कितनी सैक्सी हो तुम complete - Beti Nahi Beta - Complete Kahani All Parts
कितनी सैक्सी हौ तुम् --1
आज सें मेरे बेटे कां नामकरण पड़ गय़ा। कई दिनों सें नामकरण संस्कार कि तैयारियों मे पूरा परिवार व्यस्त थां। किसी केँ पास सांस लेनेभर कि फुर्सत नहि थि। परन्तु अबसबकुछ आराम करना चाहते थें।
सारे मेहमान भि जानेलगे थें। मे भि करण कों अपनी गोदी मे लेकर अपने कमरे मे आँ गई।
मेरे पति आशीषआज बहोत हि खुश थें। आखिर विवाह केँ लगभग 9 सालबाद उनकोये दिन देख्ना नसीबहुआ थां।
वैसे भि हम् दोनों हि नहि घऱ मे सब मेरे सासू ससुरजी, मां पिताजी औऱ ननदीसब तौ इसीदिन केँ लियेपता नहि कितनी दुआयें माँगरहे थें। करण मेरे बराबर मे सोरहा थां।
आशीष बहोत खुश थें, मेहमानों केँ जाने केँ बाद आशीष हि पूरा बचा-खुचा काम पूरा कराने मे लगेहुए थें। परन्तु आज आशीष शायद स्वयं अपने हाथों सें सबकुछ करना चाहते थें। आखिरआज उनके बेटे कां नामकरण संस्कार हुआ थां। उनकी खुशी देखते हि बनती थि।
पूराकाम निपटाकर आशीष कमरे मे आये औऱ मुझे बाहों मे भरकरचूम लिया। फिर भी मेरी प्रतिक्रिया मिली जुली थि क्योंकि मे बहोत थकी हुइ थि पर्र आशीष कि खुशी तोँ मानों सातवें आसमान पर्र थि।
अन्दर सें तौ मे भि बहोत खुश थि आखिरअब मेरे माथे पऱ बांझपन कां कलंकमिट गय़ा थां।
बापू मेरी विवाह मे कोई कोर-कसर नहि रखना चाहते थें। मे उनकी इकलौती बेटी जौ हूं औऱ बापू नें अपनी सारी सरकारी जॉब मे इतनामाल बनाया थां कि खर्च करते नहि बनरहा थां।
हमारी शानो-शौकत देखने लायक थि, कम तौ आशीष कां परिवार भि नहि थां, आशीष दो-दो फैक्ट्री केँ मालिक थें देशभर मे उनका बिजनेस फैला थां।
चूंकि विवाह दो बड़े घरानों केँ बीच हौ रही थि इसीलिये शायद जयपुर क्याँ राजस्थान कि कोई बड़ीऐसी हस्ती नहि थि जौ मेरी विवाह मे शामिल नहि हुई।
मे तोँ बचपन सें हि बहोत सुन्दर थि औऱ आज विवाह वालीरात मुझे सजाने केँ लिये ब्यूटीपार्लर वाला ग्रुप मुम्बई सें आया थां।
उन्होंने मुझेऐसा सजाया कि देखने वालों कि नजरें बार-बार मुझ पर्र हि जम जाती।
आशीष भि बहोत सुन्दर लगरहे थें। 5 फुट 10 इंच लम्बाई केँ चौड़े सीने वाले आशीष किसी हीरो सें कम नहि लगरहे थें। देखने वालेकभी हम् दोनों कों राम-सीता कि जोड़ी बताते तोँ कभी राधा-कृष्ण कि।
विवाह केँ बाद मे मायके सें विदा होकर ससुराल मे आँ गई। मन मे अनेक प्रकार कि खुशियाँ घऱ करनेलगी थि। आशीष कों पाकर कों मे जैसे धन्य हि होँ गई थि। एक् लम्हा केँ लिये भि मुझे अपने 23 साल पुराने घऱ कों छोड़ने कां मलाल नहि थां।
मे तोँ आशीष केँ संग जिंदगी केँ हसीन ख्वाब संजों रही थि। मेरी विदाई केँ वक्त भि मां पिताजी सें खुशी-खुशी विदा लेकरआई।
ससुराल मे मेराऐसा स्वागत हुआ कि मे स्वयं कों किसी राजकुमारी सें कम नहि मानरही थि। राजकुमारी तौ मे थि भि, पिताजी नें मुझे हमेशा राजकुमारी कि तरह हि पाला थां। मे उनकी इकलौती संतान जौ थि, औऱ घऱ मे पैसे कां अथाह समुन्दर।
पर्र इसघऱ कां अहसास कुछ हि घंटों मे मुझे अपना सां लगनेलगा।
मे तोँ एक् दिन मे हि पिताजी कां घऱभूल गई। सारादिन रिश्तेदारों मे हंसी खुशी केसेबीत गय़ा पता हि नहि चला।
साम होते होते मुझे बहोत थकान होनेलगी। खानां भि सभी लोगों नें मिलकर हि खाया। अधिकतर रिश्तेदार भि अपने अपनेघऱ जा चुके थें। परिवार मे दूर केँ रिश्ते कि बहुओं औऱ मेरी ननदी नें मुझे नहाकर सजधजकर होने कों कहा।
मे भि उनकी आज्ञा मानकर नहाने चली गई। आशीष केँ रूम सें सटे बाथरूम सें नहाकर जैसे हि मे नहाकर जैसी हि मे बाहर् आई तोँ देखा कमरे कां दरवाजा बाहर् सें बंद थां।
मे समझ गई कि येसभी जानबूझ कर किया गय़ा हैं। मे खुशी-खुशी ड्रेसिंग केँ सामने खड़ी होकर अपनी हुस्न कों निहारती हुईँ हल्का सां मेकअप करनेलगी। आखिर बेवकूफ तोँ मे भि नहि थि। मुझे भि आभास थां कि आज कि रात मेरे लिये कितनी कीमती हैं।
