Ek Chaat k Niche (Family Saga) – New Episode
युवराज कि नज़र जैसे हि नीचे गई, उसकी आँखें फटी कि फटीरह गईं।
औऱ पैरों केँ पास बैठी महिला कि आवाज़ आई, उसकी आवाज़ मे गहरा सदमा थां: "युवराज। तुँ?"
मैंने भि आँखें फाड़कर देखा। युवराज कि नग्न टाँगों केँ बीच बैठी वो महिला कोई औऱ नहि, हमारी अपनी मां थि! उसकेहाथ मे अभि भि मेरे भइया कां उत्तेजित लन्ड पकड़ा हुआ थां।
युवराज केँ मुँह सें बस इतना निकला, "मां। आप्?"
मैंने करीब फुसफुसाते हुए पूछा, "आप् दोनों यहा क्याँ कररहे हें?"
मां घबराकर खड़ी हुईं। उनकेभरे हुए मम्मे औऱ नीचे कि नग्नता उस रौशनी मे दर्दनाकरूप सें स्पष्ट थि। उन्होंने एक् हाथ लंबा करके अपनेगोल मुम्मों पर्र रखा औऱ दूसरा हाथ अपनी खुली हुईँ, गीली बुर पऱ। उन्होंने पलटकर करीब चीख़कर पूछा, "तुम् दोनों यहा क्याँ कररहे हौ?"
मैंने सहजता सें कहा, "वही जौ सरपंच करने वाला थां। "
सरपंच कां नाम सुनकर माँ बुरीतरह डरगईं। "क्याँ मतलब तेरा। सरपंच करने वाला थां?"
मैंने द्वार (दरवाज़ा) बंद किया औऱ सीधे मां केँ पास गय़ा। युवराज अभि भि स्तब्ध औऱ नंगा खड़ा थां। मैंने जाकर मां केँ होंठों पर्र अपने होंठरख दिए औऱ उनके मम्मो पऱ रखाहाथ हटा दिया।
युवराज चिल्लाया, "क्याँ कररहा हैं दिलराज! तेरी मम्मी हैं वोँ!"
मैंने बिनाहटे पलटकर देखा, "हाँ! औऱ जिसके सामने तुँ नंगा खड़ा हैं, औऱ जिसने पाँच मिनट पहले तेरा लन्ड अपने मुँह मे लिया थां। वोँ भि यही हैं!"
युवराज अपनी लज्जा कों छुपाने कि कोशिश करतेहुए बोला,
"वोँ ग़लती सें हुआ दिलराज! पीछेहट माँ सें। मे कपड़े पहनरहा हूं। मां, आप् भि पहनो औऱ घऱ चलते हें। "
"अच्छा युवराज! अगर तुँ नं होता, तोँ तेरी स्थान सरपंच होता, यह सोच!"
मां नें कहा, "क्याँ बोलेजा रहा हैं दिलराज! पीछेहट! कपड़े पहन लेनेदे!"
मैंने उन्हें अपनी बाँहों केँ शिकंजे मे कस लिया औऱ कहा, "हाँ! मैंने देख लिया थां सरपंच कों आतेहुए। वोँ अपनी मोटर कि तरफ़ आँ रहा थां, साला। मुझे देखकर वापस मुड़ गय़ा। "
"अच्छा?" युवराज कों अब दिलचस्पी हुई।
"माँ सें पूछ लेँ, तेरे सामने खड़ी हैं!"
युवराज नें अपने कपड़े एक् तरफ़रखे, नंगा हि मां केँ पास गय़ा, दोनों बाँहों सें पकड़ा औऱ पूछा, "सच माँ? जौ मे सोचरहा हूं, वहीबात हैं?"
माँ चुप रहीं। युवराज समझ गय़ा कि माँ सरपंच कों देने वालीथीं।
वो आग-बबूला हौ गय़ा, "ओ साला हरामज़ादा सरपंच! हमारी ताई कि औऱ मम्मी कि लेता हैं, औऱ हम् मादरचोद चूतिये हें!" युवराज पूरे गुस्से मे बोला।
मां नें मेरी तरफ़ देखा, "तुम्हें तुम्हारी ताई केँ बारे मे किसने बताया?" उन्हें लगा ताई नें हमें बताया होगा।
"कल देख लिया थां हमने! सरपंच अपनी मोटर पऱ ताई कि लें रहा थां! औऱ हमने सरपंच कों पकड़ लिया थां। कहा कि हमने वीडियो बनाई हैं, औऱ उसकी गांडफट गई थि!" मैंने जानबूझकर झूठ बोला। "पऱ बहनचोद कि इतनी हिम्मत कि आज तुम्हें बुला लिया!कल हमने ताई केँ संग पकड़ा, कल तौ वो तुम्हारे बारे मे कुछ नहि बोला!"
माँ नें हिम्मत जुटाकर कहा, "मे कौन सां रोजआती हूं उसकेपास! तुम्हारी ताई नें हि बात करवाई थि चार-पाँच दिन पहले। आज सुभह सें फ़ोनकिए जारहा थां, इसलिये आज ज़ोर डालकर उसने मुझेयहा मोटर पऱ बुला लिया। मुझे क्याँ पता थां कि यहसभी होँ जाएगा!"
"पऱ तुम् दोनों यहा क्याँ करनेआए थें?"
"हमने तौ ताई कों बुलाया थां। युवराज कों ताई कि लेनी थि। "
मां नें सर हिलाया, "अच्छा, तभी युवराज कुछ नहि बोलाजब मे कररही थि। मुझे ताई समझरहा थां?"
"हाँ!" युवराज नें पुष्टि कि। "पर्र मुझेअब सरपंच पऱ क्रोध आँ रहा हैं। बहनचोद कि इतनी हिम्मत कि हमारे घऱ कि औरतों कों." वो इतना बोलकर चुप होँ गय़ा।
मे माँ कि तरफ़देख रहा थां। मां मुँह नीचे करके पूरी नंगी खड़ीथीं। ऐसालग रहा थां जैसे कपड़े पहनना भूल गई हों। युवराज भि नंगा हि सरपंच कों गालियाँ दिएजा रहा थां।
मे थोडा आगे बढ़ा, मां केँ पास गय़ा, औऱ मुस्कुराकर पूछा, "माँ, क्याँ हुआ?ऐसे क्यूं खड़ी हौ? युवराज कां बाकीकाम करदोअब, याँ ऐसे हि खड़ी रहोगी?"
माँ नें मेरे मुँह कि तरफ़ देख्ना शुरुआत कर दिया।
युवराज फिन भड़का, "पागल हौ गय़ा हैं तूँ दिलराज! साले, मम्मी हैं हमारी!"
"अच्छा! पहले अपने नीचेदेख, फिनबोल कि क्याँ करना हैं!" (मैंने तोँ पहले हि ठोंक चुका थां मां कों। युवराज भि ठोंक लें, तौ घऱ मे ठोंकने कि थोड़ी आसानी हौ जाए!) पऱ युवराज कुछ ज्यादा हि सोचरहा थां।
युवराज बोला, "नहि दोस्त, यह ग़लत होगा। मुझसे नहि होगा। "
माँ नें भि बीच मे टोका, "हाँ दिलराज बेटे! क्याँ बोलेजा रहा हैं? यहसभी ग़लत हैं। तुम् मेरे बेटे हौ!"
मैंने एक् नक़ली क्रोध दिखाते हुए, माँ कों आँख मारते हुएकहा, "अच्छा बहनचोद ! जब सरपंच सें मरवानी थि, तब इतनी शरीफ़ियत सें नहि बोल्ना थां!"
माँ समझगईं कि मे युवराज सें ठुकवाना चाहता हूं, तभी युवराज पऱ इतना ज़ोरडाल रहा हूं।
युवराज फिन बौखलाया, "केसेबोल रहा हैं दिलराज! लज्जा कर थोड़ी!"
"जब हमारी मम्मी कों बाहर् लोगों सें मरवाने आते लज्जा नहि आई, तोँ मे क्यूं करूँ! मे तौ इस साली कों ठोंकूँगा! तूँ देख लेँ अब युवराज, तेरी मर्ज़ी हैं! मेरे सें तोँ इसे नंगी देखकर रहा नहि जाता!"
औऱ मे जल्दी मां केँ पास गय़ा, उनके शरीर कों चूमने लगा, औऱ उनके दोनों मम्मो कों मुँह मे भरकर चूसने लगा।
मां नें ममता औऱ दर्द केँ मिश्रण मे कराहना शुरुआत किया, "पऱ बेटे, यह ग़लत हैं। आहह-आहह! मे तेरी मम्मी हूं। अहम्म! नाँ कर, प्लीज़! छोड़दे! युवराज, तूँ हि समझा अपने भइया कों!"
मे एकदम सें पीछेहट गय़ा। मां कों लगा मे मान गय़ा। मे थोडा पीछे हटकर लाइटबंद कर दि। कमरे मे फिन सें घुप अँधेरा होँ गय़ा।
मैंने अपना पजामा नीचे किया औऱ माँ कों झुकने कों कहा। थोडा नाटक करती हुई मां झुकगईं। मैंने अंधेरे मे युवराज कों फुसफुसाया, "युवराज! डालदे मुँह मे, जैसा पहले डाला थां! अँधेरे मे पता नहि चलेगा कौन हैं!"
युवराज कां कोई जवाब नहि आया। मैंने पीछे खड़े होकर माँ कि बुर पर्र लन्ड रखा औऱ एक् हि झटके मे धकेल दिया!
"आहहहहह! आया स्वाद अब। आहहहह!"
मां दर्द सें चीख़ी, "आहहहह! मर गई रे! धीरे-धीरे डालरे कुत्ते! आहहहह! हाय!"
मैंने तेज़ धक्के मारते हुएकहा, "आहहहह! सरपंच नें ऐसे डालना थां तेरे, मां! आहहहह! क्या बात है! फिन चिल्लाती ऐसे, बोल! अब बेटों कां लन्ड लें औऱ चीख़ें मार! आहहहह!"
