हम् जौ धीरे-धीरे धीरे-धीरे खोगए। – New Episode
Ek number kahani bhaijaan
हम् जौ धीरे-धीरे धीरे-धीरे खोगए। – New Episode
अध्याय 7 :~ वर्जित ज्वालाएँ
पिछली रात कि यादें अभि भि मेरी रगों मे तरलआग कि तरहजल रहीथीं। सलोनी दिदी केँ संग वो कामुक आलिंगन बहुत मासूमियत सें शुरुआत हुआ थां - बसदो जिस्म गर्मियों कि गर्मी मे एक् हि खाट साझाकर रहे थें, पतली चादर केँ नीचे उनके कोमल उभार मेरेबदन सें सटेहुए थें। मगरये जल्द हि खतरनाक मोड़ लेँ गय़ा। उनकागोल नितंब मेरे गुप्तांग सें सटाहुआ थां, औऱ मे अपने लिंग कों कड़ा होने सें रोक नहि पारहा थां। मैंने अपनी बांह उनकीकमर केँ चारों ओर लपेटली थि, उन्हें औऱ लगभग खींचते हुए; मेरी उंगलियां उनकी पतली नाइटी केँ नीचे सें उनके भारी स्तनों केँ निचले हिस्से कों सहलारही थीं। जिस तरह सें उन्होंने धीरे-धीरे सें अहहभरी औऱ मेरेबदन सें औऱ सटगईं। वो अनुभव बिजली जैसा थां।
मेरी सांसें उनकी गर्दन पर्र गरमहवा कि तरहपड़ रहीथीं, जब मैंने फुसफुसाते हुएकहा, "दिदी। मे तुम्हारे संग बहोत ज़ोरदार सेक्स करना चाहता हूं। "
जिससमय यह शब्द मेरे मुंह सें निकले, सभीकुछ बिखर गय़ा। सलोनी दिदी एकदम सें जमगईं। सदमे, लज्जा औऱ डर सें उनका जिस्म पत्थर जैसा कड़ा हौ गय़ा। वो जल्दी मुझसे दूरहट गईं, हमारे बीच दूरीबना ली; उनकी सांसें तेज़ औऱ अनियमित हौ गई थीं। बिना एक् भि शब्दकहे, उन्होंने मेरीतरफ सें मुंहफेर लिया। कमरे मे एक् भारी सन्नाटा छा गय़ा, जिसे मात्र पंखे कि धीमी-धीमी घूमने कि आवाज़ हि तोड़रही थि। मे वहीं लेटारहा, मेरा लिंग दर्दनाक रूप सें फड़करहा थां, मेरादिल पछतावे औऱ अधूरी कामवासना सें ज़ोरों सें धड़करहा थां, जब तक कि आखिरकार मुझे नींद नें अपनी आगोश मे नहि लें लिया।
मे सुभह करीब 7:30 बजे जागा; पिछली रात कि गलती केँ कारण मेरा दिमाग़ अभि भि धुंधला सां थां। निराशा केँ कारण मेराबदन भारी महसूस हौ रहा थां। मैंने उस भावना कों झटक देने कां फैसला किया। मैंने अपना रोज़ाना कां व्यायाम किया — पुश-अप्स, स्क्वैट्स औऱ कुछ स्ट्रेचिंग — पसीना मेरे सीने औऱ पीठ सें टपकरहा थां। उसकेबाद, मैंने ठंडे पानी सें स्नान किया, ताकि अपने गुप्तांग मे बची हुईँ कामुक गर्मी कों शांतकर सकूँ।
जब मे कमरे मे वापसआया, तोँ सलोनी दिदी घऱ मे घूमते हुए अपने सुभह केँ काम-काज निपटा रहीथीं। मुझे किचन सें बर्तनों कि हल्की-हल्की खनखनाहट सुनाई देरही थि। मे पलंग पर्र बैठ गय़ा, अपने मोबाइल पर्र स्क्रॉल कररहा थां, मगर मेरा ध्यान असल मे मोबाइल पर्र नहि थां।
तभी द्वार (दरवाज़ा) खुला।
सलोनी दिदी नहाकर ताज़ा-दम कमरे मे आईं। उन्होंने अपने जिस्म पर्र सिर्फ़ एक् सफ़ेद तौलिया लपेटा हुआ थां, जोँ उनके भरे-पूरे बदन कों मुश्किल सें हि ढकपारहा थां। तौलिया उनके स्तनों केँ ठीकऊपर बंधा थां, जिससे उनके बूब्ज़ ऊपर उठकर एक् गहरी, लुभावनी दरारबना रहे थें। उनकी चिकनी, गोरी त्वचा पऱ पानी कि बूंदें छोटे-छोटे हीरों कि तरहचमक रहीथीं। कुछ बूंदें धीरे धीरे उनकी हंसली कि हड्डी सें नीचे सरकीं, उनके स्तनों केँ बीच सें गुज़रती हुई तौलिए केँ अंदर गायब होँ गईं। उनके लंबे, गीले कालेबाल उनके कंधों औऱ पीठ सें चिपके हुए थें, जिससे पानी कि छोटी-छोटी धाराएँ उनकी रीढ़ कि हड्डी सें नीचेबह रहीथीं।
तौलिया उनकीभरी हुइ जांघों केँ काफ़ी ऊपर तक थां, जिससे उनकी चिकनी, नम टांगें साफ़दिख रहीथीं। उनकेहर कदम केँ संग तौलिया थोडा-सां खिसक जाता थां, मानो अभि खुल जाएगा। गीले कपड़े केँ नीचे सें उनके निप्पल हल्के-हल्के दिखाई देरहे थें—दो कड़े उभार जौ सफ़ेद कपड़े केँ नीचे सें बाहर् झांकरहे थें। वो बेहद सेक्सी लगरही थीं—किसी ऐसी वर्जित देवी कि तरह जोँ अभि-अभि किसी कामुक ड्रीम्स सें बाहर् निकली हौ। उनके बॉडीवॉश कि गंध—फूलों जैसी ताज़ा खुशबू जौ उनकी अपनी स्वाभाविक औरत-सुगंध केँ संग मिलकर पूरे कमरे मे फैल गई थि।
मेरी आँखें उन्हें एकटक निहार रहीथीं। उनकी चौड़ी कमर धीरे धीरे थिरकरही थि। उनकीकमर कां उभार औऱ हर हरकत केँ संग उनके भारी स्तनों कां उछाल देखकर मेरा लन्ड जल्दी फड़कउठा। वो मुझसे सीधे आँखें मिलाने सें बचरही थीं, मगर मे उनके गालों औऱ गर्दन पऱ हल्की-सि लज्जा कि लालीदेख सकता थां। उन्हें पता थां कि मे उन्हें देखरहा हूं। हमारे बीच कि हवा भारी होँ गई थि—अनकहे तनाव औऱ कच्ची कामुक ऊर्जा सें भरी हुइ।
मे उन्हें घूरने सें स्वयं कों रोक नहि पारहा थां। जैसे-जैसे मे अपनी आँखों सें उनकेबदन केँ हर उभार कों निहार रहा थां, मेरादिल ज़ोरों सें धड़करहा थां। उनकी गीली त्वचा, जिसतरह तौलिया उनके कूल्हों सें चिपका हुआ थां, औऱ उनकी जांघों सें नीचे सरकती पानी कि बूंदें—ये सभी मुझे पागलबना रहा थां।
फिन हमारी आँखें मिलीं।
सलोनी दिदी नें मेरी तरफ़ देखा औऱ हल्की-सि, शर्मीली मुस्कान दि। वो मुस्कान। मेरेलिए बिजली केँ झटके जैसी थि। उनकी आँखों मे कुछ थां—घबराहट, जिज्ञासा औऱ एक् छिपी हुई भूख कां मिला-जुला एहसास। उसी लम्हा, मुझे यकीन होँ गय़ा। वो भि यही चाहती थीं। वही वर्जित चाहत जौ मुझे अंदर सें जलारही थि, वही उन्हें भि भस्मकर रही थि। अगरअब भि मे चुपरहा, तौ ये अजीब-सां संकोच हमेशा केँ लिएबना रहेगा औऱ शायद हमारे बीचसभी कुछ बिगाड़ देगा।
