Ek Chaat k Niche (Family Saga) – New Episode
*सॉरी रीडर्स, अभि एक् दफ़्तर प्रोजेक्ट केँ कारणयहा ज़्यादा ध्यान नहि देपारहा, तौ चॅप्टर अपलोड कि स्पीड थोडीकम रहेगी, औऱ जब मुझे वक़्त मिलेगा तब मे gif औऱ pics भि डाल दुंगा.
दूसरी तरफ़, ताई वाली साइड पऱ माहौल पूरीतरह सें तप चुका थां। एक् तूफ़ानी राऊंड युवराज नें अभि अभि समाप्त किया थां। दोनों केँ शरीर पसीने मे भीगे नंगेबैड पर्र लेटे थें, साँसें अभि भि तेज़थीं।
युवराज कि आवाज़ मे एक् संतुष्ट, गहरी गूँज थि: "कैसालगा, ताई? क्याँ मजाआया?"
ताई नें कमर कों मलतेहुए कहा, उनकी आवाज़ मे थकान औऱ शिकायत थि: "तूँ भि पूराआग कां दरिया हैं। सारे मर्द एक् हि खानदान केँ भूखेशेर होँ तुम्। "
युवराज मंद-मंद मुस्कराया: "अच्छा, मेरी ताई। दिलराज कां भि तौ पूराज़ोर लगता होगाजब वो ठोकता हैं? तेरा शरीर दुखता होगा?"
ताई नें हाँफते हुए जवाब दिया, जिसमें गहरा अनुभव छलकता थां: "औऱ पूछमत! पूरा जिस्म तोड़ देता हें। सच मे, दोनों भइया अपने बाप पऱ हि गए हौ, वैसा हि पागलपन, वैसी हि हवस!"
युवराज केँ चेहरे पर्र शर्तिया जीत कि मुस्कान थि: "अच्छा, ताई! औऱ डैडी? तूने उनके लन्ड कि भि गर्मी देखी हैं?"
ताई कि आँखें एक् लम्हा कों दूर अतीत मे खोगईं: "हाँ, बेटा। अब तेरे औऱ मेरेबीच कौन सि दीवार बची हैं? अब तुझसे क्याँ हि छुपाना। "
युवराज नें उत्सुकता कि चरम सीमा पर्र पूछा: "केसे फँसाया उस धूर्त नें तुम्हें? तुँ केसे मानी, ताई? एक् एक् बातबता। "
ताई नें आँखों मे गहरीनमी केँ संग धीरे-धीरे सें कहा:"बस, फँस गई ऐसे हि, धीरे-धीरे धीरे-धीरे। तेरेताए कि मौत केँ बाद, घऱ तौ तेरे डैडी नें हि सँभाला थां। औऱ फिन धीरे-धीरे धीरे-धीरे, उन्होंने मेरेइस तन्हा बदन कों भि सँभाल लिया। "
युवराज कां मन षड्यंत्र कि परतों कों टटोलरहा थां: "क्याँ हमारे उस सीधे सादेअमन कों पता थां येसभी?"
ताई कि आवाज़ मे अपराध बोध कि एक् महीनपरत थि: "हाँ। एक् दिन उसने तेरे डैडी केँ संग मुझेदेख लिया थां। फिनबाद मे मैंने उसे समझाया। औऱ फिन.फिन उसने भि धीरे-धीरे धीरे-धीरे मेरे जिस्म पऱ अपनाहक मान लिया। "
युवराज कि आँखें हैरानी सें चौड़ी हौ गईं: "अच्छा! तभीअमन तेरा भि मज़ा लेनेलगा? औऱ उसने मेरे डैडी कों कुछ नहि कहा?"
ताई नें तर्क दिया: "नहि! मैंने उसे रोका, क्योंकि तेरे डैडी नें हमारी बहोत सहायता कि हैं। अब भि अमन कों तेरे डैडी नें हि कनाडा कि सैर करवाई हैं, ख़र्चा करके। अमन कों सभीपता थां, इसीलिए वो चुपरहा। औऱ। वैसे भि, अमन नें फिन तेरी मां पर्र भि हाथफेर लिया थां। तौ फिनउसे क्याँ शिकायत होती?"
युवराज एक् झटके सें उठा: "क्याँ! बहनचोद! मेरी मां नें अमन कों दि हैं! ये केसे होँ सकता हैं!"
ताई नें ठंडी हँसी हँसते हुएकहा: "बसअमन कों नहि। ये तौ मुझे भि नहि पता, किस किस कों दि हैं तेरी मां नें!"
युवराज केँ बदन मे आगलग गई, उसका लन्ड फिन सें जागउठा: "किसकिस कों दि हैं माँ नें? बता, ताई! सभीउगल दे!"
उसने ताई कों गले सें लगाया, औऱ उसका खड़ाहुआ लन्ड जाँघों केँ बीचगरम दबाव बनाने लगा। "बता, ताई! मां नें औऱ किस-किस कों अपनी गुफा दि हैं?"
युवराज नें ताई कि गाँड़ पर्र हाथ फेरा: "तेरी गांड़ सें भि अधिक, माँ कि गाँड़ बड़ी मोटी हैं। किसकिस नें उस पर्र हाथ फेरा हैं?"
