Romance कुमकुम completee - Yuvaraj Ki Kahani – New Episode
चक्रवाल नें किन्नरी कि ओर संकेत करकहा। 'क्यूं नहि.? ज़रूर अवलोकन करूंगा। कलामयी सुन्दरी! तुम् अपना अपूर्व नर्तन आरंभकरो। '
कटिप्रदेश पऱ किंचित बल देकर सुंदरी निहारिका उठ खड़ी हुइ। उसके नूपुर बज उठे-छम छम!
चक्रवाल नें अपनी वीणाहाथ मे ली। उसकी अभ्यस्त अंगुलियां अविराम गति सें वीणा केँ तारों पर्र नृत्य करनेलगी।।
मुग्धकारी स्वर वीणा केँ तारों सें प्रवाहित होकर नपुर ध्वनि कां आलिंगन करनेलगा। दोनों स्वरों केँ सम्मिश्रण सें प्रकृति निस्तब्ध, निश्चल होँ उठी।
वे दोनों श्रेष्ठतम कलाकार अपनी-अपनी कला मे पूर्णतया तन्मय होँ गए। चक्रवाल अपनी वीणा पऱ एक् गीत बजाने लगा। किन्नरी केँ नपुरउस गीत कां अनुसरण कर अबाध, लेकिन मंथरगति सें गुंजरित होनेलगे।
किन्नरी कां बल खाताहुआ ललितांग जिस्म युवराज केँ सन्निकट कभी इतस्तत: नर्तन करतारहा।
युवराज मंत्र-मुग्ध दृष्टि सें उस अपूर्व नृत्य कां अवलोकन करतेरहे। उस युवती किन्नरी कि प्रतिभा अपर्व थि, अनुपमेय थि। सुंदरी निहारिका कां वो कलापूर्ण नर्तन मानो राजोद्यान कि विलासमयी भूमि पऱ नहि, वरन युवराज केँ हृदय प्रदेश पऱ होँ रहा हौ।
तन्मयता सें नृत्य अवलोकन कररहे थें वे। वीणा कि मधुर झंकार केँ संग चक्रवाल कि स्वर लहरी अलापउठी
जौ केलि कुंज मे तुमको कंकड़ी उन्होंने मारी। क्याँ कसकरही वो अब भि तेरेउर मे सुकुमारी।। निहारिका कांप उठी—युवराज विचलित होँ उठे।
चक्रवाल कां वो गायन सुनकर किन्नरी कों लगा, जैसे वो उस गायन कां भाव अपने नृत्य द्वारा व्यक्त करने मे सर्वथा असमर्थ हैं।
युवराज चिल्ला उठे—'चक्रवाल !' परन्तु चक्रवाल तन्मय थां। उसकी स्वर-रागिनी मे तनिक भि शिथिलता नं आई। वो गाता हि रहा। निहारिका नें एक् क्षण मे हि अपनी भंगिमा ठीककर ली। उसके अंग-प्रत्यंग पूर्ववत गायन कां भाव व्यक्त करनेलगे।
उसने पहले उद्यान केँ सघन निकुंज कि ओर अपनी तर्जनी द्वारा संकेत किया, फिन कलापूर्ण गति सें झुककर भूम पर्र सें एक् कंकड़ी उठाली औऱ उसे सामने कि ओर फेंका-पश्चात तीव्र गति सें आह भरती हुई वो भूमि पर्र बैठ गई, मानो वो कंकड़ी उसी कों आकरलगी हौ। इस प्रकार उसने जोँ केलिकुंज मे तुमको, कंकड़ी उन्होंने मारी—कां भाव प्रदर्शित किया। गायनएवं नर्तन रुक गय़ा—तीव्र गति सें जाम्बुक कों दौड़ा आतेहुए देखकर।
उसे घबराई हुइ भंगिमा सें आताहुआ देखकर युवराज कों कुछ शंका हुईँ। उन्होंने पूछा- क्याँ हैं चम्बुक?'
