हम् जौ धीरे-धीरे धीरे-धीरे खोगए। – New Episode
अध्याय ५: एक् नया सिग्नल
जैसा कि आप् सबको पिछली रात कि घटनाओं सें पता हैं, सलोनी दिदी कि पीठ कि मांसपेशी मे बहुततेज दर्द हौ गय़ा थां। जौ शुरुआत मे बस एक् मासूम मालिश कां ऑफर थां, वोँ आरामसे कुछ बहोत ज़्यादा अंतरंग होँ गय़ा। मेरेहाथ उनकी बॉडी पर्र बढ़ती हुइ हिम्मत केँ संग घूमते गए थें। एक्-एक् करके उनके कपड़े उतारता गय़ा, जब तक वोँ मेरे नीचे करीब नंगी न् पड़ीरह गई। उनकी नंगीपीठ कि चिकनी त्वचा, गांड केँ नरम औऱ गोल-गोल उभार — मैंने उनकेहर इंच कों आरामसे मसलते हुएछुआ थां। मेरी उंगलियां वर्जित खुशी सें कांपरही थीं। उन गरम लम्हों मे मे उनकीदेह कों देखने औऱ छूने कां आनंद लें रहा थां, मगर मेरे सीने केँ अंदर कहीं गहरे मे मुझेपता थां कि यह मात्र शुरुआत थि — एक् बेहद अजीब औऱ खतरनाक टाइम कि।
अगली सुभहउसी अजीब माहौल केँ संग उग़ी।
हम् दोनों मे सें किसी नें भि एक् शब्द नहि बोला। आँखों मे आँखें डालना भि नामुमकिन होँ गय़ा थां। जब भि हमारी नजरें मिलने वाली होतीं, हम् जल्दी दूसरी तरफदेख लेते। मानोहवा मे भि उनकी नंगी चूतड़ औऱ रसीले देह कि यादबसी हुइ हौ। हमारे बीच कां सन्नाटा बहोत गाढ़ा, बिजली भरा औऱ बेहद असहज थां।
आमतौर पर्र सलोनी दिदी बाथरूम सें केवल तौलिए मे लिपटी निकलती थीं। उनके गीलेबाल कंधों पर्र लहराते हुए, औऱ वोँ बिना किसी झिझक केँ कपड़े बदलती थीं। मगर आज नहि। इस सुभह वोँ पूरीतरह कपड़े पहनकर निकलीं, जैसे अपनीदेह कों किसी भि नजर सें बचाना चाहती हों। उनका वोँ कॉलेज वाला यूनिफॉर्म भि आज गायब थां। इसके बजाय उन्होंने एक् साधारण, शालीन सलवार-कमीज़ पहनी थि। नरम कपड़ा उनकीदेह पर्र इसतरह लिपटा हुआ थां कि वोँ एक् संग मासूम भि लगरही थीं औऱ बेहद आकर्षक भि — पागलकर देने वाली।
हम् चुपचाप सजधजकर हुए औऱ कॉलेज केँ लिए निकल पड़े। पूरीराह मात्र हमारे बीच कां वोँ खामोश तनाव हि संग थां, जोँ एक् अदृश्य घूंघट कि तरह हमारे बीच लटकाहुआ थां।
हम् दोनों थर्ड सेमेस्टर मे कॉलेज मे पढ़रहे थें, हालाँकि अलग-अलग ब्रांच मे — मे EEE कररहा थां औऱ सलोनी दिदी EE मे। फिन भि कुछ कॉमन सब्जेक्ट्स कि वजह सें हमारी क्लासेस संग होतीथीं, औऱ आज भि वैसा हि दिन थां। यह इलेक्ट्रिकल मशीन्स-I कि क्लास थि, दिन कि दूसरी अंतिम क्लास।
मे लेक्चर हॉल मे बहुतदेर सें पहुंचा। जैसे हि मे अंदर घुसा, प्रोफेसर कि तीखी नजरें मुझ पर्र पड़गईं। उन्होंने पूरेहॉल मे गूँजती हुई डाँटते हुए आवाज़ मे पूछा कि मे देर सें क्यूं आया, औऱ फिन सख्ती सें बोले, “जल्दी बैठजाओ। ” क्लासरूम आज खासतौर पऱ भराहुआ थां। हमारे छोटेरूम कि वजह सें EE ब्रांच कों बड़ाहॉल दे दिया गय़ा थां, जिससे हम् सभी कॉमन क्लासेस केँ लिएइस भीड़भरे हॉल मे ठूंसदिए गए थें।
मेरे मित्र — रोहन, कबीर औऱ अंशुल — बाईंतरफ केँ कोने मे बैठे थें, मगर उनकेपास एक् भि खालीसीट नहि बची थि। बहुतदेर तक अपने ग्रुप मे स्थान ढूंढने केँ बाद आखिरकार मेरीनजर मिडिल रो मे एक् खाली कुर्सी पर्र पड़ी।
मे वहा जाकरबैठ गय़ा।
मेरेबगल मे अकांक्षा नाम कि लड़की बैठी थि।
जैसे हि मे सीट पऱ बैठा, उसके परफ्यूम कि हल्की-सि खुशबू मेरीनाक मे घुस गई — नरम, औरतों वाली औऱ थोड़ी नशाछू देने वाली। वोँ अपनी कुर्सी पऱ हिली, तोँ उसकी जांघ मेरी जांघ सें एक् लम्हा केँ लिए रगड़खा गई। उस हल्की-सि रगड़ सें मेरे जिस्म मे अचानक एक् करंट-सां दौड़ गय़ा।
सुभह सलोनी दिदी केँ संगहुए उस भारी औऱ अजीब सन्नाटे केँ बाद, किसी दूसरी लड़की केँ इतने लगभग बैठना अजीबतरह सें उत्तेजक लगरहा थां।
मे लेक्चर पर्र ध्यान लगाने कि कोशिश कररहा थां, मगर मेरामन बार-बार भटकजा रहा थां। एक् तरफकल रात सलोनी दिदी कि नंगी चिकनी पीठ औऱ उनके गोल-मटोल गांड कों मसलते हुए मेरे हाथों कि याद, दूसरी तरफ अभि बगल मे बैठी अकांक्षा कि गरमदेह औऱ उसकी जांघों कि नरमाहट। दोनों केँ बीच मेरा लन्ड आहिस्ता अंदर हि अंदर फड़कने लगा थां।
लेक्चर हॉल प्रोफेसर शर्मा कि भारी औऱ एकसुर वाली आवाज़ सें गूंजरहा थां। वोँ सिग्नल्स एंड सिस्टम्स केँ जटिल न्यूमेरिकल प्रॉब्लम्स समझारहे थें। हवा मे पुरानी किताबों, चॉक कि धूल औऱ दर्जनों स्टूडेंट्स केँ परफ्यूम-कॉलोन कि मिली-जुली गंधभरी हुई थि। ऊँची खिड़कियों सें सूरज कि किरणें अंदर आँ रहीथीं, जौ लकड़ी कि डेस्कों पर्र सुनहरी रोशनी बिखेर रहीथीं।
मुझेइन गणितों कां हमेशा सें शौक थां। समीकरण मेरे सामने प्रेमिका केँ राज़ कि तरहखुल जाते थें — तर्कपूर्ण, संतोष देने वाले औऱ मेरी उंगलियों केँ इशारे पऱ झुकने वाले। मेरापेन नोटबुक पऱ तेज़ी सें दौड़रहा थां, एक् केँ बाद एक् प्रॉब्लम हल करतेहुए। मगर मेरेबगल मे अकांक्षा परेशान थि। उसकी नाजुक उंगलियाँ डेस्क केँ किनारे पर्र बेचैनी सें थपथपा रहीथीं। उसकेभरे हुए होंठ सिकुड़े हुए थें औऱ वोँ उन नंबर्स कों देखरही थि जोँ उसकेबस मे नहि आँ रहे थें।
अकांक्षा बेहद सुंदर औऱ नशीली थि — वोँ किस्म कि लड़की जिसकी याद व्यक्ति केँ दिमाग़ मे लंबे टाइम तक बसी रहती हैं। लंबी, पतली हाइट-काठी, मगर जहाँ-जहाँ होना चाहिए वहा भरपूर मांसलता। उसके बूब्ज़ खासतौर पर्र कमाल केँ थें — भरे-भरे, भारी औऱ एकदमगोल, जौ हर साँस केँ संग उसके क्रीम कलर कि कुर्ती कों खींचरहे थें। वोँ ऊपर-नीचे होतेहुए एक् सम्मोहक लय बनाते थें। उसकी गर्दन केँ नीचे गहरीखाई बनरही थि जोँ नजर कों खींचे बिना नहि रहती। कोई भि सोच सकता थां कि वोँ कितने रसीले औऱ गरम होंगे, कितनी आसानी सें निचुड़ेंगे, औऱ उनकी चोटियाँ हल्की-सि छुअन पर्र भि सख्त होँ जाएँगी।
उसकी पतलीकमर केँ नीचे कूल्हे भारी औऱ औरताना ढंग सें फैलेहुए थें, जोँ आगे चलकर उसकी मोटी औऱ गोल-गोल गांड मे बदल जाते थें। जब वोँ सीट पऱ हिलती, तोँ वोँ जूसी चूतड़ कुर्सी पर्र दब जाते औऱ सलवार केँ पतले कपड़े केँ ऊपर सें भि उनकी मोटाई साफ झलकती। उसकी लंबी, आकर्षक टांगें लगतीथीं कि कभी समाप्त हि नहि होतीं। जब वोँ एड़ियाँ मोड़कर बैठी थि, तौ उसकी पैंट थोड़ी ऊपरचढ़ गई थि औऱ उसकी चिकनी पिंडलियाँ नजर आँ रहीथीं। उसकी गोरी-गुलाबी त्वचा पऱ हल्का सुनहरा रंग थां, मानोधूप नें चूम लिया हौ। उसकेघने, रेशमी कालेबाल पीठ पर्र लहराते हुए थें — इतने काले कि क्लासरूम कि रोशनी मे नीलेरंग केँ संग चमकते थें। उनमें जैस्मिन औऱ नारियल केँ तेल कि गंध थि, जोँ हरबार वोँ सिर हिलाती तौ मेरीतरफ आँ जाती।
उसका चेहरा बेहद नाजुक थां — ऊँचेगाल, सीधी छोटीनाक औऱ बड़े-बड़े expressive भूरे आँखें, जिन्हें मोटी पलकें घेरेहुए थीं। उन आँखों मे समझदारी केँ संगकुछ औऱ भि थां — छुपी हुइ चाहत। उसके होंठ स्वाभाविक रूप सें मोटे औऱ गुलाबी थें, नीचे वाला होंठ थोडा अधिकभरा हुआ। ऐसे मुँह जौ अंधेरे मे राज़ फुसफुसाने याँ सुख केँ पलों मे खुलने केँ लिएबने लगते थें।
पहले सेमेस्टर सें हम् क्लासमेट थें। दोनों हि पढ़ाकू औऱ नियमित। शुरुआत सें हि मुझे अफवाहें सुनाई देतीथीं — कॉरिडोर मे फुसफुसाहटें औऱ दोस्तों कि जानकार नजरें — कि अकांक्षा मुझे पसन्द करती हैं। वोँ मुझे चुपके सें देखती हैं। उसकी दिलचस्पी केवल दोस्ती सें ज़्यादा हैं। मगरउस समय मे श्रेया केँ संग गहरे रिश्ते मे थां, इसलिये उन अफवाहों कों मैंने अनसुना कर दिया थां। अकांक्षा नें स्वयं कभी एक् शब्द भि नहि कहा। वोँ हमेशा दूरी बनाए रखती थि, शालीन औऱ reserved।
जब भि मे बाईंतरफ अपने दोस्तों — रोहन, कबीर औऱ अंशुल — कि तरफ देखता, वोँ मुझे देखकर शरारती औऱ जानकार मुस्कानें बिखेरते। इन्होंने हि सबसे पहलेयह बात मेरे कानों मे डाली थि औऱ पहले दिनों मे खूब चिढ़ाया थां। अब उनकी मुस्कानें कहरही थीं — “देखो दोस्त, आखिरकार उसकेबगल मे बैठ गय़ा। ”
मे न्यूमेरिकल्स पर्र वापसलौट गय़ा। अकांक्षा नें झुककर मेरे औऱ लगभगआते हुए पूछा, उसका कंधा हल्के सें मेराछू गय़ा। उसकेबदन कि गर्मी पतले कपड़ों सें भि महसूस होँ रही थि। उसकीनरम आवाज़ फुसफुसाहट मे थि:
“तुम् यहसभी इतना आसानी सें केसेकर लेते होँ? मुझे तौ बहोत टफ लगता हैं… यह ट्रांसफॉर्म औऱ कन्वॉल्यूशन मुझे चिढ़ा रहे हें। ”
मैंने सिर घुमाकर उसकीतरफ देखा। हमारे चेहरे पहले सें ज़्यादा लगभग थें। मे उसके साँस कि मीठीगंध महसूस कररहा थां औऱ उसकी भूरी आँखों मे सुनहरे कणदेख रहा थां।
“मुझे तोँ आसान लगता हैं, ” मे आत्मविश्वास सें मुस्कुराया। “एक् बार पैटर्न समझ आँ जाए तोँ सभी अपने आप् फ्लो होने लगता हैं। ”
उसने नीचे वाला होंठ हल्के सें दाँतों तले दबाया — एक् अनजाने मे बेहद कामुक हरकत, जिससे मेरेबदन मे गर्मी दौड़ गई। “मुझे सिखा सकते हौ?” उसने शर्माते हुए उम्मीद भरी आवाज़ मे पूछा। “बस थोडा-सां… मे पीछे नहि छूटना चाहती। ”
“बिल्कुल, ” मे जल्दी बोला, “मुझे खुशी होगी। ”
उसकेबाद हमारे बीच कि दीवार टूट गई। बातें आहिस्ता बहने लगीं — दोस्ताना, गर्मजोशी भरी औऱ आरामदेह। प्रोफेसर पढ़ाते रहे औऱ हम् सिर झुकाकर शेयर्ड नोटबुक पऱ बातें करतेरहे। मे स्टेप बाय स्टेप समझाता, बीच-बीच मे मेरी उंगलियाँ उसकी उंगलियों कों छू जातीं। हर छुअन सें मेरे जिस्म मे झनझनाहट होती। जब उसेकोई पॉइंट समझआता तौ उसकी हँसीनरम औऱ मीठी होती, आँखें खुशी सें चमक उठतीं।
सलोनी दिदी केँ संग सुभह सें चले आँ रहे भारी औऱ दम घोंटने वाले सन्नाटे केँ बादयह बदलाव तरोताज़ा कररहा थां। आज पहलीबार मुझे किसी लड़की कि कंपनी मे मजा आँ रहा थां, जिसकी नज़दीकी मेरे अंदर पुरुषत्व कों जगारही थि।
छोटे ब्रेक केँ दौरान मेरे दोस्तों नें मौका नहि छोड़ा। मैंने पीछे देखा तौ वोँ झुककर शैतानी मुस्कानें बिखेर रहे थें।
“अरेवाउ! श्रेया कों finally replace कर दिया?” रोहन नें ज़ोर सें फुसफुसाते हुए चिढ़ाया। “इतनेपास बैठकर पढ़ारहा हैं… बड़ा cozy लगरहा हैं। ”
कबीर हँसा, “वक्त आँ हि गय़ा थां दोस्त। अकांक्षा बहुत दिनों सें इंतजार कररही थि। ”
मैंने उन्हें तेज़ नजरों सें घूरा औऱ धीरे-धीरे मगर सख्ती सें कहा, “मुँहबंद रखो। ” हालाँकि मेरे होंठों पर्र भि हल्की मुस्कान आँ गई थि। उनकी शरारती हँसी मेरे पीछे सुनाई देरही थि जब मे अकांक्षा कि तरफ मुड़ा। वोँ अनसुना करने कां नाटककर रही थि, मगर उसके गालों पऱ हल्की सि गुलाबी छाए जानेलगी थि।