मेरी नब्ज़ तेज़ होँ गई। मेरी शॉर्ट्स केँ अंदर मेरा लन्ड पत्थर जैसा कड़ा होँ चुका थां। मुझेकुछ तोँ करना हि थां।
मे खाट सें खड़ा हुआ—मेरे पांव थोड़े कांपरहे थें। सलोनी दिदी अभि भि अलमारी केँ पास खड़ीथीं, अपने गीले बालों कों ठीककर रहीथीं; तौलिया मुश्किल सें हि टिकाहुआ थां। मे सीधे उनकी तरफ़ बढ़ा।
मैंने अपने दोनों हाथ धीरे-धीरे सें उनके नंगे, भीगे कंधों पऱ रखदिए। उनकी त्वचा गरम औऱ रसीले थि, नहाने कि वजह सें अभि भि नम थि। उन्होंने ऊपर मेरी तरफ़ देखा, औऱ हमारी आँखें एक्-दूसरे मे गहरे सें खोगईं। इस नज़दीकी सें उनकी साँसें तेज़ हौ गईं। मे उनकेबदन सें निकलती गर्मी कों महसूस कर सकता थां।
“क्याँ तुम् कुछ कहना चाहते हौ?” उन्होंने धीरे-धीरे सें पूछा, उनकी आवाज़ काँपरही थि।
मैंने सिर हिलाया, मेरागला सूख गय़ा थां। “दिदी। मुझेपता हैं कि ये ग़लत हैं। हम् कज़िन हें। येसही नहि हैं। समाज, परिवार। सभीमना करते हें। मगर हम् दोनों जानते हें कि हम् क्याँ चाहते हें। मे तुम्हारी आँखों मे येदेख सकता हूं। जिसतरह सें तुम् मुझे देखती हौ, मे उसे महसूस कर सकता हूं। चलो, अपनी चाहत कों स्वीकार कर लेते हें। चलो, इससे लड़ना छोड़ देते हें। इसकेबाद जौ भि होगा.उसे हम् क़िस्मत पऱ छोड़ देंगे। ”
वो हैरान रहगईं, हैरानी सें उनके होंठखुल गए। उन्होंने कुछ कहने केँ लिए अपना मुँह खोला, मगर इससे पहले कि वो कुछकह पातीं, मैंने उन्हें कसकरगले लगा लिया।
मेरी बाहें उनके तौलिए सें ढके जिस्म केँ चारों ओर लिपटगईं, औऱ उनके रसीले, भीगे बूब्ज़ मेरे सीने सें ज़ोर सें दबगए। कपड़े केँ आर-पार उनके निप्पल मुझेचुभ रहे थें। मैंने अपना चेहरा उनकी गर्दन मे छिपा लिया, औऱ उनकी ताज़ा, नशीली गंध कों साँसों मे भर लिया। उनकादिल मेरेदिल केँ संग ज़ोरों सें धड़करहा थां। मेरेहाथ उनकीपीठ पर्र घूमने लगे, औऱ उनकी चिकनी, भीगी त्वचा कों महसूस करनेलगे। मे अपनी बाहों मे उनकेबदन कों काँपते हुए महसूस कर सकता थां—एक् तरफ़ विरोध औऱ दूसरी तरफ़ समर्पण केँ बीच फँसाहुआ।
मैंने औऱ इंतजार नहि किया।
मैंने उनके चेहरे कों अपने हाथों मे थामा औऱ एक् भूखी, बेताब चुंबन केँ लिए अपने होंठ उनके होंठों सें मिलादिए। शुरुआत मे, वो हिचकिचाईं—उनके होंठ कड़ेरहे, औऱ उनकेहाथ हल्के सें मेरे सीने कों पीछे धकेलरहे थें। मगर मे उन्हें चूमता रहा, उनके निचले होंठ कों चूसता रहा, औऱ अपनीजीभ सें उसे छेड़ता रहा।
कुछ हि सेकंड बाद, उनके अंदरकुछ टूट गय़ा।
उन्होंने मेरे मुँह केँ अंदर धीरे-धीरे सें एक् अहहभरी औऱ मुझे भि वापस चूमना शुरुआत कर दिया। हमारे होंठजोश सें एक् संग हिलने लगे। जल्द हि, हमारी जीभें मिल गईं—एक्-दूसरे पऱ फिसलती हुईँ, नाचती हुईँ, एक्-दूसरे कां स्वाद लेती हुइ। लारआपस मे मिल गई, औऱ वो चुंबन औऱ भि अधिक बेकाबू औऱ गहरा होता गय़ा। हमारे चुंबन कि गीली आवाज़ों सें रूमभर गय़ा। उनकेहाथ ऊपर मेरे बालों मे चलेगए, औऱ उन्होंने मुझे औऱ भि लगभग खींचते हुए मेरे बालों कों कसकर पकड़ लिया।
मेरेहाथ लालच सें उनकेबदन कों टटोलने लगे। मैंने अपनी उंगलियाँ उसकीपीठ पर्र फिराईं, उसकी कोमलकमर कों दबाया, फिन नीचे झुककर तौलिए केँ ऊपर सें उसके भरे-भरे, रसदार नितंबों कों पकड़ लिया। मैंने उन्हें ज़ोर सें मसला, उसकी जांघों कों अपने उत्तेजित लिंग सें सटा लिया। जैसे हि मैंने अपने कड़े लिंग कों उसकेबदन सें रगड़ा, वो चुंबन केँ बीच हांफने लगी।
मैंने उसे औऱ गहराई सें चूमा, उसकीजीभ चूसी, उसके होंठों कों काटा, उसकी योनि कों तीव्र भूख सें निगल लिया। उसकी साँसें तेज़ हौ रहीथीं। उसकाबदन मेरेबदन सें पिघलरहा थां। मे महसूस कर सकता थां कि उसके सख्त निप्पल मेरे सीने सें रगड़रहे थें, जैसे हम् भूखे प्रेमियों कि तरह एक्-दूसरे कों चूमरहे हों।
जुनून बेकाबू थां। मेरेहाथ अपने आप् हि चलनेलगे। उसे अभि भि गहरे चुंबन देतेहुए, मैंने उसके तौलिए कां किनारा खींचा। वो आरामसे ढीलाहुआ। कपड़ा धीरे धीरे नीचे सरका, जिससे उसके भारी स्तनों कां ऊपरी हिस्सा, फिन उसके गहरे, उभरेहुए निप्पल, औऱ आखिर मे उसकी कोमल, सुडौल कमर दिखाई दि।
तौलिया उसकीकमर पऱ ढीला लटकाहुआ थां, जब मैंने उसके नंगे कूल्हों कों ज़ोर सें दबाया; मेरी उंगलियाँ उसकी कोमल मांसल त्वचा मे धंसगईं। वो मेरे मुँह मे ज़ोर सें कराहउठी। फिन मेराहाथ उसकी जांघों केँ बीच सरका औऱ उसकी बालों वाली योनि कों छू गय़ा।
जिससमय मेरी उंगलियाँ उसके गीले, गरम योनि-होठों सें टकराईं—जौ कोमल बालों सें ढके थें—सलोनी दिदी एकदम सें जमगईं।
उसकी आँखें अचानक खुलगईं। पलक झपकते हि, उसने मुझे ज़ोर सें पीछे धकेला; उसके चेहरे पऱ हैरानी औऱ क्रोध साफ़झलक रहा थां।
थप्पड़!
मेरेगाल पऱ एक् ज़ोरदार, जलन पैदा करने वाला थप्पड़ पड़ा; उसकी गूँज पूरे कमरे मे फैल गई। मेरा चेहरा जलउठा।
उसने तेज़ी सें नीचे गिरते हुए तौलिए कों पकड़ा औऱ अपने नंगे जिस्म पर्र कसकर लपेट लिया; उसका सीना गुस्से औऱ लज्जा सें तेज़ी सें ऊपर-नीचे होँ रहा थां।
"निकलजाओ!" वो कांपती हुईँ आवाज़ मे चिल्लाई। "अभि इसी वक्त कमरे सें बाहर् निकलजाओ!"
