Ek Chaat k Niche (Family Saga) – New Episode
Chapter 7
कुछदेर बाद प्यास लगी तौ नीचे पानी पीने कों उतरा औऱ जैसे हि बड़ी दिदी औऱ जीजाजी केँ रूम केँ पास सें गुज़रने लगा, तौ म्यूज़िक कि धीमी आवाज़ आई। खिड़की थोड़ी खुली दिखी औऱ पर्दा भि थोडा सां किनारे हटाहुआ थां।
जैसे हि मेरी नज़र अंदर गई, मेरी आँखें फटीरह गईं। दिदी सिर्फ़ ब्रा औऱ पैंटी मे थींहाँ, बस! एक् बारीक लेस वाली, उनकेभरे हुए बूब्ज़ कों बडी मुश्किल सें संभालती हुइ ब्रा, औऱ नीचे एक् छोटी सि, सेक्सी पैंटी, जौ उनकेगोल, कसेहुए नितंबों केँ बीचों बीचफँस कररह गयीँ, थि। वोँ जीजाजी केँ सामने थिरकरही थीं, अपनीकमर कों ऐसे मरोड़ रहीथीं कि माहौल मे आगलगजाए। जीजाजी बेड पर्र पूरीतरह नग्न बैठे थें औऱ इस नज़ारे कां लुत्फ़ उठारहे थें। मे तौ येसभी देखकर सचमुच पागल होँ गय़ा।
कुछदेर बाद म्यूजिक बंदहुआ औऱ जीजाजी नें दिदी कों अपनेपास बुलाया। दिदी जाकरबेड पऱ लंबीलेट गयीं।
जीजाजी उनके होठों कों चूसने लगे। कुछ देर केँ प्रेम भरे चुंबनों केँ बाद, जीजा नें वोँ थोड़ी सि बची हुइ ब्रा औऱ पैंटी भि उतार दि। अब दोनों पूरे नंगे थें, एक् दूसरे कों बेड पऱ चूसरहे थें, हर साँस मे हवसघोल रहे थें। इधर मेरे लन्ड कि रगरग फटने कों आँ गई, थि।
इतने मे दोनों केँ होंठअलग हुए।
दिदी "चलोजी, अब जल्दकरो! मेरी बुर बहोत गीली होँ गई हैं। "
जीजा"चल मेरी रानी, मेरे लन्ड पऱ बैठजा। सवारी कर लेँ औऱ ठंडीकर लेँ अपनी प्यासी बुर। "
इतना सुनते हि दिदी नें लन्ड कों अपनी बुर पर्र सेट किया औऱ अपरचढ गई औऱ तेज़ी सें उछलने लगीं। मुझे पीछे सें उनकी मोटी, गोल गांड कां नज़ारा दिखरहा थां, औऱ साइड सें ऊपर नीचे होते उनके विशाल मम्मे। जब उनकी मोटी मोटी गांडऊपर नीचे होती, तौ मांस केँ हिलने सें औऱ जांघों केँ आपस मे टकराने सें 'थपथप' कि आवाज़ आती। दिदी कि वो मोटी, लचकदार गांड पीछे सें इतनी सेक्सी लगरही थि कि मेरादिल कररहा थां कि अभि जाऊँ औऱ इसी अवस्था मे अपनी लन्ड उनकी गांड मे घुसादूँ।
दिदी "आआआह्म्म्म। क्या बात है जी! औऱ ज़ोर लगाओ आप् भि नीचे सें!"
जीजा "आआआह्ह। तुम्हारे बिना केसे रहूँगा कमल दुबई मे एक् महीना! आआआह्ह्ह्ह। तेरी बुर कि याद मे तौ पागल हौ जाऊँगा। "
दिदी "आह्म्म्म। मेरे सें भि नहि रहा जाएगा आपके लन्ड केँ बिना!अरे."
जीजा "आआआह्ह्म्म। मेरा निकलने वाला हैं। हाय."
दिदी "निकाल दो! आह्म्म्म्म। मेरी तोँ 2 बारझड गई,."
दिदी पूरेआधा घंटा तक उनके लन्ड पऱ उछलती रहीं। जीजाजी कां स्टैमिना भि पूरा ज़बरदस्त थां। मेरे लन्ड कां बाहर् खड़े बुराहाल थां। मे उसे ज़ोर ज़ोर सें हिलारहा थां, पऱ पेगलगे होने केँ कारणमाल निकलने कां नाम हि नहि लेँ रहा थां।
दिदी उठीं औऱ नंगी हि बाथरूम मे चली गयीं। मे खड़ादेख रहा थां, मुझेलगा कि वे एक् औऱ राऊंड करेंगे, औऱ तब मे अपनामाल निकाल लूँगा। लेकीन दिदी जैसे हि बाथरूम सें निकलीं, उनकी निगाह अचानक खिड़की पर्र पड़ी। मे एकदम सें घबराकर पीछेहट गय़ा। दिदी नंगी हि बेड पर्र लंबीलेट गयीं। जीजाजी भि बाथरूम सें आकर लाइटबंद करकेलेट गये। औऱ दोनों नंगे हि सोगए।
मेरा बाहर् खड़े खड़े बुराहाल हौ चुका थां। मेरा लन्ड अब भि खडा थां। तो मे माँ केँ कमरेम चला गय़ा, मां सोई हुई थीं। फिन हरलीन दिदी केँ रूम मे गय़ा, वोँ भि गहरी नींद मे थीं। मे लन्ड थोडा ढीला पडणेलगा, मन मायूस हुआ औऱ मे ऊपर अपनेरूम कि ओरचल पड़ा।
ऊपर जाकर जैसे हि मे रूम मे घुसने वाला थां, मुझे अचानक ताई कि यादआई। औऱ मे अपनीछत सें ताई वाली साइडचला गय़ा, औऱ सीधा ताई केँ आँगन मे कूद गय़ा। रात कां पूरा अंधेरा छाया थां। मैंने अंदर वाला द्वार (दरवाज़ा) खटखटाया, जहाँ ताई सोती होती हें।
द्वार (दरवाज़ा) सुनकर ताई औऱ अमन एकदमडर गए कि घऱ केँ अंदरकौन आँ गय़ा। इतने मे मैंने बाहर् सें आवाज़ दि, "दिलराज हूं मे ताई, द्वार (दरवाज़ा) खोलो। "
अमन उठकर द्वार (दरवाज़ा) खोलने आया। जब उसने द्वार (दरवाज़ा) खोला, अमन सिर्फ़ बॉक्सर मे थां औऱ ऊपर सें नंगा।
अमन "तुँ यहा क्याँ कररहा हैं इतनीरात कों?"
मे "जौ तुँ करकेहटा हैं, वही करनेआया हूं। "
अमन"चल साले। सुभह आँ जानां। सो लेनेदे अब। मे कलचला जाऊँगा, फिन जौ मर्ज़ी करी जानां मेरे पीछे सें। "
मे "नहि दोस्त। आजदिल बहोत कररहा हैं औऱ बुराहाल हुआ पड़ा हैं। समझ मेरे भइया। "
अमन "क्याँ बात? चाची कों क्याँ हौ गय़ा आज? दि नहि उन्होंने?"
मे "साराकुछ यहीं दरवाज़े मे बताऊँ?"
अमन"अ.हाँ। आँ जा अंदर। "
फिन दोनों अंदरगए। ताई बेड पऱ बैठीथीं, पेट तक पतला सां कंबल लियाहुआ थां औऱ ऊपर कमीज़ पहनाहुआ थां। मैंने अंदर जाकर ताई कों सत श्री अकाल बोला।
ताई "केसे होँ दिलराज पुत्त? क्याँ हाल हैं? इतनीरात कों क्याँ कामपड़ गय़ा?"
मे "जिसकाम आया हूं, वोँ रात कों हि करने कां मज़ाआता हैं। " मैंने थोडा मुस्कुराते हुएकहा।
ताई समझ गयीँ, थीं, क्योंकि अमन नें साराकुछ पहले हि बता दियाथ ताई कोा। इतने मे अमनबोल पड़ा।
अमन "हाँ, बता क्याँ चक्कर पड़ गय़ा जोँ सब्र नहि हुआ सुभह तक तेरे सें?"
मे "कुछ नहि दोस्त, घऱ बड़ी दिदी आई हुईँ हें, तोँ सभीकाम काज करकेथक गए औऱ सोगए। मैंने भि मां कों उठाया नहि। "
अमन "अच्छा, फिन इतनामूड केसेबन गय़ा कि रात कों दीवार फाँदकर ताई कि तरफ़ आनांपड़ गय़ा?"
ताई सुनकर मुस्कुराने लगीं।
मे "बस दोस्त, पूछोमत। सालादेख हि कुछऐसा लिया कि रहा नहि गय़ा। "
अमन "अच्छा, मुझे भि बता क्याँ देख लिया?"
मे "ओह दोस्त। साला पानी पीने केँ लिए नीचेआया औऱ रास्ते मे बड़ी दिदी केँ रूम सें कुछ आवाज़ें आईं। मे वहारुक गय़ा। बसफिन क्याँ, जौ आगे देखा उसनेऊपर कां सारा ख़ून नीचेजमा कर दिया। "
अमन "अच्छा, तौ जनाबआज बड़ी दिदी कों 'देते' देखकर आए हें। तभी गर्महुआ फिरता हैं। वैसे कैसीलग रही थि फिनकमल दिदी नंगी?"
मे "पूरी कयामत लगरही थि दोस्त। " मैंने लन्ड पऱ हाथ फेरते हुएकहा। "तुम् बताओ क्याँ कररहे थें? इरादे तौ कुछ तुम्हारे भि ठीक नहि लगरहे। बिना कमीज़ केँ तूँ बॉक्सर मे फिनरहा हैं, औऱ ताई भि बिना सलवार केँ बैठी हें कंबल मे। "
ताई नें मेरी तरफ़ देखा, फिन देखा कि एक् तरफ़ सें कंबलहटा हुआ थां औऱ उनकी जाँघ नंगीदिख रही थि।
ताई "बसकुछ नहि पुत्त, गर्मी लगरही थि इसलिये पहनी नहि। "
मे थोडा हँसकर, "फिन कि गर्मी दूर कि पुत्त नें याँ नहि?"
ताई "हट बेशरम। "
मे "लें ताई, बेशरमी कैसी? औऱ किसने करनी हैं गर्मी दूर तेरी? सारी ज़िम्मेदारी तौ मेरे भइया पर्र हि हैं। " ताई चुपचाप बैठी रहीं। मे उठकरबेड पऱ बैठ गय़ा, मेरामूड पहले हि बहोत बनाहुआ थां।
मे "औऱ फिन, कितने राऊंड लगायें अबतक?" मैंने ताई कां हाथ अपनेहाथ मे लेकरअमन सें पूछा।
अमन "दूसरा राउंड समाप्त करकेहटा थां कि तुँ आँ गय़ा। "
मे "अच्छा, लगता नहि जिस हिसाब सें तूने किया ताई ठंडी हुइ हें। क्यूं ताई?"
ताई "अच्छा, तुझेही केसेपता?"