मैंने नहाकर स्वयं कों बहोत अच्छे सें रेडी किया।
मे आशीष कों दुनिया कि सबसे रूपवान महिला दिखना चाहती थि। इसीलिये मैंने अपनी थ्री-पीस नाइटी निकला ली। टावल हटाकर तसल्ली सें अपनी कामुक जिस्म कों निहारा। मुझे स्वयं पऱ हि गर्व होनेलगा थां।
अब मे नाइटी पहनकर आशीष कां प्रतीक्षा करनेलगी। घड़ी कि टिक-टिक करतीसुई कि आवाज़ मेरेदिल कि धड़कन बढ़ारहा थि।
प्रतीक्षा कां एक्-एक् लम्हा एक्-एक् घंटे जैसाबीत रहा थां। घड़ी मे 10 बज चुके थें पऱ आशीष कि अभि तक कोईखबर नहि थि।
प्रतीक्षा करना बहोत मुश्किल थां पर्र घऱ मे पहलेदिन हि नाईटी पहनकर बाहर् भि तौ नहि जा सकती थि नां, इसीलिये बैठीरही।
टाइमपास करने केँ लिये टेलीविज़न चला लिया।
जी क्लासिक चैनल पर्र माधुरी दीक्षित कि फिल्म दयावान चलरही थि।
मुझेलगा येमुआ टेलीविज़न भि मेरा दुश्मन बन गय़ा हैं, फिल्म मे माधुरी औऱ विनोद खन्ना कां प्रणय द़श्य मेरेदिल पऱ बहोत हि सटीकवार करनेलगा।
मे अब आशीष केँ लिये बिल्कुल सजधजकर थि पऱ वोँ कम्बख्त अन्दर कमरे मे तोँ आये।
टेलीविज़न देखते देखते पता हि नहि चलाकब थकान मुझे पऱ हावी होँ गई औऱ मुझे नींद आँ गई।
अचानक मेरीआँख खुली मैंने देखा कि आशीष मुझे बहोत हि प्रेम सें हिलाकर पलंग पर्र हि सीधा करने कि कोशिश कररहे थें, वोँ बराबर इसबात कां भि ध्यान रखरहे थें कि मेरी नींद नाँ खुले।
पऱ मेरी नींद तौ खुल गई।
आशीष कों सामने देखकर मे तुरन्त उठी औऱ अपने कपड़े ठीक करनेलगी।
“सोजाओ, सोजाओ, जान… मुझेपता हैं तुम् बहोत थक गई होगीआज…” कहतेहुए आशीष मेरे बराबर मे लेटगये औऱ मेरासिर अपनी दांयी बाजू पऱ रखकर मुझे सुलाने कि कोशिश करनेलगे।
इतने प्रेम सें शायदकभी बचपन मे बापू नें मुझे सुलाया थां।
आशीष कां प्रथम स्पर्श सचमुच नैसर्गिक थां।
आशीष कां दांया हाथ मेरेसिर केँ नीचे थां औऱ बांया हाथ लगातार सिर केँ ऊपर सें मुझे सहलारहा थां। आशीष कां इतने प्रेम सें सहलाना मुझे बहोत अच्छा लगरहा थां।
कुछदेर तौ मे ऐसे हि लेटीरही, फिन मैंने पीछे मुड़कर आशीष कि तरफ देखा-‘ये क्याँ….!?! आशीष तोँ सो चुके थें। ’
नींद मे भि वोँ कितने मासूम औऱ प्यारे लगरहे थें, मे उनकी नींद खराब नहि करना चाहती थि इसीलिये वापस उनकीतरफ पीठ कि औऱ उनसे चिपककर सो गई।
सुभह मेरीआँख 6 बजे खुली तौ मैंने देखा मेरे मासूम सें पतिदेव अभि तक गहरी नींद मे थें।
मे एक् अच्छी बहू कि तरह उठते हि अपने बैडरूम सें सटे बाथरूम मे गई औऱ तुरन्त नहा धोकर सजधजकर होकर बाहर् सासू माँ-ससुरजी केँ पास पहुँची।
मेरी ससुरजी टेलीविज़न मे मार्निंग न्यूज देखरहे थें औऱ सासू मम्मी ससुरजी जी केँ लियेगरम चायबना रही थि।
घऱ कि नौकरानी भि काम पर्र लग चुकी थि।
मैंने सासू सें कहा- माँ जी, अगर आपको एतराज नाँ होँ तोँ मे आप् दोनों कों गरमचाय बनादूँ?
उन्होंने उसके लिये भि तुरन्त मेरे ससुरजी कों शगुन निकालने कों कहा।
मे पहले हि दिनघऱ मे घुलने मिलने कि कोशिश कररही थि।
सासू माँ-ससुरजी कों गरमचाय पिलाकर औऱ अपना शगुन लेकर मे अपने कमरे मे आशीष केँ पास पहुँची तोँ वोँ भि जाग चुके थें पऱ पलंग मे पड़े थें।
मेरेपास जाते हि उन्होंने मुझे घसीटकर अपनी छाती सें चिपका लिया औऱ एक् मीठा सां चुम्बन दिया। मे तौ लज्जा सें धरती मे गड़ीजा रही थि पर्र उनकी छाती सें चिपकना नं जाने क्यूं बहोत हि अच्छा लगरहा थां।
तभी बाहर् सें ससुरजी जी कि आवाज़ आई औऱ आशीष उठकर बाथरूम मे नहाने चलेगये।
घऱ मे सासू केँ संग औऱ सारादिन केसे निकल गय़ा पता हि नहि चला। साम कों मेरे मायके वालों केँ औऱ सहेलियों केँ मोबाइल आने शुरुआत होँ गये।
मेरी सहेलियाँ बारबार पूछतीं- रात कों क्याँ हुआ…!?!
अब मे हंसकर टाल जाती, आखिर बताती भि तोँ क्याँ…!?!
