RajSharma stories मुझे कुच्छ कुच्छ होता है complete - Adult Story - Episode 1
RajSharma kahaniyan
मुझे कुच्छ कुच्छ होता हैं --1
दोस्तो मे यानी आपका साथीराज शर्मा एक् औऱ मस्त किस्सा लेकर आपकेलिए हाजिर हूं दोस्तो यह किस्सा दो सहेलियो औऱ उनकेदो दोस्तो कि हैं अब आप् किस्सा कां मजा लीजिए स्टोरी कुछइस तरह हैं।
मेरी उम्र 18 साल हैं, मे कुँवारी युवती हूं। मैने12थ कां एग्ज़ॅम दिया हैं। मे अपने बारे मे ये बताना ज़रूरी समझती हूं कि मेरी फॅमिली काफ़ी अड्वान्स हैं, औऱ मुझे किसी प्रकार कि बंदिश नहि लगाई जाती। मे अपनी मर्ज़ी सें जीना मनपसंद करती हूं। अपने हि ढंग सें फॅशनबल कपड़े पहन-नां मेराशौक हैं। औऱ क्योंकि मे मां बापू कि इकलौती बेटी हूं इसलिये किसी नें भि मुझेइस तरह केँ कपड़े पहन-नें सें नहि रोका। विद्यालय आने जाने केँ लिए मुझे एक् ड्राइवर केँ संग गाड़ी मिली हुई थि। वैसे तोँ माँ मुझे ड्राइव करने सें मना करती थि, मगर मे अक्सर ड्राइवर कों घूमने केँ लिएभेज देती औऱ स्वयं हि गाड़ी लेकरसैर करने निकल जाती थि।
विद्यालय मे पढ़ने वाला एक् लड़का मेरायार थां। उसकेपास एक् अच्छी सि बाइक थि। मगर वोँ कभीकभी हि बाइक लेकरआता थां, जब भि वोँ बाइक लेकरआता मे उसके पीछेबैठ कर उसकेसंग घूमने जाती। औऱ जब उसकेपास बाइक नहि होती तोँ मे उसकेसंग गाड़ी मे बैठकर घूमने कां मजा उठाती। ड्राइवर कों मैने पैसे देकरमना कर रखखा थां कि घऱ पर्र मां याँ पिताजी कों नां बताए कि मे अकेली वाहन लेकर अपने मित्र केँ संग घूमने जाती हूं। इस प्रकार उसे दोहरा फ़ायदा होता थां, एक् ओर तौ उसे पैसे भि मिल जाते थें औऱ दूसरी ओरउसे अकेले घूमने कां मौका भि मिल जाया करता थां। दोबजे विद्यालय सें छुट्टी केँ बाद अक्सर मे अपने साथी केँ संग निकल जाती थि औऱ लगभग 6-7 बजते बजतेघऱ पहुँच जाती थि। एक् प्रकार सें मेरा घूमना भि होँ जाता थां औऱ घऱ वालो कों कुछ कहने कां मौका भि नहि मिलता थां।
मेरे मित्र कां नाम तौ मे बटन हि भूल गयीँ,। उसकानाम शिवम हैं। शिवम कों मे मन हि मन प्रेम करती थि औऱ शिवम भि मुझसे प्रेम करता थां, मगर नां तौ मैनेकभी उससे प्रेम कां इज़हार किया औऱ नां हि उसने। उसकेसंग प्रेम करने मे मुझेकोइ झिझक महसूस नहि होती थि। मुझेयाद हैं कि प्रेम कि शुरुआत भि मैने हि कि थि जब हम् दोनो बाइक मे बैठकर घूमने जारहे थें। मे पीछे बैठी हुईँ थि जब मैने रोमांटीकबात करतेहुए उसकेगाल पर्र किसकर लिया.