मे "बसपता लग गय़ा ताई। जैसे तेरा एक् हाथ मेरेहाथ मे हैं औऱ दूसरा तेरी बुर पर्र हैं। " औऱ संग हि मैंने कंबल खींचकर परे फेंक दिया। ताई सच मे एक् हाथ सें अपनी बुर रगड़रही थीं।
मे "बसकर ताई! यह सेवाअब मुझेलूट लेनेदे। " औऱ मैंने अपनाहाथ ताई कि बुर पऱ फेरा।
ताई "आह्म्म्म पुत्त। मेरे लड़के नें तौ लूटली, अब तूँ लूट लेँ सेवा अपनी ताई कि। "
मे उठकर खड़ाहुआ औऱ अपने कपड़े उतारकर नंगा होँ गय़ा। लन्ड पूरातन कर खड़ा थां औऱ ताई मेरे लन्ड कों हि देखरही थीं, उनकी आँखें चमक उठीं।
मे "चलअमन! उतारदे बॉक्सर। तूँ भि होँ जा नंगा। आज तेरी मां कि लेंगे दोनों, जैसे मेरी मां कि ली थि दोनों नें। "
अमन "नहि दोस्त, तुम् लोगकरो एन्जॉय। मे थक गय़ा हूं। सुभह उठना हैं, जानां भि हैं, रेस्ट चाहिए। "
मे "चलठीक हैं, तेरी मर्ज़ी। सोजा तुँ फिन। "
ताई "हाँ पुत्त अमन, सो जा। रेस्ट भि ज़रूरी हैं, कल कों सारादिन सफ़र करना हैं तूने। "
अमन उठकर दूसरे रूम मे चला गय़ा। औऱ मे जाकरबेड पर्र ताई कों किस करनेलगा। मैंने उनकी कमीज़ उतार दि औऱ ताई पूरी नंगीबेड पऱ लंबीलेट गयीं। मे भि उनकेसंग लेट गय़ा, ज़ोर सें गले डालकर किस करनेलगा। आह्म्म्म। औऱ एक् हाथ सें उनके मांसल चुताड मसलने लगा। ताई धीरे-धीरे धीरे-धीरे मेरे जिस्म सें खेलती हुई मेरे लन्ड तक पहुँची औऱ उसेहाथ मे कसकर पकड़ लिया।
ताई "तेरा तौ पुत्त सच्ची बहोत बड़ा हैं! मुझेलगा अमन मज़ाक करता होगा, पर्र सच मे तेरा तोँ अमन सें मोटा औऱ लंबा हैं। "
मे "अच्छा ताई, तुझेही मनपसंद आया मेरा लन्ड?" लेटी हुईँ ताई मेरी आँखों मे देखती बोलीं।
ताई "बहोत मनपसंद आया! उम्म्म्हाआ। आह्म्म्म्म। मेरी तौ अमन कां लेते लेतेबस हौ जाती हैं, तूँ तोँ मार हि डालेगा। "
मे "नहि मरने दूँगा ताई तुम को। तूझे हि अब इसका ख़्याल रखना। "
मे उठा औऱ ताई कि जाँघों मे घुस गय़ा औऱ जीभ उनकी बुर पर्र फेरने लगा। उनकी फूली हुईँ गुलाबी बुर कों चाटते हुए मे उत्तेजना सें भर गय़ा। फिन 69 पोजीशन मे एक् दूसरे पर्र लेटगए। मे ऊपर लंबालेट कर ताई केँ मुँह मे धक्के मारने लगा औऱ उनकी बुर चाटने लगा। "आह्म्म्म। उम्म्म। आआह्ह। ताई, बुर गुलाब। गुम्म्म्म्म। आह्म्म्म्म। आआआह्ह." ताई नें मेरा पूरा लन्ड थूक सें गीलाकर दिया। 5 मिनटबाद मे उतर गय़ा औऱ ताई कि जाँघों केँ पासबैठ गय़ा।
मे "कैसालगा स्वाद ताई मेरे लन्ड कां? आया स्वाद चुसकर?"
ताई "आह्म्म्म पुत्त, सच्ची स्वाद दिला दिया। चल अब नीचे भि आनंद दिलादे जल्द। आआह्ह."
मैंने जाँघों सें पकड़कर लन्ड उनकी बुर पर्र रखा औऱ ताई कि दोनों टाँगें अपने कंधों पर्र रखलीं। धक्का मारा औऱ धीरे-धीरे धीरे-धीरे आधा लन्ड अंदरचला गय़ा। आह्म्म्म्म। मे आधे लन्ड कों आगे पीछे करनेलगा। आआआह्ह्म्म्म। आआह्ह.
ताई "स्स्स्सिइइ। आह्म्म्म। हायरे."
फिन मैंने एक् ज़ोरदार झटका मारा औऱ पूरा लन्ड अंदर धकेल दिया। ताई कि एकदमचीख निकल गई औऱ वोँ ऊपरउठ कर मुझसे लिपटगईं.
ताई "आआआआह्ह्ह्ह्ह्ह। उउउउउइइइइ। मार डालावे कंजरा! आआआआह्ह्ह्ह्ह्ह। धीरे-धीरे धकेलता वे कंजरा! पहले प्रेम प्रेम सें लगारहा थां, एकदम क्याँ हौ गय़ा तुझेही?"
मे "मुझेपता थां। देखरहा थां कहां तक दर्द होता हैं। जब तूने सिसकना स्टार्ट किया, ताई, मुझेपता लग गय़ा अमन कां यहीं तक हि गय़ा हैं। तभी तोँ आगे कां मज़ा एक् झटके मे दिखाया। क्यूं? आया मज़ा मेरी ताई कों?"
इतने मे दूसरे कमरे सें आवाज़ आई.
अमन "धीरे-धीरे करो, मैंने सोना हैं."
ताई "आह्म्म्म। अभि ऐसे हि रुकारह। धक्के नाँ मार। दर्द ज्यादा होगा नहि तोँ। धीरे-धीरे धीरे-धीरे कर, औऱ अमन सोया हैं बाजू वाले कमरे मे। "
मे "आह्म्म्म." मैंने धीरे-धीरे धीरे-धीरे धक्के मारने स्टार्ट किए। "आह्म्म्म। आआह्ह। कैसा लडका हैं तेरा ताई? उसकी मम्मी चुदवा रही हैं औऱ वोँ ख़ुद बाजू वाले कमरे मे सोया पड़ा हैं। " मैंने थोडा मुस्कुराते हुएकहा।
ताई "आह्म्म्म." वोँ लंबी लेटते हुए पीछे कों झुकीं। "आआह्ह। फिन क्याँ हुआ? वोँ तोँ ड्यूटी लगा गय़ा अपनी, अब तूँ पूरीकर रहा हैं ड्यूटी। आँ जा, ऊपर लेटजा मेरे."
औऱ मे ऊपरलेट गय़ा औऱ किस करनेलगा औऱ ज़ोर सें धक्के मारने लगा। आआआह्ह्म्म्म। आह्म्म्म्म। उम्म्म्हाआआ। मैंने पूरीरात ताई कों चोदा, कभी टाँगें उठाकर औऱ कभी घोड़ी बनाकर। 4 राऊंड लगाकर दोनों नंगे हि सोगए.
सुभहआँख खुली तोँ ताई कि आवाज़ें आँ रहीथीं।
ताई "आआआह्ह। चोद लेँ पुत्त। ओह। आख़िरी बार! आआआआह्ह्ह्ह। याद किया करनाफिन तूँ 'मां' कि गांड कों कॅनडा जा केँ। आआआह्म्म्म्म। उठ गय़ा
दिलराज पुत्त तूँ भि?" मुझेउठ कर बैठता देखकर ताई बोलीं।
मैंने उठकर देखा। ताई बेड पऱ दोनों बाहें रखकर घोड़ी बनी हुई थीं औऱ अमन पीछे सें धक्के माररहा थां। औऱ ताई बड़ेमजे सें आवाज़ें निकाल रहीथीं।
मे "अरे मादारचोद! सुभह हि लग गय़ा ठोकने मम्मी कों। "
अमन "आह्म्म्म। आआह्ह। यह तौ डेली कां काम हैं। रात कि ठुकाई चाहेरह जाए, पर्र सुभह कि ज़रूरी होती हैं। "
ताई "आआआह्ह। पुत्त, सुभह जौ मजाआता हैं खाली मुँह, वोँ रात कों नहि आता। आआआह्ह पुत्त। हाँ.ऐसे हि। आआह्ह। मार लेँ आज अच्छी तरहआज गांड अपनी मां कि, फिनयाद करकेमुठ हि मारनी हैं। आआह्म्म्। दिलराज, आँ जाइधर कों, तूँ भि मेरी तरफ़ टाँगें कर। "
मैंने कंबल साइड किया औऱ ताई कि तरफ़ टाँगें करकेलेट गय़ा। मम्मी पुत्त कि ठुकाई देखकर मेरा लन्ड पूरा खड़ा थां। इतने मे ताई नें मेरा लन्ड मुँह मे डाल लिया। मे सुभह सुभह स्वर्ग मे पहुँच गय़ा। "आह्म्म्म्म। आआआह्ह। मजा आँ गय़ा ताई! आआह्ह। इतने प्रेम सें अभि माँ नें भि नहि चूसा मेरा! आह्म्म्म्म."
अमन ज़ोर ज़ोर सें धक्के माररहा थां पीछे सें औऱ ताई मेरा लन्ड चूसरही थीं।
अमन "आआआह्ह। क्यूं फिन दिलराज, रात कों आयामजा मां केँ संग?"
मे "हाँ, बड़ा आनंद दियारात कों तेरी मां नें। "
अमन "आह्म्म्म। अब तुम्हे हि ख़्याल रखना मेरे पीछे सें। "
मे "हाँ अवश्य, सुभह सुभह गांड मे धकेला करूँगा मे भि। "
ताई एकदम लन्ड मुँह सें निकाल कर बोलीं:
ताई "हाँ! पर्र दिलराज पुत्त, तूँ गांड मे धीरे-धीरे धीरे-धीरे हि डालना।
तेरे लन्ड सें दर्द बहोत होगी पहलीबार। उम्म्म्हाआआ." लन्ड केँ टोपे पऱ किस करती हुई बोलीं, "तेरा मोटा बहोत हैं। "
अमन"हाँ दिलराज, धीरे-धीरे धीरे-धीरे मारणा गांड मे मेरी माँ कि। " धक्के मारता हुआ बोला। "आआह्ह। मुझे मां कहती थि तेरी माँ जैसी गांड करनी हैं! अब तूँ कर देना अपनी माँ जैसी मोटी गांड."
