द आई। मगर प्रश्न यह थां कि ऐसा होगा केसे? क्योंकि चंदा तौ शंकर सें प्यार करती थि औऱ शंकर उससे ब्याह भि करना चाहता थां। मे भले हि उसे ब्याह सें इंकार कर देतामगर उसकी वोँ सती सावित्री अम्मा उसकी खुशी हि देखती औऱ नतीजा यह होता कि वोँ शंकर कां ब्याह उस चंदा सें अवश्य करा देती। जबकि ऐसा हम् चाहते हि नहि थें। इसलिए हमने सोचा कि सबसे पहले हमें अपने रास्ते सें शंकर कि उस ससुरी अम्मा कों हि हटाना पड़ेगा। वैसे भि वोँ साली किसीकाम कि तौ थि नहि। स्वयं तोँ मुझेकभी देती नहि थि ऊपर सें उसकेडर सें हम् आपस मे भि मजा नहि कर पाते थें। इसलिए उसे अपने रास्ते सें हटाने कां सोच लिया हमने। यह बात तौ तुम् सबकोपता हि हैं कि केसे हम् लोगों नें मिल शंकर कि अम्मा कों अपने रास्ते सें हटाया थां। वोँ शंकर सालाआज भि यही समजता हैं कि उसके अम्मा कि मौतमहज एक् हादसा थां जौ ईश्वर केँ विधान केँ हिसाब सें हौ गय़ा थां। मगरउसे क्याँ पता कि उसकी अम्मा कों हमने केसेसोच समझकर अपने रास्ते सें हटाया हैं? हरदिन कि तरहउस दिन भि मे शंकर कों लेकरकाम पर्र चला गय़ा थां औऱ तुम् सबको समझा दिया थां कि कब क्याँ करना हैं। बस तुम् लगों नें वैसा हि किया थां। यानी कि जैसे हि शंकर कि अम्मा नहाने केँ लिए कुएॅ मे गई तौ जगन औऱ मदन भि छुपकर उसतरफ चल दिये। शंकर कि अम्मा नें जब बाल्टी कों रस्सी सें बाॅधकर कुएॅ मे डाला औऱ पानी सें भरी बाल्टी कों खींचना शुरुआत किया तौ तभीजगन औऱ मदन दोनो नें मिलकर अम्मा कों पीछे सें धक्का दे दिया। जिससे अम्मा रस्सी बाल्टी सहित कुएॅ मे जा गिरी। उसको तैरना तोँ आता नहि थां इसलिए थोड़ी हि देर मे साली पानी मे डूब गई। कुछ घंटेबाद जब वोँ वापस पानी कि सतह पर्र आँ गई तौ जगन औऱ मदन दोनो हि समझगए कि अम्मा कां रामनाम सत्य होँ चुका हैं। इसलिए जल्दी हि अंदरआकर रीना कों कह दिया कि अब वोँ आगे कां कामकरे। रीना भागती हुईँ हमारे पासआई औऱ अम्मा केँ मरने कि सूचना हमें दि। बस उसकेबाद कां तोँ सबकोपता हि हैं कि क्याँ केसेहुआ?"
"अम्मा केँ मरने कां तौ पता हैं पिताजी। " मीना नें कहा___"मे चंदा वाले चक्कर कां पूछरही हूॅ। उसके बारे मे बताओ। "
"अम्मा केँ मर जाने सें हमारा मार्ग साफ होँ गय़ा थां। " पिताजी नें कहा___"मगर शंकर बेचारा अवश्य अपनी अम्मा केँ मर जाने सें ग़मज़दा हौ गय़ा थां। जबकुछ दिन उसकी अम्मा कों मरे हौ गए तौ हमनेआगे कां काम शुरुआत किया। मे हरदिन शंकर कों काम पर्र लगाकर चारचार घंटे केँ लिए गायब हौ जाता औऱ सीधा चंदा केँ गाॅव उसकेघऱ पहुॅच जाता। चंदा कां बाप मंगा साकेत थोडा लालची किस्म कां थां औऱ गॅजेड़ी भि थां। कामधाम करके जोँ भि कमाता उसे वो गाॅजा पीकर औऱ देसी चढ़ाकर उड़ा देता थां। मैने उसकीइसी आदत कां फायदा उठाया औऱ रोज़उसे देसी दारू पिलाता औऱ स्वयं भि पीता। कुछ हि दिन मे मेरी उससेखूब बननेलगी। एक् तरह सें मे उसका पक्का दोस्त बन गय़ा थां। ख़ैर, इसी तरहकुछ दिन गुज़र गए। जब मुझे लगनेलगा कि अब मुख्य बातआगे बढ़ाने सें नुकसान नहि हैं तौ मैने उससे मुद्दे कि बात छेंड़ दि। सबसे पहले तोँ मैनेबस उसकेमन औऱ विचार कां हि पता लिया। चंदा केँ ब्याह केँ बारे मे पूछा उससे तौ कहनेलगा कि उसे चंदा केँ ब्याह कि हि चिंता हैं। मगर आर्थिक हालत बहोत अधिक खराब होने कि वजह सें वोँ चंदा कां ब्याह कर नहि पारहा हैं। मैंने उसे एक् सुझाव दिया कि किसीऐसे आदमी सें वो चंदा कां ब्याह करदे जोँ उमर मे चंदा सें थोडा बहोत बड़ा हौ। इससेउसे अधिक दहेज भि नहि देना पड़ेगा। मेरीबात उसेजॅच गई। आख़िर उसे अपने हालात कां तौ पता हि थां इसलिए बेबसी मे हि सही लेकिन उसेइस बारे मे सोचना हि पड़ा। उसने मुझसे पूछा कि ऐसाकौन ब्यक्ति हैं जौ चंदा सें उमर मे थोडा बहोत बड़ा हौ औऱ उसे दहेज न् देना पड़े तौ मैनेयूॅ हि मज़ाक मे उससेकह दिया कि मेरेसंग हि करदे अपनी चंदा कां ब्याह। मे दहेज मे उससेकुछ नहि मागूॅगा बल्कि उल्टा उसे हि थोडा बहोत पैसा रुपया दे दूॅगा। मैनेयह बात उससेबस उसकामन देखने केँ उद्देष्य सें कही थि वोँ भि हॅसते हुए। वोँ मेरीयह बातसुन कर हैरान तोँ हुआमगर फिन बोला कि दोस्त अगरसच मे तुम् मेरीचंद सें ब्याह करलो तोँ मुझेकोई ऐतराज़ न् होगा। हाॅ उमर अवश्य तुम्हारी थोड़ी क्याँ बहोत ज़्यादा हैं मगरकोई बात नहि। लड़के बच्चे तोँ पहले सें हि हें तुम्हारे तौ बच्चे केँ लिएकोई झंझट हि नहि रहेगी। कहने कां मतलबयह कि मज़ाक मे कही हुइ मेरीबात चल गई। बसफिन क्याँ थां? मैने ज़रा भि देर नहि कि औऱ फटाफट चंदा सें ब्याह कर लिया मैने। इस ब्याह मे मैने चंदा केँ बाप कों पूरे पचास हज़ार रुपये दिये थें। कुछ ब्याह केँ खर्च केँ लिए औऱ कुछ खुशी सें। इतने सारे पैसे एक् संग पाकर चंदा कां बाप भि खुश हौ गय़ा थां। इस ब्याह मे कोईताम झाम करने कां मैने पहले हि मनाकर दिया थां। इसलिए किसी कों ज़्यादा कुछपता भि नहि चला। उस दिन भि मे चंदा केँ बाप कों देसी दारू पिलाकर औऱ पीकरआया थां जिसदिन मैने चंदा सें ब्याह रचाकर उसेघऱ लाया थां। मुझेपता थां कि शंकर कों जबयहसभी पता चलेगा तौ वोँ पागल सां हौ जाएगा। मगरकुछ कर नहि पाएगा। क्योंकि सबसे बड़ी सच्चाई तोँ यहीबन जाएगी नं कि चंदाअब उसकी प्रेमिका नहि बल्कि अम्मा हैं। अगर उसमें ज़रा सि भि ग़ैरत होगी तोँ वोँ स्वयं हि इसगर कि छोंड़ कर कहींचला जाएगा याँ फिन जिंदगी भर अपनी चंदा कों अम्मा केँ रूप मे देखकर अंदर हि अंदर तड़पता रहेगा। जबकि हम् सभीहर दिनहर रात उसकी चंदा कां भोग लगाएॅगे। "
बाहर् दीवार कि ओट मे खड़ा मे पिताजी कि यहसभी बातें सुनरहा थां। मेरा चेहरा ऑसुओं सें तर थां। अपनी स्थान पर्र मे इसतरह खड़ारह गय़ा थां जैसे किसीऋषी नें मुझे पत्थर बन जाने कां श्राप दे दिया होँ। इतना बड़ाछल, इतना बड़ा अपराध किया थां इन लोगों नें मिलकर जिसकी कोई सीमा नहि थि। एक् बाप केँ अपनी हि बेटी केँ संग नाजायज़ संबंध थें औऱ मेरे दोनो भाइयों केँ अपनी बहनों केँ संग। यह एक् ऐसी सच्चाई थि जिसे मे सभीकुछ सुन लेने केँ बावजूद हजम नहि करपारहा थां। मेरे अंदर जज़्बातों कां भयंकर तूफान चालू थां। ऐसालग रहा थां जैसे सारी कायनात कों एक् झटके मे शोलों केँ हवाले करदूॅ। मगरऐसा करना मुझसे संभव नं थां। जबकि उधर,,,,
"यह सभी छोंड़ो पिताजी। " तभीजगन कि आवाज़ मेरे कानों मे पड़ी___"अब तोँ जौ होना थां वोँ तोँ होँ हि गय़ा। हमनेकल रातजी भर केँ चंदा केँ मज़ेलिए। शपथ सें पिताजी बड़ा हि कड़कमाल थि चंदा। साली नें ग़जब कां मजा दिया। "
"मजा तोँ हमने ज़बरदस्ती लिया भइया। "मदन नें कहा___"वोँ तोँ हमें हाॅथ भि नहि लगाने देरही थि। बारबार हमसेरहम कि भीख माॅगरही थि औऱ अपनी इज्ज़त कि दुहाई देरही थि। मगर हमने तौ मजा करना थां सो किसीतरह कर हि लिया। बाद मे तौ उसके भि कसबल ढीलेपड़ गए थें। सालीऐसे लेटीरह गई थि जैसेकह रही हौ कि आओ औऱ करलो जौ करना हौ। हाहाहाहा। "
"नयामाल मिल गय़ा तौ कलरात हम् बहनों कि तरफ देखा भि तुम् लोगों नें। " रीना कि आवाज़ मे शिकायत थि, बोलीं___"सच कहती हें औरतें कि सभी मर्द एक् जैसे हि होते हें। नया औऱ ताज़ा बिलमिल गय़ा तोँ भोसड़े कि तरफफिन देखते भि नहि मर्द। "
"अरे ऐसीकोई बात नहि हैं मेरी रंडी बेटी। " पिताजी कि आवाज़___"बस कलरात कि ज़राबात हि अलग थि न् इसलिए। बाॅकी यह तौ तुँ भि जानती हैं न् कि नयानौ दिन तौ पुरानां सभीदिन। इसलिए चिंता मतकर तुम् दोनो हमारी असलीमाल हि हौ। "
"पिताजी बड़ादिल कररहा हैं। " जगन कि आवाज़___"ऐसा लगता हैं कि फिन सें चंदा रानी केँ पास जाऊॅ औऱ तबीयत सें उसकीबजा करआऊॅ। "
"भइया तूने तौ मेरेमुह कि बातकह दि। " मदन कि आवाज़ सुनाई दि___"मेरा भि बहोत दिलकर रहा हैं चंदा कों पेलने कां। चल दोनो एक् एक् बार तबीयत सें पेलकर आते हें उसे। क्यूं पिताजी तुम्हें भि चलना हैं???"
"अरे नहि भई। " पिताजी कि हॅसी कि आवाज़___"तुम् दोनो हि जाओ। मुझमें अभि इतनी शक्ति नहि हैं कि तुम् लोगों कां संगदे सकूॅ। सालाकल रात दारू केँ नशे मे समझ मे हि नहि आया कितनी मेहनत हौ गई मुझसे। अबजब दारू उतरी तौ समझ आँ रहा हैं कि टाॅगों मे जान हि नहि हैं। "
"हाहाहाहाहा लें भइया। "मदन केँ ठहाकों कि आवाज़ गूॅजी___"पिताजी तोँ गय़ा काम सें। चल हम् दोनो हि किलाफतह करकेआते हें। "
"हाॅहाॅ जाओजाओ। " मीना कि आवाज़___"कर लो किलाफतह। मगरयाद रखनालौट कर हमारे पास हि आओगे। "
"जानेदे मेरी राॅड बिटिया। " पिताजी बोला___"नया माल हैं न् इसलिए उसकी चुलुक कुछ ज़्यादा हि होती हैं। यादकर जबइन लोगों तुम् दोनो केँ संगजब किया थां तौ केसे सारादिन तुम् दोनो केँ पीचे पीछे घूमते रहते थें?"
"अच्छी तरहयाद हैं पिताजी। " मीना केँ हॅसने कि आवाज़ आई___"यह दोनो हम् दोनो बहनों केँ पीछे पीछेलगे हि रहते थें। इन लोगों कों तौ यह भि होश नहि रहता थां कि अम्मा कों अगरपता चल गय़ा तोँ क्याँ ग़जब हौ जाएगा?"
बाहर् खड़ा मे यहसभी सुनरहा थां औऱ अंदर हि अंदर गुस्से कि आग मे जलाजा रहा थां। मुझेलग रहा थां कि अभि जाऊॅ औऱ सबको एक् संग ख़त्म करदूॅ। मेरे हाॅथों कि दोनों मुट्ठियाॅ कसगईं थि। जबड़े शख्ती सें भिंचगए थें। नथुने फूलकर गुब्बारा हुएजा रहे थें। तभी,,,,
"ओएऽऽ बाऽऽऽपू ग़जब हौ गय़ा रे। "जगन कि करीब-करीब बदहवाशी सें भरी आवाज़ सुनाई दि___"सभी गड़बड़ हौ गय़ा। अब क्याँ होगा पिताजी???"
"अरे क्याँ हुआ?" पिताजी नें घुड़की सि दि___"क्यूं चिल्ला रहा हैं? क्याँ गड़बड़ होँ गय़ा???"