ताई सुख कि सिहरन मे बोलउठी: "हाएरे कंजरा! तूने तौ मेरी भि बाँधखोल दि दोबारा!" (वो सँभलती हुई बोलीं): "यहा गाँव मे तोँ बसअमन कों दि हैं, औऱ सरपंच केँ नीचे तौ पड़ना हि थां जब तुम् दोनों नें उन्हें मोटर पऱ पकड़ा थां। पऱ जब वो बाहर् देश गई थि, तब अंगरेज़ों कों बहोत खिलाया हैं, तेरी माँ कहती थि। "
युवराज उग्र होँ गय़ा: "तुम्हारे पेट मे तौ पाप भि नहि पचता!सभी एक्-दूसरे कों बता देती हौ! किसकिस कों, कहां कहां दि."
उसने उत्तेजना मे अपनी एक् टाँग उठाई। "आह्ह्ह्ह! गय़ा लन्ड, ताई! आह्ह्ह! तूँ कौन सि कमहवस कि मारी हैं! तूनेकिस किस कों दि, बता!"
ताई कि आवाज़ दर्द औऱ मजा केँ बीच फँसी: "आह्ह्ह्ह!
धीरे-धीरे धकेल, मेरे पुत्त! आह्ह्ह! मेरेइस शरीर कां स्वाद तौ गाँव वालों नें हि लिया हैं। पहले तेरे डैडी, फिनअमन, फिन सरपंच, औऱ एक् निर्मल कां लड़का हरजीत जिसकी एक्सीडेंट मे मौत हौ गई। औऱ अब। तुम् दोनों भइया!बस, यहीचढ़े हें तेरी ताई पऱ। "
युवराज नें तीव्रता सें पूछा:"बस इतने हि? निर्मल वही, जिसकी किराना स्टोर कि दुकान हैं?"
ताई नें दर्दभरी साँसली: "हाँ, वही! बेचारा, अच्छा लड़का थां उसका। जब कहती थि, दौड़ाआता थां घऱ। संग हि मुफ़्त कां राशन-पानी भि दे जाता थां। पर्र क़िस्मत हि बुरी थि उसकी। "
युवराज नें क्रूरता सें ताई कि गाँड़ कों पकड़ा औऱ लन्ड कों पूरी ताक़त सें अंदर भींच लिया: "अच्छा! आह्ह्ह्ह! बुरी तौ होनी हि थि! राशन-पानी औऱ लन्ड, दोनों एक् संगबंद होँ गए!"
ताई चीखउठी: "आह्ह्ह! ओए! धीरे-धीरे कर, पुत्त! सारीरात तेरेलिए पड़ी हैं! आह्ह्ह! सिस!ओए! नहि! अकेला इकलौता लड़का थां निर्मल कां। पति तोँ पहले हि मर गय़ा थां बिचारी कां। अब एक् लड़की हि बची हैं। दोनों मम्मी बेटी हि बैठी रहती हें दुकान पर्र। "
युवराज नें अंधेहवस मे कहा:"चल छोड़ उनको! तूँ धक्के मार लन्ड पऱ, इसका अमृतपी! आह्ह्ह! बहनचोद! रांड होँ तुम् औरतें! इतने लन्ड लेकर भि सब्र नहि होता!"
ताई सुख कि पुकार मे थि: "आह्ह्ह्ह! सब्र कहां होता हैं, पुत्त! लन्ड सें भि कभीकोई रजा हैं! हाए!ओए धीरे-धीरे!"
युवराज हिंसक होँ गय़ा: "आह्ह्ह्ह! दोनों बड़ीगरम होँ तुम्! माँ भि पूरेमजे सें लेती हैं लन्ड, तेरीतरह! आह्ह्ह!"
फिन दोनों कां तूफ़ान शांतहुआ, औऱ कुछदेर बाद, एक् अंतिम, धीमादौर लगाकर वेसोगए।
इधर मे दिलराज कि नंगे लेटेहुए हि आँखलग गई थि। एकदम सें उठा, तौ देखा हरलीन दिदी, बगल मे लेटी हें।
हरलीन नें दिलराज कि छाती पऱ हाथ फेरा औऱ उनकी आवाज़ मे बेहन कि ममता औऱ एक् गहरी शरारत थि: "क्याँ बात?थक गय़ा मेरा भइया? लगता हैं, मां नें तेरा सारा पानी सुखा दिया!"
मे (दिलराज) नींद सें बाहर् निकलते हुए: "नहि-नहि दिदी! पता नहि लगा, आँख लग गई। मे तौ अभि तुम्हारे कमरे मे आने हि वाला थां। रमनसो तोँ नहि गई?"
हरलीन नें नाँ मे सिर हिलाया: "नहि, अभि नहि सोई। मूवीदेख रही हैं। " (फिन उसनेसोए हुए लन्ड पऱ धीरे-धीरे सें हाथ फेरा): "करवा दि तसल्ली अपनी मम्मी कि फिन?"
मे (दिलराज) नें संतुष्ट होकरकहा: "हाँ, हौ गई थि ठंडी। "
हरलीन नें आँख मारी: "बड़ा हरामी हैं तुँ, दिलराज! मम्मी कों भि नहि बख्शा!"
मे (दिलराज) नें मासूमियत सें जवाब दिया:"जब सामने इतना लज़ीज़ औऱ रसदार पकवान पड़ा हौ, तोँ जीभ मे पानी तोँ आएगा हि, दिदी!"
हरलीन नें कहा: "अच्छा जी!" (आरामसे, उसकेहाथ केँ चमत्कार सें मेरा लन्ड फिन सें जागउठा): "माँ कां नाम सुनकर दोबारा खड़ा हौ गय़ा!"
मे (दिलराज) नें ईमानदारी सें कहा:"हाँ, पऱ यह जौ तुम्हारे मख़मली बूब्ज़ मेरी छाती सें लगरहे हें, यह उनका भि कमाल हैं। "
हरलीन नें चुनौती दि: "अच्छा! फिन आज़ाद करदे अपनी बेहन केँ इनरस सें भरे स्तनों कों!"