ताई "आह्म्म्म्म। तेरी माँ कि मेरे लड़के नें हि कि हैं दिलराज पुत्त। अब तेरेपास मौक़ा हैं बदला लेने कां। " थोडा हँसती हुईँ बोलीं, "मेरी भि तेरी माँ जैसी करनी हैं। "
मे "हाँहाँ, क्यूं नहि, बदला तोँ अवश्य लूँगा!" मे हँसता हुआ बोला।
इतने मे अमनझड़ गय़ा। औऱ ताई नें मेराचुस चुस हि कर निकाल दिया। फिन हम् तीनों नें कपड़े पहनलिए। औऱ समय देखा तौ 7 बज थें।
मे "चलठीक हैं, मे चलता हूं ताई, बाद मे आऊँगा। "
इतनाकह कर मे ऊपर सें अपनेरूम मे चला गय़ा। युवराज अभि भि सोया थां। मे भि जाकर लंबालेट गय़ा औऱ नींद आँ गई,।
10 बजेउठा, नीचे गय़ा। सारे बैठेहुए थें। ताई औऱ अमन भि आएहुए थें, सारे बातें कररहे थें। अमन नें आज जानां थां औऱ मिलने आया थां। अमन औऱ ताई मिलकर चलेगए। हरलीन दिदी नें भि छुट्टी करली थि। हम् दोनों भाइयों नें भि छुट्टी करली थि, जीजाजी औऱ बड़ी दिदी केँ आए होने कि वजह सें। ऐसे हि बातें करतेहुए जीजा नें बताया कि बिज़नेस केँ चक्कर मे एक् महीना उन्हे दुबई जानां हैं, औऱ बड़ी दिदी यहीं रुकेंगी। मां औऱ हरलीन दिदी खुशथीं, औऱ हम् दोनों भइया भि! बसऐसे हि गपशप बातों मे दिन निकल गय़ा।
साम कों हम् मोटर कि तरफ़ बाहर् घूमने निकले, जीजाजी भि संग थें। ताई केँ घऱ केँ बाहर् सें निकलने लगे तौ ताई गेटलगा रहीथीं।
मे "किधरचले ताई?"
ताई "तुम्हारे घऱ हि चली थि। अमनचला गय़ा औऱ घऱ अकेली थि, सोचा तुम्हारी तरफ़घूम आती हूं। "
युवराज "हाँजी ताई, जाआओ.घऱ हि हें सारे। "
ताई "हम्म। तुम् किधर कों चले जमाई कों लेँ कर?"
मे "मोटर कि तरफ़चले थें, घूमफिन करआते हें बस। "
औऱ ताई घऱ कि तरफ़चली गयीं, औऱ हम् मोटर कि औऱ चल पड़े। 2 घंटे तक घूमफिन करघऱ वापस आँ गए। ताई भि घऱ पर्र हि बैठीथीं।
औऱ बाते करणेलगे।
माँ उठकर रसोई मे चली गयीं, बाकी सारे बैठे बातें कररहे थें। कुछ वक्तबाद मे भि उठकर रसोई कि तरफ़ गय़ा। माँ अंदरकाम कररही थीं। मुझे अंदरआते देख मां पीछे कों घूमीं औऱ बोलने लगी हि थीं। कि मैंने जाते हि उनकीकमर सें पकड़कर होठों मे होंठडाल दिए! "आआआह्ह्म्म्म। उम्म्म्हाआआ."
लंबीकिस करके पीछेहटा औऱ खड़ा हौ गय़ा।
मां "तुँ मरवाएगा किसीदिन!"
मे "क्यूं, क्याँ हुआ?"
माँ "यह जौ करता रहता हैं। सारे बाहर् बैठे हें, ऊपर सें जमाईघऱ बैठा हैं औऱ तूँ ऐसेकाम करता हैं। टिक जायाकर। "
मे "क्याँ करूँ माँ, रहा नहि जाता तेरीदेख कर। "
मां "अच्छा जी? क्याँ बातहो गई, रात कों ताई तेरी नें कसर छोड़ दि थि कोई?"
मे "अच्छा, तुम को केसेपता रात कों ताई केँ पास थां?"
मां "तेरी ताई नें बताया थां आज! औऱ आजरात कों भि ताई केँ संग हि सोना हैं तेरी। उनकी बेहन कि लड़की कुलजीत आजआई नहि, कल कों आनां हैं उसने। मुझे कहती थि दिलराज कों भेज देनारात कों। "
मे "अच्छा! साला, ज़नानियों केँ पेट मे पचता नहि कुछ!
सभी कुछबोल देती हें एक् दूसरे कों!"
मां "ऐसा हि हैं पुत्तर जी। "
मे थोडा नाटक करतेहुए, "पऱ आज तोँ मैंने अपनी प्यारी माँ कि लेनी थि। "
माँ "अच्छा जी?"
मे "हाँजी."
माँ "कोई नां, आज ताई केँ संग गुज़ारा कर। औऱ घऱ मे जमाईआया हैं, बेवजह रिस्क नहि लेना। "
इतने मे बाहर् सें ताई कि आवाज़ आई.
ताई "चल अच्छा मनजीत, मे चलती हूं। " कहतेहुए अंदर आँ गयीं, मेरी तरफ़देख कर मुस्कुराती हुईं।
मां "रुकजाओ बहनजी, रोटीखा कर हि जानां। अब कहां जाकर बनाते रहोगे? औऱ दिलराज भि संग हि चला जाएगा। "
ताई "नहि नहि, मे बना लूँगी जाकर रोटी, कोई बात नहि। दिलराज, तुँ आँ जानां फिन, इकट्ठे खा लेंगे। "
मे अनजान बनताहुआ थोडा, "कहां आँ जाऊँ ताई?"
ताई "मेरेघऱ। हैं नहि कोई। कुलजीत आई नहि आज, उधर सो जानां मेरेपास। "
मे "मेरा तोँ मुश्किल हैं, मैंने जानां हैं कहींरात कों। युवराज आँ जाएगा ताई। "
मां सुनकर थोडा मुस्कुराने लगीं, औऱ ताई कां मुँहलटक गय़ा।
मां "क्यूं बकवास करेजा रहा हैं तुँ दिलराज! बेवजह लगा हैं खिझाने आपको बहनजी। (ताई बड़ीथीं, औऱ रिश्ते मे भि, माँ उन्हें बहनजी कहकर बुलाती हें, पंजाब मे वैसे भि ताई कों बहनजी हि बुलाते हें)। इस कंजर नें कहीं नहि जानां।
मे थोडा हँसता हुआआगे हुआ औऱ ताई कों कमर सें पकड़कर अपनेपास किया। औऱ उनके मुँह कों नीचे सें पकड़कर होंठ घोंटदिए। दोनों होंठ इकट्ठे अपने मुँह मे डालकर चूसने लगा। "उम्म्म्हाआआ। आह्म्म्म्म." ताई एकदम धक्का मारकर पीछे हुईं।
ताई "छोड़वे कंजरा! क्याँ कररहा हैं! नी मनजीत, तेरेसंग भि ऐसे हि करता होता हैं यह? दफ़ा हौ!"
माँ "हैं हि कंजरयह! चलो बैठो आप्, खाकर जानां रोटी। चल दिलराज, तूँ भि बाहर् बैठ अपनी बहनों केँ पास। "
औऱ मे मां कि गांड पर्र एक् थप्पड़ मारकर बाहर् कों चला गय़ा।
ताई "देख तोँ क्याँ करता हैं! कंजर नाँ होवे!चल, मे हेल्प कराती हूं फिन तेरी मनजीत। "
माँ औऱ ताई दोनों रसोई मे रोटी बनाने लग गयीं, औऱ बाकी हम् बाहर् बैठकर बातें करनेलग गए। 1 घंटेबाद सबने रोटीखा ली औऱ कुछ वक्त बातें करके अपने अपनेरूम मे जानेलगे सारे। जीजाजी नें ताई कों माथा टेकते हुएकहा।
जीजा "अच्छा ताई जी, मे सुभह जल्द निकल जाऊँगा। औऱ अच्छा दिलराज, तुँ भि सोया नहि, मत उठना, मे निकल जाऊँगा सुभह सुभह."
मे "चलोठीक हैं जीजाजी, ख्याल रखना। "
फिन मे औऱ ताई, ताई केँ घऱ कों चल पड़े। घऱ पहुँच कर.
ताई "चल तुँ बैठरूम मे, मे दूध लेँ करआती हूं। "
मे "क्याँ लोड हैं? तेरा हि पी लूँगा मे ताई! आँ जा, रहनेदे!" हँसते हुए बोला।
ताई "मे किसका पीऊँगी फिन?चल, तुँ कमरे मे, मे लेँ करआती हूं। "
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ताई- "मे किसका पीऊँगी फिन?चल, तूँ कमरे मे। लें करआती हूं मे। "
औऱ मैंने कमरे मे जाकर अपने सारे कपड़े उतारदिए औऱ बेड पऱ नंगालेट गय़ा। थोड़ी देरबाद ताई एक् गिलास मे दूध लेकर कमरे मे एंटर हुईं। वोँ सलवार कुर्ती मे, बिना दुपट्टे केँ, हाथ मे दूध कां गिलास लिएआती हुई, वो बिलकुल एक् मिल्फ दिख हि थि।
कमीज़ केँ अंदर सें उनके मोटे-मोटे मम्मे बाहर् आने कों कररहे थें, आधे सें ज्यादा मम्मे ऊपर कों उभरेहुए थें, जौ साफ़ दिखारहे थें कि अंदर ब्रा पहनी हैं। पासआकर दूध कां गिलास टेबल पर्र रख दिया।
मे- "एक् हि गिलास? औऱ कहतीथीं मे भि पीऊँगी। "
ताई- "हाँ! औऱ दोनों पीएँगे एक् गिलास मे सें हि। "
मे- थोडा हँसता हुआ, "अच्छा जी, एक् हि गिलास मे पीना हैं मेरीजान कों मेरेसंग। "
ताई- "अच्छा जी?अब ताई तेरीजान हौ गई, ?" वो मेरेपास बैठती हुईँ बोलीं, औऱ मेरे मुँह पर्र हाथ फेरती हुईँ पूछने लगीं, "औऱ कितनी जान हें तेरी?"
मे- "अभि तक तौ 2 हि हें—एक् आप् औऱ दूसरी माँ।
ताई- "अच्छा? औऱ कितनी चाहिए?" उन्होंने कंबल साइड पर्र किया औऱ अपनी जाँघों सें मेरे लन्ड कों छूतेहुए पूछा।
मे- "आप् हि देख लेना ताई, कितना झेल सकता हैं। " मैंने अपने लन्ड कि तरफ़ इशारा करके बोला।
ताई- मेरे लन्ड कों हाथ मे पकड़ती, "अरेवे। इसकेऊपर जोँ बैठ गई,, वोँ नहि उतरणे वाली वापस। "
मे- "अच्छा ताई? चल आँ जाफिन, बैठजा जल्द! फटने पऱ आया हैं साला। "
ताई- "दूध तौ पी लेँ पहले!"
मे- "पहले एक् राऊंड लगा लें, फिन आहिस्ता पीएँगे। चलउठ!खोल सलवार जल्द!"
ताई नें उठकर सलवार कां नाड़ा खोला, औऱ नीचे सें पूरी नंगीथीं, बिना पैंटी केँ! फिनऊपर सें कमीज़ उतार दि, औऱ ब्रा उतारने लगीं तौ मैंने रुकने कों कह दिया।
ताई- "क्याँ हुआ? ब्रा नाँ उतारूँ?"
मे- "नहि, ब्रा पहनीरख ताई! ऐसे अधिक आनंद आएगा, जब लन्ड पऱ उछलेगी। "
ताई नें 'हम्म'कहा औऱ मेरी जाँघों पऱ बैठ गयीं। औऱ लन्ड कों अपनी बुर पऱ रखा।
मे- "आआआह्म्म्म ताई! गीला तौ कर लें याँ सूखा हि लेना हैं बुर मे?"
