Oh maa (completee ) - अश्लील कहानी – New Episode
उफ्फ्! मेरे तौ पांव दुखने लगे" अपनी सैंडल उतारती वैशाली हांफते हुए बोलीं, यहा उसका कहनाहुआ औऱ वहा अभिमन्यु बिना किसी अग्रिम सूचना केँ उसकेपेर केँ अत्यंत रसीले पंजों कों अपनी हथेलियों सें हौले-हौले दबाना आरंभकर देता हैं। अपने पति कि मौजूदगी केँ एहसास सें अचानक वैशाली कि धड़कनें रुक सि गई थींमगर जब उसने मणिक केँ मुस्कुराते चेहरे पर्र गौर किया, नौटंकी करतेहुए वो जोर-शोर सें दर्दभरी आँहें लेना शुरुआत कर देती हैं। जबकि सच तौ ये थां कि बेटे केँ हाथों कां मर्दाना स्पर्श वो अपने पांव केँ पंजों सें कहीं ज्यादा अपनी बुर केँ संवेदनशील मुहाने पऱ महसूस कररही थि, लगरहा थां जैसे अभिमन्यु उसके पंजे कों नहीं बल्कि बारम्बार उसकी बुर कों अपनी बलिष्ठ हथेली केँ मध्य भींचरहा होँ। अपने पति कि उपस्थिति मे वैशाली कि येनीच सोच एकाएक इसकदर पैश्विक होँ जाती हैं कि मणिक केँ घाँस पर्र लेटते हि वो बेशर्मीपूर्वक अपनी मांसल जांघों कों तीव्रता सें आपस मे घिसने लगती हैं।
"सुनिये, मुझे बाथरूम जानां हैं" अपनी मम्मी केँ भीतर अकस्मात् आए बदलाव सें हैरान हुए अभिमन्यु नें ज्यों हि उसके उत्तेजित चेहरे कों देखा, वैशाली घाँस पऱ लेटे अपने पति सें बोलपड़ी।
"अभिमन्यु, लेडीज़ टॉयलेट उधर हैं शायद" अपनी आँखें मूंदे लेटे मणिक नें अपनी दायीं दिशा कि ओर इशारा करतेहुए कहा औऱ तत्काल वैशाली बेटे कां हाथथाम अपनेसाथ उसे भि उठने मे सहायता करने लगती हैं।
"मे अब औऱ रोक नहीं सकती मन्यु, मुझे.मुझे यहीं मूतना पड़ेगा" पास हि एक् बड़े सें पेड़ केँ समीप पहुँच वैशाली सिसकी औऱ आजू-बाजू केँ शांत वातावरण कों देख अभिमन्यु कां हाथ पकडे वो उसे भि पेड़ केँ पीछे खींच लेती हैं। एकबार फिनउस अधेड़ मां पऱ उसके बेटे कां खुमार पूरीतरह सें हावी होँ चुका थां औऱ अभिमन्यु कि आँखों मे झांकते हुए हि वो खुलेआम अपनी साड़ी कों अपनीकमर तक ऊँचा उठाने कां दुस्साहस कर बैठी थि।
"कैसीतंग कच्छियां खरीदकर लाये होँ तुम् अपनी मां केँ लिए, दिनभर मेरी गांड कि दरार मे हि घुसी रहती हें। तुम्हें नहींपता कि केसे मैंने अबतक इन्हें तुम्हारे बापू सें छुपाया हैं, अगर पकड़ी गई नाँ तौ याद रखना सीधे तुम्हारा नाम लेँ दूँगी" कहकर वैशाली नें वो साहसिक कार्य भि कर हि डाला जिसकी अभिमन्यु कों कतईआशा नहीं थि।