जाम्बुक नें उंगली सें एक् ओर संकेत किया। उसी वक्तसभी चौंक पड़ेये देखकर कि राजोद्यान केँ मुख्य दरवाज़ा सें महापुजारी कि उन मूर्ति इधर हि अग्रसर होती आँ रही हैं।
महापुजारी आकरउन लोगों केँ समक्ष खड़े हौ गये। युवराज नें उनकेचरण स्पर्श किये। महापुजारी नें तीक्ष्ण दृष्टि सें युवराज केँ नेत्रों मे देखा औऱ गांभीर स्वर मे शुभाशीर्वाद दिया। एक् क्षण सन्नाटा रहा।
'तुम् लोगजाओ.। ' महापुजारी नें किन्नरी, चक्रवाल तथा जाम्बुक कों आज्ञा दि तीनों आशंकित हृदय सें चलेगये।
'बैठिये श्रीयुवराज। ' महापुजारी उस स्फटिक-शिला पऱ बैठतहुए बोले।
युवराज कां हृदय धड़कउठा।
'श्रीयुवराज.। ' महापुजारी कि वाणी मे तीव्रता थि।
'आज्ञा देव.। '
'क्याँ होँ रहा थां यहां.?'
'कुछ भि तौ नहि महापुजारी जी। ' युवराज नें संयत वाणी मे उत्तर दिया।
'कुछ नहि.? आप् कहते हें कि कुछ नहि हौ रहा थां?' महापुजारी कां स्वर उत्तरोत्तर तीन होताजा रहा थां—'चन्द्रछटा परिपूरित रात्रि मे कुमुदिनी कां प्रस्फुटित श्वेतांग देखकर, प्रकृति देवी कां ये अद्भुत सृजन अवलोकन कर, मन स्वभवत: चलायमान होँ जाता हैं.मे पूछता हूं आपसे श्रीयुवराज कि यहांकिस प्रलय कि सृष्टि कि जारही थि.?'
'महापुजारी जी !'
'मे स्पष्ट उत्तर चाहता हूं.नहि तोँ मुझे श्रीसम्राट केँ समक्ष येबात प्रकट करनी पड़ेगी। '
'पापा केँ समक्ष.! क्यूं.? क्याँ आप् ये समझते हें कि महापुजारी जी कि आप् मेरेकोई नहि हें? क्याँ आप् मेरे पिता तुल्य नहि? क्याँ आपको मुझेदंड देने कां अधिकार नहि? क्याँ आपकी आज्ञा कि अवहेलना करने कि शक्ति मुझमें हैं.? महापुजारी जी! आपका प्रोज्जवल हृदयआज ऐसे मलीन विचारों कों केसेजगह देरहा हैं.? स्पष्ट कहिये, यदि मुझसे कोई अपराध हुआ होँ तोँ मुझे दंडाज्ञा दीजिये, मे दंडाज्ञा स्वीकार करने कों प्रस्तुत हूं। '
'वत्स.!' एकाएक महापुजारी जी कां स्वर शांत हौ गय़ा—'तुम्हें अपनी प्रतिष्ठा कां ध्यान रखना परमावश्यक हैं, तुम् जम्बूद्वीप केँ भावी सम्राट होगे-तुम्हें अपने किसी कार्य सें, अपनेत हौ रहा थां ?' प्रस्फुटित श्वेतांग हैं। मे किसी आचरण सें प्रजा कों उंगली उठाने कां अवसर नहि देना चाहिए। देखरहे हौ, स्वच्छाकाश पऱ विचरण करतेहुए उस चन्द्र कों.? इतनाधवल होतेहुए भि क्याँ कलंक सें बचसका हैं वो? मनुष्य कां हृदय दुर्बल होता हैं, तनिक-सां फिसल पड़ने पर्र जन्मपर्यन्त केँ लिए कलंकलग जाता हैं। आज सें तुम् सावधान रहना.आओ मेरेसंग.। '
महापुजारी घूम पड़े। युवराज नें उनका अनुसरण किया।