ताई थोड़ी हँसीं औऱ पीछे कों होकर होंठ लन्ड पऱ रखदिए औऱ आहिस्ता चूसने लगीं। 2 मिनट लन्ड चूसकर गीलाकर दिया औऱ फिन मुँह सें निकाल कर बुर लन्ड पर्र रख दि.
ताई- "आह्म्म्म। धीरे धीरे करनाआज। आह्म्म्म."
मे- "सारा कंट्रोल तेरेपास हैं ताई! आआह्ह्ह। बैठजा। आआह्ह्ह्म्म। बैठजा। हाँ, ऐसे हि! आआह्ह्ह."
आधा लन्ड ताई कि बुर मे चला गय़ा। "आआह्ह्ह। बैठजा ताई, पूरा लेँ अंदर!"
ताई नें आँखें बंदकर लीं औऱ सिसकियाँ लेती हुई पूरा लन्ड अंदर लेँ लिया औऱ बैठ गयीं। "आआह्म्म्म ताई! कैसालग रहा हैं?"
ताई- "आआह्ह वे पुत्त! ऐसालग रहा हैं कोई गर्मरॉड अंदर लेँ रखी हौ। "
मे- "चल ताई! फिन गर्मरॉड कों मजादे अब, औऱ ख़ुद भि मजा लें."
ऐसे हि बैठी ताई लन्ड पऱ अपनी गांड घुमाने लगीं। "आआह्ह्ह ताई! तूँ तोँ पूरी एक्सपर्ट हैं! आआह्ह्ह्ह। हाँ, कर लें खुला भोसड़ा अपना! आआह्ह्ह." मुझेऐसे बोलते हुए औऱ ज्यादा मजाआने लग गय़ा थां।
ताई- "आआह्ह्ह एक्सपर्ट तोँ होना हि हैं! तेरे सें दोगुनी उम्र हैं मेरी पुत्त! आआह्ह्ह। इस भोसड़ी नें बहोत लन्ड खाए हें। आआह्ह्ह!"
मे- "आआह्ह्ह्म्म! अच्छा ताई! किस-किस केँ खाए लन्ड? बता मुझे भि! आआह्ह."
ताई- "कोई नां, बताऊँगी तेरी भि पुत्त! आआह्ह्ह। अभि मजे लेँ अपनी ताई कि बुर कां। "
ताई ऊपर-नीचे उछलने लगीं। आआह्ह्ह। सफ़ेद ब्रा मे उनके मोटे-मोटे मम्मे पूरे सेक्सी लगरहे थें। मैंने दोनों हाथों सें मम्मे पकड़कर मसलने लगा। "आआह्ह्ह ताई! हाँ, ताई ऐसे हि! आआह्ह्ह्म्म."
10 मिनट उछलने केँ बाद ताई कों माल बुर मे महसूस हुआ.
ताई- "आआह्ह वे कंजरा! काढ़ दियाबीच मे हि! हायराम!"
ताई ऊपर हुईं औऱ उनकी बुर मे सें माल निकलता हुआ मेरी जाँघों मे गिरा।
ताई नें उठकर कपड़े सें अपनी बुर साफ़ कि औऱ फिन मेरी जाँघें साफ़कीं।
औऱ मेरेपास आकरबैठ गयीं। फिन मैंने ताई कि ब्राखोल दि औऱ मम्मे आज़ाद करदिए।
ताई- "अब ब्राखोल दि! जब लन्ड पऱ बैठी थि, तब ब्रा मे रखा। तेरी भि समझ नहि लगती!"
मे- "उसका भि अलग मज़ा हैं! अब नंगी होकरबैठ पास। औऱ ताई, जब तूँ बेझिझक होकर लन्ड, बुर, भोसड़ा बोलती हैं, तब बड़ा आनंदआता हैं। "
ताई- दूध कां गिलास उठाती हुईँ बोलीं, "मुझे तोँ स्वयं बड़ा आनंदआता हैं ऐसेबोल कर। मे औऱ अमन पूरा गंदा बोलते हें आपस मे, जब भि अकेले होते हें। " दूध कां एक् घूँट लेकर, "आँ लें, पी लेँ। "
मैंने दूध कां गिलास पकड़कर एक् घूँट पिया, फिन ताई नें पिया। ऐसे करके दोनों नें दूध समाप्त किया, औऱ ताई मेरे
संगगले डालकर लेट गयीं।
इतने मे ताई केँ फ़ोन पऱ रिंगबजी। फ़ोन पऱ 'मनजीत' लिखा थां, मतलब माँ कां फ़ोन थां। ताई नें फ़ोन उठाया। उधर सें आवाज़ आई-
मां- "सो तोँ नहि गए थें बहनजी?"
ताई- "नहि नहि, जागरहे थें। बसदूध पीकरहटे हें। "
माँ- "अच्छा-अच्छा, जाग(दही जमाने वाला थोडा सां दही) वास्ते पड़ा हैं कुछदही याँ लस्सी? मुझेदे देना सुभह केँ लिए, दही जमाना हैं। "
ताई- "हाँजी हैं! आँ जाओ, लें जाओ। "
मां- "गेट पऱ हि हूं, खोलो आँ केँ। " ताई नें फ़ोन काटा औऱ जल्द-जल्द उठकर सलवार पहनली।
ताई- "वे मेरी कमीज़ पकड़ा देबेड सें। "
मे- बेड सें कमीज़ उठाकर ताई कों पकड़ाता हुआ, "क्याँ हुआ? क्याँ आफ़त आँ गई, ?"
ताई- "आफ़त तेरी मम्मी आई हैं! गेट पर्र खड़ी हैं जाग लेने। "
ताई बिना दुपट्टे लिए बाहर् गेट खोलने चली गयीं। गेट खोलते हि मनजीत (मां) अंदर आयीं।
मां- "डिस्टर्ब तोँ नहि किया बहनजी?" थोड़ी मुस्कराहट केँ संग।
ताई- "नहि नहि." कहतेहुए अंदर जाने लगीं।
मनजीत- गांड कों हिलता देख पीछे-पीछे चलती हुइ, "दिलराज सो गय़ा?"
ताई- "नहि, अभि नहि। दूधपी कर लंबा लेटा थां। " रसोई मे एंटर होतेहुए, "एक् मिनट। फ़्रिज मे पड़ा हैं दही। " फ़्रिज मे सें दही निकाल कर एक् कटोरी मे डाला।
मे बेड सें उठा औऱ नंगा हि बाहर् कों निकला। माँ औऱ ताई रसोई मे थीं। मे जैसे हि रसोई केँ पास पहुंचा, मां दही कि कटोरी लेँ कर बाहर् कों निकलने लगीथीं।
मे आगे खड़ा होकर माँ कों ज़ोर सें ज़फ़ी डालली।
मे- "लेँ लियाजाग मां?"
माँ- "हाँ, लेँ लिया। तुँ क्याँ कररहा हैं नंगायहा?"
ताई- "तुँ क्याँ करनेआया बाहर् दिलराज?"
मे- "वोँ हि जौ मेरी मम्मी करवाने आई हैं मेरे सें। "
ताई- "क्याँ करवाने आई हैं? जाग लेनेआई हैं वोँ। "
मे- मां केँ मुँह पऱ जीभ फेरता हुआ, "सच्ची मां जाग लेनेआई हें?"
मां- होश संभालती हुइ, "हाँ पुत्त, जाग हि लेनेआई हूं। औऱ क्याँ लेना हैं मैंने!"
मे- "मुझे नहि लगता मां। " होंठों पऱ जीभ फेरते हुए बोला।
मां पूरी गर्म हौ गयीँ, थीं एक् सेकंड मे। माँ नें जीभ मुँह मे डालकर चूसनी शुरुआत कर दि।
ताई- "क्याँ होँ गय़ा मनजीत! क्याँ करीजा रही हैं? बाद मे कर लेना! हरलीन याँ कमल न् आँ जाएँ पीछे तेरे देखने
कों। "
मां- जीभ छोड़ती हुइ, "ओह, वोँ सोगए हें बहनजी। पर्र मुझे नींद नहि आँ रही थि। "
मे- "देखा ताई? मैंने कहा थां नं, जाग सिर्फ़ एक्सक्यूज़ थां। " मैंने दोनों हाथों सें उनकी गांडमसल कर बोला, "आई तोँ यह लन्ड पऱ चढ़ने हें। "
माँ- "फिन क्यूं तड़फ़ा रहा हैं?" उन्होंने मेरा लन्ड पकड़कर देखा, "देख तोँ, केसे रेडी होँ कर खड़ा हैं पुत्त। "
मे जल्द सें माँ कि कमीज़ उतार दि औऱ सलवार कां नाड़ा खोल दिया, औऱ सलवार नीचेगिर गई,। रसोई मे माँ अब नंगी खड़ीथीं। मे माँ कों संग लेकर ताई केँ रूम मे चल पड़ा। ताई पीछे-पीछे माँ केँ कपड़े उठाती हुई चली आँ रहीथीं।
कमरे मे जाकर मां कों बेड पर्र घोड़ी बनने कों कहा.
माँ- घोड़ी बनतेहुए, "जल्दकर पुत्त, मैंने जानां हैं घऱ। "
मे पीछे खड़ा होकर लन्ड माँ कि बुर मे एक् झटके सें धकेल दिया। "आआआह्ह्ह। यहींसो जा हमारे संग, सारीरात ठोकूँगा दोनों कों! आआह्ह्ह्ह."
मां- "आआआह्ह्ह ओहवे!मार डाला पुत्त! आआह्ह्ह। तरसी पड़ी थि पुत्त! सब्र नहि हुआ, इसलिये आँ गयीँ,। "
मे- उनकी गांड पर्र हाथ फेरता हुआ, ज़ोर-ज़ोर सें धक्के माररहा थां। ताई साइड पर्र बैठीथीं। मैंने ताई कों आवाज़ मारकर अपनेपास बुलाया। ताई उठकर मेरेपास आईं। मैंने बड़े प्रेम सें ताई केँ मुँह पर्र हाथ फेरते हुए माँ कों पीछे सें धक्के माररहा थां। "आआह्ह्ह ताई, तूँ क्यूं कपड़ों मे खड़ी हैं? उतार केँ नंगी हौ जा जल्द। "
ताई- "पऱ पुत्त, पहले मां अपनी कों तौ ठंडीकर दे, फिन मे भि उतार दूँगी। "
माँ- "उतारदो बहनजी! क्यूं लज्जा करी जाती हौ? मे तुम्हारे सामने घोड़ी हुई पड़ी हूं! आआह्ह्ह। अपने लड़के कां लें कर! उम्म्म्हाआआ."
इतना सुनते हि ताई नंगी हौ गयीं। मैंने ताई कां हाथ पकड़ा औऱ माँ कि गांड पऱ रख दिया। "क्यूं ताई? ऐसी करनी हैं तूने भि?"