मे जानबूझकर मां कों बोल बोलकर पूरा आनंददे रहा थां, ताकि आवाज़ें सुनकर युवराज भि मूड मे आँ जाए।
माँ कराहरही थीं, "आहहहह! रे, धीरे-धीरे मार धक्के! मुझसे ऐसे घोडी नहि हुआ जाता! आहहहह! ओह!"
इतने मे, मेरे सामने एक् गहरी आवाज़ आई। "उम्मम्म." लन्ड केँ पास मुँहछूआ। औऱ एकदम सें मुँह मे चला गय़ा!
"गल्प!। ऊँम्ममहाहहहह!। आहम्म!"
युवराज नें दोनों हाथों सें मुँह कों पकड़ा औऱ तेज़ धक्के मारने लगा!
युवराज आवेश मे चीख़ा, "आहहहह! चूस मेरा लौड़ा! आहहहम्म! साली! सरपंच कां लन्ड चूसना थां! अब अपने बेटों कां चूसा करेगी! आहहहहह!"
युवराज कि आवाज़ें सुनकर मुझे भि जोश आँ गय़ा!
मैंने पीछे सें बुर मे धक्के मारते हुए चिल्लाया, "आहहहह! धकेलदे युवराज! मुँह मे पूरा! आहहहहह!"
थोड़ी देरबाद, मेरामाल निकल गय़ा, जोँ मैंने माँ कि गांड पऱ निकाल दिया। औऱ युवराज कां भि निकल गय़ा थां।
माँ नें हाँफते हुएकहा, "लाइटऑन करो! जल्द कपड़े पहनो औऱ घऱ चलते हें!"
युवराज नें अभि भि गुस्से मे कहा, "मे तौ अभि बुर लूँगा तेरी, साली!"
माँ नें गहरे कंट्रोल मे कहा, "यह क्याँ बोलरहा हैं? थोड़ी इज़्ज़त सें बातकर! मम्मी हूं तेरी मे! कोई रंडी नहि जौ ऐसे बकवास कररहा हैं मेरे सामने!"
युवराज नें पलटवार किया, "अच्छा रंडी नहि! तौ फिन सरपंच कि रखैल बननेआई थि यहा! मे तौ ऐसे हि बोलूँगा! जौ करना हैं कर! तूँ साली रांड!"
युवराज कों पता नहि क्याँ होँ गय़ा थां, पागलों कि तरह बोलेजा रहा थां। मे युवराज केँ पास गय़ा, "चल कपड़े पहन। माँ कहां भागीजा रही हैं? फिन लेँ लेना! अभि घऱ चलते हें!" बड़ी मुश्किल सें युवराज कों समझाया।
माँ नें भि थोडा क्रोध कंट्रोल करतेहुए कहा, "हाँ बेटा, चल मेरे! बहोत वक्त ख़राब हौ गय़ा। घऱ जाकर देखते हें। चलोअब यहा सें निकलो!"
फिन युवराज नें भि घऱ जानां ठीक समझा। हमने कपड़े पहने औऱ घऱ कि ओर निकलगए। माँ कों पहलेभेज दिया। उसके पंद्रह मिनटबाद हम् चले।
घऱ आकर बैठे, तौ युवराज बस मां कों हि देखेजा रहा थां। फिन मां औऱ बेहन नें रोटी बनाई। सबने रोटीखा ली। बड़ी दिदी हरलीन केँ पास अपने कमरे मे चली गई। माँ भि अपने कमरे मे चलीगईं। हम् दोनों सोफ़े पऱ बैठे थें। मैंने युवराज कों समझाया कि अपने गुस्से पर्र कंट्रोल रखे। "डैडी कौन सां यहा हें? मां मजबूरी मे गई होगी सरपंच केँ पास। " युवराज समझ गय़ा।
जब बेहन केँ कमरे कि लाइटऑफ़ होँ गई, तौ हम् दोनों उठे औऱ दबे पाँव माँ केँ कमरे मे चलेगए।
माँ नें पूछा, "हाँ, अब क्याँ करनेआए होँ तुम् दोनों?"
युवराज नें थोडा शर्मिंदा होतेहुए कहा, "मां, सॉरी! मैंने आपको मोटर पर्र कुछ अधिक हि बोल दिया थां। "
माँ नें मुस्कुराकर कहा, "कोई बात नहि। इधर आँ मेरेपास। " औऱ "दिलराज बेटे, तुँ द्वार (दरवाज़ा) लॉककर दे। "
युवराज मां केँ पास जाकरबैठ गय़ा। मां नें उसेगले लगाया औऱ उसका माथा अपनी छाती पऱ रख दिया। "तेरीकोई ग़लती नहि युवराज बेटे, ग़लती तोँ मेरी हैं। मे हि गई थि सरपंच केँ पास। "
युवराज नें कहा, "कोई बात नहि मां। आपकी भि कोई मजबूरी थि, मे समझता हूं। पर्र अब टेंशन मतलो। हम् दोनों आपका ख़्याल रखेंगे। "
माँ थोडा हँसने लगीं, "हाँ-हाँ, क्यूं नहि! मेरे बेटों नें हि तोँ ख़्याल रखना हैं!" उन्होंने पास बैठे दिलराज कों भि गलेलगा लिया। हम् दोनों केँ बीच बैठी मां केँ मुँह पर्र एक् संतुष्टि वाली मुस्कान थि।
युवराज नें मां केँ होंठों मे अपने होंठडाल दिए औऱ चूसने लगा। "ऊँम्ममहाहहह." मे उनकी गर्दन पर्र चूमरहा थां। इसीतरह, चूसते चूसते हम् दोनों नें माँ कों नंगाकर दिया। युवराज पूरी ग़ौर सें देखरहा थां। फिन हम् दोनों भि नंगे होँ गए।
औऱ फिन बारी बारी हमने एक् एक् बार माँ कों चोदा। रात ज्यादा हौ गई थि। अगर दूसरी बार चोदते, तोँ सुभह हौ जाती। माँ कों सुभह उठना थां, इसलिये हम् दोनों अपने कमरे मे चलेगए, औऱ मां भि सोगईं।
(दूसरी तरफ़ हरलीन केँ कमरे मे)
करवटें लेती हुईँ कमल नें सोचा, 'आज नींदपता नहि क्यूं नहि आँ रही। ' उसने पूछा, "सो गई क्याँ हरलीन?"
हरलीन नें जवाब दिया, "नहि, जागरही हूं दिदी। मुझे भि आज नींद नहि आँ रही। "
कमल नें थोड़ी देर सोचने केँ बादकहा, "इससाल तेरी ग्रेजुएशन पूरी होँ जानी हैं हरलीन। फिनकोई लड़का ढूँढें, याँ तूनेकोई सीरियस वाला ढूँढ लिया हैं?"
हरलीन नें कहा, "अभि कहां दिदी! अभि बहोत समय हैं। मे पहले नौकरी करूँगी, फिन ब्याह केँ बारे मे सोचूँगी। "
"अच्छा! मतलब अभि तक समयपास किएजा रही हैं! कोई मिला नहि सीरियस वाला, जिसने मेरी बेहन कां दिल लूटा होँ?"
हरलीन नें थोडा खुलासा किया, "अभि तक तौ सभीऐसे हि टकराए थें। अभि वालाठीक हैं थोडा। बाक़ी देखो। अधिककुछ सीरियस नहि हैं अभि। " (बेहन भाइयों केँ बीचआपस कि बातें तोँ हरकोई शेयर करता हि हैं, दो बहनें तौ करती हि हें ज़्यादातर)।
कमल नें मुस्कुराकर कहा, "हम्म! सीरियस नहि मिलाकोई! तोँ इतनाबदन तेरा टाइमपास वालों नें बना दिया?"कमल नें हरलीन केँ कंधे पर्र हँसते हुएहाथ मारा औऱ छेड़ा।
हरलीन भि लज्जा सें हँस पड़ी, "इतना तोँ बन हि जाता हैं!" औऱ फिन उसने पलटकर पूछा, "आप् बताओ! आपका ख़्याल रखते हें कि नहि जीजाजी?"
कमल नें नख़रे सें कहा, "औऱ लें! देख लिया! तुम को अपने आप् देखने सें पता नहि लगता?"
हरलीन पीछे हटकरकमल कों एकटक देखती हुई मज़ाक मे बोलीं, "अब तोँ देखने केँ बाद गाँव केँ हर एक् लड़के केँ आग लगती होगी! सोचते होंगे कि यहवही कमल हैं जोँ पहले तीली जैसी होती थि!"
कमल हँसते हुए बोलीं, "सच हरलीन! असलीरंग तौ ब्याह केँ बाद हि चढ़ा हैं मुझ पर्र जवानी वाला!"
"मैंने तौ बहोत कहा थां आपको ब्याह सें पहलेकर लो किसी केँ संग! अपने आप् रंगचढ़ जानां थां पहले हि! आप् सती सावित्री बनी रहीं!"
"अच्छा जी!हाँ, तेरीतरह पहले हि छाती बाहर् निकाल लेती! मुझे नहि पसन्द थां यहसभी। "
"अच्छा! औऱ अब मनपसंद हैं?"
"हाँ, अब मनपसंद हैं। "
थोड़ी देरइसी तरह बातें करतेरहे। कमल कि हिम्मत नहि पड़रही थि कि हरलीन सें बच्चे वालीबात केसे शुरुआत करूँ। इतने मे हरलीन स्वयं हि बोल पड़ी:
"दिदी, दोसाल हौ गए!फिन बच्चे केँ बारे मे नहि सोचाकुछ? अबकबबना रहे होँ मुझे फूफी ?"
कमल कों थोड़ी ख़ुशी हुई कि बच्चे कि बात शुरुआत हुई। पर्र वो चुपचाप लेटीरही, कुछ बोलि नहि।
हरलीन नें पूछा, "क्याँ होँ गय़ा? बोल क्यूं नहि रहीकुछ?"