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चारू-चन्द्रिका भि बादलों कि ओट मे छिप गई। कुमुदिनी नें अपने नेत्र बंदकर लिए। पल्लव विकलता सें हिल पड़े।
बाह प्रकम्पित होँ तीव्र गति सें प्रवाहित होँ उठी, डाल पऱ बैठी हुईँ कोयल करुण-स्वर मे कूकउठी।
सात मनोहर बनस्थली केँ कोड़ मे रहने वाले किरात एक् सघन पर्कटी वृक्ष केँ नीचे वार्तालाप करने मे तल्लीन थें।
ईश्वर अंशुमालि कि आखिरी किरण-राशि अब भि इतस्तत: गगनचुम्बी वृक्षों कि चोटियों पऱ नृत्य कररही थीं। साध्य-समीर मृदुल गति सें हिलोरें लें रहा थां।
क्लांत पक्षीगण अपने नीड़ों कि ओर मधुर कलरव करतेहुए तीव्र वेग सें उड़ेजा रहे थें। 'भइया!ऐसा नायक किरात-समुदाय केँ विगत इतिहास मे सहस्रों वर्षों मे नहि हुआ। एक् किरात कहरहा थां—'पणिक नें नायकत्व कां कार्य जिस योग्यतापूर्ण विधि सें संचालित किया हैं, वो सर्वथा स्तुत्य हैं—जितनी प्रशंसा उसकी कि जाये थोड़ी हैं.। '
'इतनी छोटी अवस्था मे इतनी योग्यता, मे तोँ इसे देवी वरदान हि कहूंगा। ' एक् वृद्ध नें कहा।
"हमनेइन दोनों माता-पुत्रों पर्र बहोत अन्याय किया थां— मगरआज उनकेलिए पश्चाताप हौ रहा हैं, पणिक कि योग्यता देखकर। नहि मालूम थां कि संसार सें ठुकराई एक् अभागिन कां पुत्र आजइस प्रकार हमारा नायकत्व करेगा। '
'उसके नायक होते हि, देखो नं कितना आश्चर्यचकित परिवर्तन हौ गय़ा हैं हममें औऱ समस्त किरात समुदाय मे। उसने मानो हमारे जर्जर एवं मृतप्राय जिस्म मे उष्ण रक्त संचारित कर दिया हैं
- नवस्फूर्ति भर दि हैं। '
'पहले हममें सें कितने ऐसे थें जोँ शस्त्र-संचालन पूर्ण रूप सें नहि जानते थें.आज पर्णिक कि कृपा सें हम् लोगों नें भली प्रकार अस्त्रविद्या सीखली हैं। हम् लोग भली-भाति शत्रु सें अपनी रक्षा करने मे समर्थ होँ गए हें.पर्णिक कि माता नें हि अपनी बर्ताव-कुशलता सें हमें इतना साहसी बनाया हैं। ज़रूर वो कोई स्वर्गीय देवी हैं। '
क्रमश: संध्या कां आगमन होनेलगा थां। संग हि उदय होतेहुए ईश्वर मरीचिमाली कि शुभ ज्योत्सना, वन प्रदेश पऱ बिखरने लगी। किरात-समुदाय केँ सब शख्स-आबाल-वृद्ध-उस स्थल पर्र जानेलगे। नित्य संध्या कों सभीलोग वहां एकत्र होते थें औऱ विविध विषयों पर्र वार्तालाप करते थें।
नायक पर्णिक होँ आतेहुए दोकरसभी लोगउठ खड़ेहुए। पर्णिक एक् प्रशस्त शिलाखंड पर्र आकरबैठ गय़ा।
बहोत वक्त तक वार्तालाप होतारहा।
अन्त मे दो प्रहर रात्रि व्यतीत होने केँ पश्चात् जब वो अपने झोंपड़े केँ दरवाज़ा पऱ पहुँचा तौ देखा कि उसकी माता भूमि पऱ पड़ी खिसकरही हैं।