ताई- "आह्म्म्म हाँ पुत्त, ऐसी हि करनी हैं। " गांड कों मसलती हुई बोलीं, "क्या बात है मनजीत! तेरी गांड सच्ची बड़ी मोटी हैं, बड़ी ख़ूबसूरत लगती हैं। "
मां- "आआह्ह हाँ बहनजी! तेरे पुत्त कि मेहनत हैं औऱ कुछ दिलराज केँ डैडी कि। आआह्ह्ह्ह। दिलराज पुत्त, मेरी तौ 2 बारझड गयीँ, ! आआह्ह्ह। कितना वक्त लगना हैं तुम्हारी तरफ औऱ? आआह्ह्ह."
मे- "आआह्ह्ह मेरा भि अब होने वाला हैं! आआह्ह्ह." 2-4 धक्के औऱ मारे। लन्ड बाहर् निकाल करगंड पऱ सारामाल निकाल दिया। माँ सीधी होकर खड़ी हौ गयीं।
मां- किस करती हुईँ, "उम्म्म्हाआआ! मजा आँ गय़ा पुत्त!"
कपड़े उठाने केँ लिए जैसे हि वोँ झुकीं, पीछे सें गांड पऱ लगामाल किसी नें हाथ सें साफ़ किया। जब ऊपर होकर पीछे देखा तौ ताई थीं। 2 उँगलियाँ माल वाली मुँह मे डालकर चूसने लगीथीं। मेरे दिमाग़ मे पता नहि क्याँ आया, "बहनजी! अकेले अकेले मजे?" बोलते हि जाकर उनके होंठों पऱ किस करनेलगा औऱ जीभचूस ली। "आआआह्ह्म्म्म। उम्म्म्हाआआ। बहनजी."
मे देखकर पागल हौ गय़ा। पहलीबार 2 ज़नानियों कों रियल मे किस करतेदेख रहा थां।
दोनों केँ मम्मे आपस मे रगड़खा रहे थें। कुछसमय बाद दोनों अलग हौ गयीं। मां नें कपड़े पहनलिए औऱ ताई भि बेड पर्र बैठ गयीं।
माँ- "अच्छा पुत्त, मे चलती हूं। चंगा बहनजी, करो तुम् एन्जॉय। " मुस्कुराकर बोलीं।
मे- मां केँ नज़दीक गय़ा, "क्यूं माँ, मजाआया ताई केँ संगकिस करके?"
माँ- "बहोत मजाआया पुत्त! पहलीबार किसी ज़नानी केँ होंठ चूसे हें। "
ताई- "सच्ची मनजीत, मजा आँ गय़ा! तेरे जिस्म सें जबबदन लगा, पूरा करेंट लग गय़ा थां। "
मां- "कोई नाँ बहनजी, कभी खुले वक्त मे एन्जॉय करेंगे। चलो, चलती हूं मे। " इतनाकह मां बाहर् चली गयीं।
ताई- "जा दिलराज, निक्कर पहनकर गेटबंद कर आँ, नहि तौ मुझे कपड़े पहनने पड़ेंगे। "
मैंने निक्कर पहनकर मां कों बाहर् भेजकर गेटबंद कर दिया, औऱ अंदर आँ कर निक्कर उतारकर ताई केँ संग लंबालेट गय़ा। आधा घंटा ज़फ़ी डालकर पड़ेरहे औऱ कुछसमय बाद एक् राऊंड ताई पर्र लगाया, औऱ फिन दोनों नंगे हि ज़फ़ी डालकर सोगए.
सुभह 7 बजेआँख खुली। ताई गरमचाय लें कर नंगी हि बेड पर्र बैठती हुईँ बोलीं।
ताई- "चलउठ मेरा पुत्त, गरमचाय पी लेँ। "
मे उठकरगरम चाय कां गिलास पकड़कर पीनेलगा। सुभह सुभह नंगी स्त्री केँ संगगरम चाय पीने कां मजे हि अलग आँ रहा थां। दोनों नें गरमचाय पीकर गिलास साइड पऱ रखदिए। "क्याँ प्रोग्राम हैं अब ताई ?" ताई नंगी मेरी तरफ़देख रहीथीं।
ताई- "तुम को भि तौ पता हि हैं क्याँ रूटीन हैं तेरी ताई कां सुभह कां। आज कुलजीत नें आँ जानां, फिन कहां समय मिलना करने कों। "
मे- "चलफिन ताई, हौ जा घोड़ी, धक्के तेरी गांड मे आज मे भि डालूँगा। "
ताई बेड सें उठीं औऱ बेड पऱ बाहें रखकर घोड़ी होँ गयीं। ताई केँ मम्मे नीचे कों लटकरहे थें, बड़े सेक्सी लगरहे थें।
मे पीछे गय़ा औऱ गांड पऱ एक् थप्पड़ मारा, "क्यूं? रेडी हैं मेरी घोड़ी, घोड़े कां लन्ड लेने कों?"
ताई- "हाँ पुत्त, चढ़जा घोड़ी पऱ! पऱ धीरे-धीरे चढ़ना। आज वाले घोड़े कां लन्ड लंबा हैं, परेशानी नां हौ तेरी घोड़ी कों। "
ताई बोलती बड़ी सेक्सी लगरही थीं। मैंने लन्ड गांड केँ छेद पऱ रखा औऱ धीरे-धीरे धीरे-धीरे आधा लन्ड अंदरडाल दिया।
इसबार मे परेशानी नहि देना चाहता थां। धीरे-धीरे धक्के मारने स्टार्ट किए। आह्म्म्म्म। मुझे आनंद आँ रहा थां पूरा। ताई कि गांड मां जैसी मोटी तौ नहि थि, पर्र कम सेक्सी भि नहि थि। ताई भि आनंद लें रहीथीं पूरा।
ताई- "आह्म्म्म पुत्त! आआह्ह्ह। बड़े प्रेम सें कररहा हैं आज! आह्म्म्म."
मे- "अपनी प्यारी ताई कों दर्द थोड़ी देना। " गांड पऱ प्रेम सें हाथ फेरता हुआ.
ताई- "आह्म्म्म। तेरेइस प्रेम नें दीवानी कर दिया हैं तेरी! तुँ जैसे मज़े करने हें कर मेरा पुत्त। दर्द देना हैं, दे लें कोई नाँ। तेरी हि हूं अब! जैसे मर्ज़ी इस्तेमाल कर अपनी ताई कों पुत्त। "
मे भि यही सुनना चाहता थां (जब आप् किसी स्त्री याँ लड़की कि केयर करते हौ, फिन वोँ भि हर इच्छा पूरी करती हैं)। "आआह्ह्ह्म्म." आरामसे धक्के मारता हुआ, "हाँ ताई, कररहा हूं मे, औऱ तेरेबदन कां मजा लें रहा हूं। इतना सेक्सी बदन हैं तेरा, अभि तक अमन नें अच्छी तरह निचोड़ा नहि तुम्हें." मैंने धक्के तेज़ करतेहुए बोला। ताई कि आवाज़ें भि तेज़ हौ गयीं.
ताई- "आआआह्ह्ह्ह्ह्ह। आयययय। हाँ पुत्त! अब तूँ हि निचोड़ना! आआह्ह्ह। हाँ, धकेलदे पूरा!लगा दे ज़ोर! आआह्ह्ह."
मे- "आआह्ह्ह ताई! दर्द होगा! थोड़ी कंट्रोल कर लेँ। "
ताई- "धकेलदे पुत्त! परवाह नाँ कर! आआह्ह्ह्म्म."
मैंने ज़ोरलगा कर सारा लन्ड धकेल दिया! गांड कों चीरता हुआ अंदर तक घुस गय़ा। "आआआह्ह्ह ताई! गय़ा सारा! आआह्ह्ह." गांड पऱ थप्पड़ मारता हुआ, धक्के मारने लगा।
ताई कि चीखें पूरे कमरे मे गूँजरही थीं। आवाज़ें सुनकर पूरा आनंद आँ रहा थां औऱ अपने लन्ड पऱ गर्व भि महसूस हुआ, एक् 40+ कि ज़नानी कि चीखें निकलवा रहा थां।
पूराआधा घंटा गांड मारी ताई कि, औऱ अंदर हि झड गय़ा, फिन थोड़ी देर आराम करके कपड़े पहनलिए। ताई नें भि कपड़े पहनलिए, औऱ मेरे होंठों पर्र किस करके मे घऱ कों निकल गय़ा।
घऱआया। माँ औऱ बड़ी बेहन रसोई मे थीं। हरलीन दिदी सजधजकर होकररूम सें बाहर् आती हुइ मिलीं।
हरलीन दिदी- "आँ गय़ा दिलराज? गरमचाय लें करआऊँ तेरेलिए? याँ ताई सें पीकरआया?"
मे- "पीकरआया दिदी, रहनेदो। "
दिदी नें 'हम्म' किया औऱ रसोई मे चली गयीं। मे भि अपनेरूम मे चला गय़ा। युवराज सजधजकर हौ रहा थां। मे भि जाकर सजधजकर होनेलगा औऱ दोनों रेडी होकर नीचे आँ गए।
हरलीन दिदी कॉलेज निकल गयीँ, थीं। हम् दोनों भि रोटीखा कर कॉलेज निकलगए।
घऱ वड्डी दिदी औऱ मां रह गयीं। दोनों रोटीबना कर आराम करने लगीं औऱ बातें करने लगीं।
माँ- "कमल, गर्मी बढ़ गई, हैं अब पहले सें। "
कमल (वड्डी दिदी)- "हाँ माँ, अब पूराताप मारता हैं सूरज। अभि हि तोँ पहना थां सूट, देख लें गर्मी सें गीला भि हौ गय़ा। "
मां- "तने क्यूं इतना मोटासूट पहना हैं? कोई हैं नहि तेरेपास पतला सां? वोँ पहन लें, कहां जानां हैं कहीं तूने। खड़ी हौ! मे कोई देती हूं तुम को, जौ तेरे ढीला होगा औऱ ठीक रहेगा गर्मी मे। आँ, इतना टाइट सां पहनी फिरती हैं। "
मां आगे होकरसूट पकड़कर रखती हें औऱ कमीज़ कों ऊपर करके उतारकर साइड पऱ रख दिया। नीचे पहनी हुइ ब्लैक ब्रा मे खड़ी दिदी नें माँ नें दियाहुआ सूटपहन लिया औऱ सलवार भि बदलली।
माँ- "नी कुड़िये! यह क्याँ। इतनी गर्मी मे इतनी मोटीपैड वाली ब्रा पहनी फिरती हैं? पागल हौ गयीँ, हैं?"
कमल- "औऱ कोईआदत नहि पहनने कि मां। बाकियों मे लटकते रहते हें। ज़्यादातर यही पहनती हूं, याँ घऱ पऱ नार्मल बिना ब्रा केँ रहती हूं, घऱ पर्र कोई होता तोँ हैं नहि वैसे भि। "
मां- "हम्म। औऱ यहा अपनी मम्मी सें लज्जा आती होगी, हैं न्?"