"पिताजी वोँ वोँ चंदा। "मदन कि लड़खड़ाती हुआ आवाज़ सुनाई दि___"अंदर वोँ चंदाऐसे पड़ी हैं जैसेमर गई हैं। "
"क्याँ बकता हैं मादरचोद??" पिताजी कि जैसेचीख हि निकल गई थि, बोला___"बहनचोद सालेशुभ शुभबोल। "
"मदनसच कहरहा हैं पिताजी। " जगन कि आवाज़__"हम् दोनों जब अंदरगए तौ देखा चंदा चारपाई पर्र आधी लटकी हुई पड़ी थि एकदम वैसी हि नंगी हालत मे जैसेकल रात हम् छोंड़ करआए थें उसे। मैने उसकी नाॅक केँ पास उॅगली रखी औऱ उसकी कलाई कि नब्ज भि देखी। मगर नाँ हि उसके नाॅक सें साॅस आँ जारही हैं औऱ नाँ हि नब्ज चलती हुईँ महसूस होँ रही हैं। इसीलिए हमेंलग रहा हैं कि चंदा कां रामनाम सत्य होँ गय़ा हैं। अब क्याँ होगा पिताजी? चंदाअगर सच मे मर गई औऱ यहबात गाॅव वालों कों पतालग गई तोँ हम् कहीं केँ नं रह जाएॅगे पिताजी। "
जगन कि इन बातों केँ बादकुछ देर तक कोई आवाज़ नं आई। जैसेउधर सबको साॅप सूॅघ गय़ा होँ। बाहर् खड़ा मे भि यहसुन कर जैसे बेजान लाश मे तब्दील हौ गय़ा थां। जिसका डर थां वोँ तौ होँ हि चुका थां लेकिन इस सबका परिणाम यह निकलेगा यह मैने स्वप्न मे भि नहि सोचा थां। मुझेलगा कि मे दहाड़ें मारकर रो पड़ूॅ मगर मैने अपने अंदर केँ मचलते हुए जज़्बातों कों बड़ी मुश्किल सें दबाया हुआ थां। जबकि उधर,
"यह तौ सच मे बहोत हि बुराहुआ। " पिताजी कि आवाज़ मे डरवभय झलकरहा थां___"यह सभी हमारी वजह सें हि हुआ हैं। हमने अपने मज़े केँ चक्कर मे यह भि नहि सोचा कि कच्ची उमर कि उस चंदा केँ संग इतनाकुछ एक् हि बार मे नहि करना चाहिए थां। वरना उसका परिणाम यकीनन यही निकलेगा। दूसरी बात हमने शंकर कों रात मे खेतों पर्र फेंकआए थें। वोँ उस वक़्त बेहोशी हालत मे थां। संभव हैं कि उसेअब तक होश भि गय़ा होगा। अब अगरइस परिस्थिति मे वोँ यहाॅ आँ गय़ा तोँ हम् सोच भि नहि सकते हें कि वोँ क्याँ कर डालेगा? चंदा कों इसहाल मे देखेगा तौ वोँ यकीनन हम् सबकेलिए कालबन जाएगा। "
"पिताजी शंकर कि इसबात सें मेरे दिमाग़ मे एक् ज़बरदस्त तरकीब आई हैं। " जगन कि आवाज़___"अगर बोलो तौ उगलूॅ मुख सें??"
"अरे तौ उगल नाँ मादरचोद। " पिताजी चीखा__"क्याँ तब उगलेगा जब तेरी अम्मा चुद जाएगी साले??"
"मेरी दोनो अम्मा कों तौ तुमने हि चोद डाला हैं पिताजी। " जगन केँ हॅहने कि आवाज़___"यह अलगबात हैं कि तुमने हमें हमारी पहली अम्मा कों पेलने कां मौका नहि दिया जबकि उसको पेलने कि हमारी हसरत सालीधरी कि धरीरह गई। "
"बकवास नाँ कर बहनचोद। " पिताजी गुर्राया___"पहले तरकीब उगलमुख सें। साला सत्यानाश होँ गय़ा हमारा। "
"पिताजी तरकीब यह हैं" जगन कि आवाज़___"कि चंदा कि इसमौत मे हम् उस मादरचोद शंकर कों फॅसा देते हें। "
"वोँ केसे?" पिताजी कां चौंका हुआ स्वर उभरा__"मेरा मतलब कि हम् शंकर कों चंदा कि मौत मे केसे फॅसा सकते हें?"
"बड़ी सीधी सि बात हैं पिताजी। " जगन नें कहा___"हम् सबको बताएॅगे कि यहसभी शंकर नें हि किया हैं। हम् गाॅव वालों कों बताएॅगे कि तुमने जिस चंदा सें ब्याह कियाउसे शंकर पहले सें हि पसन्द करता थां औऱ उससे ब्याह भि करना चाहता थां। जबकि चंदा तोँ शंकर कों जानती भि नहि थि। शंकर नें जब देखा कि वोँ जिसे मनपसंद करता थां औऱ जिससे ब्याह करना चाहता थां वोँ तोँ स्वयं उसके हि बाप कि जोरूबन गई तौ शंकरयह सहन नं करसका। उससेयह सहन नं हुआ कि जिसे वोँ स्वयं अपनी जोरू बनाना चाहता थां वोँ स्वयं उसके बाप कि हि जोरूबन कर उसकी अम्मा बन गई। इसलिए वोँ रात कों देशी दारूपी करआया औऱ ज़बरदस्ती पिताजी केँ कमरे मे घुस गय़ा। कमरे मे उसने जबरदस्ती चंदा कि इज्जत कों लूटा औऱ फिन उसकीजान भि लेँ ली। "
"तरकीब तौ अच्छी हैं बेटवा। " पिताजी कि आवाज़___"पर्र गाॅव वाले यकीन केसे करेंगे? वोँ तोँ पूछेंगे नं कि शंकर नें यहसभी हम् सबकी मौजूदगी मे केसेकर लिया?तब क्याँ जवाब देगा तूँ?"
"हम् उनसे कहेंगे कि शंकर नें कमरे केँ दरवाजे पऱ इसतरह मोटी सि लकड़ी सें टेकलगा दिया थां कि उस दरवाजे कों लाख कोशिशों केँ बाद भि हम् सभीखोल नहि पाए। " स्थान कहरहा थां___"कमरे कां वोँ दरवाजा तभी खुलाजब शंकर नें चंदा कां काम तमामकर दिया थां। उसकेबाद वोँ स्वयं हि बाहर् आँ गय़ा थां। उसकेहाथ मे मोटी सि वही लकड़ी थि जिससे उसने दरवाजे पर्र टेक लगाया हुआ थां। हम् सभीयह डर सें कुछ नं बोलसके थें कि कहीं वोँ गुस्से मे हम् लोगों कों मारना न् शुरुआत करदे। बस इतनीबात बहुत हैं गाॅव केँ लोगों कों यकीन दिलाने केँ लिए। "
"ऐसा तुम्हारी तरफलग रहा हैं। " पिताजी कि आवाज़___"जबकि कुछलोग यह भि पूछ सकते हें कि जब हमारे घऱ मे यहसभी हौ रहा थां तोँ हमने हंगामा शराबा करके गाॅव वालों कों क्यूं नहि बुला लिया?तब क्याँ कहेंगे हम्?"
"हम् कह देंगे पिताजी कि हमेंउस टाइमकुछ सूझ हि नहि रहा थां कि क्याँ करें औऱ क्याँ न् करें?"जगन नें कहा__"बस गाॅव वालों कों हमारी बात पर्र यकीन करना हि पड़ेगा। वैसे भि गाॅव केँ लोगों कों यह उम्मीद भला कहाॅ होगीइस सबकी जौ हम् लोगों नें किया हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बातयह भि हमारी बात कों साबित करेगी जब शंकर यहाॅ पऱ मौजूद नहि रहेगा। शंकर कि ग़ैर मौजूदगी भि गाॅव वालों कों यकीन दिलाने मे पुख्ता वजह रहेगी। "
"मगर शंकर यहाॅ मौजूद क्यूं नहि होगाभला?" पिताजी कि आवाज़___"वोँ भला कहाॅचला जाएगा?"
"ग़ौर करने वालीबात हैं पिताजी। " जगन नें कहा__"शंकर कि जानकारी मे औऱ उसके सामने इतनाकुछ होँ गय़ा हैं उसकी प्रेमिका केँ संग। तौ भला वोँ अब यहाॅकिस वजह सें लौटकर आएगा?दिल कां मामला बड़ा विचित्र होता हैं पिताजी। उसकाइस संसार मे उसके प्रेमी केँ अलावा दूसरा कोई नहि रह जाता औऱ जब उसके रहते उसकी प्रेमिका कां यहहाल हौ जाए तौ भला वोँ अपनामुह दिखाने केँ लिए यहाॅ क्यूं रहेगा? बल्कि वोँ तौ कहीं पऱ चुल्लू भर पानी कि तलाश करेगा ताकि उसमें डूबकर वोँ मरसके। "
"वाउ भइयावाउ क्याँ लच्छेदार बातकही हैं मेरे मादरचोद बेटे नें। " पिताजी कि प्रशंशा मे डूबी हुईँ आवाज़__"यह तोँ कमाल हि हौ गय़ा। इतनी बड़ी औऱ इतनी गहरीबात मेरे दिमाग़ मे नहि आई। जबकि तूने साबित कर दिया कि तुँ इस संसार कां सबसे बड़ा वाला कमीना इंसान हैं। "
"पिताजी तारीफ़ करने कां भलायह कौन सां तरीका हैं?" मदन नें हॅसते हुए कहा___"जगन नें ग़लत क्याँ कहाभला? सारी बातों कों सोचकर उसनेइस सबसे बचने कि जौ तरकीब बताई हैं वोँ यकीनन लाजवाब हैं। इसलिए अब हमें बिलकुल भि देर नहि करना चाहिए। बल्कि जल्दी हि जगन कि इस तरकीब पर्र अमल करना चाहिए। "
"सहीकह रहा हैं तूँ। " पिताजी कि आवाज़___"इसके सिवा दूसरा कोई चारा भि तौ नहि हैं हमारे पास। अतः अब हम् जगन कि इस तरकीब केँ अनुसार हि काम शुरुआत करते हें। अब जोँ होगा देखा जाएगा। "
उधर वोँ सभी तरकीब पऱ अमल करने कि बातें कररहे थें जबकि इधर मेरे गुस्से कि जैसे इंतहां हौ गई थि। इतनी घटिया सोच औऱ ऐसे पापी लोगों कां इस समाज मे जीवित रहने कां कोई अधिकार नहि रह गय़ा थां। मेरे दिलो दिमाग़ उन सबकेलिए घृणा औऱ नफ़रत मे निरंतर इज़ाफा होताचला गय़ा थां। मे जल्दी हि अपनी स्थान सें हिला औऱ लकड़ी कि उस बाउंड्री केँ इसपार सें चलतेहुए घऱ केँ सामने कि तरफआया औऱ सामने सें अंदर कि तरफबढ़ चला।
बरामदे केँ बाहरी तरफ दीवार पऱ टेकलगा कररखी हुई कुल्हाड़ी पऱ मेरी नज़र पड़ी। मेरे शरीर मे दौड़ते हुए लहूॅ मे जैसे एकदम सें उबाल आँ गय़ा। मे तेज़ी सें उस कुल्हाड़ी कि तरफ बढ़ा औऱ उसे दाहिने हाॅथ सें उठाकर बरामदे कि तरफ बढ़ा। अंदर दाखिल होते हि मुझेजगन औऱ मदन मेरीतरफ पीठ किये खड़े नज़रआए। इससे पहले कि कोईकुछ महसूस कर पाता मेरा कुल्हाड़ी वाला हाॅथ बिजली कि तरहचला औऱ खचाऽऽक सें जगन कि गर्दन पऱ पड़ा। कुल्हाड़ी वार लगते हि जगन कि गर्दन आगे कि तरफझूल गई। उसकेकटे हुएधड़ सें खून कां मानो फब्बारा सां उठ गय़ा। इधर मे इतने पर्र हि नहि रुका। बल्कि किसी केँ होश मे आने सें पहले हि एक् बार पुनः मेरा कुल्हाड़ी वाला हाॅथ बिजली कि सि तेज़ी सें चला औऱ इसबार मदन केँ सीने मे गड़ता चला गय़ा। सीने मे इसलिए कि वोँ ऐन टाइम पऱ मेरीतरफ घूम गय़ा थां।
लम्हा भर मे इस सबको देखते हि मेरी दोनो बहनों केँ हलक सें चींखें निकल गई। पिताजी केँ सामने हि उसके पैरों केँ पासजगन मृत अवस्था मे खून सें लथपथ पड़ा थां। यहदेख कर पिताजी कों जैसे लकवा सां मार गय़ा थां। उसकी घिग्घी बॅध गई थि। इधर मेरी एक् बेहन मीना बाहर् कि तरफ तेजी सें भागी। मैनेपलट कर तेज़ी सें कुल्हाड़ी चला दि। कुल्हाड़ी उड़ते हुए मीना कि पीठ पर्र गड़ती चली गई औऱ वोँ प्रहार केँ वेग मे मुह केँ बल ज़मीन पऱ गिरी। वोँ मछली कि तरहकुछ देर तड़पी औऱ फिन शान्त पड़ गई। मैनेआगे बढ़कर उसकीपीठ सें एक् हि झटके मे कुल्हाड़ी कों खींच लिया।
उधर रीना केँ चिल्लाने सें जैहे पिताजी कों होशआया। अतः वोँ जल्दी उठा औऱ कमरे केँ अंदर कि तरफ हंगामा मचाते हुए भागा। उसके पीछे हि रीना भि भागी। कमरे केँ अंदरजा कर दोनो नें दरवाजे कों बंदकर अपने अपने हाॅथों सें दरवाजे पऱ ताकत सें दबाव बढ़ा दिया।
"दरवाजा खोल पिताजी। " मे कुल्हाड़ी लिएशेर कि तरहगरज उठा थां___"आज मेरे हाॅथों तुम् सबकीमौत निश्चित हैं। "
"यह तूने किया शंकर?" अंदर सें पिताजी कि भय सें काॅपती हुई आवाज़ आई___"तूने अपने हाॅथों अपने हि भइया औऱ बेहन कों काटकर मार डाला। आख़िर ऐसा क्याँ होँ गय़ा हैं तुम्हें कि तूनेयह नरसंघार कर दिया?"