दीपक कि ज्योति मे उसकी माता केँ नेत्रों सें अश्नु बिन्दुओं कां निस्सरण स्पष्टतया दृष्टिगोचर होँ रहा थां।
संग हि पर्णिक केँ उत्सुक नेत्रों नें देखा कि उसकी माता कोईहाथ मे कोई प्रकाशमान वस्तु हें। पर्णिक घबराया हुआ झोपड़े केँ भीतर आया—'माता! उसने पुकारा। '
उसकी माता चौंक पड़ी, उसका स्वर सुनकर।
उन्होंने शीघ्रतापूर्वक अपने अंचल मे उस वस्तु कों छिपा लिया औऱ नेत्रों सें प्रवाहित अश्रुकणों कों पोंछती हुईँ बोलि-'आओ वत्स। '
'तुम् रो क्यूं रही हौ माताजी?' पर्णिक उनकेपास बैठ गय़ा—'तुम्हें ऐसी कौन-सि व्यथा, ऐसी कौन-सि वेदना, ऐसा कौन-सां दुख हैं- जिससे तुम् सदैव व्यथित रहा करती हौ? वो कौन-सि अप्रकट पीड़ा हैं जिसे तुम् अपने पुत्र सें भि कहने सें संकोच कररही हौ? कहो, मे तुम्हारे सुख केँ लिएसभी कुछकर सकता हूं, माताजी। यदि मेरे जीवनोत्सर्ग सें तुम्हें शांति मिलसके तौ मे सहर्ष अपने जिंदगी कों तुम्हारे चरण-कमलों पर्र उत्सर्ग कर दंगा। जिसने अपने रक्त मांस सें मेरा पालन-पोषण किया, जिसने दुरूह यातनायें सहनकर मेरी रक्षा कि, जिसने अनादर औऱ अपमान झेला—मात्र मेरेहेत, ऐसी जननी केँ लिएकोई भि वस्तु अदेय नहि हौ सकती। माताजी, परीक्षा कां वक्त हैं-मातृ ऋण केँ उऋण होने कां अवसरदो, आज्ञा दो माताजी!'
'मुझेकोई भि दुख, कोई भि व्यथा नहि हैं, वत्स.। '
'माता! दुख हैं कि आज तक तुमने मुझे अपना पूर्व इतिहास नहि बताया, इस टाइम अपनेदुख कां कारण भि नहि बतारही होँ, पुत्र पर्र ये अविश्वास क्यूं?'
'अविश्वास!'
'अविश्वास हि तौ हैं। तभी तौ तुमने मुझे देखते हि जाने कौन-सि वस्तु आंचल मे छिपाली हैं। '
उसकी माता चौंक पड़ी।
'माताजी! जिस पावन आंचल मे अब तक पर्णिक नें क्रीड़ा कि हैं, उसकाजगह पाने वाली वस्तु ज़रूर मुझसे भि प्रिय हैं.मुझे बताओ माताजी। वो कौन-सि वस्तु हैं। कोईबात मुझसे गोपनीय रखकर मुझे असीम वेदना सें विदग्ध न् करो। '
'वो कुछ नहि हैं, पर्णिकं'
'कुछ क्यूं नहि हैं, माताजी। वो बहोत कुछ हैं, तभी पर्णिक सें भि ज्यादा उसकाआदर हैं उसका सम्मान हैं। ' पर्णिक अपनी माता केँ सन्निकट आँ रहा हैं—'मे उस वस्तु कों ज़रूर देखंगा.। ' औऱ उसने हठपूर्वक माता केँ आंचल सें वो वस्तु निकाल ली।
वो थां रत्नहार, जिसकी देदीप्यमान प्रभाव उस छोटे सें झोंपडे कों आलोकित कररही थि।
'रत्नहार.। ' चौंक पड़ा पर्णिक—'माताजी! ये मूल्यवान रत्नहार तुमने कहां सें पाया?इस जर्जर झोंपड़े सें येअगम वैभव कहां सें टपक पड़ा.?'
