Romance कुमकुम completee - Yuvaraj Ki Kahani - Complete Kahani Part 1
कुमकुम/कुशवाहा कान्त
मदमत्त मेघों नें स्वच्छाकाश पर्र अपना नृत्य आरंभकर दिया। वायु वृक्षों केँ कोमल पल्लवों कां आलिंगन करताहुआ विचरण करनेलगा। मयूर हर्षोत्फुल होँ चीत्कार करउठे। मनोरम वनस्थली केँ पक्षी, वृक्षों कि शाखाओं पर्र बैठकर कलरव करने मे निमग्न हौ गये। भुवनभास्कर केँ प्रज्जवलित मुख-मण्डल कों, उमड़ती हुइ सघन घनराशि नें आच्छादित कर लिया।
युवराज नें एक् क्षण केँ लिए अपना अश्व रोककर सामने केँ वन्य-प्रदेश पऱ दृष्टि डाली। कितना सघन, कितना वृक्षलतादिपूर्ण एवं कितना मनोहारी थां भूखंड कां येभाग।।
जहां पक्षियों कां गुंजरित कलरव, प्रकृति-नटी कि अद्भुत छटाएवं नेत्ररंजक हरियाली कां मुग्धकारी नृत्य, हृदयप्रदेश मे एक् अनिर्वचनीय खुशी कि सृष्टि कररहा थां।
संसार कि कोलाहलमयी सीमा सें दूर अवस्थित थां, वनस्थली कां ये अपूर्व प्रदेश।
युवराज अपने नेत्रों पऱ हथेली कि आड़ देकर सामने कि ओर देखने लगे, परन्तु मन्थरगति सें हिलती हुईँ वृक्षों कि टहनियों केँ अतिरिक्त कुछ दृष्टिगोचर न् हुआ।
'जाम्बुक कहां रह गय़ा.?' युवराज नें मानो बनस्थली मे व्याप्त उसघोर नीरवता सें सवाल किया औऱ फिन जल्दी हि अश्व सें नीचेउतर पड़े।
अश्व कि लम्बी बागडोर एक् वृक्ष कि शाखाओं मे बांधकर, वे एक् स्वच्छ स्फुटित-शिला पऱ आँ बैठे।
आजऊषा केँ आगमन केँ संग हि युवराज नें उस वनस्थली मे पदार्पण किया थां आखेट केँ हेतु। उनकेसंग कितने हि पायक थें, परन्तु इस टाइमसभी न् जाने किधरभटक गये थें औऱ युवराज वाराह कि खोज मे भयानक जंगल केँ उसभाग मे आँ पहुंचे थें।
युवराज केँ सुगठित बदन पर्र बहमूल्य वस्त्र एक् विचित्रता लिए देदीप्यमान हौ रहे थें। उनकी हसीन मुखाकृति पऱ भीनती हुईँ यौवन-रेखायें अत्यंत खूबसूरत प्रतीत हौ रहीथीं। कंधे सें लगाहुआ कार्मुक, तूणीर मे आच्छादित कितने हि तीरएवं पाश्र्व मे लटकता हुआ तीक्ष्ण कृपाण-सभी उनकी अतुल शक्ति केँ साक्षी थें।
सृष्टि केँ आदिकाल मे, जिस वक्त संसार इतना सभ्य नहि थां, इतनी विशाल अट्टालिकायें, इतने वैभवशाली राजा प्रासाद एवं इतना उन्नत कला-कौशल नहि थां, जनता मे शांति कि रक्षा केँ लिए नियम उप-नियम नहि बने थें, लोग अपने झगड़ों कां निवारण तलवार कि धार सें किया करते थें उस वक्त समस्त जम्बूद्वीप (भारतवर्ष) पर्र एक् जाति शासन करती थि-द्रविड़ ! द्रविड़ राज युगपाणि कि राजधानी थि पुष्पपुर एवं युवराज नारिकेल थें, युगपाणि केँ एकमात्र पुत्र।
'जाम्बुक.! जाम्बुक.!' युवराज कि तीव्र पुकार निर्जन वन्य-प्रदेश मे गुंजायमान हौ उठी। 'जाम्बुक.! जाम्बुक.!' दूर क्षितिज सें टकराकर युवराज कि ध्वनि लौटआई, मानो उनका परिहास करताहुआ चारों दिशाओं मे प्रकृति कां भयानक अट्टहास गूंजउठा होँ।
उसी टाइमपास कि सघन वृक्षावलि केँ मध्य सें सूखे पत्तों केँ चरमराने कि ध्वनि सुनाई पड़ी। युवराज चौंककर उठ खड़ेहुए।