कमल नें थोडा भोला औऱ रोने जैसा मुँह बनाकर कहा, "कुछ नहि! क्याँ बताऊँ अब तुम्हे हरलीन! भाग्य हि ख़राब हैं। "
हरलीन डर औऱ टेंशन मे बोलीं, "टेंशन मतलो दिदी! डॉक्टर कों दिखाया आपने?"
कमल नें कहा, "हाँ! सभी स्थान दिखा दिया, पर्र सभी स्थान रिपोर्ट सेम हैं। मुझ मे हि प्रॉब्लम हैं। "
हरलीन नें दिलासा दिया, "रब पऱ भरोसा रखो!सभी ठीक हौ जाएगा!"
कमल केँ आँसू गिरने लगे, "अब तोँ उम्मीद हि छोड़ दि हैं हमने! देखते हें। कोई बच्चा गोद लें लेंगे। "
हरलीन नें कमल कों गले लगाया औऱ कहा, "आप् रोओमत दिदी! मुझसे आपकोऐसे देखा नहि जाता!"
कमल नें रोतेहुए कहा, "औऱ क्याँ करूँ! अपनी भाग्य कों रोती हूं! तेरे जीजाजी इतने अच्छे हें, वोँ कुछ नहि कहरहे। कहते हें 'कोईबात नहि, बच्चा न् हौ। मुझे तुम् चाहिए बस'। इतना प्रेम करते हें मेरेसंग, औऱ मे उन्हें एक् बच्चा नहि दे सकती!"
"चुप करो दिदी! रोओमत! कुछ तोँ हल होगा! मिलकर करेंगे कुछ!"
कमल नें धीरे-धीरे सें कहा, "मैंने इन्हें कहा कि किसी औऱ लड़की केँ संग करके अपना बच्चा लें लो, मे संभाल लूँगी। "
हरलीन नें जल्दी कहा, "औऱ नहि तोँ क्याँ! लड़कीबाद मे केसकर देगी आप् पर्र! कहीं प्रॉपर्टी न् हथिया लें बाद मे आपकी!"
कमल नें सहमति दि, "तेरे जीजाजी कों भि यहीडर हैं। मैंने कॉन्ट्रैक्ट करने कों कहा थां? तुझेही क्याँ लगता हैं, ऐसा करनाठीक रहेगा?"
"ठीक तौ हैं। पऱ कौन-सि लड़की मानेगी ऐसा करवाने कों? औऱ इतनी भरोसे वालीकहा मिलेगी?"
कमल नें कुछ सोचते हुए हरलीन कां हाथ अपनेहाथ मे पकड़ा औऱ आँसुओं सें भरआई, "प्लीज़ हरलीन! मेरी सहायता कर! मे मर जाऊँगी ऐसे!"
"ऐसे क्यूं बोलरही होँ?"
"तुँ हि सहायता कर सकती हैं हरलीन! तूँ हि दे सकती हैं अब बच्चा मुझे! मुझे किसी औऱ पऱ भरोसा नहि!" उसने एक् हि साँस मे सभीकुछ बोल दिया।
हरलीन हैरान थि, "क्याँ? यह केसे हौ सकता हैं दिदी? मे बेहन हूं तेरी, छोटी!"
"तभी तौ तेरे पर्र भरोसा हैं! तेरे जीजाजी कों भि तेरे पऱ हि भरोसा हैं!"
"क्याँ? आपने जीजाजी सें बात कि हैं इस बारे मे?"
"हाँ!कोई औऱ सॉल्यूशन नहि थां हमारे पास!फिन तेराकहा थां मैंने। मानगए हें तेरे जीजाजी भि!"
"मुझेसमझ नहि आँ रही कि आप् क्याँ कहरही हौ! मे केसे करूँगी यहसभी अपने जीजा केँ संग?"
कमल रोतेहुए बोलि, "प्लीज़ हरलीन! अपनी बेहन कि सहायता करदे! सिर्फ़ नौ महीने चाहिए तेरे! मे किसी औऱ कों भि नहि कह सकती। माँ कों कहा, उन्होंने कहा 'हरलीन सें पूछ लें। ' मे क्याँ करूँ हरलीन? कुछसमझ नहि आँ रही!"
"आपने मां सें बात कि? वोँ क्याँ कहती हें?"
"वोँ कहती हें हरलीन सें पूछ लेँ, अगर मानती हैं तोँ। "
"माँ कों कोई प्रॉब्लम नहि?"
"माँ नें कुछ नहि कहा!बस तुँ हाँकर दे हरलीन! अपनी बेहन कि ज़िंदगी बचा लें! तेरेहाथ मे हैं!"
"पर्र दिदी, करेंगे केसे?"
"वोँ सभी मेरे पर्र छोड़दे! एक् महीने बाद तेरे जीजाजी नें दुबई सें आँ जानां हैं। फिन थोड़े वक्तबाद हम् तीनों दुबईचले जाएँगे! तूँ कह देना कि तेरी नौकरी लग गई हैं, इंटर्नशिप केँ लिए जानां हैं! वहा एक् महीना लगाएँगे, जब तक तूँ प्रेग्नेंट नहि होती!फिन बाक़ी आठ-नौ महीने इंडिया आकर गोवा याँ कहीं औऱ रह लेंगे, जब तक बच्चा नहि होता!"
"तूने तौ साराकुछ सोचरखा हैं! क्याँ औऱ कहां करना हैं! तेरे सासू-ससुरजी कों क्याँ कहेगी, अगर उन्होंने घऱ रहने कों कहा?"
"नहि कहते! वैसे भि वोँ ज़्यादातर अपनी नौकरी मे बिज़ी रहते हें। लगा लेंगे कोई एक्सक्यूज़। "
हरलीन चुप थि। कुछ नहि बोलि।
कमल कों ये तोँ पतालग गय़ा कि हरलीन मान गई हैं। बस, जल्द जल्द वोँ दिन आँ जाए, यही चाहती थि।
जब हरलीन कुछ नहि बोलीं, तोँ कमल नें आगे बढ़कर, लेटेहुए हि, हरलीन कां मुँह पकड़ा, उसकी गालों पऱ चुम्मा लिया औऱ कहा, "थैंकयू हरलीन! तूँ मेरी इतनी बड़ी सहायता करनेलगी हैं! मे तेरायह एहसान कभी नहि भूलूँगी!"
हरलीन नें अपनी चुप्पी तोड़ी, "ऐसा नं बोलो दिदी! मे आपकी हि हूं। जैसे मर्ज़ी इस्तेमाल करलो मुझे। आपकेलिए मेरीजान भि हाज़िर हैं!"
कमलये सभी सुनकर फिन भावुक होँ गई औऱ हरलीन कों गलेलगा लिया।
हरलीन नें कहा, "चलो सोजाओ दिदी अब। बहोत रात हौ गई हैं। औऱ रोओमत। मे हूं नं! टेंशन मतलो!"
इसी तरह बातें करतेहुए दोनों बहनें सोगईं।
सुभह हुई। अपने वक्त सें दोनों भइया औऱ हरलीन कॉलेज निकलगए। पीछे मनजीत औऱ उसकी बड़ी बेटी रहगईं। नहा धोकर दोनों मां बेटियों नें रोटीखाई औऱ बातें करने लगीं। कमल नें अपनी मम्मी कों बताया कि हरलीन बच्चे केँ लिएमान गई हैं। मनजीत थोड़ी परेशान भि थि औऱ ख़ुश भि कि हरलीन नें अपनी बेहन कां दर्द समझा।
फिन कमल नें प्लान बताया कि हरलीन कों दो-तीन महीने बाद दुबई लेँ जाएँगे। वहा प्रेग्नेंट होँ जाएगी, तौ फिन इंडिया मे हि कहीं गोवा याँ मुंबई जैसी सिटी मे डिलीवरी करवा लेंगे।
मनजीत बस बैठीसुन रही थि जोँ कमलबोल रही थि।
कमल नें कहा, "पर्र मां, एक् प्रॉब्लेम हैं। "
मनजीत नें पूछा, "अब क्याँ प्रॉब्लेम हैं?"
कमल नें जवाब दिया, "जब मे अपने सासू ससुरजी कों बताऊँगी कि मे प्रेग्नेंट हूं, तौ वोँ कहेंगे 'घऱ आँ जा'। फिन केसे आऊँगी? मेरा कहां पेट निकला होगा?"
"हाँ, प्रॉब्लेम तोँ हैं यह!फिन कुछ सोचा कि क्याँ कहना हैं तब?"
"सोचती हूं। अभि हें दो-तीन महीने। "
फिनइसी तरह दोनों इधरउधर कि बातें करती रहीं।
औऱ कॉलेज मे, युवराज औऱ मे लेक्चर सें बंक मारकर कैंटीन मे बैठे बातें कररहे थें कि युवराज नें रात वालीबात शुरुआत कर दि।
युवराज नें पूछा, "दोस्त दिलराज, रात जोँ किया, क्याँ लगता हैं, ठीक किया हमने?"
दिलराज नें थोडा अनजान बनकर स्वाद लेतेहुए पूछा, "क्याँ कियारात कों ऐसा हमने?"
"चल, अधिक अनजान नं बन! जैसे तूनेकुछ किया हि न् होँ! साले, तब तौ धक्के पे धक्के मारेजा रहा थां, जैसे रोज़ लेता हौ! यह नहि पता थां कि मम्मी अपनी कि लेँ रहा थां!"
"अच्छा! मुझेकह रहा हैं! ठोंका तौ रात कों तूने भि बड़े मज़े सें थां मां कों!"
"धीरे-धीरे बोल बहनचोद! किसी नें सुन लिया तौ गांड मे लन्ड पड़ जाएगा! औऱ हाँ, ताई कि बता, कब दिलवानी हैं अब! औऱ साले सरपंच कां काटाकब निकालना हैं?"
"हाँ!कोई नां, टेंशन नं लेँ! ताई कां भि करते हें जुगाड़, औऱ संग मे सरपंच कां भि करते हें!"