"मुझसे क्याँ पूछता हैं हरामज़ादे?" मैने दहाड़ते हुए कहा___"इस सबका कारण तोँ तुँ हि हैं। मैने तेरी औऱ तेरेइन पिल्लों कि सारी बातें सुनली हें। तूने अपने मतलब केँ लिए मेरी अम्मा कों कुएॅ मे गिराकर मार डाला। उसकेबाद तूने मेरी मासूम चंदा केँ भोले भाले बाप कों फॅसाकर उसकी बेटी सें ब्याह किया। केवलइस लिए कि तूँ उस मासूम औऱ निर्दोष केँ संग मज़ेकर सके औऱ यहसभी तूनेउस मादरचोद जगन केँ कहने पऱ किया। यह बता कि तुझेही एक् बार भि नहि लगा कि जोँ ते कहनेजा रहा हैं वोँ सबसे बड़ापाप हैं? अपनी हि बेटियों केँ संग तुँ मुह काला करता हैं। तेरे दोनो बेटे अपनी हि बेहन केँ संग नाजायज़ संबंध बनाते हें। इतना हि नहि तुँ स्वयं भि उन केँ संगयह सभी करता हैं। अरे तुझसे बड़ाइस संसार मे कौन होगा पिताजी? तूनेदो समय केँ मज़े केँ लिए रिश्तों कों भि नहि बक्शा। मेरी देवी जैहीमाॅ कों मार डाला तूने औऱ तेरेइन पिल्लों नें। "
"यहसभी झूॅठ हैं शंकर भइया। " रीना रोते बिलखते हुए चिल्ला पड़ी___"तुम् जौ समझरहे हौ वैसेकुछ भि नहि हैं। "
"तुँ चुपकर बदजात लड़की। " मे पूरी शक्ति सें चिल्लाया थां, बोला___"तुम्हें तोँ अपनी बेहन कहतेहुए भि मुझे लज्जा आती हैं ऐ बेहया। तुझमें इतनी हि हवश कि आगभरी हुई थि तौ कहींभाग जाती किसी केँ संग। कम सें कम रिश्तों पऱ कलंक तौ न् लगता। मगर नहि, तुँ अपने बाप औऱ भइया कि राॅडबन गई न्। नहि छोंड़ूॅगा, किसी कों भि ज़िंदा नहि छोंड़ूॅगा। दरवाजा खोल वरनाइसी कुल्हाड़ी सें इस दरवाजे कों काटकाट कर टुकड़े टुकड़े कर दूॅगा औऱ फिन वैसे हि टुकड़े तुम् दोनो नाली केँ कीड़ों केँ करूॅगा। "
"हमें क्षमा करदे शंकर। " पिताजी नें रोते गिड़गिड़ाते हुए कहा___"हमसे सच मे बहोत बड़ापाप होँ गय़ा हैं। मगर आख़िरी बार क्षमा करदे हमें। अब दुबारा ऐसाकभी नहि करेंगे हम्। देख तूने अपने हि दो भइया औऱ एक् बेहन कों मार डाला। अब कम सें कम हमें तौ छोंड़ दे। "
"तूँ बाहर् निकल बेटीचोद। " मैने चिल्लाया___"उसके बाद बताता हूॅ कि केसे क्षमा करताहूॅ मे?"
"ईश्वर केँ लिए भइया। " रीना बुरीतरह रोरही थि__"बस एक् बार क्षमा करदे। सच कहतीहूॅ जिंदगी भर तेरी टट्टी खाऊॅगी मे। "
"मे आख़िरी बारकह रहाहूॅ कि दरवाजा खोल। " मे गुस्से मे चीखा___"वरना दरवाजे कों काटने मे मुझे अधिक वक़्त नहि लगेगा। उसकेबाद मे तुम् दोनो कां क्याँ हस्र करूॅगा तुम् सोच भि नहि सकते। "
"बेटा क्षमा करदे नं। " पिताजी गिड़गिड़ाया___"अरे मे तेरा बाप हूॅरे। तुझेही बचपन सें पालपोष कर बड़ा किया हैं। "
"तौ कौन सां बड़ाकाम किया हैं तूने?" मैने कहा__"तुँ मुजे बचपन मे हि मार देता तौ अच्छा होता। कम सें कमआजयह सभी देखने सुनने कों तौ नं मिलता। मेरी मासूम सि चंदा कों तुम् लोगों नें रौंद रौंदकर मार डाला। मेरी देवी जैसी अम्मा कों मार डाला तुम् लोगों नें। अगर तुम् लोग मेरी अम्मा औऱ चंदा कों वापस मुझे लाकरदे दो तौ क्षमा कर दूॅगा। वरनाभूल जाओ कि मे क्षमा कर दूॅगा तुम् दोनो कों। "
अंदर सें कोई वाक्य नं फूटाउन दोनों केँ मुख सें। बस दोनो केँ रोने कि आवाज़ें गूॅजती रही। मेरा क्रोध प्रतिपल बढ़ता हि जारहा थां। मुझसे बरदास्त नं हुआ तोँ मे कुल्हाड़ी कां वार दरवाजे पर्र करनेलगा। मेरेऐसा करते हि रीना औऱ पिताजी ज़ोर ज़ोर सें चीखने लगे औऱ रहम कि भीख माॅगने लगे। मगर मे नं रुका बल्कि लगातार कुल्हाड़ी कां वार दरवाजे पर्र करताचला गय़ा। नतीजा यहहुआ कि कुछ हि देर मे लकड़ी कां वोँ दरवाजा कटकटकर टुकड़ों मे निकलने लगा। थोड़ी हि देर मे मुझे रीना कां हाॅथ नज़रआया जौ दरवाजे पर्र टिकाहुआ थां। मैने गुस्से मे आव देखा नं ताव, कुल्हाड़ी कां वार सीधा उसके हाॅथ पऱ किया। खचाऽऽऽच कि आवाज़ केँ संग हि रीना कां हाॅथ उसकी कलाई सें कट गय़ा। खून कां तेज़ फब्बारा उछलकर फैल गय़ा। कलाई सें हाॅथ कटते हि रीना कि हृदय विदारक चीख गूॅज गई। वोँ दरवाजे सें हटकर अपने दूसरे हाॅथ सें कटेहुए हाॅथ कों पकड़े पीछे हटतीचली गई। उसकायह हालदेख कर पिताजी भि मारेडर केँ पीछे कि तरफ भागा। दोनो केँ जाते हि दरवाजे पर्र सें उन दोनो कां दबावहट गय़ा।
मैने दरवाजे पर्र ज़ोर सें एक् लात मारी तोँ दरवाजा खुलता चला गय़ा औऱ इसकेसंग हि उन दोनो कि चीखना चिल्लाना भि बढ़ गय़ा। मे दरवाजे केँ अंदर दाखिल हुआ औऱ उन दोनो कि तरफ बढ़ने हि वाला थां कि मेरी नज़रबगल सें रखी चारपाई पर्र आधी लटकी हुइ चंदा कि नंगीलाश पर्र पड़ी। मेरे अंदर पीड़ा कि तीब्र लहर दौड़ती चली गई। मेरी इश्क कां यहहाल किया थां इन लोगों नें। यहदेख कर हि मेरे अंदर भयंकर क्रोध भर गय़ा। मे तेज़ी सें उन दोनो कि तरफ बढ़ा।
पिताजी औऱ रीना रोने औऱ चीखने कि मशीनबन गए थें। उन दोनो केँ चेहरे मौत केँ डर सें पीले ज़र्द पड़गए थें। कमरे मे हरतरफ रीना केँ कटेहुए हाॅथ कां खून फैलाहुआ थां। मे आखे बढ़ते हुए पिताजी केँ क़रीब गय़ा यो पिताजी मेरे पैरों मे गिर पड़ा। मैने अपनेउस पांव कों ज़ोर सें झटक दियाजिस पांव पऱ पिताजी गिरा पड़ा थां। झटका खाते हि पिताजी उछलकर पिछली दीवार सें टकराया। मे आगेबढ़ कर उसकेपास गय़ा औऱ एक् हाथ सें उसकेसिर केँ बालों कों पकड़कर उठा लिया। मैने देखा पिताजी केँ चेहरे पर्र मौत कां भय साक्षात ताण्डव करता नज़र आँ रहा थां।
"अबबता मेरे हरामी पिताजी। " मे गुर्राया___"इस कुल्हाड़ी सें तेरे कितने टुकड़े करूॅ?"
"नहि नहि शंकर। " बुरीतरह काॅपते हुएकहा पिताजी बिलबिला उठा___"मुझे क्षमा करदे बेटा। मे तेरा बाप हूॅ। अपनेआस पापी बाप कों बस एक् बार क्षमा करदे। "
खचाऽऽऽक! कुल्हाड़ी कां वार बिजली कि सि तेज़ी सें हुआ औऱ कुल्हाड़ी कां फल पिताजी कि जाॅघ मे घुस गय़ा। पिताजी केँ हलक सें हलाल होते बकरे जैसी आवाज़ निकली। जाॅघ सें भल्ल भल्ल करकेखून बहनेलगा। तभी एक् चीख मुझे अपने पीछे कि तरफ सुनाई दि। मे तेज़ी सें पलटा तोँ देखा अपनी कलाई थामें रीना बाहर् कि तरफ भागीजा रही थि। उसके बाहर् निकलते हि मे भि पलटकर उसके पीछे भागा लेकिन तभी बाहर् सें कुछलोग आँ गए औऱ मुझे पकड़लिए। मे उन लोगों कि पकड़ सें छूटने केँ लिए ज़ोर आजमाईश करनेलगा। संग हि चीखते हुएकहे भि जारहा थां कि___"मुझे छोंड़ दो वरना तुम् सबकोकाट डालूॅगा इस कुल्हाड़ी सें। "
मगर वोँ मुझे छोंड़ नहि रहे थें। देखते हि देखते मेरेउस घऱ मे लोगों कां ताॅता लग गय़ा। हर ब्यक्ति मेरेघऱ केँ इस भयानक दृष्य कों देखकर आश्चर्यचकित थां। उनकी ऑखें हैरत सें फटी पड़ीथीं। मुझे पकड़े हुएलोग मुझसे पूछेजा रहे थें कि यहसभी क्याँ हैं? मैनेयह सभी क्यूं किया? मैने चीखते हुएउन सबको सारीबात संक्षेप मे बताई। जिसेसुन करहरकोई हक्का बक्का रह गय़ा। कुछ लोगों कि नज़र कमरे केँ अंदर कराहरहे पिताजी पर्र पड़ी तौ वोँ भागते हुए पिताजी केँ पासगए। लोगों कों देखते हि पिताजी कि जान मे जानआई औऱ वोँ डरवभय सें एक् हि बात रटनेलगा। वोँ यह कि मुझेइस लड़के सें दूर लें चलो। यह मुझेमार डालेगा, काट डालेगा।
कुछ लोगों नें मिलकर पिताजी कों सहारा देकरउठा लिया औऱ कमरे सें बाहर् लेँ गए। इधर मे बहुतदेर तक उन लोगों केँ चंगुल सें निकलने कि कोशिश करतारहा मगर निकल न् सका। थक हारकर मैंने ज़ोर आजमाईश करनाबंद कर दिया। ऐसे हि वोँ दिन गुज़र गय़ा।
उसदिन गाॅव मे इतना बड़ा संगीन काण्ड हुआमगर किसी नें भि इस सबकी सूचना पुलिस कों नं दि। मे हैरान भि थां कि ऐसा लोगों नें क्यूं किया?कुछ लोग रीना केँ पीछे भि गए थें मगर वोँ लोग खाली हाॅथ वापस आँ गए। उन्हें रीना कहीं भि न् मिली थि। पिताजी कों इलाज केँ लिए जल्दी अस्पताल लेँ गए थें कुछलोग। मेरे दोनो भइया औऱ एक् बेहन मीना कि लाश कों एक् स्थान लिटाकर उन्हें सफेद क़फन सें ढॅक दिया गय़ा थां। कुछ औरतें कमरे केँ अंदर जाकर चंदा केँ नंगे शरीर कों किसीतरह ढॅक दिया थां।
गाॅव वालों नें मुझसे सबकी चिता कों आग देने केँ लिएकहा तौ मैंने केवल चंदा कि चिता कों आग लगाई जबकि अपने दोनो भइयाव बेहन कों चिताग्नि देने सें यहकहकर साफमना कर दिया कि यह मेरेकोई नहि थें। मेरेऐसा कहने पऱ गाॅव केँ मेरी हि बिरादरी केँ एक् व्यक्ति नें आग दि थि। उसदिन पूरादिन मेथेघऱ मे लोगों कि भीड़रही। मे एक् स्थान गुमसुम बैठा थां। ख़ैर धीरे-धीरे धीरे-धीरे सभीलोग अपने अपने घरों कों चलेगए।
उसीरात मैने वोँ गाॅव औऱ वोँ घऱ हमेशा हमेशा केँ लिए त्याग दिया थां। मुझे नहि पता मे कहाॅ कहाॅ बेवजह भटकता रहा? धीरे-धीरे धीरे-धीरे वक़्त गुज़रा औऱ इस घटना कों घटे पाॅचसाल गुज़र गए। मे इन पाॅच सालों मे कुछहद तक सम्हल गय़ा थां। दो वक़्त कि रोटी केँ लिए जैसा भि काम मिलता तोँ करता औऱ दो टाइम कि रोटी खाकरदिन काटने लगा थां।
ऐसे हि एक् दिन एक् ऐसे व्यक्ति सें मेरी मुलाक़ात हुई जोँ फौज मे मेजर कि पोस्ट सें रिटायर होकरआया थां। मुझमें अब तक बहुत बदलाव आँ गय़ा थां। सभीकुछ भुलाकर मे अपनेमन मर्ज़ी सें जीखारहा थां। ख़ैर, उस मेज़र सें मुलाक़ात हुईँ तौ मैने उससेकाम माॅगा। दरअसल मे हर स्थान भटकते भटकते उकता सां गय़ा थां इसलिए चाहता थां कि कहींऐसी स्थान कोईकाम मिलजाए जिससे मुझेबार बार स्थान न् बदलना पड़े। मेरेकाम माॅगने पर्र मेजर नें मेरीतरफ ग़ौर सें देखा। मेरी हाइट काठीठीक ठाक हि थि। वोँ मुझेदेख कर मुस्कुराया औऱ पूछा क्याँ कामकर सकते होँ? मैनेकहा कि मे दुनियाॅ कां हरकाम कर लूॅगा मगरकोई ग़लतकाम तौ मे हर्गिज़ भि न् करूॅगा भले हि चाहे भूॅखा मर जाऊॅ।
मेरीइस बात सें मेजर प्रभावित हुआ औऱ मुझे अपनेघऱ लेँ गय़ा। मेजर कां घऱघऱ जैसा नहि बल्कि कोई बॅगला दिखरहा थां। मेजर नें मुझसे कहा कि आज सें तुम् इस बॅगले कि देखरेख करोगे। फिन क्याँ थां मे मेजर केँ कहे अनुसार बॅगले कि देखरेख करनेलगा। बॅगले सें कुछ दूरी पर्र सर्वेन्ट क्वार्टर बनाहुआ थां जहाॅ पर्र मुझे रहने केँ लिए मेजर नें कह दिया थां। मेजर केँ अपने परिवार मे उसकी एक् जवान बेटी बस हि थि। उसकी पत्नि कुछसाल पहले ईश्वर कों प्यारी होँ गई थि। उसने दूसरी विवाह नहि कि थि। उसकेलिए उसकी बेटी हि सभीकुछ थि। मेजर कां औऱ भि परिवार थां जैसे कि उसके बड़े भइया वगैरा।