कमल- "नहि, पहलेलगी थि उतारने, फिन रहने दि। " उन्होंने पीछे सें अपनी कमीज़ मे हाथ डाला औऱ ब्रा कि हुकखोल कर कमीज़ केँ गले सें ब्रा बाहर् निकाल कर सोफ़े पर्र रख दि। "आआह्ह्ह। अबचैन मिला माँ! सच्ची, ब्रापहन करऐसे लगता हैं जैसे बाँधकर रखा हौ। "
माँ- "तौ औऱ क्याँ! मे तोँ ख़ुदकम हि पहनती हूं। घऱ सें कहीं बाहर् जानां हौ, फिन हि पहनती हूं। "
दोनों बातें करती रहीं। ऐसे हि दोपहर हौ गयीँ,। दोनों मम्मी-बेटी नीचे फ़र्श पऱ लंबीलेट गयीं। बढ़िया स्टाईल लगि हुई थि औऱ नीचे ठंडक भि थि।
दोनों मां-बेटी ज़फ़ी डालकर लंबीलेट गयीं।
माँ- "कमल, बच्चे कां क्याँ हुआ? बताया कुछ डॉक्टर नें?"
कमल थोड़ी परेशान होती हुईँ, "हाँ बताया थां मां। क्याँ बताऊँ अब तुम्हें."
मां- "बता, क्याँ कहता हैं डॉक्टर? कोई प्रॉब्लम हैं जमाई मे?"
कमल- "नहि नहि माँ, इनमें प्रॉब्लम नहि हैं। मेरे मे कमी हैं। मेरे अंदर बच्चा नहि बनरहा। "
माँ- "क्यूं पुत्त? क्याँ प्रॉब्लम हैं? पूछा थां डॉक्टर कों?"
कमल- "पूछा थां। वोँ कहती हैं वक्त लगेगा, पऱ पता नहि कितना। 4-5 साल भि लग सकते हें। "
माँ- "अच्छा, चलकोई नहि पुत्त, हौसला रख। भरोसा रखरब पऱ, सभीठीक हौ जाएगा। " हौसला देती हुईँ बोलीं।
कमल- "भरोसा औऱ हौसला हि हैं अब तोँ मां। पर्र मेरी सासू माँ अब बच्चा-बच्चा कहनेलगी हैं। उन्हें बता दियायह प्रॉब्लम, पता नहि क्याँ रिएक्टकरेंगे। "
मां- "हरपाल (जमाई) क्याँ कहता हैं? उसेपता हैं तेरी प्रॉब्लम केँ बारे मे?"
कमल-"हाँ, उन्हें पता हैं साराकुछ। वोँ तोँ बहोत अच्छे हें, कुछ नहि बोलते। कहते हें कोईबात नहि, जब होगातब सही। पऱ मैंने उनसे एक् बातकही थि, अब आप् पऱ हैं साराकुछ मां। "
माँ- "मुझ पर्र क्याँ हैं?" थोड़ी सवालिया आँखों सें देखती हुइ।
कमल- "मैंने इन्हें कहा थां दूसरा विवाह करवालो। उससे बच्चा लें कर तलाक़ दे देना। "
मां- "तुँ पागल हौ गई, हैं? यह कैसी सलाह देती हैं तूँ उसे?"
कमल- "तौ औऱ क्याँ कहूँ! 'कॉन्ट्रैक्ट मैरिज होँ जाती हें बहोत पैसों केँ लिए। "
माँ- "क्याँ गारंटी हैं, वोँ धोखा नहि देगी?अगर कोई चालू निकली, केसकर देगीबाद मे। फिन क्याँ करेगी तुँ?"
कमल- "इन्होंने भि यहीकहा थां मुझे। यह बाहर् किसी औऱ सें करवाने कों मानते नहि। "
मां- "हाँ! औऱ ठीक हि कहते हें वोँ। कल कों कोई औऱ सियापा खड़ा होँ जाए, फिन देखते रहियो मुँह फाड़ केँ। "
कमल-कुछ देरचुप रहकर, "एक् बात औऱ कही थि। "
माँ- "औऱ क्याँ? कौन सि उल्टी सलाहदे दि थि?"
कमल- "मैंने कहा थां फिनअगर अपनी हरलीन सें लेँ लें
एक्." इतनाकह करचुप कर गयीँ,।
माँ- "तेरा दिमाग़ ठीक हैं कमल? क्याँ बोलरही हैं? पता हैं तुझेही कुछ?"
कमल- "औऱ क्याँ बोलूँ?" थोडा गुस्से मे, "मर जाऊँ मे अगर मेरा नहि होता बच्चा."
दोनों मां-बेटी उठकरबैठ गयीं।
माँ- "कमलदेख। थोडा सब्रकर, शांत होँ जाकमल। पर्र पुत्त, तुँ यह भि तोँ सोच। हरलीन केसेदे देगी? उसकी तौ विवाह भि नहि हुई अभि। "
कमल- थोडा अपने आप् कों संभालती हुइ, "सभीदेख लूँगी मे। मुझे भरोसा नहि औऱ किसी स्त्री पऱ बाहर्, औऱ न् हि हरपाल कों। हरलीन तोँ मेरी अपनीसगी बेहन हैं। उसका बच्चा तोँ मे पाल भि लूँगी, पऱ किसी औऱ कां नहि पाला जाएगा। "
मां- "पर्र कमल पुत्त। मुझेकुछ समझ नहि आँ रहा। "
bhay,, maa k sath joo padosi chachi kaa ldka chudayi kia he uskah maa k sath keyse suru hua agar apne kahani mai bataya he too plz batana konsa part mai he,, muze hindi pardna nahee ata bro plz batana aap
Ek Chaat k Niche (Family Saga) – New Episode
ज़रा सि अपनी हिम्मत जुटाकर, कमल नें कहा, "बस, ज़रा अपने आप् कों संभालिए। मे सभीदेख लूँगी। मुझे किसी बाहर् वाली स्त्री पऱ बिलकुल भरोसा नहि हैं, नं हि हरपाल कों हैं। हरलीन मेरी अपनीसगी बेहन हैं। उसका बच्चा तोँ मे पाल भि लूँगी, पर्र किसी औऱ कां मुझसे पाला नहि जाएगा। "
"पर्र कमल, बेटी। मुझेकुछ समझ नहि आँ रहा, " मम्मी नें अपनी असमर्थता जताई।
"समझना क्याँ हैं इसमें? बस हरलीन कों मनाना पड़ेगा। "
"हाँ, औऱ हरलीन तेरे एक् बोल पर्र मान जाएगी, जैसे?"
"मुश्किल हैं, पऱ मुझेपता हैं वो मान जाएगी, क्योंकि वो प्रेम हि इतना करती हैं मेरे सें। बस आप् 'हाँ'कर दो, माँ। "
"मे क्याँ कहूँअब तुझेही? तूनेमन बना हि लिया हैं तौ। एक् लड़की केँ लिए दूसरी लड़की कि ज़िंदगी ख़राब करदु, औऱ क्याँ?"
"कुछ नहि होता, "कमल नें झट सें मां कों गलेलगा लिया,
"बसमुझ पर्र भरोसा रखो। हरलीन मेरी भि बेहन लगती हैं। ऐसे हि थोड़ी उसकी ज़िंदगी ख़राब कर दूँगी मे भि!"
"बस, अबकुछ प्लान सोचना पड़ेगा कि बच्चा केसे औऱ कहां करना हैं। "
"पहले अपनी बेहन कों मना लेँ! यूँ हि आगे कि मत सोचेजा। "
इसीतरह बातों-बातों मे टाइमबीत गय़ा, औऱ थोड़ी देरबाद हरलीन घऱ आँ गई। वो फ़्रेश होने केँ लिए अपने कमरे मे चली गई। क़रीब एक् घंटेबाद हम् दोनों भइया आँ गए। मां औऱ बड़ी बेहन(कमल) बरामदे मे चारपाई पर्र बैठे थें। हम् भि पास पड़ी कुर्सियों पर्र बैठगए।
कमल दिदी नें छेड़ते हुएकहा, "आँ गए कॉलेज सें? पढ़ते भि होँ, याँ बस लडकिया ताडणे जाते होँ कॉलेज मे?"
युवराज हँसते हुए बोला, "बड़ी जल्दरूप बदल लिया दिदी! आँ गए अपने असली ब्याह सें पहले वालेरूप मे!"
औऱ मैंने जल्दी जोड़ा, "सचकहा! मां कां सूट पहनकर फिन सें रौब डालना शुरुआत कर दिया हैं, पहले कि तरह!"
पास बैठी माँ भि हँस पड़ीं।
कमल नें नखरे सें कहा, "औऱ नहि तौ क्याँ! कहना औऱ रौब डालना तुम् दोनों पर्र हि तोँ हैं। इतने टाइमबाद मौका मिला हैं!"
सभीदेर तक बैठे बातें करतेरहे।
कमल दिदी बिस्तर पर्र बैठीथीं, औऱ उनकेभरे हुए मम्मे कुर्ते मे सें साफ़झलक रहे थें। उनकी चुनरी एक् कंधे सें फिसलकर उनकी जाँघों पर्र गिर चुकी थि, औऱ छाती कि गहरी लकीर एकदमसाफ दिखाई देरही थि। जिस ढीलेपन सें कुर्ता उनकेबदन पर्र टिका थां, उससे साफ़ ज़ाहिर थां कि दिदी नें अंदरकोई ब्रा नहि पहनी थि। उस रसीले कपड़े मे उनके मम्मे बेझिझक आज़ाद लगरहे थें।
इतने मे, हरलीन दिदी अंदर सें द्वार (दरवाज़ा) खोलकर बाहर् आईं, "आँ गए तुम् सभी?गरम चाय पीओगे? बनाऊँ?"
मैंने कहा, "बना लो दिदी। " बाक़ी सबने भि हाँकर दि। दिदी दरवाज़े सें हि मुड़ीं औऱ अंदर किचन मे चलीगईं।
युवराज बोला, "मे कपड़े बदलकर आता हूं, " औऱ अंदरचला गय़ा। मे भि उसकेसंग हि चला गय़ा।
हम् दोनों नें कपड़े बदले, औऱ युवराज नीचेचला गय़ा। मे सीढ़ियाँ उतररहा थां। युवराज मेरे आगे-आगे द्वार (दरवाज़ा) खोलकर बाहर् माँ औऱ बड़ी दिदी केँ पास जाकरबैठ गय़ा। मे रुका औऱ किचन कि तरफ़बढ गय़ा। हरलीन दिदी शेल्फ़ केँ पास खड़ीगरम चायबना रहीथीं। उन्होंने लोअर औऱ कुर्ता पहनाहुआ थां औऱ संग मे दुपट्टा लियाहुआ थां।
मे धीरे-धीरे सें गय़ा औऱ पीछे सें उन्हें गलेलगा लिया। औऱ कान केँ पास मैंने फुसफुसाया, "बन गई गरमचाय दिदी?"
"अरे, क्याँ कररहा हैं दिलराज! तूने तोँ डरा हि दिया थां। मुझेलगा पता नहि कौन आँ गय़ा। "
"औऱ किस कि हिम्मत पड़ेगी तुम्हें ऐसेगले लगाने कि?" दिदी कि रसीले, भरी हुई गांड मेरी उठती हुई चीज़ सें छूरही थि, औऱ मेरा लन्ड उसी लम्हा खडा होनेलगा।
"क्याँ कररहा हैं दिलराज! कंट्रोल कर!चल, अब गिलास मे गरमचाय डालकर ट्रेउठा, " दिदी नें हल्के सें झिड़कते हुएकहा।
मे भि पीछेहट गय़ा। दिदी कि नज़र मेरे पजामे पऱ पड़ी, जिसमें एक् टेंटबना हुआ थां।
"अरे, यह क्याँ कररखा हैं दिलराज! अपने नीचे तोँ देख, ऐसे हि बाहर् जाएगा क्याँ?"
