Ek Chaat k Niche (Family Saga) – New Episode
अबआते हें असलीकथा पऱ, वो कथा जोँ इसघऱ कि दीवारों केँ पीछे साँस लेँ रही थि।
बड़ी बेहन (कमलप्रीत) कि विवाह होँ जाने केँ बादडैड विदेश चलेगए औऱ घऱ पऱ ज़िंदगी ऊपर-ऊपर सें एकदम सामान्य तरीके सें चलनेलगी। घऱ मे अबबस मां (मनजीत कौर), हमारी बेहन (हरलीन, जोँ हम् दोनों भाइयों सें एक् साल बड़ी थि), औऱ हम् दोनों भइया (मे, दिलराज औऱ युवराज) हि रहते थें।
कॉलेज मे हमारे दिनआम तौर पर्र गुज़र रहे थें। हरलीन भि हमारे हि कॉलेज मे थि। हम् सबका एक् नॉर्मल सां फ्रेंड ग्रुप थां, हम् सभी मिलकर पुरेमजे करते थें, औऱ साम होते हि अपने-अपने घऱ वापसलौट आते थें। हम् दोनों भइया एक् हि मोटर-साईकिल पर्र कॉलेज जाते थें, औऱ हरलीन अपनी स्कूटी पर्र आती-जाती थि।
कॉलेज सें निकाल कर, घऱ कि तरफ़ जाने सें पहले, हम् दोनों भइया बाज़ार मे एक्-दो चक्कर लगा लेते थें। हमारा शौक़ थां वहा थोड़ी लड़कियों कों निहारते, कुछ छेड़खानी करते, औऱ फिनघऱ कां रुख़ करते। रोज़ कां यही गर्मी भरा रूटीन चलतारहा।
एक् दिन बाज़ार मे ऐसे हि चक्कर लगाते हुए हमारी नज़र एक् ग़ज़ब कि चीज़ पर्र पड़ी। वो हमारी बाइक केँ आगे-आगे पैदलचली जारही थि। पीछे सें देखने पर्र वो पूरीटॉप क्लास रसीली स्त्री लगरही थि। उसकी गांड पूरी लचकती हुईँ थि, कसरत सें उभरी हुईँ, बाहर् कों निकली हुइ। हाथ मे उसकी खनकती चूड़ियाँ थीं। साफ़ ज़ाहिर थां कि कोई नई-नवेली, सेक्सी शादीशुदा भाभी हैं।
हमने उसके पीछे अपनी बाइक केँ एक्-दो चक्कर औऱ काटे, नज़दीक सें उसे घूरते रहे। वो भि पलटकर हमें हल्का-फुल्का रिस्पॉन्स देनेलगी। हम् दोनों भइयाये देखकर ख़ुशी सें पागल हौ गए l
फिन हमनेतय किया कि आख़िर पहलकौन करेगा। बात तौ दोनों करना चाहते थें, पर्र पर्ची निकालने पऱ मौक़ा युवराज केँ हिस्से आया। युवराज नें हि अपना फ़ोन नंबर एक् काग़ज़ पऱ लिखकर, थोडा शारीरिक इशारा मारकर, तेज़ी सें उसकी तरफ़ उछाला। आगे सें उस भाभी नें भि बिना किसी लज्जा केँ वो पर्ची झट सें उठाली।
हम् उसे देखते-देखते घऱ कि तरफ़चल पड़े। रास्ते भर हम् आपस मे उसी कि बातें करतेरहे कि दोस्त, क्याँ ग़ज़ब कि सेक्सी भाभी थि!
युवराज: "हाँ दोस्त, बहोत सेक्सी थि। बसअब उसका फ़ोन याँ मैसेज आँ जाए, फिन देख्ना, साला कितना रस टपकाती हैं!"
ऐसी हि मसालेदार बातें करते-करते हम् घऱ पहुँच गए।
हरलीन भि कॉलेज सें आँ गई थि। रात कां खानां खाकर हम् सभी अपने-अपने रूम मे चलेगए। हम् दोनों भइया एक् हि कमरे मे सोते थें, जबकि माँ औऱ हरलीन केँ कमरे अलग-अलग थें। हम् दोनों कां रूमऊपर (पहली मंज़िल) पर्र थां।
ऊपर जाकर हम् दोनों भइया अपने-अपने पलंग पर्र लेटगए औऱ फ़ोन चलाने लगे। इतने मे युवराज केँ फ़ोन पर्र एक् अनजान नंबर सें मैसेज आया। युवराज केँ चेहरे कि रौनक देखने लायक थि।
हमें समझते देर नहि लगी कि मैसेज उसी भाभी कां आया हैं, जिसेआज हम् नंबर देकरआए थें। युवराज उससे नॉर्मल बातें करतारहा जैसे हाल-चाल, परिचय, वग़ैरह-वग़ैरह।
युवराज फ़ोन पर्र बातचीत औऱ चैट मे व्यस्त होँ गय़ा, औऱ मे भि साइड मे होकर अपना फ़ोन चलाने लगा। ऐसे हि तीन-चार दिन निकलगए। युवराज रोज़उस भाभी सें घंटों गपशप मारता रहता। जब मैंने उससे ज़ोर देकर पूछा, तोँ युवराज नें बड़े गर्व सें बताया कि उसने भाभी सें बातों-बातों मे सभीकुछ खुलवा दिया हैं। यहा तक कि चैट पऱ हि उसे नंगा भि कर लिया थां।
औऱ जब उसने मुझे भाभी कि नंगी तस्वीर दिखाई, तौ उसे देखकर मेरा भि दिमाग़ हिल गय़ा। क्याँ सेक्सी, कसाहुआ बदन थां भाभी कां! औऱ उसकी बुर पर्र एक् भि बाल नहि थां, एकदम चिकनी औऱ साफ़-सुथरी, गुलाबी।
युवराज एक् तरफ़ होकर उससे दोबारा चैट करनेलग गय़ा। दस मिनटचैट करने केँ बाद युवराज अचानक उठकर बाथरूम मे चला गय़ा। मुझे जल्दी पतालग गय़ा कि वो मुठ मारने गय़ा हैं। भाभी कि वो तस्वीर देखकर मेरा भि मन बेकाबू होनेलगा थां, पर्र मैंने किसीतरह स्वयं कों कंट्रोल किया।
मुझे प्यास लगी, तौ मे उठकर पानी पीने केँ लिए नीचे रसोई मे चला गय़ा। ऊपर जाने कि सीढ़ियाँ घऱ केँ अंदर सें हि थीं।
पानी पीकर मे रसोई सें निकला, तौ देखा कि माँ केँ कमरे कि लाइटजल रही थि। मे देखने केँ लिएउस तरफ़ बढ़ा। द्वार (दरवाज़ा) तौ अंदर सें बंद थां, पर्र साइड मे लगी एक् खिड़की थोड़ी-सि खुली थि। औऱ उस खिड़की सें अंदर जौ नज़ारा मैंने देखा, उसे देखकर मे हक्का-बक्का रह गय़ा।
अंदर मां पलंग पर्र सोई हुइ थीं। उन्होंने सिर्फ़ ऊपर एक् ढीला सां कुर्ता पहनाहुआ थां। मगर नीचे सें वो बिल्कुल नंगी पड़ीथीं। वो गहरी नींद मे सोई हुई थीं। पीछे कि तरफ़ उनकी गोरी, नंगी गांड मुझे खिड़की केँ फ़्रेम सें बिल्कुल साफ़दिख रही थि—दूधिया सफ़ेद औऱ भरी हुइ।
उन्हें इस हालत मे देखकर पहले तोँ मुझे एक् अजीब लज्जा महसूस हुईँ, पर्र जब मेरी नज़र अपने पजामे पर्र पड़ी। मेरा लन्ड बेकाबू होकर फटने कों हौ रहा थां। मेरामूड पहले हि भाभी कि तस्वीर देखकर बनाहुआ थां, अब मां कि गोरी, नंगी गांड देखकर मेरा काम-भाव औऱ अधिकबढ़ गय़ा।
मैंने जैसे-तैसे स्वयं कों शांत किया औऱ चुपचाप ऊपर अपने कमरे कि तरफ़चल दिया।
युवराज भि तब तक मुठ मारकर बाथरूम सें आँ गय़ा थां औऱ आकरलेट गय़ा थां। मे भि अपनेबैड पर्र आकरलेट गय़ा। उसरात मुझे बड़ी मुश्किल सें नींदआई.