मुझेआज फिन सें रात कां प्रतीक्षा थां, आशीष कां मे बेसब्री सें प्रतीक्षा करनेलगी।
बापू औऱ आशीष 8 बजे तक घऱआये। मैंने औऱ माँ जी नें मिलकर डायनिंग पर्र खानां लगाया।
मे जल्द-जल्द काम निपटाकर अपने कमरे मे जाकर सजधजकर होना चाहती थि, सोचरही थि शायदआज मेरी सुहागरात होँ…’
खानां खाकरकुछ देर परिवार केँ सब सदस्यों नें संग बैठकर गप्पें मारी।
फिन माँ जीजी नें स्वयं हि बोल दिया- …बेटी तुँ जा, थक गई होगी अपने कमरे मे जाकर आरामकर।
मे तौ जैसेइसी लम्हा कां प्रतीक्षा कररही थि, मे तुरन्त उठी औऱ अपने कमरे मे आँ गर्इ, अपना नाईट गाऊन उठाकर बाथरूम मे गई, नहाकर फिन सें कल कि तरह सजधजकर होकर अपनेबैड पऱ लेटकर टेलीविज़न देखने लगी।
मुझे आशीष कां बेसब्री सें प्रतीक्षा थां। कल तोँ कुछ मेहमान औऱ दोस्ते थें घऱ मे पर्र आज तौ कोई नहि थां, आशीष कों कमरे मे जल्द आनां चाहिए थां।
देखते देखते 10 बजगये पऱ आशीष बाहर् हि थें।
मैंने चुपके सें कमरे कां दरवाजा खोलकर ओट सें बाहर् देखा आशीषहॉल मे अकेले बैठे टेलीविज़न हि देखरहे थें।
‘तौ क्याँ उनको मेरीतरह अपनी सुहागरात मनाने कि बेसब्री नहि हैं… ‘क्याँ उनकामन नहि हैं अपनी पत्नि केँ संग वक्त बिताने कां…?’
जब माँ जी औऱ पापा दोनों हि अपने कमरे मे जा चुके थें, मे भि अपने कमरे मे थि, घऱ केँ नौकर भि अपने सर्वेन्ट रूम मे चलेगये थें तोँ आशीष क्यूं अकेले हॉल मे बैठकर टेलीविज़न देखरहे थें !?!
मे आशीष कों अन्दर कमरे मे बुलाना चाहती थि पर्र चाहकर भि हिम्मत नहि करपाई।
मे वापस जाकर उनका प्रतीक्षा करते करते टेलीविज़न देखने लगी। आज भि मुझेपता नहि चलाकब नींद आँ गई।
रात कों किससमय आशीष कमरे मे आये मुझे नहि पता।
सुभहजब मेरीआँख खुली तौ वोँ मुझसे चिपककर सोरहे थें।
उनकाये बर्ताव मुझे बहोत अजीबलग रहा थां, मे कुछ भि समझ नहि पारहा थि- क्याँ मे आशीष कों मनपसंद नहि थि…? यदि नहि… तौ वोँ मुझसे ऐसे चिपककर क्यूं सोरहे थें। यदि‘हां…’ तोँ फिन वोँ रोजरात कों कमरे मे मेरे सोने केँ बाद हि क्यूं आते हें?
“किससे अपनीबात बताऊं, किससे इसके बारे मे समझूं… कहीं मे हि तोँ गलत नहि सोचरही थि…” यही सोचते सोचते मे आजफिन सें बाहर् आई। माँ जी औऱ पापा केँ पैरछुए औऱ स्वयं हि उनके लियेगरम चाय बनाने किचन मे चली गई।
उनकोगरम चाय देते हि पिता जी बोले- बेटा, जरा आशीष कों बुला।
“जी पापा…” बोलकर मे अपने कमरे मे गई आशीष कों जगाया।
आँखें खुलते हि उन्होंने दोनों बाहों मे मुझे जकड़ लिया औऱ मेरे होठों पऱ एक् प्यारा सां चुम्बन दिया।
मैंने शर्माते हुएकहा- बाहर् पापा बुलारहे हें जल्द चलिये।
आशीष तुरन्त एक् आज्ञाकारी बेटे कि तरह उठकर बाहर् आये औऱ पापा केँ सामने बैठगये।
पापा बोले- बेटा, फैक्ट्री मे अधिककाम कि वजह सें तुम् दोनों हनीमून केँ लिये नहि गये। ये बात मेरीसमझ मे आती हैं पऱ कम सें कम एक् दिन कों बहु कों कहीं बाहर् घुमालाओ।
पहले तोँ आशीष नें फैक्ट्री केँ काम कां हवाला देकर पापा कों मना किया पर्र पापा केँ जबरदस्ती करने पर्र वोँ आजदिन मे कहीं बाहर् जाने केँ लियेमान गये, मुझसे बोले-चलो आज बाहर् घूमने चलते हें, तुम् रेडी हौ जाओ जल्द सें औऱ मे भि नहाकर आता हूं।
मे तौ जैसे उनके आदेश कि हि इंतजार कररही थि। फिन भि एक् बहू होने केँ नाते मैंने पहले माँ जी औऱ पापा कों ब्रेकफास्ट करवाकर चलने कों कहा तौ मां जी बोलि- नहि बेटा, यह हि दिन हें घूमने फिरने केँ, तुम् जाओघूम आओ।
“जी माँ जी…” बोलकर मे तुरन्त अपने कमरे मे गई औऱ नहाकर रेडी होनेलगी।
मेरे बाहर् आते हि आशीष भि बाथरूम मे घुसगये अभि मे अपना मेकअप कर हि रही थि कि आशीष नहाकर बाहर् आये औऱ मुझे मेकअप करता देखकर पीछे सें मुझसे लिपटकर बोले- कितनी सैक्सी लगरही हौ तुम्…
मैंने उनकी आँखों मे झांकते हुए पूछा-फिन घूमने कां प्रोग्राम कैंसिल करदें क्याँ?