मेजर नें मुझे बंदूख चलाना सिखा दिया थां औऱ चूॅकि वोँ फौजी व्यक्ति थां इसलिए उसके नियम कानून भि शख्त औऱ पक्के थें। हर सुभहचार बजे उठना औऱ फिन उसकेसंग एक्सरसाइज़ करना, उसकेसंग दौड़ लगाना। यहसभी जैसे एक् रुटीन सां बन गय़ा थां। मुझे अपने आप् मे ऐसा महसूस होता जैसे मे भि मेजर कि तरह एक् फौजी व्यक्ति थां। मेजर कि बेटी बहोत हि प्यारी बच्ची थि। रुपये पैसे कां ज़रा भि घमंड नहि थां उसे। मे भले हि छोटी जाति कां थां मगरकोई भि मुझे कहींआने जाने सें रोंकता नहि थां। एक् तरह सें मे भि उसघऱ कां सदस्य बन गय़ा थां। मेजर कि बेटी मुझेदिन भर चाचू चाचूकह कर पुकारती रहती थि। पता नहि उसे मुझमें ऐसा क्याँ नज़रआता थां जिसकी वजह सें वोँ मुझे बहोत स्नेह देती थि। वोँ बिलकुल किसी गुड़िया कि तरह थि। मे शुरुआत शुरुआत मे उससे ज़्यादा बात नहि करता थां। इसकीवजह यह थि कि मुझे लड़कीव महिला जात सें नफ़रत सि हौ गई थि।
धीरे-धीरे धीरे-धीरे ऐसे टाइम गुज़रने लगा औऱ मेजर केँ यहाॅ रहतेहुए मुझेचार साल गुज़र गए। इनचार सालों मे मे मेजर औऱ उसकी बेटी सें इतनाघुल मिल गय़ा थां कि मुझे लगता हि नहि थां कि मे इनकेलिए कोई पराया हूॅ। मेजर कि बेटी कों मे अपनी बेटी कि तरह मानता थां औऱ हर लम्हा उसेखुश रहने कि ईश्वर हे दुवाएॅ करता रहता थां। उसेदेख करहरदुख दूर होँ जाता थां। मे तोँ जैसे अपने अतीत कां हर किस्सा भूल गय़ा थां। मगरफिन सें एक् बार मेरे नसीब मे बुरादिन आँ गय़ा। मेजर केँ बड़े भइया कां लड़का पढ़ाई केँ सिलसिले मे आया औऱ फिन मेजर केँ हि बॅगले पऱ रहनेलगा। मुझे उसकी शक्लदेख कर अजीब सां एहसास होता। हलाॅकि वोँ देखने मे हसीन गबरू जवान थां लेकिन उसकी ऑखों मे जानेऐसा क्याँ थां कि मुझे वोँ खटकने लगा थां। ख़ैर, कुछ हि दिनों मे मुझेसमझ आँ गय़ा कि मुझेऐसा क्यूं लगता थां।
मेजर कां भतीजा बड़ा हि शातिर किस्म कां लड़का थां। वोँ मेजर केँ सामने उससे बहोत हि सलीके सें बातें करता औऱ ऐसा दर्शाता कि उसके जैसा संस्कारी लड़का दुनियाॅ जहाॅन मे कहीं ढूॅढ़ने पऱ भि नहि मिलेगा। लेकिन मेजर केँ नं रहने पऱ वोँ हमेशा मेजर कि बेटी कों जोँ कि स्वयं उसकेसगे चाचा कि हि बेटी थि यानी कि उसकी बेहन थि तोँ वोँ उसे ताड़ता रहता थां। उसकी ऑखों मे हवस स्पष्ट दिखाई देती थि। मे दिन मे अधिकतर बॅगले केँ बाहर् मुख्य दरवाज़ा पऱ हि रहता थां। बीचबीच मे मे इधरउधर कां चक्कर लगाता औऱ कभीकभी बॅगले केँ अंदर भि घूमआता। यही मेरेकाम कां तरीका नियम बद्ध थां।
मे मेजर केँ उस भतीजे केँ चलते मेजर कि बेटी कुमुद केँ लिए बेहद चिंतित व परेशान होनेलगा थां। मे अच्छी तरहसमझ चुका थां कि उस नामुराद लड़के कि नीयत कुमुद बेटिया पर्र ख़राब होँ चुकी थि। मैनेइस बारे मे मेजर सें इसलिए कुछ भि नहि बताया थां क्योंकि मेरेपास उस लड़के केँ खिलाफ़ कीई सबूत नहि थां। मेजर अपने भतीजे केँ प्रति मेरी वोँ सभी बातें कभी न् मानता बल्कि उल्टा मुझ पऱ हि क्रोध करता औऱ मुझेकाम सें भि निकाल देता। इस लिए मे बस बेबस होँ चुका थां लेकिन मेरी पूरी कोशिश थि कि मेरे रहते वोँ लड़का अपने नापाक़ इरादों कभी कामयाब न् हौ सके। इस लिए वोँ जब भि अपने विद्यालय याँ काॅलेज सें वापस बॅगले मे आता तोँ मे कुछदेर केँ अंतराल मे बॅगले केँ अंदर कां चक्कर अवश्य लगाआता औऱ जाॅचपरख लेता कि सभीठीक हैं कि नहि।
ऐसे हि एक् दिन कि बात हैं कि वोँ लड़का अपने काॅलेज सें जल्द हि आँ गय़ा। मुझे उसके जल्द आँ जाने पर्र हैरानी तोँ हुई लेकिन मे कर भि क्याँ सकता थां। पर्र मुझेऐसा आभास अवश्य हुअ जैसेआज कुछ होने वाला हैं। ख़ैर, उसके अंदर जाने केँ कुछदेर बाद हि मे भि अंदरचला गय़ा। मैने बड़े एहतियात सें हर स्थान कां मुआयना किया। मे यह महसूस करके चौंका कि लड़का अपने कमरे मे नहि हैं। यह महसूस होते हि मे सीधा कुमुद केँ कमरे कि तरफबढ़ गय़ा। कुमुद केँ कमरे केँ पासआकर मैने देखा कि कमरे कां दरवाजा हल्का खुलाहुआ हैं। यहदेख कर मे चौंका। आमतौर पऱ कुमुद केँ कमरे कां दरवाजा बंद हि रहता थां। मैने हल्के खुलेहुए दरवाजे सें अंदर कि तरफ झाॅका तौ मेरी नज़रउस लड़के पर्र पड़ी। मे यहदेख कर बुरीतरह चौंका कि वोँ लड़का कुमुद केँ कमरे केँ अटैच बाथरूम केँ दरवाजे केँ पास खड़ा हैं। उसका एक् हाॅथ दरवाजे केँ ऊपरी हिस्से पर्र थां जबकि दूसरा हाथ नीचे कि तरफ थां। मुझे उसके दूसरे हाॅथ कि कुहनी हिलती हुइ प्रतीत होँ रही थि। मेरे दिमाग़ नें काम किया। मे समझ गय़ा कि वोँ कमीना कुमुद बिटिया कों नहाते हुएदेख रहा हैं। बस इसकेआगे मुझसे बरदास्त न् हुआ। मुझे बेहद क्रोध आँ गय़ा उस पऱ। मे झटके सें दरवाजा खोलकर अंदर कि तरफ तेज़ी सें बढ़ा।
कमरे केँ अंदरआहट महसूस होते हि वोँ लड़का बुरीतरह चौंककर पलटा औऱ मुझे देखते हि हक्का बक्का रह गय़ा। मगर उसकीयह हालत केवलकुछ पलों तक हि रही। उसकेबाद उसनेइस तरह सें अपनारंग बदला कि भला गिरगिट क्याँ बदलता होगा। यहाॅ पऱ उसनेइस कहावत कों पूरीतरह सिद्ध कर दिया कि "उल्टा चोर कोतवाल कों डाॅटे"। ऐसे माहौल मे उसकेसंग जोँ कुछ मुझे कहना चाहिए थां वहीसभी वोँ मुझे ऊॅची आवाज़ मे कहनेलगा थां। उसकेमुख सें अपनेलिए यहसभी सुनकर मे भौचक्का सां रह गय़ा। हैरतव अविश्वास सें मेरामुह तथा मेरीफट पड़ी थि। जबकि वोँ बराबर मुझ गरजेजा रहा थां। कुछ हि देर मे बाथरूम सें कुमुद बिटिया कपड़े पहनकर बाहर् निकली। मैने उसकीतरफ देखा तोँ चौंक गय़ा, उसका चेहरा ऑसुओं सें तर थां औऱ वोँ मुझेइस तरह देखेजा रही थि जैसे बिनाकुछ बोले हि ऑखों सें कहरही होँ कि___"क्यूं चाचू, ऐसा क्यूं किया तुमने? मे तौ आपकी बेटी जैसी हि हूॅ औऱ आपको अपने पिता जैसा हि सम्मान देतीहूॅ। फिन आपनेमुझ पर्र गंदी नज़र डाली। क्यूं चाचू क्यूं? क्याँ आप् हवस मे इतने अंधे हौ गए कि आपको मुझमें आपकी कुमुद बिटिया कि स्थान एक् ऐसी लड़की दिखने लगी जिसके संग अपनीहवस कों मिटाया जाए?"
उसकी ऑखों नें जैसेसभी कुछकह दिया थां मुझे। उसे अपनेमुख सें कहने कि कीई ज़रूरत नहि रह गई थि औऱ मे भि जैसे उसकी ऑखों केँ द्वारा कही हुईँ हरबात समझ गय़ा थां। उसके चेहरे पऱ जल्दी हि हिकारत केँ भाव उभरेतथा उसमें शामिल हौ गई घृणा। जिसके तहत उसने जल्दी हि अपनामुह फेर लिया जैसेअब वोँ मुझे देख्ना भि न् चाहती होँ। सच कहूॅ तौ इनकुछ हि पलों मे मेरी सारी दुनियाॅ बरबाद होँ गई। चार सालों कां मेरा विश्वास मेरा प्रेम व स्नेह एक् लम्हा मे हि जैसे नेस्तनाबूत होँ गय़ा थां।
यह एहसास होते हि मेरे अंदर तीब्र पीड़ा हुइ। मेरी ऑखों सें ऑसूछलक पड़े। मैने अपनी सफाई मे कुछ भि कहना गवाॅरा न् किया औऱ मे आगे भि कहना नहि चाहता थां। क्योंकि सबसे बड़ा होता हैं विश्वास। अगर विश्वास हि नहि रहा तौ सफाई देने कां कोई मतलब हि नहि रह गय़ा थां। मुझे तक़लीफ इसीबात पऱ हुई कि उस लड़की नें यह केसे यकीनकर लिया कि मैंने उस पऱ गंदी नज़र डाली थि? उसे अपने भइया पर्र संदेह क्यूं नं हुआ जिसने सचमुच हि वोँ काम किया थां। क्याँ केवलइस लिए कि वोँ उसका भइया थां औऱ मे कोई ग़ैर थां?
वोँ लड़का मुझे ज़बरदस्ती घसीटते हुए कमरे सें बाहर् लाया औऱ बॅगले सें निकल जाने केँ लिएकह दिया। मे भि दुखीमन सें उठा औऱ अपनी बंदूख सम्हाले बॅगले सें बाहर् निकल गय़ा। लेकिन मे बॅगले केँ मुख्य दरवाज़ा सें बाहर् नं गय़ा। मुझे मेजर साहब केँ आने कां इन्तज़ार थां। मुझे उनका सामना करना थां। मे ऐसे हि वहाॅ सें जाकरयह साबित नहि करा देना चाहता थां कि मे वास्तव मे गुनहगार हूॅ बल्कि उनके सामने जाकरयह दर्शाना चाहता थां कि मे गुनहगार नहि हूॅ।
साम केँ करीब-करीब आठबजे मेजर साहब बॅगले पर्र लौटकर आए। मे सारादिन भूखों प्यासा मुख्य दरवाजे पऱ किसी गुलाम कि तरह खड़ारह गय़ा थां। रहरहकर मेरेमन मे ख़याल आता कि यहाॅ सें कहींऐसी स्थान चला जाऊॅ जहाॅ सें कोई इंसान दुबारा वापस नहि आँ पाता। मगर मे ऐसा भि न् करसका थां। मुझे मेजर साहब कों अपना चेहरा दिखाना एक् बार। मेरे अंदर स्त्री जात केँ प्रति जोँ नफ़रत कहींखो सि गई थि वोँ फिन सें उभरकर आँ गई थि। ख़ैर, मेजर साहबआए औऱ बॅगले केँ अंदरचले गए। मुझेपता थां कि वोँ लड़का औऱ कुमुद मेजर साहब कों मिर्च मशाला लगाकर आज कि घटना केँ बारे मे बताएॅगे। मगर मुझे परवाह नहि थि अब। मुझे उम्मीद थि कि मेजर साहब मेरे बारे मे ऐसा हर्गिज़ भि नहि सोच सकते। आख़िर देश दुनियाॅ देखी थि उन्होंने। उनको इंसानों कि पहचान थि।
मगर मेरी उम्मीदों पर्र बिजली उस टाइम गिरीजब मेजर साहब नें मुझे बुलाया औऱ मुझे डाॅटना शुरुआत किया।
"हमें तुमसे ऐसे गंदे कर्म कि ज़रा भि उम्मीद नहि थि शंकर। " मेजर साहब नें कड़ी आवाज़ मे कहा___"हमें तुम् पऱ कितना भरोसा थां। हम् तुम्हें कभी ग़ैर नहि समझते थें। मगर तुमने अपनी ज़ात दिखा दि। शुरुआत मे जब तुमने कहा थां कि तुम् दुनियाॅ कां हरकाम कर सकते होँ मगरकोई ग़लतकाम नहि करोगे भले हि चाहे भूॅखों मरजाओ तौ हम् तुम्हारी उसबात सें बेहद प्रभावित हुए थें। मगरआज जोँ कुछ तुमने किया हैं उससे हमें बहोत दुख पहुॅचा हैं। हमारी बेटी तुम्हें हमारे जैसा हि पिता कां सम्मान देती थि औऱ तुमसे लाड प्रेम करतीमगर तुमने उस पऱ हि गंदी नज़रडाल दि। मन तोँ करता हैं कि तुमसे यह बंदूख छीनकर इसकी सारी गोलियाॅ तुम्हारे सीने मे उतारदें मगर नहि करेंगे ऐसा। इतनेसाल कि वफ़ादारी कां अगरयही इनाम लेना तोँ कोईबात नहि। मगरअब तुम्हारे लिए यहाॅकोई स्थान नहि हैं। निकलजाओ यहाॅ सें औऱ दुबारा कभी अपनी शक्लमत दिखाना हमें वरना हमसेयह उम्मीद न् करना कि हम् तुम्हें ज़िंदा छोंड़ देंगे। "
बस, मेजर साहब कि यह बातें सुनकर मे बुरीतरह अंदर सें टूटकर बिखर गय़ा। मे अब एक् लम्हा भि यहाॅ लुकना नहि चाहता थां। इसलिए घुटनों केँ बलबैठ कर मैने अपने कंधे सें बंदूख निकाली औऱ मेजर साहब केँ क़दमों मे रख दि। उसकेबाद मैने उन्हें अपने दोनों हाॅथ जोड़कर नमस्ते किया औऱ फिन धीरे-धीरे धीरे-धीरे खड़ा हौ गय़ा। मेरे अंदरऑधी तूफान मचाहुआ थां। मुझेऐसा लगरहा थां कि मे दहाड़ें मारकर रोऊॅमगर मैने अपने मचलते हुए जज़्बातों कों शख्ती सें काबू कियाहुआ थां। खड़े होकर मैने एक् बार कुमुद बिटिया कि तरफ देखा तोँ उसने जल्द सें अपनामुह फेर लिया। मेरी ऑखों सें ऑखू कां कतराटूट करहाल केँ फर्श पऱ गिर गय़ा।