ऐसा मैने भावुक हौ कर नहि बल्कि उसकी झिझकदूर करने केँ लिए किया थां। वोँ इससे पहले प्रेम कि बात करने मे भि बहोत झिझकता थां। एक् बार उसकी झिझकदूर होने केँ बाद मुझेलगा कि उसकी झिजाहक दूर करके मैनेठीक नहि किया। क्योंकि उसकेबाद तौ उसने मुझसे इतनी शरारत करनी शुरुआत कर दि कि कभी तौ मुझेमजा आँ जाता थां औऱ कभीउस पऱ क्रोध। मगरकुल मिलाकर मुझे उसकी शरारत बहोत अच्छी लगती थि। उसकी इन्ही सभी बातो केँ कारण मे उसे मनपसंद करती थि औऱ एक् प्रकार सें मैने अपनातन मन उसकेनाम कर दिया थां।
एक् दिन मे उसकेसंग वाहन मे थि। वाहन वोही ड्राइव कररहा थां। एकाएक एक् सुनसान स्थान देखकर उसने गाड़ी रोक दि औऱ मेरीओर देखते हुए बोला, “अच्छी स्थान हैं नां ! चारोतरफ अंधेरा औऱ पेड पौधे हें। मेरे ख़याल सें प्रेम करने कि इससे अच्छी स्थान होँ हि नहि सकती.”ये कहतेहुए उसने मेरे होंठो कों चूमना चाहा तोँ मे उससेदूर हटनेलगी। उसने मुझे बाहों मे कस लिया औऱ मेरे होंठो कों ज़ोर सें अपने होंठो मे दबाकर चूसना शुरुआत कर दिया। मे जबरन उसके होंठो कि गिरफ़्त सें आज़ाद हौ कर बोलीं, “छ्चोड़ो, मुझे साँस लेने मे तक़लीफ़ होँ रही हैं.” उसने मुझे छ्चोड़ तौ दियामगर मेरी मम्मों पर्र अपना एक् हाथरख दिया। मे समझरही थि कि आज इसकामन पूरीतरह रोमॅंटिक हौ चुक्का हैं। मैनेकहा, “मे तोँ उसदिन कों रोरही हूं जब मैने तुम्हारे गाल पऱ किस करके अपनेलिए मुसीबत पैदाकर ली। नाँ मे तुम्हे किस्स करती औऱ नां तुम् इतना खुलते.” “तुमसे प्रेम तौ मे काफ़ी टाइम सें करता थां। मगरउस दिन केँ बाद सें मे ये पूरीतरह जान गय़ा कि तुम् भि मुझसे प्रेम करती हौ। वैसे एक् बात कहों, तुम् हौ हि इतनी हसीन कि तुम्हे प्रेम किए बिना मेरामन नहि मान-ता हैं.”
वोँ मेरी मम्मों कों दबाने लगा तोँ मे बोलीं, “उम्म्म्मम क्यूं दबारहे होँ इसे? छ्चोड़ो नां, मुझे कुच्छ कुच्छ होता हैं.” “क्याँ होता हैं?” वोँ औऱ भि ज़ोर सें दबाते हुए बोला, मे क्याँ बोलती, यह तोँ मेरेमन कि एक् फीलिंग थि जिसे शब्दो मे कह पाना मेरेलिए मुश्किल थां। इसे मे सिर्फ अनुभव कररही थि। वोँ मेरी मम्मों कों बदस्तूर मसल्ते दबाते हुए बोला, “कहो नाँ क्याँ होता हैं?”
“उम्म्म्मम उफफफफफफ्फ़ मेरीसमझ मे नहि आँ रहा हैं कि मे इस फीलिंग कों केसे व्यक्त करूँ.बस समझलो कि कुच्छ हौ रहा हैं.”