कितनी सैक्सी हो तुम complete - Beti Nahi Beta – New Episode
कितनी सैक्सी हौ तुम् --2
पापा बोले- बेटा, फैक्ट्री मे अधिककाम कि वजह सें तुम् दोनों हनीमून केँ लिये नहि गये। ये बात मेरीसमझ मे आती हैं पर्र कम सें कम एक् दिन कों बहु कों कहीं बाहर् घुमालाओ।
पहले तोँ आशीष नें फैक्ट्री केँ काम कां हवाला देकर पापा कों मना किया पर्र पापा केँ जबरदस्ती करने पर्र वोँ आजदिन मे कहीं बाहर् जाने केँ लियेमान गये, मुझसे बोले-चलो आज बाहर् घूमने चलते हें, तुम् रेडी हौ जाओ जल्द सें औऱ मे भि नहाकर आता हूं।
मे तोँ जैसे उनके आदेश कि हि इंतजार कररही थि। फिन भि एक् बहू होने केँ नाते मैंने पहले मां जी औऱ पापा कों ब्रेकफास्ट करवाकर चलने कों कहा तौ मां जी बोलि- नहि बेटा, यह हि दिन हें घूमने फिरने केँ, तुम् जाओघूम आओ।
“जी माँ जी…” बोलकर मे तुरन्त अपने कमरे मे गई औऱ नहाकर सजधजकर होनेलगी।
मेरे बाहर् आते हि आशीष भि बाथरूम मे घुसगये अभि मे अपना मेकअप कर हि रही थि कि आशीष नहाकर बाहर् आये औऱ मुझे मेकअप करता देखकर पीछे सें मुझसे लिपटकर बोले- कितनी सैक्सी लगरही होँ तुम्…
मैंने उनकी आँखों मे झांकते हुए पूछा-फिन घूमने कां प्रोग्राम कैंसिल करदें क्याँ?
अचानक ये पूछते हि मे झेंप गई, पता नहि एकदम मे इतनी बोल्ड केसे हौ गई पति केँ सामने।
परन्तु पति शायद पहले हि दिन सें अपना लगने लगता हैं।
आशीष भि तेजी सें सजधजकर होनेलगे औऱ बोले- नहि, आज तुमको जयपुर घुमाता हूं।
‘चलो किसी बहाने आशीष केँ संग वक्त बिताने केँ मौका तौ मिला। ’ये सोचकर हि मे उत्तेजित थि, मे रेडी होकर बाहर् आई, तोँ पीछे पीछे आशीष भि आँ गये।
बाहर् आकर मैंने एक् बारफिन सें मां जी औऱ पिताजी जी केँ पांवछुए, औऱ आशीष केँ संग-संग घऱ सें निकल गई।
आशीष नें ड्राइवर सें वाहन कि चाबीली औऱ बहोत अदब सें दरवाजा खोलकर मुझे गाड़ी मे बिठाया।
उनकेइस सेवाभाव सें हि मे गदगद होँ गई।
गाड़ी कां स्टेलयरिंग सम्भालते हि आशीष बोले- कहां चलोगी मेरीजान !!
मैंने हल्का सां शर्माकर कहा- जहाँ आप् लें जाओ। मेरी कहीं घूमने मे नहि आपकेसंग वक़्त बिताने मे हैं।
गाड़ी मे बैठे-बैठे आशीष नें मेरा माथा प्रेम सें चूम लिया। मे तौ सिहर हि गई, मेरे जिस्म पऱ किसी मर्द कां ये पहला चुम्बन थां।
मेरा पूरा जिस्म एक् चुम्बन सें हि कांप गय़ा, गाललाल होँ गये, रौंगटे खड़े हौ गए।
तभी आशीष नें मेरी तंद्रा तोड़ी औऱ बोले-चलो, पहले किसी रेस्टोरेन्ट मे ब्रेकफास्ट करते हें, फिन घूमने चलेंगे।
मैंने उनकीहाँ मे हाँ मिलाई औऱ हम् ब्रेकफास्ट करने पहुँचे, वहीं सें आगे कां प्रोग्राम बना लिया।
दिन भर मे आशीष नें सिटी पैलेस, हवामहल, आमेर कां किला औऱ नं जाने क्याँ-क्याँ दिखाया।
साम कों 7 बजे भि आशीष सें मैंने कि कहा-अब घऱ चलते हें, मां-बापू प्रतीक्षा करते होंगे।
आशीषकुछ देर औऱ घूमना चाहते थें पर्र मुझे तौ घऱ पहुँचने कि बहोत जल्द थि।
आशीष भि बहोत अच्छे मूड मे थें तोँ मुझेलगा कि इस माहौल कां आज फायदा उठाना चाहिए।
जल्दघऱ पहुँचकर फ्रैश होकर अपने कमरे मे घुस जाऊँगी आशीष कों लेकर।
मैंने घऱ चलने कि जिद कि तौ आशीष भि मानगये। वापस चलने केँ लिये बैठते वक़्त आशीष नें फिन सें मेरे माथे पऱ एक् प्यारा सां चुम्बन दिया।
मुझे उनका चुम्बन बहोत हि अच्छा लगरहा थां, बल्कि मे तौ यह चुम्बन मात्र माथे पर्र नहि अपने पूरे जिस्म पर्र चाहती थि, उम्मीद लगनेलगी थि कि शायदआज मेरी सुहागरात जरूर होगी।
आज आशीष केँ संग घूमने कां सबसे बड़ा फायदा यहहुआ कि अब मे उनकेसंग खुलकर बातकर पारही थि, अपनीबात उनसेकह पारही थि।
जल्द हि हम् घऱ पहुँच गये, आशीष नें घऱ केँ दरवाजे पऱ हि वाहन कि चाबी ड्राइवर कों दि औऱ हम् दोनों घऱ केँ अन्दर आँ गये।
पिताजी अभि तक फैक्ट्री सें नहि आये थें।
हमारे आते हि माँ जी नें गरमचाय बनाई औऱ मुझसे पूछा- कैसारहा आज कां दिनॽ
‘बहोत अच्छा.’ मैंने भि खुश होकर जवाब दिया।
कुछ हि देर मे पिताजी भि आँ गये, हम् चारों सें एक् संग बैठकर खानां खाया।
फिन मे मां कि इजाजत लेकर तेजी सें अपने कमरे मे चली गई।
आशीषआज भि बाहर् पापा केँ संग बैठकर टेलीविज़न हि देखरहे थें।
पर्र मुझे उम्मीद थि कि आज आशीष जल्द अन्दर आयेंगे।
मे पिछले दिनों कि तरह नहाकर नईनई नाईटी पहनकर आशीष कां प्रतीक्षा करनेलगी।
पऱ ये क्याँ साढ़े दसबजगये आशीषआज भि बाहर् हि थें।
मैंने दरवाजा खोलकर बाहर् झांका तौ पाया कि आशीष अकेले बैठकर टेलीविज़न देखरहे थें।
मे कुछसमझ नहि पारही थि कि यहरोज हि क्यूं होँ रहाहैॽ यदि आशीष कों टेलीविज़न इतना हि मनपसंद हैं तौ अपने कमरे मे भि तौ हैं। वैसे तोँ मुझसे बहोत प्रेम जतारहे थें फिनरोज हि मुझे कमरे मे अकेला क्यूं छोड़ देते हें… क्यूं वोँ कमरे मे देर सें आते हें…? क्याँ उनको मे मनपसंद नहि हूं… क्याँ वोँ मेरेसंग अकेले मे वक्त नहि बिताना चाहते…?