अगलादिन भि ऐसे हि गुज़र गय़ा।
रात कों युवराज फिन सें अपनीउस भाभी केँ संगचैट पऱ लगाहुआ थां। मुझेपता नहि क्याँ सूझा, मे एक् अज्ञात आकर्षण केँ वशीभूत होकरफिन सें उठकर नीचेचला गय़ा।
माँ केँ कमरे कि लाइटआज भि जलरही थि। द्वार (दरवाज़ा) बंद थां। मैंने साइड वाली खिड़की केँ पास जाकर अंदर झाँका.
माँ आज भि करीबकल वाली स्थिति मे हि लेटीथीं, पर्र आज वोँ जागरही थीं। वो फ़ोन पर्र किसी सें बातकर रहीथीं।
माँ: "पता नहि तुम् कब आओगे। मेरा तोँ यहा बुराहाल हुआ पड़ा हैं। बुर मे आगलगी पड़ी हैं। रात कों तौ सलवार पहनने कां भि दिल नहि करता। "
मुझे सिर्फ़ माँ कि धीमी, दबी हुई आवाज़ हि सुनरही थि।
माँ: "हाँहाँ, सभीसो गए हें। लड़के भि सोगए हें औऱ लड़की भि। पऱ उनकी मां कों सुकून नहि मिलरहा। औऱ एक् तुम् हौ, जोँ इतनीदूर बैठे हौ! अपनी पत्नि कां कोई ख़्याल नहि हैं तुम्हें!"
फिन माँ दो मिनट केँ लिएचुप हौ गईं, औऱ फिन सीधी लेटकर, शायद अपनी बुर मे उँगली सहलाने लगीं.
"आआहहम्म्म। आआह्ह." उनकी आवाज़ मे अब एक् काम-जनित कराह थि। 
माँ: "तुम्हारा तोँ वहासभी चल हि जाता होगा। वहा रोज़ नई-नई गोरी कों घोड़ी बनाते होगे तुम्। औऱ यहा तुम्हारी पत्नि प्यासी बैठी उँगलियों सें कामचला रही हैं!"
ये तोँ अब पक्का हौ गय़ा थां कि माँ पापा सें हि फ़ोन पऱ लगी हुई हें। पऱ इतनी खुलकर, ऐसी गंदी, रसीली बातें करतेहुए मैंने मां कों पहलीबार सुना थां।
मेरे पजामे मे फिन सें तम्बू तन गय़ा थां। मैंने झट सें एक् हाथ पजामे मे डालकर अपना लन्ड ज़ोर सें हिलाना शुरुआत कर दिया औऱ मां कि बातें सुनने लगा।
माँ: "सच कहूँ, अब तोँ दिल करता हैं किसी केँ आगे घोड़ी हौ जाऊँ। इंडिया मे भि अपना ख़ाता खोललूँ." (वो थोडा हँसकर बोलीं, आवाज़ मे अजीब सि ख़ुमारी थि)। "लो औऱ सुनो!वहा तोँ तुमने ख़ुद मुझे एक् गोरे केँ आगे घोड़ी करवा दिया थां, अब क्यूं मनाकर रहे होँ?"
वो एक् मिनट केँ लिएचुप होँ गईं.
मां: "हाँजी, वोँ तोँ हैं, यहा ख़तरा तौ हैं। किसी केँ मन कां पता नहि होता न् कि कौन कैसा हैं। "
फिन उन्होंने शायद अपनी बुर मे दो उँगलियाँ औऱ गहराई तक डाललीं.
मां: "आआह्ह्ह। तुम् कबआकर डालोगे मेरी बुर मे। आआह्ह्ह। अरे। तुम्हारी मनजीत बहोत प्यासी हैं, सरदारा। आआह्ह्ह। ओह। निकल गय़ा मेरा पानी."
इधर माँ कि कामुक आवाज़ें सुनकर, मेरी फुर्र फुर्र करती हथेली केँ नीचे मेरा भि पजामा पूरीतरह गीला हौ चुका थां। उनकी बुर तोँ मुझेठीक सें दिखी नहि। वो सीधी लेटीथीं, इसलिये वो उनकीभरी हुई जाँघों केँ बीच छुपी हुई थि।
मां: "चलो अच्छा, अबसो जाती हूं, सुभह उठना भि हैं।। गुड नाईट मेरे सरदारा, औऱ उस गोरी कि तसल्ली करवा देना जिसे घोड़ी कियाहुआ हैं." (उन्होंने फिन शरारती ढंग सें हँसकर कहा)। "म्म्म्मुआआहह। बाय मेरीजान। "
औऱ माँ नें फ़ोनकाट दिया।
मे भि हड़बड़ी मे चुपके सें ऊपर अपने कमरे मे चला गय़ा। युवराज तब तक गहरी नींद मे सो चुका थां। मैंने अपना गीला पजामा बदला औऱ आकरलेट गय़ा।
मे बसयही सोचरहा थां। मां-डैडी इतने खुले विचार केँ हें! डैडी नें माँ कि बुर एक् गोरे कों दिलवाई थि! मेरे दिमाग़ मे बसयही घूमरहा थां कि उस गोरे नें मां कि केसेली होगी.
यह सोचते-सोचते कब नींद आँ गई, पता हि नहि चला।
Ek Chaat k Niche (Family Saga) – New Episode
अगली सुभह मे उठा। मां अपनीसैर सें लौटकर रसोई मे काम करनेलगी हुईँ थीं। तभी हमारी बेहन हरलीन सुभह-सुभह जिम करके अपने कमरे सें बाहर् निकली। वो गर्मी सें पसीने मे भीगी हुईँ थि।
हरलीन नें एक् हल्की टी-शर्ट औऱ पजामा पहनाहुआ थां, जौ पसीने कि नमी सें उसकेबदन सें पूरीतरह चिपक गय़ा थां। टी-शर्ट केँ नीचे उसके बूब्ज़ औऱ पजामे मे उसकी कसकर गढ़ी हुइ गांड बड़ी सेक्सी लगरही थि। उस चिपकते कपड़े मे उसका जिस्म ज़रा-सां भि छिपा नहि थां। वो नहाने केँ लिए अपने कमरे मे चली गई। सब केँ रूम केँ संग बाथरूम जुड़े हुए थें। घऱ केँ अंदर एक् कॉमन बाथरूम भि थां, जोँ शायद हि कभी इस्तेमाल होता थां।
मे बाहर् सोफ़े पर्र बैठा थां औऱ युवराज अभि तक सोयाहुआ थां।
किचन सें मां कि मधुर आवाज़ आई, "पुत्तर, आकरगरम चाय पकड़ लेँ। "
मे उठकर किचन मे गय़ा। मां अंदर रोटी सेंकरही थीं; उन्होंने चटक पीलेरंग कां एक् सूट-सलवार पहनाहुआ थां। रोटी बनाने केँ लिए झुकने पऱ माँ कि भरी हुई गांड औऱ अधिक बाहर् कों उभररही थि।
मुझे जल्दी रात वाला नंगासीन याद आँ गय़ा। मे माँ सें गरमचाय लेकर बाहर् आकरबैठ गय़ा। मेरेमन मे अब सिर्फ़ मां कि गोरी, नंगी गांड हि घूमरही थि।
थोड़ी देर मे हरलीन नहाकर आई। उसनेबाल धोएहुए थें; गीले-गीले बालों मे वो बहोत खूबसूरत लगरही थि। नहाकर उसने एक् टाइट जीन्स औऱ काली शर्टपहन ली थि, औऱ अपने गीलेबाल सुखारही थि। हरलीन नें किचन मे जाकर मां सें गरमचाय ली औऱ मेरेपास आकरबैठ गई।
हरलीन: "दिलराज, तुम् लोगों कों कॉलेज नहि जानां?"