वोँ मेरी मम्मों कों पहले कि तरह दबाता औऱ मसलता रहा.फिन मेरे होंठो कों किस करनेलगा। मे उसके होंठो केँ चुंबन सें कुछकुछ गरम होनेलगी। जोँ मौकाहमे संयोग सें मिला थां उसका फ़ायदा उठाने केँ लिए मे भि व्याकुल होँ गयीँ,। तभी उसने मेरे कपड़ो कों उतारने कां उपक्रम किया। होंठ कों मुक्त कर दिया थां। मे उसकीओर देखते हुए मुस्कुराने लगी.ऐसा मैने उसका हौंसला बढ़ाने केँ लिए किया थां। ताकिउसे एहसास हौ जाए कि उसे मेरा सपोर्ट मिलरहा हैं।
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मेरी मुस्कुराहट कों देखकर उसके चेहरे पर्र भि मुस्कुराहट दिखाई देनेलगी। वोँ धीरे-धीरे मेरे कपड़े उतारने लगा, पहले उसकाहाथ मेरी मम्मों पऱ हि थां सो वोँ मेरी मम्मों कों हि नंगा करनेलगा। मे होल सें बोलीं, “मेरा विचार हैं कि तुम्हे अपनी भावनाओं पऱ काबू करना चाहिए। प्रेम कि ऐसी दीवानगी अच्छी नहि होती.”
उसने मेरे कुच्छ कपड़े उतारदिए। फिन मेरी ब्रा खोलते हुए बोला, “तुम्हारी मस्त जवानी कों देखकर अगर मे अपने आप् पऱ काबूपा लूँ तोँ मेरेलिए यह एक् अजूबे केँ समान होगा.”
मैनेमन मे सोचा कि अभि तुमने मेरी जवानी कों देखा हि कहां हैं। जबदेख लोगे तौ पता नहि क्याँ हाल होगा.मगर मे सिर्फ मुस्कुराई। वोँ मेरे मम्मे कों नंगाकर चुक्का थां। दोनो चूचियों मे ऐसा तनाव आँ गय़ा थां उससमय तक कि उसके दोनो निपल अकड़कर औऱ ठोस हौ गये थें। औऱ सुई कि त्तरह तनगये थें। वोँ एक् समयदेख कर हि इतना उत्तेजित होँ गय़ा थां कि उसने निपल समेत पूरी मम्मों कों हथेली मे समेटा औऱ कसकसकर दबाने लगा.अब मे भि उत्तेजित होनेलगी थि। उसकी हर्कतो सें मेरे अरमान भि मचलने लगे थें। मैने उसके होंठो कों किस करने केँ बाद प्रेम सें कहा, “छ्चोड़ दो नाँ मुझे। तुम् दबारहे हौ तोँ मुझे गुदगुदी हौ रही हैं। पता नहि मेरी चूचियों मे क्याँ हौ रहा हैं कि दोनो चूचियों मे तनाव सां भरताजा रहा हैं। प्लीज़ छ्चोड़ दो, मत दबाओ.” वोँ मुस्कुरा कर बोला, “मेरे जिस्म केँ एक् ख़ास हिस्से मे भि तोँ तनावभर गय़ा हैं। बोलो तौ उसे निकाल कर दिखाऊँ?”
मे समझ नहि पायी कि वोँ किसकी बातकर रहा हैं। मगरएका एक् वोँ अपनी पॅंट उतारने लगा तोँ मे समझ गई, औऱ मेरे चेहरे पऱ लज्जा कि लालीफैल गयीँ,। वोँ किस्में तनावआने कि बातकर रहा थां उसेअब मे पूरीतरह समझ गयीँ, थि। मुझे लज्जा कां एहसास भि हौ रहा थां औऱ एक् प्रकार कां रोमांच भि सारे जिस्म मे अनुभव हौ रहा थां। मे उसेमना करतीरह गई, मगर उसने अपनाकाम करने सें स्वयं कों नहि रोका, औऱ अपनी पॅंट उतारकर हि माना। जैसे हि उसने अपना अंडरवेर भि उतारा तौ मैने जल्द सें निगाह फेरली।
वोँ मेराहाथ पकड़कर अपनीओर खींचते हुए बोला, “छ्छूकर देखो नां। कितना तनाव आँ गय़ा हैं इसमें। तुम्हारे निप्पल सें अधिकतन गय़ा हैं यह.”