तोँ फिन मुझे पर्र इतना प्रेम क्यूं लुटाते हें…?
उनकाये बर्ताव आज मुझे अजीब लगनेलगा, मेरी नींदउड़ चुकी थि, आज मुझे अपनेसंग आशीष कि जरूरत महसूस होनेलगी थि।
मैंने अपने कमरे केँ अन्दर जाकर अपनेफोन सें आशीष कों मोबाइल किया।
उन्होंने मोबाइल उठाया तोँ मैंने तुरन्त अन्दर आने कां आग्रह किया।
वोँ बोले- तुम् सोजाओ, मे अपने आप् आकरसो जाऊँगा।
उनकाये बर्ताव मेरेगले नहि उतररहा थां, बैठे-बैठे पता नहि क्यूं मुझेआज घऱ मे अकेलापन सां लगनेलगा। जोँ घऱ 2 दिन पहले मुझे बिल्कुल अपनालग रहा थां, आज 2 हि दिन मे वोँ घऱ मुझे बेगाना लगनेलगा।
अचानक हि मेरी आँखों सें आँसू बहनेलगे। बाहर् हॉल मे जाकर उनसेबात करने कि मेरी हिम्मत नहि थि। मैंने आज सारीरात जागने कां निर्णय किया कि आज आशीष किसी भि वक्त कमरे मे आयेंगे मे तब हि उनसेबात जरूर करूँगी।
रात कों 12 बजे लगभग कमरे कां दरवाजा बहोत हि धीरे-धीरे सें खुला। आशीष नें धीरे-धीरे सें अन्दर झांका, औऱ मुझे सोता देखकर अन्दर आँ गये। दरवाजा अन्दर सें बन्द किया, फिन अपना नाइटसूट पहनकर वोँ मेरीबगल मे आकरलेट गये, मुझे पीछे सें पकड़कर मुझसे चिपककर सोने कि प्रयास करनेलगे।
मे तभी उठकरबैठ गई, मेरी आँखों सें आँसू झरने कि तरहबह रहे थें।
मेरे आँसू देखकर आशीष भि परेशान हौ गये, बोले- क्याँ हुआ जानू…रो क्यूं रही होँ?
पऱ मे थि कि रोये हि जारही थि, मेरेमुख सें एक् शब्द भि नहि फूटरहा थां, बस लगातार रोयेजा रही थि।
आशीष नें फिन पूछा- क्याँ अपने माँ-बापू याद आँ रहे हें तुमको… चलोकल तुमको आगरा लेँ चलूंगा। मिल लेनाउन सबसे।
आशीष मेरेमन कि बात नहि समझपा रहे थें औऱ इधर मे बहोत कुछ केहना चाहती थि… पर्र बोल नहि पारही थि। आशीषखाट पर्र मेरेबगल मे अधलेटी अवस्था मे बैठगये, मेरासिर अपनी गोदी पऱ रखकर सहलाने लगे।
कुछ देर रोने केँ बाद मैंने स्वयं हि आशीष कि ओर मुंह किया तौ पाया कि वोँ तोँ बैठे बैठे हि सोगये थें।
अब मे उनको क्याँ कहती… याँ तौ आशीष कमरे मे हि नहि आँ रहे थें औऱ जबआये तौ मुझे सहलाते सहलाते हि कबसोगये पता भि नहि चला।
मे वहा सें उठी, बाथरूम मे जाकर मुँह धोया, वापसआकर देखा तौ आशीषखाट पऱ सीधेसो चुके थें। अबपता नहि आशीष नींद मे सीधे हौ गये थें याँ मेरे सामने सोने कां नाटककर रहे थें?
मे कुछ भि नहि करसकी, चुपचाप उनकेबगल मे जाकरसो गई।
सुभह आशीष नें हि मुझे जगाया। मैंने घड़ी देखी तोँ अभि तौ साढ़े पांच हि बजे थें, वोँ बहोत प्रेम सें मुझेजगा रहे थें, मे भि उस टाइम फ्रैश मूड मे थि, मुझेलगा कि शायदआज सुभह सुभह आशीष सुहागरात मनायेंगे मेरेसंग…
जैसे हि मेरीआँख खुली, आशीष नें मेरी आँखों पऱ बड़े प्रेम सें चुम्बन लिया औऱ बोले- कितनी सुन्दर होँ तुम्…
मे तौ जैसे उनकीइस एक् लाइन कों सुनकर हि लज्जा सें दोहरी होँ गई।
तभी आशीष नें कहा- जल्द सें उठकर रेडी होँ जाओ, आगरा चलना हैं नाँ।
मेरे तौ जैसेपैर केँ नीचे सें जमीन हि खिसकने लगी, समझ मे नहि आया कि आखिर आशीष चाहते क्या् हैंॽयह मेरेसंग ऐसा क्यूं कररहे हैंॽ
अपने आप् हि फिन सें मेरी रूलाई फूट गई। अब तोँ मे बिफर चुकी थि, मैंने चिल्लाकर कहा- क्यूं जाऊँ मे उनकेघऱ… अबवहा मेराकौन हैं… मेरा तौ अब जौ भि हैं यहीं हैं आपकेपास… औऱ आप् हें कि अपनी पत्नि केँ संग परायों कि तरह बर्ताव करते हें। आपकी पत्नि आपके प्रेम कों तरस जाती हैं, आप् हें कि उसकेसंग अकेले मे कुछ टाइम भि नहि बिताना चाहते, मुझे मेरे मम्मी-बाप नें मात्र आप् हि केँ भरोसे यहा भेजा हैं.!