देखा, एक् विशालकाय वाराह खड़ा थां, अपने प्रज्जवलित नेत्रों द्वारा युवराज कों घूरता हुआ। युवराज केँ नयन प्रकाशमान होँ उठे। उनके विशाल बाहु चंचल हौ गये। उन्होंने कार्मुक पर्र तीर चढ़ाया। वाराह केँ मुख सें क्रोधपूर्ण गुर्राहट कि ध्वनि निकल पड़ी। वो प्रबल वेग सें टूट पड़ा युवराज केँ ऊपर।
युवराज संभलगये थें। जरा-सां पीछे हटकर दायीं ओर खड़े होँ गये। दूसरे हि क्षण, तीव्र गति सें उन पऱ आक्रमण करने केँ लिएआए हुएउस विकराल वाराह केँ तीक्ष्ण दांत, दाहिनी ओर केँ वृक्ष मे धंसगए।
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उसकाबार खाली गय़ा, इससे वो भयानक जन्तु औऱ भि क्रोधित हौ उठा। उसकेमुख सें दिशाओं कों प्रकम्पित करती हुइ भयानक घुरघुराहट निकाली।
युवराज नें कार्मुक कान तक खींचा। दूसरे हि क्षणतौर सर्राता हुआ जाकरउस क्रुद्ध वाराह केँ पंजर मे घुस गय़ा। दारुण चीत्कार केँ संग वो भूमि पर्र लेट गय़ा औऱ छटपटाने लगा।
युवराज आरामसे उसकीओर बढ़े। उनका अनुमान थां कि वो मृतप्राय वाराह उस टाइम पूर्णतया अशक्त हैं औऱ उन्हें किसी प्रकार कि हानि पहुंचाने कि सामर्थ्य उसमें नहि हैं।
इसलिये वे वाराह केँ एकदम समीपचले गए, परन्तु ज्यों हि वे उसके सन्निकट पहुंचे, वो विचित्र गति सें उठ खड़ाहुआ औऱ सामने केँ घने जंगल कि ओरभाग चला।
अपने शिकार कों भागता देखकर युवराज विद्युत वेग सें अश्व पऱ आरूढ़ हौ गये। उनका संकेत पाकर द्रुतगामी अश्व लक्षित दिशा कि ओरभाग चला, अविराम गति सें। कितने हि नदी-नाले, झाड़-झंखाड़ पार कियेजा चुके, परन्तु न् तोँ वो वाराह हि रुका औऱ नं युवराज नें उसका पीछा छोड़ा।
दोनों मे सें किसी कि गति मे बाधा नं पहंची। युवराज कां अश्व इतना अभ्यस्त थां कि ऊबड़ खाबड़ भूमि पऱ भि तीव्र गति सें अग्रसर होँ रहा थां।
पीछा करने कि धुन मे युवराज नें इसबात कां ध्यान न् दिया कि उनके रास्ता मे हि एक् वृक्ष कि शाखा बहोत नीचे तक झुकी हुइ हैं।
दूसरे हि क्षण एक् करुण चीत्कार केँ संग युवराज अश्व पर्र सें नीचे आँ रहे। वृक्ष कि शाखा उनके मस्तक सें इतने प्रबल वेग सें टकराई कि रक्त कि धारा प्रवाहित होँ चली। स्वामिभक्त अश्व दो-चार पगआगे बढ़कर खड़ा हौ गय़ा। युवराज कुछ क्षणों तक चेतनाहीन रहे।
परन्तु चेतना आते हि वे पुनः अश्व पर्र जा चढ़े। मस्तक केँ घाव कां उन्हें कुछ ध्यान हि नहि रहा-ध्यान रहा तौ मात्र उस वाराह कां, जोँ इस वक्त उनकी दुर्दशा कां कारणबना।
वाराह ज्यादा दूर नहि गय़ा कि युवराज नें पुन: अपने कार्मुक पर्र तौर चढ़ाया। सर्राता हुआ वो तीर जाकर वाराह कि ग्रीवा मे घुस गय़ा। ठीकउसी वक़्त पास कि सघन वृक्षावलि केँ पीछे सें एक् सांगी प्रबल वेग सें आकरउस वाराह केँ पंजर मे जा धंसी।
इन दोनों प्रबल आघातों कों सहन न् कर सकने केँ कारण वो दुर्दान्त वाराह भूमि पर्र लुढ़ककर आखिरी सांस लेनेलगा। युवराज कों आश्चर्य हुआ, महान आश्चर्य-ये देखकर कि उनके शिकार पर्र इस प्रकार आक्रमण करने वालाये दूसरा कौन आँ पहुँचा?