दिनइसी मस्त माहौल मे आगे बढ़ा। जब दूसरी अंतिम क्लास — इलेक्ट्रिकल मशीन्स I — शुरुआत हुई तोँ अकांक्षा फिन सें मेरेबगल मे आकरबैठ गई। अब हमारे बीच कां माहौल औऱ हल्का औऱ गरम होँ चुका थां। हम् नोट्स शेयर करते, प्रोफेसर कि बोरिंग आवाज़ पर्र चुपके सें मजाक करते औऱ छोटे-छोटे डाउट्स संग सॉल्व करते। भीड़भरी रो मे उसकी जांघ मेरी जांघ सें लगातार सटी हुईँ थि औऱ मैंने हटाने कि कोशिश नहि कि। कभी-कभी जब वोँ पेन लेने केँ लिए झुकती, तोँ उसके भारी स्तनों कां नरम उभार मेरी बाँह कों छू जाता औऱ मेरी नसों मे वर्जित करंट दौड़ जाता।
एक् लम्हा मे अचानक मेरीनजर सलोनी दिदी सें टकरा गई। वोँ अपनी मित्र प्रिया केँ संग बैठीथीं। उनकी साधारण सलवार-कमीज़ उन्हें दूर औऱ फिन भि बेहद परिचित बनारही थि। नजरें मिलते हि मेरे अंदर भारी अजीबपन कां सैलाब आँ गय़ा। कलरात कि याद ताज़ा होँ गई — उनकी नंगीपीठ, मेरे हाथों तले उनके गोल-मटोल चूतड़, उनकीदेह कि प्रतिक्रिया। लज्जा औऱ कुछ गहरा अंधेरा मेरे सीने मे उलझ गय़ा। सलोनी दिदी नें सबसे पहलेनजर हटाली। मैंने भि। मेरादिल तेज़ धड़करहा थां।
कॉमन क्लास समाप्त होँ गई। स्टूडेंट्स सामान समेटने लगे। मे लास्ट लेक्चर मे जाने कां मूड नहि थां। दिन कां बोझ औऱ कलरात कां तनाव मुझे भागने कों मजबूर कररहा थां।
जैसे हि मे उठा, अकांक्षा भि मेरेसंग उठ गई। उसनेबैग कंधे पऱ डाला, उसकेभरे हुए मम्मों हिलकर एक् आकर्षक नज़ारा पेशकर गए।
“चूंकि हम् दोनों लास्ट क्लास बंककर रहे हें, ” उसने हल्की उम्मीद भरी आवाज़ मे कहा, उसकी भूरी आँखें मेरी आँखों मे डूबकर, “तोँ मेरेरूम चलकर सिग्नल्स एंड सिस्टम्स अच्छे सें पढ़ादो नाँ… बिना जल्दबाजी केँ। ”
मुझेमना करने कां कोई कारण नहि सूझा। ऑफर हवा मे लटक गय़ा — संभावनाओं सें भराहुआ।
“ठीक हैं, ” मे बोला, आवाज़ स्थिर रखतेहुए हालाँकि दिल तेज़ धड़करहा थां। “चलो। ”
मे उसकेसंग कॉलेज बिल्डिंग सें बाहर् निकला। दोपहर कि ढलतीधूप मे हम् साइड-बाय-साइड चलरहे थें। थोडा आगे बढ़ने सें पहले मैंने मोबाइल निकाला औऱ सलोनी दिदी कों जल्द सें मैसेज टाइपकर दिया:
“मे एक् यार केँ संग हूं। साम तक रूम पऱ आँ जाऊँगा। ”
मैसेज सेंड करके मोबाइल जेब मे रखा औऱ अकांक्षा केँ संग चलतारहा। उसकी लहराती हुईँ गांड औऱ बालों कि गंध मुझेबता रही थि कि यह दोपहर किसी लेक्चर सें कहीं अधिक दिलचस्प होने वाली हैं।
दोपहर कि धूपअब नरम होकर सुनहरे एम्बर रंग कि होँ चुकी थि जब हम् अकांक्षा केँ निजी कमरे मे दाखिल हुए। यह एक् छोटामगर बेहद साफ-सुथरा 1BHK अपार्टमेंट थां, जिसमें औरत-सुलभ नाजुकता कां माहौल थां। फर्श इतना चमकदार थां कि छत कि रोशनी उसमें परछाईं बनारही थि। खिड़की पर्र हल्के लैवेंडर रंग केँ पर्दे हवा मे लहरारहे थें। दीवारों पर्र कुछ आर्टिस्टिक पोस्टर्स लगे थें — एक् मे साम कां पहाड़ी नज़ारा, दूसरे मे फूलों केँ डिज़ाइन जोँ किसी स्त्री कि देह कि वक्र रेखाओं कि याद दिलाते थें। हवा मे लैवेंडर औऱ हल्की जैस्मिन अगरबत्ती कि गंध थि, जौ कमरे कों बेहद निजी औऱ खतरनाक रूप सें seductive बनारही थि।
अकांक्षा नें दरवाजा बंद करतेहुए हल्की-सि “क्लिक” कि। वोँ मेरीतरफ मुड़ी, उसकी गहरी भूरी आँखों मे घबराहट औऱ छुपी हुई उत्तेजना झलकरही थि।
“आहिस्ता बैठो नां, ” उसने अपनी मीठी आवाज़ मे कहा औऱ छोटे सें प्लश सोफे कि तरफ इशारा किया। “मे कुछ आरामदेह पहनकर आती हूं। बसदो मिनट। ”
मे सोफे पर्र बैठ गय़ा। मेरादिल अब तेज़ औऱ भारी धड़कने लगा थां। बाथरूम सें पानी कि आवाज़ औऱ कपड़े उतरने कि सरसराहट आनेलगी। अचानक उसकी मुंह सें एक् छोटी-सि “अहह” निकली औऱ कुछ कपड़ा फर्श पर्र गिरने कि आवाज़ आई।
थोड़े खुले बाथरूम केँ दरवाजे केँ पास उसका पिंक ब्रा पड़ा थां — नाजुक, लेस वाला औऱ अभि भि उसके भारी स्तनों कि गर्मी सें तपरहा थां। उस पारदर्शी कपड़े पर्र उसके गोल-गोल मांसल चूचियों केँ निशान साफ थें। मेरी रगों मे गर्मी दौड़ गई। मेरेमन मे जल्दी उसके ब्रा-मुक्त झूलते हुए भारी स्तनों कि तस्वीर घूम गई। कमरे मे अजीब-सां भारी सन्नाटा छा गय़ा। हम् दोनों मे सें किसी नें उस बारे मे कुछ नहि कहा। मैंने खिड़की कि तरफनजर घुमाली, जबकि अकांक्षा नें शर्माते हुए जल्द सें ब्राउठा लिया। वोँ समय बेहद तनावभरा थां, मगर हमारे बीच कि चाहत कों औऱ बढ़ारहा थां।
कुछ मिनटबाद अकांक्षा बाहर् निकली।
उसकारूप देखकर मेरी साँसरुक गई। वोँ दरवाजे मे खड़ी एक् जीवंत कामुकता कि मूर्ति लगरही थि। कॉलेज कि शालीन लड़कीअब पूरीतरह बदल चुकी थि। उसने एक् ओवरसाइज़्ड सफेद टी-शर्ट पहनी थि जोँ उसके जिस्म पर्र ढीली-ढाली थि, मगरसही जगहों पर्र चिपक भि रही थि। उसकीहेम उसके चिकने, दूधिया जांघों केँ बीच तक हि पहुँच रही थि। बिना ब्रा केँ उसके भारी, एकदमगोल चूचे टी-शर्ट केँ नीचे आज़ाद झूलरहे थें। हर हल्की हरकत पर्र वोँ हिलते-डुलते, उनकी पूरी मोटाई औऱ नरमाहट साफदिख रही थि। उसके सख्त, काले निप्पल कपड़े कों अंदर सें खींचरहे थें, जैसेदो मुलायम चेरी। गले कि ढीली लाइन सें उसकी गहरीचोच दिखरही थि।
नीचे उसने बहोत छोटी ब्लैक कॉटन शॉर्ट्स पहनीथीं जौ उसके चौड़े, औरताना कूल्हों पऱ कसकर चिपकी हुई थीं। इतनी छोटी कि उसके मोटे, गोल चूतड़ शॉर्ट्स केँ नीचे सें झाँकरहे थें — रसीले, चिकने औऱ हाथों मे भर लेने कों ललचारहे थें। सबसे खतरनाक बातयह थि कि उसने अंदर पैंटी नहि पहनी थि। पतला कपड़ा उसकी चूत कि पफी हुइ लिप्स पऱ इतना चिपका हुआ थां कि हल्का camel-toe साफदिख रहा थां। उसकी लंबी, टोन वाली टांगें अनंतलग रहीथीं, अभि-अभि नहाने कि वजह सें चमकरही थीं।
उसके लंबे कालेबाल गीले लहरों मे एक् कंधे पऱ पड़े थें। कुछ लटेंगले औऱ कॉलरबोन पऱ चिपकी हुइ थीं। उसके गालों पऱ हल्की लाली थि औऱ वोँ बड़ी-बड़ी भूरी आँखें लज्जा व उत्सुकता केँ संग मुझेदेख रहीथीं। वोँ बेहद सेक्सी लगरही थि — लंबी, पतलीमगर भरपूर मांसल, हर मोड़ जवानी औऱ छुपी हुईँ हवस सें भराहुआ।
“बहोत बेहतर लगरहा हैं, ” उसने थोड़ी भारी आवाज़ मे कहा। “अब बताओ… क्याँ खाओगे?”
मैंने कठिनाई सें थूक निगला। “अरे, मुझेभूख नहि हैं। परेशान मत होँ। ”
मगर अकांक्षा नें सिर हिलाया औऱ लगभगआई। उसकी हरकत सें उसके भारी चूचे सम्मोहक ढंग सें हिले। “नहि, मे ज़िद करती हूं, ” उसने मुस्कुराते हुएकहा। “तुम् मुझे पढ़ाने आए होँ, तौ मे तुम्हें खानां तोँ बना हि सकती हूं। कहो, क्याँ बनाऊँ?”
“जौ आसानी सें बनजाए, ” मैंने भारी आवाज़ मे कहा।
उसकेभरे होंठों पऱ मीठी मुस्कान आई। “तौ मे टेहरी बना देती हूं — सब्ज़ी वाली चावल। आसान, मज़ेदार औऱ आरामदेह। ”
वोँ किचनेट कि तरफ गई औऱ मे भि सहायता करनेलगा। हम् दोनों साइड-बाय-साइड खड़े होकर सब्ज़ी काटने लगे। स्टोव कि गर्मी औऱ हमारी नज़दीकी सें माहौल औऱ गरम हौ रहा थां।
खानां बनाते हुए अकांक्षा बेहद कामुक लगरही थि। उसकी टी-शर्ट बार-बार एक् कंधे सें सरक जाती, जिससे उसकी कॉलरबोन औऱ एक् चूचे कां ऊपरी उभारदिख जाता। पसीने कि छोटी-छोटी बूँदें उसके माथे औऱ गर्दन पऱ बनरही थीं, जौ आरामसे उसकेगरम त्वचा पऱ बहरही थीं। एक् बूँद उसकी गर्दन सें नीचे उतरी, कॉलरबोन पार कि औऱ उसके भारी स्तनों केँ बीच गहरे मे गायब हौ गई। इससे कपड़ा गीला होकर उसकी त्वचा सें चिपक गय़ा औऱ निप्पल औऱ भि साफउभर आए।
हरबार जब वोँ मसाला लेने केँ लिएऊपर हाथ उठाती याँ झुककर चावल हिलाती, तौ टी-शर्ट ऊपरचढ़ जाती औऱ उसके नंगे, मोटे चूतड़ नीचे सें पूरीतरह दिख जाते। वोँ गोल-मटोल गांड हिलती-डुलती, जिगल करती। शॉर्ट्स कां हेम बार-बार ऊपरचढ़ जाता, उसकी जांघों औऱ गांड केँ निचले हिस्से कों उजागर करता। चावल हिलाते टाइम उसके कूल्हे स्वाभाविक रूप सें झूलते, जिससे उसके मुलायम चूतड़ सिकुड़ते-फैलते।
गलती सें होने वाले स्पर्श अब लगातार औऱ बेहद उत्तेजक हौ गए थें। सब्ज़ी पास करते वक़्त उसकीगरम जांघ मेरी जांघ सें रगड़ खाती। जब वोँ चम्मच लेने केँ लिए मेरेऊपर झुकी तौ उसका एक् पूरा भारी बूब्ज़ मेरी बाँह पऱ दब गय़ा — नरममगर भारी, गरम औऱ लचीला। एक् बारनमक लेते वक़्त मेरीहाथ कि पीठ उसकी जांघ कि चिकनी त्वचा पऱ रगड़खा गई। वोँ नहि हटी, बल्कि उसकी साँसरुक गई औऱ गाल औऱ लाल हौ गए। दूसरे मौके पर्र वोँ मेरीपीठ सें सट गई, उसके सख्त निप्पल मेरीपीठ कों छूगए।
मसालों कि गंध केँ संग उसकी पसीने वालीदेह कि मीठी, मुस्की खुशबू हवा मे घुलरही थि।
बातें भि जारी रहीं।
“बताओ नाँ, वोँ नई लड़की… सलोनी?” अकांक्षा नें धीरे-धीरे सें पूछा, चावल हिलाते हुए। उसके मम्मों हिलरहे थें।
मैंने सहज रहने कि कोशिश कि। “वोँ मेरे पिताजी केँ यार कि बेटी हैं। कॉलेज मे आने पऱ पिताजी नें कहा थां कि उसकी सहायता करना, उसे सेटल होने मे मदद करना। बस इतना हि हैं। ”
मैंने आगे भि समझाया, परिवार कि बात प्राइवेट रखने वाली झूठीकथा बुनते हुए, बिना सीधे cousin कहे।
अकांक्षा नें गर्दन सें पसीना पोंछा। उस हरकत सें उसकी टी-शर्ट औऱ भि चिपक गई। “समझ गई। श्रेया नें कलकुछ कहा थां… कि तुम् हाल मे किसीनई लड़की केँ बहोत लगभग देखेजा रहे होँ। ”
मे मुस्कुराया। “श्रेया औऱ मेरेबीच कभी इतना सीरियस कुछ नहि थां। लोग ज्यादा समझरहे थें। ”
बातें हल्की होतीगईं, हँसी-मज़ाक बढ़ता गय़ा। हम् कॉलेज कि घटनाएँ शेयर करतेरहे। अकांक्षा नें बताया कि एक् दिनजब मैंने क्लास मे सलोनी कां संग दिया थां तौ श्रेया नें मेरे पीछेकुछ बुरी बातें कहींथीं।
“वोँ बिल्कुल खुश नहि हुइ थि, ” अकांक्षा नें शरारत भरी आँखों सें कहा, हँसते हुए उसके चूचे ऊपर-नीचे होँ रहे थें।
मे हँसा, “तोँ सावधान रहना। अगर वोँ हमेंइस तरहसंग देख लेगी तौ तुम् अगला टारगेट बन सकती होँ। ”
अकांक्षा ज़ोर सें हँसी, उसका पूरा मांसल जिस्म हिलउठा। “आनेदो उसे, ” उसने आत्मविश्वास सें कहा। “मे संभाल लूंगी। ”
इसी मस्ती औऱ बढ़ती हुइ कामुक तनाव केँ संग टेहरी बनकर रेडी होँ गई।
हमने प्लेटें भरकर सोफे पऱ रखीं। अकांक्षा नें टेलीविज़न ऑन किया औऱ तारक मेहता कां ओल्टा चश्मा शुरुआत होँ गय़ा। वोँ शो कि बहोत शौकीन थि, किरदारों पर्र खिलखिलाकर हँसरही थि।
मैंने मुस्कुराते हुएकहा, “सच कहूँ तौ मैंने यहशो पहलेकभी नहि देखा। ”
उसकी आँखें हैरानी सें फैलगईं। “क्याँ? तुमने इतना मज़ेदार शोमिस कर दिया?”