फिन दोनों अगला लेक्चर लगाने निकलगए। कॉलेज खत्म होने केँ बादघऱ चलेगए। हरलीन भि घऱ आँ गई थि।
साम कों मोटर कि तरफ़ घूमने गए। मोटर पऱ भि कोई नहि मिलाआज, थोडीसैर कि औऱ घऱ कि तरफ़चल पड़े। घऱ केँ बाहर् ताई मिलगईं। हम् दोनों नें ताई कों सत श्री अकालकहा।
ताई नें पूछा, "कहां सें आए मेरे बेटे, घूमकर?"
दिलराज नें जवाब दिया, "बस ताई, मोटर कि तरफ़गए थें एक् चक्कर लगाने। "
ताई नें कहा, "अच्छा अच्छा! आओघऱफिन! गरमचाय बनाती हूं!"
युवराज नें शरारत सें कहा, "नहि-नहि ताई! फिन किसीदिन! औऱ गरमचाय नहि, दूध पिएँगे!" (वो ताई केँ मुम्मों कि तरफ़ देखेजा रहा थां)।
दिलराज नें बीच मे बात काटी, "औऱ ताई, अमन कां फ़ोनआया थां? औऱ कुलजीत दिदी कैसी हें अब?ठीक हें?" (यह साला युवराज भि नं, पता नहि क्याँ बोले जाता हैं, केसे देखे जाता हैं ताई केँ मुम्मों कों)।
ताई नें कहा, "आया थां फ़ोनअमन कां, ठीकठाक हैं। कुलजीत भि ठीक हैं। दो-एक् दिनबाद अपनेगाव सें दवाई लेँ आएगी, अगर ज्यादा फ़र्क़ न् पड़ा तोँ। "
इतना बोलकर हम् घऱचले गए।
घऱ जाकर रोटी खाकर फ़्री हौ गए। औऱ हम् बाहर् बरामदे मे घूमने लगे। माँ किचन मे बर्तन साफ़ करने लगीं। बड़ी दिदी हरलीन केँ पास बैठी थि।
कमल नें हरलीन सें कहा, "आज मे मां केँ संगसो जाऊँगी। तुँ डिस्टर्ब होती होगी न्! औऱ तेरीबात भि करनी होती होगी। "
हरलीन नें कहा, "नहि नहि! ऐसीकोई बात नहि! बात करनी होती तौ आपके सामने कर लेती। कौन सि लज्जा हैं आपसे?"
कमल नें कहा, "हम्म, पता हैं मुझे। पऱ आज मे मां केँ संगसो जाऊँ। मां कां दिललगा रहता हैं फिन। "
थोडीदेर बाद हम् अंदर आँ गए, औऱ माँ भि किचन सें फ़्री होँ गईं। हरलीन अपने कमरे मे चली गई, औऱ मां औऱ बड़ी दिदी कमल इकट्ठी कमरे मे चलीगईं।
दोनों कों इकट्ठा कमरे मे जातेदेख युवराज कां मुँहउतर गय़ा,
युवराज नें झुंझलाकर कहा, "लें! हौ गय़ा काम! बहनचोद! दिदी कां भि पता नहि लगता। आज माँ केँ संगसो गई! बहनचोद, काम ख़राब होँ गय़ा!"
दिलराज नें कहा, "चल कोई नं! कलसही! क्यूं टेंशन लेता हैं?"
हम् दोनों भि अपने कमरे मे चलेगए। युवराज कां काम मुश्किल हुआ पड़ा थां (बुर लेकर अगलादिन बिना बुर केँ काटना बहोत मुश्किल होता हैं, जिन्होंने ली हैं उन्हें पता होगा, याँ जौ शदिशुदा हें)। उसने बाथरूम मे जाकरमुठ मारी औऱ आकरसो गय़ा। मेराकाम भि मुश्किल थां, पऱ मे कंट्रोल कररहा थां।
इतने मे मेरे फ़ोन पर्र मैसेज आया:
"सो गय़ा कि, याँ जागरहा हैं अभि?"
*अधुरे सवाल अगले अध्याय कि लिये:ज- यह मैसेज किसका आया? औऱ युवराज अब ताई औऱ सरपंच दोनों कां हिसाब केसे करेगा?
आप् भि अपनीफॅन थिअरीस कमेंट कर सकते हैं।
Ek Chaat k Niche (Family Saga) – New Episode
मेरेलिए स्वयं पऱ काबू पाना बेहद मुश्किल होँ रहा थां, शरीर मे एक् अजीब सि बेचैनी थि। मे करवटें बदल हि रहा थां कि तभी फ़ोन कि स्क्रीन जगमगा उठी। एक् मैसेज आया थां :
"सो गय़ा याँ, जागरहा हैं अभि?"
नंबर हरलीन दिदी कां थां। धड़कनें थोड़ी तेज़ होँ गईं। मैंने जल्दी जवाब टाइप किया: "नहि, जागरहा हूं। कम्बख्त नींद हि नहि आँ रही। "
हरलीन: "हाल तोँ मेरा भि वही हैं। आज दिदी, मां केँ संगसो गई हें। कोईसमय पास करने वाला भि नहि हैं। "
मे: "अच्छा? औऱ तुम्हारा वोँ। रवनीत? उससेबात नहि हौ रही क्याँ?"
हरलीन: "नहि दोस्त, वोँ आजकल बहोत बिज़ी रहता हैं। ढंग सें बात हि नहि हौ पाती। वैसे, तुम्हे एक् ज़रूरी बात बतानी थि। रमन कां फ़ोनआया थां। पगलीपूछ रही थि कि फिनकब मिलना हैं। "
मे: "अच्छा! फिन क्याँ कहा उसने?"
हरलीन: "यहाचैट पऱ टाइप नहि होँ रहा मुझसे। एक् कामकर, अगर युवराज सो गय़ा हैं तौ चुपचाप मेरे कमरे मे आँ जा। फिन बताती हूं सारीबात तसल्ली सें। "
ये पढ़ते हि मेरे जिस्म मे बिजली दौड़ गई। मे जल्दी बिस्तर सें उठा, कमरे सें बाहर् झाँका। घऱ मे सन्नाटा थां। दबे पाँव सीढ़ियों सें नीचे उतरा। युवराज घोड़े बेचकर सोरहा थां औऱ मां केँ कमरे कि लाइटबंद थि। दिल कि धड़कनों कों संभालते हुए मे हरलीन दिदी केँ कमरे मे दाखिल हुआ। द्वार (दरवाज़ा) अधखुला थां।
हरलीन: "कुंडी लगादे। " उनकी आवाज़ मे एक् मादकनशा थां।
मैंने कुंडी चढ़ाई औऱ उनकीतरफ मुड़ा। दिदी बिस्तर पर्र बैठीथीं। उन्होंने गहरेलाल रंग कि एक् बेहद ढीली औऱ पारदर्शी सि सलवार-कमीज़ पहनरखी थि। वोँ मलमल कां कपड़ा उनके शरीर कि आग कों छुपाने मे नाकाम थां; उनके उरोजों कां उभार साफ़झलक रहा थां। लालरंग मे उनका सफ़ेद शरीर औऱ भि कयामत लगरहा थां। मे मंत्रमुग्ध सां उनकेपास जाकरबैठ गय़ा।
"हाँजी, अब बताइए। क्याँ कहरही थि आपकी सहेली रमन?"
हरलीन नें अपनी लटों कों पीछे किया। "बस यहीरट लगारखी हैं कि कब मिलेगा? मैंने तेरा नंबरदे दिया थां, पर्र फिन भि मुझे हि माध्यम बनारही हैं। "
मे: "तोँ बताओ, हुकुम करो। कब बुलाऊँ उसे?"
हरलीन: "अब मुझे क्याँ पता? वोँ कहरही थि बाहर् मिलना सेफ़ नहि हैं, होटल मे रिस्क हैं। "
मे: "तौ फिन औऱ कहां?"
हरलीन: "वोँ कहरही हैं याँ तौ रात कों हमारे घऱ आँ जाए, याँ फिन वोँ तुम्हें अपनेघऱ बुला लें। "
मे: "दिमाग़ खराब हैं क्याँ? उसकेघऱ गय़ा औऱ किसी नें देख लिया तोँ खाल उधेड़ देंगे मेरी। औऱ यहारात कों बुलाया तोँ युवराज मेरे कमरे मे हि होता हैं, केसे करेंगे?"
कमरे मे कुछसमय कि खामोशी छा गई, मात्र हमारी साँसों कि आवाज़ थि। मेरी नज़रें उनकी छाती पऱ टिकीथीं। एक् शैतानी औऱ कामुक विचार मेरे दिमाग़ मे आया। मे थोडा आगे खिसका।
"एक् मार्ग हैं। अगर तुम् राजी होँ तौ। "
हरलीन: "वोँ क्याँ?" उनकी आँखों मे भि चमक थि।
मे उनके इतना लगभग हौ गय़ा कि हमारी साँसें टकराने लगीं। "तुम् रात कों इस कमरे मे हि रहना, औऱ मे तुम्हारे कमरे मे आँ जाऊँगा." मैंने अपनीबात अधूरी छोड़ी औऱ उनके होंठों पऱ अपने होंठरख दिए। "औऱ तुम् भि संग हि रहोगी। बस देख्ना औऱ मजा लेना। "
अगले हि समय, मैंने उनके होंठों कों अपने मुँह मे भर लिया। एक् गीली औऱ गहरी 'चूम्म्म' कि आवाज़ गूंजी। "आह्ह्ह्म्म! उम्माह्ह्ह!"
हरलीन नें कोई विरोध नहि किया, बल्कि मेरे बालों मे उंगलियाँ फंसाकर मेरासंग देने लगीं। एक् मिनट तक हम् पागलों कि तरह एक्-दूसरे कां मुँह चूसते रहे। मेराहाथ सरकते हुए उनके उछलते हुए स्तनों पर्र जा टिका।
"क्याँ तुम् मेरासंग दोगी, दिदी? रमन केँ संग मिलकर?"