पर्णिक कि माता केँ नेत्रों सें प्रेमाश्रु प्रवाहित होँ चले—'वत्स! इस पवित्र रत्नहार कों प्रणाम करो। ' उन्होंने कहा।
पर्णिक नें उसे मस्तक सें लगाया। 'ये कहां सें आया माताजी.?' उसने पूछा।
उसकी माता कुछ नं बोलि, सिर्फ पर्णिक केँ हाथ सें वो हार लेकर यत्नपूर्वक यथास्थान रख दिया।
तुम्हें कौन-सि वेदना कष्टदे रही हैं माताजी ?'
'जानेदो वत्स!चलो भोजनकर लो। '
'केसे भोजनकर लूं माताजी। तुम् चिंता मे विदग्ध होतीरहो औऱ मे क्षुधा शांत करूं? पहले मे तुम्हारी चिंता शांत करूंगा। '
'वो तौ चिता पऱ हि शांत होगी, पर्णिक' 'नायक!'तभी कुटिया केँ दरवाज़ा पऱ सें किसी नें पुकारा। पर्णिक त्वरित वेग सें बाहर् आया। देखा, एक् वृद्ध किरात खड़ा थां।
'क्याँ हैं.? हैं क्याँ पितृव्य.?' उसने पूछा।
'पुत्र! सीमांत सें दुर्मुख एक् आवश्यक समाचार लेकरआया हैं। सभीलोग एकत्र हें, तुम् भि चलो.। '
'आवश्यक कार्य हैं.?'
'हां, अत्यंत आवश्यक.। ' वृद्ध किरात नें कहा।
'मे चलता हूं। ' पर्णिक बोला—'माताजी! कोई महत्त्वपूर्ण आवश्यक समाचार हैं। मुझे जाने कि आज्ञा दो। '
"जाओ वत्स.। ' माता नें कहा। पर्णिक नें झुककर उनकेचरण छुए। पुन: उस वृद्ध किरात केँ संगउस ओरचल पड़ा, जहां किरात समुदाय उत्सुक नेत्रों सें उसकी इंतज़ार कररहा थां।
सब केँ नेत्रों पऱ आसन्न भय केँ लक्षण स्पष्टतया दृष्टिगोचर होँ रहे थें। पर्णिक केँ आते हि सभीउठ खड़ेहुए। पर्णिक नें निराक्षणात्मक दृष्टि सें चारों ओर देखा-देखा उसने, सबकेमुख पऱ आतंक व्याप्त हैं।
'कहां हैं दुर्मुख?' उसने एक् प्रस्तर-शिला पर्र बैठते हुए पूछा।
एक् किरात युवक नें आदरसहित आकर अभिवादन किया। 'तुम् अभि सीमांत सें आँ रहे हौ?
'जीहां.। '
'क्याँ समाचार लाये होँ?' दुर्मुख नें अधरोष्ठ पर्र जीभ फेरते हुए कहा—'खटबांग कि घाटी (खैबरपास) केँ उसपार, एक् सेना आँ पहुंची हैं। सम्भव हैं कि जल्दी हि वो हम् पर्र आक्रमण करदे। '
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'किसकी सेना हैं वो?'
'सुना हैं कि मध्य अशांत महाद्वीप (एशिया) सें आर्य सम्राट तिरमांशु अपनी सेना लेकरदेश विजय करने निकले हैं। वही हौ सकते हें।
'इस प्रकार अनायास आक्रमण करने कां तात्पर्य?'
'ये तौ वही जानें, परन्तु गुप्त-रीति सें पता लगाने पर्र ज्ञात हुआ हैं कि आर्य जाति केँ रहने केँ लिए मध्य अशांत महाद्वीप मे जगह कि कमी हैं। अबवे देश-विदेश मे अपना विस्तार चाहते हें।
'वो किस प्रकार?'