उसकी आँखें नम थीं—उनमें कामुकता, पछतावा औऱ क्रोध—सभी कुछ मिला-जुला थां। मे वहा हक्का-बक्का खड़ारहा; मेरागाल दर्द सें फड़करहा थां औऱ मेरा लिंग अभि भि दर्दनाक रूप सें कड़ा थां—मगर जोँ कुछ अभि-अभि हुआ थां, उसकी कड़वी सच्चाई अचानक मुझ पर्र हावी हौ गई।
मे बिनाकुछ कहे, मुड़ा औऱ कमरे सें बाहर् निकल गय़ा।
मे गुस्से औऱ उलझन सें भराहुआ थां। मेरामन भावनाओं कां एक् तूफ़ान बन चुका थां—ख़्वाहिश, अस्वीकृति, क्रोध औऱ लज्जा। मे उसका चेहरा नहि देख्ना चाहता थां। कुछदेर बाद, वो एक् हसीन गुलाबी सलवार-कमीज़ पहनकर बाहर् आई; वो बेहद शालीन औऱ हसीनलग रही थि—मगर मैंने उसकी तरफ़ बिल्कुल भि नहि देखा।
हम् दोनों चुपचाप रेडीहुए औऱ कॉलेज केँ लिए निकल पड़े। कॉलेज तक कां वो सफ़र बेहद अजीब औऱ असहज थां। हम् दोनों मे सें किसी नें भि एक् शब्द नहि कहा। हमारे बीच कां तनाव पहले सें कहीं अधिक गहरा हौ चुका थां। जब हम् कॉलेज पहुँचे, तौ हमने एक्-दूसरे कि तरफ़ देखे बिना हि अपने रास्ते बदललिए औऱ अपनी-अपनी क्लास कि तरफ़चल दिए।
दिन कि शुरुआत तोँ एक् जलतेहुए जुनून केँ संग हुईँ थि, मगर उसकाअंत एक् ठंडी, खामोशी मे हुआ।
जैसे हि मे क्लासरूम मे दाख़िल हुआ, मैंने देखा कि मेरे साथी—रोहन, कबीर औऱ अंशुल—पहले सें हि पीछे वाली बेंच पऱ बैठेहुए थें औऱ अपनी रोज़ाना वाली मज़ाक-मस्ती मे लगेहुए थें। रोहन, प्रोफ़ेसर केँ अजीब सें हेयरकट पर्र कोई बेतुका सां मज़ाक कररहा थां, जिसे सुनकर बाकी दोनों ज़ोर-ज़ोर सें हँसरहे थें। मैंने ज़बरदस्ती मुस्कुराया औऱ उनकेसंग शामिल होँ गय़ा, मे उनकेबीच घुल-मिल जानां चाहता थां औऱ अपने भारीमन कों हल्का करना चाहता थां।
“हे दोस्तों, ” मैंने कहा, औऱ उनकेसंग मुट्ठी टकराई।
उन्होंने बड़े उत्साह सें मेरा स्वागत किया। कुछ मिनटों तक, मैंने उनके मज़ाकों औऱ आम बातचीत मे स्वयं कों डुबोने कि कोशिश कि; मे उनकेसंग हँस भि रहा थां, जबकि मेरामन कहीं औऱ हि थां। आज सुभह सलोनी दिदी कां वो थप्पड़ मेरे दिमाग़ मे बार-बार घूमरहा थां। बदन पऱ अब उसका दर्द ज्यादा महसूस नहि होँ रहा थां, मगरमन मे उसने बहोत बड़ी उथल-पुथल मचा दि थि। मे सोचता रहा — क्याँ मैंने हदपार कर दि थि? क्याँ ये उसकी योनि पर्र अचानक हुआ स्पर्श थां? याँ फिनबात कुछ औऱ हि गहरी थि? अपराध-बोध औऱ उलझन मेरा पीछा छोड़ने कों रेडी हि नहि थें।
जल्द हि प्रोफ़ेसर क्लास मे आए, औऱ सभी अपनी-अपनी सीटों कि ओर भागे। रोहन जाकर अपनी गर्लफ्रेंड अवनी केँ संगबैठ गय़ा। कबीर औऱ अंशुल एक् संग बैठे। मे एक् कोने वालीसीट पर्र अकेला रह गय़ा। तभी आकांक्षा मेरेपास आकर खड़ी हौ गई।
वो प्रेम सें मुस्कुराई। “हे, क्याँ मे यहाबैठ सकती हूं?”
मैंने भि मुस्कुराते हुए जवाब दिया। “हाँ, बिल्कुल। ”
वो मेरेबगल मे बैठ गई औऱ फुसफुसाते हुए बोलीं, “कल मेरे कमरे मे उस ‘एजुकेशन सेशन’ केँ लिए तुम्हारा धन्यवाद। तुमने मुझेउन बातों कों समझने मे सचमुच बहोत सहायता कि। मे तुम्हारी बहोत शुक्रगुज़ार हूं। ”
मैंने नरमी सें सिर हिलाया। पूरी क्लास केँ दौरान, हम् संग बैठेरहे। मेरे अंदर एक् हल्का सां तनाव थां — सलोनी दिदी केँ संग सुभह हुइ घटना अभि भि एक् काले बादल कि तरह मेरेमन पऱ छाई हुईँ थि, मगर आकांक्षा कि शांत औऱ दोस्ताना मौजूदगी नें किसीतरह माहौल कों हल्का औऱ ज्यादा सहजबना दिया थां।
उसदिन करीब-करीब हर क्लास मे मे औऱ आकांक्षा संग हि बैठे। लेक्चर केँ बीच हम् बातें करतेरहे — असाइनमेंट, प्रोफेसर औऱ कॉलेज कि इधर-उधर कि बातों पर्र छोटी-मोटी बातचीत। उसकी हंसी बहोत प्यारी औऱ दिलकश थि, औऱ उसके सुनने कां अंदाज़ ऐसा थां कि मुझे लगता थां कि वो मेरीबात सचमुच सुनरही हैं।
कैंटीन ब्रेक केँ दौरान, हमारा पूरा ग्रुप संग थां। आकांक्षा हमारे ग्रुप केँ लिएकोई नई नहि थि, क्योंकि वो पहले सें हि अवनी (रोहन कि गर्लफ्रेंड) कि मित्र थि। हम् सभी एक् बड़ी मेज़ पर्र बैठे, खाते-पीते औऱ मज़ाक-मस्ती करतेरहे। फिरभी मे भि बातचीत मे हिस्सा लें रहा थां, मगर सलोनी दिदी केँ थप्पड़ कि याद मुझे बार-बार खामोशी कि ओर खींचरही थि।
क्लास ख़त्म होने केँ बाद, रोहन नें सुझाव दिया कि हम् सभी मिलकर कोई फिल्म देखने चलें। वो साफ़तौर पर्र अवनी केँ संग औऱ ज्यादा वक़्त बिताना चाहता थां, औऱ चूंकि आकांक्षा भि उसकेसंग आँ रही थि, इसलिये उसने ज़ोर देकरकहा कि मे भि उनकेसंग चलूं।
मे झिझका। "दोस्त, आज मेरामूड नहि हैं। "
मगर रोहन अपनी ज़िद पर्र अड़ारहा। "अरे, बोर मतबनो। चलो नां। बहोत मजा आएगा। "
आखिरकार मे मान गय़ा। हम् सबनेऑटो लिया औऱ 'बरेली कि बर्फी' फिल्म देखने केँ लिए थिएटर पहुंच गए।
पूरी प्लानिंग औऱ सफ़र केँ दौरान, मेरा ध्यान बार-बार आकांक्षा कि तरफ़चला जाता थां। वो ऑटो मे मेरे बिल्कुल पास बैठी थि, औऱ कभी-कभी उसका कंधा मेरे कंधे सें छू जाता थां। हमारे बीच एक् स्वाभाविक औऱ सहज तालमेल थां — हल्की-फुल्की छेड़छाड़, आरामदायक खामोशियां औऱ एक्-दूसरे कों चोरी-छिपे देख्ना। उसके अंदर एक् ऐसी गर्मजोशी भरी ऊर्जा थि, जिसने आरामसे मुझे मेरे अंदरचल रहे तूफ़ान सें बाहर् निकालना शुरुआत कर दिया। फिर भी सलोनी दिदी केँ संग सुभह हुई घटना कि याद अभि भि ताज़ा थि, मगर आकांक्षा कि मौजूदगी मुझे एक् चैन देने वाले भटकाव कि तरह महसूस हौ रही थि।
सीटों कां इंतज़ाम कुछइस तरहहुआ: रोहन औऱ अवनी कोने वाली सीटों पर्र बैठे (साफ़तौर पऱ उन्हें अपनी प्राइवेसी चाहिए थि), उनकेबाद आकांक्षा औऱ फिन मे। मैंने सलोनी दिदी कों एक् बार भि मैसेज नहि किया थां। फिल्म शुरुआत हुइ, औऱ रोहन-अवनी एक् प्यारे कपल कि तरह अपने मे हि व्यस्त हौ गए — आपस मे फुसफुसाते हुए, एक्-दूसरे कां हाथ थामेहुए औऱ अंधेरे मे चोरी-छिपे एक्-दूसरे कों किस करतेहुए।