मे: "जानां हैं, पर्र थोडा देर सें। आज हमारे पहलेदो लेक्चर ख़ाली हें, इसलिये देर सें जाएँगे। "
हरलीन: "ठीक हैं, चलो मे चलती हूं। "
हरलीन नें बाल सँवारे, अपने आपको पूरीतरह संवारा औऱ कॉलेज केँ लिए निकल गई। आज जीन्स मे हरलीन ख़ासकर सेक्सी लगरही थि। डेनिम उसके नितंबों पऱ कसकर लिपटा थां, उसकी गांड पूरी बाहर् कों उभरी हुई थि, औऱ उसकेगोल मम्मे भि मोटे थें.
उसे देखकर साफ़पता लगरहा थां कि किसी अनजान मर्द नें उस पऱ अपनी सवारी कि हुईँ हैं, वो अब पूरीतरह सें खिली हुईँ हैं।
इतने मे युवराज भि नीचे आँ गय़ा। आकर वो अपने कमरे मे जिम करनेचला गय़ा। पहले तोँ हम् ज़्यादातर साम कों हि जिम करते थें, पता नहि आज वो सुभह-सुभह क्यूं कसरत करनेलगा।
मे अभि सोफ़े पर्र हि बैठा थां। मां रसोई सें निकलीं, गर्मी औऱ मेहनत सें वो पसीने मे पूरीतरह भीग चुकीथीं।
माँ: "दिल, कॉलेज नहि जानां तुम् लोगों नें? युवराज उठा नहि अभि तक?"
मे: "जानां हैं मां, पऱ देर सें। हमारे पहलेदो लेक्चर मुफ़्त हें। युवराज उठ गय़ा हैं, वो कमरे मे जिम करनेलगा हैं। "
मां: "अच्छा, ठीक हैं। मे तौ ख़ुद मोटी होतीजा रही हूं, सोचती हूं मे भि तेरी बेहन केँ संग कसरत शुरुआत करदूँ। "
मे: "मोटी तोँ नहि लगतीं मां, आप् तोँ दमदार लगती हें। हाँ, जिम लगा लियाकरो, वैसे भि जिस्म चुस्त रहता हैं। "
मां: "हाँ, देखती हूं। कहती हूं हरलीन कों, मुझे भि आवाज़ मार लियाकरे जब कसरत करती हैं। चल, मे अबघऱ कि सफ़ाई करलूँ, फिन रोटी खाते हें। "
मे सोफ़े पऱ बैठाफोन मे व्यस्त होँ गय़ा।
माँ झाड़ू लगाने लगीं। मेरा ध्यान उन पऱ रुक गय़ा। पीछे सें उनकी कमीज़ उनकी गांड केँ खाँचे मे फँसी हुई थि, औऱ उनकेगोल चूतड़ों कि पूरीकसी हुई शेपबनी हुई थि। मेरे दिमाग़ मे फिन सें उनकी नंगी गांड घूमने लग गई।
माँ मेरे सामने आकर झाड़ू मारने लगीं औऱ बाद मे पोछा लगाने केँ लिए नीचे ज़मीन पर्र बैठगईं। जैसे हि वो उकड़ू बैठीं, उनके मोटे-मोटे, भारी मम्मों एकदम कुर्ते केँ गले सें बाहर् कों निकलआए। उनके दोनों घुटने उनके मम्मो सें दबरहे थें, जिससे बूब्ज़ औऱ ज्यादा उभरकर सामने आँ गए थें।
आज पहलीबार मैंने मां केँ मम्मे इसतरह सें उछलेहुए देखे थें। मेरा लन्ड पजामे मे दर्दनाक तरीक़े सें फटने कों होँ रहा थां।
इतने मे माँ बोल पड़ीं।
मां: "काम करना भि मुश्किल हि हैं। कामवाली एक् दिन न् आए, तौ मुश्किल होँ जाती हैं। "
मे: "क्याँ हुआ कामवाली कों?"
माँ: "बीमार हैं पुत्तर वोँ, इसलिये मुझे करनापड़ रहा हैं काम। चल कोई नहि, एक्-दो दिन कि बात हैं। "
मे चुपचाप उठकर स्नानघर मे चला गय़ा। अंदर जाकर नंगा होँ गय़ा औऱ अपना लन्ड पकड़कर उन्मत्त होकर हिलाने लगा।
"आआहम्म। आआह्ह। इतने बड़े मम्मे माँ। हायरे तेरी गांड। आआह्ह। उस गोरे कां लन्ड लेती थि बाहर्। आआह्ह। यहा भि लन्ड ढूँढरही हैं। अरे मेरा लेँ लें। तेरा पुत्तर बुझा देगा प्यास तेरी। आआहम्म। अरे."
ऐसे हि गरम ख़याल ज़ुबान सें निकालते हुए मेरा पानी निकल गय़ा औऱ मे शांत हौ गय़ा।
नहाकर बाहर् आया औऱ सजधजकर होनेलगा। युवराज भि आँ गय़ा, वो भि नहाकर रेडी होनेलगा। सजधजकर होकर, हमने रोटीखाई औऱ हम् दोनों कॉलेज निकलगए।
कॉलेज पहुँचकर हम् अपने दोस्त-दोस्तों सें मिले औऱ कैंटीन मे बैठगए। तभी रवनीत आया। वो हमारे बैच कां हि थां, पऱ उसकी स्ट्रीम अलग थि। हम् दोनों भाइयों कि उसकेसंग अच्छी बनती थि। वो हम् दोनों कां अच्छा यार थां। औऱ। हमारी बेहन हरलीन कां चक्कर भि रवनीत केँ संग हि चलता थां।
येबात हमारे बीच खुली हुईँ थि। अफ़ेयर शुरुआत होने केँ बाद हि हरलीन नें रवनीत कों विश्वास मे लेकर हमसे मिलवाया थां। कॉलेज मे औऱ किसी कों नहि पता थां कि हमारी बेहन कां चक्कर रवनीत केँ संग हैं। वैसे भि हरलीन सीनियर थि, उसेइस बार पास-आउट हौ जानां थां, तोँ ज्यादा कोई तनाव नहि थां।
रवनीत नें नमस्कार कि औऱ पासबैठ गय़ा। हम् इधर-उधर कि बातें करतेरहे। कॉलेज कां आधादिन गुज़र गय़ा थां। युवराज मेरेपास आकर खड़ाहुआ।
युवराज: "दोस्त दिलराज, मैंने आजउस भाभी सें मिलने जानां हैं। तुम्हें घऱ अकेले हि जानां पड़ेगा। "
मे: "भोसड़ी केँ, सुभह नहि बताया?"
युवराज: "दोस्त, मुझेलगा तुम्हे अभि बता दूँगा। क्याँ हुआ?कोई बात हैं तौ रहने देता हूं, नहि जाता। "
मे: "चल साले, कोई बात नहि हैं। मिल आँ जाकर। मे चला जाऊँगा किसी केँ संग बैठकर घऱ। "
इतने मे हरलीन हमारी तरफ़आती दिखी।
मे: "तूँ यहा हमारे पास क्याँ कररही हैं?"