मैने अपनाहाथ छुड़ाने कि आक्टिंग भर कि। सच तौ यह थां कि मे उसे छ्छूने कों उतावली हौ रही थि। अब तक देखा भि नहि थां। छ्छूकर देखने कि बात तोँ औऱ थि। उसने मेरेहाथ कों बढ़ाकर एक् मोटी सि चीज़ पर्र रख दिया। वोँ उसका लन्ड हैं यह मे समझ चुकी थि। एक् समय कों तौ मे सन्नरह गयीँ,, उसका लन्ड पकड़ने केँ बाद। मेरेदिल कि धड़कन इतनी तेज़ हौ गई, कि स्वयं मेरे कानो मे भि गूँजती लगरही थि। मे उसके लन्ड कि जड़ कि ओरहाथ बढ़ाने लगी तौ एहसाह हुआ कि लन्ड लंबा भि काफ़ी थां। मोटा भि इसकदर कि उसे एक् हाथ मे लें पाना एक् प्रकार सें नामुमकिन हि थां।
वोँ मुझे गर्म होतादेख कर मेरे औऱ लगभग आँ गय़ा औऱ मेरे निपल कों सहलाने लगा.एका एक् उसने निपल कों चूमा तौ मेरे जिस्म मे खून कां दौरा तेज़ हौ गय़ा, औऱ मे उसके लन्ड केँ ऊपर तेज़ी सें हाथ फिराने लगी। मेरेऐसा करतेहुए उसनेझट सें मेरे निपल कों मूह मे लेँ लिया औऱ चूसने लगा.अब तौ मे पूरी मस्ती मे आँ गई, औऱ उसके लन्ड पर्र बारबार हाथफेर करउसे सहलाने लगी। बहोत अच्छा लगरहा थां, मोटे औऱ लंबे गर्म लन्ड पऱ हाथ फिराने मे।
एका एक् वोँ मेरे निपल कों मूह सें निकाल कर बोला, “कैसालग रहा हैं मेरे लन्ड पऱ हाथ फेरने मे?”
मे उसके प्रश्न कों सुनकर शर्मा गये.हाथ हटाना चाहा तौ उसने मेराहाथ पकड़कर लन्ड पर्र हि दबा दिया औऱ बोला, “तुम् हाथ फेरती होँ तोँ बहोत अच्छा लगता हैं, देखो नाँ, तुम्हारे द्वारा हाथ फेरने सें औऱ कितना तन गय़ा हैं.”
मुझसे रहा नहि गय़ा तौ मे मुस्कुरा कर बोलि, “मुझे दिखाई कहां देरहा हैं?”
“देखोगी ! यहलो.” कहतेहुए वोँ मेरे शरीर सें दूर हौ गय़ा औऱ अपनीकमर कों उठाकर मेरे चेहरे केँ समीप किया तौ उसका मोटा तगड़ा लन्ड मेरी निगाहो केँ आगे आँ गय़ा। लन्ड कां सुपाड़ा ठीक मेरी आँखो केँ सामने थां औऱ उसका आकर्षक रूप मेरेमन कों विचलित कररहा थां। उसने थोडा सां औऱ आगे बढ़ाया तौ मेरे होंठो केँ एकदम लगभग आँ गय़ा। एक् बार
तौ मेरेमन मे आया कि मे उसके लन्ड कों किसकर लूँमगर झिझक केँ कारण मे उसे चूमने कों पहल नहि करपारही थि। वोँ मुस्कुरा कर बोला, “मे तुम्हारी आँखो मे देखरहा हूं कि तुम्हारे मन मे जौ हैं उसे तुम् दबाने कि कोशिश कररही हौ। अपनी भावनाओं कों मत दबाओ, जौ मन मे आँ रहा हैं, उसे पूराकर लो.”