एक् हि सांस मे पता नहि मे इतनासभी केसेबोल गई, पता नहि मुझमें इतनी हिम्मत कहां सें आँ गईॽ
मे लगातार रोयेजा रही थि।
आशीष नें मुझेऊपर करकेगले सें लगा लिया औऱ चुप कराने कि कोशिश कररहे थें।
मुझेचुप कराने कि कोशिश करते-करते मैंने देखा कि आशीष कि आँखों सें भि आँसू निकलने लगे, उनका फफकना सुनकर मेरी निगाह उठी, मैंने आशीष कि तरफ देखा वोँ भि लगातार रोरहे थें।
मे सोचने लगी कि ऐसा मैंने क्याँ गुनाह कर दिया जोँ इनको भि रोना आँ रहा हैं।
मैंने स्वयं कों संभालते हुए उनकोचुप कराने कां प्रयास किया औऱ कहा- आप् क्यूं रोरहे होॽ मुझसे गलती होँ गई जोँ मे आपे सें बाहर् आँ गई आगे सें जिंदगी मे कभी भि आपको मेरीतरफ सें शिकायत नहि मिलेगी।
आशीष नें मुझे सीने सें लगा लिया औऱ बोले- तुम् इतनी अच्छी क्यूं हौ नयना…
मे उनको नार्मल करने कां प्रयास करनेलगी।
यकायक उन्होंने मेरे होठों पऱ अपने होंठरख दिए, मुझे जैसे करन्टी सां लगा।
‘अहह…’ एक् झटके केँ संग मे पीछेहट गई, मैंने नजरें उठाकर आशीष कि ओर देखा। आशीष कि निगाहों मे मेरे लियेबस प्रेम हि प्रेम दिखाई देरहा थां।
तभी मुझे एहसास हुआ कि मे तौ पीछेहट गई पर्र मे पीछे क्यूं हटीॽ मे भि तोँ यही चाहती थि। अपने जिस्म पर्र आशीष केँ गरम होठों कां स्पर्श…
पऱ मेरे लियेयह बिल्कुल नया थां। मेरी 23 साल कि आयु मे पहलीबार किसी नें मेरे होठों कों ऐसेछुआ थां।
मेरे पूरे शरीर मे झुरझुरी सि दौड़ गई। एक् हि सैकेण्ड मे मुझेऐसा झटकालगा जिसने मुझे पीछे धकेल दिया, हम् दोनों केँ आँसूपता नहि कहां गायब होँ गये थें, आशीष हौले सें आगेआकर बैड पऱ चढ़गये, औऱ मेरे बराबर मे आँ गये। उन्हों नें अपनी दांयी बाजू मेरेसिर केँ नीचे कि औऱ मुझे अपनीतरफ खींच लिया, मुझेलगा जैसे मेरेमन कि मुराद पूरी होने वाली हैं अपनेमन केँ अन्दर सैकड़ो अरमान समेटे मे आशीष कि बाहों मे समाती चली गई।
आशीष नें यकायक फिन सें मेरे होठों पर्र अपने गरम-गरम होठों कों रख दिया, अब तौ मे भि स्वयं कों मानसिक रूप सें सजधजकर कर चुकी थि। मे भि आशीष कां संग देनेलगी, आखिर मे भि तौ मन हि मनयही चाहरही थि। चूमते-चूमते आशीष नें हौले सें मेरे होठों पर्र पूरा कब्जा कर लिया।
अब तौ मेरे निचले होंठ कों अपने होठों केँ बीच मे दबाकर चूसरहे थें, मेरा रोम-रोम थर्र-थर्र कांपरहा थां।
आशीष केँ हाथ मेरी गाऊन केँ अन्दर होतेहुए मेरीपीठ तक पहुँच चुके थें वोँ बैड पर्र अधलेटे सें हौ गये औऱ मुझे अपनेऊपर झुका लिया।
ऐसा लगरहा थां मानोआज हि वोँ मेरे होठों कां सारारस पी जायेंगे। पता नहि क्यूं पर्र अब मुझे भि उनका अपने होठों कां ऐसे रसपान करना बहोत अच्छा लगरहा थां मन केँ अंदर अजीब अजीब सि परन्तु मिठास सि पैदा हौ रही थि। इधर आशीष कि उंगलियाँ मेरीपीठ पर्र गुदगुदी करने थि अचानक हि मैंने आशीष कों सिर सें पकड़ा औऱ तेजी सें स्वयं सें चिपका लिया।
आशीष कि उंगलियाँ मेरीपीठ पऱ चमत्कार करने लगीं, पूरे शरीर मे झुरझुरी हौ रही थि। मेरे यौवन कों पहलीबार कोई मर्दऐसे नौचरहा थां, उस वक़्त होने वाले सुखद अहसास कों शब्दों मे बयान करना नामुमकिन थां। अचानक आशीष नें पाला बदला औऱ मुझे नीचे बिस्तर पऱ लिटा दिया, अब वोँ मेरेऊपर आँ गये।
मेरे होंठ उनके होठों सें मुक्त हौ गये। अब उनके होंठ मेरी गर्दन कां नाप लेने मे लगगये। उनकेहाथ भि पीठ सें हटकर मेरी नाईटी कों खोलने लगे।