हरलीन: "हाए! धीरे-धीरे बोल कमीने! आऊच! अंह्ह्ह! क्याँ तुँ हम् दोनों कों एक् संग संभाल पाएगा?"
मैंने उनके गोल-मटोल स्तनों कों अपनी मुट्ठी मे भरकरजोर सें भींच दिया। कपड़े केँ नीचे उनकी गर्मी मेरी हथेलियों कों जलारही थि। "वोँ तुम् मुझ पर्र छोड़दो। उसका ट्रायल तौ अभि मिल जाएगा तुम्हें। "
हरलीन: "आऊच! धीरे-धीरे! क्याँ मतलब 'ट्रायल'?"
मे: "अभि बताता हूं!" मैंने झटके सें उनकी कमीज़ कां पल्ला पकड़ा औऱ उसे उतारकर एक् कोने मे फेंक दिया। नज़ारा देख मेरी आँखें फटीरह गईं। "उफ़्फ़! क्याँ बात हैं दिदी! ज़हरलग रही होँ!"
ब्रा केँ बिना उनकी छाती एकदम दूधिया सफ़ेद औऱ भरी हुई थि। निप्पल ठंड औऱ उत्तेजना सें अकड़ चुके थें। मैंने बिनादेर किए एक् निप्पल कों अपने मुँह मे भरा औऱ चूसना शुरुआत कर दिया।
हरलीन: "आह्ह्ह! दिलराज! धीरे-धीरे। दाँतमत लगा!हाए."
मे किसी भूखे जानवर कि तरह उनके स्तनों कों चूसरहा थां, काटरहा थां। मेरीइस हरकत सें दिदी कां जिस्म टूटने लगा। मैंने उन्हें बांहों मे भरकर खड़ाकर दिया। केवल सलवार मे लिपटी वोँ कयामत कि मूरतलग रहीथीं।
हरलीन: "अबबस भि कर। कलरमन आँ जाएगी, जौ करना हैं उसकेसंग कर लेना। "
मे: "कल तक कां सब्र नहि हैं, मेरीजान। जब इतनी सेक्सी बेहन नंगी सामने होँ, तौ सब्र किसे होता हैं?"
हरलीन: "अच्छा? तोँ फिन 'दिदी' मतबोल, नाम लेकर बुला मुझे। "
मे उनकी गर्दन पऱ आवारा चुंबन देतेहुए फुसफुसाया, "आह्ह्ह्म्म! दिदी बोलने मे जोँ नशा हैं, वोँ नाम मे कहां?"
हरलीन: "आह्ह्ह! दिलराज! मुझेकुछ होँ रहा हैं."
मैंने सलवार केँ ऊपर सें हि उनकी सुडौल गांड कों मसलना शुरुआत कर दिया। जवाब मे दिदी नें मेरी टी-शर्ट उतारी औऱ मेरे नंगे सीने पऱ अपने होंठ गड़ादिए। मेरे निप्पलों कों अपनी ज़बान सें छेड़ते हुए उन्होंने कहा, "उंह्ह्ह! तुम्हारी तरफ तौ बड़ा तजुर्बा हैं! कहीं औऱ भि मुँह मारता हैं क्याँ?"
मे: "आह्ह्ह! आप् क्रोध क्यूं होँ रही हौ? तजुर्बा तोँ आपकेसंग हि लेँ रहा हूं। "
बातों-बातों मे मेरा पजामा नीचेसरक गय़ा। मेरा लन्ड लोहे कि रॉड कि तरह तनकर उनके चेहरे केँ सामने सलामी देरहा थां।
हरलीन कि आँखें फैलगईं। "हाए! दिलराज! यह तो पास सें औऱ भि बडा हैं। "
मे: "स्वयं हि बड़ा हौ गय़ा आपकी सेवा केँ लिए। वैसे आपने कितने देखे हें?"
दिदी नें उसे अपनीनरम हथेली मे पकड़ा औऱ सहलाने लगीं। "विद्यालय समय मे देखे थें एक्-दो। औऱ अब तोँ तुम कोपता हि हैं रणवीत कां। पर्र इसे देखकर तौ मेरे मुँह मे पानी आँ रहा हैं। "
मे: "तौ इंतजार किसबात कां? भरलो मुँह मे!"
औऱ बस, अगले हि समय मेरा मुंडा दिदी केँ गरम औऱ गीले मुँह केँ अंदर थां।
"आह्ह्ह! दिदी! बस ऐसेही! आह्ह्ह!"
वोँ पूरेजोश केँ संगचूस रहीथीं, जैसेकोई लॉलीपॉप हौ। मुझसे रहा नहि गय़ा, मैंने उन्हें खड़ा किया औऱ फिन सें उनके होंठों पर्र टूट पड़ा। इसी छीना-झपटी मे उनकी सलवार भि फर्श पऱ गिर गई।
अब दिदी मेरे सामने पूर्ण रूप सें नग्नथीं। उनकी भारी गांड औऱ वोँ मखमली शरीर। मैंने उन्हें बिस्तर पर्र लिटाया नहि, बल्कि खड़े-खड़े हि उनकी एक् टांग उठाकर अपनीकमर पर्र लपेटली। मेरा लन्ड उनकी गीली गुफा केँ मुहाने पऱ थां।
हरलीन: "आह्ह्ह्म्म्! दिलराज! अब औऱ नहि रुका जाता!डाल दे अंदर! फाड़दे मुझे! आह्ह्ह!"
मैंने एक् हि झटके मे आधा लन्ड अंदर उतार दिया।
हरलीन: "आह्ह्ह्ह! हाएराम! धीरे-धीरे। मर गई! एकदम सें मतडाल! उफ़्फ़, यह तोँ बहोत मोटा हैं!"
हम् दस मिनट तक वहीं खड़े-खड़े एक्-दूसरे मे समाएरहे। फिन मैंने उन्हें पलंग पऱ पटक दिया औऱ उनकी टांगें अपने कंधों पऱ रखकर, पूरी ताकत सें धक्के लगाने शुरुआत किए।
हरलीन: "आह्ह्ह्ह! दिलराज! मार डाला!हाए! रोना निकलरहा हैं मेरा। पऱ मजा बहोत आँ रहा हैं! आज तक ऐसासुख किसी नें नहि दिया! अपनी बेहन कों पूरा निचोड़ लेँ! आह्ह्ह!"
ये सुनकर मेरा जानवर औऱ जाग गय़ा। मैंने अपनीगति तेज़कर दि। करीबआधे घंटे कि तूफानी चुदाई केँ बाद, हम् दोनों नें एक् संग मोक्ष प्राप्त किया। मैंने अपना गाढ़ा लावा उनकेपेट पर्र हि छोड़ दिया।
बाथरूम सें होकर हम् वापस लेटे, थकान औऱ चैन दोनों चेहरे पर्र थें।
हरलीन: "कलजबरमन तेराये 'मूसल' लेगी नं, उसकी तोँ चीखें निकल जाएंगी। रवनीत कां तोँ उससे झेला नहि जाता। "
मे (हंसते हुए): "तुम् भि लेँ लेनासंग मे। वैसेरमन थोड़ी नाज़ुक लगती हैं, पऱ उम्मीद हैं संभाल लेगी। वैसे तुम् दोनों दिखने मे जितनी शरीफ़ लगती होँ, असल मे उतनी हि बड़ी हवसन हौ। "
हरलीन: "अच्छा? तोँ तुझेही मे हवसन लगती हूं?"
मे: "बिल्कुल! औऱ मुझेये मनपसंद हैं। "
मेरा लन्ड उनकी जांघों केँ स्पर्श सें फिन सें जागने लगा थां।
हरलीन: "यहफिन खड़ा होँ गय़ा! इसे सुकून नहि हैं क्याँ?"
मे: "इसे सुकून तब मिलेगा जबयह दोबारा तुम्हारी बुर कि सैर करेगा। "
औऱ रातभर हमने वोँ सभी किया जौ समाज कि नज़रों मे गुनाह थां, मगर हमारे लिए मात्र मजा।
सुभह कि किरणें खिड़की सें झाँकरही थीं। मे अपने कमरे मे सोरहा थां। आँख खुली तौ ग्यारह बज चुके थें। युवराज गायब थां। मे फ्रेश होकर नीचेआया।
ड्राइंग रूम मे मां औऱ दोनों बहनें टेलीविज़न देखरही थीं।
कमल (बड़ी दिदी): "बड़ालेट उठाआज नवाब?"
मे: "छुट्टी कां दिन हैं दिदी, हक़ बनता हैं। "
मां गरमचाय बनाने चलीगईं। युवराज कां पूछा तौ पताचला वोँ शहर गय़ा हैं।
माँ गरमचाय लेकरआईं। उन्होंने बादामी रंग कां एक् बारीक सूट पहना थां। उस लिबास मे उनकाभरा हुआ जिस्म औऱ ढलती उम्र कां वोँ नशीला यौवन कयामत ढारहा थां। मेरे अंदर कां शैतान फिन जागने लगा। 'काश! माँ केँ संग भि.' मैंने झटककर गरमचाय पी औऱ टेलीविज़न मे ध्यान लगाने कि कोशिश कि।
उधरशहर केँ एक् होटल मे, युवराज कां अलग हि खेलचल रहा थां।
दरवाज़े पर्र दस्तक हुई। युवराज नें खोला तौ सामने भाभी (चरनजीत) थीं। एक् स्टाइलिश पायजामा सूट मे वोँ किसी मॉडल सें कम नहि लगरही थीं। अंदरआते हि दोनों एक्-दूसरे मे समागए।
भाभी (चरनजीत): "बड़ी मुश्किल सें एक्सक्यूज़ बनाकर निकली हूं। सासू-ससुरजी कों शक न् हौ जाए। "
युवराज: "चिंता मतकर, रवनीत तोँ हैं नहि जोँ जासूसी करेगा। "
बातों कां सिलसिला जल्द हि कपड़ों केँ उतरने तक पहुँच गय़ा। युवराज नंगा खड़ा थां, उसका हथियार तनाहुआ थां। भाभी कि नज़रें उस पऱ टिकगईं।
भाभी: "स्स्स! युवराज! तेरा तोँ तेरे भइया सें भि ज्यादा दमदार हैं। "
युवराज: "तभी तोँ तुँ दौड़ी चलीआई। "
युवराज नें धीरे धीरे भाभी कों नंगा किया। उनकी कालेरंग कि जालीदार पैंटी औऱ टाइट ब्रा उतारते हि उनका सफ़ेद शरीरचमक उठा। उसने भाभी केँ हरअंग कों पूजा, चूसा औऱ फिन उन्हें पलंग पऱ लिटा दिया।
जब उसने प्रवेश किया, तोँ भाभी कि आँखें पलटगईं। "आह्ह्ह्म्म्! युवराज! हाँ.ऐसे हि!"