उसकेये कहने केँ बाद मैने उसके लन्ड कों चूमने कां मन बनाया मगर एकदम सें होंठआगे नां बढ़ाकर उसे चूमने कि पहल नां कर पायी.तभी उसने लन्ड कों थोडा औऱ आगे मेरे होंठो सें हि सटा दिया, उसके लन्ड केँ दहाकते हुए सुपादे कां स्पर्श होंठो कां अनुभव करने केँ बाद मे अपने आप् कों रोक नहि पाई औऱ लन्ड केँ सुपादे कों जल्द सें चूम लिया। एक् बारचूम लेने केँ बाद तोँ मेरेमन कि झिझक काफ़ी कम हौ गई, औऱ मे बारबार उसके लन्ड कों दोनो हाथो सें पकड़कर सुपादे कों चूमने लगी, एकाएक उसने सिसकी लेकर लन्ड कों थोडा सां औऱ आगे बढ़ाया तोँ मैनेउसे मूह मे लेने केँ लिएमूह खोल दिया, औऱ सुपपड़ा मूह मे लेकर चूसने लगी।
इतना मोटा सुपाड़ा औऱ लन्ड थां कि मूह मे लिए रखने मे मुझे तकलीफ़ कां अनुभव हौ रहा थां, मगरफिन भि उसे चूसने कि तमन्ना नें मुझेहार मान-नें नहि दि औऱ मे कुछदेर तक उसे मज़े सें चूस्ति रही.एका एक् उसनेकहा, “हयाययीयियी तुम् इसेमूह मे लेकरचूस रही होँ तोँ मुझे कितना मजा आँ रहा हैं, मे तोँ जानता थां कि तुम् मुझसे बहोत प्रेम करती होँ, मगर थोडा झिझकति होँ। अब तोँ तुम्हारी झिझक खत्म हौ गई,, क्यूं हैं नां?”
क्रमशः।
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मुझे कुच्छ कुच्छ होता हैं --2
गतान्क सें आगे।
मैनेहां मे सिर हिलाकर उसकीबात कां समर्थन किया औऱ बदस्तूर लन्ड कों चूस्ति रही.अब मे पूरीतरह खुल गई, थि औऱ चुदाई कां खुशी लेने कां इरादा कर चुकी थि। वोँ मेरेमूह मे धीरे-धीरे धीरे-धीरे धक्के लगाने लगा। मैने अंदाज़ा लगा लिया कि ऐसे हि धक्के वोँ चुदाई केँ वक़्त भि लगाएगा.चुदाई केँ बारे मे सोचने पऱ मेरा ध्यान अपनी बुर कि ओर गय़ा, जिसे अभि उसने निवस्त्र नहि किया थां। जबकि मुझे बुर मे भि हल्की हल्की सिहरन महसूस होनेलगी थि। मे कुछ हि देर मे थकान कां अनुभव करनेलगी। लन्ड कों मूह मे लिए रहने मे तकलीफ़ कां अनुभव होनेलगा। मैनेउसे मूह सें निकालने कां मन बनाया मगर उसका रोमांच मुझेमूह सें निकालने नहि देरहा थां। मूह तक गय़ा तोँ मैनेउसे अंदर सें तोँ निकाल लियामगर पूरीतरह सें मुक्त नहि किया। उसके सुपादे कों होंठो केँ बीच दबाएउस पऱ जीभ फेरती रही। झिझक समाप्त होँ जाने केँ कारण मुझे ज़रा भि लज्जा नहि लगरही थि।
तभी वोँ बोला, “हाई मेरीजान, अब तोँ मुक्त करदो, प्लीज़ निकाल दो नां.”