हरलीन: "तुम् दोनों सें काम थां। मैंने रवनीत केँ संग कहीं जानां थां। मेरी स्कूटी तुम् लोगघऱ लेँ जानां। "
युवराज कुछ बोलने लगा थां, पर्र मे बीच मे हि बोल पड़ा, "बहनचोद, सबनेआज हि जानां थां?"
हरलीन: (थोडा हैरान होकर) "औऱ कौनचला हैं?"
मे युवराज कि तरफ़ देखने लगा। दिदी समझ गई।
हरलीन: "तुँ किसे मिलने जारहा हैं युवराज?"
युवराज: "एक् मित्र हैं दिदी, उसकेपास जानां हैं। "
हरलीन: "अच्छा जी, कौन-सें डिपार्टमेंट कि हैं?" (दिदी कों लगाकोई लड़की होगी अपने कॉलेज कि। )
मे: "कॉलेज कि नहि हैं दिदी, बाहर् कि हैं। "
हरलीन: "अच्छा। चलठीक हैं, तूँ लेँ जइयो स्कूटी मेरी। औऱ माँ कों कह देना मे रमन केँ संग आऊँगी। (रमन हरलीन कि पक्की सहेली हैं औऱ रवनीत कि सगी बड़ी बेहन हैं)। पर्र रवनीत छोड़ जाएगा मुझे अपने आप्। "
ये कहतेहुए युवराज औऱ हरलीन, दोनों ग़ायब होँ गए।
फिन मे सोचने लगा। युवराज नें आज सुभहजिम इसीलिए लगाया थां, ताकि वो साम कों फ़्री रहे, औऱ हरलीन भि इतनी सेक्सी बनकर इसीलिए आई थि, ताकि रवनीत कों लुभासके।
मैंने भि दिदी कि स्कूटी उठाई औऱ घऱ कि तरफ़ निकल गय़ा। अकेला कॉलेज मे बोर हौ रहा थां।
घऱ पहुंचा तौ गेट पर्र तालालगा हुआ थां।
मैंने बाहर् स्कूटी खड़ी कि औऱ दीवार फांदकर अंदरचला गय़ा। अंदर वाला द्वार (दरवाज़ा) खुला थां। पहले तौ मे डर गय़ा कि कहींकोई चोरी करने नं आया होँ। फिन अंदर रसोई सें कुछ हलचल कि आवाज़ आई, औऱ मे दबे पाँव अंदर गय़ा।
अंदर वालासीन देखकर मेरेहोश उड़गए।
मां बिल्कुल नंगी रसोई मे खड़ीथीं। औऱ हाथ मे तेल कि बोतल लेकर अपने कमरे मे चलीगईं।
मे आरामसे माँ केँ पीछे गय़ा। मां अपने मोटे-मोटे चूतड़ों कों मस्ती सें हिलाती हुई कमरे मे घुसगईं। मैंने खिड़की केँ पास खड़े होकर अंदर देखा, औऱ मेरे पैरों तले ज़मीन निकल गई।
अंदर अनमोल नंगाबेड पऱ बैठा थां। (अनमोल मेरे ताऊ कां लड़का हैं, हमारे घऱ केँ बाजू मे हि रहता हैं)। माँ तेल कि बोतल लेकर अंदरगईं।
अनमोल: "लेँ आई चाची तेल?आजा, बैठजा। " (उसने अपनी जांघ पऱ ज़ोर सें थपकी दि) "आजा, मेरी जांघ पऱ बैठजा। क्या बात है चाची, तेरा जिस्म तौ आग लगाता हैं पूरी। "
माँ: "अच्छा? तेरा औज़ार भि कौन-सां छोटा हैं, ज़ालिम!"
अनमोल नें मां कों खड़ा किया औऱ ख़ुद भि खड़ा हौ गय़ा औऱ उनके होंठ चूसने लगा।
अनमोल: "उम्म्म्म्हाआ। आआह्हम्म। चाची, तेरे होंठ.दिल करता हैं खा जाऊँ। "
माँ: "आआह्हम्म। खाजा नां, कौन-सां मना किया हैं तुम्हे। "
अनमोल नें मां केँ भारी स्तनों कों हाथ सें मसलते हुएकहा, "आआह्हम्म। चाची, मम्मे बड़े मोटे हें, चाचे नें किए हें याँ कोई औऱ रसचूस गय़ा इनका?"
मां: "औऱ किसी कों तोँ नज़दीक भि नहि आने दियाइस जट्टी नें। तुँ पहला हैं। " (झूठ बोलते हुए उन्होंने अदा सें कहा)।
अनमोल उनके पैरों केँ बीचबैठ गय़ा, उनकी टाँगें फैलाईं औऱ अपनीजीभ उनकी बुर पऱ रख दि।
अनमोल: "आआह्हम्म्म। उम्म्म। तेरी बुर चाची, पूरी गीली हुई पड़ी हैं। शहदटपक रहा हैं। "
वो उन्हें बेड पऱ लें गय़ा, सीधा लिटाया औऱ उनकी बुर कों पागलों कि तरह चूसने लगा। "आआह्हम्म्म। उम्म्म्म्। चाची तेरी बुर। क्या बात है."
मां: (हाथ सें उसका मुँह अपनी गीली बुर पर्र ज़ोर सें दबाते हुए) "आआह्ह्ह। चूस लें। चूस लेँ चूत अपनी चाची कि। आआह्ह्ह। मे मर गई। बड़ेदिन सें प्यासी थि। "
मे बाहर् खिड़की पऱ खड़ाये सभीदेख औऱ सुनरहा थां। मुझसे संयम नहि होँ रहा थां। मेरा लन्ड फ़टने वाला थां। मैंने अपने कपड़े उतारदिए औऱ बाहर् नंगा खड़ा होकर अपना लन्ड तेज़ी सें हिलाने लगा।
अंदर, अनमोल मम्मी केँ ऊपरलेट गय़ा, उन्हें होठों पऱ चूमने लगा औऱ दो उँगलियाँ उनकीगरम बुर मे डालदीं।
मां: "आआह्ह्ह्ह। अनमोल। डालदे अब। औऱ नं तड़पा। हायराम."
अनमोल: "क्याँ डालदूँ चाची? बोल?"
माँ: "हायवे। लन्ड डालदे अपना। बड़ी प्यासी हूं."
अनमोल उठा, तेल अपने तनकर खड़े लन्ड पर्र लगाया औऱ उसे माँ कि बुर पर्र रगड़ने लगा।
अनमोल: "आआह्ह्ह। बड़ी गीली हुईँ पड़ी हैं बुर तेरी चाची। आआह्ह। तेल कि ज़रूरत हि नहि पड़नी थि। आआह्ह."
उसने लन्ड बुर केँ मुहाने पर्र रखा औऱ एक् हि ज़ोरदार झटके मे सारा लन्ड अंदर धकेल दिया।
अनमोल: "आआआआह्ह्ह्ह्ह। चाची। आयामजा? आआह्ह। आआहम्म."
माँ: "आआह्ह। हायरे वे.मार डाला। धीरे-धीरे धकेलता वे कंजर। आआआह्ह्ह। क्या बात है। चोद मुझे.चोद अच्छी तरह। आआह्ह। दोबार पानी निकल गय़ा थां मेरा। "
अनमोल "आआह्ह्ह। उम्म्म." करताहुआ पूराआधा घंटा माँ कि टाँगें उठाकर उनकी बुर मारता रहा। फिन उन्हें घोड़ी बनाकर मम्मी कि अच्छी-खासी ठुकाई कि।
मे बाहर् खड़ा अपनी उत्तेजना केँ संगये सभी देखता रहा। करीब एक् घंटे तक ये ज़बरदस्त चुदाई चलतीरही। अनमोल नें मां कि अच्छी रेल बनाई।
जब दोनों कां काम हौ गय़ा (दोनों झड़गए), तोँ वेबेड पऱ लम्बे लेटगए।
अनमोल: "चाची, मजाआया? मेरे लन्ड कि सवारी करके?"