मेरी हालत तोँ मुझे हि पता थि। मैंने फुसफुसाकर कहा, "क्याँ करूँ? आपकोइस तरह देखकर मेराहाल यही होता हैं। "
"ठीककर इसे, औऱ बाहर् आँ जा, " कहकर वो गरमचाय लेकर बाहर् चलीगईं।
मैंने भि दो मिनट तक लन्ड कों शांत किया औऱ बाहर् चला गय़ा। सबने बातें करतेहुए गरमचाय पी। फिन आधा घंटा बैठकर मे औऱ युवराज मोटर कि तरफ़ घूमने निकलगए।
हमारी मोटर केँ संग हि गाँव केँ सरपंच कि मोटर थि। मोटर केँ बाहर् सरपंच कि बाईक खड़ी थि।
मैंने युवराज सें कहा, "मोटर कि लाइट कां अंदाज़ा लें लेते हें कि कब आएगी, चल लगता हैं सरपंच मोटर पर्र आयाहुआ हैं। "
"हाँ, बाइक खड़ी हैं, पूछ लेते हें। चल। "
"अगर आजआनी हुइ, तोँ धान कों पानीलग जाएगा। "
हम् दोनों सरपंच कि मोटर कि तरफ़चल पड़े। आस-पास खेतों मे देखा, सरपंच कहीं दिखा नहि। थोड़ी देरबाद मोटर केँ कमरे सें कुछ आवाज़ें आईं। औऱ हमें समझने मे देर न् लगी कि अंदर क्याँ हौ रहा हैं।
मैंने युवराज कों मुँह पर्र उंगली रखकरचुप रहने कों कहा, औऱ हम् धीरे-धीरे धीरे-धीरे मोटर केँ पीछेचले गए। वहा एक् जाली वाली खिड़की थि जोँ खुली हुई थि। जब मैंने औऱ युवराज नें अंदर देखा, तौ कमरे केँ अंदर एक् व्यक्ति पूरीतरह नंगा एक् महिला केँ ऊपर झुकेहुए, तेज़ी सें धक्के माररहा थां। हमें दोनों कि उलझी हुईँ नंगी टाँगें हि दिखाई देरही थीं।
युवराज नें मेरी तरफ़ देखकर इशारा किया, "कौन हैं?"
मैंने भि अपने होंठ सिकोड़कर 'पता नहि' कां इशारा किया औऱ उसे अंदर देखने कों कहा।
व्यक्ति धक्के मारने सें रुका। नीचे पड़ी महिला कुछबोल रही थि। व्यक्ति रुका, थोडा पीछेहटा औऱ फिन महिला कि दोनों जाँघें उठाकर अपने मज़बूत कंधों पऱ रखलीं। स्त्री कां मुँह अभि भि नहि दिखरहा थां, पर्र व्यक्ति कि नंगीपीठ दिखाई देरही थि। संग मे दब्बों वाला तहमद औऱ व्यक्ति कि गांड भि दिखरही थि, जिसे देखकर कुछ अधिक अच्छा नहि लगरहा थां।
व्यक्ति नें धक्के तेज़-तेज़ मारने शुरुआत करदिए। उसी लम्हा, नीचे पड़ी महिला दर्द औऱ मजा केँ मिश्रित भाव मे ऊँची सिसकियाँ लेनेलगी, "आहह-आहह। ऊँहह.मार डालारे सरपंचा! क्या बात है, आहह-आहह."
हम् दोनों भइया एक्-दूसरे कों देखने लगे कि ये तोँ साला सरपंच हैं। पऱ पैरों तले सें ज़मीन तोँ तब निकली, जब नीचे सें उठती स्त्री नें बाँहें सरपंच केँ गले मे डालीं औऱ गले लगाया।
औऱ जब मेरी नज़र स्त्री पऱ पड़ी, तोँ वो मजा लेती स्त्री कोई औऱ नहि, हमारी ताई थि!
हम् दोनों एक्-दूसरे कां मुँहदेख रहे थें, औऱ अंदर सें आँ रही आवाज़ें सुनरहे थें। "आहह-आहह। अरेरे सरपंचा! ठोंक लिया! आहह-आहह। औऱ ज़ोर सें! आहह-आहह!"
सरपंच बोला, "क्याँ हौ गय़ा तेरी, सालि पागल हौ गई हैं? मोटर पऱ कोईसुन लेगा तोँ पंगा होँ जायेगा। थोडा कंट्रोल कर!"
"आहह-आहह। कंट्रोल नहि होँ रहा! कितने टाइमबाद तेरा अंदर गय़ा हैं। मज़ा आँ गय़ा! हायराम! आहह-आहह! जब तेरा जाता हैं, सच मे आनंद आँ जाता हैं!"
सरपंच नें कहा, "तेरीयही बातें हि तौ मुझेमजे देती हें। इतनामजा तोँ मेरी अपनी महिला भि नहि देती, जितना तूँ देती हैं। "
थोड़े टाइमबाद दोनों कां काम हौ गय़ा औऱ वोँ कपड़े पहनने लगे। मैंने इशारे सें युवराज कों चलने केँ लिएकहा, औऱ हम् दोनों जल्द सें अपनी मोटर पर्र पहुँच गए।
अँधेरा हौ गय़ा थां। ताई मोटर सें बाहर् आई औऱ चुपचाप घऱ कि ओर निकल गई। थोड़ी देरबाद सरपंच बाहर् निकला औऱ बाइक पऱ बैठकर किक मारने हि वाला थां।
तभी मे तेज़ी सें सरपंच कि तरफ़ जातेहुए बोला, "सरपंच साब, सत श्री अकाल!"
सरपंच नें आगे सें 'सत श्री अकाल' कां जवाब दिया, "हाँ, भइया जवानों! क्याँ किएजा रहे होँ इतने अँधेरे तक खेतों मे?"
मैंने भि थोड़ी चालाकी सें कहा, "बस कुछ नहि। खेतआए थें, एक् चक्कर लगाने। सुना हैं, मोटर वालेरूम मे कांड बड़े होते हें। " मैंने थोडा हँस दिया।
सरपंच, बात सें अनजान बनतेहुए, पूछने लगा, "कौन सें कांड होते हें? मुझे भि बता ज़रा!"
"औऱ नहि तौ क्याँ सरपंच साब! गाँव केँ मोहतबर बंदे एक्-दूसरे कां ख़्याल बड़ा रखते हें! लोग उन्हें कांडकह देते हें। जैसे आप् ध्यान रखते हें हमारी ताई कां!"
युवराज सुनकर चुपचाप खड़ारहा, कुछ बोला नहि।
सरपंच ये सुनकर खाँसने लगा। उसे पतालग गय़ा कि हमनेउसे ताई (परमजीत कौर) केँ संगदेख लिया हैं। उसने घबराकर कहा, "क्याँ बोलेजा रहा हैं दिलराज बेटा?"
"अच्छा जी!" मे थोडा आगे बढ़कर बाइक केँ पास गय़ा। सरपंच बाइक पऱ बैठा थां। "मे क्याँ बोलूँ? अगर आप् कहें तौ दिखादूँ?" मैंने जेब सें अपनाफोन निकालते हुएकहा।
सरपंच थोडा डरकर बोला, "तूने वीडियो बनाई हैं?"
"औऱ नहि तोँ क्याँ! ऐसा मौक़ा दुबारा थोड़ी मिलना थां!" मैंने फोन वापसजेब मे रखतेहुए कहा।
"तुम्हें क्याँ चाहिए? पैसे चाहिए?" सरपंच सीधा हि बोल पड़ा।
"लो! कर दि न् वही अपनी चूतियो वालीबात! हमारे पिताजी दुसरे देश हें। साले! क्याँ तुम को हमारे पास पैसों कि कोईकमी लगती हैं सरपंच?"
सरपंच कि उम्र 45+ थि, पर्र अब वो डर गय़ा थां, औऱ मेरे कंट्रोल मे भि थां, इसलिये मैंने सीधा हि बोला, "लगती हैं कोईकमी, सरपंच? बोल?"
"फिन क्याँ चाहिए? कहो! पर्र कोई फ़ुद्दू हरकतमत करना। मेरी इज़्ज़त हैं गाँव मे!"
"हाँ, ठीक हैं। कोईबात नहि, नहि करेंगे कोई हरकत। बाक़ी, अभि तूँ ताई सें कोईबात मत करना कि हमें तुम्हारे बारे मे पताचल गय़ा हैं। आँ गई समझ, सरपंच साब?"
"हम्म, ठीक हैं। जौ चाहिए होगा, बता देना, पऱ वीडियो मत दिखाना दोस्त!" अब सरपंच मिन्नतें करनेलगा थां।
"नहि दिखाएँगे, वादा हैं! बस जोँ हमें चाहिए, वो दे देना। "
"हाँ, जौ मर्ज़ी बोल देना, मिल जाएगा। ये मेरा भि वादा हैं!"
"चलोठीक हैं, चलते हें फिन। सोचकर बताएँगे कि क्याँ चाहिए। "
"बैठजाओ बाइक पर्र, घऱ छोड़ देता हूं। "
"नहि नहि, चलो आप्! हम् तब तक पैदल हि चलते हें। "
इतना सुनकर सरपंच नें बाइक कि किक मारी औऱ निकल गय़ा।
औऱ हम् दोनों घऱ कि ओरचल पड़े।
"बड़ा कमीना हैं साले तूँ!" युवराज कि ज़ोर सें आवाज़ आई औऱ वो हँसने लगा। "वीडियो तोँ बनाई भि नहि थि औऱ यूँ हि सरपंच कि गांड फाड़ दि!"
"डराने केँ लिएकुछ तौ चाहिए थां नं! इसलिये मैंने ये हथियार इस्तेमाल किया। अब सरपंच पूरीतरह हमारे कब्ज़े मे हैं। "
"हाँ!अब तोँ साला हमारे लिएकुछ भि करेगा! पऱ ताई कां क्याँ? उसे केसे बताएँ?"
कुछ सोचते हुए मैंने पूछा, "तुम्हारी तरफ क्याँ लगता हैं, क्याँ करना चाहिए?"
"करना क्याँ चाहिए! जोँ हमने सरपंच केँ संग किया, वही अब ताई केँ संग करते हें, " युवराज बोला।
"पऱ ताई सें हम् क्याँ लेंगे? सरपंच सें तोँ फिन भि उम्मीद हैं कि साला पैसेदे देगा, पर्र ताई तौ बेचारी ग़रीब हैं, औऱ अमन कों कर्ज़ा लेकर बाहर् भेजा हैं उसने। "
"हाँ दोस्त, ये तोँ हैं, " युवराज इतना सुनकर बसयही बोला।
मैंने कहा, "हाँ, पऱ एक् कामकर सकती हैं ताई। "
युवराज नें पूछा, "वो कौन सां?"
"जोँ वो सरपंच केँ लिए करती हैं। घोडी होकर देगी क्याँ? ताई कि लेने कां मन करेगा तेरा?"