मैंने कंधे उचकाए। “डेली सिटकॉम मे उतना इंटरेस्ट नहि थां। मगर तुम्हारे संग बैठकर… बुरा नहि लगरहा। ”
पूरी एपिसोड उसने मुझे चिढ़ाया, किरदार समझाती रही, औऱ सोफे पर्र इतनाझुक आई कि उसकी नंगी जांघ मेरी जांघ सें सट गई। उसकी पसीने वालीदेह कि गंध, उसके हिलते चूचे औऱ लगातार छुअन…सभी कुछसाम कों बेहद नशीला बनारहा थां। सलोनी दिदी केँ संग सुभह वाला अजीबपन अब आहिस्ता पीछे छूटता जारहा थां।
साम ढलते-ढलते सूरज कि सुनहरी रोशनी अबनरम होकरसाम कि ठंडक मे बदल चुकी थि। अकांक्षा औऱ मे अब असली मकसद पर्र आँ गए थें। टेहरी कि गंध अभि भि कमरे मे मीठी-मीठी फैली हुई थि। हम् उसके कमरे केँ कोने मे बने छोटे स्टडी टेबल पर्र बैठगए। किताबें औऱ नोटबुक फैली हुइ थीं। मैंने सिग्नल्स एंड सिस्टम्स केँ मुश्किल कॉन्सेप्ट्स उसे धैर्य सें समझाने शुरुआत करदिए।
अकांक्षा मेरे बिल्कुल पास बैठी थि। उसकी कुर्सी इतनी लगभग खींची हुई थि कि उसकीदेह कि गर्मी लगातार मुझेछू रही थि। वोँ अभि भि वही ओवरसाइज़्ड सफेद टी-शर्ट औऱ छोटी-सि ब्लैक शॉर्ट्स पहनेहुए थि, जोँ उसकी मोटी गांड औऱ जांघों पऱ बेशर्मी सें चिपकी हुइ थीं।
जैसे-जैसे मे फूरियर ट्रांसफॉर्म औऱ कन्वॉल्यूशन समझाता, मेरीनजर बार-बार पुस्तक सें हटकर उसके शरीर पर्र चली जाती।
वोँ सच मे लाजवाब लगरही थि। उसके लंबे कालेबाल कंधों पर्र लहरारहे थें औऱ कभी-कभी उसके भारी चूचियों कों छू जाते। रसोई कि गर्मी केँ बाद टी-शर्ट औऱ भि पतली औऱ चिपकी हुई लगरही थि। हरबार जब वोँ नोटबुक मे लिखने केँ लिएआगे झुकती, तोँ गला ढीला होकर उसके मस्त चूचियों कां गहराचोच दिखा देता। भरे-भरे, गोल-मटोल चूचे हल्के-हल्के हिलते। एक् बार तौ जब वोँ न्यूमेरिकल सॉल्व करने केँ लिए बहोत झुकी, तोँ टी-शर्ट कां कॉलर औऱ नीचेसरक गय़ा औऱ उसका एक् गुलाबी निप्पल कां किनारा साफदिख गय़ा। वोँ नजारा बेहद नशीला थां — दूधिया मांसल चूचे साँस केँ संगहिल रहे थें, इतने लगभग कि लगता थां गर्माहट महसूस हौ रही होँ।
मे पढ़ाता रहा, आवाज़ स्थिर रखतेहुए, हालाँकि मेरेखून मे आगलगरही थि। अकांक्षा ध्यान सें सुनरही थि, प्रश्न पूछरही थि, मगर मुझे पूरा यकीन थां कि वोँ मेरी घूरती नजरों सें वाकिफ थि। उसके गालों पऱ हल्की लाली थि, मगर उसने टी-शर्ट ठीक करने याँ स्वयं कों ढकने कि कोई कोशिश नहि कि। उल्टा वोँ औऱ ज़्यादा झुकरही थि, जैसे जानबूझकर मुझे अपने शरीर कां आनंद लेनेदे रही हौ। हमारे बीच कां यह चुप्पा समझौता पढ़ाई मे एक् रोमांचक तनावभर रहा थां।
वक्तइसी मस्ती मे बीतता गय़ा। करीबदो घंटे तक हम् पढ़ते रहे — मेरी उंगलियाँ कभी-कभी उसकी उंगलियों कों छू जातीं, उसकी जांघ टेबल केँ नीचे मेरी जांघ सें सटी रहती। बाहर् साम गहरी होतीजा रही थि। उसकेभरे चूचेहर साँस केँ संग ऊपर-नीचे होँ रहे थें, निप्पल अभि भि कपड़े सें उभरेहुए थें। उसकी लंबी चिकनी टांगें बेचैनी सें हिलरही थीं, जिससे मेरीनजर बार-बार उसकी शॉर्ट्स केँ किनारे पऱ चली जाती।
आखिरकार सात बजने पऱ मैंने नोटबुक बंदकर दि। “आज केँ लिए बहुत हैं। तुमने अच्छे सें समझ लिया हैं। ”
अकांक्षा नें आलसभरी अंगड़ाई ली, कमर पीछे कि तरफ झुकाकर अपने भारी चूचे औऱ भि आगे निकाल दिए। उसने मुस्कुराते हुएकहा, “थैंकयू सोमच। अब मुझे बहोत कॉन्फिडेंस आँ गय़ा हैं। ” फिन थोडा रुककर उम्मीद भरी आवाज़ मे बोलीं, “चलो मार्केट घूमआएँ? पास मे अच्छा मॉल हैं। थोडा वॉककर लें, फिन तुम् वापसचले जानां। ”
मैंने एक् लम्हा सोचा — कमरे कां यहगरम माहौल औऱ सलोनी दिदी कां इंतजार। मगर अकांक्षा कां संग छोड़ना मुश्किल थां। “ठीक हैं, ” मे बोला, “चलो। ”
उसके चेहरे पऱ चमक आँ गई। “ग्रेट! बसदो मिनट, कपड़े बदललूँ। ”
वोँ फिन बाथरूम मे चली गई। जब बाहर् निकली तौ मेरादम रुक गय़ा। अकांक्षा नें टाइट ब्लू डेनिम जींस पहनी थि जोँ उसकी लंबी टांगों औऱ मोटे कूल्हों पऱ दूसरी चमड़ी कि तरह चिपकी हुईँ थि। उसकी गांड पऱ कपड़ा इतनातना हुआ थां कि उसकी भरी-भरी, गोल-गोल चूतड़ें बिल्कुल साफउभर रहीथीं — मेरी जीवन मे देखी सबसे सुंदर गांड। मोटी, रसीले औऱ हाथ भरने लायक। जींसहर कदम पर्र उसे औऱ भि उभाररही थि, उसके चूतड़ हिलते-डुलते, जिगल करते। ऊपर उसने सफेद टी-शर्ट औऱ खुला ग्रे ओवरशर्ट पहना थां। बालों कों ढीला पोनीटेल बना लिया थां।
“कैसीलग रही हूं?” उसने शर्माते हुए मुस्कुराकर पूछा औऱ धीरे-धीरे सें घूमकर दिखाया।
“परफेक्ट लगरही हौ, ” मैंने सच्चाई सें कहा, मेरी नजरें उसकीजीन वाली मोटी गांड पऱ अटकी हुईँ थीं। “यह साम केँ लिए बेस्ट हैं। ”
उसकी तारीफ पाकर हम् साम कि ठंडीहवा मे निकल पड़े। चलतेसमय अकांक्षा केँ कूल्हे स्वाभाविक रूप सें लहरारहे थें, जिससे उसकी भारी गांडहर कदम पर्र हिलती-कूदती। टाइट जींस मे उसकी गांड कां गहराचीर साफदिख रहा थां। बिनाशक, वोँ परफेक्ट गांड थि — भरी हुई, आकर्षक औऱ पूरीतरह महिला वाली।
मॉल साम कि चहल-पहल सें भरा थां। हम् दुकानों मे घूमते रहे। अकांक्षा छोटी-छोटी चीजों पऱ मेरीराय पूछती रही — परफ्यूम, रूम कां सामान। आखिरकार हम् गेमिंग ज़ोन मे पहुँच गए।
“खेलें कुछ?” उसने उत्साह सें पूछा।
हम् बहुतदेर खेलते रहे — पहले रेसिंग गेम, फिन शूटिंग गेम। कंधे टकराते, हँसी होती। हर अच्छे स्कोर पर्र उसके चूचे टी-शर्ट केँ अंदरजोर सें हिलते। लगातार छुअन, हँसी औऱ उसकीदेह कि गर्मी। सभीकुछ बेहद मस्त थां।
गेम केँ बाद हम् मॉल केँ अंदर वाले पैस्ट्री कैफे मे गए। हमने एक् प्लेट मे चॉकलेट पैस्ट्री औऱ स्ट्रॉबेरी टार्ट शेयरकिए। खेल-खेल मे एक्-दूसरे कों बाइट्स खिलाए। कभी उसके होंठों पऱ क्रीम लग जाती, तौ वोँ आहिस्ता चाटती, आँखों मे शरारत लिए मुझे देखती। बातें अब औऱ गहरी औऱ फ्लर्टी होतीजा रहीथीं।
साम गहराते हि मे उसे उसकेरूम तक छोड़ने गय़ा। दरवाजे पर्र पहुँचकर अकांक्षा नें मुस्कुराते हुए मुझेजोर कां हग किया। उसके भारी चूचे मेरी छाती सें पूरीतरह दबगए। उसकीदेह कि गंध — परफ्यूम, पैस्ट्री औऱ स्त्री वाली गर्माहट — मुझेघेर लें गई।
“आज केँ लिए थैंकयू, ” उसने मेरेकान केँ पास फुसफुसाया। “बाय। ”
“बाय, ” मैंने उसे एक् समय extra देर तक अपने सें चिपकाए रखा, फिन अनमने मन सें अलगहुआ।
वापस अपनेरूम कि तरफ चलतेहुए मेरा दिमाग़ अकांक्षा कि हिलती गांड, उसके चूचियों केँ झलकते नज़ारों औऱ पूरेदिन बनी कामुक तनाव सें भराहुआ थां। सलोनी दिदी केँ संग वाला अजीबपन अब पीछे कहीं धुँधला पड़ गय़ा थां।
बहोत हि बेहतरीनऔर जबरदस्त एपसोड हैं ! स्टोरी कि शुरुआत बहोत अच्छी हैं ! औऱ आपकी शुद्ध हिंदी लेखन शैली ग़ज़ब हैं !