उसकेबाद मे एक् लम्हा केँ लिए भि नहि रुका। वहाॅ सें बाहर् आकर मे सर्वेन्ट क्वार्टर कि तरफ अपने कमरे मे गय़ा औऱ वहाॅ सें अपना सामान एक् थैले मे भरकर कमरे सें बाहर् आँ गय़ा। बॅगले केँ मुख्य दरवाज़ा सें बाहर् निकलकर मे एक् तरफ बढ़ता चला गय़ा। उसकेबाद बॅगले मे क्याँ हुआ इसका मुझेकुछ पता नहि। वहाॅ सें आने केँ बाद मे एक् सुनसान स्थान पर्र दिनभर यूॅ हि दुखीमन सें बैठारहा। यह संसार बहोत बड़ा थां मगरइस संसार मे ऐसाकोई भि नहि थां जिसे मे अपना कहता। जोँ मुझे समझता औऱ मेरे दुखों कों महसूस करता। वर्षों पहले एक् दुख सें उबरा थां, आजफिन एक् दुख नें मुझे वहीं पऱ लें जाकरपटक दिया थां। ख़ैर, वक्त कां काम हैं बदलना। इसलिए धीरे-धीरे धीरे-धीरे वक्त केँ संग मे भि उस सबको भूलने कि कोशिशें करनेलगा। ऐसे हि एक् साल गुज़र गय़ा। मे कोई न् कोईकाम कर लेता जिससे मुजेदो समय कि रोटीमिल सके औऱ रातों कों कहीं भि लेटकर सो जाता। यहीं मेरी ज़िंदगी बन गई थि। ऐसे हि एक् दिन हरिया सें मेरी मुलाक़ात हौ गई। इसने जाने मुझमें ऐसा क्याँ देखा कि यह मुझे यहाॅ लें आया औऱ फिन मे तब सें यहीं कां रह गय़ा। यहाॅ पर्र हरिया सें मेरी अच्छी दोस्ती हौ गई। बिंदिया भाभी मे मुझे एक् माॅ कि झलक दिखने लगी औऱ रितू बिटिया केँ रूप मे एक् ऐसीनेक दिल लड़कीमिल गई जोँ मुझे काका कहती हैं औऱ मेरीआदर सम्मान करती हैं। मुझे उसमें अपनी बेटी हि नज़रआती हैं। एक् तरह सें यहाॅ पर्र मुझे एक् भरपूर परिवार हि मिल गय़ा हैं। मगर हमेशा इसबात कां डरबना रहता हैं कि किसीदिन मेरी क़िस्मत औऱ सबका वोँ ईश्वर फिन सें नं मुझसे रूठजाए औऱ मुझेफिन सें उसीदुख दर्द मे लें जाकरपटक दे जहाॅ सें उबरने मे मुझे एक् युगलग जाता हैं। "
अपने गुज़रे हुएकल कि दुखभरी किस्सा बताकर शंकर नें गहरी साॅसली औऱ अपने गमछे सें अपनी ऑखों सें बहचले ऑसुओं कों पोंछा। उसके सामने हि खड़े हरिया व रितू कि ऑखों मे भि ऑसू थें। शंकर कि स्टोरी मे वोँ इतनाडूब गए थें कि उन्हें ऐसा प्रतीत होँ रहा थां जैसेसभी कुछ उनकी ऑखों केँ सामने हि वोँ सभीघट रहा थां।
हरिया कों जाने क्याँ सूझा कि वोँ झपटकर शंकर कों अपनेगले सें लगा लिया औऱ फूटफूट कररो पड़ा। शंकरउसे इसतरह रोतादेख मुस्कुराया। यहअलग बात थि कि उसकी ऑखें भि बहचली थि। रितूआगे बढ़कर उन दोनो कों एक् दूसरे सें अलग किया।
"काका आपने अपने अंदर इतना बड़ादुख छुपा केँ रखाहुआ थां। " रितू नें दुखीमन सें कहा___"जिसका हमें एहसास तक नं थां। यकीनन आपकेसंग जोँ कुछहुआ वोँ बहोत हि दुखदायी थां। मगर आप् चिंता मत कीजिए। अब इसकेआगे ऐसाकुछ भि नहि होगा। आप् हमेशा हमारे संग हि रहेंगे। मे कभी भि आपकोऐसे दुख मे जाने नहि दूॅगी जिससे आपको जीने मे तक़लीफ हौ। "
"ईश्वर करेऐसा हि होँ बिटिया। " शंकर नें कहा__"मे भि तुम् लोगों कों छोंड़ कर कहीं नहि जानां चाहता। तुम् सबसे इतना लगाव हौ गय़ा हैं कि अबअगर ऐसाकुछ हुआ तौ यकीनन यहदुख सहन नहि कर पाऊॅगा मे। "
"अरे तूँ फिकर काहे करथै ससुरे?" हरिया नें कहा__"हम् अइसनअब कउनव सूरतमा नं होंयदेब। चलअबई सभी छोंडअउर आपनमन कां खुशरख। अउरहाॅ ई हमरा वादाहा कि हम् बहोत जल्द तोहरा ब्याह एको हसीन लड़की सें करबजउन तोहरी ऊ ससुरी बिंदिया भौजी जइसनै होई। "
हरिया कि यहबात सुनकर शंकर औऱ रितू दोनो हि मुस्कुरा कररहगए। कुछदेर ऐसी हि कुछ औऱ बातें हुईं उसकेबाद सहसा रितू कों कुछयाद आया।
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किस्सा ज़ारी हैं अभि,,,,,,,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस सुंदर प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं,,,,,,
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
कथाअब आगे,,,,,,,,,
उधर हवेली मे!
कई सारी गाड़ियाॅ हवेली केँ बाहर् विसाल मैदान मे आकर रुकीं। सब गाड़ियों केँ सब दरवाज़े एक् संग खुले औऱ उनमें सें कई सारे अजनबी लोग बाहर् निकले। सब आदमियों मे अधिकतर व्यक्ति हट्टे कट्टे व बाॅडी बिल्डथ टाइप केँ थें। जबकि कुछ व्यक्ति साधारण हाइट काठी केँ थें। वोँ सभी हट्टे कट्टे आदमियों सें घिरेहुए थें।
हवेली केँ बाहर् अजय सिंह केँ कुछ व्यक्ति हाॅथों मे बंदूख लिए खड़े थें। उन लोगों नें जब इतने सारे आदमियों कों एक् संग हवेली कि तरफआते देखा तौ उनके चेहरों कां रंग सां उड़ने लगा। उन्हें लगनेलगा अबयहकौन सि नई मुसीबत आँ गई यहाॅ?सभी एक् दूसरे कि तरफ देखने लगे थें। जैसे एक् दूसरे सें पूछरहे हों कि यहसभी क्याँ हैं? लेकिन जवाब किसी केँ पास नहि थां।
"ठाकुर साहब सें बोलो कि हम् लोग उनकेकहे अनुसार अपने आदमियों कों यहाॅ लेकर आँ गए हें। " एक् व्यक्ति नें अजय सिंह केँ एक् व्यक्ति सें कहा___"हमारे पास ज़्यादा वक़्त नहि हैं। इसलिए अभि हमें जानां होगा लेकिन हमारे यह व्यक्ति उनके किसी भि आदेश कां पालन करने केँ लिए पूरीतरह सजधजकर रहेंगे। "
उस व्यक्ति कि यहबात कदाचित गार्ड कि समझ मे न् आई थि। इसीलिए वो मूर्खों कि तरहउस व्यक्ति कों देखता रह गय़ा। उसके चेहरे पर्र उलझन केँ सें भावउभर आए थें।
"अरे भइयाऐसे क्यूं देखरहे हौ हमें?" व्यक्ति नें चौंकते हुए कहा__"हम् सभी ठाकुर साहब केँ बिजनेस वाले फ्रैण्ड्स हें। अतः जल्दजाओ औऱ उन्हें बताओ कि मिस्टर कमलनाथ औऱ उनकेसंग सब उनकेयार यहाॅआए हुए हें। "
गार्ड केँ चेहरे पऱ फैले उलझन केँ भावकम तोँ न् हुए लेकिन उसने इतना ज़रूर किया कि पाॅकिट सें फोन निकाल कर किसी कों मोबाइल लगाया। उधर सें काल रिसीव करते हि उसने कहा___"मालकिन, कुछलोग मालिक सें मिलने आए हें। कहरहे हें कि उनके बिजनेस सें संबंधित फ्रैण्ड्स हें। मेरेलिए क्याँ आदेश हैं मालिकन?"
".। " उधर सें कुछकहा गय़ा औऱ इसकेसंग हि कालकट हौ गई।
"आप् कृपया एक् मिनट रुकिये। " फिनउस गार्ड नें बड़ी विनम्रता सें कहा___"मालकिन आँ रही हें बाहर्। "
"ओकेनो प्राब्लेम। " उस व्यक्ति नें कहा औऱ दूसरी तरफपलट करइधर उधर देखने लगा।
कुछ हि देर मे हवेली कां दरवाजा खुला औऱ प्रतिमा उसमे सें बाहर् निकली। उसके पीछे हि उसका बेटा शिवा भि थां। हवेली केँ बाहर् इतनी सारी गाड़ियाॅ औऱ इतने सारे लोगों कों देखकर वोँ चौंकी। मनो मस्तिष्क मे एक् हि बात चकरघिन्नी कि तरह नाचने लगी कि 'कहींफिन सें कोई सीबीआई वाले नहि आँ गए यहाॅ'।
प्रतिमा कि देखते हि गार्ड नें उस व्यक्ति केँ पास जाकरउसे बताया कि मालकिन आँ गई हें। वोँ व्यक्ति पलटकर प्रतिमा केँ पासआया।
"नमस्ते भाभीजी। " उस व्यक्ति नें खुशदिली सें हाॅद जोड़कर नमस्ते करतेहुए बोला__"हम् सभी ठाकुर साहब केँ फ्रैण्ड सर्कल केँ लोग हें। ठाकुर साहब सें कल मीटिंग मे हमारी कुछ बातें हुई थि। जिसके तहत उन्होंने हमसे हमारे कुछ बेहतरीन आदमियों कि माॅग कि थि। सोइससमय हम् उसी सिलसिले मे यहाॅआए हें। हमारे पास ज़्यादा वक्त नहि हैं इसलिए हम् ठाकुर साहब सें मिलकर जल्दी हि यहाॅ सें जानां चाहेंगे। उसकेबाद यह उनकाकाम हैं कि वोँ हमारे इन आदमियों केँ द्वारा क्याँ काम लेते हें?"
प्रतिमा उस व्यक्ति कि बातों सें समझ गई कि कलअजय सिंह किसी ज़रूरी मीटिंग मे थां इसीलिए साम कों देर सें आया थां। तौ इसका मतलब मीटिंग इस सबकेलिए थि। लेकिन समस्या यह थि कि यहलोग जिससे मिलने आए थें उसे तौ सीबीआई वाले सुभह हि अपनेसंग लेँ गए थें। इसलिए अब वोँ इन्हें क्याँ जवाबदे यही उसकीसमझ मे नहि आँ रहा थां। सच्चाई बताने पर्र संभव हैं कि बात बिगड़ जाती। अगर इन लोगों कों अभि पताचल जाए कि अजय सिंह कों सीबीआई वाले लेँ गए हें तौ यहलोग जल्दी हि यहाॅ सें रफूचक्कर हौ जाएॅगे।
"क्याँ बात हैं भाभीजी?" उस व्यक्ति नें कहा___"आप् किसी गहरीसोच मे डूबी हुइ प्रतीत होँ रही हें। कहिएसभी ठीक तोँ हैं नं? ठाकुर साहब कों बुलाइये हम् उनसे मिलना चाहते हें। "
"ठाकुर साहब तोँ इस वक़्त हवेली केँ अंदर नहि हें। " फिन प्रतिमा कों एक्सक्यूज़ बनाना पड़ा___"सुभह हि कहींचले गए थें। कहाॅगए हें इस बारे मे कुछ बताया भि नहि उन्होंने। "
"ओहआई सि। " उस व्यक्ति नें कहा___"कोई बात नहि भाभीजी। हम् मोबाइल पऱ बातकर लेंगे उनसे। अच्छा अब हम् चलते हें। हम् अपनेइन आदमियों कों यहीं पऱ छोंड़े जारहे हें। "
"अरेऐसे केसेचले जाएॅगे आप् लोग?" प्रतिमा नें औपचारिकता केँ भाव सें कहा___"अंदर आइये औऱ कम सें कमगरम चाय याँ काॅफी तौ पीकर हि जाइये। वरना आपके ठाकुर साहब मुझे हि डाॅटेंगे कि मैने आप् लोगों कों बिनागरम चाय पानी करवाए हि जाने दिया। "
"इसकी ज़रूरत नहि हैं भाभीजी। " व्यक्ति नें हॅसते हुए कहा___"आपने कह दिया इतना हि बहोत हैं हमारे लिए। अच्छा अब हम् चलते हें, नमस्ते। "
"नमस्ते जी। " प्रतिमा नें भि प्रत्युत्तर मे अभिवादन किया।
इसकेबाद वोँ जितने भि साधारण हाइट काठी केँ व्यक्ति सूटबूट पहनेआए थें वोँ सभी गाड़ियों मे सवार होकर वहाॅ सें चलेगए। उनके जाने केँ बाद प्रतिमा नें बाॅकी बचे हट्टे कट्टे व बाॅडी बिल्डर आदमियों कि तरफ देखा।
"बेटा इन सबको सर्वेंट क्वार्टर मे लेँ जाओ। "फिन प्रतिमा नें शिवा सें कहा___"औऱ इनके रहने कां इंतजाम करो। तब तक मे सविता(नौकरानी) सें कहकरइन लोगों केँ लिएगरम चाय पानी कां उचित बंदोबस्त कराती हूॅ। "
"ओके माॅम। " शिवा नें कहा औऱ हवेली कि सीढ़ियाॅ उतरकर नीचे आँ गय़ा उन लोगों केँ पास।
उन सबको लेकर शिवा हवेली केँ पूर्व दिशा कि तरफबने सर्वेंट क्वार्टर कि तरफबढ़ गय़ा। यह सर्वेंट क्वार्टर अजय सिंह नें सालभर पहले हि बनवाया थां। उन लोगों केँ जाने केँ बाद प्रतिमा भि अंदर कि तरफचली गई। उसके चेहरे पऱ सहसागहन चिंता व तकलीफ़ केँ भाव गर्दिश करते नज़रआने लगे थें। उसेपता थां कि अजय सिंह केँ जोँ बिजनेस संबंधी साथीआए थें वोँ अजय सिंह सें मोबाइल पऱ अवश्य बात करेंगे। मगरजब अजय सिंह कां मोबाइल नहि लगेगा तोँ वोँ सभी परेशान भि होँ जाएॅगे। उस सूरत मे उनका क्याँ रिऐक्शन होगा इसकाकुछ भि अंदाज़ा लगाना मुश्किल थां।
प्रतिमा कों समझ नहि आँ रहा थां कि इस परिस्थिति मे वोँ क्याँ करे? उसने सहायता केँ उद्देश्य सें हि अपनी इंस्पेक्टर बेटी रितू कों मोबाइल लगाया थां लेकिन उसनेकाल कों रिसीव न् करकेकट कर दिया थां। यह प्रतिमा केँ लिए शायद आख़िरी सबूत थां कि उसकी बेटी नें सचमुच हि अपनेमाॅ बाप केँ खिलाफ़ बगावत कर दि थि।
अंदर प्रतिमा नें सविता कों उन आदमियों केँ लिएगरम चाय कां कह दिया औऱ स्वयं आकर ड्राइंग रूम मे रखे सोफे पर्र बैठ गई। उसके चेहरे सें चिन्ता व तकलीफ़ केँ भावजा हि नहि रहे थें। वोँ कुछ भि करकेअजय सिंह कों सीबीआई केँ चंगुल सें बाहर् निकालना चाहती थि। हलाॅकि उसेपता थां कि ऐसे मामलों मे अपराधी कां कानून कि गिरफ्त सें बाहर् आनां बेहद मुश्किल काम होता हैं लेकिन इसके बावजूद प्रतिमा अजय सिंह कों बाहर् निकालना चाहती थि।
सहसा प्रतिमा कों अपने पिता जगमोहन सिंह कां ख़याल आया। प्रतिमा कां बाप जगमोहन सिंहआज कल इलाहाबाद हाई कोर्ट मे बतौर क्रिमिनल लायर थां। ऊम्र सें ज़्यादा अधेड़ नहि लगता थां। कहा जाता हैं कि जगमोहन सिंह बहोत हि काबिल व तेज़ तर्रार वकील थां। चाहे जैसा भि केस होँ, मुहमाॅगी फीस मिलने पर्र वो अपने मुवक्किल कों बाइज्ज़त बरीकरा लेता थां। मगर यहाॅ पर्र प्रतिमा केँ लिए सबसे बड़ी समस्या यह थि कि वोँ अपने बाप सें सहायता माॅगे तौ माॅगे केसे?