आकांक्षा मेरेबगल मे बड़े धीरे-धीरे बैठी थि। उसने अपनेलिए पॉपकॉर्न नहि लिया। इसके बजाय, वो बार-बार मेरे पॉपकॉर्न मे हाथडाल रही थि। हमारे हाथकई बार एक्-दूसरे सें टकराए — हल्के, अनजाने स्पर्श जौ ज़रूरत सें एक् समय ज्यादा देर तक ठहरेरहे। एक् समयऐसा भि आया, जब फ़िल्म कां कोई मज़ेदार सीन देखकर हँसते हुए उसने धीरे-धीरे सें अपनाहाथ मेरेहाथ पऱ रख दिया। वो फ़िल्म कां पूरामजा लें रही थि, खुलकर हँसरही थि, औऱ सीट पर्र आहिस्ता बैठी हुईँ थि। वो सचमुच बहोत खुश औऱ मेरी संगत मे काफ़ी सहजलग रही थि। उसकी हँसी, अंधेरे थिएटर कि रोशनी मे उसकी आँखों कि चमक, औऱ उसका बेफ़िक्र स्वभाव — इन सबने मिलकर उससाम कों औऱ भि हल्का-फुल्का बना दिया।
फ़िल्म समाप्त होने केँ बाद, हम् सभीपास केँ हि एक् रेस्टोरेंट मे डिनर केँ लिएगए। मे ज़्यादातर चुप हि रहा, क्योंकि सुभह पड़े थप्पड़ कां असर अभि भि मुझ पऱ थां; मगर बाकी तीनों — रोहन, अवनी औऱ आकांक्षा — आपस मे मज़ाक-मस्ती कररहे थें औऱ खूब एन्जॉय कररहे थें। वहा कां माहौल पूरीतरह सें हँसी-मज़ाक सें भराहुआ थां। आखिर मे बिल मैंने हि दिया।
फिन रोहन नें मुझसे कहा, "दोस्त, क्याँ तुम् आकांक्षा कों उसके कमरे तक छोड़ दोगे? मे तोँ अवनी केँ संगजा रहा हूं। "
मे मान गय़ा। वापस लौटते वक्तऑटो मे, आकांक्षा नें मुझसे फ़िल्म केँ बारे मे पूछा। मैंने उसे ठीक-ठाक औऱ तहज़ीब सें जवाबदिए, मगर मेरामन अभि भि कहीं औऱ हि उलझाहुआ थां। जब हम् उसके कमरे केँ पास पहुँचे, तौ उसने मुझे अंदरआने केँ लिएकहा।
शुरुआत मे तोँ मैंने मनाकर दिया। "काफ़ी देर हौ चुकी हैं। "
मगर उसने बड़े हि चुलबुले अंदाज़ मे ज़िद कि। "अरे, बस थोड़ी देर केँ लिए। आँ जाओ नाँ। "
आखिरकार मे मान गय़ा औऱ उसकेसंग अंदरचला गय़ा।
हम् उसके कमरे मे दाखिल हुए। मे पलंग पर्र बैठ गय़ा, जबकि वो कपड़े बदलने चली गई। वो एक् लंबी, ढीली-ढाली शर्ट पहनकर वापसआई, जौ उसकी जांघों तक पहुँच रही थि—साफ़ ज़ाहिर थां कि उसने उसके नीचेकुछ नहि पहना थां। ये नज़ारा बेहदसहज औऱ अंतरंग थां। वो हम् दोनों केँ लिए आइसक्रीम लेँ आई। हम् संग बैठकर उसके लैपटॉप पऱ क्रिकेट मैच देखने लगे; हम् मैच कां लुत्फ़ उठारहे थें औऱ खातेहुए हि आपस मे हल्की-फुल्की बातें कररहे थें।
करीब-करीब एक् घंटेबाद, मैच समाप्त हौ गय़ा। हमारी बातचीत आहिस्ता कॉलेज केँ शुरुआती दिनों कि तरफ़ मुड़ गई।
मैंने सबसे पहले अपनीबात शुरुआत कि। “जानती हौ, शुरुआत मे मे हॉस्टल मे काफ़ी अकेला महसूस करता थां। आरामसे मेरे साथीबने। पहले EEE ब्रांच केँ 4 लड़कों सें दोस्ती हुई, फिन EE ब्रांच केँ 3 लड़कों सें जान-पहचान बढ़ी—इस तरह हमारा 7 लोगों कां एक् ग्रुप बन गय़ा। हॉस्टल कि वोँ रातें तोँ कमाल कि होती थीं—देर रात तक मैगी खानां, गपशप करना, पूरे कैंपस मे घूमना-फिरना। अब तोँ उनमें सें ज़्यादातर लोग हॉस्टल छोड़कर जा चुके हें, इसलिये अबसभी कुछकुछ अलग-सां लगता हैं। ”
मैंने श्रेया कां ज़िक्र भि किया। “शुरुआती दिनों मे, मुझे श्रेया बहोत पसन्द थि। औऱ वो भि मुझे पसन्द करती थि। हमनेसंग मे काफ़ी अच्छा समय बिताया, मगरबाद मे मुझे एहसास हुआ कि अभि प्रेम-इश्क मेरेबस कि बात नहि हैं। एक् सच्चे औऱ पक्के रिश्ते कि जोँ माँगें होती हें, उन्हें मे पूरा नहि कर सकता थां। ”
आकांक्षा चुपचाप मेरी बातें सुनती रही, औऱ फिन उसने अपनीबात कही।
वो बहोत हि धीमी आवाज़ मे बोलीं—उसकी आवाज़ मे एक् अजीब-सि भावुकता घुल गई थि। “मेरे माँ-बाप बहोत हि सख़्त मिज़ाज केँ हें। उन्होंने मुझेकभी कोई आज़ादी नहि दि। जब मे कॉलेज आई, तौ मेरीबस यही चाहत थि कि मे खुलकर साँस लें सकूँ, अपनी ज़िंदगी कों जी सकूँ। कॉलेज केँ पहले हि दिन, ओरिएंटेशन केँ दौरान मेरी नज़र तुम् पऱ पड़ी। तुम्हारी कोईबात मुझे अपनी तरफ़ खींचरही थि। मैंने तुमसे बात करने कि कईबार कोशिश कि—कभी केमिस्ट्री लैब मे, तौ कभी ग्रुप प्रोजेक्ट्स केँ दौरान—मगर तुम् हमेशा श्रेया केँ संग हि व्यस्त रहते थें। ”
उसकी आँखें थोड़ी नम होँ गईं, औऱ वो आगे बोलीं, “येबात मैंने आज तक किसी कों नहि बताई। तुम्हें उसकेसंग देखकर मुझेदुख तौ होता थां, मगर मुझे उससेकभी नफ़रत नहि हुई। बस। मे तुम्हें दूर सें हि पसन्द करतीरही। ”
पूरा माहौल भावनाओं सें भर गय़ा—एक् अजीब-सि गंभीरता छा गई। हम् दोनों हि उस लम्हा मे स्वयं कों बेहद संवेदनशील औऱ भावुक महसूस कररहे थें। सालों सें दिल मे दबी हुईँ अनकही भावनाएँ, सख़्त परवरिश कां दबाव, जवानी कि दहलीज पऱ खड़ी ज़िंदगी कि उलझनें, औऱ किसी अपने सें जुड़ने कि इंसान कि बुनियादी ज़रूरत—यह सारी भावनाएँ उस लम्हा हमारे बीच खुलकर सामने आँ गईं।
आरामसे, बिना किसी पहले सें बनी योजना केँ, हम् एक्-दूसरे कि तरफ़ झुकते चलेगए। हमारे होंठ एक्-दूसरे सें मिले—एक् बेहद गहरे औऱ भावुक चुंबन मे। इस चुंबन केँ पीछे न् तोँ कोईहवस थि, औऱ न् हि कोई शारीरिक वासना—ये वैसा बिल्कुल नहि थां, जैसा सलोनी दिदी केँ संगहुआ थां। येकिस बहोत हि नरम, कोमल औऱ सालों सें दबी भावनाओं सें भराहुआ थां — होठों कां हल्का सां चूसना, धीमी हलचल औऱ शांत साँसें। हमने करीब 10 मिनट तक किस किया, औऱ एक्-दूसरे मे अपनी भावनाएँ उड़ेल दीं।
जब आखिरकार हमनेकिस तोड़ा, तोँ एक् लम्हा केँ लिए अजीब सि खामोशी छा गई। हमने एक्-दूसरे कि तरफ देखा, औऱ फिन शरमाते हुए मुस्कुराए।
मैंने धीरे-धीरे सें कहा, “अब मुझे चलना चाहिए। ”