हम् जौ धीरे-धीरे धीरे-धीरे खोगए। – New Episode
अध्याय ६:पाप कि हद
साम गहरी होती हुइ मखमली अंधेरे मे बदल चुकी थि, जब मे अपने कमरे कि तरफलौट रहा थां। कैंपस रोड केँ किनारे लगे पेड़ों सें हल्की हवा फुसफुसा रही थि, जिसमें रात कों खिलने वाले फूलों कि हल्की गंध घुली हुईँ थि। मगर मेरामन आसपास कि दुनिया सें कहींदूर थां। वो अभि भि अकांक्षा केँ कमरे मे अटकाहुआ थां — उसके हंसी कि गर्माहट मे, उसके कूल्हों केँ नशीले हिलने-डुलने मे, औऱ उसकी हसीन, स्त्रीत्व भरीदेह केँ चुराए हुए नजरों मे।
जब मे चलरहा थां, मेरे होंठों पऱ एक् नरम, सोच भरी मुस्कान खेलरही थि। क्याँ दिन गुजरा हैं आज, मैंने स्वयं सें कहा। आज अनजाने सुख कां एक् गुप्त अध्याय खुल गय़ा थां। अकांक्षा कि मौजूदगी एक् खुलासा थि — उसकी नाजुक पऱ छरहरी देह, उसके मोटे औऱ भरेहुए चुच्चों कां पतले टी-शर्ट केँ अंदर हिलना, औऱ उसके टाइट जींस मे उसकी गोल-गोल, मोटी गांड कां सम्मोहक लहराना। मैंने उसकेसंग हर लम्हा कां आनंद लिया थां — सहज बातें, साझी हंसी, औऱ हमारे बीच बहती वोँ छिपी हुइ तनावभरी लहर। उसमें कुछ ताजगी भरी हल्कापन थां, जोँ मेरेमन औऱ मेरी कामवासना दोनों कों बराबर उत्तेजित कररहा थां।
मेरे विचार पीछे कि तरफबह गए, जैसा कि शांत पलों मे अक्सर होता हैं — उन शुरुआती दिनों कि तरफ, जब श्रेया औऱ मे एक्-दूसरे कि तरफ खिंचे चलेआए थें। उससमय हमारा नाता सबसे मीठीखोज जैसालगा थां। हम् घंटों बातें करते, क्लास मे एक्-दूसरे कों चुपके सें देखते, हमारे युवादिल मासूम उत्तेजना औऱ नई इश्क केँ रोमांच सें धड़कते थें। मैंने अपने युवा यकीन केँ संग सोचा थां कि वही लड़की हैं जोँ मेरे दिनों कों खुशियों सें भर देगी।
मगर अब, जब मे उन यादों कों आज केँ ताजे अनुभव केँ संग जोड़कर देखरहा थां, तौ मेरे सीने मे एक् नरम, जिज्ञासा भरा दर्द उठनेलगा।
क्याँ सभीकुछ अलग होता, मैंने अपनेदिल केँ अंदरूनी कोनों मे स्वयं सें पूछा, अगर मे अकांक्षा कि तरफ मुड़ गय़ा होता? वो पहले सेमेस्टर सें हि वहां थि — हसीन, समझदार, औऱ चुपचाप ध्यान देने वाली। उसके मुझे मनपसंद करने कि अफवाहें तब भि मेरे कानों तक पहुंच चुकीथीं, फिन भि मे श्रेया केँ पीछे जुटारहा। क्याँ होताअगर मे उन फुसफुसाहटों कों सुन लेता? क्याँ अकांक्षा मे मुझे एक् गहरा औऱ ज़्यादा सामंजस्य भरा नाता मिलता? उसकी मुस्कान मे कोईतेज धार नहि थि, उसका स्पर्श गरम औऱ बुलावा देने वाला थां, न् कि क्षणिक। शायद हमारी किस्सा कुछ अधिक समृद्ध औऱ संतोषजनक बन जाती — श्रेया केँ संग वाले जटिलताओं औऱ कड़वाहट सें मुक्त।
ये विचार शुद्ध थां, न् अफसोस सें भरा, न् गिल्ट सें। बसदिल कि नरम जिज्ञासा। वो मुझे देखाहुआ महसूस कराती हैं, मैंने सोचा, ऐसे तरीके सें जौ बिल्कुल स्वाभाविक औऱ सहज हैं। उसकी हंसी अभि भि मेरे कानों मे गूंजरही हैं। उसकीदेह… ईश्वर, वो केसे चलती हैं। मेरे अंदर एक् शांत गर्माहट फैल गई जब मैंने उसके बूब्ज़ कां अपनी बांह पर्र लगने वालानरम दबावयाद किया, औऱ उसके आकर्षक कर्व्स कि लुभावनी रेखाएं। मगर शारीरिक खिंचाव केँ अलावा, कुछ अधिक मीठा थां — साथीपन कां एहसास, जौ कलरात सें चली आँ रही मेरी अजीब सि खामोशी कों शांतकर रहा थां।
मे सोचरहा थां कि क्याँ जीवनऐसे मामलों मे दूसरा मौका देती हैं। क्याँ ब्रह्मांड नें आज अकांक्षा कों मेरेपास एक् संकेत केँ रूप मे भेजा हैं। मेरादिल, उस लम्हा मे शुद्ध औऱ खुला, स्पष्टता कि उतावलापन रहा थां। शायदये किसीनई शुरुआत कि शुरुआत हैं, मैंने सोचा, जौ श्रेया द्वारा छोड़ी गई अजीब खालीपन कों भरसके औऱ अब सलोनी दिदी केँ संगबनी भारी तनाव कों हल्का करसके।
इन गहरी, दिल सें जुड़ी सोचों मे खोयाहुआ मे आखिरकार अपने कमरे केँ दरवाजे तक पहुंच गय़ा। अंदर कि लाइटें पर्दों सें होकर हल्की चमक बिखेर रहीथीं। मे एक् लम्हा रुका, स्वयं कों संभाला, फिनहाथ उठाकर धीरे-धीरे सें दरवाजा खटखटाया।
अंदर सें नरम कदमों कि आवाज़ आई — संयमित, करीब-करीब हिचकिचाती हुइ। दरवाजा धीरे-धीरे सें खुला, औऱ वहां सलोनी दिदी खड़ीथीं।
हमारी नजरें मिलीं।
एक् छोटे सें, बिजली जैसे लम्हा केँ लिए, कल रात जौ कुछहुआ थां, वो चुपचाप हमारे बीचलटक गय़ा — उनकी नंगीदेह मेरे हाथों केँ नीचे, उनकी त्वचा कि गर्माहट, वोँ निषिद्ध अंतरंगता जौ हमने साझा कि थि। हम् दोनों मे सें कोईकुछ बोला नहि। उनकीनजर मे हैरानी औऱ वही भारी अजीबपन थां जौ सुभह सें छायाहुआ थां। मैंने पहलेनजर हटाई औऱ चुपचाप अंदर आँ गय़ा, हल्के सें अभिवादन करतेहुए।
रूमआज सें अधिक छोटालग रहा थां, हवा अनकही बातों सें भारी थि। एक् धीमी, दबाव वाली खामोशी हम् दोनों पऱ भारी पर्दे कि तरहछा गई। मे हॉल सें टेबल कि तरफचला, हरकदम सोच-समझकर, मेरीबैग अचानक भारी लगनेलगी। मैंने उसे सावधानी सें रखा, उसकी हल्की आवाज़ शांत स्थान मे अनायास तेजलगी। मेरादिल स्थिर लय सें धड़करहा थां, जोँ मेरे कानों मे गूंजरहा थां।
उनकीतरफ देखे बिना मैंने अपने कपड़े बदलने शुरुआत किए। मैंने अपनी शर्ट केँ बटन धीरे धीरे खोले, उनके पीछे मौजूद होने कां भार महसूस करतेहुए। कपड़ा सरसराता हुआ मेरे कंधों सें उतरा। मुझेलगा उनकी नजरें मुझ पर्र टिकी हुई हें — याँ शायदये केवल मेरी कल्पना थि, जोँ इस असहनीय तनाव सें औऱ बढ़ गई थि। हर छोटी हरकत बढ़-चढ़कर महसूस हौ रही थि: कपड़े कि सरसराहट, मेरे पैरों तले फर्श कि चरमराहट, हमारी सांसों कि उथलीलय। अजीबपन इतनासाफ महसूस होँ रहा थां, जैसेकोई जीवित चीज हम् दोनों कों लपेटे हुए होँ, जिससे सबसे साधारण काम भि असहज औऱ छिपी यादों सें भरालग रहा थां।
मैंने एक् आरामदायक टी-शर्ट पहनली, मेरापीठ अभि भि उनकीतरफ थां, उससमय कों टालते हुएजब मुझे सीधे उनका सामना करना पड़ेगा। खामोशी लंबी खिंचती गई, भारी औऱ अंतरंग, उनसभी अनकही बातों सें भरी हुइ जौ हम् बोलने कि हिम्मत नहि करपारहे थें।
भारी खामोशी कुछदेर औऱ रही, फिन सलोनी दिदी बोलीं, उनकी आवाज़ धीमी थि, मगर उसमें साफ़तौर पर्र जिज्ञासा थि।
“तोँ… क्याँ तुम् पूरे वक्त अपने दोस्तों केँ संगथीं?”
मैंने जवाब देने सें पहले उन्हें थोड़ी देर देखा, “हाँ, मे थि। ”
उन्होंने धीरे-धीरे सें सिर हिलाया, मगर उनकी आँखों सें उनके बेचैन विचार पताचल रहे थें। थोड़ी देर रुकने केँ बाद, उन्होंने औऱ ज़ोर दिया, उनकी आवाज़ बहोत सोच-समझकर बनाई गई थि। “किसके संग, ठीक सें?”
इससे पहले कि मे जवाबदे पाता, उन्होंने जल्द सें कहा, जैसे स्वयं कों ठीककर रहीहों, “असल मे… नहि, रुको। मैंने अंतिम क्लास केँ बाद तुम्हारे दोस्तों कों देखा थां। वे कैंटीन कि तरफजा रहे थें। तुम् उनकेसंग नहि थीं। तोँ मे बससोच रही थि… क्याँ कोई औऱ हैं जिसके बारे मे मे नहि जानती?”
उसके शब्दहवा मे लटकेहुए थें, शक औऱ ज़बरदस्ती कि लापरवाही केँ हल्के सें परदे मे लिपटे हुए। हमारे बीच अजीब सां माहौल औऱ बढ़ गय़ा, जिससे आसान प्रश्न कहीं ज्यादा असरदार होँ गय़ा।
मैंने धीरे-धीरे सें सांसली, उसके प्रश्न केँ पीछे छिपी भावनाओं कों महसूस किया। "उस मतलब मे तौ मे यार नहि हूं, " मैंने शांति सें, फिन भि थोड़ी हिचकिचाहट केँ संग जवाब दिया। "उसकानाम आकांक्षा हैं। वो मेरी क्लासमेट हैं — उसी सेमेस्टर मे, अलग ब्रांच मे। वो सिग्नल्स औऱ सिस्टम्स मे कुछ मुश्किल न्यूमेरिकल्स मे स्ट्रगल कररही थि, इसलिये मे उसके डाउट्स दूर करने मे सहायता करने केँ लिए उसके कमरे मे गय़ा। "
सलोनी दिदी कि भौंहें थोड़ी ऊपर उठीं। उसने अपनी बाहें छाती पऱ क्रॉस करलीं, औऱ उसकी मामूली सलवार कमीज़ भि हिलने लगी। "आकांक्षा." उसने धीरे-धीरे सें नाम दोहराया, जैसेउसे चखरही होँ। "औऱ तुमने पूरीसाम उसे। उसके कमरे मे पढ़ाया?"
अब उसकी आवाज़ मे एक् हल्की सि तल्खी थि — जलन नहि, बल्कि कुछऐसा हि, कुछ बेचैनी भरा।
"हाँ, " मैंने धीरे-धीरे सें जवाब दिया। “उसने क्लास केँ बाद मुझसे पूछा। मुझे क्लासमेट कि सहायता करने मे कोई बुराई नहि लगी। ”
सलोनी दिदी नें अपनासिर झुकाया, उनकी गहरी आँखें मेरे चेहरे कों शांत औऱ गहराई सें देखरही थीं। “ये बहुत लंबा डाउट-क्लियरिंग सेशनरहा होगा, ” उन्होंने कहा, उनके होंठों पर्र एक् हल्की, करीब-करीब चिढ़ाने वाली मुस्कान थि जोँ उनकी आँखों तक ठीक सें नहि पहुँची। “तुम् घंटों तक गायब थें। ”
मैंने हल्के सें कंधे उचकाए, अपनीटोन कों कैज़ुअल रखने कि कोशिश कररहा थां। “कुछ कॉन्सेप्ट कों ठीक सें समझाने मे वक्त लगता हैं। तुम् जानते हौ कि इन सब्जेक्ट्स केँ संग कैसा होता हैं। ”
वो कुछ सेकंड केँ लिएचुप रहीं, हमारे बीच कां टेंशन ऐसे बढ़ता गय़ा जैसेकोई नं दिखे धुआँ हौ। फिन वो फिन बोलीं, इसबार उनकी आवाज़ धीमी थि, फिन भि वो जांचकर रहीथीं। “औऱ वो सिर्फ़ एक् क्लासमेट हैं? औऱ कुछ नहि?”
प्रश्न जितना होना चाहिए थां, उससे ज्यादा भारीलगा। कमरे मे आने केँ बाद पहलीबार मैंने सीधे उनकी नज़रों सें नज़रें मिलाईं।
“हाँ, दिदी। बस एक् क्लासमेट जिसे पढ़ाई मे सहायता चाहिए थि। ”
सलोनी दिदी नें धीरे-धीरे सें सिर हिलाया, मगर उनकी आँखों केँ भाव सें लगरहा थां कि वो अभि भि कन्विंस नहि हुईँ हें। हमारे बीच कि हवा मे अनकहे प्रश्न, पिछली रात कि यादें, औऱ हमारी पहले सें हि उलझी हुईँ दुनिया मे अचानक एक् नएनाम — आकांक्षा — कां आनां गूंजरहा थां।
आकांक्षा केँ बारे मे बातचीत धीरे धीरे ख़त्म होनेलगी, फिन भि हर शब्द कां वज़न कमरे मे अनदेखे धुएं कि तरह छायाहुआ थां। सलोनी दिदी कि आँखें मुझ पऱ टिकी रहीं, जिसमें उत्सुकता औऱ दबी हुई भावना कां अजीब सां मिश्रण थां। जैसे हि खामोशी नें हमें एक् बारफिन निगलने कि धमकी दि, वो फिन बोलीं, इसबार उनकी आवाज़ थोड़ी धीमी, करीब-करीब नरम थि।
“ओह… तुम्हें भूखलगी होगी, ” उन्होंने कहा, छोटे सें रसोई एरिया कि तरफ थोडा मुड़ते हुए। “शायद मैंने पहले नहि पूछा। मे जल्द सें तुम्हारे लिएकुछ बनाती हूं। इसमें अधिक वक्त नहि लगेगा। ”
उनके ऑफ़र मे नॉर्मल होने कि एक् शांत कोशिश थि, जैसे खानां बनाने सें हमारे बीच कि दूरियाँ किसीतरह ठीक हौ सकती हें। एक् समय केँ लिए, मुझेउस देखभाल करने वाली सलोनी दिदी कि झलक मिली जिसे मे कभी जानता थां — जौ बिना किसी झिझक केँ मेरा ख्याल रखती थि।
मगर मैंने जल्द सें अपनासिर हिला दिया। “नहि, दिदी। कोई ज़रूरत नहि हैं। मैंने पहले हि खा लिया हैं। ”
वो बीच मे हि रुकगईं, उनकीपीठ अभि भि थोड़ी मेरीतरफ थि। “तुमने खाया? कहां?”
मे जवाब देने सें पहले एक् सेकंड केँ लिए झिझका, “असल मे, आकांक्षा नें कुछ बनाया थां। इसे तहरी कहते हें — सब्ज़ियों औऱ मसालों केँ संगपका हुआ चावल। ये काफ़ी अच्छा थां। ”
जैसे हि मेरे मुँह सें यह शब्द निकले, माहौल एकदमबदल गय़ा। कमरे मे एक् भारी, दम घोंटने वाली खामोशी छा गई, जोँ पहले सें अधिक गहरी औऱ गहरी थि। सलोनी दिदी कई सेकंड तक बिना हिले-डुले खड़ी रहीं, जैसे “आकांक्षा” नाम औऱ मेरेलिए उनके खानां बनाने कि इमेज नें उन्हें कहीं नरमी सें छुआ हौ। हवा मे अनकही जलन, बेचैनी औऱ पिछली रात कि डरावनी यादें भरगईं जब मेरे हाथों नें उनके नंगे जिस्म कों छुआ थां।
वो आहिस्ता मुड़ीं, उनके चेहरे पऱ बहोत ध्यान थां, फिन भि उनकी आँखों मे भावनाओं कां तूफ़ान थां — थोड़ी चोट, थोडा अधिकार जताने कि भावना, औऱ हमेशा रहने वाली अजीब सि बेचैनी जौ हमें छोड़ने कां नाम नहि लें रही थि। हम् दोनों मे सें किसी नें बात नहि कि। बसदूर सें सीलिंग फैन कि आवाज़ औऱ दीवार पर्र लगी घड़ी कि हल्की टिक-टिक सुनाई देरही थि। वो खामोशी दर्दनाक तरीके सें फैली हुई थि, हमेंऐसे लपेटरही थि जैसेकोई अनदेखी ज़ंजीर होँ, जिससे हर साँस मुश्किल लगरही थि। मे करीब-करीब सुन सकता थां कि उसके विचार तेज़ी सें दौड़रहे हें — वो सोचरही थि कि मैंने कितनी आसानी सें किसी दूसरी लड़की केँ संग खानां खाया जबकि हमारे बीच कां तनाव अभि भि बनाहुआ थां।
ये अजीब सि हालत बर्दाश्त केँ बाहर् थि, इतनी ज्यादा कि इसका स्वाद भि चखने लायक थां।
बहोत देरबाद, सलोनी दिदी कां फ़ोनबजा, जौ भारी शांति कों चीरता हुआ एक् टेम्पररी रहम कि तरहआया। उसने स्क्रीन पऱ देखा, कॉल आई उठाते वक़्त उसका चेहरा थोडा नरमपड़ गय़ा। ये उसका परिवार थां। वो खिड़की कि तरफ बढ़ी, धीमी, प्रेम भरी आवाज़ मे बात करतेहुए — सबकी सेहत केँ बारे मे पूछरही थि, अपनी मम्मी कि किसीबात पर्र धीरे-धीरे सें हँसरही थि, औऱ उन्हें अपनी कॉलेज लाइफ़ केँ बारे मे बतारही थि। उसकी आवाज़ मे एक् गर्मजोशी थि जोँ उस ठंडी खामोशी सें बहोत दूरलग रही थि जोँ हमने अभि-अभि शेयर कि थि।
दूसरी तरफ, मे अपने लैपटॉप मे बिज़ी थां, किसी असाइनमेंट मे पूरीतरह डूबाहुआ होने कां नाटककर रहा थां। मेरी उंगलियां मशीन कि तरह कीज़ पर्र घूमरही थीं, मगर मेरामन कहीं औऱ थां — अकांशा कि हंसी कि मीठी यादों औऱ कुछफीट दूर खड़ी मुश्किल हकीकत केँ बीच फंसाहुआ।
कई मिनटबीत गए। आखिरकार, सलोनी दिदी नें प्रेम सें “अपना ख्याल रखना, सभी लोग। मुझे तुम्हारी याद आँ रही हैं, ” कहकरकॉल आई समाप्त कि औऱ फ़ोनरख दिया। वो कुछदेर चुपचाप खड़ी रहीं, फिन उनका ध्यान मेरीतरफ गय़ा।
“तुम् अपने परिवार सें बात क्यूं नहि करते?” उन्होंने धीरे-धीरे सें पूछा, उनकी आवाज़ मे सच्ची चिंता थि। “तुम् उन्हें शायद हि कभी फ़ोन करते हौ। ”
मैंने लैपटॉप स्क्रीन सें नज़रें हटाए बिना, एक् धीमी, ताने वाली हंसी निकाली। “दिदी, किससे बात करूँ?”