मे उठकरबैठ गय़ा औऱ दिदी भि बैठगईं। "चलो, अब तुम्हारे कमरे मे चलते हें। वहीं करता हूं उन्हें आज़ाद। "
हरलीन नें षड्यंत्रकारी लहजे मे कहा:"हाँ। सुन, तूँ जा कमरे मे पहले। रमन पूछेगी, तोँ कह देना कि तूँ बाहर् बैठ गय़ा थां। मे थोडा ध्यान रखरही हूं, फिन थोड़ी देर रुककर आऊँगी। "
मैंने हाँ मे जवाब दिया औऱ पजामा पहनने लगा हि थां कि दिदी नें मुझेझटक दिया।
हरलीन नें हुक्म दिया: "रहनेदे! उतारना हि हैं। जा, बस तौलिया लपेट लेँ। "
मे तौलिया लपेटकर हरलीन दिदी केँ कमरे कि तरफ़चल दिया। दिदी वहीं मेरे कमरे मे चौकीदारी केँ लिएबैठ गईं।
मे नीचे जाकर दिदी केँ कमरे मे दाख़िल हुआ, तौ रमन बाथरूम सें बाहर् निकलरही थि। उसने हरलीन दिदी कि टी-शर्ट औऱ पजामा पहनाहुआ थां।
रमन नें हैरानी सें पूछा: "दिलराज! तूँ इस तौलिए मे यहा क्याँ कररहा हैं?"
मे (दिलराज) नें शरारत सें हँसकर कहा: "हरलीन दिदी कहरही थीं, रमन कों मेरी सहायता चाहिए। "
रमन क्रोधित होँ गई: "मुझे क्याँ सहायता चाहिए तेरी? तेरी बेहन तौ पागल हैं! उसने कंजरी नें तुम्हे तौलिए मे भेज दिया! लज्जा नहि आतीउसे?"
मे (दिलराज) नें शांति सें कहा: "दिदी कों क्यूं गालियाँ निकालनी? अब वोँ नं होतीं, तौ मे केसे मिलता तुम्हें?"
रमन चुपचाप खड़ीरही, मुँह नीचेकर लिया। मे पास जाकर उसकी बाँह सें पकड़ा औऱ अपने गर्म शरीर केँ संगगले लगा लिया।
मे (दिलराज) नें सीधे पूछा: "तुम्हारा दिल नहि करता, मुझेऐसे नंगा देखने कों?"
रमनकुछ नं बोलीं, मुँह नीचे हि कर लिया। मे उसकेगले केँ पास फुसफुसाया: "क्याँ हुआ? लज्जा आँ रही हैं अब? पहले तौ बड़ी बड़ी बातें करती थि कि 'दिलराज केँ लन्ड पऱ चढ़ूँगी', औऱ 'हरलीन कुत्तिये', ये वोँ। अबपास आया तौ चुपचाप खड़ी हैं। "
रमन नें दबी आवाज़ मे कहा: "न्। नहि। बस.ऐसे हि। मुझे लज्जा आँ रही हैं। "
मे (दिलराज) नें अहंकार सें कहा: "अच्छा! अबये लज्जा मे दूर करता हूं!"
एक् हाथ सें तौलिए कों खोलकर लन्ड कों पूरीतरह आज़ाद कर दिया, जौ अबरमन कि जाँघों सें अस्पष्ट रूप सें टकराने लगा। "देखो! पसन्द हैं?"
रमन कि नज़र पहले हि नीचे थि, औऱ जब लन्ड पऱ पड़ी, तौ उसकी आँखें खुलीरह गईं।
रमन अविश्वसनीयता मे बोलीं: "हाए रब्बा! इतनाबडा! ओए! क्याँ खाता हैं, दिलराज, तूँ?"
मे (दिलराज) नें विजयी भाव सें कहा: "जोँ बाक़ी लोग खाते हें। पर्र आज मुझे तुम्हें खानां हैं। "
रमन नें डरतेहुए कहा: "अच्छा! ओए! तुँ 'आप्' मतकर! सिधेसे बोल! इतनी इज़्ज़त सि न् कर, दिलराज, प्लीज़!"
मे (दिलराज) नें मान लिया: "अच्छा!" मैंने मुँहऊपर किया औऱ उसके गुलाबी होंठ चूसने लगा: "आह्ह्ह्म्म्! उम्माह्ह्ह्ह!" औऱ पजामे केँ ऊपर सें उसकी गांड़ कों सहलाने लगा।
धीरे-धीरे धीरे-धीरे रमन केँ कपड़े उतारदिए, औऱ दोनों नग्न, एक् दूसरे कों भूखी नज़रों सें देखने लगे। रमन बिना कपड़ों केँ पूरी क़यामत कि महिला लगरही थि। उसका जिस्म मख़मली औऱ रसीले थां। मैंने पूरे जिस्म कों स्वाद सें चूसा औऱ खाट पर्र लंबालेट गय़ा। रमन कों इशारा किया कि वो लन्ड चूसे। रमन नें बिनाकुछ बोले लन्ड मुँह मे भर लिया औऱ तेज़ी सें चूसने लगी।
मे (दिलराज) नें अहहभरी: "आह्ह्ह्ह! रमन! तुँ तौ पूरी एक्सपर्ट लगती हैं चूसने मे। पहले भि किसी कां रस पिया हैं, लगता हैं!" रमन नें कोई जवाब नहि दिया।
रमन (लन्ड मुँह सें निकालती हुईँ, साँस लेती हुईँ): "हरलीन कहां रह गई?"