वोँ मिन्नत करनेलगा तोँ मुझे औऱ भि मजाआने लगा औऱ मे प्रयास करकेउसे औऱ चूसने कां प्रयत्न करनेलगी। मगर थकान कि अधिकता होँ जाने केँ कारण, मैनेउसे मूह सें निकाल दिया। उसनेएका एक् मुझे धक्का देकर गिरा दिया औऱ मेरी जीन्स खोलने लगा औऱ बोला, “मुझे भि तौ अपनीउस हसीन जवानी केँ दर्शन करादो, जिसे देखने केँ लिए मे बेताब हूं.”
मे समझ गयीँ, कि वोँ मेरी बुर कों देखने केँ लिए बेताब थां। औऱ इस एहसास नें कि अब वोँ मेरी बुर कों नंगा करकेदेख लेगासंग हि शरारत भि करेगा। मे रोमांच सें भर गयीँ,। मगरफिन भि दिखावे केँ लिए मे मना करनेलगी। वोँ मेरी जीन्स कों उतार चूकने केँ बाद मेरी पॅंटी कों खींचने लगा तौ मे बोलि, “छ्चोड़ो नाँ ! मुझे लज्जा आँ रही हैं.”
“लन्ड मूह मे लेने मे लज्जा नहि आई औऱ अब मेरामन बेताब हौ गय़ा हैं तोँ सिर्फ़ दिखाने मे लज्जा आँ रही हैं.” वोँ बोला। उसने खींचकर पॅंटी कों उतार दिया औऱ मेरी बुर कों नंगाकर दिया। मेरे जिस्म मे बिजली सि भर गयीँ,। ये एहसास हि मेरेलिए अनोखा थां उसने मेरी बुर कों नंगाकर दिया थां। अब वोँ बुर केँ संग शरारत भि करेगा.वोँ बुर कों छूने कि कोशिश करनेलगा तोँ मे उसे जाँघो केँ बीच च्चिपाने लगी। वोँ बोला, “क्यूं च्छूपा रही हौ। हाथ हि तोँ लगाउन्गा। अभि चूमने कां मेरा इरादा नहि हैं। हांअगर प्यारी लगी तोँ अवश्य चूमूंगा.”
उसकीबात सुनकर मे मन हि मन रोमांच सें भर गयीँ,। मगर प्रत्यक्ष मे बोलीं, “तुम् देख लोगेउसे, मुझे दिखाने मे लज्जा आँ रही हैं। आँखबंद करके च्छुओगे तौ कहो.”
“ठीक हैं ! जैसी तुम्हारी मर्ज़ी। मे आँखबंद करता हूं, तुम् मेराहाथ
पकड़कर अपनी बुर पऱ रख देना.”
मैनेहां मे सिर हिलाया। उसने अपनीआँख बंदकर ली तोँ मे उसकाहाथ
पकड़कर बोलि, “चोरी छिपेदेख मत लेना, ओके, मे तुम्हारा हाथ अपनी बुर पऱ रखरही हूं.”