दरअसल, जब प्रतिमा नें अपने बाप कों बताया कि वो अजय सिंह सें प्रेम करती हैं औऱ उससे विवाह करना चाहती हैं तौ जगमोहन सिंह बुरीतरह भड़क गय़ा। उसे प्रेम शब्द सें हि नफ़रत थि। पता नहि ऐसा क्याँ थां कि प्यार प्रसंग होने पऱ वो आपे सें बाहर् होँ जाता थां। उसकेघऱ मे नियम कानून बड़े शख्त थें। उसकीदो हि बेटियाॅ थि। जिनमें सें प्रतिमा छोटी वाली थि। जबकि पहली बेटी मुम्बई मे रहती थि, जहाॅ आजकलअजय सिंह कि बेटी नीलम रहती हैं। जगमोहन सिंह कों कोई बेटा नहि थां। धन दौलत कि शुरुआत सें हि कोईकमी नहि थि। ख़ैर, बाप केँ साफ इंकार कर देने पऱ प्रतिमा नें पहलीबार अपने बाप सें मुहज़ुबानी कि थि औऱ साफ शब्दों मे कह दिया थां कि वोँ विवाह करेगी तोँ अजय सिंह सें हि वरना वोँ कभी किसी सें विवाह नहि करेगी। जगमोहन कों अपनीइस बेटी कि धृष्टता पर्र बेहद क्रोध आया औऱ उसनेउसी टाइमकह दिया उससे कि आज केँ बाद वोँ उसकेलिए मर गई हैं। बस प्रतिमा नें आव देखा नं ताव, बाप कां घऱ छोंड़ दिया औऱ सीधाअजय सिंह केँ पास पहुॅच गई। अजय सिंह केँ संग हि वो रहनेलगी। इसबीच वोँ प्रग्नेन्ट होँ गई तोँ आनन फानन मे अजय सिंह औऱ प्रतिमा नें आपस मे कोर्ट मैरिज करली थि।
तब सें लेकरअब तक प्रतिमा नें कभी भि अपने बाप सें कोई मतलब नहि रखा थां औऱ नां हि उसके बाप जगमोहन नें। प्रतिमा कि इस बगावत सें उसकी बड़ी बेहन कों धक्का तौ अवश्य लगा थां लेकिन वोँ कर भि क्याँ सकती थि? ऐसे हि वक़्त गुज़रता गय़ा। प्रतिमा अपनी बड़ी बेहन सें मोबाइल पऱ हि हाल समाचार लेँ लिया करती थि। दोनो बहनें वर्षों सें एक् दूसरे सें नं मिली थि।
ड्राइंग रूम मे सोफे पर्र बैठी प्रतिमा इन्हीं सभी यादों मे खोई थि। उसकी ऑखों मे ऑसूभर आए थें। माॅ कां साया तौ पहले हि उसकेसिर सें उठ गय़ा थां। दोनो बहनों मे यह सबसे ज़्यादा लाड प्रेम मे पली पढ़ी थि औऱ शायदयही वजह थि कि जिद्दी होँ गई थि। जिसका नतीजा यहहुआ थां कि उसने अपने बाप केँ खिलाफ़ जाकरअजय सिंह सें विवाह करली थि। मगरआज केँ हालात बहोत औऱ तब केँ हालात मे बहोत फर्क़ हौ गय़ा थां। आज केँ हालात मे प्रतिमा किसी केँ भि सामने झुकने औऱ किसी केँ भि नीचे लेटने कों सजधजकर थि। बदले मे उसेअजय सिंह सीबीआई कि गिरफ्त सें बाहर् चाहिए थां।
प्रतिमा कि हिम्मत नहि होँ रही थि कि वोँ दुबारा अपने बाप सें बातकर सके। विवाह वालीबात कों तौ वर्षों हौ गए थें। लेकिन इन वर्षों मे उसने एक् बार भि अपने बाप सें बात करना ज़रूरी नहि समझा थां। औऱ आजजब बुरासमय आया तोँ उसे अपने बाप कां ख़याल आया औऱ उससे सहायता माॅगने कां भि। प्रतिमा कों पहलीबार लगा कि उसे अपने बाप सें इसतरह मुहज़ुबानी नहि करनी चाहिए थि औऱ नाँ हि तैश मे आकरइस तरह बाप केँ घऱ कि दहलीज़ कों छोंड़ देना चाहिए थां। मामले कों प्रेम सें औऱ समझा बुझाकर भि सुलझाया जा सकता थां। आजअगर ग़ौर कियाजाए तोँ दोदो बेटियाॅ होने केँ बाद भि उसका बाप घऱ मे अकेला हि थां। सोचने वालीबात हैं कि उतने बड़ेघऱ मे उसका बाप पिछले कितने हि वर्षों सें अकेला रहरहा हैं। क्याँ उसे अपनेउस अकेलेपन सें दुख नहि होता होगा? क्याँ उसेइस बात कां दुख नहि होगा कि उसकी बेटी नें आज तक उसकी सुधि तक न् ली। अपनी खुशियों कों गलेलगा कर अपने बाप कों अकेला छोंड़ दिया। तन्हाई इंसान कों जीतेजी मार डालती हैं। मगर उसनेकभी अपनीइस बेटी कों मोबाइल करकेउस सबका गिला न् किया थां।
प्रतिमा कों बड़ी शिद्दत सें एहसास हुआ कि उससे कितनी बड़ीभूल हुईँ हैं। कहते हें कि माॅ बापप कां क्रोध याँ नाराज़गी जिंदगी भर केँ लिए नहि होती। आख़िर बाप कों औलाद केँ आगेहार जानां हि होता हैं। मगर यहाॅ तौ जगमोहन दोनोतरफ सें हाराहुआ बाप बन चुका थां। प्रतिमा कि ऑखों सें पश्चाताप केँ ऑसूबह रहे थें। उसेइस बात कां बखूबी एहसास थां कि भले हि उसके बाप नें उसे त्याग दिया थां मगरआज भि वोँ अपनी बेटियों केँ मंगलमय जिंदगी कि कामना करता होगा। यह सभीसोच सोचकर प्रतिमा कों भारीदुख होँ रहा थां। उसे अपनी अज्ञानता औऱ अपने छोटेपन कां शिद्दत सें एहसास हौ रहा थां मगरअब रोने सें क्याँ होँ सकता थां? पच्चीस साल कां समय थोडा सां नहि होता अपने बाप सें अनबन कियेहुए।
प्रतिमा कों लगनेलगा कि यह जोँ कुछ भि आज उसके औऱ उसके परिवार केँ संग होँ रहा हैं वोँ सभीउसी कां फल हैं जोँ उसने इतने वर्षों सें बाप कों दुखी कियाहुआ हैं। यहसभी सोचकर हि प्रतिमा कों चक्कर सां आनेलगा। उसने अपनासिर दोनो हाॅथों सें पकड़ लिया। तभी ड्राइंग रूम मे शिवा दाखिल हुआ। अपनी माॅम कों इसतरह पीड़ा मे देख वो घबरा सां गय़ा। जल्दी हि प्रतिमा केँ पास पहुॅचा वो औऱ उसे उसके कंधों सें पकड़कर झकझोरा।
"क्याँ हुआ माॅम?" शिवा नें घबराकर कहा___"आप् ठीक तोँ हें नं माॅम? प्लीज़ बताइये न् क्याँ हुआ हैं आपको?"
"कुछ नहि बेटा। " प्रतिमा नें स्वयं कों सम्हालते हुए कहा___"बस थोडा चक्कर सां आँ गय़ा थां। "
"आप् इतना टेंशन क्यूं लेती हें माॅम?" शिवा नें प्रतिमा केँ चेहरे कों दोनो हथेलियों मे लेकर कहा___"सभी कुछठीक होँ जाएगा। डैड बहोत जल्द वापस आँ जाएॅगे। "
"हाॅ बेटा। " प्रतिमा नें कहींखोए हुए सें कहा___"सभी कुछठीक हौ जाएगा। तेरेडैड जल्द हि हमारे पास वापस आँ जाएॅगे। "
"आप् चलिये माॅम। " शिवा नें प्रतिमा कों उठाते हुए कहा___"अपने कमरे मे आराम कीजिए आप् औऱ हाॅ अधिकसोच विचार मत किया कीजिए। "
शिवा कि बात कां प्रतिमा नें फीकी सि मुस्कान केँ संग जवाब दिया औऱ कमरे कि तरफ शिवा केँ संगबढ़ गई। कमरे मे बेड पर्र प्रतिमा कों लेटाकर शिवा किचन कि तरफबढ़ गय़ा। किचन मे सविता गरमचाय बनाकर केतली मे डालरही थि। यहदेख कर शिवा वापस बाहर् कि तरफआया औऱ हवेली सें बाहर् आँ गय़ा। बाहर् उसने एक् व्यक्ति कों बुलाया औऱ अंदर लें गय़ा उसे। अंदरआकर उसने सविता सें कहा कि वोँ गरमचाय नास्ता काका कों पकड़ा दे। सविता नें वैसा हि किया। शिवा औऱ वोँ व्यक्ति दोनो हि गरमचाय नास्ता कां सामान लिये सर्वेंट क्वार्टर कि तरफबढ़ गए।
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उधर फार्महाउस पऱ!
शंकर काका कि स्टोरी सें माहौल थोडा गंभीर सां होँ गय़ा थां लेकिन हरिया काका कि मज़ेदार बातों सें फिन सें खुशनुमा हौ गय़ा थां। रितू कों सहसाकुछ यादआया तोँ उसने हरिया काका कि तरफ देखा।
"अरे काका। "फिन उसने कहा___"इन सभी बातों केँ बीच हम् यह तौ भूल हि गए कि तहखाने मे मंत्री कि बेटी कैद हैं औऱ वोँ कल सें भूखी प्यासी भि होगी। "
"हाॅ बिटिया। " हरिया काका केँ चेहरे पऱ चौंकने वालेभाव उभरे___"ई तासही मा हम् भुलाय दीन्हें रहे। ऊ ससुरी मंत्रीवा कि छोकरिया अबे तक ता ज़रूरै भूख पियास सें मरतहोई। "
"आप् भि कमाल करते हैं काका। " रितू नें कहा___"ऐसा लगता हैं जैसे आप् उस बेचारी कों ऐसे हि मार देंगे। जबकि अभि तौ मुझे उसके अंदर कि गर्मी निकालनी हैं। चलिये देखें तौ सही क्याँ हालचाल हें उसके?"
"हाॅ हाॅचला बिटिया। " हरिया काका नें बंदूख कों शंकर केँ हाथ मे थमाते हुए कहा___"अब ता देखहिन कां पड़ी कि ऊ ससुरी अबे ज़िंदा बा केँ मरगईल हैं। "
रितू हरिया कि बात पऱ मुस्कुराती हुईँ तहखाने कि तरबबढ़ गई। उसके पीछे पीछे हरिया भि चलरहा थां। कुछ हि देर मे वोँ दोनो तहखाने केँ दरवाजे केँ पास खड़े थें। हरिया नें चाभीहे तहखाने कां दरवाजा खोला औऱ एक् साइडहट गय़ा। रितू दरवाजे केँ अंदर कि तरफ दाखिल होँ गई। अभि वोँ दोतीन सीढ़ियाॅ हि नीचे उतरी थि कि सहसाउसे रुक जानां पड़ा औऱ जल्द सें पैन्ट कि जेब सें रुमाल निकाल कर अपनेमुह व नाॅक पऱ रखना पड़ा।
तहखाने मे तेज़ दुर्गंध फैली हुई थि। मतलबसाफ थां अंदर मौजूद सूरज औऱ उसकेयार याँ फिन सूरज कि बेहन मे सें किसी कां टट्टी पेशाब छूट गय़ा थां जिसकी वजहहे अंदर दुर्गंध फैली हुई थि। रितू सें बर्दास्त न् हुआ तौ वोँ वापस तहखाने सें बाहर् आँ गई।
"काकाइन लोगों नें तोँ यहाॅमहक फैलारखी हैं। " रितू नें बुरा सां मुह बनाते हुए कहा___"ऐसे मे अंदर जाया नहि जाएगा। इसलिए सबसे पहले आप् तहखाने कां हालसही करवाइये। उसकेबाद हि आगे कां कार्यक्रम होगा। "
"ठीक हैं बिटिया। " हरिया नें कहा___"हम् इहाॅ कि सफाई करवाता हूॅतब तक तुँ बाहर् रहा। "
"ठीक हैं काका। " रितू नें कहा___"मे कुछदेर केँ लिए कमरे मे जारही हूॅ। जब यहाॅ कां सभीठीक हौ जाए तोँ आप् मुझे बुला लीजिएगा। "
यहकहकर रितू वहाॅ सें बाहर् आकरइस तरफ सें अंदर गई औऱ अपने कमरे कि तरफबढ़ गई। कमरे मे आकर रितूबेड पऱ लेट गई। अभि वो लेटी हि थि कि नैना फूफी भि कमरे मे आँ गई औऱ बेड केँ किनारे भाग मे बैठ गई।
"आइये फूफी। " रितू नें अधलेटी अवस्था मे कहा__"आप् भि धीरे-धीरे लेट जाइये। "
"चलठीक हैं तूँ कहती हैं तोँ लेट जातीहूॅ। " नैना नें रितू केँ इसतरफ आतेहुए कहा___"अच्छा यहबता कि तेरेइस फार्महाउस पऱ औऱ क्याँ क्याँ होता हैं?"