युवराज अपने अश्व पऱ सें नीचे उतरे। उसी टाइम एक् सघन वृक्षावलि सें निकलकर एक् बीस वर्षीय बालक उनके सम्मुख आँ खड़ाहुआ।
युवराज नें ध्यानपूर्वक उस युवक पऱ दृष्टि डाली। देखा-उसके मुख पऱ अपूर्व तेज प्रस्फुटित हौ रहा हैं। बदन नग्न हैं, सिर्फ कटि-प्रदेश पर्र एक् साधारण-सां वस्त्र हैं। कटि-प्रदेश मे कृपाण लटकरहा हैं एवंहाथ मे एक् सांगी। वेशभूषा सें वो किरात पुत्र-सां लगरहा थां।
'कौन हौ तुम्.?' युवराज नें पूछाउस वीर युवक सें। 'मे किरात कुमार पर्णिक हूं.। ' युवक नें किंचित् हास्य केँ संग उत्तर दिया। 'किरातकुमार पर्णिक.?' युवराज नें स्थिर वाणी मे दोहराया। उनका हृदय तीव्र गति सें क्रोधित होँ उठा थां, ये सोचकर कि इस धृष्ट युवक नें उनके शिकार पऱ अपनी सांगी चलाकर उनकाघोर अपमान किया हैं।
'किरातकुमार पर्णिक? तुमने युवराज नारिकेल कां अपमान किया हैं, मेरे शिकार पऱ अपनी सांगी चलाई हैं.जानते होँ इसका परिणाम.?' युवराज बोले।
'इसका परिणाम.?' पर्णिक केँ हसीनमुख पर्र पुन: हास्य रेखा नृत्य करउठी--- क्याँ होँ सकता हैं इसका परिणाम.? आप् हि बताने कां कष्ट कीजिये.चिर कृतज्ञ रहूंगा.। '
युवराज कि देदीप्यमान मुखश्री म्लान पड़ गई, युवक कि व्यंगात्मक बातें सुनकर।
उन्हें लगा, जैसे किरातकुमार केँ वेश मे कोई आकाशीय देवता उनकी परीक्षा लेने भूतल पऱ उतरआया हैं नहि तौ एक् किरातकुमार मे इतना साहस कहां?
'मुझे आश्चर्य हैं.!' पर्णिक दोपगआगे बढ़ आया—'कि युवराज नें अपने राजप्रासाद कि सुखमयी गोद त्यागकर इस कंटकाकीर्ण वनस्थली मे विचरण करना केसे स्वीकार कर लियाएवं निरीह वन्य पशुओं पऱ अपनी अतुलित शक्ति कां दुरुपयोग करनाकिस प्रकार उचित समझा?'
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युवराज निश्चल खड़ेरहे। सिर्फ एक् बार उन्होंने आश्चर्य एवं क्रोधपूर्ण दृष्टि पर्णिक पर्र डाली। 'क्याँ युवराज केँ राजप्रासाद मे आमोद-प्रमोद कि वस्तुओं कां इतना अभाव होँ गय़ा हैं कि उन्हें इस भूखंड मे आकर अपने मनोरंजनार्थ वन्य-पशुओं कां वध करना पड़ा? क्याँ युवराज केँ हृदय मे वो अन्यायपूर्ण कार्य न्यायोचित प्रतीत हुआ हैं?'
'क्याँ अब पुष्पपुर केँ युवराज कों एक् किरातकुमार सें न्याय कि दीक्षा लेनी पड़ेगी?' 'न्याय पर्र किसी कां एकाधिकार नहि युवराज.!' निर्भय उत्तर दिया पर्णिक नें।
युवराज गुस्सा एवं क्षोभ सें कांप उठे—'तुम्हारी बातें अभद्रोचित हें किरातकुमार! अच्छा होँ कि तुम् अपनेइस सुकुमार मुख सें ऐसे अप्रिय वाक्य न् निकालो। युवराज कि सहनशीलता कां सीमोल्लंघन कररही हैं तुम्हारी बातें। '
'हम् दरिद्र हें। हमें भोजन केँ लिए कन्दमूल भि दुर्लभ हैं। यदि हम् अपनी क्षुधा केँ शमनार्थ ऐसे निकृष्ट रास्ता कां अवलम्बन कर, वन्य-पशुओं कां वधकरे तोँ वो क्षम्य हौ सकता हैं मगर आप्.? आपको क्षुधा लगने पऱ मणि-मुक्ताओं कि थालियां मिल सकती हें। निद्रा लगने पऱ पुष्पशैया प्रस्तुत हौ सकती हैं, प्यास लगने पर्र सुधारस भि मिल सकता हैं—यदि आप् ऐसा घृणित कार्य सिर्फ अपनेहेय मनोरंजन कि पूर्ति केँ लिए करें तोँ वो क्षम्य नहि हौ सकताकभी नहि होँ सकता युवराज.। '