मैने बुर पर्र उसकाहाथ रख दिया.फिन अपनाहाथ हटा लिया। उसकेहाथ कां स्पर्श बुर पऱ लगते हि मेरे जिस्म मे सनसनाहट होनेलगी। गुदगुदी कि वजह सें बुर मे तनाव बढ़ने लगा.उस पर्र सें जब उसने बुर कों च्छेड़ना शुरुआत किया तौ मेरी हालत औऱ भि खराब होँ गई,। वोँ पूरी बुर पर्र हाथ फेरने लगा.फिन जैसे हि बुर केँ अंदर अपनी उंगली घुसाने कि चेष्टा कि तोँ मेरेमूह सें सिसकी निकल गई,। वोँ बुर मे उंगली घुसाने केँ बाद बुर कि गहराई नापने लगा। मुझे इतनामजा आनेलगा कि मैने चाहते हुए भि उसे नहि रोका। उसने उंगली बुर कि काफ़ी गहराई मे घुसा दि थि।
मे लगातार आह लें रही थि। मेरी कुँवारी औऱ नाज़ुक बुर कां कोना कोना जलनेलगा। तभी उसने एक् हाथ मेरी गांद केँ नीचे लगाया कमर कों थोडा ऊपर करके बुर कों चूमना चाहा। उसने अपनीआँख खोलली थि औऱ होंठों कों भि इस प्रकार खोल लिया थां जैसे बुर कों होंठो केँ बीच मे दबाने कां मन हौ। मेरी हल्की झांतो वाली बुर कों होंठों केँ बीचदबा करजब उसने चूसना शुरुआत किया तोँ मे औऱ भि बुरीतरह च्चटपटाने लगी। उसनेकस कसकर मेरी बुर कों चूसा औऱ चंद हि पॅलो मे बुर कों इतना गर्मकर डाला कि मे बर्दाश्त नहि करपाई औऱ होंठो सें कामुक आह निकालने लगी। इसकेसंग हि मे कमर कों हिला हिलाकर अपनी बुर उसके होंठों पऱ रगड़ने लगी।
उसनेसमझ लिया कि उसके द्वारा बुर चूसे जाने सें मे गर्म हौ रही हूं। सो उसने औऱ भि तेज़ी सें चूसना शुरुआत कियासंग हि बुर केँ सुराख केँ अंदरजीभ घुसाकर गुदगुदाने लगा.अब तौ मेरी हालत औऱ भि खराब होनेलगी। मे ज़ोर सें हल्की चीख लें कर बोलि, “शिवमयह क्याँ कररहे होँ। इतने ज़ोर सें मेरी बुर कों मत चूसो औऱ यह तुम् छेद केँ अंदर गुदगुदी……। ऊउउउईईई…। मुझसे बर्दस्त नहि हौ पारहा हैं। प्लीज़ निकालो जीभ अंदर सें, मे पागल होँ जाउन्गि.”
मे उसे निकालने कों अवश्य कहरही थि मगर एक् सचये भि थां कि मुझे
बहोत मजा आँ रहा थां। बुर कि गुदगुदाहट सें मेरा सारा शरीर काँपरहा थां। उसने तोँ बुर कों छेड़ छेड़कर इतना गर्मकर डाला कि मे बर्दस्त नहि करपाई। मेरी बुर कां भीतरी हिस्सा रस सें गीला हौ गय़ा। उसने कुच्छ देर तक बुर केँ अंदर तक केँ हिस्से कों गुदगुदाने केँ बाद बुर कों मुक्त कर दिया। मे अब एक् समय भि रुकने कि हालत मे नहि थि। जल्द सें उसके जिस्म सें जिस्म सें लिपट गयीँ, औऱ लन्ड कों पकड़ने कां प्रयास कररही थि कि उसे बुर मे डाल लूँगी कि उसने मेरी टाँगो कों पकड़कर एकदम ऊँचाउठा दिया औऱ नीचे सें अपना मोटा लन्ड मेरी बुर केँ खुलेहुए च्छेद मे घुसाने कि कोशिश कि। वैसे तोँ बुर कां द्वार (दरवाज़ा) आमतौर पऱ बंद होता थां। मगरउस समय क्योंकि उसने टाँगो कों ऊपर कि ओरउठा दिया थां इसलिये छेद पूरीतरह खुल गय़ा थां। रस सें बुर गीली होँ रही थि। जब उसने लन्ड कां सुपाड़ा छेद पऱ रखखा तोँ यह भि एहसास हुआ कि छेद सें औऱ भि रस निकालने लगा। मे एक् समय कों तौ सीसीया उठी.जब उसने बुर मे लन्ड घुसाने कि बजाए हल्का सां रगड़ा। मे कराह लेकर बोलीं, “घुसाओ जल्द सें………। देरमत करो प्लीज़…………….”
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