"क्याँ मतलब??" रितू बुरीतरह चौंकी___"यहाॅ क्याँ क्याँ होता हैं सें आपका क्याँ मतलब हैं?"
"इतनी नासमझ व बुद्धू नहि हूॅ मे जितना तुँ समझरही हैं मुझे। " नैना नें कहा___"यहाॅ आए मुझेकुछ टाइम तौ होँ हि गय़ा हैं। मैने महसूस किया हैं कि यह फार्महाउस असल मे मुजरिम लोगों केँ लिए एक् ऐसीजेल कि तरह हैं जिसकी कैद सें मुजरिम कां निकल पाना नामुमकिन हि नहि बल्कि असंभव हैं। कहदेभला कि मे झूॅठकह रहीहूॅ?"
रितू चकितभाव सें देखती रह गई अपनी फूफी कों। लेकिन फिन जल्दी हि सम्हल भि गई। चेहरे पर्र शशंकभाव लातेहुए बोलीं___"यह सभी आपने स्वयं महसूस किया हैं याँ यहसभी बातें किसी केँ द्वारा पताचली हैं आपको?"
"बात अगरसच हैं तौ इसबात सें कोई मतलब हि नहि रह जाता मेरी बच्ची कि मुझेयह सभी केसेपता चला?" नैना नें स्पष्ट भाव सें कहा___"दूसरी बात मुझेइस बात सें कोई ऐतराज़ नहि हैं कि तूँ इस फार्महाउस पर्र क्याँ कररही हैं। बल्कि खुशी हैं कि मुजरिमों कों उचित सज़ादे रही हैं तूँ। मगर मे बसयही कहूॅगी कि ऐसे कामों मे अपनीजान कां ख़तरा भि बहोत होता हैं इसलिए अपना भि ख़याल रखना। "
"ख़तरा तोँ हर इंसान केँ जिंदगी मे होता हैं फूफी। " रितू नें कहा___"चाहे वोँ कोईआम इंसान हौ याँ फिनकोई ऐसा इंसान जौ हर वक़्त ख़तरों केँ बीच हि रहता हैं। मे इस फार्महाउस पऱ इसके पहलेकभी भि किसी मुज़रिम कों कानून अपने हाॅथ मे लेकर नहि आई फूफी औऱ नाहीऐसा करने कां मैनेकभी सोचा थां। मगरयह सभी तोँ मैनेतब कियाजब विधी कां मामला आया। हमारे देश मे किसी मुजरिम कों उसके संगीन सें भि संगीन अपराध केँ लिएकोई शख्त सज़ा नहि होँ पाती। इसकीकई सारी वजहें हें मगर मुख्य वजहें यह हें कि हमारा कानूनी सिस्टम बहोत कमज़ोर व ढीला हैं। कोर्ट मे आज भि लाखों ऐसे संगीन अपराधों केँ केस फाइलों केँ नीचेदबे हुए हें जिनकी समयावधी कां पता चलते हि हमारा कानून पर्र सें विश्वास उठने लगता हैं। दूसरी बात हमारा यही कानूनी सिस्टम बड़े लोगों औऱ मंत्री मिनिस्टरों केँ हाॅथ कि कठपुतली बनाहुआ हैं। जबकि सच्चाई यह हैं कि कानून कि नज़र मे कोई भि छोटा बड़ा नहि होता। अगर अपराध देश केँ सबसे बड़े ब्यक्ति नें किया हैं तोँ उसे भि वैसी हि सज़ा मिलनी चाहिए जोँ किसीआम मुजरिम कों मिलती हैं। मगरयह सभी कहने कि बातें हें फूफी, हकीक़त मे ऐसा होता नहि हैं। कानून केँ इसी कमज़ोर सिस्टम कि वजह सें एक् शरीफ व्यक्ति मजबूरीवश जुर्म कां दामनथाम बैठता हैं। "
"तुम् जिन चीज़ों कि बातकर रही होँ बेटा। " नैना नें गहरी साॅस ली___"वोँ हमेशा ऐसी हि रहेंगी। बल्कि अगरयह कहूॅ तोँ ग़लत नं होगा कि इससे भि बदतरबन जाएॅगी। इसलिए इस विषय पऱ बात करने कां कोई मतलब नहि हैं। तुमने कहा कि विधी कां मामला जब सामने आयातब तुमने ऐसा क़दम उठाया। विधी केँ बारे मे भि तुमने हि मुझे बताया थां कि उसकेसंग चारऐसे लड़कों नें घिनौना कुकर्म किया थां जौ बड़े बाप कि पैदाईश हें। मे यह कहना चाहती हूॅ कि ऐसे बड़े बाप कि औलादों कों यहाॅ लाकर औऱ उनको सज़ा देने सें कहीं तुम् पर्र तौ कोई ख़तरा नहि आँ जाएगा। आख़िर प्रश्न तौ बड़े लोगों कां हैं न्। जिनके यह बच्चे हें उन्हें अगरपता चलजाए कि उनके बच्चों कों तुमने क्याँ औऱ केसे सज़ा दि हैं तौ यकीनन वोँ बड़ेलोग तुझ पऱ बिजली बनकर गिरेंगे। "
"फिक्र मत कीजिए फूफी। " रितू नें सहसा कठोरभाव सें कहा___"मैंने उन सबका अच्छा खासा इंतजाम कियाहुआ हैं। आप् यूॅ समझिये कि उन बड़े बड़े खलीफाओं कि जान मेरी मुट्ठी मे कैद हैं। आज कि डेट मे वोँ सभीऐसी कठपुतलियाॅ बनेहुए हें जोँ मात्र मेरे हि इशारे पऱ नाचने केँ लिए मजबूर हें। वोँ अपनी मर्ज़ी सें ऐसाकोई काम नहि करेंगे जोँ मुझे मनपसंद हि न् आए। "
"ऐसा तेरेपास उनके खिलाफ क्याँ हैं?" नैना नें चकितभाव सें पूछा___"जिसकी वजह सें वोँ सभी बड़े बड़े सूरमा तेरे इशारों पर्र नाचने केँ लिए मजबूर बनगए हें?"
नैना केँ पूछने पर्र रितू नें कुछसमय सोचा औऱ फिन उसने वीडियो वाली सारीबात बता दि उसे। यह भि बताया कि उसने स्वयं मर्द कि आवाज़ मे मोबाइल पर्र मंत्री सें बात भि कि थि औऱ कल तोँ वोँ मंत्री कि बिगड़ैल बेटी कों भि पकड़कर लेँ आई हैं जौ इस टाइम तहखाने मे बंद हैं। सारी बातें जानने केँ बाद नैना कां मुह आश्चर्य सें खुला कां खुलारह गय़ा।
"हे ईश्वर!। " फिन उसकेमुख सें निकला___"यह तूँ क्याँ कररही हैं रितू? लड़कों कि बात तक तोँ ठीक थां औऱ लड़कों केँ बापों तक भि ठीक थां लेकिन लड़की कों क्यूं कैदकर किया तूने?यह ठीक नहि हैं मेरी बच्ची। उन लोगों नें घृणित कर्म किया क्योंकि वोँ उनकी फितरत थि मगर तेरी फितरत तोँ ऐसी नहि हैं न् बेटा? इसलिए मेरीबात मान औऱ मंत्री कि बेटी कों छोंड़ दे तुँ। "
"आपने बहोत दूर तक कां सोच लिया फूफी। " रितू नें मुस्कुरा कर कहा___"जबकि मेराऐसा करने कां कोई इरादा हि नहि हैं। मेरा मकसद तोँ बसयह हैं कि मे उन्हें भि उस चीज़ कां एहसास कराऊॅ जिस चीज़ कों करने मे उन्हें सबसे ज़्यादा मजाआता हैं। मे उन्हें दिखाना चाहती हूॅ फूफी कि जब वैसा हि सभीकुछ अपनेसंग होता हैं तब कैसा प्रतीत होता हैं? जब अपनेऊपर वैसा जुल्म होता हैं तोँ कितनी तक़लीफ़ होती हैं? हाॅ फूफी यही, बस यही एहसास कराना चाहती हूॅ मे उन सबको। "
"अगर ऐसीबात हैं तोँ फिनठीक हैं। " नैना नें सहसा मुस्कुराते हुए कहा___"जौ भि करनाइस बात कां ख़याल रखतेहुए करना कि तुम् एक् अच्छे संस्कारों वाली लड़की होँ जौ किसी कां भि बुरा नहि कर सकती। "
"अच्छा अब आप् आराम कीजिए फूफी। " रितू नें बेड सें उतरते हुए कहा___"मे ज़रा तहखाने मे उन सबकाहाल चालदेख लूॅ। "
"ठीक हैं जाओ। " नैना नें कहा औऱ धीरे-धीरे लेट गई।
रितू कमरे सें निकलकर बाहर् आँ गई। उसने अपने आईफोन केँ बाईब्रेशन कों महसूस किया थां। वोँ समझ गई थि कि हरिया काका नें हि उसेमिस काल दिया थां। मतलबसाफ थां कि उसने तहखाने कि गंदगी कों साफकर दिया थां। ख़ैर, कुछ हि देर मे रितू तहखाने मे पहुॅच गई। अब वहाॅ पर्र कोईमहक नहि थि। बल्कि सबकुछ एकदम सें साफ सुथरा हौ गय़ा थां।
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उधर मंत्री दिवाकर चौधरी कि तरफ!
इस वक़्त मंत्री केँ सब मित्र ड्राइंगरूम मे जमाहुए बैठे थें। सबकेबीच ब्लेड कि धार कि मानिन्द पैना सन्नाटा फैलाहुआ थां। अभि थोड़ी देर पहले हि मंत्री दिवाकर चौधरी अपने आवास पऱ अपने साथियों केँ संगआया थां। दिवाकर चौधरी कलसाम सें चिंतित व परेशान थां। कलसाम कों हि आया नें बताया थां कि रचना बेटी जिम सें नहि लौटी हैं। चौधरी कों पहलेइस बात पर्र अधिक चिंता कि बात नज़र नहि आई थि। उसेलगा थां कि रचना अपनी फ्रैण्ड्स केँ संग होगी। लेकिन जबआधी रात गुज़र जाने पर्र भि रचना न् आई तोँ चौधरी कों चिंता सताने लगी। उसने रचना कि जान पहचान वालीसब लड़कियों कों मोबाइल लगाकर रचना केँ बारे मे पूॅछा थां। मगर सबनेयही कहा कि रचना उनकेपास नहि हैं। एक् लड़की नें बताया कि साम कों जिम सें बाहर् आते वक्त रचना उसकेसंग हि थि लेकिन फिन वोँ अपनी स्कूटी लेकरघऱ केँ लिए निकल गई थि।
दिवाकर चौधरी कों कल सारीरात नींद नहि आई थि। अपनी बेटी केँ लौटने केँ इंतजार मे वो जागता हि रहा थां। मगररात गुज़र गई औऱ अबयह दूसरा दिन शुरुआत होकर दोपहर भि हौ रही थि। फिन भि रचना केँ बारे मे कोई ख़बर नं मिली थि उसे। चौधरी केँ लिए चिंता वाली सबसे ज़्यादा बातयह थि कि रचना कां फोन मोबाइल कल सें लगातार बंदबता रहा थां। दिवाकर चौधरी कों अब अपनी बेटी कि बहोत अधिक चिंता सतारही थि। उसने अपनीतरफ सें पूरी कोशिश करली थि मगर रचना कों ढूॅढ़ पाने मे वो नाकाम रहा थां। दूसरी चिंता कि बातयह थि कि उसका बेटा औऱ बेटे केँ तीनों दोस्तों कां भि कहींकोई पता नहि चलरहा थां। यहसभी बातें चौधरी कि रातों कि नींद उड़ाए हुईँ थि।
"बड़ी हैरत कि बात हैं चौधरी साहब। " अवधेश श्रीवास्तव कह उठा___"पहले हम् अपने बच्चों केँ लिए चिंतित व परेशान थें। उसकेबाद हम् अपनेलिए परेशान हौ गएउन वीडियोज़ कि वजह सें औऱ अब रचना बेटी केँ लिए परेशान हौ गए हें। पिछले कुछ टाइम सें यहसभी हमारे संग क्याँ होनेलगा हैं इसका अंदाज़ा भि हैं किसी कों?"