लो, रखो इसे अपनी पॉकेट मे.मे बिना कच्छी पहने हि ठीक हूं। ह्म्म्म! कितना खुला-खुला सां लगरहा हैं मन्यु, ऐसी ठंडीहवा मे तौ मे घंटों तुम्हारे संग नंगी बैठीरह सकती हूं" अपनी कच्छी कों अपनी टाँगों सें बाहर् निकाल वो उसे अपने बेटे कि दायीं हथेली पर्र रखतेहुए बोलीं।
"तुम् देख्ना मत, हाँ मन्यु.मे मूतने बैठरही हूं" बेहद अश्लीलात्मक व्यंग कसतेहुए अपने निचले धड़ सें यूँ सरेआम नंगी होँ चुकी वो अत्यंत बेशर्म मम्मी वहीं घाँस पर्र नीचे बैठने लगी थि मगरतभी अभिमन्यु उसकी बायीं कलाई कों बलपूर्वक थामउसे स्वयं सें बुरीतरह चिपका लेता हैं।
"आखिर तुम् चाहती क्याँ होँ? क्यूं अपनी हँसती-खेलती जीवन कों बर्बाद करने पऱ तुली हैं? कोई सहारा नहीं देगा हमें मां.नाँ तुम्हारा पति, तुम्हारी बेटी औऱ नां हि कोई रिश्तेदार। समाज हमपर थूकेगा तोँ नां तुम् सह सकोगी औऱ नां हि मे" हालाकिं अभिमन्यु द्वारा कहा गय़ा उसकाहर शब्द उसके गुस्स कि थरथराहट सें कांपरहा थां मगरजिस प्रेम सें उसकाहाथ उससे लिपटी उसकी मम्मी कि पीठ कों सहलाने मे व्यस्त थां, उसके गुस्सा कि पहचान करनाखुद उसकेबस सें बाहर् थां।
"मुझे तुम् दोनों चाहिए.बस मुझे तुम् दोनों चाहिए" बेटे केँ सर्वदा उचितकथन केँ जवाब मे वैशाली नें रट लगाते हुएकहा।
"हम् हें तौ तुम्हारे संग मां, तुम् अकेली कहां होँ" अभिमन्यु अत्यधिक आश्चर्य सें भरतेहुए पूछता हैं, आखिर उसकी मां क्यूं बेवजह आशंकित हैं वो जानने कां बेहद इच्छुक होँ चला थां।
"अधूरे नहि, मुझे तुम् दोनों पूरे चाहिए मन्यु। तुम्हारे पिताजी कि तरह मुझे तुम् भि पूरे चाहिए" वैशाली रुदन केँ स्वर मे बुदबुदाई, निश्चित वो रो पड़ने केँ बेहद नजदीक पहुँच चुकी थि।
"अच्छा तौ क्याँ आज सुभह इसीलिए तुम् मेरे कमरे मे नंगी-पुंगी चलीआई थि?" अभिमन्यु नें जैसे विस्फोट किया, उसके विध्वंशक सवाल कों सुन उससे लिपटी उसकी मां क्षणमात्र मे हि उससेअलग होने कां प्रयास करने लगती हैं मगर वो उसे स्वयं सें लेशमात्र भि दूर नहीं होने देता बल्कि पहले सें कहीं
ज़्यादा कसकर स्वयं मे समेटना शुरुआत कर देता हैं। आखिरउसे भि तोँ अपनी मां सें दूरहुए महीना बीतने कों थां, अब उसके एहसास नम नहीं होते तोँ फिनकब होते?