माँ: "हाँ, बहोत। बड़ी प्यासी थि मेरी बुर, आजचैन आया। चल, अबउठ औऱ कपड़े पहन औऱ जा। बच्चे कॉलेज सें आते हि होंगे। "
मे भि चुपके सें अपने कमरे मे चला गय़ा। मैंने बाहर् खड़े-खड़े हि दोबार मुठमार ली थि औऱ सारामाल अपनी अंडरवियर सें साफ़कर लिया थां। मे कमरे मे आकर नंगा हि बेड पर्र लेट गय़ा औऱ मुझे गहरी नींद आँ गई।
माँ औऱ अनमोल कमरे सें बाहर् आए।
मां: "यह लेँ चाबी, बाहर् सें गेट कां तालाखोल दे, अपनेघऱ कि तरफ़ सें जाकर। "
अनमोल ऊपर गय़ा औऱ दीवार फांदकर अपनेघऱ चला गय़ा। मां नें बाहर् सें गेट खोला औऱ अंदर आँ गईं।
मां इसबात सें पूरीतरह अनजान थीं कि मे अपने कमरे मे सोयाहुआ हूं।
मुझेसोए हुए एक् घंटा होँ गय़ा थां। हमारा कॉलेज सें घऱआने कां वक्त भि होँ गय़ा थां। घऱ केँ बाहर् घंटीबजी, कोई माँगने वालाआया थां। माँ आटा डालने गईं औऱ घऱ केँ बाहर् उसेआटा दे दिया।
तभी माँ नें बाहर् खड़ी स्कूटी देखी औऱ सोचने लगीं, "ये तोँ हरलीन कि स्कूटी हैं। " फिन वोँ जल्द सें हरलीन केँ कमरे मे गईं, वहा कोई नहि थां। मां सोचने लगीं, "स्कूटी तोँ हरलीन कि हैं, फिन हरलीन कहां हैं?"
मां सोचते-सोचते ऊपर (मेरे कमरे कि तरफ़) आँ गईं औऱ कमरे मे मुझे देखकर हैरान होँ गईं कि मे कबआया।.औऱ मे बेड पऱ नंगा सोया पड़ा थां। मेरा लन्ड भि इस वक़्त सोया पड़ा थां।
मां अंदरआकर आवाज़ देने लगीं।
माँ: "दिलराज! उठ पुत्तर। दिल, उठ!"
मे एकदम सें उठकरबैठ गय़ा।
मे: "क्याँ हुआ माँ?"
मां: "हुआ तौ कुछ नहि, तुँ कॉलेज सें कबआया?"
मे चुपरहा औऱ अपने दोनों हाथों सें सिर पर्र खुजली करनेलगा, जैसे अभि भि अधूरी नींद मे हूं।
माँ: "औऱ। नंगा क्यूं सोया पड़ा हैं? लज्जा हैं कोई तुम्हारी तरफ याँ नहि?"
मुझेयाद आया कि मे नंगा हि सो गय़ा थां। मे फिनकुछ नहि बोला।
माँ: "बोलता क्यूं नहि बेशरम?"
मे: "गर्मी लगरही थि, कपड़े उतारदिए थें। आप् भि तौ अनमोल केँ ऊपर अपने कमरे मे उतारकर बैठीथीं। "
मे इतनीबात कहकरचुप होँ गय़ा।
कमरे मे एकदम सन्नाटा छा गय़ा।
हम् दोनों, मम्मी-बेटा, चुप थें, औऱ माँ निस्तब्ध होकर मेरेपास आकरबेड पर्र धीरे-धीरे सें बैठगईं।
Ek Chaat k Niche (Family Saga) – New Episode
थोड़ी देर तक छाईउस घनी चुप्पी कों मां नें तोड़ा,
माँ: "तुँ। कबआया थां?"
मे: "जब आप् तेल कि बोतल लेकर कमरे मे गई थीं। " (मुझेपता थां कि अगरआज खुलकर नहि बोला, तोँ आगेकुछ नहि होना। मे बिना किसी झिझक केँ बोलरहा थां। )
मां: "बेशरम! तुम्हें लज्जा नहि आई मुझेइस तरह देखते हुए?"
मे: "आप् कौन-सां लज्जा कररही थीं? नंगी होकर अनमोल केँ लन्ड पर्र चढ़ने लगीथीं। "
मां मुझेइस तरह बेबाकी सें बोलते हुए देखकर थोडा हँस पड़ीं। वो अपनी हँसी मुश्किल सें रोक पाईं।
माँ: "देख तौ ज़रा, कितना बेशरम हौ गय़ा हैं! अपनी मम्मी केँ संग केसेबात कररहा हैं!.औऱ हाँ, यह लें निक्कर पहन, यह अपनेइस बंदर कों खड़ा करके बैठा हैं। "
मे: "मेरा क्याँ कसूर हैं इसमें? ये भि अब आपके कारण हि हुआ हैं। "
इतने मे नीचे सें युवराज कि आवाज़ आई।
माँ: "चलउठ, युवराज आँ गय़ा लगता हैं। कपड़े पहन लें औऱ नीचे आँ, मे गरमचाय बनाती हूं।.औऱ हाँ, किसी कों बताना नहि जौ देखा हैं। "
मे: (हँसकर) "मे क्यूं बताऊँगा? मे पागल थोड़ी हूं जौ अपनी माँ कि इज़्ज़त ख़राब करूँगा। "
मां नीचेचली गईं। मे भि उठकर पजामा-टीशर्ट पहनकर नीचे गय़ा। नीचे युवराज सोफ़े पऱ बैठा थां औऱ माँ किचन मे गरमचाय बनारही थीं।
मे: "औऱ फिन, कैसारहा प्रोग्राम भाभी केँ संग?"
युवराज: "बढ़िया थां। ज़बरदस्त हैं साली भाभी। "
मे: "क्याँ कियाफिन आज?"
युवराज: "कुछ नहि, पहले कॉफ़ी पी, फिन पार्क मे बैठे थें घंटाभर। "
मे: "कियाकुछ पार्क मे याँ नहि?" (मैंने आँख मारकर पूछा। )
युवराज: "तेरी लगता हैं मैंने नहि किया होगा?"
मे: "वोँ तौ पता हैं मुझे, आख़िर भइया किसका हैं!" (दोनों हँस पड़े। ) "अच्छा बता, क्याँ करकेआया हैं। "
युवराज: "करना क्याँ थां, पार्क मे कौन-सां चूत लेँ लेनी थि। बसकिस कि औऱ Blowjob लगवाए। "
मे: "बहनचोद, औऱ क्याँ चाहिए तुम को पहली मीटिंग मे!"
युवराज: "अरे दोस्त, वोँ भाभी तौ चूत देने कों फिनरही थि। "
इतने मे माँ गरमचाय लेकर आँ गईं।
माँ: "क्याँ खुसर-फुसर किएजा रहे हौ दोनों भइया?"
मे: "कुछ नहि माँ, बस कॉलेज कि बातें कररहे थें। "
मां: "अच्छा। औऱ आज अलग-अलग केसेआए? औऱ तूँ दिलराज, हरलीन कि स्कूटी पर्र केसेआया? हरलीन कहां हैं?"
युवराज मेरी तरफ़ देखने लगा।
मे: "कुछ नहि माँ, युवराज किसी साथी केँ पास जानां थां औऱ मे हरलीन कि स्कूटी लेँ आया। हरलीन अपनी सहेली केँ संग आँ जाएगी, उसनेकह दिया थां मुझे। "
माँ: "अच्छा-अच्छा, चलोठीक हैं। गरमचाय पीलो तुम् लोग, मे किचन मे कामदेख लूँ, कुछ करने वालाहुआ तौ। "
माँ उठकरचली गईं।
मे: "हाँ, अब बता क्याँ कहरहा थां तूँ? बुर देणे कों फिनरही थि भाभी?"