दो घंटे तक उस कमरे मे मात्र सिसकियाँ औऱ जिस्मों केँ टकराने कि आवाज़ें गूंजती रहीं। लञ्च केँ बाद भि उनकामन नहि भरा।
युवराज (भाभी कों बांहों मे भरकर):"मन करता हैं तुझेही जाने हि नं दूँ। पूरीरात तुम्हारी तरफ अपनी बांहों मे रखूँ। "
भाभी (साँसे चढ़ाते हुए):"दिल तोँ मेरा भि करता हैं। पऱ मजबूरी हैं। पर्र मजा बहोत आया। "
दोनों नें एक् अंतिम बार, एक् 'क्विक राउंड' औऱ लिया। भाभी कां जिस्म पूरीतरह निढाल हौ चुका थां, एक् दूसरे कों चूमते हुए, उन्होंने होटल सें चेकआउट किया औऱ अपनी अपनी दुनिया मे वापसलौट गए चेहरों पर्र वोँ राज़लिए जौ कभी बाहर् नहि आने वाले थें।
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Ek Chaat k Niche (Family Saga) – New Episode
सॉरी फ्रेंड्स, थोडा ज़्यादा हि देर होँ गई इसबार, थोडा बीसीहू, मंथएंड हें नाँ, इस लिये थोडा काम हैं.
इधरघऱ पर्र मे अकेला बैठाबोर हौ रहा थां। साम हुइ तौ माँ औऱ तीनों बहनें बाहर् घूमने चलीगईं थि। फिन थोड़ी देर मे युवराज भि आँ गय़ा। मे बाहर् हि चारपाई पर्र बैठा थां, वोँ पासआकर कुर्सी पऱ बैठ गय़ा।
युवराज: "औऱ भइया, क्याँ हाल हैं? अकेला हि बैठा हैं? बाकीसभी कहां हें?"
मे: "घरवाले गएसैर करने, औऱ मे फ़ालतू बैठा हूं। मुझेबता देताशहर जारहा हैं, मे भि चलाआता साथमे। "
युवराज: "लेँ जाता, पऱ दोस्त मे भाभी कों मिलने गय़ा थां। इसलिये नहि कहा तुझेही। औऱ वैसे भि तुँ सोया पड़ा थां सुभह। "
मे: "अच्छा अच्छा। ठीक हैं। औऱ फिन, कर आयाकाम भाभी कां?"
युवराज: "औऱ दोस्त! बहोत दिलकर रहा थां। जब सें मां कि ली थि, उसकेबाद सें तौ दिल करता हैं बुर पऱ चढ़ा हि रहूँ। "
मे: "अच्छा! क्याँ बात हैं! मां कि बुर नें इतना पागलकर दिया?"
युवराज: "नहि, ऐसीबात नहि हैं कोई, पऱ साले!दिल बड़ाकर रहा थां किसी कि लेने कां। यहा माँ केँ संग दिदी सो जाती हैं। मैंने सोचा क्यूं न् भाभी कि हि लें आऊँ। "
मे: "हम्म, सही हैं! बहनचोद! तेरेपास ऑप्शन तोँ हैं, मेरेपास साला वोँ भि नहि हैं। "
युवराज: "क्यूं? रमन कां क्याँ हुआ? नहि बनाकोई प्रोग्राम उसकेसंग?"
मे: "कहां दोस्त! कोई प्रोग्राम नहि बनाअभ तक। "
हम् बातें कर हि रहे थें कि इतने मे माँ औऱ दोनों बहनें टेहल केँ घऱ केँ अंदर आँ गईं।
आकर तीनों बैठगईं। मां मेरेपास चारपाई पऱ बैठगईं, कमल औऱ हरलीन दिदी कुर्सी पऱ बैठगईं। थोड़ी देर बातें करने केँ बाद, माँ नें कहा,
मां: "हाँ, सच! तेरी ताई मिली थि बाहर्। कुलजीत गाँव गई हैं। तौ तेरी ताई रात कों अकेली हि होगी, एक् जण जानां उधर सोने। "
मैंने "हम्म" मे जवाब दिया औऱ थोड़ी बहोत बातें कीं। फिन हम् दोनों भइया बाहर् निकलगए।
दिलराज: "क्याँ करना हैं फिन?सो जानां तुँ ताई केँ पास, औऱ ठोक देनाआज। "
युवराज: "दोस्त, सो तौ जाऊँगा, पऱ पहलीबार ठोकने मे थोड़ी झिझक लगेगी। मुझेलगा तुँ संग होगा। "
दिलराज: "हम्म, संग तोँ मे भि चला जाऊँ, पऱ मेरा प्लान कुछ औऱ हैं। "
युवराज: "औऱ क्याँ प्लान हैं तेरा?"
दिलराज: "आजरमन नें आनां हैं रात कों। हरलीन दिदी नें बताया हैं। मे सोचरहा हूं रात कों उसेठोक दूँ। "
युवराज: "अच्छा अच्छा। ठीक हैं। चल, तुँ रमन केँ संग लेँ लेनामजे। "
दिलराज: "औऱ दोस्त! ताई वाला भि टाईम पे बन गय़ा, नहि तौ कहां लें होनी थि रमन कि भि। "
युवराज: "हाँ। ऐसा करते हें, अभि चलते हें ताई केँ घऱ। तुँ शुरुआत कर देना, खत्म मे अपने आप् रात कों कर दूँगा। "
मे: "हाँ, यह भि ठीक हैं। "
फिन हम् दोनों ताई केँ घऱ कों चलदिए। ताई केँ घऱ केँ अंदर दाख़िल हुए तौ अंदर ताई औऱ कोई दूसरी महिला बैठी बातें कररही थीं। जब हम् आगेगए तौ वोँ महिला सरपंच कि घरवाली थि। दोनों बातेकर रहीथीं।
मैंने बाहर् सें हि आवाज़ दि, औऱ ताई बाहर् आईं।
ताई: "तुम् दोनोकब आए, पुत्त?"
मे: "बस अभि आए हैं। "
ताई: "आँ जाओ, बैठो अंदर। "
फिन हम् अंदरगए, औऱ हमने सरपंच कि घरवाली कों 'सत श्री अकाल'कहा औऱ कुर्सी पर्र बैठगए।
सरपंच कि घरवाली: "औऱ पुत्त! मां कैसी हें? ठीक हें?"
मे: "हाँजी, ठीक हें। "
सरपंच कि घरवाली: "चलो, अच्छा हैं। बहनजी, चलती हूं मे फिन, फिन कभी आऊँगी। "
ताई: (किचन मे जाती हुईँ बोलीं) "बैठजा! गरमचाय पीकर जानां! बनाने लगी हूं। "
सरपंच कि घरवाली नां नाँ करती हुईँ बाहर् चल दि। बाहर् जाती हुईँ उसकीसूट मे ढकी हुईँ गांड़ बड़े ज़ोरदार हुलारे लें रही थि।
युवराज: (धीरे-धीरे सें) "ओ बहनचोद! साली कि गांड़ तोँ देख, केसेहिल रही हैं! सरपंच पूरीकसर निकालता होगा, बहनचोद!"
सरपंचनी कि गांड़ देखकर मेरा लन्ड पजामे मे सलाम देनेलगा। मैंने पजामे केँ ऊपर सें लन्ड कों सहलाया।
"हाँ, हैं तौ साली पूरी कयामत! कोई नं! करते हें इस साली कां भि जुगाड़! तुँ बैठयहा। मे किचन मे ताई पे हाथ फेरकर आता हूं। " औऱ मे किचन कि तरफ़चल दिया।
युवराज: "हाँ! जल्द आनां बाहर्! अगर हौ सके तौ नंगी करके लें आनां ताई कों बाहर् किचन सें!"
मे किचन मे गय़ा। ताई गरमचाय बनारही थीं। मैंने पीछे सें जाकर उन्हें गले लगाया औऱ दोनों हाथों मे उनके मोटे बूब्ज़ पकड़लिए।
"आह्ह्ह्म्म्! ताई! बड़े दिनों बादहाथ मे आई हैं!"
ताई: (धीरे-धीरे सें) "तूँ हि नहि आता हैं, मे तोँ ठुकणे कों हि बैठी हूं तुझसे। जब मर्ज़ी ठोक लेँ। चल, रात कों ठोक लेना। अभि बाहर् युवराज भि बैठा हैं। कहींदेख न् लेँ हम् दोनों कों!"
मे: "आज सिर्फ़ देख्ना नहि हैं उसने। आज तौ करना भि हैं उसने। "
ताई: (गिलासों मे गरमचाय डालती हुईँ बोलीं) "क्याँ मतलब?"
मे: "वही जौ तूने सुना, ताई! आज युवराज भि ठोकेगा तुम्हे। औऱ रात कों उसने हि सोना हैं तेरेसंग। "
ताई: "ओए! क्याँ बोलेजा रहा हैं? अबहर एक् केँ नीचे आँ जाऊँ?"