'देश विजय करकेवे उन देशों मे अपनी जाति कों बसायेंगे एवं अपनी सभ्यता तथा संस्कृति कां प्रसार करेंगे, यही उनकी आकांक्षा हैं। '
"परन्तु ये तौ न्यायसंगत आक्रमण नहि हैं। '
'बिनाबल प्रयोग केँ किसीनये धर्मएवं नई संस्कृति कां कां प्रसार नहि होता, नायक महोदय !' दुर्मुख नें कहा—'ये समाचार इतना महत्त्वपूर्ण थां कि इसे आपकेपास अति जल्दी पहचाना आवश्यक थां। अब आप् हि निर्णय करें कि इस विकट परिस्थिति मे हमारा क्याँ कर्तव्य होना चाहिये?'
'हमारा कर्तव्य.?' पर्णिक दुर्दमनीय विचारों मे निमग्न हौ गय़ा। उपस्थित किरात-समुदाय मे आहिस्ता कानाफूसी होनेलगी।
'ये समाचार जल्दी हि द्रविड़राज केँ पास पहुंचाया जानां चाहिए.। ' एक् नें नम्र निवेदन किया।
'राजनगर पुष्पपुर यहां सें सोलह योजनदूर हैं—यदि जल्दी हि किसी कों नं भेजा गय़ा तोँ अनर्थ कि संभावना हैं। "
'जब तक पुष्पपुर समाचार भेजा जायेगा, तब तक तौ उनकी सेना खटवांग कि घाटीपार कर हमारे प्रांत मे पहुंच जायेगी औऱ हमारा निवास जगह नष्ट-भ्रष्ट कर देगी। ' एक् दूसरे नें कहा।
'क्याँ खट्वांग जैसी दुरूह घाटीवे इतनी शीघ्रता सें पारकर लेंगे.?' पहले नें पूछा।
"पुष्पपुर समाचार भेजने कि कोई आवश्यकता नहि.।
' तीसरे नें कहा-'द्रविड़राज कों अपने गुप्तचरों द्वारा अब तक ये समाचार मिल गय़ा होगा, अथवा तुरंत हि मिल जायेगा। समाचार मिलते हि द्रविड़राज स्वदेश-रक्षा कां कोई उपाय करेंगे तोँ, तब तक.। '
"तब तक.। ' पर्णिक उच्च-स्वर मे बोला—'हमें हि स्वदेश रक्षा कां भार ग्रहण करना होगा। भाइयों ! इस विषय पऱ अच्छी तरह विचार करने केँ पश्चात् मे इस परिणाम पऱ पहुँचा हूं। कि ऐसी परिस्थिति मे स्वदेश-रक्षा कां पूर्ण दायित्व हम् पर्र हैं। यदि हम् अपने समुदाय कि पूरी शक्ति कां प्रयोग करे तौ आर्य सम्राट कि सेना कों हम् पर्याप्त वक्त तक रोक सकते हें। '
'ठीक हैं.। ' कई किरात एक् संगबोल उठे।
'तौ प्रस्तुत होँ जाओ अपना रक्तदान करने केँ लिए। आज समरांगनण रक्तपिपासु दृष्टि सें हमारी ओरदेख रहा हैं। बलि होना हैं तोँ स्वदेश पऱ बलि होँ। मरना हैं तोँ अपनीआन पऱ मर मिटो.चलो। हमारे समुदाय मे जितने नवयुवक हें, सब शस्त्र सज्जित हौ जायें। कल प्रात:काल हम् लोग प्रस्थान करेंगे.।
पर्णिक कि बीरतापूर्ण ललकार नें किरात-युवकों मे नव चेतना प्रवाहित कर दि।
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"ऐसा न् बोलो माताजी। ' पर्णिक नें अपनी माता केँ चरण पकड़ लिये—'मेरे हृदय मे स्वदेश रक्षा कि भावना प्रबल होँ उठी हैं। इतने दिनों तक मेरी नस-नस मे वीरता कां संचार कर, तुम् अब चाहती हौ कि मे कायर बनकर देशद्रोहिता कां कलंक अपनेभाल पऱ लगालूं। मेरे हृदय मे उठी उमंग पर्र पानी केँ छींटे मारकर ठंडा न् करोमा। एक् वीरमाता केँ समान मुझे युद्ध क्षेत्र मे जाने कि अनुमति दो.दोन माताजी.। ' __