युवराज: "हाँ, औऱ क्याँ। बहोत गरम थि साली। कह रही थि कोईरूम लेँ लेता। "
मे: "अच्छा! भोसड़ी केँ, इतनीगरम थि!"
युवराज: "औऱ क्याँ। अब देखता हूं, कहरही हैं दोबारा मिलेंगे तौ रूम लें लेंगे। "
मे: "हम्म, मज़े हें बहनचोद तेरे। इधर मे हि फिनरहा हूं अकेला। "
युवराज: "हाँ, सच! भोसड़ी केँ, एक् बात औऱ। पता हैं वोँ भाभी रवनीत कि भाभी लगती हैं। उसके भइया कि घरवाली हैं। "
मे: "अच्छा! भोसड़ी केँ। उसका भइया तौ Canada मे काम करता हैं!"
युवराज: "हाँ। "
मे: "फिन तोँ मज़े हें भइया। अकेली हि हैं यहा, तभी इतनीगरम हुई फिनरही हैं।.तुम्हे केसेपता लगा कि वोँ रवनीत कि भाभी हैं?"
युवराज: "उसके फ़ोन पर्र तस्वीरें देखरहा थां। रवनीत औऱ रमन केँ संग बहोत तस्वीरें थीं, तब बताया उसने। "
मे: "अच्छा। चल बढ़िया हैं। दिदी कों रवनीत बजाता हैं, तूँ उसकी भाभी कों बजाएगा। " (औऱ हँसने लगा। )
युवराज: "चल साले, क्याँ बोलेजा रहा हैं। बेहन हैं वोँ अपनी, ऐसे बकवास कररहा हैं। चल मे फ़्रेश होकरआया, फिनजिम लगाते हें। "
मे: "हम्म, चल आँ जा जल्द। "
युवराज ऊपरचला गय़ा। मे उठकर रसोई कि तरफ़ गय़ा। अंदर मां बर्तन धोरही थीं। मे पीछे खड़ा होकर उनकीभरी हुईँ गांड कों घूरने लगा। मां कों एहसास हुआ कि पीछेकोई खड़ा हैं, तौ वो घूमकर देखीं औऱ फिन वापसकाम करनेलग गईं।
मां: "हाँदिल पुत्तर, क्याँ चाहिए?"
मे: "चाहिए तोँ बहोत कुछ हैं, पऱ आप् दोगी?" (मैंने थोड़े शरारती अंदाज़ मे कहा। )
माँ: "अच्छा? ऐसा क्याँ चाहिए जौ मे दे नहि सकती?"
मे आरामसे आगे गय़ा औऱ मां केँ संग सटकर खड़ा होँ गय़ा। औऱ मैंने दोनों हाथ माँ कि गांड पर्र रखकरउसे मसलना शुरुआत कर दिया।
मे: "यह चाहिए माँ। जौ आज अनमोल केँ आगे घोड़ी कि थि। "
माँ: "वे क्याँ कररहा हैं कुत्ते! हाथ पीछेकर, थप्पड़ खाएगा मेरे सें! तेरी मां हूं, कोई धंधेवाली नहि हूं जिसके संगऐसा कररहा हैं!"
मे: (मैंने हाथ हटाए, पर्र अपना तनकर खड़ा लन्ड उनकी गांड सें सटा दिया औऱ माँ सें पूरा चिपक गय़ा। ) "ऐसा क्यूं कररही होँ मां? अनमोल मुझसे अधिक प्यारा हौ गय़ा हैं क्याँ अब आपको?" (मैंने थोडा रूठते हुएकहा। )
मां बोलने हि लगीथीं कि युवराज नें बाहर् सें जिम लगाने केँ लिए आवाज़ मार दि।
मां: "जावे! युवराज नें देख लिया तौ पंगापड़ जाएगा। जा, जिम लगा जाकर। "
मे किचन सें निकला। मे औऱ युवराज जिम लगाने कमरे मे चलेगए। मेराआज जिम लगाने कां दिल नहि कररहा थां, मे बस माँ केँ बारे मे सोचेजा रहा थां। मेरा लन्ड भि पजामे मे पूरा खड़ा हौ गय़ा थां। थोडा समय रुककर.
मे: (युवराज सें) "मे रसोई सें पानी कि बोतल लेकरआता हूं। "
मे जल्द सें रसोई मे गय़ा। मां स्लैब केँ संग खड़ी होकर सब्ज़ी काटरही थीं। मैंने जाकर पीछे सें उन्हें ज़ोर सें जकड़ लिया। मां थोडा डरगईं।
मे: "ओह माँ। क्याँ कर दिया हैं तुमने। मेराकुछ करने कों दिल नहि कररहा अब। " (मेरा लन्ड खड़ा थां औऱ मां कि गांड मे साफ़लग रहा थां, माँ कों महसूस हौ रहा थां। )
मैंने पीछे सें जकड़े हुए हि, आगे सें दोनों हाथों मे उनके मम्मे पकड़लिए। मां एकदम सें थरथरा गईं।
माँ: "यह क्याँ कररहा हैं दिलराज! यह ग़लत हैं। तेरी मां हूं मे। तूँ नहि कर सकताऐसा!"
मे: "अरे माँ। कंट्रोल नहि होँ रहा! तुम् होँ हि इतनी सेक्सी! ऊपर सें जब सें तुम्हें अनमोल कों चूत देते देखा हैं, मेरा बड़ादिल कररहा हैं तुम्हारी लेने कों!"
मैंने जल्द सें अपना पजामा नीचे पैरों मे गिरा दिया औऱ अपना नंगा लन्ड निकालकर मां कि गांड पऱ रगड़ने लगा। "क्या बात है." (मैंने उनकी कमीज़ ऊपर उठाकर, सलवार केँ ऊपर सें हि लन्ड रगड़ना शुरुआत कर दिया। )
मां: "हायवे कंजर! क्याँ कररहा हैं! नं कर। मेरा क्यूं बुराहाल कररहा हैं। रात काटनी मुश्किल होँ जानी हैं मुझसे."
मे: "कोई न्, मे कटवा दूँगा रातआज। तुम् बस अभि मुझे हल्का करो पहले। "
मां: "मे केसे करूँ.कर तौ तुँ हि रहा हैं."
मैंने उनकी सलवार कों घसीटकर नीचेकर दिया। नाड़ा थोडा ढीला थां। सलवार उनकी जाँघों मे फँस गई। मैंने उन्हें स्लैब पऱ हि झुकाकर घोड़ी बना लिया औऱ अपना लन्ड उनकी गांड कि लकीर मे मसलने लगा। "आआह्हम्म। ओह." (मे दोनों हाथों सें उनके चूतड़ों कों ज़ोर-ज़ोर सें भींचने लगा। )
मां: "हायवे कंजर। अंदरमत डालना पुत्तर। ऐसे हि निकाल लें। ग़लत नाताबन जाएगा अगर अंदरडाल दिया तौ। "
मे ज़ोर-ज़ोर सें लन्ड उनकी गांड कि लकीर मे रगड़ता रहा औऱ पाँच मिनट मे मेरामाल छूट गय़ा। माँ कि सारी गांड मेरेगरम माल सें भर गई। माँ नें वैसे हि सलवार ऊपरकर ली। मैंने भि पजामा ऊपरकर लिया। इतने मे युवराज नें आवाज़ लगाई, "आँ जा दिलराज! क्याँ करनेलग गय़ा किचन मे?"