उसने एक् प्यारी सि मुस्कान केँ संगसिर हिलाया। “अपना ख्याल रखना। ”
उस मुश्किल भरेदिन केँ बावजूद, जब मे उसके कमरे सें निकला, तौ मुझे अपने अंदर एक् अजीब सि हल्कापन औऱ खुशी महसूस होँ रही थि।
आकांक्षा केँ संगउस सुंदर औऱ भावुक मुलाकात केँ बाद, मे अपने कमरे कि तरफजा रहा थां औऱ मेरेदिल मे एक् अजीब सां हल्कापन थां। मेरे होठों पऱ एक् हल्की सि मुस्कान थिरकरही थि। मे सचमुच बहोत खुश थां औऱ मन हि मन रोहन कां धन्यवाद अदाकर रहा थां कि उसने मुझे ज़बरदस्ती मूवी प्लान मे शामिल होने केँ लिए मनाया थां। मेरामन बार-बार यहीसोच रहा थां — काश मैंने श्रेया पऱ अपना वक़्त बर्बाद करने केँ बजाय, शुरुआत सें हि आकांक्षा केँ संग अपने रिश्ते कि शुरुआत कि होती? वो कितनी प्यारी औऱ अपनेपन सें भरी हुइ लगती थि; उससे जुड़ना कितना आसान थां।
जब मे दरवाज़े पऱ पहुंचा, तोँ रात केँ करीब 8 बजरहे थें। मैंने कुछबार द्वार (दरवाज़ा) खटखटाया। कुछ मिनटों बाद, सलोनी दिदी नें द्वार (दरवाज़ा) खोला। हमारी नज़रें एक् समय केँ लिए मिलीं। उसने अपनी रोज़ाना वाली हल्की नीली सलवार-कमीज़ पहनी हुइ थि; वो सादी होने केँ बावजूद बहोत हसीनलग रही थि। मगर सुभह पड़ेउस थप्पड़ केँ बाद, मुझे उसकीतरफ देखने मे कोई दिलचस्पी नहि थि। मैंने बिनाकुछ कहे, बस उसे नज़रअंदाज़ करतेहुए, सीधे कमरे मे प्रवेश कर लिया।
मे अपने कपड़ों मे हि पलंग पऱ लेट गय़ा औऱ छत कों घूरने लगा। सलोनी दिदी जल्दी कमरे मे नहि आईं। मे बाहर् सें उनकेकाम करने कि आवाज़ें सुन सकता थां — बर्तन धोना, इधर-उधर घूमना। मुझेकोई परवाह नहि थि। मेरामन उनसे सामना करने कां बिल्कुल नहि थां।
कुछदेर बाद, वो दरवाज़े पऱ आकर खड़ी होँ गईं। “खानां सजधजकर हैं। आओ औऱ खालो। ”
“मुझेभूख नहि हैं, ” मैंने रूखेपन सें जवाब दिया। “तुम् खालो। ”
वो एक् मिनट तक चुपचाप वहीं खड़ी रहीं, औऱ फिनचली गईं। कुछ मिनटों बाद, वो एक् थाली लेकर वापसआईं, जिसमें रोटियाँ औऱ भिंडी कि सब्ज़ी थि। वो पलंग केँ पासआईं औऱ उसके किनारे पर्र बैठगईं; वो मुझे ज़बरदस्ती खिलाने कि कोशिश कररही थीं।
“कम सें कम थोडा सां तोँ खालो, ” उन्होंने धीरे-धीरे सें कहा।
मैंने विरोध किया औऱ अपना चेहरा दूसरी तरफफेर लिया। मगर वो ज़ोर देती रहीं औऱ रोटी कों मेरे मुँह केँ औऱ लगभग लेँ आईं। मेरा क्रोध बढ़ता हि गय़ा, औऱ आखिरकार मेरा सब्रटूट गय़ा। “आखिर तुम् चाहती क्याँ होँ, दिदी?!” मे चिल्ला पड़ा। “तुम् इतना अजीब व्यवहार क्यूं कररही होँ? तुम् मुझेयहा विलेन बनने पऱ मजबूर क्यूं कररही होँ? ये सिर्फ़ मेरी गलती नहि हैं! इस कमरे मे मेरेसंग रहने कां फ़ैसला तुम्हारा थां। अब हम् बड़े होँ चुके हें। तुम् चारपाई पऱ सो सकती थि, मगर तुमने हररात मेरेबगल मे सोना चुना। जब हमारे बीच नज़दीकियां बढ़ने लगीं, तोँ मैंने दूरी बनाए रखने कि कोशिश कि, मगर तुम् औऱ भि ज्यादा मेरे लगभग आँ गईं। औऱ सुभह, नहाने केँ बाद, तुम् सिर्फ़ एक् तौलिए मे मेरे सामने आँ गईं, औऱ मुझे देखकर ऐसे मुस्कुरा रहीथीं, जैसे तुम्हें पता हि नं हौ कि तुम् क्याँ कररही होँ। औऱ फिन अचानक तुम् एकदम भोली बनने कां नाटक करती हौ औऱ मुझेकोई incestuous राक्षस जैसा दिखाने लगती होँ!”
मे रुक गय़ा, औऱ ज़ोर-ज़ोर सें साँस लेनेलगा।
सलोनी दिदी कि आँख सें एक् आँसू लुढ़क आया। वो दुखी औऱ कमज़ोर लगरही थीं। उनके आँसू देखकर मेरा क्रोध थोडा शांत हौ गय़ा। उन्होंने रोटीफिन सें मेरे मुँह केँ पासलाई। इसबार मैंने उनकेहाथ सें आहिस्ता खाया। वो मुझे एक्-एक् निवाला खिलाने लगीं।
"तुम्हें पता हैं, मे तुम्हें उतना हि पसन्द करती हूं जितना तुम् मुझे, " उन्होंने काँपती हुइ आवाज़ मे कहा, उनकी आँखों सें आँसूबह रहे थें। "मे भि वहीसभी चाहती हूं। मुझे तुम्हारी बहोत ज्यादा चाहत हैं। मगर मे स्वयं कों उस अंतिम हद कों पार करने सें रोकने कि कोशिश कररही थि। इसीलिए मैंने तुम्हें थप्पड़ मारा। क्योंकि मुझेपता थां कि अगर तुम् नहि रुकते, तोँ मे स्वयं कों रोक नहि पाती। "
हम् दोनों हि भावुक होँ गए। क्रोध पिघलकर कुछनरम एहसास मे बदल गय़ा। हम् एक् हि थाली सें एक्-दूसरे कों खिलाते रहे — एक् निवाला मेरेलिए, एक् उनकेलिए। पूरा माहौल भावनाओं, खामोश आँसुओं औऱ सालों सें दबी हुई फीलिंग्स सें भराहुआ थां। रूम छोटा औऱ अधिकगरम महसूस होनेलगा।
जब हमारा खानां समाप्त हौ गय़ा, तोँ उनका फ़ोनबजा। उनकी मां कां फ़ोन थां।
"तुम् फ़ोनउठा लो, " मैंने कहा। "मे बर्तन धो देता हूं। "
उन्होंने सिर हिलाया औऱ फ़ोनउठा लिया, जबकि मे सफाई करनेचला गय़ा।
बाद मे, मे बालकनी मे खड़ारात केँ आसमान कों देखरहा थां। सलोनी दिदी आईं औऱ मेरेबगल मे खड़ी होँ गईं। उन्होंने धीरे-धीरे सें रेलिंग पऱ रखे मेरेहाथ पऱ अपनाहाथ रख दिया।
"हम् जानते हें कि हम् एक्-दूसरे कों मनपसंद करते हें, " उन्होंने फुसफुसाते हुएकहा, उनकी आवाज़ भर्रा गई थि। "मे तुम्हारे संग खुशी-खुशी रहना चाहती हूं। मगर मुझे इसके अंजाम सें बहोत डर लगता हैं। "
उनके गालों सें फिन सें आँसू बहनेलगे। मे मुड़ा औऱ उन्हें कसकरगले लगा लिया। उनकाबदन मेरे जिस्म सें सटकर काँपरहा थां।
"कोईबात नहि, " मैंने उनकीपीठ सहलाते हुए फुसफुसाया। "हमेंकुछ भि करने कि ज़रूरत नहि हैं। हम् रुक सकते हें। आओ, आरामकरो। "
मे उन्हें कमरे केँ अंदर लेँ गय़ा, द्वार (दरवाज़ा) बंद किया औऱ उन्हें पलंग पऱ बिठा दिया।