प्रश्न मेरीसोच सें अधिक तीखा निकला, जिसमें सालों कां दबाहुआ दर्द थां। सलोनी दिदी नें जल्दी बदलाव महसूस कर लिया। वो पासआईं औऱ पलंग केँ किनारे पर्र मेरीतरफ मुँह करकेबैठ गईं।
“अभिर… तुम्हारा क्याँ मतलब हैं?” उन्होंने धीरे-धीरे सें पूछा। “वे तुम्हारे परिवार वाले हें। ”
मैंने धीरे-धीरे सें लैपटॉप बंद किया, औऱ आखिरकार उनकी आँखों सें आँखें मिलीं। मेरी आवाज़ सख्त, दूर, करीब-करीब ठंडी होँ गई। “फ़ैमिली? ये शब्दअब खोखला लगता हैं। मम्मी केँ गुज़र जाने केँ बाद, सभी कुछबदल गय़ा। पिताजी… उन्होंने हमारे घऱ मे दूसरी स्त्री लाने मे पूरा एक् साल भि इंतजार नहि किया। मम्मी केँ घऱ मे। ”
सलोनी दिदी केँ चेहरे पर्र गहरी हमदर्दी केँ संग नरमी आँ गई। “मुझेपता हैं कि तुम्हारे लिएये मुश्किल थां। इतनीकम उम्र मे अपनी मम्मी कों खोना—”
“मुश्किल?” मैंने बीच मे हि टोक दिया, मेरे होंठों पऱ एक् कड़वी मुस्कान आँ गई। “ये सिर्फ़ मुश्किल नहि थां, दिदी। ये बहोत बुरा थां। एक् दिन मम्मी थीं — प्रेम सें, प्रेम सें, अपनी हँसी औऱ अपने खाने कि खुशबू सें घऱ कों भररही थीं। अगले हि दिन, वो चलीगईं। औऱ अचानक, उनकी स्थान एक् नई महिला बैठी थि, ऐसे व्यवहार कररही थि जैसे वो उनकी स्थान लेँ सकती हैं। ऐसे व्यवहार कररही थि जैसे वो उनकी स्थान लेँ सकती हैं। ”
सख्त रहने कि कोशिशों केँ बावजूद मेरी आवाज़ थोड़ी भर्रा गई। पुराने ज़ख्म खुलरहे थें, कच्चे थें औऱ उनसेखून बहरहा थां।
“मैंने कोशिश कि, तुम्हें पता हैं, ” मैंने कहा, मेरा लहजा भारी होताजा रहा थां। “मैंने पिताजी कि खातिर इसे मानने कि कोशिश कि। मगरहर बारजब मे उन्हें देखता, तौ मुझेपता चलता कि क्याँ कमी हैं। उनकीहर मुस्कान धोखे जैसी लगती थि। उनका बनाया हर खानां मां कि याद कां अपमान लगता थां। इसलिये मैंने कोशिश करनाबंद कर दिया। मे ठंडापड़ गय़ा। दूर होँ गय़ा। मैंने स्वयं कों किताबों मे, कॉलेज मे, हरउस चीज़ मे डुबो लिया जौ मुझेउस घऱ सें दूर रखती थि। ”
सलोनी दिदी चुपचाप सुनरही थीं, उनकी आँखों मे आँसू थें। “अभिर… तुमने पहलेकभी इस बारे मे इतना खुलकर बात नहि कि। ”
“क्योंकि इसका क्याँ मतलब थां?” मैंने धीमी औऱ तनावभरी आवाज़ मे जवाब दिया। “बात करने सें मम्मी वापस नहि आतीं। इससेये नज़ारा नहि मिटता कि बापू किसी दूसरी महिला कां हाथ पकड़े हुए हें जबकि मम्मी कि तस्वीरें अभि भि दीवारों पर्र टंगी हें। मुझे अकेलापन महसूस होँ रहा हैं, दिदी। अपने हि घऱ मे एक् अजनबी जैसा। अब उनकेपास उनकानया छोटा सां परफेक्ट परिवार हैं। मे बस…उस अतीत कि याद हूं जिससे वेआगे बढ़ना चाहते हें। ”
रूम छोटालग रहा थां, तनाव पहले सें कहीं ज्यादा बढ़ गय़ा थां। मेरा सीनादबे हुए इमोशन सें ऊपर-नीचे होँ रहा थां, जैसे सालों कां दबाहुआ दर्द लहरों कि तरह बाहर् निकलरहा हौ। सलोनी दिदी नें अपने आप् हाथ बढ़ाया मगर स्वयं कों रोक लिया, उन्हें वो अजीब सां एहसास याद आँ गय़ा जौ हमारे बीच अभि भि थां।
“तुम् अकेल नहि होँ, ” उन्होंने धीरे-धीरे सें कहा। “तुम्हारे लिए अभि भि ऐसेलोग हें जोँ तुम्हारी परवाह करते हें। ”
मैंने एक् सूखी, बिना हंसी केँ हंसी। “क्याँ मे? कभी-कभी मे सोचती हूं। ”
बातचीत साम तक लंबीचली, जिसमें भारी रुकावटें, इमोशनल बातें औऱ उसतरह कि सच्ची ईमानदारी थि जोँ सिर्फ़ बहोत कमज़ोरी केँ पलों मे हि सामने आती हैं। मे ऊपर सें सख्तरही — जब भि बात बहोत दर्दनाक होती, मे टॉपिक छोड़ देती, ताने मारकर बातटाल देती — फिन भि मेरेकवच मे दरारें दिखरही थीं। सलोनी दिदी नें सब्र औऱ शांत हमदर्दी सें सुना, आकांक्षा केँ लिए पहले कि जलन मेरे गहरेदुख केँ सामने कुछदेर केँ लिएभूल गई।
मेरे टूटेहुए परिवार केँ बारे मे हमारी इमोशनल बातचीत केँ बाद कि खामोशी कमरे मे लिपटे एक् भारी कंबल जैसीलग रही थि। ये गहरी, असहज औऱ ऐसी बातों सें भरी थि जोँ हम् दोनों कहना चाहते थें मगर हिम्मत नहि जुटापाए। सलोनी दिदी आखिरकार खड़ी हुईं, उनका दुपट्टा एक् कंधे सें थोडा खिसक गय़ा, जिससे उनकी गर्दन कां चिकना घुमाव औऱ उनके स्तनों कां ऊपरी उभारदिख रहा थां।
“हम् ऐसे भूखे नहि रह सकते, ” उन्होंने धीरे-धीरे सें कहा, उनकी आवाज़ नॉर्मल लगने कि कोशिश कररही थि। “मे गर्म रोटी औऱ ताज़ी सब्ज़ी बनाऊँगी। रसोई मे मेरी सहायता करनेआओ। ”
मे बिनाकुछ कहे उनके पीछेचला गय़ा। आजरात छोटा रसोई औऱ भि छोटालग रहा थां। स्टोव केँ ऊपर बल्ब कि गरम पीली रोशनी नें सभीकुछ औऱ नरम, ज्यादा अपना सां बना दिया थां। हवा पहले सें हि गरम थि, औऱ जैसे हि हमने खानां बनाना शुरुआत किया, हर गुजरते मिनट केँ संगये औऱ गरम होती गई।
सलोनी दिदी स्टोव पर्र खड़ी सब्ज़ी हिलारही थीं, जबकि मे उनकेबगल वाले काउंटर पर्र आटा गूंथरहा थां। तंग स्थान मे हमारे बदन एक्-दूसरे सें रगड़ते रहे। पहले तौ हमनेइसे नज़रअंदाज़ करने कि कोशिश कि। मगरये नामुमकिन हौ गय़ा।
जैसे हि मैंने उनके पीछे बेलन पकड़ा, मेरी छाती उनकीपीठ सें ज़ोर सें दब गई। उसके रसीले, भारी ब्रेस्ट मेरेहाथ सें दबरहे थें, उसके निप्पल केँ सख्त सिरे उसकी पतली कमीज़ केँ ऊपर सें मेरी स्किन पर्र आहिस्ता रगड़खा रहे थें। मे स्तब्ध रह गय़ा। वो स्तब्ध रह गई। कई लंबे सेकंड तक, मे उसके ब्रेस्ट कां पूरा, गरम वज़न अपनेऊपर महसूस कर सकता थां। उसकी सांसें तेज़ होँ गईं। मैंने धीरे-धीरे सें स्वयं कों पीछे खींचा, मगर इससे पहले कि मेरा सख्त होता लिंग उसकी गांड केँ रसीले घुमाव सें टकराता।
बाद मे, जब वो गैस कां प्रेशर चेक करने केँ लिए नीचे झुकी, तोँ उसके बड़े, गोल कूल्हे सीधे मेरीकमर मे धंसगए। गोल-
मोटा, रसीला मांस मेरेअब पत्थर जैसे सख्त हौ चुके लन्ड केँ चारों ओर थोडा फैल गय़ा। मे महसूस कर सकता थां कि उसके कूल्हों केँ बीच कि गहरी दरार हमारे कपड़ों केँ ऊपर सें मेरे इरेक्शन कों दबारही हैं। सलोनी दिदी नें एक् छोटी, कांपती हुइ सांसली मगर जल्दी हटी नहि। वो वहींरही, उसकी रसीले गांडकुछ खतरनाक सेकंड केँ लिए मेरे कड़ेपन सें आहिस्ता रगड़ती रही, जबकि वो सब्जी कों हिलाने कां नाटककर रही थि। उसकेबदन कि गर्मी पागलों जैसी थि।
हर छोटी हरकत एकदम टॉर्चर बन गई। जब मैंने उसे बेली हुईँ रोटी दि, तौ मेरी उंगलियां खुलेआम उसके ब्रेस्ट केँ किनारे पऱ थीं, उसकी भारी, रसीले उछाल महसूस कररही थीं। उसका निप्पल पत्थर जैसा सख्त थां। जब वो मुझे प्लेट देने केँ लिए मुड़ी, तौ उसकी जांघ मेरे पैरों केँ बीच फिसल गई औऱ मेरे धड़कते हुए लन्ड पर्र मजबूती सें दब गई, उसे धीरे धीरे रगड़ने लगी। रसोई आरामसे जलती हुईँ हवस कि आग मे बदल गय़ा थां। हमारे चेहरे लाल होँ गए थें, सांसें भारी हौ रहीथीं, औऱ उसकेगरम बदन कि खुशबू खाने कि मसालेदार खुशबू केँ संग मिलकर सभीकुछ दस गुना ज्यादा कामुक बनारही थि।
हमने किसीतरह खानां बनाना समाप्त किया। रोटियां नरम औऱ गरमथीं, सब्जी मसालों सें भरपूर थि। हम् प्लेटें टेबल पऱ लेँ गए औऱ चुपचाप खानां खाया, एक्-दूसरे कों देखते रहे। खानां टेस्टी थां, मगर असलीभूख कुछ औऱ हि थि।
डिनर केँ बाद, हम् सोफे पर्र चलेगए। लाइटें धीमीथीं। सलोनी दिदी मेरे सामने बैठीथीं, घबराई हुइ मगर पक्की लगरही थीं।
“अभिर… हमेंसच मे कलरात केँ बारे मे बात करनी हैं, ” उन्होंने धीमी औऱ कांपती आवाज़ मे कहा।
मैंने सिर हिलाया, मेरादिल ज़ोर सें धड़करहा थां। “मुझे सॉरी, दिदी। मैंने हदपार कर दि। ”
उन्होंने अपने हाथों कि तरफ देखा, फिन मेरीतरफ। उनकेगाल गुलाबी थें। “मुझे बताओ तुम्हें कैसालगा… सच मे। ”
मैंने एक् गहरी साँसली औऱ आहिस्ता बोला, मेरी आवाज़ भारी थि। “जब तुम्हारी पीठ मे दर्दहुआ औऱ तुमने मुझसे मसाज करने कों कहा… तोँ मैंने नॉर्मल तरीके सें शुरुआत किया। मगर जैसे हि मैंने तुम्हारे कपड़े उतारे औऱ तुम्हारी नंगीपीठ देखी… तुम्हारी चिकनी स्किन तेल सें चमकरही थि… मे बहोत ज्यादा हॉर्नी हौ गय़ा। मेराकॉक पत्थर जैसा सख्त हौ गय़ा। जब मे तुम्हारे हिप्स तक पहुंचा… उन बड़े, रसीले, मुलायम गालों तक… मे स्वयं कों कंट्रोल नहि करसका। मैंने उन्हें आरामसे मसाज किया, ये महसूस करतेहुए कि वे केसेहिल रहे थें औऱ मेरे हाथों मे पूरीतरह सें भरगए। तुम्हारी गांड इतनी रसीले औऱ मज़बूत हैं… इसकीलत लग गई। मे औऱ गहराई तक दबाता रहा, तुम्हारे गालों कों थोडा फैलाता रहा। मैंने हर एक् सेकंड कां मजा लिया। तुम्हें छूने सें हि मेरा प्री-कम निकलरहा थां। ”
सलोनी दिदी कि साँसें तेज़ होँ गई थीं। उनकी जांघें आपस मे कसकरदब गईं।
“मुझे भि मजाआया, ” उन्होंने करीब शर्मिंदगी महसूस करतेहुए धीरे-धीरे सें कहा। “जब तुमने मेरी ब्रा खोली औऱ मुझे करीब-करीब नंगी छोड़ दिया… तोँ मुझे बहोत खुलाहुआ महसूस हुआ। मगर तुम्हारे ऑयलीहाथ मेरी स्किन पर्र बहोत अच्छे लगरहे थें। जब तुमने मेरे नंगे बटक्स कि मालिश शुरुआत कि… तौ मे गीली होँ गई, अभीर। सच मे गीली। मुझे गंदालगा… मगर मुझे अच्छा लगा। मुझे अपनी सबसे प्राइवेट जगहों पऱ तुम्हारे हाथ महसूस करना अच्छा लगा। ”
कन्फेशन हमारे बीच, हॉट औऱ भारी, लटकाहुआ थां।
सलोनी दिदी शर्माकर मुस्कुराईं औऱ पास झुकीं। “तुम् कुछ औऱ भि नॉटी सुनना चाहते होँ?”