'युवराज नारिकेल तुम्हारी इन अभद्र एवं धृष्ट बातों कां उत्तर कृपाण सें देना चाहते हें सावधान !' युवराज नें कटिप्रदेश सें लटकती हुइ अपनी कृपाण खींचली।
'मे प्रसन्न हूं.युवराज कों विदित हौ कि पर्णिक कि माता नें उसे मरना सिखाया हैं, जीना नहि.। '
दोनों विकट प्रतिद्वन्द्रियों केँ कृपाण झन्न सें एक्-दूसरे सें जा टकराये। नीरव वनस्थली कृपाणों कि भयावनी झंकार सें झंकृत हौ उठी-झन्न! ! ! पास केँ वृक्षों पऱ बैठेहुए पक्षिगण पंख फड़फड़ाकर दूरउड़ चले। वायु केँ प्रबल वेग सें कांपकर एकाएक पत्तियां निश्चल हौ गयीं। दानवाकार मेघों केँ लुट जाने सें भुवनभास्कर कां देदीप्यमान मुखमंडल चमचमा उठा औऱ वे प्रज्जवलित नेत्रों द्वारा उन दोनों समवयस्क युवकों कां वो अद्भुत द्वन्द्व देखने लगे।
स्वर्णिम किरणों केँ पड़ने सें दोनों केँ स्वेदाच्छन्न मुख अतीव प्रभावशाली दृष्टिगोचर हौ रहे थें।
'परिहास नहि हैं.पर्णिक पऱ विजय पाना, परिहास नहि युवराज। ' पर्णिक कां कृपाण तीव्र वेग सें युवराज पऱ प्रहार करने कों लपका। युवराज नें पैंतरा बदला, जरा-सां झुके औऱ विद्युत जैसी चपलता केँ संग उन्होंने पर्णिक कां बार विफलकर दिया।
"अब तुम् बचना किरात युवक !' युवराज नें अपने कृपाण कां भरपूर दांव पर्णिक पऱ चलाया, मगर आश्चर्य कि वो वीर किरात पुत्र उस अचूक लक्ष्य सें परेजा रहा, सिर्फ उसके मणिबंध पर्र जरा-सि खरोंच आँ गई।
"तुम् अद्भुत हौ किरातकुमार!' युवराज आश्चर्यचकित होँ उठे—'नहि तोँ तुम्हारे मणिबंध पर्र लगाहुआ वो तनिक-सां घाव तुम्हारे वक्ष पर्र होता!' विकराल रूप धारण कियेहुए युवराज नें पणिक केँ वार कां प्रत्युत्तर दिया—मुझे आश्चर्य हैं—घोर आश्चर्य हैं कि इस बन्य-प्रदेश मे रहतेहुए, कितना अच्छा शस्त्र संचालन तुमने किस प्रकार सीखा!'
'ये मेरी माताजी कि कृपा हैं, युवराज ! उन्होंने हि मुझे शस्त्र संचालन कि शिक्षा दि हैं.। ' 'धन्य हैं तुम्हारी माताजी.!' 'मात्र मेरी हि माता नहि, अवनी कि माता, संसार केँ प्रत्येक प्राणी कि माता होने योग्य हें वे.आप् अप्रतिम होतेजा रहे हें युवराज.! युद्ध मे शिथिलता प्राणघातक होँ सकती हैं। '
पर्णिक कों आश्चर्य हुआये देखकर कि युवराज कि शस्त्र-संचालन गति धीमी पड़ती जारही हैं औऱ बहोत सम्भव थां कि पर्णिक कां कृपाण उन पऱ संघातिक आक्रमण कर बैठता.कि सहसा पर्णिक कि दृष्टि युवराज केँ मस्तक केँ घाव पऱ जा पड़ी।
इस टाइम भि उसघाव सें रक्तस्राव होँ रहा थां। युवराज कि शक्ति भि क्षीण होतीजा रही थि। क्रमश: उन पऱ अचैतन्यता केँ लक्षण स्पष्ट दीख पड़ने लगे औऱ कुछ हि क्षणों केँ पश्चात् वे अर्धमूच्छित होकर भूमि पऱ गिर पड़े। पर्णिक नें दौड़कर उन्हें उठाया— 'युवराज.!' औऱ अब पर्णिक नें युवराज केँ मस्तक कां वो भयंकर घाव देखा।
युवराज केँ नेत्र धीरे-धीरे सें खुले। मुंह सें क्षीण स्वर निकला-'मेरी चिंता न् करो, पर्णिक.तुम्हारी माता इंतजार कररही होंगी। अब मे ठीक हूं। '
'मुझेआशा हैं कि श्रीयुवराज मुझे ज़रूर माफ़कर देंगे। ' पर्णिक नें कहा।
युवराज नें स्वीकृति मे मात्र अपना मस्तक हिला दिया। 'पर्णिक ! मुझे सहारा देकर घोड़े पर्र बैठा दो.औऱतब तुम् जा सकते होँ.। ' युवराज बोले।
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