"तुमने चोरी छिपे मेरे मैसेज भि पढ़े मां, कहो क्यूं किया तुमने ऐसा?" अभिमन्यु कां ये लगातार दूसरा विस्फोट थां औऱ जिसे सुनने केँ बाद तौ वास्तविकता मे वैशाली कि आँखें झरने सि बहनेलगी थीं।
"क्योंकि.क्योंकि मे चाहती हूं कि तुम् उन रंडियों कों नहीं अपनी.अपनी मां कों चोदो" वैशाली केँ रुंधे गले सें अचानक बाहर् आयाये विस्फोट उसकीपीठ पऱ कसे उसके बेटे केँ हाथों कों भि अचानक हि शून्य मे परिवर्तित कर देता हैं औऱ जोँ मरणासन्न हुए स्वतः हि नीचेगिर जाते हें।
"हाँ मन्यु येसच हैं बेटा, तुम्हारी मम्मी तुमसे चुदवाने कों तड़परही हैं मगर चाहकर भि वो पापी नहींबन पारही। तुम्हारी शपथखा कर कहती हूं मेरेलाल, मे हरपल केवल औऱ मात्र तुम्हारे बारे मे हि सोचती हूं। तुम्हें पूरीतरह सें पाने कि चाह मे मेरातन औऱ मन पागल सां हुआजा रहा हैं, रह-रहकर मेरी बुर बस तुम्हें हि पुकारती रहती हैं इसआस मे कि तुम् वापस इसमेसमा जाओ.हमेशा हमेशा केँ लिए इसमे समाकर रहजाओ" वैशाली बोलती हि जातीयदि बीच मे हि अभिमन्यु केँ फोन पर्र मोबाइल नहींआया होता, रिंगटोन उसके पिता केँ नंबर पर्र सेव थि औऱ जिसे वैशाली भि खूब पहचानती थि।
"बसलौट हि रहे हें बापू, टॉयलेट बहोत दूर थां" कहकर वो कॉलआई कटकर देता हैं।
"अपनेयह आँसू पोंछों मम्मी, तुम् भि बात-बेबात रोना शुरुआत कर देती हौ" अभिमन्यु अपने अंगूठों सें अपनी मम्मी कि नम पलकें पोंछते हुएउसे प्रेम भरी डाँट लगाते हुए कहता थां।
"मूतना हैं?" उसने पिछले कथन मे जोड़ा, जिसके जवाब मे जल्दी वैशाली इनकार मे अपनासिर हिला देती हैं।
कच्छी पहनोगी?" अभिमन्यु केँ नटखटी सवाल जारीरहे, उसकी मम्मी कां इनकार भि कहां पीछे हटने वाला थां।
"मेरा लन्ड चूसना हैं?" उसने लगातार तीसरा सवाल पूछा, इस बार नां चाहते हुए भि जाने क्यूं वो जोरों सें हँसने भि लगा थां।
"धत्!" पहले बेटे कां अश्लील सवाल तत्पश्चयात उसकी हँसी सें लज्जित वैशाली उसकी बलिष्ठ छाती पर्र घूंसा जड़तेहुए कुनमुनाई।
"नौटंकी कहीं कि.अबचलो। दो जवान बच्चों कि मां होकर भि साड़ी केँ नीचे बिना कच्छी पहनेयूँ सरेआम घूमती होँ, लज्जा तौ तुम्हें आती नहीं वैशाली" बीते संपूर्ण जिंदगी मे प्रथम बार अपनी मां केँ सम्मुख खुदउसी कां नाम प्रत्यक्ष अपनी जुबान पऱ लाकर अभिमन्यु जितना संतोष स्वयं महसूस कररहा थां, वैशाली उससे कहीं ज़्यादा संतुष्ट, बेहद हर्षित थि।