मे: "अच्छा, बहनचोद! अब तुझेही लज्जा आती हैं? जब सरपंच केँ नीचे पड़ी थि तब नहि आई?"
ताई: "ओए! तुम्हारी तरफ किसने कहाये?"
मे: "मैंने औऱ युवराज नें अपनी आँखों सें देखा हैं! केसे तुँ लन्ड लेनेलगी थि सरपंच कां मोटर पऱ! वहीं सें युवराज कां मनबन गय़ा तेरी लेने कि!"
ताई चुप रहीं। बाहर् युवराज हमारी बातें सुनरहा थां। ताई नें गरमचाय केँ गिलास उठाए औऱ बाहर् चलने लगीं।
मैंने ताई कों रोक दिया औऱ ताई कि चुन्नी हटा दि। उनके मोटे-मोटे मम्मों सूट मे लटकेहुए दिखने लगे। ताई मेरे मुँह कि तरफ़ देखने लगीं, पऱ बोलीं कुछ नहि।
मे: "हाँ, ऐसे सही हैं, ताई! सेक्सी लगती हैं ऐसे। युवराज कां मन भि बनना चाहिए अपनी ताई कों देखकर। "
ताई गरमचाय लेकर बाहर् चलीगईं औऱ युवराज कों गिलास पकड़ाया, औऱ ख़ुद सामने सोफ़े पर्र बैठगईं।
युवराज ताई केँ मम्मो कों बड़े ग़ौर सें देखरहा थां औऱ गरमचाय पीरहा थां। मे भि ताई केँ संग सोफ़े पर्र बैठ गय़ा।
ताई: "औऱ युवराज, पुत्त! कैसीचल रही हैं पढ़ाई?"
युवराज: "ठीकचल रही हैं, ताई। आप् बताओ, आया फ़ोनअमन कां?"
ताई: "हाँ पुत्त, आया थां। ठीकठाक हैं वोँ भि। "
मैंने गरमचाय पीकर गिलास रखा। "औऱ ताई! क्याँ कहरही थि सरपंच कि घरवाली?"
ताई: "कुछ नहि पुत्त! यैसे हि मिलने आई थि। "
दिलराज: "अच्छा अच्छा। सरपंच नहि मिला? बड़ेदिन हौ गए देखेहुए। कहीं देखा आपनेउसे?"
ताई: "मे क्याँ करना देखकर पुत्त? सारादिन तौ घऱ हि रहती हूं मे। कब देख्ना उसको?"
दिलराज: "अच्छा, ताई! चलफिन हमेंदेख लेँ आज!" मैंने खड़ा होकर पजामा औऱ कच्छा नीचेकर दिया औऱ लन्ड बाहर् निकाल दिया। ताई मेरी तरफ़ आँखें फाड़ फाड़कर देखने लगीं।
"कुछ नहि होता, ताई! युवराज कों भि पता हैं अपने बारे मे। तभी तोँ संगआया हैं मेरे। "
ताई नें मुँह नीचेकर लिया। युवराज उठा औऱ ताई केँ पासआकर सोफ़े पऱ बैठ गय़ा।
युवराज: "कोईबात नहि, ताई! मे समझता हूं तेरी मजबूरी! ताए केँ बाद केसे काबूरखा अपने पे?
" उसने धीरे-धीरे सें ताई केँ मुँह सें मुँह जोड़ दिया औऱ उनके होंठों कों अपने मुँह मे भर लिया।
"मूह्ह्ह्ह्म्म्म्! आह्ह्ह्ह्म्म्! ताई! आह्ह्ह्ह्म्म्!"
मे नीचे सें नंगा खड़ा दोनों कों देखरहा थां। मेरा लन्ड अब पूरा अकड़कर खड़ा हौ गय़ा थां। युवराज नें अपनी टी-शर्ट उतार दि औऱ पजामा भि उतार दिया
ताई: "ओए कंजरो! केसे नंगे हौ गए?गेट खुला हैं अभि बाहर् कां!
कोई आँ जाएगा! रुको, मे लगाकर आती हूं। "
औऱ ताई गेट लगाने बाहर् चलीगईं।
युवराज: "आज आएगामजा ताई कि लेने कां! पूरीरात ठोकनी हैं आज!"
दिलराज: "हाँहाँ! पूरीरात चोद लेना ताई कों! अभि केँ लिये मुझे लेँ लेनेदे एक् राउंड। "
युवराज नें हाँ मे सिर हिलाया। औऱ ताई बाहर् सें गेट लगाकर अंदर आँ गईं।
ताई: "ओए! जल्दकरो! कोई आँ नं जाए!"
युवराज: "अब किसने आनां हैं? साम सें रात होने वाली हैं!"
ताई: "पता नहि होता किसी कां! तेरी माँ हि नं आँ जाए कहीं!"
दिलराज: "कोई नं, ताई! उसे भि तेरेसंग हि नंगीकर लेंगे। "
ताई: (युवराज कि तरफ़ देखते हुए) "क्याँ?"
दिलराज: "ये भि चढ़ गय़ा हैं माँ पर्र। " मैंने लन्ड ताई केँ मुँह केँ क़रीब किया औऱ मुँह मे धकेल दिया।
ताई ब्लोजोव लेने लगीं, औऱ युवराज ताई केँ सूट केँ ऊपर सें बूब्ज़ चूसने लगा।
मैंने लन्ड मुँह सें निकाला औऱ ताई कां सलवार-सूट उतार दिया। ताई नीचे सें नंगीथीं। औऱ उनके मोटे मोटे मम्मों लटकने लगे।
मैंने ताई कों सोफ़े पऱ घुटनों केँ बल झुकाया औऱ लन्ड पीछे सें उनकी बुर मे धकेल दिया। औऱ थोड़ी देर धक्के मारता रहा,
औऱ युवराज आगे होकर लन्ड कों चुसवाणे लगा।
युवराज नें ताई केँ मुँह मे हि झड़ दिया, औऱ मैंने गाँड़ पर्र माल निकाल दिया। फिन दोनों सोफ़े पर्र बैठगए औऱ कपड़े पहनने लगे। ताई नें भि अपनेअपर गिराहुआ माल साफ़ करके सूट-सलवार पहन लिया।
फिन हम् दोनों ताई कों रात कां बोलकर घऱ कों चलदिए।
घऱ पऱ कमल दिदी औऱ मां किचन मे रोटीबना रहीथीं। युवराज टी.वी। लगाकर देखने लगा। मुझे हरलीन दिदी केँ कमरे सें आवाज़ें सुनाई दीं। मैंने किचन मे जाकर मां सें पूछा, "हरलीन दिदी केँ कमरे मे कौन हैं?"
माँ: "उसकी सहेली आई हैं, रमन। कॉलेज कां कामकर रही हें। रात यहीं रहना हैं उसने। "
दिलराज: (मन मे ख़ुश होताहुआ) "लें! ये तौ सालीसच मे आँ गई! मुझेलगा साली नें आनां नहि! चल, आज तौ मजा आएगा! दिदी औऱ रमन, दोनों कि लूँगा आज!"
सोचता सोचता बाहर् आकर युवराज केँ संग बैठकर टी.वी। देखने लगा। थोड़ी देरबाद सबने रोटीखाई। रमन मेरी तरफ़ चोरी चोरीदेख रही थि। रमन नें सलवार-सूट पहना थां जिसमें वो पूरीमाल लगरही थि। उसके मम्मों एकदमतंग थें, पूरे। मेरा तौ देखकर लन्ड खड़ा हौ गय़ा थां, औऱ बसयही सोचरहा थां कि रात कों केसे चोदना हैं। संग मे हरलीन दिदी भि बैठी, पूरीमाल लगरही थीं।
सबने रोटी खाकर थोड़ी सैर कि, औऱ युवराज ताई केँ घऱ कों निकल गय़ा। औऱ मे भि अपने कमरे मे चला गय़ा। मां औऱ बडी बेहन, औऱ हरलीन दिदी औऱ रमन भि अपने कमरे मे चलीगईं।
आराम करतेहुए मुझे एक् घंटा होँ गय़ा थां। कुछ सोचने केँ बाद मे उठा औऱ दरवाज़े केँ पास गय़ा। जैसे हि द्वार (दरवाज़ा) खोला, आगे मां खड़ीथीं। बिना चुन्नी केँ सलवार-सूट मे खड़ी, उनके मोटे-मोटे मम्मों सूट मे लटकेहुए, एकदम सामने थें। वो बहोत आकर्षक लगरही थीं।
मे: "तुम् क्याँ कररही होँ यहा?"
मां: "तूँ कहां चला?"
मे: "कहीं नहि। बस यहीं। वैसे हि बाहर् सैर करनेलगा थां। नींद नहि आँ रही थि। "
माँ: "अच्छा! चलफिन, मुझे भि सैर करवादे! मुझे भि नहि नींद आँ रही!"
उन्होंने छाती पर्र हाथरखा, मुझे पीछे कि तरफ़ धकेलकर बिस्तर पर्र लिटा दिया, औऱ ख़ुदऊपर बैठगईं।
मे: "क्याँ कररही होँ, माँ? कोई आँ जाएगा! द्वार (दरवाज़ा) खुला हैं!"
मां: (ऊपर लेटती हुई, गर्दन पऱ चुंबन करने लगीं) "मूह्ह्ह्ह! नहि आताकोई पुत्त! सभीसो गए हें। तभी तौ तेरेपास आई हूं। अबचल, तड़फ़ा मतअब अपनी मम्मी कों! डालदे यह सब्बल जैसा जोँ खड़ाकर रखा हैं पजामे मे!" "आह्ह्ह्म्म्!"
मैंने लेटे लेटे माँ कां ऊपर कां सूट उतारा, औऱ बूब्ज़ आज़ाद होकर लटकने लगे। फिन सलवार कां नाड़ा खोलकर सलवार भि उतार दि। "वाउ, माँ! ब्रा पहले हि उतारकर आई होँ!"