'वत्स! केसे आज्ञा दं तुम्हें? आज तक जिसे एक् क्षण केँ लिए भि नेत्रों कि ओट न् किया, उसे केसे समरभूमि मे जाने कों कों सकती हूं। पर्णिक! मतजाओ। मतजाओ वत्स। युद्धभूमि कि भीषणता सहन करना परिहास नहि। '
'माताजी! आजजब परीक्षा कां वक्तआया हैं तौ दुरूह यातनाओं कां स्मरण दिलाकर मुझे पथविमुख करना चाहती होँ? जिसेआज तक तुमने वीरतापूर्ण गाथायें सुनाकर मरने-मारने कां उपदेश दियाउसे आज तुम् कायरता केँ संग जीने कां उपदेश देरही हौ, माताजी! आज क्याँ होँ गय़ा हैं तुम्हें.? मुझे जाने कि आज्ञा दो, मैंने समस्त समुदाय कों प्रात:काल प्रस्तुत रहने कि आज्ञा दे दि हैं। '
'तौ जाओ पार्णिक, मुझे ज्यादा दुख न् दो। '
पर्णिक पर्र वज्रगिर पड़ा—'ओह! क्याँ उसकी बातें तथ्यहीन हें? यदि नहि तोँ माता दुखी क्यूं हौ गई?'
पर्णिक कों महान ग्लानि हुइ। वो चिंताग्रस्त होँ कुटिया केँ एक् कोने मे जाकरपड़ रहा।
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"ऐसी आज्ञा क्यूं देरहे होँ नायक.?'उस वृद्ध किरात नें कहा-'आज देश पर्र विपत्ति केँ बादल गहरारहे हें, एक् विदेशी हमें पददालित करना चाहता हैं, ये देखते हुए भि तुम् मौन होकरबैठ जानां चाहते हौ?'
'क्याँ करूं? माताजी कि आज्ञा.। ' पर्णिक कां मस्तक सरम सें झुक गय़ा।
'कहां गय़ा वो तुम्हारा सारा गर्व.?' भूतपूर्व नायक केँ पुत्र कां तीव्र स्वर गर्जन करउठा —'कहां गय़ा वो तुम्हारा पराक्रम? कहां गई वो तुम्हारी अनोखी डींग? मेरी माताजी देवी हें, पूजनीय हैं? अपनी माता कों वीर प्रसविनी कहते थें.? उसी केँ गुणगान मे अहर्निश तल्लीन रहते थें? धिक्कार हैं ऐसी कायर माता कि संतान पर्र। '
'चुपरहो.! चुपरहो नहि तौ.। '
'हां-हां बंदकर दो मेरामुख, काटदो मेरीजीभ। तुम्हारे पास शक्ति हैं। पराक्रम हैं न्। निर्बलों पऱ हि अपनी शक्ति कां प्रयोग करना तुम्हारी माता नें सिखाया हैं। क्याँ असहायों पर्र हि शस्त्र कां बल प्रयोग करना तुमने वीरता समझरखी हैं? धिक्कार हैं तुम्हारी माता केँ इस आचरण पर्र औऱ तुम्हारे जैसे कायरएवं अंध मातृ-भक्त पर्र। '
".' पर्णिक नें दोनों हाथों सें अपनेकान बंदकर लिए।