एक् उच्चस्तरीय रेस्टोरेंट मे वैशाली कि पसन्द कां खानां लग चुका थां, डरते-डरते हि सही पऱ पहला निवाला अपने बेटे कों खिलाकर वो अगला अपने पति केँ मुँह तक पहुँचा हि देती हैं। अभिमन्यु कों भि नाँ जाने क्याँ सूझा औऱ वो भि स्वयं नाँ खाकर अपने हाथों सें बारी-बारी अपने माँ-बाप कों खिलाने लगा थां, फिन तौ जैसे मणिक कां हाथ भि उसकी पत्नि औऱ बेटे कि तर्ज पर्र बस उन्हें हि खिलाते जाने मे मग्न हौ चला थां। वेटर तोँ वेटर, वो मौजूद ग्राहक भि उन तीनों केँ बीचचल रही अनूठी व प्रेमपूर्ण भोजनग्रहण प्रक्रिया सें हैरान हुए बगैर नहींरह सका थां, बल्कि कुछ तौ स्वयं ब स्वयं उनकेरंग मे रंगगए थें। हमेशा कंजूसी करने वाली वैशाली उस तात्कालिक टाइम मे इतनी ज़्यादा प्रफुल्लित थि कि बेटे सें पैसे मांग उसने वेटर कों एक् लंबीटिप भि उपहारस्वरूप खुशी-खुशी प्रदान कर दि थि।
घऱ लौटते-लौटते बहुतरात हौ चुकी हैं, मणिक केँ स्कूटर केँ पीछे अभिमन्यु भि हौले-हौले अपनी बाइकचला रहा हैं, मार्ग सुनसान थां तोँ वो केसे अपने माँ-बाप सें आगे याँ उन्हें अकेला वहाछोड़ सकता थां। घऱ पहुँचकर एक् छोटा सां शुभरात्रि वार्तालाभ, फिन तीनों दो मे बटकर अपने-
अपने-अपने शयनकक्ष केँ भीतरचले जाते हें। उसरात वैशाली चुद तौ अपने पति सें रही थि मगर पहलीबार उसके मन-मस्तिष्क मे केवल औऱ मात्र उसका अपना बेटा समाया हुआ थां, मणिक केँ हर हाहाकारी धक्के पऱ उस अधेड़ पत्नि केँ मुंह सें पुकार तोँ उसके पति कि निकलरही थि मगर अंतर्मन सें सें वो औऱ उसकेभाव अब पूर्णतः ममतामयी हौ चुके थें।
-------------------------------------------
एक् औऱ खुशनुमा सुभह कां आगाज़, पति औऱ बेटे कों घऱ सें रुखसत कर चुकी वैशाली रोज कि भांति आज बेटे कि याद मे नग्न नहीं होती।
"अब तौ मे तब अपने कपड़े उतारूंगी मन्यु, जब बिनाडरे, बिना घबराहट केँ, अपनी मर्जी सें तुम्हारे कमरे केँ अंदरआने कां साहस जुटा लूँगी औऱ मेरा यकीन हैं कि तब तुम् भि अपनी मम्मी कों स्वयं मे समाने सें स्वयं कों कतई नहींरोक पाओगे" दर्पण केँ समक्ष मानोखुद सें हि घनघोर प्रतिज्ञा करती वैशाली गंभीर, बेहद गंभीर होँ चली थि। बिना नग्नहुए आज उसका अपनेघऱ मे क्षणमात्र भि काटना मुश्किल थां तोँ कुछदेर केँ सोच-विचार केँ उपरांत वो सुधा सें मिलने सीधे उसकेघऱ कि ओरकूच कर जाती हैं।
दोनों अधेड़ सहेलियां एक् लंबे अंतराल केँ बाद एक्-दूसरे सें मिलरही थि। वैशाली कों ये जानकार बहोत दुख होता हैं कि आज-कल उसकी एकमात्र सखी केवल औऱ केवल बीमार हि बनी रहती हैं, उसका बेडरूम बेडरूम सां नहींउसे किसी दवाखाने सां नजर आँ रहा थां। सुधा केँ बताने पाए वैशाली नें ये भि जानां कि वो निद्रा जैसी सामान्य व प्राकृतिक क्रिया भि बिना औषधि केँ पूरी नहींकर पाने कों विवश हैं, फिरभी वैशाली नें उसे नींद कि गोलियां बेवजह लेने सें प्रेमपूर्ण डाँट भि लगाईमगर खुद अधेड़ उम्र कों प्राप्त कर चुकी वो इस उम्र कि चिंताओं सें अक्सर स्वयं भि तौ जूझा करती थि, अनुभा केँ शादी सें पूर्व वो भि सुबह-शाम अनेकों आशंकाओं सें घिरीरहा करती थि।