युवराज नें थोडा सोचा औऱ कहा, "मे भि सोचरहा थां। पऱ तुझेही क्याँ लगता हैं, येठीक रहेगा?"
"ठीक हि रहेगा। तुँ 'हाँ' याँ 'नाँ' कर, फिन तुम्हें एक् औऱ मज़े वालीबात बताता हूं। "
"अच्छा?" युवराज कि आवाज़ मे लालच थां। "हाँ, लेँ लेंगे। सरपंच कों भि तोँ दि हैं। हमारे काम भि आँ जाएगी। अभि बदन भि क़ायम पड़ा हैं ताई कां। साली केँ मुम्मे भि पूरे मोटे मोटे हें!"
"हाँ, शरीर तौ पूरा क़ायम हैं! चलफिन, ठोंक लेना तूँ भि ताई कों!"
"तुँ भि तौ संग हि ठोंकेगा ? हम् दोनों भइया मिलकर ठोंकेंगे!"
"हम्म, अवश्य! पऱ मैंने तोँ पहले हि ठोंकरखी हैं। "
युवराज थोडा हैरान होकर मेरी तरफ़ देखने लगा औऱ बोला, "सच, बहनचोद? फिन मेरे सें यूँ हि मजा लेने केँ लिए सुनेजा रहा थां? सीधाबोल देता!"
"मे तोँ तुम्हारी तरफदेख रहा थां कि तुँ क्याँ कहता हैं। बताना तोँ थां हि तुम को। अपने मे कौन सां कोईराज हैं!"
"हम्म। तूने केसेली ताई कि?"
"लंबी किस्सा हैं। रात कों बताता हूं कमरे मे। "
इतने मे हम् घऱ पहुँच गए। अंदर माँ औऱ दोनों बहनें बैठीथीं। कुछदेर बैठे, बातें कीं, औऱ फिन सबने खानां खाया। फिन सभी सोने केँ लिए जानेलगे। बड़ी दिदी (कमल) हरलीन सें कहनेलगी, "आज तेरेसंग सोऊँगी, तेरे कमरे मे, " औऱ दोनों चलीगईं। माँ भि अपने कमरे मे चलीगईं। हम् दोनों भि ऊपर कमरे मे चलेगए। जाकरबैड पर्र लेटगए औऱ फ़ोन चलाने लगे।
तभी युवराज बोल पड़ा, "बता दोस्त अब, केसेली तूने ताई कि?"
मुझेपता थां, बताना तोँ पड़ेगा। फिन मैंने साराकुछ युवराज कों बताया कि एक् दिन ताई अमन कों देरही थि। मे यूँ हि ऊपर सें ताई केँ घऱ गय़ा थां, तौ मैंने देख लिया। बस, फिन मे भि अंदरघुस गय़ा।
"क्याँ सच मे? अमन औऱ ताई आपस मे लगेहुए थें?"
युवराज थोडा हैरान होताहुआ बोला। "अमन कों केसेदे दि ताई नें? वो तौ उसका बेटा हैं!"
"हाँ, पूछा थां मैंने ताई सें। पर्र बात गोलमोल कर गई थि ताई। औऱ अमन भि फिन कॅनडा चला गय़ा, फिनपूछ हि नहि पाया। "
युवराज सुनकर हैरान थां। "अमन नें अपनी मां कि लेँ ली! पऱ दिल, दोस्त। साले कों लज्जा नहि आई होगी अपनी मां कि लेतेहुए?" युवराज मेरी तरफ़ देखकर बोला।
मे इसबात पर्र कुछ न् बोला। "चल छोड़अब अमन कों। अब तोँ ताई कि तुँ भि लेगा। "
ये सुनकर युवराज केँ मुँह पर्र मुस्कान आँ गई।
"हाँ दोस्त! ज़िंदगी मे दूसरी बुर पऱ चढ़ना हैं। पहली रवनीत कि भाभी कि औऱ अब ताई कि!"
युवराज भाभी कि बुर पहले होटल मे लेँ आया थां।
"कोई नाँ। अब चुते हि चुते मिलेंगी। टेंशन न् लें। अभि सरपंच कि तरफ़ सें भि हिसाब करना हैं। "
युवराज नें पूछा, "सरपंच कां केसे करना हैं हिसाब?"
"कोई नाँ, देखते हें। मेरा सालादिल उसकी पत्नि कि लेने कों कररहा हैं। साले कि महिला माल हैं पूरी! साली कां बदन पूरा सेक्सी हैं!"
"हाँहाँ! वो तौ सालीमाल हैं, पऱ सरपंच मान जाएगा दिलाने कों? क्याँ लगता हैं?"
"मान जाएगा। साला उसका बाप भि मान जाएगा! पर्र प्लान बनाना पड़ेगा कि केसेली जाए। छोड़उसे अभि। "
"तुँ बता। तूँ कब लेगा ताई कि?"
"मेरा तोँ मन हैं कि अभि चला जाऊँऊपर सें। मेरा तोँ फुलमूड हैं अभि!"
"आज तौ कुलजीत आँ गई होगी, अमन कि मौसी कि लड़की। अब तोँ घऱ मे मुश्किल हैं। ऐसा करते हें, कलसाम कों अपनी मोटर पऱ बुला लेते हें। तेरा सरप्राइज़ मोटर पऱ हि मिलेगा ताई कों। "
"हाँ, ये भि ठीक रहेगा!"
बस, यूँ हि फिन वो भाभी केँ बारे मे पूछने लगा औऱ हम् औऱ बातें करतेरहे।
दूसरी तरफ़, कमल हरलीन केँ संगखाट पर्र लेटीसोच रही थि, 'हरलीन सें बात केसे करूँ?समझ नहि आँ रही। '
इसी तरह सोचते सोचते कमल कों नींद आँ गई औऱ आँख सुभह खुली। हरलीन अभि सोई हुईँ थि। कमलउठी, फ़्रेश हुईँ औऱ बाहर् किचन मे जाकर माँ कों देखकर बोलि, "गुड मॉर्निंग, माँ!"
"गुड मॉर्निंग कमल बेटी! उठ गई? गरमचाय देती हूं। बैठजा!"
"हाँजी, देदो माँ!"
मनजीत गरमचाय लेकरआई, कमल केँ पास बैठी औऱ उसेगरम चाय पकड़ा दि। "हरलीन नहि उठी अभि?"
"नहि, अभि सोई थि। मैंने उठाया नहि। अभि वक्त हैं कॉलेज कों, अपने आप् उठ जाएगी जब जानां होगा। "
मनजीत नें कहा, "हम्म, ठीक हैं। फिन कि बातरात कों हरलीन सें?"
कमल नें जवाब दिया, "नहि। समझ नहि आया कि केसे शुरुआत करूँ। आज कोशिश करूँगी फिन। "
दोनों चुप बैठी रहीं। हरलीन अपने कमरे मे उठी, फ़्रेश हुइ औऱ सजधजकर होकर बाहर् आँ गई।
हम् दोनों भइया वक्त सें रेडी होँ गए। मैंने रेडी होकर ताई कों फ़ोन किया औऱ मिलने केँ लिए पूछा। ताई नें कुलजीत केँ आने कि वजह सें घऱ मे मिलने केँ लिएमना कर दिया, पऱ मोटर पर्र आने कों मान गई।
फिन फ़ोन काटकर नीचे आँ गए। युवराज पूरा ख़ुश थां। आजउसे ताई कि बुर मिलनी थि!
फिनवही रूटीन। हम् कॉलेज निकलगए। पूरादिन निकल गय़ा। कॉलेज सें घऱ आँ गए। युवराज ताई सें मिलने केँ लिए पूरा गर्महुआ पड़ा थां। साम कां वक़्त होँ गय़ा। युवराज कों मोटर पऱ जाने कि जल्द थि। फिन हम् दोनों मोटर कि तरफ़चल पड़े।
अँधेरा होँ गय़ा थां, जब हम् मोटर केँ पास पहुँचे। कमरे केँ अंदर सें कुछ खड़खड़ाने कि आवाज़ आई। मे औऱ युवराज समझगए कि ताई अंदर हि हैं। मैंने अभि युवराज कों ताई केँ बारे मे बताया नहि थां। युवराज कों समझा दिया थां कि तुँ हि अपने कंट्रोल मे करना हैं। कह देना कि सरपंच औऱ मेरे बारे मे पता हैं तुम्हें।
मैंने युवराज कों इशारा किया कि तूँ जा अंदर, मे बाहर् नजर रखता हूं।
युवराज नें गेट खोला। अंदर क़दम रखते हि, एक् तेज़हाथ नें उसे बाँह सें पकड़ा औऱ अँधेरे मे हि उसे घसीटकर उसके होंठ चूसने लगी। युवराज कों एक् गरम, नग्न शरीर महसूस हुआ। होंठ चूसते हुए उसनेउस नंगीपीठ पऱ हाथ फेरा।
'ताई साली पहले सें हि नंगी हैं, कितनी गर्म हैं!' युवराज मन मे सोचने लगा। दोनो एक्-दसरे केँ होंठों कां गहरा स्वाद लें रहे थें।
अँधेरे कमरे मे एक् ज़बरदस्त माहौल बन चुका थां। महिला नें किस केँ बीच हि युवराज कि टी-शर्ट औऱ पजामा उतार फेंका, औऱ उसके नंगे शरीर कों हर तरफ़ चूमने लगी।
बाहर् खड़े दिलराज केँ फ़ोन पऱ घंटीबजी। बिना देखे फ़ोन उठाया, औऱ आगे सें आवाज़ आई, "सॉरी दिलराज बेटे। मुझसे आज नहि होँ पाएगा। घऱ पऱ कुलजीत बीमार हौ गई हैं। उसे डॉक्टर केँ पास लेकर जानां पड़ेगा। "
मेरे फ़ोन पऱ बात करते करते सरपंच मेरे सामने सें बाइक मोड़कर वापसचला गय़ा।
मैंने फ़ोन काटा, जेब मे रखा औऱ मोटर केँ कमरे कि तरफ़चल पड़ा, औऱ सोचने लगा, 'ताई तोँ आई नहि, फिन अंदरकौन हैं?'
अंदर माहौल गर्मबन गय़ा थां।
"आहह-आहह.म। आज तौ तूनेबाल कटवालिए हें सारे दाढ़ी केँ औऱ बदन केँ, " युवराज केँ पेट पऱ चूमते हुए वो महिला नीचे बैठती हुईँ बोलि।
युवराज कुछ नहि बोला। उसने आवाज़ पऱ भि ग़ौर नहि किया। युवराज नें अपने उत्तेजित लन्ड पर्र मुँह महसूस किया। उस महिला नें लन्ड कों अपने मुँह मे लेकर तेज़ी सें चूसना शुरुआत कर दिया।
इतने मे द्वार (दरवाज़ा) खुला। दिलराज अंदरआया। अंदरघुप अँधेरा थां। दिलराज नें लाइटऑन कि।
युवराज नंगा खड़ा थां, उसकीपीठ मेरी तरफ़ थि। युवराज केँ पैरों मे एक् महिला बैठी थि।
युवराज कि नज़र नीचे गई, औऱ उसकी आँखें फटीरह गईं।
औऱ नीचे बैठी स्त्री कि आवाज़ आई: "युवराज?"
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