माँ: "औऱ नहि तौ! ऐसे हि समय ख़राब करना हैं क्याँ? तूने भि तोँ उतारनी हि थि। मैंने पहले हि उतार दि! औऱ हाँ, तेरी बेहन ज़ोर डालने लगी थि उतारने कों। कहनेलगी, सोने टाईम उतार दियाकरो।
मे: "अच्छा! चलफिन, मेरा भि उतारदे पजामा! मे भि नंगा हि हूं नीचे सें। "
मां: "हाँ, वोँ तोँ पतालग हि गय़ा थां तेरा। जोँ मेरी गाँड़ पऱ चुभरहा हैं! पजामा फाड़कर गाँड़ मे जाने कों फिनरहा हैं!"
मे: "अच्छा जी! क्याँ बात, आज बड़ेमूड मे होँ!"
माँ: "मन तोँ अपने आप् हि बन जाता हैं जबघऱ मे लन्ड लेने कों मिलजाए!" उन्होंने पजामा नीचे करके लन्ड कों हाथ मे पकड़ा। "हाए! केसे अकड़ा हुआ पड़ा हैं!"
मे: "लेँ, लें फिन! बुर मे! बैठजा ऊपर!"
मां: "सूखा हि लें लूँ? चीख़ें निकलवानी हें मेरी? तेरी बहनें उठ जाएँगी!"
मे: "चलफिन, गीलाकर दे!
माँ नें मुँह लन्ड पर्र रखा। "आह्ह्ह्म्म्! ग्लूप! ग्लूप! आह्ह्ह्म्म्!"
मे: "स्श्श्श्श्श्श। आह्ह्ह्ह्ह्ह!" मैंने सिर पकड़ा औऱ नीचे सें लन्ड कां गस्सा मारा। लन्ड माँ केँ हलक मे लगा, जिससे कितना साराथूक लन्ड पऱ गिरा औऱ माँ कों खाँसी आँ गई।
माँ: "ओए कुत्ते! मारना हैं मुझे? कितनी ज़ोर सें गस्सा मारा! मां हूं तेरी! थोडा रहम्कर! कोई किरायेकी घोडी थोड़ी हूं!"
मे: "हाँ!चल आँ जा, बैठ जा लन्ड पऱ अब! ज्यादा बातें नं कर!"
माँ मूह सें लन्ड निकालकर, लन्ड केँ पर्र ऊपरआके बैठगईं। लन्ड कों हाथ सें सेट करके बुर पऱ रखा औऱ अंदर लेँ लिया।
"आह्ह्ह्ह! गय़ा अंदर!हाए! माँ! बैठजा ऐसे हि! आह्ह्ह! पूरा लेँ लेँ अंदर अपनी बुर मे! आह्ह्ह!"
पूरा लन्ड अंदरचला गय़ा, औऱ माँ लन्ड पर्र कुछदेर ऐसे हि बैठी रहीं।
माँ: "आह्ह्ह्ह! ओए पुत्त! अब मिला आराम मेरी बुर कों! ख़ाली पड़ी थि! अबभरी हैं!" वो धीरे धीरे ऊपर-नीचे होती हुइ, "आह्ह्ह्ह! हाए!ओए, लगा ज़ोर पुत्त! नीचे सें तुँ भि! आह्ह्ह्म्म्!"
मैंने नीचे सें मारने शुरुआत किए औऱ मां कों कमर सें पकड़कर अपनेऊपर लंबा लिटा लिया। "आह्ह्ह्ह! लेँ, लन्ड अपनी बुर मे! आह्ह्ह!" औऱ ज़ोर-ज़ोर सें मारने लगा।
मे येभूल गय़ा थां कि कमरे कां द्वार (दरवाज़ा) खुला हैं, औऱ हरलीन दिदी औऱ रमन मेरीराह देखरही हें।
मां: "आह्ह्ह्ह! आज बड़ा आनंद आँ रहा हैं! आह्ह्ह! उधर तेरा भइया युवराज भि लगा होगा तेरी ताई पऱ चढ़के धक्के मारने! आह्ह्ह!"
मे: "औऱ नहि तौ! आज तोँ तुम् दोनों कि किस्मत खुल गई!"
माँ: "खुली नहि पुत्त, खोली हैं मैंने हि! मैंने हि कहा थां ताई कों कि (कुलजीत कों) गाँवभेज दे किसी बहाने सें! फिन हि बात बननी थि!"
मे: "अच्छा! बड़ी भूखी हौ लन्ड कि तुम् तौ! आह्ह्ह!" मैंने गाँड़ पऱ एक् थप्पड़ मारा। "अंह्ह्ह्म्म्!" औऱ होंठ चूसने लगा। "मूह्ह्ह्ह! आह्ह्ह्म्म्! अच्छा! अगर मे ताई केँ पासचला जाता?"
माँ: "फिन तेरी स्थान युवराज कां लन्ड होता मेरी बुर मे! आह्ह्ह! धीरे-धीरे मार थोड़े ! थक गई हूं मे! तुम को तोँ पता हि हैं, मैंने तुम् दोनों मे कभी फ़र्क नहि किया! दोनों कों एक् जितना प्रेम करती हूं!" (गाँड़ कों लन्ड पर्र घुमाती हुइ)
"आह्ह्ह्ह! तुम्हारे दोनों केँ लन्ड कों भि एक् जितना प्रेम करती हैं तुम्हारी मां! आह्ह्ह!"
मे: "अच्छा! चलफिन, घोड़ी बनजा, मां! मेरा होने वाला हैं अब!"
मां: "आह्ह्ह्ह! आँ जा पुत्त!" (घोड़ी बनती हुईँ) " ज़ोर सें मारना अब! दर्द महसूस होँ तेरी मम्मी कों!"
मैंने लन्ड बुर पर्र रखा औऱ पीछे सें धक्का मारा।
"आह्ह्ह्ह!" औऱ एक् बार मे लन्ड पूरा धकेल दिया।
"आह्ह्ह्ह! हाए!" औऱ ज़ोर-ज़ोर सें मारने लगा। पूरे कमरे मे हम् दोनों कि जांघों कि आवाज़ गुंजरही थि।
तभी मेरे फ़ोन पऱ मैसेज कि टोनबजी। मैंने ऐसे हि फ़ोन माँ कि कमर पर्र रखकर मैसेज पढ़ना शुरुआत किया। मैसेज हरलीन दिदी कां थां।
मैसेज: "हरामी! हम् दोनों कमरे मे राहदेख रही हें, औऱ तुँ यहा मां कों घोड़ी बनाके लगाहुआ हैं। "
मैंने मैसेज पढ़कर हैरान रह गय़ा कि दिदी कों केसेपता लगा। फिन पीछे मुड़कर दरवाज़े कि तरफ़ देखा, तौ दिदी
दरवाज़े केँ पास खड़ीथीं। मेरे थोडे धक्के मारने बंद हौ गए।
मां: (पीछे न् देखते हुए)"ओए! क्याँ हौ गय़ा? फ़ोन पऱ लग गय़ा? पहले अपनी मम्मी कों तोँ चोद लेँ अच्छी तरह, फिन चला लेना फ़ोन। "
मैसेज: "बहनचोद! मां तोँ पूरीगरम हुईँ पड़ी हैं! ठंडी करके कमरे मे आँ जानां बादमे। मे औऱ रमनराह देखरही हें तेरी। "
मैंने पीछे देखते हुएहाँ मे सिर हिला दिया, औऱ दिदी अपने कमरे मे चलीगईं।
माँ: (पीछे देखती हुई) "क्याँ हुआ? पीछे क्याँ देखता रहता हैं? धक्के क्यूं नहि माररहा?"
मे: "कुछ नहि। मुझेलगा दरवाज़े केँ पासकोई खड़ा हैं। "
माँ: "कोई नहि खड़ा। वैसे हि लगा होगा। चल, अब जल्द-जल्द मार ! मैंने भि जानां हैं कमरे मे। तेरी बेहन नं उठजाए कहीं!"
मैंने धक्के मारने शुरुआत किए। "आह्ह्ह्ह! मां अगर दिदी उठकरऊपर आँ गई, फिन क्याँ करोगी अगरऐसे देख लिया उन्होंने हम् दोनों कों? आह्ह्ह्ह!"
माँ: "अच्छा! फिनचोद लेना बेहन अपनी कों भि! वो कौन सि कम हैं तेरी माँ सें?"
मे: "अच्छा! दे देगी मुझे? क्याँ लगता हैं?"
मां: "तेरी लेनी हैं?"
मे: "दिलादे, अगर दिला सकती हैं तोँ! आह्ह्ह्ह! फिन तोँ मज़ा आँ जाए! दिदी भि बड़ी सेक्सी हैं! गांड़ पूरी हिलती हैं जब चलती हैं! आह्ह्ह्ह! हाए! मां! मेरा निकल गय़ा! आह्ह्ह्ह! उंह्ह्ह्ह!"
औऱ बुर मे हि पानी निकल गय़ा। "सॉरी, मां! फ़्लो फ़्लो मे पता नहि लगा, अंदर हि निकल गय़ा। "
मां: "कोई नहि! मे साफ़कर लूँगी! आह्ह्ह्म्म्! गर्म गर्म
लावा सां छोड दिया अंदर! आह्ह्ह! मजा आँ गय़ा! उठकर उँगली सें माल कों बाहर् निकाला औऱ मुँह मे डालकर चूसती हुइ, "आह्ह्ह्म्म्! स्वाद आँ गय़ा, पुत्त, आज तौ! अब तोँ दोतीन दिन स्वाद हि रहना हैं। युवराज कों भि बता देना, कल देख लेनाकौन जाता हैं ताई कि लेने। " (कपड़े पहनती हुई बोलीं)
मे: "हाँ, कोई नं! कह दूँगा युवराज कों। "
औऱ मां कपड़े पहनकर बाहर् चलदीं, औऱ अपने कमरे मे चलीगईं।
मे नंगा हि लेटारहा, औऱ सोचाकुछ देर रुककर दिदी केँ कमरे मे जानां हैं।
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