दिन कां खानां दोनों नें संग मिलकर बनाया। वैशाली कि इच्छास्वरूप उसकीसखी भि इसी बहाने पेटभर करखा लेगी, ये सोच उसकेमन सें उनके पिछले बैर कों भि स्वतः हि भुला देता हैं। पूरेदिन दोनों नें बहोत गप्पें लड़ायीं, खूब हँसी-ठिठोली कि, एक्-दूसरे कां सुख-दुख बाँटा औऱ कईनए आश्वासनों केँ संग वैशाली वापस अपनेघऱ कों लौटआती हैं। परिवार केँ साथहर किसी कों एक् सच्चे यार कि भि जरुरत ज़रूर होती हैं, आज वैशाली इस सत्यता सें भि बखूबी परिचित हौ चली थि।
साम कों पति-बेटे केँ घऱ लौटने पर्र शुरुआत हुआगरम चाय कां सिलसिला कब रात्रि भोजन पर्र आँ ठहरा थां, येएकल मनुष्य शायद हि कभीसमझ पाएं। मणिक कि पसन्द केँ राजमा-चावल, अभिमन्यु कि पसंदीदा धनिया-टमाटर चटनी औऱ भरवां मिर्च तलते वक़्त तोँ नां जाने कितनी बार रसोई मे हि वैशाली कि लारटपक चुकी थि। तीनों नें छककर खाया, मणिक तौ जैसे बच्चा बन गय़ा थां, लगातार जल्द-जल्द राजमा-चावल जबरन अपने मुँह केँ भीतर ठूंसे जारहा थां औऱ अंततः दो-चार लंबी-लंबी संतुष्टिपूर्वक डकारें लेकर बारी-बारी अपनी उंगलियों कों चाटने लगता हैं।
"भइयाआज तौ मज़ा हि आँ गय़ा, क्यूं अभिमन्यु? मुझसे तौ अब कुर्सी सें उठा भि नहीं जाएगा, लगरहा हैं यहींसो जाऊँ" कुर्सी पऱ पसरते हुए मणिक वास्तविकता मे हि वहीं अपनी आँखों कों मूँदते हुए कहता हैं।
"अरेअरे, हाथ धोकर बेडरूम मे सोइए, यहा कुर्सी पर्र केसे सोयेंगे आप्" वैशाली प्रत्युत्तर मे बोलि। अभिमन्यु चुप थां, अपने माँ-बाप कि अभिनय सें प्रचूर नोंक-झोंक पऱ मन हि मन मुस्कुरा रहा थां।
"हाँये भि सही हैं, कुर्सी पऱ केसे सोऊंगा। मे तोँ चला बेडरूम मे, तुम् दोनों भि वक्त सें सो जानां" कुर्सी सें उठतेहुए मणिक अपनी पत्नि कों आँख मारते हुए बोला, ये उसका एक् मूक इशारा थां जिसका लुफ्त सिर्फ विवाहित दंपति हि उठा सकते हें। लजाती वैशाली जल्दी उसे अपनी आँखों सें डाँटती हैं औऱ फिन बेटे कि नजरों सें छुप-छुपाकर खुद भि एक् मूक
चुम्बन उसकीओर उछालते हुए जोरों सें चहक पड़ती हैं।
अर्धरात्रि केँ टाइमजब अभिमन्यु अपने पलंग पर्र बारम्बार करवटें बदलरहा थां तब अचानक उसके कमरे कि ट्यूबलाइट जलने सें उसकीबंद आँखें भि तत्काल खुल जाती हैं। सर्वप्रथम जोँ विध्वंशक दृश्य उसकी अकस्मात् फटपड़ी आँखों नें देखा, उछलकर पलंग पर्र बैठते हुए वो बार-बार अपनी आँखों कों मसलने लगता हैं मगरफिन भि उसकी आँखें वही विस्फोटक दृश्य देखने कों विवशथीं, जौ कोई सपना नहीं पूर्ण हकीकत थां।