वे दोनों एक् गहरी खामोशी मे बैठेरहे, जोँ उन्हें हमेशा केँ लिए खिंचती हुईँ महसूस हुईँ। कमरे मे सिर्फ़ घड़ी कि हल्की टिक-टिक औऱ उनकी तेज़-तेज़ चलती साँसों कि आवाज़ आँ रही थि। सलोनी दिदी धीरे-धीरे सें खाट पऱ मेरे औऱ लगभगसरक आईं, उनकीनरम जाँघें मेरी जाँघों सें छूगईं। जब उन्होंने अपनाहाथ मेरेहाथ पर्र रखा, तोँ उनकी उंगलियाँ काँपरही थीं; उन्होंने मेरेहाथ कों धीरे-धीरे सें, करीब-करीब बेताबी सें दबाया — मानोअगर उन्होंने मेराहाथ छोड़ दिया, तोँ मे कहीं गायब हि हौ जाऊँगा। रोने सें अभि भि लाल औऱ नम उसकी आँखें मेरी आँखों मे टिकगईं। उसके घुंघराले बालों कि लटें उसकेलाल चेहरे पऱ बिखरी हुइ थीं, मगर वो पहलेकभी इतनी सुंदर नहि दिखी थि—कच्ची, बेबस औऱ दर्द सें भरी हुई। उस लम्हा, मानो उसने अपने चारों ओर जौ भि दीवारें खड़ी कि थीं, वे ढहगईं।
“मे तुम्हें मनपसंद करती हूं, ” उसने फुसफुसाते हुएकहा, उसकी आवाज़ भावनाओं सें काँपरही थि। “हे ईश्वर, मे तुम्हें चाहती हूं… जिंदगी मे मैंने कभी किसी चीज़ कों इतना बेताब नहि चाहा। ”
उसकीये स्वीकारोक्ति हवा मे गहरी औऱ भारी सि गूंजरही थि। इससे पहले कि मे कुछकह पाता, उसने अपनी उंगलियाँ मेरे बालों मे डालीं, उन्हें कसकर पकड़ा औऱ मुझे अपनीओर खींच लिया। उसकी साँसें मेरे होठों पर्र गरम औऱ काँपती हुई महसूस होँ रहीथीं। मे एक् समय केँ लिए झिझका, मगर उसकी आँखों कि भूख नें मुझे अपनीओर खींच लिया।
हमारे होंठ मिले।
शुरुआत मे, ये कोमल थां—करीब नाजुक। उसकेभरे हुए, गरम होंठ एक् हल्की सि कंपकंपी केँ संग मेरे होठों सें दबगए, जिनमें उसके पहले केँ आँसुओं कां हल्का सां नमकीन स्वाद थां। मगर वो कोमलता अधिकदेर तक नहि रही। उसकेगले सें एक् गहरी, बेताब सि आवाज़ निकली जब उसने अपनासिर झुकाया औऱ मुझे औऱ ज़ोर सें चूमा। उसके होंठ खुले औऱ उसकीजीभ मेरे मुँह मे घुस गई, मेरीजीभ कों तीव्र, गीलीभूख सें ढूँढ़ रही थि।
चुंबन जल्द हि गंदा औऱ बेताब होँ गय़ा।
हमारी जीभें मिलीं औऱ बेशर्मी सें उलझगईं, एक् दूसरे पऱ फिसलती औऱ सहलाती हुईँ एक् गरम, चिकनी नृत्य कि तरह। उसका स्वाद मीठा औऱ गरम थां, उसकीलार मेरीलार मे मिलरही थि जैसे-जैसे चुंबन औऱ गंदा, गीला औऱ अश्लील होता गय़ा। कमरे मे नरम, गीली चूमने कि आवाज़ें गूँज उठीं जैसे हम् एक् दूसरे कों खारहे थें। उसने मेरे निचले होंठ कों चूसा, फिन अपनीजीभ कों औऱ अंदर तक धकेल दिया, मेरे मुँह कों ऐसे टटोलरही थि जैसे वो मेरेलिए भूखी हौ। मे उसकी कच्ची भावनाओं सें काँपती हुइ महसूस कर सकता थां - डर, राहत औऱ बेकाबू वासना सभी एक् संग टकरारही थीं।
मैंने भि उतनी हि भूख सें जवाब दिया, उसकेसिर केँ पिछले हिस्से कों थाम लिया औऱ उसकीपीठ कों ज़ोर सें चूमा। हमारी साँसें गरम औऱ उखड़ी हुईँ थीं। लार हमारी ठुड्डी सें टपकरही थि जैसे-जैसे चुंबन बेकाबू औऱ जोशीला होता गय़ा। उसने मेरे मुंह मे सिसकी भरी, एक् बेबस, टूटी हुईँ आवाज़ जिसने मेरे लिंग मे खून कां प्रवाह बढ़ा दिया। उसकाबदन औऱ लगभग आँ गय़ा, उसके कोमल बूब्ज़ कपड़ों केँ ऊपर सें मेरी छाती सें छूरहे थें, उसके निप्पल पहले सें हि कड़े औऱ ध्यान पाने केँ लिए बेताब थें।
उसने मुझेऐसे चूमा, जैसेकोई ऐसी महिला होँ जिसने सालों सें स्वयं कों रोकरखा होँ — जैसे कि ज़िंदा महसूस करने कां ये उसका एकमात्र मौका होँ। उसकी ज़बान कां हर स्पर्श, मेरे होंठों पऱ हर हल्की-सि काट, उसके होंठों कां हर बेताब दबाव चीख-चीखकर कहरहा थां कि उसे इसकी कितनी ज़रूरत थि। मेरी कितनी ज़रूरत थि।
मगर अचानक, मेरेमन मे शक कि एक् लहरउठी।
मे थोडा पीछेहटा, औऱ ज़ोर-ज़ोर सें साँस लेनेलगा। "क्याँ तुम् सच मे ये चाहती हौ, दिदी?" मैंने पूछा; मेरी आवाज़ धीमी औऱ गंभीर थि, औऱ मे उसकी आँखों मे जवाब ढूँढ़ रहा थां।
शब्दों मे जवाब देने केँ बजाय, सलोनी कि आँखें वासना सें भर उठीं। उसने मुझे ज़ोर सें धक्का दिया। मे एक् हल्की सि आवाज़ केँ संग पलंग पऱ गिर पड़ा। काँपते हाथों सें वो उठी औऱ जल्द सें अपनी सलवार खोल दि। कपड़ा उसकी चिकनी टांगों सें नीचेसरक गय़ा, जिससे उसकी मलाई जैसी जांघें औऱ उसकी सादी काली पैंटी दिखाई देनेलगी, जौ उसकी उत्तेजना सें पहले हि गीली हौ चुकी थि। उसने अपनी कमीज़ पूरीतरह सें उतारने कि ज़हमत भि नहि उठाई - उसनेबस उसे थोडा ऊपर खींच लिया, जिससे उसका कोमलपेट औऱ ज्यादा दिखाई देनेलगा, फिन वो जल्दबाज़ी मे, करीब बेकाबू होकर मेरेऊपर चढ़ गई।
मेरीकमर पर्र बैठकर, वो नीचे झुकी औऱ मेरे होंठों कों एक् बारफिन पहले सें कहीं अधिक आक्रामक चुंबन सें चूम लिया। इस बारकोई झिझक नहि थि। उसने अपनीगरम, गीली योनि कों मेरी पैंट मे उभररहे उभार सें रगड़ा औऱ उसकीजीभ मेरे मुँह मे वापसघुस गई। अबये चुंबन पूरीतरह सें गंदा थां - गीला, शोरगुल भरा औऱ वासना सें लबालब। वो लालच सें मेरीजीभ चूसरही थि, बेशर्मी सें आहेंभर रही थि, उसकीकमर धीरे धीरे, बेताबी सें गोल-गोल घूमरही थि, कपड़ों केँ ऊपर सें उसकी भीगी योनि मेरे कड़े लिंग सें रगड़रही थि।
जब वो मुझे पूरीतरह सें अपनेवश मे कररही थि, तोँ उसके घुंघराले बाल हमारे चारों ओर एक् पर्दे कि तरहफैल गए थें। मे उसकी जांघों केँ बीच सें निकलती गर्मी कों महसूस कर सकता थां, जिसतरह हर रगड़ केँ संग उसकी पैंटी औऱ गीली होतीजा रही थि। उसकेहाथ मेरे सीने पर्र बेताबी सें चलरहे थें, नाखून हल्के सें मेरी कमीज़ केँ ऊपर सें मुझे खरोंच रहे थें, मानो वो उसे फाड़ देना चाहती हौ।
उसने एक् लम्हा केँ लिए चुंबन तोड़ा, मेरी गर्दन पऱ हांफते हुए। उसकी आवाज़ कांपती हुईँ, कामुकता सें भरी फुसफुसाहट मे निकली, "मे दिखावा करते-करते थक गई हूं। मुझे तुम्हारे अंदर कि ज़रूरत हैं। मुझे तुम्हें अपने अंदर फैलाते हुए, मुझे भरतेहुए महसूस करने कि ज़रूरत हैं। कृपया."