मे: (धीरे-धीरे सें मां केँ कान केँ पास जाकर) "तेरी माँ कि गांड मारने लग गय़ा थां। "
माँ हँस पड़ीं।
माँ: "कुत्तेया! तेरी भि तोँ मम्मी हि हूं। "
मैंने मां कों अपनी तरफ़ घुमाया औऱ उनकी आँखों मे देखने लगा।
मे: "अब माँ केँ संग-संग मेरी'जान' भि हौ तुम्। मनजीत कौर। " (औऱ उनके होंठों पऱ किस करके, पानी लेकर बाहर् युवराज केँ पासचला गय़ा। )
माँ: (सलवार केँ ऊपर सें गांड कों हाथ लगाकर देखती हें। सलवार गांड सें चिपक गई थि औऱ गीला-गीला लगरहा थां। ) "अरेवे कंजर नें सारे चूतड़ भरदिए अपनेमाल सें।.चलकोई नहि मनजीत। अबकर हि गय़ा हैं तौ लज्जा कैसी। जहाँ अनमोल केँ आगे घोड़ी हुईँ, अपने पुत्तर केँ आगे भि हौ जइयो। " (वो अपने आप् सें बातें करती हुइ बोलीं। )
एक् घंटाजिम लगाने केँ बाद युवराज नहाने लग गय़ा। मे भि कमरे मे बैठा आराम करनेलगा। इतने मे हरलीन दिदी मेरेपास आईं। मे बेड पर्र बैठा थां, सिर्फ़ बॉक्सर पहनाहुआ थां औऱ ऊपर कां बदन नंगा थां। मेरी बॉडी कि बढ़िया शेपबनी हुइ थि।
हरलीन: "लगा लियाजिम दिलराज?"
मे: "हाँजी। आँ जाओ, बैठ जाओ। " (दिदी मेरे सामने कुर्सी पर्र बैठगईं। दिदी नें अभि तक कपड़े नहि बदले थें, जीन्स औऱ शर्ट मे हि थीं। पर्र एक् चीज़ बदली हुईँ थि। सुभह कॉलेज दिदी काली शर्ट पहनकर गई थीं औऱ अब सफ़ेद शर्ट मे थीं। मे दिदी कों देख हि रहा थां, इतने मे दिदी बोल पड़ीं। )
हरलीन: "युवराज कहां हैं?"
मे: "वोँ नहारहा हैं, बाथरूम मे हैं। "
हरलीन: "अच्छा। मैंने पूछना थां, तूने मां कों क्याँ कहा? मे कुछ औऱ हि नं कहदूँ औऱ पकड़ी जाऊँ। "
मे: "कुछ नहि। मे स्कूटी लेँ आया, युवराज नें कहींकाम जानां थां औऱ तुम् रमन केँ संग आँ जाओगी, यहकह दिया थां। "
हरलीन: "ठीक हैं। शुक्रिया भइया। " (एक् मुस्कान केँ संग। )
मे: "कोई नं। वैसे, इतनादेर केसे हौ गए?"
हरलीन: "कुछ नहि दोस्त, बस वक़्त लग गय़ा। "
मे: "इतना वक़्त कहां लगा दिया?" (मैंने थोडा अनजान बनतेहुए बोला। पता तौ मुझेलग हि गय़ा थां शर्ट बदली देखकर कि कोई कांड तौ अवश्य किया होगा। )
हरलीन: "लग जाएगा पता तुम को भि, जब तेरी सहेली बनेगी कोई। "
मे: "अच्छा? ऐसा क्याँ हौ जाता हैं सहेली बनने केँ बाद? सहेली कि शर्ट बदलकर भेजने लग जाते हें?" (थोडा हँसकर। )
हरलीन: "अच्छा जी! बड़ा ध्यान देरहा हैं मेरी शर्ट कों। ख़राब हौ गई थि, इसलिये बदलली थि।.चल, बहोत बातें न् बना औऱ नीचे आँ जइयो रोटी खाने। मे चलती हूं, नहालूँ मे भि। "
दिदी उठकरचली गईं। उनकी जाती हुइ चाल देखकर पतालग रहा थां कि आज वोँ भि लन्ड कि सवारी करकेआई हें।
युवराज नहाकर आँ गय़ा, औऱ मे भि नहाने चला गय़ा। नहाकर तरोताज़ा महसूस हुआ औऱ थोडा वक्त हम् कमरे मे बैठेरहे। युवराज फ़ोन पऱ चैटकर रहा थां।
मे: "कब मिलना हैं फिनअब दोबारा भाभी कों?"
युवराज: "वोँ तौ कहरही हैं कल मिलने कों। "
मे: "फिनमिल आँ, क्याँ चक्कर हैं। भाभी केँ फट्टे चक्कदे। "
युवराज: "हाँ दोस्त, जा हि आऊँगा। साली कि गर्मी निकाल हि आऊँगा।.गोलियाँ पिल्स होंगी नं पड़ी तेरेपास?"
मे: (हँसकर) "हाँ, हें। पर्स सें लेँ लियो। खाकरचल यहीं सें। मुझे भि ज़रूरत होनी हैं। "
युवराज: "तुँ साले क्याँ करेगा खाकरकल?.औऱ हाँ, कल कॉलेज
दिदी केँ संगचला जइयो, मे सुभह सीधा होटल हि जाऊँगा। "
मे: "मे कॉलेज सें छुट्टी मार लूँगा कल। कोई न्, तूँ मज़े लेँ।
युवराज: "चलठीक हैं, देख लियो जैसे करना हैं।.चल चलिए, रोटी खाइए नीचे जाकर। "
हम् दोनों नीचे आँ गए। टेबल पर्र सभी इकट्ठे बैठकर रोटी खाते थें। मां औऱ दिदी रोटी डालकर लेँ आए। दिदी नें नहाकर लोअर औऱ टी-शर्ट पहनली थि।
मां नें भि लगता हैं नहा लिया थां, सूटबदल लिया थां, हल्के आसमानी Sky Blue रंग कां सलवार-सूट पहनाहुआ थां। मां केँ थोड़े-थोड़े मम्मे बाहर् कों आँ रहे थें। सभी बैठकर खानां खानेलग गए।
माँ मेरेसंग वाली कुर्सी पर्र बैठीथीं। मैंने धीरे-धीरे सें टेबल केँ नीचे सें अपनापेर मां कि टाँगों पऱ लेँ जाकर फेरना शुरुआत कर दिया। (ब्लू फ़िल्मों मे देखा थां, आज पहलीबार करने कां मौक़ा मिला)। मां मेरी तरफ़ आँखें निकालकर देखने लगीं, औऱ फिन रोटी खानेलग गईं।
रोटी खाकर, थोडा वक्त इधर-उधर कि बातें करनेलगे। हम् दोनों भइया औऱ बेहन बैठकर टेलीविज़न देखने लगगए औऱ माँ रसोई मे बर्तन साफ़ करनेलग गईं।
बेहन भि फ़ोन पऱ टाइपिंग करने मे व्यस्त थि औऱ युवराज भि फ़ोन पर्र लगा थां। इतने मे किचन सें आवाज़ आई।
मां: "डैडी तेरे कां फ़ोन हैं हरलीन पुत्तर, बातकर लें। "
दिदी भागकर रसोई मे गईं औऱ फ़ोन पऱ बात करने लगीं। नेटवर्क कि समस्या कि वजह सें आवाज़ ठीक नहि आँ रही थि, तोँ दिदी ऊपरछत पऱ चलीगईं।
मे सोफ़े पर्र बैठा थां। मेरा ध्यान एकदम दिदी केँ फ़ोन पऱ पड़ा। फ़ोन पर्र रवनीत कि चैट खुली पड़ी थि औऱ फ़ोन अभि Lock नहि हुआ थां। मे Message पढ़ने लग गय़ा जौ रवनीत भेजरहा थां:
> "हरलीन, आजसच मे बड़ामजा आया होटल मे करके। मुझे नहि पता थां तूँ इतनीहॉट हैं। तेरी बुर बड़ी गर्म थि। सच मे, आज चोदने कां मजा आँ गय़ा।.औऱ क्षमा करना, फ़्लो-फ़्लो मे जौ तेरी शर्ट फाड़ दि थि। "
औऱ उसकेबाद, रवनीत नें एक् वीडियो भेजी थि। मैंने आवाज़ बंद करकेओपन कि औऱ देखा। एक् लड़की घोड़ी बनी हुईँ थि औऱ पीछे सें बालों सें पकड़कर एक् लड़का बुर मे लन्ड धकेलरहा थां। तीस सेकंड केँ बाद लड़की नें पीछे मुड़कर देखा। वोँ लड़की हरलीन दिदी थि!