धीरे धीरे नाईटी खुलती गई, आशीष कों मेरी गोरी काया कि झलक देखने कों मिलती, तौ आशीष औऱ अधीर हौ जाते। कमरे मे फैली ट़यूब कि रोशनी मे अब मुझे लज्जा महसूस होनेलगी, फिन भि आशीष कां इसतरह प्रेम करना मुझे जन्नत कां अहसास देनेलगा। तभी मुझे अहसास हुआ कि मेरी पूरी नाईटी खुल चुकी हैं आशीष मेरी ब्रा केँ ऊपर सें हि अपने हाथों सें मेरे उरोजों कों हौले-हौले सहलारहे थें उनके गीले होंठ भि मेरे उरोजों केँ ऊपरी हिस्से केँ इर्द-गिर्द केँ क्षेत्र मे गुदगुदी पैदा करनेलगे।
मेरे होंठ सूखने लगे।
आशीष नें मुझे पीछे घुमाकर मेरी ब्रा कां हुककब खोला मुझे तोँ पता भि नहि चला। मेरेबदन केँ ऊपरी हिस्से सें ब्रा केँ रूप मे आखिरी वस्त्र भि हट गय़ा, मेरे दोनों अमृतकलश आशीष केँ हाथों मे थें, आशीष उनको अपने हाथों मे भरने कां प्रयास करनेलगे।
परन्तु शायद वोँ आशीष केँ हाथों सें बढ़े थें इसीलिये आशीष केँ हाथों मे नहि आँ रहे थें। मेरे गुलाबी निप्पल कड़े होनेलगे।
अचानक आशीष नें पाला बदलते हुए मेरे बांये निप्पल कों अपने मुंह मे लेँ लिया औऱ किसी बच्चे कि तरह चूसने लगे। मे तोँ जैसेहोश हि खोनेलगी।
कितनी सैक्सी हो तुम complete - Beti Nahi Beta – New Episode
कितनी सैक्सी हौ तुम् --3
आशीष नें मुझे पीछे घुमाकर मेरी ब्रा कां हुककब खोला मुझे तोँ पता भि नहि चला। मेरेबदन केँ ऊपरी हिस्से सें ब्रा केँ रूप मे आखिरी वस्त्र भि हट गय़ा, मेरे दोनों अमृतकलश आशीष केँ हाथों मे थें, आशीष उनको अपने हाथों मे भरने कां प्रयास करनेलगे।
परन्तु शायद वोँ आशीष केँ हाथों सें बढ़े थें इसीलिये आशीष केँ हाथों मे नहि आँ रहे थें। मेरे गुलाबी निप्पल कड़े होनेलगे।
अचानक आशीष नें पाला बदलते हुए मेरे बांये निप्पल कों अपने मुंह मे लें लिया औऱ किसी बच्चे कि तरह चूसने लगे। मे तौ जैसेहोश हि खोनेलगी।
आशीष मेरे दांयें निप्पल कों अपने बांयें हाथ कि दो उंगलियों केँ बीच मे दबाकर मींजने मे लगे थें जिससे तीव्र दर्द कि अनुभूति होँ रही थि परन्तु उस टाइममुझ पऱ उस दर्द सें ज़्यादा कामवासना हावी होँ रही थि औऱ उसी वासना केँ कम्पन मे दर्द कहीं खोनेलगा, मेरी आँखें स्वयं-ब-स्वयं हि बंद होनेलगी, मे शायदइसी नैसर्गिक क्षण केँ लिये पिछले कुछ दिनों सें प्रतीक्षा कररही थि, मेरी आँखें पूरीतरह बंद होँ चुकी थि।
मुझे महसूस हुआ कि आशीष नें मेरे निप्पलों कों चाटना छोड़ दिया हैं अब वोँ अपने दोनों हाथों सें मेरे निप्पलों कों सहलारहे थें औऱ उनकीजीभ मेरे नाभिस्थल कां निरीक्षण कररही थि।
यकायक उन्होंने मेरे पूरे नाभिप्रदेश कों चाटना शुरुआत कर दिया पऱ ये क्याॽ
अब उनके दोनों हाथ मेरे उरोजों पर्र नहि थें।
ये मुझे बिल्कुल भि अच्छा नहि लगा, मे तौ चाहरही थि कि येरात यहींथम जाये औऱ आशीष सारीरात मेरे उरोजों कों यूँ हि सहलाते रहें औऱ मेरा जिस्म यूँ हि चाटते रहें।
मेरी आँखें फिन सें खुल गई तोँ मैंने पाया कि आशीष भि अपनी शर्ट औऱ बनियान उतार चुके थें। ओहहहहहहह… तोँ अबसमझ मे आया कि जनाब केँ हाथ मेरेनरम नरम खरबूजों कों छोड़कर कहां लगगये थें ! मे आशीष कि तरफदेख हि रही थि, उन्होंने भि मेरी आँखों मे देखा।
हम् दोनों कि नजरें चार हुईं औऱ शर्म सें मेरी निगाह झुक गई पऱ मेरे होंठों कि मुस्कुराहट नें आशीष कों मेरी मनोस्थिति समझा दि होगी।
आशीष नंगे हि फिन सें मेरेऊपर गये, ‘नयना…’ आशीष नें मुझे पुकारा !
‘हम्म्म…’ बसयही निकल पाया मेरेगले सें।
‘कैसा महसूस कररही होँ…” आशीष नें फिन सें मुझसे पूछा।
मे तोँ अब जवाब देने कि स्थिति मे हि नहि रही थि, मैंने बस स्वयं कों तेजी सें आशीष सें नंगे शरीर सें चिपका लिया, मेरे जिस्म सें निकलने वाली गर्मी स्वयं हि मेरी हालत बयाँ करनेलगी।
आशीष केँ हाथफिन सें अपनी क्रिया करनेलगे, पता नहि आशीष कों मेरे निप्पल इतने मज़ेदार लगे क्याँ, जोँ वोँ बारबार उनको हि चूसरहे थें !