मैंने सिर हिलाया, पूरीतरह सें अट्रैक्टेड।
उन्होंने अपना निचला होंठ काटा औऱ धीमी, सिडक्टिव आवाज़ मे बोलने लगीं।
“पिछले साल मैंने आखिरकार अपनी मां कों कुछऐसा बताया जोँ मैंने सालों सें सीक्रेट रखा थां। जब मे छोटी थि, शायद चौदह याँ पंद्रह साल कि, तौ मे एक् रातउठी औऱ अपने मां-पिताजी केँ बेडरूम कि तरफचली गई क्योंकि द्वार (दरवाज़ा) थोडा खुला थां। मैंने अंदर झाँका।
कमरे मे हल्की रोशनी थि। मां खाट पऱ पीठ केँ बल पूरीतरह नंगी लेटी हुईँ थीं। उनका मैच्योर बदन बहोत कामुक लगरहा थां। उनके ब्रेस्ट बहोत बड़े औऱ भारी थें, जोँ उनकी छाती पर्र बाहर् कि ओर फैलेहुए थें औऱ मोटे, काले निप्पल सीधे खड़े थें। उनकापेट रसीले थां जिसमें हल्की सिलवटें थीं, उनकीकमर गहरी मुड़ी हुईँ थि, औऱ उनकी जांघें मोटी औऱ मांसल थीं। उनकी पुसीशेव करके चिकनी थि, बाहरी होंठ सूजेहुए औऱ चमकरहे थें, थोड़े खुलेहुए थें। उनके बड़े, गोल चूतड़ बेडशीट पऱ फैलेहुए थें, जोँ रसीले औऱ भारीलग रहे थें।
बापू उनकेऊपर लेटेहुए थें, वे भि पूरीतरह नंगे थें। उनका लिंग मोटा औऱ लंबा, गहरेरंग कां, मोटी नसों सें ढकाहुआ, औऱ पूरीतरह सें सख्त थां। उसकासिर उनकेरस सें सूजाहुआ औऱ चमकरहा थां। उन्होंने अपना लिंगहाथ मे पकड़ा औऱ आरामसे उनकी पुसी मे डाला। जैसे-जैसे वो औऱ अंदरगए, उनकी सूजी हुई पुसी केँ होंठ उनके मोटे शाफ्ट केँ चारों ओर कसकरफैल गए। जैसे हि उनके कूल्हे ज़ोर सें आगे बढ़ने लगे, उनके भारी बूब्ज़ हिलने औऱ गोल-गोल घूमने लगे।
उन्होंने उन्हें लंबे, ज़ोरदार स्ट्रोक सें चोदा। हर धक्के सें उनका पूराबदन हिलरहा थां। उसके बड़े ब्रेस्ट ज़ोर-ज़ोर सें ऊपर-नीचे उछलरहे थें, हर हरकत केँ संग रसीले मांसहिल रहा थां। उसने दोनों हाथों सें उसके ब्रेस्ट पकड़लिए, रसीले मांस कों ज़ोर सें दबाया, उसकी उंगलियां उनमें गहराई तक धंसगईं। उसकी मोटी जांघें पूरीतरह फैली हुई थीं, घुटने मुड़े हुए थें, औऱ उसके पांव उसकीपीठ केँ पीछे बंधेहुए थें। हरबार जब वो उसके अंदर गहराई तक धक्का देता, तोँ उसके मुलायम चूतड़ औऱ फैल जाते औऱ साफ़ दिखाई देते।
उसका मोटा लन्ड उसकी गीली बुर मे अंदर-बाहर् होतारहा। गुलाबी अंदरूनी होंठों नें उसकी नसों वाले शाफ्ट कों कसकर पकड़रखा थां। साफ़रस उसकी पूरी लंबाई पऱ लगाहुआ थां औऱ उसकी बुर सें टपककर उसकी गांड कि दरार पर्र गिररहा थां, जिससे उसका गांड कां छेद चमकदार हौ रहा थां। हर गहरे धक्के केँ संग उसका रसीले पेट थोडा हिलरहा थां।
फिन पिताजी नें अपना लन्ड पूरीतरह सें बाहर् निकाल लिया। वो चमकरहा थां औऱ गीला थां। उसने माँ कों पेट केँ बलपलट दिया औऱ उन्हें चारों पैरों पर्र खड़ाकर दिया। उसके बड़े ब्रेस्ट ज़ोर सें नीचेलटक रहे थें, दो बड़े पेंडुलम कि तरह आज़ादी सें झूलरहे थें। उसकीपीठ गहराई तक झुकी हुईँ थि, जिससे उसका बड़ा गांडऊपर कि ओरउठरहा थां। उसके मोटे चूतड़ पूरीतरह सें खुलेहुए, गोल औऱ रसीले थें। उसने दोनों हाथों सें उसके चौड़े हिप्स पकड़े, उसकी उंगलियां उसके मांस मे धंसगईं, औऱ अपना मोटाकॉक पीछे सें उसकी पुसी मे डाल दिया।
वो उसे ज़ोरदार, रिदमिक मूवमेंट्स केँ संग चोदने लगा। हर धक्के केँ संग उसका पूराबदन आगे कि ओरहिल रहा थां। उसके भारी लटकेहुए ब्रेस्ट बेतहाशा आगे-पीछे झूलरहे थें। हरबार जब उसके हिप्स उससे टकराते थें, तौ उसके मोटे पिछवाड़े ज़ोर सें हिलते औऱ लहराते हुए थें। हर गहरे स्ट्रोक केँ संग उसके बॉल्स उसकी सूजी हुइ पुसी लिप्स सें दबरहे थें। मे साफ़देख सकता थां कि उसकी पुसी उसके मोटेकॉक केँ चारों ओर केसे फैली हुई थि, जब वो पीछे खींचता थां तौ बाहरी होंठ उसके शाफ़्ट सें चिपके रहते थें, फिनजब वो आगे धकेलता थां तौ अंदर गायब हौ जाते थें। उसकी पुसी सें लगातार जूस निकलरहा थां, जोँ उसकी अंदरूनी जांघों सें चमकदार ट्रेल्स मे बहरहा थां। यहां तक कि हरडीप पेनिट्रेशन केँ संग उसका टाइट एनसहोल भि साफ़तौर पऱ सिकुड़ता औऱ ढीला होता थां।
उसका चेहरा एक् तरफ़ थां, आँखें आधीबंद थीं, होंठ खुले थें, गाल गहरेलाल होँ गए थें। उसकीपीठ औऱ उसके भारी ब्रेस्ट्स केँ साइड्स पऱ पसीना दिखरहा थां। पिताजी कां लन्ड अंदर-बाहर् होतारहा, चिकना औऱ चमकदार, हर धक्के केँ संग उसकी बुर कों पूरीतरह सें खोल देता थां।
मे वहींजमी खड़ीरही, अपने माँ-पिताजी कों इतनी बेरहमी सें चोदते हुए देखने सें नज़रें नहि हटापा रही थि…”
सलोनी दिदी धीरे-धीरे सें हँसीं, उनकी आँखों मे शरारती यादें चमकरही थीं।
“जब मैंने पिछले साल माँ कों इसके बारे मे बताया, तौ वो इतनी हँसीं कि रो पड़ीं। उन्होंने मुझे अपनेपास खींचा औऱ सभीकुछ डिटेल मे समझाया। उन्होंने मुझे बताया कि उन्हें रफ सेक्स कितना पसन्द हैं, जब पिताजी कां लन्ड उन्हें पूरीतरह सें फैलाता हैं तौ कितना अच्छा लगता हैं। उन्होंने ये भि माना कि वो कभी-कभी उनसे ज़ोर सें चोदने, उनकी गांड पऱ थप्पड़ मारने औऱ उनकेबाल खींचने कि भीख माँगती हें। उन्होंने कहा कि एक् स्त्री कां बदन मज़े केँ लिएबना हैं, औऱ इसकामजा लेने मे कुछ भि गलत नहि हैं। ”
पूरी किस्सा मे लगभगबीस मिनटलगे थें। सलोनी दिदी नें अपनी मम्मी केँ ब्रेस्ट औऱ गांड केँ हर धक्के, हरअहह, हर हिलने-डुलने कों इतनी साफ़, गंदी डिटेल मे बताया कि मेरा लिंग पूरे वक़्त दर्द सें तनाहुआ थां। रूम सेक्सुअल एनर्जी सें भराहुआ लगरहा थां।
उस लंबी, बहोत हि इरोटिक किस्सा केँ बाद, बातचीत औऱ भि खुलकर होनेलगी।
सलोनी दिदी नें मुझे चिढ़ाते हुए मुस्कुराया। “तुम्हें मेरे बटक्स सच मे मनपसंद हें, हैं नां?”
“वे परफेक्ट हें, ” मैंने सच मे कहा। “छोटे, रसीले औऱ गोल। जितना मैंने कभी सोचा भि नहि थां उससे भि बेहतर। ”
वो हँसी। “तुम् ऐसा केसेकह सकते हौ? तुमने तौ सिर्फ़ मेरे हि देखे हें। तुम्हारा कोई मुकाबला नहि हैं। ”
“शायद मुझे इसकी ज़रूरत नहि हैं, ” मैंने जवाब दिया, मेरी आँखें उसके जिस्म पर्र घूमरही थीं। “कुछ चीज़ें तुम्हें तभीपता चलती हें जब तुम् उन्हें छूते होँ। ”
हम् ऐसे हि बातें करतेरहे — धीरे धीरे, फ़्लर्टी औऱ बहोत सेंसुअल। उसने मुझसे पूछा कि जबकोई लड़का अराउज़ होता हैं तौ उसकाकॉक केसे बदलता हैं। मैंने डिटेल मे बताया कि ये केसे मोटा, लंबा औऱ सख़्त होता हैं। वो चमकती आँखों सें सुनरही थि, शरारती छोटे-छोटे प्रश्न पूछरही थि। अजीब सां माहौल हमारे बीच पूरीतरह सें एक् गरम, इरॉटिक, मज़ेदार औऱ अजीबतरह सें चैन देने वाले वाइब मे बदल गय़ा थां।
अचानक, मेरा फ़ोन ज़ोर सें बजनेलगा। ये एक् रैंडम फोन थि।
“मुझेये लें लेना चाहिए, ” मैंने बिनामन केँ खड़े होतेहुए कहा।
सलोनी दिदी नें सिर हिलाया, उनका चेहरा अभि भि लाल थां, उनके होंठों पऱ एक् छोटी सि शरारती मुस्कान थि।
फ़ोन बजतारहा, हमारे चारों ओरछाई घनी, कामुक धुंध कों चीरता हुआ। मैंने स्क्रीन पर्र नज़र डाली औऱ मुझे हैरानी औऱ गिल्ट कां एक् अजीब मिक्स महसूस हुआ। ये आकांक्षा थि।
मे बालकनी कि तरफ़ गय़ा, धीमी आवाज़ मे जवाब दिया। “हैलो?”
आकांक्षा कि आवाज़ आई, नरम औऱ दोस्ताना। “हे, अभिर। इतनीदेर सें फ़ोन करने केँ लिए सॉरी। मे बसआज केँ लिएफिन सें थैंकयू कहना चाहती थि। टीचिंग, मॉल…सभी कुछ बहोत अच्छा थां। ”
हमनेबस कुछ मिनटबात कि — हल्की, फ़ॉर्मल औऱ कैज़ुअल। उसने सिग्नल्स औऱ सिस्टम्स नोट्स केँ बारे मे पूछा, प्रोफ़ेसर केँ बारे मे मेरे एक् छोटे सें मज़ाक पऱ धीरे-धीरे सें हँसी, औऱ मुझेगुड नाइटकहा। औऱ कुछ नहि। मैंने जल्द सें उसका नंबरसेव किया औऱ पाँच मिनट मे कॉलआई समाप्त कर दि।
जब मे कमरे मे लौटा, तोँ सलोनी दिदी अभि भि सोफ़े पर्र बैठीथीं। हमारी नज़रें मिलीं, औऱ हमने एक् छोटी सि, जानी-पहचानी मुस्कान दि — गर्मजोशी भरी, थोड़ी शर्मीली, फिन भि हमारे पहले केँ कन्फ़ेशन कि गर्मी लिएहुए। किसी शब्द कि ज़रूरत नहि थि। अब हमारे बीच कां माहौल हल्का लगरहा थां, मगरफिन भि जोश मे थां।
हमनेरात समाप्त करने कां फैसला किया। मैंने टीवी चालू किया, औऱ हम् फ्रेंड्स कां एक् एपिसोड देखते हुए एक् संगखाट पऱ लेटगए। स्क्रीन कि रोशनी सें रूम हल्का रोशन थां। हम् एक्-दूसरे केँ बगल मे लेटे थें, हमारे बदन छोटे सें बैड पऱ अपने आप् पास आँ गए थें। सलोनी दिदी केँ चिकने पेरआलस सें मेरे पैरों पर्र रखे थें, उनकी जांघ मेरे निचले जिस्म पर्र लिपटी हुईँ थि। उनका नंगापेर धीरे-धीरे सें मेरी पिंडली सें छू गय़ा। मेरा लिंग, जौ हमारी पिछली कामुक बातचीत सें अभि भि थोडा कड़ा थां, मेरे कपड़ों केँ पतले कपड़े सें दब गय़ा।
उनकाहाथ आहिस्ता मेरेपेट पऱ थां, उंगलियां हल्के सें फैली हुईँ थीं। हम् एक्-दूसरे कि गर्मी, एक्-दूसरे कि सांसें महसूस कर सकते थें - धीमी, स्थिर औऱ करीबी। हर सांस मे उनकी त्वचा औऱ बालों कि हल्की खुशबू आँ रही थि। हर छोटी सि हरकत सें उनके रसीले बूब्ज़ मेरी बांह सें छूरहे थें। हम् शोदेख रहे थें, जोक्स पऱ चुपचाप हंसरहे थें, मगर हमारा ध्यान बंटाहुआ थां। ये नज़दीकी बिजली जैसी थि। उसकेबदन कि गर्मी, मेरेऊपर उसकेपेर कां हल्का वज़न, औऱ मेरेपेट पऱ उसकेहाथ कां हल्का दबाव, इन सबने एक् गहरा कामुक आराम दिया। हम् दोनों मे सें किसी नें बात नहि कि। हम् बस वहीं लेटेरहे, औऱ एपिसोड चलतेहुए शांत औऱ अपनेपन कां मजा लेतेरहे।
आखिरकार, हम् दोनों कों नींद आँ गई।
मे अचानक रात केँ लगभग 1 बजेउठा, मेरा जिस्म पसीने सें भीगाहुआ थां। रात बहोत अधिकगरम हौ गई थि। बिजली नहि थि — पंखा हमारे ऊपर बेजान लटकाहुआ थां, औऱ हवाघनी, नम औऱ दम घोंटने वालीलग रही थि। मेरी स्किन चिपचिपी थि, मेरी छाती ज़ोर-ज़ोर सें ऊपर-नीचे होँ रही थि। मे चुपचाप खाट सें उठा औऱ वॉशरूम चला गय़ा। मेरे चेहरे औऱ गर्दन पर्र ठंडे पानी केँ छींटे पड़ने सें थोड़ी देर केँ लिए आराम मिला, मगर कमरे कि गर्मी अभि भि बहोत ज्यादा थि।
जब मे वापसआया, तौ मे अपनेबदन सें चिपके कपड़ों कों औऱ बर्दाश्त नहि करसका। पूरे अंधेरे मे, मैंने अपनी टी-शर्ट उतार दि औऱ बहोत छोटे काले शॉर्ट्स पहनलिए — जौ मुश्किल सें जांघ केँ बीच तक पहुँच रहे थें, नॉर्मल हाफ-पैंट सें बहोत छोटे। मैंने नीचेकुछ नहि पहना थां। मेरा लिंग आज़ाद, भारी औऱ गरम होकर मेरी जांघ पऱ लटकाहुआ थां। मेरा ऊपरीबदन पूरीतरह सें नंगा थां, मांसपेशियां पसीने कि एक् पतलीपरत सें चमकरही थीं।
मैंने खाट कि तरफ देखा जहाँ सलोनी दिदी आधी नींद मे लेटीथीं, आहिस्ता सांस लेँ रहीथीं।