'तुम्हारी माता नें तुम्हें योग्य बनाया, तुम्हारी माता नें तुम्हें शस्त्र संचालन सिखाया, तुम्हारी माता नें तुम्हें अतुलित शक्ति प्रदान कि.परन्तु आज वहीं तुम्हारी माता देश पऱ विपत्ति केँ वक्त भीरुता कां पथ ग्रहण कररही हें आज वहीं तुम्हें पथ विमुख कररही हें, ऐसे वक्त जबकि तुम् समरांगण मे अपनीबलि देकर सदैव केँ लिए अपवनी औऱ अपनी माता कि कीर्ति कौमुदी उज्जवल कर सकते होँ.। तुम् वीर हौ, बलशाली हौ, निर्बलों एवं असहायों पऱ अपने प्रज्ज्वलित नेत्रों सें गुस्सा कि वर्षा कर सकते हौ—अपनी माता कि आज्ञा केँ विरुद्ध एक् भि कार्य नहि कर सकते हौ तुममें इतनी बुद्धि, इतनी शक्ति नहि कि देश कि संकटापन्न स्थिति मे तुम् अपनी माता कि अवहेलना कर सको.तुम् नपुंसक हौ, कायर हौ, भीरू होँ.। '
नायक-पुत्र कि व्यंग्यपूर्ण बातों सें घबराकर पर्णिक अपनी माता केँ पास भागा। 'मुझे आज्ञा दो माताजी!' पर्णिक केँ नेत्रों मे अश्रुबिन्दु झलकआये थें। वो मातृ-भक्त वास्तव मे बिना अपनी माता कि आज्ञा पायकुछ भि कर सकने मे असमर्थ थां—'देखो माताजी! तनिक दृष्टि उठाकर आज किरात समुदाय कि ओर देखो। सब तुम् पर्र वाक् वाणों कि वर्षा कररहे हें। '
'करनेदो वत्स ! दुख मे हि तौ हमारा जिंदगी प्रस्फुटित हुआ हैं। '
'परन्तु तनिक अपने कर्तव्य पऱ ध्यान दो माताजी! वीर प्रसविनी होकर अपने पुत्र कों भीरूता कि गोद मे समर्पित कर देना अन्याय होगा। तुम् विचार भि नहि कर सकीं कि इस टाइम मेरे हृदय मे तुम्हारी भीरूता नें कितना दारुण हंगामा मचारखा हैं। मे जलरहा हैं कि मेरी माता कां वीर हृदय नहि, वरन् एक् अनाथिनी कां कायर हृदयबोल रहा हैं। मैंने ऐसा नहि समझा थां। '
'वत्स.!'
'मुझे आज्ञा दो माता जी। ' पर्णिक नें माता केँ समक्ष घुटने टेक दिये।
विवश होकर माता नें प्रेमपूर्वक उसके मस्तक पर्र अपनाहाथ रख दिया। तत्पश्चात् आंचल मे सें वही रत्नहार निकालकर उसकेगले मे डाल दिया—'जाओ वत्स.!ये अपनी अमूल्य निधि, ये पवित्र रत्नहार मे तुम्हें प्रदान करती हूं। ये कल्याणकारी हैं। इसे बहोत हि यत्नपूर्वक रखना। एक् क्षण केँ लिए भि इसे अपने सें विलग न् करना, नहि तौ अनिष्ट होगा। '
पर्णिक नें माता कि चरण-धूलि मस्तक सें लगाई।
पुन: गर्दन मे पड़ेहुए उस अमूल्य रत्नहार कों मन-हि-मन प्रणाम किया औऱ उत्साह सें भरकर शीघ्रतापूर्वक उसओरचल पड़ा, जिधरदस सहस शस्त्रधारी किरात-युवक खड़े उसकी इंतज़ार कररहे थें।
पर्णिक कों देखकर सबने जयघोष किया। तुरंत हि वो किरात सेना, तीव्रगति सें खट्वांग घाटी कि ओर अग्रसर हुई।
पर्णिक कि माता झोंपड़े केँ दरवाज़ा पऱ उन वीरों कां पद-संचालन तब तक देखती रही, जब तक कि सघन वनस्थली नें उन मदमस्त युवकों कों अपने अंचल मे छिपा नहि लिया।
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