परन्तु मेरा भि मनयही कहरहा थां कि आशीष लगातार मेरे दोनों निप्पल पीते रहें। फिर भीअब मेरी दोनों घुंडियाँ दर्द करनेलगी थीं, पूरीतरह लाल होँ गई परन्तु फिन भि इससे मुझे असीम आनन्द कां अनुभव हौ रहा थां।
मेरी आँखें अब पूरीतरह बंद हौ चुकी थि, मे स्वयं कों नशे मे महसूस कररही थि परन्तु मेरेसंग जौ भि हौ रहा थां मे उसको जरूर महसूस करपारही थि।
पूरे जिस्म मे मीठी-मीठी बेचैनी अनुभव हौ रही थि।
मैंने अपनी बाहें फैलाकर आशीष कि पीठ कों जकड़ लिया, आशीष कां एक् हाथअब मेरीकमर पर्र कैपरी केँ इलास्टिक केँ इर्द-गिर्द घूमने लगा।
हौले-हौले आशीष मेरी केपरी उतारने कि कोशिश कररहे थें। जैसे हि मुझे इनका आभासहुआ मैंने स्वयं हि अपने नितम्ब हल्के सें ऊपर करके उनकी सहायता कर दि।
आशीष तौ जैसेइसी लम्हा केँ प्रतीक्षा मे थें, उन्होंने मेरी केपरी केँ संग हि कच्छी भि निकालकर फेंक दि।
अब मे आशीष केँ सामने पूर्णतया नग्न अवस्था मे थि परन्तु फिन भि दिल आशीष कों छोड़ने कां नहि हौ रहा थां।
आशीषअब खुलकर मेरे शरीर सें खेलने लगे, वोँ मेरे पूरे जिस्म पर्र अपने होंठों केँ निशान बनारहे थें, शायद मेरे कामुक शरीर कों कोई एक् हिस्सा भि ऐसा नहि बचा थां जिस कों आशीष नें अपने होंठों सें स्पर्श नां किया हौ।
आशीषअब धीरे-धीरे धीरे-धीरे नीचे कि तरफ बढ़ने लगे, मेरी नाभि चाटने केँ बाद आशीष मेरे पेड़ू कों चाटने लगे।
आहहहह्…इस्स्… स्स्स्स…स… हम्म्म्म… ओह…ये क्याँ कर दिया आशीष नें…
मुझ पर्र अब कामुकता पूरीतरह हावी होनेलगी, मुझे अजीबतरह कि गुदगुदी होँ रही थि, मे इस वक़्त स्वयं केँ काबू मे नहि थि, मुझे बहोत अजीब सां महसूस हौ होनेलगा, ऐसी अनुभूति जिंदगी मे पहलेकभी नहि हुईँ थि पऱ ये जौ भि हौ रहा थां इतना सुखदायक थां कि मे उसे एक् समय केँ लिये भि रोकना नहि चाहरही थि।
मेरी सिसकारियाँ लगातार तेज होनेलगी थि, तभीकुछ ऐसाहुए जिसने मेरीजान हि निकाल दि।
आशीष नें हौले नें नीचे होकर मेरी दोनों टांगों केँ बीच कि दरार पऱ अपनी सुलगती हुइ जीभरख दि। ’सीईईईई… ईईईई…’ मेरीजान हि निकल गई, अब मे ऐसे तड़पने लगी जैसेजल बिन मछली।
ऊई माँऽऽऽ… अऽऽऽहऽऽ… ये क्याँ कर डाला आशीषनेॽ मेरा पूरा शरीर एक् लम्हा मे हि पसीने पसीने होँ गय़ा, थर्र-थर्र कांपने लगी थि मे।
आशीष हौले-हौले उस दरार कों ऊपर सें नीचे तक चाटरहे थें।
उफ़्फ़… मुझसे अपनी प्यास अब बर्दाश्त नहि होँ रही थि, पलंग कि चादर कों मुट्ठी मे भींचकर मे स्वयं कों नियंत्रित करने कां असफल कोशिश करनेलगी परन्तु ऐसा करने पऱ भि जब मे स्वयं कों नियंत्रित नहि करपाई तोँ आशीष कों अपनी टांगों सें दूर धकेलने कि कोशिश कि।
आशीष शायद मेरी स्थिति कों समझगये। स्वयं हि अब उन्होंने मेरी मक्खन जैसी योनि कां मोह त्याग कर नीचे कां रुखकर लिया।
अब आशीष मेरी जांघों कों चाटते-चाटते नीचे पैरों कि तरफबढ़ गये, ऐसा महसूस हुआ जैसे मेरी योनि मे कोई फव्वारा छूटा होँ, मेरी योनि मे सें सफेदरंग कां गाढ़ा-गाढ़ा स्राव निकलकर बाहर् आनेलगा।
इस स्राव केँ निकलते हि मुझेकुछ चैन महसूस हुआ, अब मेरी उतावलापन भि कम होँ गई थि, मे होश मे आनेलगी परन्तु मेरे पूरेबदन मे मीठा-मीठा दर्द हौ रहा थां, मुझेऐसा महसूस होनेलगा जैसे मेरा पेशाब यहीं निकल जायेगा।
मे तुरन्त आशीष सें स्वयं कों छुड़ाकर कमरे सें सटे टायलेट कि तरफ दौड़ी। टायलेट कि सीट पऱ बैठते हि बिनाजोर लगाये मेरी योनि सें श्वेत पदार्थ मिश्रित स्राव बड़ी मात्रा मे निकलने लगा।
परन्तु मूत्र विसर्जन केँ बाद मिलने वाली संतुष्टि भि कम सुखदायी नहि थि।
अपनी योनि कों अच्छी तरह धोने केँ बाद मे वापस अपने कमरे मे आई तौ देखा आशीष अपना नाईटसूट पहनकर टेलीविज़न देखने लगे।
मे भि अब पहले सें बहोत अच्छा अनुभव कररही थि, आते हि आशीष कि बगल मे लेटकर टेलीविज़न देखने लगी। पता हि नहि लगा कि कब मुझे नींद आँ गई।
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