“दिदी, ” मैंने धीरे-धीरे सें कहा, “बहोत गर्मी हैं। आपकोकुछ हल्का पहन लेना चाहिए। इससे सोना आसान होँ जाएगा। ”
उन्होंने जवाब मे नींद मे कुछ बुदबुदाया।
मे वापस पलंग पऱ चढ़ गय़ा। इस सॉना जैसे माहौल मे नींद आनां नामुमकिन लगरहा थां। मे पीठ केँ बललेट गय़ा, आराम करने कि कोशिश कररहा थां। एकदम अंधेरे कमरे मे, मे सिर्फ़ धुंधली परछाईं हि देखपा रहा थां। मगर मेरी आँखें इतनी एडजस्ट होँ गई थीं कि सलोनी दिदी कों धीरे धीरे उठतेहुए देख सकता थां। उन्होंने अपने कपड़े उतारने शुरुआत करदिए।
सलोनी दिदी नें धीरे-धीरे सें अपनी सलवार केँ किनारों तक हाथ डाला। उन्होंने नाड़ा खोला औऱ उसे नीचे खींचने लगीं। ढीला सूती कपड़ा उनके चौड़े, मांसल कूल्हों औऱ मोटी जांघों पर्र फिसल गय़ा। जैसे हि सलवार नीचे हुइ, मे साफ़-साफ़ उसके रसीले कूल्हे देख सकता थां। वे छोटे औऱ गोल थें, मुश्किल सें एक् पुरानी, हल्के रंग कि पैंटी मे समारहे थें जोँ उसके गहरे कूल्हों केँ बीचऊपर चढ़ी हुइ थि। उसकी जांघें बहोत मोटी औऱ रसीली लगरही थीं, रसीले मांस थोडा हिलरहा थां जब वो सलवार सें बाहर् निकली, पहले एक् पेर, फिन दूसरा। उसने धीरे-धीरे सलवार कों एक् तरफ़कर दिया।
अब वो सिर्फ़ अपनी कमीज़ औऱ अंडरगारमेंट्स मे खड़ी थि। मेरादिल तेज़ी सें धड़कने लगा। उसने दोनों हाथों सें अपनी कमीज़ कां निचला हिस्सा पकड़ा औऱ उसेऊपर खींचने लगी। कपड़ा धीरे धीरेऊपर उठा, जिससे पहले उसका रसीले, गोलपेट औऱ गहरी नाभि दिखी। उसकीकमर पतली थि मगर उसके चौड़े कूल्हों मे काफ़ी घुमावदार थि। जैसे हि उसने कमीज़ कों औऱ ऊपर उठाया, उसके भारी बूब्ज़ दिखने लगे, जौ एक् पुरानी काली ब्रा मे कसकरदबे हुए थें। ब्रा उसकेलिए बहोत छोटीलग रही थि — उसके बड़े, रसीले मम्मों साइड औऱ नीचे सें बाहर् निकलरहे थें, गहरी क्लीवेज कम रोशनी मे भि साफ़दिख रही थि। उसने कमीज़ कों पूरीतरह सें अपनेसिर केँ ऊपर खींच लिया, उसकी बाहें ऊपरउठ गईं, जिससे उसके बूब्ज़ ज़ोर सें ऊपर उठकर उछलने लगे।
सलोनी दिदी अब सिर्फ़ अपनी ब्रा औऱ एक् पुराने स्टाइल कि पैंटी पहने अपनेखाट केँ पास खड़ी थि। पैंटी सिंपल औऱ थोड़ी घिसी हुई थि, कपड़ा उसकी पूरी योनि केँ टीले पऱ फैलाहुआ थां, जिससे उसके मोटे होंठों कि साफ़ आउटलाइन दिखरही थि। साइड सें, मे देख सकता थां कि केसे पतली पैंटी कां स्ट्रैप उसके बड़े, रसीले नितंबों केँ बीच गायब हौ गय़ा। उसके हिप्स बहोत बड़े औऱ भारीलग रहे थें, रसीले मांस पैंटी केँ किनारों सें बाहर् निकलरहा थां। एक् छोटा, पतला तौलिया उसके सामने ढीला-ढाला लपेटा हुआ थां, मुश्किल सें कुछढक रहा थां। वो बार-बार नीचे खिसकरहा थां, जिससे उसके भारी ब्रेस्ट कां निचला हिस्सा औऱ पेट केँ निचले हिस्से कां रसीले मांस बार-बार दिखरहा थां।
मे उसे घूरना बंद नहि करपारहा थां। मेरी आँखें आहिस्ता उसके जिस्म केँ हरइंच पर्र घूमरही थीं — उसकी मोटी जांघों सें लेकर, उसके चौड़े मुलायम हिप्स तक, उस टाइट ब्रा सें सटे उसके ब्रेस्ट केँ भारी वज़न तक, औऱ उसकी रसीले, कर्वी कमर तक। हल्की पीली रोशनी सें उसकी स्किन चिकनी औऱ गरमलग रही थि। उसकीहर छोटी सि हरकत सें उसका मांस धीरे-धीरे सें हिलता थां — उसकी गांड, उसकी जांघें, औऱ खासकर उसके ब्रेस्ट।
पलंग पऱ लेटेहुए, सोने कां नाटक करतेहुए, मेरा लिंग मेरे शॉर्ट्स केँ अंदर दर्द सें सख्त होँ गय़ा थां। मे उसे चुपचाप देखता रहा, सलोनी दिदी कों मुझसे कुछ हि फीट कि दूरी पर्र करीब-करीब नंगी खड़ी पूरीतरह सें देखरहा थां।
कुछ मिनट तक चुपचाप लेटे रहने औऱ सोने कां नाटक करने केँ बाद, अंधेरा औऱ मेरेबगल मे सलोनी दिदी केँ बदन कि गर्मी बर्दाश्त सें बाहर् होँ गई। रूम पूरीतरह सें अंधेरा थां। कहीं सें भि रोशनी कि एक् किरण भि नहि आँ रही थि। मे बस अपनेबगल मे उनकी मौजूदगी महसूस कर सकता थां।
धीरे धीरे, बहोत सावधानी सें, मैंने अपना दाहिना हाथ पतली चादर केँ नीचे उनकीओर बढ़ाया। मेरी उंगलियों नें आखिरकार उनके नंगेपेट कों छुआ। उनकी स्किन बहोत गरम, रसीले औऱ पसीने सें थोड़ी गीली थि। मैंने धीरे-धीरे सें अपनी पूरी हथेली उनके निचले पेट पर्र रखी, उसकी कोमलता औऱ उनकी सांसों केँ हल्के उतार-चढ़ाव कों महसूस किया। वहा कां मांस रसीले औऱ लचीला थां, मेरी उंगलियां गरम स्किन मे थोड़ी धंसगईं।
जैसे हि मेराहाथ उनकेपेट पर्र रखा, मे अपनी उंगलियों केँ ठीक नीचे उनकी पुरानी पैंटी केँ कमरबंद कां किनारा महसूस कर सकता थां। थोडा औऱ ऊपर, उनके भारी स्तनों कां निचला हिस्सा मेरेहाथ केँ ऊपरी हिस्से सें छू गय़ा। पूरे अंधेरे मे भि, मे साफ-साफ सोच औऱ महसूस कर सकता थां कि वो मात्र अपनी ब्रा औऱ पैंटी मे लेटी हुईँ थीं। उसकी ब्रा कां पतला कपड़ा औऱ उसकी पैंटी कां इलास्टिक हि मेरेहाथ औऱ उसकी नंगी स्किन केँ बीच रुकावट थें।
मैंने अपनाहाथ कुछदेर वहींरखा, धीरे-धीरे सें उसकेपेट केँ नरम, गरम घुमाव कों महसूस किया। तभी मैंने देखा कि उसकी सांसें बदल गई थीं। अब ये गहरी नींद मे सोए किसी शख्स कि तरह धीमी औऱ गहरी नहि थि। उसकी सांसें हल्की, थोड़ी तेज़ औऱ ज्यादा होश मे होँ गई थीं। उसकाबदन अजीबतरह सें शांत होँ गय़ा थां — बहोत अधिक शांत।
फिन मैंने उसे महसूस किया। एक् बहोत हि हल्की सि हरकत। उसकापेट मेरी हथेली केँ नीचे थोडा सां तन गय़ा। उससमय, मुझे एहसास हुआ कि सलोनी दिदी आधीजाग रहीथीं। वो पूरीतरह सोई नहि थीं। उन्हें पूरे वक्त अपने जिस्म पर्र मेरेहाथ कां एहसास थां।
मेरादिल ज़ोर-ज़ोर सें धड़कने लगा। मेरे अंदर घबराहट कि एक् लहर दौड़ गई। मैंने आहिस्ता औऱ सावधानी सें अपनाहाथ उसकेपेट सें हटाया, उसे अपनीओर खींचा। मे फिन सें पूरीतरह सें शांत लेटारहा, ऐसा दिखावा करतेहुए कि कुछहुआ हि नहि, मेरी सांसें धीमीथीं। उसकेगरम, नरमपेट कि याद अभि भि मेरी हथेली पऱ थि, औऱ मेरा लिंग मेरे शॉर्ट्स केँ अंदर पत्थर जैसा कड़ाबना हुआ थां।
मेरीफिन सें हिलने कि हिम्मत नहि हुइ।
आखिरकार सुभह-सुभह नींद नें मुझे जकड़ लिया थां, मगरये एक् बेचैन, गरम नींद थि जिसमें रसीले स्किन औऱ मनाकिए गएटच केँ टूटे-फूटे ड्रीम्स थें। सुभह लगभगचार बजे, माहौल मे अचानक बदलाव नें मुझे मेरी हैरानी सें जगाया। रात मे किसी वक्त बिजली वापस आँ गई थि। सीलिंग फैन हमारे ऊपर आरामसे घूमरहा थां, जिससे ठंडी, ताज़ा हवा कि लहरें हमारे पसीने सें भीगे जिस्म पऱ पड़रही थीं। तेज़ गर्मी गायब होँ गई थि, उसकी स्थान एक् मज़ेदार, करीब-करीब बर्फीली हवा आँ गई थि जिससे मेरी स्किन मे झुनझुनी होँ रही थि।
मे वहाउस मज़ेदार, धुंधली, आधी-बेहोशी कि हालत मे लेटा थां — आधा जागाहुआ, आधा नींद केँ गरम कोहरे मे खोयाहुआ। मेरा जिस्म पिछली साम कि यादों सें अभि भि जलरहा थां, हरनस ज़िंदा थि औऱ एक् अधूरी ज़रूरत सें चीखरही थि। मेरा लिंग ज़िद्दी, दर्द सें कड़ा, मोटा औऱ उन छोटे, पतले शॉर्ट्स केँ अंदर ज़ोर-ज़ोर सें धड़करहा थां जिन्हें मैंने पहना थां। पंखे सें सुभह कि ठंडीहवा नें उसके सेंसिटिव, सूजेहुए लिंग कों औऱ भि बेचैन कर दिया थां, पतला कपड़ा मेरे कूल्हों केँ हर छोटे सें हिलने पऱ उससे रगड़खा रहा थां। चिपचिपा प्रीकम पहले हि मोटी बूंदों केँ रूप मे बाहर् निकल चुका थां, जिससे मेरे शॉर्ट्स कां अंदरूनी हिस्सा चिकना औऱ गरम होँ गय़ा थां।
बिना पूरीतरह समझे कि मे क्याँ कररहा हूं, मेराहाथ अपने आप् चला गय़ा। धुंधले, धुंधले अंधेरे मे, मैंने सलोनी दिदी कों पकड़ा औऱ उन्हें अपनीओर खींचा, उनकी गर्मी चाहता थां। वो थोडा हिलीं मगर उन्होंने विरोध नहि किया, अपने जिस्म कों मेरेबदन सें एक् नींदभरी, नैचुरल आलिंगन मे पिघलने दिया। रात मे उन पऱ ढीला-ढाला लपेटा हुआ पतला तौलिया नीचे खिसक गय़ा थां, जोँ अब मुश्किल सें कुछढक रहा थां। उसनेवही पुरानी, सिंपल दादीमा-स्टाइल ब्रा पहनी हुई थि — हल्की काली, जोँ उसके छोटे, उभरेहुए ब्रेस्ट पऱ थोड़ी टाइट थि — औऱ मैचिंग पैंटी जोँ उसके छोटे हिप्स औऱ टाइट छोटे हिप्स कों टाइटकर रही थि।
हमारे बदन आहिस्ता, गरमागरम गलेलग रहे थें। उसकासिर मेरे नंगे सीने सें लगाहुआ थां, उसकी एक् चिकनी, नंगी टांगआलस सें मेरेऊपर रखी हुईँ थि। मेराहाथ उसकी पतलीकमर केँ चारों ओर लिपटा हुआ थां, मेरी हथेली उसके निचले हिस्से केँ गरम, रसीले कर्व पऱ अपने अधिकार सें टिकी हुई थि। ये अंतर नशीला थां — पंखे सें आँ रही ठंडीहवा हमारी खुली स्किन कों चूमरही थि, जबकि हमारे दबेहुए शरीरों केँ बीच बढ़ती गर्मी लगातार बढ़रही थि, जिससे हमारे बीच कि हवा मोटी औऱ लालच सें भारी हौ रही थि।
उसके छोटे ब्रेस्ट मेरे सीने सें हल्के सें दबेहुए थें, सख्त निप्पल पतले ब्रा केँ ज़रिए दो छोटे जलने वाले पॉइंट्स कि तरह मुझमें चुभरहे थें। मेरा कड़ाकॉक उसकी जांघ सें मजबूती सें सटाहुआ थां, हर धड़कन केँ संग धड़करहा थां, मोटा शाफ़्ट तेज़ी सें धड़करहा थां क्योंकि उससे औऱ प्रीकम उसकी रसीले स्किन पऱ निकलरहा थां। मे उसकेबदन कि गर्मी कों अपनेबदन सें महसूस कर सकता थां, उसकी साँसें मेरे कॉलरबोन पऱ धीमी औऱ हल्की पड़रही थीं। कई लंबे, आलसी मिनटों तक, हम् बसउसगरम, नींदभरी आलिंगन मे लिपटे रहे। मगर वो नज़दीकी, ठंडीहवा, औऱ हमारे पहले केँ इकरारों सें बचाहुआ तनाव मेरे अंदरकुछ बहोत गहरा औऱ गहरा जगाने लगा।
हमारे बीच कि गर्मी आरामसे, ज़बरदस्त तरीके सें बढ़रही थि। सलोनी दिदी थोडा हिलीं, औऱ एक् हल्की, अनजाने मे अहह भरतेहुए स्वयं कों मुझसे औऱ ज़ोर सें सटा लिया। उस छोटी सि हरकत सें मेरा लिंग उसकी जांघ पऱ ज़ोर सें फड़कने लगा। मेराहाथ अपने आप् चलनेलगा — आहिस्ता उसकी नंगीपीठ पर्र ऊपर-नीचे सहलाते हुए, उसकी स्किन केँ रसीले, रेशमी टेक्सचर, उसकी रीढ़ कि हड्डी केँ हल्के सें नीचे उतरने, औऱ उसके छोटे, टाइट बटक्स केँ हल्के सें ऊपर उठने कों महसूस करतेहुए। मैंने जिस भि इंच कों छुआ, उसे करंट जैसा महसूस हुआ। उसकी स्किन गरम थि, मेरी हथेली केँ नीचे करीब-करीब बुखार जैसी, औऱ पंखे कि ठंडीहवा सें जब भि मेरी उंगलियाँ चलतीं, तौ वो हल्के सें काँप जाती।