मे (दिलराज): "बाहर् हैं। वोँ जागरही हैं, ध्यान रखरही हैं। "
रमन:"अब किसने आनां हैं इतनीरात कों? आँ जाती अंदर वोँ भि। "
मे (दिलराज) नें चौंककर पूछा: "दिदी नें क्याँ करना हैं यहा?"
रमन नें होंठों पऱ जीभ फेरी:"वही, जौ मे कररही हूं!"
मे (दिलराज): "तेरा दिमाग़ तोँ ठीक हैं?"
रमन (लन्ड पर्र जीभ फेरती हुइ): "क्यूं? क्याँ हुआ? नहि कर सकती? आह्ह्ह्म्म्! हाए! दिलराज! तेरा लन्ड बड़ा मोटा हैं!"
मे (दिलराज): "चूस अच्छी तरह! आह्ह्ह्ह!" रमन धीरे-धीरे धीरे-धीरे अपनी सीमाएँ तोड़रही थि। मुझेये तौ स्पष्ट होँ गय़ा थां कि हरलीन दिदी रमन कों जानबूझकर मेरेसंग चुदवा रहीथीं।
रमन: "आह्ह्ह्म्म्! दिलराज! कंट्रोल नहि हौ रहा! मेरी बुर
नीचे सें गीली हौ गई हैं! आह्ह्ह्म्म्!"
मे (दिलराज): "आह्ह्ह्म्म्! आँ जा! मेरे मुँह पऱ रख अपनी बुर! 69 कि स्थिति मे होँ जा!"
रमन नें झुककर अपनी बुर मेरे मुँह पर्र रखी औऱ मेरे लन्ड कों मुँह मे भरकर चूसने लगी।
थोड़ी देरबाद मे उठा औऱ रमन कों बैड पऱ लंबा लिटा दिया। लन्ड उसकी बुर केँ मुहाने पर्र सेट करके धीरे-धीरे धीरे-धीरे अंदर धकेल दिया।
रमन नें दर्द मे मीठीचीख़ मारी: "आह्ह्ह्ह! धीरे-धीरे, दिलराज! फाड़ न् देना मेरी!हाए!"
मैंने कंट्रोल होकर लन्ड पूरा अंदर धकेल दिया, औऱ रमन सिसकियाँ लें रही थि। लन्ड अंदर धकेलकर कुछदेर रुका। रमन कों भि पूरा आनंद आँ रहा थां।
रमन नें हवस मे चिल्लाया: "आह्ह्ह्ह! दिलराज! रुकमत! ठोक अच्छी तरह! आह्ह्ह्ह!"
ये सुनते हि मैंने ज़ोरज़ोर सें धक्के मारने शुरुआत करदिए। पूरे कमरे मे हवस औऱ चीख़ों कि आवाज़ें गूँजने लगीं।
रमन चीख़उठी: "आह्ह्ह्ह्ह! हाए! दिलराज! मार डाला! आह्ह्ह्ह! तेरा बड़ा मोटा हैं! आह्ह्ह्ह! तेरी बेहन कि बस हौ जानी हैं जब तेरा लेगी! आह्ह्ह्ह!"
मे पूरेजोश मे हिंसक होँ गय़ा थां। रमन पागलों कि तरह चुदवा रही थि, पूरे स्वाद सें। अंदर हम् दोनों हवस केँ दीवाने थें, पऱ बाहर् एक् नया नाटक शुरुआत होँ चुका थां।
हरलीन दिदी मेरे कमरे सें निकलकर नीचेआईं औऱ किचन मे पानी पीने लगीं। जैसे हि वो पीछे मुड़ीं, उनकी बड़ी बेहनकमल वहीं खड़ीथीं।
हरलीन एकदम सें डरगईं: "क्याँ हुआ?"
कमल: "कुछ नहि। डरा दिया तुने। सोई नहि अभि तक?"
हरलीन नें पानी कां गिलास पकड़ा दिया औऱ अपने कमरे कि तरफ़ चलने लगीं।
कमल नें शर्तिया प्रश्न किया: "होँ गय़ा नाटक समाप्त तुम्हारा, जौ तुँ औऱ रमनकर रही थि?"
हरलीन नें कहा:"हाँ, हौ गय़ा समाप्त। "
कमल: "क्याँ कररही हैं रमन?"
हरलीन नें बात टालने कि कोशिश कि: "कुछ नहि। बस बैठी हैं। "
कमल:"चल, मे भि चलती हूं तेरेसंग। रमन सें बातें कर लूँगी मे भि। अब तौ नींदआनी नहि जल्द। "
हरलीन नें घबराहट मे रोका: "नहि नहि। सुभहकर लेना। अब हम् सोना हैं। "
इतने मे कमरे मे सें ज़ोरदार दोतीन थप्पड़ों जैसी आवाज़ें आईं, जैसेकोई किसी कों पूरी ताक़त सें कूटरहा होँ।
कमल नें संदेह सें पूछा:"ये किसकी आवाज़ थि?"
हरलीन नें झूठ बोला:"पता नहि। वैसे हि होगीकोई। " (मन मे: हे ईश्वर! यह भि न्! धीरे-धीरे नहि कर सकते दोनों हवस केँ मारे!)
कमल नें फैसला कर लिया:"चल, देखते हें। " वो धीरे-धीरे धीरे-धीरे हरलीन केँ कमरे कि तरफ़चल दि। कमरे केँ दरवाज़े केँ पास पहुँची औऱ अंदर कां नज़ारा देखकर ठिठक गई।
हरलीन कमल केँ पीछे खड़ी देखने लगी।
कमल (धीरे-धीरे सें, काँपते हुए):"*ये क्याँ होँ रहा हैं अंदर? तुम्हे पता थां?"