"हमसे सबसे बड़ी ग़लती यह हुईँ कि हमनेहर चीज़ कों तुच्छ व ग़ैरमामूली समझा। " अशोक मेहरा नें कहा__"पर्र अब हमें गंभीरता सें इस सबके बारे मे सोचना पड़ेगा चौधरी साहब। हमें शुरुआत सें हर घटना पर्र ग़ौर करना होगा। हमारे संग राहू कुतू कां यह चक्कर तब सें शुरुआत हुआ जबसे हमारे बच्चों नें उस लड़की कां रेप किया थां। उसरेप केँ बाद सें हि हमारे बच्चे गायबहुए हें औऱ अब तक हमें उनकीकोई खोज ख़बर नहि लगी हैं। उसकेबाद उस अंजान ब्यक्ति कां हमें वोँ वीडियोज़ भेजना, संग हि उसकी वोँ धमकीभरी बात। औऱ अब रचना बेटी कां अकस्मात गायब हौ जानां। यह सारी घटनाएॅ इसबात कि तरफ स्पष्ट रूप सें इशारा करती हें कि इनसब घटनाओं कां कर्ता धर्ता एक् हि ब्यक्ति हैं। दूसरा कोई आदमीऐसा करने कां सोच भि नहि सकता हैं। "
"मे अशोक कि इन बातों सें पूरीतरह सहमतहूॅ चौधरी साहब। " अवधेश श्रीवास्तव नें कहा___"यह सच हैं कि सारी घटनाओं कां केन्द्र बिन्दु उस लड़की केँ रेप वाली वोँ घटना हि हैं। ऐसे मामलों मे आमतौर पर्र वही होता हैं जौ ऐसेहर रेपिस्ट केँ संग होता हैं। यानीरेप पीड़िता केँ घरवाले पुलिस मे एफआईआर दर्ज़ करवाते हें औऱ अदालत सें इंसाफ कि गुहार लगाते हें। हलाॅकि ऐसाकम हि होता हैं क्योंकि कोई भि शरीफ ब्यक्ति अपनी बदनामी नहि कराना चाहता इसलिए केस कों रफादफा करवा लेता हैं लेकिन कुछऐसे भि होते हें जोँ बदनामी सें नहि डरते औऱ इंसाफ केँ लिए सुप्रीम कोर्ट तक कां दरवाजा पारकर जाते हें। मगर हैरत कि बात हैं कि जिस लड़की केँ संग हमारे बच्चों नें रेप कियाउस पर्र किसी नें कोई ऐक्शन हि नहि लिया। जबकि कानून केँ हि डर सें हमारे बच्चे शायद कहींछुप गए औऱ आज तक लौटकर घऱ नहि आए। दूसरी बातयह कि हमने भि यह जानने कि कोशिश नहि कि कि रेप केँ बादउस लड़की कां क्याँ हुआ? जबकि हमेंऐसे मामले कि लम्हा लम्हा कि ख़बर रखनी चाहिए थि। आजउस घटना कों घटे क़रीब क़रीब दो हप्ते होँ गए होंगे। "
"यहसच हैं कि हमनेहर चीज़ कों मामूली हि नहि समझा बल्कि उसे नज़रअंदाज़ भि किया। " दिवाकर चौधरी नें गहरी साॅस लेतेहुए कहा___"जिसका नतीजा आज हमेंइस रूप मे देखने कों मिलरहा हैं। मगर, अब भि शायदकुछ नहि बिगड़ा हैं। हमेंइस मामले मे अपनीतरफ सें जाॅच पड़ताल करनी चाहिए। सबसे ज़्यादा उस लड़की केँ बारे मे, क्योंकि घटनाओं कां सिलहिला उसरेप सें हि शुरुआत हुआ हैं। संभव हैं कि हमेंकोई ऐसा सुराग़ मिलजाए जिससे हमें सारी बातों कां पताचल जाए। हलाॅकि हमनेउस दिन पुलिस कमिश्नर सें मोबाइल पर्र पूॅछा थां कि हमारे बच्चों केँ लापता होने मे अगर पुलिस कां हाॅथहुआ तौ अच्छा नहि होगा। इस पर्र कमिश्नर नें साफसाफ कहा थां कि हमारे बच्चों पर्र कानून कां हाॅथतभी पड़ सकता थां जबकि रेप पीड़िता केँ घरवालों नें थाने मे एफआईआर दर्ज़ करवाया होता। इस लिएजब ऐसाकुछ हुआ हि नहि हैं तोँ हमारे बच्चों पर्र कानून कोई कार्यवाही केसेकर देगा?इस लिएयह तोँ साफ हैं कि हमारे बच्चों केँ गायब होने मे नुलिस याँ कानून कां कोई हाॅथ नहि हैं। मगर बच्चे गायब हें यहसचबात हैं। इसलिए अब इसकापता लगाना बेहद ज़रूरी हैं कि यहसभी किसने किया हैं हमारे बच्चों केँ संग? दूसरा मामला वोँ वीडियो भेजने वाला हैं। वीडियो भेजने वाले नें उसदिन मोबाइल पऱ स्पष्ट कहा थां कि उसकेपास हमारे खिलाफ ऐसेऐसे सबूत हें जिनके बेस पर्र वोँ हमेंजब चाहेबीच चौराहे पऱ नंगा दौड़ा सकता हैं। उसकीइस बात पऱ हमनेयह निष्कर्श निकाला थां कि संभव हैं कि उसी नें हमारे बच्चों कों पकड़ा होँ औऱ फिन उन्हें टार्चर करके उनसे हमारे खिलाफ़ उन वीडियो केँ रूप मे सबूत प्राप्त किया होगा। "
"फिन तोँ यह साबित हौ गय़ा चौधरी साहब कि इनसब घटनाओं कां कर्ता धर्ता एक् हि ब्यक्ति हैं। " अशोक मेहरा बीच मे बोल पड़ा___"आपकी बातों मे यकीनन ठोस सच्चाई हैं। यकीनन हमारे बच्चे उस वीडियों भेजना वाले केँ पास हि हें। इसबात सें यह भि सोचाजा सकता हैं कि रचना बेटी कों भि उसी नें किडनैप किया होगा। "
"बिलकुल ऐसा हौ सकता हैं चौधरी साहब। " अवधेश श्रीवास्तव नें कहा___"अभि तक हमें वस्तुस्थित कां ज़रा भि एहसास नहि थां लेकिन अब हौ रहा हैं औऱ समझ मे भि आँ रहा हैं कि वोडियो भेजने वाला हमसे चाहता क्याँ हैं?"
"क्याँ चाहता हैं वो??" दिवाकर चौधरी फिरकिनी कि मानिंद अवधेश कि तरफघूम कर पूछा थां।
"हौ सकता हैं कि इन मामलों केँ तहतउस वीडियो भेजने वाले केँ संबंध मे जौ थ्यौरी मेरे दिमाग़ मे बनी हैं वोँ ग़लत भि हौ। " अवधेश श्रीवास्तव नें कहा___"लेकिन फिन भि प्रकट कररहा हूॅ। बात उस लड़की केँ रेप सें हि शुरुआत हुइ। रेप पीड़िता केँ घरवालों कों जबइसबात कां पताचला होगा कि रेप करने वाले लड़के बड़े बाप कि औलाद हें तौ वोँ समझगए कि पुलिस मे एफआईआर दर्ज़ कराने कां कोई फायदा नहि होगा। क्योंकि बड़े लोगों केँ प्रभाव सें सीघ्र हि इसकेस कों इतना कमज़ोर बना दिया जाएगा कि उसमें कोईदम नहि रह जाएगा। बल्कि ऐसा भि हौ सकता हैं कि उल्टा लड़की कों हि कोर्ट मे चरित्रहीन औऱ बदचलन साबित कर दियाजाए। उस सूरत मे इंसाफ तौ मिलने सें रहा हि ऊपर सें समाज केँ बीच उनकी जोँ इज्ज़त खाक़ मे मिलेगी उसकी भरपाई इस जन्म मे तोँ संभव नहि होँ सकती थि। इसलिए लड़की केँ घरवालों नें अपनी बेटी केँ संगहुए रेप कां बदला लेने केँ लिए दूसरा तरीका अपनाया। दूसरा तरीका यह थां कि किसीतरह वोँ हमारे बच्चों कों पकड़ लें औऱ फिन अपने तरीके सें जौ चाहे सज़ादें उन्हें। अब तक वोँ इसीलिए अपनेहर काम मे सफलरहे क्योंकि हमनेइन सभी चीज़ों कि तरफ ध्यान हि नं दिया थां। ध्यान तोँ तबआया जब मामला हमारे हाॅथ सें निकल गय़ा। हाॅ चौधरी साहब, मामला हमारे हाॅथ सें निकल हि तौ गय़ा हैं। क्योंकि उस ब्यक्ति केँ पास हमारे खिलाफ जोँ सबूत हैं वोँ हमें किसी भि लम्हा बीच चौराहे पऱ नंगा होकर दौड़ने पर्र मजबूर कर देगा। "
"तौ तुम्हारे हिसाब सें यहसभी लड़की केँ घरवालों नें किया हैं?" चौधरी नें कहा___"मतलब कि उन लोगों नें हमारे बच्चों कों पकड़ा औऱ उनसे हमारे खिलाफ़ सबूत भि प्राप्त करलिए?"
"जी बिलकुल। " अवधेश श्रीवास्तव नें कहा___"आप् स्वयं सोचिए कि ऐसा करने कि उनके सिवाभला किसके पासवजह थि? यह तौ एक् यथार्थ सच्चाई हैं नं चौधरी साहब कि बेवजह कभीकुछ नहि होता हैं। इसलिए यहसभी करने कि वजह केवल औऱ केवलरेप पीड़िता केँ घरवालों केँ पास थि। दूसरा ब्यक्ति ऐसा करने कां शौक तोँ नहि रख सकता नं?"
"चलोमान लिया कि यहसभी उसरेप पीड़िता लड़की केँ घरवालों नें किया हैं। " चौधरी नें कहा___"लेकिन प्रश्न यह हैं कि उन्हें हमारी बेटी कों भि किडनैप याँ पकड़ने कि क्याँ ज़रूरत थि? हमारी बेटी नें तोँ कोई गुनाह नहि किया थां न्? फिन क्यूं उसे पकड़ा उन्होंने?"
"संभव हैं कि रचना बेटी केँ ज़रिये। " अवधेश श्रीवास्तव नें कहा___"वोँ हमेंयह एहसास दिलाना चाहते हों कि जब वैसा हि रेपकेस हमारे संग होँ तौ हमें कैसा लगेगा? हमें उससे कितनी तक़लीफ़ होगी?"
अवधेश श्रीवास्तव केँ इस तर्क सें दिवाकर चौधरी कुछबोल नं सका। जैसे निरुत्तर हौ गय़ा थां वो याँ फिन कदाचित उसेबात समझ मे आँ गई थि कि अवधेश कां तर्क बिलकुल सही थां। ख़ैर, अवधेश श्रीवास्तव कि उसबात सें कुछदेर सन्नाटा छायारहा।
"तोँ अब क्याँ कियाजाए?" सहसा अशोक मेहरा नें उस सन्नाटे कों चीरते हुए कहा___"अगर हम् सही लाइन पर्र हें तौ हमारा अगला क़दमअब क्याँ होना चाहिए?"
"बड़ा सीधाव सरल जवाब हैं अशोक। " अवधेश श्रीवास्तव नें कहा___"हमारा अगला क़दमयह होना चाहिए कि हमें जल्द सें जल्दउस रेप पीड़िता लड़की केँ घरवालों कों धर लेना चाहिए। उसकेबाद स्वयं हि हम् अपने तरीके सें उनका क्रिया कर्म करेंगे। "
"तुम् तोँ ऐसेकह रहे होँ अवधेश जैसे कि यहसभी वैसा हि आसानकाम होँ जैसे थाली सें दाल चावल कां निवाला बनाकर उसेखा लेना आसान होता हैं। " अशोक नें कहा___"जबकि हमेंइस बात पऱ भि ज़रा ग़ौरकर लेना चाहिए कि जिस ब्यक्ति कों हम् धर लेने केँ लिए अपने क़दम बढ़ाने जारहे हें उसने क्याँ इस सबके बारे मे नहि सोचा होगा? बल्कि अवश्य सोचा होगा भइया, उसे भि इसबात कां अच्छी तरह सें पता हैं कि हम् क्याँ चीज़ हें। अगर वोँ हमारे बच्चों कों धर लेगा तोँ सबसे पहले हमारा शक़उसी पर्र हि जाएगा। उस सूरत मे हम् उसकीउस धृष्टता केँ लिए उसका क्याँ हस्र करेंगे यहबात भि उसने अवश्य सोची होगी। अब सोचने वालीबात यह हैं कि जब उसनेयह सभी सोचा होगा तोँ अपने बचाव कां कोई नं कोई मार्ग भि सोचा होगा। ऐसे हि तोँ नहि कोई साॅप केँ बिल मे अपना हाॅथडाल देता हैं। "
"यकीनन तुम्हारी बात मे दम हैं। " अवधेश श्रीवास्तव नें जैसे स्वीकार किया__"औऱ उसकेजिस बचाव वाले रास्ते कि तुम् बातकर रहे हौ वोँ यकीनन यही होँ सकता हैं कि आज कि डेट मे उसकेपास हमारे खिलाफ़ सबूत केँ रूप मे वोँ वीडियो रूपी ब्रम्हास्र हैं। "
"बिलकुल ठीक समझे। " अशोक नें कहा__"इस लिएअब हम् अगरकोई क़दम भि उठाएॅ तोँ ज़रासोच समझकर उठाएॅ। क्योंकि अगरउसे पताचल गय़ा कि हम् उसके खिलाफ़ कुछ करनेजा रहे हें तोँ संभव हैं कि अगले हि लम्हा वोँ हम् पऱ क़यामत बरपादे। "
"इसका मतलब तौ यहहुआ कि हम् कुछकर हि नहि सकते। " सहसा चौधरी आवेश मे कह उठा__"उस साले नें हमें पंगुबना कररख दिया हैं। मगरऐसा कब तक चलेगा दोस्त? हमेंकुछ तोँ करना हि पड़ेगा नं? वरना वोँ दिनदूर नहि जबकि हम् चारों किसी चौराहे पर्र नंगे दौड़लगा रहे होंगे। "
"कुछ तोँ करना हि पड़ेगा चौधरी साहब?" अशोक नें कहा___"साला नुकसान तोँ दोनोतरफ सें होना हि हैं। इसलिए कुछ करके हि नुकसान झेलते हें। शायदऐसा भि हौ जाए कि साराखेल हमारे हक़ मे हौ जाए। "
"बात तौ सचकही तुमने। " चौधरी नें कहा___"मगर प्रश्न यह हैं कि हम् करेंगे क्याँ?"
"वही जौ करने कां सजेशन थोड़ी देर पहले अवधेश भइया नें दिया थां। " अशोक नें कहा___"मगर उसमें थोडा चेंज करना पड़ेगा। वोँ यह कि लड़की केँ घरवालों कों पहले हम् दिलेरी सें धरनेजा रहे थें जबकि अबवही काम हम् इस तरीके सें करने कि कोशिश करेंगे कि उस कम्बख्त कों इसकीभनक तक न् लगसके। "
"ओहआई सि। " अवधेश श्रीवास्तव बोला__"मगर मुझे लगता हैं कि हमें एक् बारयह सभी करने सें पहलेफिन सें इस बारे मे सोच लेना चाहिए। कहींऐसा नं होँ कि हम् स्वयं हि धरलिए जाएॅ। "
"कायरव डरपोंक जैसी बातें मतकरो अवधेश। " चौधरी नें कठोरता सें कहा___"अब हम् चुप भि नहि बैटना चाहते हें। साला हिंजड़ा बनाकर रख दिया हैं उसने हमें। मगर अब औऱ नहि। अब जोँ होगा देखा जाएगा। "
बस चौधरी कि इसबात नें जैसे फैंसला सुना दिया थां। किसी मे भि इस फैंसले केँ खिलाफ़ जाने कि हिम्मत नं थि। इसलिए अबइसकाम कों अंजाम देने कि वक़्त सीमा पऱ विचार विमर्ष किया गय़ा औऱ उसकेबाद अशोक औऱ अवधेश अपने अपनेघऱ चलेगए। मगरआगे किसके संग क्याँ होने वाला हैं यह किसी कों कुछपता नं थां।
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दोस्तो, आप् सबके सामने भाग हाज़िर हैं,,,,,,,
आप् सबकी प्रतिक्रिया औऱ फीडबैक कां इन्तज़ार रहेगा।
दोस्तो, भाग नंबर 50 एक् हि ब्रैकेट मे आँ हि नहि रहा थां इसलिए ऐसा देना पड़ा। शब्द संख्या 72000 दिखारहा थां शायद।
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