मैंने जल्द सें वोँ वीडियो अपने नंबर पऱ भेज दि औऱ अपने वाले सें चैट डिलीट कर दि। जैसे हि बैक किया, रमन कां भि मैसेज आयाहुआ थां। मैंने ओपन किया, उसमें लिखा थां:
> "कुत्तिये! तुँ मेरे भइया केँ संग मज़ेकर रही हैं! मुझेकब बिठाना हैं अपने भइया केँ लन्ड पऱ? मेरीकब बात करवानी हैं दिलराज केँ संग?"
मे मैसेज पढ़कर हैरान रह गय़ा। औऱ जल्द सें फ़ोनलॉक करके सोफ़े कि साइड पऱ रख दिया।
इतने मे हरलीन दिदी नीचे आँ गईं। मां भि काम निपटा करआकर हमारे पास बैठकर टेलीविज़न देखने लगगईं।
हरलीन: "यहलो माँ, फ़ोन अपना। "
मे: "क्याँ बात, मेरीबात नहि करवाई डैडी सें?" (मैंने बेहन कों छेड़ते हुएकहा। )
हरलीन: "मुझे क्याँ पता थां तूनेबात करनी हैं, मैंने काट दिया। "
मां: "चलकोई न्, फिनकर लियो। "
मे: "कोई नं मां, मे तौ ऐसे हि छेड़रहा थां। "
दिदी नें अपना फ़ोन उठाया औऱ "गुड नाईट" कहकर अपने कमरे मे चलीगईं।
मां: "युवराज! फ़ोन सें निकल आँ तुँ भि। कौन-सि अपनी पत्नि केँ संगलगा हैं?"
युवराज: "किसी केँ संग नहि लगा माँ, मित्र कां मैसेज आया थां। "
माँ: "पता हैं मुझे कौन-सें यार केँ संगलगा हैं। "
युवराज: "चलोठीक हैं, चलता हूं मे भि सोने। गुड नाईट।.आँ जइयो दिलराज टेलीविज़न देखकर तुँ। "
मैंने 'हाँ' मे जवाब दिया औऱ टेलीविज़न देखने लग गय़ा।
माँ: "चल मे भि चलती हूं। चला जइयो तुँ भि जल्द कमरे मे, दिल। "
मे: "बैठजाओ आप् तौ पास। क्याँ करना हैं आपने जाकर कमरे मे अभि। "
माँ: "बस पुत्तर, थक गई हूं। आराम करना हैं, सिर दर्दकर रहा हैं बहोत। "
मे खड़ा होँ गय़ा औऱ मां कों हाथ सें पकड़कर सोफ़े पर्र बिठा दिया।
मे: "बैठो आप् यहा, मे अभि आपका दर्ददूर करता हूं। " (औऱ मे उनके पीछे खड़ा होकर उनकासिर दबाने लगा। ऊपर खड़े होकर मां केँ मोटे स्तनों कां नज़ारा बड़ा जबरदस्त लगरहा थां। मे सिर कों धीरे धीरेदबा रहा थां। ) "आया आरामसिर कों?"
माँ: "हाँ, थोडा-थोडा फ़र्क हैं। "
मैंने दोनों हाथसिर सें हटाकर उनके कंधों पऱ रखदिए, औऱ दोनों कंधों सें सूट नीचे कों सरका दिया। सूट थोडा खुला थां औऱ धीरे-धीरे नीचे कों हौ गय़ा।
मां: "यह क्याँ कररहा हैं दिल?" (वो उठकर खड़ी हौ गईं, उनकी आवाज़ मे विरोध कम, घबराहट ज्यादा थि। )
मैंने जाकर माँ कों ज़ोर सें जकड़ लिया।
मे: "माँ, आईलवयू। मुझे बहोत पसन्द होँ तुम्। " (मैंने दोनों हाथ उनकी गांड पर्र रखदिए औऱ मसलने लगा, औऱ उनकी गर्दन पऱ किस करनेलगा। ) "आआह्हम्म। म्म्मुआआ."
माँ: "आआह्ह। वे क्याँ कररहा हैं पुत्तर! नं कर, यह ग़लत हैं। छोड़दे मुझे!" (उनकादिल भि कररहा थां, साम कों लन्ड रगड़कर उनकी बुर कों गीला कियाहुआ थां। )
मे: "अब कंट्रोल नहि हौ रहा माँ!" (मे उनके कपड़े उतारने लगा औऱ माँ नें झट सें रोक दिया। )
माँ: "वे क्याँ, यहा बाहर् हि नंगा करेगा?"
मे मां कों संग लेकर उनके कमरे मे चला गय़ा। अंदर जाकर कुंडी लगाली। औऱ मां कि कमीज़ उतार दि। वो अब सिर्फ़ सलवार मे मेरे सामने खड़ीथीं। मे पीछे होकर उन्हें घूरकर देखने लगा।
मां: "वे बेशरम, क्याँ देखरहा हैं? लज्जा नहि आती?" (उन्हें सचमुच लज्जा आँ रही थि, आज पहलीबार अपने लड़के केँ सामने नंगी खड़ीथीं। )
मे: "अब कैसी लज्जा कररही हौ मेरी छम्मक छल्लो!" (मैंने उन्हें अपनेपास घसीटकर उनके होंठों पर्र किस करना शुरुआत कर दिया। ) "
म्म्म्मुआआघघ। आआह्हम्म." (औऱ गर्दन पर्र किस करता-करता, दोनों मम्मे हाथ मे पकड़कर मुँह मे लेँ लिए औऱ चूसने लगा। )"आआआ। आआह्हम्म."
मां: "आआह्हम्म। हायराम। वे."
मैंने माँ कि सलवार कां नाड़ा खोल दिया। सलवार पैरों मे गिर गई। मां अब पूरीतरह नंगी हौ गई थीं।
मे: "ब्रा-पैंटी नहि पहनतीं?"
माँ: "पहनती हूं, पऱ रात कों नहाकर उतार देती हूं। "
(युवराज कों ऊपरगए एक् घंटा होँ गय़ा थां औऱ हमें मां-बेटे कों मज़े करतेहुए। )
मे: (मां कों बेड पर्र बिठाया। ) "मे ऊपर युवराज कों कोई एक्सक्यूज़ लगाकर आता हूं, कहीं वोँ नीचे न् आँ जाए देखने। "
मां: "हाँ, ठीक हैं। "
मे: "ऐसे हि रहना नंगी, कपड़े मत पहनना। आता हूं बस मे। "
मे ऊपर गय़ा, युवराज फ़ोन पर्र लगा थां।
युवराज: "बड़ा टाइमलगा दिया, क्याँ करनेलग गय़ा थां?"
मे: "कुछ नहि, एक् मुव्ही लगि हुईँ थि, वोँ देखरहा थां। चार्जर लेनेआया थां मे। सोजा तूँ, मैंने तौ सुभह छुट्टी करनी हैं। "
युवराज: "हाँ, बस लगा हूं सोने। " (उसने साइड मे फ़ोन रखकरकहा। ) "लाइटबंद कर दियो जाताहुआ। "
मैंने लाइटबंद कि औऱ चुपके सें नीचेचला गय़ा।
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