हरलीन (बाँह सें पकड़कर बाहर् किचन केँ पास लाती हुई): "हाँ, पता थां। इसीलिए मना किया थां आपको जाने सें। "
कमल नें गुस्से सें फुसफुसाया: "पऱ दिलराज केँ संग क्यूं?
बाहर् किसी सें मरवा लेतीये कुत्ती!"
हरलीन नें निराशा जताई: "मे क्याँ करती? वोँ ज़िदकर रही थि दिलराज सें चुदवाने कि। फिन मे केसे रोकती?"
कमल नें भेद जानने कि कोशिश कि: "तूने मनाया दिलराज कों?"
हरलीन (थोडा चुप रहकर, स्वीकार किया):"हाँ। "
कमल आश्चर्य औऱ अपमान सें करीबचीख़ उठी:"हाए! मे मर जाऊँनी कुत्तिये! लज्जा नहि आई तुम्हे अपने भइया कों अपनी साथी केँ लिए मनाते हुए?"
हरलीन नें तर्क दिया:"आई थि। पर्र मनाना पड़ा। पता तोँ हैं तुम्हें, पक्की सहेली हैं मेरी वोँ। केसे नां करती उसको?"
कमल नें ठहराव लिया: "सहेली पक्की हैं, तोँ इसका मतलब भइया केँ लन्ड पऱ चढ़ा देगी?"(कुछ देरचुप रही):
"चल, आँ देखते हें क्याँ कररहे हें। "
हरलीन : "क्याँ देख्ना? वहीकर रहे हें जोँ तूँ औऱ जीजाजी करते होते थें। "
कमल नें चेतावनी दि: "अधिक नं बोल!चुप करकेचल। "
वे दरवाज़े केँ बाहर् गए औऱ खिड़की सें झाँककर अंदर देखने लगे।
अंदर माहौल पूरातप चुका थां। दूसरा राऊंड चलरहा थां। रमन पूरीतरह घोड़ी बनी हुइ थि, औऱ दिलराज पीछे सें जान लगाकर धक्के माररहा थां।
दिलराज नें सुख मे चीख़ा: "आह्ह्ह्ह! रमन! आह्ह्ह!" (रमन कि गाँड़ पर्र ज़ोरदार थप्पड़ मारता हुआ): "आह्ह्ह!"
रमन नें पागलपन सें चीख़ा: "आह्ह्ह्ह! दिलराज! चोद! आह्ह्ह! अच्छी तरह!हाए! तेरे लन्ड जितना आनंद नहि हैं किसी मे! बड़े दिनों बादआज मेरी ख़्वाहिश पूरी हुईँ हैं! आह्ह्ह! ये हरलीन कुत्ती कहां रह गई? इसेकहा थां मेरेपास रहे!"
बाहर् खड़ीकमल तपतीजा रही थि। उसकी बुर मे सें पानी कां झरनाफूट पड़ा थां, औऱ सलवार पूरी गीली हौ रही थि।
दिलराज नें हवस मे कहा: "आह्ह्ह्ह! हरलीन दिदी सें क्याँ करवाना? अपने आप् आँ जाएँगी बाद मे! तुँ चुदवा अच्छी तरह!"(मन मे: दिदी कहां रह गई? अब तक तोँ आँ जानां चाहिए थां! दूसरा राउंड दिदी केँ संग लगाना थां!) वो मन मे सोचता हुआ ताकत सें धक्के मारता रहा।
बाहर् खड़ीकमल औऱ हरलीन अंदर कां अंगारों जैसा माहौल देखकर चरम पर्र पहुँच रहीथीं। कमल नें जल्दी एक् हाथ सलवार मे डाल लिया, औऱ काँपते हुएकहा: "हाएनी हरलीन! दिलराज कां कितना बड़ा हैं! केसेलगा हैं ठोकने तेरी सहेली कों! मेरी तोँ देखकर हि गीली हौ गई!"
हरलीन नें हँसते हुए उकसाया: "जाफिन! पड़जा तुँ भि दिलराज केँ नीचे, जैसेरमन पड़ी हैं!"
कमल नें विरोध किया: "बेशर्म नं होँ, तोँ क्याँ बोलीं जारही हैं! छोटा भइया हैं मेरा!"
हरलीन नें हाथ पऱ चोट कि: "अच्छा! फिनये क्यूं डालाहाथ सलवार मे, भइया कों देखकर?"
कमल नें सच्चाई बताई: "पानी सें गीली हुइ पड़ी हैं! क्याँ करूँ औऱ? तेरे जीजा कों गए इतनेदिन होँ गए! मेरी बुर सूखी पड़ी थि तब सें! आज देखकर पूरा सैलाब आँ गय़ा!"
हरलीन नें पुष्टि कि: "अच्छा!" (एक् हाथ सलवार केँ ऊपर सें कमल कि बुर पर्र रखती हुइ): "हाए!सच मे! ये तौ पानी छोड़रही हैं! पूरा लन्ड माँगती हैं तेरी बुर, बेहन!"
कमल नें शरमाते हुएहाथ पीछे किया:"चल, पीछेकर हाथ!कोई न्! मे हाथ सें शांतकर लूँगी। तेरी भि हुईँ होगी गीली। तूँ हौ जा घोड़ी! दिलराज आगे जाकर तुम को, तेरी सहेली यादकर रही हैं अंदर!"