सिर सें पैर तक पूरीतरह सें नंगी उसकी मम्मी उसके पलंग केँ बेहद नजदीक खड़ी थि। उसके खुले केशों सें झर-झर पानीचू रहा थां, बल्कि उसका संपूर्ण कामुक जिस्म हि पानी सें तरबतर थां औऱ जौ कि प्रत्यक्ष प्रमाण थां कि वो स्नान करने केँ पश्चयात बिना अपने जिस्म कों पोंछे सीधी उसके कमरे मे चलीआई थि। उसकी मम्मी कि आँखों कां अद्-धुला काजल उसकी आँखों कों औऱ भि ज्यादा कजरारी बनाने मे सहायक थां, माथे कि चटक बिंदी, नाक कां छल्ला औऱ कानों कि बालियां तौ खुद उसीकी पसन्द सें उसकी मम्मी नें खरीदी थीं, उसकेगले कां स्वर्ण मंगलसूत्र उसके गोल-मटोल स्तन केँ बीचों-बीच धंसा औऱ तौ औऱ उसकी मम्मी नें अपनी पतलीकमर मे आजकई बरसों बाद अपनीमृत सासू माँ सें उपहारस्वरूप मिली चांदी कि करधनी भि पहनी हुईँ थि। उसका सपाट नग्नपेट, अत्यंत गोल नाभि औऱ चिपकी टाँगों केँ मध्य कां तिकोना कालापन जोँ कि उसकी झांटों कि अधिकता सें उत्पन्न हुआ थां, जिसेदेख खाट पऱ बैठे अभिमन्यु कि आँखें सहसा चौंधिया सि गई थीं। मांसल फूली दोनों जांघें, घुटने, गुदाज पिडालियां व पानी केँ घेरे केँ मध्य उसके गौरवर्णी दोनों पांव। एक् आखिरी बारइसे सचमुच कां स्वप्न समझ वो तीव्रता सें अपनी दायीं पहली ऊँगली कों अपने दांतों सें बलपूर्वक काटता हैं मगर उसकी मां भि वहीं थि, वो भि वहीं थां औऱ उसकी कष्टप्रद अहह सें उसका शयनकक्ष भि गूँजउठा थां।
"तु.तुम्, य.यहा, प.बापू?" घबराहटवश अभिमन्यु केँ कांपते मुँह सें बस इतने हि शब्द बाहर् निकलपाए थें, जबकि उसके विपरीत उसकी मम्मी शांत, बेहद गंभीर थि।
"तुम्हारी मां घऱ मे अपने पति कि मौजूदगी केँ बावजूद आधीरात कों अपने जवान बेटे केँ कमरे मे नंगीचली आई हैं, तुम्हें क्याँ लगता हैं मन्यु.मे क्यूं यहाआई हूं?" अभिमन्यु केँ सवाल कों सिरे सें नकार उल्टे वैशाली नें उससे पूछा। उसके भावों सामान उसका सवाल भि उतना हि गंभीर, उतना हि सटीक थां।
"क्याँ तुम्हारे बापूकभी इतने जल्द सोते हें? मैंने स्वयं उन्हें सुलाया हैं मन्यु, ताकि हमारे मिलन मे अब अन्यकोई बाधा नहीं आँ सके" अपनेमूक हौ चुके बेटे पऱ पुनः आघात करतेहुए वैशाली नें अपने पिछले सवाल मे जोड़ा।
"तु.तुम् नें पर्र.मम्मी चलीजाओ, अगर.अगर वो उठगए." अभिमन्यु केँ भयप्रचूर स्वर फूटेमगर इसबार भि उसकाकथन अधूरा रह गय़ा थां।
"मुझे मारेंगे-पीटेंगे, तुम् बचा लेना। हमेंघऱ सें निकाल देंगे, तुम् मजदूरी करकेदो रोटी खिला देना। कहो मन्यु, क्याँ कर सकोगे ऐसा?पाल सकोगे अपनी मां कों जैसे मैंने अबतक तुम्हें पाला हैं?" वैशाली केँ हृदयविदारक शब्द किसी नुकीले खंजर सामान सीधे अभिमन्यु केँ धड़कते सीने मे भीतर तक धंसेचले जाते हें, आज वैशाली शांत थि मगर अभिमन्यु रुंआसा हौ गय़ा थां।