उसकी कमज़ोरी उसकी आवाज़ केँ लड़खड़ाने, मेरे कंधों कों कसकर पकड़ने औऱ अस्वीकृति केँ डर औऱ तीव्र ख़्वाहिश सें कांपते उसकेबदन मे साफझलक रही थि। वो स्वयं कों पूरीतरह सें - दिल, बदन औऱ आत्मा सें - बिना किसीकवच केँ पेशकर रही थि।
मैंने उसकी सुडौल कमर कों पकड़ लिया, उसकी कोमल त्वचा कों दबाते हुएउसे अपने उत्तेजित लिंग सें औऱ कसकर नीचे खींच लिया। वो हांफउठी, फिन एक् मंद सिसकी भरी औऱ नएजोश केँ संग मुझे चूमने लगी, उसकीजीभ मेरीजीभ कों चाटरही थि औऱ चूसरही थि, जबकि उसकीकमर तेजी सें हिलरही थि, जैसे घर्षण कि तलाश मे होँ।
हमारे बीच कि हवा उसकी उत्तेजना कि खुशबू औऱ हमारे शरीरों कि गर्मी सें भरी हुईँ थि। उसकाहर चुम्बन, हर स्पर्श, औऱ उसकी भीगी बुर कां मेरे लन्ड सें हर रगड़—सभी कुछ एक् कच्ची, जज़्बाती हवस मे डूबाहुआ थां। वो सिर्फ़ कामुक हि नहि थि—बल्कि वो स्वयं कों पूरीतरह सें मेरे हवाले कररही थि।
औऱ मे वो सभीकुछ लेने केँ लिए सजधजकर थां, जौ वो मुझेदे रही थि।
उनके होंठफिन सें टकराए, भूखे औऱ जंगली जानवरों कि तरह। जीभें एक्-दूसरे कों चूसती हुईं, थूक कि मोटीधार बहाती हुईं। मैंने उसकी गरदन पऱ अपनी गीलीजीभ फिराई, लंबे-लंबे स्ट्रोक्स मे चाटा, उसकी नमकीन पसीने वाली चमड़ी कों थूक सें तरबतर कर दिया। फिन जोर सें चूसा, निशान बनादिए।
“म्म्म्म्म्ह्ह्ह… आआआह्ह्ह…” वोँ धीरे-धीरे सें कराहउठी, उसकी आवाज़ काँपरही थि।
मे उसकी कॉलरबोन पऱ उतरा, ज़ोर-ज़ोर सें चूसता हुआ, थूक कि धार उसके स्तनों केँ बीच बहनेलगी। उसकेकान मे जीभडाल दि, अंदर घुमाई, गीला-गीला कर दिया। “ओह्ह्ह फक… कितना संवेदनशील हैं… उउउह्ह्ह्ह!” उसका पूराबदन थरथरा उठा। उसकादिल जोर-शोर सें धड़करहा थां, मे महसूस कररहा थां।
हमने एक्-दूसरे केँ कपड़े फाड़ते हुए उतारे। जैसे हि उसकी भारी, नरम, लटकती चूचियाँ बाहर् आईं, मे गुर्राया। भारी, गर्म, मोटी चूचियाँ, काली सख्त चुचियाँ। मैंने दोनों हाथों सें कसकर दबाईं, मांस फूलकर उभरआया।
“आआआह्ह्ह! जोर सें दबाओ… तुम्हारी हें यह… चूसो इन्हें…” वोँ कराहरही थि।
मे बाएं मम्मों पर्र टूट पड़ा। पूरा मुँह खोलकर चूस लिया, जीभ सें पूरा मम्मों थूक सें लथपथकर दिया। निप्पल कों मुंह मे लेकर ज़ोर-ज़ोर सें चूसा — “छ्लूर्प… छ्लूर्प… छ्लूर्प…” थूक मुंह केँ कोनों सें बहरहा थां, उसकी मम्मों पऱ सफेद धारियाँ बनरही थीं।
वोँ कमर उचकाकर चिल्लाई, “आआआह्ह्ह्ह्ह! चूसो मेरी चूचियाँ… जोर सें चूसो! म्म्म्म्मााााह्ह्ह! फट जाएँगी… हाँ…हाँ… हाँ!”
मे घंटों तक उसकी दोनों चूचियों कों चूसता रहा। कभी दाँत सें काटता, कभी पूरा मम्मों मुंह मे भरकर चूसता, कभी दोनों चूचियों कों जोड़कर बीच मे मुँह डालकर मोटरबोट करता। थूक हरतरफ फैल गय़ा थां। उसकी चूचियाँ चमकरही थीं, लार सें भीगी हुईं।
“फक… तुम् मेरी चूचियों कों कितना गंदाबना रहे हौ… मुझे बहोत पसन्द हैं… आआआह्ह्ह! म्म्म्म्मााााह्ह! चूसते रहो मेरी रसभरी चूचियाँ!”
फिन मे नीचे सरका। उसकी मोटी जाँघें फैलाकर देखा — उसकी झब्बीदार, गीली बुर। कालीघनी झाँटों सें भरी, रस टपकरही थि, सूजी हुई क्लिट बाहर् निकली हुइ।
मैंने धीरे धीरे चाटना शुरुआत किया।
जीभ कों पूरीतरह फैलाकर उसकी बुर केँ नीचे सें ऊपर तक एक् लंबा, गीला स्ट्रोक। फिन दोबारा। फिनतीन बार। फिन बार-बार।
“ओह्ह्ह्ह्ह… हाँ… चाटो मेरी बुर… धीरे धीरे… आआह्ह्ह…” वोँ कराहरही थि।
मैंने पूरा मुँह उसकी झब्बीदार बुर पर्र रख दिया। जीभ अंदर डाली, बुर केँ छेद मे घुमाई, रस चूस-चूसकर पीनेलगा। मोटाथूक मेरे मुंह सें बहकर उसकी बुर पऱ गिररहा थां, झाँटों कों चिपकाता हुआ, गाड़ तक बहरहा थां।
उसकी प्रतिक्रिया भयंकर थि। उसकी जाँघें काँपने लगीं। साँसें फूलगईं। दिल जोर-शोर सें धड़करहा थां।
“आआआह्ह्ह्ह! ओह मेरेराम… तुम्हारी जीभ अंदरघुस रही हैं… म्म्म्म्मााााह्ह! बुर चाटो… मेरी गीली झब्बीदार बुर चाटो… उउउह्ह्ह्ह! गहरी… औऱ गहरी… आआआह्ह्ह्ह!”
मे घंटों तक उसकी बुर चाटता रहा। कभी क्लिट कों चूसता, कभीजीभ अंदर डालकर बुर फक करता, कभी झाँटों कों मुँह मे लेकर चूसता। थूक औऱ बुर कां रस मिलकर पूरी बुर, जाँघें औऱ बैड कों तरकर दिया।
“फक… आआआह्ह्ह्ह! मे फिन झड़ने वाली हूं… मत रुको… म्म्म्म्मााााह्ह! तुम् मेरी बुर कों इतना गंदाचाट रहे हौ… मे पागल हौ रही हूं… आआआह्ह्ह्ह! हाँहाँ हाँ! बुर कां रसपीलो सभी… उउउह्ह्ह्ह!”