हरलीन नें अहंकार सें कहा: "अच्छा जी! मे तौ हौ हि जाऊँगी! मुझे क्याँ हैं! मे तौ पहले भि हुइ हूं। " (थोडा हँसती हुईँ)।
कमल नें गहराई सें पूछा: "बड़ी बेशर्म हैं तूँ, हरलीन! सच मे दि हैं दिलराज कों तूने?"
हरलीन नें ठोस जवाब दिया:"हाँ! दि हैं। "
कमल नें अविश्वास जताया: "अच्छा! मुझे यकीन नहि होता!"
हरलीन नें जाल बिछाया: "अगर मे करवादूँ यकीन, तौ तूँ देगी दिलराज कों?"
कमल(कुछ देर सोचने केँ बाद, हवस सें हारती हुई): "हाँ! देखूँगी। पहले तुँ यकीन तोँ दिला!"
हरलीन नें मुस्कान दि: "चलफिन! यहीं खड़ी रहना, औऱ मजे सें देख्ना! औऱ उँगली कर लेना बुर मे!" (थोडा हँसकर): "कंट्रोल रखना पर्र! आज अंदर नं आनां! तेरा जुगाड़ कल लगवाऊँगी मे, ख़ुद दिलराज कों कहकर!"
कमल नें हारमान ली: "बड़ी कुत्ती हैं, हरलीन, तूँ! ठीक हैं, जैसी तेरी मर्ज़ी!"
to be continued।
Ek Chaat k Niche (Family Saga) – New Episode
रमन अभि बोलकर हटी हि थि कि हरलीन दिदी कमरे केँ अंदर आँ गई।
दिलराज: मैंने जल्द सें तकिया उठाया औऱ अपनी जाँघों पऱ रख दिया, औऱ लन्ड कों छिपा लिया। "आप् क्याँ कररही हौ यहा, दिदी? बाहर् जाओ! थोडीदर रुककर आनां! थोड़ी लज्जा करलो, दिदी! बिना बताए अंदर आँ गईं, बता तोँ देती!"(मन मे थोडा-थोडा हँसरहा थां। )
बाहर् खड़ीकमल ख़ुश होती हैं औऱ हरलीन कों गाली देती हैं। "ऐसे हि लगी थि कुत्ती बोलने कि मैंने दिलराज कों दि हैं! दिलराज तौ गालियाँ देरहा हैं उसे! रिश्ते कां मान रखनाआता हैं मेरे भइया कों!
हरलीन: दिलराज कि बातों पर्र ज्यादा ध्यान नहि दिया। उसे पता थां ये वोँ ऊपर-ऊपर सें बोलरहा हैं। "ओए, रमन! तुम्हारी तरफ लज्जा नहि आती, कुत्तिये? कपड़े पहन लेँ! औऱ कितनी देनी हैं मेरे भइया कों?"
रमन:"हाए नी! कहां मर गई थि तूँ, हरलीन? तेरा हि इंतजार कररही थि! अभि तोँ सिर्फ़ दो राऊंड हि हुए हें! सुभह तक दूँगी मे तौ तेरे भइया कों! मज़ा हि बड़ा देता हैं तेरा भइया!"
बाहर् खड़ीकमल: "इसका भि पता नहि लगता! अभि कहकर गई थि, बुर मरवाऊँगी, अब आराम करने कों कहरही हैं! इसका भि समझ नहि आता!"
रमण: "बेचारा किसको कहरही हैं? पूरा साँड़ हैं तेरा भइया! एक् बार चढ़ता हैं, फिन पुरा मज़ा करवाता हैं! चल, एक् राउंड होँ जाए! दिलराज! अपनी बेहन कों भि भोलापन दिखादे अपना!"
दिलराज: "पागल होँ गई हैं, रमन, तूँ! दिदी केँ सामने केसे? दिदी! आप् बाहर् बैठजाओ! थोडा वक्त औऱ रुको!बस एक् राउंड हि लगाना हैं मैंने भि औऱ। "
हरलीन: "मुझे बाहर् नहि बैठना अकेली! अबडर लगता हैं बाहर् अकेली कों। "
रमन:"चल फिन, यहा बैठकर देख अपने भइया कि परफ़ॉर्मेंस!" रमन नें दिलराज कि जाँघों सें तकिया उठाया, साइड पऱ रखा, औऱ पैरों केँ बीच मे बैठकर लन्ड मुँह मे भर लिया औऱ चूसने लगी। "आह्ह्ह्म्म्!"
दिलराज: "क्याँ कररही हैं, रमन! आह्ह्ह्म्म्! दिदी! तुम् जाओयहा सें!"
रमन: (लन्ड मुँह सें निकालती हुई बोलि) "कहीं नहि जानां! तेरी रंडी बेहन यहीं रहेगी!"
दिलराज: मैंने ज़ोर सें एक् थप्पड़ रमन केँ मुँह पर्र मारा। "केसे बकवास कररही हैं! बेहन हैं मेरी वोँ!"
रमन: "अच्छा! तभीकल पूरे स्वाद सें चोदा अपनी बेहन कों!" रमन नें लन्ड कों हाथ मे पकड़ा औऱ कहा, "यही लन्ड धकेला थां तूने अपनी बेहन कि बुर मे!" औऱ मुँह मे भरकर चूसने लगी। "आह्ह्ह्म्म्! ग्लूप! ग्लूप! अंह्ह्ह्म्म्!"