मेरी उंगलियां औऱ बोल्ड होतीगईं, औऱ नीचे सरकती गईं, जब तक कि उन्होंने पतली पैंटी केँ ऊपर उसके छोटे, मज़बूत नितंबों मे सें एक् कों पकड़ नहि लिया। ये बड़ा याँ बहोत अधिक मांसल नहि थां, मगरये एकदमसही आकार कां थां — टाइट, चिकना औऱ बहोत ज्यादा लुभावना। मैंने पहलेइसे धीरे-धीरे सें दबाया, अपनी हथेली मे हल्की गर्मी महसूस कि। सलोनी दिदी नें एक् हल्की, नींदभरी अहहभरी, उनकाबदन अपने आप् मेरे जिस्म सें सट गय़ा। उनके रिएक्शन सें हिम्मत पाकर, मैंने औऱ ज़ोर सें दबाया, उस छोटे सें मांस कों मसलते हुए, अपनी उंगलियों कों अंदर जाने दिया औऱ उनके गालों कों थोडा फैलाया। उनकी पैंटी कां पतला कपड़ा पहले सें हि गीलालग रहा थां, औऱ उनकी जांघों केँ बीच सें निकलरही गर्मी मुझे पागलकर रही थि।
मेरा लिंग औऱ ज़ोर सें धड़कने लगा, उसकी रसीले जांघ पर्र ज़ोर सें दबारहा थां, सूजाहुआ सिरहर धड़कन केँ संग उसकी स्किन पऱ चिपचिपा प्रीकम फैलारहा थां। मे महसूस कर सकता थां कि मेरे बॉल्स भारी ज़रूरत सें कसरहे हें।
उनकाहाथ, जोँ मासूमियत सें मेरे सीने पर्र रखा थां, एक्सप्लोर करनेलगा। उसने अपनी उंगलियां धीरे धीरे मेरे नंगे एब्स पऱ फिराईं, मसल कि हर लाइन कों छूतेहुए, औऱ छेड़ते हुए नीचे औऱ नीचे लें गई। पंखे कि ठंडीहवा हमारी हाइपरसेंसिटिव स्किन पर्र बहरही थि, जिससे हरटचदस गुना ज्यादा इंटेंस लगरहा थां। मैंने महसूस किया कि उसकी सांसें मेरी गर्दन पर्र तेज़ हौ रही हें, गरम औऱ तेज़। हमारे चेहरे अब इतनेपास थें कि मे अपने होंठों पर्र उसकी सांस कि गर्मी महसूस कर सकता थां।
हमनेकिस करना शुरुआत कर दिया।
ये आहिस्ता शुरुआत हुआ — गाल पर्र, जॉलाइन पऱ, मेरे मुँह केँ कोने पर्र झिझकते हुए, नींद मे छोटे-छोटे किस। फिन हमारे होंठठीक सें मिले। किस पहले आरामसे गहराहुआ, गीला औऱ भूखा होता गय़ा। उसकेभरे हुए, रसीले होंठ मेरेलिए अलगहुए, औऱ हमारी जीभें शरमाते हुए, फिन औऱ हिम्मत सें छूईं। हमारी किस कि गीली, करीबी आवाज़ — रसीले, फिसलन भरी, औऱ लार सें भरी — पंखे कि लगातार चलने वाली आवाज़ केँ संगमिल गई। मैंने उसके निचले होंठ कों चाटा, उसे धीरे-धीरे सें अपने मुँह मे चूसा, जैसे हि हमारी जीभें औऱ गहराई तक उलझीं, गरम, चिपचिपी लार कां लेन-देन हुआ। उसके मुँह कां स्वाद मीठा औऱ नशीला थां।
मेराहाथ उसके टाइट छोटेऐस कों दबाता औऱ मसाज करतारहा, कभी-कभी उसकी पैंटी केँ किनारे केँ नीचे सें फिसलकर नंगी, जलती हुईँ स्किन कों छू लेता। ठंडीहवा मे उसकाऐस बहोत चिकना औऱ गरमलग रहा थां। मैंने उसके गालों कों औऱ चौड़ा किया, मेरी उंगलियाँ उसके सबसे प्राइवेट हिस्सों केँ बहोत लगभग सें छूरही थीं। सलोनी दिदी कि साँसें तेज़ होँ गईं, उसका छोटाबदन बढ़ती ज़रूरत केँ संग मुझसे लिपटरहा थां।
उसकाहाथ औऱ हिम्मतवाला होँ गय़ा। उसने अपनाहाथ मेरेपेट सें नीचे सरकाया औऱ हिम्मत करके मेरे छोटे शॉर्ट्स केँ अंदरडाल दिया। जैसे हि उसकीगरम उंगलियों नें मेरे मोटे, धड़कते हुएकॉक कों पकड़ा, मेरेगले सें एक् गहरी कराह निकल गई। उसनेगरम, नसों वाले शाफ़्ट कों धीरे-धीरे सें दबाया, उसे अपनी छोटी हथेली मे तेज़ी सें धड़कता हुआ महसूस किया। मेराकॉक अब बहोत अधिकलीक कररहा थां — गाढ़ा, गरम प्रीकम उसकी उंगलियों पऱ लगाहुआ थां, जब उसने मुझे आहिस्ता सहलाना शुरुआत किया, जिससे वो चिपचिपा गीलापन मेरे सूजेहुए सिर औऱ शाफ़्ट पर्र फैल गय़ा। ये एहसास पागलकर देने वाला थां। उसकेहाथ केँ हर धीमे झटके सें मेरे कूल्हे अपने आप् हिल जाते थें, जिससे मेराकॉक उसकी पकड़ मे औऱ गहराई तक चला जाता थां।
“अभिर…” उसने गीलेकिस केँ बीच हाँफते हुए फुसफुसाया, उसकी आवाज़ भारी औऱ उत्तेजना सें कांपरही थि। उसकी साँस मेरे होंठों पऱ गरमलग रही थि।
मे अपना मुँह उसकी गर्दन पऱ लेँ गय़ा, वहा कि सेंसिटिव स्किन कों चाटने औऱ चूसने लगा। मेरीजीभ नें उसकेगले पऱ धीमी, गीली लाइनें बनाईं, उसकी स्किन केँ हल्के नमकीनपन कों पंखे कि ठंडीहवा केँ संग मिलाहुआ महसूस किया। जब मैंने धीरे-धीरे सें उसकी गर्दन कों काटा औऱ चूसा, तौ वो ज़ोर सें कांपउठी, जिससे हल्के निशान पड़गए। फिन मे उसके चेहरे पऱ वापस गय़ा, उसकेगाल, उसके जबड़े कों चाटा, इससे पहले कि हमारी जीभें फिन सें एक् गंदे, लार सें भरेकिस मे मिलीं। जब हम् थोड़ी देर केँ लिएअलग हुए, तोँ हमारी मिली-जुली लार कि धारें हमारे होंठों सें जुड़गईं, औऱ फिन हम् औऱ गहरे होँ गए।
अबगले लगना पूरीतरह सें गंदा औऱ तेज़ होँ गय़ा थां।
मेराहाथ उसके पिछवाड़े सें हटकर उसके छोटे ब्रेस्ट पऱ चला गय़ा। मैंने उसकी फीकी ब्रा केँ ऊपर सें एक् ब्रेस्ट कों धीरे-धीरे सें दबाया, औऱ महसूस किया कि उसका कड़ा, उभराहुआ उभार मेरी हथेली मे भर गय़ा हैं। उसके निप्पल पत्थर जैसे सख्त थें। मैंने अपनी उंगलियां कप केँ अंदर डालीं, पहलीबार नंगी स्किन कों छुआ - इतनागरम, इतना रसीले। मैंने उसके कड़े छोटे निप्पल कों अपनी उंगलियों केँ बीच दबाया, औऱ आरामसे घुमाया। सलोनी दिदी मेरे मुंह मे ज़ोर सें कराह उठीं, उनकाहाथ मेरेकॉक केँ चारों ओरकस गय़ा क्योंकि वो मुझे तेज़ी सें सहलारही थीं, उनकी हथेली अब मेरे रिसते हुए प्रीकम सें पूरीतरह गीली हौ गई थि।
हमारे जिस्म आरामसे, बेताब होकर एक्-दूसरे सें रगड़रहे थें। मेरा कड़ा, प्रीकम सें सनाहुआ लिंग उसकी जांघों केँ बीच रगड़खा रहा थां, उसकी पैंटी केँ गीले क्रॉच पर्र दबावडाल रहा थां। मे पतले कपड़े केँ आर-पार उसकी बुर कि गर्मी औऱ बढ़ते गीलेपन कों महसूस कर सकता थां। उसके छोटे बूब्ज़ मेरी छाती सें सटरहे थें, हर हरकत केँ संग निप्पल मज़े सें रगड़रहे थें।
मैंने अपनाहाथ वापस नीचे किया, औऱ उसे पीछे सें उसकी पैंटी केँ अंदर पूरीतरह सें डाल दिया। मेरी उंगलियों नें सीधे उसके नंगे, टाइट गांड केँ गाल कों पकड़ा, स्किन सें स्किन। वहां बहोत गर्मी थि। मैंने औऱ ज़ोर सें दबाया, उसे औऱ पास खींचा ताकि मेरा धड़कता हुआ लिंग उसकी पैंटी सें ढके टीले सें सटजाए। मेरी उंगलियों नें औऱ गहराई तक खोजा, उसकी गांड कि दरार पऱ रगड़ते हुए, उसके टाइट छोटेछेद केँ पास कि सेंसिटिव स्किन कों छेड़ते हुए। हर टच सें वो हमारे किस मे सिसक उठती थि।
उसकाहाथ अब मेरे शॉर्ट्स केँ अंदर मेरे लिंग कों औऱ ज्यादा कॉन्फिडेंस केँ संगपंप कररहा थां, मोटे, फिसलन वाले शाफ्ट कों गीली, गंदी आवाज़ों केँ संग हिलारहा थां। प्रीकम आसानी सें बहरहा थां, उसकी उंगलियों पऱ लगाहुआ थां औऱ मेरे बॉल्स सें टपकरहा थां। उत्तेजना कि गंध — मेरा मस्की प्रीकम उसकी औरतों वाली खुशबू केँ संग मिलाहुआ — हमारे बीच कि छोटी सि स्थान मे भर गई।
मैंने एक् समय केँ लिएकिस तोड़ा औऱ फिन सें उसकी गर्दन कों चाटा, इस बार औऱ ज़ोर सें चूसा, उसकी स्किन कों चखा औऱ अपनीजीभ गीली घुमाई। उसने अपनासिर झुकाया, जिससे मुझे औऱ एक्सेस मिला, उसका छोटा जिस्म लालच सें कांपरहा थां। हमारे चेहरे लाल होँ गए थें, होंठ सूजेहुए थें औऱ लार सें चमकरहे थें। मैंने उसकागाल चाटा, फिन उसकीजीभ कों फिन सें पकड़ा, लालच सें चूसा क्योंकि हमारे बीच औऱ लारटपक रही थि।
अब गर्मी बर्दाश्त सें बाहर् थि। पंखे कि ठंडीहवा नें हमारे जलतेहुए बदन कों औऱ भि सेंसिटिव बना दिया थां। हरटच, हर चाट, हर स्ट्रोक एकदमआग जैसालग रहा थां। मेराकॉक दर्दकर रहा थां, उसकेहाथ मे ज़ोर-ज़ोर सें फड़करहा थां, उसकासिर सूजाहुआ औऱ बैंगनी थां, लगातार लीक होँ रहा थां। मे उसे इतना चाहता थां कि दर्द होँ रहा थां।
वासना कि तेज़ गर्मी मे, उस लम्हा मे खोयाहुआ, मैंने अपने होंठ उसके होंठों सें लगादिए औऱ उसके गीले मुँह केँ पास धीरे-धीरे सें फुसफुसाया:
“दिदी… मे तुम्हें बहोत बुरीतरह सें चोदना चाहता हूं…”
शब्द सूखीघास मे चिंगारी कि तरह निकले।
असर जल्दी हुआ।
सलोनी दिदी एकदमजम गईं। मेरे धड़कते, प्रीकम सें चिकने कॉक पऱ उनकाहाथ चलनाबंद होँ गय़ा। उनका छोटा सां जिस्म मेरे जिस्म सें सटकर अकड़ गय़ा, जैसेजोश कां धुंधलापन एक् समय मे टूट गय़ा हौ। वो तेज़ी सें पीछे हटीं, जिससे हमारे गरम शरीरों केँ बीच अचानक ठंडी दूरी आँ गई। पंखे कि ठंडीहवा बेरहमी सें उस स्थान पर्र घुसी जहाँ हमारी स्किन एक्-दूसरे सें चिपकी हुइ थि।
वो जल्द सें उठीं, औऱ अपने छोटे ब्रेस्ट कों ढकने केँ लिए पतला तौलिया अपनी छाती पर्र खींच लिया। उनकी साँसें अभि भि भारी औऱ उखड़ी हुई थीं, मगर उनकी आँखें हैरानी औऱ कन्फ्यूजन सें चौड़ी होँ गई थीं। हमने जोँ सुंदर, गंदासमय बनाया थां, वो उन लापरवाह शब्दों केँ संग पूरीतरह सें टूट गय़ा।
“मुझे… मुझे क्षमा करना, ” मैंने धीरे-धीरे सें कहा, मेरे सीने मे तेज़ी सें घबराहट बढ़रही थि।
उन्होंने कुछ नहि कहा। वो बस वापसलेट गईं, अपनाबदन मुझसे दूर किया औऱ चादर अपनेऊपर खींचली। इसकेबाद जौ सन्नाटा छा गय़ा वो बहराकर देने वाला थां। मेराकॉक अभि भि दर्द सें कड़ा थां, गुस्से मे फड़करहा थां औऱ मेरे शॉर्ट्स केँ अंदर सें रिसरहा थां, मगर तेज़ उत्तेजना अब कड़वी औऱ खट्टी हौ गई थि। उसकेबाद नींद आरामसे आई — बेचैनी, बेचैनी औऱ गहरे अफ़सोस सें भरी — जैसे हि सुभह कि पहली रोशनी पर्दों केँ बीच सें आनेलगी।
हमारे बीच कि लाइन खतरनाक तरीके सें धुंधली हौ गई थि। औऱ अब वो टूटी हुई लगरही थि।
हम् जौ धीरे-धीरे धीरे-धीरे खोगए। – New Episode
Thanks for such a wonderful response! I'm really happy too see so much appreciation and motivation। Also, thank you for taking the waqt too read this sundar kahani.
I'd love too know your theories and opinions about the kahani। Which character दो you like the most, and why? What would you like too see happen with that character in the future? Feel free too share any predictions, thoughts, aur suggestions.
Also, I'd appreciate honest feedback on the kahani। What दो you think iss working well, and what could be improved? Your suggestions will madad make the kahani even more interesting and engaging.
One more thing—I’m facing an issue while uploading GIFs through imgbb। Whenever I try too upload a GIF, it shows an error saying, "Only pictures are allowed." If anyone knows how too fix this problem, please let mai know.
And yes, this iss the Hindi version of the kahani। The English version iss also available under the title "The Slow Seduction of Ours." If anyone iss interested, please दो check it out as well.
Thank you for your support and feedback!
हम् जौ धीरे-धीरे धीरे-धीरे खोगए। - Continue reading next part
Relavant source : click here