वोँ पहलीबार झड़ गई — जाँघें मेरेसिर कों जकड़लीं, पूरा जिस्म हिलने लगा, गरम बुर कां रस मेरे मुंह मे बहनेलगा। मे चाटता रहा, सभी पी गय़ा।
फिन रुका नहि। आहिस्ता फिन चाटने लगा। दूसरी बार वोँ औऱ जोर सें चिल्लाई —
“आआआह्ह्ह्ह! फिन…फिन आँ रहा हैं… ओहफक! म्म्म्म्मााााह्ह! मेरी झब्बीदार बुर चाटते रहो… मे तुम्हारी गंदी रंडी हूं आज… आआआह्ह्ह्ह! चूसो क्लिट… हाँ…हाँ… हाँ!”
उसकेबाद मैंने उसेपेट केँ बल लिटाया। उसकी मोटी, गोल, सफेद गांड केँ दोनों फंदे फैलाए। उसका छोटा सां, गुलाबी गांड कां छेदथूक औऱ बुर केँ रस सें भीगाहुआ थां।
मैंने गांड चाटना शुरुआत किया — बहोत धीरे-धीरे, बहोत गंदे तरीके सें।
जीभ सें गोल-गोल चाटा। फिन थूक थूका सीधाछेद पर्र, देखा केसे बहता हैं, फिनचाट लिया।
“ओह गॉड…वहा नहि… कितना गंदा हैं… उउउह्ह्ह्ह!” वोँ चौंककर बोलि, मगर जल्दी अपनी गांड मेरे मुंह पऱ पीछे धकेल दि।
मे पागल हौ गय़ा। उसकी गांड केँ छेद कों चूसने लगा, जीभ अंदर डालने कि कोशिश करतेहुए, जोर-शोर सें चाटते हुए। “छ्लूर्प… छ्लूर्प… थप…थप…” आवाजें पूरे कमरे मे गूँजरही थीं।
“आआआह्ह्ह्ह! मेरी गांडचाट रहे होँ… कितना गंदा लड़का हैं तुँ… म्म्म्म्मााााह्ह! चूसो मेरी गांड… अंदरजीभ डालो… उउउह्ह्ह्ह! हाँ…हाँ… मेरी गंदी गांड चाटो… मे पागल हौ रही हूं… आआआह्ह्ह्ह!”
मैंने उसकी गांड कों घंटों चाटा। थूक कि नदियाँ बहरही थीं। उसकी गांड पूरीतरह लार सें चमकरही थि। वोँ स्वयं अपने हाथों सें गांड केँ फंदे फैलाए हुए थि।
“फक… आआआह्ह्ह्ह! गांड चाटते हुए मेरी बुर सें रस निकलरहा हैं… मे फिनझड़ जाऊंगी… म्म्म्म्मााााह्ह! तुम्हारी जीभ मेरी गांड केँ अंदर हैं… कितना मज़ा आँ रहा हैं… आआआह्ह्ह्ह! हाँ…हाँ… हाँ… चाटो… चूसो… गंदाकर दो मेरी गांड!”
फिन उसने मुझेपीठ केँ बल लिटाया। उसकी आँखों मे शुद्ध वासना थि।
उसने अपनानरम हाथ मेरेतने हुए, रस टपकते लन्ड पर्र रखा औऱ धीरे-धीरे सें सहलाया। फिन मुंह नीचे किया।
सबसे पहले लन्ड केँ सुपाड़े कों चूमा, फिन पूरी लंबाई चाटी, मोटाथूक लगाकर चिकना किया। फिन मुंह मे लिया।
“म्म्म्म्म…” वोँ अहह भरतेहुए चूसने लगी।
आहिस्ता सिर हिलाती हुई चूसरही थि। थूक मुंह सें बहकर मेरे लन्ड औऱ अंडकोष पर्र गिररहा थां। आवाजें — “ग्लक… ग्लक… छ्लूर्प… म्म्म्फ्फ्फ…”
“पहलीबार कररही हूं… मगर तुम्हारा लन्ड बहोत मज़ेदार हैं…” कहकर वोँ औऱ गहरी चूसने लगी।
“आआह्ह्ह… दिदी… तुम्हारा मुंह कितना गरम औऱ गीला हैं…” मे कराहउठा।
वोँ पूरीलगन सें लन्ड चूसरही थि। कभी गहरी लेती, गैग होती, आँखों मे पानी आँ जाता, फिन भि छोड़ती नहि। थूक कि लार मेरे लन्ड कों पूरीतरह भीगारही थि।
“म्म्म्म्मााााह्ह! तुम्हारा मोटा लन्ड… ग्लक ग्लक… मेरे मुंह मे… आआह्ह्ह! चूसती रहूँगी… मेरा प्यारा लन्ड…”
हम् 69 मे आँ गए। वोँ मेरे लन्ड कों चूसती रही, मे उसकी बुर औऱ गांड कों चाटता रहा। रूम पूरीतरह गंदी आवाजों औऱ कराहों सें भर गय़ा थां।
“आआआह्ह्ह! म्म्म्म्मााााह्ह! फक!ओहहाँ! आआआह्ह्ह्ह! बुर चाटो… गांड चाटो… चूचियाँ चूसो… मे तुम्हारी हूं… आआआह्ह्ह! हाँहाँ हाँ!”
बहोत देरबाद हम् थककर एक्-दूसरे कि बाँहों मे लिपटगए। बदन पसीने, थूक औऱ बुर केँ रस सें चिपचिपा हुआ थां।
मैंने फुसफुसाया, “आईलवयू दिदी। ”
“आईलवयू टू, ” उसने मेरी छाती चूमते हुएकहा।
फिन भि मे उसकी चूचियों कों चूसने लगा। वोँ शरमाते हुए मुस्कुराई औऱ नीचेसरक गई। मेरे लन्ड कों फिन सें मुंह मे लें लिया। आरामसे, प्रेम सें, मगर बहोत गंदे तरीके सें चूसने लगी।
मे खुशी कि चरम सीमा पर्र थां। उसकीगरम, गीली, लार भरी जुबान औऱ मुंह मे लन्ड लिएहुए मे गहरी नींद मे सो गय़ा।
Ek aur behtareen kathanak read karne ko mil gyaa kya jabardast lekhan h bhasha shaili kaa too jawab hi nahee. Ab kya hi kahun mere pass tariff k liye shabd kam pad rahe haen. Waiting for next eagerly
Kathanak jabardast h Saloni, Akanksha, Avni k sath -2 Shreya ko bi Abhir say chudwane kaa moka milna chahiye aur Saloni dwara apni dosto ko bi Abhir say chudwana chahiye aesa mai chahta ho lekin male Hero sirf Abhir hi hu dusra koy naheen. Baki aapki marji
हम् जौ धीरे-धीरे धीरे-धीरे खोगए। – New Episode
उम्मीद हैं आप् सब कों स्टोरी पसन्द आँ रही होगी। अपने विचार अवश्य साझा करें, क्योंकि आपकीराय हमारे लिए बहोत मायने रखती हैं। आपको किस्सा जैसी मनपसंद आएगी, उसे उसी हिसाब सें आगे बढ़ाने कि कोशिश कि जाएगी।
जैसे आप् मे सें एक् पाठक नें कहा थां कि स्टोरी कों सिर्फ़ अभिर औऱ सलोनी केँ बीच हि रखाजाए। येकथा मुख्य रूप सें अभिर औऱ सलोनी कि हि हैं, मगर इसमें दूसरे किरदारों कि भि महत्वपूर्ण भूमिका होगी। क्योंकि अगरकथा सिर्फ़ दो किरदारों केँ इर्द-गिर्द हि घूमती रहे, तौ कुछ वक्तबाद कथा मे नया औऱ दिलचस्प करने केँ लिए बहोत कमरह जाएगा। फिन भि, किस्सा कां मुख्य केंद्र अभिर औऱ सलोनी हि रहेंगे।
आप् सब अपने विचार अवश्य साझा करें। आपको स्टोरी मे क्याँ अच्छा लगा औऱ इसमें क्याँ सुधार कियाजा सकता हैं, ये बताना न् भूलें। आपकीराय स्टोरी कों औऱ बेहतर बनाने मे सहायता
And अगर kisi ko ptaa h की GIF kese add krte h too please bataaye, kyuki जब me IMGBB use karta hoon तो usmein GIF में error show karta h, so kisiko ptaa h की kese upload krte h तो jarur bataye, ap padhen kaa experience और अच्छा hoga.
shukriya.
हम् जौ धीरे-धीरे धीरे-धीरे खोगए। - Kahani ab aur interesting hogi
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