हरलीन: दिलराज केँ पास जाकर, "सॉरी, दिलराज! गलती सें मुँह सें निकल गय़ा थां। ये कुत्ती सामने सभीकुछ बोल देती हैं। "
हरलीन अभि इतना हि बोलि थि कि मैंने उसकी गर्दन पकड़ी औऱ होंठ चूसने लगा। "उम्माह्ह्ह्ह! आह्ह्ह्म्म्!" नीचे बैठीरमन लन्ड चूसरही थि।
रमन: "आह्ह्ह्म्म्म्!" (लन्ड मुँह सें निकाला) "आह्ह्ह! अबबनी बात!"
मे उठकर खड़ाहुआ, औऱ हरलीन दिदी केँ भि कपड़े उतारदिए। कमरे मे अब हम् तीनों नंगे खड़े थें।
बाहर् कमल कां बुराहाल थां अंदर कां माहौल देखकर। "ये तोँ सच हि कहरही थि! केसे नंगेहुए हें! बेशर्म! बेहन-भइया कां लिहाज़ हि नहि रहा!"
हरलीन: "हाए, दिलराज! बड़ा कंट्रोल करकेरखा हुआ थां। अब नहि होगा!डाल दे अंदर अपना लन्ड! आह्ह्ह्म्म्! उम्मह्ह्ह्ह!" (चुंबन करती हुइ बोलीं। )
रमन:"देख! केसे हवासी फिनरही हैं तेरी बेहन! दिलराज! धकेलदे! औऱ कुछ नं हौ जाए तेरी बेहन कों!"
मैंने दिदी कों पकड़ा औऱ पलंग पऱ लंबा लिटा दिया। रमन मेरेपास आई, लन्ड कों मुँह मे डालकर गीला किया, औऱ दिदी कि बुर पर्र रख दिया। मैंने धीरे धीरे लन्ड अंदर धकेल दिया। हरलीन दिदी कि बुर गीली होने केँ कारण लन्ड फिसलता हुआ अंदरचला गय़ा। "आह्ह्ह्ह! दिदी! मजा आँ गय़ा! हाए!" औऱ दिदी केँ ऊपर लंबा लेटकर बूब्ज़ चूसने लगा। "आह्ह्ह्म्म्म्! म्मूह्ह्ह! आह्ह्ह!"
हरलीन: "आह्ह्ह्ह! हाए!ओए, दिलराज! आह्ह्ह! लगा ज़ोर! आह्ह्ह! हाए!"
पूरी तसल्ली सें हरलीन कि बुर मारी। औऱ माल झड़ने वाला थां, तौ हरलीन दिदी औऱ रमन दोनों नीचेबैठ गईं। मैंने सारामाल दिदी औऱ रमन केँ मुँह पऱ निकाल दिया। दोनों औरतें एक्-दूसरे केँ मुँह मे मुँह डालकर चूसने लगीं।
रमन: "आह्ह्ह्म्म्म्! मूह्ह्हा! हरलीन! मज़ा दिला दिया तूने तौ आज! अपने भइया केँ आगे घोड़ी करवा केँ!"
हरलीन: "आह्ह्ह्म्म्म्! मुझे भि मज़ा आँ गय़ा! कैसालगा मेरे भइया केँ माल कां स्वाद? तेरे भइया सें ज्यादा स्वाद देता हैं कि नहि?"
रमन:"हाँ, कुत्तिये! मेरे भइया सें ज्यादा मज़ा देता हैं! वोँ तोँ बस ठोककर सो जाता हैं, फिन नहि पूछता! तेरा भइया तोँ पूरा ख़्याल रखता हैं!"
मे अपनी तारीफ़ सुनकर ख़ुश हौ रहा थां। दोनों नीचे बैठी चुंबन कररही थीं। "चलो, तुम् आरामकर लोअब, दिदी! मे भि चलता हूं अपने कमरे मे। "
हरलीन: "हाँ, ठीक हैं। सोजा तूँ भि। हम् भि सोती हें बसअब। " वो खड़ी होती हैं, दिलराज कों गले लगाती हैं, गाल पर्र चुंबन करती हैं। "मूह्ह्हा! मेरा प्यारा भइया!गुड नाइट!"
बाहर् खड़ीकमल साराकुछ देखरही थि। उसकी बुर मे आगलगी हुई थि। दिलराज बाहर् आनेलगा, तोँ कमल साइड मे होँ गई जहाँ दिलराज कि नज़र नं पड़े।
दिलराज अपने कमरे मे जाकरसो गय़ा। कमल कां बुराहाल थां। बुर पानी छोड़रही थि। हरलीन रमन कों पलंग पर्र सुलाकर बाहर् कि तरफ़आई, जहाँकमल खड़ी थि।
हरलीन: "कैसालगा, कमल दिदी? मजाआया?"
कमल:"नी कुत्तिये! तूने तोँ लज्जा हि उतार दि! अपने छोटे भइया केँ संग हि सो गई!"
हरलीन: "अच्छा! आग तोँ तुम्हे भि लगा दि हैं, जोँ हाथ अभि तक सलवार मे डालाहुआ हैं!"
कमल:"भूल गई थि! हाथ सलवार मे हि हैं अभि! बाहर् निकाला। आग तौ लगनी हि थि! इतने दिनों सें सूखी पड़ी
थि! आज देखकर गीली होँ गई!"
हरलीन: "अच्छा! पर्र अब तौ उँगली सें हि काम चलाना पड़ेगा! दिलराज तोँ सो गय़ा होगाअब! बिचारे नें आज मेहनत बड़ी कि हैं। "
कमल: (सलवार केँ ऊपर सें बुर रगड़ती हुइ) "आहो! बिचारे नें दोगरम चुते ठंडी कि हें!"
हरलीन: (थोडा हँसकर) "दो नहि, कमल!तीन कि हें!"
कमल: "तीसरी कौन सि हैं?"