"ज.जरूर मां। अपनी.अपनीजान सें ज़्यादा प्रेम करूंगा तुम्हें, मे भले हि भूखारह जाऊँ पर्र तुम्हें कभी नहीं रहने दूँगा, तुम्हें हर वो खुशी दूँगा जिसकी तुम् वाकई हकदार हौ, तुम्हें." एकाएक रोपड़ा अभिमन्यु आगे बोलता हि जातायदि तत्काल वैशाली उसकेबैड पर्र चढ़करउसे अपने नग्न सीने सें नहीं चिपका लेती।
"सश्श्श्श्! बसबसअब चुप होँ जाओ, बिलकुल.बिलकुल चुप होँ जाओ। तुम्हारे बापू सें हमेंकोई खतरा नहीं मन्यु, अब वो सीधे सुभह हि उठेंगे.मैंने उन्हें नींद कि गोली देकर सुलाया हैं" अपने बेटे केँ उद्विग्न कांपते चेहरे कों पटापट चूमती वैशाली मुस्कुराकर कहती हैं। अभिमन्यु कि आश्चर्य सें बड़ी हौ चुकी आँखें बार-बार उसे अत्यधिक चैन पहुंचा रहीथीं।
तुम्हीं तोँ कहते थें कि तुम्हारी मम्मी डरपोक हैं, बात-बेबात रोती हैं, घड़ी-घड़ी घबराती हैं.तौ आज मैंने तुम्हें झूठा साबित कर दिया" कहकर वैशाली बेटे केँ होंठों पऱ एक् लघु चुम्बन अंकित कर देती हैं, अभिमन्यु केँ पूछने सें पहले उसनेखुद हि उसेबता दिया कि आज वो सुधा केँ घऱ गई थि औऱ उसे नींद कि गोलियां भि वहीं सें प्राप्त हुईँ थीं।
"पर्र फिन भि मम्मी, मे.मे तुम्हारे संग सेक्स नहीं." अपनी मम्मी केँ इस विस्फोटक कारनामे सें हैरान-परेशान हुए अभिमन्यु नें इसबार भि अपनाकथन पूरा नहींकर पाया थां मगर इसबार उसकी घबराहट इसकीवजह नहीं थि बल्कि उसे बलपूर्वक पलंग पऱ धकेल क्षणमात्र मे हि उसकी मां उसकेऊपर सवार हौ चुकी थि।
"उसे चोदना कहते हें निहायती बेशर्म लड़के औऱ अब तुम् क्याँ तुम्हारे फरिश्ते भि वही करेंगे, जौ तुम्हारी ये स्त्री तुमसे करवाना चाहेगी" अपने बेटे कि वृहद दोनों कलाइयों कों अपनी छोटी-छोटी हथेलियों मे जकड़ेठीक उसकेतने विशाल लन्ड पऱ बैठी वैशाली कि मंत्रमुग्ध कर देने वाली हँसी सें उसका पूराघऱ गूँज उठता हैं, कुछ पलोंबाद हि जिसमे अभिमन्यु कि खिलखिलाहट शामिल होँ जाती हैं।
लुका-छिपी सें शरूहुआ मम्मी-बेटे कां ये नया-नवेला नाता पहले खुलेपन मे बदला, फिन उसमे आकर्षण मिश्रित हुआ, थोड़ी अश्लीलता बढ़ी तौ अपने आप् रोमांच नें भि अपनी उपस्थति दर्ज करवा दि, हौले-हौले प्रेम, वासना, भाव, सुख-दुख भि आपस मे मिलने लगे औऱ अंततः सब केँ सम्मिश्रण सें दोनों "दोबदन सें एक् जान हौ हि जाते हें। "
ख़त्म खत्म खत्म
( The end)
Oh maa (completee ) - अश्लील कहानी - Continue reading next part
Relavant source : click here