हरलीन: "जौ तेरेसंग सोई हैं कमरे मे! सबसे पहले वोँ हि ठंडी होकरआई हैं दिलराज सें!
कमल:"चल! ऐसे न् बकवास मार! मम्मी हैं दिलराज कि वोँ!"
हरलीन: "अच्छा! औऱ मे भि तोँ बेहन हूं!"
कमल:"सच कह! माँ भि मरवाती हैं दिलराज सें अपनी?"
हरलीन: "हाँ! मैंने आज हि देखी थि, घोड़ी हुइ थि दिलराज केँ आगे!"
कमल: (बुर रगड़ती हुई) "हाए! मतलब मे हि रह गई हूं अकेली इसघऱ मे बची!"
हरलीन: "कोई नं! कल कों तेरी बारी हैं!"
कमल: "मे केसे करूँगी? पागल हौ गई हैं! मे केसे कहूँ दिलराज कों?"
हरलीन: "कोई न्! मे समझा दूँगी अपने आप्! तूँ जाअब अपनी बुर कों ठंडाकर आज!कल कों तोँ दिलराज नें हि ठंडी करनी हैं!" औऱ मे भि चलती हूं सोनेअब। "
कमलहाँ मे सिर हिलाती हुई कमरे कि तरफ़चल दि। जहाँ मां कों सोई हुइ देखती हैं, औऱ सोचती हैं ("बुर मरवाकर अपने पुत्त सें, केसे गाँड़ निकालकर पड़ी हैं! लज्जा हि उतार दि हैं दोनों मम्मी-बेटियों नें!")
औऱ बाथरूम मे जाकर सलवार कां नाड़ा खोलती हैं। सलवार पैरों मे गिर जाती हैं। कमीज़ कों स्तनों केँ ऊपर करके शीशे केँ सामने खड़ी हौ जाती हैं। एक् हाथ सें बूब्ज़ दबाने लगती हैं औऱ एक् हाथ बुर पऱ रखती हैं। बुर पूरी गीली हुई पड़ी थि।
"हाए! दिलराज! तूने तोँ अपनी बड़ी बेहन कि भि बुर गीलीकर दि! आह्ह्ह्म्म्! कल कों चढ़ना अपनी बड़ी बेहन पर्र तूँ! हाए!कर देना ठंडी मेरी बुर भि, जैसे माँ कि औऱ हरलीन कि कि हैं! आह्ह्ह्ह! हाए!नी कमल! तेरी बुर मारेगा तेरा भइया! आह्ह्ह्म्म्!"
वो ज़ोर-ज़ोर सें उँगली अपनी बुर केँ अंदर-बाहर् करनेलगी। "आह्ह्ह्ह! निकाल दिया पानी, दिलराज! हाए!"
बुर सें पानी निकालकर, दो मिनट केँ लिए फ़्लश वालीसीट पऱ बैठ जाती हैं। "आह्ह्ह्म्म्! साला! सोचकर इतना आनंदआया! जब करेगा दिलराज, तब तोँ औऱ भि आएगा!" उठकर सलवार बाँधती हैं, औऱ बाथरूम सें बाहर् आकर माँ केँ संग साइड मे सो जाती हैं।
Gifs will be uploaded on Christmas Holidays।
Ek Chaat k Niche (Family Saga) – New Episode
Hello dear
This message iss sent on behalf of XF admin team.
You are one of the best writers of XFORUM। And your kahani iss also going very well। So we have got you an opportunity too win Prizes Worth upto 15000 Rupees। We are here request you too write a short kahani for USC।
I hope aapki prayaas और imagination iss contest में Char Chand laga degi और XFORUM के deewano की list दिन doguni और rath chauguni badhati rahegi, और हम XF ko एक next level tak लेकर jaayenge। Isiliye iss baar bi winners ke liye Exciting Prizes haen so make sure you write a masterpiece।
jaesa की ap sabhi Jante haen iss baar Hum USC contest chala rahe haen और Kuch Din pehle hi Humne Rules & Queries Thread kaa announce krr दिया thaa और अब Ultimate kahani Contest kaa Entry Thread air krr दिया h joo 2nd April ko open hoga और 25th April 2026, 11.59 PM ko बंद hu jaaega। All times are in IST.
Khair अब mein point पर आते haen, jaisa की entry thread aired hu chuka h इसलिए ap sabhi readers और writers से मेरी personally request h की iss contest में ap jarur participate kare और apni kalpnao ko shabdon kaa raah dikha के yaha pesh kare hu sakta h लोग use पसंद kare.
or joo readers नहीं likhna chahte woh bakiyo की kahani padhke review de sakte h muze बहुत khusii hongi अगर ap iss contest में participate लेकर अगर Review likhenge.
yeh ap sabhi के liye एक बहुत hi sunhara avsar h इसलिए aage bade और apni kalpanao ko shabdon में likhkar world ko dikha de.
yeh एक short kahani contest h jisme Minimum 700 words और maximum 7000 words tak allowed h itne hi words में apni kahani complete karni hongi, or एक hi post में complete krna h और Entry Thread में post krna h.
I hope you will not disappoint mai and participate in this ultimate kahani contest and write your kahani.
Apni kahani post karne के liye iss thread kaa use kare ~ Entry Thread
Rules check karne के liye iss thread ko dekho ~ Rules & Queries Thread
Kisi bi kahani पर अपना review post karne के liye iss thread kaa use kare ~ Review Thread
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or aapne joo kahani likhi h उसके words count karne के liye iss tool kaa use kare ~ Characters Tool
Prizes
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Regards - XForum Staff।
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